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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया है। आज की दुनिया जो व्यक्ति डिजिटल क्रांति से असंपृक्त रहेगा, वह शीघ्र ही अपने आप को अशिक्षित व्यक्ति की तरह अनुभव करेगा।

वर्ष 1983 में जब इंटरनेट की औपचारिक शुरुआत हुई थी, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि मात्र 43 वर्षों की अल्प अवधि में हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उस मोड़ पर खड़े होंगे जहाँ मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगेंगी। आज 2026 में, हमारा जीवन भौतिक जगत से कहीं अधिक डिजिटल जगत में बीत रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ई-कॉमर्स वेबसाइट्स और एआई टूल्स अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस तकनीक के साथ हमारा रिश्ता कैसा है? क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या तकनीक हमारा उपयोग कर रही है?

डिजिटल क्रांतिएक महा-परिवर्तन की आहट

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले पाँच साल पूरी मानव सभ्यता को पूरी तरह बदल कर रख देंगे। तकनीक की गति इतनी तीव्र है कि यदि हमने समय के साथ खुद को नहीं बदला, तो हम न केवल पीछे छूट जाएंगे, बल्कि दूसरों के ज्ञान और एल्गोरिदम (Algorithm) के अधीन होकर रह जाएंगे। आज ‘डिजिटल साक्षरता’ से आगे बढ़कर ‘डिजिटल दक्षता’ हासिल करना अनिवार्य हो गया है, ताकि हम खुद को असहाय महसूस न करें।

डिजिटल क्रांति क्या है? (Understanding Digital Revolution)

‘डिजिटल क्रांति’ का अर्थ केवल इंटरनेट चलाना या सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है— नियंत्रण। अर्थात्  जब हम सोशल मीडिया के स्वभाव (Psychology) को समझकर उसे अपने लाभ के लिए उपयोग करते हैं।

  • जब हम प्लेटफॉर्म्स के द्वारा नियंत्रित होने के बजाय, उन्हें निर्देश देते हैं कि वे आपके लिए क्या काम करें।
  • जब तकनीक हमारी उत्पादकता बढ़ाती है, न कि हमारा समय बर्बाद करती है।

संक्षेप में, हमारे लिए, अपनी शर्तों पर डिजिटल संसाधनों का उपयोग करना ही वास्तविक डिजिटल क्रांति है।

डिजिटल क्रांति : एक नई दृष्टि की शुरुआत

एक लेखक और इतिहासकार के रूप में, मैं वर्ष 1995 से कंप्यूटर पर कार्य कर रहा हूँ। मेरे दो यूट्यूब चैनल हैं-

ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्टोरीज फ्रॉम हिन्दू धर्म (हिन्दू धर्म की कथाएँ)

मेरी तीन वैबसाइट्स भी हैं जिन पर मैं विगत लगभग 15 वर्षों से काम कर रहा हूँ-

भारत का इतिहास डॉट कॉम

राजस्थान हिस्ट्री डॉट कॉम

मोहनलाल गुप्ता डॉट कॉम

मैं फेसबुक, इंस्टाग्राम व ‘एक्स’ (Twitter) जैसे सभी प्रमुख मंचों पर उपस्थित हूँ। मुझे लगता था कि मैं तकनीक को अच्छी तरह समझता हूँ।

मेरी इस धारणा का कारण यह था कि जब मैं इन प्लेटफॉम्स पर काम करने लगा तो मेरे दोनों यूट्यूब चैनल बहुत जल्दी मॉनेटाइज्ड हो गए, एक चैनल पर तो 2 लाख से अधिक सब्सक्राइबर बन गए, आमदनी भी अच्छी होने लगी।

इसी तरह मेरी वैबसाइट्स पर भी  प्रतिदिन 1000-1500 विजिर्ट्स आने लगे किंतु कुछ ही वर्षों में मेरे यूट्यूब चैनल और वैबसाइट्स पर तेजी से विजिटर्स घटने लगे और आज स्थिति यह है कि एक चैनल डीमॉनेटाइज्ड हो गया है, दूसरे चैनल पर मुश्किल से हजार- डेढ़ हजार व्यूअर्स आते हैं, वैबसाइट्स पर तो लगभ 100-150 विजिटर्स ही प्रतिदिन आ रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ, मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया।

गैप कहाँ है?

  1. प्लेटफॉर्म का स्वभाव: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अपना एक ‘कैरेक्टर’ और एल्गोरिदम होता है। इसे समझे बिना वहां सफल होना असंभव है।
  2. दक्षता में वृद्धि: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि एआई टूल्स और सही डिजिटल रणनीतियों के माध्यम से हम अपने दैनिक कार्यों की गति को 10 गुना तक बढ़ा सकते हैं।
  3. सिस्टम बनाम मेहनत: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि डिजिटल दुनिया में ‘हार्ड वर्क’ से ज्यादा ‘स्मार्ट सिस्टम’ मायने रखता है।
  4. कंटेंट की शक्ति: मैं इस बात को समझने में असफल रहा कि कैसे अपने ज्ञान को डिजिटल एसेट (Digital Asset) में बदला जा सकता है।

डिजिटल टूल्स का उपयोग क्यों आवश्यक !

आज की दुनिया में ज्ञान ही शक्ति है, लेकिन वह ज्ञान बेकार है जो दूसरों तक सही तरीके से न पहुँचे। डिजिटल माध्यम हमें यह अवसर देते हैं कि हम अपने क्षेत्र में नॉलेज लीडर’ (Knowledge Leader) बनें।

  • यदि हम शिक्षक हैं, तो आप पूरी दुनिया को पढ़ा सकते हैं।
  • यदि हम लेखक हैं, तो आपकी पहुँच करोड़ों पाठकों तक हो सकती है।
  • यदि हम उद्यमी हैं, तो आपका बाजार भौगोलिक सीमाओं से मुक्त है।
  • यदि हम डॉक्टर हैं तो डिजिटल माध्यमों से अधिक रोगियों तक पहुंच सकते हैं।

डिजिटल क्रांति : आर्थिक स्वावलंबन और घर बैठे करियर

एक बहुत बड़ा मिथक है कि कमाई के लिए केवल पारंपरिक नौकरी ही एकमात्र विकल्प है। डिजिटल आजादी हमें यह सामर्थ्य देती है कि हम अपने हुनर को ऑनलाइन ले जाएं। सही टूल्स और मार्केटिंग की समझ हो, तो व्यक्ति घर बैठे न केवल अपने परिवार का सम्मानजनक भरण-पोषण कर सकता है, बल्कि दूसरों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो अपनी स्वतंत्रता से समझौता किए बिना आर्थिक उन्नति चाहते हैं।

क्या हम तैयार हैं?

तेजी से बदलती इस दुनिया में दो ही विकल्प हैं: या तो बदलाव के शिकार बनें या बदलाव के सारथी। डिजिटल एज्यूकेशन की राह हमें सशक्त बनाती है, हमें वैश्विक मंच प्रदान करती है और सबसे महत्वपूर्ण— हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है।

हम भी इस तकनीक के युग में पीछे छूटने के खतरे को पहचान पा रहे हैं? याद रखिए, आने वाले 5 साल नए सिरे से हमारे जीवन की दिशा तय करेंगे। स्वयं को तैयार करें, शिक्षित करें और डिजिटल रूप से आजाद बनें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स तक, कोई भी डिकोड नहीं कर सका। आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसे पढ़ना नामुमकिन बना हुआ है?

क्या धरती पर कभी किसी ने ऐसी औरतें देखी हैं जिनकी नसें हरे रंग की हैं और जो निर्वस्त्र होकर नीले पानी में नहाती हैं? संभवतः ज्ञात सभ्यताओं के किसी भी कालखण्ड के इतिहास में ऐसी औरतों का उल्लेख नहीं है किंतु आज से छः सौ साल पहले लिखी गए एक रहस्यमयी किताब में इन औरतों के चित्र बने हुए हैं। इन औरतों के बारे में कुछ लिखा भी गया है किंतु क्या लिखा गया है, इसे कोई नहीं पढ़ सका। यह एक ऐसी किताब है, जिसके पन्ने पलटते ही हम एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाते हैं जो हमारी धरती जैसी तो लगती है, लेकिन है नहीं।

इतिहास के सीने में दबे अनगिनत रहस्यों को विज्ञान ने सुलझा लिया है, कुछ को समय ने धुंधला कर दिया है, लेकिन एक रहस्य ऐसा है जिसने सदियों से इंसानी दिमाग को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।

आज मैं बात कर रहा हूँ वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  (Voynich Manuscript) की। यह 240 पन्नों की एक पुरानी डायरी जैसी लगती है किंतु दुनिया की सबसे रहस्यमयी किताब है।

एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स तक, कोई भी डिकोड नहीं कर सका। आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसे पढ़ना नामुमकिन बना हुआ है?

धूल भरे पुस्तकालय से दुनिया के सामने तक का सफर

इस किताब की आधुनिक खोज की कहानी भी किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है। साल 1912 में, पोलिश-अमेरिकी मूल के पुरानी किताबों के एक व्यापारी, विल्फ्रिड वॉयनिच (Wilfrid Voynich), इटली में रोम के पास स्थित ‘विला मोंड्रागोन’ नामक एक पुराने कैथोलिक कॉलेज के पुस्तकालय में दुर्लभ किताबें खंगाल रहे थे।

धूल से सने संदूकों के बीच, उनकी नज़र एक अजीबोगरीब किताब पर पड़ी। इसका कवर बिल्कुल सादा था—न कोई नाम, न लेखक का पता। जिज्ञासावश जब वॉयनिच ने इसे खोला, तो वह सन्न रह गए। पन्नों पर जो लिपि लिखी थी, वह न तो लैटिन थी, न ग्रीक, न अरबी और न ही दुनिया की कोई अन्य ज्ञात भाषा। यह एक पूरी तरह से अज्ञात लिपि थी, जिसके साथ अजीबोगरीब चित्र बने थे। वॉयनिच ने इसे तुरंत खरीद लिया और अपनी पूरी ज़िंदगी इस किताब का रहस्य सुलझाने में लगा दी। उन्हीं के सम्मान में आज इसे ‘वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट’ कहा जाता है।

कोलंबस से भी पुरानी: क्या कहती है साइंस?

दशकों तक विद्वानों का मानना था कि यह किताब शायद 16वीं या 17वीं सदी में लिखी गई होगी। लेकिन साल 2009 में, यूनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के वैज्ञानिकों ने इस किताब के पन्नों (जो जानवरों की खाल से बने कागज ‘वेलम’ पर लिखे गए हैं) की रेडियो-कार्बन डेटिंग की।

नतीजे चौंकाने वाले थे। परीक्षणों से पता चला कि यह किताब 1404 से 1438 के बीच लिखी गई थी। इसका मतलब यह है कि यह किताब क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज किए जाने से भी लगभग सदी भर पहले अस्तित्व में थी।

इस किताब का ऐतिहासिक सफरनामा भी काफी दिलचस्प है। दस्तावेजों के अनुसार, 16वीं सदी में यह किताब बोहेमिया के सम्राट रूडोल्फ द्वितीय के पास थी, जिन्होंने इसे 600 सोने के सिक्कों (आज के हिसाब से लाखों डॉलर) में खरीदा था। राजा को विश्वास था कि यह 13वीं सदी के मशहूर दार्शनिक और जादूगर ‘रोजर बेकन’ की कृति है। इसके बाद यह किताब कई विद्वानों और कीमियागरों के हाथों से गुजरती हुई अंततः रोम के उस अंधेरे तहखाने में गुम हो गई, जहाँ इसे वॉयनिच ने ढूँढ निकाला।

एक अकल्पनीय दुनिया: वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के अंदर क्या है?

