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बहमनी राज्य

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बहमनी राज्य

बहमनी राज्य की स्थापना

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में दिल्ली साम्राज्य का विशृंखलन आरम्भ हो गया और प्रान्तीय गवर्नर स्वतंत्र होने लगे। इसी अशान्ति के बीच, दक्षिण भारत में ‘सादा अमीरों’ (विदेशी अमीरों) ने हसन कांगू के नेतृत्व में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया और दौलताबाद में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।

हसन कांगू ने ‘अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह’ की उपाधि धारण की तथा अपने राज्य का नाम बहमनी राज्य रखा। 1347 ई. से 1527 ई. तक इस वंश में 14 शासक हुए जिनमें अलाउद्दीन हसन बहमनशाह (1347 से 1358 ई.), मुहम्मद शाह प्रथम (1358 से 1375 ई.), मुहम्मद द्वितीय (1378 से 1397 ई.) ताजुद्दीन फिरोजशाह (1397 से 1422 ई.), अहमदशाह प्रथम (1422 से 1435 ई.) और अलाउद्दीन द्वितीय (1435-1457 ई.) अधिक प्रसिद्ध हुए।

इनमें से मुहम्मद (द्वितीय) को छोड़कर समस्त सुल्तान क्रूर और धर्मान्ध थे। इस कारण उनका अपने पड़ौसी विजयनगर के हिन्दू राज्य से निरन्तर संघर्ष चलता रहा। फलस्वरूप राज्य की आन्तरिक स्थिति बिगड़ती चली गई। अन्त में सम्पूर्ण राज्य पाँच राज्यों- बीजापुर, गोलकुण्डा, बरार, बीदर और अहमदनगर में विभाजित हो गया।

ये पाँचों राज्य भी पारस्परिक द्वेष एवं संघर्ष के कारण कमजोर होते चले गए। बाबर के आक्रमण के समय इन राज्यों में अव्यवस्था फैली हुई थी।

बहमनी नाम क्यों पड़ा ?

ब्राह्मणी राज्य की अवधारणा

हसन कांगू ने अपने राज्य को बहमनी नाम क्यों दिया, इस सम्बन्ध में अलग-अलग मान्यतायें हैं। फरिश्ता का कहना है कि हसन पहले दिल्ली के गंगा नामक एक ब्राह्मण ज्योतिषी के यहाँ नौकर था। एक दिन अपने स्वामी का खेत जोतते समय हसन को स्वर्ण-मुद्राओं से भरा हुआ एक पात्र मिला।

हसन ने वह पात्र अपने स्वामी को दे दिया। ब्राह्मण हसन की ईमानदारी तथा स्वामि-भक्ति से बहुत प्रसन्न हुआ। उस ब्राह्मण का सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से परिचय था। ब्राह्मण ने सुल्तान से हसन की प्रशंसा की। सुल्तान ने हसन की ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे राज्य में नौकरी दे दी।

ज्योतिषी ने हसन के राजा बनने की भविष्यवाणी की और उससे वचन लिया कि जब उसकी भविष्यवाणी सत्य हो जाय तब हसन उसे अपना प्रधानमंत्री बना ले। हसन ने ब्राह्मण की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। हितैषी ब्राह्मण के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिये राजपद प्राप्त करने पर उसने अपना नाम ‘ब्राह्मणी’ अथवा बहमनी रखा और उसका राज्य ‘बहमनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस मत को स्वीकार करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हसन कांगू एक धर्मांध सुल्तान था, हिन्दुओं के प्रति उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था इसलिये यह संभव नहीं है कि उसने अपने राज्य का नाम ब्राह्मणी राज्य रखा हो।

ईरानी बहमन वंश की अवधारणा

मेजर हेग ने फरिश्ता के इस मत को अस्वीकार करते हुए लिखा है कि हसन ने कभी अपना नाम ब्राह्मणी नहीं रखा। उसकी मुद्राओं, मस्जिद के शिलालेखों तथा ग्रन्थों में भी उसका राजकीय नाम बहमनशाह मिलता है। आधुनिक इतिहासकारों की धारणा है कि हसन फारस के बादशाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज था। इस कारण उसका वंश बहमनी कहलाया। यह अवधारणा ही अधिक सही प्रतीत होती है।

बहमनी वंश के शासक

अलाउद्दीन हसन बहमनशाह

बहमनी राज्य के संस्थापक अलाउद्दीन हसन बहमनशाह अर्थात् हसन कांगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। उसने अपने पड़ौसी राज्यों पर आक्रमण कर उत्तर में बाणगंगा से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया।

उसने अपने राज्य को प्रशासन की दृष्टि से चार भागों- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर में विभाजित किया जिन्हें अतरफ कहा जाता था। प्रत्येक अतरफ में एक प्रांतपति की नियुक्ति की गई। 1358 ई. में हसन कांगू की मृत्यु हो गई। वह एक कट्टर मुस्लिम एवं धर्मान्ध शासक सिद्ध हुआ।

मुहम्मदशाह (प्रथम)

हसन कांगू के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह (प्रथम) बहमनी राज्य का शासक हुआ। उसने अपने पिता के विजय अभियान को जारी रखा तथा विजयनगर एवं तेलंगाना (वारंगल) के राजाओं के साथ सफलतापूर्वक युद्ध किया। वारंगल के शासक कापय नायक और विजयनगर के शासक बफुका ने मुहम्मदशाह के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा लिया।

मुहम्मदशाह ने कापय नायक से गोलकुण्डा का किला छीन लिया। तब से गोलकुण्डा दुर्ग को बहमनी राज्य तथा तेलंगाना राज्य की सीमा मान लिया गया। मुहम्मदशाह का शासन कठोर था। वह दुराचारियों का कठोरता से दमन करता था। उसने अपने राज्य में मद्यपान का निषेध कर दिया।

मुजाहिद शाह बहमनी

मुहम्मदशाह (प्रथम) की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र अलाउद्दीन 1373 ई. में बहमनी के तख्त पर बैठा। उसे मुजाहिद शाह बहमनी (प्रथम) भी कहा जाता है। मुजाहिद का अपने सेनापतियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं था। इससे सेनापतियों में उसके विरुद्ध असंतोष फैल गया। उसने दो बार विजयनगर पर आक्रमण किया जिसमें उसे बड़ी क्षति उठानी पड़ी। 1378 ई. में मुजाहिद के चचेरे भाई दाऊद ने उसकी हत्या कर दी परन्तु एक वर्ष के उपरान्त दाऊद का भी वध कर दिया गया।

