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अकबर और मानसिंह शराब पीकर कुश्ती लड़ते थे (74)

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अकबर और मानसिंह शराब पीकर कुश्ती लड़ते थे

हालांकि अकबर (Shahanshah Akbar) मानसिंह (Raja Mansingh of Amber) का फूफा लगता था किंतु अकबर और मानसिंह एक ही उम्र के थे। दोनों एक साथ शराब पीते और नशे में धुत्त होकर कुश्ती लड़ते थे।

कुंअर मानसिंह अकबर के दरबार में प्रमुख मंत्रियों, प्रमुख सलाहकारों, प्रमुख सेनापतियों एवं नवरत्नों में से एक था। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि मानसिंह अकबर को अपने सगे भाई से भी अधिक प्रिय था। हालांकि अकबर का कोई सगा भाई नहीं था, उसका केवल एक सौतेला भाई था जो काबुल (Kabul) का शासक था।

फिर भी राहुल सांकृत्यायन के इस कथन में छिपे इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि राजा मानसिंह उन लोगों में से था जिन्हें अकबर बहुत प्रेम करता था।

एक बार जब अकबर के सौतेले भाई मिर्जा हकीम मुहम्मद खाँ (Mirza Hakim) ने अकबर से बगावत की, तब अकबर ने राजा मानसिंह को मिर्जा हकीम की बगावत कुचलने के लिए भेजा। यहाँ तक कि अकबर ने राजा मानसिंह को अफगानिस्तान का शासक भी बना दिया।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है- ‘जब अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया मजहब चलाया तो उसने मानसिंह से भी चेला बनने के लिए कहा। इस पर मानसिंह ने कहा कि यदि चेला होने का अर्थ जान न्यौछावर करना है तो उसे आप अपनी आंखों से देख रहे हैं। यदि जरूरत हो तो परीक्षा देने के लिए भी तैयार हूँ। जहाँ तक धर्म का सवाल है, मैं हिन्दू हूँ। मुझे नए मजहब की आवश्यकता नहीं है।’

मानसिंह के इस जवाब ने अन्य हिन्दू राजाओं के लिए भी राह आसान कर दी और एक भी हिन्दू राजा ने दीन-ए-इलाही स्वीकार नहीं किया।

मानसिंह का जन्म 21 दिसम्बर 1550 को आम्बेर में हुआ था। वह आम्बेर नरेश बिहारी मल अथवा भारमल (Raja Bharmal)  का पौत्र था एवं भगवंतदास अथवा भगवानदास (Raja Bhagwan Das) का दत्तक पुत्र था। राजा भारमल के बाद उसके पुत्र भगवानदास को आम्बेर (Amber) की गद्दी मिली थी। भगवानदास के कोई पुत्र नहीं था। इसलिए भगवानदास ने अपने नौ भाइयों में से किसी एक भाई के पुत्र मानसिंह को गोद लिया था।

जिस समय राजा भारमल ई.1560 में पहली बार अपने पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह को लेकर अकबर से मिला, उस समय अकबर की आयु 18 वर्ष तथा मानसिंह की आयु 10 वर्ष थी। अकबर तथा राजा भारमल की इस भेंट के बारे में हम पिछले आलेखों में चर्चा कर चुके हैं।

इसी भेंट में राजा भारमल ने अपनी पुत्री हीराकंवर (Heera Kunwari) का विवाह अकबर से करना निश्चित किया था। इसी भेंट में अकबर ने अपने पुत्र भगवान दास तथा पौत्र मानसिंह को अकबर के दरबार में भेजना निश्चित किया था। इसी भेंट के बाद अकबर और मानसिंह अच्छे मित्र बन गए थे। इस कारण ही राजपूताना के राजाओं के अकबर के मैत्री-सम्बन्ध साथ बनने आरम्भ हुए थे।

जब आम्बेर की राजकुमारी का विवाह अकबर से हो गया तब अकबर ने हीराकंवर के पिता भगवान दास को अपने हरम की सुरक्षा का भार सौंप दिया। राजा भगवानदास ई.1588 तक जीवित रहा किंतु अकबर ने राजा भगवानदास के साथ-साथ उसके पुत्र मानसिंह को भी शासन में अनेक महत्वपूर्ण जिम्मदारियां सौंपी।

जब तक भगवानदास जीवित रहा तब तक मानसिंह को अकबर के महलों में कुंवर कहा जाता था और भगवानदास की मृत्यु के बाद उसे राजा कहा जाने लगा। अकबर ने मानसिंह को मिर्जा की उपाधि दी थी। यह उपाधि केवल तैमूर के वंशजों को मिलती थी। इसी आधार पर बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर कुंवर मानसिंह को अपना पुत्र मानता था किंतु यह बात सही नहीं है।

सही बात यह है कि अकबर और मानसिंह घनिष्ठ मित्र थे। वे साथ-साथ बैठकर शराब पीते थे। शराब के नशे में कुश्ती लड़ते थे और गुत्थम-गुत्था होकर पड़ जाते थे। जब शराब का नशा उतर जाता तो कई-कई दिनों तक एक-दूसरे को अपनी शक्ल तक नहीं दिखाते थे। ऐसी स्थिति में उनके बीच पिता-पुत्र का सम्बन्ध नहीं हो सकता था, अपितु मित्र का सम्बन्ध ही हो सकता था!

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने खानखानानामा में अकबर और मानसिंह की एक कुश्ती का चित्र दिया है। इस चित्र में अकबर मानसिंह के ऊपर सवार है और उसने मानसिंह का गला दबोच रखा है। मानसिंह की स्थिति इतनी खराब है कि एक दरबारी अकबर को बीरबल के ऊपर से हटा रहा है तथा समस्त दरबारी चिंतित होकर चिल्ला रहे हैं।

पी एन ओक ने लिखा है कि अकबर का शराब-प्रेम जगजाहिर था। शराब के नशे में अकबर द्वारा एक बार मानसिंह का गला दबाया गया था और फिर जहर भी खिलाने का प्रयास किया गया था किंतु भूल से अकबर ही वे गोलियां खा बैठा।

ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अभियान करने का निश्चय किया। उसने चित्तौड़ पर आरोप लगाया कि उसने अकबर के शत्रु बाजबहादुर को अपने यहाँ शरण दी।

20 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से दस मील उत्तर-पूर्व में अपनी छावनी डाली। इस समय मानसिंह केवल 17 साल का लड़का था। उसने चित्तौड़ दुर्ग का पतन होते हुए अपनी आंखों से देखा था।

आगे चलकर मानसिंह ने मेवाड़ को अकबर के अधीन करने के उद्देश्य से अपनी आधी जिंदगी खपा दी किंतु मानसिंह मेवाड़ को अकबर के अधीन नहीं कर सका। इसके लिए अकबर ने मानसिंह को अपमानित भी किया। हल्दीघाटी की लड़ाई के बाद कुछ समय के लिए अकबर और मानसिंह के सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे।  मानसिंह ने जीवन भर अकबर तथा उसके पुत्र जहांगीर (JAHANGIR) के लिए तलवार चलाई।

अंतिम सांस तक मानसिंह तलवार चलाता रहा। भारत से लेकर अफगानिस्तान तक ऐसा कोई मोर्चा नहीं था जहाँ मानसिंह अपने घोड़े पर बैठकर नहीं गया।

उसने मेवाड़, गुजरात, स्यालकोट, सिंध, अटक, काबुल, बिहार, उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान का कोई कोना नहीं छोड़ा जहाँ उसने अकबर तथा जहांगीर (JAHANGIR) के लिए युद्ध न किया हो और उसे न जीता हो!

मुगलों की इतनी सेवा करने पर भी मानसिंह का जीवन मुगलों द्वारा किए गए अपमान से छलनी होता रहा। जब मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में न तो महाराणा को पकड़ सका, न मार सका, न उसका राज्य छीन सका, न उससे अधीनता स्वीकार करवा सका तो अकबर ने मानसिंह को अपमानित किया। उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी। अर्थात् मानसिंह लम्बे समय तक अकबर के महल की सीढ़ियां नहीं चढ़ सका।

मानसिंह की बुआ हीराकंवर का विवाह अकबर (Akbar) के साथ हुआ था जिसके पेट से सलीम अर्थात् जहांगीर का जन्म हुआ था। मानसिंह को अपनी बहिन मानबाई का विवाह अकबर के इसी पुत्र सलीम के साथ करना पड़ा। सलीम को मानसिंह से जबर्दस्त चिढ़ थी।

इसलिए सलीम ने एक दिन शराब के नशे में धुत्त होकर मानसिंह की बहिन मानबाई (Man Bai) को कोड़ों से पीट-पीटकर अधमरी कर दिया। मानबाई ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली और इससे नाराज होकर अकबर ने सलीम की जगह सलीम के पुत्र खुसरो (Khusro) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का मन बनाया।

जब अकबर मरने लगा तो अकबर ने अपने महल के चारों ओर मानसिंह का पहरा लगवाया किंतु जहांगीर ने रामसिंह कच्छवाहे (Ram Singh Kachhwaha) की सहायता से न केवल अकबर के ताज और राज पर कब्जा कर लिया अपितु अकबर की मृत्यु हो जाने पर मानसिंह का अपमान करके बंगाल भेज दिया।

दो साल बाद जहांगीर ने मानसिंह को बंगाल से अपने पास तलब किया। उस समय जहांगीर (JAHANGIR) काबुल में था। इसलिये मानसिंह बंगाल से रवाना होकर आगरा पहुंच गया और वहीं पर बादशाह के आगरा लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।

जब फरवरी 1608 में बादशाह आगरा पहुंचा तो मानसिंह उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। जहांगीर बुरी तरह से चिढ़ गया। उसने भरे दरबार में मानसिंह को कपटी और बूढ़ा भेड़िया कहकर उसकी भर्त्सना की।

8 जून 1608 को मानसिंह ने अपने पुत्र जगतसिंह (Raja Jagat Singh of Amber) की पुत्री का विवाह जहांगीर से किया। जहांगीर ने मानसिंह की पौत्री से तो विवाह कर लिया किंतु मानसिंह को शहजादे परवेज (Shahzada Parvez)  के अधीन, दक्षिण के मोर्चे पर लड़ने भेज दिया। अकबर के समय में मानसिंह मुगलों का प्रधान सेनापति था किंतु जहांगीर ने शहजादे परवेज को प्रधान सेनापति बनाकर, उसके नीचे तीन सेनापति रखे जिनमें से मानसिंह एक था।

6 जुलाई 1614 को एलिचपुर के मोर्चे पर राजा मानसिंह की मृत्यु हो गई। जहांगीर (JAHANGIR) ने अपनी आत्मकथा में राजा मानसिंह की रानियों की संख्या 1500 बताई है। ब्लॉचमैन ने भी इसी संख्या को स्वीकार किया है तथा प्रत्येक रानी से दो या तीन बच्चे होने का उल्लेख किया है। यह संख्या सही नहीं है। आमेर की पुरानी वंशावलियों में मानसिंह की लगभग दो दर्जन स्त्रियों एवं एक दर्जन बच्चों का उल्लेख हुआ है। उसके रनिवास में विभिन्न प्रांतों से आई हुई स्त्रियां भी रहती थीं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

बीरबल को अपने हरम में घुसने की अनुमति दे दी अकबर ने( 75)

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बीरबल को अपने हरम में घुसने की अनुमति दे दी अकबर ने

माना जाता है कि अकबर और बीरबल के किस्से उन्नीसवीं सदी में किसी लेखक ने अपनी कल्पना के आधार पर लिखे जिन्हें आगे से आगे विस्तार मिलता गया।

बीरबल (Raja Birbal) अकबर (Badshah Akbar) के दरबार में प्रमुख मंत्री एवं सेनापति था। वह न केवल बादशाह का सलाहकार था अपितु अकबर द्वारा घोषित नवरत्नों में से एक था। बीरबल का वास्तविक नाम महेशदास (Mahesh Das) था। उसका जन्म ई.1528 में महर्षि कवि के वंशज जिझौतिया ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

बीरबल के जन्मस्थान के बारे में बहुत से मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वान उन्हें आगरा का, कुछ विद्वान कानपुर के घाटमपुर तहसील का, कुछ विद्वान दिल्ली का, कुछ विद्वान मध्यप्रदेश के सीधी जिले का निवासी बताते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार महेशदास का जन्म राजस्थान के नागौर (Nagaur) कस्बे में हुआ था। अधिकतर विद्वान मध्यप्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गाँव को बीरबल का जन्मस्थल मानते हैं।

महेशदास बचपन से ही तीव्र बुद्धि का था। वह विभिन्न भाषाओं में गीत लिखता और उन्हें संगीत की धुन के साथ गाता था। अकबर एवं बीरबल की भेंट के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार एक बार बादशाह अकबर ने अपने पान लगाने वाले सेवक से कहा कि वह बाजार जाकर एक पाव चूना ले आए।

अकबर के सेवक ने महेशदास पनवाड़ी की दुकान पर जाकर कहा कि बादशाह के लिए एक पाव चूना दे दो। जब बीरबल ने अकबर के सेवक की यह बात सुनी तो उसने अचम्भा व्यक्त करते हुए कहा कि आज तक बादशाह ने इतना चूना नहीं मंगवाया। अवश्य ही तेरे द्वारा लगाए गए पान के चूने से बादशाह की जीभ कट गई है।

इसलिए बादशाह यह चूना तुझे ही खिलायेगा। इसलिए तू चूने के साथ इतना ही घी भी ले जा। जब बादशाह चूना खाने को कहे तो चूना खाने के बाद घी पी लेना। इससे तेरी जान नहीं जाएगी।

पनवाड़ी की सलाह पर बादशाह के सेवक ने चूने के साथ घी भी खरीद लिया। जब उसने अकबर को चूना ले जाकर दिया तो अकबर ने सेवक को आदेश दिए कि वह इस चूने को खा ले। सेवक ने चूना खा लिया तथा उसके बाद महेशदास की सलाह के अनुसार घी भी पी लिया।

अगले दिन जब बादशाह का सेवक पुनः पान लेकर अकबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो अकबर उसे जीवित देख आश्चर्य चकित हुआ। उसने सेवक से पूछा कि वह चूने खाकर मरा क्यों नहीं?

