Home Blog Page 120

राजा भगीरथ ने गंगाजी को धरती पर लाने के लिए महातप किया (14)

0
राजा भगीरथ - www.bharatkaitihas.com
राजा भगीरथ ने गंगाजी को धरती पर लाने के लिए महातप किया

राजा भगीरथ पुनः अपने दिव्य रथ पर सवार होकर समुद्र की ओर चल दिए तथा गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुईं समुद्र तक पहुँच गयीं। यहाँ से राजा भगीरथ गंगाजी को रसातल में ले गए तथा अपने पितरों की भस्म को गंगाजल से सिंचित करके उन्हें मुक्ति दिलवाई।

विभिन्न पुराणों से लेकर वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में ईक्ष्वाकु वंशी राजा भगीरथ का उल्लेख बहुत आदर के साथ हुआ है। हम पिछली कड़ियों में चर्चा कर चुके हैं कि राजा सगर के पौत्र का नाम अंशुमान था। अंशुमान का पुत्र दिलीप हुआ। ईक्ष्वाकु वंश में त्रेता युग में दिलीप नामक दो राजा हुए हैं। प्रथम दिलीप, राजा अंशुमान का पुत्र था एवं राजा भगीरथ का पिता था और दूसरा दिलीप राजा खटवांग का पुत्र था और राजा रघु का पिता था।

जब भगवान श्री हरि विष्णु ने कपिल मुनि के रूप में प्रकट होकर राजा सगर के साठ हजार  पुत्रों को भस्म कर दिया तब राजा अंशुमान ने अपने पितृव्यों के तर्पण के लिए गंगाजल प्राप्ति हेतु घनघोर तपस्या की किंतु वह गंगाजी को पृथ्वी पर नहीं ला पाया।

तदनंतर उसके पुत्र दिलीप ने भी घनघोर तपस्या की किंतु वह भी भगवती गंगा को धरती पर नहीं ला सका। राजा दिलीप के बाद उसका पुत्र भगीरथ अयोध्या का राजा हुआ। राजा भगीरथ ने भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घनघोर तपस्या की।

बहुत से पुराणों के अनुसार राजा भगीरथ पुत्रहीन थे। इसलिए उन्होंने राज्यभार अपने मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं गोकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या करने लगे। पितामह ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान माँगे, एक तो यह कि राजा भगीरथ अपने पितरों का गंगा जल से तर्पण करके उन्हें स्वर्ग पहुंचाएं और दूसरा यह कि राजा भगीरथ की कुल परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए एक पुत्र प्राप्त हो।

पितामह ब्रह्मा ने राजा भगीरथ को दोनों वरदान दिये तथा यह भी कहा कि स्वर्ग में बहने वाली गंगा नदी का वेग इतना अधिक है कि यह पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती। इसलिए तुम्हें भगवान शंकर को प्रसन्न करके उनकी कृपा प्राप्त करनी होगी।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने के पश्चात् राजा भगीरथ ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने का निश्चय किया तथा एक वर्ष तक अपने पैरों के अंगूठों पर खड़े होकर घनघोर तपस्या की। भगवान शंकर ने भगीरथ से कहा कि धरती के प्राणियों के पाप-ताप तथा शाप हरने के लिए गंगाजी का धरती पर अवतरित होना आवश्यक है। मैं इस कार्य में तुम्हारी सहायता करूंगा तथा गंगाजी के स्वर्ग से धरती पर अवतरित होने से पहले मैं उसे अपने शीश पर धारण करूंगा ताकि गंगजाजी का वेग कम हो सके।

जब देवी गंगा स्वर्ग से धरती पर गिरने लगीं तो उनका वेग अत्यंत प्रबल था। निश्चय ही यदि गंगाजी सीधे ही धरती पर गिरतीं तो धरती अपने स्थान पर स्थिर नहीं रह सकती थी। अतः भगवान शंकर ने स्वर्ग से आती हुई गंगाजी को अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपने मस्तक पर धारण कर लिया। तब से गंगाजी का नाम जटाशंकरी हो गया। वे भगवान शिव की जटाओं में ऐसे समा गईं कि उन्हें जटाओं से निकलने का मार्ग ही नहीं मिला।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस पर राजा भगीरथ ने फिर से भगवान शंकर की तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं से मुक्त किया। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव ने राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर अपनी जटाओं को निचोड़ा जिससे तीन बूंद जल प्रकट हुआ। एक बूंद जल की पुनीत धारा बनकर पाताल की ओर चली गयी, दूसरी बूंद आकाशगंगा बनकर आकाश की ओर तथा तीसरी बूंद जल की धारा के रूप में राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चली। कुछ पुराणों के अनुसार शिव की जटाओं से निकली गंगाजी सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। इनमें से तीन धाराएं ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा की ओर बढ़ीं। गंगाजी की अन्य तीन धाराएं सुचक्षु, सीता और सिंधु पश्चिम दिशा की ओर बढ़ीं और सातवीं धारा ‘भागीरथी’ राजा भगीरथ की अनुगामिनी हुई। राजा भगीरथ गंगाजी में स्नान करके पवित्र हुए और अपने दिव्य रथ पर चढ़कर हिमालय से समुद्र की ओर चल दिए। गंगा मैया उनके पीछे-पीछे चलीं। कुछ पुराणों के अनुसार इस मार्ग में जह्नु मुनि की यज्ञशाला थी जो गंगाजी के प्रवाह में बह गई। इस पर मुनि ने क्रुद्ध होकर गंगाजी को पी लिया। गंगाजी के इस प्रकार लुप्त हो जाने पर समस्त देवता चिंतित हुए और उन्होंने जह्नु मुनि का पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया तथा उनसे कहा कि  गंगाजी आपकी पुत्री हैं, कृपया उन्हें मुक्त करें।

इस पर जह्न ऋषि ने गंगाजी को अपने कानों के मार्ग से बाहर निकाला। तभी से गंगाजी जह्नुसुता एवं जाह्नवी कहलाने लगीं।

राजा भगीरथ पुनः अपने दिव्य रथ पर सवार होकर समुद्र की ओर चल दिए तथा गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुईं समुद्र तक पहुँच गयीं। यहाँ से राजा भगीरथ गंगाजी को रसातल में ले गए तथा अपने पितरों की भस्म को गंगाजल से सिंचित करके उन्हें मुक्ति दिलवाई।

राजा भगरीथ के दृढ़ संकल्प को देखकर पितामह ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर कहा- ‘हे भगीरथ, जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देवता के समान पूज्य माने जायेंगे तथा गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी के नाम से विख्यात होगी। तीन धाराओं में प्रवाहित होने के कारण गंगा आज से त्रिपथगा कहलाएगी।’

गंगा-अवतरण के सम्बन्ध में पुराणों में मिलने वाली कथाओं तथा महाभारत में मिलने वाली कथा में थोड़ा अंतर है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के वनपर्व में तीर्थयात्रा पर्व का सुंदर वर्णन किया है इसी वर्णन में राजा भगीरथ की तपस्या का वर्णन हुआ है। महर्षि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को भगीरथ की तपस्या का बहुत सुंदर वर्णन सुनाया था। इस वर्णन के अनुसार राजा भगरीथ ने गंगाजी को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक हिमालय पर्वत पर घनघोर तपस्या की।

एक हजार दिव्य वर्ष बीत जाने पर स्वयं गंगाजी ने साकार होकर राजा भगीरथ को दर्शन दिए तथा उनसे पूछा- ‘महाराज आप मुझसे क्या चाहते हैं।’

राजा भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा- ‘वरदायिनी महानदी! मेरे साठ हजार पितृव्यों की मुक्ति के लिए आप धरती पर चलें। मैं उनके उद्धार के लिये आपसे याचना करता हूँ।’

राजा भगीरथ की यह बात सुनकर विश्वन्दिता गंगाजी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा-

‘महाराज! मैं आपकी प्रार्थना स्वीकार करती हूँ किंतु आकाश से पृथ्वी पर गिरते समय मेरे वेग को रोकना बहुत कठिन है। महेश्वर नीलकण्ठ को छोड़कर तीनों लोकों मे कोई भी मेरा वेग धारण नही कर सकता। अतः हे महाबाहो! तुम तपस्या द्वारा उन्हीं वरदायक भगवान शिव को प्रसन्न करो। स्वर्ग से गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तक पर धारण करेंगे। विश्वभावन भगवान शंकर आपके पितरों के हित की इच्छा से आपका मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे।’

महाभारत की कथा के अनुसार जब गंगा भगवान शिव की जटाओं में होती हुई पृथ्वी पर अवतरित हुई तब वह राजा भगीरथ का अनुसरण करते हुए सूखे हुए समुद्र तक पहुँची, जिसका जल अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। समुद्र को भरने के पश्चात् गंगाजी ने पाताल में स्थित सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया।

पहले स्वर्ग, फिर पृथ्वी एवं अंत में पाताल में बहने के कारण गंगाजी ‘त्रिपथगा’ कहलाईं। यहाँ स्वर्ग से आशय हिमालय पर्वत के किसी क्षेत्र से, पृथ्वी का आशय भारत भूमि के मैदानी क्षेत्रों से तथा पाताल का आशय दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीपों  अर्थात् इण्डोनेशिया, कम्बोडिया, मलेशिया, वियतनाम एवं ऑस्ट्रेलिया आदि द्वीपों से लिया जाना चाहिए।

गंगाजी के धरती पर आने के उपलक्ष्य में राजा भगीरथ ने सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। उनके द्वारा किए गए महान् यज्ञ में देवराज इन्द्र सोमपान करके मदमत्त हो गया। यज्ञ के अंत में राजा भगीरथ ने गंगाजी के किनारे दो स्वर्ण घाट बनवाए तथा रथ में बैठी अनेक सुन्दर कन्याएँ धन-धान्य सहित, ब्राह्मणों को दान स्वरूप प्रदान कीं।

पुराणों में उल्लेख है कि भगीरथ के संकल्प कालिक जलप्रवाह से आक्रांत होकर गंगा राजा भगीरथ की गोद में जा बैठी। इस प्रकार वह भगीरथ की पुत्री होकर भागीरथी कहलाई और राजा की जंघा अर्थात् उरु पर बैठने के कारण ‘उर्वशी’ के नाम से विख्यात हुई।

पुराणों के अनुसार पृथ्वी-वासियों के पाप धोने के लिए देवनदी गंगा को धरती पर लाने के पश्चात् राजा भगीरथ ने दीर्घकाल तक अयोध्या में राज्य किया तथा प्रजा को सुखी बनाया। महर्षि वाल्मीकि ने गंगा-अवतरण का बहुत संुदर वर्णन किया है। प्रत्येक भारतवासी चिरकाल तक राजा भगीरथ का ऋणी रहेगा जिन्होंने गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर उतारकर भारत को सचमुच भारत बना दिया।

यदि इस प्रसंग को प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर देखा जाए तो गंगा-अवतरण की घटना एक महत्वपूर्ण भौगोलिक घटना है। इस घटना का मानवीकरण करके राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार का कथानक रचा गया है। गंगा अवतरण की घटना होने से पहले, समुद्रों का जल हिमकाल के कारण हिमालय पर्वत पर जमा हो गया था जिसके कारण समुद्र खाली हो गए थे।

इस सम्बन्ध में यह रूपक गढ़ा गया कि अगस्त्य ऋषि ने समुद्रों का जल पीकर उन्हें खाली कर दिया था। वस्तुतः अगस्त्य किसी बादल का नाम था जिसने समुद्रों का जल अपने भीतर खींच लिया था। इस प्रकार खाली हुए समुद्र के बीच जो हजारों द्वीप उभर आए होंगे उन्हें ही राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के नाम से पुकारा गया होगा।

जब हिमकाल बीत गया तब हिमालय की बर्फ पिघलने से सात नदियां ह्लादिनी, पावनी, नलिनी, सुचक्षु, सीता, सिंधु और भागीरथी एक साथ धरती की ओर प्रवाहित हुईं तथा इस जल से समुद्र भर गया। गंगा-अवतरण के कथानक में वर्णन आया है कि राजा भगीरथ द्वारा किए गए यज्ञ में इन्द्र सोमपान करके मदमत्त हो गया।

इस वाक्य का आशय इस घटना से लगता है कि हिमयुग बीत जाने के बाद जब हिमालय का जल नदियों के माध्यम से समुद्र में भर गया तब धरती पर फिर से वर्षा होने लगी। वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों में इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है तथा उसके मदमत्त हो जाने का अर्थ अधिक वर्षा करने से लगाया जा सकता है क्योंकि समुद्रों में जल भर जाने से वाष्पन की क्रिया से समुद्र का जल बादलों में पहुंचने एवं उनका जल फिर से धरती पर बरसने की क्रिया तेज हो गई होगी।