अगर आपको लगता है कि इस किताब की केवल भाषा ही अजीब है, तो इसके चित्रों को देखकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। मैन्युस्क्रिप्ट के हाई-रेज़ोल्यूशन स्कैन देखने पर पता चलता है कि 240 पन्नों की इस किताब को चित्रों के आधार पर 6 मुख्य भागों में बांटा जा सकता है। हर भाग अपने आप में एक अलग और पेचीदा पहेली है।

  1. हर्बल सेक्शन (वनस्पति विज्ञान): यह किताब का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसमें 113 अलग-अलग प्रकार के पौधों और वनस्पतियों के चित्र बने हैं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी पौधा हमारी पृथ्वी पर पाए जाने वाले किसी भी ज्ञात पौधे से पूरी तरह मेल नहीं खाता। यह ऐसे पौधे हैं जो या तो किसी की गहरी कल्पना से उपजे हैं, या फिर किसी ऐसी जगह के हैं जिसे हम नहीं जानते।
  2. एस्ट्रोनॉमिकल सेक्शन (खगोल विज्ञान): इस हिस्से में सितारों, सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों के गोलाकार चार्ट बने हैं। इनमें राशि चक्र (Zodiac) के चिह्न भी दिखाई देते हैं। लेकिन इन नक्षत्रों के बीच अजीबोगरीब आकृतियां हैं, जैसे धनु या वृषभ राशि के चिह्नों के इर्द-गिर्द ऐसी महिलाओं के चित्र बने हैं जो तारों से बंधी हुई प्रतीत होती हैं।
  3. बायोलॉजिकल सेक्शन (जीव विज्ञान): यह पूरी किताब का सबसे विचित्र हिस्सा माना जाता है। इसमें कई नग्न महिलाओं के चित्र हैं, जो हरे और नीले रंग के रहस्यमयी तरल पदार्थों से भरे कुंडों (Pools) में तैर रही हैं या नहा रही हैं। उनके शरीर से अजीब से पाइप, कैप्सूल और नलियां जुड़ी हुई हैं, जो इंसानी नसों (Blood vessels) जैसी दिखती हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे कीमिया (Alchemy) का कोई गुप्त फॉर्मूला मानते हैं, तो कुछ इसे मानव शरीर के आंतरिक तंत्र का रहस्यमयी चित्रण।
  4. कॉस्मोलॉजिकल सेक्शन (ब्रह्मांड विज्ञान): इसमें बड़े-बड़े फोल्ड-आउट (खुलने वाले) पन्ने हैं। एक पन्ना तो 6 सामान्य पन्नों के बराबर बड़ा है, जिसमें ज्वालामुखी, प्राचीन महल और नौ ग्रहों जैसी आकृतियां बनी हैं। इसमें बने महल और दीवारें इटली के कुछ प्राचीन किलों से मिलते-जुलते हैं, जो एक इशारा देते हैं कि शायद किताब इटली या उसके आस-पास ही कहीं लिखी गई थी।
  5. फार्मास्युटिकल सेक्शन (औषधि विज्ञान): यहाँ विभिन्न पौधों की जड़ों, पत्तियों और अजीब सी बोतलों के चित्र बने हैं। ऐसा लगता है जैसे यह प्राचीन काल के किसी वैद्य की रहस्यमयी दवाइयां बनाने की रेसिपी बुक हो।
  6. रेसिपीज़ (विधियां): किताब के अंत में बिना चित्रों वाले सिर्फ टेक्स्ट (लिखावट) के पन्ने हैं, जिनके किनारे फूल और तारे बने हैं। इसे देखकर लगता है कि यह कोई निर्देशिका या जादुई मंत्रों की सूची है।

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  कोड जिसे कोई तोड़ न सका

चित्रों के अलावा इस किताब की असली जानलेवा पहेली है इसकी भाषा… जिसे वॉयनिचीज़’ (Voynichese) कहा जाता है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुश्मनों के सबसे जटिल कोड तोड़ने वाले महारथी, जैसे विलियम फ्राइडमैन (जिन्होंने जापान के प्रसिद्ध ‘पर्पल कोड’ को क्रैक किया था)—वे भी वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के सामने बेबस नज़र आए।

लेकिन क्या यह सिर्फ एक पागलपन भरी चित्रकारी है? भाषा विज्ञानियों (Linguists) के अध्ययन कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। उन्हों भाषा विज्ञानियों ने पाया कि वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट  की भाषा ज़िपफ के नियम’ (Zipf’s Law) का कड़ाई से पालन करती है। ‘ज़िपफ का नियम’ कहता है कि किसी भी प्राकृतिक भाषा में, सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द, दूसरे सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्द से दोगुना आता है, और इसी क्रम में आगे बढ़ता है।

इसका मतलब है कि वॉयनिच का टेक्स्ट कोई बेतरतीब लिखावट नहीं है। इसमें स्वर (Vowels) और व्यंजन (Consonants) का एक निश्चित पैटर्न है। शब्दों की लंबाई बिल्कुल वैसी है जैसी अंग्रेजी या लैटिन में होती है। लिखने वाले ने बिना किसी गलती, बिना किसी काट-छांट के, बाएं से दाएं, एक दम सधे हुए हाथों से इसे लिखा है। अगर यह कोई झूठी भाषा होती, तो इसे इतनी परफेक्शन और निरंतरता के साथ लिखना एक इंसान के लिए लगभग नामुमकिन है।

सच या धोखा? प्रमुख थ्योरीज़

सदियों से वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट के रहस्य को सुलझाने के लिए कई थ्योरीज़ (सिद्धांत) सामने आई हैं:

  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 1: एलियन या दूसरी दुनिया का ज्ञान: चूंकि इसमें छपे पौधे और तारामंडल हमारी दुनिया से मेल नहीं खाते, कई कॉन्स्पिरेसी थ्योरिस्ट मानते हैं कि यह किसी परग्रही सभ्यता का ज्ञान है जो गलती से धरती पर छूट गया, या किसी इंसान ने एलियंस के संपर्क में आकर इसे लिखा।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 2: एक मध्ययुगीन धोखा (The Great Hoax): कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसे जानबूझकर केवल पैसे कमाने के लिए बनाया गया था। चूंकि सम्राट रूडोल्फ द्वितीय दुर्लभ और जादुई चीज़ों के दीवाने थे, शायद एडवर्ड केली नाम के एक मशहूर धोखेबाज़ ने अपने साथी जॉन डी के साथ मिलकर यह झूठी किताब रची, ताकि राजा को बेवकूफ बनाकर मोटी रकम ऐंठी जा सके।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 3: महिलाओं का स्वास्थ्य और सीक्रेट कोड: हाल ही में कुछ शोधकर्ताओं ने दावा किया कि यह किताब कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि
  •  वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट महिलाओं के स्वास्थ्य, गर्भावस्था और हर्बल मेडिसिन की एक एनसाइक्लोपीडिया है। Nuns ने अपनी जानकारियों को चर्च की आंखों से छिपाने के लिए इसे सीक्रेट कोड में लिखा।
  • वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरी 4: ऑटो-कॉपी या कार्डन ग्रिल मेथड: कुछ लोगों का मानना है कि यह वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट थ्योरीएक ‘माइक्रोग्राफिक’ साइफर है। हर अक्षर को एक जटिल जाली (Grille) के ज़रिए बदल दिया गया है, जिसे डिकोड करने की चाबी (Key) इतिहास में कहीं खो चुकी है।

तकनीक हार गई, वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट का रहस्य बरकरार

आज वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट अमेरिका की प्रतिष्ठित येल यूनिवर्सिटी (Yale University) की ‘बायनेकी रेयर बुक एंड मैन्युस्क्रिप्ट लाइब्रेरी’ में एक शीशे के सुरक्षित बॉक्स (वॉल्ट) के अंदर रखी हुई है। हालांकि, इसका पूरा पीडीएफ इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध है, जिसे दुनिया भर के लाखों एमेच्योर जासूस, हैकर्स और एआई सिस्टम रोज़ाना क्रैक करने की कोशिश कर रहे हैं।

हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां हमने ब्लैक होल की तस्वीर खींच ली है, इंसानी डीएनए का नक्शा बना लिया है, और मंगल ग्रह पर रोवर भेज दिए हैं। लेकिन यह एक बड़ी विडंबना है कि हमारे सारे सुपरकंप्यूटर और आधुनिक विज्ञान मिलकर भी 600 साल पहले एक इंसान के हाथ से लिखी गई इस 240 पन्नों की किताब के सामने असहाय हैं।

हमें याद दिलाती है कि हमारी तमाम तकनीकी तरक्की के बावजूद, इतिहास ने अभी भी अपने कुछ राज़ हमारे लिए छुपा कर रखे हैं। शायद एक दिन कोई जीनियस वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट कोड को तोड़ दे… या शायद, इसे कभी पढ़ा ही नहीं जा सकेगा।

क्या आपको लगता है कि वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट में किसी अकल्पनीय खज़ाने या ज्ञान का राज़ छिपा है, या यह महज़ सदियों पुराना एक बहुत ही चालाकी से बुना गया मज़ाक है? रहस्य अभी भी बरकरार है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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एनीमल फार्म: ऐ फेयरी स्टोर

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

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पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया? आखिर क्या था उस विमान का ऐसा रहस्य जिसके कारण मर्यादा पुरुषोत्तम ने जो विमान विभीषण से प्राप्त किया था, वह विभीषण को लौटाने के स्थान पर किसी और को दे दिया।

जब भगवान श्रीराम लंका नरेश रावण को मारकर अयोध्या लौटे तो विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान दिया था ताकि भगवान समयावधि के भीतर अयोध्या पहुंच सकें। इस विमान की सहायता से भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और जनकनंदिनी सीता के साथ बहुत कम अवधि में लंका से अयोध्या पहुंच गये थे।

पुष्पक विमान का इतिहास

वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि यह विमान मन की गति से चलता था और यात्रियों के संख्या के अनुसार इसका आकार बदला जा सकता था। अनेक पुराणों, महाकाव्यों और अगस्त्य संहिता आदि में पुष्पक विमान का वर्णन किया गया है।

कुछ पुराणों के अनुसार इस विमान का निर्माण देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिए किया था जबकि कुछ अन्य पुराणों के अनुसार स्वयं ब्रह्माजी ने इसे सूर्य की चमक से निर्मित किया था और इसे अपनी शक्ति का प्रतीक माना था। इस प्रकार ब्रह्माजी पुष्पक विमान के सबसे पहले इसके स्वामी थे।

यह विमान जल, थल और आकाश तीनों स्थानों पर चल सकता था और किसी भी मौसम में चलने में सक्षम था। यह सोने और रत्नों से सुसज्जित था। इसमें ऊँचे खंभे, सुंदर गलियारे और सुगंधित कक्ष थे। इसकी आकृति एक विशाल हंस की तरह थी।

जब ब्रह्माजी ने कुबेर को यक्षों का राजा बनाया तथा उत्तर दिशा का लोकपाल नियुक्त किया तब देवताओं ने कुबेर को अपने कोष का अध्यक्ष भी बना दिया। इस पर ब्रह्माजी ने कुबेर को अपना पुष्पक विमान भी दे दिया।
यक्षराज कुबेर समुद्र के बीच में एक सुरक्षित नगरी बनाकर रहने लगा। इसे लंका कहा जाता था। देवताओं का समस्त स्वर्ण इसी नगरी में सुरक्षित रखा गया।

जब रावण ने ब्रह्माजी से बल प्राप्त करके राक्षसों का नेतृत्व प्राप्त किया, तो उसने अपने सौतेले भाई कुबेर पर आक्रमण कर दिया। कुबेर अपने यक्षों सहित लंका से भाग निकला और हिमालय में अलका पुरी बसाकर रहने लगा।
इस प्रकार रावण ने कुबेर की लंका, देवताओं के समस्त धन और विमान पर अधिकार कर लिया। रामचरित मानस में लिखा है-

एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।

इसी विमान में बैठकर रावण ने स्वर्ग पर धावा बोल दिया। देवता रावण को नहीं जीत सके और स्वर्ग से निकल गए।
एक दिन जब रावण पुष्पक विमान में बैठकर लंका से स्वर्गलोक जा रहा था, तब उसने रंभा को आकाश मार्ग में विचरण करते हुए देखा।

पुष्पक विमान में अत्याचार

रावण ने रंभा के बल पर आसक्त होकर उसे बलपूर्वक उठाकर पुष्पक विमान में बैठा लिया। रंभा स्वर्ग की अप्सरा था और कुबेर के पुत्र नलकूबर की पत्नी के रूप में रहती थी। इसलिए रंभा ने रावण से कहा कि आप मेरे पिता के समान हैं, आपको यह शोभा नहीं देता किंतु रावण ने रंभा के साथ बलात्कार किया।

जिन दिनों भगवान श्रीराम जनकनंदिनी सीता और लक्ष्मणजी के साथ पंचवटी में निवास कर रहे थे, तब रावण जनकनंदिनी सीता का अपहरण करके इसी पुष्पक विमान में बैठाकर लंका ले आया था। इस प्रकार जो विमान ब्रह्माजी की शक्ति के रूप में बनाया गया था, वह रावण की शक्ति का प्रतीक बन गया।

जब भगवान राम दुष्ट रावण का वध करने के बाद जनकनंदिनी सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ लंका से अयोध्या लौटने लगे तब लंकेश विभीषण ने उन्हें पुष्पक विमान प्रदान किया ताकि भरतजी को दिए गए वचन के अनुसार भगवान समय सीमा में अयोध्या पहुंच सकें।

भगवान राम के साथ उनके वानर मित्र भी पुष्पक विमान में बैठ गए जिनमें हनुमानजी, राजा सुग्रीव और युवराज अंगद प्रमुख थे। अयोध्या पहुंचने के बाद श्रीराम ने पुष्पक विमान से कहा कि अब तुम कुबेर के पास चले जाआ। इस सम्बन्ध में रामचरित मानस में एक दोहा इस प्रकार कहा गया है-

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।

कुबेर ही वास्तविक अधिकारी

यहाँ आकर उस प्रश्न के उत्तर स्वतः मिल जाता है कि भगवान श्रीराम ने अयोध्या पहुंचने पर पुष्पक विमान लंकेश विभीषण को क्यों नहीं लौटाया।

चूंकि पुष्पक विमान ब्रह्माजी ने कुबेर को दिया था, इसलिए श्रीराम ने कुबेर को ही इस विमान का वास्तविक अधिकारी माना तथा पुष्पक विमान कुबेर के पास ही भेज दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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एनीमल फार्म

क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म (Animal Farm) का नाम सुना है! जी हाँ, यही वह किताब है जिसने दुनिया भर के लोगों के दिमागों में आग लगा दी थी और उन दिमागों से निकली आग में दुनिया की 45 सरकारें जलकर भस्म हो गई थीं!