इस पर अकबर (Akbar) के सेवक ने अकबर को अपने जीवित रहने का कारण बताया तो बादशाह ने महेशदास को अपने दरबार में बुलवाया। इस प्रकार बादशाह अकबर और बीरबल की पहली बार भेंट हुई जो आगे चलकर प्रगाढ़ मैत्री-सम्बन्धों में बदल गई।

कहा नहीं जा सकता कि इस प्रसंग में कितनी सच्चाई है किंतु अकबर और बीरबल (Birbal) के सम्बन्ध में इस तरह की सैंकड़ों कहानियां प्रचलित हैं जिनमें बीरबल की बुद्धिमानी का वर्णन किया गया है। इनमें से कोई भी कहानी किसी भी समकालीन अभिलेख में नहीं मिलती है।

जब किसी ऐतिहासिक पात्र के सम्बन्ध में किम्वदन्तियां जुड़ जाती हैं तो उनमें से इतिहास को ढूंढ पाना कठिन हो जाता है। बीरबल के साथ भी यही हुआ है। माना जाता है कि अकबर और बीरबल के किस्से उन्नीसवीं सदी में किसी लेखक ने अपनी कल्पना के आधार पर लिखे जिन्हें आगे से आगे विस्तार मिलता गया।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार महेशदास मध्यप्रदेश के घोघरा गांव में रहता था। उसके पूर्वज संस्कृत के विद्वान थे और कवि कर्म करते थे। अतः ऐसी अवस्था में बीरबल आगरा का का कैसे हो सकता था? वह संस्कृत, हिन्दू, फारसी तथा ब्रज भाषाओं का विद्वान था। ऐसा व्यक्ति पनवाड़ी कैसे हो सकता था?

बीरबल विभिन्न भाषाओं में गीत लिखकर उन्हें संगीत के साथ गाता था जिसके कारण वह दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया था। अकबर की सेवा में आने से पहले महेशदास पन्ना के राजा रामचंद्र के यहाँ नौकरी करता था जहाँ उसका नाम ब्रह्मकवि था। उसका विवाह एक सम्पन्न परिवार की कन्या से हुआ था। इसलिए उसके पनवाड़ी होने की संभावना बिल्कुल समाप्त हो जाती है।

मान्यता है कि महेशदास पहला हिन्दू था जो अकबर के दरबार (Akbar’s Court) में मंत्री बना। यह भी कहा जाता है कि अकबर ने बादशाह बनने के कुछ दिनों बाद ही महेशदास को अपना मंत्री बना लिया था। उस समय अकबर 14 साल का था और महेशदास की आयु 28 वर्ष थी। महेशदास ने अकबर की तीस साल तक सेवा की।

पाठकों को स्मरण होगा कि संगीत सम्राट कहा जाने वाला तानसेन भी पन्ना के राजा रामचंद्र के दरबार में नौकरी करता था जिसे अकबर ने अपनी सेवा में बुला लिया था। अतः पर्याप्त संभव है कि अकबर को तानसेन के सम्बन्ध में जानकारी महेशदास ने ही दी होगी।

महेशदास स्वभाव से दयालु, विनम्र, बुद्धिमान, कवि-हृदय एवं तुरंत जवाब देने वाला व्यक्ति था। उसकी निश्छल हास्य-प्रियता के कारण अकबर उसे पसंद करने लगा। अकबर ने महेशदास को बीरबल की उपाधि दी।

कुछ लोगों के अनुसार यह उपाधि ‘बिर-बर’ अथवा ‘विर-वर’ थी। तुर्की भाषा में इस शब्द का अर्थ ‘हाजिर-जवाब’ होता है। यही ‘बिर-बर’ शब्द आगे चलकर बीरबल में बदल गया।

कुछ विद्वानों के अनुसार बेताल-पच्चीसी नामक लोक-कथा में वीरवर नामक एक बुद्धिमान पात्र है जो अपने राजा के प्रति अत्यंत निष्ठा का प्रदर्शन करता है। उसी वीरवर के अनुकरण में अकबर ने महेशदास को वीरवर की उपाधि दी जो घिसपिट कर बीरबल हो गई।

अकबर द्वारा दी गई यह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि लोग महेशदास का वास्तविक नाम भूल गए और उसे बीरबल नाम से ही जानने लगे। यद्यपि बीरबल कवि एवं गायक था किंतु अकबर के दरबार में बीरबल की प्रमुख भूमिका सैनिक एवं प्रशासनिक थी।

बीरबल (Raja Birbal) भी मानसिंह (Raja Mansingh) की तरह अकबर का अत्यंत निकटतम मित्र था। अकबर (Shahnshah Akbar) ने बीरबल को कांगड़ा की तरफ एक जागीर भी प्रदान की थी जहाँ वह शायद ही कभी जा पाया था।

जिस तरह टोडरमल (Raja Todarmal) भूराजस्व एवं वित्तीय मामलों का जानकार होते हुए भी सैनिक अभियानों का नेतृत्व करने के लिए भेजा जाता था, उसी प्रकार बीरबल को भी कवि होते हुए भी सैनिक अभियानों का नेतृत्व करने के लिए भेजा जाने लगा।

अकबर ने उसे दो हजार का मनसब प्रदान किया। अकबर बीरबल से इतना प्रसन्न रहता था कि उसने बीरबल को अपने हरम में प्रवेश करने की अनुमति दे रखी थी। यह सम्मान अकबर के अतिरिक्त किसी भी अन्य पुरुष को प्राप्त नहीं था। फतहपुर सीकरी के किले में अकबर ने बीरबल का महल अपने महल के निकट ही बनवाया था जिसे आज भी देखा जा सकता है।

राजा बीरबल के प्रभाव से गाय एवं गोबर को पवित्र मानने लगा अकबर (76)

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राजा बीरबल के प्रभाव से गाय एवं गोबर को पवित्र मानने लगा अकबर

अपने पूर्वजों की तरह अकबर (Akbar) भी मजहबी विचारों में कट्टरता का पालन करता था किंतु राजा बीरबल (Raja Birbal) के प्रभाव से वह गाय एवं गोबर को पवित्र मानने लगा।

अकबर ने टोडरमल (Raja Todarmal) को चार हजार का, मानसिंह को पांच हजार का तथा राजा बीरबल को दो हजार का मनसब दिया था। मनसब की दृष्टि से राजा बीरबल का दर्जा बहुत नीचा था किंतु उसका सम्मान टोडरमल तथा मानसिंह जैसा ही था, अपितु कई मामलों में उनसे भी बढ़कर था।

आज अकबर के साथ बीरबल का नाम एक मसखरे तथा विदूषक की तरह जुड़ गया है किंतु बीरबल विदूषक अथवा मसखरा नहीं था। वह अपने समय का श्रेष्ठ व्यक्ति था जिसे अकबर अंतःपुर में भी अपने साथ रखना पसंद करता था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni) ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख (Muntakhab ut-Tawarikh) में बीरबल को भट्ट एवं ब्रह्मभट्ट की जगह मंगता एवं भाट लिखा है जो जगह-जगह अपनी कविताएं सुनाता हुआ घूमता था। बदायूंनी लिखता है- ‘अकबर को अपने राज्य के प्रथम वर्ष में ही एक मंगता, बरहमन भाट मिल गया जिसका पेशा हिंदुओं का गुनगान करना था।

उसके कारण बादशाह की हालत मन् तू शुदम् तू मन शुदी, मन तन् शुदम्  तू जाँ शुदी। अर्थात् मैं तू हो गया, तू मैं हो गया, मैं तन हो गया और तू जान हो गया, जैसी हो गई।’

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है- ‘अकबर ने अपने दरबारियों के घर जाकर भोजन करने की परम्परा आरम्भ की। जब अकबर उनके घर जाता तो उसके दरबारी, अकबर के स्वागत में अपने घर को खूब सजाते। मखमल, जरबफत कमखाब के पायंदाज बिछाते। बादशाह की सवारी आने पर सोने-चांदी के फूल बरसाते, थाल के थाल मोती निछावर करते।

सवा लाख रुपया नीचे रखकर चबूतरा बांधते जिसके ऊपर बादशाह के बैठने के लिए गद्दी तैयार की जाती। लाल, जवाहर, शाला-दुशाला मखमल जरबफत, कीमती हथियार, सुंदर लौंडियाएं और गुलाम, हाथी-घोड़े तथा लाखों रुपए बादशाह के हुजूर में हाजिर किए जाते।’

लोगों ने राजा बीरबल (Raja Birbal) से कहा कि सब दरबारी अमीर और बेग, बादशाह की दावत करते हैं, तुम भी करो। बीरबल ने उनकी बात मान ली तथा बादशाह को अपने महल में भोजन करने के लिए आमंत्रित किया।

जब अकबर (Badshah Akbar) बीरबल के महल में भोजन करने पहुंचा तो बीरबल ने उसके स्वागत की कोई तैयारी नहीं की तथा बादशाह के आने पर बहुत साधारण भोजन प्रस्तुत किया किंतु बादशाह के सम्मान में ऐसी-ऐसी कविताएं पढ़ीं कि बादशाह वहाँ से बहुत संतुष्ट होकर गया।

बीरबल के घर में मिली साधारण दावत से बादशाह अकबर (AKBAR), राजा बीरबल की निर्धनता को ताड़ गया। उसने बीरबल को एक जागीर देने का निश्चय किया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि ई.1572 में अकबर के सेनापति हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) ने नगरकोट एवं कांगड़ा पर विजय प्राप्त की।

बादशाह के घनिष्ट मित्र राजा बीरबल को इस इलाके में एक जागीर दी गई किंतु कुछ ही समय बाद मिर्जा इब्रहीम (Mirza Ibrahim) नामक एक शहजादे ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया। इस पर बादशाह अकबर को यह इलाका छोड़ना पड़ा किंतु उसने बीरबल को इस जागीर के बदले में पांच मन सोना देकर संतुष्ट किया।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि एक बार एक हाथी बिगड़कर बीरबल की ओर दौड़ा। इस पर बादशाह अपना घोड़ा लेकर उस हाथी और बीरबल के बीच में आ गया। इस कारण हाथी रुक गया और बीरबल की जान बच गई। कुछ समय में बीरबल ने अकबर का इतना विश्वास जीत लिया कि वह अकबर का धार्मिक मामलों में मार्गदर्शन करने लगा।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने अपनी पुस्तक अकबरनामा (AKBARNAMA) में बीरबल की प्रशंसा की है जबकि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में बीरबल की बड़ी निंदा की है।

मुल्ला लिखता है- ‘इस हिन्दू गायक ने अपनी बुद्धि के जोर पर बादशाह का विश्वास जीत लिया। उसने अकबर को इस बात के लिए सहमत कर लिया था कि मनुष्य को उगते हुए सूर्य की ओर देखना चाहिए न कि डूबते हुए सूर्य को। मनुष्य को अग्नि, जल, पहाड़, वनस्पति, गाय तथा गोबर को पवित्र मानना चाहिए तथा जनेऊ समेत इन सब वस्तुओं की पूजा करनी चाहिए। दुष्ट बीरबल के प्रभाव से अकबर प्रतिदिन उस दिन के ग्रह के अनुसार उसी रंग के कपड़े पहनने लगा। उसने गायों को जिबह करना और उनका गोश्त खाना भी बंद करवा दिया। यहाँ तक कि अकबर अपने महल में होम करने लगा और सार्वजनिक रूप से सूर्य एवं अग्नि को नमन करने लगा।’

अकबर (Akbar) के अन्य मुस्लिम मंत्री भी राजा बीरबल (Raja Birbal) को नापसंद करते थे। कहा जाता है कि अपने काम में असफल रहने वाले किसी भी व्यक्ति से अकबर नाराज हो जाता था किंतु वह फैजी, तानसेन तथा बीरबल से कभी भी नाराज नहीं हुआ।

जब अकबर ने दीन-ए-इलाही चलाया तो अकबर के अनेक मुसलमान एवं हिन्दू मंत्रियों ने दीन-ए-इलाही (Din-i Ilahi) मानने से मना कर दिया। फिर भी बहुत से मुसलमान मंत्रियों ने दीन-ए-इलाही स्वीकार कर लिया किंतु हिन्दू मंत्रियों में Raja Birbal अकेला ही था जिसने दीन-ए-इलाही स्वीकार किया था।

Birbal भी अन्य मुसलमान एवं हिन्दू मंत्रियों की तरह बड़ी आसानी से दीन-ए-इलाही अपनाने से मना कर सकता था किंतु उसने मना नहीं किया क्योंकि उन दोनों के मन इतने एक थे कि जो एक ने किया और कहा, वह दूसरे ने माना और अपनाया। दीन-ए-इलाही तो चीज ही क्या थी!

