Home Blog Page 123

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

0
संगम युगीन अर्थव्यवस्था - bharatkaitihas.com
संगम युगीन अर्थव्यवस्था

संगम युगीन साहित्य एवं शासन व्यवस्था दोनों ही इस बात के प्रमाण हैं कि संगम युगीन अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत रही होगी। अर्थव्यवस्था की मजबूती के बिना न तो उन्नत शासन व्यवस्था स्थापित की जा सकती है और इतना उत्कृष्ट साहित्य लिखा जा सकता है।

संगम साहित्य में वर्णित राज्य व्यवस्था

संगम काव्य दक्षिण भारत में पहली बार राज्य प्रणाली के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। ये रचनाएँ ऐतिहासिक विकास की ऐसी प्रक्रिया के संकेत देती हैं जिसमें हम कबीलों की संख्या में ह्रास तो पाते हैं, किन्तु राजा के साथ सुगठित इकाइयों के रूप में उनका अस्तित्व भी बना रहता है। राज्य एक संगठित राजनीतिक संरचना के रूप में तो गया था किन्तु यह अभी भी स्थिर नहीं था। यद्यपि प्रजातांत्रिक अवधारणा अभी सुदृढ़ नहीं हो पाई थी, परंतु प्रशासन राजतंत्रीय होते हुए भी प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर चलता था।

राजत्व

संगम काल के तीन राजवंशों में से ‘चोल’ सिंचित और उर्वर कावेरी घाटी पर शासन करते थे। उनकी राजधानी ‘युरैयुर’ में थी। ‘पांडय’ पशुचारी और तटवर्ती भागों पर शासन करते थे और उनकी राजधानी ‘मदुरै’ में थी। ‘चेर’ का आधिपत्य पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र में था उनकी राजधानी ‘वंजि’ (कुरुर) में थी। संगम कृतियाँ इतने राजाओं के नाम की चर्चा करता है कि उनका वंशक्रम और कालक्रम निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

फिर भी विद्वानों ने चोल राजाओं- उरुवाप्रेफर इलांजेत्चेन्नी, उसके पुत्र कारिकल और कारिकल के दो पुत्रों, नालन-किल्ली और नेदुं किल्ली की वंशावली की पुष्टि कर ली है। पांड्य राजवंश में मुथुकुदुमी पेरुवालुदी, अरयिपादाई कादंथ नेडुनजेलियन, वेर्रीवेर्चेलियन और तलयालंकानाथु चेरुवेनरा नेडुल जेलियन नामक राजाओं की पुष्टि हो गई है। इसी प्रकार चेर राजवंश के राजाओं में ईमायारारांबन नेडुमकेरालतन, चेरन सेंगुत्तुवन और मांतारम चेरल ईरुंपोराई की पुष्टि की जा चुकी है।

संगम काल में शासन राजतंत्रात्मक था। राजा को वेंतन कहा जाता था। वह समाज और शासन दोनों का प्रधान होता था। समाज के प्रधान के रूप में वह इन्द्रोत्सव तथा नृत्य-समारोहों के उद्घाटन करता था। राज्याभिषेक के समय वह महत्त्वपूर्ण उपाधियां ग्रहण करता था। उसे देवताओं के समकक्ष माना जाता था। प्राचीन तमिलवासी तीन वस्तुओं- मृदंग, राजदण्ड, और श्वेत छत्र को राजा के प्रधान चिह्न मानते थे।

संगम साहित्य के अनुसार राजपद वंशानुगत रूप में पिता से पुत्र को प्राप्त होता था। राजा का दायित्व राज्य में राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखने का था। वह प्रजा के कल्याण की देख-रेख करता था तथा उसकी भलाई के लिए कार्य करता था। राजा अपने राज्य का दौरा करता था एवं शासन के मामलों में मंत्रियों से परामर्श लेता था जिन्हें संगम साहित्य में ‘सुर्रम’ कहा गया है। सुर्रम का तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो राजा को आवश्यकता पड़ने पर सलाह देने के लिए उसके निकट रहते थे।

सामन्त

संगम कालीन शासन व्यवस्था में राजा के अधीन दो प्रकार के ‘सामंत’ होते थे- (1.) वेलिर और (2.) अ-वेलिर। उनमें से कुछ सामंत साहित्य के महान संरक्षक सिद्ध हुए। इन सरदारों में कुछ प्रमुख थे- मोहुर का पालयन मारन (आधुनिक मदुरै के निकट), नानन वेनमान और विल्लवान कोथाई (दोनों प्रायद्वीप के पशिचमी तट के निकट), ओइमानाडु (आधुनिक दक्षिणी आकेटि) के नलिलया कोडन, टिथियन (तिन्ने वैल्ली क्षेत्र) तथा वेलिर सरदारों का समूह, जैसे- पारमबुनाद कापारी, पाल्नी क्षेत्र का वेलपेगन, पुडुकोटटाई क्षेत्र का वेलइव्वी, कोदुंबालुर के वेल आवी और ईरुक्कुवेल, तथा अन्य।

उत्तर-संगम-काल में राजतंत्रीय सत्ता अधिक सुदृढ़ हो गई और परंपरागत सरदारों की स्थिति घटकर राजकीय अधिकारियों के समान हो गई। संगमोत्तर काल में इन सामंतों ने एवं राजकीय अधिकारियों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और राजा कमजोर हो गया।

शासन

राजा की नीतियाँ को नियंत्रित करने के लिए विभिनन परिषदें बनी हुई थीं। सिलप्पादिकरम दो प्रकार की परिषदों की चर्चा करता है- (1.) पेरुंकुलु और (2.) एंपेरायम। पेरुंकुलुम पांच सदस्यों की मंत्रि-परिषद थी, जबकि एंपेरायम अथवा महासभा में 8 सदस्य होते थे। दोनों परिषदें प्रशासकीय निकाय थीं, यद्यपि उनका कार्य सामान्यतः परामर्शी स्वरूप का था तथापि राजा उनके परामर्श को अस्वीकार नहीं करता था। इन परिषदों का मुख्य कार्य न्यायिक था,। मदुरैक्कांजी के अनुसार इन संस्थाओं के प्रमुख को ऐंपेकुल कहते थे।

प्राचीन राजा चाहे जितना प्रतापी रहे हों, शासन का स्वरूप ‘स्वभावतः-सीमित’ अथवा ‘लोकप्रिय-राजतंत्र’ का रहा है। उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में यह व्यवस्था अधिक सुदृढ़ रही है। प्रत्येक स्थानीय इकाई, चाहे वह कितनी भी छोटी और किसी भी कोने में क्यों न स्थित हो, स्थानीय सभा द्वारा शासित होती थी। संगम साहित्य में अवाई और मरनाम नामक संस्थाओं के भी उल्लेख आए हैं। ऐसी सभाओं को आमतौर पर ‘आरांकुरावैयम’ कहा जाता है जो अपने सही निर्णाय के लिए विख्यात थीं। इन्हें हमारी आधुनिक पंचायत प्रणाली का पूर्वज कहा जा सकता है।

प्रतिरक्षा

बड़े राजा और सामंत विशाल एवं स्थायी सेनाएं रखते थे। दो राज्यों के बीच प्रायः युद्ध होते रहते थे। इनका उद्देश्य न केवल अपने राज्य की रक्षा करना एवं पड़ौसी राज्य के क्षेत्र पर अधिकार करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाना होता था अपितु पड़ोसी राज्यों की अत्याचार या कुशासन झेल रही जनता को त्राण दिलाने का भी होता था। कभी-कभी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने हेतु भी युद्ध होते थे। राज्य का प्रत्येक पुरुष स्वयं को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करता था। राजाओं द्वारा संपोषित स्थायी सेना के अतिरिक्त पूरे राज्य में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक होते थे जो आवश्यकता पड़ने पर वेतनभोगी सैनिक के रूप में राजा की सेना में सम्मिलित हो सकते थे।

संगम साहित्य के अनुसार राजा के पास चतुरंगिणी सेना अर्थात् रथ सेना, गज सेना, अश्व सेना और पैदल सेना होती थी। चेर राजाओं के पास नौ-सेना भी थी जो सामुद्रकि पत्तन की रखवाली करती थी। दूसरे राजाओं के जहाज चेर राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते थे। संगम ग्रंथों में युद्ध क्षेत्रों में सैनिक छावनी का भी उल्लेख मिलता है। राजा की छावनी भव्य होती थी और छावनी में भी वह अपने श्वेत छत्र के नीचे सोता था। राजा को हर समय उसके सैनिक घेरे रहते थे।

राजा को घेर कर सोने वाले सैनिक बिना तलवार के होते थे। सामान्य सैनिकों की छावनियाँ अलग-बगल में ईख की पत्तियों से बनी होती थीं और उनके शिखर पर धान की पत्तियाँ लगाई जाती थीं जिनसे धान लटकता रहता था। सेनापतियों और ऊंची श्रेणी के पदाधिकारियों के साथ उनकी पत्नियाँ भी युद्ध-अभियान पर जाती थीं और वे उनके पतियों के लिए विशेष रूप से बनी छावनियों में ठहरती थीं। राजा सैनिकों और पदाधिकारियों की छावनियों में जाकर उनकी कुशल-क्षेम पूछता था। वह रात्रि के समय और यहाँ तक कि बरसात में भी ऐसा करता था।

तमिल प्रजा में योद्धा के प्रति तथा युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिक के प्रति भारी सम्मान का भाव था किन्तु पीठ पर लगे घाव के प्रति गहरे तिरस्कार का भाव होता था। जिस राजा या सेनापति की पीठ पर घाव लग जाता था, वह राजा या सेनापति उपवास करके प्राण छोड़ता था। जो योद्धा युद्ध में शहीद हो जाते थे उनकी याद में स्मारक खड़े किए जाते थे। राजकीय कारावासों में बंदियों को पीड़ा दी जाती थी।

संगम शासन व्यवस्था अनेक मामलों में उत्तर-भारत के राजनीतिक विचारों और संस्थाओं से प्रभावित थी। संगम काल के अनेक राजा अपने कुल को शिव एवं विष्णु आदि देवताओं और प्राचीन ऋषियों से उत्पन्न मानते थे। अनेक राजाओं के पूर्वजों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। संगम युग के शासक कला, साहित्य एवं संस्कृति के रक्षक थे और विशाल यज्ञों का आयोजन किया करते थे।

संगम साहित्य में वर्णित संगम युगीन अर्थव्यवस्था

कृषि

संगम युगीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं पशुपालन पर आधारित थी। संगम युग की जनता की समृद्धि भूमि की उर्वरता और व्यापार के विस्तार में निहित थी। मदुरैक्कांजी कृषि और व्यापार को आर्थिक विकास की मुख्य शक्ति मानता है। सिलप्पादिकरम भी प्रजा की सुख-समृद्धि को कृषि से जोड़ता है। कृषि राज्य के राजस्व का मुख्य स्रोत थी। प्रजा कृषि एवं पशुपालन में विशेष रुचि लेती थी।

संगम काव्यों में प्रायः दूध और दूध के उत्पादों- दही, मक्खन, घी, छाछ आदि का उल्लेख हुआ है। संगम साहित्य की अनेक रचनाओं में पशुधन के महत्त्व का उल्लेख हुआ है। पड़ौसी राज्य प्रायः पशुधन लूटने के लिए आक्रमण कर दिया करते थे। राजा के प्रधान कर्त्तव्यों में अपने राज्य के पशुधन की रक्षा करना भी था। संगम काल में बड़ै पैमाने पर उपजाई जाने वाली फसलों में धान और ईख का प्रमुख स्थान था।

अन्य फसलों में विभिन्न प्रकार के फल, चना, सेम, वलिल (शकरकंद), कटहल, आम, केला, नारियल, सुपारी, केसर, गोल-मिर्च, हल्दी, इत्यादि सम्मिलित थे। संगम युग के राजाओं ने कृषि के विकास के लिए अनेक उपाय किए। कारिकाल चोल ने सिंचाई के लिए तालाब खुदवाया। उसका कावेरी तटबंध कृषि के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

तालाब से सिंचाई के कारण कृषि में लाभ की चर्चा अनेक कविताओं में मिलती है। मदुरैक्कांजी उन नदियों की चर्चा करता है जो पूर्वी-सागर की ओर के तालाबों को भर देती है।

उद्योग

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में उद्योगों का भी बड़ा महत्व था। संगम युग में विभिन्न प्रकार की उद्योग सम्बन्धी गतिविधियाँ बड़े स्तर पर होती थीं। काव्यों में अनेक प्रकार के कारीगरों- लौहकार, ताम्रकार, स्वर्णकार, कुंभकार, मूर्त्तिकार, चित्रकार और बुनकर आदि का उल्लेख हुआ है। मनिमेकलाई महाराष्ट्र से वास्तुकारों, मालवा से लौहकारों, ग्रीस और रोम से काष्ठकारों तथा मगध से जौहरियों के अपने तमिल प्रतिरूपों के साथ सहयोग की चर्चा करता है।

व्यवसाय आमतौर पर आनुवंशिक था अर्थात पिता का काम ही पुत्र अपना लेता था। सिलप्पादिकरम के अनुसार अलग-अलग व्यवसाय के लोग अलग-अलग गलियों में रहते थे। इससे विभिन्न व्यापारों और उद्योगों में उन्नति तो हुई ही, साथ ही व्यवसाय से जुड़े लोगों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में महारत हासिल की।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

इस युग में निर्माण-कला ने भी ऊँचाइयां प्राप्त कीं। सिलप्पादिकरम में ऐसी नौकाओं का उल्लेख हुआ है जिनके आग्रभाग अश्व, गज और सिंह की आकृति वाले थे। भूमध्यसागरीय जगत और अन्य दूर-देशों के साथ बढ़ते व्यापारिक सम्बन्ध तभी संभव हो सकते थे जब मजबूत और दूरस्थ यात्रा योग्य पोत बनाए गए हों। अन्य निर्माण कार्यों में पुल, नालियाँ, प्रकाशगृह, नगर परिघाएं इत्यादि सम्मिलित थे। संगम युग में चित्रकला भी काफी लोक प्रिय थी। पारिपादाल ‘मदुरा’ (मदुरै) में चित्रांकनों के एक संग्रहालय की चर्चा करता है और सिलप्पादिकरम में चित्रों की बिक्री का उल्लेख हुआ है। घरों की दीवारें छतें, वस्त्र, पलंगपोश, पर्दे और नित्य उपयोग की जाने वाली अन्य चीज़ें भी चित्रांकित की जाती थीं। उस काल में तमिलों में बुनाई कला अत्यंत लोकप्रिय थी। संगम साहित्य में, बुने हुए पुष्प के ‘अभिकल्प’ की बार-बार चर्चा हुई है। कपास, रेशम, ऊन और चूहे के बाल से भी कपड़े बुने जाते थे। सूत को रंगने का भी रिवाज था। भारतीय रेशम अपनी बारीकी के कारण रोमन सौदागरों द्वारा भारी मांग में था। ‘बुनाई’ एक घरेलू उद्योग था जिसमें परिवार के सारे सदस्य, विशेषकर महिलाएँ भाग लेती थीं। चर्मकारों, कुंभकारों और अन्य कारीगरों ने भी औधोगिक विकास में योगदान किया।

इस युग में ग्रीक मूर्ति-कला और अन्य विदेशी शिल्पों का भी दक्षिण भारत में प्रवेश हुआ। ‘नेदुनालवादाई’ और ‘पादिरुप्पत्तु’ आदि साहित्यिक कृतियाँ विदेशियों द्वारा बनाए गए सुंदर चिरागों, रोमन पात्रों और मद्य-चषकों का उल्लेख करती हैं। उस अवधि में अमरावती (आंध्र प्रदेश) और श्रीलंका की मूर्तिकलाओं में ग्रीक-रोमन प्रभाव देखे जा सकते हैं।

व्यापार

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में व्यापार का बहुत बड़ा योगदान था। संगम युग में तमिल व्यापारियों के भूमध्यसागरीय देशों, ग्रीस, रोम, मिस्र, चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया और श्रीलंका के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिलप्पादिकरम, मनिमेकलाई और पटिटनप्पालाई आदि साहित्यिक कृतियाँ ग्रीक और रोमन व्यापारियों के साथ सम्बन्धों की बार-बार चर्चा करती हैं।

इस अवधि में भारत-रोम व्यापार अपने उत्कर्ष पर था। प्लिनी, टॉलेमी, स्ट्राबो और पेट्रोनियस आदि विदेशियों के पेरिप्लस आफ ऐरिथ्रिअन और अन्य वृत्तांत उस अवधि के अनेक पत्तनों और व्यापारिक सामग्रियों का उल्लेख करते हैं। अनेक स्थलों पर हुई पुरातात्त्विक खुदाइयों से भी तमिल व्यापारियों एवं अन्य देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि होती है। तमिलनाडु में अनेक स्थानों से उन देशों के सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं।

