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शाक्त धर्म एवं उसके सम्प्रदाय

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शाक्त धर्म एवं उसके सम्प्रदाय

वैष्णव धर्म (पौराणिक धर्म) एवं शैव धर्म की तरह शाक्त धर्म भी भारत में अत्यंत प्राचीन काल से विद्यमान है। यह भी पूरे भारत में फैला हुआ है। हालांकि आजकल शाक्त सम्प्रदाय को तांत्रिक धर्म मान लिया जाता है किंतु प्राचीन काल में इसका स्वरूप पूर्णतः तांत्रिक नहीं था।

सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। अतः शाक्त सम्प्रदाय, भारत के प्राचीनतम सम्प्रदायों में से है तथा हिन्दू-धर्म के तीन प्रमुख सम्प्रदायों- वैष्णव, शैव एवं शाक्त में से एक है। शाक्त सम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। गुप्तकाल में शाक्त मत का नवीन रूप दिखाई देता है।

इस काल में वैष्णव एवं शैव मतों के समन्वय से नाथ सम्प्रदाय तथा नवीन शाक्त सम्प्रदाय की उत्पत्ति हुई। इसीलिए नाथों और शाक्तों में से कुछ शाखाएं वैष्णव धर्म का तथा कुछ शाखाएं तांत्रिक मत का पालन करती हैं। शाक्त धर्म, शक्ति की साधना का विज्ञान है। इसके मतावलंबी शाक्त धर्म को प्राचीन वैदिक धर्म के बराबर ही पुराना मानते हैं। शाक्त धर्म का विकास वैदिक धर्म के साथ-साथ या सनातन धर्म में इसे समावेशित करने की आवश्यकता के साथ हुआ। यह हिन्दू-धर्म में पूजा का एक प्रमुख स्वरूप है।

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गुप्त काल में शाक्त सम्प्रदाय, उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया आदि द्वीपों में लोकप्रिय था। भारत में काश्मीर, दक्षिण भारत, असम और बंगाल में शाक्त धर्म का अधिक प्रचलन हुआ। वैष्णव मत पर शाक्त मत का प्रभाव हो जाने से ब्रज क्षेत्र में भी शक्ति की पूजा होने लगी। ब्रज क्षेत्र में महामाया, महाविद्या, करौली, सांचोली आदि विख्यात शक्ति पीठ स्थित हैं। मथुरा के राजा कंस ने यशोदा से उत्पन्न जिस कन्या का वध किया था, उसे भगवान श्रीकृष्ण की प्राण रक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी शक्ति की यह मान्यता ब्रज से लेकर सौराष्ट्र तक विस्तृत है। द्वारका में भगवान द्वारकानाथ के शिखर पर चर्चित सिंदूरी आकर्षक देवी प्रतिमा को श्रीकृष्ण की भगिनी माना जाता है जो शिखर पर विराजमान रहकर सदा श्रीकृष्ण की रक्षा करती हैं। ब्रज क्षेत्र आज से 100 वर्ष पूर्व तक तांत्रिकों का प्रमुख गढ़ था। यहाँ के तांत्रिक भारत भर में प्रसिद्ध रहे हैं। कामवन भी राजा कामसेन के समय तंत्र विद्या का मुख्य केंद्र था, उसके दरबार में अनेक तांत्रिक रहते थे। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद सम्पूर्ण भारत भूमि में शाक्त धर्म के प्रति आकर्षण कम हुआ। सम्पूर्ण भारत वर्ष, अर्थात् हिन्दूकुश पर्वत से लेकर दक्षिण एशियाई द्वीपों में देवी के विभिन्न स्वरूपों के मंदिर एवं शक्ति पीठ प्राप्त होते हैं। शाक्त सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ ‘श्री दुर्गा भागवत पुराण’ है।

‘दुर्गा सप्तशती’ भी इसी पुराण का अंश है। इस ग्रंथ में 108 देवी पीठों का वर्णन किया गया है। इनमें से 51-52 शक्ति पीठों का विशेष महत्व है। माँ दुर्गा के प्राचीन मंदिरों की संख्या भी हजारों में है। देवी उपनिषद के नाम से एक उपनिषद भी लिखा गया।

विश्व के प्रायः समस्त धर्मों में यह मान्यता है कि ईश्वर, पुरुष जैसा हो सकता है किंतु शाक्त धर्म विश्व का एकमात्र धर्म है जो ‘मातृ-तत्व’ को सृष्टि की रचयिता मानता है। शाक्त सम्प्रदाय में देवी को ही सर्वशक्तिमान माना जाता है तथा उसी की आराधना होती है। इस मत के अनुसार विभिन्न देवियां, एक ही सर्वशक्तिमान देवी के विभिन्न रूप हैं। शाक्त मत के अन्तर्गत भी कई परम्पराएँ मिलतीं हैं जिनमें लक्ष्मी से लेकर रौद्ररूपा काली तक उपस्थित हैं। कुछ शाक्त सम्प्रदाय अपनी देवी का सम्बन्ध शिव या विष्णु से मानते हैं।

भगवान शिव की पत्नी, माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। यही सती, दुर्गा और भगवती है। उसी की विशेष आराधना के लिए वर्ष में दो बार नवरात्रि उत्सव का आयोजन किया जाता है। वर्ष का पहला नवरात्रि चैत्र माह में आता है इसे ‘चैत्रीय नवरात्रि’ कहते हैं। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है जिसे ‘शारदीय नवरात्रि’ कहते हैं।

शारदीय नवरात्रि के नौ दिन उत्सव की तरह मनाए जाते हैं, जिसे दुर्गोत्सव कहा जाता है। चैत्रीय नवरात्रि शैव तात्रिकों के लिए होती है जिसके अंतर्गत तांत्रिक अनुष्ठान और कठिन साधनाएँ की जाती हैं। शारदीय नवरात्रि सात्विक साधकों के लिए होती है जो माँ की भक्ति तथा अनुकम्पा प्राप्ति हेतु मनाई जाती है।

शक्ति के तांत्रिक अनुयाइयों को ही मुख्यतः शाक्त कहा जाता है। शाक्त न केवल शक्ति की पूजा करते हैं, बल्कि उसके शक्ति-आविर्भाव को मानव शरीर एवं जीवित ब्रह्माण्ड की शक्ति या ऊर्जा में संवर्धित, नियंत्रित एवं रूपान्तरित करने हेतु कठिन साधना करते हैं। मान्यता है कि शक्ति, ‘कुंडलिनी’ रूप में मानव शरीर के गुदा आधार पर स्थित होती है।

‘जटिल-ध्यान’ एवं ‘यौन-यौगिक-अनुष्ठानों’ के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति जागृत की जा सकती है। इस अवस्था में कुंडलिनी, सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना से ऊपर की ओर उठती है तथा मार्ग में कई चक्रों को भेदती हुई सिर के शीर्ष में अन्तिम चक्र में प्रवेश करती है और वहाँ यह अपने पति-प्रियतम शिव के साथ हर्षोन्मादित होकर मिलती है।

भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट ही परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

एक ओर भारत भूमि पर उत्तर से दक्षिण तक वैष्णव धर्म तथा शैव धर्म फल-फूल रहा था तो दूसरी ओर शाक्त धर्म नामक वाममार्गी मत भी विभिन्न दार्शनिक व्याख्याओं के साथ रूप ले रहा था। वामर्माग में पंचमकारों- मद्य, मीन, मांस, मैथुन तथा मुद्रा के माध्यम से साधक की उन्नति का मार्ग ढूंढा गया तथा तंत्र-मंत्र और यंत्र के बल पर सिद्धियों की कामना की गई।

इस मत में भैरवी साधना जैसी अनेक साधना पद्धितियों का निर्माण किया गया जिनमें साधक को भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना अनिवार्य था। इस तंत्र साधना की कुछ मर्यादाएं निश्चित की गईं जिनकी पालना प्रत्येक साधक को करनी पड़ती थी। इस मत के अनुसार भैरवी ‘शक्ति’ का ही एक रूप होती है तथा तंत्र की सम्पूर्ण भावभूमि ‘शक्ति’ पर आधारित है।

इस साधना के माध्यम से साधक को इस तथ्य का साक्षात् कराया जाता था कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का माध्यम नहीं, वरन् शक्ति का उद्गम भी होती है। शक्ति प्राप्ति की यह क्रिया केवल सदगुरु ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं एवं संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारण तंत्र के क्षेत्र में स्त्री समागम के साथ-साथ गुरु के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ती थी।

शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था। मद्य और माँस के साथ-साथ मीन (मछली), मुद्रा (विशेष क्रियाएँ), मैथुन (स्त्री संसर्ग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

जन-साधारण इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा। साधारण-तान्त्रिक एवं सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा ब्रह्म को पाने का प्रयास करते थे। पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था।

कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का उचित प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती थी। वाम साधना में एक और मत सामने आया जिसमें भैरवी-साधना या भैरवी-चक्र को प्राथमिकता दी गई। इस मत के साधक वैसे तो पाँचों मकारों को मानते थे, किन्तु उनका मुख्य ध्येय काम के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – शैव एवं शाक्त धर्म

शैव धर्म

नाथ सिद्ध कालमुख एवं अघोरी सम्प्रदाय

शाक्त धर्म एवं उसके सम्प्रदाय

संगम युग में समाज

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संगम युग में समाज

संगम युग में समाज अत्यंत उन्नत दशा में था। संगम युगीन समाज की जानकारी संगम साहित्य से होती है। संगम युग के लोग विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियाँ करते थे।

तोल्कापिपयम के वर्णन से पता चलता है कि संगम समाज का आरंभिक दौर भूमि के पंचविध वर्गीकरण- पहाड़ी, पशुचारी, कृषीय, मरुस्थल और तटीय पर आधारित था। इन वर्गीकृत भूमियों पर विभिन्न किस्म के लोग रहते थे और सबने अपने अलग-अलग परिवेश में विशेष प्रकार के तौर-तरीके और जीवन-शैलियाँ विकसित कीं। पारिस्थितिकीय विविधताओं ने उनके विभिन्न व्यवसायों- आखेट, कृषि, पशुचारण, लूट-पाट, माही गिरी, गोताखोरी, नौचालन, इत्यादि का स्वरूप निर्धारित किया।

आद्य मानव समूह

मानवशास्त्री अध्ययनों से पता चलता है कि संगम युग में समाज का आद्य सामाजिक घटक नेग्रोआयड और आस्ट्रेलायड समूहों का था जिनका मिश्रण आद्य भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए एक अन्य प्रजातीय कुल से हुआ था। आरंभिक दौर में इन समाजों की जनसंख्या कम थी और सामाजिक वर्गों का निर्माण नहीं हुआ था। इस कारण प्रत्येक क्षेत्र के लोगों में एकता थी। वे अपने शासकों के पास स्वतंत्रता पूर्वक आ-जा सकते थे। उस समय का तमिल समाज व्यावसायिक वर्गीकरण से परिचित था जिसमें सैनिकों, आखेटकों, गड़ेरियों, हलवाहों, मछुआरों, इत्यादि व्यवसायों का अस्तित्व प्रमुखता से था।

सामाजिक वर्गीकरण

के उत्तरार्द्ध में अनेक कबीलों और सरदारों का अस्तित्व मिलता है। चार वैदिक वर्ण स्पष्टतः बाद की अवधि के थे। अप्रवासी ब्राह्मणों द्वारा ईसा की पहली सदी के लगभग वर्ण-व्यवस्था लाई गई, किन्तु इसमें उत्तर भारत की तरह क्षत्रिय शामिल नहीं थे। सिर्पफ ब्राह्मण ही द्विज थे जो यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे। संगम साहित्य में दासों का उल्लेख भी मिलता है और उन्हें ‘आदिमाई’ कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- वह व्यक्ति जो दूसरों के चरणों पर आश्रित होता है।

संगम कालीन समाज में स्त्री की दशा

कालित्तोगाई आदि संगम-काव्यों से ज्ञात होता है कि संगम युग में समाज तमिल नारियों को पुरुषों की भांति स्वतंत्रता प्रदान करता था।। वे स्वतंत्रता पूर्वक घरों से बाहर जाती थीं। समुद्रतट और नदी-किनारे खेल सकती थीं और मंदिरों के उत्सव में शामिल होती थीं। फिर भी नारी को पुरुषों के संरक्षण में रहना होता था। ‘कुरुंतोगाई’ से पता चलता है कि पत्नी को पति के गुणों के मूल्यांकन के आधार पर नहीं, अपितु इसलिए प्यार करना चाहिए क्योंकि वह उसका पति है।

दूसरे शब्दों में, पत्नी के लिए पति का आकलन करना संभव नहीं था। यद्यपि ऐसे प्रसंग भी मिलते हैं जहाँ नारियाँ शिक्षित थीं और काव्य-रचना भी करती थीं किन्तु साधारणतः नारियों की स्थिति ऐसी नहीं थी। उन्हें संपत्ति का अधिकार नहीं था, किन्तु उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था। वे विधवा का जीवन बिताती थीं अथवा सती हो जाती थीं और इसे दैवी-विधान माना जाता था। विवाह एक संस्कार था, संविदा नहीं। ‘तोलकापिपयम’ में आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की गई है जिनमें ब्रह्म विवाह का आम प्रचलन था। प्रणय-निवेदन और बिना विवाह के साथ में रहने का भी उल्लेख है जो बाद में पारंपरिक विवाह के रूप ले लेता था।

संगम युग में समाज वेश्यावृत्ति के दोष से मुक्त नहीं था। वेश्यावृत्ति एक स्वीकृत संस्था थी। किन्तु गणिकाएँ शांत पारिवारिक जीवन में बाधक मानी जाती थीं। इसके बावजूद, काव्यों में जिस रूप में इनका चित्रण हुआ है और वे जैसी सामाजिक हैसियत रखती थीं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संगम युग की गणिकाएं हेय-दृष्टि से नहीं देखी जाती थीं। यद्यपि कुरुतोगाई आदि ग्रंथों में ऐसी गणिकाओं की चर्चा हुई है जो पत्नियों और उनके रिश्तेदारों को चुनौती देती हैं, पुरुषों को लुभाती हैं तथापि गणिकाएँ अपने साथियों को मुख्यतः नृत्य-गायन आदि से ही प्रसन्न करती थीं।

वस्त्राभूषण एवं अलंकार

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धनी लोग बारीक मलमल और रेशम से बने वस्त्र पहनते थे। कुलीनों और राजाओं को छोड़कर शेष लोग कपड़े के दो टुकड़ों- एक कमर के नीचे और दूसरा पगड़ी के रूप में शिरोवस्त्र से ही संतुष्ट रहते थे। स्त्रियाँ कपड़ों का उपयोग कमर से नीचे के भाग को ढंकने के लिए ही करती थीं। कबीले तो उतना भी नहीं कर सकते थे। कबीलाई स्त्रियाँ शरीर को ढंकने के लिए पत्तों और छालों का उपयोग करती थीं। संगम युग के स्त्री-पुरुष तेल, सुगंधित द्रव्य, रंगीन पाउडर और प्रलेप के शौकीन थे तथा अपनी छातियों पर चंदन का गहरा लेप लगाते थे। सिलप्पादिकरम के अनुसार सित्रयां अपने शरीर पर तस्वीरें बनवाती थीं और पलकों पर श्याम-रंजक लगाती थीं। स्त्री और पुरुष दोनों गर्दन के घेरे में, बाहों और पैरों में आभूषण धारण करते थे। कुलीन स्त्रियां भारी बाजूबंद और पाजेब पहनती थीं, जबकि सामान्य गृहस्थ-स्त्रियाँ सामान्य प्रकार के जेवर धारण करती थीं। धनी वर्ग के स्त्री-पुरुष स्वर्ण और कीमती रत्नों से शृंगार करते थे, निर्धन स्त्रियां शंख एवं कौड़ी से बने कंगनों और रंगीन मनकों से बने कंठहार पहनती थीं। ‘शिलप्पादिकरम’ एक ऐसे आनुष्ठानिक गर्मस्नान का उल्लेख करता है जिसका जल पाँच प्रकार के बीजों, दस प्रकार के स्ंतभों और बत्तीस प्रकार के सुगंधित पौधों से गरम किया जाता था। बालों को ‘अखिल के धुएं’ से सुखाया जाता था और सजने-संवरने के लिए बालों को पाँच हिस्सों में बांटा जाता था।

पुरुष भी लंबे बाल रखते थे और उनके गुच्छे को गांठ बनाकर बांधते थे। इन गांठों को कभी-कभार मनकों की माला से घेरा जाता था। कुरुंतोगाई के अनुसार तमिल लोग फूलों के शौकीन थे। स्त्रियां जूड़े में कुमुदिनी के फूल लगाती थीं।

