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राजा दशरथ की रानियाँ

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प्राणमय, अन्नमय ओर मनोमय कोश की प्रतीक हैं राजा दशरथ की रानियाँ !

विभिन्न पुराणों में आई हुई कथाओं में वर्णित ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं को मानव देह धारी होने के साथ-साथ प्राकृतिक शक्तियों के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की कथा, राजा धुंधुमार द्वारा धुंधु राक्षस के संहार की कथा, राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाकर समुद्र को जल से भरने की कथा। ये सब कथाएं धरती पर होने वाली विशाल प्राकृतिक घटनाओं की ओर संकेत करती हैं।

इसी तरह ईक्ष्वाकु वंशी राजा दशरथ की तीनों रानियों को कुछ दार्शनिकों ने प्राणमय, अन्नमय और मनोमय कोश का प्रतीक सिद्ध करने का प्रयास किया है। इन प्रतीकों के विस्तार में जाने से  पहले हमें उन पांच कोषों के बारे में जानना होगा जिनके भीतर प्रत्येक प्राणी निवास करता है।

जब माया के प्रेरणा से आत्मा परमात्मा से अलग होकर शरीर धारण करती है तो उसे सबसे पहले माया द्वारा निर्मित आनंदमय कोष रूपी शरीर की प्राप्ति होती है। जब आनंदमय कोष में रहने वाला आत्मा माया के प्रभाव से कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे विज्ञानमय कोष कहते हैं।

विज्ञानमय कोष आनंदमयकोष के ऊपर लिपट जाता है। इस विज्ञानमय कोष को जब माया के प्रभाव से सुख-दुख की अनुभूति होने लगती है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे मनोमय कोष कहते हैं। यह मनोमय कोष विज्ञानमय कोष के चारों ओर लिटप जाता है।

जब माया के प्रभाव से मनोमय कोष में सुख और दुख की अनुभूतियों का विस्तार होता है तो प्राणमय कोष की रचना होती है तथा यह प्राणमय कोष मनोमय कोष के चारों ओर लिटप जाता है। जब माया की इच्छा से प्राणमय कोष को भोग करने की इच्छा होती है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे अन्नमय कोष कहते हैं। यह प्रत्येक प्राणी का सबसे बाहरी शरीर होता है जिसका निर्माण अन्न से होता है।

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इस प्रकार हमारे बाहरी शरीर अर्थात् अन्नमय कोष के भीतर प्राणमय कोष, प्राणमय कोष के भीतर मनोमय कोष, मनोमय कोष के भीतर विज्ञानमय कोष एवं विज्ञानमय कोष के भीतर आनंदमय कोष स्थित होता है।

इस प्रकार परमात्मा के अंश के रूप में विलग हुए आत्मा पर माया का आवरण चढ़ता चला जाता है तथा वह परमात्मा को पूरी तरह भूलकर इन पांचों कोषों के माध्यम से ना-ना प्रकार के भोग विलास करने में जुटा रहता है।

जब जीवात्मा अपने समस्त बाह्याडम्बरों का विनाश करके परमात्मा में विलीन होता है तो उसके पांचों शरीरों को एक एक करके मरना पड़ता है। सबसे पहले अन्नमय कोष मरता है। उसके बाद प्राणमय कोष मरता है। उसके बाद मनोमय कोष मरता है और उसके बाद विज्ञानमय कोष मरता है और सबसे अंत में मनुष्य का सबसे सूक्ष्म शरीर अर्थात् आनंद कोष नष्ट होता है, इसके बाद आत्मा पुनः परमात्मा में मिल जाता है।

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विभिन्न दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत दार्शनिक विवेचनाओं के अनुसार राजा दशरथ भोग में लिप्त जीवात्मा के प्रतीक हैं। इसलिए रामचरित मानव में सुमंतजी जब राजा दशरथ को प्रणाम करते हैं तो जयजीव कहकर शीश झुकाते हैं। प्रत्येक मनुष्य की दस इन्द्रियां होती हैं- पांच ज्ञानेन्द्रियां तथा पांच कर्मेन्द्रियां। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा को ज्ञानेन्द्रियां कहा जाता है। तथा हाथ, पैर, मुंह, गुदा और लिंग को कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इन दस इंद्रियों को समुच्चय को ही दशरथ कहा गया है। इन दस रथों पर सवार जीवात्मा अर्थात् दशरथ भोग विलास करता है।

दार्शनिकों के अनुसार महारानी कौसल्या दशरथ रूपी जीवात्मा की ज्ञान-शक्ति की प्रतीक हैं एवं उनका वर्ण क्षत्रिय है। वे हानि-लाभ की चिंता नहीं करती, केवल कर्त्तव्य निर्वहन ही उनका अभीष्ट है। रानी कैकेयी इच्छा-शक्ति की प्रतीक है, उसका वर्ण वैश्य है, इस कारण वह हानि-लाभ की चिंता करती है। रानी सुमित्रा राजा दशरथ रूपी जीवात्मा की की क्रिया-शक्ति का प्रतीक है, उसका वर्ण शूद्र है।

शूद्र अन्नमय कोश का, वैश्य प्राणमय कोश का और क्षत्रिय मनोमय कोश का प्रतीक है। इन तीनों कोषों के भीतर छिपकर राजा दशरथ रूपी विज्ञानमय कोष एवं आनंदमय कोष निवास करता है।

राजा दशरथ को कैकेयी सबसे अधिक प्रिय है क्योंकि प्राणमय कोश मनोमय और अन्नमय दोनों कोषों का भरण-पोषण करता है। प्राणमय कोष के बिना मनोमय कोष और अन्नमय कोष जीवित नहीं रह सकते। दशरथ रूपी विज्ञानमय कोश ऊर्ध्वमुखी होकर, शुद्ध ब्रह्म रूपी आनंदमय कोष को अर्थात् श्रीराम को सिंहासन पर आसीन करना चाहता है, कौसल्या रूपी मनोमय कोष इस कार्य में विज्ञानमय कोष की सहायता करता है तथा सुमित्रा रूपी अन्नमय कोष इस कार्य की मौन स्वीकृति देता है किन्तु प्राणमय कोश रूपी कैकेयी जिसके पास मन्थर गति से चलने वाली मन्थरा दासी रूपी बुद्धि है, इस कार्य में विघ्न उत्पन्न करती है क्योंकि कैकेयी मन के एकाङ्गी विकास को स्वीकार नहीं करती, अपितु चाहती है कि परब्रह्म रूपी राम का लाभ सारे जगत् को मिले।

प्राणमय कोष की प्रतीक रानी कैकेयी को कैकेयी नाम देना सार्थक ही है। संस्कृत साहित्य में ध्वनि के एक विशेष प्रकार को ‘केकय’ कहा जाता है। यह ध्वनि समस्त ध्वनियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। मन में अनेक प्रकार की इच्छा रूपी ध्वनियां उत्पन्न होती हैं किंतु रानी कैकेई ने राजा राजा दशरथ रूपी विज्ञानमय कोष और कौसल्या रूपी मनोमय कोष के भीतर विशेष ध्वनि उत्पन्न की कि रामजी को अयोध्या के सिंहासन पर बैठने के स्थान पर जगत् के कल्याण के लिए वन-गमन करना चाहिए ताकि असुरों का नाश हो सके।

पुराणों में रानी कैकेयी को अश्वपति की कन्या भी कहा गया है। यहाँ अश्वपति से तात्पर्य इन्द्रिय रूपी अश्वों के स्वामी अर्थात् मन से है।

व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास को चाहने वाली शक्ति अर्थात् कैकेयी के साथ सदैव विद्यमान रहने वाली व्यक्तित्व-विकास की स्मृति को ही कथा में मन्थरा नाम दिया गया है। चूंकि यह स्मृति शिथिल रूप में विद्यमान रहती है और केवल परिस्थिति विशेष अर्थात् आत्मज्ञान के अनुचित विनियोग अर्थात् राम के राज्याभिषेक को देखकर ही प्रकट होती है। इसलिए इस शिथिलता अथवा मन्दता के कारण इसे मन्थरा कहा गया है।

भले ही कुछ दार्शनिकों ने दशरथ को दस इन्द्रियों का प्रतीक; रानियों को प्राणमय, मनोमय एवं अन्नमय कोषों का प्रतीक एवं मंथरा को बुद्धि विशेष का प्रती बनाकर यह सुंदर रूपक खड़ा कर दिया है किंतु हमारी दृष्टि में दार्शनिक आधार पर  की गई यह विवेचना भारतीय जन मानस में प्रचलित धारणा से मेल नहीं खाती। भारतीय जन मानस में राजा दशरथ एवं माता कौसल्या को श्रीराम के प्रेम का प्रतीक माना गया है जो एक क्षण के लिए भी श्रीराम को अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहते एवं कैकेई तथा मंथरा को दुर्बुद्धि का प्रतीक माना गया है जो रामजी को राजतिलक से वंचित करके उन्हें वन में भेजने का षड़यंत्र करती हैं। यही कारण है कि सदियों से भारत में कोई भी व्यक्ति अपनी पुत्रियों के नाम कैकेई अथवा मंथरा नहीं रखता।

हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि आत्मा के पांच कोषों में निवास करने एवं इन पांचों कोषों को त्यागकर परमपिता परमात्मा में विलीन हो जाने की अवधारणा को हम गलत नहीं ठहरा रहे। हम तो केवल इतना कह रहे हैं कि महारानी कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकई को इन कोषों के रूप में देखने का जो दार्शनिक रूपक खड़ा किया गया है, वह उचित नहीं जान पड़ता। यह तो ऐसा ही प्रयास है जैसे किसी का नाम पर्वतसिंह रख दिया जाए और फिर कहा जाए कि उसका नाम पर्वतसिंह इसलिए रखा गया क्योंकि वह वास्तव में एक विशाल पहाड़ था।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी राम चरित मानस में रानी कैकेई और दासी मंथरा के कृत्य को निंदनीय ही माना है तथा उन्हें अपयश की पिटारी कहा है।

श्रीराम कितने पुराने हैं

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ईक्ष्वाकु वंशी श्रीराम कितने पुराने हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं दिया जा सका है! धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य श्रीराम का कालखण्ड अलग-अलग समय पर निर्धारित करते हैं! हिन्दू धर्म ग्रंथराजा रामचंद्र को पौने दो करोड़ साल पुराना बताते हैं!