मुहम्मदशाह (द्वितीय)

दाऊद की मृत्यु के बाद मुहम्मदशाह (द्वितीय) बहमनी के तख्त पर बैठा। इसे मुजाहिद (द्वितीय) भी कहा जाता है। वह शान्ति प्रिय सुल्तान था। उसने अपने पूर्वजों की युद्ध नीति को त्याग दिया। वह धार्मिक प्रवृत्ति का सुल्तान था। उसने अपने राज्य में कई मस्जिदें बनवाईं और मदरसे तथा मकतब स्थापित किये। वह अपनी प्रजा के सुख का ध्यान रखता था। उसने विजयनगर राज्य से अच्छे सम्बन्ध बनाये। 1397 ई. में उसका निधन हुआ।

ताजुद्दीन फीरोजशाह

मुहम्मदशाह (द्वितीय) के बाद ताजुद्दीन फीरोजशाह गुलबर्गा के सिंहासन पर बैठा। वह बड़ा ही धर्मान्ध सुल्तान था। उसके समय में विजयनगर राज्य के साथ पुनः संघर्ष उठ खड़ा हुआ। विजयनगर पर उसने तीन बार चढ़ाई की जिनमें से दो बार वह विजयी हुआ।

तीसरी बार में उसे विजयनगर के राजा देवराय (द्वितीय) ने बुरी तरह परास्त किया तथा उसके राज्य के बहुत बड़े भूभाग पर अधिकार कर लिया। बहमनी राज्य को जन-धन की बड़ी हानि उठानी पड़ी। इस कारण ताजुद्दीन फीरोजशाह राज्य कार्य से उदासीन रहने लगा। अपने अंतिम दिनों में वह बीमार रहता था। 1422 ई. में उसके भाई अहमदशाह ने उसे अपदस्थ कर दिया।

अहमदशाह

ताजुद्दीन फीरोजशाह के बाद उसका भाई शिहाबुद्दीन अहमद (प्रथम) बहमनी राज्य के तख्त पर बैठा। उसे अहमदशाह भी कहते हैं। उसने गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को अपनी राजधानी बनाया। उसने भी विजयनगर राज्य पर आक्रमण करके सहस्रों हिन्दुओं को मार दिया।

1424 ई. में अहमदशाह ने वारंगल के राजा पर आक्रमण करके उसके राज्य का बहुत बड़ा भाग अपने राज्य में मिला लिया। उसने मालवा पर आक्रमण करके वहाँ के शासक हुसैनशाह को परास्त किया। उसने गुजरात पर भी आक्रमण किया किंतु परास्त होकर लौट आया। 1435 ई. में अहमदशाह की मृत्यु हो गई।

अलाउद्दीन अहमद (द्वितीय)

अहमदशाह के बाद उसका पुत्र जफर खाँ 1435 ई. में अलाउद्दीन अहमद के नाम से बहमनी राज्य के तख्त पर बैठा। उसने कोंकण के राजा को परास्त किया। अलाउद्दीन ने विजयनगर पर आक्रमण करके देवराय (द्वितीय) को परास्त किया तथा उससे भारी धन वसूल किया। अलाउद्दीन ने संगमेश्वर के हिन्दू राजा की पुत्री से बलपूर्वक विवाह किया। 1457 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु हो गई।

हुमायूँशाह (जालिम)

अलाउद्दीन के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँशाह 1457 ई. में तख्त पर बैठा। वह बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक था। उसके अत्याचारों के कारण लोग उसे जालिम कहते थे। इस निर्दयी सुल्तान को महमूद गवां नामक बड़े ही राजभक्त मंत्री की सेवाएँ प्राप्त थीं जिसने राज्य को नष्ट होने से बचाया। 1461 ई. में हुमायूँशाह की मृत्यु हो गयी।

निजामशाह

जालिम हुमायूँशाह के बाद उसका आठ साल का पुत्र निजामशाह गद्दी पर बैठा। उसकी माँ मखदूमजहाँ उसकी संरक्षिका नियुक्त हुई। बहमनी राज्य के लिये यह बड़े संकट का काल था। उड़ीसा तथा तेलंगाना के हिन्दू राजाओं ने बहमनी राज्य पर आक्रमण कर दिया परन्तु बहमनी राज्य की सेना ने उन्हें पीछे धकेल दिया।

इसी संकटकाल में मालवा के शासक महमूद खिलजी ने बहमनी राज्य पर आक्रमण करके बीदर पर अधिकार कर लिया परन्तु गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा के हस्तक्षेप से उसे बहमनी राज्य से बाहर निकाल दिया गया। 1463 ई. में केवल दस साल की आयु में निजामशाह की अचानक मृत्यु हो गई।

मुहम्मद शाह (तृतीय)

निजामशाह के बाद उसका चाचा मुहम्मदशाह (तृतीय) 1463 ई. में बहमनी राज्य का शासक हुआ। वह मदिरा तथा व्यभिचार में व्यस्त रहता था। इसलिये राज्य की वास्तिविक शक्ति सुल्तान के मन्त्री महमूद गवां के हाथों में चली गई।

महमूद गवां (प्रधानमंत्री)

महमूद गवां ने योग्यतापूर्वक शासन किया। उसने पड़ौसी राज्यों को परास्त करके बहमनी राज्य का विस्तार किया। उसने कोंकण के सरदार से बीसलगढ़ जिले को छीना, उड़ीसा के राजा से कर वसूल किया, विजयनगर के राजा के साथ युद्ध करके गोआ का बंदरगाह छीन लिया तथा कांची पर भी अधिकार कर लिया।

महमूद गवां ने राज्य के समस्त विभागों में सुधार किये। उसने राज्य की आर्थिक दशा तथा न्याय-व्यवस्था में कई सुधार किये। उसने मालगुजारी वसूलने की समुचित व्यवस्था की। उसने सेना में भी कई सुधार किये। रिश्वत तथा घूसखोरी का बुरी तरह दमन किया। शिक्षा की भी उत्तम व्यवस्था की।

महमूद गवां एक विदेशी अमीर था इसलिये दक्षिण के अमीरों ने सुल्तान को महमूद गवां के विरुद्ध भड़काया। शराब के नशे में धुत्त सुल्तान ने महमूद गवां का वध करने के आदेश दे दिये। इस प्रकार इस योग्य मन्त्री गवां की हत्या करवा दी गई। बाद में सुल्तान को अपनी भूल का पता लगा। उसके मन में इतनी ग्लानि उत्पन्न हुई कि उसने आत्महत्या कर ली। महमूद गवां के मरते ही बहमनी राज्य का पतन आरम्भ हो गया।