एनीमल फार्म संसार की सबसे रोचक और प्रभावशाली पुस्तकों में से एक है।

जब यह किताब जनता के बीच पहुंची तो दुनिया भर के लोगों ने साम्यवादियों के लाल झण्डे फूंक दिए, सरकारों को गिरा दिया और फिर से अपने देश की वास्तविक संस्कृति के आधार पर सरकारों का गठन किया। इस प्रकार इस किताब ने दुनिया भर में साम्यवाद का जनाजा निकला दिया।

एनीमल फार्म पर बात करने से पहले यह जानना आवश्यक होगा कि ईस्वी 1917 में रूस की बोल्शेविक क्रांति (Bolshevik Revolution) के बाद दुनिया भर में लगभग 50 देशों में साम्यवादी, मार्क्सवादी और लेनिनवादी सरकारें स्थापित हुई थीं।

इन कम्युनिस्ट सरकारों के तानाशाही रवैये और जनता के उत्पीड़ ने से दुखी होकर इंगलैण्ड के एक लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने ‘एनीमल फार्म: ए फेयरी स्टोरी’ शीर्षक से एक छोटा सा उपन्यास लिखा। इस उपन्यास ने दुनिया भर के लोगों के दिमागों में आग लगा दी।

अमरीकी सरकार ने इस उपन्यास में भरी हुई कम्युनिस्ट विरोधी आग को पहचाना और इस किताब को कम्युनिज्म के विरुद्ध एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए ने इस किताब के 60 से अधिक भाषाओं में अनुवाद करवाए और उन्हें सोवियत संघ तथा उसके प्रभाव वाले समस्त कम्युनिस्ट देशों में गुप्त रूप से फैला दिया।

सीआईए ने इस किताब पर 1954 में विभिन्न भाषाओं में एनिमेटेड फिल्में भी बनवाई। इन किताबों और फिल्मों ने दुनिया भर में पूंजीवाद को नई ऑक्सीजन प्रदान की और लोगों को कम्युनिज्म के विरोध में खड़ा कर दिया।

विरोध की इस आग में दुनिया भर में स्थापित लगभग 50 कम्युनिस्ट सरकारों में से 45 सरकारें वर्ष 1989 से 1991 के बीच भस्म हो गईं।

अब दुनिया के केवल 5 देशों में आधिकारिक रूप से कम्युनिस्टों की सरकारें बची हैं जिनमें चीन, क्यूबा, लाओस, उत्तर कोरिया और वियतनाम शामिल हैं। हालांकि रूस अब आधिकारिक रूप से कम्युनिस्ट देश नहीं है किंतु रूसी सरकार का चरित्र अब भी कम्युस्टि है।

इस वीडियो में हम जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘एनीमल फार्म ए फेयरी स्टोरी’ की मूल कथा के बारे में चर्चा करेंगे।

इस उपन्यास का मूल सार यह है कि संसार में हर क्रांति अच्छे उद्देश्य के लिए होती है, किंतु जब क्रांति सफल हो जाती है तब सत्ता बुरे लोगों द्वारा हथिया ली जाती है। इसके बाद जनता को एक नए तरह का शोषण का सामना करना होता है।

जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) का उपन्यास ‘एनीमल फार्म: ए फेयरी स्टोरी’ (Animal Farm: A Fairy Story) एक व्यंग्यात्मक रूपकात्मक डिस्टोपियन कथा है, जो 17 अगस्त 1945 को इंग्लैंड में पहली बार प्रकाशित हुआ था। यह एक पशु-कथा अर्थात् बीस्ट फेबल के रूप में लिखी गई है जिसमें मानवीय गुणों वाले जानवरों की कहानी के माध्यम से ईस्वी 1917 में हुई रूसी क्रांति से लेकर सोवियत संघ के स्टालिन युग तक की घटनाओं को दर्शाया गया है।

ऑरवेल, पूंजीपति नहीं थे, एक लोकतांत्रिक समाजवादी लेखक थे किंतु उन्होंने स्पेनिश सिविल वार के अपने अनुभवों से प्रभावित होकर स्टालिनवाद की आलोचना की।

इस उपन्यास की कहानी मैनर फार्म नामक पशुओं के एक बाड़े के अंदर घूमती है।

एनीमल फार्म में बहुत से जानवर रहते हैं तथा फार्म का मालिक उनसे बहुत काम लेता है। भर पेट खाने को भी नहीं देता। इसलिए पीड़ित जानवर अपने मालिक के खिलाफ विद्रोह करते हैं, ताकि समानता, स्वतंत्रता और सुख से भरा हुआ समाज स्थापित कर सकें। इस क्रांति का नेतृत्व तीन सूअर करते हैं।

जब क्रांति सफल हो जाती है तो एनीमल फार्म सूअरों की तानाशाही के अधीन एक डिस्टोपियन राज्य में बदल जाता है। सूअरों का राज्य आदमी के शासन भी अधिक उत्पीड़न करता है। उपन्यास की थीम में क्रांतिकारी आदर्शों का भ्रष्टाचार, अधिनायकवाद का उदय, प्रचार का प्रभाव और उत्पीड़न का चक्रीय स्वभाव शामिल है। जैसे ही एनीमल फार्म से आदमी का शासन हटता है और एनीमल फार्म के भोले-भाले जानवरों की सत्ता स्थापित होती है, क्रांतिकारी नेताओं की भाषा बदलने लगी है। चूंकि अब वे सत्ताधीश हैं, इसलिए उनकी भाषा में नैतिक विरोधाभास होने लगते हैं।

इस रूपक में एनीमल फार्म के जानवर सोवियत रूस के इतिहास के प्रमुख व्यक्तियों और घटनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। सूअर कम्युनिस्ट नेतृत्व के प्रतीक हैं जबकि फार्म की घटनाएं यूएसएसआर अर्थात् सोवियत संघ की नौकरशाही के द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को दिखाती हैं।

इस उपन्यास के प्रकाशन के 80 साल बाद भी एनीमल फार्म की कहानी न केवल रूस की, अपितु संसार भर में जनता के साथ हो रहे राजनीतिक धोखे को उजागर करती है। एनीमल फार्म की कहानी का अंत एनीमल फार्म के जानवरों पर आदमी के शासन की पुनर्स्थापना के साथ होता है।

उपन्यास में दस अध्याय हैं जिसमें क्रांति और उसके परिणाम की कथा जानवरों के उत्पीड़न से लेकर मानव-तानाशाही की बहाली तक चलती है।

उपन्यास की शुरुआत मैनर फार्म से होती है, जो शराबी मनुष्य मिस्टर जोन्स के कुप्रबंधन के कारण अस्त-व्यस्त है। एनीमल फार्म के जानवरों का जीवन दयनीय हैदृ वे भूखे, थके हुए और शोषित हैं।

एनीमल फार्म का एक वृद्ध सूअर जिसे सभी ओल्ड मेजर कहते हैं, सभी जानवरों को एक सभा में बुलाता है। वास्तव में वह एक पुरस्कार प्राप्त मिडल व्हाइट सूअर है जिसका पहले का नाम विलिंगडन ब्यूटी था।

ओल्ड मेजर नामक वह बूढ़ा सूअर, एनीमल फार्म के जानवरों को मानव शासन से मुक्ति का सपना दिखाता है। ओल्ड मेजर कहता है कि सभी जानवरों की समस्याओं के मूल कारण मनुष्य हैं, जो जानवरों का शोषण करते हैं दृ दूध और अंडे चुराते हैं, जानवरों से काम करवाते हैं और अंत में जानवरों को मार देते हैं।

ओल्ड मेजर एनिमलिज्म के सिद्धांतों की व्याख्या करता है और कहता है कि आदमी की गुलामी से त्रस्त सभी जानवर एक समान हैं और उन्हें मनुष्यों से मुक्त होकर एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहां कोई शोषण न हो।

वह बूढ़ा सूअर बीस्ट्स ऑफ इंग्लैंड नामक एक क्रांतिकारी गीत गाकर जानवरों को एकजुट होने का आह्वान करता है। इस सभा के तीन दिन बाद ओल्ड मेजर की मौत हो जाती है, लेकिन उसके विचार जीवित रहते हैं।

इस उपन्यास में ओल्ड मेजर कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन का प्रतीक है, जो क्रांति की प्रेरणा प्रदान करता है। यह अध्याय जानवरों के बीच असंतोष को स्थापित करता है, जो बाद की घटनाओं की नींव रखता है।

जानवरों की सभा में विभिन्न पशु अपनी प्रकृति के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं दृ घोड़े उत्साहित हैं, मुर्गियां चिंतित हैं और सूअर विचारशील हैं।

ओल्ड मेजर की मौत के बाद, दो युवा सूअर, स्नोबॉल और नेपोलियन जानवरों का नेतृत्व संभालते हैं। वे ओल्ड मेजर की शिक्षाओं को व्यवस्थित करते हैं और एनिमलिज्म को एक दर्शन के रूप में विकसित करते हैं।

स्नोबॉल नामक सूअर बुद्धिमान है और प्रखर वक्ता है। वह जानवरों को पढ़ना-लिखना सिखाता है। जबकि नेपोलियन नामक सूअर चालाक और महत्वाकांक्षी है। वह जानवरों के पिल्लों को गुप्त रूप से एनिमलिज्म में शिक्षित करता है।

अब एनीमल फार्म के जानवर सात आज्ञाओं को अपनाते हैं, जो खलिहान की दीवार पर लिख दी जाती हैं- 1. दो पैरों पर चलने वाला दुश्मन है; 2. चार पैरों वाला या पंख वाला मित्र है; 3. कोई जानवर कपड़े नहीं पहनेगा; 4. कोई जानवर बिस्तर पर नहीं सोएगा; 5. कोई जानवर शराब नहीं पिएगा; 6. कोई जानवर दूसरे जानवर को नहीं मारेगा; 7. सभी जानवर समान हैं।

सूअर खुद को विशेष भोजन का हकदार बताते हैं, कहते हैं कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। एक रात को जब मिस्टर जोन्स शराब के नशे में होता है, जानवर विद्रोह करते हैं, उसे और जोन्स तथा उसके आदमियों को भगा देते हैं।

क्रांति सफल हो जाती है और जोन्स फार्म का नाम बदलकर एनीमल फार्म कर दिया जाता है। वे एक हरा झंडा फहराते हैं, जिसमें एक सींग और खुर का प्रतीक होता है। जीवन में सुधार आता है दृ भोजन प्रचुर है, और काम सुचारू रूप से चलने लगता है।

यह अध्याय क्रांति की शुरुआती सफलता दिखाता है, लेकिन सूक्ष्म संकेत देता है कि सूअरों में सत्ता की लालसा है। वस्तुतः यह चित्रण ईस्वी 1917 की बोल्शेविक क्रांति का प्रतिनिधित्व करता है, जहां जनता ने रूस के जार निकोलस द्वितीय को सत्ता से हटाया था।

विद्रोह के बाद, एनीमल फार्म के सभी जानवर सामूहिक रूप से काम करते हैं। स्नोबॉल समितियां बनाता है, जैसे अंडा उत्पादन समिति, जबकि नेपोलियन पिल्लों पर ध्यान केंद्रित करता है।

जब गायें दूध देती हैं, तो उसे सूअर पी जाते हैं और जब मुर्गियाँ अण्डे देती हैं तो उन्हें भी सूअर खा जाते हैं। जब एनीमल फार्म के जानवर दूध और अण्डों के बारे में पूछते हैं तो सूअर जानवरों को एनीमल फार्म पर शांति रखने की सलाह देते हैं।

एक दिन मिस्टर जोन्स और उसके सहयोगी बैटल ऑफ द काउशेड में फार्म पर हमला करते हैं, लेकिन एनीमल फार्म के जानवर उन्हें हरा देते हैं। अब तो स्नोबॉल और नेपोलियन पशुओं के वास्तविक नायक बन जाते हैं।

वस्तुतः ‘बैटल ऑफ द काउ-शेड’ 1918 के गृहयुद्ध में विदेशी हस्तक्षेप को दर्शाता है।

एनीमल फार्म के सूअर काम नहीं करते, वे केवल नेता हैं और बाकी के जानवरों के लिए निर्णय लेते हैं। जबकि दूसरी ओर बाकी के जानवर कड़ी मेहनत करते हैं।

एनीमल फार्म पर बॉक्सर नामक एक मजबूत घोड़ा है, वह सूअरों के भाषणों से प्रभावित होकर ‘आई विल वर्क हार्डर’ का संकल्प लेता है। यह अध्याय क्रांति के आदर्शों की शुरुआती परीक्षा दिखाता है, जहां समानता अभी भी मौजूद लगती है किंतु सूअरों की विशेषाधिकार शुरू हो जाते हैं।

एक दिन स्नोबॉल फार्म को आधुनिक बनाने के लिए एक पवनचक्की बनाने का प्रस्ताव रखता है, जो एनीमल फार्म के जानवरों को बिजली और सुविधाएं प्रदान करेगी।

नेपोलियन इस पवनचक्की के प्रस्ताव का विरोध करता है, जिससे सूअरों के बीच नेतृत्व को लेकर तनाव बढ़ता है।

अब नेपोलियन नामक सूअर की महत्वाकांक्षा स्पष्ट होने लगती है। एक दिन वह अपने प्रशिक्षित कुत्तों से स्नोबॉल को भगा देता है और जानवरों का एकमात्र नेता बन जाता है। वह जानवरों की सभाओं को समाप्त कर देता है और सूअरों की समिति से शासन चलाने लगता है।

इस उपन्यास में जहाँ नेपोलियन नामक सूअर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी स्टालिन का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं स्नोबॉल ट्रॉटस्की का। नेपोलियन के आदेश पर काम करने वाले कुत्ते सोवियत गुप्त पुलिस एनकेवीडी के प्रतीक हैं।

एक दिन नेपोलियन ओल्ड मेजर की खोपड़ी को धरती में से खोदकर निकालता है और जानवरों के समक्ष उसका प्रदर्शन करके स्नोबॉल को तोड़फोड़ के लिए आरोपी बनाता है।

इस सभा में नेपोलियन नामक सूअर, जानवरों से पवनचक्की बनाने के लिए कहता है और पवनचक्की से होने वाले फायदों का बखान करता है। स्क्वीलर नामक एक चालाक सूअर, एनीमल फार्म में आ रहे बदलावों को जायज ठहराता है। यह अध्याय अधिनायकवाद के उदय को दिखाता है।