 ईक्ष्वाकु वंशी राजा दशरथ के चार पुत्र हुए। बड़े पुत्र रामचंद्र अपने शील, सौंदर्य एवं शक्ति के कारण सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रिय थे। राजा रामचंद्र अयोध्या के 64वें ईक्ष्वाकुवंशी राजा थे। वे भी त्रेता युग में हुए।

इतिहासकार अब तक श्रीराम का जीवनकाल निश्चित नहीं कर पाए हैं। रामायण मीमांसा के रचनाकार स्वामी करपात्रीजी, पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। ये सभी विद्वान अपने मत के समर्थन में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं अन्य पुराणों से प्रमाण देते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12 लाख 96 हजार वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8 लाख 64 हजार वर्ष रही।

द्वापर के बाद ई.पू. 3 हजार 102 में कलियुग आरम्भ हुआ। यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8 लाख 69 हजार 119 वर्ष पहले हुआ। वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5 हजार 114 अर्थात् आज से लगभग 7 हजार वर्ष पूर्व हुआ।

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वाल्मीकि रामायण की रचना का काल आज से लगभग 2800 वर्ष पुराना माना जाता है। इस ग्रंथ में पहली बार रामकथा का परिपक्व स्वरूप उभर कर सामने आया। इससे पहले भी रामकथाओं के अनेक ग्रंथ थे, वे अब नष्ट हो गए हैं। महर्षि वाल्मीकि ने उन ग्रंथों एवं हिन्दू जनमानस में प्रचलित कथाओं के आधार पर रामायण नामक ग्रंथ की रचना की। आज हमारे पास रामकथा को बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ यही है। इसमें श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों का वर्णन किया गया है।

अब तक प्राप्त प्राचीनतम उल्लेख के अनुसार आज से लगभग 2 हजार साल पहले अर्थात् प्रथम शताब्दी ईस्वी में उज्जैन के राजा शकारि विक्रमादित्य ने इक्ष्वाकुओं की राजधानी अयोध्या की यात्रा की तथा रामायण में वर्णित स्थान पर पहले से ही स्थित मंदिर का भव्य नवनिर्माण करवाया।

जब पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में चीनी यात्री फाह्यान अयोध्या आया तो उसने अयोध्या में कुछ बड़े बौद्ध मंदिरों को देखा। उसने अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। इससे प्रतीत होता है कि इस काल तक बौद्धों ने हिन्दुओं के प्राचीन मंदिरों को तोड़ डाला था। अथवा बौद्ध होने के कारण फाह्यान को हिन्दू मंदिरों का उल्लेख करने में कोई रुचि नहीं थी।

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सातवीं शताब्दी ईस्वी में जब ह्वेसांग अयोध्या आया, तब तक अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध एवं जैन मंदिर बन चुके थे। वह भी बौद्ध था तथा उसने भी अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। ऑस्ट्रिया के एक पादरी फादर टाइफैन्थेलर ने सत्रहवीं शताब्दी में अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ।

फादर टाइफैन्थेलर ने लिखा है- ‘अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।’

ई.1889-91 में अलोइज अंटोन नामक इंग्लिश पुरातत्वविद् की देख-रेख में अयोध्या का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया गया जिसमें उसने अयोध्या के निकट तीन टीले देखे जिन्हें मणिपर्वत, कुबेरपर्वत तथा सग्रीवपर्वत कहा जाता था। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने माना है कि इन टीलों के नीचे बड़े बौद्ध मठों के अवशेष हैं जिनका उल्लेख ह्वेसांग ने किया था। स्वतंत्रता के पश्चात् अयोध्या नगर में हुई खुदाइयों में अयोध्या में मानव सभ्यता को ईसा से 1,700 वर्ष पूर्व अर्थात् आज से 3,700 वर्ष पूर्व पुरानी माना गया।

निश्चय ही इसके पूर्व की सभ्यता नष्ट हो गई होगी क्योंकि रामसेतु पुल की कार्बन डेटिंग से इस तथ्य की पुष्टि हो चुकी है कि मानव निर्मित इस सेतु का निर्माण आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था। अर्थात् अयोध्या में निश्चित रूप से आज से सात हजार साल पहले भी सभ्यता रही होगी जो काल के प्रवाह में नष्ट हो चुकी होगी।

अतः हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार रामचंद्र का जन्म आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था।

हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में हुए उल्लेखों के अनुसार अयोध्या में श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों पर तीन मंदिर बनाए गए। पहला मंदिर श्रीराम की जन्मभूमि पर था जिसे ‘जन्मस्थानम्’ कहा जाता था। दूसरा मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ कहलाता था जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया। तीसरा मंदिर ‘स्वर्गद्वारम्’ कहलाता था जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया।

सात हजार वर्ष की अवधि में अयोध्या ने जाने कितनी करवटें ली होंगी किंतु हिन्दुओं को राजा रामचंद्र से जुड़े तीनों मंदिर जन्मस्थानम्, त्रेता के ठाकुर एवं स्वर्गदारम् याद रहे। अयोध्या के धार्मिक महत्व के कारण ही बौद्धों एवं जैनों ने भी अयोध्या को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया किंतु धार्मिक संकीर्णता के चलते उन्होंने अपने ग्रंथों में श्रीराम से सम्बद्ध मंदिरों का उल्लेख नहीं किया।

ईस्वी 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। ई.1528 में बाबर ने अपने सेनापति मीर बाकी को आदेश दिया कि वह अयोध्या का ‘जन्मस्थानम्’ नामक मंदिर तोड़ दे ताकि अयोध्या की धार्मिक पहचान मिटाई जा सके। कुछ हिन्दू राजाओं ने हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे के नेतृत्व में मीर बाकी पर आक्रमण किया। इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। युद्ध में विजय प्राप्त करके मीर बाकी ने राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ डाला तथा उसके स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया।

इस मस्जिदनुमा ढांचे को खड़ा करने में राम जन्मभूमि मंदिर के भग्नावशेषों को काम में लिया गया जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर के चौदह स्तम्भ भी सम्मिलित थे जिन पर हिन्दुओं के धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण थे। मीर बाकी ने इस ढांचे के सामने एक शिलालेख अंकित करवाया जिसमें इस स्थल का ‘फरिश्ते का जन्म स्थान’ के रूप में उल्लेख किया।

चूंकि यह काम मुगल आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने किया था, इसलिए मुसलमानों ने इस ढांचे को बाबरी मस्जिद कहा। मुगल दस्तावेजों में इसे ‘मस्जिद जन्मस्थानम्’ कहा जाता रहा। जब भारत के छठे मुगल बादशाह औरंगजेब ने ई.1669 में उत्तर भारत के समस्त मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए तो उसकी सेनाओं ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के दो मंदिरों ‘त्रेता के ठाकुर’ तथा स्वर्गद्वारम् को भी नष्ट कर दिया।

इसके बाद पूरे पांच सौ सालों तक हिन्दू अयोध्या के जन्मस्थानम् मंदिर को फिर से प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते रहे। नवम्बर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या का जन्मस्थानम् मंदिर स्थल फिर से हिन्दुओं को लौटा दिया है और अब इस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाने की तैयारियां चल रही हैं।

भरत तुम मनुष्यों के राजा बनो, मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा (26)

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भरत - bharatkaitihas.com
भरत तुम मनुष्यों के राजा बनो, मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा

जब श्रीराम ने भरत से यह कहा कि तुम मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा तो इस बात में कई गुप्त संदेश छिपे हुए थे। उनके कहने का आशय यह था कि अब मैं जंगल में घुसकर वहाँ निवास करने वाले नरभक्षी राक्षसों का अनुशासन करंगा अर्थात् उन्हें नष्ट करूंगा।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं की उज्जवल परम्परा में अयोध्या नरेश राजा दशरथ के चार पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े रामचंद्र थे। इस कड़ी में हम उन राजकुमारों के त्याग और उच्च आदर्श के प्रतिमान स्थापित करने की चर्चा करेंगे।

राजा रदशरथ के बड़े पुत्र अपने शील, सौंदर्य एवं शक्ति के कारण सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रिय थे। रामचंद्र का विवाह मिथिला के राजा सीरध्वज की बड़ी पुत्री सीता से हुआ जो राजा सीरध्वज द्वारा खेत में हल चलाते समय भूमि को फाड़कर प्रकट हुई थी।

राजा दशरथ के पुत्र लक्ष्मण का विवाह राजा सीरध्वज की दूसरी पुत्री उर्मिला से हुआ था। दशरथ के पुत्र भरत का विवाह मिथिला के राजा सीरध्वज के छोटे भाई कुशध्वज की पुत्री माण्डवी से एवं शत्रुघ्न का विवाह कुशध्वज की छोटी पुत्री श्रुतकीर्ति से हुआ।

जब राजा दशरथ ने अपनी वृद्धावस्था का विचार करके अपने बड़े पुत्र रामचंद्र को राज्य देना चाहा तो रानी कैकेई ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के प्राण बचाने के पुरस्कार के रूप में मिले दो वरदानों का उपयोग करते हुए अपने पुत्र भरत के लिए राजसिंहासन और कौसल्या नंदन रामचंद्र के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लिया।

राजकुमार रामचंद्र की रानी सीता एवं अनुज लक्ष्मण ने भी रामचंद्र के साथ वन में जाने का निर्णय लिया। रामचंद्र के वनवास के दौरान घटित घटनाओं से ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं की शुभ्र परम्पराओं का इतिहास प्राप्त होता है। राजकुमार रामचंद्र ने 14 वर्ष की अवधि का उपयोग वनवासी ऋषियों एवं तपस्वियों का सानिध्य प्राप्त करने एवं ऋषियों को दुख देने वाले असुरों का संहार करने में किया।

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राम, लक्ष्मण एवं सीता अयोध्या से निकलकर गंगा-यमुना के संगम स्थल अर्थात् प्रयाग में स्थित भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर गए तथा उनसे पूछा- ‘हमें वनवास की अवधि में कहाँ निवास करना चाहिए!’

ऋषि भरद्वाज ने उनसे अनुरोध किया- ‘आप यहीं रह जाइए। गंगा-यमुना के संगम पर स्थित तीर्थराज प्रयाग अत्यंत सुखकारी एवं पुण्य स्थल है।’

इस पर राम ने कहा- ‘यह स्थान अयोध्या के निकट है इसलिए अयोध्यावासी यहाँ आते रहेंगे और मेरे एकांतवास में विघ्न उत्पन्न करेंगे।’

इस पर महर्षि भरद्वाज ने उन्हें चित्रकूट पर्वत पर जाकर निवास करने की सलाह दी। कुछ समय पश्चात् भरतजी अयोध्यावासियों को लेकर चित्रकूट पहुंचे तथा श्रीराम से अयोध्या लौट चलने का अनुरोध करने लगे तो राम ने पिता के वचनों का सम्मान रखने के लिए 14 वर्ष तक वन में ही रहने का संकल्प व्यक्त किया तथा अनुज भरत से कहा कि वह पिता के वचनों का पालन करते हुए अपना राज्याभिषेक करवा ले तथा अपने स्वर्गीय पिता दशरथ को, माता कैकेई को दिए हुए वचन रूपी ऋण से मुक्त करवाए।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि श्रीराम ने अपने अनुज भरत से कहा- ‘पुत्र अपने माता-पिता को पुत् नामक नर्क से मुक्ति दिलवाता है, इसलिए उसे पुत्र कहा जाता है। वही पुत्र है जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है। चूंकि हम राजा दशरथ के पुत्र हैं इसलिए हमें अपने पिता की मुक्ति के लिए उनके वचनों एवं आदेशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने तुम्हें राज्य करने और मुझे वन में जाने का आदेश दिया था।’

राम ने कहा- ‘हे भरत! तुम शत्रुघ्नजी तथा समस्त ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या को लौट जाओ! मैं भी अब लक्ष्मण और सीता को लेकर दण्डकारण्य में प्रवेश करूंगा। भरत! तुम स्वयं मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बूंगा। अतुलित बुद्धि वाले शत्रुघ्नजी तुम्हारी सहायता में रहें ओर सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र हैं, हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो।’

