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सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

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सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com
सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी हुई दिखाई देती है। हिन्दी साहित्य के इतिहास (History of Hindi Literature) में पंद्रहवीं शताब्दी को भक्तिकाल (Bhakti Period) के रूप में याद किया जाता है। मुसलमानों के अत्याचारों से संत्रस्त हिन्दुओं को अपने धर्म पर अडिग रहने के लिए उन्हें भक्ति का सम्बल दिया गया।

इस काल में लगभग पूरे भारत में बड़ी संख्या में संतों एवं भक्त-कवियों का आविर्भाव (Emergence) हुआ। इन्होंने जनकवियों के रूप में अपने भक्ति भरे उद्गार प्रकट किए और जनभाषा (Vernacular Language) में जनजागृति का सराहनीय कार्य किया। भक्तिकाल में भक्ति की दो धाराएं प्रबल रूप में सामने आईं—सगुण भक्तिधारा और निर्गुण भक्तिधारा। इसी काल में रामानंद के 12 शिष्यों का आविर्भाव हुआ, जिनमें से कबीर भी एक थे।

कबीर का दर्शन और गुरु का महत्व

संत कबीर निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि हैं, किन्तु वे सगुण को पूरी तरह नकार नहीं पाए। उनके काव्य में यह सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व स्पष्ट रूप से प्रस्फुटित होता है। वे कहते हैं—

“सगुण की सेवा करो, निर्गुण को करूं ध्यान।

निर्गुण सगुण के परे, तहिं हमारा ध्यान।।”

कबीर का जन्म ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार, संवत् 1455 अर्थात् 1398 ईस्वी में होना सिद्ध होता है। बीजक (Bijak) इनका एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ (Authentic Text) माना जाता है। बीजक में यह भी लिखा है कि कबीर ने न तो कभी कागज छुआ और न ही कभी कलम पकड़ी, फिर भी वे चारों युगों की बातें मौखिक ही बता देते थे—

“मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहीं हाथ।

चारिउ युग का महातम, कबीर मुखहि जनाई बात।।” (साखी-187)

कबीर अनुभव जन्य बात कहा करते थे— तू कहता कागद की लेखी। मैं कहता आँखिन की देखी।।” अतः यह माना जाने लगा कि कबीर बीजक भी कबीर के अनुयायियों (Followers) ने कबीर से सुनकर लिखा था। किंतु यह संभव नहीं लगता कि इतने बड़े संत-भक्त कबीर पढ़ने-लिखने से वंचित रह गए हों। उनके अनुयायी अनंतदास ने “कबीर परिचई” में उनके उद्गार इस प्रकार स्पष्ट किए हैं—

“हम तो भगति मुक्ति में आया। गुरु परसाद रामगुण गाया।।

राम भरोसे गिनो न काहू। सब मिलि राजा रंक रिसाहू।।

रामनहरा राम है, मति न सके कोइ।

पतिताहूं ना डरौं, करता करे सो होइ।।” (पृ.27/226)

कबीर जानते थे कि भक्ति से ही मुक्ति संभव है और यह भक्ति बिना गुरु-कृपा (Guru’s Grace) के संभव नहीं है। बीजक के प्रारंभ में ही कबीर गुरु की महत्ता प्रतिपादित कर देते हैं—

“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरुदेव की, गोविंद दियो मिलाय।।” (पृ. 5, पद-1)

राम-नाम का वास्तविक स्वरूप

गुरु-कृपा से ही कबीर भक्ति-पथ पर अग्रसर होते हैं। कबीर परिचई से स्पष्ट होता है कि कबीर के गुरु रामानंद थे। अतः कुछ विद्वानों का मानना है कि कबीर के पदों में जहाँ-जहाँ “राम” का नाम आया है, वह उनके गुरु रामानंद के लिए है। जबकि कबीर साहित्य का अवगाहन करने पर पता चलता है कि यहाँ एक वैचारिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व विद्यमान है और कबीर के राम केवल निर्गुण ब्रह्म (Attributeless Absolute) के प्रतीक हैं।

भर्तिकाल से पूर्व वैदिक वाङ्मय (Vedic Literature) में सगुण ब्रह्म के बजाय निर्गुण ब्रह्म का चिंतन ही प्रमुख था। वहाँ अवतारवाद (Incarnationism) की कोई परिकल्पना नहीं थी। कबीर ने भी ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप को ही “आतम-राम” के रूप में अपनाया। भक्तिकाल के सगुण भक्तों ने भी निर्गुण ब्रह्म की सत्ता का निषेध नहीं किया है, अपितु सगुण भक्ति-मार्ग में प्रवेश से पूर्व निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप पर पर्याप्त चिंतन किया है।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में ब्रह्म के सगुण और निर्गुण…… दो स्वरूप बताते हुए दोनों को ही अगमनीय, अथाह, अनादि और अनुपम कहा है और उस ब्रह्म के नाम (राम) को इन दोनों स्वरूपों से बड़ा बताया है, क्योंकि वह इन दोनों स्वरूपों को अपने वश में रखता है—

“अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अथ अगाध अनादि अनूपा।

मोरें मत बड़ नाम दुइ तें। किए जेहि जुग निज निज बसतें।।” (रा. बाल. 23/2)

शायद यही कारण रहा हो कि कबीर सगुण-निर्गुण से ही इतर ब्रह्म का चिंतन करते हैं, जहाँ सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व समाप्त हो जाता है। महाकवि सूरदास भी “भ्रमरगीत-सार” के प्रारंभ में सगुण भक्ति-पथ में प्रवृत्त होने का कारण बताते हुए लिखते हैं—

“रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब किन ध्यावे।

सब विधि अगम विचारहि ताते सूर सगुन लीला पद गावै।।”

अवतारवाद का खंडन और प्रेम का मार्ग

कबीर अवतारवाद में विश्वास नहीं रखते। वे अवतारी पुरुषों को महापुरुष तो मानते हैं, किन्तु ईश्वर नहीं मानते। यहाँ उनका पारमार्थिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व मुखर होता है। बीजक में वे कहते हैं—

” दशरथ सुत तिहुँ लोकहि जाना, राम नाम का मर्म है आना।।” (शब्द-109, पृ. 164)।

राम-नाम के मर्म की ओर संकेत करते हुए “ज्ञान चौंतीसा” में कबीर कहते हैं—

“ररा रति रहा अरुझाई। राम के कहे दुख दरिद्र जाई।।

ररा कहै सुनहु रे भाई। सतगुरु पूछे के सेवक आई।।” (पद-27, पृ.177)

अर्थात् “र” अक्षर संसार को इस झगड़े में उलझाए हुए है कि राम-राम कहने से सब दुःख-दारिद्य दूर होता है, किंतु वह यह भी कहता है कि सद्गुरु को पूछकर ही राम-नाम का सेवन करो। बीजक के प्रारंभ में गुरु वंदना करते हुए कबीर ज्ञान व भक्ति के मार्ग में दुधा से प्रवृत्त करने के उपकार को प्रतिपल स्मृत करते हुए अपने आपको गुरु-चरणों में न्यौछावर करते हुए कहते हैं—

“बलिहारी गुरुदेव की, घड़ी-घड़ी सौ बार।

भक्ति ज्ञान दुधाव के, करत लिया भवपार।।” (पृ. 5, पद 2)

कबीर की यह भक्ति अपने-आतम-राम निर्गुण-ब्रह्म के प्रति बहुत ही दृढ़ है। इसमें दिखावा नहीं, दृढ़ आस्था है, विश्वास (Faith) है, समर्पण है और अपार प्रेम है। प्रेम के बिना भक्ति संभव ही नहीं है। कबीर कहते हैं—

“भक्ति पियारी राम की, जैसी पियारी आग।

सारा पुट्टन जरि मुवा, बहुरि ले आवे मांग।।” (साखी-267, पृ. 207)

कबीर को राम-भक्ति आग के समान प्रिय है। आग लगने पर वह सारे गाँव को जला डालती है, फिर भी भोजन बनाने या घर में उजाला करने के लिए व्यक्ति उसे दूसरों के घरों से मांग लाता है। राम-भक्ति के लिए ऐसे प्रेम की प्रगाढ़ता जरूरी है। किंतु ऐसा निष्कलुष एवं निर्बोध प्रेम तभी संभव है, जब व्यक्ति में राग-द्वेष, छल-कपट और अहंकार (Ego) के भाव न आएं।

कबीर कहते हैं, कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नांहि। सीस उतारे भुइं धरे, तब पैठे घर मांहि।।”

कबीर का व्यक्तित्व और ‘हद-बेहद’ का दर्शन

कबीर के मन में संतों-भक्तों-गुरुजनों और प्राणियों के प्रति कोमल एवं कल्याणकारी भाव हैं, ऐसे भाव, जो उन्हें जगत से लौटाकर आत्मलीनता (Self-absorption) में दृढ़ करते हैं। ब्रह्म के प्रति इस तरह की आत्मलीनता ही भक्ति की पराकाष्ठा (Climax of Devotion) कही जाती है।

कबीर बाहरी दिखावा पसंद नहीं करते। उनका कहना है कि मन में विषय-विकार-रूपी विष रखें और आत्मचेतना-रूपी अमृत से अनजान रहते हुए मूर्तिपूजा (Idolatry) करें, तो ऐसे लोग भक्ति के मूल स्वरूप का बिगाड़ ही करते हैं—

“कबीर न भक्ति बिगारिया, कंकर पथर धोय।

अन्तर में विष राखिके, अमृत डारिन खोय।।” (साखी-251)

“कबीर” शब्द है अरबी भाषा का, जिसका अर्थ होता है— महान, श्रेष्ठ। कबीर के बारे में कहा गया है—

“हद तपे से औलिया, बेहद तपे सो पीर।

हद बेहद दोऊ तपे, ताको नाम कबीर।”

यह हद और बेहद क्या? हद तो है गृहस्थ की मर्यादा और बेहद है गृहस्थ की मर्यादा से बाहर रहने वाले साधु, किंतु कबीर तो गृहस्थ भी थे, साधु-संत एवं योगी भी थे और इनसे ऊपर भी थे। उनके जीवन का यही संतुलन उनके काव्य के सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व को सुलझाता है। एक साखी में वे कहते हैं—

“हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।

हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध।।” (साखी-189)

यहीं गृहस्थ-मर्यादा एवं वैराग्य-मर्यादा से परे स्वरूप-स्थिति में अनुभवजन्य ज्ञान की बात कही गई है। यह दूसरों के लिए दुर्बोध (Incomprehensible) भी है और सर्वोच्च भी है। यह स्थिति गुरु-कृपा बिना संभव नहीं होती। गुरु-कृपा से मनुष्य को देवत्व प्राप्त करते देर नहीं लगती। कबीर कहते हैं—

“बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ बार।

मानुष से देवता किया, करत न लागी बार।।” (पद-14)

रामानंद की देन और कबीर की अनन्यता

अपने गुरु रामानंद से राम के प्रति ऐसी ही प्रेम भक्ति कबीर ने प्राप्त की थी, जिससे उनका कायाकल्प होते देर नहीं लगी। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि उनके पदों में एक अनन्यसाधारण बात मिलती है जो सिद्धों और योगियों की अक्खड़ता भरी उक्तियों में नहीं है, जो वेदान्तियों के तर्क-कर्कश ग्रंथों में नहीं है जो समाज-सुधार की “हाय-हाय” में नहीं है।

कोई अनन्य साधारण बात। वह क्या है? फिर वह वस्तु भी क्या है, जिसे रामचंद्र से पाकर कबीर जैसा मस्तमौला फक्कड़ हमेशा के लिए उनका क्रीतदास हो गया। ……राम और उनकी भक्ति — ये ही रामानंद की कबीर को देन है। इन्हीं दो वस्तुओं ने कबीर को योगियों से अलग कर दिया, सिद्धों से अलग कर दिया, मुल्लाओं से अलग कर दिया। इन्हीं को पकड़कर कबीर “वीर” हो गए— सबसे अलग, सबसे ऊपर, सबसे विलक्षण, सबसे सरस, सबसे तेज।

कबीर मानते थे कि भक्ति के बिना हर कोई इस भ्रामक जगत (Illusory World) में गोते खा रहा है, डूब रहा है, कोई भी पार नहीं उतर रहा है और इस बात पर कोई विचार भी नहीं कर रहा है—

“भरम का बाँधा यह जगत, कोई न करे विचार।

हरि की भक्ति जाने बिना, बूड़ी मुवा संसार।।” (रमैनी-74)

पर, कबीर इस पर विचार करते हैं और जानते हैं कि यह हरि-भक्ति “राम” की भक्ति है और इस भवसागर (Ocean of Mundane Existence) से पार उतारने में राम का नाम ही एकमात्र जहाज है। राम की शरण में जाने से यह संसार-सागर गाय के खुर सदृश सहज ही पार किया जा सकता है—

“इच्छा करि भवसागरहि, बोहित राम अधार।

कहहिं कबीर हरिशरण गहु, गोपदवत विस्तार।।” (रमैनी-20)

निरंजन राम और शब्द-साधना (Niranjan Rama and Word-Sadhana)

कबीर राम से अनन्य प्रेम करते हैं और राम के वास्तविक स्वरूप को समझते हैं। वे यह भी जानते हैं कि राम अलख-निरंजन, संसार के कर्ता, पालक और संहारक (Destroyer) हैं। गीता में श्रीकृष्ण जिस प्रकार अर्जुन को अपने स्वरूप के बारे में बताते हैं, ठीक उसी प्रकार का स्वरूप कबीर के राम का है, जो उन्हें पुकार-पुकार कर कहता है—

“मैं सिरजौं, मैं मारिहूं, मैं जारौं, मैं खाऊं।

जल थल नभ में रमि रहौं, मोर निरंजन नाऊं।।” (रमैनी-21)

इस निरंजन राम को कबीर “बावन अक्षरों” में खोजकर उसके चिंतन-मनन की बात कहते हैं— बावन अक्षर सोधिके, रमे मो चित लाग।”

ठीक यही बात राम-स्नेही रामदयाल के स्वामी हरिरामदासजी भी कहते हैं। उनके अनुसार “रा” और “म” को जाने बिना तो वेदों और पुराणों का ज्ञान भी थोथा है, अर्थात् उसमें कोई सार नहीं है — एके रे-मो बिण जाण्या, थोथा वेद-पुराणी।” यह रे-मो, अर्थात् राम का नाम ब्रह्म के सगुण और निर्गुण रूप से भी ऊपर है, जो निराकार-स्वरूप (Formless Absolute), परिपूर्ण, परब्रह्म परमेश्वर और पूर्णांक है।

तुलसीदासजी ने अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा” कहकर अपनी सम्मति में ब्रह्म के नाम को बड़ा बताया है, जबकि कबीर का सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व यहाँ समाप्त होता है जहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि सगुण-निर्गुण से भी परे (ब्रह्म में) मेरा ध्यान लगा हुआ है — सगुण निर्गुण तें परे, तहां हमारा ध्यान।” ಕबीर ब्रह्मांडव्यापी भूमण्डलीय चेतना (Cosmic Consciousness) में आत्मलीन हैं। सच्चे संत का स्वभाव भी ऐसा ही होता है।

डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल संत-स्वभाव के बारे में लिखते हैं — “संत एक ऐसे लोक का संदेश लाता है, जो शाश्वत (Eternal) है, जिसमें देश और काल के अपने भेद भूलकर एक में मिलते हैं, जिसे हम प्रेम का लोक कहते हैं, प्रेम ही मानवीय हृदय की वास्तविक शक्ति है। जिस क्षण मन में प्रेम का उदय होता है, मानव के लिए सेवा और भक्ति का अपूर्व द्वार खुल जाता है।” (साहित्य संदेश, जुलाई-अगस्त, 1958)।

इस द्वार के खुलते ही आतम-राम पुकारकर कहने लगता है कि हे कबीर, मैं तेरे द्वार पर खड़ा हूँ, मुझसे मिल लो, मैं तो सर्वव्यापक हूँ और सभी में मिल रहा हूँ, अतः तुम्हें ही मुझसे मिलना होगा, मैं तुममें नहीं मिलूंगा—

“द्वारे तेरे राम जी, मिलहु कबीर मोहि।

तै तो सब में मिलि रहा, मैं न मिलूंगा तोहि।।” (साखी-258)

प्रेम की पराकाष्ठा और विविध संबंध

आतम-राम सचेत करता है कि जो विषय-वासनाओं (Sensual Desires) में मिला हुआ है, उसे मैं नहीं मिल सकता, किंतु कबीर के लिए अन्य सभी रस अन्तरस हैं, वे तो केवल राम-रस में ही तल्लीन हैं। कबीर की प्रेमभक्ति इतनी अंतरंग है कि उसकी बहिरंग छवि तो कोई भांप ही नहीं सकता। कबीर कहते हैं—

“हाड़ जले जस लाकड़ी, बार जले जस घास।

कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरे कपास।।” (साखी-274)

अर्थात् शवदाह (Cremation) के समय हड्डियाँ लकड़ी की तरह जल जाती हैं, बाल घास की तरह जल जाते हैं। भगवान के विरह (Pangs of Separation) में भक्त भी अनुदिन जलता रहता है, किंतु ठीक वैसे ही, जैसे कोठी में भीतर-ही-भीतर कपास जल जाए और बाहर किसी को पता तक नहीं चल पाए! यहाँ कबीर राम-भक्ति को पुनः आग के समान ही प्रिय बताते हुए अपने-आपको राम के प्रेम में तिल-तिल जलते रहने से उपमित करते हैं, जो कबीर के आंतरिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व की गहराई को दर्शाता है। कबीर की प्रेम-प्रतीति कितनी प्रगाढ़ है। वे अपने आतम-राम को शास्त्रों में नहीं, प्रेम में खोजते हैं—

“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।”

कबीर के ये ढाई आखर “राम” नाम के ढाई आखर ही हैं और वे कहते हैं कि जो कोई इन ढाई आखरों को प्रेम-पूर्वक पढ़ेगा, वही पंडित हो जाएगा।

कबीर ने अपने आतम राम को ब्रह्म स्वरूप मानते हुए उसकी तरह-तरह से वंदना, स्तुति और भक्ति की है। वे अपने राम से तरह-तरह के संबंध जोड़ते हैं। कहीं वे अपने को राम का कुत्ता बताते हैं, कहीं अपने को राम की पत्नी और कहीं राम को अपना साला, तो कहीं राम को अपना पुत्र बताते हैं—

“कबीरा कूता राम का, मुतिया मेरा नांउ।

गले प्रेम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊ।।”

“हरि मोर पिव, मैं राम की बहुरिया।

राम बड़े, मैं तन ही लहरिया।।” (शब्द-36)

“हम बहनोई, राम मोर सारा।

हमहि बाप, हरि पुत्र हमारा।।” (शब्द-100)

भक्ति के विविध भाव और निष्कर्ष

कबीर ब्रह्म के स्वरूप को आतम-राम के रूप में देखते हैं। उसे सगुण-निर्गुण स्वरूप में और इनसे परे भी देखते हैं। कबीर की भक्ति में दास्यभाव (Servant Attitude), दार्स्थभाव, माधुर्यभाव (Sweet/Spouse Attitude) और वात्सल्यभाव (Parental Attitude) भी है। वे अपने बारे में तो सोचते ही हैं, दूसरों के बारे में भी चिंतन करते हैं। उनका चिंतन कल्याणकारी है। वे चाहते हैं कि राम का भजन करने से ही कर्म-बंधन (Bondage of Karma) से छुटकारा मिल सकता है और भवसागर की कठिनाइयों से मुक्ति मिल सकती है। वे कहते हैं—

“कहहिं कबीर सुनो हो संतो, जिन यह सृष्टि बनाई।

छाड़ि पसार राम भजु बौरे, भवसागर कठिनाई।।” (शब्द-25)

रामरस का पान करने वाले भक्त को मृत्यु का भी भय नहीं होता। कबीर कहते हैं— हमन मरैं मरिहैं संसारा। हमको मिला जीवावनहारा।” जो भक्त जीवावनहारा अर्थात् राम से स्नेह करता है, उसे अमर होने से कौन रोक सकता है? कबीर शून्य में ध्यान लगाने वालों, अजपा जाप करने वालों और अनहदनाद सुनने वालों को नष्ट होते देख रहे हैं, जबकि रामसनेहियों को नहीं।

“शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद हू मरि जाय।

रामसनेही ना मरे, कह कबीर समझाय।।”

ब्रह्म के बहुविध स्वरूप का चिंतन करते हुए कबीर बौद्धमता, वेदमत और हठयोग-सरीखी साधनाओं को मृतप्रायः मानते हुए मन-मंदिर में स्थित राम की भक्ति को ही श्रेष्ठ मानते हैं और उसे ही मुक्ति का हेतु मानते हुए कहने लगते हैं—

“हम तो भगति मुक्ति में आया।

गुरु परसाद राम गुण गाया।।”

कबीर में भी भक्तिभाव का स्फुरण हुआ और वे कह उठे — कबहु बाढ़ियं बल आपणी, छोड़ि बिरानी आस। जाके आंगन नदिया बहे, सो कस मरे पियास।। (कबीर बीजक : साखी-227) अर्थात जिसके आंगन में नदिया बहती हो वह क्यों प्यासा मरे? उसे तो अपने बादल पर भरोसा करना चाहिए। कबीर ने ऐसा ही किया और भक्तिकाल के संतों-भक्तों में अपनी निराली पहचान बनाई।

निष्कर्ष

सनातन धर्म परम्परा में सगुण-भक्ति और निर्गुण भक्ति का सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व सदा से ही बना हुआ है। इस अंतर्द्वन्द्व का कारण यह प्रतीत होता है कि परमात्मा न दिखकर भी दिखने का आभास देता है। कबीर में भी यह सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व बहुतायत से दिखता है। हालांकि वे बार-बार स्वयं को निर्गुण भक्ति पर स्थिर करने का प्रयास करते हैं और इस प्रयास में वे कभी-कभी सगुण और निर्गुण दोनों को नकारने का भी असफल प्रयास करते हैं।

वस्तुतः कबीर के गुरु रामानंद सगुण भक्ति के बहुत बड़े संत थे। उन्हीं के शिष्य नरहरि ने तुलसीदास को बाल्यकाल में धर्मग्रंथों का अध्ययन करवाया और तुलसीदास सगुण भक्ति के सबसे बड़े भक्त-कवि बने। अतः कबीर के लिए यह संभव नहीं था कि वे स्वयं को इस प्रभाव से पूरी तरह मुक्त कर पाते, यही वजह है कि उनका काव्य इस सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर हमारे सामने आता है, जहाँ वे स्वयं को सगुण भक्ति से पूरी तरह अलग नहीं कर पाते और न ही निर्गुण भक्ति को सगुण भक्ति से श्रेष्ठ घोषित कर पाते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

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काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—

  1. काशी (Kashi) – सबसे प्राचीन एवं आध्यात्मिक नाम, जिसका अर्थ “प्रकाश की नगरी” माना जाता है।
  2. वाराणसी (Varanasi) – वरुणा (Varuna) और असी (Assi) नदियों के मध्य स्थित होने के कारण।
  3. बनारस (Banaras/Benares) – वाराणसी का अपभ्रंश रूप, जो मध्यकाल एवं अंग्रेजी शासनकाल में अधिक प्रचलित हुआ।
  4. अविमुक्त क्षेत्र (Avimukta Kshetra) – ऐसा क्षेत्र जिसे भगवान शिव कभी नहीं छोड़ते।
  5. आनन्दवन (Anandavan) – शिव का आनन्दमय वन या दिव्य निवास।
  6. महाश्मशान (Mahashmashan) – मोक्षदायिनी नगरी एवं अंतिम संस्कारों के महान केंद्र के रूप में।
  7. मोक्षदायिनी नगरी (City of Salvation) – जहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष प्राप्ति की मान्यता है।
  8. शिवपुरी (Shivpuri) – भगवान शिव की नगरी।
  9. रुद्रावास (Rudravas) – रुद्र अर्थात शिव का निवास स्थान।
  10. सुरंधन / सुरपुरी (Surandhan / Surpuri) – देवताओं की नगरी के रूप में वर्णित।
  11. दीपों की नगरी (City of Light) – आध्यात्मिक ज्ञान एवं प्रकाश का प्रतीक।
  12. विश्वनाथ की नगरी (City of Vishwanath) – काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के कारण।
  13. मुक्तिक्षेत्र (Muktikshetra) – मुक्ति प्रदान करने वाला क्षेत्र।
  14. तपोभूमि (Tapobhoomi) – ऋषियों-मुनियों की साधना स्थली।
  15. धर्मनगरी (Religious Capital) – सनातन धर्म के प्रमुख केंद्र के रूप में।

स्कन्द पुराण (Skanda Purana) एवं काशी खंड (Kashi Khand) में काशी के अनेक अन्य विशेषणात्मक नाम भी मिलते हैं।

काशी नगर का ज्ञात इतिहास 1000 ई.पू. अर्थात लगभग तीन हजार वर्ष पुराना है। [1] स्कन्द पुराण (Skanda Purana) में इस नगर का प्रशस्ति में 15000 छंदों में गौरव गान किया गया है। काशी पावन गंगा नदी (Ganga River) के तट पर बसा हुआ है जिसे भगवान विश्वनाथ (Vishwanath/Shiva) का निवास स्थान माना जाता है। विश्वनाथ (विश्वेश्वर) बारह ज्योतिर्लिंगों (Jyotirlinga) में से एक माने जाते हैं।

अनेक हिन्दू प्राचीन धर्म ग्रंथों (Ancient Hindu Scriptures) में काशी और विश्वनाथ का उल्लेख पाया जाता है। काशी नगर के अन्य अनेक नामों में से एक वाराणसी (Varanasi/Banaras) नाम समान रूप से लोकप्रिय है। वरुणा (Varuna River) और असी (Assi River) नामक नदियों के मिलन स्थल (संगम स्थल) पर बसा हुआ होने के कारण वाराणसी नाम प्रचलन में आया माना जाता है। [2]

यहाँ यह सहज शंका उठती है कि जब गंगा जैसी परम पावन विश्वविख्यात नदी के तट पर काशी बसी है तो उसका नामकरण गंगा नदी की अपेक्षा वरुणा और असी नामक धाराओं को सार्थक करने वाला चयनित क्यों हुआ?

काशी शब्द की उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक अर्थ (Origin and Spiritual Meaning of Kashi)

प्रसंगवश काशी शब्द के मूल में संस्कृत (Sanskrit) शब्द काश जुड़ा है। प्राचीनकाल में इस नगर का नाम काशी क्यों रखा गया था? यह ऐतिहासिक दृष्टि से उतना ही सहज है जितना कि भारत का नाम है। भारत अर्थात भा (प्रकाश) + रत। यहाँ दोनों नामों में निहितार्थ प्रकाश अर्थात आध्यात्मिक प्रकाश (Spiritual Light) से है जिसकी वैदिक प्रेरणा (Vedic Inspiration) तमसो मा ज्योतिर्गमय के अनुरूप होना प्रतीत होती है।

भारत का नामकरण चक्रवर्ती सम्राट भरत (Emperor Bharat) (ऋषि विश्वामित्र (Rishi Vishwamitra) का नाती और शकुन्तला-दुष्यन्त (Shakuntala-Dushyant) का पुत्र) के द्वारा मान्य किया जाता है। उसी प्रकार क्या काशी नामकरण भी किसी चक्रवर्ती सम्राट अथवा चक्रवर्ती विजेता के द्वारा प्रचलन में आया था? यह ज्ञात नहीं है।

आर्य विजय अभियान एवं काशी (Aryan Campaign and Kashi)

इतिहासकारों (Historians) ने पुरा प्रमाणों के आधार पर व्यक्त किया है कि ई.पू. 1600 से ई.पू. 1100 तक सम्पूर्ण एशिया (Asia) में आर्यों (Aryans) की तीन प्रमुख शाखाओं — कुषाई (Kushai/Kassite), मितन्नी (Mitanni) और हित्ती (Hittite) — का साम्राज्य छा गया था जिनमें कुषाई सर्वाधिक बलशाली थे और उनका सम्पूर्ण ईराक (Iraq) पर साम्राज्य था। [3]

यह विजय आर्यों के चक्रवर्ती अभियान की सफलता के फलस्वरूप हुई थी किन्तु यह ज्ञात नहीं है कि इस विजय अभियान का उद्गम अथवा विधिवत आरम्भ किस स्थान से हुआ था। [4]

पाश्चात्य इतिहासकारों (Western Historians) ने इन पाँच शताब्दियों के, ईराक पर आर्य-शासन को ‘अंधकार युग’ (Dark Age) की संज्ञा दी है किन्तु साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि इन विजेताओं का स्थानीय नागरिकों ने स्वागत किया था।  [5]

ये आर्य विजेता संख्या में कम होने के उपरान्त भी स्थानीय लोगों से घुलमिल गए थे। इन आर्यों ने नगरीय व्यवस्था के स्थान पर ग्रामीण व्यवस्था को अपनाया। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ मॉडर्न ईराक (Encyclopedia of Modern Iraq) में उल्लेख मिलता है कि इन विजेता आर्यों के देवताओं के नाम सूर्य (Surya/Soryas) और वरुण (Varuna/Boryas) इत्यादि थे। इन विजेताओं का सम्बोधन न केवल कस्साइट (Kassite) था अपितु कोशाई (Koshai/Kushai) भी उल्लिखित है।

काशी एवं वाराणसी नाम की ऐतिहासिक सम्भावनाएँ (Historical Possibilities of Kashi and Varanasi)

कोशाई अथवा कुशाई शब्द का मूल कहीं काश अथवा काशी तो नहीं? इस विजय अभियान के प्रथम राजा का नाम एकओम (Ekoam) (एम ओम, ई.पू. 1574–1565) प्रथम था और इनके देवता वैदिक देवता (Vedic Deities) थे।