संगम ग्रंथ मुसिरी, पुहार यकावेरी पट्टिनम और कोड़काई के पत्तनों की चर्चा करते हैं। ये पत्तन उस काल के तीन महान शासकों के हैं। इनके अतिरिक्त पेरिप्लस तोंडी, मुसिरी और कोमारी (कन्याकुमारी), कोल्ची (कोड़की), पोडुके (अरिकामेडु) और सोपात्मा के पत्तनों का उल्लेख करता है।

पेरिप्लस के अनुसार दक्षिण भारत में तीन प्रकार के जलयानों का उपयोग होता था- लघु तटीय जलयान, वृहद तटीय जलयान और समुद्र-यात्रीय जलयान। कोलांडिया नामक वृहद जलयानों की चर्चा मिलती है जो तमिलनाडु के समुद्रतट से चलकर गंगा नदी तक पहुंचते थे।

रोम को निर्यात किए गए पण्यों से अच्छा लाभ होता था। बाघ, तेंदुए, बंदर और मोर आदि जीवित पशु-पक्षी रोम भेजे जाते थे। निर्यात के मुख्य पशु-उत्पादों में हाथीदाँत और मोती शामिल थे। वानस्पतिक उत्पादों में सुगंधित पदार्थ और मसाले गोलकी, अदरख, इलायची, लौंग, काष्ठपफल, इत्यादि, नारियल केला, गुड़, सागौन, चंदन, आर्गरु उरैयार के नाम से ज्ञात विशेष प्रकार के सूती वस्त्र, इत्यादि मुख्य निर्यात-सामग्रियाँ थीं। हीरा, वैदूर्य, इस्पात, अल्पमूल्य रत्न, इत्यादि खनिज भी निर्यात किए जाते थे।

रोम से आयात की जाने वाली वस्तुओं में सिक्के, मूंगा, मध, शीशा, टिन और जेवर शामिल थे। उस अवधि में दक्षिण भारत के अनेक स्थलों पर बनी मालाएँ दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनेक स्थलों पर पाई गई हैं। इससे इन प्रदेशों के बीच समुद्रवर्ती सम्बन्धों की पुष्टि होती है। संगम काल में तमिल प्रदेश के अनेक शहरों में विदेशी व्यापारियों की बस्तियां थीं।

तमिलों की समृद्धि में र्सिफ विदेशी-व्यापार का ही योगदान नहीं था अपितु विभिन्न नगरीय केंद्रों के जुड़ने से स्थानीय व्यापारिक नेटवर्क ने आंतरिक व्यापार को फूलने-फलने के पर्याप्त अवसर प्रदान किए। ‘सिलप्पादिकरम’ में पुहार के बाजार की गालियों का उल्लेख हुआ है। मदुराइकांजी पांडयों की राजधानी मदुराई के बाजार का उल्लेख करता है।

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार का बहुत बड़ा योगदान था। तटीय पत्तनों और शहरों के अतिरिक्त तमिल प्रदेश के भीतरी इलाकों में भी नगर-केंद्रों का विकास हुआ। इनमें मदुरै, करुर, पेरुर, कोडुमानाल, उरैयुर, कांचीपुरम, इत्यादि प्रसिद्ध हैं। एक और पूर्वीतट पर कोरकोई ‘मोती’ निकालने के लिए प्रसिद्ध था तो दूसरी ओर भीतरी इलाके में कोडुमानाल ‘वैदूर्य’ के लिए। दूर-दराज के गाँव भी व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े थे।

भीतरी प्रदेश के व्यापारिक परिवहन के लिए पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले छकड़े प्रमुख साधन थे। व्यापार अधिकांशतः अदला-बदली के आधार पर चलता था। तमिल प्रदेश की भौगोलिक विविधता के कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच उत्पादों का विनिमय आवश्यक था। साथ ही मुद्रा का उपयोग भी होता था।

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में व्यापार राजकीय राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत था। व्यापारियों से ‘पारगमन-कर’ लिया जाता था। युद्ध में लूटा गया माल भी राजकीय कोष में वृद्धि करता था किंतु कृषि से होने वाली आय ही युद्ध और राजनीतिक संगठन का मुख्य आधार थी। संगम साहित्य में किसानों से लिए जाने वाले करों की जानकारी नहीं मिलती।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – संगम युग

संगम युग में समाज

संगम साहित्य

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

इस्लाम का जन्म

0
इस्लाम का जन्म - bharatkaitihas.com
मक्का शहर का प्राचीन चित्र

जिस समय भारत भूमि पर वैष्णव धर्म के भीतर विभिन्न दार्शनिक विचारों का विकास नवीन उत्कर्ष को प्राप्त कर रहा था, भारत भूमि से दूर अरब की भूमि पर इस्लाम का जन्म हो रहा था।

पश्चिम एशिया में स्थित अरब प्रायद्वीप को भूमध्य सागर, लाल सागर, अरब सागर और फारस की खाड़ी तीन ओर से घेरे हुए है। कुछ तटवर्ती क्षेत्रों को छोड़़कर यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप रेगिस्तान है।

इस्लाम का अर्थ

इस्लाम अरबी भाषा के ‘सलम’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है आज्ञा का पालन करना। ‘इस्लाम’ का अर्थ है ‘आज्ञा का पालन करने वाला।’ इस्लाम का वास्तविक अर्थ है ‘खुदा के हुक्म पर गर्दन रखने वाला।’ व्यापक अर्थ में इस्लाम एक धार्मिक मत का नाम है, जिसका उदय सातवीं शताब्दी में अरब में हुआ था। इस मत के मानने वाले ‘मुसलमान’ कहलाते हैं। मुसलमान शब्द ‘मुसल्लम-ईमान’ का बिगड़ा हुआ स्वरूप है।

‘मुसल्लम’ का अर्थ है ‘पूरा’ और ‘ईमान’ का अर्थ है ‘दीन या धर्म।’ इसलिए मुसलमान उन लोगों को कहते हैं जिनका दीन इस्लाम में पूरा विश्वास है। वे जो भी कार्य करते हैं, अल्लाह के नाम पर करते हैं और कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व कहते हैं- ‘परम करुणामय एवं दयालु अल्लाह के नाम (बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम) पर यह काम करता हूँ।’

अरब का प्राचीन धर्म

इस्लाम का उदय होने से पहले, अरब वालों के धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे उसी प्रकार इन लोगों के भी प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था। अरब वालों में अन्धविश्वास भी कूट-कूट कर भरा था।

उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं। मक्का में काबा नामक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ किसी समय 360 मूर्तियों की पूजा होती थी। यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरब वालों का विश्वास था कि इस पत्थर को ईश्वर ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इसे बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे।

यह पत्थर आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है। काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले के ऊपर था, कुरेश कबीले में मुहम्मद नामक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और इस्लाम का जन्म हुआ। इस्लाम का जन्म होने से पहले, अरब में विदेशी यहूदियों और इसाइयों की बस्तियां भी थीं। विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग एक दूसरे के सम्पर्क में आते थे और उनके विश्वास एक दूसरे को प्रभावित करते थे।

हजरत मुहम्मद का परिचय

हजरत मुहम्मद का जन्म ई.570 में मक्का के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला तथा माता का नाम अमीना था। मुहम्मद के जन्म से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वे छः साल के हुए तो उनकी माता की, तथा आठ साल के हुए तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। वे भेड़ें चराने लगे इस कारण उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध नहीं हुआ।

फिर भी वे चिंतनशील बालक थे। इतिहासकार नैथेनियन प्लैट ने लिखा है- ‘अरब के तारों भरे आकाश के तले एक अनाथ गडरिया बालक अपना एकान्त समय ईश्वर के बारे में चिन्तन करता हुआ बिताया करता था।’

 वयस्क होने पर मुहम्मद अपने चाचा के साथ ऊँटों के काफिले लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे। इन यात्राओं से उनको मक्का की भौगोलिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्थितियों का ज्ञान हो गया तथा साथ ही उन्हें व्यापार का भी व्यावहारिक ज्ञान हो गया।

यात्राओं और व्यापार के कारण मोहम्मद का सम्पर्क एक धनी विधवा ‘बीबी खदीजा’ से हुआ। बीबी खदीजा ने उनकी ईमानदारी एवं गुणों से प्रभावित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस समय मुहम्मद की आयु लगभग 25 वर्ष और बीबी खदीजा की आयु लगभग 40 वर्ष थी। हजरत मुहम्मद सरल जीवन व्यतीत करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था तक उनके जीवन में कोई विशेष घटना नहीं घटी।

एक दिन उन्हें फरिश्ता जिबराइल के दर्शन हुए जो उनके पास अल्लाह का पैगाम अर्थात् संदेश लेकर आया। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ इसके बाद मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’

अब मुहम्मद ने अपने मत का प्रचार करना आरम्भ किया। उन्होंने अपने ज्ञान का पहला उपदेश अपनी पत्नी खदीजा को दिया। उन्होंने मूर्ति-पूजा तथा बाह्याडम्बरों का विरोध किया। उनकी शिक्षा में यहूदी, ईसाई और हनीफी शिक्षाओं से भिन्न अथवा नया कुछ भी नहीं था किंतु हजरत मुहम्मद का कहना था कि केवल अल्लाह में आस्था रखो। उसकी इच्छा को चुपचाप शिरोधार्य कर लेना चाहिए।

कुरान की सूरत तीन में कहा गया है- ‘अल्लाह इस बात की गवाही देता है कि उस (एक अल्लाह) के सिवाय कोई भी पूज्य नहीं और फरिश्ते तथा इल्म वाले भी गवाही देते हैं कि वही इन्साफ के साथ सब कुछ सम्भालने वाला है। उसके सिवाय और कोई इलाह (पूज्य) नहीं, वह सर्वशक्तिमान और ज्ञानमय है। बेशक दीन तो अल्लाह के नजदीक यही इस्लाम (आत्म समर्पण) है।’

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

अरबवासियों ने मुहम्मद के विचारों का स्वागत नहीं किया। उनके अपने कुरैशी कबीले के लोगों ने हजरत मुहम्मद का जबर्दस्त विरोध किया। कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा जिससे विवश होकर 28 जून 622 को हजरत मुहम्मद को अपनी जन्मभूमि मक्का को छोड़ कर मदीना चले गए। यहीं से मुसलमानों का ‘हिजरी संवत्’ आरम्भ होता है। हिजरी अरबी के ‘हज्र’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘जुदा या अलग हो जाना।’ चूंकि हजरत मुहम्मद मक्का से अलग होकर मदीना चले गए इसलिए इस घटना को ‘हिजरत’ कहते है। मदीना (यस्रिब) के खेतिहर नखलिस्तान में हजरत मुहम्मद को अपने विचारों के प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण मिला। मदीना वालों की, मक्का के अभिजात्य लोगों से शत्रुता थी, अतः उन्होंने हजरत मुहम्मद को सहर्ष समर्थन दिया और बहुत से लोग उनके अनुयाई बन गए जो ‘अन्सार’ कहलाए। मुहम्मद मदीना में नौ वर्ष तक रहे। हजरत मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों के साथ ई.630 में मक्का पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। पराजित मक्कावासियों ने आत्समर्पण कर मुहम्मद के धार्मिक विश्वासों को स्वीकार कर लिया। इससे कुरैशी व्यापारियों तथा सरदारों को नुकसान नहीं हुआ अपितु फायदा हुआ। मक्का का एक जातीय व धार्मिक केन्द्र के रूप में महत्त्व पहले से भी अधिक बढ़ गया।

जो कुरैशी पहले हजरत मुहम्मद के इस्लाम को शत्रुतापूर्ण दृष्टि से देखते थे, वे ही अब इस आन्दोलन से जुड़ने लगे और अग्रणी भमिका भी निभाने लगे। फलस्वरूप, थोड़े ही समय में सम्पूर्ण अरब के लोग इस्लाम को मानने लगे। मक्का इस्लाम का तीर्थ स्थान एवं प्रमुख धार्मिक केन्द्र बन गया।  ई.632 में मुहम्मद का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए। इस प्रकार इस्लाम का जन्म हुआ।

हजरत मुहम्मद के उपदेश

हजरत मुहम्मद का एक अल्लाह में विश्वास था, जिसका न आदि है न अन्त, अर्थात् न वह जन्म लेता है और न मरता है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा तथा अत्यन्त दयावान है। मुहम्मद का कहना था कि चूंकि समस्त इंसानों को अल्लाह ने बनाया है इसलिए समस्त इंसान एक समान हैं। मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों से कहा- ‘सच्चे धर्म का यह तात्पर्य है कि तुम अल्लाह, कयामत, फरिश्तों, कुरान तथा पैगम्बर में विश्वास करते रहो और अपनी सम्पत्ति को दीन-दुखियों को खैरात में देते रहो।’

हजरत मुहम्मद के सम्बन्ध में मुसलमानों की मान्यता

मुसलमानों में ‘ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह’ के सिद्धांत में अटल विश्वास है अर्थात् ‘अल्लाह के सिवाय कोई पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।’ अल्लाह में विश्वास रखने के साथ-साथ यह मानना भी जरूरी है कि मुहम्मद अल्लाह के नबी, रसूल और पैगम्बर हैं। पैगाम ले जाने वाले को ‘पैगम्बर’ कहते हैं।

हजरत मुहम्मद, अल्लाह का संदेश पृथ्वी पर लाए, इसलिए वे पैगम्बर कहलाए। ‘नबी’ कहते हैं किसी उपयोगी परम ज्ञान की घोषणा को। हजरत मुहम्मद ने चूँकि ऐसी घोषणा की, इसलिए वे नबी हुए। ‘रसूल’ का अर्थ दूत होता है। हजरत मुहम्मद रसूल हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और इंसान के बीच दूत का काम किया।

कुरान

पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह की ओर से बहुत से ‘इल्हाम’ (दिव्य ज्ञान) हुए थे। मुहम्मद ने जनसामान्य को इस ज्ञान का उपदेश दिया जो ‘कुरान’ में संकलित है। कुरान को ‘कलामे-पाक’ भी कहा जाता है। यह स्वयं ‘अल्लाह ताला’ का कलाम है। यह आसमान से हजरत मुहम्मद पर ‘नाजिल’ किया गया (उतारा गया) है। मान्यता है कि हजरत मुहम्मद द्वारा ‘इल्हाम’ के सम्बन्ध में कही गई बातों से उनके अनुयाई टीपें तैयार कर लेते थे।

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद इन टीपों को ई.650 में खलीफा उस्मान के काल में संकलित कर लिया गया और यह संकलन ही कुरान के नाम से जाना गया। इसे पैगम्बरों के पास ईश्वरीय आदेश पहुँचाने वाले फरिश्ते जिब्राइल द्वारा कुरान अरबी भाषा के ‘किरन’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘निकट या समीप।’ इस प्रकार कुरान वह ग्रन्थ है, जो लोगों को अल्लाह के निकट ले जाता है।

सुन्ना

मुसलमानों के धार्मिक साहित्य का दूसरा भाग सुन्ना कहलाता है। उसमें हजरत मुहम्मद के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों से सम्बन्धित हदीसें अर्थात् अनुश्रुतियां शामिल हैं। हदीसों का संकलन नौंवी शताब्दी में बुखारी, मुस्लिम इब्न अल इज्जाज आदि उलेमाओं ने किया था। कई उलेमाओं ने कुरान और हदीस के आधार पर हजरत मुहम्मद का जीवन चरित्र लिखा।

हजरत मुहम्मद के उपलब्ध जीवन चरित्रों में से सबसे प्राचीन मदीना के निवासी इब्न इसहाक द्वारा आठवीं शताब्दी ईस्वी में लिखा गया। शिया मतावलम्बी ‘सुन्ना’ को नहीं मानते जिसकी रचना पहले तीन खलीफाओं के शासनकाल में पैगम्बर विषयक अनुश्रुतियों से हुई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

इस्लाम के सिद्धांत

0
इस्लाम के सिद्धांत - bharatkaitihas.com
फतहपुर सीकरी की दरगाह

इस्लाम के सिद्धांत हजरत मुहम्मद के उपदेशों पर आधारित हैं तथा ये कुरान के माध्यम से मुसलमानों के लिए उपलब्ध हैं। माना जाता है कि कुरान किसी ने लिखी नहीं थी, अपितु इसकी आयतें इलहाम के माध्यम से मुहम्मद पर आयत हुई थीं, अर्थात् आसमान से उतरी थीं।

मुसलमान के पांच कर्त्तव्य

कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान के पांच कर्त्तव्य हैं- कलमा, नमाज, जकात, रमजान तथा हज।