आवास

संगम काल के लोग कई प्रकार के घर बनाते थे। सामान्य लोगों के घर कच्ची मिट्टी की ईटों एवं गारे से बनाये जाते थे। धनी लोगों के घर ‘सुडुमान’ अर्थात् पकाई गई मिट्टी की ईंटों से बने होते थे। निर्धन लोेग ऐसी छाजन वाले घरों में रहते थे जो घास अथवा नारियल या पंखिया खजूर अथवा ताड़ से छाई जाती थी।

साहित्यिक रचनाएँ धनी लोगों के कई मंजिलों वाले घरों का उल्लेख करती हैं जिनके प्रवेश-द्वार पर लोहे के फाटक होते थे और उन फाटकों को जंग से बचाने के लिए उन पर रंग किया जाता था। ‘सिलप्पादिकरम’ के अनुसार ये घर सुंदर कलात्मक दीपकों से प्रकाशित किए जाते थे। ऐसे दीपक ग्रीस और रोम से आते थे। इनमें मछली से निकाला गया तेल डाला जाता था।

भोजन और पेय

संगम काल के तमिल लोग प्रायः सामिष भोजन करते थे किंतु ब्राह्मण एवं संन्यासी निरामिष आहार ही ग्रहण करते थे। भोजन में चावल, दूध, मक्खन, घी और शहद प्रधान थे। मांस और मद्य का खुलकर उपयोग होता था। दही लोकप्रिय भोज्य था। कुरुंतोगाई दही, गुड़, मुरमुरा, दूध और घी से बने अनेक प्रकार के मिष्ठानों की चर्चा करता है। संगम ग्रंथों में कढ़ी और चावल का भी उल्लेख हुआ है।

उच्च वर्ग के लोग उत्तम कोटि के चावल, मन पसंद मांस, आयातित मद्य इत्यादि ग्रहण करते थे। ब्राह्मण मद्य और मांस से परहेज करते थे। नगरीय क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं द्वारा निर्धनों को निःशुल्क भोजन का वितरण किया जाता था।

धनी गृहस्थों द्वारा दावतों का आयोजन भी किया जाता था। अतिथियों को भोजन करवाना सामान्य प्रथा थी और बिना अतिथि को खिलाए भोजन अधूरा माना जाता था। कवि और विद्वान सम्मानित अतिथि माने जाते थे और घी में पकाया गया चावल उन्हें प्रेम और आदर से खिलाया जाता था।

मनोरंजन

लोग अनेक प्रकार के खेलों और उत्सवों में भाग लेते थे। इनमें नृत्य, संगीत के आयोजन, धार्मिक उत्सव, बैलों की लड़ाई, मुर्गेबाजी, आखेट, पासा, कुश्ती, मुक्केबाजी, कलाबाजी, इत्यादि शामिल थे। औरतें धार्मिक उत्सवों, पासे और वारिप्पांथु या कपड़े की गेंद से खेलती थीं।

लड़कियां प्रायः ताड़ या खजूर की पंखियों के रेशे से बने हिंडोले में झूलती थीं। नरिन्नाई अलंकृत गुड़ियों से खेले जाने वाले खेल की चर्चा करता है। कुरुंतोगाई के अनुसार बच्चे खिलौना-गाड़ी से खेलकर और समुद्र-तट पर बालू के घर बनाकर अपना मनोरंजन करते थे।

नृत्य और संगीत मनोविनोद के लोकप्रिय साधन थे। संगम काव्य अनेक प्रकार के नृत्यों की चर्चा करता है। सिलप्पादिकरम सात समूहों में बंटे ग्यारह प्रकार के नृत्यों का उल्लेख करता है। यह संगीत की बारीकियों का भी विवरण देता है। मृदंग, बांसुरी और याल जैसे अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र पुहार और मदुराई की दुकानों में बेचे जाने का भी उल्लेख है। प्रदर्शन की कलाओं में नाटक भी शामिल था।

नाटकों का स्वरूप अधिकांशतः धार्मिक होता था, प्रायः महान व्यक्तियों अथवा महत्त्वपूर्ण घटनाओं के स्मरणोत्सव के रूप में भी नाटक खेले जाते थे। मागध और बंदी अपने वाद्य-यंत्रों के साथ जगह-जगह घूमकर किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति अथवा घटना की महिमा गाया करते थे और संगम युग में यह कार्य काफी लोकप्रिय था।

आरंभ में चारण (पोरुनार) युद्ध में संलग्न सैनिकों में वीरत्व जगाने और युद्ध में विजय मिलने पर उनकी विजय-गाथा गाते थे। वे युद्धरत योद्धाओं के संदेश उनके घरों तक पहुंचाते थे। समाज में उनका बहुत आदर था और राजा भी उन्हें सम्मानित करते थे। पोरुनार के साथ-साथ पनार भी जनसामान्य का मनोरंजन करते थे।

संगम कालीन समाज के धार्मिक विश्वास

साहित्यिक स्रोत संगम युग में धार्मिक कृत्यों का विशद उल्लेख करते हैं। संगम कालीन तमिल समाज में ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म प्रचलित थे। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ईसा की प्रथम शताब्दी में तमिल प्रदेश में आए। इस अवधि में शैव और वैष्णव जैसे ब्राह्मण-पंथ भी प्रचलित थे। संगम कृतियों में वैदिक लोगों के आगमन और तमिलों के धर्म के साथ उनके धर्म के पारस्परिक प्रभाव की चर्चा अनेक स्थलों पर हुई है।

सिलप्पादिकरम त्रिगुण पवित्र-अगिन, द्विज प्रकृति, छः कर्त्तव्य तथा अन्य ब्राह्मणवादी विचारों और अवधारणाओं की चर्चा करता है। तोल्कापिपयम में भी ब्राह्मण-विहित छः कर्त्तव्यों का उल्लेख है। ब्राह्मणवादी अनुष्ठान एवं संस्कार पूरी तरह प्रचलन में थे। अनेक संगम काव्यों में यज्ञीय भवनों वाले पांड्य नृपों की चर्चा हुई है।

तोल्कापिपयम में चार देवताओं की चर्चा हुई है- मुरुगन, तिरुमल, वेंदन (इंद्र) और वरुण। इन्द्र की पूजा वर्षा के देवता के रूप में होती थी और उसके सम्मान में वार्षिकोत्सव मनाया जाता था। पत्तिनप्पालाई में शिव के पुत्र मुरुगन की पूजा का उल्लेख है। लक्ष्मी (समृद्धि की देवी), वनों के संरक्षक के रूप में मायन (पश्चवर्ती विष्णु), बलदेव, कामन (प्रणय-देव), चन्द्रदेव, समुद्रदेव तथा अन्य देवताओं की भी पूजा होती थी।

संगम युग के लोग भूत-प्रेत में भी विश्वास करते थे। सिल्पादिकरन में भूत की चर्चा मिलती है। अनेक लोग पेड़ों, युद्ध क्षेत्रों और श्मशानों में निवास करने वाले ऐसी दुष्टात्माओं में विश्वास करते थे जो रक्तपान करते हैं और रक्त सने हाथों से बाल संवारते हैं। उसी ग्रंथ में छोटे देवताओं, जैसे- मदुरा और पुहार आदि अभिभावक देवताओं का उल्लेख हुआ है।

वे ग्राम-देवताओं को तुष्ट करने के लिए यज्ञ करते थे। वृक्षों, झरनों और पर्वत-शिखरों पर निवास करने वाले देवताओं में विश्वास और उनकी पूजा-अर्चना की परंपरा से स्पष्टतः जीववाद के प्रचलन का पता चलता है। मृतवीरों, सतियों और अन्य शहीदों को भी देवत्व प्रदान किया जाता था।

संगम युग में ईसा की प्रथम शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्मों के प्रवेश से तमिलों के दार्शनिक विचार बहुत हद तक प्रभावित हुए। इन विचारधाराओं ने ज्ञान को पदार्थ पर प्राथमिकता दी। बौद्धों और जैनों ने लोगों का आह्वान किया कि वे पदार्थ से परे जगत के बारे में सोचें। अनेक विद्वानों का मत है कि उस काल के दो प्रसिद्ध महाकाव्यों, सिलप्पादिकरम और मनिमेकलाई में से प्रथम जैन ग्रंथ था और दूसरा बौद्ध ग्रंथ।

शैववाद और वैष्णववाद भी महत्त्वपूर्ण धार्मिक मत थे। मनिमेकलाई में शैववाद का उल्लेख हुआ है। अन्य ग्रंथों में शिव को उनके सहज गुणों के साथ उल्लिखित किया गया है, जैसे- प्राचीन प्रथम ईश्वर, सुंदर नीले कंठ वाले भगवान और वटवृक्ष के नीचे स्थित भगवान। इससे प्रतीत होता है कि आरंभिक काल में शैववाद और वैष्णववाद दोनों तमिल प्रदेश में र्सिफ सिद्धांत में प्रचलित थे, नाम से नहीं। यद्यपि तोल्कापिपयम मुरुगदेव (शिव का पुत्र) और मायन (विष्णु का आरंभिक नाम) की चर्चा तो करता है, किन्तु शैववाद और वैष्णववाद का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता। संभवतः इन दो पंथों का दो भिन्न संप्रदायों में संक्रमण संगम युग में हो रहा था।

संगम युग के लोग स्वप्नों और मानव-जीवन पर ग्रहों के प्रभाव में भी विश्वास करते थे। कुछ लक्षण तो आमतौर पर अनिष्टकर माने जाते थे। कौओं का कांव-कांव किसी अतिथि के आगमन का सूचक था। कुरुंतोगाई के अनुसार कौआ एक शुभ अग्रदूत था और उसे चावल एवं घी खिलाया जाता था।

मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा संगम कालीन सभ्यता का परिष्कृत पक्ष था। अनेक संगम ग्रंथों में शिव, मुरुगन, बलदेव, विष्णु, कामन और चन्द्रदेव के मंदिरों की चर्चा हुई है। मनिमेकलाई एक विशाल ईंट चक्रवाह कोट्टम का उल्लेख करता है। अनेक वृक्षों के नीचे देवताओं के चबूतरे बनाए जाते थे। पूजन-विधि में नृत्य, पुष्पार्पण, तंडुल आदि सम्मिलित थे। सिल्प्पादिकरम में देवताओं की प्रस्तर-प्रतिमाओं का उल्लेख है। यह ईसा पूर्व तीसरी सदी के लिंगम के रूप में टी. ए. गोपीनाथ राव द्वारा की गई पुरातात्तिवक खोज से भी प्रमाणित होता है।

संगम युग के तमिल जन्म और मृत्यु के अवसरों पर आनुष्ठानिक अस्वच्छता में भी विश्वास करते थे। मृतकों को दफनाया अथवा जलाया जाता था अथवा खुले में गृद्धों या शृगालों के भोजन के लिए छोड़ दिया जाता था। मनिमेकलाई में शमशानों का उल्लेख हुआ है जहाँ अनेक प्रकार के भूत-प्रेत रहते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – संगम युग

संगम युग में समाज

संगम साहित्य

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

संगम साहित्य

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संगम साहित्य

संगम साहित्य से तात्पर्य पांड्य-शासकों द्वारा संरक्षित विद्वत्-परिषद् के साहित्यकारों द्वारा तीन अलग-अलग सम्मेलनों में तमिल भाषा में रचे गए साहित्य से है। इतिहासविद् संगम साहित्य की तुलना ग्रीस और रोम के गौरव-ग्रंथों तथा यूरोपीय पुनर्जागरण काल के साहित्य से करते हैं।

कुछ विद्वान संगम युग को तमिलों का स्वर्ण-युग मानते हैं। निश्चय ही तमिलों के इतिहास में संगम युग अनूठा है। दक्षिण भारत के अनेक स्थलों से प्राप्त पुरातात्त्विक स्रोत संगम युग के लोगों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों पर प्रकाश डालते हैं किंतु इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी उस युग के बहुमूल्य संगम-साहित्य से प्राप्त होती है।

संगम साहित्य का रचनाकाल

संगम साहित्य के रचना-काल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार संगम साहित्य ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर दूसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक लिखा गया। एम. अरोकिया स्वामी के अनुसार संगम साहित्य में सम्मिलित ग्रंथ ‘तोलक्कापियम’ के लेखक ‘तोल्कापिप्यर’ ईसा पूर्व चौथी अथवा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में हुए। अतः संगम साहित्य की रचना इसी काल में आरम्भ हुई होगी।

संगम साहित्य की रचना के आधार पर के. ए. एन. शास्त्री संगम युग की अवधि ई.100 से ई.250 तक मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इस साहित्य का संकलन ई.300 से ई.600 के काल में हुआ किंतु यह निर्विवाद है कि इस साहित्य का अंतिम संकलन ई.600 अथवा उसके आसपास हुआ। इस साहित्य का सृजन एवं संग्रहण पांड्य शासकों द्वारा मदुरै में आयोजित तीन ‘सम्मेलनों’ के दौरान हुआ जिन्हें ‘संगम’ कहा जाता है।

संगम साहित्य की रचना

अलग-अलग पांड्य शासकों द्वारा अलग-अलग काल में बुलाए गए तीन साहित्य-सम्मेलनों में भाग लेने के लिए दक्षिण भारत के अनेक ख्यातिनाम लेखक, कवि एवं चारण दूर-दूर से मदुरै आए। इन सम्मेलनों को ‘संगम’ और इन सम्मेलनों में रचित साहित्य को ‘संगम साहित्य’ कहा गया। संगम साहित्य अनेक वीरों और वीरांगनाओं की प्रशंसा में रचित उच्चकोटि की अनेक छोटी-बड़ी कविताओं का संग्रह है। ये कविताएँ धर्मसम्बन्धी नहीं हैं।

साहित्य का विशाल भण्डार

संगम साहित्य अपने मूल रूप में साहित्य का विशाल भण्डार रहा होगा। जो संगम-साहित्य आज उपलब्ध है वह उसका एक हिस्सा भर ही है। संगम साहित्य निम्नलिखित संकलनों में उपलब्ध है- नरिनई, कुरुन्दोहई, ऐन्गुरुनुरु, पत्तुप्पत्त, पदिटुप्पतु, परिपाड़ल, कलित्तोहई, अहनानुरु और पुरनानुरू। संपूर्ण संगम साहित्य में 473 कवियों की 2,289 रचनाएं हैं। इन कवियों में से 102 अनाम कवि हैं तथा शेष तमिल के विख्यात साहित्यकार हैं।

संगम साहित्य में 30,000 पंक्तियों की कविताएं हैं। इन्हें आठ संग्रहों में संकलित किया गया, जिन्हें ‘एट्टूतोकोई’ कहा गया। इनके दो मुख्य समूह हैं- पाटिनेनकिल कनाकू (18 निचले संग्रह) और पत्त ूपत्तू (10 गीत)। पहले समूह को दूसरे से अधिक पुराना और अधिक ऐतिहासिक माना जाता है। संगम साहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रंथ ‘तोलक्कापियम’ है। यह तमिल-व्याकरण और काव्य का ग्रंथ है।

तीन संगमों की परंपरा

पांड्य शासकों द्वारा कुल तीन संगम आयोजित किए गए थे किंतु पहले दो संगमों के बारे में कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है और उनमें जिस साहित्य का सृजन हुआ उसका भी कुछ पता नहीं। तीसरे संगम के बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है। यह संगम पांड्यों की राजधानी मदुरा में हुआ। इस सम्मलेन में तमिल कवियों ने पर्याप्त संख्या में हिस्सा लिया होगा।

इरैयानार अहप्पोरुल के अनुसार ये संगम 9,990 वर्ष तक चलते रहे तथा इनमें 8,598 विद्वान सम्मिलित थे। अधिकांश विद्वान् संगमों की इस अवधि को सही नहीं मानते। उनके विचारानुसार इतनी लम्बी अवधि संभवतः संगम साहित्य को प्राचीनता की गरिमा और महत्ता प्रदान करने के लिए ही बताई गई होगी।

संत अगस्व्यार संगम परम्परा के प्रवर्तक थे। अहप्पोरुल की टीका से तीनों संगमों की अनुक्रमिक व्यवस्था और उनके अंतरालों के बीच के जल-प्लावनों की भी जानकारी मिलती है। ये संगम अथवा विद्वत्परिषदें 197 पांडय राजाओं द्वारा संरक्षित थीं। परंपरागत मतानुसार तीन अनुक्रमिक संगमों में प्रथम दो प्रागैतिहासिक काल के हैं। सभी तीनों संगम पांडयों की राजधानी में आयोजित किए गए।