अकबर तथा बीरबल के मैत्री-सम्बन्धों में और भी कई महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। ई.1586 में अकबर ने बीरबल को अफगानिस्तान के मोर्चे पर भेजा जहाँ युद्ध के मैदान में ही बीरबल की मृत्यु हो गयी।

उसका शव प्राप्त नहीं किया जा सका। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि जब अकबर को इस बात का पता लगा तो वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया। उसने दो-तीन दिन तक भोजन नहीं किया। मरियम मकानी ने बहुत समझाया।

तब जाकर अकबर (Akbar) ने रोना-धोना समाप्त किया। अकबर ने बीरबल का शव ढुंढवाया किंतु वह प्राप्त नहीं किया जा सका।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि बीरबल के मरने पर अकबर को अत्यंत अधीरता और शोक हुआ जिसे देखकर लोग आश्चर्य करते थे। कितने ही आलिम एवं फाजिल, अनुभवी एवं बहादुर, सरदार और दरबारी अकबर के सामने ही मरे थे किंतु अकबर को किसी के मरने पर उतना दुःख नहीं हुआ जितना बीरबल के मरने पर हुआ!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अजेय चित्तौड़ अकबर की आंखों में चुभता था जैसे रावण की आंखों में अयोध्या (77)

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अजेय चित्तौड़

 अजेय चित्तौड़ दुर्ग (Invincible Chittorgarh Fort) महाभारत काल से गंभीरी नदी के तट पर अपना गर्वोन्नत भाल ऊंचा किए खड़ा था। इसने बैक्ट्रिया से आए यूनानी योद्धाओं के आक्रमणों को अपनी आंखों से देखा था। प्रत्येक विदेशी आक्रांता की आंखों में चित्तौड़ का दुर्ग चुभता था।

अकबर (Akbar) की आंखों में भी अजेय चित्तौड़ दुर्ग वैसे ही चुभता था जैसे रावण की आंखों में अयोध्या चुभती थी और कंस की आंखों में नंदगांव चुभता था। मुगलों के आगमन के समय अयोध्या के रघुवंशियों के वंशज अजेय चित्तौड़ दुर्ग पर राज्य करते थे जिन्हें गुहिल, राणा एवं सिसोदिया कहा जाता था।

चित्तौड़ दुर्ग की सेनाओं ने महाराज खुमांण के नेतृत्व में आठवीं शताब्दी ईस्वी में खलीफाओं (Khalifa) की उन सेनाओं को मार डाला था जिन्होंने सिंध के मरुस्थल (Desert of Sindh) को पार करके भारत भूमि पर पहला आक्रमण किया था।

उसी समय से चित्तौड़ दुर्ग विदेशी आक्रांताओं की आंखों की किरकिरी बना हुआ था। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने तथा सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ का दुर्ग जलाया था किंतु दो बार भस्म होने के बाद भी चित्तौड़ का दुर्ग पूरी आन, बान और शान के साथ अपनी ही राख से उठ खड़ा हुआ था और भारत माता के शत्रुओं पर आंख तरेरता रहता था।

महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha) और महाराणा सांगा (Maharana Sanga) ने उत्तर भारत के मुस्लिम शासकों में कसकर मार लगाई थी इसलिए अजेय चित्तौड़ दुर्ग भारत के सभी मुस्लिम शासकों के निशाने पर था। अकबर के दादा बाबर (BABUR)  ने ई.1526 में चित्तौड़ के महाराणा सांगा को खानवा के मैदान में पराजित अवश्य किया था किंतु वह चित्तौड़ दुर्ग नहीं ले सका था।

खानवा (Khanwa) के मैदान में बड़ी संख्या में महाराणा सांगा के नेतृत्व में लड़ने गए हिन्दू राजाओं एवं सैनिकों का संहार हुआ था। राजपूताने में शायद ही कोई ऐसा राजवंश था जिसके वीरों ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति न दी हो।

डूंगरपुर के राजा उदयसिंह, अंतरवेद के माणिकचंद चौहान और चंद्रभाण चौहान, रत्नसिंह चूण्डावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, परमार गोकलदास और खेतसी आदि अनेक हिन्दू राजा इस युद्ध में काम आये। राजस्थान के बहुत से गांवों में आज भी उन सती स्त्रियों के चबूतरे मिलते हैं जिनके पति खानवा के युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए काम आए थे।

ई.1528 में राणा सांगा के निधन के बाद मेवाड़ की सामरिक शक्ति को जबर्दस्त धक्का लगा तथा राजपूताने में हिन्दू राजाओं का संघ बिखर गया। इस दौरान मुगल शक्ति भी हिचकोले खाती रही।

भारत में मुगल शासन की नींव डालने वाला बाबर (BABUR)  तो खानवा और चंदेरी के युद्ध जीतने के बाद बहुत कम समय तक जीवित रह पाया और उसके पुत्र हुमायूँ (HUMAYUN) को बिहार एवं गुजरात के अफगानों ने तंग किए रखा तथा उसे लम्बी अवधि के लिए भारत भूमि से दूर रखा।

 इस कारण राजपूताने के हिंदू राजाओं को कुछ संभलने का अवसर मिल गया। इसी काल में जोधपुर में मालदेव जैसे प्रबल राजा का उदय हुआ किंतु शेरशाह सूरी ने मारवाड़ राज्य की कमर तोड़ दी। उसके पुत्र राव चंद्रसेन ने अपनी जन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिए आजीवन संघर्ष किया।

राव मालदेव (Rao Maldev) और चंद्रसेन (Chandrasen of Marwar) की तरह अजेय चित्तौड़ ने भी अपनी स्वतंत्रता के लिए अथक संघर्ष किया। महाराणा सांगा का पुत्र रत्नसिंह अपने पिता की तरह एक प्रबल राजा एवं दुराधर्ष योद्धा था किंतु दुर्भाग्य से वह केवल तीन साल ही शासन करके ई.1531 में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

रत्नसिंह के बाद सांगा का दूसरा पुत्र विक्रमादित्य मेवाड़ का शासक हुआ किंतु वह अयोग्य था। उसने अपने निजी सेवकों के साथ-साथ राजदरबार में सात हजार पहलवानों को रख लिया जिनकी शक्ति पर उसे मेवाड़ के सामंतों से भी अधिक विश्वास था।

अपने छिछोरेपन के कारण वह सरदारों की दिल्लगी उड़ाया करता था जिससे अप्रसन्न होकर मेवाड़ी सरदार अपने-अपने ठिकानों में चले गये और राज्य-व्यवस्था बहुत बिगड़ गई।

इस स्थिति का लाभ उठाने के लिये गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह (Bahadurshah of Gujrat) ने मेवाड़ पर दो अभियान किये। बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग के कई दरवाजों पर अधिकार कर लिया तथा दुर्ग को बारूद से उड़ाने की धमकी देने लगा।

राजमाता कर्मवती ने मुगल बादशाह हुमायूँ से सहायता मांगी किंतु हुमायूँ (HUMAYUN) ने कर्मवती की सहायता नहीं की। इस पर राजमाता कर्मवती ने बहादुरशाह को चित्तौड़ दुर्ग की अपार सम्पदा देकर दुर्ग को नष्ट होने से बचाया किंतु कुछ ही दिन बाद बहादुरशाह फिर से आ धमका।

राजमाता कर्मवती ने मेवाड़ के सरदारों को पत्र लिखा- ‘अब तक तो अजेय चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उसके हाथ से निकलने का समय आ गया है। मैं किला तुम्हें सौंपती हूँ। चाहे तुम रखो चाहे शत्रु को दे दो। मान लो तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है। तो भी जो राज्य वंश-परम्परा से तुम्हारा है, वह शत्रु के हाथ में चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी।’

राजमाता का यह पत्र पाकर मेवाड़ के सरदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये। महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई कुंवर उदयसिंह को दुर्ग से बाहर भेज दिया गया। दोनों पक्षों में हुए युद्ध में मेवाड़ की पराजय हो गई तथा कई हजार राजपूत सैनिक काम आए।

दुर्ग में स्थित हिन्दू स्त्रियों ने राजमाता कर्मवती (Rakmata Karmawati) के नेतृत्व में जौहर किया। राजमाता कर्मवती को चित्तौड़ के इतिहास में हाड़ी रानी के नाम से भी जाना जाता था।

जैसे ही हुमायूँ (HUMAYUN) को ज्ञात हुआ कि चित्तौड़ दुर्ग का पतन हो गया तो वह बहादुरशाह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये आगे बढ़ा। बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग में आग लगाकर भाग गया तथा एक नाव-दुर्घटना में समुद्र में डूब कर मर गया।

इस पर मेवाड़ के सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये।

मेवाड़ की शक्ति को भारी क्षति पहुंची थी किंतु महाराणा विक्रमादित्य में कोई सुधार नहीं हुआ। मेवाड़ी सामंत पुनः नाराज होकर अपने ठिकानों में चले गए। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर ई.1537 में दासीपुत्र बनवीर (बनवारी) ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी।

उस समय विक्रमादित्य की आयु 19 वर्ष थी। उसके कोई पुत्र नहीं था और उसके छोटे भाई उदयसिंह की आयु 15 वर्ष थी। बनवीर ने कुंवर उदयसिंह (Kunwar Udai singh) की भी हत्या करनी चाही किंतु उदयसिंह की धाय पन्ना गूजरी उदयसिंह को लेकर चित्तौड़ से भाग गई। इससे उदयसिंह के प्राण बचे।

कुंभलमेर (कुंभलगढ़) के महाजन किलेदार आशा देपुरा ने मेवाड़ी सरदारों को एकत्रित करके ई.1540 में कुंवर उदयसिंह को फिर से अजेय चित्तौड़ का स्वामी बनावाया। जब ई.1543 में शेरशाह सूरी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, उस समय चित्तौड़ में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह शेरशाह सूरी (Shershah Suri) की सेना का सामना कर सके।

इसलिए उदयसिंह ने चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां शेरशाह सूरी को भिजवा दीं। शेरशाह, चित्तौड़ आया तथा खवास खाँ के छोटे भाई मियां अहमद सरवानी को वहाँ छोड़कर स्वयं लौट गया।

जब कुछ ही दिनों बाद शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई तो चित्तौड़ के सामंतों ने शेरशाह के प्रतिनिधि को मार भगाया और चित्तौड़ का दुर्ग एक बार फिर से स्वतंत्र होकर अपने शत्रुओं की आंखों में चुभने लगा।

जब अकबर ने चित्तौड़ के लिए प्रस्थान किया, तब महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ का स्वामी था। इस समय चित्तौड़ स्वतंत्र अवश्य था किंतु ई.1526 से लेकर ई.1567 तक चित्तौड़ इतने अधिक वीरों को खो चुका था कि उसमें इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वह अकबर (Akbar) जैसे प्रबल शत्रु का सामना कर सके।

अजेय चित्तौड़ इस बार शत्रु को अपनी चाबियां सौंपने वाला नहीं था। वह शत्रु को चित्तौड़ी आन-बान और शान का परिचय देना चाहता था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

कमजोर वर्गों पर अत्याचार कौन कर रहा है!

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कमजोर वर्गों पर अत्याचार

यह कोई व्यंग्य नहीं है, एक नंगी सच्चाई है कि इस देश के दलितों, जनजातियों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, अन्य पिछड़ों आदि कमजोर वर्गों पर कोई तो अत्याचार कर रहा है। केवल इन पर ही नहीं, इस देश के युवाओं, महिलाओं, बच्चों, सवर्णों, बेरोजगारों पर भी कोई न कोई अत्याचार अवश्य कर रहा है।

कौन है वह अत्याचारी। क्या आपने उसका चेहरा देखा है?

कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने वाले को आपने नहीं देखा ना! मैंने देखा है। इससे पहले कि मैं आपको उस अत्याचारी का चेहरा दिखाऊँ, आपको मेरी बात ध्यान से सुननी और समझनी होगी। मेरी इस बात में कुछ तथ्य हैं और कुछ तर्क। मैं तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर आपको उस अत्याचारी का चेहरा दिखाना चाहता हूँ किंतु इन तथ्यों और तर्कों तक पहुंचने में कोई जल्दबाजी भी नहीं करना चाहता।

कमजोर वर्गों पर अत्याचार एक संवेदनशील मुद्दा है और इससे केवल भारत वर्ष का ही नहीं, हिन्दू समाज का ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता का ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व का अस्तित्व बनता और बिगड़ता है।

कमजोर वर्गों पर अत्याचार के सम्बन्ध में तर्कों और तथ्यों से पहले, मैं आपको दो-तीन छोटी-छोटी कहानियों का स्मरण कराना चाहता हूँ, क्योंकि कहानियों के माध्यम से बड़ी से बड़ी बात आसानी से समझी जा सकती है। मैं आपको पहले से ही सुनी-सुनाई कोई झूठी कहानियां नहीं सुनाउंगा, अपितु उन कहानियों के पीछे छिपी सच्चाइयों तक ले जाने का प्रयास करूंगा।

झूठी कहानी कोई भी हो, मन को तसल्ली तो देती है किंतु झूठी कहानियों की नंगी सच्चाई यह है कि झूठी कहानियां बनाने, झूठे दर्शन गढ़ने और झूठे सिद्धांत बनाने से बुरे आदमी का ही लाभ होता है और प्रत्येक सच्चे आदमी का नुक्सान होता है।

झूठे आदमी का नुक्सान तो सच्ची कहानी से होता है न कि किसी झूठी कहानी से।

संसार भर में हजारों सालों से प्रचलित एक झूठी कहानी तो यह है कि शेर जंगल का राजा होता है! हम सचमुच ही जीवन भर इस सिद्धांत पर विश्वास करके चलते हैं कि शेर जंगल का राजा होता है, लेकिन इस झूठी कहानी से शेर का कोई लाभ नहीं होता, गीदड़ों का लाभ होता है। वास्तव में शेर कहीं का राजा नहीं होता। वह भी दूसरे जानवरों की तरह ही एक सामान्य और हिंसक जानवर होता है जो पेट की आग बुझाने के लिए जंगल में भटकता रहता है।

जंगल की क्रूर सच्चाई यह है कि शेर तब तक ही राजा है जब तक उसका सामना खरगोश और हिरण जैसे निरीह जानवरों से हेता है। शेर तब तक ही राजा है जब तक कि जंगल के छोटे-छोटे दुष्ट प्राणी एक साथ मिलकर उस पर हमला नहीं कर देते। इन दुष्ट जानवरों में भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते और कमजोर माने जाने वाले सियार तथा गीदड़ भी हो सकते हैं।

हाँ, सच यही है कि 10-12 भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते और या गीदड़ योजना बनाकर आते हैं और जंगल के राजा को घेरकर मार डालते हैं। जंगल में और भी शेर, बाघ, चीते, तेंदुए दूर खड़े इस दृश्य को देख रहे होते हैं किंतु वे जंगल के राजा की सहायता करने नहीं आते। क्योंकि उन तथाकथित राजाओं को पता है कि वे इन छोटे समझे जाने वाले दुष्ट जानवरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि वे हमेशा झुण्ड में रहकर हमला करते हैं।

दूसरी ओर भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते, सियार और गीदड़ जानते हैं कि जंगल के राजा की सहायता करने के लिए कोई नहीं आएगा।

इसके विपरीत जब कोई शेर किसी जंगली भैंसे पर आक्रमण करता है तो तुरंत ही 10-20 जंगली भैंसे दौड़ते हुए आते हैं और उस आक्रमणकारी शेर को घेर लेते हैं, यदि शेर तुरंत ही वहाँ से भाग नहीं जाता, तो तुरंत ही मारा जाता है।

क्या इस कहानी से कुछ स्पष्ट होता है कि जंगल में कमजोर वर्गों पर अत्याचार कौन कर रहा है?

अब एक और झूठी कहानी की चर्चा करते हैं जिसमें कहा गया है- सिंहन के लेहंड़े नहीं, हंसन की नहीं पाँत। लालन की नहीं बोरियाँ, साधु न चलें जमात।

अर्थात् शेरों के कभी झुंड नहीं होते, हंस कभी कतार बाँधकर नहीं उड़ते, कीमती रत्नों की कभी बोरियां नहीं भरी जातीं और सच्चे साधु कभी भीड़ या जमात बनाकर नहीं चलते। ये सभी अपनी अपनी श्रेष्ठता में अकेले ही काफी हैं।

यहाँ हमारी दूसरी कहानी में छिपा झूठ इस रूप में सामने आता है कि सिंह केवल इसीलिए गीदड़ों और जंगली कुत्तों के द्वारा मारे दिए जाते हैं क्योंकि वे झुण्ड में नहीं होते। जब शेरों को पेट की आग सताती है, तब वे भी झुण्ड बनाते हैं और तब वे हाथी तक का शिकार कर लेते हैं, भेड़िए, लक्कड़बग्घे और गीदड़ कभी भी शेरों के झुण्ड पर हमला नहीं करते। दूर से ही निकल जाते हैं।

हंस भी इसी कारण आकाश में सुरक्षित रूप से रहकर यात्रा कर पाते हैं क्योंकि वे कतार बांध कर उड़ते हैं, जैसे ही वे कतार से अलग हुए, वे रास्ता भटक जाते हैं और कोई बाज आकर उनका शिकार कर लेता है।

रत्न अर्थात् कीमती वस्तुएं बोरियों अर्थात् तिजोरियों में बंद करके रखे जाते हैं तो ही सुरक्षित रह पाते हैं। इसी प्रकार साधु भी अपनी जमात में ही सुरक्षित रह पाता है अन्यथा उसका वही हाल होता है जो पालघर में दो साधुओं और उनके एक साथी का हुआ था।

भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। भारत के लोगों ने कई तरह की झूठी कहानियां बना ली हैं जैसे कि हम कभी विश्वगुरु थे। निश्चित रूप से हम वेदों में प्रकट हुए ज्ञान के बल पर यह कह रहे थे किंतु भारत के वेदों को दुनिया के कितने लोगों ने माना और अपनाया? क्या कभी विश्वगुरु रहा भारत कमजोर वर्गों पर अत्याचार करता है।

क्या हम किसी व्यक्ति से यह पूछने का साहस कर सकते हैं कि भारत ऐसा कैसा विश्वगुरु था जिसके चलते दुनिया भर के मजहबों ने जन्म लिया और वे न केवल विश्वगुरु पर अपितु पूरी दुनिया पर तलवार लेकर टूट पड़े!

सच तो यह है कि विश्वगुरु होने वाली कहानी झूठी है। यह झूठी कहानी भारत के लोगों की रक्षा न तब कर सकी और न अब कर सकेगी।

भारत के लोगों की एक झूठी कहानी यह भी है- अनेकता में एकता। सच्चाई यह है कि अनेकता में कभी एकता नहीं होती। एकता में ही एकता होती है। इसीलिए वेदों में कहा गया है-

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।

अर्थात्- वेदों का ऋषि समाज से कहता है कि तुम सब एक साथ चलो, एक साथ बोलो और तुम्हारे मन एक समान होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार प्राचीन काल में देवता एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, वैसे ही तुम भी अपनी एकता बनाए रखो।

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।

कुछ समय पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक भाषण में इस वेदमंत्र को उद्ध्त कियाा था। इसका अर्थ यह कि ऋषि समाज का आह्वान करता है कि तुम सबके विचार समान हों, तुम्हारी सभा (संगठन) एकतापूर्ण हो, तुम्हारे मन और चित्त एक हों। मैं तुम्हें समान विचार से अभिमन्त्रित करता हूँ और समान श्रद्धा के साथ तुम्हारी आहुति स्वीकार करता हूँ।

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।

अर्थात् तुम सबका संकल्प एक जैसा हो, तुम्हारे हृदय एक समान हों और तुम्हारा मन एक हो, जिससे तुम्हारा पारस्परिक संगठन और सहयोग पूर्णतः सुदृढ़ हो सके।

ऋषियों ने ये मंत्र क्यों लिखे। इसलिए लिखे क्योंकि वे जानते थे कि यदि हम एक नहीं हुए तो बुरे विचारों वाले लोग, मक्कार लोग, दुष्ट लोग, हिंसक लोग हमें मारकर नष्ट कर देंगे। वेदों में एक भी मंत्र ऐसा नहीं है जो भारत के लोगों को कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने के लिए उकसाता है।

हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि ऋषियों ने हमें ये मंत्र तो दिए जिनके बल पर हमने स्वयं को विश्वगुरु मान लिया किंतु हम इन मंत्रों को जीवन में उतारने में सफल नहीं रहे। हम कभी एक नहीं रह सके। कभी एक साथ नहीं चल सके। हमने स्वयं को अपने-अपने स्वार्थों और मनसिक कुंठाओं की अलग-अलग गुफाओं में बंद कर लिया।

यही कारण था कि दुनिया भर के भेड़ियों, जंगली कुत्तों, लक्कड़भग्गों और गीदड़ों ने स्वयं को शेर मानने वाले विश्वगुरु पर बार-बार हमले किए और हम एक जुट होकर उनका सामना करने की बजाय स्वयं को विश्वगुरु बताकर उन्हें डराने का प्रयास करते रहे।

हम समझ ही नहीं पाए कि भेड़ियों, जंगली कुत्तों, लक्कड़भग्गों और गीदड़ों को शेर के गौरव, गरिमा और महिमा से कुछ लेना-देना नहीं होता। उनके लिए सबसे बड़ा मंत्र पेट की भूख है, मन की आग है, दिमाग की अशांति है। लाल खून की प्यास है और पीले सोने की भूख है।

अब हम कुछ रहस्यमय गुफाओं की बात करते हैं जिनका निर्माण 1947 में आजादी मिलने के बाद हुआ और पूरे भारतीय समाज को बंद कर दिया गया है। इन गुफाओं में दलितों, पिछड़ों और अन्य पिछड़ों पर ही नहीं भारत के प्रत्येक नागरिक पर अत्याचार किया जा रहाहै। क्या ही अच्छा हो यदि हम इन गुफाओं की बात करने से पहले पश्चिमी विद्वान प्लेटो द्वारा लिखे गए गुफा के सिद्धांत की चर्चा करते हैं। इस सिद्धांत से कमजोर वर्गों पर अत्याचार की धारणा का कुछ स्पष्टीकरण मिल सकता है!

प्लेटो हमें एक ऐसी गुफा की कल्पना करने को कहते हैं जहाँ कुछ लोग बचपन से ही जंजीरों में बंधे हैं। वे कैदी गुफा में बनी केवल एक दीवार की ओर ही देख सकते हैं जो आके से बंद है किंतु अर्द्धपारदर्शी है। जंजीरों में बंधे इन लोगों को पीछे मुड़कर दूसरी दीवार देखने की छूट नहीं है जिसमें एक लम्बा सा मार्ग खुला हुआ है जिससे होकर गुफा से बाहर जाया जा सकता है।

जंजीरों में बंधे हुए कैदी जिस दीवार की तरफ देखते हैं, उस दीवार के दूसरी तरफ आग जल रही है। आग और कैदियों के बीच एक संकरा रास्ता है जहाँ से कुछ दुष्ट लोग तरह-तरह के पशु-पक्षियों की आकृतियों के खिलौने लेकर गुजरते हैं। जब वे घोड़े की आकृति का खिलौने लेकर निकलते हैं तो कैदियों को मुर्गे की आवाज सुनाते हैं। घोड़े की यह आकृति सदैव काले रंग की होती है।

जब वे दुष्ट लोग मुर्गे की आकृति लेकर चलते हैं तो उस समय कैदियों को घोड़े की आवाज सुनाई देती है। 

जीवन भर इन्हीं दृश्यों को देखकर गुफा में बंद कैदी दीवार पर उभरने वाली उन आकृतियों की परछाइयों को ही असली दुनिया मान लेते हैं। वे मानते हैं कि घोड़ा केवल काला होता है और उसकी आवाज मुर्गे जैसी होती है। मुर्गा भी केवल काला होता है और उसकी आवाज घोड़े की हिनहिनाहट जैसी होती है। इन कैदियों के लिए दुनिया में केवल दो ही रंग हैं एक घोड़े और मुर्गे का अर्थात् काला और दूसरा आग का अर्थात् लाल।

इन कैदियों में से कुछ बुद्धिमान कैदी भी होते हैं जो तरह-तरह के तर्क-वितर्क और दर्शन के आधार पर व्याख्या करते रहते हैं कि घोड़े और मुर्गे का रंग काला होने पर भी उनकी आवाजें अलग-अलग क्यों हैं? आग का रंग लाल ही क्यों है, दुनिया में केवल काला और लाल रंग ही क्यों है? बहुत से कैदियों ने यह भी व्याख्या की है कि घोड़ा ऐसे क्यों बोलता है और मुर्गा वैसे क्यों बोलता है। गुफा में बंद ये लोग इतने बुद्धिमान हो चुके हैं कि वे ये भी बताते हैं कि इन रंगों और आवाजों से गुफा में बंद कर दिए गए कैदियों का कितना भला हो रहा है!