(1.) कलमा

कलमा अरबी भाषा के ‘कलम’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- शब्द। कलमा का अर्थ होता है- ‘अल्लाह का वाक्य’ अर्थात् जो कुछ अल्लाह की ओर से लिखकर आया है, कलमा है- ‘ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह।’

(2.) नमाज

नमाज का अर्थ खिदमत या बंदगी करना है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- नम तथा आज। ‘नम’ का अर्थ होता है ठण्डा करने वाली या मिटाने वाली और ‘आज’ का अर्थ होता है वासनाएँ अथवा बुरी इच्छाएँ। इस प्रकार नमाज उस प्रार्थना को कहते हैं जिससे मनुष्य की बुरी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं।

नमाज दिन में पाँच बार पढ़ी जाती है- प्रातःकाल, दोपहर, तीसरे पहर, संध्या समय तथा रात्रि में। शादी, गमी, यात्रा, लड़ाई, बेकारी आदि समस्त परिस्थितियों में नमाज पढ़ी जा सकती है। नमाज किसी भी परिस्थिति में मुआफ नहीं हो सकती किंतु नाबालिक बच्चों और पागलों पर नमाज फर्ज नहीं है। शुक्रवार को समस्त मुसलमान मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं। नमाज से पहले ‘वुजू’ करना (हाथ, पांव, मुंह आदि धोना) अनिवार्य है।

(3.) जकात

जकात का शाब्दिक अर्थ होता है- ज्यादा होना या बढ़ना परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ होता है भीख या दान देना। चूंकि भीख या दान देने से धन बढ़ता है इसलिए जो धन दान दिया जाता है उसे जकात कहते हैं। प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का चालीसवाँ हिस्सा खुदा की राह में, अर्थात् दान में दे देना चाहिए।

(4.) रोजा

चाँद का नौवाँ महीना ‘रमजान’ होता है जो अरबी भाषा के रमज शब्द से बना है। इसका अर्थ है शरीर के किसी अंग को जलाना। चूंकि इस महीने में रोजा या व्रत रखकर शरीर को जलाया जाता है इसलिए इसका नाम रमजान रखा गया है।

रोजा में सूर्य निकलने के बाद और सूर्यास्त के पहले खाया-पिया नहीं जाता। रोजा रखने से बरकत (वृद्धि) होती है और कमाई बढ़ती है। रोजा के लिए रमजान का महीना इसलिए चुना गया क्योंकि इसी महीने में कुरान उतरा था। रोगी एवं यात्री के लिए रमजान के महीने में रोजा रखना अनिवार्य नहीं है। वे बाद में उतने ही दिन रोजा रख सकते हैं।

(5.) हज

हज का शाब्दिक अर्थ है इरादा परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ है- मक्का में जाकर बन्दगी करना। प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक बार मक्का जाकर बन्दगी करे। जिल्हज (बकरीद माह) की नौवीं तारीख को ‘अरफात’ (एक स्थान का नाम) के मैदान में उपस्थित होना भी अनिवार्य है।

उपरोक्त पांच सिद्धांतों के अतिरिक्त भी इस्लाम के सिद्धांत हैं जिनका वर्णन कुरान में किया गया है।

अल्लाह

अल्लाह शब्द अरबी के ‘अलह’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- पाक या पवित्र, जिसकी पूजा करनी चाहिए। अल्लाह के सिवाय किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। इस्लाम बहुदेववाद के साथ-साथ मूर्ति-पूजा और प्रकृति पूजा का भी विरोध है। वह ईसाइयों द्वारा प्रतिपादित ईश्वर-त्रय (पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा) के सिद्धांत का भी विरोधी है।

वह ईसा को पैगम्बर तो मानता है किंतु ईश्वर का पुत्र नहीं, क्योंकि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुणों को जोड़ना उसे मनुष्य की श्रेणी में ले जाना है। कुरान में बार-बार कहा गया है- ‘यदि ईश्वर को सन्तानोत्पादक कहोगे तो आकाश फट जाएगा और धरती उलट जाएगी।’ कुरान की मान्यता है कि अल्लाह अर्श (आकाश) पर रहता है और वहाँ उसका सिंहासन भी है। वह निराकार, असीम शक्ति का स्वामी तथा प्रेम और दया का सागर है। वह लोगों को क्षमा करता है।

फरिश्ता

इस्लाम में देवों को ‘मलक’ तथा देवदूतों को ‘फरिश्ता’ कहते हैं। फरिश्ते वे पवित्र आत्माएँ हैं, जो अल्लाह तथा मनुष्य में सामीप्य स्थापित करती हैं। अल्लाह के पास से पैगाम लेकर जो फरिश्ता हजरत मुहम्मद के पास उतरा था, उसका नाम जिबराइल था। हजरत मुहम्मद जिबराइल को चर्म-चक्षु से नहीं, अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से देखते थे।

शैतान एवं जिन्न

शैतान भी देवताओं की तरह मलक-योनी का है किन्तु कुरान शैतान में विश्वास रखने की मनाही करता है। कुरान के अनुसार नीच वासनाएं मनुष्य के पतन का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ‘जिन्न’ नीच वासनाओं को उभारने का काम करते हैं। कुरान में ‘इबलीस’ नामक जिन्न का उल्लेख है जो मनुष्यों को गुमराह करने की कोशिश करता है। अतः उससे बचना चाहिए।

कमायत

अरबी के कयम शब्द से ‘कयामत’ बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है- खड़ा होना तथा व्यावहारिक अर्थ है- दुनिया का मिट जाना। कुरान के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म पहला और आखिरी जन्म है। इस जीवन के समाप्त हो जाने पर, मनुष्य की देह कब्र में दफनाई जाती है। तब भी उसकी आत्मा एक भिन्न प्रकार के कब्र में जीवित पड़ी रहती है और इसी आत्मा को कयामत के दिन उठकर अल्लाह के समक्ष जाना पड़ता है।

कुरान में कयामत का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-

‘जब कयामत आएगी, चांद में रोशनी नहीं रहेगी, सूरज और चांद सटकर एक हो जाएंगे और मनुष्य यह नहीं समझ सकेगा कि वह किधर जाए और ईश्वर को छोड़़कर अन्यत्र उसकी कोई भी शरण नहीं होगी ……. जब तारे गुम हो जाएंगे, आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा, पहाड़ों की धूल उड़ जाएगी और नबी अपने निर्धारित क्षण पर पहुँचेंगे ……. न्याय का दिन जरूर आएगा, जब सुर (तुरही) की आवाज उठेगी, जब तुम सब उठकर झुण्ड के झुण्ड आगे बढ़ोगे और स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएंगे ……. कयामत के दिन समस्त आत्माएं अल्लाह के समक्ष खड़ी होंगी और मुहम्मद उनके प्रवक्ता होंगे। तब, प्रत्येक रूह के पुण्य और पाप का लेखा-जोखा लिया जाएगा। पुण्य और पाप को तौलने का काम जिबराइल करेंगे। जिसका पुण्य परिणाम में अधिक होगा, वह जन्नत (स्वर्ग) में जाएगा। जिनके पाप अधिक होंगे, वे दोज़ख (नर्क) में पड़ेंगे।’

जन्नत और दोज़ख

कुरान के अनुसार जन्नत (स्वर्ग) सातवें अर्श (आकाश) पर स्थित है। उसमें एक रमणीय उद्यान है जहाँ झरने और फव्वारे हैं। दूध और शहद की नदियां बहती हैं। वृक्षों के तने स्वर्ण के हैं और उनमें स्वादिष्ट फल लगते हैं। स्वर्ग में ‘हूर-यूल-आयून’ जाति की सत्तर युवतियां हैं जिनकी आंखें काली और बड़ी हैं। पुण्यात्माओं की सेवा करने के लिए ‘गिलमा’ जाति के सुन्दर लड़के रहते हैं। इसके विपरीत दोज़ख की कल्पना अत्यंत भयानक तथा विकराल रूप में की गई है। कुरान के अनुसार जन्नत के सुख केवल पुरुषों के लिए हैं, स्त्रियों के लिए नहीं।

कर्मफलवाद में विश्वास

इस्लाम के सिद्धांत की सबसे बड़ी विशेषता कर्मफल का सिद्धांत है जो अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार होने वाली ‘अल्ल्लाह की मेहरबानी’ में विश्वास करता है। कुरान के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों का परिणाम अवश्य मिलेगा। जिसने भी कण-मात्र सुकर्म किया है, वह भी अपनी आंखों से देखेगा। कयामत के बाद स्वर्ग और नर्क का निर्णय इसी जन्म में किए गए कर्मों के फलानुसार ही होता है। कुरान कहता है- ‘अगर तुम ज्ञान से देखते तो तुम यहीं नर्क को भी देख सकते थे।’ कुरान के अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य ‘लिका-अल्लाह’ (ईश्वर मिलन) है। यह मिलन सम्भवतः सुकर्मों से ही सम्भव हो सकता है।

नैतिक सिद्धान्त

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

इस्लाम के नैतिक सिद्धान्त कुरान में लिखी गई बातों पर आधारित हैं। बहुत से लोग इन सिद्धांतों की अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं। उनकी व्याख्याएं जिन पुस्तकों में लिखी गई हैं, उन्हें हदीस कहा जाता है। प्रत्येक मुसलमान से न्यायप्रिय होने, भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से चुकाने, उदारता दिखाने, गरीबों की मदद करने की अपेक्षा की जाती है। इस्लाम में वैवाहिक सम्बन्धों पर पितृसत्तात्मक जीवन पद्धति की छाप है। अल्लाह ने स्त्री को पुरुष के लिए बनाया है। उसे पुरुष से दबकर रहना चाहिए। साथ ही कुरान में स्त्रियों के मानवीय अधिकारों को भी मान्यता दी गई है। पति द्वारा पत्नी से अनावश्यक क्रूर व्यवहार किए जाने की भी निन्दा की गई है। स्त्रियों को स्त्री-धन रखने का अधिकार और दयाधिकार प्राप्त हैं। कुरान के अनुसार अल्लाह के सामने समस्त मुसलमान बराबर हैं। अमीरी और गरीबी प्राकृतिक चीजें हैं जिन्हें स्वयं अल्लाह ने बनाया है। गरीबों के निर्वाह के लिए इस्लाम में जकात दिए जाने की व्यवस्था है। कुरान मनुष्य की निजी सम्पत्ति का समर्थन करता है। व्यापारिक मुनाफे को उचित मानता है जबकि सूदखोरी की निन्दा की गई है- ‘बेचने (व्यापारी) को तो अल्लाह ने हलाल (जाइज) किया है और सूद (ब्याज) को हराम (नाजाइज)।’ कर्जदार को बन्धुआ बनाने का निषेध है।

मुसलमानों पर यहूदी परम्पराओं का प्रभाव

यहूदी धर्म, इस्लाम से पुराना है। यहूदियों की कुछ परम्पराएं मुसलमानों ने भी अपना लीं। यहूदियों की तरह मुसलमानों में भी लड़कों का अनिवार्यतः खतना किया जाता है। अन्तर यह है कि मुसलमान, लड़के का खतना सामान्यतः सात से दस वर्ष की आयु में करते हैं जबकि यहूदी, जन्म के कुछ समय बाद। सूअर का मांस न खाना भी मुसलमानों ने यहूदियों से अपनाया है। दोनों ही धर्मों में ईश्वर, मनुष्यों एवं पशुओं की मूर्ति या चित्र बनाना एवं मूर्ति-पूजा करना वर्जित है। दोनों धर्मों में शराब पीना वर्जित है।

शिया सम्प्रदाय

इस्लाम के अनुयाई दो सम्प्रदायों में विभक्त हैं- शिया और सुन्नी। ‘शिया’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘गिरोह’ परन्तु व्यापक अर्थ में शिया उस सम्प्रदाय को कहते हैं जो हजरत मुहम्मद के दामाद ‘हजरत अली’ को हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, पहले तीन खलीफाओं को नहीं। शिया सम्प्रदाय का झण्डा काला होता है। शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम की दसवीं तारीख को ताजिये निकालते हैं।

सुन्नी सम्प्रदाय

‘सुन्ना’ को मानने वाले तथा अबूबक्र से खलीफाओं की गणना करने वाले ‘सुन्नी’ कहलाए। ‘सुन्नी’ शब्द अरबी के ‘सुनत’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है- मुहम्मद के कामों की नकल करना। व्यावहारिक रूप में सुन्नी उस सम्प्रदाय को कहते है, जो प्रथम तीन खलीफाओं को ही हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, हजरत मुहम्मद के दामाद अली को नहीं। सुन्नी सम्प्रदाय का झण्डा सफेद होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

खलीफाओं का उत्कर्ष

0
खलीफाओं का उत्कर्ष - bharatkaitihas.com
खलीफा हारून रशीद का काल्पनिक चित्र

इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ। खलीफाओं के प्रयत्नों से इस्लाम अरब की भूमि से बाहर निकल कर पूरी दुनिया में फैल गया।

‘खलीफा’ अरबी के ‘खलफ’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘लायक बेटा’ अर्थात् योग्य पुत्र परन्तु खलीफा का अर्थ है जाँ-नशीन या उत्तराधिकारी। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जो उनके उत्तराधिकारी हुए, वे खलीफा कहलाए। प्रारम्भ में खलीफा का चुनाव, हजरत मुहम्मद के अनुयाइयों की सहमति से होता था परन्तु बाद में यह पद आनुवंशिक हो गया।

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद हजरत मुहम्मद के ससुर अबूबकर प्रथम खलीफा चुने गए जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े थे। अबूबकर के प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम का प्रचार हुआ तथा खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ। अबूबकर के मर जाने पर 634 ई.में उमर को निर्विरोध खलीफा चुना गया। उमर ने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा ने नहीं की।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

उसने इस्लाम के अनुयाइयों की एक विशाल तथा योग्य सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा इस्लाम प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। जिन देशों पर उसकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी और इस्लाम का प्रचार आरम्भ हो जाता था। इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया। उमर के बाद उसमान खलीफा हुआ परन्तु थोड़े ही दिन बाद उसकी विलास-प्रियता के कारण उसकी हत्या कर दी गई और उसके स्थान पर हजरत मुहम्मद के दामाद अली को खलीफा चुना गया। कुछ लोगों ने उसका विरोध किया। इस प्रकार गृह-युद्ध आरम्भ हो गया और इस्लाम के प्रचार में भी शिथिलता आ गई। अन्त में अली का वध कर दिया गया। अली के बाद उसका पुत्र हसन खलीफा चुना गया परन्तु उसमें इस पद को ग्रहण करने की योग्यता नहीं थी। इसलिए उसने इस पद को त्याग दिया। अब सीरिया का गवर्नर मुआविया, जो खलीफा उमर के वंश से था, खलीफा चुन लिया गया। हसन ने मुआविया के पक्ष में खलीफा का पद इस शर्त पर त्यागा था कि खलीफा का पद निर्वाचित होगा, आनुवांशिक नहीं, परन्तु खलीफा हो जाने पर मुआविया के मन में कुभाव उत्पन्न हो गया और वह अपने वंश की जड़ जमाने में लग गया। उसने मदीना से हटकर दमिश्क को खलीफा की राजधानी बना दिया।

चूंकि वह उमर के वंश का था, इसलिए दश्मिक के खलीफा उमैयद कहलाए।

मुआविया लगभग बीस वर्ष तक खलीफा के पद पर रहा। इस बीच में उसने अपने वंश की स्थिति अत्यन्त सुद्धढ़ बना ली। अली के पुत्र हसन के साथ उसने जो वादा किया था, उसे तोड़ दिया और अपने पुत्र यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इससे बड़ा अंसतोष फैला। इस अंसतोष का नेतृत्व अली के पुत्र तथा हसन के भाई इमाम हुसैन ने ग्रहण किया।

उसने अपने थोड़े से साथियों के साथ फरात नदी के पश्चिमी किनारे के मैदान में उमैयद खलीफा की विशाल सेना का बड़ी वीरता तथा साहस के साथ सामना किया। इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख को तलवार के घाट उतार दिया गया। जिस मैदान में इमाम हुसैन ने प्राण त्यागे, वह कर्बला कहलाता है। कर्बला दो शब्दों से मिलकर बना है- कर्ब तथा बला। कर्ब का अर्थ होता है मुसीबत और बला का अर्थ होता है दुःख।

चूंकि इस मैदान में हजरत मुहम्मद की कन्या के पुत्र का वध किया गया था, इसलिए इस मुसीबत और दुःख की घटना के कारण इस स्थान का नाम कर्बला पड़ गया। मुहर्रम मुसलमानों के वर्ष का पहला महीना है। चूंकि इस महीने की दसवीं तारीख को इमाम हुसैन की हत्या की गई थी, इसलिए यह शोक और रंज का महीना माना जाता है। मुसलमान लोग मुहर्रम के दिन शोक का त्यौहार मनाते हैं।