इन आर्य विजेताओं ने 1565 ई.पू. में राजा एकओम द्वितीय के नेतृत्व में शक्तिशाली बेबीलोन (Babylon) नगर पर भी ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी। बेबीलोन नगर फरात (यूफ्रेटीस/Euphrates) नदी के तट पर बसा हुआ नगर था। एक भारतीय इतिहासकार के अनुसार फरात नामकरण भारत शब्द का अपभ्रंश है। [6]

इससे संकेत मिलता है कि प्रकाश (काश अथवा काशी) शब्द की आध्यात्मिक मौलिकता इस अभियान से जुड़ी रही होगी। इसी कुषाई वंश (Kushai Dynasty) के एक शासक का नाम बोरना बोरयस द्वितीय (Borna Boryas II) (ई.पू. 1404–1378) था जिसका संभावित अपभ्रंश मूल नाम वरण+वीर+यश अथवा वरण+पुर+अस (असि) प्रतीत होता है।

ज्ञातव्य है कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने कुषाई साम्राज्य के अनेक मूल शब्दों (संस्कृत मूल) को कीलाक्षर लिपियुक्त बेबीलोन की भाषा में अनुवाद करके उनका पुनः सुमेरी भाषा (Sumerian Language) में अनुवाद और आगे यूनानी भाषा (Greek Language) से अंग्रेजी भाषा (English Language) में अनुवाद किया है। अतः मूल संस्कृत शब्दों में कितना परिवर्तन होकर कुषाई-कस्साइट तथा वरण+पुर+असि (बोरना बोरयस) हो सकता है, यह अनुमानित किया जा सकता है।[7]

वरुण+असि+पुर का निवासी अर्थात वाराणसी पुर (नगर) का मूल निवासी यदि यही वीर राजा बोरना बोरेयस द्वितीय (प्रथम तो इससे पहले हुआ होगा जिसकी सही तिथि अभी तक नहीं ढूँढ़ी जा सकी है) था तो सहज है कि काशी को विश्व विजय का श्रेय दिलाने वाली यह घटना विश्वनाथ नाम को सार्थक करने वाली है तथा वाराणसी नाम भी ऐतिहासिक है और ई.पू. 1000 से पहले की घटनाओं का काशी के मान्यता प्राप्त इतिहास में अभी तक समावेश न होने के कारण कोई आश्चर्य नहीं कि यह भारतीय तथ्य उजागर नहीं हो पाया है।

निष्कर्ष

यही कहा जा सकता है कि प्राचीन ईराक (Ancient Iraq) के कुषाई विजय अभियान और लगभग ढाई हजार वर्ष पहले हुए महात्मा बुद्ध (Mahatma Buddha) की जातक कथाओं (Jataka Tales) (बुद्ध के पूर्व जन्म की गाथाओं) [8] में पाये जाने वाले काशी के अनेक बृहद नाम वाले राजाओं की ऐतिहासिकता पर विधिवत शोध (Historical Research) किया जाना चाहिए। इससे न केवल काशी का वाराणसी नामकरण अपितु अन्य अनेक भारतीय नगरों और राजाओं के विलुप्त गौरवशाली संभावित सत्यों-तथ्यों को उजागर करने में सहायता मिल सकेगी। ऐसा शोध कार्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाना अपेक्षित है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

संदर्भ (References)


[1] Varanasi 2000; Department of Tourism, Govt. of India, New Delhi.

[2] Guide and Map Varanasi 1996; Department of Tourism, Govt. of India, New Delhi.

[3] Iraq Museum 1976; Min. of Information, Director General of Antiquities, Baghdad P. 25 to 32.

[4] आर्यों की इस दिग्विजय का विस्तृत विवरण मैंने अपने उपन्यास मोहनजोदरो की नृत्यांगना की भूमिका में दिया है।

[5] Encyclopedia of Modern Iraq (1976) Part-I, Khaled-Al-ANI, Arab Encyclopedia House.
Baghdad P. 50 to 61.

[6] The Fountain Head of Religion 1909 by Ganga Prasad, Arya Pratinidhi Sabha (U.P.), P. 154.

[7] काशी-वाराणसी: नामकरण, वीरेन्द्रनाथ भार्गव, वैचारिकी, जनवरी-मार्च 2008, पृ. 48-50.

[8] जातकमाला 1994, डॉ. सूर्यकान्त व्यास, चौखम्बा संस्कृत संस्थान, पो. बॉक्स 1160, वाराणसी.

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव

तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे ‘तमिल वेद’ और ‘विश्व नीतिशास्त्र’ के रूप में जाना जाता है। संत कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित यह कृति लगभग 2000 वर्षों से मानवता का मार्गदर्शन कर रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सार्वभौमिकता है; यह किसी विशिष्ट धर्म, जाति या देश तक सीमित न रहकर संपूर्ण मानव जाति के नैतिक उत्थान की बात करती है।

1. तिरुक्कुरल का परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction and Historical Background)

‘तिरुक्कुरल’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘तिरु’ (श्री या पवित्र) और ‘कुरल’ (छोटा छंद या दोहा)। ऐतिहासिक रूप से इसका कालखंड विद्वानों के बीच चर्चा का विषय रहा है, किंतु अधिकांश शोधकर्ता इसे ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य का मानते हैं।

यह ग्रंथ संगम काल (Sangam Era) के बाद के साहित्य का हिस्सा है। जहाँ शुरुआती संगम साहित्य में प्रेम और युद्ध (अकम और पुरम) की प्रधानता थी, वहीं तिरुक्कुरल ने समाज को नैतिकता और मूल्यों की एक सुव्यवस्थित संरचना प्रदान की।

लेखक: संत तिरुवल्लुवर (The Author: Saint Thiruvalluvar)

तिरुवल्लुवर के जीवन के बारे में अधिक ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन किंवदंतियों के अनुसार वे एक बुनकर थे। उन्हें एक ऐसे दूरदर्शी के रूप में देखा जाता है जिन्होंने सांसारिक जीवन जीते हुए भी उच्चतम आध्यात्मिक और नैतिक सत्य को प्राप्त किया था।

2. तिरुक्कुरल की संरचना (Structure of Thirukkural)

तिरुक्कुरल की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक और व्यवस्थित है। इसमें कुल 1330 कूपल (दोहे) हैं, जिन्हें 133 अध्यायों (Athikarams) में विभाजित किया गया है। प्रत्येक अध्याय में 10 दोहे होते हैं।

संपूर्ण ग्रंथ को मुख्य रूप से तीन खंडों में बांटा गया है, जिन्हें ‘पाल’ (Paal) कहा जाता है:

2.1 अरम (Aram – Virtue/Dharma)

यह खंड ‘धर्म’ या ‘नैतिकता’ को समर्पित है। इसमें 38 अध्याय हैं। यह व्यक्ति के व्यक्तिगत आचरण, गृहस्थ जीवन और संन्यास के कर्तव्यों पर प्रकाश डालता है। यह सिखाता है कि एक आदर्श मनुष्य को आंतरिक रूप से कैसा होना चाहिए।

2.2 पोरुल (Porul – Wealth/Artha)

इसमें 70 अध्याय हैं, जो इसे ग्रंथ का सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं। यह खंड ‘अर्थ’ यानी राजनीति, अर्थशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर केंद्रित है। इसमें राजा के गुण, शासन व्यवस्था, मित्रता, कृषि और नागरिकता जैसे विषयों का विस्तार से वर्णन है।

2.3 इंबम (Inbam – Love/Kama)

इसमें 25 अध्याय हैं। यह खंड ‘काम’ या ‘प्रेम’ के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक पहलुओं की चर्चा करता है। इसमें नायक और नायिका के प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं का अत्यंत सुंदर और मर्यादित चित्रण किया गया है।

3. तिरुक्कुरल की प्रमुख विशेषताएं (Key Features of Thirukkural)

3.1 सार्वभौमिकता और पंथनिरपेक्षता (Universality and Secularism)

तिरुक्कुरल की सबसे अद्भुत बात यह है कि इसमें ‘ईश्वर’ शब्द का प्रयोग किसी विशिष्ट नाम (जैसे शिव, विष्णु या बुद्ध) के रूप में नहीं किया गया है। तिरुवल्लुवर ‘आदि भगवान’ या ‘सर्वोच्च शक्ति’ की बात करते हैं। यही कारण है कि इसे दुनिया की सबसे अधिक भाषाओं में अनुवादित होने वाली धर्मनिरपेक्ष पुस्तकों में से एक माना जाता है।

3.2 गागर में सागर (Conciseness)

प्रत्येक कुरल मात्र सात शब्दों का होता है (ऊपर की पंक्ति में चार और नीचे की पंक्ति में तीन)। इन सात शब्दों में कवि ने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समाहित कर दिया है। इसी कारण तमिल में कहा जाता है कि तिरुवल्लुवर ने “एक सरसों के दाने में सातों समुद्र समा दिए हैं।”

4. तिरुक्कुरल का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन (Social and Political Philosophy)

4.1 आदर्श शासन (Ideal Governance)

‘पोरुल’ खंड में तिरुवल्लुवर ने एक आदर्श राज्य की परिकल्पना की है। उनके अनुसार, एक राजा या शासक को न्यायप्रिय, साहसी और विद्वान होना चाहिए। वे कहते हैं कि वह राजा जो अपनी प्रजा की रक्षा करता है और न्याय के मार्ग पर चलता है, उसे देवताओं के समान पूजा जाता है।

4.2 मित्रता और संगति (Friendship and Company)

तिरुवल्लुवर ने मित्रता पर कई अध्याय लिखे हैं। वे चेतावनी देते हैं कि मित्रता केवल हंसने-हंसाने के लिए नहीं, बल्कि गलत मार्ग पर चलने वाले मित्र को टोकने और सही रास्ता दिखाने के लिए होती है।

4.3 कृषि का महत्व (Importance of Agriculture)

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए तिरुवल्लुवर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा है कि “किसान ही इस संसार की धुरी हैं, क्योंकि वे उन सभी का भरण-पोषण करते हैं जो अन्य व्यवसायों में लगे हैं।”

5. नैतिक शिक्षाएं और मानवीय मूल्य (Moral Teachings and Human Values)

तिरुक्कुरल में कुछ मूल्यों पर विशेष जोर दिया गया है:

  • कृतज्ञता (Gratitude): किए गए उपकार को कभी न भूलना।
  • क्षमा (Forgiveness): शत्रु को भी क्षमा करने की शक्ति रखना।
  • सत्यवादिता (Truthfulness): सत्य वही है जो किसी को हानि न पहुँचाए।
  • परोपकार (Altruism): दूसरों की सहायता करना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

6. तिरुक्कुरल का वैश्विक प्रभाव और अनुवाद (Global Impact)

तिरुक्कुरल का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है। ईसाई मिशनरियों से लेकर आधुनिक दार्शनिकों तक, सभी इसके प्रशंसक रहे हैं।

  • जी.यू. पोप (G.U. Pope): इन्होंने 1886 में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और इसे दुनिया के सामने लाए।
  • अल्बर्ट श्विट्ज़र (Albert Schweitzer): नोबेल पुरस्कार विजेता श्विट्ज़र ने कहा था कि तिरुक्कुरल जैसा विश्व-दर्शन पूरी दुनिया के साहित्य में विरल है।
  • गांधीजी: गांधीजी ने भी स्वीकार किया था कि तिरुक्कुरल की शिक्षाओं ने उनके अहिंसा और सत्य के विचारों को प्रभावित किया।

7. निष्कर्ष (Conclusion)

तिरुक्कुरल एक ऐसा कालातीत ग्रंथ है जो समय की सीमाओं को पार कर चुका है। आज के डिजिटल और भागदौड़ भरे युग में, जहाँ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, तिरुवल्लुवर के दोहे हमें मानसिक शांति और सही दिशा प्रदान करते हैं। यह हमें सिखाता है कि कैसे हम भौतिक समृद्धि (अर्थ) और व्यक्तिगत सुख (काम) को नैतिकता (धर्म) के दायरे में रहकर प्राप्त कर सकते हैं।

तमिल संस्कृति के इस अनमोल रत्न को पढ़ना केवल साहित्य का अध्ययन नहीं, बल्कि जीवन की कला को सीखना है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com
डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया है। आज की दुनिया जो व्यक्ति डिजिटल क्रांति से असंपृक्त रहेगा, वह शीघ्र ही अपने आप को अशिक्षित व्यक्ति की तरह अनुभव करेगा।

वर्ष 1983 में जब इंटरनेट की औपचारिक शुरुआत हुई थी, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि मात्र 43 वर्षों की अल्प अवधि में हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उस मोड़ पर खड़े होंगे जहाँ मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगेंगी। आज 2026 में, हमारा जीवन भौतिक जगत से कहीं अधिक डिजिटल जगत में बीत रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ई-कॉमर्स वेबसाइट्स और एआई टूल्स अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस तकनीक के साथ हमारा रिश्ता कैसा है? क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या तकनीक हमारा उपयोग कर रही है?

डिजिटल क्रांतिएक महा-परिवर्तन की आहट

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले पाँच साल पूरी मानव सभ्यता को पूरी तरह बदल कर रख देंगे। तकनीक की गति इतनी तीव्र है कि यदि हमने समय के साथ खुद को नहीं बदला, तो हम न केवल पीछे छूट जाएंगे, बल्कि दूसरों के ज्ञान और एल्गोरिदम (Algorithm) के अधीन होकर रह जाएंगे। आज ‘डिजिटल साक्षरता’ से आगे बढ़कर ‘डिजिटल दक्षता’ हासिल करना अनिवार्य हो गया है, ताकि हम खुद को असहाय महसूस न करें।

डिजिटल क्रांति क्या है? (Understanding Digital Revolution)

‘डिजिटल क्रांति’ का अर्थ केवल इंटरनेट चलाना या सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है— नियंत्रण। अर्थात्  जब हम सोशल मीडिया के स्वभाव (Psychology) को समझकर उसे अपने लाभ के लिए उपयोग करते हैं।

  • जब हम प्लेटफॉर्म्स के द्वारा नियंत्रित होने के बजाय, उन्हें निर्देश देते हैं कि वे आपके लिए क्या काम करें।
  • जब तकनीक हमारी उत्पादकता बढ़ाती है, न कि हमारा समय बर्बाद करती है।

संक्षेप में, हमारे लिए, अपनी शर्तों पर डिजिटल संसाधनों का उपयोग करना ही वास्तविक डिजिटल क्रांति है।

डिजिटल क्रांति : एक नई दृष्टि की शुरुआत

एक लेखक और इतिहासकार के रूप में, मैं वर्ष 1995 से कंप्यूटर पर कार्य कर रहा हूँ। मेरे दो यूट्यूब चैनल हैं-

ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्टोरीज फ्रॉम हिन्दू धर्म (हिन्दू धर्म की कथाएँ)

मेरी तीन वैबसाइट्स भी हैं जिन पर मैं विगत लगभग 15 वर्षों से काम कर रहा हूँ-

भारत का इतिहास डॉट कॉम

राजस्थान हिस्ट्री डॉट कॉम

मोहनलाल गुप्ता डॉट कॉम

मैं फेसबुक, इंस्टाग्राम व ‘एक्स’ (Twitter) जैसे सभी प्रमुख मंचों पर उपस्थित हूँ। मुझे लगता था कि मैं तकनीक को अच्छी तरह समझता हूँ।

मेरी इस धारणा का कारण यह था कि जब मैं इन प्लेटफॉम्स पर काम करने लगा तो मेरे दोनों यूट्यूब चैनल बहुत जल्दी मॉनेटाइज्ड हो गए, एक चैनल पर तो 2 लाख से अधिक सब्सक्राइबर बन गए, आमदनी भी अच्छी होने लगी।

इसी तरह मेरी वैबसाइट्स पर भी  प्रतिदिन 1000-1500 विजिर्ट्स आने लगे किंतु कुछ ही वर्षों में मेरे यूट्यूब चैनल और वैबसाइट्स पर तेजी से विजिटर्स घटने लगे और आज स्थिति यह है कि एक चैनल डीमॉनेटाइज्ड हो गया है, दूसरे चैनल पर मुश्किल से हजार- डेढ़ हजार व्यूअर्स आते हैं, वैबसाइट्स पर तो लगभ 100-150 विजिटर्स ही प्रतिदिन आ रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ, मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया।

गैप कहाँ है?