अब नेपोलियन आदमियों की तरह दो पैरों पर चलने लगता है, बिस्तर पर सोने लगता है और अत्यधिक शराब पीने लगता है। वह अपनी आज्ञाओं को गुप्त रूप से बदलता है। नेपोलियन के आदेश पर एनीमल फार्म की भेड़ें फोर लेग्स गुड, टू लेग्स बैड का गीत गाने लगती हैं। ताकि जानवर नेपालियन का विरोध न करें।

पवनचक्की का निर्माण शुरू होता है, लेकिन कठिनाइयां आती हैं। जानवर पवनचक्की बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और जानवरों का जीवन कठिन होता चला जाता है, लेकिन स्क्वीलर नामक सूअर दावा करता है कि इस समय एनीमल फार्म का शासन मिस्टर जोन्स के समय से बेहतर है। वास्तव में यह रूपक सोवियत रूस के पांच-वर्षीय योजनाओं और आदर्शों के भ्रष्टाचार को दिखाता है।

जब पवन चक्की बन जाती है तो पड़ौसी फार्म के मालिक मिस्टर फ्रेडरिक हमला करते हैं और पवनचक्की को विस्फोट से नष्ट कर देते हैं। इस पर मिस्टर फ्रेडरिक तथा जानवरों के बीच युद्ध होता है जिसमें जानवर जीत जाते हैं। कुछ पशु इस युद्ध में मर जाते हैं।

एक दिन नेपोलियन, एनीमल फार्म के जानवरों से छिपकर, एनीमल फार्म के दुश्मन फ्रेडरिक से लकड़ी के लिए सौदा करता है। फ्रेडरिक एनीमल फार्म की लकड़ी ले जाता है और बदले में नकली नोट देता है। इस पर नेपोलियन इस षड़यंत्र के लिए स्नोबॉल को देशद्रोही ठहराता है जिसे कि पहले ही एनीमल फार्म से भगाया जाता है। इस प्रकार यह अध्याय युद्ध और धोखे को दर्शाता है, जहाँ फ्रेडरिक हिटलर का रूपक है और हमला मोलोटोव-रिबेंट्रॉप पैक्ट के टूटने का।

इसके बाद नेपोलियन एनीमल फार्म का शुद्धिकरण करता है और अपने विरोधी जानवरों को अपने कुत्तों से मरवा देता है। नेपोलियन आरोप लगाता है कि जानवर स्नोबॉल की साजिश में शामिल हैं, वे ही मेरा विरोध करते हैं।

अब नेपोलियन एनीमल फार्म के एंथम बीस्ट्स ऑफ इंग्लैंड पर प्रतिबंध लगा देता है। जानवर अब एक नया गीत गाने लगते हैं जिसमें नेपोलियन की स्तुति की जाती है। इस प्रकार नेपोलियन पूरी तरह डिक्टेटर बन जाता है और एनीमल फार्म की दीवारों पर लिखी गई पुरानी आज्ञाओं को मिटाकर नई आज्ञाएं लिखवाता है।

नई आज्ञाओं में कहा जाता है कि ‘ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम आर मोर इक्वल दैन अदर्स।’ इसके बाद जानवरों के कष्ट और अधिक बढ़ जाते हैं, लेकिन नेपोलियन का प्रचार अधिकारी जो कि स्क्वीलर नामक सूअर है, शासन के अच्छे होने का दावा करता है। यह चित्रण वस्तुतः 1930 के दशक के शो ‘ट्रायल्स और पर्जेस’ को दिखाता है।

एक दिन पवनचक्की तूफान में गिर जाती है। नेपोलियन इसके लिए भी स्नोबॉल को दोषी ठहराता है जबकि पवनचक्की तो घटिया निर्माण सामग्री के कारण गिरती है।

युवा सूअरों का निष्पादन होता है। मुर्गियां अंडों की जब्ती पर विद्रोह करती हैं, लेकिन भूख से दबा दी जाती हैं। यह अध्याय सोवियत की अकाल (जैसे होलोडोमोर) को दर्शाता है।

कुछ समय और बीतता है, पवनचक्की पुनर्निर्मित होती है, लेकिन उससे होने वाली आय पर केवल सूअरों का अधिकार होता है। सूअर मानवीय आदतें अपनाते हैं दृ सीधे चलना, कपड़े पहनना, शराब पीना। झंडे का रंग भी बदल जाता है। ओल्ड मेजर की खोपड़ी फिर से दफना दी जाती है। अब केवल एक आज्ञा बाकी रहती है, जो जानवरों के बीच समानता के अधिकार की जगह असमानता को दर्शाती है।

एक दिन बॉक्सर नामक घोड़ा जो कि रूस के स्टाखानो-वाइट श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है, अत्यधिक मेहनत के कारण बीमार पड़ जाता है और नेपोलियन द्वारा बेच दिया जाता है।

एक दिन नेपोलियन एनीमल फार्म के सूअरों और पड़ौसी फार्मों के मानव किसानों के लिए रात्रिभोज आयोजित करता है। वह क्रांतिकारी परंपराओं को समाप्त देता है। एनीमल फार्म का नाम वापस द मैनर फार्म कर देता है। जानवर बाहर से देखते हैं कि सूअर और मनुष्य अब एक जैसे हो चुके हैं। वे ताश खेलते हैं और पैसा हार-जीत पर लगाते हैं।

सूअरों के आदेश पर फार्म के दूसरे जानवर और अधिक काम करते हैं, उनका भोजन घटा दिया जाता है। सूअरों के मनुष्य-मित्र नेपोलियन की प्रशंसा करते हैं। यह अध्याय क्रांति के बाद जनता के साथ होने वाले पूर्ण विश्वासघात को दिखाता है, जहां सूअर और मनुष्य एक हो जाते हैं अर्थात् सोवियत रूस के कम्युनिस्ट और यूरोप के पूंजीपति एक हो जाते हैं।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच एक दिन मैनर फार्म का पुराना मालिक मिस्टर जोन्स लौट आता है और एनीमल फार्म पर फिर से कब्जा कर लेता है। इस प्रकार एक सफल क्रांति बुरे अनुभव के साथ समाप्त हो जाती है और एनीमल फार्म के जानवर फिर से पहले की तरह आदमी के निर्देशों पर काम करने लगते हैं।

एनीमल फार्म के जानवरी अब जाकर अनुभव कर पाते हैं कि सूअरों के शासन से तो आदमी का शासन बेहतर है। अर्थात् कम्युनिस्टों के शासन से पूंजीपतियों का शासन बेहतर है।

इस प्रकार यह उपन्यास समानता के भ्रष्टाचार, प्रचार की शक्ति और अधिनायकवाद को उजागर करता है। सात आज्ञाएं सोवियत संविधान की विकृति हैं। अंत में, सूअर और मनुष्य का एकीकरण सोवियत-पश्चिम संबंधों की आलोचना है। ऑरवेल राजनीतिक उद्देश्य को कलात्मक व्यंग्य से जोड़ते हैं, दिखाते हैं कि सत्ता-लोलुप नेता क्रांतियां कैसे तानाशाही में बदल देते हैं।

यदि हम इस कथानक को भारत के इतिहास की दृष्टि से देखें तो हम पाते हैं कि भारत में भी ईस्वी 1857 में एक महान् क्रांति आरम्भ हुई। इसका उद्देश्य भारत माता को विदेशियों की दासता से मुक्त करवाना था। यह क्रांति पूरे 90 साल में जाकर सफल हुई। हजारों प्रतिभावान क्रांतिनायकों ने अपना जीवन होम कर दिया। अंततः 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।

जैसा कि हर क्रांति के बाद होता है, क्रांति के महान नायक क्रांति के दौरान या तो शहीद हो गए, या फिर परिदृश्य से हटा दिए गए और क्रांति की सफलता का समस्त श्रेय कम प्रतिभा वाले लोगों को मिला। उनके हाथों में सत्ता की बागडोर आई। वे धूर्त नहीं थे किंतु चालाक अवश्य थे। उन्होंने अपने आप को कम्यूनिस्ट नहीं कहा, बड़ी चालाकी से धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी के रूप में प्रदर्शित किया।

शीघ्र ही वे चालाक लोग जिन्हें भारत की सत्ता की बागडोर मिली थी और जो स्वयं को समाजवादी कहते थे, सुविधाभोगी होने लगे। समय के साथ इन सुविधाभोगियों का लालच बढ़ने लगा। वे जनता के सुख-सुविधाओं से नहीं अपनी सुख-सुविधाओं के लिए पॉलिटिक्स का गंदा खेल खेलने लगे। और धीरे-धीरे पूरी तरह धूर्त भी बन गए।

भारत के इन नेताओं ने भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद (Secularism and socialism) शब्द ठीक उसी प्रकार बदल दिए जिस प्रकार एनीमल फार्म के अधिनायक नेपोलियन ने एनीमल फार्म की सात आज्ञाओं को बदल दिया था।

हालांकि जनता ने पिछले कुछ सालों से उन्हें सत्ता से वंचित कर रखा है किंतु वे पॉलिटिक्स का गंदा खेल खेलने से बाज नहीं आते, और सदैव इस ताक में रहते हैं कि सत्ता फिर से उनके हाथों में आ जाए।

संसार भर में हुई सफल क्रांतियों की इस क्रूर हकीकत तथा भारत की जनता के साथ हुए धोखे को समझाने के लिए मैंने इस आलेख में जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास एनीमल फार्म की कहानी का सहारा लिया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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हरम बेगम का कपट जाल

बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।

मुगल शहजादों ने अकबर के राज्य पर हमला कर दिया!

ई.1567 में अकबर (Badshah Akbar) के पुराने विश्वसनीय सेनापति आसफ खाँ (Asaf Khan) तथा उज्बेकों की बगावतें समाप्त होने के साथ ही अब अकबर के लिए समय आ गया था जब वह पूरी शक्ति के साथ चित्तौड़ एवं रणथंभौर पर कार्यवाही कर सके किंतु अभी आसफ खाँ तथा उज्बेकों का विद्रोह समाप्त भी नहीं हुआ था कि अकबर के खानदान के बहुत से शहजादों ने अकबर के विरुद्ध बगावत कर दी।

इसलिए अकबर के चित्तौड़ अभियान से पहले हमें अकबर के खानदान के शहजादों एवं मिर्जाओं द्वारा अचानक ही अकबर के राज्य पर हमला करने की घटनाओं की चर्चा करनी होगी जिनके कारण अकबर का चित्तौड़ अभियान कुछ दिन के लिए टल गया था।

पाठकों को स्मरण होगा कि कुछ समय पहले ही अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ की सहायता के लिए कुछ सेनाएं भेजी थीं जिनके कारण अकबर के चचेरे चाचा मिर्जा सुलेमान को काबुल का घेरा उठाकर बदख्शां की तरफ भाग जाना पड़ा था और अकबर के वृद्ध मंत्री कुतुबुद्दीन खाँ को मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का सलाहकार बनाया गया था।

मिर्जा हकीम खाँ बहुत ही अस्थिर मस्तिष्क का शहजादा था। उसकी परवरिश अपनी माता चूचक बेगम के हाथों में हुई थी जो स्वयं भी राज्य की लालची और अस्थिर बुद्धि की औरत थी। इसलिए मिर्जा हकीम खाँ ने अकबर द्वारा समय पर भेजी गई सहायता का मूल्य नहीं समझा तथा अकबर से कोई सम्बन्ध नहीं रखे।

बदख्शां (Badakshan) का शासक मिर्जा सुलेमान भी अस्थिर बुद्धि का व्यक्ति था। वह बार-बार काबुल से मार खाकर आता था, कुछ समय के लिए शांत होकर बैठता था किंतु थोड़े समय बाद फिर से सेना सजाकर काबुल पर अधिकार करने चल देता था। इस बार भी कुछ दिनों तक बदख्शां में बैठे रहने के बाद मिर्जा सुलेमान एक बार फिर से काबुल की ओर चल पड़ा। उसे ज्ञात हो चुका था कि बादशाह अकबर की सेनाएं वापस पंजाब जा चुकी हैं।

इस बार भी मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) ने हरम बेगम को अपने साथ लिया जो प्रायः युद्धों में जाया करती थी। जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को ज्ञात हुआ कि उसके सास-ससुर सेना लेकर आ रहे हैं तो मिर्जा सुलेमान ने मासूम नामक एक सेनापति को काबुल की रक्षा का भार सौंपा तथा स्वयं अपने प्रधानमंत्री ख्वाजा हसन नक्शबंदी के साथ घोरबंद चला गया।

कुछ ही दिनों में मिर्जा सुलेमान ने काबुल को घेर लिया। इस बीच मिर्जा सुलेमान ने हरम बेगम को घोरबंद भेजा ताकि वह मिर्जा हकीम खाँ से बात करके उसे समर्पण के लिए राजी कर सके।

हरम बेगम ने अपने संदेशवाहकों को अपने जंवाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ के पास भेजकर कहलवाया कि मैं तुम्हें अपने पुत्र से भी अधिक प्रेम करती हूँ क्योंकि तुम मेरे जंवाई हो। मेरे आने का उद्देश्य यह है कि मेरा और तुम्हारा सम्बन्ध और भी दृढ़ हो जाए। मिर्जा हकीम खाँ ने अपने कुछ संदेशवाहक अपनी सास हरम बेगम के पास भेजे ताकि वे हरम बेगम के व्यवहार तथा उसके उद्देश्य का पता लगा सकें।