महमूदशाह

1482 ई. में सुल्तान महमूदशाह की मृत्यृ के उपरान्त उसका बारह वर्षीय पुत्र महमूदशाह तख्त पर बैठा। वह नाम मात्र का शासक था। उसने 26 वर्ष तक शासन किया परन्तु शासन की वास्तविक शक्ति उसके मन्त्री बरीद के हाथ में रही। महमूदशाह जीवन भर आमोद-प्रमोद में लगा रहा। वह राज्य के कार्यों में रुचि नहीं लेता था। इससे प्रान्तीय गवर्नर, केन्द्रीय शक्ति की उपेक्षा करने लगे और स्वतंत्र होने का प्रयत्न करने लगे।

कलीमुल्लाह

महमूदशाह के बाद उसका पुत्र कलीमुल्लाह तख्त पर बैठा। वह भी अपने पिता की तरह नाम मात्र का शासक था। 1526 ई. में अमीर बरीद ने कलीमुल्लाह को तख्त से उतार दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। इस प्रकार बहमनी वंश का अन्त हो गया।

बहमनी राज्य की विच्छिन्नता

1527 ई. में बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पांच राज्यों में विभक्त हो गया- (1.) बरार में इमादशाही राज्य, (2.) अहमदनगर में निजामशाही राज्य, (3.) बीजापुर में आदिलशाही राज्य, (4.) गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा (5.) बीदर में बरीदशाही राज्य।

बहमनी राज्य के पतन के कारण

बहमनी राज्य लगभग 180 साल तक चला। इसके 14 सुल्तानों में से 5 की हत्या हुई, 3 पदच्युत किये गये, 2 को अंधा किया गया और 2 अधिक मद्यपान के कारण मरे। बहमनी राज्य का पतन उसकी आन्तरकि दुर्बलताओं के कारण हुआ। इस राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) राज्य के अमीरों का अन्तर्कलह

बहमनी राज्य के अमीरों में विभिन्न वर्ग तथा सम्प्रदाय उत्पन्न हो गये जो एक दूसरे को समाप्त करना चाहते थे। पूरे 180 साल तक बहमनी राज्य के विदेशी अमीरों तथा दक्षिणी अमीरों में घोर संघर्ष चला। तुर्क अमीर मंगोलों को घृणा की दृष्टि से देखते थे, अफगान अमीर तुर्कों से घृणा करते थे, अबीसीनिया के अमीर अरबों से नफरत करते थे और भारतीय मुसलमान, जो यहीं पैदा हुए थे, विदेशी मुसलमानों से घृणा करते थे। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्गों तथा सम्प्रदायों में संघर्ष तथा कलह के कारण राज्य की शासन-व्यवस्था सदैव डांवाडोल रही और अंत में राज्य का पतन हो गया।

(2.) पड़ौसी राज्यों से निरंतर युद्ध

बहमनी राज्य अपनी स्थापना से लेकर अपने नष्ट होने तक साम्प्रदायिक कट्टरता का शिकार रहा। वह अपने पड़ौस में स्थित विजयनगर राज्य तथा वारांगल राज्य को समाप्त करने का प्रयास करता रहा। इस प्रयास में हर समय युद्ध चलता रहा तथा इन तीनों राज्यों की शक्ति क्षीण होती रही। परस्पर वैमनस्य के कारण तीनों ही राज्यों ने एक दूसरे को कंगाली और बदहाली में पहुँचा दिया।

(3.) प्रधानमंत्री महमूद गवां की हत्या

शराब के नशे में धुत्त मुहम्मदशाह (तृतीय) ने अमीरों के कहने पर प्रधानमंत्री मूहमद गवां का वध करवा दिया। उसने अपने बल से राज्य की विघटनकारी शक्तियों को नियंत्रित कर रखा था। इस योग्य मन्त्री के मरते ही राज्य का छिन्न-भिन्न होना आरम्भ हो गया। प्रान्तीय गवर्नरों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया और उन्हें दबाना संभव नहीं रहा।

(4.) महमूदशाह का दुराचारण

महमूदशाह का दुराचरण भी बहमनी साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी था। उसने 26 साल तक बहमनी राज्य पर शासन किया। वह मूर्ख तथा आचरण-भ्रष्ट सुल्तान था। वह अपना समय मूर्खों, गायकों तथा नर्तकों की संगति में व्यतीत करता था। इससे अमीर एवं सरकारी कर्मचारी कर्त्तव्य-भ्रष्ट हो गये। साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा और प्रान्तीय गवर्नर स्वतंत्र होने लगे।

(5.) शासन का अमीर बरीद के हाथों में चले जाना

1578 ई. में अहमदशाह की मृत्यु के उपरान्त बहमनी राज्य के जितने भी शासक हुए, वे नाम मात्र के शासक थे और वास्तविक शक्ति अमीर बरीद के हाथों में थी। अमीर बरीद का अनियन्त्रित प्रभाव बहमनी राज्य के पतन का कारण सिद्ध हुआ। उसने अन्तिम सुल्तान कलीमुल्लाह का अन्त कर दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। इस प्रकार बहमनी राज्य का अन्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विजयनगर राज्य

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विजयनगर राज्य मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिन्दू राज्य था। उस काल में विजयनगर राज्य जैसा कोई अन्य विशाल हिन्दू राज्य अस्तित्व में नहीं था।

विजयनगर राज्य की स्थापना

विजयनगर राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सेवेल ने सात मतों का उल्लेख किया है जिनमें से सर्वाधिक विश्वसनीय मत यह है कि इस राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की। ये दोनों भाई वारंगल के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव की सेवा में थे।

जब मुसलमानों ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त की तब इन दोनों भाइयों को कैद करके दिल्ली ले जाया गया। जब दक्षिण भारत पर दिल्ली सल्तनत शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सकी तब मुहम्मद बिन तुगलक ने हरिहर तथा बुक्का को मुक्त करके उन्हें रायचूर दोआब का सामन्त बनाकर दक्षिण भेज दिया।

इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकाण्ड पण्डित माधव विद्यारण्य था जिसने इस वंश की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार आचार्य कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की की थी। माधव विद्यारण्य के अनुज वेदों के टीकाकार सायणाचार्य ने भी इन दोनों भाइयों का पथ प्रदर्शन किया।

अपने गुरु तथा सहायक के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। मुहम्मद बिन तुगलक के शासन के अन्तिम भाग में हरिहर ने स्वयं को विजयनगर का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।

विजयनगर के राजवंश

विजयनगर में 1336 ई. से 1416 ई. तक चार राजवंशों ने शासन किया। इनमें से प्रथम दो राजवंश बहमनी राज्य के शासकों के समकालीन थे। जिस समय तृतीय राजवंश विजयनगर के तख्त पर बैठा उस समय बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पाँच राज्यों में विभक्त हो चुका था। अतः तीसरें एवं चौथे राजवंशों को मुसलमानों के साथ वैसा भीषण संघर्ष नहीं करना पड़ा, जैसा प्रथम दो राजवंशों को करना पड़ा था।

(1) प्रथम राजवंश: संगम वंश (1436-1486 ई.)