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जब श्रीराम ने भरत से यह कहा कि तुम मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा तो इस बात में कई गुप्त संदेश छिपे हुए थे। उनके कहने का आशय यह था कि अब मैं जंगल में घुसकर वहाँ निवास करने वाले नरभक्षी राक्षसों का अनुशासन करंगा अर्थात् उन्हें नष्ट करूंगा। आगे चलकर जब खर और दूषण श्रीराम पर आक्रमण करते हैं तो श्रीराम इस बात को दूसरे शब्दों में कहते हैं- ‘हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरही।’ अर्थात् हम क्षत्रिय राजकुमार हैं और इस वन में तुम्हारे जैसे पशुओं का ही वध करते फिर रहे हैं। राजकुमार भरत ने श्रीराम के आदेश को स्वीकार लिया और उनसे कहा कि आपके आदेशानुसार मैं अयोध्या लौट जाउंगा तथा आप भी पिता के वचनों का सम्मान करते हुए चौदह वर्ष तक वन में रहें किंतु अयोध्या के राजा आप ही हैं। मैं आपकी चरण पादुकाओं को शीश पर धरकर तथा उन पादुकाओं से आदेश लेकर राजकाज करूंगा एवं चौदह वर्ष बीतने पर जब आप अयोध्या लौटेंगे, तब आपका राज्यतिलक होगा तथा आप अयोध्यावासियों के राजा बनकर उन्हें सुख देंगे। इतना कहकर कैकेई नंदन भरत ने श्रीराम की पादुकाएं अपने शीश पर रख लीं और अयोध्यावासियों को साथ लेकर पुनः अयोध्या लौट गए।

अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गई सम्पूर्ण रामकथाओं को यदि सार रूप में ग्रहण करें तो उनसे कुछ निश्चित प्रतिमान स्पष्ट होते हैं। इक्ष्वाकुवंशी चारों राजकुमारों ने अपने-अपने स्तर पर त्याग और उच्च आदर्श के प्रतिमान स्थापित किए। उन्होंने स्वयं के हित का चिंतन नहीं करके समाज के समक्ष राजाओं एवं राजकुमारों द्वारा किए जाने वाले आचरण को व्याख्यायित किया।

श्रीराम ने पिता दशरथ द्वारा श्रीराम की विमाता कैकेई को दिए गए वचनों का सम्मान करते हुए न केवल राज्य ही छोड़ा अपितु चौदह वर्ष तक वनवास में रहना उचित समझा। दूसरे पुत्र भरत ने राज्य पर ज्येष्ठ पुत्र के अधिकार को नैसर्गिक मानते हुए स्वयं राजा बनना स्वीकार नहीं किया तथा चौदह वर्ष तक अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में रहना और वहीं से राज्यकार्य करना उचित समझा।

दशरथ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण ने अपनी विमाता कौसल्या के पुत्र को अपना स्वामी मानकर उनके साथ वन में जाना स्वीकार किया। यहाँ तक कि अपनी पत्नी को भी अपने साथ नहीं लिया। राजा दशरथ के चौथे पुत्र शत्रुघ्नजी ने अपने तीनों भाइयों को चौदह साल तक अयोध्या से अनुपस्थित जानकर अयोध्यावासियों का रक्षण एवं पोषण किया।

उन्होंने राज्य की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा। इक्ष्वाकु राजाओं एवं राजकुमारों की इस उच्च परम्परा में अयोध्या के राजमहल की रानियों ने भी एक से बढ़कर एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। रानी सीता महलों का सुख छोड़कर पति के साथ वनों में भटकती फिरीं किंतु उनके लिए यह कोई त्याग नहीं था, पति के साथ रहने का सुख था। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान श्रीराम के वनवास की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखा है- ‘रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।’

अर्थात्- लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्री रामचन्द्र, पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं, जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयंत सहित बसता है। अर्थात् उनके लिए वन में निवास करना किसी महासुख से कम नहीं है। लक्ष्मणजी की रानी उर्मिला ने 14 साल की दीर्घ अवधि का पति वियोग सहना स्वीकार किया तथा अपनी तीनों विधवा सासों की सेवा-सुश्रुषा की। भरतजी 14 साल तक नंदीग्राम में रहते रहे किंतु रानी माण्डवी अयोध्या में अपनी सासों की सेवा करती रही।

श्रुतकीर्ति ने भी परिवार की मर्यादा और शील का अनुकरण किया। जब तक राम लौटकर नहीं आए, किसी भी भाई ने दाम्पत्य सुख नहीं भोगा। चौदह साल बाद जब राम-लक्ष्मण एवं सीता अयोध्या लौट आए तथा श्रीराम का राज्यतिलक हुआ, उसके बाद ही चारों भाईयों की रानियों ने दो-दो पुत्रों को जन्म दिया।                                  

महर्षि जाबालि को कड़ी फटकार लगाई वनवासी राम ने (27)

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महर्षि जाबालि को कड़ी फटकार लगाई वनवासी राम ने

हमने पिछली कड़ी में उल्लेख किया था कि दशरथ नंदन श्रीराम ने चित्रकूट में अपने अनुज भरत को यह समझाने का प्रयास किया कि पुत्रों को अपने मृत पिता के वचनों का पालन करके उसे ऋण से मुक्त करवाने का प्रयास करना चाहिए एवं अपने समस्त पितरों की रक्षा एवं मुक्ति का प्रयास करना चाहिए। इसलिए तुम्हें अयोध्या लौट जाना चाहिए और मुझे वन में जाना चाहिए। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि वहाँ महर्षि जाबालि बैठे हुए समस्त वार्तालाप सुन रहे थे।

महर्षि जाबालि ने श्रीराम से कहा कि आप श्रेष्ठ बुद्धि वाले एवं तपस्वी हैं किंतु आपको गंवार मनुष्य की तरह ऐसा निरर्थक विचार मन में नहीं लाना चाहिए। इस संसार में कौन पुरुष किसका बंधु है, और किससे किसको क्या पाना है! जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है। अतः श्रीराम! जो मनुष्य किसी को अपना माता या पिता समझकर उसके प्रति आसक्त होता है उसे पागल के समान समझना चाहिए! क्योंकि कोई किसी का कुछ भी नहीं है।

जैसे कोई मनुष्य दूसरे गांव को जाते समय बाहर धर्मशाला में एक रात के लिए ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थान को छोड़कर आगे के लिए प्रस्थान कर जाता है, इसी प्रकार माता, पिता, भाई, घर और धन ये मनुष्यों के आवास मात्र हैं! हे रघुवंश कुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं।

अतः नरश्रेष्ठ आपको पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊंचे, तथा बहुकण्टकीर्ण वन के कुत्सित मार्ग पर नहीं चलना चाहिए। आप समृद्धिशालिनी अयोध्या में राजा के पद पर अपना अभिषेक करवाइए। वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारी की भांति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगों का उपभोग करते हुए अयोध्या में विहार कीजिए। राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा पराए थे और आप भी पराए हैं। इसलिए मैं जो कहता हूँ, आप वही कीजिए।

पिता जीव के जन्म में निमित्तकारण मात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किए हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही मनुष्य का जन्म होता है।  राजा को जहाँ जाना था, वहाँ चले गए। यह प्राणियों की स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ में कष्ट उठा रहे हैं।

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जो जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थ का परित्याग करके धर्म परायण हुए हैं, उन-उन लोगों के लिए मैं शोक करता हूँ, दूसरों के लिए नहीं। वे इस जगत् में धर्म के नाम पर केवल दुःख भोगकर मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं। अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं। श्राद्ध का दान पितरों को मिलता है, यही सोचकर लोग श्राद्ध में प्रवृत्त होते हैं किंतु विचार करके देखिए तो इसमें अन्न का नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खाएगा!

यदि यहाँ किसी मनुष्य द्वारा खाया हुआ अन्न मृत व्यक्ति के शरीर में चला जाता है तो परदेश में जाने वाले व्यक्ति के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उसको रास्ते के लिए भोजन देना उचित नहीं है। देवताओं के लिए यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बताने वाले ग्रंथ चालाक मनुष्यों ने दान की ओर लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिए ही बनाए हैं।

अतः महामते! आप अपने मन में यह निश्चय कीजिए कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिए, परोक्ष पारलौकिक लाभ को पीछे धकेल दीजिए। सत्पुरुषों की बुद्धि जो सब लोगों के लिए राह दिखाने वाली होने के कारण प्रमाणभूत है, उसे आगे करके, भरत के अनुरोध से आप अयोध्या का राज्य ग्रहण कीजिए।’

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महर्षि जाबालि का यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचंद्र ने अपनी संशयरहित बुद्धि के द्वारा श्रुतिसम्मत सद्युक्ति का आश्रय लेकर कहा- ‘हे विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करने की इच्छा से जो बात कही है, वह कर्त्तव्य जैसी दिखाई देती है किंतु वह करने योग्य नहीं है। वह पथ्य के समान दिखाई देती हुई भी पथ्य नहीं है। जो पुरुष धर्म अथवा वेद की मर्यादा को त्याग देता है, वह पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों ही भ्रष्ट हो जाते हैं। इसलिए वह कभी भी सत्पुरुषों में सम्मान नहीं पाता है। मनुष्य का आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुल में, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही स्वयं को वीर पुरुष मानता है, कौन पवित्र है और कौन अपवित्र। आपने जो आचार बताया है उसे अपनाने वाला पुरुष वास्तव में अनार्य होगा। वह बाहर से पवित्र दिखने पर भी भीतर से अपवित्र होगा! आपका उपदेश चोला तो धर्म का पहने हुए है किंतु वास्तव में अधर्म है। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्म छोड़ दूं और धर्मविहीन कर्म में लग जाऊं तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? यदि मैं अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दूँ तो फिर मुझे किस साधन से स्वर्ग की प्रािप्ति होगी?

आपके बताए हुए मार्ग पर चलकर यह सम्पूर्ण जगत् स्वेच्छाचारी हो जाएगा और अनाचरण करने लगेगा। सत्य का पालन ही राजाओं का दयाप्रधान धर्म है। सनातन आचार है। सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है। संसार में सत्य ही धर्म की पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है। झूठ बोलने वाले से सब लोग वैसे ही डरते हैं जैसे सांप से।

सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्म सदाश्रितः। सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदं।। अर्थात्- जगत् में सत्य ही ईश्वर है। धर्म सदैव सत्य का आधार लेकर खड़ा रहता है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है। दान, यज्ञ, होम, तपस्या ओर वेद, इन सबका आधार सत्य ही है। इसलिए सबसको सत्य-परायण होना चाहिए। संसार में अलग-अलग तरह के मनुष्य होते हैं।

एक मनुष्य समस्त लोक का पालन करता है, एक मनुष्य सम्पूर्ण कुल का पालन करता है, एक मनुष्य नर्क में डूबता है और एक स्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है। मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य की शपथ खाकर पिता के सत्य का पालन स्वीकार कर चुका हूँ। मैं पिता के आदेश का किसलिए पालन नहीं करूं? मैं इस सत्य रूपी धर्म को समस्त प्राणियों के लिए हितकर और सब धर्मों में श्रेष्ठ समझता हूँ।

मनुष्य अपने शरीर से जो पाप करता है, पहले मन के द्वारा कर्तव्य रूप से निश्चित करता है। फिर जिह्वा की सहायता से उस पाप को वाणी द्वारा दूसरों से कहता है। तत्पश्चात् दूसरों के सहयोग से उसे शरीर द्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पाप कायिक, वाचिक और मानसिक भेद से तीन प्रकार का होता है।

पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी ये सब सत्यवादी पुरुष को पाने की इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्य का ही अनुसरण करते हैं। अतः मनुष्य को सदा सत्य का ही सेवन करना चाहिए। मैंने पिताजी के सामने वन में रहने की प्रतिज्ञा की है। अब उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने के लिए मैं भरत की बात कैसे मान लूं? गुरु के समक्ष की गई वह प्रतिज्ञा अटल है। किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती। मैं वन में ही रहकर बाहर-भीतर से पवित्र होकर नियमित भोजन करूंगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पों द्वारा देवताओं और पितरों को तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञा का पालन करूंगा।

इस कर्मभूमि को पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिए। क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्मों के ही फल से अपने पदों के भागी हुए हैं। जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध भी दण्डनीय है।  नास्तिक तथागत एवं नास्तिक चार्वाक को भी इसी कोटि में समझना चाहिए।

जिस प्रकार चोर को राजा से दण्ड दिलवाया जाता है, उसी प्रकार नास्तिक को राजा से दण्ड दिलवाना चाहिए, किसी भी विद्वान ब्राह्मण को कभी भी किसी नास्तिक से बात तक नहीं करनी चाहिए। जो धर्म में तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषों का साथ करते हैं, तेज से सम्पन्न हैं, जिनमें दान रूपी गुण की प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते हैं तथा मल-संसर्ग से रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसार में पूजनीय होते हैं।’

जब श्रीराम ने रोषपूर्वक ये बातें कहीं तो महर्षि जाबालि ने हाथ जोड़कर कहा- ‘रघुनंदन न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकों की बात ही कहता हूँ। परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है। मैं अवसर देखकर आस्तिक और नास्तिक हो जाता हूँ। इसलिए मैंने नास्तिकों जैसी बातें कहीं ताकि आप अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लें। मेरा मंतव्य केवल आपको अयोध्या लौट जाने के लिए सहमत करना है। मैं इसी को सबसे बड़ा धर्म समझता हूँ।’

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को ईक्ष्वाकुओं की परम्परा बताई (28)

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महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को ईक्ष्वाकुओं की परम्परा बताई

आज हमें रामकथा का प्राचीनतम स्वरूप महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में मिलता है। इस ग्रंथ में श्रीराम का चित्रण मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में किया गया है।

जब भगवान श्रीराम ने जाबालि ऋषि से रोषपूर्ण बातें कहीं तो गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम को बताया कि जाबालि ऋषि नास्तक नहीं हैं। वे तो आपसे केवल इतना चाहते हैं कि आप जंगलों के दुख भोगने की बजाय अध्योध्या को लौट जाएं। आपका अयोध्या लौट जाना उचित है क्योंकि ईक्ष्वाकुओं की यह परम्परा रही है कि राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही अगला राजा होता है। मैं आपको ईक्ष्वाकुओं की उज्जवल परम्परा के बारे में बताता हूँ।

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को स्वयंभू ब्रह्मा के प्रकट होने से लेकर उनके द्वारा वाराह रूप धारण करके धरती को समुद्र से बाहर निकालने, ब्रह्मा से मरीचि नामक ऋषि के उत्पन्न होने और मरीचि से कश्यप, कश्यप से मनु एवं मनु से ईक्ष्वाकु के उत्पन्न होने की जानकारी दी।

महर्षि वसिष्ठ ने कहा कि राजा ईक्ष्वाकु द्वारा अयोध्या की स्थापना की गई। तब से लेकर राजा दशरथ तक जितने भी राजा हुए हैं, वे सब अपने पिता के ज्येष्ठ पुत्र थे। आप भी राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र हैं, इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कुलगुरु का अर्थात् मेरा आदेश मानकर अयोध्या लौट चलें और अयोध्या का राज्य संभालें। चूंकि आपकी माताएं, समस्त ऋषिगण, ब्राह्मण एवं पुरजन भी यही चाहते हैं इसलिए आपको सत्पुरुष के पथ का त्याग करने वाला नहीं समझा जाएगा।

गुरु के आग्रह पर भी श्रीराम ने अपने निश्चय का त्याग नहीं किया तथा अपने स्वर्गीय पिता दशथ के वचनों का मान रखने के लिए वन में प्रवास करने का निर्णय अपरिवर्तित रखा।

ईक्ष्वाकु वंशी राजकुमार श्रीराम के इस एक निर्णय ने उनके सम्पूर्ण व्यक्त्तिव को अलौकिक बना दिया। महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को उनके बाल्यकाल में ही अरण्यवासी ऋषियों की समस्याओं से परिचित करवा चुके थे। अतः निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि श्रीराम ने अपने दीर्घकालीन अरण्य-प्रवास के दौरान वनवासी ऋषियों के सान्निध्य के प्रभाव से कुछ नए संकल्प लिए होंगे तथा आर्य संस्कृति को नष्ट करने वाली आसुरि शक्तियों के संहार का बीड़ा उठाया होगा।

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अपने वन-प्रवास की अवधि में श्रीराम ने अनेक राक्षसों को मारा जो ऋषियों को यज्ञ हवन करने, आर्य जीवन शैली का विकास करने एवं अरण्यों में एकांतवास करने में विघ्न उत्पन्न करते थे। इनमें से कुछ घटनाओं की चर्चा हम आगामी कथाओं में करेंगे।

आज हमें रामकथा का प्राचीनतम स्वरूप महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में मिलता है। इस ग्रंथ में श्रीराम का चित्रण मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में किया गया है। यही कारण है कि जब महर्षि वाल्मिीकि श्रीराम को इक्ष्वाकुवंशी राजाओं का परिचय देते हैं तो इस वंश की उत्पत्ति का उल्लेख प्रजापति ब्रह्मा से आरम्भ करते हुए भी वे इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के साथ उन चमत्कारी विवरणों का उल्लेख नहीं करते हैं, जिनका उल्लेख रामायण के बाद लिखे गए पुराणों में किया गया है।

महर्षि वाल्मीकि राजा सगर द्वारा सगर-पुत्रों से समुद्र खुदवाने का उल्लेख तो करते हैं किंतु पुत्रों की संख्या साठ हजार नहीं बताते। फिर भी वाल्मीकि रामायण में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो दिव्य, अतीन्द्रिय एवं अलौकिक जान पड़ती हैं। इसका कारण यह है कि वाल्मीकि रामायण का स्वरूप भी विगत तीन हजार सालों में पूरी तरह बदल चुका है।

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आज जो महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण हमारे सामने है, उस पर पुराणों का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। यहाँ तक कि वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड के 109वें अध्याय में तथागत बुद्ध को चार्वाकों के समान ही दण्डनीय चोर कहा गया है। जबकि महर्षि वाल्मीकि की रामायण की रचना तो महात्मा बुद्ध से सैंकड़ों साल पहले की है। ऐसी स्थिति में तथागत बुद्ध का उल्लेख वालमीकि कृत रामायण में होना ही नहीं चाहिए था किंतु जैसा कि हमने पहले कहा, वाल्मीकि रामायण का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने हैं, उसमें बहुत सी बातें पौराणिक काल में जोड़ी गई हैं। मूल वाल्मीकि रामायण में निश्चित रूप से श्रीराम के चरित्र में शील, सौंदर्य एवं शौर्य का अप्रतिम समन्वयन किया गया होगा किंतु श्रीराम में अतीन्द्रिय अथवा अलौकिक शक्तियों का आरोपण नहीं किया गया होगा। ऐसा निश्चय ही रामायण की मूल रचना के बहुत बाद में किया गया होगा। रामायण के बाद महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत ही ऐसा ग्रंथ है जिसमें रामकथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इस रामकथा को अलग ग्रंथ के रूप में भी देखा जाता है तथा अध्यात्म रामायण कहा जाता है। चूंकि महाभारत का काल आते-आते श्री हरि विष्णु के अवतारों की अवधारणा पुष्ट हो चुकी थी इसलिए अध्यात्म रामायण में श्रीराम को विष्णु अवतार के रूप में चित्रित किया गया है।

वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस ग्रंथ पर वाल्मीकि रामायण का प्रभाव है किंतु उस पर उन पुराणों का भी प्रभाव है जिन्होंने राम को अवतारी पुरुष घोषित करने का साहस दिखाया था।

ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्राचीनतम पुराणों की रचना वाल्मीकि रामायण के लगभग पांच सौ साल बाद हुई। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण सबसे पुराने हैं। इनमें भी श्रीराम का उल्लेख है। हरिवंश पुराण में रामकथा संक्षेप में लिखी गई है।

आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले लिखे गए विष्णु पुराण में भी रामकथा का उल्लेख हुआ है। आज से लगभग सात सौ साल पहले लिखे गए भागवत पुराण में सीता को लक्ष्मीजी का अवतार बताया गया है। गरुड़ पुराण एवं स्कंद पुराण में श्रीराम का अवतारी स्वरूप और अधिक स्पष्ट हुआ।

इस प्रकार लगभग एक हजार वर्षों की दीर्घ अवधि में रचित विविध पुराणों में श्रीराम का अवतारी स्वरूप पुष्ट होता चला गया। इन ग्रंथों में भगवान के अवतारी स्वरूप को पुष्ट करने वाली अनेक नवीन कथाएं जोड़ दी गईं जिनसे भगवान के दुष्ट-हंता स्वरूप के साथ-साथ क्षमा एवं दया के सागर तथा भक्त-वत्सल स्वरूप का भी दर्शन होता है।

पुराणों के रचना काल में भगवान श्री हरि विष्णु के विविध स्वरूपों की पूजा प्रचलित हुई जिनमें नृसिंह एवं वाराह पूजा अधिक लोकप्रिय थीं। आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले मगध के गुप्त सम्राटों के काल में उत्तर भारत में वाराह पूजा एवं दक्षिण भारत में नृसिंह पूजा सर्वाधिक प्रचलित थी। गुप्त सम्राटों के बाद के कालों में श्री हरि विष्णु के श्रीराम एवं श्रीकृष्ण स्वरूपों की भक्ति एवं पूजा की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

पुराणों के रचना काल में वामन भगवान एवं श्री परशुराम को भी निष्ठापूर्वक श्री हरि विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा दी जाती रही किंतु उनके अलग से मंदिर बहुत कम बने। उन्हें  प्रायः श्री हरि विष्णु के विविध अवतारों के मंदिरों में दशावतारों के रूप में ही प्रतिष्ठित किया जाता रहा।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पहले रामचरित मानस की रचना की। इस ग्रंथ में श्रीराम को भगवान श्रीहरि विष्णु के लौकिक अवतार के रूप में चित्रित किया गया एवं उनके शत्रुनाशक एवं भक्त-वत्सल स्वरूप का इतना मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया गया कि ‘श्रीराम-भक्ति’ ने ‘विष्णु-भक्ति’ के समस्त स्वरूपों को बहुत पीछे छोड़ दिया। केवल ‘कृष्ण-भक्ति’ ही श्रीराम-भक्ति के बराबर खड़ी रह सकी। भगवान के अन्य अवतारों एवं स्वरूपों की पूजा का प्रचलन बहुत कम हो गया।

गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरित मानस की ख्याति के पश्चात् श्रीराम के अवतारी पुरुष होने का विश्वास इतना पुष्ट हो गया कि उस काल में कदाचित् ही ऐसा कोई हिन्दू बचा था जो श्रीराम को लौकिक पुरुष मानता हो या जिसे श्रीराम के विष्णु का अवतार होने पर संदेह हो! इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार श्रीराम के अवतारी पुरुष बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए हमें विभिन्न पुराणों के साथ-साथ दक्षिण भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित रामकथाओं एवं अलावार संतों द्वारा रचि साहित्य का अध्ययन करना होता है।

जयंत की आंख फोड़कर उसे जीवित छोड़ दिया श्रीराम ने (29)

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जयंत - bharatkaitihas.com
जयंत की आंख फोड़कर उसे जीवित छोड़ दिया श्रीराम ने

राजकुमार भरत द्वारा अयोध्यावासियों को अपने साथ लेकर अयोध्या लौट जाने के बाद भी राम, लक्ष्मण एवं सीता कुछ दिनों तक चित्रकूट में निवास करते रहे। वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, नरसिंह पुराण, पद्म पुराण तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस में श्रीराम के चित्रकूट प्रवास के दौरान घटित इंद्र के पुत्र जयंत की कथा का उल्लेख किया गया है।

इस कथा के अनुसार एक दिन इन्द्र का पुत्र जयंत चित्रकूट आया। उसने सुना था कि राम कोई साधारण पुरुष नहीं हैं, वे तीनों लोकों के स्वामी स्वयं श्री हरि भगवान विष्णु हैं और वे राक्षसों का संहार करने के लिए अरण्य वन में प्रवेश करने वाले हैं। इसलिए जयंत ने श्रीराम के बल को देखने का निश्चय किया।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि इन्द्रपुत्र जयंत ने अपने अहंकार के कारण ऐसा प्रयास किया मानो कोई मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो। जयंत ने कौए का रूप धरकर माता सीता के चरण पर चौंच मारकर उन्हें घायल कर दिया।

जब सीताजी के चरण से रक्त बहने लगा तो श्रीराम ने एक सरकण्डा उठकार अपने धनुष पर तीर की भांति चढ़ाया और उसे जयंत पर छोड़ दिया। मंत्र से प्रेरित वह ब्रह्मबाण जयंत की ओर दौड़ा। जयन्त ने जब भगवान के तीर को अपनी ओर आते हुए देखा तो जयंत अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगा।

जयंत अपना वास्तविक रूप धरकर अपने पिता इन्द्र के पास गया। इन्द्र ने उसे श्रीराम का विरोधी जानकर उसे अपने पास नहीं रखा। इससे जयंत के हृदय में अत्यधिक भय उत्पन्न हो गया। वह ब्रह्मलोक एवं शिवलोक में भी गया किंतु वहां भी उसे अभय नहीं मिला। श्रीराम विमुख होने के कारण समस्त देव उसके विरुद्ध हो गए।

जयंत शोक से व्याकुल होकर ब्रह्माण्ड भर में भागता फिरा किंतु कहीं से अभयदान नहीं मिला। जब देवर्षि नारद ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आई। उन्होंने जयंत को समझाया कि तू श्रीराम की शरण में जा, वही तुझे इस कष्ट से उबार सकते हैं।

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इस पर जयंत पुनः चित्रकूट पहुंचा और श्रीराम के चरण पकड़कर अत्यंत आर्त स्वर में कहने लगा- ‘हे शरणागत हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था। अपने कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण में आया हूँ।’

जयंत की आर्तपुकार सुनकर श्रीराम ने जयंत को एक आंख से काना करके छोड़ दिया। हमने यह कथा रामचरित मानस में आए वर्णन के अनुसार दी है। रामचरित मानस में यह प्रसंग अरण्यकांड में लिखा गया है जबकि वाल्मीकि रामायण एवं अध्यात्म रामायण में जयंत का प्रसंग सुन्दरकांड में वर्णित है।

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वाल्मीकि रामायण में जयंत रूपी कौआ सीता माता के शरीर के उपरी भाग में अर्थात् छाती में चोंच मारता है जबकि वेदव्यासजी रचित अध्यात्म रामायण, तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरित मानस एवं अज्ञात लेखक द्वारा लिखित आनंद रामायण में कौआ सीता माता के पैर के अंगूठे में चौंच मारता है। इन चारों ही ग्रंथों में यह घटना चित्रकूट में ही दर्शाई गई है। आनन्द रामायण में भी यह प्रसंग दिया गया है और यह रामचरित मानस से मेल खाते हुए भी थोड़ी सी भिन्नता लिए हुए है। रामचति मानस में कौआ सीता माता के चरण पर एक बार प्रहार करता है किंतु आनंद रामायण में कौआ कई बार चोंच मारता है। वाल्मीकि रामायण में यह कथा थोड़े अंतर के साथ मिलती है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित जयंत कथा को पढ़ने से लगता है कि यह एक भक्त ने नहीं लिखी है, अपितु किसी सामान्य साहित्यकार ने लिखी है जो कथा में रोमांच पैदा करने के लिए उसे अनावश्यक रूप से कामुक एवं शृंगारिक बनाता है। वाल्मीकि रामायण में आई जयंत की कथा में सीता माता के कपड़ों को अत्यंत अस्त-व्यस्त दिखाया गया है एवं उनके भय का वर्णन भी एक साधारण नारी के भय के समान किया गया है। वाल्मीकि का कौआ सीता माता की छाती में चोंच से प्रहार करके उन्हें बुरी तरह घायल कर देता है।

कुछ ग्रंथों ने इस कथा को और भी चमत्कारिक बनाने का प्रयास किया है तथा इस कथा को श्रीराम की बाल-लीला से आरम्भ किया है जिसके अनुसार एक दिन श्रीराम बाल लीला करते हुए लक्ष्मणजी एवं हनुमानजी के साथ पतंग उड़ा रहे थे। जब यह पतंग उड़ते-उड़ते इंद्रलोक में पहुची तो इंद्र-पुत्र जयंत की पत्नी ने वह अद्भुत पतंग पकड़ ली।

श्रीराम ने हनुमानजी से कहा- ‘देखो पतंग किसने पकड़ी?’

पतंग को ढूंढते हुए हनुमानजी इंद्रलोक पहुंच गए। उन्होंने जयंत की पत्नी से कहा- ‘पतंग छोड़ दीजिए।’

जयंत की पत्नी बोली- ‘मैं उस बालक के दर्शन करूंगी जिसकी पतंग इतनी सुन्दर है। तभी पतंग छोड़ूंगी।’

हनुमानजी ने यह बात धरती पर लौटकर श्रीराम को बताई। श्रीराम ने हनुमानजी से कहा- ‘आप जयंत की पत्नी से जाकर कहें कि उसे मेरे दर्शन चित्रकूट में होंगे।’

हनुमानजी ने जयंत की पत्नी से यह बात कही तो उसने पतंग छोड़ दी। जब श्रीराम वनवास की अवधि में चित्रकूट में निवास कर रहे थे तब उन्होंने एक बार पूर्णिमा की रात में एक स्फटिक शिला पर बैठकर सीता माता का शृंगार किया। उसी समय जयंत की पत्नी अपनी सखियों के साथ रघुनाथजी के दर्शन करने आई। वह श्रीराम का रूप देखकर प्रसन्न हुई। उसने श्रीराम की स्तुति की और इच्छित वर मांगकर देवलोक को चली गई।

जब इंद्र के पुत्र जयंत को इस घटना की जानकारी मिली तो उसने प्रतिज्ञा की कि मैं इस श्रीराम से बदला लूंगा क्योंकि उसने मेरी पत्नी को मोहित किया है। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति लिए ही जयंत ने कौआ बनकर सीता माता के चरणों पर चोंच से प्रहार किया था।

इन कथाओं के अनुसार श्रीराम ने इन्द्र के पुत्र जयंत की एक आंख इसलिए फोड़ दी थी क्योंकि उसने सीता माता को बुरे भाव से देखा थाा। इन कथाओं में यह मान्यता भी प्रतिपादित की जाती है कि तभी से कौए की एक ही आंख होती है।

अनसूया हजारों साल बूढ़ी थी

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अनसूया हजारों साल बूढ़ी थी

ऋषि भरद्वाज ने श्रीराम एवं सीता से हजारों साल बूढ़ी अनसूया का परिचय करवाया!

जब दशरथ नंदन भरत अयोध्यावासियों को चित्रकूट से अयोध्या ले गए तो राजकुमार रामचंद्र ने लक्ष्मण एवं सीताजी को अपने साथ लेकर चित्रकूट छोड़ दिया और गहन दण्डकारण्य में प्रवेश किया। उन्होंने अरण्य में रहकर तपस्या करने वाले ऋषियों के आश्रमों में जाकर उनका सानिध्य प्राप्त करने लगे। उनका उद्देश्य वन में रहने वाले ऋषियों एवं मुनियों को अभय प्रदान करना एवं मनुष्यभक्षी राक्षसों का संहार करना था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण तथा सीता चित्रकूट से चलकर अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे। महर्षि अत्रि वैदिक ऋषि थे जिनका उल्लेख सप्तऋषि के रूप में होता है। ऋग्वेद में इनका उल्लेख बार-बार होता है। वेदों के बहुत से मंत्र अत्रि ऋषि द्वारा लिखे गए थे। अतः श्रीरामचंद्र के काल में अत्रि ऋषि की आयु हजारों वर्ष की रही होगी।

वाल्मीकि रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामचरित मानस में ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया का उल्लेख अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है। अनसूया को पौराणिक काल की सोलह सतियों मे से एक माना जाता है। वे मुनि कर्दम की पुत्री थीं जिन्हें प्रजापति कर्दम भी कहा जाता है।

अनसूया की माता का नाम देवहूति था। प्रजापति कर्दम एवं देवहूति की 9 कन्याएं हुईं जिनमें से एक अनसूया थीं। अनसूया की पति-भक्ति अर्थात सतीत्व का तेज इतना अधिक था कि जब देवगण आकाश में विचरण करते थे तो उन्हें अनसूया का तेज अनुभव होता था।

जिस समय श्री राम अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे, उस समय सती अनसूया अत्यंत वृद्ध होने के कारण शिथिल हो चुकी थीं। उनके शरीर में झुर्रियां पड़ गई थीं तथा सिर के बाल सफेद हो गए थे। अधिक हवा चलने पर हिलते हुए कदली वृक्ष के समान उनके सारे अंग निरंतर कांप रहे थे।

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अत्रि ऋषि ने रामचंद्र से अपनी अत्यंत वृद्ध हो चुकी पत्नी अनसूया का परिचय करवाया। ऋषि ने कहा- ‘हे राम! ये मेरी पत्नी अनुसूया हैं। एक बार दस वर्षों तक वृष्टि नहीं हुई तथा सारा संसार गर्मी से जलने लगा तब अनसूया ने अपने तप के प्रभाव से यहाँ कंद-मूल उत्पन्न किए तथ मंदाकिनी की पवित्र धारा बहाई।

इसके बाद इन्होंने दस हजार वर्षों तक तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था। हे राम! मेरी पत्नी अनुसूया ने देवताओं के कार्य के लिए एक बार अत्यंत उतावली होकर दस रात के बराबर एक ही रात बनाई थी। ये अनसूया देवी तुम्हारे लिए माता की भांति पूजनीया हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियों के लिए वंदनीया तपस्विनी हैं क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका। राजकुमारी सीता को देवी अनसूया का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।’