चूंकि राजधानी समय-समय पर बदलती रहती थी अतः प्रथम संगम का मुख्यालय पुराना मदुरै था और दूसरा संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया। अनुक्रमिक जल-प्लावनों में ये दोनों केन्द्र समुद्र द्वारा नष्ट कर दिए गए। तीसरा संगम आधुनिक मदुरै में आयोजित हुआ था। तृतीय संगम की तिथि अन्य संगमों की तिथियों की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक प्रतीत होती है। यह तिथि ईसा की प्रथम दो शताब्दी और संभवतः ईस्वी सन् के प्रारंभ के तत्काल पूर्व की सदी मानी जाती है।

तोल्कापिप्यर का काल द्वितीय संगम युग में माना जाता है। तीसरा संगम युग भारत-रोम के तत्कालीन शाही रोम के साथ व्यापार के काल से मेल खाता है। यह काल-निधार्रण उस समय के ग्रीक लेखकों के विवरण में उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित है। भूमध्य सागरीय प्रदेशों और तमिल क्षेत्र के बीच समुद्रपारीय व्यापारिक गतिविधियों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। यह संगम साहित्य से भी प्रमाणित होता है।

संगमों की तुलना आधुनिक युग के यूरोप में फ्रेंच अकादमी से की जा सकती है जिसका लक्ष्य भाषा की शुद्धता और साहित्यिक स्तर को बनाए रखना था। आरंभ में संगम में नामांकन सहयोजन से होता था, किंतु आगे चलकर यह भगवान शिव, जो इस महान संस्था के स्थायी अध्यक्ष थे, की चमत्कारी युक्ति से होने लगा।

संगम साहित्य की भाषा

दक्षिण भारत की सर्वाधिक प्राचीन भाषा संभवतः तमिल थी। बाद में स्थानीय बोलियों के मिश्रण से तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषाएँ भी अस्तित्व में आईं। वैदिक संस्कृति से सम्पर्क के बाद दक्षिण की भाषाओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्द अपनाए गए और ई.पू. तीसरी शताब्दी में 44 वर्णों पर आधारित एक लिपि का विकास किया गया।

संगम साहित्य इसी लिपि में लिखा गया। पुरातत्वविदों को 75 से भी अधिक ब्राह्मी लिपि (जो बायीं ओर से दायीं ओर लिखी जाती है) में लिखे अभिलेख मदुरा और उसके आस-पास की गुफाओं में प्राप्त हुए हैं। इनमें तमिल के साथ-साथ प्राकृत भाषा के भी कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है। सुदूर दक्षिण के जन जीवन पर पहले-पहल संगम साहित्य से ही स्पष्ट प्रकाश पड़ता है।

संगम साहित्य के प्रमुख महाकाव्य

संगम साहित्य में तिरूवल्लूवर जैसे तमिल संतों की कृति ‘कुराल’ उल्लेखनीय है जिसका बाद में अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। ‘कुराल’ को तीन भागों में बांटा गया है। पहला भाग महाकाव्य, दूसरा भाग राजनीति और शासन तथा तीसरा भाग प्रेम विषयक है। ‘शिलाप्पदीकारम’ तथा ‘मणिमेकलई’ नामक दो महाकाव्य भी हैं। जिनकी रचना लगभग छठी शताब्दी ईस्वी में की गई। पहला महाकाव्य तमिल साहित्य का सर्वाेत्तम रत्न माना जाता है। यह एक प्रेमगाथा पर आधारित है।

दूसरा महाकाव्य मदुरै के अनाज व्यापारी ने लिखा। दोनों महाकाव्यों में दूसरी से छठी शताबदी ईस्वी तक के तमिल समाज का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वर्णन हुआ है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगो के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य ही एकमात्र प्रमुख स्रोत है। इस साहित्य में व्यापार और वाणिज्य के बारे में प्राप्त तथ्यों की पुष्टि उसकी विदेशी विवरणों तथा पुरातात्विक प्रमाणों से भी होती है।

संगम साहित्य-निकाय

आधुनिक विद्वान ‘संगम साहित्य पद का प्रयोग केवल उन्हीं रचनाओं के लिए करते हैं जो छंदबद्ध हैं, गद्य का जन्म बहुत बाद में हुआ। ‘एत्तुतोगाई’ (अष्टसंग्रह), ‘पत्तुपात्रु’ (दस गीत) और ‘पतिने किल्कनक्कु’ (अष्टादश लघु कृतियाँ), आदि काव्य इसी क्रम में ई.150-250 की अवधि में रचे गए हैं। पंचमहाकाव्य- जीवकचिंतामणि, सिलप्पादिकरम, मनिमे कलाई, वलयपाथी और कुंडल केशी बहुत बाद में रचे गए।

इनमें से अंतिम दो महाकाव्य अब उपलब्ध नहीं हैं। शेष तीन महाकाव्यों में सिलप्पादि करम तथा मनिमे कलाई जुड़वाँ महाकाव्य कहे जाते हैं, क्योंकि वे एकल परिवार- कोवलान (पुहार का धनी सौदागर), कन्नगी (कोवलान की साध्वी पत्नी), माधवी (नर्तकी) जिसके साथ कोवलान विवाहित बनकर रहता था, और इस विवाह से उत्पन्न संतान, मनिमेकलाई की कहानी को ही आगे बढ़ाते हैं।

सिलप्पदिकरम का लेखक ईलांगो आदिगल था जिसे महाकाव्य में तत्कालीन चेर राजा सेंगुत्तुवन का भाई कहा गया है। मनिमेकलाई की रचना सथनार ने मुख्य रूप से तमिलों के बीच बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए की थी। ये काव्य-रचनाएँ तमिलों की सामाजिक, आर्थिक और आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन करती हैं और इनके प्रतिपाद्य विषय के केंद्र मदुरै, पुहार (पूंपुहारकावेरी), पटिटनम, वंजि (करुर) और कांची आदि नगर हैं।

उपर्युक्त तीन समूहों के काव्य ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों के भीतर लिखे माने जा सकते हैं किन्तु वर्तमान समय में वे जिस क्रम में संगृहीत और व्यवस्थित हैं वह बहुत बाद का प्रतीत होता है। काव्य की लंबाई उसे बड़े वर्गों में विभाजित करने का मुख्य आधार थी। ‘अष्टसंग्रह’ की कविताएँ तीन से तैंतीस पंक्तियों की हैं, जबकि ‘दशगीत’ की सबसे छोटी कविता 103 पंक्तियों तथा सबसे लंबी कविता 782 पंक्तियों की है। अधिकांश कविताओं के अंत में टिप्पणी भी दी गई है जिनमें कवियों के नाम और उस कविता-रचना की परिस्थितियों का भी उल्लेख है।

‘अष्टादश लघुकृतियों’ में नैतिक और उपदेशात्मक साहित्य है। संगम साहित्य के उपदेशात्मक साहित्य में विश्व-प्रसिद्ध ‘तिरुक्कुरल’ का छंदबद्ध साहित्य भी सम्मिलित है जिसके प्रत्येक छंद में दो से तीन पंक्तियाँ हैं।

वर्तमान में संगम साहित्य में 3 पंक्तियों से लेकर 800 पंक्तियों तक की विभिन्न लंबाई वाले काव्य हैं। इनमें से कुछ रचनाएँ एक ही कवि की मानी गई हैं, जबकि नालादियार जैसी कुछ अन्य रचनाएँ अनेक कवियों द्वारा लिखित मानी जाती हैं। वर्तमान में उपलब्ध संगम काव्य 30,000 से अधिक पंक्तियों में है। ये कुल 473 कवियों द्वारा लिखी गई हैं जिनमें लगभग 50 महिला कवि भी हैं। 102 कविताएँ अज्ञात कवियों की हैं।

इन रचनाओं से प्रकट होता है कि उस समय की संस्कृति बहुत उन्नत थी तथा संगम युग आते-आते तमिल भाषा अत्यंत प्रौढ़ हो चुकी थी। संगम साहित्य की भाषा अवश्य ही अत्यंत प्राचीन है किंतु आधुनिक तमिल भाषियों को उसे समझने में अधिक कठिनाई नहीं होती। विद्वानों ने संगम काव्य को विषय-वस्तु के आधार पर अनेक श्रेणियों में बांटा है किंतु आकार के आधार पर उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया जाता है- (1.) लघु संबोध-गीति और (2.) लंबी कविताएँ।

इतिहासकारों के लिए छोटी कविताएँ, लंबे गीतिकाव्य से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

संबोध-गीति वचनिकाओं में संगृहीत हैं। ये वचनिकाएँ हैं- अहनानुरु, पुरानानुरु, कुरुंतोगाई, नार्रिनाई, कालितोगाई, परिपादाल, ऐंगुरुनुरु और पतिरुर्पत्तु। इनका संकलन ‘एत्तुतोगाई’ कहलाता है। दस लंबे गीति-काव्य अथवा विवरणात्मक काव्य, जिसे ‘पत्तु पत्तु’ कहते हैं, नौवां समूह माना जाता है। इस संकलन में निम्नलिखित काव्य शामिल हैं-

रुमुरुगारुर्प्पादाई, सिरुपानारुर्प्पादाई, पोरुनारुर्पादाई, पेरुंबनारुर्पादाई, नेदुनालवादाई, कुरिंजिप्पात्रु, मदुराईक्कांजी, पत्तिनाप्पालाई, मुमुल्लाइप्पत्तु और मलाईपादुकादम। इनमें तिरुमुरुगारुर्पादाई भगवान मुरुगन पर भक्ति-काव्य है। सिरु पनारुर्प्पादाई नलिलयाक्कोडन की उदार प्रकृति का वर्णन करता है जिसने चोल राज्य के एक हिस्से पर शासन किया। पेरुं बाना रुज्पदाई तोंदा ईमान इलांतिरैयान और उसकी राजधानी कांचीपुरम का वर्णन करता है।

पोरुनारुर्प्पादाई और पत्तिनाप्पालाई महान चोल राजा कारिकाल का स्तुतिगान करता है। नेदुनालवादाई और मदुराई कांजी के महान पांड्य राजा लालैया लांग नत्रु नेडुन जेलियान का वर्णन करता है। कुरिजिप्पत्रु पहाड़ी और पर्वतीय जीवन का चित्रण करता है, और मलाई पादुकादम नायक नान्नान के साथ-साथ युद्ध में राजा की विजय का उत्सव मनाने और सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए गीत-संगीत की रचना करता है। ये सारी कृतियाँ संगम युग में कवियों की महत्ता को भी दर्शाती हैं।

संगम साहित्य का महत्त्व

संगम साहित्य प्राचीन तमिल समाज की सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक जानकारियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। संगम साहित्य ने अपनी पश्चवर्ती साहित्यिक परम्पराओं को अत्यंत प्रभावित किया। दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के लेखन के लिये संगम साहित्य की उपयोगिता अंदिग्ध है। इस साहित्य में उस समय के चोल, चेर और पाण्ड्य नामक तीन राजवंशों का उल्लेख हुआ है।

संगम साहित्य ही एकमात्र ऐसा साहित्यिक स्रोत है जो सुदूर दक्षिण के जनजीवन पर सर्वप्रथम विस्तृत और स्पष्ट प्रकाश डालता है। संगम साहित्य से दक्षिण भारत के राजनीतिक इतिहास की तिथियां नहीं मिलतीं किंतु संगम साहित्य वहाँ के सामजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के सम्बन्ध में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करता है। इसी साहित्य से पता चलता है कि दक्षिण के तीन प्रमुख राज्य- पांड्य, चोल और चेर परस्पर संघर्षरत रहे। संगम साहित्य से दक्षिण और उत्तर भारत की संस्कृतियों के सफल समन्वय का स्पष्ट चित्र प्राप्त होता है।

यह साहित्य बताता है कि दक्षिण के तीनों राज्यों ने प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाते हुए किस प्रकार विदेशी व्यापार का प्रसार किया। उनके व्यापारिक सम्बन्ध कैसे थे, इस बारे में भी हमें यथेष्ट जानकारी देता है। संगम कविताएँ तमिल भाषा की पहली सशक्त रचनाएँ मानी जाती हैं। इन कविताओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों के तमिल भाषा में आत्मसात करने के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं।

यह साहित्य इस बात का ज्वलंत प्रमाण देता है कि दक्षिण की द्रविड़ और उत्तर की आर्य संस्कृति ने परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान किया और देश की एक समन्वित संस्कृति प्रदान की जिसे सामान्यतः हिन्दू संस्कृति भी कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – संगम युग

संगम युग में समाज

संगम साहित्य

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

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संगम युगीन अर्थव्यवस्था

संगम युगीन साहित्य एवं शासन व्यवस्था दोनों ही इस बात के प्रमाण हैं कि संगम युगीन अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत रही होगी। अर्थव्यवस्था की मजबूती के बिना न तो उन्नत शासन व्यवस्था स्थापित की जा सकती है और इतना उत्कृष्ट साहित्य लिखा जा सकता है।

संगम साहित्य में वर्णित राज्य व्यवस्था

संगम काव्य दक्षिण भारत में पहली बार राज्य प्रणाली के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। ये रचनाएँ ऐतिहासिक विकास की ऐसी प्रक्रिया के संकेत देती हैं जिसमें हम कबीलों की संख्या में ह्रास तो पाते हैं, किन्तु राजा के साथ सुगठित इकाइयों के रूप में उनका अस्तित्व भी बना रहता है। राज्य एक संगठित राजनीतिक संरचना के रूप में तो गया था किन्तु यह अभी भी स्थिर नहीं था। यद्यपि प्रजातांत्रिक अवधारणा अभी सुदृढ़ नहीं हो पाई थी, परंतु प्रशासन राजतंत्रीय होते हुए भी प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर चलता था।

राजत्व

संगम काल के तीन राजवंशों में से ‘चोल’ सिंचित और उर्वर कावेरी घाटी पर शासन करते थे। उनकी राजधानी ‘युरैयुर’ में थी। ‘पांडय’ पशुचारी और तटवर्ती भागों पर शासन करते थे और उनकी राजधानी ‘मदुरै’ में थी। ‘चेर’ का आधिपत्य पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र में था उनकी राजधानी ‘वंजि’ (कुरुर) में थी। संगम कृतियाँ इतने राजाओं के नाम की चर्चा करता है कि उनका वंशक्रम और कालक्रम निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

फिर भी विद्वानों ने चोल राजाओं- उरुवाप्रेफर इलांजेत्चेन्नी, उसके पुत्र कारिकल और कारिकल के दो पुत्रों, नालन-किल्ली और नेदुं किल्ली की वंशावली की पुष्टि कर ली है। पांड्य राजवंश में मुथुकुदुमी पेरुवालुदी, अरयिपादाई कादंथ नेडुनजेलियन, वेर्रीवेर्चेलियन और तलयालंकानाथु चेरुवेनरा नेडुल जेलियन नामक राजाओं की पुष्टि हो गई है। इसी प्रकार चेर राजवंश के राजाओं में ईमायारारांबन नेडुमकेरालतन, चेरन सेंगुत्तुवन और मांतारम चेरल ईरुंपोराई की पुष्टि की जा चुकी है।

संगम काल में शासन राजतंत्रात्मक था। राजा को वेंतन कहा जाता था। वह समाज और शासन दोनों का प्रधान होता था। समाज के प्रधान के रूप में वह इन्द्रोत्सव तथा नृत्य-समारोहों के उद्घाटन करता था। राज्याभिषेक के समय वह महत्त्वपूर्ण उपाधियां ग्रहण करता था। उसे देवताओं के समकक्ष माना जाता था। प्राचीन तमिलवासी तीन वस्तुओं- मृदंग, राजदण्ड, और श्वेत छत्र को राजा के प्रधान चिह्न मानते थे।

संगम साहित्य के अनुसार राजपद वंशानुगत रूप में पिता से पुत्र को प्राप्त होता था। राजा का दायित्व राज्य में राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखने का था। वह प्रजा के कल्याण की देख-रेख करता था तथा उसकी भलाई के लिए कार्य करता था। राजा अपने राज्य का दौरा करता था एवं शासन के मामलों में मंत्रियों से परामर्श लेता था जिन्हें संगम साहित्य में ‘सुर्रम’ कहा गया है। सुर्रम का तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो राजा को आवश्यकता पड़ने पर सलाह देने के लिए उसके निकट रहते थे।

सामन्त

संगम कालीन शासन व्यवस्था में राजा के अधीन दो प्रकार के ‘सामंत’ होते थे- (1.) वेलिर और (2.) अ-वेलिर। उनमें से कुछ सामंत साहित्य के महान संरक्षक सिद्ध हुए। इन सरदारों में कुछ प्रमुख थे- मोहुर का पालयन मारन (आधुनिक मदुरै के निकट), नानन वेनमान और विल्लवान कोथाई (दोनों प्रायद्वीप के पशिचमी तट के निकट), ओइमानाडु (आधुनिक दक्षिणी आकेटि) के नलिलया कोडन, टिथियन (तिन्ने वैल्ली क्षेत्र) तथा वेलिर सरदारों का समूह, जैसे- पारमबुनाद कापारी, पाल्नी क्षेत्र का वेलपेगन, पुडुकोटटाई क्षेत्र का वेलइव्वी, कोदुंबालुर के वेल आवी और ईरुक्कुवेल, तथा अन्य।