हरम बेगम ने मिर्जा हकीम के दूतों का स्वागत किया तथा उनके समक्ष सौगंध खाई कि छल की कोई बात नहीं है और जैसा कहा गया है, ठीक वही होगा। जब मिर्जा के आदमियों ने बेगम की शपथ सुनी तो उन्होंने वचन दिया कि वे मिर्जा से मुलाकात करने की व्यवस्था कर देंगे।

मिर्जा हकीम के संदेशवाहकों ने हरम बेगम (Harem Begum) के पास से लौटकर मिर्जा हकीम खाँ को विश्वास दिलाया कि हरम बेगम किसी तरह का विश्वासघात नहीं करेगी। अतः बेगम से मिलने में कोई कठिनाई नहीं है।

बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि हरम बेगम कपट-जाल बिछा रही है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है किंतु मिर्जा हकीम, हरम बेगम के कपट-जाल में फंस गया और उसने काबुल से 12 कोस दूर कराबाग में हरम बेगम से भेंट करने का निश्चय किया।

जब बेगम ने देखा कि षड़यंत्र सफल होता दिख रहा है तो उसने अपने आदमी भेजकर मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) से कहलवाया कि मैंने मिर्जा हकीम खाँ को कराबाग में मिलने के लिए सहमत कर लिया है। अतः आप समय पर पहुंच कर मिर्जा हकीम खाँ को बंदी बना लें।

इस पर मिर्जा सुलेमान ने काबुल का घेरा मुहम्मद कुली सिंघाली को सौंपा और स्वयं रात में ही कूच करके कराबाग के निकट पहुंचकर एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठ गया।

जब बाकी काकशाल, मिर्जा हकीम खाँ के आगे-आगे कराबाग जा रहा था तो उसे मार्ग में एक काबुली मिला। उसने बाकी काकशाल को बताया कि मिर्जा सुलेमान एक पहाड़ी के नीचे घात लगाकर बैठा है। इस पर बाकी काकशाल मिर्जा हकीम खाँ को लेकर घोरबंद की तरफ भाग लिया।

जब मिर्जा सुलेमान को पता लगा कि मिर्जा हकीम पीछे मुड़कर भाग रहा है तो वह भी पहाड़ी से निकल आया और मिर्जा हकीम तथा उसके अमीरों का पीछा करने लगा। इस पर मिर्जा हकीम तथा उसके अमीर एक घाटी में जाकर छिप गए। मिर्जा सुलेमान निराश होकर काबुल चला गया।

ख्वाजा हसन तथा कुछ अन्य अमीरों ने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे बल्ख के शासक पीर मुहम्मद खाँ के पास जाकर सहायता मांगनी चाहिए। बाकी काकशाल ने कहा कि मिर्जा हकीम खाँ को बादशाह अकबर के पास जाकर उससे सहायता मांगनी चाहिए।

इस पर ख्वाजा हसन तथा उसके पक्ष के अमीर बल्ख चले गए और बाकी काकशाल मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ को लेकर भारत के लिए रवाना हो गया। ये लोग घोरबंद से ईसा, बहरा, जलालाबाद और पेशावर होते हुए सिंधु नदी के तट पर पहुंचे। यहाँ उनकी भेंट फरीदून से हुई जो मिर्जा हकीम का मामा था।

उसने मिर्जा हकीम खाँ को सलाह दी कि उसे अकबर की शरण में जाने की बजाय पंजाब पर आक्रमण करना चाहिए तथा अपने लिए नया राज्य बनाना चाहिए क्योंकि इस समय अकबर उज्बेकों के भयानक विद्रोह से घिरा हुआ है। अकबर के सेनापति आसफ खाँ ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर रखा है। इसलिए अकबर पंजाब की रक्षा नहीं कर सकेगा।

फरीदून खाँ मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ का मामा था और उसे अकबर ने ही मिर्जा हकीम का मार्गदर्शन करने के लिए आगरा से भेजा था। उसने मिर्जा हकीम खाँ को अकबर के प्रति निष्ठावान रहने की सलाह देने की बजाय, उसे अकबर के राज्य पर हमला करने का परामर्श दिया।

यह परामर्श मिर्जा हकीम खाँ को विनाश के मार्ग पर ले जाने वाला था किंतु मिर्जा हकीम को अपने मामा की यह सलाह पसंद आई और वह अपनी सेना इकट्ठी करके भारत की तरफ चल दिया।

जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा को ज्ञात हुआ कि मिर्जा हकीम खाँ पंजाब पर आक्रमण करने आ रहा है तो उन दोनों ने भी बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया और संभल से दिल्ली आकर लूटपाट करने लगे।

इस प्रकार अकबर चारों ओर से संकट में घिर गया। मिर्जा लोग अकबर के परिवार के ही शहजादे थे किंतु संकट काल में अकबर के राज्य की रक्षा करने की बजाय अकबर के राज्य पर अधिकार करने का सपना देख रहे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

दलितों की आत्महत्या

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दलितों की आत्महत्या

दलितों की आत्महत्या का मामला आज पूरे भारत में चिंता का विषय बना हुआ है। क्या है इन आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि! क्या है इस समस्या का समाधान! इस आलेख में इस विषय पर संक्षेप में चर्चा की गई है।

जब देश का संविधान बना तो इस बात पर सबका ध्यान था कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ लोगों का अत्यधिक शोषण किया गया है और कुछ लोगों ने उस शोषण में अंग्रेजों का साथ देकर अपनी तिजोरियां भरी हैं।

इसलिए पूरी संविधान सभा ने भारत में निवास करने वाले उस बड़े शोषित वर्ग के लिए एक मत से कुछ विशिष्ट प्रावधान किए। इस संविधान का प्रारूप लिखने के लिए जो समिति बनाई गई, उसकी अध्यक्षता लंदन से बैरिस्ट्री पढ़कर आए डॉ. भीमराव अम्बेडकर को दी गई।

निश्चित रूप से संविधान सभा में सभी सदस्य बहुत विद्वान थे और अपने-अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर हाल ही में आजाद हुए भारत का समग्र विकास करना चाहते थे। वे संविधान के माध्यम से कोई राजनीति नहीं कर रहे थे। संविधान उनके लिए राजनीतिक हथियार था भी नहीं, यह तो आज बन गया है।

आज तो राजनीतिज्ञों ने संविधान को ही नहीं अपितु, संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी अपनी राजनीति चमकाने का जरिया बना लिया है। तब ऐसा नहीं था। उस काल में ऐसा हो भी नहीं सकता था। इसलिए संविधान सभा के सदस्यों ने एकमत से आरक्षण का प्रावधान किया।

हिन्दू समाज का वह निर्धन वर्ग जो मुसलमानों के लगभग छः सौ सालों के शासनकाल में और उसके बाद अंग्रेजों के लगभग 200 सालों के शासनकाल में अछूत और अस्पृश्य कहकर समाज की मुख्य धारा से दूर कर दिया गया, जिनका तरह-तरह से शोषण किया गया, जिन्हें आधा पेट भोजन देकर, दो गुना – चार गुना काम लिया गया, उन्हें आजाद भारत में तेजी से विकास करने के अवसर देने के उद्देश्य से उनके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह जानते थे कि आरक्षण एक दुधारी तलवार की तरह है जो दलित समाज का भला करने के साथ ही उनके लिए कुछ न कुछ खतरे भी अवश्य पैदा करेगी। डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस चिंता को संविधान सभा के भाषणों में खुलकर व्यक्त किया था।

इस समस्या से बचने के लिए संविधान में आर्टीकल 335 का प्रावधान किया गया जो यह कहता था कि आरक्षण के लाभ से युक्त अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति देते समय यह ध्यान में रखा जाएगा कि प्रशासन की दक्षता बनी रहे।

अर्थात् आरक्षित पदों पर केवल उन्हीं युवाओं को लिया जाएगा जो उस सेवा को करने की दक्षता एवं योग्यता रखते हैं। यह प्रावधान इसलिए था ताकि इन पदों पर आने के इच्छुक दलित एवं पिछड़े कहे जाने वाले युवा अपनी गुणवत्ता में निरंतर सुधार करके समाज के शेष लोगों के बराबर आ जाएं।

इस प्रकार आर्टीकल 335 के माध्यम से आरक्षण के प्रावधान में संतुलन स्थापित किया गया। डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि यदि आरक्षण के साथ गुणवत्ता की शर्त नहीं रखी गई तो दलित वर्ग का बहुत नुक्सान होगा। सरकार के कामकाज की क्वालिटी भी गिरेगी और दलित वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास करने के प्रयास छोड़ देगा।

समय के साथ संविधान सभा भंग हो गई। चुनी हुई लोकसभाएं आने लगीं। राजनीतिक दलों में में सभी तरह के तत्व शामिल हो गए। निश्चित रूप से हर राजनीतिक दल में अच्छे लोगों के साथ-साथ कुछ लोग लालची, चालाक और धूर्त लोग भी स्थान पाने लगे।

इन लालची नेताओं ने तुरंत ही समझ लिया कि आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाकर वोटतंत्र पर कब्जा किया जा सकता है। इसलिए इन नेताओं ने वर्ष 1995 में लोकसभा एवं राज्यसभा में 77वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 पारित करके, संविधान के अनुच्छेद 15 में आरक्षित पदों के लिए योग्यता अंकों में छूट और मूल्यांकन मानकों में शिथिलता दिए जाने का प्रावधान किया। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान भी इसी संशोधन के माध्यम से किया गया था।

सतही दृष्टि से देखने पर यह एक अच्छा निर्णय लगता है किंतु अंदरूनी वास्तविकता यह थी कि इसने अब दलित एवं पिछड़े वर्ग के युवाओं को नौकरी पाने का मार्ग तो सरल बना दिया किंतु योग्यता में वृद्धि करके समाज साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के प्रयासों से वंचित कर दिया। कम योग्यता वाले लोग सरकार में उच्च पदों पर आ तो गए किंतु अब उनमें काम करने योग्य प्रतिभा न होने से वे अपने ही साथियों के बीच में स्वयं को कमजोर समझने लगे।

यही स्थिति उच्च शैक्षणिक संस्थानों में भी होने लगी। जब वे आईआईटी, आईआईएम तथा एमबीबीएस जैसी संस्थानों में पढ़ने गए तो उस पढ़ाई को न पकड़ सके। आरक्षित वर्ग के साथियों की इस कमजोरी को अनारक्षित वर्ग के छात्रों ने दलितों एवं पिछड़ों की जन्मजात मानसिक अयोग्यता माना लिया। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

दलितों अथवा पिछड़ों में मानसिक योग्यता की कमी जन्मजात नहीं होती, यह कमी तो योग्यता अर्जित करने के अवसरों से वंचित रह जाने से, उस योग्यता को अर्जित करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों को छोड़ देने से उत्पन्न होती है।

सरकारों को चाहिए था कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए योग्य बनाने हेतु जी-जाने से प्रयास करतीं, न कि उन्हें एक कठपुतली की तरह आगे से आगे बढ़ाती रहतीं।

आज स्थिति यह है कि माइनस 30 या माइनस चालीस अंक लाने वाले छात्रों को डॉक्टरी में एडमिशन दिया जा रहा है। क्या एक ऐसा छात्र जो प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम पासिंग मार्क्स नहीं ला सकता, कभी भी एमबीबीएस की मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़कर डॉक्टर बन सकता है?

यही कारण है कि इनमें से बहुत से छात्र आत्महत्या करते हैं और उन्हें कमजोर वर्गों पर अत्याचार और दलितों की आत्महत्या कहकर राजनीतिक रंग दिया जाता है। विगत 25 वर्षों में भारत में लगभग दो लाख से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। केवल पिछले 10 वर्षों में 1 लाख 17 हजार से अधिक छात्रों की आत्महत्याएँ दर्ज हुई हैं।

आज भारत में औसतन प्रतिदिन 35-36 छात्र आत्महत्या करते हैं। इन आत्महत्याओं के कारण अलग-अलग हैं किंतु पढ़ाई से घबराकर आत्महत्या करने के प्रकरण भी कम नहीं हैं।

दलितों की आत्महत्या को धूर्त किस्म के नेता, वामपंथी शातिर और कुछ नासमझ समझदार भी सवर्णों द्वारा दलितों के विरुद्ध किए गए अत्याचारों का परिणाम बताकर समाज की टूटन को और अधिक गहरी करके अपना उल्लू साधना चाहते हैं। हाल ही में बनाए गए यूजीसी के नियम इस षड़यंत्र का प्रमाण है।

क्या ऐसे दौर में हमें अम्बेडकर के उन भाषणों को फिर से नहीं पढ़ना चाहिए जो उन्होंने संविधान सभा में दिए थे?

अब भी समय है, अम्बेडकर की बात को मन लिया जाए तो दलित छात्रों को घृणित राजनीति की चौसर पर बलि चढ़ने से रोका जा सकता है।

हम जानते हैं कि धूर्त राजनीतिक पार्टियां ऐसा हरगिज नहीं होने देंगी किंतु उन्हें मालूम नहीं है कि यह आग धीरे-धीरे उनके दरवाजे तक भी पहुंच जाएगी! उस दिन क्या होगा, जब उनका अपना लड़का या लड़की किसी शैक्षणिक संस्थान की छत से कूद कर जान देगा?

जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबको दलितों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या को हल करने में ठोस कार्य करना चाहिए। कम से कम इस विचार के पक्ष में वातावरण तो तैयार करना ही चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा हकीम खाँ से लड़ना नहीं चाहता था अकबर (70)!