अचानक एक दिन एक कैदी किसी तरह अपनी जंजीर तोड़ देता है और गुफा में पीछे की ओर बने मार्ग से चलता हुआ गुफा के बाहर निकल जाता है। गुफा से बाहर निकलकर वह हैरान रह जाता है।

जब वह गुफा से बाहर असली दुनिया और चमकीले सूरज को देखता है। उसकी आँखें चौंधिया जाती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उसकी आंखें खुलती हैं और वह हरे रंग के पत्ते, लाल, पीले और सफेद रंग के फूल, नीले रंग का आकाश और बिना रंग का पानी देखता है। वह काले घोड़ों के साथ-साथ भूरे, सफेद और नीले रंग के  घोड़े भी देखता है। वह काले रंग के मुर्गों के साथ-साथ लाल, भूरे, पीले और सफेद रंग के मुर्गे भी देखता है। उसे घोड़ों की हिनहिनाहटें सुनकर आश्चर्य होता है और वह जान जाता है कि यह मुर्गे की आवाज नहीं है। मुर्गे की आाज सुनकर भी जान जाता है कि यह घोड़े की आवाज नहीं है।

वह व्यक्ति जान जाता है कि दुनिया में केवल दो ही रंग नहीं हैं, दो ही आवाजें नहीं हैं, दो ही प्रकार के प्राणी नहीं हैं। दुनिया बहुत बड़ी है और यहाँ प्रत्येक वस्तु कई प्रकार की है।

गुफा से बाहर आया व्यक्ति यह सोचकर दुखी हो जाता है कि आजतक कुछ लोगों को गुफा में बंद करके तथा जंजीरों में बांधकर इसलिए रखा गया है तथा उन्हें दीवार के पीछे जलती हुई आग और चलती हुई परछाइयां इसलिए दिखाई जाती रही हैं ताकि उन लोगों को बेवकूफ बनाकर असली दुनिया देखने से रोका जा सके और कुछ दुष्ट लोगों के स्वार्थ पूरे किए जा सकें।

वह आदमी समझ जाता है कि असली दुनिया गुफा में से दिखने वाली आग और परछाइयों से कहीं अधिक सुंदर और वास्तविक है।

वह आदमी वापस उसी गुफा में लौटकर अन्य कैदियों को वास्तविक दुनिया के बारे में बताता है। गुफा के कैदी पहले तो उसका मजाक उड़ाते हैं और उसे पागल समझने लगते हैं किंतु जब गुफा में लौटकर आया आदमी अपनी बात बार-बार दोहराता है तो गुफा के कैदी उसे पीटते हैं। अंत में उसकी जान ले लेते हैं। क्योंकि गुफा में बंद आदमी कभी भी अपने दिमाग में बन चुकी गुफाओं से बाहर आने को तैयार नहीं होते।

आज से ढाई हजार साल पहले प्लेटो द्वारा लिखा गया यह रूपक आज भी जीवित है। आज भी उस गुफा में बंद लोग मानते हैं कि उनका जो दोस्त बेड़ियां तोडकर गुफा से बाहर गया था, वही है जो कमजोर वर्गों पर अत्याचार करता है। जब से हमारा देश आजाद हुआ है, तब से हमें अलग-अलग तरह की गुफाओं में बंद करके कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने वालों की अलग-अलग परछाइयां दिखाई जा रही हैं।

इन गुफाओं की रक्षा अलग-अलग रंग के कपड़े पहनने वाले लोगों द्वारा की जा रही है। वास्तव में इन गुफाओं के रक्षकों ने ही इन गुफाओं का निर्माण किया है।

कुछ लोगों को दलित नामक एक गुफा में बंद कर दिया गया है और उसमें बंद लोगों से कहा जा रहा है कि सवर्ण जातियों ने हजारों सालों से तुम पर अत्याचार किए हैं। हम तुम्हें उनके अत्याचारों से मुक्त करवाएंगे। इस गुफा के बाहर कुछ लोग हाथी पर बैठे हैं तथा पूरी मुस्तैदी से ध्यान रख रहे हैं कि इस गुफा में बंद आदमी कभी गुफा से निकलकर सच्चाई को न जान लें।

दूसरी गुफाओं में कुछ लोगों को सामाजिक रूप से पिछड़ा, कुछ को आर्थिक रूप से पिछड़ा, कुछ को अतिपिछड़ा तो कुछ को अन्य-पिछड़ा आदि कहकर बंद कर दिया गया है। उन्हें समझाया जा रहा है कि तुम्हारा जीवन केवल आरक्षण से सुधर सकता है और तुम्हें न्याय केवल हम ही दिलवा सकते हैं। इस गुफा का निर्माण एक ऐसे प्रधानमंत्री ने किया था जो फैज टोपी लगाता था। इसलिए इस गुफा की रक्षा करने वाले लोग भी फैज टोपी पहनते हैं। उसने कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने के नाम पर देश में एक नए तरह का अत्याचार लाद दिया।

भारत की आजादी के बाद, छः प्रकार की अलग-अलग धार्मिक एवं मजहबी पहचान वाले लोगों को अल्पसंख्यक नामक गुफा में बंद कर दिया गया है। इस गुफा के बाहर कुछ हरी टोपियां हाथों में पत्थर लिए खड़ी हैं ताकि गुफा की रक्षा भली भांति की जा सके।

एक गुफा में बंद लोगों को कहा जा रहा है कि तुम सवर्ण हो, सरकार दूसरी गुफाओं में बंद लोगों के पक्ष में कानून बनाकर सवर्णों का अर्थात् तुम्हारा हक छीन रह है। इस गुफा की रक्षा करने के लिए गुफा के बाहर कोई नहीं खड़ा।

एक गुफा में देश की समस्त महिलाओं को बंद कर दिया गया है और उन्हें समझाया जा रहा है कि पुरुषों ने हजारों सालों से महिलाओं को घर में कैद करके रखा है और उन पर भयानक अत्याचार किए हैं। इस गुफा की रखवाली कुछ मोटी-ताजी ताकतवर महिलाएं करती हैं ताकि गुफा में बंद महिलाएं गुफा से बाहर आकर पुरुषों के बारे में सच्चाई न जान जाएं।

एक गुफा में देश के युवाओं को बंद कर दिया गया है तथा उन्हें समझाया जा रहा है कि तुम तो जेन-जी हो। तुम पर देश के बूढ़े-बुजुर्ग अत्याचार कर रहे हैं। घरों से निकलो और सरकार पर टूट पड़ो। इस गुफा की रखवाली कुछ युवा लड़के कर रहे हैं।

देश में नित नई गुफाएं बन रही हैं जिनमें कमजोर वर्गों पर अत्याचार के नाम पर उन-उन लोगों को ले जाकर बंद किया जा रहा है जिन पर कभी कोई अत्याचार नहीं हुआ। 

कुछ समय पहले एक गुफा का नाम अजगर अर्थात् अहीर, जाट, गूजर और राजपूत रखा गया था। उसी दौरान एक और गुफा बनाई गई थी जिसके बाहर लिखा गया था- तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।

हाल ही में एक गुफा का नाम पीडीए अर्थात् पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रख दिया गया है। इस गुफा के बाहर कुछ आदमी नीली टोपी पहनकर खड़े हैं ताकि गुफा में बंद लोग बाहर न आ जाऐ।

इन सारी गुफाओं को देखकर लगता है कि इस देश में आजादी के बाद न केवल कमजोर वर्गों पर अत्याचार हो रहे हैं अपितु हर वर्ग के लोगों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं जितने आजादी से पहले भी नहीं रहे होंगे।

इन सारी गुफाओं से थोड़ी ही दूरी पर बुरी तरह से कन्फ्यूज्ड लोगों की एक भीड़ खड़ी है। इस भीड़ ने अपने हाथों में कमल के फूल ले रखे हैं और पीली टोपियां लगा रखी हैं। इस भीड़ में शामिल लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें गुफा में बंद लोगों का करना क्या है। उन्हें कौनसी गुफा में बंद लोगों की रक्षा क्यों और कैसे करनी है! इसलिए कभी एक गुफा की तरफ देखकर कहते हैं कि हमें केवल इसी गुफा की रक्षा करनी है और कभी कहते हैं कि नहीं हमें तो सभी गुफाओं की रक्षा करनी है ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी गुफा में ढंग से बंद रहे तथा घोड़े की आकृति के साथ मुर्गे की आवाज सुनता रहे।

मेरी बात लगभग पूरी हो चुकी है, अब आप स्वयं ही समझ गए होंगे कि भारत में दलितों, पिछड़ों और अन्य पिछड़ों पर कौन अत्याचार कर रहा है!

हम पर कोई अत्याचार नहीं कर रहा। हम सबने स्वयं को अपने-अपने स्वार्थों की गुफाओं में बंद कर लिया है। यह हमारा देश है, हम किसी के बहकावे में आकर अपने देश को बर्बाद न करे। जातियों के बंधन से बाहर निकलें। सामाजिक रूढ़ियों के बंधन से बाहर निकलें। अपने-अपने दिमाग में बन चुकी गुफाओं से बाहर निकलें।

बात केवल इतनी नहीं है कि यह हमारा देश, यह हमारी आने वाली पढ़ियों का भी देश है। उनके लिए सुरक्षित और सुंदर देश बनाना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। नेताओं के बहकावे में आते रहेंगे तो देश को बर्बादी की ओर ले जाएंगे। हमारा एक ही लक्ष्य है- सर्वे भवंतु सुखिनः और यह तब तक प्राप्त नहीं होगा जब तक हम स्वयं को केवल और केवल भारतवासी नहीं समझेंगे। हम उन वैदिक ऋषियों की ओर एक बार तो देखें जो सबके सुख की कामना करते थे। हिंसा छोड़ें, अपने आसपास प्रेम और शांति स्थापित करें।

काश क्या कभी वह दिन भी आएगा जब हम कमजोर वर्गों पर अत्याचार के नाम पर बनाई गई सारी की सारी गुफाओं के लोग एक साथ अपनी अपनी गुफाओं को तोड़ डालेंगे और खुले आकाश में चमकते हुए सत्य के प्रकाश का दर्शन कर सकेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजतरंगिणी : कश्मीर का प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ

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राजतरंगिणी

राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ है जो कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करता है। जानिए इसकी रचना, महत्व और साहित्यिक विशेषताएँ।

परिचय

भारतीय इतिहास में अनेक ग्रंथ अतीत की वास्तविक झलक दिखाते हैं। उनमें से ‘राजतरंगिणी’ (Rajatarangini) विशेष महत्व रखता है। इस आलेख में हम राजतरंगिणी के महत्व, कल्हण की लेखन शैली और इसके ऐतिहासिक साक्ष्यों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

‘राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ है— राजाओं की नदी’। जिस प्रकार एक नदी अपनी धाराओं के साथ निरंतर बहती है, उसी प्रकार कल्हण ने कश्मीर के राजाओं के उत्थान और पतन के इतिहास को एक प्रवाह में पिरोया है। इसकी रचना 1148-1150 ईस्वी के आसपास की गई थी।

राजतरंगिणी (Rajatarangini) भारतीय इतिहास लेखन की उस परंपरा का ग्रंथ है जहाँ ‘तथ्य’ और ‘तर्क’ को प्रधानता दी गई। संस्कृत भाषा में कल्हण द्वारा रचित यह ग्रंथ कश्मीर के गौरवशाली इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास में पहला व्यवस्थित ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया गया है।

कल्हण: भारत के प्रथम वास्तविक इतिहासकार

कल्हण (kalhana) एक निष्पक्ष लेखक थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहासकार को राग-द्वेष’ (पक्षपात) से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने अपनी रचना में राजाओं की प्रशंसा तो की, किंतु उनकी गलतियों और अत्याचारों की आलोचना करने से भी वे पीछे नहीं हटे।

राजतरंगिणी: रचना काल और लेखक

  • लेखक: कल्हण, एक विद्वान कवि और इतिहासकार।
  • रचना काल: 1148 से 1150 ईस्वी के बीच।
  • भाषा: संस्कृत।
  • शैली: महाकाव्य (काव्यात्मक इतिहास)
  • संदर्भ सामग्री: कल्हण ने अपने ग्रंथ की रचना करते समय ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहारा लिया, जिनमें से आज केवल नीलमत पुराण (Neelmat Puran) उपलब्ध है।
  • समय काल: महाभारत काल से लेकर 12वीं शताब्दी तक का इतिहास।

राजतरंगिणी की संरचना

  • यह ग्रंथ काव्य शैली में लिखा गया है।
  • इसमें कुल आठ तरंग (अध्याय) हैं।
  • प्रत्येक तरंग में कश्मीर के विभिन्न शासकों का विवरण क्रमबद्ध रूप से मिलता है।
  • राजतरंगिणी में कुल 7,826 श्लोक हैं।

ऐतिहासिक स्रोत

कल्हण ने इतिहास लिखने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया, जो आज के आधुनिक इतिहासकारों जैसी है:

  1. अभिलेख (Inscriptions): उन्होंने मंदिरों और ताम्रपत्रों पर खुदे लेखों का अध्ययन किया।
  2. सिक्के (Numismatics): तत्कालीन मुद्राओं के माध्यम से आर्थिक स्थिति का आकलन किया।
  3. पुराने दस्तावेज़: उनसे पहले के इतिहासकारों (जैसे नीलमत पुराण) के कार्यों की समीक्षा की।
  4. मौखिक परंपराएँ: लोककथाओं को तथ्यों की कसौटी पर परखा।

राजतरंगिणी के अध्याय

राजतरंगिणी के आठ अध्याय हैं जिन्हें तरंग कहा गया है। इन तरंगों की मुख्य विषय-वस्तु इस प्रकार से है-