ऋषि के आदेश पर जब सीता ने अनसूया के निकट जाकर अपना परिचय दिया तो अनसूया बहुत प्रसन्न हुईं तथा अनसूया ने सीताजी को पतिव्रता धर्म का उपदेश दिया जिसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में एवं गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचिरित मानस में किया है।

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इस उपदेश को ‘सतीधर्म’ अर्थात् सत्य पर दृढ़ रहने का धर्म भी कहा जाता है। यहाँ सती शब्द का अर्थ सत्य-निष्ठा पर दृढ़ रहने से है न कि आग में जलने से। सती धर्म को ‘पतिव्रता धर्म’ भी कहा जाता है। इस उपदेश का सार यह है कि पति एवं पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। अतः वे एक-दूसरे के अनुकूल आचरण करें तथा एक दूसरे के मित्र बन कर रहें। देवी अनसूया ने सीताजी को अखंड सौंदर्य की एक औषधि भी प्रदान की। इन्हीं अनसूया ने एक बार अपने तपोबल से ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को छोटे बच्चों में परिवर्तित कर दिया था। कुछ पुराणों में आई इस कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माणी, लक्ष्मी और गौरी में विवाद छिड़ा कि सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन है? तीनों देवियां अपने-अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा कर रही थीं। तभी नारदजी वहाँ आए। उन्होंने मुनि अत्रि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में उन्हें बताया और कहा कि उनके समान पवित्र और पतिव्रता स्त्री तीनों लोकों में कोई नहीं है। तीनों देवियों के मन में अनसूया से ईर्ष्या हुई और उन्होंने अपने-अपने पति से कहा कि वे अनसूया के पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लें। इस पर ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ब्राह्मणों का वेश धरकर अत्रि-आश्रम पहुँचे। उस समय अत्रि ऋषि आश्रम में नहीं थे।

अनसूया ने अतिथियों का बड़े आदर से स्वागत किया। तीनों ने अनसूयाजी से कहा कि हम आपसे तभी भिक्षा लेंगे जब आप अपने सभी वस्त्रों को उतार कर भिखा दें। कुछ ग्रंथों के अनुसार तीनों देवताओं ने अनसूयाजी से कहा कि वे उन्हें अपना दूध पिलाएं।

इस पर अनसूयाजी ने अपनी दिव्य शक्ति से जान लिया कि ये धरती के प्राणी नहीं हैं अपितु स्वयं प्रजापति ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। अनसूया ने उसी समय भगवान श्री हरि विष्णु का स्मरण करके संकल्प लिया कि यदि मैंने पति के समान कभी किसी दूसरे पुरुष को न देखा हो, यदि मैं सदा मन, वचन और कर्म से पति की आराधना में ही लगी रही हूँ तो मेरे सतीत्व के प्रभाव से ये तीनों अतिथि नवजात शिशु बन जाएं। अनसूयाजी के संकल्प से तीनों अतिथि शिशु बनकर उनकी गोद में खेलने लगे।

माता अनसूया ने इन तीनों शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया तथा अपनी गोद में सुलाया। तीनों देवता गहरी नींद में सो गए। उसी समय भगवान शिव के वाहन नंदी बैल, भगवान श्री हरि विष्णु के वाहन गरुड़जी एवं ब्रह्माजी के वाहन राजहंस आश्रम के द्वार पर आकर एकत्रित हो गए। अत्रि ऋषि के आश्रम का यह दृश्य देखकर देवर्षि नारद, देवी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भी वहाँ आ गईं। नारद ने विनयपूर्वक अनसूया से कहा- ‘माते! इनके पतियों को इन्हें सौंप दीजिए।’

अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘हे माताओ! झूलों में सो रहे शिशु यदि आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं। जब तीनों देवियों ने झूले में झांककर देखा तो वहाँ एक जैसे चेहरे के तीन शिशु गहरी निद्रा में सोए हुए थे। नारद ने उन देवियों से पूछा- ‘क्या महान् पतिव्रता होने पर भी आप अपने पति को पहचान नहीं सकतीं?’

इस पर तीनों देवियों ने एक-एक शिशु को उठा लिया। इस पर तीनों देवता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। तब ज्ञात हुआ कि देवी सरस्वती ने शिवजी को, देवी लक्ष्मी ने ब्रह्माजी को और देवी पार्वती ने विष्णुजी को उठा लिया है। इस पर तीनों देवियों ने माता अनसूया से क्षमा याचना की और उन्हें बताया कि यह सब उनकी परीक्षा लेने के लिए किया गया था।

प्रजापति ब्रह्मा, विश्व पालक विष्णु एवं विश्व के रक्षक शिव ने देवी अनसूया से कहा कि आप हमसे वरदान मांगें। त्रिदेव की बात सुनकर माता अनसूया बोलीं- ‘हे प्रभु! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें।’

कालान्तर में माता अनुसूया के गर्भ से भगवान दतात्रेय रूप में भगवान श्री हरि विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म हुआ। कुछ ग्रंथों के अनुसार ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा का, श्री हरि विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का तथा भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा का जन्म हुआ।

वाल्मीकि रामायण से लेकर विविध पुराणों एवं रामचरित मानस में देवी अनसूया का जो वर्णन आया है, उसके अनुसार अनसूया की कथा किसी महान् प्राकृतिक शक्ति का ही मानवीकरण है जो बिना वर्षा के वनस्पति उत्पन्न करती है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को शिशु रूप में बदल सकती है, जिसके गर्भ से चंद्रमा, भगवान दत्तात्रेय एवं दुर्वासा जैसी महान विभूतियां जन्म लेती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शरभंग ऋषि ने श्रीराम को समस्त योग, यज्ञ, तप एवं व्रत समर्पित कर दिए (31)

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शरभंग ऋषि ने श्रीराम को समस्त योग, यज्ञ, तप एवं व्रत समर्पित कर दिए

श्रीराम का लक्ष्य शरभंग ऋषि के आश्रम तक पहुंचने का था। इसलिए वे मुनियों से शरभंग ऋषि की कुटिया का मार्ग पूछने लगे। शीघ्र ही यह समाचार शरभंग ऋषि तक पहुंच गया कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी शरभंग ऋषि के आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं।

महर्षि अत्रि एवं सती अनसूया से भेंट करने के पश्चात् ईक्ष्वाकु वंशी राजकुमार रामचंद्र ने दण्डकारण्य के गहन वन में प्रवेश किया। दण्डकारण्य का अद्भुत परिवेश किसी को भी चकित कर देने वाला था। इस वन में स्थान-स्थान पर मुनियों के आश्रम बने हुए थे जिनमें असंख्या मुनि सांसारिक बंधनों को त्यागकर तपस्या करते थे।

स्थान-स्थान पर यज्ञ कुण्ड बने हुए थे, ऋषियों के आश्रमों में उपनिषदों का आयोजन होता था। आश्रमों में बड़ी संख्या में गाएं पाली जाती थीं जिनके दूध एवं घी से न केवल ऋषि ही पुष्ट होते थे अपितु यज्ञ देव भी संतुष्ट रहते थे।

ऋषियों के आश्रमों के निकट अनेक वन्यपशु विचरण करते थे किंतु वे ऋषियों एवं आश्रम की गायों को किंचित् भी हानि नहीं पहुंचाते थे। दण्डकरारण्य का वातावरण इतना पवित्र था कि वहाँ नित्य की स्वर्ग के देवगण ऋषियों के दर्शनों के लिए आते थे तथा आश्रमों में होने वाले वेदपाठों के श्रवण का आनंद उठाते थे।

स्वर्ग की बहुत सी अप्सराएं स्वर्ग छोड़कर दण्डकारण्य में नृत्य करने आती थीं। नदियों एवं झरनों का पावन जल इस सम्पूर्ण धरती को दिव्य औषधियों एवं कंद-मूल तथा फल से लदे हुए वृक्षों से सम्पन्न रखता था।

आज जिस प्रदेश को हम छत्तीसगढ़ के रूप में जानते हैं, उसका बहुत सा प्रदेश इसी दण्डकारण्य में स्थित था। इस पुयण्भूमि में कई ऋषि और मुनि तो हजारों साल से तपस्या कर रहे थे। जब दण्डकारण्य के ऋषियों को ज्ञात हुआ कि श्रीराम ने दण्डकारण्य में प्रवेश किया है उनके आनंद का पार नहीं था। बहुत से ऋषियों को देवताओं ने बता रखा था कि एक दिन स्वयं श्री हरि विष्णु मानव देह धरकर आपके आश्रम में आपको दर्शन देने आएंगे।

इस कारण बहुत से ऋषि युगों से श्रीराम के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। एक दिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीराम ने अत्रि मुनि के आश्रम से प्रस्थान कर दिया है तो ऋषि-मुनि अपने आश्रमों को श्रीराम के स्वागत के लिए सजाने लगे। बहुत से ऋषियों ने दण्डकारण्या के पथों को बुहार कर अपने आश्रम को आने वाले मार्गों को सुगम कर दिया ताकि श्रीराम को उनके आश्रमों तक आने में कोई कष्ट न हो, कहीं वे मार्ग न पाकर उनका आश्रम छोड़कर आगे न बढ़ जाएं।

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श्रीराम ने जब मुनियों के समूहों को वेदपाठ करते हुए और सामगायन करते हुए सुना तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। ऐसा सामगायन न तो देवलोक के गंधर्व कर सकते थे और न कश्यप के पुत्र तुम्बरू! ऋषियों की पावन भूमि देखकर इक्ष्वाकु राजकुमारों श्रीराम एवं श्रीलक्ष्मण ने अपने धनुषों की प्रत्यंचा खोल दी और तीर अपने तरकष में रख लिए। वे जिस ऋषि के आश्रम के द्वार पर जाकर खड़े हो जाते थे, उनका जीवन धन्य हो जाता था। प्रत्येक ऋषि श्रीराम से कुछ कहना चाहता था और प्रत्येक ऋषि श्रीराम से कुछ सुनना चाहता था। ऋषि-पत्नियों को ऐसा लगा मानो श्रीराम उनके अपने पुत्र हों।

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बहुत से ऋषियों ने श्रीराम से प्रार्थना की कि वे यहीं रुक जाएं, यहाँ सब प्रकार की सुख सुविधाएं हैं। बहुत से ऋषियों ने तो श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकी के लिए पर्णकुटियां भी बना रखी थीं किंतु श्रीराम ऋषियों का सान्निध्य प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते रहे। श्रीराम का लक्ष्य शरभंग ऋषि के आश्रम तक पहुंचने का था। इसलिए वे मुनियों से शरभंग ऋषि की कुटिया का मार्ग पूछने लगे। शीघ्र ही यह समाचार शरभंग ऋषि तक पहुंच गया कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी शरभंग ऋषि के आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं। जब यह समाचार ऋषि शरंभग के आश्रम में पहुंचा, तब देवराज इन्द्र शरभंग ऋषि के आश्रम में आए हुए थे, वे ऋषि को ब्रह्मलोक ले जाना चाहते थे किंतु जब शरभंग ने सुना कि श्रीराम आ रहे हैं तो उन्होंने देवराज इन्द्र से क्षमा मांग ली और ब्रह्मलोक जाने से मना कर दिया तथा अपने आश्रम में रहकर श्रीराम की प्रतीक्षा करने लगे। उन दिनों दण्डकराण्य में ऋषियों एवं मुनियों के आश्रम बने हुए थे तो वहीं, कुछ राक्षसों ने भी इस वन में आकर अपना निवास बना लिया था। वे अवसर प्राप्त होते ही इन मुनियों को मार कर खा जाते थे। शरभंग ऋषि के आश्रम की तरफ बढ़ते हुए श्रीराम को एक दिन विराध नामक राक्षस दिखाई दिया जो मनुष्यों को मारकर खा जाता था। श्रीराम ने उस नरभक्षी राक्षस का वध कर दिया।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार विराध श्रीराम एवं लक्ष्मण को मारकर सीताजी को भार्या बनाना चाहता था। इसलिए उसने अचानक आक्रमण करके सीताजी को उठा लिया और बोला- ‘मुनियों के वस्त्र पहनकर इस जंगल में सुंदर युवती के साथ घूमते हुए लज्जा नहीं आती! मैं तुम दोनों का वध करके इस स्त्री को अपनी भार्या बनाउंगा।’