उत्तर-संगम-काल में राजतंत्रीय सत्ता अधिक सुदृढ़ हो गई और परंपरागत सरदारों की स्थिति घटकर राजकीय अधिकारियों के समान हो गई। संगमोत्तर काल में इन सामंतों ने एवं राजकीय अधिकारियों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और राजा कमजोर हो गया।

शासन

राजा की नीतियाँ को नियंत्रित करने के लिए विभिनन परिषदें बनी हुई थीं। सिलप्पादिकरम दो प्रकार की परिषदों की चर्चा करता है- (1.) पेरुंकुलु और (2.) एंपेरायम। पेरुंकुलुम पांच सदस्यों की मंत्रि-परिषद थी, जबकि एंपेरायम अथवा महासभा में 8 सदस्य होते थे। दोनों परिषदें प्रशासकीय निकाय थीं, यद्यपि उनका कार्य सामान्यतः परामर्शी स्वरूप का था तथापि राजा उनके परामर्श को अस्वीकार नहीं करता था। इन परिषदों का मुख्य कार्य न्यायिक था,। मदुरैक्कांजी के अनुसार इन संस्थाओं के प्रमुख को ऐंपेकुल कहते थे।

प्राचीन राजा चाहे जितना प्रतापी रहे हों, शासन का स्वरूप ‘स्वभावतः-सीमित’ अथवा ‘लोकप्रिय-राजतंत्र’ का रहा है। उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में यह व्यवस्था अधिक सुदृढ़ रही है। प्रत्येक स्थानीय इकाई, चाहे वह कितनी भी छोटी और किसी भी कोने में क्यों न स्थित हो, स्थानीय सभा द्वारा शासित होती थी। संगम साहित्य में अवाई और मरनाम नामक संस्थाओं के भी उल्लेख आए हैं। ऐसी सभाओं को आमतौर पर ‘आरांकुरावैयम’ कहा जाता है जो अपने सही निर्णाय के लिए विख्यात थीं। इन्हें हमारी आधुनिक पंचायत प्रणाली का पूर्वज कहा जा सकता है।

प्रतिरक्षा

बड़े राजा और सामंत विशाल एवं स्थायी सेनाएं रखते थे। दो राज्यों के बीच प्रायः युद्ध होते रहते थे। इनका उद्देश्य न केवल अपने राज्य की रक्षा करना एवं पड़ौसी राज्य के क्षेत्र पर अधिकार करके अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाना होता था अपितु पड़ोसी राज्यों की अत्याचार या कुशासन झेल रही जनता को त्राण दिलाने का भी होता था। कभी-कभी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने हेतु भी युद्ध होते थे। राज्य का प्रत्येक पुरुष स्वयं को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करता था। राजाओं द्वारा संपोषित स्थायी सेना के अतिरिक्त पूरे राज्य में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक होते थे जो आवश्यकता पड़ने पर वेतनभोगी सैनिक के रूप में राजा की सेना में सम्मिलित हो सकते थे।

संगम साहित्य के अनुसार राजा के पास चतुरंगिणी सेना अर्थात् रथ सेना, गज सेना, अश्व सेना और पैदल सेना होती थी। चेर राजाओं के पास नौ-सेना भी थी जो सामुद्रकि पत्तन की रखवाली करती थी। दूसरे राजाओं के जहाज चेर राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते थे। संगम ग्रंथों में युद्ध क्षेत्रों में सैनिक छावनी का भी उल्लेख मिलता है। राजा की छावनी भव्य होती थी और छावनी में भी वह अपने श्वेत छत्र के नीचे सोता था। राजा को हर समय उसके सैनिक घेरे रहते थे।

राजा को घेर कर सोने वाले सैनिक बिना तलवार के होते थे। सामान्य सैनिकों की छावनियाँ अलग-बगल में ईख की पत्तियों से बनी होती थीं और उनके शिखर पर धान की पत्तियाँ लगाई जाती थीं जिनसे धान लटकता रहता था। सेनापतियों और ऊंची श्रेणी के पदाधिकारियों के साथ उनकी पत्नियाँ भी युद्ध-अभियान पर जाती थीं और वे उनके पतियों के लिए विशेष रूप से बनी छावनियों में ठहरती थीं। राजा सैनिकों और पदाधिकारियों की छावनियों में जाकर उनकी कुशल-क्षेम पूछता था। वह रात्रि के समय और यहाँ तक कि बरसात में भी ऐसा करता था।

तमिल प्रजा में योद्धा के प्रति तथा युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिक के प्रति भारी सम्मान का भाव था किन्तु पीठ पर लगे घाव के प्रति गहरे तिरस्कार का भाव होता था। जिस राजा या सेनापति की पीठ पर घाव लग जाता था, वह राजा या सेनापति उपवास करके प्राण छोड़ता था। जो योद्धा युद्ध में शहीद हो जाते थे उनकी याद में स्मारक खड़े किए जाते थे। राजकीय कारावासों में बंदियों को पीड़ा दी जाती थी।

संगम शासन व्यवस्था अनेक मामलों में उत्तर-भारत के राजनीतिक विचारों और संस्थाओं से प्रभावित थी। संगम काल के अनेक राजा अपने कुल को शिव एवं विष्णु आदि देवताओं और प्राचीन ऋषियों से उत्पन्न मानते थे। अनेक राजाओं के पूर्वजों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। संगम युग के शासक कला, साहित्य एवं संस्कृति के रक्षक थे और विशाल यज्ञों का आयोजन किया करते थे।

संगम साहित्य में वर्णित संगम युगीन अर्थव्यवस्था

कृषि

संगम युगीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं पशुपालन पर आधारित थी। संगम युग की जनता की समृद्धि भूमि की उर्वरता और व्यापार के विस्तार में निहित थी। मदुरैक्कांजी कृषि और व्यापार को आर्थिक विकास की मुख्य शक्ति मानता है। सिलप्पादिकरम भी प्रजा की सुख-समृद्धि को कृषि से जोड़ता है। कृषि राज्य के राजस्व का मुख्य स्रोत थी। प्रजा कृषि एवं पशुपालन में विशेष रुचि लेती थी।

संगम काव्यों में प्रायः दूध और दूध के उत्पादों- दही, मक्खन, घी, छाछ आदि का उल्लेख हुआ है। संगम साहित्य की अनेक रचनाओं में पशुधन के महत्त्व का उल्लेख हुआ है। पड़ौसी राज्य प्रायः पशुधन लूटने के लिए आक्रमण कर दिया करते थे। राजा के प्रधान कर्त्तव्यों में अपने राज्य के पशुधन की रक्षा करना भी था। संगम काल में बड़ै पैमाने पर उपजाई जाने वाली फसलों में धान और ईख का प्रमुख स्थान था।

अन्य फसलों में विभिन्न प्रकार के फल, चना, सेम, वलिल (शकरकंद), कटहल, आम, केला, नारियल, सुपारी, केसर, गोल-मिर्च, हल्दी, इत्यादि सम्मिलित थे। संगम युग के राजाओं ने कृषि के विकास के लिए अनेक उपाय किए। कारिकाल चोल ने सिंचाई के लिए तालाब खुदवाया। उसका कावेरी तटबंध कृषि के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

तालाब से सिंचाई के कारण कृषि में लाभ की चर्चा अनेक कविताओं में मिलती है। मदुरैक्कांजी उन नदियों की चर्चा करता है जो पूर्वी-सागर की ओर के तालाबों को भर देती है।

उद्योग

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में उद्योगों का भी बड़ा महत्व था। संगम युग में विभिन्न प्रकार की उद्योग सम्बन्धी गतिविधियाँ बड़े स्तर पर होती थीं। काव्यों में अनेक प्रकार के कारीगरों- लौहकार, ताम्रकार, स्वर्णकार, कुंभकार, मूर्त्तिकार, चित्रकार और बुनकर आदि का उल्लेख हुआ है। मनिमेकलाई महाराष्ट्र से वास्तुकारों, मालवा से लौहकारों, ग्रीस और रोम से काष्ठकारों तथा मगध से जौहरियों के अपने तमिल प्रतिरूपों के साथ सहयोग की चर्चा करता है।

व्यवसाय आमतौर पर आनुवंशिक था अर्थात पिता का काम ही पुत्र अपना लेता था। सिलप्पादिकरम के अनुसार अलग-अलग व्यवसाय के लोग अलग-अलग गलियों में रहते थे। इससे विभिन्न व्यापारों और उद्योगों में उन्नति तो हुई ही, साथ ही व्यवसाय से जुड़े लोगों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में महारत हासिल की।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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इस युग में निर्माण-कला ने भी ऊँचाइयां प्राप्त कीं। सिलप्पादिकरम में ऐसी नौकाओं का उल्लेख हुआ है जिनके आग्रभाग अश्व, गज और सिंह की आकृति वाले थे। भूमध्यसागरीय जगत और अन्य दूर-देशों के साथ बढ़ते व्यापारिक सम्बन्ध तभी संभव हो सकते थे जब मजबूत और दूरस्थ यात्रा योग्य पोत बनाए गए हों। अन्य निर्माण कार्यों में पुल, नालियाँ, प्रकाशगृह, नगर परिघाएं इत्यादि सम्मिलित थे। संगम युग में चित्रकला भी काफी लोक प्रिय थी। पारिपादाल ‘मदुरा’ (मदुरै) में चित्रांकनों के एक संग्रहालय की चर्चा करता है और सिलप्पादिकरम में चित्रों की बिक्री का उल्लेख हुआ है। घरों की दीवारें छतें, वस्त्र, पलंगपोश, पर्दे और नित्य उपयोग की जाने वाली अन्य चीज़ें भी चित्रांकित की जाती थीं। उस काल में तमिलों में बुनाई कला अत्यंत लोकप्रिय थी। संगम साहित्य में, बुने हुए पुष्प के ‘अभिकल्प’ की बार-बार चर्चा हुई है। कपास, रेशम, ऊन और चूहे के बाल से भी कपड़े बुने जाते थे। सूत को रंगने का भी रिवाज था। भारतीय रेशम अपनी बारीकी के कारण रोमन सौदागरों द्वारा भारी मांग में था। ‘बुनाई’ एक घरेलू उद्योग था जिसमें परिवार के सारे सदस्य, विशेषकर महिलाएँ भाग लेती थीं। चर्मकारों, कुंभकारों और अन्य कारीगरों ने भी औधोगिक विकास में योगदान किया।

इस युग में ग्रीक मूर्ति-कला और अन्य विदेशी शिल्पों का भी दक्षिण भारत में प्रवेश हुआ। ‘नेदुनालवादाई’ और ‘पादिरुप्पत्तु’ आदि साहित्यिक कृतियाँ विदेशियों द्वारा बनाए गए सुंदर चिरागों, रोमन पात्रों और मद्य-चषकों का उल्लेख करती हैं। उस अवधि में अमरावती (आंध्र प्रदेश) और श्रीलंका की मूर्तिकलाओं में ग्रीक-रोमन प्रभाव देखे जा सकते हैं।

व्यापार

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में व्यापार का बहुत बड़ा योगदान था। संगम युग में तमिल व्यापारियों के भूमध्यसागरीय देशों, ग्रीस, रोम, मिस्र, चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया और श्रीलंका के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिलप्पादिकरम, मनिमेकलाई और पटिटनप्पालाई आदि साहित्यिक कृतियाँ ग्रीक और रोमन व्यापारियों के साथ सम्बन्धों की बार-बार चर्चा करती हैं।

इस अवधि में भारत-रोम व्यापार अपने उत्कर्ष पर था। प्लिनी, टॉलेमी, स्ट्राबो और पेट्रोनियस आदि विदेशियों के पेरिप्लस आफ ऐरिथ्रिअन और अन्य वृत्तांत उस अवधि के अनेक पत्तनों और व्यापारिक सामग्रियों का उल्लेख करते हैं। अनेक स्थलों पर हुई पुरातात्त्विक खुदाइयों से भी तमिल व्यापारियों एवं अन्य देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि होती है। तमिलनाडु में अनेक स्थानों से उन देशों के सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं।

संगम ग्रंथ मुसिरी, पुहार यकावेरी पट्टिनम और कोड़काई के पत्तनों की चर्चा करते हैं। ये पत्तन उस काल के तीन महान शासकों के हैं। इनके अतिरिक्त पेरिप्लस तोंडी, मुसिरी और कोमारी (कन्याकुमारी), कोल्ची (कोड़की), पोडुके (अरिकामेडु) और सोपात्मा के पत्तनों का उल्लेख करता है।

पेरिप्लस के अनुसार दक्षिण भारत में तीन प्रकार के जलयानों का उपयोग होता था- लघु तटीय जलयान, वृहद तटीय जलयान और समुद्र-यात्रीय जलयान। कोलांडिया नामक वृहद जलयानों की चर्चा मिलती है जो तमिलनाडु के समुद्रतट से चलकर गंगा नदी तक पहुंचते थे।

रोम को निर्यात किए गए पण्यों से अच्छा लाभ होता था। बाघ, तेंदुए, बंदर और मोर आदि जीवित पशु-पक्षी रोम भेजे जाते थे। निर्यात के मुख्य पशु-उत्पादों में हाथीदाँत और मोती शामिल थे। वानस्पतिक उत्पादों में सुगंधित पदार्थ और मसाले गोलकी, अदरख, इलायची, लौंग, काष्ठपफल, इत्यादि, नारियल केला, गुड़, सागौन, चंदन, आर्गरु उरैयार के नाम से ज्ञात विशेष प्रकार के सूती वस्त्र, इत्यादि मुख्य निर्यात-सामग्रियाँ थीं। हीरा, वैदूर्य, इस्पात, अल्पमूल्य रत्न, इत्यादि खनिज भी निर्यात किए जाते थे।

रोम से आयात की जाने वाली वस्तुओं में सिक्के, मूंगा, मध, शीशा, टिन और जेवर शामिल थे। उस अवधि में दक्षिण भारत के अनेक स्थलों पर बनी मालाएँ दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनेक स्थलों पर पाई गई हैं। इससे इन प्रदेशों के बीच समुद्रवर्ती सम्बन्धों की पुष्टि होती है। संगम काल में तमिल प्रदेश के अनेक शहरों में विदेशी व्यापारियों की बस्तियां थीं।

तमिलों की समृद्धि में र्सिफ विदेशी-व्यापार का ही योगदान नहीं था अपितु विभिन्न नगरीय केंद्रों के जुड़ने से स्थानीय व्यापारिक नेटवर्क ने आंतरिक व्यापार को फूलने-फलने के पर्याप्त अवसर प्रदान किए। ‘सिलप्पादिकरम’ में पुहार के बाजार की गालियों का उल्लेख हुआ है। मदुराइकांजी पांडयों की राजधानी मदुराई के बाजार का उल्लेख करता है।

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार का बहुत बड़ा योगदान था। तटीय पत्तनों और शहरों के अतिरिक्त तमिल प्रदेश के भीतरी इलाकों में भी नगर-केंद्रों का विकास हुआ। इनमें मदुरै, करुर, पेरुर, कोडुमानाल, उरैयुर, कांचीपुरम, इत्यादि प्रसिद्ध हैं। एक और पूर्वीतट पर कोरकोई ‘मोती’ निकालने के लिए प्रसिद्ध था तो दूसरी ओर भीतरी इलाके में कोडुमानाल ‘वैदूर्य’ के लिए। दूर-दराज के गाँव भी व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े थे।

भीतरी प्रदेश के व्यापारिक परिवहन के लिए पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले छकड़े प्रमुख साधन थे। व्यापार अधिकांशतः अदला-बदली के आधार पर चलता था। तमिल प्रदेश की भौगोलिक विविधता के कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच उत्पादों का विनिमय आवश्यक था। साथ ही मुद्रा का उपयोग भी होता था।

संगम युगीन अर्थव्यवस्था में व्यापार राजकीय राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत था। व्यापारियों से ‘पारगमन-कर’ लिया जाता था। युद्ध में लूटा गया माल भी राजकीय कोष में वृद्धि करता था किंतु कृषि से होने वाली आय ही युद्ध और राजनीतिक संगठन का मुख्य आधार थी। संगम साहित्य में किसानों से लिए जाने वाले करों की जानकारी नहीं मिलती।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – संगम युग