  1. प्रथम तरंग: महाभारत काल से कश्मीर के इतिहास का आरंभ। इसमें पांडव वंश के राजकुमारसहदेव द्वारा राज्य स्थापना का उल्लेख है।
  2. द्वितीय तरंग: इसमें मुख्य रूप से गोनन्द वंश के पतन के बाद के राजाओं और एक नए राजवंश के उदय का वर्णन है।
  3. तृतीय तरंग : इसमें कलहण ने गोनन्द वंश (द्वितीय) को सिंहासन की पुनर्प्राप्ति और कुछ ऐसे राजाओं का वर्णन किया है जिनका चरित्र बहुत उदार और महान है। तृतीय तरंग की शुरुआत राजा मेघवाहन (Raja Megh Vahan)के शासनकाल से होती है।
  1. चतुर्थ तरंग: इस ग्रंथ का सबसे गौरवशाली और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें कश्मीर के सबसे शक्तिशाली राजवंश, कर्कोट वंश (Karkota Dynasty) का उदय और विस्तार वर्णित है। इस तरंग का मुख्य आकर्षण सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ (Lalitaditya Muktapida ) का शासनकाल है, जिन्हें “कश्मीर का सिकंदर” भी कहा जाता है।
  2. पंचम तरंग : इसमें कर्कोट वंश के पतन के बाद उत्पल वंश (Utpala Dynasty) का उदय और राजा अवंतीवर्मन (Avantivarman ) के कल्याणकारी शासन का वर्णन है। यह अध्याय युद्धों के बजाय प्रशासनिक सुधारों और इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) के चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है।
  3. षष्ठ तरंग: राजतरंगिणी की छठी तरंग इतिहास की दृष्टि से उतार-चढ़ाव भरी है। इस अध्याय का केंद्र बिंदु एक महिला का प्रभाव है—रानी दिद्दा (Rani Didda)। यह तरंग दिखाती है कि कैसे राजनीति में कूटनीति, क्रूरता और महत्वाकांक्षा का खेल चलता है।
  4. सप्तम तरंग: राजतरंगिणी की सप्तम तरंग (सातवीं तरंग) बहुत लंबी है और यह कश्मीर के इतिहास के एक बहुत ही उथल-पुथल भरे दौर को दर्शाती है। इसमें लोहार वंश (Lohar Dynasty) का विस्तार से वर्णन है, और इसका सबसे प्रमुख और विवादित पात्र है—राजा हर्ष
  5. अष्टम तरंग: कलहण अपनी इस महान कृति को राजा जयसिंह (Raja Jaisingh) के शासनकाल के 22वें वर्ष (लगभग 1149-50 ईस्वी) में समाप्त करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व

  • राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
  • इसमें पौराणिक तत्वों के साथ-साथ तथ्यात्मक विवरण भी मिलता है।
  • कल्हण ने निष्पक्षता से घटनाओं का वर्णन किया है।
  • यह ग्रंथ न केवल कश्मीर अपितु समग्र भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

साहित्यिक विशेषताएँ

  • काव्यात्मक शैली: संस्कृत श्लोकों में रचना।
  • नैतिक दृष्टिकोण: राजाओं के गुण-दोषों का निष्पक्ष वर्णन।
  • इतिहास और साहित्य का संगम: तथ्यात्मकता और काव्य सौंदर्य दोनों का समावेश।

राजतरंगिणी और आधुनिक इतिहासकार

  • आधुनिक इतिहासकारों ने राजतरंगिणी को कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास माना है।
  • अनेक शोधकर्ताओं ने इसमें वर्णित घटनाओं का उपयोग किया है।
  • यह ग्रंथ आज भी कश्मीर अध्ययन (Kashmir Studies) का आधार है।

कश्मीर का ‘स्वर्ण युग’ और ललितादित्य मुक्तापीड़

  • राजतरंगिणी में ललितादित्य मुक्तापीड़ का वर्णन सबसे प्रभावशाली है। उसे कश्मीर का ‘सिकंदर’ कहा जाता है। उसने कन्नौज के राजा यशोवर्मन को पराजित किया और मध्य एशिया तक अपनी धाक जमाई। उसके द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर आज भी उनके वैभव का साक्षी है।

राजतरंगिणी की प्रासंगिकता

राजतरंगिणी केवल राजाओं की वंशावली नहीं है, बल्कि यह उस समय के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे का दर्पण है।

  • भ्रष्टाचार पर प्रहार: कल्हण ने ‘कायस्थों’ (नौकरशाहों) द्वारा जनता के शोषण का कड़ा विरोध किया है।
  • नारी शक्ति: इसमें सुगंधा और दिद्दा जैसी शक्तिशाली रानियों का वर्णन है, जो दिखाती हैं कि मध्यकालीन भारत में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी।
  • भौगोलिक ज्ञान: वितस्ता (झेलम) नदी और कश्मीर की घाटियों का सटीक वर्णन इसे एक भौगोलिक ग्रंथ भी बनाता है।

निष्कर्ष

राजतरंगिणी भारतीय साहित्य की वह अनमोल धरोहर है जिसने इतिहास को ‘पुराण’ से अलग कर एक ‘विज्ञान’ के रूप में स्थापित किया। कल्हण की यह कृति हमें सिखाती है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, अपितु यह वर्तमान के लिए एक सबक है। यदि आप कश्मीर के वास्तविक स्वरूप और भारतीय इतिहास की जड़ों को समझना चाहते हैं, तो राजतरंगिणी का अध्ययन अनिवार्य है। यह ग्रंथ आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है।

चित्तौड़ पर संकट देखकर शक्तिसिंह ने अकबर को त्याग दिया (78)

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चित्तौड़ पर संकट

शक्तिसिंह (Shaktisingh) ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर (Akbar) को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। चित्तौड़ (Chittor) पर संकट देखकर शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।

अकबर चाहता था कि जिस प्रकार अन्य हिन्दू राजाओं ने अकबर की अधीनस्थ मित्रता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार चित्तौड़ का महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) भी अकबर की सेवा में उपस्थित होकर अधीनता प्रकट करे तथा मुगलों के राज्य-विस्तार के लिए मुगलों के शत्रुओं से युद्ध करे किंतु महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ पर संकट आया जानकर भी अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

जब ई.1543 में 18 साल के महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ पर संकट देखकर चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां शेरशाह सूरी को सौंपनी पड़ीं थीं, महाराणा उदयसिंह उसी समय समझ गया था कि चित्तौड़ को शक्तिशाली बनाने के लिए अरावली के घने पहाड़ों में नई राजधानियां बनानी होंगी। इसी उद्देदश्य से उसने उदयपुर नामक एक नवीन नगर की स्थापना की। यह नगर अरावली की विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था।

अरावली की पहाड़ियों में हजारों साल से, दूर-दूर तक भीलों की बस्तियां बसी हुई थीं। ये लोग पहाड़ियों की टेकरियों पर झौंपड़ियाँ तथा पड़वे बनाकर रहते थे और छोटे-छोटे तीर-कमान से बड़े-बड़े वन्य पशुओं का शिकार करते थे।

अपने शिकार के पीछे भागते हुए वे एक पहाड़ी से उतर कर, दूसरी पहाड़ी पर तेजी से दौड़ते हुए चढ़ जाते थे। भीलों में सैनिक संगठन जैसी व्यवस्था नहीं थी किंतु संकट के समय ये लोग मिलकर लड़ते थे। भील-योद्धा स्वाभाविक रूप से पहाड़ियों के दुर्गम मार्गों से परिचित होते थे।

इस कारण बड़ी से बड़ी शक्ति के लिये पहाड़ों में आकर भीलों से युद्ध करना, बहुत बड़े संकट को आमंत्रण देने जैसा था। इन भीलों से गुहिल शासकों के सम्बन्ध आरम्भ से ही अच्छे थे। महाराणा कुम्भा ने भीलों से अपनी मित्रता को और अधिक सुदृढ़ बनाया था। तब से भील, मेवाड़ राज्य के विश्वसनीय साथी बने हुए थे।

जब उदयसिंह महाराणा बना तो उसने शेरशाह सूरी तथा अपने राज्य की सीमाओं के दोनों तरफ मालवा तथा गुजरात जैसे प्रबल शत्रु-राज्यों की उपस्थिति के कारण भीलों के महत्त्व को और अधिक अच्छी तरह से समझा।

महाराणा उदयसिंह जानता था कि खानुआ के मैदान में अपनी तोपों के बल पर सांगा को पछाड़ने वाले मुगल, अथवा सुमेल के मैदान में मालदेव को पटकनी देने वाले अफगान, किसी भी दिन चित्तौड़ तक आ धमकेंगे और तब चित्तौड़ की कमजोर हो चुकी दीवारें मेवाड़ राज्य को सुरक्षा नहीं दे पायेंगी।

वैसे भी वह महाराणा उदयसिंह अपने बड़े भाई विक्रमादित्य के समय में चित्तौड़ दुर्ग की दुर्दशा अपनी आँखों से देख चुका था। इसलिये उसने अपनी राजधानी के लिये प्राकृतिक रूप से ऐसे सुरक्षित स्थान की खोज आरम्भ की जहाँ तक शत्रुओं की तोपें न पहुँच सकें।

महाराणा उदयसिंह की दृष्टि मेवाड़ राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग पर गई। मेवाड़ राज्य का यह क्षेत्र विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था तथा बीच-बीच में उपजाऊ मैदान भी स्थित थे जिनमें खेती तथा पशुपालन बहुत अच्छी तरह से हो सकता था। यह पूरा क्षेत्र भील बस्तियों से भरा हुआ था और इस क्षेत्र में बड़ी-बड़ी झीलें एवं छोटी-छोटी नदियां स्थित थीं।

इन सब बातों को देखते हुए महाराणा उदयसिंह ने इस क्षेत्र में उदयपुर नगर की नींव डाली। उसने गिरवा तथा उसके आसपास के क्षेत्र में किसानों एवं अन्य जनता को लाकर बसाया और नई बस्तियां बनानी आरम्भ कीं।

शीघ्र ही इस क्षेत्र में बड़े भू-भाग पर खेती-बाड़ी एवं पशु-पालन आदि गतिविधियां होने लगीं। बढ़ई तथा लुहार आदि दस्तकार और छोटे-मोटे व्यापारी एवं व्यवसायी भी आकर बस गये।

महाराणा उदयसिंह के इस कार्य ने राजा और प्रजा के सम्बन्धों को भी नया आकार दिया जिससे परस्पर सहयोग, मैत्री एवं विश्वास का वातावरण बना और प्रजा अपने राजा को पहले से भी अधिक चाहने लगी।

इधर तो महाराणा उदयसिंह अकबर से लड़ने के लिए ये सब तैयारियां कर रहा था और उधर राजपूताने के अन्य हिन्दू राजाओं द्वारा मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेने से गुहिलों की शक्ति को भारी नुक्सान पहुंच रहा था।

जब भी मेवाड़ के महाराणा, खलीफा की सेनाओं से लड़ने के लिए रण में जाया करते थे तब उत्तर भारत के बहुत से हिन्दू राजा, महाराणा की सहायता के लिए अपनी सेनाएं लेकर आया करते थे।

यह परम्परा ई.1527 में हुए खानवा के (War of Khanwa) युद्ध तक बनी रही किंतु जब ई.1562 में आम्बेर के कच्छवाहों ने अपने घरेलू क्लेश से छुटकारा पाने के लिये, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तो उन्होंने मेवाड़ के गुहिलों की सेवा त्याग दी।

कच्छवाहों के अनुकरण में जोधपुर एवं बीकानेर के राजाओं ने भी, गुहिलों की मित्रता छोड़कर, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने-अपने राज्यों को सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। हिन्दू राजाओं की इस कार्यवाही से गुहिल, राजपूताने में अलग-थलग पड़ गये तथा उनकी शक्ति को बहुत नुक्सान हुआ।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने अकबरनामा (AKBARNAMA) में तथा विंसेंट स्म्थि ने अकबर दी ग्रेट मुगल में लिखा है कि ई.1567 में मालवा का सुल्तान बाजबहादुर अर्थात् बायजीद, अकबर के सेनापति अब्दुलाह खाँ के भय से, मालवा छोड़कर, महाराणा उदयसिंह की शरण में आया। उदयसिंह ने उसे अपने पास रख लिया। इस पर अकबर बहुत क्रुद्ध हुआ और स्वयं सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ा।

गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि राणा उदयसिंह का पुत्र शक्तिसिंह अपने पिता से नाराज होकर अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ। अकबर उस समय धौलपुर में शिविर लगाए पड़ा था।

अकबर ने कुंवर शक्तिसिंह से कहा- ‘बड़े-बड़े जमींदार मेरे अधीन हो चुके हैं, केवल राणा उदयसिंह अभी तक नहीं हुआ। अतः मैं उस पर चढ़ाई करने वाला हूँ। क्या तुम इस कार्य में मेरी सहायता करोगे?’