इमाम हुसैन के बाद अब्दुल अब्बास नामक व्यक्ति ने इस लड़ाई को जारी रखा। अन्त में वह सफल हुआ और उसने उमैयद वंश के एक-एक व्यक्ति का वध कर दिया। अब्बास के वंशज अब्बासी कहलाए। इन लोगों ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। बगदाद के खलीफाओं में हारूँ रशीद का नाम बहुत विख्यात है, जो अपनी न्याय-प्रियता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

अन्त में तुर्कों ने बगदाद के खलीफाओं का अन्त कर दिया। खलीफाओं ने मिस्र में जाकर शरण ली। खलीफा अब इतिहास के नेपथ्य में चले गए थे किंतु खलीफाओं ने ही इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया था और इन्हीं लोगों ने भारत में भी इसका प्रचार किया था।

इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप

इस्लाम आरम्भ से ही राजनीति तथा सैनिक संगठन से सम्बद्ध रहा। हजरत मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था। जब ई.622 में पैगम्बर मुहम्मद मक्का से मदीना गए तब वहाँ पर उन्होंने अपने अनुयाइयों की एक सेना संगठित की और मक्का पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सैन्य-बल से मक्का तथा अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की।

मुहम्मद न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया। पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य का शासन कुरान के अनुसार होने लगा।

इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों के साथ अन्याय तथा अत्याचार किया जाने लगा। खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयाइयों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। इसका परिणम यह हुआ कि जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं विजय के लिए गईं, वहाँ पर इस्लाम का बल-पूर्वक प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा बलात् तलवार के बल पर किया गया। परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई। खलीफाओं का उत्कर्ष इस रक्तपात को पूरी दुनिया में ले गया।

जेहाद

इस्लामी सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए जेहाद अर्थात् धर्म-युद्ध का नारा लगाते थे। इस्लाम का एक निर्देश इस्लाम की खातिर पवित्र युद्ध (जिहाद) से सम्बन्ध रखता है। कुरान में इस निर्देश को सूत्रबद्ध किया गया है- ‘वर्ष में आठ माह बहुदेववादियों और विधर्मियों से लड़ना, उनका संहार करना और उनकी जमीन-जायदाद को छीन लेना चाहिए।’

बाद में मुस्लिम उलेमाओं ने जिहाद से सम्बन्धित निर्देशों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की। बहुदेवपूजकों के बारे में कुरान का रवैया बहुत सख्त है। उसमें कहा गया है- ‘हे ईमानवालों! अपने आस-पास के काफिरों से लड़े जाओ और चाहिए कि वह तुमसे अपनी बाबत सख्ती महसूस करें, और जानें कि अल्लाह उन लोगों का साथी है जो अल्लाह से डरते हैं।’

यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है कि यदि वे अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। क्लेन नामक विद्वान ने जिहाद का अर्थ ‘संघर्ष’ किया है और इस संघर्ष के उसने तीन क्षेत्र माने हैं- (1) दृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष (2) अदृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष और (3) इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष।

‘रिलीजन ऑफ इस्लाम’ के लेखक मुहम्मद अली का मत है कि- ‘इस शब्द का अर्थ इस्लाम के प्रचार के लिए युद्ध करना नहीं है, इसका अर्थ परिश्रम, उद्योग या सामान्य संघर्ष ही है। हदीस में हज करना भी जिहाद माना गया है।

नबी ने कहा है- सबसे अच्छा जिहाद हज में माना है किंतु व्यवहार में, आगे चलकर काजियों ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया। उन्होंने समस्त विश्व को दो भागों में बांट दिया- (1.) दारूल-इस्लाम (जिस भाग पर मुसलमानों की हुकूमत थी, उसे शान्ति का देश कहा गया, और (2.) दारूल-हरब (युद्ध स्थल) जिस भाग पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत थी। उन्होंने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित किया कि ऐसे देशों को जीत कर इस्लाम का झण्डा गाड़ना जाहिदों का परम कर्त्तव्य है।’

इन भावनाओं के कारण जेहाद प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। इस कारण इस्लाम जिस भी देश में गया, उस देश के समक्ष साम्प्रदायिकता की समस्या की नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि खलीफाओं का उत्कर्ष इस्लाम के लिए तो लाभकारी सिद्ध हुआ किंतु अन्य धर्मावलम्बियों के लिए बहुत खतरनाक सिद्ध हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

0
इस्लामी साम्राज्य का प्रसार - bharatkaitihas.com
इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद के जीवन काल में ही होना आरम्भ हो गया था। मुहम्मद के प्रयासों से अरब के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। मुहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफाओं का उत्कर्ष होने पर खलीफाओं के नेतृत्व में इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तेजी से हुआ।

अरबवासियों ने संगठित होकर इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। शीघ्र ही उन्होंने भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र आदि देशों पर अधिकार कर लिया।

इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया। फिर उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद इस्लामी सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में इस्लामी सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा।

इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार किया। मध्य एशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया।

इसके बाद ई.712 में उन्होंने भारत के सिन्ध प्रदेश पर अधिकार किया। ई.750 में उन्होंने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का इस्लामी राज्य स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था।

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तेजी से होने के कारण

अरब के एक छोटे नगर में उत्पन्न इस्लाम विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बन गया। इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तीव्र गति से होने के कई कारण थे-

(1.) इस्लाम की कट्टरता ने इस्लाम के तीव्र प्रसार में सहायता की। हजरत मुहम्मद ने मदीना पहुँचकर अपने अनुयाइयों को सैनिकों के रूप में संगठित किया तथा उन्हें आदेश दिया कि कुरान में अविश्वास रखने वाले को बलात् मुसलमान बना लिया जाए और यदि वे इस्लाम को स्वीकार न करें तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए। पैगम्बर के आदेश का पालन किया गया तथा सबसे पहला आक्रमण मक्का पर किया गया।

मक्का विजय के बाद हर जगह यही उदाहरण दोहराया गया। रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है- ‘जहाँ-जहाँ इस्लाम के उपासक गए, उन्होंने विरोधी सम्प्रदाय के सामने तीन रास्ते रखे- या तो कुरान हाथ में लो और इस्लाम कबूल करो या जजिया दो और अधीनता स्वीकार करो। यदि दोनों में से कोई बात पसन्द न हो तो तुम्हारे गले पर गिरने के लिए हमारी तलवार प्रस्तुत है।

ये बड़े ही कारगर उपाय रहे होंगे किन्तु यह समझ में नहीं आता कि सिर्फ इन्हीं उपायों से इस्लाम इतनी जल्दी कैसे फैल गया।‘ इस्लाम के लिए युद्ध करने वाले मुसलमानों को कुरान का आश्वासन था कि उनके पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और उन्हें स्वर्ग में खूब आनन्द मिलेगा।

(2.) अरब की तात्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। उस समय सारा अरब अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और दुराचार का केन्द्र बना हुआ था। अरबों में निर्धनता व्याप्त थी जिसके कारण उनमें लालच भी बहुत अधिक था और धन प्राप्त करने का हर उपाय अच्छा समझा जाता था।

जुआ, शराबखोरी, और वेश्यागमन भंयकर रूप से प्रचलित थे। विवाह जैसी पवित्र संस्था का महत्त्व भी जाता रहा और समाज में यौन-सम्बन्धों की कोई नैतिक व्यवस्था नहीं रह गयी थी। समस्त अरब लोग बहुदेववादी और घोर मूर्तिपूजक थे। ऐसी स्थिति में हजरत मुहम्मद द्वारा चलाया गया- अन्धविश्वासों से रहित, आडम्बरहीन, सरल, बोधगम्य तथा एक निराकार ईश्वर की उपासना वाला इस्लाम शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

(3.) इस्लाम में सामाजिक एवं धार्मिक समानता की विचारधारा भी इस्लामी साम्राज्य का प्रसार होने का बड़ा कारण था। इस्लाम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है तथा प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक अधिकार एक समान हैं। समस्त मुसलमानों को एक अल्लाह का बन्दा समझा गया है। इसलिए इस्लाम के अनुयाई परस्पर बन्धु हैं तथा उनमें ऊँच-नीच की भावना नहीं है।

इस समानता के सिद्धान्त के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। जिस भी समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर के लोगों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे, उन्होंने समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस कारण इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ।

(4.) जिस समय इस्लाम के अनुयाई इस्लाम के प्रसार में लगे हुए थे, उस समय रोमन साम्राज्य खोखला हो चुका था और वहाँ विलासिता चरम पर थी। ईरानी साम्राज्य भी विलासिता के दलदल में डूबा हुआ था। राज्य के अधिकारी और धर्माधिकारी जनता का भयानक शोषण करते थे। इन शोषित राज्यों की जनता ने इस्लामी सेनाओं को अपनी मुक्तिदाता समझा।

इतिहासकार मानवेन्द्र राय ने लिखा है- ‘अरब आक्रमणकारी वीर जहाँ भी गए, जनता ने उन्हें अपना रक्षक और मुक्तिदाता मानकर उनका स्वागत किया क्योंकि कहीं तो जनता लोभी शासकों के भ्रष्टाचार के नीचे पिस रही थी तो कहीं ईरानी तानाशाहों के जुल्मों से त्रस्त थी और कहीं ईसाइयत का अन्धविश्वास उन्हें जकड़े हुए था।’

(5.) अरबों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति ने भी इस्लाम की सफलता में योगदान दिया। छठी शताब्दी में अरब में कारवाँ व्यापार का ह्रास हो रहा था जिससे आर्थिक सन्तुलन भंग हो गया। कारवाँओं से होने वाली आमदनी बन्द हो जाने पर खानाबदोश अरब, खेती करने लगे। इससे जमीन की माँग बढ़ रही थी और पड़ौसी राज्यों की उपजाऊ भूमि को हस्तगत करना सबसे आसान तरीका था।

जिस क्षेत्र को भी वे हस्तगत करते थे, वहाँ के लोगों से कर वसूल करते थे। लाखों गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को इसलिए स्वीकार कर लिया ताकि उन्हें कर नहीं चुकाना पड़े। इस्लाम स्वीकार करके वे इस्लामी राज्य में नौकरियाँ प्राप्त करने के पात्र बन जाते थे। यदि वे दास अथवा अर्द्धदास होते तो धर्म-परिवर्तन से दासता से मुक्त कर दिए जाते थे। इस प्रकार विजित क्षेत्रों की निर्धन जनता ने इस्लाम सहर्ष स्वीकार कर लिया।

(6.) इस्लाम के प्रारम्भिक नेताओं के महान् व्यक्तित्त्व तथा आदर्श पूर्ण जीवन ने इस्लाम की लोकप्रियता में बड़ा योगदान दिया। अबूबक्र, उमर उस्मान और अली, तीनों ही नबी के चुने हुए साथी थे और उन्होंने भी मुहम्मद की ही तरह अभाव और दरिद्रता में जीवन व्यतीत किया था। उनके न तो महल या अंगरक्षक थे और न समसामयिक बादशाहों जैसे ठाट-बाट थे। प्रत्येक मुसलमान सीधे ही उन तक पहुँच सकता था।

उन्होंने सादगी, सच्चरित्रता, वीरता और वैराग्य का ऐसा सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया कि इस्लाम का आचार पक्ष बहुत ऊँचा उठ गया। सैनिक अभियान हो अथवा तीर्थ यात्रा, ये खलीफा लोग सर्वत्र न्याय प्रदान करते चलते थे। उन्होंने अरबों में प्रचलित कुरीतियों को दूर किया और राज्य के कर्मचारियों को निर्दयी और जुल्मी होने से रोका। कुछ खलीफा दक्ष सेनापति तथा कुशल सैन्य संचालक भी थे। इन्हीं कारणों से इस्लाम का शीघ्र प्रसार सम्भव हो सका।

(7.) प्रत्येक मुसलमान वैधानिक रूप से चार पत्नियाँ रख सकता है। इस बहु-विवाह का परिणाम यह निकला कि मुसलमान जहाँ भी गए, उन्होंने गैर-स्त्रियों से विवाह कर लिए। भारत में आकर भी मुसलमानों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किए। हिन्दू स्त्रियों से मुस्लिम बच्चे पैदा हुए जिनके कारण देश में इस्लाम का तेजी से प्रसार हुआ। हिन्दू स्त्रियों से उत्पन्न मुसलमान, भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए अधिक कट्टर सिद्ध हुए।

(8.) भारत में तुर्कों के आने के समय यहाँ की राजनीतिक दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। देश में केन्द्रीय सत्ता एवं राजनीतिक एकता का अभाव था। छोटे-बड़े राज्यों के राजा आपसी संघर्ष में अपनी शक्ति क्षीण कर रहे थे। इस समय हिन्दू समाज भी पतनोन्मुख था और उसे उत्साह से भरी हुई सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। सामान्य जनता में राजवंशों के उत्थान एवं पतन के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं थी। हिन्दू समाज की जाति-व्यवस्था ने जनसामान्य को विभक्त कर रखा था।

निम्न कही जाने वाली जातियों का जीवन बहुत ही दयनीय था। निम्न जाति के अधिकांश लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके विपरीत इस्लाम ने मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधा तथा काफिरों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों को जिहाद का जामा पहना दिया। मुस्लिम सुल्तानों ने कुरान के आधार पर शासन किया और इस्लाम का प्रसार किया। के. एस. लाल ने लिखा है- ‘भारत में सुल्तानों ने अपनी धार्मिक नीति से हिन्दुओं की संख्या एक-तिहाई कर दी।’

इस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

मुस्लिम अरब व्यापारियों ने सातवीं शताब्दी से ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया। दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक ‘अहमद’ का गुलाम ‘अलप्तगीन’ गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया। ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य ‘लमगान’ तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया। लमगान के शासक जयपाल ने उससे सन्धि कर ली किन्तु कुछ समय बाद जयपाल ने सन्धि की अवहेलना शुरू कर दी।

अतः ई.991 में सुबुक्तगीन ने पुनः हिन्दूशाही राज्य पर आक्रमण करके लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया। महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए।

महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था। उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना।

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का घर) तथा ‘दारुल हरब’ (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे ‘दारुल कुफ्र’ भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

(1.) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

(2.) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

(3.) दारुल दावा- (Proselytizing or preaching of Islam) अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है। 

इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया।

उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ। एक तीसरा और संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् ‘रक्षित-विधर्मी’ घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या का प्रवेश

इस्लाम ने तलवार के जोर पर बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाना आरम्भ कर दिया। जिन हिन्दुओं ने मुसलमान बनने से मना किया, उनका सर्वस्व हरण करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। मुस्लिम मुल्लाओं और मौलवियों ने मुसलमानों को समझाया कि भारत ‘दारुल हरब’ है तथा जेहाद के माध्यम से काफिरों का सफाया करके इसे ‘दारुल इस्लाम’ बनाना है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

सूफी मत

0
सूफी मत - www.bharatkaitihas.com
सूफी मत

भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघों में विभक्त थे। उनके अलग-अलग केन्द्र थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

सूफी मत का आदि स्रोत

सूफी मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधारशिला रति भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और मुहम्मद साहब ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी ‘इश्क मजाजी’ को ‘इश्क हकीकी’ की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट है। सूफी मत जीवन का क्रियात्मक धर्म तथा नियम है।

सूफी मत का अर्थ

वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी मत अथवा ससव्वुफ इन्हीं संतों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत कहे जाते हैं-

(1.) सूफी शब्द अरबी भाषा के सफा शब्द से बना है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो।

(2.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है। अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।

(3.) इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे।

(4.) अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है। यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा एवं सरल जीवन-यापन करने वाले संत (इसमें ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन इस्लामी संतों ने भी इसे अपना लिया। वे इसी वस्त्र को धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे।

(5.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कुछ उल्लेख इसके सम्बन्ध में मिलते हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।

चिश्तिया सम्प्रदाय एवं उसके प्रमुख सूफी संत

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे। सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये। ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी सम्प्रदाय का फकीर था। इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर अल्लाह की आराधना का उपदेश दिया करते थे। मुसलमानों के धर्म गुरु पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था। ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम धर्म से अलग माना। ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लें। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है। मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी मत के मूल में प्रेम का निवास है।

ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफीमत के संसर्ग का परिणाम है।

मोइनुद्दीन चिश्ती

गौस उल आजम के शिष्य मोइनुद्दीन का जन्म 1142 ई. में सीस्तान में हुआ था। 1186 ई. में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें। सूफी दरवेश जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति-रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे।

वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये। इनमें से मोइनुद्दीन भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन, गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर आये। उन्होंने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।

शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया किंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।

मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ

मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुःखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो। एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे फकीर के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की।

ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता। तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थना की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और समस्त के ज्ञान के लिये लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी। शेख हमीदुद्दीन ने फकीर के जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-

(1.) किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।

(2.) किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।

(3.) सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।

(4.) यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।

(5.) किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।

(6.) यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।

(7.) यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।

(8.) इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।

(9.) व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।

ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग अल्लाह की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये। हिन्दू-धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है। जब हिंदुओं को उसी प्रेम के दर्शन सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे।

वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों के अनुसार 1227 ई. में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि 1235-36 ई. के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं।

बाबा फरीदुद्दीन

बाबा फरीदुद्दीन दूसरे प्रसिद्ध सूफी संत थे। फरीद का जन्म काबुल के राजवंश में हुआ था। फरीद ने धन-वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया। सतलज नदी के तट पर स्थित एक सड़क जो मुल्तान से दिल्ली आती है बाबा फरीद अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। उनके विचार बड़े ऊँचे थे। उनके उपदेशों से हिन्दू तथा मुसलमान दोनों प्रभावित हुए थे। 1265 ई. में 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

गेसू दराज

सूफी संत गेसू दराज भी विख्यात सूफी थे। वे अपने लम्बे बालों के लिये प्रसिद्ध थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था परन्तु वे दक्षिण भारत चले गये और बहमनी राज्य में स्थायी रूप से निवास करने लगे। गेसू दराज का ज्ञान अत्यन्त व्यापक था। कहा जाता है कि उन्होंने 175 पुस्तकों की रचना की। 1422 ई. में 101 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

गुरु नानक एवं उनका धर्म

0
गुरु नानक एवं उनका धर्म - www.bharatkaitihas.com
गुरु नानक एवं उनका धर्म

पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में गुरु नानक ने गुरुमत की खोज की। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, बाह्य आडम्बरों का विरोध किया तथा एकेश्वरवाद एवं निराकारवाद का प्रचार किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके सिद्धांतों को सिक्ख धर्म के रूप में मान्यता मिली। 

गुरु नानक

सिक्खों के प्रथम गुरु ‘नानक देव’ सिक्ख धर्म के प्रवर्त्तक थे। उनका जन्म ई.1469 में अविभक्त पंजाब के तलवण्डी गांव में हुआ था। नानक देव ने ‘गुरमत’ को खोजा और गुरमत की शिक्षाओं को स्वयं देश-देशांतर जाकर फैलाया। गुरु नानक एकेश्वरवादी और निराकारवादी थे तथा जाति-पाँति, अवतारवाद और मूर्ति-पूजा को नहीं मानते थे।

उनकी शिक्षाएँ ‘आदि ग्रन्थ’ में पाई जाती हैं। गुरु नानक बगदाद भी गए जहाँ उनका बड़ा स्वागत-सत्कार हुआ। बगदाद में उनका एक मन्दिर भी है जिसमें तुर्की भाषा में एक शिलालेख मौजूद है। गुरु नानक के सैयद-वंशी शिष्यों के उत्तराधिकारी अब भी उस मन्दिर की रक्षा करते हैं।  गुरु नानक की वेशभूषा और रहन-सहन सूफियों जैसा था। गुरु नानक और शेख फरीद के बीच गाढ़ी मैत्री थी।

कुछ विद्वानों का अनुमान है कि गुरु नानक पर इस्लाम का प्रभाव अधिक था। हिन्दू और मुसलमान दोनों ने गुरु नानक का शिष्यत्व स्वीकार किया। गुरु नानक जाति-पांति को नहीं मानते थे इसलिए उनके अनुयाइयों में समस्त जातियों के लोग सम्मिलित थे। उनके शिष्यों में समाज के निर्धन एवं उपेक्षित लोगों की बहुलता थी। उनके अनुयाइयों को ‘सिक्ख’ कहा जाता था। यह ‘शिष्य’ शब्द का पंजाबी भाषा में रूपान्तर था।

गुरु नानक का दर्शन

गुरु नानक का मत भारतीय वेदान्त दर्शन पर आधारित है तथा उसमें ‘तसव्वुफ’ के भी लक्षण हैं। गुरु नानक की उपासना के चारों अंग- सरन खंड, ज्ञान खंड, करम खंड तथा सच खंड; सूफियों के चार मुकामात- शरीअत, मारफत, उकबा और लाहूत से ही निकले हैं। गुरु नानक का सिद्धान्त वेदान्त के उस रूप पर आश्रित था जिसे तंत्र ने प्रस्तुत किया था और मध्य-काल के प्रायः समस्त सन्त सम्प्रदायों ने स्वीकार किया था।

वे ‘एक-ओंकार’ या ‘अकाल पुरुष’ को चरम सत्य मानते थे। अकाल पुरुष ने ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ की सृष्टि की और अपना हुकुम चलाया। प्रकृति, माया, मोह, गुण, देवता, राक्षस और सारा जगत् उसी से बना है। इसलिए सारी प्रकृति और सारा जगत सत्य है। इसके सब काम अंहकार से चलते हैं किंतु व्यक्तिगत अंहकार को ही सब कुछ मान बैठना पाप की जड़ है।

अतः मनुष्य को अपने कर्म द्वारा अपने मन से इस व्यक्तिगत अंहकार को निकालकर समष्टिगत अंहकार अर्थात् सृष्टि की सम्पूर्णता को आत्मसात करना चाहिए जो अकाल पुरुष की अभिव्यक्ति है। गुरु नानक कहते हैं- ‘मन कागज है और हमारे कर्म स्याही हैं, पुण्य और पाप इस पर लिखा हुआ है। हमें अपने कर्म की स्याही द्वारा मन के कागज पर लिखे हुए पुण्य के लेख को बढ़ाना है और पाप के लेख को मिटाना है। इसके लिए गुरु की सहायता आवश्यक है।’

गुरु नानक का मुख्य उपदेश था कि ईश्वर सत्य है तथा एक है, उसी ने सबको बनाया है। हिन्दू-मुसलमान सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के लिए एक-समान हैं। मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि परमात्मा के दरबार में उसे लज्जित न होना पड़े। गुरुनानक के बाद नौ अन्य गुरुओं ने भी गुरमत का प्रचार किया।

पंजाब में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों ने सिक्ख गुरुओं से दीक्षा ग्रहण की। नानक का कहना था कि संसार में रह कर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए।

मोहसिन फानी ने लिखा है- ‘सिक्खों में ऐसा कोई नियम नहीं है कि ब्राह्मण खत्री का शिष्य न हो, नानक खुद खत्री थे। यही नहीं उन्होंने खत्रियों को भी जट्टों से निचली श्रेणी दी है, जो वैश्यों में सबसे छोटे माने जाते हैं।’

गुरु के सिक्ख खेती, नौकरी, व्यापार या दस्तकारी करते हैं और अपनी शक्ति के अनुसार ‘मसण्ड’ अर्थात् गुरु के प्रतिनिधि को ‘नजर’ अर्थात् भेंट देते हैं। वे ‘नाम जपन अते वण्ड के छकन’ (नाम जपने और बाँटकर खाने) को अपना विशेष नियम समझते हैं।

हिन्दुओं के सम्बन्ध में गुरु नानक का मत था- ‘हिन्दुओं में से केाई भी वेद-शास्त्रादि को नहीं मानता, अपितु अपनी बड़ाई करने में लगा रहता है। उनके कान एवं हृदय सदा तुर्कों की धार्मिक शिक्षाओं से भरते जा रहे हैं। ये लोग मुसलमान कर्मचारियों के निकट एक-दूसरे की निन्दा करके सबको कष्ट पहुँचा रहे हैं। वे समझते हैं कि रसोई के लिए चौका लगा देने मात्र से हम पवित्र हो जाएंगे।’

मुस्लिम शासन के लिए कर उगाहने वाले हिन्दू कर्मचारियों को लक्ष्य करके गुरु नानक ने कहा है- ‘गौ तथा ब्राह्मणों पर कर लगाते हो और धोती, टीका और माला जैसी वस्तुएँ धारण किए रहते हो। तुम अपने घर पर तो पूजा-पाठ करते हो और बाहर कुरान के हवाले दे-देकर तुर्कों के साथ सम्बन्ध बनाए रहते हो। ये पाखण्ड छोड़ क्यों नहीं देते?’

उपरोक्त पंक्तियों में हिन्दूओं की आलोचना तो है ही किन्तु हिन्दू-धर्म में सुधार की इच्छा भी है। सिक्ख धर्म का सारा इतिहास हिन्दुत्व के लिए इस तड़प से परिपूर्ण रहा है।

गुरु नानक ने मुसलमानों को लक्ष्य करके कहा- ‘दया को तुम अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को अपनी नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित और न्यायसंगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मान ले, शिष्टाचार को अपना रोजा मान ले और इस प्रकार तू मुसलमान बन जाएगा।’

उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- ‘पहली नमाज सच्चाई है, दूसरी इन्साफ है, तीसरी दया है, चौथी नेक-नीयत है और पाचँवी अल्लाह की बंदगी है।’ गुरु नानक मुसलमानों द्वारा की जाने वाली हिंसा से बहुत व्यथित रहते थे। उनके समय में हिंदुओं का बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके बाबरी’ में इस नरसंहार का वर्णन किया है। उसने हिन्दुओं के सिरों की मीनारें चिनवाईं।

बाबरनामा में ऐसी बहुत सी घटनाएं लिखी गई हैं। सिक्खों के 16वीं सदी के ग्रंथों में सिक्खों और मुसलमानों के बीच हुए हिंसक युद्धों के उल्लेख मिलते हैं। बाबर के शासनकाल में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के गुरु नानकदेव प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने हिंदुओं पर हुए अत्याचारों से व्यथित होकर परमात्मा को सम्बोधित करते हुए लिखा है- ‘ऐती मार पई कुरलाणे, तैं कि दर्द न आया?

सिक्ख धर्म की स्थापना

गुरु नानक का पन्थ ‘सिक्ख धर्म’ के नाम से विख्यात हुआ। नानक स्वयं किसी नवीन धर्म की स्थापना करना नहीं चाहते थे। उनके जीवन काल में सिक्ख धर्म का कोई अस्तित्त्व नहीं था। ई.1538 में गुरु नानक के निधन के बाद उनके अनुयाइयों तथा शिष्यों ने ‘सिक्ख धर्म’ की स्थापना की।

सिक्ख धर्म की दार्शनिक मान्यताएँ

सिक्ख धर्म का लक्ष्य

सिक्ख धर्म का परम लक्ष्य मानव मात्र का कल्याण करना है। गुरु नानक का मानना था कि धर्म के बाह्य आडम्बरों के कारण लोगों के बीच भेद उत्पन्न होता है और वे गुमराह होते हैं। उन्होंने मनुष्यों को सब तरह के भेदभाव भुलाकर ईमानदारी और नेक-नीयत से अपना काम करने का उपदेश दिया। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं कोई अलग धर्म नहीं चलाया।

सिक्ख धर्म में ईश्वर तत्त्व का निरूपण

सिक्खमत की शुरुआत ‘एक’ से होती है। सिक्खों के धर्म ग्रंथ में ‘एक’ की ही व्याख्या है। ‘एक’ को निरंकार, परब्रह्म आदि गुणवाचक नामों से जाना गया है। गुरु ग्रंथ साहिब के शुरुआत में ‘निरंकार’ का स्वरूप बताया है जिसे ‘मूल मन्त्र’ भी कहते हैं- ‘एक ओंकार, सतिनामु, करतापुरखु, निर्भाओ, निरवैरु, अकालमूर्त, अजूनी, स्वैभंग गुर पर्सादि। जपु। आदि सचु जुगादि सचु है भी सचु नानक होसी भी सचु।’

इस प्रकार सिक्ख धर्म एकेश्वरवादी है तथा ईश्वर को एक-ओंकार कहता है। गुरु नानक का मानना था कि ईश्वर ‘अकाल पुरुष’ और ‘निरंकार’ है। अकाल पुरुष का अर्थ होता है जिस पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता। न उसका जन्म होता है और न मृत्यु।

निरंकार का अर्थ निर्गुण-निराकार से है, अर्थात् जिसका कोई आकार या रूप नहीं है। इसलिए ईश्वर की मूर्ति या चित्र नहीं बनाया जा सकता। गुरु अर्जुनदेव के अनुसार- ‘परमात्मा व्यापक है, जैसे सभी वनस्पतियों में आग समायी हुई है एवं दूध में घी समाया हुआ है। इसी तरह परमात्मा की ज्योति ऊँच-नीच सभी में व्याप्त है परमात्मा घट-घट में व्याप्त है।’ 

सिक्ख धर्म में जीव-आत्मा तत्त्व का निरूपण

सिक्ख धर्म की मूल शिक्षाओं में आत्मा के निराकारी स्वरूप, मन (आत्मा), चित (परात्मा), सुरत, बुधि, मति आदि की जानकारी दी गई है। इनकी गतिविधिओं को समझ कर मनुष्य स्वयं को समझ सकता है। इसे सिक्ख धर्म में ‘आतमचिंतन’ कहते हैं।

जीव-आत्मा जो निराकार है, उस के पास निरंकार के सिर्फ 4 ही गुण व्याप्त हैं- ‘ओंकार, सतिनाम, करता पुरख, स्वैभंग।’ शेष चार गुण प्राप्त करते ही जीव-आत्मा पुनः वापिस निरंकार में समा जाती है किन्तु उसको प्राप्त करने के लिए गुरमत के ज्ञान द्वारा जीव-आत्मा को समझना आवश्यक है। आत्मा क्या है? कहाँ से आई है? इसका अस्त्तिव क्यों है? करना क्या है? आत्मा के विकार क्या हैं? आत्मा विकार मुक्त कैसे हो? आत्मा स्वयम् निरंकार की अंश है। आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने पर निरंकार का ज्ञान हो जाता है। इत्यादि विषयों पर सिक्ख धर्म में खूब विचार किया गया है।

चार पदार्थ की प्राप्ति में विश्वास

मानव को अपने जीवन में ‘चार ‘पदार्थ’ प्राप्त करने अनिवार्य हैं-

(1.) ज्ञान पदार्थ:  ज्ञान पदार्थ या प्रेम पदार्थ किसी से ज्ञान लेकर प्राप्त होता है। गुरमत का ज्ञान पढ़ कर या समझ कर। भक्त लोग ये पदार्थ देते हैं। इसमें माया में रह कर माया से छूटने का ज्ञान है। सब विकारों को त्यागना और निरंकार को प्राप्ति करना ही इस पदार्थ का ध्येय है।

(2.) मुक्त पदार्थ: ज्ञान पदार्थ की प्राप्ति के बाद ही मुक्त पदार्थ प्राप्त होता है। माया की प्यास ख़त्म होने पर मन और चित एक हो जाते हैं। जीव सिर्फ़ नाम की आराधना करता है। इसको जीवित मुक्त कहते हैं।

(3.) नाम पदार्थ: नाम आराधना से प्राप्त किया हुआ निराकारी ज्ञान है। इसको ‘धुर की बनी’ भी कहते हैं। यह बिना कानों के सुनी जाती है और हृदय में प्रगट होती है। यह नाम ही जीवित करता है। आँखें खोल देता है। ३ लोक का ज्ञान मिल जाता है- ‘नानक नाम मिले तां जीवां।’

(4.) जन्म पदार्थ: यह निराकारी जन्म है। बस शरीर में है किन्तु सुरत शब्द के साथ जुड़ गयी है। शरीर से प्रेम नहीं है। दुःख सुख कुछ भी नहीं मानता, पाप पुण्य कुछ भी नहीं। बस जो ‘हुकुम’ होता है वो करता है- हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।

गुरुओं के सम्बन्ध में सिक्ख धर्म की मान्यता

गुरु, भगवान के सेवक हैं जो मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए समय-समय पर आते हैं किंतु वे भगवान बिल्कुल नहीं है। केवल मनुष्य ही ‘गुरु’ नहीं है, शास्त्र और शब्द भी ‘गुरु’ है। इसलिए गुरुओं में श्रद्धा रखने और उनके शास्त्र को मानने से मनुष्य की आत्मा का ‘अकाल पुरुष’ से संयोग हो सकता है, जो जीवन का चरम लक्ष्य है।

ब्राह्मणों के वचनों में विश्वास नहीं

गुरु नानक ब्राह्मणों के वचनों पर विश्वास नहीं करते थे। गुरुग्रंथ साहिब में गुरु नानक के एक पद में कहा गया है- ‘पण्डित पोथी पढ़ते हैं किन्तु विचार को नहीं बूझते। दूसरों को उपदेश देते हैं, इससे उनका मायिक व्यापार चलता है। उनकी कथनी झूठी है, वे संसार में भटकते रहते हैं। इन्हें सबद के सार का कोई ज्ञान नहीं है। पण्डित तो वाद-विवाद में ही पड़े रहते हैं।’