महर्षि अगस्त्य ने समुद्र पी लिया (15)

0
महर्षि अगस्त्य - www.bharatkaitihas.com
महर्षि अगस्त्य ने समुद्र पी लिया

बहुत से पुराणों में महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्रों को पीकर उन्हें खाली करने का आख्यान मिलता है। महाभारत में भी इस आख्यान का विस्तार से वर्णन किया गया है।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि जब राजा भगरीथ गंगाजी को स्वर्ग से उतार कर लाए तो वे गंगाजी को धरती से पाताल लोक में ले गए। मार्ग में गंगाजी ने उन रिक्त समुद्रों को भी जल से भर दिया जो महर्षि अगस्त्य द्वारा पी लिए जाने के कारण खाली पड़े थे।

इस कड़ी में हम महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्र का जल पिए जाने की घटना की चर्चा करेंगे। बहुत से पुराणों में महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्रों को पीकर उन्हें खाली करने का आख्यान मिलता है। महाभारत में भी इस आख्यान का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस आख्यान की भूमिका वृत्रासुर के वध से आरम्भ होती है तथा इसकी पूर्णाहुति ईक्ष्वाकु वंश के राजा भगीरथ पर जाकर पूर्ण होती है।

दर्शकों को स्मरण होगा कि हमने हिन्दू धर्म कथाएं की 18वीं कड़ी में वृत्रासुर वध के समय कालेय नामक दैत्यों का उल्लेख किया था। कुछ पुराणों में इन्हें कालकेय दैत्य कहा गया है। महाभारत में भी इन्हें कालकेय कहा गया है।

जब देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि की अस्थियां प्राप्त करके विश्वकर्मा से छः दांतों वाला भयंकर वज्र बनवाकर वृत्रासुर को मारने के लिए आया तब भगवान विष्णु एवं समस्त देवगण इन्द्र की सहायता के लिए आकाश में स्थित हो गए। उसी समय कालकेय नामक दैत्यों के एक विशाल समूह ने वृत्रासुर के चारों ओर घेरा बना लिया। देखते ही देखते देवों एवं दानवों का भयंकर युद्ध छिड़ गया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

कालकेय दैत्यों के काले शरीर अत्यंत भयंकर थे और उनके आकार बहुत विशाल थे। अंत में भगवान विष्णु के निर्देशन पर देवराज इंद्र ने वृत्रासुर पर वज्र से प्रहार किया जिससे वृत्रासुर भयानक गर्जना करता हुआ धरती पर गिर गया और कालकेय दैत्य समुद्र में जा छुपे।

कालकेय दैत्यों ने सोचा कि समस्त लोकों की रक्षा तप से होती है। अतः सबसे पहले तप का नाश किया जाना चाहिए, इसलिए पृथ्वी पर जितने भी धर्मात्मा, तपस्वी और पुण्यात्मा मनुष्य हैं उनका नाश कर दिया जाए। इससे समस्त लोक स्वतः नष्ट हो जाएंगे।

यह विचार स्थिर करने के बाद कालेय दैत्य दिन में समुद्र के भीतर छिपे रहते एवं रात्रि के समय समुद्र से बाहर आकर आश्रमों और तीर्थ-स्थानों में रहने वाले ऋषि-मुनियों को खा जाते। उनके अत्याचार इतने बढ़ गए कि पृथ्वी पर चारों ओर ऋषि-मुनियों की हड्डियां दिखाई देने लगीं।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

ऋषियों एवं मुनियों का संहार होते हुए देखकर देवगण अत्यंत दुःखी हुए और भगवान श्री हरि विष्णु के पास जाकर बोले- ‘भगवन्! इस संसार पर भारी विपत्ति आन पड़ी है, पता नही कौन, रात्रि के समय धर्मात्मा पुरुषों और ऋषि-मुनियों की हत्या करता है! यदि ऐसे ही धर्मात्माओं और ऋषि-मुनियों की हत्या होती रही तो पृथ्वी सहित समस्त लोकों का नाश होना निश्चित है! अतः हे जगदीश्वर! हमें इस विपत्ति से बाहर निकालें।’ प्रार्थना सुनकर भगवान श्री हरि विष्णु बोले- ‘हे देवगण! मैं इस भयंकर उत्पात से भलीभाँति परिचित हूँ। यह कार्य कालकेय नामक दैत्य कर रहे हैं। वे दिन भर तो समुद्र में छिपे रहते हैं और रात के समय समुद्र से बाहर निकलकर धर्मात्माओं और ऋषि मुनियों की हत्या करते हैं। जब तक वे समुद्र में हैं, तब तक तुम उनका वध नही कर सकते। इसलिए समुद्र को सुखाने के उपाय करो। समुद्र को सुखाने का सामर्थ्य सम्पूर्ण धरती पर केवल महर्षि अगस्त्य में है। इसलिए आप सब अगस्त्य ऋषि के पास जाएं।’ भगवान विष्णु के आदेश पर समस्त देवगण एकत्रित होकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुंचे। देवताओं ने ऋषि अगस्त्य को प्रणाम किया। देवताओं को इस प्रकार आया देखकर ऋषि अगस्त्य ने उनसे वहाँ आने का कारण पूछा। तब देवताओं ने समस्त वृत्तांत कह सुनाया।

देवताओं ने ऋषि से अनुरोध किया- ‘आप इस समुद्र को सुखा दें, ताकि हम उन दैत्यों का विनाश कर सकें जो समस्त ऋषि-मुनियों के काल बने बैठे हैं।’

देवताओं की यह प्रार्थना सुनकर महर्षि अगस्त्य ने कहा- ‘मैं इस संसार के कष्ट दूर करने के लिए तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।’

महर्षि अगस्त्य तपसिद्ध ऋषियों और देवताओं को अपने साथ लेकर समुद्र के तट पर गए तथा कहने लगे- ‘मैं समस्त संसार के हित के लिए इस समुद्र का पान करता हूँ।’

ऐसा कहकर मुनि अगस्त्य ने समुद्र का समस्त जल पी लिया। उन्होंने समुद्र के जल को अपने उदर में ऐसे धारण कर लिया जैसे कुंभ जल को धारण करता है। तभी से महर्षि अगस्त को कुंभज ऋषि कहा जाने लगा। समुद्र के सूख जाने के कारण धरती पर वर्षा बंद हो गई।

जब समुद्र खाली हो गए तो उसके तल में छिपे हुए कालकेय दैत्य दिखाई देने लगे। समस्त देवता अपने दिव्य अस्त्रों के साथ कालकेय दैत्यों पर टूट पड़े और एक बार पुनः देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया। इस युद्ध में कालकेय दैत्य देवताओं के हाथों मारे गए।

जब कालकेय दैत्य समाप्त हो गए तब देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से प्रार्थना की कि अब आप समुद्र के पिये हुए जल को पुनः छोड़ दीजिए किंतु मुनि अगस्त्य ने कहा- ‘मैंने समस्त जल पचा लिया है। अतः अब मैं उसे नहीं छोड़ सकता।’

महर्षि अगस्त्य की यह बात सुनकर देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पितामह ब्रह्माजी के पास गए एवं उनके समक्ष करबद्ध होकर प्रार्थना करने लगे कि आप समुद्र को फिर से भर दें ताकि धरती पर फिर से वर्षा आरम्भ हो सके। इस पर पितामह ब्रह्मा ने देवताओं को सलाह दी कि आप समस्त देवगण अपने-अपने स्थान पर जाएं। कुछ समय बाद जब इक्ष्वाकु वंशी राजा भगीरथ अपने पुरखों के उद्धार के लिए गंगाजी को धरती पर लेकर जाएंगे तब यह समुद्र पुनः जल से भर जाएगा।

पितामह ब्रह्मा के आदेशानुसार समस्त देवता अपने स्थान पर चले गए और राजा भगीरथ का जन्म होने की प्रतीक्षा करने लगे। आगे का कथानक हम पिछली कथा में सुना चुके हैं जिसमें राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाने और गंगाजी द्वारा समुद्र को पुनः जल से भरने की कथा कही गई थी।

ऐसा जान पड़ता है कि अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र को पीकर उसे खाली करने एवं धरती पर वर्षा बंद हो जाने का पौराणिक कथानक एक पर्यावरणीय घटना है। जब धरती पर हिमकाल आता है तो समुद्रों का वह जल जो बादलों में स्थित होता है, वह वर्षा के रूप में धरती पर न बरस कर बर्फ के रूप में पहाड़ों पर गिरता है और वहाँ बर्फ के रूप में कैद हो जाता है। इससे समुद्र का जलस्तर नीचे गिर जाता है।

जब पुनः गर्मयुग आरम्भ होता है तब पहाड़ों की बर्फ पिघल जाती है तथा पर्वतों का जल फिर से नदियों में प्रवाहित होता हुआ समुद्र में पहुंचने लगता है। धरती पर सूर्यताप बढ़ने से समुद्र के जल का वाष्पन होने लगता है और फिर से धरती पर वर्षा होने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है।

वस्तुतः कुंभज ऋषि द्वारा समुद्र को पीकर खाली करने, राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाने एवं इन्द्र द्वारा धरती पर वर्षा आरम्भ करने के रूपक इन्हीं पर्यावरणीय घटनाओं का मानवीकरण करके लिखी गई प्रतीत होती हैं।

हमारे इस कथन का आशय यह कतई नहीं है कि कोई राजा भगीरथ नहीं हुए थे अथवा कोई अगस्त्य ऋषि नहीं हुए थे या कोई इन्द्र नामक देवता नहीं हुए थे। निःसंदेह वे सब हुए थे और उन्होंने पृथ्वी के कल्याण के लिए बहुत बड़े-बड़े कार्य किए थे तभी तो उन्हें और अधिक महान् बताने के लिए इतनी बड़ी घटनाओं का नायक भी ठहरा दिया गया। भारतीय संस्कृति राजा भगीरथ एवं महर्षि अगस्त्य की चिरकाल तक ऋणी रहेगी।

महर्षि अगस्त्य निःसंदेह एक ऐसे ऋषि हुए हैं जिन्होंने भारत को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया किंतु उनकी कथा हम इक्ष्वाकुवंशी राजा रामचंद्र के प्रसंग में बताने का प्रयास करेंगे।

राजा नाभि के समय नवीन सृष्टि आरम्भ हुई (16)

0
राजा नाभि - www.bharatkaitihas.com
राजा नाभि के समय नवीन सृष्टि आरम्भ हुई

राजा ईक्ष्वाकुवंशी राजा अंशुमान के पौत्र राजा भगीरथ गंगाजी को धरती पर लाये। राजा भगीरथ के बाद उनका पुत्र श्रुत और श्रुत के बाद राजा नाभि अयोध्या का राजा हुआ।

पौराणिक अख्यानों के अनुसार राजा नाभि के समय में धरती पर बहुत सी बड़ी हलचलें हुईं। चूंकि वह काल हिमयुग के व्यतीत हो जाने के बाद आरम्भ हुए गर्मयुग का काल था इसलिए धरती पर बहुत से भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिवर्तन हुए। इस काल में नदियां पूरे वेग से बहने लगी थीं और आकाश में काले बादल छाए रहते थे जिनके कारण धरती पर वर्षा की मात्रा बहुत अधिक थी।

धरती पर चारों ओर बड़े-बड़े ताल-तलैया तथा बर्फीली नदियां दिखाई देती थीं। एक समय ऐसा भी आया कि राजा नाभ को अपनी प्रजा को जल प्रलय से बचाने के लिए अयोध्या छोड़कर पुनः हिमालय पर्वत पर जाना पड़ा जहां उनके पूर्वज महाराज मनु ने भी अपनी प्रजा की रक्षा के निमित्त आश्रय लिया था।

हिमलाय की तराई में स्थित भूमि गंगा-यमुना के दो आब की अपेक्षा काफी ऊंचाई पर थी इसलिए राजा नाभ ने कश्मीर से लेकर मगध तक की भूमि अपने अधिकार में कर ली और अपने राज्य रूपी शरीर की नाभि अयोध्या में बसायी। अर्थात् उन्होंने अपनी राजधानी अब भी अयोध्या में रखी।

कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा नाभि के समय में धनुष का आविष्कार हुआ। उन्होंने ही पहली बार विधिवत् हल से खेती आरम्भ करायी। उनके समय में उपकरण एवं शस्त्र हड्डियों और पत्थरों से बनते थे, परन्तु वे अपने से पहले वाले युग की अपेक्षा अधिक मजबूत और नुकीले थे। मनुष्य को धातुओं की पहचान भी राजा नाभि के समय में हुई।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

राजा नाभि की कथा से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस राजा का काल दो प्रस्तर युगीन सभ्यताओं के बीच का काल होना चाहिए। नृवंश विज्ञानियों के अनुसार भारत में प्रथम पाषाण काल का आरम्भ डेढ़ लाख साल पहले हुआ। इसे पुरापाषाण काल भी कहते हैं।

इस काल के बहुत से उपकरण एवं शस्त्र काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मिलते हैं। ये उपकरण बहुत ही मोटे एवं भद्दे हैं इन्हें देखने से अनुमान होता है कि इस काल में मानव आखेट की अवस्था में था और कृषि एवं पशुपालन से परिचित नहीं था। वह नदियों के किनारों पर स्थित जंगलों में घूमता रहता था।

दूसरा पाषाण काल आज से लगभग पचास हजार साल पहले आरम्भ हुआ। इसे मध्यपाषाण काल कहा जाता है। इस युग के उपकरण नदियों के किनारे एवं शैलाश्रयों के निकट मिलते हैं। ये उपकरण अपेकक्षाकृत अधिक तीखे, छोटे और धारदार हैं। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। इन उपकरणों के मिलने का अर्थ है कि इस काल का मानव मछली एवं पशुओं को छीलने एवं उनसे हड्डियां एवं कांटे अलग करने में दक्ष था। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

तीसरा पाषाण काल उत्तर-पाषाण काल कहलाता है। इसका आरंभ आज से लगभग 10-12 हजार वर्ष पूर्व हुआ। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाए गए। इस काल में कपास की खेती भी होने लगी थी। समाज का वर्गीकरण आरंभ हो गया था। व्यवसायों के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हो गया था। इस प्रकार मानव सभ्यता हिमयुगों एवं गर्मयुगों के आने-जाने के बीच के कालों में बार-बार प्रकट हुई एवं नष्ट हुई। यही कारण है कि इक्ष्वाकु वंश के कई राजाओं के काल में नवीन सभ्यता आरम्भ होने की कथाएं मिलती हैं जिनमें से राजा नाभि भी एक था। नृवंशी वैज्ञानिकों का मानना है कि पुराणों में वर्णित भगवान परशुराम भी पाषणकालीन चरित्र है। भगवान परशुराम का उल्लेख विभिन्न पुराणों, वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में मिलता है। इन कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम की उपस्थिति रामायण काल में भी मिलती है और महाभारत काल में भी। पुराणों की कालगणना इतनी उलझी हुई है कि हम उनके आधार पर भगवान परशुराम के युग अथवा जीवन काल का निर्धारण नहीं कर सकते। यदि उन्हें रामायण काल का पात्र माना जाए तो वे आज से लभगग सात से दस हजार साल पहले हुए और यदि भगवान परशुराम को महाभारत कालीन माना जाए तो वे आज से लगभग पांच हजार साल पुराने सिद्ध होते हैं।

कोई भी व्यक्ति पांच हजार साल तक जीवित रहे, यह संभव नहीं है किंतु यदि हम पुराणों में आए विवरण को देखें तो हर युग में मनुष्य की आयु अलग-अलग बताई गई है। पुराणों के अनुसार मनुष्य की आयु सतयुग में 1 लाख वर्ष, त्रेतायुग में 10 हजार वर्ष,  द्वापर में 1 हजार वर्ष और कलियुग में 100 वर्ष होती है।

यदि यह सही है तो परशुराम का रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक होना संभव है किंतु धरती पर आज तक कोई भी नर कंकाल या उसका छोटा सा अवशेष ऐसा नहीं मिला है जिसके जीवनकाल का निर्धारिण कार्बन डेटिंग के आधार पर कुछ सौ वर्ष या कुछ हजार वर्ष किया जा सके।

पुराणों में जिन सप्त चिंरजीवियों की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, उनमें भी भगवान परशुराम का नाम सम्मिलित है। इस दृष्टि से भी भगवान परशुराम की उपस्थिति रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक होनी संभव है किंतु वैज्ञानिक आधार पर इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता।

फिर भी हम अनुमान लगा सकते हैं कि जब धरती पर बार-बार हिमयुगों एवं गर्मयुगों  के आने-जाने के कारण मानव सभ्यता नष्ट हो जाती थी, या समूची धरती ही समुद्र में डूब जाती थी और हजारों साल बाद पुनः प्रकट होती थी, तब ऐसी स्थिति में हजारों साल पुराने नरकंकाल भी नष्ट हो जाते होंगे।

इसलिए हम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाते किंतु इसका जवाब वैज्ञानिकों के पास यह है कि धरती से लाखों वर्ष पुराने वानर-कंकाल, डायनासोर-कंकाल और नरकंकाल प्राप्त हुए हैं। इनमें से किसी का भी जीवन काल हजारों वर्ष का नहीं ठहरता है।

भारतीय पुराणों में आए आख्यानों एवं वैज्ञानिक शोधों के बीच कालगणना का यह अंतर तब तक विद्यमान रहेगा जब तक कि भारतीय पुराण अपने समर्थन में कोई भौतिक साक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते हैं। तब तक हिन्दू समाज इस आस्था पर दृढ़ रहेगा कि भगवान परशुराम इक्ष्वाकु वंशी राजाओं की कई पीढ़ियों के राजााओं के काल में धरती पर विद्यमान थे, महाभारत काल में भी थे और चिरंजीवी होने के कारण वे आज भी धरती पर विद्यमान हैं किंतु वैज्ञानिक इस बात को कहते रहेंगे कि धरती पर आज तक किसी भी मनुष्य की आयु हजारों वर्ष की नहीं हुई है।

राजा ऋतुपर्ण ने आकाश से ही पेड़ के पांच करोड़ पत्ते गिन लिए (17)

0
राजा ऋतुपर्ण - www.bharatkaitihas.com
राजा ऋतुपर्ण ने आकाश से ही पेड़ के पांच करोड़ पत्ते गिन लिए

राजा नाभि के पश्चात् ईक्ष्वाकु वंश में राजा सिन्धुदीप तथा उसके बाद राजा अयुतायुष अयोध्या का राजा हुआ। राजा अयुतायुष के परलोक गमन के पश्चात् राजा ऋतुपर्ण अयोध्या का राजा हुआ। ऋतुपर्ण अयोध्या का पुराकालीन राजा माना जाता है।

वायु पुराण, ब्रह्म पुराण तथा हरिवंश पुराण इत्यादि पुराणों एवं महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में ऋतुपर्ण को अयुतायुष का पुत्र बताया गया है। बौधायन श्रौत्रसूत्र के अनुसार ऋतुपर्ण भंगाश्विन का पुत्र तथा शफाल नामक राज्य का राजा था।

कुछ पुराणों के अनुसार ऋतुपर्ण के पिता का नाम सर्वकाम था। ऋतुपर्ण अश्वविद्या में अत्यंत निपुण था। निषध देश का राजा नल जुए में अपना राज्य हार जाने के उपंरात अपने अज्ञातवास के काल में इसी ईक्ष्वाकुवंशी राजन्ऋ तुपर्ण के पास ‘बाहुक’ नाम से सारथि के रूप में रहा था।

जब राजा नल की रानी दमयंती को अपने अनुचर पर्णाद के माध्यम से ज्ञात हुआ कि राजा नल सारथि के रूप में रह रहा है तो रानी दमयंती ने ऋतुपर्ण के पास संदेश भिजवाया कि मुझे अपने पति राजा नल का कुछ भी पता नहीं लग सका है। इसलिए मैं अपना दूसरा स्वयंवर कल सूर्याेदय के समय कर रही हूँ। अतः ऋतुपर्ण भी समय रहते विदर्भ राज्य की कुंडनिपुर पधारें। दमयंती का विचार था कि ऋतुपर्ण के साथ राजा नल भी अवश्य ही आएगा।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

ऋतुपर्ण ने अपने सारथि बने हुए राजा नल से कहा कि कल ही सूर्योदय के समय स्वयंवर है जबकि इतने कम समय में कुंडनिपुर पहुंचना संभव नहीं है। इस पर राजा नल ने अपनी अश्वविद्या के बल से ऋतुपर्ण को ठीक समय पर कुंडनिपुर पहुँचाने का आश्वासन दिया। सारथि बना हुआ राजा नल एवं सूतपुत्र वार्ष्णेय राजा के रथ पर सवार हो गए।

ऋतुपर्ण भी रथ पर बैठ गया। जैसे आकाशचारी पक्षी आकाश में उड़ते हैं, वैसे ही बाहुक का रथ थोड़े ही समय में नदी, पर्वत और वनों को लाँघने लगा। एक स्थान पर ऋतुपर्ण का उत्तरीय नीचे गिर गया। उन्होंने नल से कहा- ‘रथ रोको बाहुक! वार्ष्णेय मेरा उत्तरीय उठा लाएगा।’

बाहुक रूपी नल ने कहा- ‘महाराज! आपका वस्त्र गिरा तो अभी है परन्तु हम वहाँ से एक योजन आगे निकल आए हैं। अब वह नहीं उठाया जा सकता।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जिस समय यह बात हो रही थी, उस समय रथ एक वन के ऊपर से निकल रहा था। ऋतुपर्ण ने कहा- ‘बाहुक तुमने मुझे अपनी अश्व-विद्या दिखाई, अब तुम मेरी गणित-विद्या देखो। सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल दिख रहे हैं, उनकी अपेक्षा भूमि पर गिरे हुए फल और पत्ते एक-सौ-एक गुना अधिक हैं। इस वृक्ष की दोनों शाखाओं और टहनियों पर पाँच-करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पिच्यानवे फल हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो।’

इस पर बाहुक अर्थात् राजा नल ने रथ वहीं आकाश में खड़ा कर दिया और कहा कि मैं इस बहेड़े के वृक्ष को काटकर इसके फलों और पत्तों को ठीक-ठीक गिनकर निश्चय करूँगा। जब बाहुक ने उन फलों और पत्तों को गिना तो वे उतने ही निकले जितने ऋतुपर्ण ने बताए थे। बाहुक बने राजा नल ने आश्चर्य चकित होकर कहा- ‘राजन्! आपकी विद्या अद्भुत है। आप अपनी विद्या मुझे सिखा दीजिये।’ इस पर राजा ऋतुपर्ण ने कहा- ‘गणित-विद्या की तरह मैं पासों की वशीकरण-विद्या में भी इतना ही निपुण हूँ।’

बाहुक ने कहा- ‘आप मुझे यह विद्या भी सिखा दें तो मैं आपको अपनी दिव्य अश्व विद्या सिखा दूंगा।’

ऋतुपर्ण को विदर्भ पहुँचने की जल्दी थी और अश्वविद्या सीखने का लोभ भी था। अतः उसने राजा नल को गणित और पासों की विद्याएं सिखा दीं तथा कहा- ‘मैं तुमसे अश्वविद्या बाद में सीखूंगा। वह तुम्हारे पास मेरी धरोहर है।’

महाभारत वन पर्व के नलोपाख्यान में राजा ऋतुपर्ण का उल्लेख हुआ है। महाभारत में आए प्रसंग के अनुसार बृहदश्व मुनि कहते हैं- ‘हे युधिष्ठिर! तदनन्तर संध्या होते-होते सत्य-पराक्रमी राजा ऋतुपर्ण सारथी बाहुक तथा सूतपुत्र वार्ष्णेय के साथ विदर्भ राज्य में जा पहुँचे। राजा के अनुचरों ने राजा भीष्मक को इस बात की सूचना दी।

राजा भीष्मक के अनुरोध पर ऋतुपर्ण ने अपने रथ की घर्घराहट द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया। राजा नल के घोड़े वहीं रहते थे। वे रथ का घोष सुनकर अत्यंत प्रसन्न और उत्साहित हुए। उन्होंने अपने स्वामी के द्वारा संचालित हो रहे रथ की घर्घराहट को पहचान लिया।

रानी दमयन्ती ने भी नल के रथ की घर्घराहट सुनी, मानो वर्षाकाल में गरजते हुए मेघों का गम्भीर घोष हो रहा हो। इस महा-भयंकर रथनाद को सुनकर रानी दमयंती को अत्यंत विस्मय हुआ और उसने पहचान लिया कि रथ को राजा नल चला रहा है। इसलिए रानी दमयंती अपने स्वामी नल को देखने की इच्छा से ऊंचे महल की छत पर चढ़ गई। रानी ने राजा नल को देखते ही पहचान लिया।