संगम युग में समाज

संगम साहित्य

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

इस्लाम का जन्म

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मक्का शहर का प्राचीन चित्र

जिस समय भारत भूमि पर वैष्णव धर्म के भीतर विभिन्न दार्शनिक विचारों का विकास नवीन उत्कर्ष को प्राप्त कर रहा था, भारत भूमि से दूर अरब की भूमि पर इस्लाम का जन्म हो रहा था।

पश्चिम एशिया में स्थित अरब प्रायद्वीप को भूमध्य सागर, लाल सागर, अरब सागर और फारस की खाड़ी तीन ओर से घेरे हुए है। कुछ तटवर्ती क्षेत्रों को छोड़़कर यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप रेगिस्तान है।

इस्लाम का अर्थ

इस्लाम अरबी भाषा के ‘सलम’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है आज्ञा का पालन करना। ‘इस्लाम’ का अर्थ है ‘आज्ञा का पालन करने वाला।’ इस्लाम का वास्तविक अर्थ है ‘खुदा के हुक्म पर गर्दन रखने वाला।’ व्यापक अर्थ में इस्लाम एक धार्मिक मत का नाम है, जिसका उदय सातवीं शताब्दी में अरब में हुआ था। इस मत के मानने वाले ‘मुसलमान’ कहलाते हैं। मुसलमान शब्द ‘मुसल्लम-ईमान’ का बिगड़ा हुआ स्वरूप है।

‘मुसल्लम’ का अर्थ है ‘पूरा’ और ‘ईमान’ का अर्थ है ‘दीन या धर्म।’ इसलिए मुसलमान उन लोगों को कहते हैं जिनका दीन इस्लाम में पूरा विश्वास है। वे जो भी कार्य करते हैं, अल्लाह के नाम पर करते हैं और कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व कहते हैं- ‘परम करुणामय एवं दयालु अल्लाह के नाम (बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम) पर यह काम करता हूँ।’

अरब का प्राचीन धर्म

इस्लाम का उदय होने से पहले, अरब वालों के धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे उसी प्रकार इन लोगों के भी प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था। अरब वालों में अन्धविश्वास भी कूट-कूट कर भरा था।

उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं। मक्का में काबा नामक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ किसी समय 360 मूर्तियों की पूजा होती थी। यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरब वालों का विश्वास था कि इस पत्थर को ईश्वर ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इसे बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे।

यह पत्थर आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है। काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले के ऊपर था, कुरेश कबीले में मुहम्मद नामक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और इस्लाम का जन्म हुआ। इस्लाम का जन्म होने से पहले, अरब में विदेशी यहूदियों और इसाइयों की बस्तियां भी थीं। विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग एक दूसरे के सम्पर्क में आते थे और उनके विश्वास एक दूसरे को प्रभावित करते थे।

हजरत मुहम्मद का परिचय

हजरत मुहम्मद का जन्म ई.570 में मक्का के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला तथा माता का नाम अमीना था। मुहम्मद के जन्म से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वे छः साल के हुए तो उनकी माता की, तथा आठ साल के हुए तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। वे भेड़ें चराने लगे इस कारण उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध नहीं हुआ।

फिर भी वे चिंतनशील बालक थे। इतिहासकार नैथेनियन प्लैट ने लिखा है- ‘अरब के तारों भरे आकाश के तले एक अनाथ गडरिया बालक अपना एकान्त समय ईश्वर के बारे में चिन्तन करता हुआ बिताया करता था।’

 वयस्क होने पर मुहम्मद अपने चाचा के साथ ऊँटों के काफिले लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे। इन यात्राओं से उनको मक्का की भौगोलिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्थितियों का ज्ञान हो गया तथा साथ ही उन्हें व्यापार का भी व्यावहारिक ज्ञान हो गया।

यात्राओं और व्यापार के कारण मोहम्मद का सम्पर्क एक धनी विधवा ‘बीबी खदीजा’ से हुआ। बीबी खदीजा ने उनकी ईमानदारी एवं गुणों से प्रभावित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस समय मुहम्मद की आयु लगभग 25 वर्ष और बीबी खदीजा की आयु लगभग 40 वर्ष थी। हजरत मुहम्मद सरल जीवन व्यतीत करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था तक उनके जीवन में कोई विशेष घटना नहीं घटी।

एक दिन उन्हें फरिश्ता जिबराइल के दर्शन हुए जो उनके पास अल्लाह का पैगाम अर्थात् संदेश लेकर आया। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ इसके बाद मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’

अब मुहम्मद ने अपने मत का प्रचार करना आरम्भ किया। उन्होंने अपने ज्ञान का पहला उपदेश अपनी पत्नी खदीजा को दिया। उन्होंने मूर्ति-पूजा तथा बाह्याडम्बरों का विरोध किया। उनकी शिक्षा में यहूदी, ईसाई और हनीफी शिक्षाओं से भिन्न अथवा नया कुछ भी नहीं था किंतु हजरत मुहम्मद का कहना था कि केवल अल्लाह में आस्था रखो। उसकी इच्छा को चुपचाप शिरोधार्य कर लेना चाहिए।

कुरान की सूरत तीन में कहा गया है- ‘अल्लाह इस बात की गवाही देता है कि उस (एक अल्लाह) के सिवाय कोई भी पूज्य नहीं और फरिश्ते तथा इल्म वाले भी गवाही देते हैं कि वही इन्साफ के साथ सब कुछ सम्भालने वाला है। उसके सिवाय और कोई इलाह (पूज्य) नहीं, वह सर्वशक्तिमान और ज्ञानमय है। बेशक दीन तो अल्लाह के नजदीक यही इस्लाम (आत्म समर्पण) है।’

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अरबवासियों ने मुहम्मद के विचारों का स्वागत नहीं किया। उनके अपने कुरैशी कबीले के लोगों ने हजरत मुहम्मद का जबर्दस्त विरोध किया। कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा जिससे विवश होकर 28 जून 622 को हजरत मुहम्मद को अपनी जन्मभूमि मक्का को छोड़ कर मदीना चले गए। यहीं से मुसलमानों का ‘हिजरी संवत्’ आरम्भ होता है। हिजरी अरबी के ‘हज्र’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘जुदा या अलग हो जाना।’ चूंकि हजरत मुहम्मद मक्का से अलग होकर मदीना चले गए इसलिए इस घटना को ‘हिजरत’ कहते है। मदीना (यस्रिब) के खेतिहर नखलिस्तान में हजरत मुहम्मद को अपने विचारों के प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण मिला। मदीना वालों की, मक्का के अभिजात्य लोगों से शत्रुता थी, अतः उन्होंने हजरत मुहम्मद को सहर्ष समर्थन दिया और बहुत से लोग उनके अनुयाई बन गए जो ‘अन्सार’ कहलाए। मुहम्मद मदीना में नौ वर्ष तक रहे। हजरत मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों के साथ ई.630 में मक्का पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। पराजित मक्कावासियों ने आत्समर्पण कर मुहम्मद के धार्मिक विश्वासों को स्वीकार कर लिया। इससे कुरैशी व्यापारियों तथा सरदारों को नुकसान नहीं हुआ अपितु फायदा हुआ। मक्का का एक जातीय व धार्मिक केन्द्र के रूप में महत्त्व पहले से भी अधिक बढ़ गया।

जो कुरैशी पहले हजरत मुहम्मद के इस्लाम को शत्रुतापूर्ण दृष्टि से देखते थे, वे ही अब इस आन्दोलन से जुड़ने लगे और अग्रणी भमिका भी निभाने लगे। फलस्वरूप, थोड़े ही समय में सम्पूर्ण अरब के लोग इस्लाम को मानने लगे। मक्का इस्लाम का तीर्थ स्थान एवं प्रमुख धार्मिक केन्द्र बन गया।  ई.632 में मुहम्मद का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए। इस प्रकार इस्लाम का जन्म हुआ।

हजरत मुहम्मद के उपदेश

हजरत मुहम्मद का एक अल्लाह में विश्वास था, जिसका न आदि है न अन्त, अर्थात् न वह जन्म लेता है और न मरता है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा तथा अत्यन्त दयावान है। मुहम्मद का कहना था कि चूंकि समस्त इंसानों को अल्लाह ने बनाया है इसलिए समस्त इंसान एक समान हैं। मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों से कहा- ‘सच्चे धर्म का यह तात्पर्य है कि तुम अल्लाह, कयामत, फरिश्तों, कुरान तथा पैगम्बर में विश्वास करते रहो और अपनी सम्पत्ति को दीन-दुखियों को खैरात में देते रहो।’

हजरत मुहम्मद के सम्बन्ध में मुसलमानों की मान्यता

मुसलमानों में ‘ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह’ के सिद्धांत में अटल विश्वास है अर्थात् ‘अल्लाह के सिवाय कोई पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।’ अल्लाह में विश्वास रखने के साथ-साथ यह मानना भी जरूरी है कि मुहम्मद अल्लाह के नबी, रसूल और पैगम्बर हैं। पैगाम ले जाने वाले को ‘पैगम्बर’ कहते हैं।

हजरत मुहम्मद, अल्लाह का संदेश पृथ्वी पर लाए, इसलिए वे पैगम्बर कहलाए। ‘नबी’ कहते हैं किसी उपयोगी परम ज्ञान की घोषणा को। हजरत मुहम्मद ने चूँकि ऐसी घोषणा की, इसलिए वे नबी हुए। ‘रसूल’ का अर्थ दूत होता है। हजरत मुहम्मद रसूल हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और इंसान के बीच दूत का काम किया।

कुरान

पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह की ओर से बहुत से ‘इल्हाम’ (दिव्य ज्ञान) हुए थे। मुहम्मद ने जनसामान्य को इस ज्ञान का उपदेश दिया जो ‘कुरान’ में संकलित है। कुरान को ‘कलामे-पाक’ भी कहा जाता है। यह स्वयं ‘अल्लाह ताला’ का कलाम है। यह आसमान से हजरत मुहम्मद पर ‘नाजिल’ किया गया (उतारा गया) है। मान्यता है कि हजरत मुहम्मद द्वारा ‘इल्हाम’ के सम्बन्ध में कही गई बातों से उनके अनुयाई टीपें तैयार कर लेते थे।

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद इन टीपों को ई.650 में खलीफा उस्मान के काल में संकलित कर लिया गया और यह संकलन ही कुरान के नाम से जाना गया। इसे पैगम्बरों के पास ईश्वरीय आदेश पहुँचाने वाले फरिश्ते जिब्राइल द्वारा कुरान अरबी भाषा के ‘किरन’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘निकट या समीप।’ इस प्रकार कुरान वह ग्रन्थ है, जो लोगों को अल्लाह के निकट ले जाता है।

सुन्ना

मुसलमानों के धार्मिक साहित्य का दूसरा भाग सुन्ना कहलाता है। उसमें हजरत मुहम्मद के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों से सम्बन्धित हदीसें अर्थात् अनुश्रुतियां शामिल हैं। हदीसों का संकलन नौंवी शताब्दी में बुखारी, मुस्लिम इब्न अल इज्जाज आदि उलेमाओं ने किया था। कई उलेमाओं ने कुरान और हदीस के आधार पर हजरत मुहम्मद का जीवन चरित्र लिखा।

हजरत मुहम्मद के उपलब्ध जीवन चरित्रों में से सबसे प्राचीन मदीना के निवासी इब्न इसहाक द्वारा आठवीं शताब्दी ईस्वी में लिखा गया। शिया मतावलम्बी ‘सुन्ना’ को नहीं मानते जिसकी रचना पहले तीन खलीफाओं के शासनकाल में पैगम्बर विषयक अनुश्रुतियों से हुई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

इस्लाम के सिद्धांत

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फतहपुर सीकरी की दरगाह

इस्लाम के सिद्धांत हजरत मुहम्मद के उपदेशों पर आधारित हैं तथा ये कुरान के माध्यम से मुसलमानों के लिए उपलब्ध हैं। माना जाता है कि कुरान किसी ने लिखी नहीं थी, अपितु इसकी आयतें इलहाम के माध्यम से मुहम्मद पर आयत हुई थीं, अर्थात् आसमान से उतरी थीं।

मुसलमान के पांच कर्त्तव्य

कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान के पांच कर्त्तव्य हैं- कलमा, नमाज, जकात, रमजान तथा हज।

(1.) कलमा

कलमा अरबी भाषा के ‘कलम’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- शब्द। कलमा का अर्थ होता है- ‘अल्लाह का वाक्य’ अर्थात् जो कुछ अल्लाह की ओर से लिखकर आया है, कलमा है- ‘ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह।’

(2.) नमाज

नमाज का अर्थ खिदमत या बंदगी करना है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- नम तथा आज। ‘नम’ का अर्थ होता है ठण्डा करने वाली या मिटाने वाली और ‘आज’ का अर्थ होता है वासनाएँ अथवा बुरी इच्छाएँ। इस प्रकार नमाज उस प्रार्थना को कहते हैं जिससे मनुष्य की बुरी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं।

नमाज दिन में पाँच बार पढ़ी जाती है- प्रातःकाल, दोपहर, तीसरे पहर, संध्या समय तथा रात्रि में। शादी, गमी, यात्रा, लड़ाई, बेकारी आदि समस्त परिस्थितियों में नमाज पढ़ी जा सकती है। नमाज किसी भी परिस्थिति में मुआफ नहीं हो सकती किंतु नाबालिक बच्चों और पागलों पर नमाज फर्ज नहीं है। शुक्रवार को समस्त मुसलमान मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं। नमाज से पहले ‘वुजू’ करना (हाथ, पांव, मुंह आदि धोना) अनिवार्य है।

(3.) जकात

जकात का शाब्दिक अर्थ होता है- ज्यादा होना या बढ़ना परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ होता है भीख या दान देना। चूंकि भीख या दान देने से धन बढ़ता है इसलिए जो धन दान दिया जाता है उसे जकात कहते हैं। प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का चालीसवाँ हिस्सा खुदा की राह में, अर्थात् दान में दे देना चाहिए।

(4.) रोजा

चाँद का नौवाँ महीना ‘रमजान’ होता है जो अरबी भाषा के रमज शब्द से बना है। इसका अर्थ है शरीर के किसी अंग को जलाना। चूंकि इस महीने में रोजा या व्रत रखकर शरीर को जलाया जाता है इसलिए इसका नाम रमजान रखा गया है।

रोजा में सूर्य निकलने के बाद और सूर्यास्त के पहले खाया-पिया नहीं जाता। रोजा रखने से बरकत (वृद्धि) होती है और कमाई बढ़ती है। रोजा के लिए रमजान का महीना इसलिए चुना गया क्योंकि इसी महीने में कुरान उतरा था। रोगी एवं यात्री के लिए रमजान के महीने में रोजा रखना अनिवार्य नहीं है। वे बाद में उतने ही दिन रोजा रख सकते हैं।

(5.) हज

हज का शाब्दिक अर्थ है इरादा परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ है- मक्का में जाकर बन्दगी करना। प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक बार मक्का जाकर बन्दगी करे। जिल्हज (बकरीद माह) की नौवीं तारीख को ‘अरफात’ (एक स्थान का नाम) के मैदान में उपस्थित होना भी अनिवार्य है।

उपरोक्त पांच सिद्धांतों के अतिरिक्त भी इस्लाम के सिद्धांत हैं जिनका वर्णन कुरान में किया गया है।

अल्लाह

अल्लाह शब्द अरबी के ‘अलह’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- पाक या पवित्र, जिसकी पूजा करनी चाहिए। अल्लाह के सिवाय किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। इस्लाम बहुदेववाद के साथ-साथ मूर्ति-पूजा और प्रकृति पूजा का भी विरोध है। वह ईसाइयों द्वारा प्रतिपादित ईश्वर-त्रय (पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा) के सिद्धांत का भी विरोधी है।

वह ईसा को पैगम्बर तो मानता है किंतु ईश्वर का पुत्र नहीं, क्योंकि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुणों को जोड़ना उसे मनुष्य की श्रेणी में ले जाना है। कुरान में बार-बार कहा गया है- ‘यदि ईश्वर को सन्तानोत्पादक कहोगे तो आकाश फट जाएगा और धरती उलट जाएगी।’ कुरान की मान्यता है कि अल्लाह अर्श (आकाश) पर रहता है और वहाँ उसका सिंहासन भी है। वह निराकार, असीम शक्ति का स्वामी तथा प्रेम और दया का सागर है। वह लोगों को क्षमा करता है।

फरिश्ता

इस्लाम में देवों को ‘मलक’ तथा देवदूतों को ‘फरिश्ता’ कहते हैं। फरिश्ते वे पवित्र आत्माएँ हैं, जो अल्लाह तथा मनुष्य में सामीप्य स्थापित करती हैं। अल्लाह के पास से पैगाम लेकर जो फरिश्ता हजरत मुहम्मद के पास उतरा था, उसका नाम जिबराइल था। हजरत मुहम्मद जिबराइल को चर्म-चक्षु से नहीं, अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से देखते थे।