पण्डित वाचहि पोथिआ न बूझहि बीचारू।

आन को मती दे चलहि माइआ का बामारू।

कहनी झूठी जगु भवै रहणी सबहु सबदु सु सारू।  -आदिग्रन्थ, पृ. 55

कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं

सिक्ख-मत कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता। सिक्ख-धर्म के अनुसार मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता। मनुष्य केवल सोचने तक सीमित है। करता वही है जो ‘हुक्म’ में है, चाहे वो किसी गरीब को दान दे रहा हो, चाहे वो किसी को जान से मार रहा हो- ‘हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।

पाप-पुण्य में विशवास नहीं

इसी लिए गुरमत में पाप पुन्य को नहीं माना जाता- ‘पाप पुन्य दोउ एक सामान।’ अगर इंसान कोई क्रिया करता है तो वो अंतर-आत्मा के साथ आवाज़ मिला कर करे। यही कारण है की गुरमत कर्मकाण्ड के विरुद्ध है। गुरु नानक देव ने अपने समय के भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और पाखण्डों की आलोचना करते हुए जन-साधारण को पण्डों तथा पीरों के चंगुल में न फंसने की सलाह दी।

चार पुरुषार्थों में विश्वास नहीं

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को चार पदार्थों में नहीं लिया गया। गुरु गोबिंद सिंह कहते हैं-

ज्ञान के विहीन लोभ मोह में परवीन,

कामना अधीन कैसे पांवे भगवंत को।

मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं

सिक्खमत में भक्तों एवम सद्गुरुओं ने अपने ‘एक-निरंकार’ को ‘आकार रहित’ कहा है। क्योंकि सांसारिक पदार्थ समाप्त हो जाते हैं किंतु परब्रह्म कभी नहीं मरता। इसी लिए उसे ‘अकाल’ कहा गया है। ‘जीव-आत्मा’ भी आकार रहित है और इस शरीर के साथ कुछ समय के लिए बंधी है। इसका अस्त्तिव शरीर के बिना भी है, जो साधारण मनुष्य की बुद्धि से परे है। इस कारण सिक्खमत मूर्ति-पूजा के विरुद्ध है। सिक्ख-गुरुओं ने मूर्ति-पूजकों को अंधा एवं जानवर इत्यादि कहा है।

निराकार परमात्मा की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। कोई भी संसारी पदार्थ जैसे कि कब्र, भक्तों एवं सद्गुरुओं की ऐतिहासक वस्तुएं, प्रतिमाएं आदि को पूजना सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। धार्मिक ग्रंथ का ज्ञान जो एक विधि निरंकार के देश की तरफ लेकर जाता है, सिक्ख उसके समक्ष नतमस्तक होते हैं किन्तु धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि वे भी सांसारिक पदार्थ ही हैं।

अवतारवाद और पैगम्बरवाद में विश्वास नहीं

सिक्ख-मत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव ‘एक-निरंकार’ का अंश है इसलिए पशु, पक्षी, वृक्ष इत्यादि भी अवतार हैं। मनुष्य योनि में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। सिक्ख धर्म में व्यक्ति की पूजा नहीं होती- ‘मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने को एके भगवान।’ कोई भी अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरा नहीं उतरता क्योंकि सबने जन्म लिया है।

सिक्ख किसी अवतार को परमेश्वर नहीं मानते। यदि कोई अवतार गुरमत का उपदेश करता है तो सिक्ख उस उपदेश को स्वीकार कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि आत्मा मरती नहीं, इस बात से सिक्ख-मत सहमत है किंतु सिक्ख-मत श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए ‘कर्म’ के उपदेश से सहमत नहीं है।

सिक्ख-मत की दृष्टि में पैग़म्बर वह है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान जनसाधारण में बांटे। इस्लाम में कहा गया है कि मुहम्मद आखरी पैगम्बर हैं, सिक्खों में कहा गया है कि ‘हर जुग जुग भक्त उपाया।’ अर्थात्् भक्त हर युग में पैदा होते हैं और ‘एक-निरंकार’ का सन्देश लोगों तक पहुँचाते हैं।

सिक्खमत ‘ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है) से सहमत है, वे इससे भी सहमत हैं कि मुहम्मद रसूल अल्लाह हैं किन्तु वे इस बात से सहमत नहीं हैं कि सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है। अर्जुन देव जी कहते हैं- ‘धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई।’ अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी समस्त चिंताएं मिट गई हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

0
सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर - www.bharatkaitihas.com
सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख धर्म के ग्रंथ सिक्ख धर्म की मान्यताओं का विवेचन करते हैं। सिक्खों का सर्वप्रमुख ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब है जिसमें सिक्ख गुरुओं एवं वैष्णव संतों के पद संग्रहीत हैं।

सिक्ख धर्म के ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब

सिक्खों का धार्मिक ग्रन्थ ‘श्री आदि ग्रंथ’ या ‘ज्ञान गुरु ग्रंथ साहिब’ है। इसे ‘आदि गुरु दरबार’ या ‘पोथी साहिब’ भी कहा जाता है। मूलतः भाई गुरदास जी ने पुराने पूर्ववर्ती गुरुओं एवं भक्त कवियों की पोथियों से रचनाएं लेकर यह ग्रंथ तैयार किया। गुरु अर्जुनदेव इस ग्रंथ के दिशा निर्धारक बने तथा गुरु अर्जुनदेव ने अपनी वाणी भी ग्रंथ में संकलित करवाई।

इस ग्रंथ की कई प्रतिलिपियां भी तैयार हुईं। ई.1604 में गुरु अर्जुन-देव ने ‘आदि ग्रन्थ’ का संपादन किया। इसमें 5 सिक्ख-गुरुओं, 15 संतों एवं 14 कवियों की रचनाओं को सम्मिलित किया। इन पाँच गुरुओं के नाम हैं- गुरु नानक, गुरु अंगद देव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास और गुरु अर्जुनदेव।

15 संतों के नाम हैं- शेख़ फरीद, जयदेव, त्रिलोचन, सधना, नामदेव, वेणी, रामानंद, कबीर, रविदास, पीपा, सैठा, धन्ना, भीखन, परमानन्द और सूरदास। 14 कवियों के नाम हैं- हरिबंस, बल्हा, मथुरा, गयन्द, नल्ह, भल्ल, सल्ह, भिक्खा, कीरत, भाई मरदाना, सुन्दरदास, राइ बलवंड एवं सत्ता डूम, कलसहार, जालप।

बाद में गुरु गोविन्द सिंह ने अपने पिता गुरु तेग बहादुर की वाणी भी गुरुग्रंथ साहब में शामिल करके आदि ग्रन्थ को अन्तिम रूप दिया। एक दोहा गुरु गोविन्दसिंह का भी है। इस प्रकार आदि ग्रंथ में 7 सिक्ख-गुरुओं, 15 संतों एवं 14 कवियों की रचनाएं सम्मिलित हो गईं। आदि-ग्रन्थ में 15 संतों के कुल 778 पद हैं। इनमें 541 कबीर के, 122 शेख फरीद के, 60 नामदेव के और 40 संत रविदास के हैं।

अन्य संतों के एक से चार पद लिए गए हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने अपने बाद गुरु-परम्परा समाप्त कर दी तथा सिक्खों के आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए ‘आदि ग्रन्थ’ को समूचे खालसा पंथ के ‘गुरु पद’ पर आसीन कर दिया। उस समय से आदि ग्रन्थ, ‘गुरु साहब’ के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। खालसा द्वारा आदि ग्रंथ के 1430 पृष्ठ मानकित किए गए।

इसे ‘आदि ग्रंथ’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें ‘आदि’ का ज्ञान है। ‘जप बानी’ के अनुसार ‘सत्य’ ही ‘आदि’ है। इसका ज्ञान करवाने वाले ग्रंथ को ‘आदि ग्रंथ’ कहते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार जब इस ग्रंथ में गुरु तेग बहादुर की बानी नहीं थी तब यह आदि ग्रंथ था और जब गुरु गोबिंद सिंह ने 9वें महले की ‘बानी’ (वाणी) चढ़ाई तब इसे आदि ग्रंथ की जगह ‘गुरु ग्रंथ’ कहा जाने लगा।

दसम ग्रंथ

आदि ग्रंथ का ज्ञान लेना ही सिक्खों के लिए सर्वोपरि है परंतु सिक्ख हर उस ग्रंथ को सम्मान देते हैं, जिसमें ‘गुरमत’ का उपदेश है। गुरु गोबिंदसिंह ने अनेक रचनाएँ लिखीं जिनकी छोटी-छोटी पोथियाँ बना दीं। उन की मृत्यु के बाद उन की धर्मपत्नी ‘सुन्दरी’ की आज्ञा से भाई मनीसिंह खालसा और अन्य खालसा शिष्यों ने गुरु गोबिंदसिंह की समस्त रचनाओं को एकत्रित करके एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे ‘दसम ग्रन्थ’ कहा जाता है। सिक्ख धर्म के ग्रंथ में दसम ग्रंथ का बड़ा महत्व है।

दसम ग्रंथ की वाणियाँ, यथा जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिक्खों के दैनिक ‘सजदा’ एवं ‘नितनेम’ का हिस्सा हैं। ये वाणियाँ ‘खंडे बाटे की पहोल’ अर्थात् ‘अमृत छकने’ के अवसर पर पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह आदि गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ प्रकाश होता है और रोज़ हुकम्नामे भी लिया जाता है।

सरब्लोह

‘सरब्लोह’ ग्रन्थ में ‘खालसा महिमा’ संकलित है जो कि गुरु गोबिंदसिंह की प्रमाणित रचना है। इसके साथ ही सरब्लोह ग्रन्थ में कर्म कांड, व्यक्ति पूजा इत्यादि विषय पर भी कुछ रचनाएं हैं जो गुरमत के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं।

भाई गुरदास की वारों

भाई गुरदास (ई.1551-1636) गुरु अमरदास के भतीजे थे। वे चार गुरुओं के साथ रहे। उन्होंने ही सर्वप्रथम ई.1604 में ‘आदि ग्रंथ’ संकलित किया। ‘भाई गुरदास की वारों’ में मूर्ति-पूजा तथा कर्म-सिद्धांत पर आधारित कई रचनाएं हैं जो ‘गुरमत’ के विरुद्ध हैं। फिर भी गुरु अर्जुनदेव ने उनकी रचना को ‘गुरबानी की कुंजी’ कहकर सम्मान दिया।

श्री गुर सोभा

सिक्ख इतिहास को जानने के लिए जिन ग्रंथों का सहारा लिया जा सकता है, उनमें से अधिकतर ग्रंथ ई.1750 के बाद लिखे गए। सिक्ख धर्म का इतिहास के लिए कोई भी ग्रंथ पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जाता। ‘श्री गुर सोभा’ ही ऐसा ग्रन्थ है जो गुरु गोबिंदसिंह के निकटवर्ती शिष्य द्वारा लिखा गया है किन्तु इसमें तिथियां नहीं दी गई हैं। सिक्खों के और भी इतिहास विषयक ग्रन्थ हैं।

श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ, गुर-बिलास पातशाही 10, महीमा परकाश, पंथ परकाश, जनम-सखियाँ इत्यादि। श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ की व्याख्या गुरद्वारों में होती है। कभी ‘गुर-बिलास पातशाही दस’ की व्याख्या भी होती थी। सिक्खों का इतिहास लिखने वाले प्रायः सनातनी विद्वान थे। इस कारण उनकी पुस्तकों में गुरुओं एवं भक्तों के चमत्कार लिखे गए हैं जो गुरमत-दर्शन के अनुकूल नहीं हैं। ‘जम्सखिओं’ और ‘गुर-बिलास’ में गुरु नानक का हवा में उड़ना, मगरमच्छ की सवारी करना, माता गंगा को बाबा बुड्ढा द्वारा गर्भवती करना इत्यादि घटनाएं लिखी हैं।

सिक्ख धर्म के मंदिर

गुरुद्वारा

सिक्खों के धार्मिक स्थान को ‘गुरुद्वारा’ कहते हैं। इसमें किसी गुरु या ईश्वर की प्रतिमा नहीं होती अपितु गुरुग्रंथ साहब की प्रति रखी हुई होती है जिसे गुरु मानकर सेवा, प्रणाम किया जाता है तथा उसके समक्ष मत्था टेका जाता है। ग्रंथियों द्वारा ‘शबद-कीर्तन’ आयोजित किए जाते हैं। देश में कई प्रसिद्ध गुरुद्वारे हैं जिनमें आनन्दपुर साहब, शीशगंज, तरनतारन, कर्तारपुर साहब, रकाबगंज, बुड्ढा जोहड़ आदि प्रमुख हैं।

स्वर्णमंदिर

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

चौथे गुरु रामदास ने पंजाब में अमृतसर नामक सरोवर की स्थापना की थी। इसके चारों ओर एक नगर बस गया। इस नगर को भी अमृतसर कहा गया। पांचवें गुरु अर्जुनदेव ने अमृतसर में अकाल तख्त की स्थापना की तथा स्वर्ण मंदिर बनवाया। यह सिक्खों का सबसे बड़ा तीर्थ है। इसे श्री हरिमन्दिर साहिब, हरमंदिर साहिब, दरबार साहिब एवं स्वर्ण मन्दिर भी कहते हैं। यह सिक्खों का सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा अमृतसर सरोवर के मध्य में स्थित है। गुरुद्वारे तक पहुँचने के लिए पुल से होकर जाना होता है। गुरु अर्जुनदेव ने दिसंबर 1588 में हरमंदिर साहिब की नींव लाहौर के सूफी संत साईं मियां मीर से रखवाई थी जो कि गुरु अर्जुनदेव का शिष्य भी था। इस गुरुद्वारे का नक्शा स्वयं गुरु अर्जुन देव ने तैयार किया था। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। ये दरवाजे समाज के चारों वर्णों के लोगों के गुरुद्वारे में आने का संकेत करते हैं। पूरा गुरुद्वारा सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी बाहरी दीवारों पर सोने की पर्त चढ़ाई गई है। इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर कहते हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का एक स्मारक है जो शहीद सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि स्वरूप लगाया गया है। श्री हरिमन्दिर साहिब के चार द्वारों में से एक द्वार गुरु रामदास सराय की ओर खुलता है।

इसमें चौबीस घंटे लंगर चलता है, जिसमें लगभग 40 हजार लोग प्रतिदिन प्रसाद ग्रहण करते हैं। श्री हरिमन्दिर साहिब परिसर में बेरी का एक वृक्ष है जिसे बेर बाबा बुड्ढा कहते हैं। जब स्वर्ण मंदिर बन रहा था तब बाबा बुड्ढा इसी वृक्ष के नीचे बैठकर मंदिर का निर्माण कार्य देखते थे।

स्वर्ण मंदिर से 100 मीटर की दूरी पर स्वर्ण जड़ित, अकाल तख्त है। इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं। इसमें एक संग्रहालय और सभागार भी बनाया गया है। यहाँ पर सरबत खालसा की बैठकें होती हैं। सिक्ख पंथ से जुड़ी हर समस्या का समाधान इसी सभागार में होता है।

गुरुद्वारे के बाहर दाईं ओर अकाल तख्त है जिसका निर्माण ई.1606 में किया गया था। अकाल तख्त के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु, स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं। यहाँ दरबार साहिब स्थित है। उस समय यहाँ महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे। इसके पास शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का कार्यालय है। वर्तमान समय में यह समिति सिक्ख पंथ से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेती है।

मुसलमानों ने स्वर्णमंदिर को कई बार नष्ट करने का प्रयास किया किंतु सिक्खों ने इसे हर बार पुनः बना लिया। 18वीं सदी में अहमदशाह अब्दाली ने इस गुरुद्वारे पर हमला करके इसे बुरी तहर क्षतिग्रस्त कर दिया। सरदार जस्सा सिंह अहलुवालिया ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।

ई.1757 में मुसलमानों ने पुनः स्वर्ण मंदिर पर अधिकार कर लिया। तब ई.1761 में बाबा दीपसिंह ने मुसलमानों से भयानक संघर्ष करके गुरुद्वारे को मुक्त करवाया। 19वीं शताब्दी में अफगा़न हमलावरों ने स्वर्णमंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया। तब महाराजा रणजीतसिंह (ई.1801-39) ने इसे फिर से बनवाया और इसकी बाहरी दीवारों पर सोने की परत चढ़वाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

0
सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास - www.bharatkaitihas.com
सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