महल के द्वार पर पहुंचकर रथ रुक गया। राजा नल तो रथ पर ही रहा और ऋतुपर्ण रथ से उतरकर दमयंती के पिता राजा भीष्मक से मिला। राजा भीष्मक ऋतुपर्ण को अपने महल में ले आया।

ऋतुपर्ण को वहाँ स्वयंवर जैसा कोई आयोजन दिखाई नहीं दिया। स्वयं राजा भीष्मक को भी ज्ञात नहीं था कि दमयंती ने झूठा संदेश भेजकर ऋतुपर्ण को बुलाया है। ऋतुपर्ण समझ गया कि उसे राजा भीष्मक ने वहाँ नहीं बुलाया है अपितु उसे बुलाए जाने के पीछे कोई और कारण है। इसलिए ऋतुपर्ण ने विदर्भराज से कहा- ‘राजन्! मैं आपका अभिवानदन करने के लिये आया हूँ।’

राजा भीष्मक ने विचार किया कि ऋतुपर्ण सौ योजन से भी अधिक दूरी से केवल मुझे प्रणाम करने नहीं आया है किंतु उसने ऋतुपर्ण के समक्ष ऐसा ही प्रकट किया जैसे ऋतुपर्ण का यूं चले आना सहज बात ही है और ऋतुपर्ण से कहा- ‘राजन्! आप बहुत थक गए होंगे, अतः विश्राम कीजिये।’

विदर्भ नरेश के द्वारा प्रसन्नता पर्वूक आदर-सत्कार पाकर ऋतुपर्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने राजा भीष्मक के यहाँ विश्राम करना स्वीकार कर लिया। इसी बीच ऋतुपर्ण का सारथी बाहुक अपना रथ लेकर रथशाला में आ गया और रथ के घोड़ों को खोलकर सूतपुत्र वार्ष्णेय के साथ रथ के पिछले भाग में जा बैठा। इसी समय रानी दमयन्ती ने राजा नल का पता लगाने के लिये अपनी दूती को रथशाला में भेजा। दासी ने राजा नल को पहुचान लिया। इस पर राजा नल अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गया।

राजा नल वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर अपनी रानी दमयन्ती एवं अपने श्वसुर राजा भीष्मक से मिला। राजा भीष्मक ने बड़ी प्रसन्नता के साथ नल का स्वागत किया। राजा नल के आगमन की प्रसन्नता में विदर्भ नगर में बड़ा आनंद हुआ।

जब ऋतुपर्ण ने सुना कि बाहुक के वेष में राजा नल उसकी सेवा कर रहा था तो ऋतुपर्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने जाने-अनजाने में की गई अपनी गलतियों के लिए राजा नल से क्षमा याचना की। नल ने भी अनेक युक्तियों द्वारा ऋतुपर्ण की प्रशंसा करते हुए उनका धन्यवाद ज्ञापित किया।

नल ने ऋतुपर्ण से कहा- ‘आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहर के रूप में पड़ा है। राजन्! यदि आप उचित समझें तो मैं उसे आप को देने की इच्छा रखता हूँ।’ ऐसा कहकर निषधराज नल ने ऋतुपर्ण को अश्वविद्या प्रदान की। ऋतुपर्ण ने भी राजा नल से शास्त्रीय विधि के अनुसार अश्वविद्या ग्रहण की तथा अश्वों के रहस्य को समझा।

इसके बाद ऋतुपर्ण ने नल को द्यूतविद्या का रहस्य बताया और सूतपुत्र वार्ष्णेय को अपना सारथि बनाकर पुनः अयोध्या चले गए। ऋतुपर्ण के चले जाने पर राजा नल कुछ समय तक कुण्डिनपुर में रहे और रानी दमयंती को लेकर अपने राज्य ‘निषध’ चले गए। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा सौदास महर्षि वसिष्ठ के श्राप से कल्मषपाद राक्षस बन गया (18)

0
राजा सौदास - www.bharatkaitihas.com
राजा सौदास महर्षि वसिष्ठ के श्राप से कल्मषपाद राक्षस बन गया

ईक्ष्वाकु वंशी राजा सौदास का उल्लेख अनेक हिन्दू पौराणिक ग्रंथों एवं महाभारत में हुआ है। विष्णु पुराण के अनुसार राजा सौदास इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजा ऋतुपर्ण का प्रपौत्र, राजा सर्वकाम का पौत्र तथा राजा सुदास का पुत्र था। सुदास का पुत्र होने के कारण इसे सौदास कहा जाता था।

कुल पुरोहित वसिष्ठ के आशीर्वाद से राजा सुदास और सौदास ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। एक बार राजा सौदास ने महर्षि वसिष्ठ को नमस्कार करके पूछा कि हे पूज्यवर! इस संसार में अत्यंत पूज्यवान वस्तु क्या है?

इस पर महिर्ष वसिष्ठ ने कहा- ‘गाय।’

राजा सौदास के अनुरोध पर महर्षि वसिष्ठ ने गाय की महत्ता बताने के लिए एक उपदेश दिया जिसे ‘गवोपतिषत्’ कहते हैं। इस उपदेश के अनुसार प्रतिदिन गौ-पूजन करना, उसे भक्ति के साथ प्रणाम करना और गाय से प्राप्त दूध, दही एवं घी आदि को उपयोग में लाना अत्यंत लाभकारी बताया गया है।

एक बार राजा सौदास अरण्य में आखेट खेलने गया। वहाँ राजा सौदास ने दो भयंकर राक्षसों को देखा। उनमें से एक राक्षस को राजा सौदास ने मार दिया किंतु दूसरा राक्षस भयभीत होकर अदृश्य हो गया तथा उसने राजा सौदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया। राजा सौदास भी अरण्य से अपनी राजधानी अयोध्या लौट आया।

कुछ सयम पश्चात् कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा से राजा सौदास ने एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा एवं रानी ने गुरु वसिष्ठ सहित समस्त ब्राह्मणों को भोजन करवाया। जिस मायावी राक्षस ने राजा सौदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया था। उसे इस यज्ञ के बारे में ज्ञात हो गया और वह अपने साथी दैत्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए वेश बदल कर राजा सौदास के महल में आया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

उस दैत्य ने अवसर पाकर महर्षि वसिष्ठ के भोजन में नरमांस मिला दिया। रानी दमयंती ने अत्यंत श्रद्धा से वह भोजन कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ को परोसा।

जब महर्षि वसिष्ठ ने अपने सामने नरमांस परोसा हुआ देखा तो उन्होंने राजा को श्राप दिया- ‘हे सौदास! तूने मुझे खाने के लिए नरमांस दिया है, इसलिए तू राक्षस हो जा और यही भोजन कर।’

इस पर राजा सौदास कुलगुरु वसिष्ठ पर क्रुद्ध हुआ और बोला- ‘आपने बिना सोचे-समझे हमें निरपराधी होते हुए भी इतना भयानक श्राप दिया है, अतः मैं भी आपको श्राप दूंगा।’

राजा ने कुलगुरु को श्राप देने के लिए अपने हाथ में जल लिया तो रानी मदयंती राजा के पैरों में गिर पड़ी और प्रार्थना करने लगी- ‘कुलगुरु को श्राप देना उचित नहीं है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस पर राजा सौदास ने अपने हाथ का जल अपने पैरों पर गिरा दिया। इस जल के स्पर्श से राजा सौदास के पैर काले हो गए तथा तभी से राजा को कल्मषपाद कहा जाने लगा। शाप के प्रभाव से राजा उसी क्षण राक्षस बन गया। उसी समय वसिष्ठजी को राक्षस द्वारा भोजन में नरमांस मिलाए जाने की बात ज्ञात हुई और उन्होंने कल्मषपाद राक्षस बने राजा सौदास से कहा- ‘मेरे शाप का प्रभाव बारह वर्ष तक रहेगा। जब आप श्राप के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे, तब आपको श्रापकाल की घटनाएं स्मरण नहीं रहेंगी।’ राक्षस कल्पषपाद अपनी राजधानी छोड़कर जंगलों में चला गया और प्राणियों को मार कर खाने लगा। एक बार कल्पषपाद अरण्य में एक संकरे पथ पर जा रहा था। उसी संकरे पथ पर सामने से महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति आ रहा था। इस बात पर दोनों में बहस छिड़ गई कि कौन किसके लिए मार्ग छोड़ेगा! महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति ऋषि वेश में था, इसलिए वह चाहता था कि राजा अपने गुरुपुत्र के सम्मान में मार्ग छोड़े। जबकि राजा चाहता था कि ऋषिपुत्र एक चक्रवर्ती सम्राट के लिए मार्ग छोड़े। जब गुरुपुत्र ने राजा के लिए मार्ग नहीं छोड़ा तो कल्मषपाद गुरुपुत्र को रस्सी से मारने लगा।

संयोगवश महर्षि विश्वामित्र भी वहाँ आ निकले। उन्होंने एक वृक्ष के पीछे खड़े होकर यह समस्त दृश्य देखा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी महर्षि वसिष्ठ के पुत्र शक्ति को संत्रास देने के लिए किंकर नामक एक राक्षस की सृष्टि की तथा उसे राजा कल्पषपाद के शरीर में प्रवेश करा दिया। इस कारण कल्मषपाद ने और भी भयंकर रूप धारण कर लिया। शक्ति भयभीत होकर वहाँ से चला गया।

एक बार राक्षस कल्मषपाद ने एक ब्राह्मण युगल को रति के क्षणों में देखा। कल्मषपाद ने ब्राह्मण को मार दिया। इस पर ब्राह्मण-पत्नी ने दुःखी होकर कहा- ‘तू जब भी अपनी पत्नी के पास जाएगा, तू भी इसी तरह मर जाएगा, जिस तरह तूने आज मेरे पति को मारा है।’

एक बार राक्षस कल्मषपाद अरण्य में घूमता हुआ ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में जा पहुंचा। वहाँ उसने वसिष्ठ के पुत्रों को यज्ञ करते हुए देखा तो कल्मषपाद वसिष्ठ के पुत्रों को खा गया। महर्षि वसिष्ठ ने अपने पुत्रों के शोक में अपने शरीर का अंत करने का निश्चय किया तथा उन्होंने पर्वत से गिरकर, समुद्र में डूबकर, अग्नि में जलकर देहत्याग करने का निश्चय किया किंतु देवताओं ने उन्हें मरने नहीं दिया।

इस पर महर्षि वसिष्ठ अपना शरीर लताओं से बांधकर एक तेज प्रवाहयुक्त नदी में कूद गए। यहाँ भी देवताओं ने उन्हें लताओं के पाश से मुक्त कर दिया। ऋषि बच गए तथा उसी दिन से उस नदी का नाम ‘विपाशा’ हो गया जिसे अब हम ‘व्यास’ नदी कहते हैं।

जब महर्षि विपाशा में जीवित बच बए तो उन्होंने एक अन्य नदी में कूदकर प्राण त्यागने का निश्चय किया। जैसे ही ऋषि वसिष्ठ ने नदी में प्रवेश किया, नदी सौ धाराओं में बंट गई और महर्षि स्वतः उससे बाहर निकल गए। उस दिन से उस नदी का नाम ‘शतुद्रि’ हो गया जिसे अब हम ‘सतलुज’ के नाम से जानते हैं।

एक बार महर्षि वसिष्ठ अपनी पुत्रवधु अदृश्यंति के साथ अरण्य में काष्ठ एकत्रित कर रहे थे। तब महर्षि को क्षीण स्वर में वेदमंत्र सुनाई दिए। इस पर महर्षि ने अपनी पुत्रवधु से पूछा- ‘ये वेदमंत्र कौन बोल रहा है।’

इस पर अदृश्यंति ने कहा- ‘विगत 12 वर्षों से मेरे गर्भ में आपके पुत्र शक्ति का पुत्र वेदघोष कर रहा है।’

जब महर्षि को ज्ञात हुआ कि मेरे कुल का सम्पूर्ण विनाश नहीं हुआ है तो महर्षि ने देह-त्याग करने का निश्चय छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् अदृश्यंति के गर्भ से पराशर ऋषि ने जन्म लिया। पराशर का शब्दिक अर्थ होता है- ‘प्राण बचाने वाला।’ चूंकि उन्होंने अपने पितामह वसिष्ठ के प्राण बचाए थे, इसलिए वे पराशर कहलाए।

इस तरह लगभग 12 वर्ष होने को आए। एक दिन राक्षस कल्मषपाद ने महर्षि वसिष्ठ को अरण्य में संचरण करते हुए देखा। वह महर्षि को खा जाने के लिए उन पर झपटा। महर्षि ने दया करके उसे शाप-मुक्त कर दिया। राजा सौदास शापमुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हुआ तथा पुनः अपनी राजधानी अयोध्या में लौट आया।

जब राजा सौदास को राज्य करते हुए बहुत दिन बीत गए तो उसे चिंता हुई कि उसका कोई पुत्र नहीं है। ब्राह्मणी के शाप के कारण राजा अपनी रानी से पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकता था। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार जब लम्बे समय तक राजा सौदास को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो महर्षि वसिष्ठ ने राजा सौदास के अनुराध पर रानी मदयंती को मंत्रों के बल पर गर्भाधान कराया।

इससे रानी मदयंती गर्भवती हो गई किंतु सात वर्ष तक बालक गर्भ से बाहर नहीं आया। इस पर वसिष्ठ ने रानी के गर्भ पर ‘अश्म’ अर्थात् पत्थर से प्रहार किया जिससे रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। उस बालक का नाम ‘अश्मक’ हुआ। उसे वीरसह अथवा मित्रसह भी कहते थे। राजा सौदास के बाद यही अश्मक अयोध्या का राजा हुआ।

राजा खट्वांग की कथा

0
राजा खट्वांग - www.bharatkaitihas.com
राजा खट्वांग की कथा

राजा खट्वांग अपनी मृत्यु की जानकारी होते ही स्वर्ग छोड़कर अयोध्या आ गए !