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मिर्जा हकीम खाँ

मिर्जा हकीम खाँ (Mirza Hakim Khan) काबुल का शासक था और वह अकबर का सौतेला भाई (Step Brother of Shahanshah Akbar) था। उसका पूरा नाम मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ था और वह अकबर के पिता हुमायूँ (Humayun) की दूसरी पत्नी चूचक बेगम का पुत्र था। चूचक बेगम (Chuchak Begum) हुमायूं के साथ भारत नहीं आई थी, वह काबुल के दुर्ग में रहा करती थी।

जब अकबर उज्बेगों और अपने सेनापति आसफ खाँ की बगावत से निबटने में लगा था, तब काबुल के शासक मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ एवं संभल के शासक मिर्जा मुहम्मद सुल्तान तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा ने भी अलग-अलग दिशाओं से अकबर के राज्य पर हमला करके अकबर के लिए नए संकट खड़े कर दिए।

हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकी को समझाया कि काबुल पर अधिकार करने की बजाय पंजाब पर अधिकार करना सरल है क्योंकि अकबर अपने ही अमीरों की बगावत में उलझा हुआ है। मिर्जा हकीम खाँ अपनी माता चूचक बेगम की तरह अस्थिर बुद्धि का इंसान था।

इसलिए वह अपने मामा की बातों में आ गया। कहाँ तो वह अकबर की शरण लेने के उद्देश्य से भारत जा रहा था और कहाँ अब वह अकबर के राज्य पर ही चढ़ बैठा। ठीक उसी समय खुशखबर खाँ नामक एक अमीर मिर्जा हकीम खाँ की सेवा में हाजिर हुआ।

खुशखबर खाँ को अकबर (Akbar) ने ही मिर्जा हकीम खाँ के पास रुपया, सामान, खिलअत और खास घोड़ा देकर रवाना किया था ताकि मिर्जा हकीम खाँ को संकट की इस घड़ी में दिलासा दी जा सके क्योंकि मिर्जा हकीम खाँ को उसके ससुर एवं सौतेले चाचा मिर्जा सुलेमान ने काबुल से बाहर निकाल दिया था।

अकबर ने हकीम खाँ से कहलवाया था कि वह चिंता न करे, पंजाब से कुछ सूबेदारों को काबुल के लिए भेजा जा रहा है ताकि मिर्जा सुलेमान का दमन किया जा सके।

जब मिर्जा हकीम खाँ ने सुना कि खुशखबर खाँ बादशाह का संदेश लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम ने शाही परम्परा के अनुसार अपने शिविर से बाहर आकर बादशाह का पत्र ग्रहण किया।

 मिर्जा हकीम खाँ के मामा फरीदून ने मिर्जा हकीम को सलाह दी कि वह खुशखबर खाँ को बंदी बना ले किंतु मिर्जा हकीम खाँ ने खुशखबर खाँ से बादशाह का संदेश लेने के बाद उसे राजी-खुशी विदा कर दिया।

जब खुशखबर खाँ चला गया तब सुल्तान अली एवं हसन खाँ नामक कुछ अमीर काबुल से सेनाएं लेकर आ गए। उन्हें मिर्जा हकीम खाँ ने लाहौर पर आक्रमण करने के लिए बुलाया था। अब हकीम खाँ ने सिंधु नदी पार की तथा लाहौर की तरफ चल पड़ा। उसके आदमियों ने भेड़ा के पास लूटमार की।

जब यह खबर पंजाब के अधिकारियों को मिली तो मीर मुहम्मद खाँ, कुतुबुद्दीन खाँ और शफी खाँ ने मिलकर लाहौर दुर्ग की मोर्चाबंदी की। हकीम खाँ ने लाहौर पर हमला किया किंतु वह कई दिनों की घेराबंदी के बाद भी लाहौर को नहीं ले सका।

उधर जब अकबर को मिर्जा हकीम खाँ की इस हरकत के बारे में पता लगा तो वह हैरान रह गया! उस समय बादशाह आगरा में ही था। उसने खानखाना मुनीम खाँ को आगरा में नियुक्त किया तथा 17 नवम्बर 1566 को स्वयं एक सेना लेकर दिल्ली होता हुआ पंजाब के लिए चल पड़ा।

अकबर को आगरा से दिल्ली पहुंचने में 10 दिन का समय लगा। इस बीच उसने बहुत सा समय शिकार खेलने में व्यय किया। दिल्ली में भी वह मुस्लिम दरवेशों की दरगाहों के दर्शन करने में व्यस्त हो गया। वह मुताल्लिकों को खैरात बांटता रहा तथा हुमायूँ की कब्र (Tomb of Humayun) पर जाकर सजदे करता रहा।

अकबर द्वारा आगरा से रवाना होकर पंजाब पहुंचने में लगाया जा रहा विलम्ब अकारण नहीं था। वस्तुतः वह अपने सौतेले भाई हकीम मुहम्मद खाँ से लड़ना नहीं चाहता था, अपितु उसे भयभीत करके भगा देना चाहता था।

उधर जब मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ लाहौर पर अधिकार नहीं कर सका और उसने सुना कि बादशाह अकबर स्वयं ही एक विशाल सेना लेकर आ रहा है तो मिर्जा हकीम खाँ की हिम्मत जवाब दे गई। वह लाहौर छोड़कर सिंधु नदी की तरफ भागा।

जब अकबर अपनी सेना लेकर सतलुज नदी के किनारे पहुंचा तो उसे सूचना मिली कि मिर्जा हकीम खाँ लाहौर छोड़कर भाग गया। अकबर यही चाहता था। फिर भी वह धीमी गति से लाहौर की तरफ बढ़ता रहा। फरवरी 1567 के अंत में वह लाहौर पहुंचा। इस प्रकार उसने आगरा से लाहौर पहुंचने में साढ़े तीन महीने लगा दिए।

 लाहौर पहुंचकर अकबर ने लाहौर दुर्ग की रक्षा करने वाले मुगल अधिकारियों को पुरस्कृत किया तथा लाहौर के निकटवर्ती जंगलों में जी भरकर शिकार खेला। बादशाह ने एक सेना मिर्जा हकीम खाँ के पीछे भेजी ताकि मिर्जा हकीम सिंधु नदी पार करके भारत की भूमि से चला जाए।

मिर्जा हकीम के लिए अब भारत में कोई काम नहीं था। इसलिए वह सिंधु को पार करके घोरबंद की तरफ बढ़ने लगा। वहाँ जाकर उसे ज्ञात हुआ कि उसका ससुर मिर्जा सुलेमान और सास हरम बेगम काबुल की घेराबंदी उठाकर बदख्शां भाग गए हैं। संभवतः मिर्जा सुलेमान को यह गलत सूचना दी गई थी कि मिर्जा हकीम खाँ भारत से अकबर की सेना लेकर आ रहा है। उसके भागने का एक कारण यह भी था कि उसके घोड़ों में रोग फैल जाने से वे बड़ी तेजी से मरने लगे।

मिर्जा सुलेमान (Mirza Suleman) इतनी आनन-फानन में काबुल का घेरा छोड़कर भागा कि उसकी कुछ जवान पुत्रियां काबुल के शिविर में ही छूट गईं। काबुल की सेना ने उन्हें घेर लिया किंतु काबुल की सेना ने उनके साथ आदर का व्यवहार किया क्योंकि वे काबुल के शासक मिर्जा हकीम खाँ की बेगम की सगी बहिनें थीं। वह बिना किसी विघ्न के काबुल पहुंच गया और अपने बाप-दादा की राजधानी में फिर से प्रतिष्ठित हो गया।

जब संभल के शासक मुहम्मद सुल्तान मिर्जा (Muhammad Sultan Mirza) तथा उसके पुत्र उलूग मिर्जा (Ulug Mirza) को ज्ञात हुआ कि बादशाह अकबर मिर्जा हकीम खाँ से लड़ने लाहौर (Lahore) जा रहा है तो वे संभल से दिल्ली आ गए तथा दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से लूटपाट करने लगे। बादशाह अकबर खानखाना मुनीम खाँ को आगरा की रक्षा पर नियत करके गया था किंतु मुनीम खाँ को आगरा छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। मिर्जा लोग खानखाना से लड़ने की बजाय माण्डू (Mandu) की ओर भाग गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर के परबाबा का नाम मिर्जा उमरशेख था जो फरगना का शासक था। संभल से आकर दिल्ली में उत्पात मचाने वाले मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के परबाबा का पिता भी यही उमर शेख था। इस प्रकार अकबर तथा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा आपस में चाचा-भतीजा लगते थे।

अकबर अपने इस भतीजे से बड़ा स्नेह करता था किंतु भतीजे ने अपने चाचा के स्नेह का कोई मूल्य नहीं समझा तथा राज्य के लालच में बगावत करके अपनी जागीर से भी वंचित हो गया।

अकबर की तरह उसका पिता हुमायूँ भी अपने खानदान के शहजादे मुहम्मद सुल्तान मिर्जा से बहुत प्रेम करता था। मिर्जा सुल्तान ने हुमायूँ (Humayun) से भी कई बार बगावत की थी किंतु हुमायूँ ने मिर्जा सुल्तान को हर बार क्षमा करके अपने पास ही रखा था।

मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के कई बच्चे हुए थे। उसके बहुत से बच्चों का जन्म तो मुहम्मद सुल्तान मिर्जा की वृद्धावस्था में हुआ था। उसके पुत्रों में उलूग मिर्जा, इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA), मुहम्मद हुसैन मिर्जा, मसऊद मिर्जा, आकिल मिर्जा आदि के नाम मिलते हैं।

अकबर ने उन सब मिर्जाओं के भरण-पोषण के लिए संभल की जागीर दे रखी थी। अकबर ने मिर्जा सुल्तान के पुत्र-पौत्रों को यह अधिकार दे रखा था कि युद्ध-क्षेत्र में वे अकबर के हाथी अथवा घोड़े के चारों ओर रहकर युद्ध किया करें।

जौनपुर के अभियान में भी ये सारे मिर्जा, अकबर (Badshah Akbar) के चारों ओर रहे थे किंतु उनमें से कोई भी अकबर से प्रेम नहीं करता था। वे सब राज्य और सम्मान के भूखे थे। प्रेम की भूख उन्हें शायद ही सताती थी।

वस्तुतः मुगलिया-राजनीति में प्रेम का मूल्य बहुत कम था। निकटतम व्यक्ति से लेकर अनजान व्यक्ति तक कोई भी, कभी भी, कहीं भी, राज्य तथा सम्पत्ति के लालच में किसी भी सम्बन्ध को विच्छेद कर सकता था। किसी को भी मार सकता था। किसी का भी सर्वस्व हरण कर सकता था। तैमूर लंग (TIMUR LANG) से लेकर बाबर (BABUR)  तक ने भी यही किया था और अब उनके वंशज भी यही सब कर रहे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की मक्कारी : कुरुक्षेत्र में  साधुओं को लड़ने की अनुमति दे दी अकबर ने (71)

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अकबर की मक्कारी

हालांकि इतिहासकारों ने अकबर को साम्प्रदायिक सद्भाव का मसीहा सिद्ध करने की कोशिश की है किंतु  अकबर के समकालीन इतिहास में अकबर की मक्कारी के कई किस्से लिखे हुए हैं।

 जिस समय अकबर (Akbar) काबुल (Kabul) के शासक मिर्जा हकीम खाँ (Mirza Hakim Khan) के पीछे लाहौर (Lahore) जा रहा था, उसी दौरान संभल के मिर्जाओं ने भी बगावत कर दी। अकबर के सेनापति खानखाना मुनीम खाँ ने मिर्जाओं को शाही खानदान का समझकर उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं की अपितु उन्हें दिल्ली से भगा दिया।

मिर्जा लोग माण्डू (Mandu) की तरफ भाग गए तथा वहाँ नए सिरे से अकबर के विरुद्ध षड़यंत्र करने लगे। जब अकबर लाहौर से आगरा के लिए लौटा तब वह वर्तमान हरियाणा प्रांत के थानेसर अथवा कुरुक्षेत्र कस्बे के पास से होकर निकला। उसी समय थानेसर कस्बे में एक विचित्र घटना घटी।

अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (Abul Fazal) ने लिखा है कि- ‘थानेसर के (Thanesar) पास एक तालाब है जिसे छोटा समुद्र कहा जा सकता है। प्राचीन काल में वहाँ एक मैदान था जो कुरुक्षेत्र कहलाता था। भारत के साधु प्राचीन काल से इस तालाब को पवित्र समझते थे। भारत के विभिन्न भागों के लोग इसकी यात्रा करने आते थे और पुण्यदान किया करते थे।’

श्रीमद्भगवत्गीता के प्रारम्भ में कुरुक्षेत्र (Kurukshetra) को धर्मक्षेत्र कहा गया है। यहीं पर कौरवों एवं पाण्डवों के बीच महाभारत का युद्ध हुआ था। अबुल फजल ने कुरुक्षेत्र में समुद्र जितने बड़े जिस तालाब की चर्चा की है, वह वास्तव में अत्यंत प्राचीन काल का ब्रह्म सरोवर है जिससे जुड़ी हुई अनेक कथाएं पुराणों में मिलती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार अत्यंत प्राचीन काल में इस क्षेत्र से होकर सरस्वती नदी की धारा बहा करती थी। जब सरस्वती नदी सूख गई तो उसके मार्ग में छोटे-बड़े तालाब एवं सरोवर रह गए जो प्रतिवर्ष वर्षा के जल से भर जाते थे। इसी कारण सरस्वती नदी के सूख जाने के पांच हजार साल बाद भी कुरुक्षेत्र का ब्रह्म सरोवर अस्तित्व में है। अबुल फजल ने इसी का उल्लेख अपनी पुस्तक अकबर नामा (Akbarnama) में किया है।