इस पर शक्तिसिंह ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। इसलिए शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।

यह समाचार पाकर अकबर बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने चित्तौड़ पर तत्काल आक्रमण करने का निश्चय किया।

सितम्बर 1567 में अकबर चित्तौड़ की ओर रवाना हुआ और सिवीसपुर अर्थात् शिवपुर और कोटा के किलों पर अधिकार करता हुआ गागरौन पहुंचा। अकबर ने आसफ खाँ तथा वजीर खाँ को माण्डलगढ़ पर हमला करने के लिए भेजा जो कि महाराणा के मजबूत किलों में से एक था।

उन दिनों बल्लू सोलंकी माण्डलगढ़ का किलेदार था। आसफ खाँ और वजीर खाँ ने उसे हराकर माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया। अकबर ने मालवा के लिए भी एक सेना रवाना की तथा स्वयं चित्तौड़ की तरफ बढ़ने लगा। इस पर महाराणा उदयसिंह ने अपने सरदारों को चित्तौड़ की रक्षा के लिये बुलाया।

चित्तौड़ पर संकट देखकर मेड़ता का निर्वासित शासक जयमल वीरमदेवोत, रावत सांईदास चूंडावत, ईसरदास चौहान, राव बल्लू सोलंकी, डोडिया सांडा, राव संग्रामसिंह, रावत साहिबखान, रावत पत्ता, रावत नेतसी आदि कई सरदार अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण: 1567 का ऐतिहासिक घेरा (79)

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अकबर का चित्तौड़ आक्रमण

जब ईस्वी 1567 में अकबर का चित्तौड़ आक्रमण हुआ तो मेवाड़ी सामंतों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए चाल चली! इस योजना में महाराणा उदयसिंह की कोई सहमति नहीं ली गई।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण (Akbar’s invasion of Chittorgarh) तब शुरू हुआ जब अकबर ने चित्तौड़ पर आरोप लगाया कि उसने अकबर के शत्रु बाजबहादुर को शरण देकर शाही मंशा के विरुद्ध कार्य किया है और अकबर एक सेना लेकर चित्तौड़ के लिए चल पड़ा। 20 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से दस मील उत्तर-पूर्व में अपनी छावनी डाली। उस समय चित्तौड़ की राजनीतिक एवं सामरिक शक्ति अत्यंत विपन्नावस्था में थी।

 फिर भी महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) ने अकबर का सामना करने का निश्चय किया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि कुंवर शक्ति सिंह ने अकबर के धौलपुर शिविर से लौटकर महाराणा उदयसिंह को सूचित किया कि अकबर चित्तौड़ पर आक्रमण करने आ रहा है। इस पर सब सरदार बुलाए गए। महाराणा की सेवा के लिए आने वाले प्रमुख सरदारों की सूची हम पिछले आलेख में दे चुके हैं।

मेवाड़ी सरदारों ने महाराणा उदयसिंह को सलाह दी कि दिल्ली, आगरा, गुजरात एवं मालवा से लड़ते-लड़ते मेवाड़ कमजोर हो चुका है। इसलिये महाराणा को अपने परिवार सहित घने पहाड़ों में चले जाना चाहिये। इस पर महाराणा उदयसिंह, मेड़ता के शासक जयमल राठौड़ और उसके बहनोई सिसोदिया पत्ता (Sisodia Patta) को चित्तौड़ दुर्ग की सुरक्षा का भार सौंपकर, रावत नेतसी आदि कुछ सरदारों सहित मेवाड़ के पहाड़ों में चला गया।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण रोकने के लिए ओझाजी ने लिखा है कि जयमल (Jaimal Rathore) के नेतृत्व में 8000 हिन्दू सैनिक चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिए मरने-मारने को तैयार हो गए। अबुल फजल ने हिन्दू सैनिकों की संख्या 5000 लिखी है। वह लिखता है कि राणा के सिपाहियों ने दुर्ग के आसपास के प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जिससे खेतों में घास का एक तिनका भी नहीं रहा।

अक्टूबर 1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के निकट पड़ाव डाला। अकबर ने अपने सेनापति बख्सीस को घेरा डालने का काम सौंपा। चित्तौड़ दुर्ग इतना विशाल था कि मुगल सेना को उसे हर ओर से घेरने में एक महीने का समय लग गया। जब यह घेरा डालने की कार्यवाही चल रही थी, तब अकबर ने आसफ खाँ को रामपुर के किले पर भेजा। यह दुर्ग मेवाड़ राज्य में ही स्थित था।

आसफ खाँ (Asaf Khan) रामपुर के किले (Rampur Fort) को जीतकर अकबर के पास लौट आया। अकबर को ज्ञात हुआ कि महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ दुर्ग में नहीं है। वह या तो कुंभलमेर की तरफ गया है या फिर उदयपुर की तरफ गया है। इस पर अकबर ने एक-एक सेना दोनों स्थानों के लिए रवाना की।

हुसैन कुली खाँ (Husain Kuli Khan) को उदयपुर की तरफ भेजा गया था। वह कई महीनों तक महाराणा को उदयपुर एवं उसके आसपास की पहाड़ियों में ढूंढता रहा किंतु वह महाराणा को नहीं ढूंढ सका। हुसैन कुली खाँ को जहाँ भी पहाड़ियों में इक्का-दुक्का आदमी मिलते, वह उनसे महाराणा उदयसिंह के बारे में पूछता किंतु उसे किसी ने नहीं बताया कि महाराणा अपने परिवार के साथ कहाँ निवास कर रहा है।

हुसैन कुली खाँ के सैनिक उन लोगों का सामान लूट लेते, उनकी झौंपड़ियों में आग लगा देते और उन्हें मार देते। अंत में हुसैन कुली खाँ निराश होकर अकबर के पास लौट गया। अकबर का चित्तौड़ आक्रमण जारी था और उधर जब अकबर की सेनाएं महाराणा उदयसिंह को अरावली की पहाड़ियों में ढूंढ रही थीं, इधर अकबर भी चैन से नहीं बैठा था। अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर ने खाने आलम तथा आदिल खाँ से दुर्ग पर आक्रमण करवाया किंतु वे विफल होकर लौट आए तथा उन्होंने अकबर से कहा कि इसमें जल्दबाजी की गई थी।

जयमल राठौड़ के सैनिक दुर्ग की प्राचीर से अकबर की सेना पर तीर, पत्थर, जलता हुआ तेल और जलते हुए कपड़े फैंकते थे जिसके कारण अकबर के सैनिकों की हिम्मत दुर्ग के निकट जाने की नहीं होती थी। अकबर के साथ कुछ हिन्दू राजाओं की सेनाएं भी थीं। विचित्र दृश्य था, कल तक आम्बेर के कच्छवाहे तथा अन्य हिन्दू राजा चित्तौड़ की रक्षा करने में अपना गर्व समझते थे, आज वे अकबर की चाकरी स्वीकार करके चित्तौड़ का मानभंजन करने को तलवारें निकालकर खड़े थे।

मेड़ता के राठौड़ अब भी गुहिलों के कंधे से कंधा लगाकर चित्तौड़ के रक्षक बने हुए थे। मुट्ठी भर चौहान, सोलंकी, डोडिया और झाला भी चित्तौड़ के लिये मरने-मारने को तैयार थे। भले ही चित्तौड़ के रक्षक थोड़े से थे किंतु इनके सामने अकबर का चित्तौड़ आक्रमण सफल होना या अकबर की दाल गलनी कठिन थी।

अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग के चारों ओर तोपें लगाई गईं। इन तोपों के लिए तीन बड़े मंच भी बनाए गए। तोपों का एक मंच लाकूटा दरवाजे के सामने था जिसे लाखोटा बारी (Lakhota Bari) भी कहा जाता था। यह मोर्चा स्वयं अकबर के अधीन था। हसन खाँ, चगताई खाँ, राय पत्तर दास, काजी अली बगदादी, इख्तियार खाँ फौजदार और काबिर खाँ को इसी मंच पर तैनात किया गया। उधर किलेदार जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) भी अकबर की समस्त गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। जब उसे ज्ञात हुआ कि अकबर ने लाखोटा बारी पर मोर्चा जमाया है तो जयमल ने भी किले के भीतर लाखोटा बारी पर मोर्चो जमाया।

दुर्ग के बाहर दूसरा मोर्चा पूर्व की तरफ सूरजपोल के सामने राजा टोडरमल ने जमाया। इस मोर्चे पर शुजात खाँ, मीर बर्रू-बहर तथा कासिम खाँ को तोपखाने के साथ तैनात किया गया। इस मंच को बरसात से बचाने के लिए एक ढका हुआ मार्ग बनाया गया जिसकी लम्बाई एक बाण की मार तक थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर रावत सांईदास चूंडावत को नियुक्त किया गया।

तीसरे मोर्चे पर जो किले के दक्षिण की तरफ चित्तौड़ी बुर्ज के सामने था, ख्वाजा अब्दुल मजीद असद खाँ आदि कई अमीरों को नियुक्त किया गया। इस मोर्चे के लिए एक भारी तोप ढाली गई जो आधा मन का गोला फैंक सकती थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर बल्लू सोलंकी को नियुक्त किया गया। एक दिन दुर्ग के सरदारों ने रावत साहिबखान चौहान और डोडिया के ठाकुर सांडा को अकबर के पास भेजकर कहलवाया कि हम वार्षिक कर दिया करेंगे और आपकी अधीनता स्वीकार करते हैं। अनेक मुगल अमीरों ने अकबर से कहा कि वह यह संधि स्वीकार कर ले किंतु अकबर को इसमें मेवाड़ी सरदारों की कोई चाल दिखाई दी।

अकबर समझ गया कि मेवाड़ी सामंतों के इस प्रस्ताव में महाराणा की कोई सहमति नहीं है। यह तो मेवाड़ी सरदारों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए कोई चाल चली है। इसलिए अकबर का चित्तौड़ आक्रमण और तेज हो गया और अकबर ने कहा कि यदि राणा स्वयं उपस्थित होकर यह बात कहे तो मैं संधि करने को तैयार हूँ। अकबर की इस शर्त के सामने आने के बाद राजपूतों ने संधि की बात बंद कर दी और पूरे उत्साह के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी: सुरंग विस्फोट और राजपूतों का शौर्य (80)

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चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के दौरान पचास कोस दूर तक सुनाई दिया चित्तौड़ दुर्ग की दीवार उड़ने का धमाका!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी (Siege of Chittorgarh Fort) के दौरान जब अकबर (Akbar) के सेनापति खानेआलम तथा आदिल खाँ चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों तक पहुंचने में विफल रहे तब अकबर ने दुर्ग की दीवारों तक कुछ सुरंगों एवं साबातों का निर्माण करवाने का विचार किया जिनमें से होकर अकबर के सैनिक दुर्ग की दीवारों तक पहुंच सकते थे।

अकबर ने लाखोटा बारी से उस पहाड़ी तक एक सुरंग खुदवानी आरम्भ की जिस पहाड़ी पर चित्तौड़ का किला खड़ा था। शीघ्र ही राजपूत सैनिकों को अकबर की इस चालाकी का पता चल गया और वे सुरंग खोदने वालों पर किले से पत्थर और तीर फैंकने लगे। इस पर कुछ और सुरंगें खुदवानी आरम्भ की गईं ताकि कुछ सुरंगें दुर्ग के सैनिकों की चपेट में आने से बच सकें।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी का यह दृश्य तब और भीषण हो गया जब जिस मोर्चे पर राजा टोडरमल नियुक्त था, उस मोर्चे से लेकर दुर्ग की पहाड़ी तक एक साबात बनवानी आरम्भ की गई। साबात उस कृत्रिम छत अथवा कृत्रिम गुफा को कहते थे जिसके नीचे से होकर सेना अपने शत्रुओं के तीरों एवं हथियारों से बचती हुई निर्धारित बिंदु तक पहुंच जाती थी। साबात बनने के समय भी राजपूत सैनिक अवसर पाकर मुगल सैनिकों एवं कारीगरों पर हमले करते रहे।

तारीखे अल्फी (Tarikh-i-Alfi) के अनुसार जब साबात बन रहे थे, तब राणा के सात-आठ हजार सवार और कई गोलंदाजों ने उन पर हमला किया। कारीगरों के बचाव के लिए गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन थी। तो भी वे इतनी संख्या में मरे कि ईंट-पत्थर की तरह लाशें चुनी गईं। राजपूताना की रियासतों का इतिहास लिखने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि चित्तौड़ के किले (Chittor Fort) में कई चतुर तोपची थे जो सुरंग खोदने वालों और साबात बनाने वाले मुस्लिम सैनिकों को पत्थर एवं गोले फैंककर मार देते थे।

अबुल फजल लिखता है कि साबात की रक्षा करने वाले लगभग 200 सैनिक प्रतिदिन मारे जाते थे। फिर भी दिन-दिन साबात आगे बढ़ाए जाते तथा सुरंगें खोदी जाती थीं। मेवाड़ी सैनिक साबातों को तोड़ डालते थे। इसलिये जगह-जगह मोर्चे रखकर तोपखाने से साबात की रक्षा की गई। अकबर की सेना ने साबात बनाने वाले कारीगरों के बचाव के लिये गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन लगाई।

बदायूंनी (Mulla Badayuni) ने लिखा है कि मारे गए सैनिकों एवं मजदूरों के शरीर ईंटों एवं पत्थरों की जगह काम में लिए गए। बदायूंनी लिखता है कि साबात की चौड़ाई इतनी अधिक थी कि इसके नीचे दस घुड़सवार एक साथ चल सकते थे और ऊंचाई इतनी थी कि हाथी पर हाथ में भाला लिए बैठा आदमी आसानी से गुजर सकता था। बादशाह ने सुरंग और साबात बनाने वालों को जी खोलकर रुपया दिया। अबुल फजल ने लिखा है कि मजदूरों को चांदी और सोना मिट्टी की भांति दिया जाता था।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के इस दौर में अकबर के सैनिकों ने साबात के दोनों ओर मिट्टी की इतनी चौड़ी दीवार बना दी थी कि तोप के गोले उसमें प्रवेश नहीं कर सकते थे। किसी तरह से दो सुरंगें किले की तलहटी तक पहुंच गईं। एक सुरंग में 120 मन और दूसरी सुरंग में 80 मन बारूद भरी गई। 17 दिसम्बर 1567 को लाखोटा बारी की तरफ एक सुरंग उड़ाई गई जिससे 50 राजपूत सैनिकों सहित किले की एक बुर्ज उड़ गई।