इस वंश के प्रथम दो शासक हरिहर तथा बुक्का के पिता का नाम संगम था। इसलिये इस वंश को संगम वंश भी कहते हैं। हरिहर तथा बुक्का ने स्वतन्त्र शासक की उपाधियां धारण नहीं कीं परन्तु इस वंश के तीसरे शासक हरिहर (द्वितीय) ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण करके अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा की।

इस वंश के राजाओं को बहमनी वंश के राजाओं के साथ निरन्तर संघर्ष करना पड़ा और प्रायः पराजय का ही आलिंगन करना पड़ा। बहमनी राज्य के शासक इतने प्रबल नहीं थे कि वे विजयनगर राज्य की स्वतंत्र सत्ता को उन्मूलित कर सकते, अथवा उसके बहुत बड़े भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर सकते।

बहमनी राज्य की सेनायें प्रायः रायचूर दोआब में घुसकर लूटपाट मचाती थीं। विजयनगर की सेनायें, उन्हें वहाँ से मार भगाती थीं और फिर से रायचूर दोआब पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेती थीं। इस वंश के राजाओं ने दक्षिण के हिन्दू राजाओं के विरुद्ध भी युद्ध किया जिनके फलस्वरूप उनका राज्य सुदूर दक्षिण तक फैल गया था।

इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक देवराय (द्वितीय) था जिस पर बहमनी सुल्तानों ने कई आक्रमण किये। इनमें से कई युद्धों में देवराय विजयी रहा तो कुछ युद्धों में वह परास्त भी हुआ। इन युद्धों से विजयनगर राज्य को जन-धन की बड़ी हानि उठानी पड़ी।

(2) द्वितीय राजवंश: सलुव वंश (1486-1505 ई.)

देवराय (द्वितीय) के बाद उसके दो अयोग्य पुत्रों ने क्रम से शासन किया। इस वंश के अन्तिम शासक विरुपाक्ष को 1486 ई. में गद्दी से उतार कर तेलगांना के सामन्त नरसिंह सलुव ने स्वयं को विजयनगर का शासक घोषित कर दिया। इस प्रकार विजयनगर में संगम वंश का अंत हो गया तथा सलुव-वंश की स्थापना हुई।

नरसिंह ने छः वर्ष तक शासन किया। वह योग्य तथा लोकप्रिय शासक सिद्ध हुआ। इस वंश के शासन काल में शासन में बड़ी प्रगति हुई। इस वंश के राजाओं को भी बहमनी राज्य के शासकों से युद्ध करने पड़े जिनमें विजयनगर को प्रायः असफलता ही प्राप्त हुई किंतु उनका राज्य चलता रहा।

उन्होंने तामिल प्रदेश के हिन्दू राजाओं को कई युद्धों में परास्त किया। इस वंश का शासन चिरस्थायी सिद्ध नहीं हुआ। इस वंश के अन्तिम शासक को उसके सेनापति वीर नरसिंह नायक ने तख्त से उतारकर उसकी हत्या कर दी और स्वयं विजयनगर का शासक बन गया। इस प्रकार विजयनगर में तीसरे राजवंश की स्थापना हुई।

(3) तृतीय राजवंश: तुलुव वंश (1505-1570 ई.)

1505 ई. में वीर नरसिंह नायक ने विजयनगर में नये राजवंश की नींव डाली जो तुलुव-वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस राजवंश का सर्वाधिक योग्य तथा प्रतिभाशाली शासक कृष्णदेव राय था जो वीरनरसिंह नायक का छोटा भाई था। कृष्ण देव राय ने 1509 से 1530 ई. तक शासन किया।

वह वीर, साहसी, महान् विजेता, न्याय प्रिय तथा सफल शासक था। उसने अनेक युद्ध किये तथा समस्त में सफलता प्राप्त की। 1513 ई. में उसने उड़ीसा के राजा गजपति प्रतापरुद्र को युद्ध में परास्त कर वहाँ की राजकुमारी से विवाह किया। 1520 ई. में उसने बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह पर विजय प्राप्त की और उसके राज्य को लूटा।

पश्चिमी समुद्र तट पर बसे हुए पुर्तगालियों के साथ उसकी मैत्री थी। इस प्रकार कृष्णदेव राय ने अपने बाहुबल से अपने राज्य की सीमा में बड़ी वृद्धि की। इससे पड़ौसी मुसलमान शासकों को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे विजयनगर के विरुद्ध संगठित होने लगे। कृष्णदेव राय की मृत्यु के उपरान्त उसका उत्तराधिकारी सदाशिव विजयनगर के तख्त पर बैठा।

उसके मन्त्री रामराय ने पड़ौसी मुसलमान राज्यों के साथ युद्ध किया और मुसलमानों पर बड़ा अत्याचार किया। मुसलमान राज्यों के लिए यह असह्य हो गया। बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर के सुल्तानों ने अपने मतभेद भुलाकर विजयनगर के विरुद्ध एक संघ बनाया। बरार का सुल्तान इस संघ से अलग रहा।

1564 ई. के अन्तिम सप्ताह में मुसलमानों ने विजयनगर राज्य पर आक्रमण किया। कृष्णा नदी के किनारे तालीकोट नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में रामराय परास्त हो गया और उसका वध कर दिया गया। हिन्दू सैनिकों की भी बड़ी नृशंसतापूर्वक हत्या की गई।

इसके बाद विजयी सेनाओं ने विजयनगर की ओर कूच किया और नगर को नष्ट कर डाला। हजारों हिन्दू मौत के घाट उतार दिये गये। नगर की समस्त सम्पदा लूट ली गई तथा विजयनगर का यथा शक्ति विनाश किया गया। तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर का पतन आरम्भ हो गया। इस वंश ने 1570 ई. तक विजयनगर पर शासन किया।

(4) चतुर्थ राजवंश: अरविंदु वंश (1570-1614 ई.)