विराध की बातें सुनकर सीताजी भयभीत हो गईं। सीताजी को भयभीत देखकर श्रीराम के अंग शोक से शिथिल हो गए और उन्होंने लक्ष्मण से कहा- ‘ऐसा लगता है कि माता कैकेई ने जिस इच्छा से हमें वन में भेजा है, आज उनकी वह इच्छा पूरी हो जाएगी।’

श्रीराम ने विराध से उसका परिचय पूछा। इस पर विराध ने कहा- ‘मुझे ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ है कि किसी शस्त्र से मेरा वध नहीं किया जा सकता। इसलिए तुम इस स्त्री को छोड़कर यहाँ से चले जाओ।’

जब श्रीराम एवं लक्ष्मण ने विराध पर शस्त्रों से प्रहार किया तो वे शस्त्र वरदान के प्रभाव से विराध के शरीर से निकलकर धरती पर गिरने लगे। विराध ने राम और लक्ष्मण को पकड़कर अपने कंधों पर उठा लिया तथा हिंसक पशुओं से भरे हुए भयानक वन में घुस गया।

इस पर सीताजी ने राक्षस से कहा- ‘तू इन दोनों भाइयों को छोड़ दे और मुझे पकड़कर ले चल।’

सीताजी को करुण विलाप करते हुए देखकर श्रीराम एवं लक्ष्मण ने शस्त्रों की बजाय द्वंद्वयुद्ध में राक्षस का संहार करने का निर्णय किया तथा उन्होंने राक्षस के कंधे पर बैठे-बैठे ही विराध की दोनों भुजाएं उखाड़ दीं। इससे राक्षस धरती पर गिर गया। श्रीराम एवं लक्ष्मण ने दुष्ट राक्षस को मुक्कों तथा लातों से पीटना आरम्भ किया तथा उसे उठाकर बार-बार धरती पर पटकने लगे। इस पर भी वह राक्षस नहीं मरा तो श्रीराम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए एवं लक्ष्मण ने एक खड्डा खोदा। दोनों राजकुमारों ने विराध को उसी खड्डे में गाढ़ दिया।

जब विराध मरने लगा तो उसने श्रीराम से कहा- ‘मैं तुम्बरू नामक गंधर्व हूँ, एक दिन मुझे कुबेर ने बुलाया किंतु मैं रम्भा पर आसक्त होने के कारण समय पर कुबेर के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। इस कारण कुबेर ने मुझे राक्षस होने का श्राप दिया था। आज आपके हाथों से मृत्यु पाकर मेरी मुक्ति हो गई।’

जहाँ वाल्मीकि रामायण में विराध के वध का वर्णन विस्तार से किया गया है, वहीं गोस्वामी तुलसीदासजी ने विराध के वध का उल्लेख अत्यंत संक्षेप में किया है। विराध को मारने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी ने मुनि के आश्रम पहुंच कर उनके चरणों में प्रणाम किया।

मुनि शरभंग बोले- ‘हे राम! आपका स्वागत है, मर्हिष अत्री ने आपसे सत्य कहा था, मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था।’

मुनि शरंभग ने अपने समस्त योग, यज्ञ, जप, तप तथा व्रत श्रीराम को समर्पित कर दिए तथा अपना शरीर योगानल से भस्म करके वैकुण्ठ को चले गए। मुनि शरभंग इंद्र के साथ ब्रह्मलोक नहीं गए क्योंकि इससे उनकी अभेद मुक्ति होती अर्थात् उनकी आत्मा पमरात्मा में विलीन हो जाती।

इसलिए मुनि शरभंग ने श्रीराम के आने की प्रतीक्षा की ताकि वे उनसे भेद भक्ति का वरदान ले सकें। इस प्रकार की मुक्ति में भक्त कभी भी परमात्मा में विलीन नहीं होता, अपितु सांसारिक बंधनों एवं मोह-माया से मुक्त होकर भक्त बना रहता है और परमात्मा के सान्निध्य का आनंद भोगता है।  

सुतीक्ष्ण ऋषि ने भगवान को देखकर आंखें बंद कर लीं (32)

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सुतीक्ष्ण ऋषि ने भगवान को देखकर आंखें बंद कर लीं

शरभंग ऋषि को विदा करके श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी ने वनवासी सन्यांसियों से सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम का पता पूछा। इस अवसर पर उपस्थित सैंकड़ों मुनियों, तापसों एवं ऋषि-पुत्रों ने श्रीराम से कहा कि हम आपको सुतीक्ष्णजी के आश्रम तक पहुंचाएंगे। वे लोग चाहते थे कि अधिक से अधिक समय तक वे श्रीराम का सान्निध्य प्राप्त करें। इसलिए भगवान के मना करने पर भी वे लोग श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी के साथ हो लिए।

मार्ग में स्थान-स्थान पर हड्डियों के ढेर लगे हुए थे। इस पर श्रीराम ने पूछा कि पावन एवं पत्रित्र दण्डकारण्य में ये हड्डियां क्यों पड़ी हैं एवं ये किनकी हैं। इस पर वनवासी तापसों ने श्रीराम को बताया कि इस क्षेत्र में बहुत से राक्षस आ जाते हैं, वे ही ऋषियों एवं मुनियों को अकेला पाकर खा जाते हैं। ये हड्डियां उन्हीं ऋषियों एवं मुनियों की हैं।

यह सुनकर श्रीराम को बहुत दुख हुआ। गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि श्रीराम की आंखों में करुणा का जल भर गया। उन्होंने दोनों भुजाएं उठाकर प्रण किया कि मैं इस धरती को राक्षसों से विहीन कर दूंगा। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि जब वनवासी तापसों ने श्रीराम को दण्डकारण्य में राक्षसों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के बारे में बताया तो श्रीराम ने कहा कि मैं अपने पिता के वचनों का पालन करता हुआ देवताओं की प्रेरणा से ही यहाँ तक आ पहुंचा हूँ। अतः मैं मुनियों से शत्रुता रखने वाले राक्षसों का युद्ध में संहार करूंगा।  आप सब महर्षि भाई सहित मेरा पराक्रम देखें।

श्रीराम ने उस क्षेत्र में रहने वाले मुनियों के आश्रमों में जाकर उन्हें अभय दिया तथा अपने प्रण के बारे में बताया। बाल्यकाल में ताड़का का वध करने एवं दण्डकारण्य में घुसकर विराध नामक राक्षस को मार डालने के कारण श्रीराम का यश चारों ओर फैल गया था। इसलिए जब मुनियों ने देखा कि स्वयं श्रीराम उनकी झौंपड़ियों में आकर उन्हें अभय दे रहे हैं तो उन्होंने अत्यंत सुख का अनुभव किया।

बहुत से ऋषियों, मुनियों एवं तापसों से भेंट करते हुए श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुंचे। सुतीक्ष्ण ऋषि, अगस्त्य मुनि के शिष्य थे तथा भगवान के अत्यंत भक्त थे। उन्होंने भी सुना था कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीता इस गहन वन में मुनियों एवं तापसों से मिलते हुए घूम रहे हैं। इसलिए सुतीक्ष्ण ऋषि मन ही मन आशा कर रहे थे कि एक दिन प्रभु कृपा करके उनके आश्रम में भी आएंगे।

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राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि जब वनवासी तापसों ने सुतीक्ष्ण ऋषि की कुटिया में जाकर उन्हें सूचना दी कि श्रीराम आ रहे हैं तो सुतीक्ष्ण ऋषि अत्यंत व्याकुल हो गए। वे अपनी कुटिया से निकलकर मार्ग पर भागे ताकि श्रीराम की अगवानी कर सकें किंतु उन्हें मार्ग का ध्यान ही नहीं रहा इसलिए वे जहाँ-तहाँ भागने लगे। वनवासी तापसों ने सुतीक्ष्ण ऋषि को पकड़कर स्थिर किया किंतु सुतीक्ष्ण ऋषि इतने व्यग्र थे कि उन्हें न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न दिखाई दे रहा था।

सुतीक्ष्ण ऋषि कहने लगे- ‘मैंने न तो सत्संग किया है, न योग, जप, तप किए हैं, न यज्ञ किए हैं, क्या फिर भी श्रीराम मुझसे मिलने आएंगे? वे कहाँ हैं, वे किस ओर से आ रहे हैं?’

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जब सुतीक्ष्ण ऋषि अत्यंत व्यग्र हो गए तो वे श्री हरि विष्णु का ध्यान लगाकर बैठ गए। उन्होंने ध्यानावस्था में ही भगवान के दर्शन किए। इसी समय श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ऋषि की कुटिया में प्रवेश करके मुनि से कहा- ‘हे धर्मज्ञ महर्षि! मैं राम हूँ और आपके दर्शनों के लिए यहाँ आया हूँ, आप कृपा करके मुझसे बात कीजिए।’ भगवान की बात सुनकर सुतीक्ष्णजी ने आंखें खोल दीं। सुतीक्ष्णजी को बहुत आश्चर्य हुआ कि अभी आंखें बंद करके वे जिन श्री हरि विष्णु के दर्शन कर रहे थे, वही श्री हरि विष्णु उनके सामने साक्षत् खड़े थे। इस पर सुतीक्ष्ण मुनि ने नेत्र पुनः बंद कर लिए। नेत्र बंद करने के उपरांत भी मुनि को श्री हरि दिखाई दिए। इसलिए सुतीक्ष्ण मुनि समझ नहीं पाए कि उन्हें नेत्र बंद करने या हैं, या खोलने हैं! मुनि सुतीक्ष्ण की ऐसी अवस्था देखकर भगवान भी भाव-विभोर हो गए और उन्होंने मुनि को अपने हृदय से लगा लिया। इस पर मुनि को समझ में आ गया कि भगवान स्वयं चलकर उनकी कुटिया में आ गए हैं, इसलिए नेत्र बंद करने की आवश्यता नहीं है। मुनि सुतीक्ष्ण ने अत्यंत भाव-विभोर होकर भगवान की स्तुति की। श्रीराम ने कहा- ‘हे मुनि! आप मुझे अत्यंत प्रसन्न जानिए एवं मुझसे कोई वरदान मांगिए।’ मुनि ने कहा- ‘भगवन्! मैंने तो कभी कुछ मांगा ही नहीं! मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है! इसलिए मैं आपसे क्या मांगूं, और क्या नहीं! आपको जो अच्छा लगे मुझे वही वरदान दीजिए!