शैतान एवं जिन्न

शैतान भी देवताओं की तरह मलक-योनी का है किन्तु कुरान शैतान में विश्वास रखने की मनाही करता है। कुरान के अनुसार नीच वासनाएं मनुष्य के पतन का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ‘जिन्न’ नीच वासनाओं को उभारने का काम करते हैं। कुरान में ‘इबलीस’ नामक जिन्न का उल्लेख है जो मनुष्यों को गुमराह करने की कोशिश करता है। अतः उससे बचना चाहिए।

कमायत

अरबी के कयम शब्द से ‘कयामत’ बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है- खड़ा होना तथा व्यावहारिक अर्थ है- दुनिया का मिट जाना। कुरान के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म पहला और आखिरी जन्म है। इस जीवन के समाप्त हो जाने पर, मनुष्य की देह कब्र में दफनाई जाती है। तब भी उसकी आत्मा एक भिन्न प्रकार के कब्र में जीवित पड़ी रहती है और इसी आत्मा को कयामत के दिन उठकर अल्लाह के समक्ष जाना पड़ता है।

कुरान में कयामत का वर्णन इस प्रकार से किया गया है-

‘जब कयामत आएगी, चांद में रोशनी नहीं रहेगी, सूरज और चांद सटकर एक हो जाएंगे और मनुष्य यह नहीं समझ सकेगा कि वह किधर जाए और ईश्वर को छोड़़कर अन्यत्र उसकी कोई भी शरण नहीं होगी ……. जब तारे गुम हो जाएंगे, आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा, पहाड़ों की धूल उड़ जाएगी और नबी अपने निर्धारित क्षण पर पहुँचेंगे ……. न्याय का दिन जरूर आएगा, जब सुर (तुरही) की आवाज उठेगी, जब तुम सब उठकर झुण्ड के झुण्ड आगे बढ़ोगे और स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएंगे ……. कयामत के दिन समस्त आत्माएं अल्लाह के समक्ष खड़ी होंगी और मुहम्मद उनके प्रवक्ता होंगे। तब, प्रत्येक रूह के पुण्य और पाप का लेखा-जोखा लिया जाएगा। पुण्य और पाप को तौलने का काम जिबराइल करेंगे। जिसका पुण्य परिणाम में अधिक होगा, वह जन्नत (स्वर्ग) में जाएगा। जिनके पाप अधिक होंगे, वे दोज़ख (नर्क) में पड़ेंगे।’

जन्नत और दोज़ख

कुरान के अनुसार जन्नत (स्वर्ग) सातवें अर्श (आकाश) पर स्थित है। उसमें एक रमणीय उद्यान है जहाँ झरने और फव्वारे हैं। दूध और शहद की नदियां बहती हैं। वृक्षों के तने स्वर्ण के हैं और उनमें स्वादिष्ट फल लगते हैं। स्वर्ग में ‘हूर-यूल-आयून’ जाति की सत्तर युवतियां हैं जिनकी आंखें काली और बड़ी हैं। पुण्यात्माओं की सेवा करने के लिए ‘गिलमा’ जाति के सुन्दर लड़के रहते हैं। इसके विपरीत दोज़ख की कल्पना अत्यंत भयानक तथा विकराल रूप में की गई है। कुरान के अनुसार जन्नत के सुख केवल पुरुषों के लिए हैं, स्त्रियों के लिए नहीं।

कर्मफलवाद में विश्वास

इस्लाम के सिद्धांत की सबसे बड़ी विशेषता कर्मफल का सिद्धांत है जो अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार होने वाली ‘अल्ल्लाह की मेहरबानी’ में विश्वास करता है। कुरान के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों का परिणाम अवश्य मिलेगा। जिसने भी कण-मात्र सुकर्म किया है, वह भी अपनी आंखों से देखेगा। कयामत के बाद स्वर्ग और नर्क का निर्णय इसी जन्म में किए गए कर्मों के फलानुसार ही होता है। कुरान कहता है- ‘अगर तुम ज्ञान से देखते तो तुम यहीं नर्क को भी देख सकते थे।’ कुरान के अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य ‘लिका-अल्लाह’ (ईश्वर मिलन) है। यह मिलन सम्भवतः सुकर्मों से ही सम्भव हो सकता है।

नैतिक सिद्धान्त

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इस्लाम के नैतिक सिद्धान्त कुरान में लिखी गई बातों पर आधारित हैं। बहुत से लोग इन सिद्धांतों की अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं। उनकी व्याख्याएं जिन पुस्तकों में लिखी गई हैं, उन्हें हदीस कहा जाता है। प्रत्येक मुसलमान से न्यायप्रिय होने, भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से चुकाने, उदारता दिखाने, गरीबों की मदद करने की अपेक्षा की जाती है। इस्लाम में वैवाहिक सम्बन्धों पर पितृसत्तात्मक जीवन पद्धति की छाप है। अल्लाह ने स्त्री को पुरुष के लिए बनाया है। उसे पुरुष से दबकर रहना चाहिए। साथ ही कुरान में स्त्रियों के मानवीय अधिकारों को भी मान्यता दी गई है। पति द्वारा पत्नी से अनावश्यक क्रूर व्यवहार किए जाने की भी निन्दा की गई है। स्त्रियों को स्त्री-धन रखने का अधिकार और दयाधिकार प्राप्त हैं। कुरान के अनुसार अल्लाह के सामने समस्त मुसलमान बराबर हैं। अमीरी और गरीबी प्राकृतिक चीजें हैं जिन्हें स्वयं अल्लाह ने बनाया है। गरीबों के निर्वाह के लिए इस्लाम में जकात दिए जाने की व्यवस्था है। कुरान मनुष्य की निजी सम्पत्ति का समर्थन करता है। व्यापारिक मुनाफे को उचित मानता है जबकि सूदखोरी की निन्दा की गई है- ‘बेचने (व्यापारी) को तो अल्लाह ने हलाल (जाइज) किया है और सूद (ब्याज) को हराम (नाजाइज)।’ कर्जदार को बन्धुआ बनाने का निषेध है।

मुसलमानों पर यहूदी परम्पराओं का प्रभाव

यहूदी धर्म, इस्लाम से पुराना है। यहूदियों की कुछ परम्पराएं मुसलमानों ने भी अपना लीं। यहूदियों की तरह मुसलमानों में भी लड़कों का अनिवार्यतः खतना किया जाता है। अन्तर यह है कि मुसलमान, लड़के का खतना सामान्यतः सात से दस वर्ष की आयु में करते हैं जबकि यहूदी, जन्म के कुछ समय बाद। सूअर का मांस न खाना भी मुसलमानों ने यहूदियों से अपनाया है। दोनों ही धर्मों में ईश्वर, मनुष्यों एवं पशुओं की मूर्ति या चित्र बनाना एवं मूर्ति-पूजा करना वर्जित है। दोनों धर्मों में शराब पीना वर्जित है।

शिया सम्प्रदाय

इस्लाम के अनुयाई दो सम्प्रदायों में विभक्त हैं- शिया और सुन्नी। ‘शिया’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘गिरोह’ परन्तु व्यापक अर्थ में शिया उस सम्प्रदाय को कहते हैं जो हजरत मुहम्मद के दामाद ‘हजरत अली’ को हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, पहले तीन खलीफाओं को नहीं। शिया सम्प्रदाय का झण्डा काला होता है। शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम की दसवीं तारीख को ताजिये निकालते हैं।

सुन्नी सम्प्रदाय

‘सुन्ना’ को मानने वाले तथा अबूबक्र से खलीफाओं की गणना करने वाले ‘सुन्नी’ कहलाए। ‘सुन्नी’ शब्द अरबी के ‘सुनत’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है- मुहम्मद के कामों की नकल करना। व्यावहारिक रूप में सुन्नी उस सम्प्रदाय को कहते है, जो प्रथम तीन खलीफाओं को ही हजरत मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, हजरत मुहम्मद के दामाद अली को नहीं। सुन्नी सम्प्रदाय का झण्डा सफेद होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

खलीफाओं का उत्कर्ष

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खलीफा हारून रशीद का काल्पनिक चित्र

इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ। खलीफाओं के प्रयत्नों से इस्लाम अरब की भूमि से बाहर निकल कर पूरी दुनिया में फैल गया।

‘खलीफा’ अरबी के ‘खलफ’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘लायक बेटा’ अर्थात् योग्य पुत्र परन्तु खलीफा का अर्थ है जाँ-नशीन या उत्तराधिकारी। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जो उनके उत्तराधिकारी हुए, वे खलीफा कहलाए। प्रारम्भ में खलीफा का चुनाव, हजरत मुहम्मद के अनुयाइयों की सहमति से होता था परन्तु बाद में यह पद आनुवंशिक हो गया।

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद हजरत मुहम्मद के ससुर अबूबकर प्रथम खलीफा चुने गए जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े थे। अबूबकर के प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम का प्रचार हुआ तथा खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ। अबूबकर के मर जाने पर 634 ई.में उमर को निर्विरोध खलीफा चुना गया। उमर ने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा ने नहीं की।

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उसने इस्लाम के अनुयाइयों की एक विशाल तथा योग्य सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा इस्लाम प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। जिन देशों पर उसकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी और इस्लाम का प्रचार आरम्भ हो जाता था। इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया। उमर के बाद उसमान खलीफा हुआ परन्तु थोड़े ही दिन बाद उसकी विलास-प्रियता के कारण उसकी हत्या कर दी गई और उसके स्थान पर हजरत मुहम्मद के दामाद अली को खलीफा चुना गया। कुछ लोगों ने उसका विरोध किया। इस प्रकार गृह-युद्ध आरम्भ हो गया और इस्लाम के प्रचार में भी शिथिलता आ गई। अन्त में अली का वध कर दिया गया। अली के बाद उसका पुत्र हसन खलीफा चुना गया परन्तु उसमें इस पद को ग्रहण करने की योग्यता नहीं थी। इसलिए उसने इस पद को त्याग दिया। अब सीरिया का गवर्नर मुआविया, जो खलीफा उमर के वंश से था, खलीफा चुन लिया गया। हसन ने मुआविया के पक्ष में खलीफा का पद इस शर्त पर त्यागा था कि खलीफा का पद निर्वाचित होगा, आनुवांशिक नहीं, परन्तु खलीफा हो जाने पर मुआविया के मन में कुभाव उत्पन्न हो गया और वह अपने वंश की जड़ जमाने में लग गया। उसने मदीना से हटकर दमिश्क को खलीफा की राजधानी बना दिया।

चूंकि वह उमर के वंश का था, इसलिए दश्मिक के खलीफा उमैयद कहलाए।

मुआविया लगभग बीस वर्ष तक खलीफा के पद पर रहा। इस बीच में उसने अपने वंश की स्थिति अत्यन्त सुद्धढ़ बना ली। अली के पुत्र हसन के साथ उसने जो वादा किया था, उसे तोड़ दिया और अपने पुत्र यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इससे बड़ा अंसतोष फैला। इस अंसतोष का नेतृत्व अली के पुत्र तथा हसन के भाई इमाम हुसैन ने ग्रहण किया।

उसने अपने थोड़े से साथियों के साथ फरात नदी के पश्चिमी किनारे के मैदान में उमैयद खलीफा की विशाल सेना का बड़ी वीरता तथा साहस के साथ सामना किया। इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख को तलवार के घाट उतार दिया गया। जिस मैदान में इमाम हुसैन ने प्राण त्यागे, वह कर्बला कहलाता है। कर्बला दो शब्दों से मिलकर बना है- कर्ब तथा बला। कर्ब का अर्थ होता है मुसीबत और बला का अर्थ होता है दुःख।

चूंकि इस मैदान में हजरत मुहम्मद की कन्या के पुत्र का वध किया गया था, इसलिए इस मुसीबत और दुःख की घटना के कारण इस स्थान का नाम कर्बला पड़ गया। मुहर्रम मुसलमानों के वर्ष का पहला महीना है। चूंकि इस महीने की दसवीं तारीख को इमाम हुसैन की हत्या की गई थी, इसलिए यह शोक और रंज का महीना माना जाता है। मुसलमान लोग मुहर्रम के दिन शोक का त्यौहार मनाते हैं।

इमाम हुसैन के बाद अब्दुल अब्बास नामक व्यक्ति ने इस लड़ाई को जारी रखा। अन्त में वह सफल हुआ और उसने उमैयद वंश के एक-एक व्यक्ति का वध कर दिया। अब्बास के वंशज अब्बासी कहलाए। इन लोगों ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। बगदाद के खलीफाओं में हारूँ रशीद का नाम बहुत विख्यात है, जो अपनी न्याय-प्रियता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

अन्त में तुर्कों ने बगदाद के खलीफाओं का अन्त कर दिया। खलीफाओं ने मिस्र में जाकर शरण ली। खलीफा अब इतिहास के नेपथ्य में चले गए थे किंतु खलीफाओं ने ही इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया था और इन्हीं लोगों ने भारत में भी इसका प्रचार किया था।

इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप

इस्लाम आरम्भ से ही राजनीति तथा सैनिक संगठन से सम्बद्ध रहा। हजरत मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था। जब ई.622 में पैगम्बर मुहम्मद मक्का से मदीना गए तब वहाँ पर उन्होंने अपने अनुयाइयों की एक सेना संगठित की और मक्का पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सैन्य-बल से मक्का तथा अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की।

मुहम्मद न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया। पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य का शासन कुरान के अनुसार होने लगा।

इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों के साथ अन्याय तथा अत्याचार किया जाने लगा। खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयाइयों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। इसका परिणम यह हुआ कि जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं विजय के लिए गईं, वहाँ पर इस्लाम का बल-पूर्वक प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा बलात् तलवार के बल पर किया गया। परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई। खलीफाओं का उत्कर्ष इस रक्तपात को पूरी दुनिया में ले गया।

जेहाद

इस्लामी सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए जेहाद अर्थात् धर्म-युद्ध का नारा लगाते थे। इस्लाम का एक निर्देश इस्लाम की खातिर पवित्र युद्ध (जिहाद) से सम्बन्ध रखता है। कुरान में इस निर्देश को सूत्रबद्ध किया गया है- ‘वर्ष में आठ माह बहुदेववादियों और विधर्मियों से लड़ना, उनका संहार करना और उनकी जमीन-जायदाद को छीन लेना चाहिए।’

बाद में मुस्लिम उलेमाओं ने जिहाद से सम्बन्धित निर्देशों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की। बहुदेवपूजकों के बारे में कुरान का रवैया बहुत सख्त है। उसमें कहा गया है- ‘हे ईमानवालों! अपने आस-पास के काफिरों से लड़े जाओ और चाहिए कि वह तुमसे अपनी बाबत सख्ती महसूस करें, और जानें कि अल्लाह उन लोगों का साथी है जो अल्लाह से डरते हैं।’

यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है कि यदि वे अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। क्लेन नामक विद्वान ने जिहाद का अर्थ ‘संघर्ष’ किया है और इस संघर्ष के उसने तीन क्षेत्र माने हैं- (1) दृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष (2) अदृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष और (3) इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष।

‘रिलीजन ऑफ इस्लाम’ के लेखक मुहम्मद अली का मत है कि- ‘इस शब्द का अर्थ इस्लाम के प्रचार के लिए युद्ध करना नहीं है, इसका अर्थ परिश्रम, उद्योग या सामान्य संघर्ष ही है। हदीस में हज करना भी जिहाद माना गया है।

नबी ने कहा है- सबसे अच्छा जिहाद हज में माना है किंतु व्यवहार में, आगे चलकर काजियों ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया। उन्होंने समस्त विश्व को दो भागों में बांट दिया- (1.) दारूल-इस्लाम (जिस भाग पर मुसलमानों की हुकूमत थी, उसे शान्ति का देश कहा गया, और (2.) दारूल-हरब (युद्ध स्थल) जिस भाग पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत थी। उन्होंने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित किया कि ऐसे देशों को जीत कर इस्लाम का झण्डा गाड़ना जाहिदों का परम कर्त्तव्य है।’

इन भावनाओं के कारण जेहाद प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। इस कारण इस्लाम जिस भी देश में गया, उस देश के समक्ष साम्प्रदायिकता की समस्या की नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि खलीफाओं का उत्कर्ष इस्लाम के लिए तो लाभकारी सिद्ध हुआ किंतु अन्य धर्मावलम्बियों के लिए बहुत खतरनाक सिद्ध हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद के जीवन काल में ही होना आरम्भ हो गया था। मुहम्मद के प्रयासों से अरब के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। मुहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफाओं का उत्कर्ष होने पर खलीफाओं के नेतृत्व में इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तेजी से हुआ।