  1. प्लेटफॉर्म का स्वभाव: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अपना एक ‘कैरेक्टर’ और एल्गोरिदम होता है। इसे समझे बिना वहां सफल होना असंभव है।
  2. दक्षता में वृद्धि: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि एआई टूल्स और सही डिजिटल रणनीतियों के माध्यम से हम अपने दैनिक कार्यों की गति को 10 गुना तक बढ़ा सकते हैं।
  3. सिस्टम बनाम मेहनत: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि डिजिटल दुनिया में ‘हार्ड वर्क’ से ज्यादा ‘स्मार्ट सिस्टम’ मायने रखता है।
  4. कंटेंट की शक्ति: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि कैसे अपने ज्ञान को डिजिटल एसेट (Digital Asset) में बदला जा सकता है।

डिजिटल टूल्स का उपयोग क्यों आवश्यक !

आज की दुनिया में ज्ञान ही शक्ति है, लेकिन वह ज्ञान बेकार है जो दूसरों तक सही तरीके से न पहुँचे। डिजिटल माध्यम हमें यह अवसर देते हैं कि हम अपने क्षेत्र में नॉलेज लीडर’ (Knowledge Leader) बनें।

  • यदि हम शिक्षक हैं, तो आप पूरी दुनिया को पढ़ा सकते हैं।
  • यदि हम लेखक हैं, तो आपकी पहुँच करोड़ों पाठकों तक हो सकती है।
  • यदि हम उद्यमी हैं, तो आपका बाजार भौगोलिक सीमाओं से मुक्त है।
  • यदि हम डॉक्टर हैं तो डिजिटल माध्यमों से अधिक रोगियों तक पहुंच सकते हैं।

डिजिटल क्रांति : आर्थिक स्वावलंबन और घर बैठे करियर

एक बहुत बड़ा मिथक है कि कमाई के लिए केवल पारंपरिक नौकरी ही एकमात्र विकल्प है। डिजिटल आजादी हमें यह सामर्थ्य देती है कि हम अपने हुनर को ऑनलाइन ले जाएं। सही टूल्स और मार्केटिंग की समझ हो, तो व्यक्ति घर बैठे न केवल अपने परिवार का सम्मानजनक भरण-पोषण कर सकता है, बल्कि दूसरों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो अपनी स्वतंत्रता से समझौता किए बिना आर्थिक उन्नति चाहते हैं।

क्या हम तैयार हैं?

तेजी से बदलती इस दुनिया में दो ही विकल्प हैं: या तो बदलाव के शिकार बनें या बदलाव के सारथी। डिजिटल एज्यूकेशन की राह हमें सशक्त बनाती है, हमें वैश्विक मंच प्रदान करती है और सबसे महत्वपूर्ण— हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है।

हम भी इस तकनीक के युग में पीछे छूटने के खतरे को पहचान पा रहे हैं? याद रखिए, आने वाले 5 साल नए सिरे से हमारे जीवन की दिशा तय करेंगे। स्वयं को तैयार करें, शिक्षित करें और डिजिटल रूप से आजाद बनें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स तक, कोई भी डिकोड नहीं कर सका। आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसे पढ़ना नामुमकिन बना हुआ है?

क्या धरती पर कभी किसी ने ऐसी औरतें देखी हैं जिनकी नसें हरे रंग की हैं और जो निर्वस्त्र होकर नीले पानी में नहाती हैं? संभवतः ज्ञात सभ्यताओं के किसी भी कालखण्ड के इतिहास में ऐसी औरतों का उल्लेख नहीं है किंतु आज से छः सौ साल पहले लिखी गए एक रहस्यमयी किताब में इन औरतों के चित्र बने हुए हैं। इन औरतों के बारे में कुछ लिखा भी गया है किंतु क्या लिखा गया है, इसे कोई नहीं पढ़ सका। यह एक ऐसी किताब है, जिसके पन्ने पलटते ही हम एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाते हैं जो हमारी धरती जैसी तो लगती है, लेकिन है नहीं।

इतिहास के सीने में दबे अनगिनत रहस्यों को विज्ञान ने सुलझा लिया है, कुछ को समय ने धुंधला कर दिया है, लेकिन एक रहस्य ऐसा है जिसने सदियों से इंसानी दिमाग को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।

आज मैं बात कर रहा हूँ वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  (Voynich Manuscript) की। यह 240 पन्नों की एक पुरानी डायरी जैसी लगती है किंतु दुनिया की सबसे रहस्यमयी किताब है।

एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स तक, कोई भी डिकोड नहीं कर सका। आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसे पढ़ना नामुमकिन बना हुआ है?

धूल भरे पुस्तकालय से दुनिया के सामने तक का सफर

इस किताब की आधुनिक खोज की कहानी भी किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है। साल 1912 में, पोलिश-अमेरिकी मूल के पुरानी किताबों के एक व्यापारी, विल्फ्रिड वॉयनिच (Wilfrid Voynich), इटली में रोम के पास स्थित ‘विला मोंड्रागोन’ नामक एक पुराने कैथोलिक कॉलेज के पुस्तकालय में दुर्लभ किताबें खंगाल रहे थे।

धूल से सने संदूकों के बीच, उनकी नज़र एक अजीबोगरीब किताब पर पड़ी। इसका कवर बिल्कुल सादा था—न कोई नाम, न लेखक का पता। जिज्ञासावश जब वॉयनिच ने इसे खोला, तो वह सन्न रह गए। पन्नों पर जो लिपि लिखी थी, वह न तो लैटिन थी, न ग्रीक, न अरबी और न ही दुनिया की कोई अन्य ज्ञात भाषा। यह एक पूरी तरह से अज्ञात लिपि थी, जिसके साथ अजीबोगरीब चित्र बने थे। वॉयनिच ने इसे तुरंत खरीद लिया और अपनी पूरी ज़िंदगी इस किताब का रहस्य सुलझाने में लगा दी। उन्हीं के सम्मान में आज इसे ‘वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट’ कहा जाता है।

कोलंबस से भी पुरानी: क्या कहती है साइंस?

दशकों तक विद्वानों का मानना था कि यह किताब शायद 16वीं या 17वीं सदी में लिखी गई होगी। लेकिन साल 2009 में, यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के वैज्ञानिकों ने इस किताब के पन्नों (जो जानवरों की खाल से बने कागज ‘वेलम’ पर लिखे गए हैं) की रेडियो-कार्बन डेटिंग की।

नतीजे चौंकाने वाले थे। परीक्षणों से पता चला कि यह किताब 1404 से 1438 के बीच लिखी गई थी। इसका मतलब यह है कि यह किताब क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज किए जाने से भी लगभग सदी भर पहले अस्तित्व में थी।

इस किताब का ऐतिहासिक सफरनामा भी काफी दिलचस्प है। दस्तावेजों के अनुसार, 16वीं सदी में यह किताब बोहेमिया के सम्राट रूडोल्फ द्वितीय के पास थी, जिन्होंने इसे 600 सोने के सिक्कों (आज के हिसाब से लाखों डॉलर) में खरीदा था। राजा को विश्वास था कि यह 13वीं सदी के मशहूर दार्शनिक और जादूगर ‘रोजर बेकन’ की कृति है। इसके बाद यह किताब कई विद्वानों और कीमियागरों के हाथों से गुजरती हुई अंततः रोम के उस अंधेरे तहखाने में गुम हो गई, जहाँ इसे वॉयनिच ने ढूँढ निकाला।

एक अकल्पनीय दुनिया: वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के अंदर क्या है?

अगर आपको लगता है कि इस किताब की केवल भाषा ही अजीब है, तो इसके चित्रों को देखकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। मैन्युस्क्रिप्ट के हाई-रेज़ोल्यूशन स्कैन देखने पर पता चलता है कि 240 पन्नों की इस किताब को चित्रों के आधार पर 6 मुख्य भागों में बांटा जा सकता है। हर भाग अपने आप में एक अलग और पेचीदा पहेली है।

  1. हर्बल सेक्शन (वनस्पति विज्ञान): यह किताब का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसमें 113 अलग-अलग प्रकार के पौधों और वनस्पतियों के चित्र बने हैं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी पौधा हमारी पृथ्वी पर पाए जाने वाले किसी भी ज्ञात पौधे से पूरी तरह मेल नहीं खाता। यह ऐसे पौधे हैं जो या तो किसी की गहरी कल्पना से उपजे हैं, या फिर किसी ऐसी जगह के हैं जिसे हम नहीं जानते।
  2. एस्ट्रोनॉमिकल सेक्शन (खगोल विज्ञान): इस हिस्से में सितारों, सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों के गोलाकार चार्ट बने हैं। इनमें राशि चक्र (Zodiac) के चिह्न भी दिखाई देते हैं। लेकिन इन नक्षत्रों के बीच अजीबोगरीब आकृतियां हैं, जैसे धनु या वृषभ राशि के चिह्नों के इर्द-गिर्द ऐसी महिलाओं के चित्र बने हैं जो तारों से बंधी हुई प्रतीत होती हैं।
  3. बायोलॉजिकल सेक्शन (जीव विज्ञान): यह पूरी किताब का सबसे विचित्र हिस्सा माना जाता है। इसमें कई नग्न महिलाओं के चित्र हैं, जो हरे और नीले रंग के रहस्यमयी तरल पदार्थों से भरे कुंडों (Pools) में तैर रही हैं या नहा रही हैं। उनके शरीर से अजीब से पाइप, कैप्सूल और नलियां जुड़ी हुई हैं, जो इंसानी नसों (Blood vessels) जैसी दिखती हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे कीमिया (Alchemy) का कोई गुप्त फॉर्मूला मानते हैं, तो कुछ इसे मानव शरीर के आंतरिक तंत्र का रहस्यमयी चित्रण।
  4. कॉस्मोलॉजिकल सेक्शन (ब्रह्मांड विज्ञान): इसमें बड़े-बड़े फोल्ड-आउट (खुलने वाले) पन्ने हैं। एक पन्ना तो 6 सामान्य पन्नों के बराबर बड़ा है, जिसमें ज्वालामुखी, प्राचीन महल और नौ ग्रहों जैसी आकृतियां बनी हैं। इसमें बने महल और दीवारें इटली के कुछ प्राचीन किलों से मिलते-जुलते हैं, जो एक इशारा देते हैं कि शायद किताब इटली या उसके आस-पास ही कहीं लिखी गई थी।
  5. फार्मास्युटिकल सेक्शन (औषधि विज्ञान): यहाँ विभिन्न पौधों की जड़ों, पत्तियों और अजीब सी बोतलों के चित्र बने हैं। ऐसा लगता है जैसे यह प्राचीन काल के किसी वैद्य की रहस्यमयी दवाइयां बनाने की रेसिपी बुक हो।
  6. रेसिपीज़ (विधियां): किताब के अंत में बिना चित्रों वाले सिर्फ टेक्स्ट (लिखावट) के पन्ने हैं, जिनके किनारे फूल और तारे बने हैं। इसे देखकर लगता है कि यह कोई निर्देशिका या जादुई मंत्रों की सूची है।

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  कोड जिसे कोई तोड़ न सका

चित्रों के अलावा इस किताब की असली जानलेवा पहेली है इसकी भाषा… जिसे वॉयनिचीज़’ (Voynichese) कहा जाता है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुश्मनों के सबसे जटिल कोड तोड़ने वाले महारथी, जैसे विलियम फ्राइडमैन (जिन्होंने जापान के प्रसिद्ध ‘पर्पल कोड’ को क्रैक किया था)—वे भी वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के सामने बेबस नज़र आए।

लेकिन क्या यह सिर्फ एक पागलपन भरी चित्रकारी है? भाषा विज्ञानियों (Linguists) के अध्ययन कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। उन्हों भाषा विज्ञानियों ने पाया कि वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  की भाषा ज़िपफ के नियम’ (Zipf’s Law) का कड़ाई से पालन करती है। ‘ज़िपफ का नियम’ कहता है कि किसी भी प्राकृतिक भाषा में, सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द, दूसरे सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्द से दोगुना आता है, और इसी क्रम में आगे बढ़ता है।

इसका मतलब है कि वॉयनिच का टेक्स्ट कोई बेतरतीब लिखावट नहीं है। इसमें स्वर (Vowels) और व्यंजन (Consonants) का एक निश्चित पैटर्न है। शब्दों की लंबाई बिल्कुल वैसी है जैसी अंग्रेजी या लैटिन में होती है। लिखने वाले ने बिना किसी गलती, बिना किसी काट-छांट के, बाएं से दाएं, एक दम सधे हुए हाथों से इसे लिखा है। अगर यह कोई झूठी भाषा होती, तो इसे इतनी परफेक्शन और निरंतरता के साथ लिखना एक इंसान के लिए लगभग नामुमकिन है।

सच या धोखा? प्रमुख थ्योरीज़

सदियों से वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के रहस्य को सुलझाने के लिए कई थ्योरीज़ (सिद्धांत) सामने आई हैं:

  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 1: एलियन या दूसरी दुनिया का ज्ञान: चूंकि इसमें छपे पौधे और तारामंडल हमारी दुनिया से मेल नहीं खाते, कई कॉन्स्पिरेसी थ्योरिस्ट मानते हैं कि यह किसी परग्रही सभ्यता का ज्ञान है जो गलती से धरती पर छूट गया, या किसी इंसान ने एलियंस के संपर्क में आकर इसे लिखा।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 2: एक मध्ययुगीन धोखा (The Great Hoax): कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसे जानबूझकर केवल पैसे कमाने के लिए बनाया गया था। चूंकि सम्राट रूडोल्फ द्वितीय दुर्लभ और जादुई चीज़ों के दीवाने थे, शायद एडवर्ड केली नाम के एक मशहूर धोखेबाज़ ने अपने साथी जॉन डी के साथ मिलकर यह झूठी किताब रची, ताकि राजा को बेवकूफ बनाकर मोटी रकम ऐंठी जा सके।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 3: महिलाओं का स्वास्थ्य और सीक्रेट कोड: हाल ही में कुछ शोधकर्ताओं ने दावा किया कि यह किताब कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि
  •  वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट महिलाओं के स्वास्थ्य, गर्भावस्था और हर्बल मेडिसिन की एक एनसाइक्लोपीडिया है। Nuns ने अपनी जानकारियों को चर्च की आंखों से छिपाने के लिए इसे सीक्रेट कोड में लिखा।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 4: ऑटो-कॉपी या कार्डन ग्रिल मेथड: कुछ लोगों का मानना है कि यह वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरीएक ‘माइक्रोग्राफिक’ साइफर है। हर अक्षर को एक जटिल जाली (Grille) के ज़रिए बदल दिया गया है, जिसे डिकोड करने की चाबी (Key) इतिहास में कहीं खो चुकी है।

तकनीक हार गई, वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट का रहस्य बरकरार

आज वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट अमेरिका की प्रतिष्ठित येल यूनिवर्सिटी (Yale University) की ‘बायनेकी रेयर बुक एंड मैन्युस्क्रिप्ट लाइब्रेरी’ में एक शीशे के सुरक्षित बॉक्स (वॉल्ट) के अंदर रखी हुई है। हालांकि, इसका पूरा पीडीएफ इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध है, जिसे दुनिया भर के लाखों एमेच्योर जासूस, हैकर्स और एआई सिस्टम रोज़ाना क्रैक करने की कोशिश कर रहे हैं।

हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां हमने ब्लैक होल की तस्वीर खींच ली है, इंसानी डीएनए का नक्शा बना लिया है, और मंगल ग्रह पर रोवर भेज दिए हैं। लेकिन यह एक बड़ी विडंबना है कि हमारे सारे सुपरकंप्यूटर और आधुनिक विज्ञान मिलकर भी 600 साल पहले एक इंसान के हाथ से लिखी गई इस 240 पन्नों की किताब के सामने असहाय हैं।

हमें याद दिलाती है कि हमारी तमाम तकनीकी तरक्की के बावजूद, इतिहास ने अभी भी अपने कुछ राज़ हमारे लिए छुपा कर रखे हैं। शायद एक दिन कोई जीनियस वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट कोड को तोड़ दे… या शायद, इसे कभी पढ़ा ही नहीं जा सकेगा।

क्या आपको लगता है कि वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट में किसी अकल्पनीय खज़ाने या ज्ञान का राज़ छिपा है, या यह महज़ सदियों पुराना एक बहुत ही चालाकी से बुना गया मज़ाक है? रहस्य अभी भी बरकरार है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

एनीमल फार्म: ऐ फेयरी स्टोर

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

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पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया? आखिर क्या था उस विमान का ऐसा रहस्य जिसके कारण मर्यादा पुरुषोत्तम ने जो विमान विभीषण से प्राप्त किया था, वह विभीषण को लौटाने के स्थान पर किसी और को दे दिया।

जब भगवान श्रीराम लंका नरेश रावण को मारकर अयोध्या लौटे तो विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान दिया था ताकि भगवान समयावधि के भीतर अयोध्या पहुंच सकें। इस विमान की सहायता से भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और जनकनंदिनी सीता के साथ बहुत कम अवधि में लंका से अयोध्या पहुंच गये थे।

पुष्पक विमान का इतिहास

वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि यह विमान मन की गति से चलता था और यात्रियों के संख्या के अनुसार इसका आकार बदला जा सकता था। अनेक पुराणों, महाकाव्यों और अगस्त्य संहिता आदि में पुष्पक विमान का वर्णन किया गया है।

कुछ पुराणों के अनुसार इस विमान का निर्माण देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिए किया था जबकि कुछ अन्य पुराणों के अनुसार स्वयं ब्रह्माजी ने इसे सूर्य की चमक से निर्मित किया था और इसे अपनी शक्ति का प्रतीक माना था। इस प्रकार ब्रह्माजी पुष्पक विमान के सबसे पहले इसके स्वामी थे।

यह विमान जल, थल और आकाश तीनों स्थानों पर चल सकता था और किसी भी मौसम में चलने में सक्षम था। यह सोने और रत्नों से सुसज्जित था। इसमें ऊँचे खंभे, सुंदर गलियारे और सुगंधित कक्ष थे। इसकी आकृति एक विशाल हंस की तरह थी।

जब ब्रह्माजी ने कुबेर को यक्षों का राजा बनाया तथा उत्तर दिशा का लोकपाल नियुक्त किया तब देवताओं ने कुबेर को अपने कोष का अध्यक्ष भी बना दिया। इस पर ब्रह्माजी ने कुबेर को अपना पुष्पक विमान भी दे दिया।
यक्षराज कुबेर समुद्र के बीच में एक सुरक्षित नगरी बनाकर रहने लगा। इसे लंका कहा जाता था। देवताओं का समस्त स्वर्ण इसी नगरी में सुरक्षित रखा गया।

जब रावण ने ब्रह्माजी से बल प्राप्त करके राक्षसों का नेतृत्व प्राप्त किया, तो उसने अपने सौतेले भाई कुबेर पर आक्रमण कर दिया। कुबेर अपने यक्षों सहित लंका से भाग निकला और हिमालय में अलका पुरी बसाकर रहने लगा।
इस प्रकार रावण ने कुबेर की लंका, देवताओं के समस्त धन और विमान पर अधिकार कर लिया। रामचरित मानस में लिखा है-

एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।

इसी विमान में बैठकर रावण ने स्वर्ग पर धावा बोल दिया। देवता रावण को नहीं जीत सके और स्वर्ग से निकल गए।
एक दिन जब रावण पुष्पक विमान में बैठकर लंका से स्वर्गलोक जा रहा था, तब उसने रंभा को आकाश मार्ग में विचरण करते हुए देखा।

पुष्पक विमान में अत्याचार

रावण ने रंभा के बल पर आसक्त होकर उसे बलपूर्वक उठाकर पुष्पक विमान में बैठा लिया। रंभा स्वर्ग की अप्सरा था और कुबेर के पुत्र नलकूबर की पत्नी के रूप में रहती थी। इसलिए रंभा ने रावण से कहा कि आप मेरे पिता के समान हैं, आपको यह शोभा नहीं देता किंतु रावण ने रंभा के साथ बलात्कार किया।

जिन दिनों भगवान श्रीराम जनकनंदिनी सीता और लक्ष्मणजी के साथ पंचवटी में निवास कर रहे थे, तब रावण जनकनंदिनी सीता का अपहरण करके इसी पुष्पक विमान में बैठाकर लंका ले आया था। इस प्रकार जो विमान ब्रह्माजी की शक्ति के रूप में बनाया गया था, वह रावण की शक्ति का प्रतीक बन गया।

जब भगवान राम दुष्ट रावण का वध करने के बाद जनकनंदिनी सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ लंका से अयोध्या लौटने लगे तब लंकेश विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान प्रदान किया ताकि भरतजी को दिए गए वचन के अनुसार भगवान समय सीमा में अयोध्या पहुंच सकें।

भगवान राम के साथ उनके वानर मित्र भी पुष्पक विमान में बैठ गए जिनमें हनुमानजी, राजा सुग्रीव और युवराज अंगद प्रमुख थे। अयोध्या पहुंचने के बाद श्रीराम ने पुष्पक विमान से कहा कि अब तुम कुबेर के पास चले जाआ। इस सम्बन्ध में रामचरित मानस में एक दोहा इस प्रकार कहा गया है-

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।

कुबेर ही वास्तविक अधिकारी

यहाँ आकर उस प्रश्न के उत्तर स्वतः मिल जाता है कि भगवान श्रीराम ने अयोध्या पहुंचने पर पुष्पक विमान लंकेश विभीषण को क्यों नहीं लौटाया।

चूंकि पुष्पक विमान ब्रह्माजी ने कुबेर को दिया था, इसलिए श्रीराम ने कुबेर को ही इस विमान का वास्तविक अधिकारी माना तथा पुष्पक विमान कुबेर के पास ही भेज दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com
एनीमल फार्म

क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म (Animal Farm) का नाम सुना है! जी हाँ, यही वह किताब है जिसने दुनिया भर के लोगों के दिमागों में आग लगा दी थी और उन दिमागों से निकली आग में दुनिया की 45 सरकारें जलकर भस्म हो गई थीं!

एनीमल फार्म संसार की सबसे रोचक और प्रभावशाली पुस्तकों में से एक है।

जब यह किताब जनता के बीच पहुंची तो दुनिया भर के लोगों ने साम्यवादियों के लाल झण्डे फूंक दिए, सरकारों को गिरा दिया और फिर से अपने देश की वास्तविक संस्कृति के आधार पर सरकारों का गठन किया। इस प्रकार इस किताब ने दुनिया भर में साम्यवाद का जनाजा निकला दिया।

एनीमल फार्म पर बात करने से पहले यह जानना आवश्यक होगा कि ईस्वी 1917 में रूस की बोल्शेविक क्रांति (Bolshevik Revolution) के बाद दुनिया भर में लगभग 50 देशों में साम्यवादी, मार्क्सवादी और लेनिनवादी सरकारें स्थापित हुई थीं।

इन कम्युनिस्ट सरकारों के तानाशाही रवैये और जनता के उत्पीड़ ने से दुखी होकर इंगलैण्ड के एक लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने ‘एनीमल फार्म: ए फेयरी स्टोरी’ शीर्षक से एक छोटा सा उपन्यास लिखा। इस उपन्यास ने दुनिया भर के लोगों के दिमागों में आग लगा दी।

अमरीकी सरकार ने इस उपन्यास में भरी हुई कम्युनिस्ट विरोधी आग को पहचाना और इस किताब को कम्युनिज्म के विरुद्ध एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए ने इस किताब के 60 से अधिक भाषाओं में अनुवाद करवाए और उन्हें सोवियत संघ तथा उसके प्रभाव वाले समस्त कम्युनिस्ट देशों में गुप्त रूप से फैला दिया।

सीआईए ने इस किताब पर 1954 में विभिन्न भाषाओं में एनिमेटेड फिल्में भी बनवाई। इन किताबों और फिल्मों ने दुनिया भर में पूंजीवाद को नई ऑक्सीजन प्रदान की और लोगों को कम्युनिज्म के विरोध में खड़ा कर दिया।

विरोध की इस आग में दुनिया भर में स्थापित लगभग 50 कम्युनिस्ट सरकारों में से 45 सरकारें वर्ष 1989 से 1991 के बीच भस्म हो गईं।

अब दुनिया के केवल 5 देशों में आधिकारिक रूप से कम्युनिस्टों की सरकारें बची हैं जिनमें चीन, क्यूबा, लाओस, उत्तर कोरिया और वियतनाम शामिल हैं। हालांकि रूस अब आधिकारिक रूप से कम्युनिस्ट देश नहीं है किंतु रूसी सरकार का चरित्र अब भी कम्युस्टि है।

इस वीडियो में हम जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘एनीमल फार्म ए फेयरी स्टोरी’ की मूल कथा के बारे में चर्चा करेंगे।

इस उपन्यास का मूल सार यह है कि संसार में हर क्रांति अच्छे उद्देश्य के लिए होती है, किंतु जब क्रांति सफल हो जाती है तब सत्ता बुरे लोगों द्वारा हथिया ली जाती है। इसके बाद जनता को एक नए तरह का शोषण का सामना करना होता है।

जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) का उपन्यास ‘एनीमल फार्म: ए फेयरी स्टोरी’ (Animal Farm: A Fairy Story) एक व्यंग्यात्मक रूपकात्मक डिस्टोपियन कथा है, जो 17 अगस्त 1945 को इंग्लैंड में पहली बार प्रकाशित हुआ था। यह एक पशु-कथा अर्थात् बीस्ट फेबल के रूप में लिखी गई है जिसमें मानवीय गुणों वाले जानवरों की कहानी के माध्यम से ईस्वी 1917 में हुई रूसी क्रांति से लेकर सोवियत संघ के स्टालिन युग तक की घटनाओं को दर्शाया गया है।

ऑरवेल, पूंजीपति नहीं थे, एक लोकतांत्रिक समाजवादी लेखक थे किंतु उन्होंने स्पेनिश सिविल वार के अपने अनुभवों से प्रभावित होकर स्टालिनवाद की आलोचना की।

इस उपन्यास की कहानी मैनर फार्म नामक पशुओं के एक बाड़े के अंदर घूमती है।

एनीमल फार्म में बहुत से जानवर रहते हैं तथा फार्म का मालिक उनसे बहुत काम लेता है। भर पेट खाने को भी नहीं देता। इसलिए पीड़ित जानवर अपने मालिक के खिलाफ विद्रोह करते हैं, ताकि समानता, स्वतंत्रता और सुख से भरा हुआ समाज स्थापित कर सकें। इस क्रांति का नेतृत्व तीन सूअर करते हैं।

जब क्रांति सफल हो जाती है तो एनीमल फार्म सूअरों की तानाशाही के अधीन एक डिस्टोपियन राज्य में बदल जाता है। सूअरों का राज्य आदमी के शासन भी अधिक उत्पीड़न करता है। उपन्यास की थीम में क्रांतिकारी आदर्शों का भ्रष्टाचार, अधिनायकवाद का उदय, प्रचार का प्रभाव और उत्पीड़न का चक्रीय स्वभाव शामिल है। जैसे ही एनीमल फार्म से आदमी का शासन हटता है और एनीमल फार्म के भोले-भाले जानवरों की सत्ता स्थापित होती है, क्रांतिकारी नेताओं की भाषा बदलने लगी है। चूंकि अब वे सत्ताधीश हैं, इसलिए उनकी भाषा में नैतिक विरोधाभास होने लगते हैं।

इस रूपक में एनीमल फार्म के जानवर सोवियत रूस के इतिहास के प्रमुख व्यक्तियों और घटनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। सूअर कम्युनिस्ट नेतृत्व के प्रतीक हैं जबकि फार्म की घटनाएं यूएसएसआर अर्थात् सोवियत संघ की नौकरशाही के द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को दिखाती हैं।

इस उपन्यास के प्रकाशन के 80 साल बाद भी एनीमल फार्म की कहानी न केवल रूस की, अपितु संसार भर में जनता के साथ हो रहे राजनीतिक धोखे को उजागर करती है। एनीमल फार्म की कहानी का अंत एनीमल फार्म के जानवरों पर आदमी के शासन की पुनर्स्थापना के साथ होता है।

उपन्यास में दस अध्याय हैं जिसमें क्रांति और उसके परिणाम की कथा जानवरों के उत्पीड़न से लेकर मानव-तानाशाही की बहाली तक चलती है।