तालीकोट के युद्ध के उपरान्त रामराय के भाई तिरूमल्ल ने सदाशिव के नाम पर शासन करना आरम्भ किया परन्तु 1570 ई. में उसने सदाशिव को अपदस्थ कर दिया और स्वयं विजयनगर का सम्राट बन गया। इस प्रकार एक नये राजवंश की स्थापना हुई जो अरविन्दु वंश के नाम से प्रसिद्ध है।

उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र रंग द्वितीय हुआ। वह योग्य शासक था। उसके बाद उसका भाई बैंकट द्वितीय सिंहासन पर बैठा। उसने 1586 ई. से 1614 ई. तक शासन किया। उसके काल में राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। उसने मैसूर के पृथक राज्य को मान्यता देकर बहुत बड़ी भूल की। इस वंश में कई निर्बल राजा हुए जो साम्राज्य को ध्वस्त होने से नहीं बचा सके। इस वंश का अंतिम स्वतन्त्र शासक रंग (तृतीय) अयोग्य राजा था। उसके बाद विजयनगर राज्य ध्वस्त हो गया।

विजयनगर राज्य का शासन प्रबंध

विजयनगर राज्य का शासन प्रबन्ध उस काल में अच्छे शासन प्रबन्ध का द्योतक है। अध्ययन की दृष्टि से विजयनगर राज्य के शासन प्रबंधन को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1.) केन्द्रीय शासन, (2.) प्रांतीय शासन तथा (3.) स्थानीय शासन। विजयनगर के शासन की निम्नलिखित विशेषतायें थीं-

केन्द्रीय शासन

(1.) सम्राट ही शासन का केन्द्र बिंदु था

विजयनगर साम्राज्य का शासन सैनिक शक्ति पर आधारित था। सम्राट ही समस्त शासन की धुरी था जिसके पास असीमित अधिकार थे। वह स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन करता था। सम्राट की सहायता तथा परामर्श के लिए मन्त्रिपरिषद् होती थी परन्तु सम्राट उनके परामर्श को मानने के लिये बाध्य नहीं था।

मंत्रिपरिषद् के सदस्य सम्राट द्वारा नियुक्त किये जाते थे। शासन, सेना तथा न्याय सम्बन्धी समस्त अधिकार सम्राट में निहित थे। सम्राट स्वयं शासकीय आज्ञायें देने से लेकर सेनापति तथा न्यायाधीश का कार्य करता था। उसके कार्यों में राजकीय पदाधिकारी सहायता किया करते थे। इन पदाधिकारियों में प्रधानमन्त्री, कोषाध्यक्ष तथा सेनापति प्रमुख थे।

(2.) राजदरबार में राजाज्ञाओं का लेखन

शासन सम्बन्धी आज्ञाएँ देने का कार्य राजदरबार में होता था। सम्राट लिखित आज्ञाएँ नहीं देता था। जब सम्राट कोई आज्ञा देता था तो राज्याधिकारी उसे पंजिका में लिखते थे। वही सम्राट की आज्ञा का प्रमाण होता था। जब सम्राट किसी पर दया दिखाता था तो सम्राट उसे मोम लगी मुहरें देता था जिससे यह प्रमाणित हो जाता था कि सम्राट ने उसके ऊपर कृपा की है।

(3.) सामन्ती पद्धति से सेना का संगठन

विजयनगर राज्य का दक्षिण के मुसलमान राज्यों के साथ निरन्तर संघर्ष चलता रहा। इसलिये राज्य को सेना की ओर विशेष रूप से ध्यान देना पड़ता था। सेना का संगठन सामन्तीय था। सेना दो प्रकार की होती थी। एक सम्राट की सेना जिसकी संख्या कम थी और दूसरी प्रांतपतियों की सेना जिसकी संख्या अधिक थी।

युद्ध के समय प्रांतपति अपनी सेना लेकर सम्राट की सहायता करते थे। सारी सेना तीन अंगों- हाथी, घोड़े तथा पैदल में विभक्त थी। सेना में सर्वाधिक संख्या पैदल सैनिकों की थी। राज्य की अधिकांश सेना प्रजापतियों तथा स्थानीय अधिकारियों के अधीन रहती थी, इसलिये उसमें सामन्तशाही सेना के समस्त दोष पाये जाते थे।

विजयनगर के राजाओं ने अश्वारोहियों की संख्या में वृद्धि तथा सैनिकों के प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। प्रांतपतियों की सेनाओं में भर्ती किये जाने वाले सैनिकों में सम्राट के प्रति वैसी स्वामिभक्ति नहीं होती थी, जैसी स्थानीय सेना के सैनिकों में होती थी। यही कारण था कि संख्या में अधिक होते हुए भी वे मुसलमान सेनाओं के विरुद्ध असफल हो जाती थीं।

(4.) विधर्मियों से अच्छा व्यवहार

विजयनगर राज्य की स्थापना का उद्देश्य हिन्दू संस्कृति, हिन्दू धर्म तथा हिन्दू जनता की रक्षा करना था। अतः राज्य के शासन में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। वे राज्य के उच्च पदों पर आसीन थे। हिन्दू धर्म संसार का सबसे उदार और सहिष्णु धर्म है। इस कारण विजयनगर राज्य में धर्मान्धता तथा धार्मिक असहिष्णुता नहीं थी।

जैन और बौद्ध भी वैष्णवों की तरह सुख से रहते थे। मुसलमानों पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं होता था। विजयनगर के कुछ राजाओं ने मुस्लिम सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती किया और उनके लिए मस्जिदें बनवाईं।

(5.) कर नीति

राज्य की आय का प्रधान साधन भूमिकर था। सारी भूमि सम्राट की थी। सम्राट अपनी भूमि अपने प्रांतपतियों में बाँट देता था। ये प्रांतपति अपनी भूमि किसानों को दे देते थे जिन्हें भूमि की उपज का निश्चित अंश कर के रूप में प्रांतपति को देना पड़ता था। भूमिकर के साथ-साथ किसानों को चारागाह तथा विवाह कर भी देना पड़ता था। बाहर से आने वाली समस्त आवश्यक वस्तुओं पर, जिनके अन्तर्गत पशु भी थे, चुुंगी देनी पड़ती थी। वेश्याओं को भी कर देना पड़ता था। देश धन-धान्य से पूर्ण था और बस्ती बड़ी घनी थी।