इस पर श्रीराम ने कहा- ‘हे मुनि! आप प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान और समस्त गुणों के निधान हो जाएं!’

सुतीक्ष्ण ऋषि ने कहा- ‘आपने जो कुछ दिया, मैंने स्वीकार कर लिया, अब आप कृपा करके अपने भाई लक्ष्मण तथा सीताजी सहित मेरे हृदय रूपी आकाश में चंद्रमा की भांति निवास करें।’

वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण रामचरित मानस के सुतीक्ष्ण ऋषि से थोड़े अलग हैं। वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण श्रीराम से कहते हैं- ‘हे वीर! मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट होकर चित्रकूट पर्वत पर रहते हैं। एक बार देवराज इन्द्र यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने के लिए आए थे। उन्होंने मुझे बताया था कि मैंने अपने तप से समस्त शुभ्र लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है किंतु मैंने उन शुभ्र लोकों में जाने का विचार नहीं किया तथा आपकी प्रतीक्षा करता रहा। आज आप आ गए हैं, इसलिए मैं वे समस्त शुभ्र लोक आपको समर्पित करता हूँ, ताकि आप सीताजी एवं लक्ष्मण सहित उन लोकों में निवास करें जिन लोकों की सेवा स्वयं देवर्षि किया करते हैं।’

इस पर श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ऋषि से कहा- ‘हे मुनि! उन शुभ्र लोकों की प्राप्ति तो मैं स्वयं आपको करवाउंगा। आप तो मुझे यह बताएं कि आज रात मैं इस वन में कहाँ निवास कर सकता हूँ।’

मुनि सतीक्ष्ण ने कहा- ‘हे राम! यह सम्पूर्ण वन ही तपोवन है, आप यहीं मेरी कुटिया में निवास कीजिए।’

इस पर श्रीराम, लक्ष्मणजी एवं सीताजी सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में ही रुक गए तथा अगली प्रातः मुनि से आज्ञा लेकर अगस्त्य ऋषि के आश्रम के लिए प्रस्थान कर गए।

रामचरित मानस में लिखा है कि श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि से पूछा कि अगस्त्य ऋषि के दर्शन कहाँ होंगे तो मुनि ने कहा- ‘मैं भी वहीं अपने गुरु अगस्त्य के आश्रम जा रहा हूँ। अतः मैं ही आपको पथ दिखा दूंगा।’

श्रीराम सुतीक्ष्ण ऋषि की चतुराई ताड़ गए कि अधिक से अधिक समय हमारा सान्निध्य प्राप्त करने के लिए इन्होंने यह बहाना बनाया है।

इस प्रकार तुलसी के सुतीक्ष्ण ऋषि भगवान के भक्त अधिक हैं जबकि वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण ज्ञानी अधिक हैं।

महर्षि अगस्त्य से भेंट की श्रीराम ने (33)

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महर्षि अगस्त्य से भेंट की श्रीराम ने

भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के समय महर्षि अगस्त्य से भेंट करके उनसे दिव्य आयुध एवं अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। महर्षि अगस्त्य से भेंट के पीछे श्रीराम का मंतव्य केवल इतना ही नहीं था। इस भेंट के पीछे बड़े गहरे प्रयोजन छिपे थे।

श्रीराम, लक्ष्मण तथा जनकनंदिनी सीताजी महर्षि अगस्त्य से भेंट करने के लिए सुतीक्ष्ण ऋषि के साथ दण्डकारण्य से अगस्त्य के आश्रम के लिए रवाना हो गए। श्रीराम एवं महर्षि अगस्त्य से भेंट का श्रीराम कथा में अत्यंत महत्व है, यदि श्रीराम को मानव माना जाए तो भी और श्री हरि विष्णु का अवतार माना जाए तो भी! इस भेंट के महत्व की चर्चा करने से पहले हम अगस्त्य ऋषि की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हैं।

महर्षि अगस्त्य एक ऋग्वैदिक ऋषि थे। उन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ऋग्वेद में उनका नाम कई बार आया है। महर्षि अगस्त्य ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165वें सूक्त से लेकर 191वें तक के सूक्तों के दृष्टा थे। अगस्त्य के पुत्र दृढ़च्युत तथा दृढ़च्युत के पुत्र इध्मवाह भी नवम मंडल के 25वें तथा 26वें सूक्तों के द्रष्टा थे।

अगस्त्य ऋषि महर्षि पुलस्त्य के पुत्र तथा विश्रवा के भाई थे। इनका जन्म काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान अगस्त्य कुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

देवताओं के अनुरोध पर महर्षि अगस्त्य काशी से दक्षिणापथ की ओर गए। कुछ पुराणों में यह प्रसंग आया है कि उन दिनों विंध्याचल पर्वत बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से अनुरोध किया कि वे विंध्याचल पर्वत को आदेश दें कि वह बढ़ना बंद कर दे। इस पर अगस्त्य ऋषि काशी से दक्षिणापथ की ओर गए तथा मार्ग में जब उन्होंने विंध्याचल पर्वत को पार किया तो विंध्याचल से कहा कि जब तक मैं लौट कर न आऊं, तुम इसी प्रकार स्थिर रहना, अपना आकार मत बढ़ाना।

विंध्याचल पर्वत महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानता था। उसे ज्ञात था कि ये वही महर्षि अगस्त्य हैं जिन्होंने एक बार समुद्र का पानी पीकर उदरस्थ कर लिया था ताकि देवगण समुद्र में छिपे हुए राक्षसों को देख सकें और उनका संहार कर सकें। इसलिए विंध्याचल ने महर्षि का आदेश स्वीकार कर लिया।

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विंध्याचल ने बढ़ना बंद कर दिया और महर्षि अगस्त्य फिर कभी दक्षिणापथ से उत्तरापथ की ओर आए ही नहीं। वे दक्षिण भारत में इतने दीर्घकाल तक निवास करते रहे कि अधिकतर भारतीय अगस्त्य को तमिल देश का निवासी ही मानते हैं। तमिल भाषा में अगस्त्य को ‘अगतियार’ कहा जाता है।

महर्षि अगस्त्य ने विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं। दक्षिण भारत में इसे मलयध्वज नाम के पांड्य राजा की पुत्री बताया जाता है। वहाँ इसका नाम कृष्णेक्षणा है। इनके पुत्र का नाम इध्मवाहन था। महर्षि अगस्त्य ने मणिमती नगरी के दैत्यराज इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्य को नष्ट किया। भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट योगदान के लिए जावा, सुमात्रा, बाली आदि द्वीपों में भी उनकी पूजा की जाती है।

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महर्षि अगस्त्य अपने समय के बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। उन्होंने बहुत से दिव्य शस्त्रों की रचना की थी। महर्षि अगस्त्य के ग्रंथ ‘अगस्त्य संहिता’ में विद्युत उत्पादन से सम्बन्धित सूत्र मिलते हैं। इस ग्रंथ में आए एक श्लोेक में कहा गया है कि एक मिट्टी के पात्र में ताम्रपट्टिका तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु लगाएं। उसके ऊपर पारा लगाएं, ऊपर पारा तथा दस्तलोष्ट डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा। अर्थात्- मिट्टी के बर्तन में एक कॉपर प्लेट लगाएं तथा उसमें शिखिग्रीवा अर्थात् कॉपर सल्फेट डालें। उनके बीच में लकड़ी का गीला बुरादा डाले और ऊपर दस्त लोष्ट अर्थात् जस्ते का लेप करें। इन्हें धातु के तारों से जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति अर्थात् बिजली बनेगी। अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग करने की विधि का भी विवरण दिया गया है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे पर सोने एवं चांदी की पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली। संभवतः इसी कारण अगस्त्य को कुंभोद्भव अर्थात् ‘बैटरी बॉर्न’ कहा गया। महर्षि अगस्त्य कहते हैं- ‘सौ कुंभों अर्थात् उपरोक्त विधि से बने तथा शृंखला में जोड़े गए सौ सेलों की शक्ति का  पानी  पर प्रयोग करेंगे, तो  पानी अपने रूप को बदलकर प्राणवायु अर्थात् ऑक्सीजन एवं उदान वायु अर्थात् हाइड्रोजन में परिवर्तित हो जाएगा।

कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात् तेजाब के घोल का सान्निध्य पाते ही यवक्षार अर्थात् सोने या चांदी का नाइट्रेट, ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।

पश्चिमी जगत के जिस वैज्ञानिक फैराडे ने विद्युत के बल्ब की खोज की थी, उसने अपनी जीवनी में लिखा है कि उसने विद्युत बल्ब बनाने के लिए इसी ग्रंथ के अंग्रेजी अनुवाद को आधार बनाया था। आधुनिक नौकाचलन और विद्युत वहन, संदेशवहन आदि के लिए जो अनेक बारीक तारों की मोटी केबल बनती है, उसका उल्लेख भी इस ग्रंथ में हुआ है तथा केबल को रज्जु कहा गया है।

महर्षि अगस्त्य ने अपने ग्रंथ में आकाश में उड़ने वाले गर्म गुब्बारे एवं विमान को संचालित करने की तकनीक का भी उल्लेख किया है। महर्षि अगस्त्य के अनुसार उदानवायु अर्थात् हाईड्रोजन को वायु प्रतिबंधक वस्त्र अर्थात् गुब्बारे में रोककर विमान बनाया जाता है। एक श्लोक में कहा गया है कि विमान वायु पर उसी तरह चलता है, जैसे जल में नाव चलती है।

इस ग्रंथ में गुब्बारों और आकाशछत्र को रेशमी वस्त्र सुयोग्य कहा गया है क्योंकि वह बड़ा लचीला होता है। वायु पुराण में आए एक उल्लेख के अनुसार प्राचीनकाल में ऐसा वस्त्र बनता था जिसमें वायु भरी जा सकती थी। उस वस्त्र को बनाने की विधि अगस्त्य संहिता में दी गई है।

रेशमी वस्त्र पर अंजीर, कटहल, आंब, अक्ष, कदम्ब, मीराबोलेन वृक्ष के तीन प्रकार ओर दालें इनके रस या सत्व के लेप किए जाते हैं। तत्पश्चात सागर तट पर मिलने वाले शंख आदि और शर्करा का घोल यानी द्रव सीरा बनाकर वस्त्र को भिगोया जाता है, फिर उसे सुखाया जाता है। फिर इसमें उदानवायु भरकर इसे उड़ाया जा सकता है।

महर्षि अगस्त्य के बाद वैशेषिक दर्शन में भी ऊर्जा के स्रोत, उत्पत्ति और उपयोग के सम्बन्ध में बताया गया है। इक्ष्वाकु राजकुमार श्रीराम भी महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानते थे। इसलिए जब उन्होंने दण्डकारण्य में राक्षसों के संहार का प्रण लिया तो उन्हें अगस्त्य ऋषि के सहयोग की आवश्यकता अनुभव हुई।

श्रीराम को अच्छी तरह ज्ञात था कि उन्हें महर्षि अगस्त्य से निश्चय ही ऐसी युद्ध विद्याएं एवं दिव्य शस्त्र प्राप्त हो जाएंगे जिनका उपयोग करके वे राक्षसों का संहार कर सकेंगे। इसीलिए श्रीराम महर्षि अगस्त्य के प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण को अपने साथ लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे।

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