उपन्यास की शुरुआत मैनर फार्म से होती है, जो शराबी मनुष्य मिस्टर जोन्स के कुप्रबंधन के कारण अस्त-व्यस्त है। एनीमल फार्म के जानवरों का जीवन दयनीय हैदृ वे भूखे, थके हुए और शोषित हैं।

एनीमल फार्म का एक वृद्ध सूअर जिसे सभी ओल्ड मेजर कहते हैं, सभी जानवरों को एक सभा में बुलाता है। वास्तव में वह एक पुरस्कार प्राप्त मिडल व्हाइट सूअर है जिसका पहले का नाम विलिंगडन ब्यूटी था।

ओल्ड मेजर नामक वह बूढ़ा सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों को मानव शासन से मुक्ति का सपना दिखाता है। ओल्ड मेजर कहता है कि सभी जानवरों की समस्याओं के मूल कारण मनुष्य हैं, जो जानवरों का शोषण करते हैं दृ दूध और अंडे चुराते हैं, जानवरों से काम करवाते हैं और अंत में जानवरों को मार देते हैं।

ओल्ड मेजर एनिमलिज्म के सिद्धांतों की व्याख्या करता है और कहता है कि आदमी की गुलामी से त्रस्त सभी जानवर एक समान हैं और उन्हें मनुष्यों से मुक्त होकर एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहां कोई शोषण न हो।

वह बूढ़ा सूअर बीस्ट्स ऑफ इंग्लैंड नामक एक क्रांतिकारी गीत गाकर जानवरों को एकजुट होने का आह्वान करता है। इस सभा के तीन दिन बाद ओल्ड मेजर की मौत हो जाती है, लेकिन उसके विचार जीवित रहते हैं।

इस उपन्यास में ओल्ड मेजर कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन का प्रतीक है, जो क्रांति की प्रेरणा प्रदान करता है। यह अध्याय जानवरों के बीच असंतोष को स्थापित करता है, जो बाद की घटनाओं की नींव रखता है।

जानवरों की सभा में विभिन्न पशु अपनी प्रकृति के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं दृ घोड़े उत्साहित हैं, मुर्गियां चिंतित हैं और सूअर विचारशील हैं।

ओल्ड मेजर की मौत के बाद, दो युवा सूअर, स्नोबॉल और नेपोलियन जानवरों का नेतृत्व संभालते हैं। वे ओल्ड मेजर की शिक्षाओं को व्यवस्थित करते हैं और एनिमलिज्म को एक दर्शन के रूप में विकसित करते हैं।

स्नोबॉल नामक सूअर बुद्धिमान है और प्रखर वक्ता है। वह जानवरों को पढ़ना-लिखना सिखाता है। जबकि नेपोलियन नामक सूअर चालाक और महत्वाकांक्षी है। वह जानवरों के पिल्लों को गुप्त रूप से एनिमलिज्म में शिक्षित करता है।

अब एनीमल फार्म के जानवर सात आज्ञाओं को अपनाते हैं, जो खलिहान की दीवार पर लिख दी जाती हैं- 1. दो पैरों पर चलने वाला दुश्मन है; 2. चार पैरों वाला या पंख वाला मित्र है; 3. कोई जानवर कपड़े नहीं पहनेगा; 4. कोई जानवर बिस्तर पर नहीं सोएगा; 5. कोई जानवर शराब नहीं पिएगा; 6. कोई जानवर दूसरे जानवर को नहीं मारेगा; 7. सभी जानवर समान हैं।

सूअर खुद को विशेष भोजन का हकदार बताते हैं, कहते हैं कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। एक रात को जब मिस्टर जोन्स शराब के नशे में होता है, जानवर विद्रोह करते हैं, उसे और जोन्स तथा उसके आदमियों को भगा देते हैं।

क्रांति सफल हो जाती है और जोन्स फार्म का नाम बदलकर एनीमल फार्म कर दिया जाता है। वे एक हरा झंडा फहराते हैं, जिसमें एक सींग और खुर का प्रतीक होता है। जीवन में सुधार आता है दृ भोजन प्रचुर है, और काम सुचारू रूप से चलने लगता है।

यह अध्याय क्रांति की शुरुआती सफलता दिखाता है, लेकिन सूक्ष्म संकेत देता है कि सूअरों में सत्ता की लालसा है। वस्तुतः यह चित्रण ईस्वी 1917 की बोल्शेविक क्रांति का प्रतिनिधित्व करता है, जहां जनता ने रूस के जार निकोलस द्वितीय को सत्ता से हटाया था।

विद्रोह के बाद, एनीमल फार्म के सभी जानवर सामूहिक रूप से काम करते हैं। स्नोबॉल समितियां बनाता है, जैसे अंडा उत्पादन समिति, जबकि नेपोलियन पिल्लों पर ध्यान केंद्रित करता है।

जब गायें दूध देती हैं, तो उसे सूअर पी जाते हैं और जब मुर्गियाँ अण्डे देती हैं तो उन्हें भी सूअर खा जाते हैं। जब एनीमल फार्म के जानवर दूध और अण्डों के बारे में पूछते हैं तो सूअर जानवरों को एनीमल फार्म पर शांति रखने की सलाह देते हैं।

एक दिन मिस्टर जोन्स और उसके सहयोगी बैटल ऑफ द काउशेड में फार्म पर हमला करते हैं, लेकिन एनीमल फार्म के जानवर उन्हें हरा देते हैं। अब तो स्नोबॉल और नेपोलियन पशुओं के वास्तविक नायक बन जाते हैं।

वस्तुतः ‘बैटल ऑफ द काउ-शेड’ 1918 के गृहयुद्ध में विदेशी हस्तक्षेप को दर्शाता है।

एनीमल फार्म के सूअर काम नहीं करते, वे केवल नेता हैं और बाकी के जानवरों के लिए निर्णय लेते हैं। जबकि दूसरी ओर बाकी के जानवर कड़ी मेहनत करते हैं।

एनीमल फार्म पर बॉक्सर नामक एक मजबूत घोड़ा है, वह सूअरों के भाषणों से प्रभावित होकर ‘आई विल वर्क हार्डर’ का संकल्प लेता है। यह अध्याय क्रांति के आदर्शों की शुरुआती परीक्षा दिखाता है, जहां समानता अभी भी मौजूद लगती है किंतु सूअरों की विशेषाधिकार शुरू हो जाते हैं।

एक दिन स्नोबॉल फार्म को आधुनिक बनाने के लिए एक पवनचक्की बनाने का प्रस्ताव रखता है, जो एनीमल फार्म के जानवरों को बिजली और सुविधाएं प्रदान करेगी।

नेपोलियन इस पवनचक्की के प्रस्ताव का विरोध करता है, जिससे सूअरों के बीच नेतृत्व को लेकर तनाव बढ़ता है।

अब नेपोलियन नामक सूअर की महत्वाकांक्षा स्पष्ट होने लगती है। एक दिन वह अपने प्रशिक्षित कुत्तों से स्नोबॉल को भगा देता है और जानवरों का एकमात्र नेता बन जाता है। वह जानवरों की सभाओं को समाप्त कर देता है और सूअरों की समिति से शासन चलाने लगता है।

इस उपन्यास में जहाँ नेपोलियन नामक सूअर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी स्टालिन का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं स्नोबॉल ट्रॉटस्की का। नेपोलियन के आदेश पर काम करने वाले कुत्ते सोवियत गुप्त पुलिस एनकेवीडी के प्रतीक हैं।

एक दिन नेपोलियन ओल्ड मेजर की खोपड़ी को धरती में से खोदकर निकालता है और जानवरों के समक्ष उसका प्रदर्शन करके स्नोबॉल को तोड़फोड़ के लिए आरोपी बनाता है।

इस सभा में नेपोलियन नामक सूअर, जानवरों से पवनचक्की बनाने के लिए कहता है और पवनचक्की से होने वाले फायदों का बखान करता है। स्क्वीलर नामक एक चालाक सूअर, एनीमल फार्म में आ रहे बदलावों को जायज ठहराता है। यह अध्याय अधिनायकवाद के उदय को दिखाता है।

अब नेपोलियन आदमियों की तरह दो पैरों पर चलने लगता है, बिस्तर पर सोने लगता है और अत्यधिक शराब पीने लगता है। वह अपनी आज्ञाओं को गुप्त रूप से बदलता है। नेपोलियन के आदेश पर एनीमल फार्म की भेड़ें फोर लेग्स गुड, टू लेग्स बैड का गीत गाने लगती हैं। ताकि जानवर नेपालियन का विरोध न करें।

पवनचक्की का निर्माण शुरू होता है, लेकिन कठिनाइयां आती हैं। जानवर पवनचक्की बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और जानवरों का जीवन कठिन होता चला जाता है, लेकिन स्क्वीलर नामक सूअर दावा करता है कि इस समय एनीमल फार्म का शासन मिस्टर जोन्स के समय से बेहतर है। वास्तव में यह रूपक सोवियत रूस के पांच-वर्षीय योजनाओं और आदर्शों के भ्रष्टाचार को दिखाता है।

जब पवन चक्की बन जाती है तो पड़ौसी फार्म के मालिक मिस्टर फ्रेडरिक हमला करते हैं और पवनचक्की को विस्फोट से नष्ट कर देते हैं। इस पर मिस्टर फ्रेडरिक तथा जानवरों के बीच युद्ध होता है जिसमें जानवर जीत जाते हैं। कुछ पशु इस युद्ध में मर जाते हैं।

एक दिन नेपोलियन, एनीमल फार्म के जानवरों से छिपकर, एनीमल फार्म के दुश्मन फ्रेडरिक से लकड़ी के लिए सौदा करता है। फ्रेडरिक एनीमल फार्म की लकड़ी ले जाता है और बदले में नकली नोट देता है। इस पर नेपोलियन इस षड़यंत्र के लिए स्नोबॉल को देशद्रोही ठहराता है जिसे कि पहले ही एनीमल फार्म से भगाया जाता है। इस प्रकार यह अध्याय युद्ध और धोखे को दर्शाता है, जहाँ फ्रेडरिक हिटलर का रूपक है और हमला मोलोटोव-रिबेंट्रॉप पैक्ट के टूटने का।

इसके बाद नेपोलियन एनीमल फार्म का शुद्धिकरण करता है और अपने विरोधी जानवरों को अपने कुत्तों से मरवा देता है। नेपोलियन आरोप लगाता है कि जानवर स्नोबॉल की साजिश में शामिल हैं, वे ही मेरा विरोध करते हैं।

अब नेपोलियन एनीमल फार्म के एंथम बीस्ट्स ऑफ इंग्लैंड पर प्रतिबंध लगा देता है। जानवर अब एक नया गीत गाने लगते हैं जिसमें नेपोलियन की स्तुति की जाती है। इस प्रकार नेपोलियन पूरी तरह डिक्टेटर बन जाता है और एनीमल फार्म की दीवारों पर लिखी गई पुरानी आज्ञाओं को मिटाकर नई आज्ञाएं लिखवाता है।

नई आज्ञाओं में कहा जाता है कि ‘ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम आर मोर इक्वल दैन अदर्स।’ इसके बाद जानवरों के कष्ट और अधिक बढ़ जाते हैं, लेकिन नेपोलियन का प्रचार अधिकारी जो कि स्क्वीलर नामक सूअर है, शासन के अच्छे होने का दावा करता है। यह चित्रण वस्तुतः 1930 के दशक के शो ‘ट्रायल्स और पर्जेस’ को दिखाता है।

एक दिन पवनचक्की तूफान में गिर जाती है। नेपोलियन इसके लिए भी स्नोबॉल को दोषी ठहराता है जबकि पवनचक्की तो घटिया निर्माण सामग्री के कारण गिरती है।

युवा सूअरों का निष्पादन होता है। मुर्गियां अंडों की जब्ती पर विद्रोह करती हैं, लेकिन भूख से दबा दी जाती हैं। यह अध्याय सोवियत की अकाल (जैसे होलोडोमोर) को दर्शाता है।

कुछ समय और बीतता है, पवनचक्की पुनर्निर्मित होती है, लेकिन उससे होने वाली आय पर केवल सूअरों का अधिकार होता है। सूअर मानवीय आदतें अपनाते हैं दृ सीधे चलना, कपड़े पहनना, शराब पीना। झंडे का रंग भी बदल जाता है। ओल्ड मेजर की खोपड़ी फिर से दफना दी जाती है। अब केवल एक आज्ञा बाकी रहती है, जो जानवरों के बीच समानता के अधिकार की जगह असमानता को दर्शाती है।

एक दिन बॉक्सर नामक घोड़ा जो कि रूस के स्टाखानो-वाइट श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है, अत्यधिक मेहनत के कारण बीमार पड़ जाता है और नेपोलियन द्वारा बेच दिया जाता है।

एक दिन नेपोलियन एनीमल फार्म के सूअरों और पड़ौसी फार्मों के मानव किसानों के लिए रात्रिभोज आयोजित करता है। वह क्रांतिकारी परंपराओं को समाप्त देता है। एनीमल फार्म का नाम वापस द मैनर फार्म कर देता है। जानवर बाहर से देखते हैं कि सूअर और मनुष्य अब एक जैसे हो चुके हैं। वे ताश खेलते हैं और पैसा हार-जीत पर लगाते हैं।

सूअरों के आदेश पर फार्म के दूसरे जानवर और अधिक काम करते हैं, उनका भोजन घटा दिया जाता है। सूअरों के मनुष्य-मित्र नेपोलियन की प्रशंसा करते हैं। यह अध्याय क्रांति के बाद जनता के साथ होने वाले पूर्ण विश्वासघात को दिखाता है, जहां सूअर और मनुष्य एक हो जाते हैं अर्थात् सोवियत रूस के कम्युनिस्ट और यूरोप के पूंजीपति एक हो जाते हैं।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच एक दिन मैनर फार्म का पुराना मालिक मिस्टर जोन्स लौट आता है और एनीमल फार्म पर फिर से कब्जा कर लेता है। इस प्रकार एक सफल क्रांति बुरे अनुभव के साथ समाप्त हो जाती है और एनीमल फार्म के जानवर फिर से पहले की तरह आदमी के निर्देशों पर काम करने लगते हैं।

एनीमल फार्म के जानवरी अब जाकर अनुभव कर पाते हैं कि सूअरों के शासन से तो आदमी का शासन बेहतर है। अर्थात् कम्युनिस्टों के शासन से पूंजीपतियों का शासन बेहतर है।

इस प्रकार यह उपन्यास समानता के भ्रष्टाचार, प्रचार की शक्ति और अधिनायकवाद को उजागर करता है। सात आज्ञाएं सोवियत संविधान की विकृति हैं। अंत में, सूअर और मनुष्य का एकीकरण सोवियत-पश्चिम संबंधों की आलोचना है। ऑरवेल राजनीतिक उद्देश्य को कलात्मक व्यंग्य से जोड़ते हैं, दिखाते हैं कि सत्ता-लोलुप नेता क्रांतियां कैसे तानाशाही में बदल देते हैं।