अबुल फजल लिखता है कि- ‘इस वर्ष बादशाह के आगमन से पहले ही कुरुक्षेत्र में बड़ी भीड़ हो गई थी।’ इस पंक्ति से ऐसा लगता है कि कुछ मुस्लिम बादशाह कुरुक्षेत्र में प्रतिवर्ष लगने वाले मेले को देखने आते रहे होंगे। संभवतः अकबर भी पिछले कुछ सालों में कुरुक्षेत्र आया हो। इस कारण इस मेले का आकर्षण बढ़ गया हो और इस मेले में अधिक भीड़ होने लगी हो।

अबुल फजल ने लिखा है- कुरुक्षेत्र में संन्यासियों के दो दल हैं। एक गिरि कहलाता है तो दूसरा पुरी। ये दोनों दल इस सरोवर के दोनों तरफ अपने-अपने समूह में बैठा करते थे। भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों से जो यात्री स्नान करने आते थे, उनको दान दिया करते थे।

लोग साधु इसलिए बनते हैं क्योंकि वे संसार से विमुख हो जाते हैं किंतु उनमें लोभ और क्रोध बना रहता है। गिरि और पुरी साधुओं (Giri and Puri Sadhu) की इस लड़ाई का कारण यह था कि पुरी सम्प्रदाय के साधु तालाब के तट पर जिस स्थान पर बैठा करते थे, उस स्थान को एक दिन गिरि सम्प्रदाय के साधुओं ने बलपूर्वक पुरी साधुओं से छीन लिया।

पुरी साधुओं की संख्या बहुत कम थी इसलिए पुरी साधु, गिरि साधुओं का कुछ नहीं कर सके। उसी दौरान पुरी साधुओं को ज्ञात हुआ कि बादशाह अकबर अम्बाला तक आ गया है और कुछ ही दिनों में कुरुक्षेत्र पहुंचेगा।

इस पर पुरी साधुओं का नायक केशू पुरी अम्बाला गया। उसने बादशाह से भेंट की तथा उससे कहा कि गिरि साधुओं ने हमारा स्थान छीन लिया है। यह स्थान परम्परा से हमारा है। कभी कुछ समय के लिए गिरि साधु उस पर बैठा करते थे किंतु अब हम बैठते हैं। अतः बादशाह हमें हमारा स्थान दिलवाए।

अकबर ने पुरी साधुओं के मुखिया केशू पुरी की बातों में कोई रुचि नहीं दिखाई। इस पर केशू पुरी ने बादशाह से कहा कि जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक वह स्थान हमारे पास रहेगा। हममें उनका सामना करने की शक्ति नहीं है किंतु हम उनसे लड़ेंगे। इसमें या तो हमारा रक्तपात हो जाएगा या हम उनसे अपना स्थान छीन लेंगे।

इस पर अकबर केशू पुरी की बात से सहमत हो गया। अकबर की मक्कारी उछलकर सामने आ गई। उसने कहा कि तुम लोग आपस में लड़कर ही इसका निर्णय कर लो कि किस स्थान पर कौन बैठेगा। हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है किंतु तुम लोग यह लड़ाई हमारे सामने करना। केशु पुरी ने बादशाह की बात स्वीकार कर ली तथा वापस कुरुक्षेत्र लौट आया।

कुछ दिन बाद बादशाह की सवारी थानेसर पहुंची। बादशाह उस तालाब के पास गया और उसने साधुओं को समझाया कि वे झगड़ा न करें किंतु उन साधुओं पर बादशाह की बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ। वे मरने-मारने को तो पहले से ही तैयार थे किंतु बादशाह को आया देखकर और अधिक उग्र हो गए।

दोनों तरफ के साधु अपनी बात पर अड़े हुए थे और एक ही स्थान पर बैठना चाहते थे। अकबर ने दोनों पक्षों के साधुओं को लड़कर फैसला करने की अनुमति दे दी। इस प्रकार अकबर की मक्कारी का एक किस्सा कुरुक्षेत्र से जुड़ गया।

 दोनों पक्षों के साधु आमने-सामने पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गए। अकबर भी इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी बना। पुरी साधुओं की संख्या लगभग 300 थी जबकि गिरि साधु 500 थे।

इसलिए बादशाह ने तूरानी सेनानायक अर्थात् उज्बेक सेनानायक यतीम शाह को और भारत के सेनानायक वीरू अर्थात् एक हिन्दू सेनानायक को आदेश दिए कि पुरी लोगों की सहायता की जाए। अकबर की मक्कारी भरे आदेश के बाद  यतीम शाह और वीरू ने भी अपने सैनिकों को इस संघर्ष में उतार दिया जिन्होंने गिरि साधुओं पर आक्रमण करने में पुरी साधुओं की सहायता की।

प्रत्येक पक्ष से साधु तलवार लेकर आगे बढ़े। उसके बाद तीर चलाए गए। और फिर पुरी साधुओं ने गिरि साधुओं पर पत्थर मारने शुरु कर दिए। कुछ गिरि साधु लड़ाई छोड़कर भाग निकले। पुरी साधुओं ने उनका पीछा किया और उनमें से कितनों को ही जान से मार डाला। उन्होंने गिरि साधुओं के मुखिया आनंदकंद को भी मार डाला। शेष साधु छिन्न-भिन्न हो गए। अकबर इस खेल को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ।’

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni ) ने भी इस घटना का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘कुरुक्षेत्र का तालाब चार हजार साल पुराना है जहाँ कौरव और पाण्डवों के युद्ध में 70-80 लाख आदमी मारे गए थे। अब यहाँ हर साल एक जलसा होता है।

यहाँ के पूजास्थन पर हिन्दू श्रद्धालु सोना, चांदी, रत्न, आभूषण, रेशम, मूल्यवान सामान दान करते हैं। वे ब्रह्मसरोवर के कुण्ड में गुप्त रूप से सिक्के डाल देते हैं। जोगियों एवं संन्यासियों की टुकड़ियां अपने उत्तराधिकार के लिए लड़ती हैं। मुल्ला लिखता है कि बादशाह के सैनिक शरीर पर राख मलकर संन्यासियों की तरफ से लड़े। दोनों ओर से बहुत से मारे गए।’

 मुल्ला के वर्णन से ऐसा लगता है कि उसने गिरि साधुओं को जोगी तथा पुरी साधुओं को संन्यासी लिखा है। मुल्ला लिखता है कि अंत में संन्यासी विजयी हुए। अर्थात् पुरी विजयी हुए।

राहुल सांकृत्यायन ने भी अबुल फजल से मिलता-जुलता वर्णन किया है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार दोनों ओर के साधुओं ने अपने-अपने नागा सैनिकों के संगठन तैयार कर लिए थे। इस संघर्ष में 20 साधु मारे गए।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा वर्णित यह संख्या सही नहीं है। लगभग सभी गिरि साधुओं को मार गिराया गया था जिनकी संख्या 500 से अधिक थी। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि लगभग इसी संख्या में पुरी साधु भी मरे होंगे।

वस्तुतः कुरुक्षेत्र के इस प्रकरण में किसी भी लेखक ने सत्य-स्थिति का वर्णन नहीं किया है। सत्य-स्थिति यह है कि जब भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब भारत में कुछ नागा-साधुओं के समूह देश की रक्षा के लिए सैनिक परम्पराओं के साथ लड़ने-मरने के लिए तैयार होने लगे।

कुरुक्षेत्र में जो संघर्ष हुआ, वह ऐसी ही दो नागा सेनाओं के बीच हुआ था जिसमें अकबर ने बड़ी ही चालाकी से अपने सैनिकों को भी लड़वा दिया ताकि नागा साधुओं की यह लड़ाई जल्दी समाप्त न हो!

मुगलों के समय में भी नागा सेनाएं बड़ी संख्या में देशी राज्यों में रहती थीं और वे युद्ध-क्षेत्र में रहकर उसी प्रकार युद्ध करती थीं जिस प्रकार क्षत्रिय सैनिक किया करते थे। राजपूताने के युद्धों में नागा सेनाओं के विवरण बड़ी संख्या में मिलते हैं। अंग्रेजों के काल में हुए संन्यासी आंदोलन में भी इन्हीं नागा साधुओं के समूह सम्मिलित थे। अकबर की मक्कारी यहीं समाप्त नहीं हुई, उसके आदेश पर यह काम आगे भी होता रहा।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर और टोडरमल : यदि राजा टोडरमल न होता तो अकबर का राज्य उखड़ गया होता (72)

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अकबर और टोडरमल

अकबर और टोडरमल दोनों ही एक दूसरे पर पूरा विश्वास करते थे। हालांकि अकबर के हिन्दू मंत्रियों (Hindu Ministers of Akbar) और सेनापतियों में से एक भी ऐसा नहीं था जिसने कभी अकबर के विरुद्ध बगावत की हो किंतु टोडरमल एक ऐसा विलक्षण मंत्री था जिसने सेनापति न होते हुए भी सेनाओं का नेतृत्व किया और अकबर के दुश्मनों का सफाया किया।

 इस समय तक अकबर को शासन करते हुए 11 साल हो चुके थे। वह तेजी से अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था किंतु अफगान सेनापतियों, मुगल शहजादों, मिर्जाओं और उज्बेक लड़ाकों द्वारा लगातार की जा रही बगावतों के कारण राज्य-विस्तार का काम धीमी गति से चल रहा था।

इस बीच राजपूताना के अनेक हिन्दू राज्य अकबर से अधीनस्थ मित्रता स्वीकार कर चुके थे किंतु चित्तौड़ का दुर्ग अब भी गर्व से अपना सीना फुलाए हुए निर्भय खड़ा था। चित्तौड़ के प्रशस्त भाल पर उसके शासकों द्वारा विजयी इतिहास के अक्षर गहराई से टंकित किए गए थे जिनके कारण अकबर अब तक चित्तौड़ से दूर ही रहा था।

ई.1567 तक अकबर ने उज्बेकों का दमन कर दिया, मिर्जा हकीम, मिर्जा सुल्तान, खानेजमां और आसफ खाँ भी दबाए जा चुके थे। अतः अकबर चित्तौड़ की तरफ बढ़ने की तैयारी करने लगा।

अकबर के चित्तौड़ आक्रमण से पहले हमें अकबर के उन विख्यात मंत्रियों एवं सेनापतियों की चर्चा करनी होगी जो इस समय तक अकबर के दरबार में आ-आकर एकत्रित हो चुके थे। इनमें से कई राजपुरुषों का उल्लेख चित्तौड़ के घेरे में होगा।

अकबर ने अपने नौ दरबारियों को नवरत्न घोषित किया था जिनमें राजा बीरबल, मियां तानसेन, अबुल फजल, राजा मानसिंह, राजा टोडरमल, मुल्ला दो प्याजा, फकीर अजियोदीन तथा अब्दुल रहीम खानखाना सम्मिलित थे।

इनमें से राजा टोडरमल का उल्लेख उज्बेकों के दमन के समय हो चुका है।  टोडरमल का जन्म उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में स्थित सीतापुर जिले के लहार अथवा लहरपुर गांव में 1 जनवरी 1500 को हुआ था। कुछ लोगों ने उन्हें अग्रवाल, कुछ ने पंजाबी, कुछ ने टंडनखत्री तथा कुछ ने कायस्थ माना है।

बिहार प्रांत के पटना नगर के दीवान मोहल्ले में, नौजरघाट पर स्थित चित्रगुप्त का मंदिर राजा टोडरमल ने बनवाया था। इससे अनुमान होता है कि टोडरमल कायस्थ था। टोडरमल की बाल्यावस्था में ही टोडरमल के पिता की मृत्यु हो गई। उस समय तक हिन्दू फारसी नहीं पढ़ते थे, इससे उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलती थीं।

टोडरमल के परिवार में आजीविका का कोई साधन नहीं होने से टोडरमल ने फारसी भाषा का अध्ययन किया तथा अपना जीवन एक कार्यालय लिपिक के रूप में आरम्भ किया जिसे उन दिनों दफ्तर-मुंशी कहा जाता था। जब शेरशाह सूरी का उदय हुआ तब टोडरमल ने शेरशाह की नौकरी कर ली तथा उन्नति करता हुआ उच्च पदों तक जा पहुंचा।

जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ (Humayun) को भारत से बाहर कर दिया और शेरशाह के राज्य की पश्चिमी सीमा गक्खरों के प्रदेश से मिल गई, तब शेरशाह सूरी ने बिहार की तरह पंजाब में भी रोहतास नामक नवीन दुर्ग बनवाया ताकि वहाँ एक सेना रखकर गक्खरों एवं बादशाह हुमायूँ को शेरशाह के राज्य में प्रवेश करने से रोका जा सके।

जब हुमायूँ ने सूर सल्तनत का अंत कर दिया तथा दुबारा से मुगलिया सल्तनत स्थापित हुई, तब हुमायूँ ने टोडरमल को शाही सेवा में पूर्ववत् रहने दिया। इस प्रकार अकबर और टोडरमल (Akabr and Todarmal) पहली बार एक दूसरे के निकट आए।

 जब अकबर बादशाह हुआ तब उसने अनुभव किया कि वह अपनी सल्तनत का प्रशासनिक कार्य अफगान अमीरों, उज्बेकों एवं मुगल शहजादों के भरोसे नहीं छोड़ सकता क्योंकि वे अवसर मिलते ही बगावत करते हैं।

इसलिए अकबर (Shahanshah Akbar) ने अपनी सेना में हिन्दू राजाओं एवं राजकुमारों को नियुक्त किया तथा प्रशासन में ऐसे प्रतिष्ठिति हिन्दुओं को नियुक्त किया जो राजा तो नहीं थे किंतु उनकी प्रशासनिक क्षमताएं निश्चित रूप से श्रेष्ठ थीं। अकबर ने ऐसे हिन्दुओं को राजा एवं मियां की उपाधियां देकर उनकी हैसियत अन्य अमीरों के बराबर अथवा उनसे भी ऊंची कर दी। टोडरमल (Todarmal) भी उन्हीं में से एक था।

इतिहास की पुस्तकों में टोडरमल का सर्वप्रथम उल्लेख ई.1565 में मिलता है जब उसने अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानेजमां का विद्रोह दबाने में विशेष प्रतिभा का प्रदर्शन किया था।

यह वही अली कुली खाँ था जिसने हेमू का तोपखाना छीनकर पानीपत की लड़ाई का फैसला युद्ध आरम्भ होने से पहले ही कर दिया था। यदि अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानजमां को दबाने में अकबर को टोडरमल की सेवाएं नहीं मिली होतीं तो अकबर का राज्य उसी समय उखड़ गया होता!