लाखोटाबारी (Lakhotabari) का दरवाजा नींव से उखड़ गया। इस दरार से होकर शाही फौज किले में घुसने लगी। इतने में अचानक दूसरी सुरंग भी उड़ गई जिससे शाही फौज के 200 सिपाही मारे गये। लगभग चालीस सिपाही पास की खाई में छिपे हुए थे वे भी मिट्टी एवं ईंटों में दब कर मर गए।

अबुल फजल तथा मुल्ला बदायूंनी दोनों ने लिखा है कि दो सुरंगें पास-पास खोदी गईं थीं तथा इनमें बारूद भर दिया गया था। सेना की एक टुकड़ी पूरी तरह हथियार बंद एवं साजो-सामान सहित, सुरंगों की ओर चली गई और सुरंग के फटने की प्रतीक्षा करने लगी ताकि दुर्ग की दीवार गिरते ही वे दुर्ग में घुस जाएं।

अबुल फजल (Abul Fazal) लिखता है कि दोनों सुरंगों में आग लगाने के लिए एक ही बत्ती बनाई गई थी किंतु मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि दोनों सुरंगों की बत्तियों में एक ही समय में आग लगाई गई थी किंतु एक की बत्ती जो दूसरी से छोटी थी, पहले फट गई और उसने जमीन को उछाल दिया। दुर्घटना यह हुई कि लम्बी बत्ती से दूसरी सुरंग देर से विस्फोटित हुई। पहली सुरंग के फटने पर, टूटी दीवार में बने रास्ते से बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही एक टुकड़ी आगे बढ़ गई। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि अभी दूसरी सुरंग फटी नहीं है और फटने वाली है।

मुल्ला लिखता है- ‘जब पहली सुरंग के फटने पर आमने-सामने की लड़ाई शुरु हो गई तब अचानक ही दूसरी सुरंग सुलगी और फट पड़ी जो कि पूरी तरह बारूद से भरी हुई थी। दोस्त और दुश्मन दोनों ही हवा में उछाल दिए गए। इस्लाम के फौजी (अकबर के सैनिक) सौ मन और दो सौ मन भारी पत्थरों के तले दब गए। पत्थर-दिल काफिर (महाराणा के सैनिक) भी उसी प्रकार उछल गए जैसे आग के दरिया में पतंगे। विस्फोट के पत्थर तीन-चार कोस की दूरी तक उछल गए और एक जोर की चीख ईस्लाम के सैनिकों तथा काफिरों दोनों ओर से हुई।

रक्त की एक धारा जन्नत से जहन्नुम की ओर बही। हालांकि ग्रेबे का और इस्लाम के विश्वासियों का खून एक ही जगह बहा। कौवों और गिद्धों के लिए खुशी का दिन था। अल्लाह की रहमत कि कौओं और गिद्धों को खाना मिला। अचानक फटने वाली सुरंग के धमाके में शहंशाह के व्यक्तिगत परिचय वाले करीब पांच सौ योद्धा काट दिए गए। उन्होंने शहादत का जाम पिया और काफिरों के कितने सैनिक काटे गए, कौन कह सकता है!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी को विफल करने हेतु चित्तौड़ के सैनिकों ने रात भर उस टूटी दीवार को बनाने का काम किया जो उन सुरंगों के फटने से टूट चुकी थी। चित्तौड़ दुर्ग की दीवार के साथ-साथ दुर्ग की एक बुर्ज भी इस धमाके की चपेट में आने से गिर गई।’

गौरीशंकर हीराचंद ओझा (Gouri Shankar Hira Chand Ojha) ने लिखा है कि सुरंग के इस विस्फोट का धड़ाका 50 कोस दूर तक सुनाई दिया। निश्चित रूप से यह हिन्दू सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी थी किंतु किले के भीतर के वीरों ने बिना कोई समय गंवाए दुर्ग की दीवार एवं बुर्ज, फिर से बना ली। उसी दिन आसफ खाँ ने बीका खोह और मोर मगरी की तरफ तीसरी सुरंग उड़ाई, जिससे अकबर की तरफ के 30 आदमी और मारे गए। अबुल फजल के अनुसार ये 30 आदमी दुर्ग की रक्षा करने वालों में से थे। कतिपय समकालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर भी इस धड़ाके की चपेट में आ गया किंतु वह बाल-बाल बच गया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा देख लिया आखिर मुगलों ने  (81)

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जयमल राठौड़ - www.bharatkaitihas.com
जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा देख लिया आखिर मुगलों ने

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल राठौड़ मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

जब अकबर (AKBAR) के सैनिकों द्वारा बनाई गई दो सुरंगों में भरे हुए बारूद को पलीता दिखाया गया तो एक सुरंग तो समय पर फटी किंतु दूसरी सुरंग कुछ देर से फटी जिसकी चपेट में आकर न केवल दुर्ग की दीवार पर खड़े चित्तौड़ी सैनिक अपितु दुर्ग के बाहर खड़े अकबर के सैनिक भी मारे गए।

 कुछ सैनिक मिट्टी एवं पत्थरों के नीचे दबकर मर गए। यहाँ तक कि स्वयं अकबर भी मरते-मरते बचा। इस दौरान चित्तौड़ दुर्ग के भीतर से भारी गोलीबारी की जा रही थी। अकबर भी वहाँ खड़े रहकर समस्त कार्यवाही का संचालन कर रहा था।

इस दौरान एक गोली अकबर के ठीक पास खड़े एक आदमी को आकर लगी जिससे उस आदमी की तुरंत मृत्यु हो गई किंतु अकबर बाल-बाल बच गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि इस युद्ध में अकबर कई बार मरते-मरते बचा।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि इन सुरंगों के फटने से अकबर के पक्ष को हुई क्षति के कारण दुर्गरक्षकों में तो हर्ष और जोश था किंतु अकबर शांत और गंभीर था। उसने सोचा कि यह काम बिना योजना के किया गया है और जोशीले लोगों ने जल्दबाजी की है।

सुरंगों के फटने से गिरी चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) की दीवार को राजपूतों द्वारा वापस बना लिए जाने से अकबर की सेना दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकी और अकबर की यह योजना विफल हो गई।

इस पर अकबर साबात बनवाने में व्यस्त हो गया। वह समझता था कि दुर्ग को छीन लेने का यही सर्वोत्तम उपाय है। वह साबात के निर्माण कार्य को देखता और दुर्ग के समीप जाकर दुर्गरक्षकों पर गोलियां चलाया करता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि राजा टोडरमल और कासिम खाँ मीर की देख-रेख में एक साबात बनकर तैयार हो गया। अबुल फजल ने लिखा है कि साबात के ऊपर भी कोठड़ियां बनाई गईं।

स्वयं अकबर भी दो रात और एक दिन एक कोठड़ी में रहा था। दुर्ग में घिरे हुए लोग भी वीरतापूर्वक लड़े। अकबर साबात पर बैठा वीरों के काम देख रहा था। जब यह साबात बन गया तब इस साबात के नीचे से होकर अकबर की सेनाएं चित्तौड़ दुर्ग की दीवार तक पहुंच गईं।

दो रात और एक दिन तक दोनों सेनाएं लड़ाई में इस तरह लगी रहीं कि खाना-पीना भी भूल गईं। इन दो रातों और एक दिन में वीर लोगों ने न भोजन किया न नींद ली, इससे दोनों पक्ष थक गए।

शाही फौज ने कई जगह से किले की दीवार तोड़ डाली परन्तु राजपूतों ने उन स्थानों पर तेल, रुई, कपड़ा, बारूद आदि जलाकर शत्रु को भीतर आने से रोका।

एक दिन अकबर लाखोटा बारी वाले तोप-मंच पर आया। उसने देखा कि उसके योद्धा, दुर्ग के घेरे पर तैनात हैं तथा दुर्ग की प्राचीर पर खड़े हुए दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चला रहे हैं।

अकबर ने भी रन्ध्रों की आड़ में से दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चलाईं। जहाँ से अकबर गोलियां चला रहा था, उससे थोड़ी दूर पर अकबर का सेनापति जलाल खाँ खड़ा हुआ दुर्ग-रक्षकों पर निशाने लगा रहा था। अचानक दुर्ग में से किसी बंदूकची ने गोली चलाई जो अकबर के सेनापति जलाल खाँ को आकर लगी।

जलाल खाँ घायल हो गया किंतु मरा नहीं। जलाल खाँ को गोली लगने से अकबर बुरी तरह से बौखला गया। उसने कहा कि मैं अवश्य ही इस बंदूकची को मारकर जलाल खाँ का बदला लूंगा। इसके बाद अकबर ने एक रंध्र की आड़ में से गोली चलाई जिससे दुर्ग की प्राचीर पर खड़ा हुआ निशानची उसी समय मारा गया।

बाद में ज्ञात हुआ कि उस निशानची का नाम इस्माइल था। वह मेवाड़ की तरफ से लड़ रहे अफगान बंदूकचियों का अफसर था।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह के हाथ से इस प्रकार जाने कितने ही सैनिक मारे गए। यह बताना समीचीन होगा कि सूरी सल्तनत के पतन के बाद अफगान सेनाओं के बहुत से तोपची एवं बंदूकची उन हिन्दू राज्यों में चले आए थे जिनका मुगलों से संघर्ष चल रहा था। इस्माइल भी उन्हीं में से एक था।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि एक दिन अकबर चित्तौड़ी बुर्ज के पास वाले मंच पर आया। वह धीरे-धीरे एक स्थान की ओर जा रहा था जहाँ पर गोलियों और गोलों की वर्षा हो रही थी। उसके मन में किसी प्रकार का भय नहीं था। एकाएक तोप का एक बड़ा गोला उसके पास आकर गिरा जिससे अकबर के बीस सैनिक मारे गए।

 दूसरे दिन खानेआलम को एक गोली लगी। वह अकबर (AKBAR) के पास ही खड़ा हुआ था। गोली खाने आलम के कवच में चली गई परंतु अंदर जाते-जाते ठण्डी हो गई। एक दिन मुजफ्फर खाँ को भी गोली लगी परंतु उसकी कोई क्षति नहीं हुई।

एक रात को मुगल सेना द्वारा दुर्ग पर सब ओर से आक्रमण किया गया और प्राचीर को स्थान-स्थान पर तोड़ दिया गया। यह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था कि दुर्ग नष्ट होने वाला है। साबात के पास विजयी सेना आगे बढ़ रही थी। आधी रात को दुर्गरक्षक टूटी हुई प्राचीर के पास आए।

उस समय हुए संघर्ष में कुछ लोग तो मारे गए और दूसरे लोगों ने टूटी हुई प्राचीर में मखमल, रुई, लकड़ियां और तेल भर दिया। जब मुगल आक्रमण करते तो राजपूत इस सामग्री में आग लगा देते जिससे मुगल सैनिक दुर्ग में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे।

उसी समय अकबर ने देखा कि एक राजपूत सरदार दीवार की मरम्मत कराने के लिये हाथ में मशाल लेकर इधर-उधर घूम रहा है। अबुल फजल लिखता है कि उसके कवच में हजार मेखें थीं जो उसके उच्च अधिकारी होने का संकेत दे रही थीं परंतु अकबर नहीं जानता था कि वह कौन है। अकबर ने अपनी संग्राम नामक बंदूक से उस पर गोली चलाई।

अबुल फजल ने लिखा है कि पहले शुजात खाँ ने और बाद में राजा भगवंतदास (Raja Bhagwant Das) ने आकर अकबर (AKBAR) से कहा कि ऐसा मालूम होता है कि उस आदमी को गोली लग गई है।

 खानेजहाँ (Khane Jahanने कहा कि यह व्यक्ति रात भर वहीं था और प्राचीर की मरम्मत करवा रहा था। अब वह दुबारा नहीं आए तो मान लेना चाहिए कि वह मारा गया। थोड़ी ही देर में जब्बार अली दीवाना ने आकर बादशाह को सूचना दी कि शत्रु दिखाई नहीं देते।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल राठौड़ की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni ) ने लिखा है कि छः महीना या उससे अधिक समय बीतने पर अंततः एक रात शाही फौज ने चारों ओर से आक्रमण करते हुए किले (Chittor Fort) की दीवार को तोड़ दिया और तूफान की तरह दुर्ग में घुस गई।

बंदूकों व तोपों के छोड़ने की रौशनी में जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा दिखाई देने लगा जो कि इस्लाम के सिपाहियों की ओर मुखातिब था। यही वह चेहरा था जिसने पिछले छः महीनों से अकबर की रातों की नींद और खाना-पीना हराम कर रखा था।

भले ही किसी भी इतिहासकार ने नहीं लिखा है किंतु यदि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी के विवरण में थोड़ी-बहुत भी सच्चाई है तो उसे पढ़कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा जयमल राठौड़ के क्रोधित चेहरे को देखकर कितने ही मुगल सेनापतियों के प्राण सूखकर कण्ठ में आ गए होंगे! कितने ही मुगल सेनापतियों ने जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) के इस क्रोधित चेहरे को देखकर अपने जीवन को धिक्कारा होगा। मोर्चे पर मौजूद राजा भगवंतदास, राजा टोडरमल (Raja Todarmal) एवं राय पत्तर दास भी उन्हीं में से रहे होंगे!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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