ईक्ष्वाकु वंश के द्वापर युगीन राजाओं में खट्वांग भी महाप्रतापी, धर्मपरायण एवं सत्यव्रती राजा हुए हैं। इनकी कथा अनेक पुराणों एवं महाभारत में भी मिलती है। कुछ पुराणों में इन्हें राजा दिलीप भी कहा गया है।

ईक्ष्वाकु वंश में दिलीप नामक एक राजा, खट्वांग से बहुत पहले भी त्रेता युग में हुए थे, वे राजा भगीरथ के पिता थे। ईक्ष्वाकु वंश के दिलीप नामक एक राजा द्वापर युग में भी हुए थे। आज हम जिस राजा दिलीप की कथा सुनाने जा रहे हैं, उनका वास्तविक नाम राजा खट्वांग है और वे त्रेता युगीन राजा हैं।

कुछ पुराणों में खट्वांग के पुत्र का नाम दीर्घबाहु दिलीप लिखा गया है किंतु हम इस समय स्वयं को राजा खट्वांग पर ही केन्द्रित करते हैं जिन्हें कुछ पुराणों ने राजा दिलीप भी कहा है। विष्णु पुराण का कथन है कि राजा दिलीप जैसा पृथ्वी पर कोई राजा नहीं हुआ, जिसने मात्र कुछ क्षण पृथ्वी लोक पर रहकर मनुष्यों में अपनी दानवृत्ति का प्रकाश फैलाया तथा सत्य और ज्ञान का आचरण करके अमरता प्राप्त की।

राजा खट्वांग के समय एक बड़ा देवासुर संग्राम लड़ा गया जिसमें देवताओं का पक्ष बहुत कमजोर था। इसलिए देवताओं ने अयोध्या के राजा खट्वांग को देवताओं की सहायता के लिए आमंत्रित किया। राजा खट्वांग ने देवासुर संग्राम में भाग लेकर देवताओं को विजय दिलवाई। उन्होंने अनेक दानवों का संहार किया और बचे हुए दानवों को भयभीत करके युद्ध से भगा दिया। राज खट्वांग की सहायता से प्रभावित होकर देवताओं ने राजा खट्वांग से वरदान मांगने को कहा।

इस पर राजा खट्वांग ने देवताओं से पूछा कि पहले आप मुझे यह बताइये कि मेरी कितनी आयु शेष बची है ताकि मैं उसी के अनुसार वरदान मांगूं। इस पर देवताओं ने उत्तर दिया- ‘मात्र एक मुहूर्त’।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

इस पर देवताओं ने उत्तर दिया- ‘मात्र एक मुहूर्त’।

पुराणों के अनुसार एक मुहूर्त में दो घड़ी होती हैं और एक घड़ी में 24 मिनट होते हैं। अर्थात् राजा खट्वांग के पास केवल 48 मिनट का जीवन शेष बचा था। देवताओं का उत्तर सुनकर राजा खट्वांग ने कहा- ‘मैं वरदान लेकर क्या करूंगा।’

राजा खट्वांग ने उसी क्षण स्वर्ग छोड़ दिया और वह अनारुद्ध-गति नामक विमान पर बैठकर वायु वेग से पृथ्वी पर आ गए और भगवान् श्री हरि विष्णु की स्तुति करने लगे। कुछ ही देर में यमराज आ गए और राजा खट्वांग को अपने साथ बैकुण्ठ में ले गए। इस अलौकिक घटना से तीनों लोकों में राजा खट्वांग का यश फैल गया।

महाभारत में शुकदेवजी राजा परीक्षित को राजा खट्वांग की कथा सुनाते हैं जिसके अनुसार जैसे ही राजा खट्वांग को ज्ञात हुआ कि वह दो घड़ी में मृत्यु को प्राप्त होने वाला है तो वह स्वर्ग छोड़कर धरती पर आ गया और उसने अपनी सम्पत्ति निर्धनों तथा ब्राह्मणों को दान कर दी तथा उसी समय वैराग्य धारण करके सरयू तट पर तप करने लगा और अंत में योग क्रिया द्वारा स्वयं को अपने शरीर से मुक्त कर लिया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

विष्णु पुराण के अनुसार मृत्यु निकट आई जानकर खट्वांग ने कहा- ‘हे परामत्न्! यदि मुझे ब्राह्मणों की अपेक्षा कभी अपना आत्मा प्रियतर नहीं हुआ, यदि मैंने कभी स्वधर्म का उल्लघंन नहीं किया और सम्पूर्ण देव, मनुष्य, पशु, पक्षी और वृक्षादि में श्री अच्युत के अतिरिक्त मेरी अन्य दृष्टि नहीं हुई तो मैं निर्विघ्न पूर्वक उन मुनिजन पूजित प्रभु को प्राप्त होऊं।’ ऐसा कहते हुए राजा खट्वांग ने सम्पूर्ण देवताओं के गुरु, अकथनीय स्वरूप, सत्तामात्र शरीर, परमात्मा भगवान् वासुदेव में अपना चित्त लगा दिया और उन्ही में लीन हो गए। श्रीमद्भागवत में भी राजा खट्वांग की वैसी ही कथा मिलती है जैसी महाभारत में दी गई है। विविध ग्रंथों में कहा गया है कि इस विषय में पूर्वकाल में सप्तर्षियों द्वारा कहा हुआ श्लोक सुना जाता है जिसमें कहा गया है कि खट्वांग के समान पृथिवी तल में अन्य कोई भी राजा नहीं होगा, जिसने एक मूहूर्त मात्र जीवन के रहते ही स्वर्गलोक से भूमण्डल में आकर अपनी बुद्धि द्वारा तीनों लोकों को सत्य-स्वरूप भगवान् वासुदेव मय देखा। इस कथा का मूल भाव यह है कि मनुष्य को मृत्यु से डरना नहीं चाहिए, वह तो अवश्यम्भावी है। इसलिए मृत्यु की तैयारी करनी चाहिए। यह तैयारी दान-दक्षिणा, जप-तप एवं व्रत आदि से हो सकती है।

इस कथा में दो घड़ी का जो रूपक दिया गया है, उसका तात्पर्य सम्पूर्ण मानव जीवन के कुल मूल्य से है। प्रत्येक मनुष्य को एक निश्चित जीवन मिलता है किंतु प्रत्येक मनुष्य यह समझता है कि मृत्यु अभी दूर है, इसलिए वह अपनी आयु का एक बड़ा हिस्सा विद्याध्ययन करने, धनार्जन करने एवं पुत्र-पौत्रादि का सुख प्राप्त करने में लगा देता है।

इन सब सुखों एवं उपलब्धियों में खोया हुआ मनुष्य जब मृत्यु के निकट पहुंचता है तो उसे अपना जीवन बहुत छोटा जान पड़ता है, केवल दो घड़ी के समान अति संक्षिप्त। जबकि कामनएं ज्यों की त्यों बाकी रहती हैं, उन्हें पाने की अभिलाषा अब भी अधूरी होती है। वह मरना नहीं चाहता किंतु मृत्यु सिर पर आकर खड़ी हो जाती है, अब वह इतना भी नहीं सोच पाता कि मैं इस मृत्यु की तैयारी कैसे करूं!

राजा खट्वांग की कथा के माध्यम से हमारे ऋषियों ने हमारे सामने एक स्पष्ट लक्ष्य प्रक्षेपित किया है। यह लक्ष्य समय का सदुपयोग करने के रूप में हमारे सामने रखा गया है। जो मनुष्य, जीवन के इस लक्ष्य को जितनी जल्दी पहचान लेता है, वह उतने ही लाभ में रहता है।

जिस प्रकार एक विद्यार्थी वर्ष भर पढ़कर एक दिन परीक्षा देता है, उसी प्रकार मनुष्य को समस्त जीवन एक लक्ष्य के साथ व्यतीत करने के पश्चात् मृत्यु रूपी परीक्षा देनी होती है। अतः राजा खट्वांग की कथा मनुष्य को चीख-चीख कर बताती है कि मृत्यु दूर नहीं है, वह प्रतिक्षण आ रही है, उसके स्वागत की तैयारी में जुटो, हरिस्मरण, दान-पुण्य, त्याग-तपस्या और दूसरों की सेवा से ही मनुष्य उस योग्यता को प्राप्त कर सकता है कि वह मृत्यु रूपी परीक्षा में सहज ही उत्तीर्ण हो जाए।

इस कथा से हमें एक और बड़ा संकेत मिलता है कि स्वर्ग की प्राप्ति हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं है। हमारा अंतिम लक्ष्य श्री हरि विष्णु की प्राप्ति है। श्री हरि विष्णु की प्राप्ति का मार्ग धरती से खुलता है। इसीलिए खट्वांग मृत्यु निकट जानकर स्वर्ग छोड़कर धरती पर आ गया। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वर्ग और नर्क में जीवात्मा को कर्म करने का अधिकार नहीं होता, वहाँ तो कर्मों से प्राप्त फल का भोग किया जाता है।

कर्म करने का अधिकार केवल धरती पर है और वह भी केवल मनुष्य देहधारी जीवात्मा को। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह धरती पर रहकर ऐसे कर्म करे कि उसे स्वर्ग और नर्क दोनों में न भटकना पड़े। वह अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर अग्रसर हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा दिलीप ने सिंह से कहा वह गौ के स्थान पर मुझे खा ले (20)

0
राजा दिलीप - www.bharatkaitihas.com
राजा दिलीप ने सिंह से कहा वह गौ के स्थान पर मुझे खा ले

महर्षि वसिष्ठ ने राजा दिलीप को बताया कि आपने स्वर्ग लोक में  कामधेनु गाय का अपमान किया है। इसी दोष से आपकी संतान की कामना फलवती नहीं होती।

पिछली कड़ी में हमने राजा खट्वांग की कथा कही थी। राजा खट्वांग से दीर्घबाहु नामक पुत्र हुआ। कुछ पुराणों में राजा खट्वांग को दिलीप कहा गया है तो कुछ पुराणों में खट्वांग के पुत्र दीर्घबाहु को दिलीप कहा गया है।

राजा दिलीप सूर्य वंश के बहुत बड़े प्रतापी राजा हुए। वे महाराज रामचंद्र के पूर्वज थे। दुर्भाग्यवश उन्हें कोई संतान नहीं थी इसलिए राजा बहुत चिंत्ति थे। इसी चिंता में वे रानी सुदक्षिणा को लेकर गुरु वसिष्ठ के आश्रम में गये। राजा दिलीप ने गुरु वसिष्ठ से अपनी व्यथा कही और गुरु से अपनी संतानहीनता का कारण और उसके निवारण का उपाय पूछा।

महर्षि वसिष्ठ ने महाराज दिलीप को बताया कि आपने स्वर्ग लोक में  कामधेनु गाय का अपमान किया है। इसी दोष से आपकी संतान की कामना फलवती नहीं होती।

