हालांकि इतिहासकारों ने अकबर को साम्प्रदायिक सद्भाव का मसीहा सिद्ध करने की कोशिश की है किंतु अकबर के समकालीन इतिहास में अकबर की मक्कारी के कई किस्से लिखे हुए हैं।
जिस समय अकबर (Akbar) काबुल (Kabul) के शासक मिर्जा हकीम खाँ (Mirza Hakim Khan) के पीछे लाहौर (Lahore) जा रहा था, उसी दौरान संभल के मिर्जाओं ने भी बगावत कर दी। अकबर के सेनापति खानखाना मुनीम खाँ ने मिर्जाओं को शाही खानदान का समझकर उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं की अपितु उन्हें दिल्ली से भगा दिया।
मिर्जा लोग माण्डू (Mandu) की तरफ भाग गए तथा वहाँ नए सिरे से अकबर के विरुद्ध षड़यंत्र करने लगे। जब अकबर लाहौर से आगरा के लिए लौटा तब वह वर्तमान हरियाणा प्रांत के थानेसर अथवा कुरुक्षेत्र कस्बे के पास से होकर निकला। उसी समय थानेसर कस्बे में एक विचित्र घटना घटी।
अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (Abul Fazal) ने लिखा है कि- ‘थानेसर के (Thanesar) पास एक तालाब है जिसे छोटा समुद्र कहा जा सकता है। प्राचीन काल में वहाँ एक मैदान था जो कुरुक्षेत्र कहलाता था। भारत के साधु प्राचीन काल से इस तालाब को पवित्र समझते थे। भारत के विभिन्न भागों के लोग इसकी यात्रा करने आते थे और पुण्यदान किया करते थे।’
श्रीमद्भगवत्गीता के प्रारम्भ में कुरुक्षेत्र (Kurukshetra) को धर्मक्षेत्र कहा गया है। यहीं पर कौरवों एवं पाण्डवों के बीच महाभारत का युद्ध हुआ था। अबुल फजल ने कुरुक्षेत्र में समुद्र जितने बड़े जिस तालाब की चर्चा की है, वह वास्तव में अत्यंत प्राचीन काल का ब्रह्म सरोवर है जिससे जुड़ी हुई अनेक कथाएं पुराणों में मिलती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार अत्यंत प्राचीन काल में इस क्षेत्र से होकर सरस्वती नदी की धारा बहा करती थी। जब सरस्वती नदी सूख गई तो उसके मार्ग में छोटे-बड़े तालाब एवं सरोवर रह गए जो प्रतिवर्ष वर्षा के जल से भर जाते थे। इसी कारण सरस्वती नदी के सूख जाने के पांच हजार साल बाद भी कुरुक्षेत्र का ब्रह्म सरोवर अस्तित्व में है। अबुल फजल ने इसी का उल्लेख अपनी पुस्तक अकबर नामा (Akbarnama) में किया है।
अबुल फजल लिखता है कि- ‘इस वर्ष बादशाह के आगमन से पहले ही कुरुक्षेत्र में बड़ी भीड़ हो गई थी।’ इस पंक्ति से ऐसा लगता है कि कुछ मुस्लिम बादशाह कुरुक्षेत्र में प्रतिवर्ष लगने वाले मेले को देखने आते रहे होंगे। संभवतः अकबर भी पिछले कुछ सालों में कुरुक्षेत्र आया हो। इस कारण इस मेले का आकर्षण बढ़ गया हो और इस मेले में अधिक भीड़ होने लगी हो।
अबुल फजल ने लिखा है- कुरुक्षेत्र में संन्यासियों के दो दल हैं। एक गिरि कहलाता है तो दूसरा पुरी। ये दोनों दल इस सरोवर के दोनों तरफ अपने-अपने समूह में बैठा करते थे। भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों से जो यात्री स्नान करने आते थे, उनको दान दिया करते थे।
लोग साधु इसलिए बनते हैं क्योंकि वे संसार से विमुख हो जाते हैं किंतु उनमें लोभ और क्रोध बना रहता है। गिरि और पुरी साधुओं (Giri and Puri Sadhu) की इस लड़ाई का कारण यह था कि पुरी सम्प्रदाय के साधु तालाब के तट पर जिस स्थान पर बैठा करते थे, उस स्थान को एक दिन गिरि सम्प्रदाय के साधुओं ने बलपूर्वक पुरी साधुओं से छीन लिया।
पुरी साधुओं की संख्या बहुत कम थी इसलिए पुरी साधु, गिरि साधुओं का कुछ नहीं कर सके। उसी दौरान पुरी साधुओं को ज्ञात हुआ कि बादशाह अकबर अम्बाला तक आ गया है और कुछ ही दिनों में कुरुक्षेत्र पहुंचेगा।
इस पर पुरी साधुओं का नायक केशू पुरी अम्बाला गया। उसने बादशाह से भेंट की तथा उससे कहा कि गिरि साधुओं ने हमारा स्थान छीन लिया है। यह स्थान परम्परा से हमारा है। कभी कुछ समय के लिए गिरि साधु उस पर बैठा करते थे किंतु अब हम बैठते हैं। अतः बादशाह हमें हमारा स्थान दिलवाए।
अकबर ने पुरी साधुओं के मुखिया केशू पुरी की बातों में कोई रुचि नहीं दिखाई। इस पर केशू पुरी ने बादशाह से कहा कि जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक वह स्थान हमारे पास रहेगा। हममें उनका सामना करने की शक्ति नहीं है किंतु हम उनसे लड़ेंगे। इसमें या तो हमारा रक्तपात हो जाएगा या हम उनसे अपना स्थान छीन लेंगे।
इस पर अकबर केशू पुरी की बात से सहमत हो गया। अकबर की मक्कारी उछलकर सामने आ गई। उसने कहा कि तुम लोग आपस में लड़कर ही इसका निर्णय कर लो कि किस स्थान पर कौन बैठेगा। हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है किंतु तुम लोग यह लड़ाई हमारे सामने करना। केशु पुरी ने बादशाह की बात स्वीकार कर ली तथा वापस कुरुक्षेत्र लौट आया।
