कन्नौज से हुमायूँ और बैरामखाँ की सेनायें अलग हो गयीं थीं। जब हुमायूँ आगरा की ओर भाग रहा था तो शेरखा की सेना का ध्यान उस ओर से हटाने के लिये बैरामखाँ संभल की तरफ बढ़ा तथा उसने लखनौर के राजा मित्रसेन की शरण ली। जब शेरखा को यह ज्ञात हुआ तो उसने अपने आदमी लखनौर भेजे और बैरामखाँ को बुलावा भेजा।
जब शेरखा के आदमी बैरामखाँ को शेरखा के सामने लाये तब शेरखा ने भरी मजलिस में खड़े होकर बड़ी गरमजोशी से बैरामखाँ का स्वागत करते हुए कहा- ‘जो इखलास रखता है, वह खता नहीं करता।’[1]
बैरामखाँ ने भी तपाक से जवाब दिया- ‘हाँ! जो इखलास रखेगा, वह खता नहीं करेगा।’
बैरामखाँ का उत्तर सुनकर शेरखा का मुँह उतर गया। फिर भी उसने बैरामखाँ की बड़ी आवभगत की और सम्मान सहित छोड़ दिया। उसके जाने के बाद शेरखा ने अपने दरबारियों से कहा कि जब बैरामखाँ ने यह कहा कि जो इखलास रखेगा वह खता नहीं करेगा, मैं तभी समझ गया था कि यह हमसे मेल नहीं करेगा।
जब गुजरात के सुल्तान महमूद को मालूम हुआ कि बैरामखाँ हुमायूँ से बिछड़ गया है, तो उसने भी अपने आदमी बैरामखाँ को लाने के लिये भेजे। बैरामखाँ चाहता था कि वह किसी भी तरह अपने आदमियों के साथ सुरक्षित रूप से हुमायूँ से जा मिले जो कि इस समय सिंध में था। इसलिये बैरामखाँ महमूद के आदमियों के साथ गुजरात आ गया। महमूद ने भी उसकी बहुत आवभगत की और कई तरह के प्रलोभन दिये किंतु बैरामखाँ ने महमूद का एक भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और एक दिन उससे मक्का जाने के लिये छुट्टी मांगी। महमूद जानता था कि बैरामखाँ यहाँ से सीधा हुमायूँ के पास जायेगा किंतु उसने बैरामखाँ को रोका नहीं।
जिस समय बैरामखाँ हुमायूँ के पास पहुँचा उस समय हुमायूँ की सेना सिंध में भक्कर के सुल्तान महमूद से उलझी हुई थी। भक्कर के सिंधियों ने मुगल सेना की हालत खराब कर रखी थी। कई दिनों की लड़ाई के चलते हुमायूँ के पास बहुत कम सैनिक रह गये थे और वह किसी तरह अपने आप को जंग के मैदान में टिकाये हुए था। संयोग से बैरामखाँ सीधे रणक्षेत्र में ही पहुँचा। इतना समय नहीं था कि बैरामखाँ हुमायूँ से मिल पाता। इसलिये वह सीधे ही युद्ध में कूद पड़ा।
जिस समय बैरामखाँ युद्ध में कूदा उस समय हुमायूँ की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि कुछ ही देर में हुमायूँ की पराजय हो जायेगी। सुबह से ही उसके बहुत से सैनिक मारे गये थे। अमीरों ने हूमायूँ को सलाह दी कि वह मैदान छोड़कर सुरक्षित निकल जाये किंतु वह मृत्यु निश्चित जानकर भी लड़ता रहा। अचानक उसने देखा कि दुश्मन की सेना के पीछे से एक लश्कर प्रकट हुआ। बात ही बात में वह लश्कर टिड्डी दल की तरह दुश्मन पर छा गया। हुमायूँ ने अपने आदमियों से पूछा कि यह क्या लशकर गेब है ?[2] हुमायूँ के आदमी कुछ जवाब नहीं दे सके। लेकिन इस लश्कर को देखकर वे दूने उत्साह से तलवार चलाने लगे। बाद में मालूम हुआ कि वह लशकर गेब नहीं बैरामखाँ आ पहुँचा था और सीधा ही मैदाने जंग में कूद पड़ा था। जब बादशाह की सेना को मालूम हुआ कि बैरामखाँ है तो सब खुशी से चिल्ला उठे। सूरज डूबने से पहले युद्ध का पासा पलट चुका था। मुगल सेना ने मोर्चा मार लिया।
बैरमबेग के लौट आने की खुशी में हुमायूँ ने सचमुच बैरम[3] मनाया और उसके स्वागत में एक विशाल भोज का आयोजन किया। इस अवसर पर हुमायूँ ने कहा कि बेरमबेग सचमुच अपने नाम के अनुकूल आचरण करने वाला है। वह जहाँ भी जाता है वहीं जश्न मनाया जाता है। इसके बाद जब भी बेरमबेग किसी जंग से लौटकर आता तो हूमायूँ उसके स्वागत में उत्सव मनाता।
[1] जो विश्वास बनाये रखता है वह धोखा नहीं करता।
[2] देवमाया।
[3] तुर्की भाषा में बैरम का अर्थ होता है- ‘उत्सव।