(6.) दरबार की शोभा

विजयनगर के शासक प्राचीन हिन्दू राजाओं की तरह अपने राजदरबार की शोभा का बड़ा ध्यान रखते थे। होली, दीपावली, महानवमी आदि पर्वों के अवसर पर राज्य में आनंद एवं उत्सव मनाया जाता था। उस समय दरबार को विभिन्न प्रकार से अलंकृत किया जाता था जिसकी शोभा देखने योग्य होती थी।

प्रान्तीय शासन

शासन की सुविधा के लिए विजयनगर का राज्य लगभग दो सौ प्रान्तों में विभक्त किया गया था। प्रत्येक प्रान्त का शासन एक प्रांतपति को सौंपा गया। प्रांतपति की नियुक्त सम्राट करता था। ये प्रांतपति या तो राजवंश के होते थे, या शक्तिशाली सामंत। प्रांतपति अपने प्रांत के आंतरिक मामलों में स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश शासक होते थे।

उनकी अपनी सेनाएँ होती थीं। प्रांतपति भी दरबार का आयोजन करते थे। उन्हें केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में कार्य करना पड़ता था और अपने प्रान्त के सुशासन तथा सुव्यवस्था के लिये सम्राट के प्रति उत्तरदायी रहना पड़ता था। प्रान्त की आय का आधा भाग केन्द्रीय राजकोष में भेजा जाता था।

आय का शेष भाग प्रांतपति अपने कुटुम्ब, अपनी सेना तथा प्रान्त के शासन पर व्यय करता था। जो प्रांतपति क्रूरता से शासन करते थे, अथवा राजद्रोही हो जाते थे, या लगान देना बन्द कर देते थे, उन्हें सम्राट द्वारा कठोर दण्ड दिया जाता था और वे अपने पद से हटा दिये जाते थे।

स्थानीय शासन

शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक प्रान्त को कई जिलों में विभक्त किया गया था जिसे नाडू अथवा कोट्टम कहते थे। प्रत्येक जिला कई परगनों में विभक्त रहता था और शासन की सबके छोटी इकाई गाँव होती थी। गाँव का प्रबन्ध गाँव की पंचायतों द्वारा होता था। ये सब स्थानीय संस्थाएँ थीं जिनके प्रधान अयगर कहलाते थे।

अयगरों को या तो जागीरें दी जाती थीं या खेतों की उपज का कुछ भाग वेतन के रूप में दिया जाता था। इनका पद वंशानुगत होता था। अयगर गाँव के झगड़ों का निर्णय करते थे, राजकीय कर वसूल करते थे और शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखते थे। ग्राम सभा की सहायता के लिये चौधरी, लेखक, चौकीदार, तौला इत्यादि होते थे। ये पद वंशानुगत होते थे। उन्हें कृषि उपज का एक भाग वेतन के रूप में मिलता था।

न्याय व्यवस्था

सम्राट न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी था। वह स्वयं अंतिम अपील सुनता था तथा महत्त्वपूर्ण अभियोगों का निर्णय करता था। मन्त्रीगण न्याय कार्य में सम्राट की सहायता करते थे। राज्य में बहुत से राजकीय न्यायालय थे जिनमें न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी। गांव वाले गांव सभाओं अथवा पंचायतों के माध्यम से न्याय प्राप्त करते थे। ग्राम पंचायतों के निर्णय के विरुद्ध राजा से अपील की जा सकती थी।

राज्य की न्याय व्यवस्था परम्परागत नियमों, रीति रिवाजों तथा राज्य के संवैधानिक व्यवहारों पर आधारित थी। दण्ड विधान कठोर था। चोरी, व्यभिचार तथा राजद्रोह के मामलों में अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड दिया जाता था। मामूली अपराध के लिये आर्थिक दण्ड दिया जाता था। ब्राह्मण प्राणदण्ड से मुक्त थे।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि विजयनगर राज्य की आन्तरिक शासन व्यवस्था में अनेक विशेषताएँ थीं। धार्मिक सहिष्णुता के साथ-साथ इस व्यवस्था में लोकहित की रक्षा का समुचित प्रबन्ध था। केन्द्रीय शक्ति दृढ़ता से प्रांतपतियों, स्थानीय शासकों एवं प्रजा पर शासन करती थी। अपराधियों एवं विद्रोही प्रांतपतियों को कठोर दण्ड दिये जाते थे।

सामन्तीय व्यवस्था होने के कारण प्रजा पर कर अधिक थे फिर भी प्रजा सुखी एवं समृद्ध थी। इस शासन-व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष इसका सामन्तीय स्वरूप था। सम्राट सैन्य शक्ति के लिये सामंतों पर निर्भर था। सामंती सैनिक सम्राट के प्रति स्वामिभक्त नहीं थे इसी कारण विजयनगर का राज्य अपने पड़ौसी मुस्लिम राज्यों से प्रायः हार जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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विजयनगर की सामाजिक दशा

विजयनगर राज्य का पतन

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विजयनगर की सामाजिक दशा

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विजयनगर की सामाजिक दशा

विजयनगर की सामाजिक दशा मध्यकालीन दक्षिण भारत के समस्त राज्यों में सबसे अच्छी थी। सभी लोगों को अपने काम का चयन करने तथा अपनी परम्पराओं के अनुसार जीवन जीने की छूट थी।

विजयनगर की सामाजिक दशा

सामाजिक दशा

विजयनगर राज्य में के समाज में हिन्दू परम्पराओं के अनुसार ब्राह्मणों का बड़ा आदर था। उन्हें प्राणदण्ड से मुक्त रखा गया था। ब्राह्मण शाकाहारी तथा पवित्र आचरण वाले होते थे। अन्य जातियों में मांसाहार प्रचलित था। हिन्दू देवी-देवताओं को भेड़ों तथा भैंसों की बलि दी जाती थी। सती प्रथा भी प्रचलन में थी। तेलगू विधवा स्त्रियाँ जीवित ही धरती में गाड़ दी जाती थीं।