इस पर राजा दिलीप ने गुरु से कहा कि मेरी स्मृति में ऐसी कोई घटना नहीं है जब मैंने मैंने कामधेनु का अपराध किया हो! कृपया मेरा अपराध समझाने का कष्ट करें।

गुरु ने कहा कि एक बार आप देवराज इंद्र के निमंत्रण पर स्वर्गलोक में गये थे। तब आप स्वर्ग के ऐश्वर्य को देखने में इतने खो गये कि आपने कल्पतरु के नीचे विश्राम कर रही कामधेनु गाय को नमस्कार नहीं किया जिससे आपको कामधेनु के अपमान का दोष लग गया। समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु के रुष्ट होने के कारण आप संतान-सुख से वंचित हैं।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

महाराजा दिलीप ने गुरु से इस दोष के निवारण का उपाय पूछा। गुरु ने कहा- ‘राजन्! इस दोष से मुक्त होने का उपाय यह है कि आप कामधेनु की सेवा करके उसे प्रसन्न करें किंतु कामधेनु को धरती पर नहीं लाया जा सकता। अतः आप कामधेनु की पुत्री नंदनी की सेवा कर सकते हैं।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

नंदिनी उन दिनों महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में थी। राजा एवं रानी ने नंदिनी से अपने साथ चलने की प्रार्थना की। नंदिनी ने ऋषि की आज्ञा से राजा दिलीप एवं रानी सुदक्षिणा के साथ चलना स्वीकार कर लिया। राजा ने अपने सेवकों को अयोध्या भेज दिया और स्वयं रानी सहित महर्षि के तपोवन में गौ-सेवा करने लगे। वे प्रतिदिन गाय की पूजा करते और गाय को चरने के लिए अरण्य में छोड़ देते। नंदिनी जिधर जाना चाहती, राजा उसके पीछे-पीछे छाया की तरह चलते। नंदिनी के जल पीने के पश्चात ही राजा एवं रानी जल पीते थे। संध्या काल में रानी आश्रम के द्वार पर खड़ी उनकी प्रतीक्षा करती तथा गाय को तिलक लगाकर उसका दूध दुहती। जब गाय सो जाती तो राजा एवं रानी भी शयन करते। प्रातःकाल में राजा एवं रानी गौशाला की सफाई करते। इस प्रकार सेवा करते हुए इक्कीस दिन बीत गए। बाईसवें दिन जब राजा गौ चरा रहे थे तब अचानक एक सिंह गाय पर टूट पड़ा। राजा ने तुरंत धनुष पर बाण चढ़ाकर सिंह को खदेड़ने का प्रयास किया किंतु राजा दिलीप की अंगुलियाँ बाण पर चिपक गईं। उनके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही। सिंह ने मनुष्यवाणी में कहा- ‘राजन्! तुम्हारा बाण मुझ पर नहीं चल सकता है। मैं भगवान शंकर का सेवक कुम्भोदर हूँ। इस तपोवन के देवदार वृक्षों की सेवा के लिए भगवान शिव ने मुझे यहाँ नियुक्त किया है और कहा है कि जो जीव इन वृक्षों को क्षति पहुंचाएगा वही तुम्हारा आहार होगा। आज मुझे यह आहार मिला है, अतः तुम लौट जाओ।’

सिंह के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर राजा दिलीप क्रोधित हो गए और अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर बोले- ‘जब तक सूर्यवंशीयों के शरीर में प्राण हैं, तब तक तुम इस गाय को हानि नहीं पहुंचा सकते।’

इस पर सिंह ने कहा- ‘हे राजन्! तुम बीच में न आओ! यह मेरे और इस गौ के बीच का विवाद है।  मैं भगवान शिव द्वारा नियुक्त इस उपवन का रक्षक हूँ और इस उपवन को क्षति पहुंचाने वाले को दंड देना मेरा कर्त्तव्य है।’

राजा दिलीप ने कहा- ‘यदि आप भगवान शिव के सेवक हैं तो हमारे लिए भी आदरणीय हैं,  मैं आप पर शस्त्र नहीं उठा सकता किंतु यह गाय मेरे द्वारा रक्षित है इसलिए आप गाय के बदले मुझे खा लें। क्योंकि आपके वन में इस गाय का प्रवेश करना मेरी गलती है।’

सिंह ने राजा दिलीप से कहा- ‘हे राजन्! तुम इस देश के धर्मात्मा राजा हो। तुम्हारे मरने से इस देश को बहुत हानि होगी। इसलिए तुम यहाँ से चले जाओ तथा मुझे इस गाय को मारकर खा जाने दो।’

इस प्रकार सिंह ने राजा को बहुत समझाया किंतु राजा दिलीप अपने प्रण पर अडिग रहे और अपनी आँखें मूंदकर सिंह के सामने बैठ गए ताकि सिंह उन्हें अपना आहार बना सके। राजा सिंह के आक्रमण की प्रतीक्षा करते रहे किंतु सिंह ने उन पर आक्रमण नहीं किया। इस पर राजा ने आंखें खोल लीं। उन्होंने देखा कि वहाँ कोई सिंह नहीं है। राजा ने विस्मित होकर नंदिनी की ओर देखा।

नंदिनी ने कहा- ‘उठो राजन्! यह सब मेरी माया थी। मैं तुम्हारे संकल्प और सत्यनिष्ठा को परख रही थी। मैं तुम्हारे द्वारा की गई सेवा से प्रसन्न हूँ। मेरी कृपा से तुम्हें तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।’

नंदिनी के आशीर्वाद से राजा दिलीप को कुछ समय पश्चात् एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘रघु’ रखा गया। महाराज रघु सूर्यवंश के बड़े प्रतापी राजा हुए और उनके नाम पर इक्ष्वाकुओं को रघुवंशी कहा जाने लगा।

संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘रघुवंशम्’ में राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक कुल 29 राजाओं का वर्णन किया है। रघुवंशम् की कथा राजा दिलीप और उनकी रानी सुदक्षिणा के ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में प्रवेश करने से प्रारम्भ होती है।

राजा दिलीप धनवान, गुणवान, बुद्धिमान और बलवान हैं, साथ ही धर्मपरायण भी। वे हर प्रकार से सम्पन्न हैं परन्तु उनके संतान नहीं है। वे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद पाने के लिए गौमाता नंदिनी की सेवा करने का संकल्प लेते हैं। एक दिन जब नंदिनी जंगल में विचरण कर रही होती है तब एक सिंह नंदिनी को अपना आहार बनाना चाहता है।

राजा दिलीप स्वयं को सिंह के समक्ष अर्पित करके सिंह से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें वह अपना आहार बनाये। सिंह प्रार्थना स्वीकार कर लेता है और उन्हें मारने के लिए झपटता है। इस छलांग के साथ ही सिंह ओझल हो जाता है। तब नन्दिनी बताती है कि उसी ने महाराज दिलीप की परीक्षा लेने के लिए यह माया रची थी।

नंदिनी दिलीप की सेवा से प्रसन्न होकर पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देती है। राजा दिलीप और सुदक्षिणा नंदिनी का दूध ग्रहण करते हैं और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। इस गुणवान पुत्र का नाम रघु रखा जाता है जिनकी सत्यनिष्ठा एवं पराक्रम के कारण इस वंश को ‘रघुवंश’ के नाम से जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराज रघु

0

महाराज रघु ने यक्षराज कुबेर से ब्राह्मणकुमार के लिए कर प्राप्त किया!

अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के पुराण-प्रसिद्ध राजा दिलीप के पुत्र राजा रघु हुए। वे अत्यंत प्रतापी एवं सत्यनिष्ठ राजा थे। अनेक पुराणों में राजा रघु की कथा मिलती है जिनके अनुसार राजा दिलीप को नंदिनी गाय की सेवा करने के प्रसाद के रूप में राजा रघु एवं रानी सुदक्षिणा को पुत्र के रूप में प्राप्त हुए थे।

जब रघु छोटे बालक थे, तब उनके पिता महाराज दिलीप ने अश्वमेध यज्ञ किया। देवराज इन्द्र ने यज्ञ के अश्व को पकड़ लिया। इस पर राजकुमार रघु ने इन्द्र से युद्ध किया तथा इन्द्र को पराजित करके यज्ञ का अश्व छुड़ा लिया।

जब राजा रघु राज्यसिंहासन पर बैठे तो उन्होंने दिग्विजय करके चारों दिशाओं में कौशल राज्य का विस्तार किया। दिग्विजय के पश्चात् राजा रघु ने अपने कुल गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से विश्वजित यज्ञ किया और उसमें अपनी संपूर्ण संपत्ति दान कर दी।

ठीक उसी समय विश्वामित्र का शिष्य कौत्स वहाँ आया। वह अपने गुरु को चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं दक्षिणा में देने के लिए राजा रघु से याचना करने आया था।

राजा रघु ने ब्राह्मण कुमार का स्वागत किया तथा उससे कहा- ‘आज मैं कृतार्थ हुआ! आप-जैसे तपोनिष्ठ, वेदज्ञ ब्रह्मचारी के स्वागत से मेरा गृह पवित्र हो गया। आपके गुरुदेव श्री वरतन्तु मुनि अपने तेज़ से साक्षात अग्निदेव के समान हैं। उनके आश्रम का जल निर्मल एवं पूर्ण तो है? वहाँ वर्षा ठीक समय पर तो होती है? आश्रम के नीवार समय पर तो पकते हैं? आश्रम के, मृग एवं तरु पूर्ण रूप से प्रसन्न तो हैं?’

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

महाराज रघु के कुशल-प्रश्न शिष्टाचार मात्र नहीं थे। उनका तात्पर्य यह ज्ञात करने से था कि राजा रघु के राज्य में इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु, पृथ्वी आदि देवी-देवता अपने दायित्वों का निर्वहन ढंग से कर रहे हैं अथवा नहीं!  पुराणों में आए विवरण के अनुसार यदि कोई देवी-देवता राजा रघु के राज्य में अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करते थे तो राजा रघु उन्हें दण्ड देकर अनुशासित कर सकते थे। राजा रघु यह सहन नहीं कर सकते थे कि उनके राज्य में तपोमूर्ति ऋषियों के आश्रम में देवी-देवता किसी तरह का विघ्न उत्पन्न करने का साहस करें।

ब्राह्मण कुमार कौत्स ने कहा- ‘आप-जैसे धर्मज्ञ एवं प्रजावत्सल नरेश के राज्य में सर्वत्र मंगल होना स्वाभाविक है। ऋषियों के आश्रमों में भी सर्वत्र कुशलता है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

कौत्स ने देखा कि महाराज के शरीर पर एक भी आभूषण नहीं है। चक्रवर्ती राजा होने पर भी महाराज रघु ने ब्राह्मण कुमार को मिट्टी के पात्रों में अर्घ्य एवं पाद्य निवेदित किया था। कौत्स समझ गया कि महाराज यज्ञ पूर्ण होने पर अपना सर्वस्व दान कर चुके हैं। राजमुकुट और राजदण्ड के अतिरिक्त राजा के पास कुछ नहीं है। इसलिए कौत्स ने चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त करने की अभिलाषा का उल्लेख नहीं किया।

राजा ने पूछा- ‘हे ब्राह्मण कुमार आपका अध्ययन पूर्ण हो गया होगा। अब आपके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का समय है। कृपा करके मुझे कोई सेवा बताएं। मैं इसमें अपना सौभाग्य मानूँगा।’

ब्राह्मण कुमार ने कहा- ‘हे राजन्! मैंने अपने गुरु से चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। अध्ययन पूर्ण होने पर मैंने अपने गुरु से आग्रह किया कि वे गुरु-दक्षिणा माँगें। गुरु विद्याध्ययन काल में मेरे द्वारा आश्रम में की गई सेवा से ही सन्तुष्ट थे परन्तु मेरे बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने चौदह कोटि स्वर्ण-मुद्राएँ माँगीं क्योंकि मैंने उनसे चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। हे नरेन्द्र! आपका मंगल हो। मैं आपको कष्ट नहीं दूँगा। पक्षी होने पर भी चातक सर्वस्व अर्पित करके सहज शुभ्र बने घनों से याचना नहीं करता। आप अपने त्याग से परमोज्ज्वल हैं। मैं आपसे कोई याचना नहीं करूंगा, आप मुझे अनुमति दें।’

ब्राह्मण कुमार की बात सुनकर राजा चिंतित हुए। उन्होंने कहा-‘ हे ब्राह्मण कुमार आप कृपा करके अयोध्या पधारे हैं। अतः थोड़ा अनुग्रह और करें एवं तीन दिन मेरी अग्निशाला में चतुर्थ अग्नि की भाँति सुपूजित होकर निवास करें!  रघु के यहाँ से सुयोग्य वेदज्ञ ब्राह्मण निराश लौट जाए, यह मैं कैसे सह सकता हूँ।’