गुरु नानक से लेकर गुरु गोविन्दसिंह तक दस सिक्ख गुरु हुए जिनके नाम क्रमशः (1.) नानक, (2.) अंगद, (3.) अमरदास, (4.) रामदास, (5.) अर्जुनदेव, (6.) हरगोविन्द, (7.) हरराय, (8.) हरकृष्णराय, (9.) तेग बहादुर और (10.) गोविन्दसिंह है। प्रत्येक गुरु अपने अन्तिम समय में अपने उत्तराधिकारी को अपना पद सौंपकर उसे पंथ का गुरु घोषित कर दिया करते थे।

गुरु गोविन्दसिंह जब स्वर्गवासी होने लगे, तब उन्होंने ‘ग्रन्थ साहिब’ को ही पंथ का गुरु घोषित कर दिया और यह आज्ञा दी कि अब से कोई ‘व्यक्ति’ गुरु नहीं होगा। इस प्रकार दस गुरुओं के नेतृत्व में सिक्ख धर्म का विकास हुआ। इन सभी गुरुओं का जीवन सहज, सरल, सादा और परम्परागत भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित था।

उन्होंने तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन को गहरई तक प्रभावित किया। उन्होंने भक्ति, ज्ञान, उपासना, अध्यात्म एवं दर्शन को उच्च जातियों के संकीर्ण दायरे से निकालकर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया।

सिक्ख गुरुओं ने मनुष्य को उद्यम करते हुए जीवन जीने, कमाते हुए सुख प्राप्त करने और ध्यान करते हुए निरंकार ईश्वर को प्राप्त करने की बात कही। उनका मानना था कि परिश्रम करने वाला व्यक्ति सभी चिन्ताओं से मुक्त रहता है। गुरु नानक के अनुसार जो व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और उसमें कुछ दान-पुण्य करता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।

 सिक्ख गुरुओं द्वारा प्रारंभ की गई ‘लंगर’ (निःशुल्क भोजन) प्रथा विश्व-बन्धुत्व, मानव-प्रेम, समानता एवं उदारता की मिसाल है। सिक्ख गुरुओं ने अन्धी नकल के खिलाफ वैकल्पिक चिन्तन पर जोर दिया। शारीरिक-अभ्यास एवं विनोदशीलता को जीवन का आवश्यक अंग माना। पंजाब के लोकगीतों, लोकनृत्यों एवं ‘होला-महल्ला’ पर शास्त्रधारियों के प्रदर्शित करतबों के मूल में सिक्ख गुरुओं के प्रेरणा-बीज ही हैं।

गुरु अंगद के समय में सिक्ख धर्म

गुरु नानक के वचनों को सर्वप्रथम गुरु अंगद ने ‘गुरुमुखी’ लिपि में लिखा। तभी से गुरुओं के उपदेशों का संकलन आरम्भ हुआ तथा गुरुमुखि लिपि आरम्भ हुई। गुरु अंगद ने सिक्ख धर्म में लंगर को प्रधानता दी।

गुरु अमरदास के समय में सिक्ख धर्म

तीसरे गुरु अमरदास ने प्रत्येक आगंतुक के लिए ‘गुरु के लंगर’ में भोजन करना आवश्यक किया। उन्होंने औरतों में पर्दे और सती-प्रथा की निन्दा की तथा धर्म-प्रचार के लिए ‘बाईस मज्झी’ ( बाईस गद्दी) कायम की।

गुरु रामदास के समय में सिक्ख धर्म

चौथे गुरु रामदास ने अमृतसर की स्थापना की, जो पहले रामदासपुर कहलाता था और कालान्तर में सिक्ख धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थान बना।

गुरु अर्जुन देव के समय में सिक्ख धर्म

पाचँवे गुरु अर्जुनदेव (ई.1581-1606) ने अमृतसर के तालाब को पूरा करवाया और उसके बीच में प्रसिद्ध सूफी संत मियां मीर के हाथ से हरमन्दर साहब की बुनियाद रखवाई। इस मन्दिर के चारों तरफ दरवाजे थे, जिसका अर्थ था कि यह चारों दिशाओं के मनुष्यों और चारों वर्णों की जातियों के लिए खुला था। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समान रूप से आ सकते थे। उन्होंने जलन्धर दोआब में करतारपुर भी बसाया और तरनतारन में गुरुद्वारा स्थापित किया।

उनके समय ‘आदि ग्रन्थ साहिब’ का संकलन एवं सम्पादन किया गया जिसमें गुरुवाणी को इकट्ठा कराकर रागबद्ध रूप से सज्जित किया गया। इससे सिक्खों के शास्त्र को मूर्तरूप मिल गया। एक बार किसी ने अकबर से शिकायत की कि इस ग्रन्थ में इस्लाम और अन्य धर्मों की निन्दा की गई है। इस पर अकबर ने गुरु को बुलाकर इस बारे में पूछा। गुरु ने ग्रन्थ खोलकर कहा कि इस चाहे जहाँ से पढ़वा लो।

अकबर ने ग्रंथ में एक जगह अपना हाथ रखा। वह भाग पढ़ा गया। इस पंक्ति में निराकार ईश्वर की स्तुति की गई थी। अकबर ने प्रसन्न होकर ग्रन्थ साहिब पर इक्यावन मोहरें भेंट कीं और गुरु को वस्त्र देकर सम्मानित किया। एक बार अकबर ने दिल्ली लौटते हुए गोइन्द्रवाल में गुरु के लंगर में भोजन भी किया।

जहाँगीर, अकबर जैसा सहिष्णु नहीं था। वह गुरु की तहरीक पसन्द नहीं करता था तथा इसे कुफ्र समझता था। अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर का पुत्र खुसरो भाग कर गुरु अर्जुनदेव की शरण में आया। गुरु ने पांच हजार रुपए देकर शहजादे की सहायता की। जहाँगीर ने गुरु को दिल्ली बुलवाया और उन पर दो लाख रुपयों का जुर्माना लगाया तथा आज्ञा दी कि ग्रन्थ साहिब में से वे समस्त पंक्तियाँ निकाल दें जिनसे इस्लाम का थोड़ा भी विरोध होता है।

गुरु ने दोनों आज्ञाओं को मानने से इन्कार कर दिया। इस पर जहाँगीर ने गुरु पर आमानुषिक अत्याचार किए। उन पर जलती हुई रेत डाली गई, उन्हें जलती हुई लाल कड़ाही में बैठाया गया और उन्हें उबलते हुए गर्म जल से नहलाया गया। गुरु ने समस्त उत्पीड़न सहन कर लिया। इसके बाद गुरु रावी-स्नान के बहाने कैद से बाहर आए और रावी के तट पर जाकर अपने प्राण-त्याग दिए।

इस प्रकार ई.1606 में गुरु अर्जुनदेव की हत्या के बाद सिक्खों का इतिहास पूरी रह बदल गया। अब वे भजन-कीर्तन करने वाले शांत लोग नहीं रहे, अपितु अपने सिद्धांतों के लिए लड़-मरने वाले समूहों में संगठित होने लगे। वे अवसर मिलते ही मुगलों को क्षति पहुँचाने का प्रयास करते थे। अतः मुसलमानों की हिंसा का सामना करने के लिए शांतिप्रिय सिक्ख जाति ने स्वयं को लड़का समूहों में संगठित कर लिया।

गुरु हरगोविंद के समय में सिक्ख धर्म

गुरु अर्जुनदेव के बाद छठे गुरु हरगोविन्द हुए। गुरु अर्जुनदेव के साथ जो अमानुषिक अत्याचार हुए, उससे सिक्खों में नई जागृति उत्पन्न हुई। वे समझ गए कि केवल जप और माला से धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। इसके लिए तलवार भी धारण करनी चाहिए और उसके पीछे राज्य-बल भी होना चाहिए। इसलिए गुरु हरगोविन्द ने ‘सेली’ (साधु का चोगा) फाड़कर गुरुद्वारे में डाली और शरीर पर राजा और योद्धा का परिधान धारण किया।

यहीं से सिक्ख-पंथ की प्रेम और भक्ति की परम्परा ने सैनिक चोला पहन लिया। गुरु हरगोविन्द ने माला और कण्ठी के बजाए दो तलवारें रखनी शुरू कीं, एक आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक के रूप में और दूसरी लौकिक प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में। उन्होंने समस्त ‘मज्झियों’ के ‘मसण्डो’ (धर्म प्रचारकों) को आदेश दिया कि अब से भक्त, गुरुद्वारे में चढ़ाने के लिए द्रव्य नहीं भेजेंगे अपितु अश्व और अस्त्र-शस्त्र भेजेंगे।

उन्होंने पाँच सौ सिक्खों की एक फौज तैयार की और उन्हें सौ-सौ सिपाहियों के दस्तों में संगठित किया। उन्होंने अमृतसर में लोहागढ़ का किला बनवाया तथा लौकिक कार्यों की देख-रेख के लिए हर मन्दिर के सामने अकाल तख्त स्थापित किया।

गुरु हरगोविन्द के समय सिक्खों की मुगलों से तीन लडाइयाँ हुईं और हर लडाई में मुगलों को मुँह की खानी पडी। इससे सिक्खों की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और सारा हिन्दू समाज उन्हें धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में देखने लगा। सिक्खों की संख्या बढ़ाने को पूरे पंजाब में प्रायः यह परम्परा चल पड़ी कि हर हिन्दू परिवार अपने ज्येष्ठ पुत्र को गुरु की शरण में समर्पित कर दे। अभी भी पंजाब में ऐसे हिन्दू परिवार हैं जिनका एक सदस्य सिक्ख होता है और शेष पुरुष मौना सिक्ख कहलाते हैं।

ई.1628 में शाहजहाँ, अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु के डेरे में चला गया। जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आए हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया। इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया।

इस पर वजीर खाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने बादशाह के क्रोध को शान्त किया। कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नए नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिए हितकर नहीं समझा गया।

इसलिए बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया।

गुरु का मुगलों से तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिए। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिए। इसलिए ई.1631 में गुरु के विरुद्ध मुगल सेना भेजी गई परन्तु सिक्खों ने उसे खदेड़ दिया तथा सात मस्जिदों पर अधिकार जमाकर उन्हें अपने काम में लेने लगे। शाहजहाँ ने सेना भेजकर उन्हें मस्जिदों से बाहर निकाला।

मुगलों से निरन्तर संघर्ष के कारण सिक्ख गुरु द्वारा किए जाने वाले धर्म-प्रचार के कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगी तथा सिक्खों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। गुरु हरगोविंद जानते थे कि सिक्खों की शक्ति एवं साधन अत्यंत सीमित हैं जबकि मुगल सल्तनत की शक्ति एवं साधन असीमित हैं, सिक्ख बहुत दिनों तक इस संघर्ष में नहीं टिक सकेंगे। इसलिए गुरु हरगोविंद आध्यात्मिक चिन्तन के लिए काश्मीर की पहाड़ियों में चले गए और कीरतपुर नामक स्थान पर निवास करने लगे। माना जाता है कि गुरु हरगोविन्द ने ही सिक्खों को मांस खाने की अनुमति प्रदान की। ई.1645 में गुरु हरगोविंद का निधन हो गया।

गुरु हरराय के समय में सिक्ख धर्म

सातवें गुरु हरराय की भी औरंगजेब से नहीं बनी किंतु उनके समय में मुगलों से कोई लड़ाई नहीं हुई और सिक्ख धर्म के संगठन का काम जारी रहा।

गुरु हरकिशन के समय में सिक्ख धर्म

आठवें गुरु हरकिशन के समय भी सिक्ख धर्म के संगठन का कार्य निरंतर चलता रहा। उन्होंने बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए अपने निकटतम सम्बन्धी की बजाए गुरु अर्जुन के पौत्र तेग बहादुर को अपना उत्तराधिकारी बनाया, जो सिक्ख धर्म के नौवें गुरु बने। 

गुरु तेगबहादुर के समय में सिक्ख धर्म

जिस समय तेगबहादुर (ई.1664-75) सिक्खों के गुरु बने, औरंगजेब का दमन-चक्र जोरों पर था तथा हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया जा रहा था। औरंगजेब ने हिन्दू-मन्दिरों की भाँति सिक्ख-गुरुद्वारों को भी तुड़वाना आरम्भ कर दिया। इस पर गुरु तेगबहादुर ने विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। जब कश्मीर के कुछ पण्डितों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए मजबूर किया गया तो वे आनन्दपुर आकर गुरु तेगबहादुर से मिले।

गुरु ने कहा- ‘किसी महापुरुष के बलिदान के बिना धर्म की रक्षा असम्भव है।’ उस समय उनके पुत्र गोविन्दसिंह ने कहा- ‘पिताजी, आपसे बढ़कर दूसरा महापुरुष कौन होगा?’ गुरु तेगबहादुर को यह परामर्श उचित लगा। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा कि औरंगजेब को समाचार भेज दो कि- ‘यदि तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार कर ले तो समस्त हिन्दू खुशी-खुशी मुसलमान बन जाएंगे।’

औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर को अपने दरबार में बुलावया। गुरु वहाँ हाजिर तो हुए किंतु उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। इस पर 11 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में उनकी हत्या कर दी गई। इससे सिक्खों की क्रोधाग्नि और भड़क उठी।

गुरु गोबिंदसिंह के समय में सिक्ख धर्म

जब गुरु तेगबहादुर पूर्वी भारत में दौरा कर रहे थे और उनका परिवार पटना में ठहरा हुआ था तब ई.1666 में पटना में गोविन्दसिंह का जन्म हुआ। पाँच वर्ष वहाँ रहकर वे आनन्दपुर आए और सातवें वर्ष में पढ़ने बैठे। साहिबचन्द ग्रन्थी ने उन्हें संस्कृत और हिन्दी तथा काजी पीर मुहम्मद ने फारसी सिखाई। उन्होंने शीघ्र ही इन भाषाओं पर अधिकार कर लिया।

आरम्भ से ही उन्हें साहित्य का जो व्यसन लगा, वह अन्त तक रहा। नौ वर्ष की आयु में जब उनके पिता दिल्ली में शहीद हुए तब पंथ का भार गोविन्दसिंह के कन्धों पर आ गया। गोविन्दसिंह सिक्खों के दसवें गुरु हुए। उन्होंने सिक्खों को सैनिक जाति में परिवर्तित कर दिया। 

गुरु गोविन्दसिंह ने आनन्दपुर के वैशाखी मेले मे सिक्खों को एकत्रित किया। उन्होंने एक बड़े चबूतरे पर चारों ओर से कनात खड़ी करवाकर उसके भीतर कुछ बकरे बँधवा दिए। त्तपश्चात वे तलवार खींच कर कनात से बाहर आए और कहा कि धर्म की रक्षा के लिए चण्डी बलिदान चाहती है। तुममें से जो प्राण देने को तैयार हो वह कनात में आए। मैं अपने हाथों महाचण्डी के आगे उसका बलिदान करूँगा।

गुरु के पुकारने पर एक आदमी कनात में जाता, गुरु उसे वहीं बिठा देते और एक बकरे की गरदन काटकर रक्त-भरी तलवार लिए बाहर निकल आते। इस प्रकार पाँच वीर कनात के भीतर पहुँचे। गुरु ने फिर पुकार लगाई किंतु जब कोई और व्यक्ति बलिदान के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ, तब गुरु ने उन पाँच वीरों को बाहर निकाला और कहा ये ‘पाँच प्यारे धर्म के खालिस अर्थात् शुद्ध सेवक हैं और उन्हें लेकर मैं आज से खालसा-धर्म की नींव डालता हूँ।’ 

उसी समय, उन्होंने एक कड़ाह में पवित्र जल भरवाया, उनकी धर्मपत्नी ने उसमें बताशे घोले और गुरु ने तलवार से उस जल को आलोड़ित किया तथा तलवार से ही उसे ‘पाँच प्यारों’ पर छिड़का। इसी अमृत को पीकर लोग खालसा-धर्म की सेवा में प्रवृत्त हुए। इस प्रकार गुरु गोविंदसिंह ने ‘खालसा’ की स्थापना की। खालसा का अर्थ होता है- ‘शुद्ध’।

उन्होंने 30 मार्च 1699 के दिन खालसा पंथ की शिक्षाओं को अंतिम रूप दिया। तब से यह पंथ खालसा धर्म कहलाने लगा। इस पंथ के अनुयाई, हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए प्रत्येक समय प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार रहते थे।

गुरु गोबिंदसिंह अपने शिष्यों को उपदेश देते थे कि केवल ‘शाप’ ही नहीं ‘शर’ का भी प्रयोग करना चाहिए। उनकी कविताओं में अद्भुत तेज था। जिस परमात्मा को गुरु नानक ‘निरंकार पुरुख’ कहते थे, उस परमात्मा के नाम गुरु गोविन्दसिंह ने असिध्वज, महाकाल और महालौह रखे। सिक्ख-धर्म का वर्तमान संगठन काफी अंशों तक गुरु गोविन्दसिंह द्वारा ही किया गया।