द्वन्द्व-युद्ध का बड़ा आदर होता था परन्तु इसके लिए मन्त्री की आज्ञा लेनी पड़ती थी। राज प्रासाद में कई स्त्रियाँ लेखिका का कार्य करती थीं। वेश्या-कर्म प्रचलित था। सरायों में वेश्याएं उपलब्ध होती थीं। इन वेश्याओं को राजकीय कर देना पड़ता था। प्रजा सुखी थी। अब्दुर्रज्जाक के अनुसार साधारण जनता भी जवाहर तथा सोने के आभूषण पहनती थीं। आमोद-प्रमोद के अनेक साधन उपलब्ध थे।

साहित्य तथा कला

विजयनगर के शासकों ने हिन्दू-कला तथा हिन्दू-संस्कृति की उन्नति में बड़ा योग दिया। उनके आश्रय में संस्कृत, तमिल, कन्नड़ तथा तेलगू भाषाओं के साहित्य की उन्नति हुई। उनके दरबार में संस्कृत तथा तेलगू के बड़े-बड़े विद्वान रहते थे। विजयनगर के कुछ सम्राट स्वयं अच्छे कवि तथा संगीतज्ञ हुए।

विजयनगर राज्य के विद्वानों में सायण का नाम अग्रणी है। उसने संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा आरण्यक पर टीकाएँ लिखीं। सायण के भाई माधव विद्यारण्य भी संस्कृत के उच्चकोटि के विद्वान थे। अलसनी नामक विद्वान तेलगू का बहुत बड़ा कवि था। कृष्णदेवराय के काल में वह राष्ट्रकवि था।

स्थापत्य

विजयनगर के राजाओं में भवन निर्माण के प्रति बड़ी रुचि थी। विजयनगर की राजधानी में भव्य भवन तथा मन्दिरों का निर्माण हुआ। इन उदार राजाओं ने बड़े-बड़े तड़ाग, जलकुण्ड तथा झीलें बनवाने में बड़ा धन व्यय किया। महलों तथा मन्दिरों पर भांतिभांति की चित्रकारी की गई थी।

कृष्णदेवराय ने हजारा मंदिर अर्थात् सहस्र स्तम्भों वाला मंदिर बनवाया जिसे हिन्दुओं की मंदिर स्थापत्य कला का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है। विट्ठल स्वामी का मंदिर भी उस युग की स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है। दुर्भाग्य से उस काल के लगभग समसत भव्य भवन मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दिये गये। उनमें से कुछ ही भवनों के भग्नावशेष अब देखने को मिलते हैं।

आर्थिक दशा

विदेशी यात्रियों ने विजयनगर राज्य के गौरव की बड़ी प्रंशसा की है तथा विजय नगर राज्य की उस काल में विश्व के धनी राज्यों में गिनती की है। राज्य की राजधानी विशाल एवं भव्य भवनों तथा विस्तृत बाजारों से विभूषित थी। सारा नगर सड़कों, बागों, उपवनों, झीलों आदि से अलंकृत था। नगर अपनी सम्पत्ति तथा वैभव के लिये प्रसिद्ध था। देश की भूमि उर्वरा थी।

खनिज पदार्थों का बाहुल्य था और सामुद्रिक व्यापार उन्नत दशा में था। इससे देश में धन की कमी नहीं थी। समुद्र तट पर बहुत अच्छे बन्दरगाह थे। पुर्तगालियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। अरबी घोड़ों का व्यापार जोरों पर था। हीरे, पन्ने, मोती, नीलम आदि खुले बाजार में बेचे जाते थे।

विजयनगर की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि एवं पशुपालन था। शासन की ओर से सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी। इस कारण कृषि भरपूर होती थी। कृषि के बाद दूसरा आधार उद्योग धंधे थे जिनमें वस्त्र तथा धातुओं के उद्योग प्रमुख थे। इत्र का उद्योग भी उन्नत दशा में था। उद्योगों तथा व्यवसायों के अलग-अलग संघ थे।

लेन-देने का काम सोने-चांदी की मुद्राओं से होता था। अंतरदेशीय तथा विदेशी व्यापार दोनों उन्नत अवस्था में थे। साम्राज्य में अनेक अच्छे बंदरगाह थे। पुर्तगाल, अफ्रीका, ईरान, अरब, बर्मा, श्रीलंका, मलाया, चीन आदि बहुत से देशों के साथ बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार होता था।

वस्त्र, चावल, लोहा, शोरा, शक्कर तथा मसालों का व्यापार किया जाता था और घोड़े, हाथी, मोती, ताम्बा, कोयला, पारा, रेशम आदि बाहर से मंगाये जाते थे। राज्य के पास अपना जहाजी बेड़ा भी था और जहाज निर्माण उद्योग भी उन्नत अवस्था में था।

 इटली के यात्री निकोलो कोण्टी ने 1420 ई. में विजयनगर की यात्रा की। उसने लिखा है- ‘नगर की परिधि 60 मील है। उसकी दीवारें पर्वत शिखरों तक पहुंचती हैं। नगर में लगभग 90 हजार व्यक्ति अस्त्र-शस्त्र धारण करने योग्य हैं। राजा भारत के अन्य समस्त राजाओं से अधिक शक्तिशाली है।’

इसी प्रकार 1442-43 ई. में विजयनगर की यात्रा करने वाले ईरानी कूटनीतिज्ञ तथा पर्यटक अब्दुल रज्जाक ने लिखा है- ‘राजा के कोषगृह में गड्ढे बनाये गये हैं जिनमें पिघला हुआ सोना भर दिया गया है। सोने की ठोस शिलाएं बनाई गई हैं। देश की समस्त उच्च एवं नीची जातियों के निवासी कानों, कण्ठों, बाजुओं, कलाइयों तथा उंगलियों में जवाहरात तथा सोने के आभूषण पहनते हैं।’

पुर्तगाली यात्री पेइज ने लिखा है- ‘राजा के पास भारी कोष, अनेक हाथी तथा सैनिक हैं। इस नगर में प्रत्येक राष्ट्र और जाति के लोग मिलेंगे क्योंकि यहाँ व्यापार अधिक होता है और हीरे आदि बहुमूल्य पत्थर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। संसार में यह सबसे अधिक सम्पन्न नगर है। यहाँ चावल, गेहूँ आदि अनाज के भण्डार भरे हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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विजयनगर राज्य का पतन

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विजयनगर राज्य का पतन

दक्षिण भारत के शिया मुसलमान शासकों की कट्टरता के कारण विजयनगर राज्य का पतन हो गया। इन शिया राज्यों ने एक साथ मिलकर विजयनगर के हिन्दू राज्य पर आक्रमण करके उसे नष्ट कर दिया।