यदि हम इस कथानक को भारत के इतिहास की दृष्टि से देखें तो हम पाते हैं कि भारत में भी ईस्वी 1857 में एक महान् क्रांति आरम्भ हुई। इसका उद्देश्य भारत माता को विदेशियों की दासता से मुक्त करवाना था। यह क्रांति पूरे 90 साल में जाकर सफल हुई। हजारों प्रतिभावान क्रांतिनायकों ने अपना जीवन होम कर दिया। अंततः 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।

जैसा कि हर क्रांति के बाद होता है, क्रांति के महान नायक क्रांति के दौरान या तो शहीद हो गए, या फिर परिदृश्य से हटा दिए गए और क्रांति की सफलता का समस्त श्रेय कम प्रतिभा वाले लोगों को मिला। उनके हाथों में सत्ता की बागडोर आई। वे धूर्त नहीं थे किंतु चालाक अवश्य थे। उन्होंने अपने आप को कम्यूनिस्ट नहीं कहा, बड़ी चालाकी से धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी के रूप में प्रदर्शित किया।

शीघ्र ही वे चालाक लोग जिन्हें भारत की सत्ता की बागडोर मिली थी और जो स्वयं को समाजवादी कहते थे, सुविधाभोगी होने लगे। समय के साथ इन सुविधाभोगियों का लालच बढ़ने लगा। वे जनता के सुख-सुविधाओं से नहीं अपनी सुख-सुविधाओं के लिए पॉलिटिक्स का गंदा खेल खेलने लगे। और धीरे-धीरे पूरी तरह धूर्त भी बन गए।

भारत के इन नेताओं ने भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद (Secularism and socialism) शब्द ठीक उसी प्रकार बदल दिए जिस प्रकार एनीमल फार्म के अधिनायक नेपोलियन ने एनीमल फार्म की सात आज्ञाओं को बदल दिया था।

हालांकि जनता ने पिछले कुछ सालों से उन्हें सत्ता से वंचित कर रखा है किंतु वे पॉलिटिक्स का गंदा खेल खेलने से बाज नहीं आते, और सदैव इस ताक में रहते हैं कि सत्ता फिर से उनके हाथों में आ जाए।

संसार भर में हुई सफल क्रांतियों की इस क्रूर हकीकत तथा भारत की जनता के साथ हुए धोखे को समझाने के लिए मैंने इस आलेख में जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास एनीमल फार्म की कहानी का सहारा लिया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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हरम बेगम का कपट जाल

बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।

मुगल शहजादों ने अकबर के राज्य पर हमला कर दिया!

ई.1567 में अकबर (Badshah Akbar) के पुराने विश्वसनीय सेनापति आसफ खाँ (Asaf Khan) तथा उज्बेकों की बगावतें समाप्त होने के साथ ही अब अकबर के लिए समय आ गया था जब वह पूरी शक्ति के साथ चित्तौड़ एवं रणथंभौर पर कार्यवाही कर सके किंतु अभी आसफ खाँ तथा उज्बेकों का विद्रोह समाप्त भी नहीं हुआ था कि अकबर के खानदान के बहुत से शहजादों ने अकबर के विरुद्ध बगावत कर दी।

इसलिए अकबर के चित्तौड़ अभियान से पहले हमें अकबर के खानदान के शहजादों एवं मिर्जाओं द्वारा अचानक ही अकबर के राज्य पर हमला करने की घटनाओं की चर्चा करनी होगी जिनके कारण अकबर का चित्तौड़ अभियान कुछ दिन के लिए टल गया था।

पाठकों को स्मरण होगा कि कुछ समय पहले ही अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ की सहायता के लिए कुछ सेनाएं भेजी थीं जिनके कारण अकबर के चचेरे चाचा मिर्जा सुलेमान को काबुल का घेरा उठाकर बदख्शां की तरफ भाग जाना पड़ा था और अकबर के वृद्ध मंत्री कुतुबुद्दीन खाँ को मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का सलाहकार बनाया गया था।

मिर्जा हकीम खाँ बहुत ही अस्थिर मस्तिष्क का शहजादा था। उसकी परवरिश अपनी माता चूचक बेगम के हाथों में हुई थी जो स्वयं भी राज्य की लालची और अस्थिर बुद्धि की औरत थी। इसलिए मिर्जा हकीम खाँ ने अकबर द्वारा समय पर भेजी गई सहायता का मूल्य नहीं समझा तथा अकबर से कोई सम्बन्ध नहीं रखे।

बदख्शां (Badakshan) का शासक मिर्जा सुलेमान भी अस्थिर बुद्धि का व्यक्ति था। वह बार-बार काबुल से मार खाकर आता था, कुछ समय के लिए शांत होकर बैठता था किंतु थोड़े समय बाद फिर से सेना सजाकर काबुल पर अधिकार करने चल देता था। इस बार भी कुछ दिनों तक बदख्शां में बैठे रहने के बाद मिर्जा सुलेमान एक बार फिर से काबुल की ओर चल पड़ा। उसे ज्ञात हो चुका था कि बादशाह अकबर की सेनाएं वापस पंजाब जा चुकी हैं।

इस बार भी मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) ने हरम बेगम को अपने साथ लिया जो प्रायः युद्धों में जाया करती थी। जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को ज्ञात हुआ कि उसके सास-ससुर सेना लेकर आ रहे हैं तो मिर्जा सुलेमान ने मासूम नामक एक सेनापति को काबुल की रक्षा का भार सौंपा तथा स्वयं अपने प्रधानमंत्री ख्वाजा हसन नक्शबंदी के साथ घोरबंद चला गया।

कुछ ही दिनों में मिर्जा सुलेमान ने काबुल को घेर लिया। इस बीच मिर्जा सुलेमान ने हरम बेगम को घोरबंद भेजा ताकि वह मिर्जा हकीम खाँ से बात करके उसे समर्पण के लिए राजी कर सके।

हरम बेगम ने अपने संदेशवाहकों को अपने जंवाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ के पास भेजकर कहलवाया कि मैं तुम्हें अपने पुत्र से भी अधिक प्रेम करती हूँ क्योंकि तुम मेरे जंवाई हो। मेरे आने का उद्देश्य यह है कि मेरा और तुम्हारा सम्बन्ध और भी दृढ़ हो जाए। मिर्जा हकीम खाँ ने अपने कुछ संदेशवाहक अपनी सास हरम बेगम के पास भेजे ताकि वे हरम बेगम के व्यवहार तथा उसके उद्देश्य का पता लगा सकें।

हरम बेगम ने मिर्जा हकीम के दूतों का स्वागत किया तथा उनके समक्ष सौगंध खाई कि छल की कोई बात नहीं है और जैसा कहा गया है, ठीक वही होगा। जब मिर्जा के आदमियों ने बेगम की शपथ सुनी तो उन्होंने वचन दिया कि वे मिर्जा से मुलाकात करने की व्यवस्था कर देंगे।

मिर्जा हकीम के संदेशवाहकों ने हरम बेगम (Harem Begum) के पास से लौटकर मिर्जा हकीम खाँ को विश्वास दिलाया कि हरम बेगम किसी तरह का विश्वासघात नहीं करेगी। अतः बेगम से मिलने में कोई कठिनाई नहीं है।

बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि हरम बेगम कपट-जाल बिछा रही है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।

जब बेगम ने देखा कि षड़यंत्र सफल होता दिख रहा है तो उसने अपने आदमी भेजकर मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) से कहलवाया कि मैंने मिर्जा हकीम खाँ को कराबाग में मिलने के लिए सहमत कर लिया है। अतः आप समय पर पहुंच कर मिर्जा हकीम खाँ को बंदी बना लें।

इस पर मिर्जा सुलेमान ने काबुल का घेरा मुहम्मद कुली सिंघाली को सौंपा और स्वयं रात में ही कूच करके कराबाग के निकट पहुंचकर एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठ गया।

जब बाकी काकशाल, मिर्जा हकीम खाँ के आगे-आगे कराबाग जा रहा था तो उसे मार्ग में एक काबुली मिला। उसने बाकी काकशाल को बताया कि मिर्जा सुलेमान एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठा है। इस पर बाकी काकशाल मिर्जा हकीम खाँ को लेकर घोरबंद की तरफ भाग लिया।

जब मिर्जा सुलेमान को पता लगा कि मिर्जा हकीम पीछे मुड़कर भाग रहा है तो वह भी पहाड़ी से निकल आया और मिर्जा हकीम तथा उसके अमीरों का पीछा करने लगा। इस पर मिर्जा हकीम तथा उसके अमीर एक घाटी में जाकर छिप गए। मिर्जा सुलेमान निराश होकर काबुल चला गया।

ख्वाजा हसन तथा कुछ अन्य अमीरों ने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे बल्ख के शासक पीर मुहम्मद खाँ के पास जाकर सहायता मांगनी चाहिए। बाकी काकशाल ने कहा कि मिर्जा हकीम खाँ को बादशाह अकबर के पास जाकर उससे सहायता मांगनी चाहिए।

इस पर ख्वाजा हसन तथा उसके पक्ष के अमीर बल्ख चले गए और बाकी काकशाल मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को लेकर भारत के लिए रवाना हो गया। ये लोग घोरबंद से ईसा, बहरा, जलालाबाद और पेशावर होते हुए सिंधु नदी के तट पर पहुंचे। यहाँ उनकी भेंट फरीदून से हुई जो मिर्जा हकीम का मामा था।

उसने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे अकबर की शरण में जाने की बजाय पंजाब पर आक्रमण करना चाहिए तथा अपने लिए नया राज्य बनाना चाहिए क्योंकि इस समय अकबर उज्बेकों के भयानक विद्रोह से घिरा हुआ है। अकबर के सेनापति आसफ खाँ ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर रखा है। इसलिए अकबर पंजाब की रक्षा नहीं कर सकेगा।

फरीदून खाँ मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का मामा था और उसे अकबर ने ही मिर्जा हकीम का मार्गदर्शन करने के लिए आगरा से भेजा था। उसने मिर्जा हकीम खाँ को अकबर के प्रति निष्ठावान रहने की सलाह देने की बजाय, उसे अकबर के राज्य पर हमला करने का परामर्श दिया।

यह परामर्श मिर्जा हकीम खाँ को विनाश के मार्ग पर ले जाने वाला था किंतु मिर्जा हकीम को अपने मामा की यह सलाह पसंद आई और वह अपनी सेना इकट्ठी करके भारत की तरफ चल दिया।

जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा को ज्ञात हुआ कि मिर्जा हकीम खाँ पंजाब पर आक्रमण करने आ रहा है तो उन दोनों ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया और संभल से दिल्ली आकर लूटपाट करने लगे।

इस प्रकार अकबर चारों ओर से संकट में घिर गया। मिर्जा लोग अकबर के परिवार के ही शहजादे थे किंतु संकट काल में अकबर के राज्य की रक्षा करने की बजाय अकबर के राज्य पर अधिकार करने का सपना देख रहे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

दलितों की आत्महत्या

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दलितों की आत्महत्या

दलितों की आत्महत्या का मामला आज पूरे भारत में चिंता का विषय बना हुआ है। क्या है इन आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि! क्या है इस समस्या का समाधान! इस आलेख में इस विषय पर संक्षेप में चर्चा की गई है।

जब देश का संविधान बना तो इस बात पर सबका ध्यान था कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ लोगों का अत्यधिक शोषण किया गया है और कुछ लोगों ने उस शोषण में अंग्रेजों का साथ देकर अपनी तिजोरियां भरी हैं।

इसलिए पूरी संविधान सभा ने भारत में निवास करने वाले उस बड़े शोषित वर्ग के लिए एक मत से कुछ विशिष्ट प्रावधान किए। इस संविधान का प्रारूप लिखने के लिए जो समिति बनाई गई, उसकी अध्यक्षता लंदन से बैरिस्ट्री पढ़कर आए डॉ. भीमराव अम्बेडकर को दी गई।

निश्चित रूप से संविधान सभा में सभी सदस्य बहुत विद्वान थे और अपने-अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर हाल ही में आजाद हुए भारत का समग्र विकास करना चाहते थे। वे संविधान के माध्यम से कोई राजनीति नहीं कर रहे थे। संविधान उनके लिए राजनीतिक हथियार था भी नहीं, यह तो आज बन गया है।

आज तो राजनीतिज्ञों ने संविधान को ही नहीं अपितु, संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी अपनी राजनीति चमकाने का जरिया बना लिया है। तब ऐसा नहीं था। उस काल में ऐसा हो भी नहीं सकता था। इसलिए संविधान सभा के सदस्यों ने एकमत से आरक्षण का प्रावधान किया।

हिन्दू समाज का वह निर्धन वर्ग जो मुसलमानों के लगभग छः सौ सालों के शासनकाल में और उसके बाद अंग्रेजों के लगभग 200 सालों के शासनकाल में अछूत और अस्पृश्य कहकर समाज की मुख्य धारा से दूर कर दिया गया, जिनका तरह-तरह से शोषण किया गया, जिन्हें आधा पेट भोजन देकर, दो गुना – चार गुना काम लिया गया, उन्हें आजाद भारत में तेजी से विकास करने के अवसर देने के उद्देश्य से उनके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह जानते थे कि आरक्षण एक दुधारी तलवार की तरह है जो दलित समाज का भला करने के साथ ही उनके लिए कुछ न कुछ खतरे भी अवश्य पैदा करेगी। डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस चिंता को संविधान सभा के भाषणों में खुलकर व्यक्त किया था।

इस समस्या से बचने के लिए संविधान में आर्टीकल 335 का प्रावधान किया गया जो यह कहता था कि आरक्षण के लाभ से युक्त अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति देते समय यह ध्यान में रखा जाएगा कि प्रशासन की दक्षता बनी रहे।

अर्थात् आरक्षित पदों पर केवल उन्हीं युवाओं को लिया जाएगा जो उस सेवा को करने की दक्षता एवं योग्यता रखते हैं। यह प्रावधान इसलिए था ताकि इन पदों पर आने के इच्छुक दलित एवं पिछड़े कहे जाने वाले युवा अपनी गुणवत्ता में निरंतर सुधार करके समाज के शेष लोगों के बराबर आ जाएं।

इस प्रकार आर्टीकल 335 के माध्यम से आरक्षण के प्रावधान में संतुलन स्थापित किया गया। डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि यदि आरक्षण के साथ गुणवत्ता की शर्त नहीं रखी गई तो दलित वर्ग का बहुत नुक्सान होगा। सरकार के कामकाज की क्वालिटी भी गिरेगी और दलित वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास करने के प्रयास छोड़ देगा।

समय के साथ संविधान सभा भंग हो गई। चुनी हुई लोकसभाएं आने लगीं। राजनीतिक दलों में में सभी तरह के तत्व शामिल हो गए। निश्चित रूप से हर राजनीतिक दल में अच्छे लोगों के साथ-साथ कुछ लोग लालची, चालाक और धूर्त लोग भी स्थान पाने लगे।