उन्होंने सिक्खों में पगड़ी बाँधने की प्रथा प्रारम्भ की तथा ‘पंच-ककारों’ को धारण करना समस्त सिक्खों के लिए अनिवार्य बनाया। ये पाँच ककार हैं- (1.) कंघी (बाल सुलझाने के लिए) (2.) कच्छ (फुर्ती के लिए) (3.) कड़ा (यम, नियम और संयम का प्रतीक) (4.) कृपाण (आत्मरक्षा के लिए) तथा (5.) केश (जिसे प्रायः समस्त गुरु धारण करते आए थे)।

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्ख धर्म में मदिरा और तम्बाकू को वर्जित किया। सिक्खों के लिए जो कर्म निषिद्ध हैं उनका उल्लेख ‘रहतनामा’ में मिलता है। रहतनामा में केश-कर्तन को महान् अपराध माना गया है।

गुरु गोविन्दसिंह की तैयारियों से औरंगजेब घबरा गया। उसने गुरु की राजधानी आनन्दपुर पर जबरदस्त घेरा डाला किन्तु गुरु हाथ नहीं आए। आनन्दपुर से भागते हुए उनके दो पुत्र जोरावर सिंह और फतेहसिंह, गायब हो गए। किसी ने उनके दोनों पुत्रों को सरहिन्द के शासक वजीरखाँ के हाथों में सौंप दिया। वजीर खाँ ने उन बालकों से इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा परन्तु उन बालकों ने भी अपने दादा की भांति, इस घृणित प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस पर वजीर खाँ ने उन्हें जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया।

गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के विरुद्ध उसे फारसी भाषा में एक लम्बा पत्र लिखा जिसे ‘ज़फ़रनामा’ कहा जाता है। इस पत्र में औरंगजेब के शासन-काल में हो रहे अन्याय तथा अत्याचारों का मार्मिक उल्लेख है। इस पत्र में नेक कर्म करने और मासूम प्रजा का खून न बहाने की नसीहतें, धर्म एवं ईश्वर की आड़ में मक्कारी और झूठ के लिए चेतावनी तथा योद्धा की तरह युद्ध के मैदान में आकर युद्ध करने की चुनौती दी गई है।

 औरंगजेब ने एक विशाल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी। गुरु परास्त हो गए। औरंगजेब ने सन्धि करने के लिए गुरु को दक्षिण में आमंत्रित किया। गुरु गोविंदसिंह दक्षिण की तरफ रवाना हुए किंतु गुरु द्वारा औरंगजेब से भेंट किए जाने से पहले ही औरंगजेब का निधन हो गया।

गुरु गोविन्दसिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की और उसके साथ दक्षिण की तरफ गए परन्तु गोदावरी के किनारे नानदेड़ नामक स्थान पर दो अफगान पठानों ने छुरे से वार करके गुरु को घायल कर दिया। गुरु ने अपनी मृत्यु से पहले ही घोषणा की कि मेरे बाद सिक्ख धर्म में कोई गुरु नहीं होगा तथा ‘ग्रंथ साहब’ को ही गुरु माना जाएगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

0
बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म - www.bharatkaitihas.com
बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

बंदा बैरागी

गुरु गोविंदसिंह जब घायल होकर मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए थे तब माधवदास नामक एक वैरागी उनसे भेंट करने आया। उसने स्वयं को गुरु का बन्दा (दास) कहा। गुरु ने उसे बन्दा बहादुर के नाम से पुकारा। उसे बंदा बैरागी भी कहा जाता है।

गुरु ने बन्दा बहादुर को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयाई तथा कुछ अन्य सिक्ख अनुयाई उसके साथ करके उसे पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तभी उसे गुरु की मृत्यु का समाचार मिला। उसने गुरु के आदेश को मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

वह इतिहास में बंदा बैरागी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बंदा बैरागी ने सिक्खों से मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया तथा सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया और वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त किया। उसने शाहबाद, मुस्तफाबाद आदि स्थानों को जीतते हुए सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को दीवार में जिन्दा चुनवाया था। वजीर खाँ युद्ध में मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा के हाथ लगी। बन्दा ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया। बंदा बैरागी का उद्देश्य पंजाब में एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसने लौहगढ़ को राजधानी बनाया, गुरु नानक और गुरु गोविन्दसिंह के नाम के सिक्के चलाए और सिक्ख राज्य की एक सील या मुहर भी बनवायी। बन्दा ने सरहिन्द क्षेत्र में मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया। इस प्रकार उसने सबसे पहले सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किए। मुगल बादशाह पहले तो राजपूत शासकों के विरोध को दबाने में और फिर दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध दबाने में व्यस्त रहा।

इसका लाभ उठाते हुए बंदा बैरागी ने पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किए। बहादुरशाह ने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने का उत्तरदायित्त्व सौंपा। उसने स्वयं भी पंजाब की तरफ प्रस्थान किया। दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा के केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा भाग निकला। इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई तथा जहांदारशाह बादशाह हुआ।

जहांदारशाह ने गुरु गोविन्दसिंह के दत्तक पुत्र अजीतसिंह को मान्यता देकर सिक्खों में फूट का बीज बोया किंतु बंदा बैरागी का मुगलों के विरुद्ध संघर्ष चलता रहा। जहाँदारशाह केवल 10 माह के शासन के बाद अपने भतीजे फर्रूखसीयर द्वारा मार दिया गया। फर्रूखसीयर ने फीरोज खाँ के नेतृत्व में एक सेना बन्दा के विरुद्ध भेजी। बन्दा भागकर पहाड़ों में छिप गया।

उसकी राजधानी लौहगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। बन्दा बहादुर ने साहस नहीं छोड़ा। वह निरन्तर मुगलों से संघर्ष करता रहा। ई.1716 में गुरुदास-नांगल नामक स्थान पर बन्दा बहादुर को मुगल सेना ने घेर लिया। आठ माह तक मुगल सेना से घिरे रहने के बाद विवश होकर बन्दा बहादुर ने आत्म-समर्पण कर दिया। उसे तथा उसके साथियों को दिल्ली ले जाया गया, जहाँ उसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया।

उसकी अस्वीकृति के बाद उसे तथा उसके साथियों का निर्ममता से हत्या की गई। बन्दा की मृत्यु के बाद सिक्ख नेतृत्व-विहीन हो गए। जब सिक्खों के सामने न गुरु रहा, न गुरु का बन्दा, तब सिक्खों ने सरबत खालसा और गुरुमत्ता की प्रथाएँ आरम्भ कीं। वर्ष में दो बार- बैशाखी और दीवाली पर, सिक्खों ने विशाल सभाएँ करनी आरम्भ कीं जिन्हें सरबत खालसा कहा जाता था। सरबत खालसा में लिये गए निर्णयों को ‘गुरुमत्ता’ कहा जाता था। बंदा बैरागी के पश्चात् भी सिक्खों और मुगलों के बीच संघर्ष चलते रहे।

सिक्खों द्वारा दल खालसा का गठन

ई.1737 में नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया। उसके बाद मुगल सत्ता का बिखराव चरम पर पहुँच गया था। नादिरशाह के आक्रमण के बाद सिक्खों ने स्वयं को 100-100 व्यक्तियों के छोटे दलों में संगठित कर लिया। प्रत्येक दल का एक नेता होता था। दल के सभी सदस्य अपने नेता के आदेश का पालन करते थे। ई.1748 में सभी दलों ने मिलकर दल खालसा का गठन किया।

दल खालसा में सम्मिलित सभी दलों को पुनः 11 जत्थों में विभाजित किया, जो बाद में ‘मिसलों’ के नाम से विख्यात हुए। इन मिसलों के पराक्रमी और योग्य सिक्ख नेताओं ने पंजाब के भिन्न-भिन्न भागों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पंजाब में 12 छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गए। आगे चलकर महाराजा रणजीतसिंह (ई.1801-39) ने इन मिसलों को जीतकर पंजाब में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। इस प्रकार पंजाब मुगल सल्तनत से बाहर हो गया।

सिक्ख धर्म पर हिन्दू-धर्म का प्रभाव

सिक्ख धर्म भले ही आध्यात्मिक रूप से एवं बाह्य रूप से स्वयं को हिन्दू-धर्म से अलग दिखाता है किंतु व्यावहारिक रूप में सिक्ख धर्म पर हिन्दू-धर्म का गहरा प्रभाव है। गुरु ग्रंथ साहब में कई ऐसे पद हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं के नाम हैं। भाई गुरदास ने ‘आदि ग्रंथ साहब’ का संकलन किया था जिसे आगे चलकर ‘गुरुग्रंथ साहब’ कहा गया।

उन्हीं भाई गुरदास द्वारा रचित ‘भाई गुरदास की वारों’ में मूर्ति-पूजा तथा कर्म-सिद्धांत पर आधारित कई रचनाएं हैं जो ‘गुरमत’ के विरुद्ध हैं। फिर भी गुरु अर्जुनदेव ने उनकी रचना को ‘गुरबानी की कुंजी’ कहकर सम्मान दिया।

राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर के अनुसार सिक्ख-धर्म और हिन्दुत्व, ये दो नहीं, एक ही धर्म हैं। हिन्दुत्व का स्वभाव है कि उस पर जैसी विपत्ति आती है तब वह वैसा ही रूप अपने भीतर से प्रकट करता है। इस्लामी हमले से बचने के लिए अथवा उनका उत्तर देने के लिए हिन्दुत्व ने इस्लाम के अखाड़े में अपना जो रूप प्रकट किया, वही सिक्ख या खालसा-धर्म है।

सिक्ख गुरुओं ने हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिए अपनी गर्दने कटवाईं। उन्होंने अपना जो सैनिक संगठन खड़ा किया, उसका लक्ष्य भी हिन्दू-धर्म को जीवित एवं जागरूक रखना था। यद्यपि सिक्ख गुरुओं ने निराकार ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया किन्तु सिक्खों ने कभी भी सगुण-साकार उपासना का विरोध नहीं किया।

गोविन्दसिंह ने  ‘किसुन-विसुन’ के अस्तित्त्व से इन्कार किया किन्तु ‘चण्डी’ की स्तुति भी की। रामकथा पर भी उन्होंने सुन्दर खण्डकाव्य लिखा। व्यवाहारिक रूप में सिक्ख गुरु, अवतारों तथा हिन्दू देवी-देवताओं में श्रद्धा रखते थे। सिक्ख ग्रन्थों में लिखा है-

रामकथा जुग जुग अटल, जो कोई गावे नेत।

स्वर्गवास रघुवर कियो, सगली पुरी समेत।

सैद्धांतिक रूप में भले ही सिक्ख धर्म जांति-पांति में विश्वास नहीं करता किंतु व्यववारिक रूप में सिक्ख समाज ने हिन्दू समाज की बहुत सी कुरीतियाँ स्वीकार कर लीं जिनमें जाति-पांति भी है। सिक्खों में भी जटसिक्ख, माली सिक्ख, कुम्हार सिक्ख, चमार सिक्ख सहित कई जातियाँ है तथा छुआछूत भी मौजूद है।

विवाह सम्बन्धों पर वैसे ही नियन्त्रण हैं, जैसे हिन्दू समाज में हैं। जटसिक्ख आदि जातियां बन गई हैं। बहुत से सिक्ख गंगाजी नहाते हैं तथा हिन्दू-मंदिरों में जाते हैं। बहुत से सिक्ख देवी के भक्त हैं। इस प्रकार सिक्ख सम्प्रदाय, हिन्दू-धर्म के काफी निकट बना हुआ है।

सिक्ख मत की हिन्दू-धर्म, सूफी मत और इस्लाम से तुलना

एक पाश्चात्य लेखक ने लिखा है- ‘सिक्ख धर्म सनातन धर्म की अरबी टीका और आर्य समाज इस्लाम का संस्कृत में अनुवाद है।’ यदि इस टिप्पणी पर विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि सिक्ख धर्म और कुछ नहीं हिन्दू-धर्म का ही बदला हुआ रूप है।

गुरु नानक की शिक्षाओं से स्पष्ट होता है कि वे वेदान्त दर्शन से अत्यंत प्रभावित थे। उन पर सूफियों की धर्म-साधना का भी प्रभाव पड़ा था किन्तु इस्लामी दर्शन का नहीं। हजरत मुहम्म्द तथा गुरु नानक दोनों ही एकेश्वरवादी थे किन्तु इन दोनों के ईश्वर के स्वरूप में बहुत अंतर था।

मुहम्मद के अनुसार अल्लाह सातवें आसमान पर रहता है एवं मनुष्यों के सुख-दुःख तथा भक्ति-अभक्ति से उसका सम्बन्ध है किन्तु गुरु नानक का ‘एक-ओंकार’, ‘निराकार पुरुष’ है। सिक्ख धर्म के दर्शन और इस्लाम के दर्शन में, विशेषतः ईश्वर के स्वरूप को लेकर वही भिन्नता है जो वेदान्त और कुरान के बीच मिलती है। इस प्रकार सिक्ख धर्म और इस्लाम की नींव ही बिल्कुल अलग है। इस्लाम की अपेक्षा वह वेदानत के अधिक निकट है।

गुरु नानक का सृष्टि विकास का सिद्धान्त, वेदान्त का सिद्धान्त है। वे कर्म को मानते थे, पुनर्जन्म को मानते थे, निर्वाण और माया को मानते थे तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिदेवत्व में विश्वास करते थे। उनका गुरु-परम्परा में, जो विश्वास था, वह हिन्दू-धर्म तथा सूफी मत दोनों से प्रेरित है। इस्लाम में वैराग्य का कोई स्थान नहीं है जबकि हिन्दू-धर्म एवं सूफी मत दोनों में वैराग्य की बड़ी महिमा है।

इस्लाम में नाम जप, ध्यान, समाधि और योग बिल्कुल अलग तरह का है जबकि सिक्ख धर्म का नाम जप, ध्यान, समाधि और योग बिल्कुल हिन्दुओं जैसा है। गुरु नानक की सबसे बड़ी शिक्षा यह थी कि परमात्मा विश्व के कण-कण में व्याप्त है। इसलिए निखिल सृष्टि को ब्रह्ममय समझकर उसे प्रणाम करो। हिन्दू-धर्म भी इस सिद्धांत पर सर्वाधिक विश्वास करता है जबकि इस्लाम में केवल अल्लाह के अलावा और किसी की इबादत स्वीकार्य नहीं है।

गुरु नानक स्वयं को न हिन्दू मानते थे, न मुसलमान। वे जिसे ‘सिक्ख धर्म’ कहते थे, वह उनकी दृष्टि में ‘सुधरा हुआ हिन्दू’ और ‘सुधरा हुआ मुसलमान’ दोनों हो सकते थे। आरम्भ में उनके पंथ में बहुत-से मुसलमान भी दीक्षित हुए। कालान्तर में सिक्खों का मुसलमानों से राजनीतिक वैर हो गया जिसके कारण मुसलमानों ने सिक्ख बनना छोड़ दिया। ‘रहतनामा’ में गुरु की स्पष्ट आज्ञा है कि खालसा-धर्म (अर्थात् शुद्ध धर्म) हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों से अलग हैं।

सिक्ख धर्म के प्रगतिशील तत्त्व

सिक्ख धर्म आरम्भ से ही प्रगतिशील रहा। जाति-पांति, मूर्ति-पूजा और तीर्थ के साथ वह सती-प्रथा, शराब और तम्बाकू को भी निषिद्ध मानता है। इस धर्म ने पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया। कहा जाता है कि सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास से एक रानी मिलने आई किन्तु वह पर्दे में थी। अतः गुरु ने उससे मिलने से इन्कार कर दिया।

सिक्ख धर्म के गुरु, वैराग्य को उच्च-जीवन के लिए आवश्यक मानते थे किंतु उसे वे गृहस्थों पर जबरदस्ती लादने के विरुद्ध थे। खान-पान में खालसा-धर्म में वैष्णवों जैसी कट्टरता नहीं है। एक हिन्दू पंडित प्रतापमल का पुत्र जब मुसलान बनने लगा, तब उससे कहा गया कि यदि तुम खान-पान की स्वतंत्रता के लिए हिन्दू-धर्म को छोड़ना चाहते हो तो अच्छा है कि मुसलमान न होकर सिक्ख हो जाओ।

गुरुओं ने सभी धर्मों और जातियों के लोगों को सिक्ख धर्म में दीक्षित किया। उन्होंने आने वाली शताब्दियों के लिए नए मनुष्य का सृजन किया जो जातियों एवं धर्मों में विभक्त न होकर धर्म, मानव एवं देश के संरक्षण के लिए तत्त्पर रहने वाला था। सबको साथ लेकर चलने की सामाजिक संचरना, सिक्ख धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...