अकबर और टोडरमल के वास्तविक सम्बन्ध यहीं से आरम्भ हुए। अकबर को टोडरमल के काम करने का तरीका इतना पसंद आया कि अकबर ने उसे आगरा का प्रभारी बना दिया। अकबर ने राजा टोडरमल को बंगाल की टकसाल का प्रबंधन करने का भी जिम्मा दे दिया। अकबर ने टोडरमल को दीवान ए मुशरिफ अर्थात् वित्तमंत्री बनाया तथा उसे वकील-उस्-सल्तनत अर्थात् बादशाह का सलाहकार भी नियुक्त किया। मुगल सल्तनत के 15 सूबों में नियुक्त दीवान राजा टोडरमल के अधीन काम किया करते थे। अकबर ने टोडरमल को 4000 का मनसब प्रदान किया।

यह एक उच्च मनसब था जो अकबर द्वारा बहुत कम सेनापतियों, अमीरों एवं राजाओं को दिया गया था। बाद में उसे गुजरात का सूबेदार बनाया गया। मुश्किल समय में अकबर ने टोडरमल को पंजाब में कई मोर्चों पर भेजा। अंत में अकबर ने टोडरमल को अपने दरबार के नवरत्नों में सम्मिलित कर लिया।

टोडरमल अकबर के हिन्दू दरबारियों में पहला था जिसने धोती-कुर्ता छोड़कर मुगलों की तरह बरजू-चोगा और मोजे पहनने आरम्भ किए। टोडरमल ठाकुरजी को भोग लगाए बिना भोजन नहीं करता था।

एक बार किसी यात्रा में किसी व्यक्ति ने टोडरमल के ठाकुरजी की प्रतिमा चुरा ली। इस पर टोडरमल ने अन्न-जल का त्याग कर दिया।

जब अकबर को यह बात ज्ञात हुई तो उसने टोडरमल से कहा कि प्रतिमा चोरी गई है, ठाकुरजी अब भी सब स्थान पर हैं। इस तरह आत्मघात करना उचित नहीं है। इस पर टोडरमल ने अन्न-जल ग्रहण करना आरम्भ कर दिया।

ई.1567 में महाराणा उदयसिंह के विरुद्ध हुए चित्तौड़ दुर्ग के घेरे में राजा टोडरमल की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण थी कि जहाँ लाखेटाबारी का मोर्चा स्वयं अकबर संभाल रहा था, वहीं सूरजपोल की तरफ का मोर्चा राजा टोडरमल संभाल रहा था।

आगे चलकर महाराणा प्रताप से हुए हल्दीघाटी युद्ध से पहले ई.1576 में महाराणा प्रताप से मिलने के लिए अकबर ने जिन दो प्रतिनिधियों को गोगूंदा भेजा था उनमें राजा मानसिंह तथा राजा टोडरमल ही सम्मिलित किए गए थे।

टोडरमल ने अकबर के राजस्व प्रबंधन को चुस्त एवं दुरुस्त बनाया। राजा टोडरमल द्वारा चलाई गई कुछ परम्पराएं तो आज भी भारत के राजस्व प्रशासन में प्रचलित हैं। टोडरमल ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के लहरपुर में अपने लिये एक दुर्ग-महल का निर्माण करवाया।

टोडरमल ने भागवत पुराण का फारसी में अनुवाद किया। ई.1585 में राजा मानसिंह ने काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया किंतु हिंदुओं ने उसके बनाए मंदिर को स्वीकार नहीं किया तब राजा टोडरमल ने अपने धन से काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया। कुछ लोगों का मानना है कि टोडरमल ने अकबर से धन लेकर काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया। 

इस प्रकार अकबर और टोडरमल के सम्बन्ध स्थाई बने रहे और अकबर ने उस पर विश्वास करके अपनी सल्तनत में बड़े-बड़े अधिकार एवं दायित्व सौंप दिए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

टोडरमल अभी जीवित है, खानखाना मर गया तो क्या हुआ (73)

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टोडरमल अभी जीवित है खानखाना मर गया तो क्या हुआ

राजा टोडरमल (Raja Todarmal), अकबर (Badshah Akbar) का पहला हिन्दू मंत्री था जिसने हिंदुओं की वेशभूषा त्यागकर मुगल अमीरों जैसे कपड़े पहनने आरम्भ किए थे। बादशाह अकबर उसकी प्रतिभा एवं निष्ठा से इतना प्रभावित हुआ कि अकबर ने उसे ऐसे-ऐसे श्रेष्ठ पद दिए और ऐसे-ऐसे महत्वपूर्ण कार्य सौंपे जो अकबर किसी मुगल शहजादे अथवा चगताई अमीर को भी नहीं दे सकता था।

जौनपुर, चित्तौड़, रणथंभौर, सूरत एवं हल्दीघाटी के अभियानों में टोडरमल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) के बाहर लगाए गए चार मोर्चों में से उसे एक मोर्चे का स्वतंत्र प्रभारी बनाया था। ई.1572 में अकबर ने उसे गुजरात के माल-बंदोबस्त का दफ्तर ठीक करने के लिए भेजा। वहाँ इतनी अव्यवस्था मची हुई थी कि कई वर्षों से बादशाह को मिलने वाली मालगुजारी का सही हिसाब किसी को पता नहीं था। टोडरमल ने यह दफ्तर ठीक करके मालगुजारी का सही हिसाब मिला लिया।

ई.1573 में टोडरमल को बिहारी पठानों से लड़ने के लिए भेजी गई सेना की व्यवस्था करने भेजा गया। इस मोर्चे पर पहले से ही खानखाना मुनीम खाँ की अध्यक्षता में एक विशाल सेना बिहारी पठानों से लड़ रही थी जिसमें बाबर (BABUR)  एवं हुमायूँ (HUMAYUN) के समय के अनुभवी अमीर भी मौजूद थे किंतु यह सेना बिहारी पठानों से जीत नहीं पा रही थी।

जब टोडरमल मुनीम खाँ (Munim Khan) के पास पहुंचा तो Raja Todarmal ने नए सिरे से सेना की व्यूह रचना की।

उसके द्वारा की गई व्यवस्था से कुछ ही दिनों में मुगलों को जीत प्राप्त हो गई। इसके कुछ दिन बाद मुगल सेना बंगाल की राजधानी गौड़ के अभियान पर भेजी गई। इसे बाद में मालदा के नाम से जाना गया। अफगान लोग गौड़ से भागकर टौंडा चले गए। मुनीम खाँ और टोडरमल को भी टौंडा जाकर मोर्चा संभालना पड़ा। टौंडा में बादशाही सेना की प्रबल विजय हुई।

इस पर बंगाल और बिहार के शासक दाऊद खाँ (Daud Khan  of Bengal) ने अपने परिवार को रोहतास के किले (Rohtas ka Kila) में छोड़ दिया तथा स्वयं एक विशाल सेना लेकर मुगल सेना पर टूट पड़ा। खानखाना मुनीम खाँ को मुगल सेना के केन्द्र में तथा Todarmal को मुगल सेना के दाएं पक्ष में रखा गया।

इस बार दाऊद की सेना मुगलों पर भारी पड़ी तथा मुगल सेना का हरावल तितर-बितर हो गया। दाऊद की सेना मुगल सेना के केन्द्र तक पहुंच गई।

कुछ ही समय में मुगल सेना में यह अफवाह फैल गई कि खानखाना मुनीम खाँ मारा गया। जब यह बात टोडरमल को बताई गई तो उसने कहा- ‘क्या हुआ जो खानखाना मारा गया है, मैं तो हूँ। अपने स्थान पर डटे रहो और लड़ते रहो। हम बादशाह के लिए लड़ रहे हैं न कि खानखाना के लिए।’

 टोडरमल की इस बात से मुगल सेनापतियों में जोश छा गया और वे फिर से लड़ने लगे। थोड़ी ही देर में अफगानों का सेनापति गूजर खाँ मारा गया। पठान और अफगान भाग खड़े हुए तथा विजयश्री ने मुगलों का वरण कर लिया। बाद में ज्ञात हुआ कि खानखाना नहीं अपितु खानआलम मारा गया था। खानखाना तो युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया था।

बंगाल और बिहार के शासक दाऊद ने यह रणनीति अपना रखी थी कि जब वह हारने लगता था तो मैदान छोड़कर भाग जाता था और कुछ ही दिनों में फिर से सेना एकत्रित करके मुगलों पर टूट पड़ता था। इस कारण मुगलों की सेना कई सालों से बिहार एवं बंगाल के मोर्चे पर फंसी हुई थी।

इस बार टोडरमल ने मोर्चा संभाला। दाऊद जहाँ भी गया, टोडरमल ने उसका पीछा किया तथा उसे चैन से नहीं बैठने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ई.1576 में दाऊद ने सुलह की प्रार्थना की।

जब दाऊद के अमीर खानखाना मुनीम खाँ के डेरे में संधि की बात करने पहुंचे तो मुनीम खाँ संधि करने के लिए तैयार हो गया किंतु टोडरमल ने संधि करने से मना कर दिया।

टोडरमल ने दाऊद के मंत्रियों के सामने ही मुनीम खाँ से कहा- ‘अपने आराम और दाऊद के मंत्रियों की प्रार्थना पर ध्यान मत दो। सुलह मत करो। बिना कोई विराम दिए लड़ते जाओ, दाऊद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।’

मुनीम खाँ में टोडरमल जितना साहस, श्रम एवं उत्साह नहीं था। वह बंगाल से बाहर निकलना चाहता था। इसलिए वह संधि करने के लिए उतना ही उत्सुक था जितना कि दाऊद। टोडरमल जानता था कि दाऊद संधि नहीं करना चाहता है, वह तो अपनी शक्ति को पुनर्गठित करने तक के लिए समय लेना चाहता है। उसके विरोध के बावजूद मुनीम खाँ ने दाऊद से संधि कर ली। जब मुनीम खाँ ने संधि के कागज टोडरमल की तरफ बढ़ाए तो टोडरमल ने उन पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। मुनीम खाँ ने अपनी जीत की खुशी में जलसे का आयोजन किया किंतु टोडरमल उसमें भी सम्मिलित नहीं हुआ।

जब बादशाह (Badshah Akbar) ने टोडरमल को बंगाल से आगरा बुलवाया तो टोडरमल बंगाल से 54 श्रेष्ठ हाथी लेकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। बादशाह हाथियों की इस भेंट को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ। टोडरमल के खाते में और भी ढेरों उपलब्धियाँ हैं।

जब अकबर ने टोडरमल को अनेक महत्वपूर्ण पद दे दिए तो कुछ मुगल अमीरों ने अकबर से कहा कि आपने एक हिंदू को मुसमानों के ऊपर इतना बड़ा अधिकार दे दिया है, यह उचित नहीं है। इस पर अकबर ने कहा-

हर कुदाम शुमा दर सरकारे खुद हिंदुए दारद्।

अगर माहम हिंदुए दाश्तऽवाशीम्

चिरा अज ओ बद बायद बूद्।

अर्थात्- आप में से हरेक अपने कारोबार में हिन्दू मुंशी रखते हैं। यदि मैंने भी हिंदू रखा तो उससे क्या बुरा होगा?

टोडरमल जीवन के अंतिम दिनों में शाही नौकरी छोड़कर हरिद्वार जाना चाहता था किंतु अकबर ने उससे कहा कि तीर्थयात्रा करने से बेहतर है सक्रिय रहकर कार्य करना। इसलिए टोडरमल को अपने जीवन की अंतिम सांस तक अकबर के लिए काम करना पड़ा। अपनी मृत्यु के समय टोडरमल लाहौर के मोर्चे पर था। 8 नवंबर 1589 को लाहौर में ही टोडरमल की मृत्यु हुई। इस अवसर पर आम्बेर नरेश भगवानदास भी उपस्थित था।

टोडरमल के दो पुत्र थे जिनमें से एक का नाम धारी था। वह सिंध-क्षेत्र में अकबर के लिए लड़ता हुआ मारा गया। टोडरमल के दूसरे पुत्र कल्याणदास ने हिमालय क्षेत्र में कुमाऊँ को परास्त किया था।

उज्बेक नेता अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानजमां का विद्रोह दबाने में टोडरमल की बहुत बड़ी भूमिका थी। राहुल सांकृत्यायन ने उसका मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि- ‘अबुल फजल (Abul Fazal) राजनीति और शासन में अद्वितीय था, राजा मानसिंह (Raja Mansingh) महान! सैनिक था किंतु राजा टोडरमल (Raja Todarmal) में ये दोनों गुण मौजूद थे।’        

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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