कुछ दिन बाद बादशाह की सवारी थानेसर पहुंची। बादशाह उस तालाब के पास गया और उसने साधुओं को समझाया कि वे झगड़ा न करें किंतु उन साधुओं पर बादशाह की बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ। वे मरने-मारने को तो पहले से ही तैयार थे किंतु बादशाह को आया देखकर और अधिक उग्र हो गए।
दोनों तरफ के साधु अपनी बात पर अड़े हुए थे और एक ही स्थान पर बैठना चाहते थे। अकबर ने दोनों पक्षों के साधुओं को लड़कर फैसला करने की अनुमति दे दी। इस प्रकार अकबर की मक्कारी का एक किस्सा कुरुक्षेत्र से जुड़ गया।
दोनों पक्षों के साधु आमने-सामने पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गए। अकबर भी इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी बना। पुरी साधुओं की संख्या लगभग 300 थी जबकि गिरि साधु 500 थे।
इसलिए बादशाह ने तूरानी सेनानायक अर्थात् उज्बेक सेनानायक यतीम शाह को और भारत के सेनानायक वीरू अर्थात् एक हिन्दू सेनानायक को आदेश दिए कि पुरी लोगों की सहायता की जाए। अकबर की मक्कारी भरे आदेश के बाद यतीम शाह और वीरू ने भी अपने सैनिकों को इस संघर्ष में उतार दिया जिन्होंने गिरि साधुओं पर आक्रमण करने में पुरी साधुओं की सहायता की।
प्रत्येक पक्ष से साधु तलवार लेकर आगे बढ़े। उसके बाद तीर चलाए गए। और फिर पुरी साधुओं ने गिरि साधुओं पर पत्थर मारने शुरु कर दिए। कुछ गिरि साधु लड़ाई छोड़कर भाग निकले। पुरी साधुओं ने उनका पीछा किया और उनमें से कितनों को ही जान से मार डाला। उन्होंने गिरि साधुओं के मुखिया आनंदकंद को भी मार डाला। शेष साधु छिन्न-भिन्न हो गए। अकबर इस खेल को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ।’
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni ) ने भी इस घटना का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘कुरुक्षेत्र का तालाब चार हजार साल पुराना है जहाँ कौरव और पाण्डवों के युद्ध में 70-80 लाख आदमी मारे गए थे। अब यहाँ हर साल एक जलसा होता है।
यहाँ के पूजास्थन पर हिन्दू श्रद्धालु सोना, चांदी, रत्न, आभूषण, रेशम, मूल्यवान सामान दान करते हैं। वे ब्रह्मसरोवर के कुण्ड में गुप्त रूप से सिक्के डाल देते हैं। जोगियों एवं संन्यासियों की टुकड़ियां अपने उत्तराधिकार के लिए लड़ती हैं। मुल्ला लिखता है कि बादशाह के सैनिक शरीर पर राख मलकर संन्यासियों की तरफ से लड़े। दोनों ओर से बहुत से मारे गए।’
मुल्ला के वर्णन से ऐसा लगता है कि उसने गिरि साधुओं को जोगी तथा पुरी साधुओं को संन्यासी लिखा है। मुल्ला लिखता है कि अंत में संन्यासी विजयी हुए। अर्थात् पुरी विजयी हुए।
राहुल सांकृत्यायन ने भी अबुल फजल से मिलता-जुलता वर्णन किया है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार दोनों ओर के साधुओं ने अपने-अपने नागा सैनिकों के संगठन तैयार कर लिए थे। इस संघर्ष में 20 साधु मारे गए।
राहुल सांकृत्यायन द्वारा वर्णित यह संख्या सही नहीं है। लगभग सभी गिरि साधुओं को मार गिराया गया था जिनकी संख्या 500 से अधिक थी। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि लगभग इसी संख्या में पुरी साधु भी मरे होंगे।
वस्तुतः कुरुक्षेत्र के इस प्रकरण में किसी भी लेखक ने सत्य-स्थिति का वर्णन नहीं किया है। सत्य-स्थिति यह है कि जब भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब भारत में कुछ नागा-साधुओं के समूह देश की रक्षा के लिए सैनिक परम्पराओं के साथ लड़ने-मरने के लिए तैयार होने लगे।
कुरुक्षेत्र में जो संघर्ष हुआ, वह ऐसी ही दो नागा सेनाओं के बीच हुआ था जिसमें अकबर ने बड़ी ही चालाकी से अपने सैनिकों को भी लड़वा दिया ताकि नागा साधुओं की यह लड़ाई जल्दी समाप्त न हो!
मुगलों के समय में भी नागा सेनाएं बड़ी संख्या में देशी राज्यों में रहती थीं और वे युद्ध-क्षेत्र में रहकर उसी प्रकार युद्ध करती थीं जिस प्रकार क्षत्रिय सैनिक किया करते थे। राजपूताने के युद्धों में नागा सेनाओं के विवरण बड़ी संख्या में मिलते हैं। अंग्रेजों के काल में हुए संन्यासी आंदोलन में भी इन्हीं नागा साधुओं के समूह सम्मिलित थे। अकबर की मक्कारी यहीं समाप्त नहीं हुई, उसके आदेश पर यह काम आगे भी होता रहा।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