अरबवासियों ने संगठित होकर इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। शीघ्र ही उन्होंने भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र आदि देशों पर अधिकार कर लिया।

इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया। फिर उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद इस्लामी सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में इस्लामी सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा।

इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार किया। मध्य एशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया।

इसके बाद ई.712 में उन्होंने भारत के सिन्ध प्रदेश पर अधिकार किया। ई.750 में उन्होंने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का इस्लामी राज्य स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था।

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तेजी से होने के कारण

अरब के एक छोटे नगर में उत्पन्न इस्लाम विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बन गया। इस्लामी साम्राज्य का प्रसार तीव्र गति से होने के कई कारण थे-

(1.) इस्लाम की कट्टरता ने इस्लाम के तीव्र प्रसार में सहायता की। हजरत मुहम्मद ने मदीना पहुँचकर अपने अनुयाइयों को सैनिकों के रूप में संगठित किया तथा उन्हें आदेश दिया कि कुरान में अविश्वास रखने वाले को बलात् मुसलमान बना लिया जाए और यदि वे इस्लाम को स्वीकार न करें तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए। पैगम्बर के आदेश का पालन किया गया तथा सबसे पहला आक्रमण मक्का पर किया गया।

मक्का विजय के बाद हर जगह यही उदाहरण दोहराया गया। रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है- ‘जहाँ-जहाँ इस्लाम के उपासक गए, उन्होंने विरोधी सम्प्रदाय के सामने तीन रास्ते रखे- या तो कुरान हाथ में लो और इस्लाम कबूल करो या जजिया दो और अधीनता स्वीकार करो। यदि दोनों में से कोई बात पसन्द न हो तो तुम्हारे गले पर गिरने के लिए हमारी तलवार प्रस्तुत है।

ये बड़े ही कारगर उपाय रहे होंगे किन्तु यह समझ में नहीं आता कि सिर्फ इन्हीं उपायों से इस्लाम इतनी जल्दी कैसे फैल गया।‘ इस्लाम के लिए युद्ध करने वाले मुसलमानों को कुरान का आश्वासन था कि उनके पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और उन्हें स्वर्ग में खूब आनन्द मिलेगा।

(2.) अरब की तात्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। उस समय सारा अरब अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और दुराचार का केन्द्र बना हुआ था। अरबों में निर्धनता व्याप्त थी जिसके कारण उनमें लालच भी बहुत अधिक था और धन प्राप्त करने का हर उपाय अच्छा समझा जाता था।

जुआ, शराबखोरी, और वेश्यागमन भंयकर रूप से प्रचलित थे। विवाह जैसी पवित्र संस्था का महत्त्व भी जाता रहा और समाज में यौन-सम्बन्धों की कोई नैतिक व्यवस्था नहीं रह गयी थी। समस्त अरब लोग बहुदेववादी और घोर मूर्तिपूजक थे। ऐसी स्थिति में हजरत मुहम्मद द्वारा चलाया गया- अन्धविश्वासों से रहित, आडम्बरहीन, सरल, बोधगम्य तथा एक निराकार ईश्वर की उपासना वाला इस्लाम शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

(3.) इस्लाम में सामाजिक एवं धार्मिक समानता की विचारधारा भी इस्लामी साम्राज्य का प्रसार होने का बड़ा कारण था। इस्लाम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है तथा प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक अधिकार एक समान हैं। समस्त मुसलमानों को एक अल्लाह का बन्दा समझा गया है। इसलिए इस्लाम के अनुयाई परस्पर बन्धु हैं तथा उनमें ऊँच-नीच की भावना नहीं है।

इस समानता के सिद्धान्त के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। जिस भी समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर के लोगों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे, उन्होंने समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस कारण इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ।

(4.) जिस समय इस्लाम के अनुयाई इस्लाम के प्रसार में लगे हुए थे, उस समय रोमन साम्राज्य खोखला हो चुका था और वहाँ विलासिता चरम पर थी। ईरानी साम्राज्य भी विलासिता के दलदल में डूबा हुआ था। राज्य के अधिकारी और धर्माधिकारी जनता का भयानक शोषण करते थे। इन शोषित राज्यों की जनता ने इस्लामी सेनाओं को अपनी मुक्तिदाता समझा।

इतिहासकार मानवेन्द्र राय ने लिखा है- ‘अरब आक्रमणकारी वीर जहाँ भी गए, जनता ने उन्हें अपना रक्षक और मुक्तिदाता मानकर उनका स्वागत किया क्योंकि कहीं तो जनता लोभी शासकों के भ्रष्टाचार के नीचे पिस रही थी तो कहीं ईरानी तानाशाहों के जुल्मों से त्रस्त थी और कहीं ईसाइयत का अन्धविश्वास उन्हें जकड़े हुए था।’

(5.) अरबों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति ने भी इस्लाम की सफलता में योगदान दिया। छठी शताब्दी में अरब में कारवाँ व्यापार का ह्रास हो रहा था जिससे आर्थिक सन्तुलन भंग हो गया। कारवाँओं से होने वाली आमदनी बन्द हो जाने पर खानाबदोश अरब, खेती करने लगे। इससे जमीन की माँग बढ़ रही थी और पड़ौसी राज्यों की उपजाऊ भूमि को हस्तगत करना सबसे आसान तरीका था।

जिस क्षेत्र को भी वे हस्तगत करते थे, वहाँ के लोगों से कर वसूल करते थे। लाखों गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को इसलिए स्वीकार कर लिया ताकि उन्हें कर नहीं चुकाना पड़े। इस्लाम स्वीकार करके वे इस्लामी राज्य में नौकरियाँ प्राप्त करने के पात्र बन जाते थे। यदि वे दास अथवा अर्द्धदास होते तो धर्म-परिवर्तन से दासता से मुक्त कर दिए जाते थे। इस प्रकार विजित क्षेत्रों की निर्धन जनता ने इस्लाम सहर्ष स्वीकार कर लिया।

(6.) इस्लाम के प्रारम्भिक नेताओं के महान् व्यक्तित्त्व तथा आदर्श पूर्ण जीवन ने इस्लाम की लोकप्रियता में बड़ा योगदान दिया। अबूबक्र, उमर उस्मान और अली, तीनों ही नबी के चुने हुए साथी थे और उन्होंने भी मुहम्मद की ही तरह अभाव और दरिद्रता में जीवन व्यतीत किया था। उनके न तो महल या अंगरक्षक थे और न समसामयिक बादशाहों जैसे ठाट-बाट थे। प्रत्येक मुसलमान सीधे ही उन तक पहुँच सकता था।

उन्होंने सादगी, सच्चरित्रता, वीरता और वैराग्य का ऐसा सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया कि इस्लाम का आचार पक्ष बहुत ऊँचा उठ गया। सैनिक अभियान हो अथवा तीर्थ यात्रा, ये खलीफा लोग सर्वत्र न्याय प्रदान करते चलते थे। उन्होंने अरबों में प्रचलित कुरीतियों को दूर किया और राज्य के कर्मचारियों को निर्दयी और जुल्मी होने से रोका। कुछ खलीफा दक्ष सेनापति तथा कुशल सैन्य संचालक भी थे। इन्हीं कारणों से इस्लाम का शीघ्र प्रसार सम्भव हो सका।

(7.) प्रत्येक मुसलमान वैधानिक रूप से चार पत्नियाँ रख सकता है। इस बहु-विवाह का परिणाम यह निकला कि मुसलमान जहाँ भी गए, उन्होंने गैर-स्त्रियों से विवाह कर लिए। भारत में आकर भी मुसलमानों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किए। हिन्दू स्त्रियों से मुस्लिम बच्चे पैदा हुए जिनके कारण देश में इस्लाम का तेजी से प्रसार हुआ। हिन्दू स्त्रियों से उत्पन्न मुसलमान, भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए अधिक कट्टर सिद्ध हुए।

(8.) भारत में तुर्कों के आने के समय यहाँ की राजनीतिक दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। देश में केन्द्रीय सत्ता एवं राजनीतिक एकता का अभाव था। छोटे-बड़े राज्यों के राजा आपसी संघर्ष में अपनी शक्ति क्षीण कर रहे थे। इस समय हिन्दू समाज भी पतनोन्मुख था और उसे उत्साह से भरी हुई सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। सामान्य जनता में राजवंशों के उत्थान एवं पतन के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं थी। हिन्दू समाज की जाति-व्यवस्था ने जनसामान्य को विभक्त कर रखा था।

निम्न कही जाने वाली जातियों का जीवन बहुत ही दयनीय था। निम्न जाति के अधिकांश लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके विपरीत इस्लाम ने मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधा तथा काफिरों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों को जिहाद का जामा पहना दिया। मुस्लिम सुल्तानों ने कुरान के आधार पर शासन किया और इस्लाम का प्रसार किया। के. एस. लाल ने लिखा है- ‘भारत में सुल्तानों ने अपनी धार्मिक नीति से हिन्दुओं की संख्या एक-तिहाई कर दी।’

इस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार

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मुस्लिम अरब व्यापारियों ने सातवीं शताब्दी से ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया। दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक ‘अहमद’ का गुलाम ‘अलप्तगीन’ गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया। ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य ‘लमगान’ तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया। लमगान के शासक जयपाल ने उससे सन्धि कर ली किन्तु कुछ समय बाद जयपाल ने सन्धि की अवहेलना शुरू कर दी।

अतः ई.991 में सुबुक्तगीन ने पुनः हिन्दूशाही राज्य पर आक्रमण करके लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया। महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए।

महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था। उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना।

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का घर) तथा ‘दारुल हरब’ (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे ‘दारुल कुफ्र’ भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

(1.) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

(2.) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

(3.) दारुल दावा- (Proselytizing or preaching of Islam) अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है। 

इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया।

उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ। एक तीसरा और संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् ‘रक्षित-विधर्मी’ घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या का प्रवेश

इस्लाम ने तलवार के जोर पर बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाना आरम्भ कर दिया। जिन हिन्दुओं ने मुसलमान बनने से मना किया, उनका सर्वस्व हरण करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। मुस्लिम मुल्लाओं और मौलवियों ने मुसलमानों को समझाया कि भारत ‘दारुल हरब’ है तथा जेहाद के माध्यम से काफिरों का सफाया करके इसे ‘दारुल इस्लाम’ बनाना है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

सूफी मत

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सूफी मत

भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघों में विभक्त थे। उनके अलग-अलग केन्द्र थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

सूफी मत का आदि स्रोत

सूफी मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधारशिला रति भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और मुहम्मद साहब ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी ‘इश्क मजाजी’ को ‘इश्क हकीकी’ की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट है। सूफी मत जीवन का क्रियात्मक धर्म तथा नियम है।

सूफी मत का अर्थ

वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी मत अथवा ससव्वुफ इन्हीं संतों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत कहे जाते हैं-

(1.) सूफी शब्द अरबी भाषा के सफा शब्द से बना है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो।

(2.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है। अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।

(3.) इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे।

(4.) अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है। यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा एवं सरल जीवन-यापन करने वाले संत (इसमें ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन इस्लामी संतों ने भी इसे अपना लिया। वे इसी वस्त्र को धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे।

(5.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कुछ उल्लेख इसके सम्बन्ध में मिलते हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।

चिश्तिया सम्प्रदाय एवं उसके प्रमुख सूफी संत

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे। सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये। ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी सम्प्रदाय का फकीर था। इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर अल्लाह की आराधना का उपदेश दिया करते थे। मुसलमानों के धर्म गुरु पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था। ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम धर्म से अलग माना। ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लें। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है। मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी मत के मूल में प्रेम का निवास है।

ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफीमत के संसर्ग का परिणाम है।

मोइनुद्दीन चिश्ती

गौस उल आजम के शिष्य मोइनुद्दीन का जन्म 1142 ई. में सीस्तान में हुआ था। 1186 ई. में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें। सूफी दरवेश जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति-रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे।

वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये। इनमें से मोइनुद्दीन भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन, गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर आये। उन्होंने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।

शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया किंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।

मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ

मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुःखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो। एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे फकीर के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की।

ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता। तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थना की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और समस्त के ज्ञान के लिये लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी। शेख हमीदुद्दीन ने फकीर के जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-

(1.) किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।

(2.) किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।

(3.) सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।

(4.) यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।

(5.) किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।

(6.) यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।

(7.) यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।

(8.) इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।

(9.) व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।

ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग अल्लाह की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये। हिन्दू-धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है। जब हिंदुओं को उसी प्रेम के दर्शन सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे।

वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों के अनुसार 1227 ई. में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि 1235-36 ई. के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं।

बाबा फरीदुद्दीन

बाबा फरीदुद्दीन दूसरे प्रसिद्ध सूफी संत थे। फरीद का जन्म काबुल के राजवंश में हुआ था। फरीद ने धन-वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया। सतलज नदी के तट पर स्थित एक सड़क जो मुल्तान से दिल्ली आती है बाबा फरीद अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। उनके विचार बड़े ऊँचे थे। उनके उपदेशों से हिन्दू तथा मुसलमान दोनों प्रभावित हुए थे। 1265 ई. में 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

गेसू दराज

सूफी संत गेसू दराज भी विख्यात सूफी थे। वे अपने लम्बे बालों के लिये प्रसिद्ध थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था परन्तु वे दक्षिण भारत चले गये और बहमनी राज्य में स्थायी रूप से निवास करने लगे। गेसू दराज का ज्ञान अत्यन्त व्यापक था। कहा जाता है कि उन्होंने 175 पुस्तकों की रचना की। 1422 ई. में 101 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

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सूफी मत

गुरु नानक एवं उनका धर्म

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गुरु नानक एवं उनका धर्म

पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में गुरु नानक ने गुरुमत की खोज की। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, बाह्य आडम्बरों का विरोध किया तथा एकेश्वरवाद एवं निराकारवाद का प्रचार किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके सिद्धांतों को सिक्ख धर्म के रूप में मान्यता मिली। 

गुरु नानक

सिक्खों के प्रथम गुरु ‘नानक देव’ सिक्ख धर्म के प्रवर्त्तक थे। उनका जन्म ई.1469 में अविभक्त पंजाब के तलवण्डी गांव में हुआ था। नानक देव ने ‘गुरमत’ को खोजा और गुरमत की शिक्षाओं को स्वयं देश-देशांतर जाकर फैलाया। गुरु नानक एकेश्वरवादी और निराकारवादी थे तथा जाति-पाँति, अवतारवाद और मूर्ति-पूजा को नहीं मानते थे।

उनकी शिक्षाएँ ‘आदि ग्रन्थ’ में पाई जाती हैं। गुरु नानक बगदाद भी गए जहाँ उनका बड़ा स्वागत-सत्कार हुआ। बगदाद में उनका एक मन्दिर भी है जिसमें तुर्की भाषा में एक शिलालेख मौजूद है। गुरु नानक के सैयद-वंशी शिष्यों के उत्तराधिकारी अब भी उस मन्दिर की रक्षा करते हैं।  गुरु नानक की वेशभूषा और रहन-सहन सूफियों जैसा था। गुरु नानक और शेख फरीद के बीच गाढ़ी मैत्री थी।

कुछ विद्वानों का अनुमान है कि गुरु नानक पर इस्लाम का प्रभाव अधिक था। हिन्दू और मुसलमान दोनों ने गुरु नानक का शिष्यत्व स्वीकार किया। गुरु नानक जाति-पांति को नहीं मानते थे इसलिए उनके अनुयाइयों में समस्त जातियों के लोग सम्मिलित थे। उनके शिष्यों में समाज के निर्धन एवं उपेक्षित लोगों की बहुलता थी। उनके अनुयाइयों को ‘सिक्ख’ कहा जाता था। यह ‘शिष्य’ शब्द का पंजाबी भाषा में रूपान्तर था।

गुरु नानक का दर्शन

गुरु नानक का मत भारतीय वेदान्त दर्शन पर आधारित है तथा उसमें ‘तसव्वुफ’ के भी लक्षण हैं। गुरु नानक की उपासना के चारों अंग- सरन खंड, ज्ञान खंड, करम खंड तथा सच खंड; सूफियों के चार मुकामात- शरीअत, मारफत, उकबा और लाहूत से ही निकले हैं। गुरु नानक का सिद्धान्त वेदान्त के उस रूप पर आश्रित था जिसे तंत्र ने प्रस्तुत किया था और मध्य-काल के प्रायः समस्त सन्त सम्प्रदायों ने स्वीकार किया था।