इन लालची नेताओं ने तुरंत ही समझ लिया कि आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाकर वोटतंत्र पर कब्जा किया जा सकता है। इसलिए इन नेताओं ने वर्ष 1995 में लोकसभा एवं राज्यसभा में 77वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 पारित करके, संविधान के अनुच्छेद 15 में आरक्षित पदों के लिए योग्यता अंकों में छूट और मूल्यांकन मानकों में शिथिलता दिए जाने का प्रावधान किया। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान भी इसी संशोधन के माध्यम से किया गया था।

सतही दृष्टि से देखने पर यह एक अच्छा निर्णय लगता है किंतु अंदरूनी वास्तविकता यह थी कि इसने अब दलित एवं पिछड़े वर्ग के युवाओं को नौकरी पाने का मार्ग तो सरल बना दिया किंतु योग्यता में वृद्धि करके समाज साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के प्रयासों से वंचित कर दिया। कम योग्यता वाले लोग सरकार में उच्च पदों पर आ तो गए किंतु अब उनमें काम करने योग्य प्रतिभा न होने से वे अपने ही साथियों के बीच में स्वयं को कमजोर समझने लगे।

यही स्थिति उच्च शैक्षणिक संस्थानों में भी होने लगी। जब वे आईआईटी, आईआईएम तथा एमबीबीएस जैसी संस्थानों में पढ़ने गए तो उस पढ़ाई को न पकड़ सके। आरक्षित वर्ग के साथियों की इस कमजोरी को अनारक्षित वर्ग के छात्रों ने दलितों एवं पिछड़ों की जन्मजात मानसिक अयोग्यता माना लिया। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

दलितों अथवा पिछड़ों में मानसिक योग्यता की कमी जन्मजात नहीं होती, यह कमी तो योग्यता अर्जित करने के अवसरों से वंचित रह जाने से, उस योग्यता को अर्जित करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों को छोड़ देने से उत्पन्न होती है।

सरकारों को चाहिए था कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए योग्य बनाने हेतु जी-जाने से प्रयास करतीं, न कि उन्हें एक कठपुतली की तरह आगे से आगे बढ़ाती रहतीं।

आज स्थिति यह है कि माइनस 30 या माइनस चालीस अंक लाने वाले छात्रों को डॉक्टरी में एडमिशन दिया जा रहा है। क्या एक ऐसा छात्र जो प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम पासिंग मार्क्स नहीं ला सकता, कभी भी एमबीबीएस की मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़कर डॉक्टर बन सकता है?

यही कारण है कि इनमें से बहुत से छात्र आत्महत्या करते हैं और उन्हें कमजोर वर्गों पर अत्याचार और दलितों की आत्महत्या कहकर राजनीतिक रंग दिया जाता है। विगत 25 वर्षों में भारत में लगभग दो लाख से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। केवल पिछले 10 वर्षों में 1 लाख 17 हजार से अधिक छात्रों की आत्महत्याएँ दर्ज हुई हैं।

आज भारत में औसतन प्रतिदिन 35-36 छात्र आत्महत्या करते हैं। इन आत्महत्याओं के कारण अलग-अलग हैं किंतु पढ़ाई से घबराकर आत्महत्या करने के प्रकरण भी कम नहीं हैं।

दलितों की आत्महत्या को धूर्त किस्म के नेता, वामपंथी शातिर और कुछ नासमझ समझदार भी सवर्णों द्वारा दलितों के विरुद्ध किए गए अत्याचारों का परिणाम बताकर समाज की टूटन को और अधिक गहरी करके अपना उल्लू साधना चाहते हैं। हाल ही में बनाए गए यूजीसी के नियम इस षड़यंत्र का प्रमाण है।

क्या ऐसे दौर में हमें अम्बेडकर के उन भाषणों को फिर से नहीं पढ़ना चाहिए जो उन्होंने संविधान सभा में दिए थे?

अब भी समय है, अम्बेडकर की बात को मन लिया जाए तो दलित छात्रों को घृणित राजनीति की चौसर पर बलि चढ़ने से रोका जा सकता है।

हम जानते हैं कि धूर्त राजनीतिक पार्टियां ऐसा हरगिज नहीं होने देंगी किंतु उन्हें मालूम नहीं है कि यह आग धीरे-धीरे उनके दरवाजे तक भी पहुंच जाएगी! उस दिन क्या होगा, जब उनका अपना लड़का या लड़की किसी शैक्षणिक संस्थान की छत से कूद कर जान देगा?

जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबको दलितों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या को हल करने में ठोस कार्य करना चाहिए। कम से कम इस विचार के पक्ष में वातावरण तो तैयार करना ही चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा हकीम खाँ से लड़ना नहीं चाहता था अकबर (70)!

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मिर्जा हकीम खाँ

मिर्जा हकीम खाँ (Mirza Hakim Khan) काबुल का शासक था और वह अकबर का सौतेला भाई (Step Brother of Shahanshah Akbar) था। उसका पूरा नाम मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ था और वह अकबर के पिता हुमायूँ (Humayun) की दूसरी पत्नी चूचक बेगम का पुत्र था। चूचक बेगम (Chuchak Begum) हुमायूं के साथ भारत नहीं आई थी, वह काबुल के दुर्ग में रहा करती थी।

जब अकबर उज्बेगों और अपने सेनापति आसफ खाँ की बगावत से निबटने में लगा था, तब काबुल के शासक मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ एवं संभल के शासक मिर्जा मुहम्मद सुल्तान तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा ने भी अलग-अलग दिशाओं से अकबर के राज्य पर हमला करके अकबर के लिए नए संकट खड़े कर दिए।

हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकी को समझाया कि काबुल पर अधिकार करने की बजाय पंजाब पर अधिकार करना सरल है क्योंकि अकबर अपने ही अमीरों की बगावत में उलझा हुआ है। मिर्जा हकीम खाँ अपनी माता चूचक बेगम की तरह अस्थिर बुद्धि का इंसान था।

इसलिए वह अपने मामा की बातों में आ गया। कहाँ तो वह अकबर की शरण लेने के उद्देश्य से भारत जा रहा था और कहाँ अब वह अकबर के राज्य पर ही चढ़ बैठा। ठीक उसी समय खुशखबर खाँ नामक एक अमीर मिर्जा हकीम खाँ की सेवा में हाजिर हुआ।

खुशखबर खाँ को अकबर (Akbar) ने ही मिर्जा हकीम खाँ के पास रुपया, सामान, खिलअत और खास घोड़ा देकर रवाना किया था ताकि मिर्जा हकीम खाँ को संकट की इस घड़ी में दिलासा दी जा सके क्योंकि मिर्जा हकीम खाँ को उसके ससुर एवं सौतेले चाचा मिर्जा सुलेमान ने काबुल से बाहर निकाल दिया था।

अकबर ने हकीम खाँ से कहलवाया था कि वह चिंता न करे, पंजाब से कुछ सूबेदारों को काबुल के लिए भेजा जा रहा है ताकि मिर्जा सुलेमान का दमन किया जा सके।

जब मिर्जा हकीम खाँ ने सुना कि खुशखबर खाँ बादशाह का संदेश लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम ने शाही परम्परा के अनुसार अपने शिविर से बाहर आकर बादशाह का पत्र ग्रहण किया।

 मिर्जा हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकीम को सलाह दी कि वह खुशखबर खाँ को बंदी बना ले किंतु मिर्जा हकीम खाँ ने खुशखबर खाँ से बादशाह का संदेश लेने के बाद उसे राजी-खुशी विदा कर दिया।

जब खुशखबर खाँ चला गया तब सुल्तान अली एवं हसन खाँ नामक कुछ अमीर काबुल से सेनाएं लेकर आ गए। उन्हें मिर्जा हकीम खाँ ने लाहौर पर आक्रमण करने के लिए बुलाया था। अब हकीम खाँ ने सिंधु नदी पार की तथा लाहौर की तरफ चल पड़ा। उसके आदमियों ने भेड़ा के पास लूटमार की।

जब यह खबर पंजाब के अधिकारियों को मिली तो मीर मुहम्मद खाँ, कुतुबुद्दीन खाँ और शफी खाँ ने मिलकर लाहौर दुर्ग की मोर्चाबंदी की। हकीम खाँ ने लाहौर पर हमला किया किंतु वह कई दिनों की घेराबंदी के बाद भी लाहौर को नहीं ले सका।

उधर जब अकबर को मिर्जा हकीम खाँ की इस हरकत के बारे में पता लगा तो वह हैरान रह गया! उस समय बादशाह आगरा में ही था। उसने खानखाना मुनीम खाँ को आगरा में नियुक्त किया तथा 17 नवम्बर 1566 को स्वयं एक सेना लेकर दिल्ली होता हुआ पंजाब के लिए चल पड़ा।

अकबर को आगरा से दिल्ली पहुंचने में 10 दिन का समय लगा। इस बीच उसने बहुत सा समय शिकार खेलने में व्यय किया। दिल्ली में भी वह मुस्लिम दरवेशों की दरगाहों के दर्शन करने में व्यस्त हो गया। वह मुताल्लिकों को खैरात बांटता रहा तथा हुमायूँ की कब्र (Tomb of Humayun) पर जाकर सजदे करता रहा।

अकबर द्वारा आगरा से रवाना होकर पंजाब पहुंचने में लगाया जा रहा विलम्ब अकारण नहीं था। वस्तुतः वह अपने सौतेले भाई हकीम मुहम्मद खाँ से लड़ना नहीं चाहता था, अपितु उसे भयभीत करके भगा देना चाहता था।

उधर जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ लाहौर पर अधिकार नहीं कर सका और उसने सुना कि बादशाह अकबर स्वयं ही एक विशाल सेना लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम खाँ की हिम्मत जवाब दे गई। वह लाहौर छोड़कर सिंधु नदी की तरफ भागा।

जब अकबर अपनी सेना लेकर सतलुज नदी के किनारे पहुंचा तो उसे सूचना मिली कि मिर्जा हकीम खाँ लाहौर छोड़कर भाग गया। अकबर यही चाहता था। फिर भी वह धीमी गति से लाहौर की तरफ बढ़ता रहा। फरवरी 1567 के अंत में वह लाहौर पहुंचा। इस प्रकार उसने आगरा से लाहौर पहुंचने में साढ़े तीन महीने लगा दिए।

 लाहौर पहुंचकर अकबर ने लाहौर दुर्ग की रक्षा करने वाले मुगल अधिकारियों को पुरस्कृत किया तथा लाहौर के निकटवर्ती जंगलों में जी भरकर शिकार खेला। बादशाह ने एक सेना मिर्जा हकीम खाँ के पीछे भेजी ताकि मिर्जा हकीम सिंधु नदी पार करके भारत की भूमि से चला जाए।

मिर्जा हकीम के लिए अब भारत में कोई काम नहीं था। इसलिए वह सिंधु को पार करके घोरबंद की तरफ बढ़ने लगा। वहाँ जाकर उसे ज्ञात हुआ कि उसका ससुर मिर्जा सुलेमान और सास हरम बेगम काबुल की घेराबंदी उठाकर बदख्शां भाग गए हैं। संभवतः मिर्जा सुलेमान को यह गलत सूचना दी गई थी कि मिर्जा हकीम खाँ भारत से अकबर की सेना लेकर आ रहा है। उसके भागने का एक कारण यह भी था कि उसके घोड़ों में रोग फैल जाने से वे बड़ी तेजी से मरने लगे।

मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) इतनी आनन-फानन में काबुल का घेरा छोड़कर भागा कि उसकी कुछ जवान पुत्रियां काबुल के शिविर में ही छूट गईं। काबुल की सेना ने उन्हें घेर लिया किंतु काबुल की सेना ने उनके साथ आदर का व्यवहार किया क्योंकि वे काबुल के शासक मिर्जा हकीम खाँ की बेगम की सगी बहिनें थीं। वह बिना किसी विघ्न के काबुल पहुंच गया और अपने बाप-दादा की राजधानी में फिर से प्रतिष्ठित हो गया।

जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा (Muhammad Sultan Mirza) तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा (Ulug Mirza) को ज्ञात हुआ कि बादशाह अकबर मिर्जा हकीम खाँ से लड़ने लाहौर (Lahore) जा रहा है तो वे संभल से दिल्ली आ गए तथा दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से लूटपाट करने लगे। बादशाह अकबर खानखाना मुनीम खाँ को आगरा की रक्षा पर नियत करके गया था किंतु मुनीम खाँ को आगरा छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। मिर्जा लोग खानखाना से लड़ने की बजाय माण्डू (Mandu) की ओर भाग गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर के परबाबा का नाम मिर्जा उमरशेख था जो फरगना का शासक था। संभल से आकर दिल्ली में उत्पात मचाने वाले मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के परबाबा का पिता भी यही उमर शेख था। इस प्रकार अकबर तथा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा आपस में चाचा-भतीजा लगते थे।

अकबर अपने इस भतीजे से बड़ा स्नेह करता था किंतु भतीजे ने अपने चाचा के स्नेह का कोई मूल्य नहीं समझा तथा राज्य के लालच में बगावत करके अपनी जागीर से भी वंचित हो गया।

अकबर की तरह उसका पिता हुमायूँ भी अपने खानदान के शहजादे मुहम्मद सुल्तान मिर्जा से बहुत प्रेम करता था। मिर्जा सुल्तान ने हुमायूँ (Humayun) से भी कई बार बगावत की थी किंतु हुमायूँ ने मिर्जा सुल्तान को हर बार क्षमा करके अपने पास ही रखा था।

मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के कई बच्चे हुए थे। उसके बहुत से बच्चों का जन्म तो मुहम्मद सुल्तान मिर्जा की वृद्धावस्था में हुआ था। उसके पुत्रों में उलूग मिर्जा, इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA), मुहम्मद हुसैन मिर्जा, मसऊद मिर्जा, आकिल मिर्जा आदि के नाम मिलते हैं।

अकबर ने उन सब मिर्जाओं के भरण-पोषण के लिए संभल की जागीर दे रखी थी। अकबर ने मिर्जा सुल्तान के पुत्र-पौत्रों को यह अधिकार दे रखा था कि युद्ध-क्षेत्र में वे अकबर के हाथी अथवा घोड़े के चारों ओर रहकर युद्ध किया करें।

जौनपुर के अभियान में भी ये सारे मिर्जा, अकबर (Badshah Akbar) के चारों ओर रहे थे किंतु उनमें से कोई भी अकबर से प्रेम नहीं करता था। वे सब राज्य और सम्मान के भूखे थे। प्रेम की भूख उन्हें शायद ही सताती थी।

वस्तुतः मुगलिया-राजनीति में प्रेम का मूल्य बहुत कम था। निकटतम व्यक्ति से लेकर अनजान व्यक्ति तक कोई भी, कभी भी, कहीं भी, राज्य तथा सम्पत्ति के लालच में किसी भी सम्बन्ध को विच्छेद कर सकता था। किसी को भी मार सकता था। किसी का भी सर्वस्व हरण कर सकता था। तैमूर लंग (TIMUR LANG) से लेकर बाबर (BABUR)  तक ने भी यही किया था और अब उनके वंशज भी यही सब कर रहे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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