ब्राह्मण कुमार कौत्स को महाराज रघु की प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी और वह अयोध्या राज्य की यज्ञशाला में ठहर गया। अतिथि की इच्छा पूर्ण किए बिना राजा रघु को अपने भवन में प्रवेश करना अनुचित जान पड़ा। इसलिए उन्होंने अपने अनुचरों से कहा- ‘मैं आज रात रथ में ही शयन करूँगा। उसे शस्त्रों से सुसज्जित कर दो! यक्षराज कुबेर ने हमारे राज्य को कर नहीं दिया है। इसलिए मैं कल प्रातः होते ही कुबेर पर आक्रमण करने जाउंगा।’

जब राजा रघु ने दिग्विजिय यात्रा की थी और उसके बाद यज्ञ किया था, तब दोनों ही अवसरों पर भारत भर के समस्त नरेश अयोध्या को कर दे चुके थे तथा राजा रघु कर में प्राप्त सम्पूर्ण कोष ब्राह्मणों एवं निर्धनों को दान कर चुके थे किंतु दिग्पाल कुबेर ने अयोध्या को कर नहीं दिया था। अन्य समस्त देवता स्वर्ग में रहते थे इसलिए राजा रघु उनसे तो कर नहीं मांग सकते थे किंतु कुबेर स्वर्ग में नहीं रहता था। उसकी राजधानी अलकापुरी में थी जो हिमालय पर स्थित थी। इस कारण वह अयोध्या राज्य का अंग थी। इस नाते कुबेर को चाहिए था कि वह अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट को कर दे। कुबेर से कर वसूलने का निश्चय करके महाराज रघु रथ में ही सो गए ताकि अगली प्रातः अलकापुरी पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर सकें।

अगली प्रातः महाराज रघु ब्रह्ममुहूर्त में उठे और अपने शस्त्र संभालने लगे। जैसे ही महाराज ने शंख ध्वनि की, वैसे ही अयोध्या राज्य के कोषाध्यक्ष ने आकर राजा को सूचित किया कि महाराज आज प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जब मैं कोषागार में कुबेर की पूजा करने गया तो वहाँ अचानक ही स्वर्ण की वर्षा होने लगी।

महाराज रघु समझ गए कि कुबेर ने अयोध्या का कर चुका दिया है। महाराज रघु ने उसी समय ब्राह्मण कुमार कौत्स को बुलाकर उससे कहा कि यह समस्त धन यक्षराज कुबेर ने आपके निमित्त दिया है। अतः आप इस द्रव्य को स्वीकार करें।

कौत्स ने कहा- ‘राजन्! मैं ब्राह्मण हूँ। मधुकरी से प्राप्त कण ही मेरी विहित वृत्ति है। गुरु दक्षिणा की चौदह कोटि स्वर्ण मुद्राओं से अधिक एक भी मुद्रा का स्पर्श मेरे लिये लोभ तथा पाप है।’ इस प्रकार ब्रह्मचारी कौत्स ने चौदह कोटि स्वर्ण मुद्रा स्वीकार कर लीं और राजा को आशीर्वाद देकर वहाँ से चला गया। राजा ने शेष मुद्राएं ब्राह्मणों को दान कर दीं।

महाराज रघु ने दीर्घकाल तक भारत की प्रजा का पालन किया। वे इक्ष्वाकु कुल में सर्वश्रेष्ठ राजा माने गए इसलिए इक्ष्वाकु कुल को रघुवंश कहा गया। रामायण, महाभारत एवं लगभग समस्त पुराणों में महाराज रघु का उल्लेख किया गया है। महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रघुवंशम्’ की रचना इन्हीं महाराज रघु को केन्द्र में रखकर की है।

रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के पुत्र राम अयोध्या के नरेश हुए। रघु के वंशज होने के कारण ही राम को राघव, राघवेन्द्र, रघुवर, रघुवीर, रघुनाथ, रघुकुल भूषण आदि सम्मानजनक शब्दों से विभूषित किया जाता है।

राजा अज

0

राजा अज ने जंगल में लकड़ियां काटकर गुरु दक्षिणा चुकाई!

अज का अर्थ होता है जिसका जन्म नहीं हुआ हो। इसीलिए प्रजापति ब्रह्मा को अज कहा जाता है। पौराणिक काल में अज नामक कई राजा हुए हैं। इनमें सर्वाधिक विख्यात ईक्ष्वाकु वंश का राजा अज था। वह महाराज रघु का पुत्र था।

विष्णु पुराण सहित अनेक पुराणों में महाराज अज की कथा मिलती है। बहुत से पुराणों में राजा अज के विवाह की घटना का उल्लेख मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार एक बार किसी देश के राजा भोजराज ने अपनी राजकुमारी इंदुमती के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। जब राजकुमार अज को इस स्वयंवर की सूचना मिली तो वे भी अपने पिता की आज्ञा से इस स्वयंवर में भाग लेने के लिए राजा भोजराज की राजधानी में गए।

राजकुमार अज ने स्वयंवर में राजकुमारी इंदुमति को जीत लिया एवं इंदुमति ने प्रसन्नता पूर्वक राजा अज का वरण किया। राजकुमार अज अपनी रानी को लेकर अपने पिता की राजधानी अयोध्या लौट आए। जब महाराज रघु ने देखा कि उनका पुत्र वयस्क हो गया है एवं उसका विवाह भी हो गया है तब महाराज रघु ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने का निश्चय किया।

सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं में यह परम्परा थी कि वे अपने जीवन का तीसरा काल आरम्भ होने  पर अर्थात् प्रौढ़ावस्था आने पर अपना राजपाट अपने पुत्र अथवा योग्य उत्तराधिकारी को सौंपकर स्वयं रानी सहित वनप्रांतर में चले जाते थे और वहीं पर ईश आराधना एवं आध्यात्मिक चिंतन करते थे।

जब वनवासी राजा वृद्ध होते थे तो वे सन्यास आश्रम में प्रवेश करके पुनः मानव समाज में लौटते थे और अपने द्वारा वानप्रस्थ आश्रम के दौरान अर्जित ज्ञान को जन साधारण में बांट देते थे और देशाटन करते हुए ब्रह्मलीन होते थे।

महाराज रघु ने भी प्रौढ़ावस्था आने पर अपना राज्यपाट अपने पुत्र अज को सौंप दिया तथा स्वयं रानी सहित वन में चले गए। पुराने राजा के वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् कुलगुरु महार्षि वसिष्ठ ने रघुवंशी राजकुमार अज का राज्यभिषेक किया। अज से ही ईक्ष्वाकुओं को रघुवंशी कहे जाने की परम्परा आरम्भ हुई। महाराज अज ने अपने पूर्वजों की परम्परा के अनुसार राज्य का धर्म पूर्वक पालन किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

एक बार राजा अज ने गुरु वसिष्ठ को अपने महल में आमंत्रित किया तथा उनसे एक यज्ञ सम्पन्न करवाया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा अज ने गुरु से प्रार्थना की कि वे यज्ञ की दक्षिणा मांगें।

गुरु वसिष्ठ ने कहा- ‘हम दक्षिणा अवश्य लेंगे किंतु महाराज अज! आप हमें दक्षिणा में क्या देना चाहते हैं!’

राजा अज ने कहा- ‘महाराज! कौशल राज्य सामर्थ्यवान एवं सम्पन्न राज्य है, अपने कुलगुरु की प्रत्येक इच्छा पूरी कर सकता है, आप स्वयं ही अपनी इच्छा बताएं।’

इस पर गुरु वसिष्ठ ने कहा- ‘महाराज! राज्य की सम्पत्ति प्रजा द्वारा चुकाए गए कर से उत्पन्न होती है। इस सम्पत्ति में से राजा को अपनी निजी आवश्यकताएं पूरी करने का पूरा अधिकार होता है। इस नाते आप हमें राज्यकोष में से जो चाहे दे सकते हैं किंतु महाराज इस बार हम आपकी प्रजा द्वारा चुकाए गए कर से दक्षिणा नहीं लेंगे। हमारी इच्छा है कि आप अपने परिश्रम से एक दिन में जो धन अर्जित करें, वह सम्पूर्ण धन हमें गुरु दक्षिणा के रूप में प्रदान करें।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा अज ने सोचा कि मैं तो अत्यंत सामर्थ्यवान राजा हूँ, अतः एक दिन में अधिक से अधिक धन अर्जित कर लूंगा ताकि गुरु वसिष्ठ उस धन से संतुष्ट हो जाएं। इसलिए राजा अज ने महर्षि की इस इच्छा को स्वीकार कर लिया तथा महर्षि से एक दिन की प्रतीक्षा करने को कहा। महर्षि वसिष्ठ तो राजा के महल में ठहर गए और राजा अज उसी समय अपना महल एवं राज्य छोड़कर निकटवर्ती राज्य में चले गए।

राजा अज अपने ही राज्य में परिश्रम करके धन अर्जित नहीं कर सकते थे। क्योंकि वे जिसके पास भी काम मांगने जाते तो वह राजा पर अनुग्रह करके उन्हें अधिक से अधिक राशि देने का प्रयास करता जो कि राजा के परिश्रम से धर्म-पूर्वक अर्जित की गई राशि नहीं होती। इसलिए राजा अज अपने राज्य से बाहर निकल गए और साधारण श्रमिक का वेश बनाकर निकटवर्ती राज्य में पहुंचे। महाराज अज ने उस नगर के बड़े-बड़े श्रेष्ठियों के पास जाकर उनसे एक दिन के लिए काम देने की प्रार्थना की किंतु इस अपरिचित नगर में उन्हें किसी ने कोई काम नहीं दिया। इस पर राजा अज निकटवर्ती वन में चले गए और दिन भर सूखे वृक्ष काटकर उनकी लकड़ियां एकत्रित करते रहे।

संध्याकाल में राजा ने वे लकड़ियां वन के निकट स्थित नगर में लाकर बेच दीं। एक श्रेष्ठि ने उस समस्त सूखी लकड़ियों के लिए राजा अज को केवल एक साधारण मुद्रा प्रदान की। राजा अपने पूरे दिन के गहन परिश्रम का इतना तुच्छ पारिश्रमिक देखकर बहुत निराश हुए। फिर भी गुरु को दिए वचन के अनुसार राजा अज एक साधारण मुद्रा लेकर अपनी राजधानी अयोध्या पहुंचे और उन्होंने अत्यंत कष्ट के साथ वह मुद्रा गुरु के चरणों में रख दी।

महर्षि वसिष्ठ ने अपने चरणों में रखी हुई एक साधारण मुद्रा एवं राजा के म्लान मुख को देखा तो सारी स्थिति समझ गए। उन्होंने मुद्रा लेकर अपने कमण्डल में रखते हुए कहा- ‘राजन! यह धन आपने अपने परिश्रम से अर्जित किया है। आज से पहले किसी भी राजा ने अपने कुलपुरोहित को स्वयं द्वारा अर्जित धन दक्षिणा में नहीं दिया होगा। इस दक्षिणा को पाकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।’

यह कथा यहीं समाप्त होती है तथा देखने में अत्यंत साधारण प्रतीत होती है किंतु वस्तुतः इस कथा के माध्यम से हमारे ऋषियों ने समस्त भारतवासियों को अपने परिश्रम से धन अर्जित करने एवं उस धन से अपने परिवार का पालन करने का उपदेश दिया है।

इस घटना के कुछ दिन बाद राजा अज रानी इन्दुमती के साथ उद्यान में घूम रहे थे। तभी आकाश मार्ग से जा रहे देवर्षि नारद की वीणा से लिपटी हुई देवलोक की एक पुष्पमाला गिर पड़ी और नीचे धरती पर आकर रानी इन्दुमती के कण्ठ में जा पड़ी। इस माला के प्रहार से रानी इन्दुमती की उसी क्षण मृत्यु हो गई।

महाराज अज को रानी की मृत्यु से अत्यंत शोक हुआ। तभी देवर्षि नारद वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने राजा को बताया कि रानी इन्दुमति का धरती पर इतना ही जीवन था। उन्हें पुनः स्वर्ग में बुला लिया गया है। राजा अज को देवर्षि नारद की यह बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। इस पर देवर्षि नारद ने राजा अज को रानी इन्दुमती के पूर्व जन्म की कथ सुनाई।

देवर्षि ने कहा- ‘एक बार देवराज इन्द्र ने तृणविन्दु नामक ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए हरिणी नामक एक अप्सरा को भेजा था। इस पर ऋषि ने हरिणी को मानवी के रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। हरिणी के अनुरोध करने पर ऋषि तृणविंदु ने उसे शाप से छूटने का उपाय भी बता दिया तथा कहा कि जब देवर्षि नारद की वीणा पर लिपटी हुई माला तेरे गले में गिरेगी तब तुझे मानवी रूप से मुक्ति मिलेगी। आज संयोगवश मेरे आकाश गमन के समय मेरी वीणा से लिपटी हुई पुष्पमाला गिर पड़ी और हरिणी शाप मुक्त होकर पुनः स्वर्ग में जा पहुंची। इसलिए अज को रानी इन्दुमति की मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।’

देवर्षि नारद की बात सुनकर अज ने धैर्य धारण किया। उस समय राजकुमार दशरथ छोटे बालक थे। अतः राजा अज ने अपने पुत्र का बहुत ध्यान से लालन-पालन किया तथा उन्हें समुचित शिक्षा दिलवाई। इस प्रकार पत्नी के वियोग में राजा के आठ वर्ष बीत गए। राजा अज ने देखा कि राजकुमार दशरथ सब प्रकार से प्रजा का पालन करने योग्य हो गए हैं तो राजा ने अपना राजपाट दशरथ को दे दिया और स्वयं तपस्या करते हुए पंचत्त्व में विलीन हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रानी कैकेयी

0

रानी कैकेयी ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की!