वे ‘एक-ओंकार’ या ‘अकाल पुरुष’ को चरम सत्य मानते थे। अकाल पुरुष ने ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ की सृष्टि की और अपना हुकुम चलाया। प्रकृति, माया, मोह, गुण, देवता, राक्षस और सारा जगत् उसी से बना है। इसलिए सारी प्रकृति और सारा जगत सत्य है। इसके सब काम अंहकार से चलते हैं किंतु व्यक्तिगत अंहकार को ही सब कुछ मान बैठना पाप की जड़ है।

अतः मनुष्य को अपने कर्म द्वारा अपने मन से इस व्यक्तिगत अंहकार को निकालकर समष्टिगत अंहकार अर्थात् सृष्टि की सम्पूर्णता को आत्मसात करना चाहिए जो अकाल पुरुष की अभिव्यक्ति है। गुरु नानक कहते हैं- ‘मन कागज है और हमारे कर्म स्याही हैं, पुण्य और पाप इस पर लिखा हुआ है। हमें अपने कर्म की स्याही द्वारा मन के कागज पर लिखे हुए पुण्य के लेख को बढ़ाना है और पाप के लेख को मिटाना है। इसके लिए गुरु की सहायता आवश्यक है।’

गुरु नानक का मुख्य उपदेश था कि ईश्वर सत्य है तथा एक है, उसी ने सबको बनाया है। हिन्दू-मुसलमान सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के लिए एक-समान हैं। मनुष्य को अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि परमात्मा के दरबार में उसे लज्जित न होना पड़े। गुरुनानक के बाद नौ अन्य गुरुओं ने भी गुरमत का प्रचार किया।

पंजाब में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों ने सिक्ख गुरुओं से दीक्षा ग्रहण की। नानक का कहना था कि संसार में रह कर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए।

मोहसिन फानी ने लिखा है- ‘सिक्खों में ऐसा कोई नियम नहीं है कि ब्राह्मण खत्री का शिष्य न हो, नानक खुद खत्री थे। यही नहीं उन्होंने खत्रियों को भी जट्टों से निचली श्रेणी दी है, जो वैश्यों में सबसे छोटे माने जाते हैं।’

गुरु के सिक्ख खेती, नौकरी, व्यापार या दस्तकारी करते हैं और अपनी शक्ति के अनुसार ‘मसण्ड’ अर्थात् गुरु के प्रतिनिधि को ‘नजर’ अर्थात् भेंट देते हैं। वे ‘नाम जपन अते वण्ड के छकन’ (नाम जपने और बाँटकर खाने) को अपना विशेष नियम समझते हैं।

हिन्दुओं के सम्बन्ध में गुरु नानक का मत था- ‘हिन्दुओं में से केाई भी वेद-शास्त्रादि को नहीं मानता, अपितु अपनी बड़ाई करने में लगा रहता है। उनके कान एवं हृदय सदा तुर्कों की धार्मिक शिक्षाओं से भरते जा रहे हैं। ये लोग मुसलमान कर्मचारियों के निकट एक-दूसरे की निन्दा करके सबको कष्ट पहुँचा रहे हैं। वे समझते हैं कि रसोई के लिए चौका लगा देने मात्र से हम पवित्र हो जाएंगे।’

मुस्लिम शासन के लिए कर उगाहने वाले हिन्दू कर्मचारियों को लक्ष्य करके गुरु नानक ने कहा है- ‘गौ तथा ब्राह्मणों पर कर लगाते हो और धोती, टीका और माला जैसी वस्तुएँ धारण किए रहते हो। तुम अपने घर पर तो पूजा-पाठ करते हो और बाहर कुरान के हवाले दे-देकर तुर्कों के साथ सम्बन्ध बनाए रहते हो। ये पाखण्ड छोड़ क्यों नहीं देते?’

उपरोक्त पंक्तियों में हिन्दूओं की आलोचना तो है ही किन्तु हिन्दू-धर्म में सुधार की इच्छा भी है। सिक्ख धर्म का सारा इतिहास हिन्दुत्व के लिए इस तड़प से परिपूर्ण रहा है।

गुरु नानक ने मुसलमानों को लक्ष्य करके कहा- ‘दया को तुम अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को अपनी नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित और न्यायसंगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मान ले, शिष्टाचार को अपना रोजा मान ले और इस प्रकार तू मुसलमान बन जाएगा।’

उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- ‘पहली नमाज सच्चाई है, दूसरी इन्साफ है, तीसरी दया है, चौथी नेक-नीयत है और पाचँवी अल्लाह की बंदगी है।’ गुरु नानक मुसलमानों द्वारा की जाने वाली हिंसा से बहुत व्यथित रहते थे। उनके समय में हिंदुओं का बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके बाबरी’ में इस नरसंहार का वर्णन किया है। उसने हिन्दुओं के सिरों की मीनारें चिनवाईं।

बाबरनामा में ऐसी बहुत सी घटनाएं लिखी गई हैं। सिक्खों के 16वीं सदी के ग्रंथों में सिक्खों और मुसलमानों के बीच हुए हिंसक युद्धों के उल्लेख मिलते हैं। बाबर के शासनकाल में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के गुरु नानकदेव प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने हिंदुओं पर हुए अत्याचारों से व्यथित होकर परमात्मा को सम्बोधित करते हुए लिखा है- ‘ऐती मार पई कुरलाणे, तैं कि दर्द न आया?

सिक्ख धर्म की स्थापना

गुरु नानक का पन्थ ‘सिक्ख धर्म’ के नाम से विख्यात हुआ। नानक स्वयं किसी नवीन धर्म की स्थापना करना नहीं चाहते थे। उनके जीवन काल में सिक्ख धर्म का कोई अस्तित्त्व नहीं था। ई.1538 में गुरु नानक के निधन के बाद उनके अनुयाइयों तथा शिष्यों ने ‘सिक्ख धर्म’ की स्थापना की।

सिक्ख धर्म की दार्शनिक मान्यताएँ

सिक्ख धर्म का लक्ष्य

सिक्ख धर्म का परम लक्ष्य मानव मात्र का कल्याण करना है। गुरु नानक का मानना था कि धर्म के बाह्य आडम्बरों के कारण लोगों के बीच भेद उत्पन्न होता है और वे गुमराह होते हैं। उन्होंने मनुष्यों को सब तरह के भेदभाव भुलाकर ईमानदारी और नेक-नीयत से अपना काम करने का उपदेश दिया। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं कोई अलग धर्म नहीं चलाया।

सिक्ख धर्म में ईश्वर तत्त्व का निरूपण

सिक्खमत की शुरुआत ‘एक’ से होती है। सिक्खों के धर्म ग्रंथ में ‘एक’ की ही व्याख्या है। ‘एक’ को निरंकार, परब्रह्म आदि गुणवाचक नामों से जाना गया है। गुरु ग्रंथ साहिब के शुरुआत में ‘निरंकार’ का स्वरूप बताया है जिसे ‘मूल मन्त्र’ भी कहते हैं- ‘एक ओंकार, सतिनामु, करतापुरखु, निर्भाओ, निरवैरु, अकालमूर्त, अजूनी, स्वैभंग गुर पर्सादि। जपु। आदि सचु जुगादि सचु है भी सचु नानक होसी भी सचु।’

इस प्रकार सिक्ख धर्म एकेश्वरवादी है तथा ईश्वर को एक-ओंकार कहता है। गुरु नानक का मानना था कि ईश्वर ‘अकाल पुरुष’ और ‘निरंकार’ है। अकाल पुरुष का अर्थ होता है जिस पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता। न उसका जन्म होता है और न मृत्यु।

निरंकार का अर्थ निर्गुण-निराकार से है, अर्थात् जिसका कोई आकार या रूप नहीं है। इसलिए ईश्वर की मूर्ति या चित्र नहीं बनाया जा सकता। गुरु अर्जुनदेव के अनुसार- ‘परमात्मा व्यापक है, जैसे सभी वनस्पतियों में आग समायी हुई है एवं दूध में घी समाया हुआ है। इसी तरह परमात्मा की ज्योति ऊँच-नीच सभी में व्याप्त है परमात्मा घट-घट में व्याप्त है।’ 

सिक्ख धर्म में जीव-आत्मा तत्त्व का निरूपण

सिक्ख धर्म की मूल शिक्षाओं में आत्मा के निराकारी स्वरूप, मन (आत्मा), चित (परात्मा), सुरत, बुधि, मति आदि की जानकारी दी गई है। इनकी गतिविधिओं को समझ कर मनुष्य स्वयं को समझ सकता है। इसे सिक्ख धर्म में ‘आतमचिंतन’ कहते हैं।

जीव-आत्मा जो निराकार है, उस के पास निरंकार के सिर्फ 4 ही गुण व्याप्त हैं- ‘ओंकार, सतिनाम, करता पुरख, स्वैभंग।’ शेष चार गुण प्राप्त करते ही जीव-आत्मा पुनः वापिस निरंकार में समा जाती है किन्तु उसको प्राप्त करने के लिए गुरमत के ज्ञान द्वारा जीव-आत्मा को समझना आवश्यक है। आत्मा क्या है? कहाँ से आई है? इसका अस्त्तिव क्यों है? करना क्या है? आत्मा के विकार क्या हैं? आत्मा विकार मुक्त कैसे हो? आत्मा स्वयम् निरंकार की अंश है। आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने पर निरंकार का ज्ञान हो जाता है। इत्यादि विषयों पर सिक्ख धर्म में खूब विचार किया गया है।

चार पदार्थ की प्राप्ति में विश्वास

मानव को अपने जीवन में ‘चार ‘पदार्थ’ प्राप्त करने अनिवार्य हैं-

(1.) ज्ञान पदार्थ:  ज्ञान पदार्थ या प्रेम पदार्थ किसी से ज्ञान लेकर प्राप्त होता है। गुरमत का ज्ञान पढ़ कर या समझ कर। भक्त लोग ये पदार्थ देते हैं। इसमें माया में रह कर माया से छूटने का ज्ञान है। सब विकारों को त्यागना और निरंकार को प्राप्ति करना ही इस पदार्थ का ध्येय है।

(2.) मुक्त पदार्थ: ज्ञान पदार्थ की प्राप्ति के बाद ही मुक्त पदार्थ प्राप्त होता है। माया की प्यास ख़त्म होने पर मन और चित एक हो जाते हैं। जीव सिर्फ़ नाम की आराधना करता है। इसको जीवित मुक्त कहते हैं।

(3.) नाम पदार्थ: नाम आराधना से प्राप्त किया हुआ निराकारी ज्ञान है। इसको ‘धुर की बनी’ भी कहते हैं। यह बिना कानों के सुनी जाती है और हृदय में प्रगट होती है। यह नाम ही जीवित करता है। आँखें खोल देता है। ३ लोक का ज्ञान मिल जाता है- ‘नानक नाम मिले तां जीवां।’

(4.) जन्म पदार्थ: यह निराकारी जन्म है। बस शरीर में है किन्तु सुरत शब्द के साथ जुड़ गयी है। शरीर से प्रेम नहीं है। दुःख सुख कुछ भी नहीं मानता, पाप पुण्य कुछ भी नहीं। बस जो ‘हुकुम’ होता है वो करता है- हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।

गुरुओं के सम्बन्ध में सिक्ख धर्म की मान्यता

गुरु, भगवान के सेवक हैं जो मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए समय-समय पर आते हैं किंतु वे भगवान बिल्कुल नहीं है। केवल मनुष्य ही ‘गुरु’ नहीं है, शास्त्र और शब्द भी ‘गुरु’ है। इसलिए गुरुओं में श्रद्धा रखने और उनके शास्त्र को मानने से मनुष्य की आत्मा का ‘अकाल पुरुष’ से संयोग हो सकता है, जो जीवन का चरम लक्ष्य है।

ब्राह्मणों के वचनों में विश्वास नहीं

गुरु नानक ब्राह्मणों के वचनों पर विश्वास नहीं करते थे। गुरुग्रंथ साहिब में गुरु नानक के एक पद में कहा गया है- ‘पण्डित पोथी पढ़ते हैं किन्तु विचार को नहीं बूझते। दूसरों को उपदेश देते हैं, इससे उनका मायिक व्यापार चलता है। उनकी कथनी झूठी है, वे संसार में भटकते रहते हैं। इन्हें सबद के सार का कोई ज्ञान नहीं है। पण्डित तो वाद-विवाद में ही पड़े रहते हैं।’

पण्डित वाचहि पोथिआ न बूझहि बीचारू।

आन को मती दे चलहि माइआ का बामारू।

कहनी झूठी जगु भवै रहणी सबहु सबदु सु सारू।  -आदिग्रन्थ, पृ. 55

कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं

सिक्ख-मत कर्म-फल सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता। सिक्ख-धर्म के अनुसार मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता। मनुष्य केवल सोचने तक सीमित है। करता वही है जो ‘हुक्म’ में है, चाहे वो किसी गरीब को दान दे रहा हो, चाहे वो किसी को जान से मार रहा हो- ‘हुक्मे अंदर सब है बाहर हुक्म न कोए।

पाप-पुण्य में विशवास नहीं

इसी लिए गुरमत में पाप पुन्य को नहीं माना जाता- ‘पाप पुन्य दोउ एक सामान।’ अगर इंसान कोई क्रिया करता है तो वो अंतर-आत्मा के साथ आवाज़ मिला कर करे। यही कारण है की गुरमत कर्मकाण्ड के विरुद्ध है। गुरु नानक देव ने अपने समय के भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और पाखण्डों की आलोचना करते हुए जन-साधारण को पण्डों तथा पीरों के चंगुल में न फंसने की सलाह दी।

चार पुरुषार्थों में विश्वास नहीं

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को चार पदार्थों में नहीं लिया गया। गुरु गोबिंद सिंह कहते हैं-

ज्ञान के विहीन लोभ मोह में परवीन,

कामना अधीन कैसे पांवे भगवंत को।

मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं

सिक्खमत में भक्तों एवम सद्गुरुओं ने अपने ‘एक-निरंकार’ को ‘आकार रहित’ कहा है। क्योंकि सांसारिक पदार्थ समाप्त हो जाते हैं किंतु परब्रह्म कभी नहीं मरता। इसी लिए उसे ‘अकाल’ कहा गया है। ‘जीव-आत्मा’ भी आकार रहित है और इस शरीर के साथ कुछ समय के लिए बंधी है। इसका अस्त्तिव शरीर के बिना भी है, जो साधारण मनुष्य की बुद्धि से परे है। इस कारण सिक्खमत मूर्ति-पूजा के विरुद्ध है। सिक्ख-गुरुओं ने मूर्ति-पूजकों को अंधा एवं जानवर इत्यादि कहा है।

निराकार परमात्मा की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। कोई भी संसारी पदार्थ जैसे कि कब्र, भक्तों एवं सद्गुरुओं की ऐतिहासक वस्तुएं, प्रतिमाएं आदि को पूजना सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। धार्मिक ग्रंथ का ज्ञान जो एक विधि निरंकार के देश की तरफ लेकर जाता है, सिक्ख उसके समक्ष नतमस्तक होते हैं किन्तु धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी सिक्खों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि वे भी सांसारिक पदार्थ ही हैं।

अवतारवाद और पैगम्बरवाद में विश्वास नहीं

सिक्ख-मत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव ‘एक-निरंकार’ का अंश है इसलिए पशु, पक्षी, वृक्ष इत्यादि भी अवतार हैं। मनुष्य योनि में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। सिक्ख धर्म में व्यक्ति की पूजा नहीं होती- ‘मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने को एके भगवान।’ कोई भी अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरा नहीं उतरता क्योंकि सबने जन्म लिया है।

सिक्ख किसी अवतार को परमेश्वर नहीं मानते। यदि कोई अवतार गुरमत का उपदेश करता है तो सिक्ख उस उपदेश को स्वीकार कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि आत्मा मरती नहीं, इस बात से सिक्ख-मत सहमत है किंतु सिक्ख-मत श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए ‘कर्म’ के उपदेश से सहमत नहीं है।

सिक्ख-मत की दृष्टि में पैग़म्बर वह है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान जनसाधारण में बांटे। इस्लाम में कहा गया है कि मुहम्मद आखरी पैगम्बर हैं, सिक्खों में कहा गया है कि ‘हर जुग जुग भक्त उपाया।’ अर्थात्् भक्त हर युग में पैदा होते हैं और ‘एक-निरंकार’ का सन्देश लोगों तक पहुँचाते हैं।

सिक्खमत ‘ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है) से सहमत है, वे इससे भी सहमत हैं कि मुहम्मद रसूल अल्लाह हैं किन्तु वे इस बात से सहमत नहीं हैं कि सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है। अर्जुन देव जी कहते हैं- ‘धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई।’ अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी समस्त चिंताएं मिट गई हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

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