राजा दशरथ ईक्ष्वाकु वंशी राजा अज के पुत्र थे एवं त्रेता युग में कौशल राज्य के राजा थे जिसकी राजधानी अयोध्या थी। राजा दशरथ का उल्लेख विभिन्न पुराणों, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण एवं भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में हुआ है।

दशरथ का शाब्दिक अर्थ होता है दस रथ अथवा दस रथों का स्वामी। वाल्मीकि रामायण के 5वें सर्ग में अयोध्या पुरी का वर्णन किंचित् विस्तार से किया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की स्थापना राजा विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु द्वारा की गई थी।

दर्शकों को स्मरण होगा कि वैवस्वत मनु ही वर्तमान मनवन्तर के मनु हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अयोध्या नगरी वर्तमान मानव सभ्यता में धरती पर बसने वाली सबसे प्राचीन नगरी है। तब से लेकर अयोध्या में मनु के वंशज ही राजा होते आए थे जिन्हें इक्ष्वाकु राजा, सूर्यवंशी राजा एवं रघुवंशी राजाओं के नाम से सम्बोधित किया जाता था। ईक्ष्वाकु वंश की परम्परा के अनुसार राजा दशरथ परम प्रतापी एवं वीर थे।

रघुवंशी राजा दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। महारानी कौशल्या वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रांत के कौशल प्रदेश के राजा भानुमान की राजकुमारी थीं। वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस तथा अनेकानेक प्राचीन संस्कृत नाटकों में कौशल्या का उल्लेख राजा दशरथ की सर्वप्रमुख रानी एवं राजकुमार रामचंद्र की माता के रूप में मिलता है किंतु आनन्द-रामायण में दशरथ एवं कौशल्या के विवाह का वर्णन विस्तार से हुआ है।

विभिन्न पुराणों में दशरथ और कौशल्या को कश्यप और अदिति का अवतार बताया गया है। रामचरित मानस सहित कुछ ग्रंथों में दशरथ और कौशल्या को स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा का अवतार बताया गया है। जैन साहित्य में कौशल्या का वर्णन अलग ढंग से मिलता है। मुनि गुणभद्र कृत उत्तर-पुराण में कौशल्या की माता का नाम सुबाला तथा पुष्पदत्त के ‘पउम चरिउ’ में कौशल्या का दूसरा नाम अपराजिता बताया गया है।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

लगभग समस्त पौराणिक ग्रंथों एवं रामायण में महारानी कौसल्या को अपने पति की आज्ञाकारिणी बताया गया है जो पति के प्रत्येक निर्णय को चुपचाप स्वीकार करती है किंतु महर्षि वेदव्यास रचित अध्यात्मरामायण में कौसल्या को अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट तथा राम को वन जाने से रोकते हुए चित्रित किया गया है।

महाराज दशरथ की दूसरी रानी सुमित्रा थीं। वे मगध नरेश की पुत्री थीं जो अयोध्या का अधीनस्थ सामंत था। सामंत पुत्री होने के कारण रानी सुमित्रा का स्तर महारानी कौसल्या की अपेक्षा नीचा था।

महाराज दशरथ की तीसरी रानी कैकेई केकय नरेश की कन्या थी। महाराज दशरथ ने केकय नरेश को परास्त करने के पश्चात् संधि की शर्त के रूप में कैकेई से विवाह किया था। इस विवाह के समय राजा दशरथ की उम्र कैकेई की अपेक्षा काफी अधिक थी। इसलिए कैकेई ने वृद्ध नरेश के साथ विवाह करने से पहले एक शर्त रखी कि कैकेई के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही अयोध्या राज्य का उत्तराधिकारी होगा।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस प्रकार ये तीनों रानियां आर्य राजाओं की पुत्रियां होते हुए भी अलग-अलग स्तर के राजाओं की पुत्रियां थीं तथा राजमहल में उनके सम्मान भी उन्हीं के अनुरूप थे। महारानी कौसल्या एक स्वतंत्र राजा की पुत्री थीं, इसलिए उनका सम्मान सर्वोच्च था। रानी सुमित्रा एक अधीनस्थ सामंत की पुत्री थीं इसलिए उनका सम्मान तीनों रानियों में सबसे कम था। रानी कैकेई एक पराजित राजा की पुत्री थीं किंतु उनका सम्मान सुमित्रा की अपेक्षा इसलिए अधिक था क्योंकि वह राजा की सबसे प्रिय और सबसे चहेती रानी थी।

यद्यपि सार्वजनिक रूप से जब राजा के साथ रानी को भी विराजमान होता था तो महारानी कौसल्या ही पटरानी होने के कारण महाराज के साथ विराजमान होती थीं तथापि यदि महाराज कभी अपने राज्य से बाहर जाते तो रानी कैकेई उनके साथ जाती थी। सुमित्रा की अधिकार सीमा केवल महल के भीतर तक थी। अधिकारों का यह अंतर पुत्र-कामेष्ठि यज्ञ के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की कथाओं को पढ़ने से अनुमान होता है कि इस वंश के राजाओं को पुत्र की प्राप्ति सहज रूप से नहीं होती थी जिसके कारण इक्ष्वाकुवंशी राजाओं को तपस्या एवं यज्ञ आदि करके पुत्र प्राप्ति हेतु प्रयास करना पड़ता था।

ठीक यही स्थिति महाराज दशरथ के साथ भी थी। उनकी तीन रानियां थीं, आयु भी पर्याप्त हो चुकी थी किंतु उनके कोई पुत्र नहीं था।

इसलिए कुलगुरु वसिष्ठ के परामर्श पर महाराज दशरथ ने श्ृंगी ऋषि को बुलवाकर पुत्र-कामेष्ठि यज्ञ करवाया। यज्ञ के पूर्ण होने पर स्वयं अग्निदेव अपने हाथों में खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए। उन्होंने खीर का वह पात्र राजा दशरथ को दिया और कहा कि वे इस खीर को अपनी रानियों को खिला दें।

इस पर राजा दशरथ ने खीर का आधा भाग पटरानी कौसल्या को दे दिया। शेष आधे भाग के दो भाग किए। उनमें से एक भाग रानी कैकेई को दिया। इस प्रकार खीर का जो चौथाई भाग बचा, उसके दो भाग करके एक-एक भाग पुनः कौसल्या एवं कैकेई के हाथों पर रख दिए। कौसल्या एवं कैकेई की स्वीकृति लेकर राजा दशरथ ने वे दोनों छोटे भाग रानी सुमित्रा को दे दिए।

अग्निदेव की कृपा से महारानी कौसल्या के गर्भ से स्वयं श्री हरि विष्णु का अवतार हुआ जिन्हें ‘राम’ कहा गया। वे त्रेता युग में भगवान श्री हरि विष्णु के तीसरे अवतार थे। त्रेता में पहला अवतार वामन के रूप में हुआ था जिन्होंने धरती एवं स्वर्ग को राक्षसों से मुक्त करवाकर उनके राजा बलि को पाताल लोक में रहने के लिए भेजा था।

दूसरा अवतार भगवान परशुराम के रूप में हुआ था जिन्होंने हैहय क्षत्रियों का विनाश करके धरती को उनके अत्याचारों से मुक्त करवाया था। तीसरा अवतार भगवान श्रीराम के रूप में हुआ जिन्होंने रावण तथा उसके पुत्रों का वध करके ऋषि-मुनियों को अभय प्रदान किया।

रानी कैकेई के गर्भ से राजकुमार भरत का जन्म हुआ। उनके लिए कहा जाता था कि साक्षात धर्म  ही मानव-देह में उपस्थित हुआ है। उन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता था। रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए- लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न। लक्ष्मण को शेषनाग का एवं शत्रुघ्नजी को भगवान के हाथ में धारण किए जाने वाले शंख का अवतार माना जाता है।

वाल्मीकि रामायण में अयोध्या काण्ड के अन्तर्गत अध्याय 7 से 42 तक कैकेयी से सम्बन्धित कथा का विस्तार से वर्णन हुआ है। इसके अनुसार देवासुर एक बार देवराज इन्द्र तथा दण्डकारण्य में रहने वाले असुर शंबर के बीच भीषण युद्ध हुआ। देवताओं ने अयोध्या नरेश दशरथ को अपनी सहायता करने के लिए बुलाया। इससे पहले भी इक्ष्वाकु वंशी राजा देवासुर संग्रामों में देवों की सहायता करने के लिए जाते रहे थे।

राजा दशरथ अपनी रानी कैकेई को अपने साथ लेकर युद्ध क्षेत्र में गए। रानी कैकेई शस्त्र एवं रथ संचालन में निपुण थी। उसने महाराज के रथ पर रहकर महाराज के शरीर की रक्षा की तथा जब महाराज के रथ का धुरा टूट गया तब कैकेई ने अपना हाथ उस धुरे में फंसा दिया ताकि महाराज रथ पर टिके रहकर युद्ध कर सकें।

जब असुरों ने महाराज को शस्त्रों के प्रहार से घायल कर दिया तब कैकेई राजा दशरथ के रथ को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकाल लाई तथा महाराज को सुरक्षित रूप से अयोध्या ले आई। युद्ध समाप्त होने पर जब महाराज दशरथ को कैकेयी के इस कौशल का पता लगा, तो उन्होंने प्रसन्न होकर कैकेयी को दो वर माँगने के लिए कहा। कैकेयी ने उन वरों को यथासमय माँगने के लिये रख छोड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

पुराणों में कालगणना - bharatkaitihas.com

पुराणों में कालगणना

0
पुराणों में कालगणना: भारतीय परम्परा में समय का विशाल स्वरूप पुराणों में कालगणना की मूल अवधारणा कालगणना भारतीय परम्परा में समय को समझने की एक विशिष्ट...
Ebook The Quantum Universe and Vedanta - bharatkaitihas.com

Ebook The Quantum Universe and Vedanta

0
The Ebook The Quantum Universe and Vedanta by Dr. Mohanlal Gupta explores the fascinating relationship between quantum physics, consciousness, cosmic origins, and the philosophical insights of ancient Indian Vedanta.
पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण - bharatkaitihas.com

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण

0
पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण करते समय उनकी साहित्यिक परम्परा, रचनाकाल, विषयवस्तु और ऐतिहासिक उपयोगिता का अध्ययन आवश्यक है। 1. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उद्गम...
पुराणों की पौराणिकता - bharatkaitihas.com

पुराणों की पौराणिकता

0
1. भारतीय वाङ्मय में पुराणों का महत्त्व भारतीय वाङ्मय में पुराणों का स्थान अतुलनीय है। पुराण धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के महत्त्वपूर्ण स्रोत...
पुराण का वास्तविक स्वरूप - bharatkaitihas.com

पुराणों का वास्तविक स्वरूप

0
पुराणों का वास्तविक स्वरूप जानने के लिए मूल ग्रन्थों, वैदिक सन्दर्भों, पारिभाषिक शब्दावली और ऐतिहासिक प्रमाणों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। 1. प्रस्तावना : पुराणों...