विजयनगर राज्य के पतन के कारण

विजयनगर राज्य का इतिहास, पड़ौसी मुस्लिम राज्यों से संघर्ष का इतिहास है। इस संघर्ष में विजयनगर को अत्यधिक क्षति उठानी पड़ी और वह पतनोन्मुख हो चला। विजयनगर राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) मुस्लिम शासकों की कट्टरता

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना ऐसे काल में हुई थी जब चारों ओर मुस्लिम राज्यों की बहुलता थी। मुस्लिम शासक अपनी आंखों से किसी भी हिन्दू राज्य को पनपते हुए नहीं देख सकते थे। इस कारण न केवल बहमनी पड़ौसी राज्य अपितु मालवा एवं गुजरात के दूरस्थ मुस्लिम राज्य भी विजयनगर राज्य को अस्थिर करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे।

(2.) विजयनगर की समृद्धि

विजयनगर एक समृद्ध राज्य था। इस कारण पड़ौसी मुस्लिम राज्य उसकी सम्पदा का हरण करने के लिये प्रायः हर समय विजयनगर राज्य के गांवों में लूट पाट मचाते रहते थे। इस कारण विजयनगर राज्य के वीर सैनिक बड़ी संख्या में वीरगति को प्राप्त हो जाते थे।

(3.) सैनिक दुर्बलता

विजयनगर के हिन्दू राजाओं की सेनाएँ, मुसलमान शासकों की सेनाओं की तुलना में संगठित तथा रणकुशल नहीं थीं। विजयनगर के शासकों ने सैन्य प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं की थी। उन दिनों विजयनगर में अरबी घोड़ों का व्यापार उन्नत दशा में था फिर भी विजयनगर के राजाओं ने अपनी सेना में घोड़ों की अपेक्षा हाथियों को प्रमुखता दी।

हिन्दू राजा एवं सेनापति हाथियों पर बैठकर लड़ने में अधिक विश्वास करते थे परन्तु ये हाथी, मुस्लिम तीरन्दाजों तथा घुड़सवारों के सामने नहीं ठहर नहीं पाते थे और प्रायः पीछे मुड़कर अपने ही सैनिकों को रौंद डालते थे। मुसलमान सैनिकों के पास तोपखाना उपलब्ध था जिसकी सहायता से वे अपनी पराजय को विजय में बदल देते थे।

विजयनगर की सेना का संगठन सामन्तीय पद्धति पर आधारित था जिसमें राजा, अपने सामंतों की सेना पर निर्भर रहता था। सामंती सैनिकों की स्वामिभक्ति प्रायः संदिग्ध होती थी।

(4.) प्रान्तीय शासकों पर निर्भरता

विजयनगर राज्य के लिए प्रान्तीय शासकों पर निर्भरता भी अत्यन्त घातक सिद्ध हुई। प्रान्तीय शासकों को अत्यन्त व्यापक अधिकार प्राप्त थे और उनकी अपनी निजी सेनाएँ हुआ करती थीं। इससे केन्द्रीय शक्ति का निर्बल हो जाना स्वाभाविक था। दुर्बल तथा अयोग्य शासकों के शासन काल में प्रान्तीय शासक स्वतन्त्र होने के प्रयास करते थे जिससे राज्य दुर्बल हो जाता था।

(5.) विलासिता

विजयनगर की सम्पन्नता तथा धन की प्रचुरता के कारण लोग विलासी थे। उनमें कई तरह की बुराइयाँ उत्पन्न होने लगीं तथा उनमें युद्ध करने की इच्छा-शक्ति नहीं बची।

(6.) पुर्तगालियों का विजयनगर की राजनीति में हस्तक्षेप

विजयनगर के उदार शासकों ने अपने राज्य के पश्चिमी तट पर पर्तगालियों को बसने एवं व्यापार करने की अनुमति दे दी। कालान्तर में पुर्तगाली व्यापारी अधिक व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त करने के लिये विजयनगर की आन्तरिक राजनीति में भाग लेने लगे जिसके परिणाम विजयनगर राज्य के लिये अच्छे नहीं हुए।

(7.) रायचूर दोआब की विजय

कृष्णदेवराय द्वारा रायचूर दोआब पर विजय प्राप्त करना विजयनगर के लिये घातक सिद्ध हुआ। रायचूर पर विजय प्राप्त कर लेने से हिन्दुओं का गर्व अत्यधिक बढ़ गया। दूसरी ओर बीजापुर के सुल्तान आलिशाह ने रायचूर में परास्त हो जाने के उपरान्त अन्य मुसलमान राज्यों को विजयनगर के विरुद्ध संगठित करना आरम्भ किया। दक्षिण के मुस्लिम राज्यों का संगठन विजयनगर के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ।

(8.) अच्युतराय की अयोग्यता

कृष्णदेवराय का उत्तराधिकारी अच्युतराय अयोग्य तथा निर्बल शासक था। सेवेल के अनुसार अच्युतराय के चरित्र तथा शासन की कुव्यवस्था ने राज्य का विनाश कर दिया और आक्रमणकारियों के लिए द्वार खोल दिये। उसके राजदरबार में कई दल बन गये। इस कारण अच्युतराय ने अपने ही वंश के शत्रु आदिलशाह को अपनी सहायता करने के लिए आमन्त्रित किया।

(9.) दक्षिण के सुल्तानों के झगड़ों में हस्तक्षेप

विजयनगर राज्य के पतन का तात्कालिक कारण यह था कि सदाशिव राय तथा उसके हठधर्मी मन्त्री रामराय ने दक्षिण के सुल्तानों के झगड़ों में हस्तक्षेप करना आरम्भ किया। सबसे पहले 1543 ई. में इन लोगों ने बीजापुर के विरुद्ध अहमदनगर तथा गोलकुण्डा के साथ एक संघ बनाया। इसके बाद 1558 ई. में अहमदनगर के विरुद्ध संघ बनाया और उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कालान्तर में विजयनगर स्वयम् इस प्रकार के संघ के आक्रमण का शिकार बन गया और छिन्न-भिन्न हो गया।

(10.) सदाशिव के निर्बल उत्तराधिकारी

तालीकोट के युद्ध के उपरान्त कोई ऐसा शासक न हुआ जो विजयनगर राज्य को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचा सकता। इस युद्ध के उपरान्त रामराय के भाई तिरूमल्ल ने 1570 ई. तक सदाशिव के नाम पर विजयनगर के बचे हुए राज्य पर शासन किया। इसके बाद उसने तख्त छीन लिया और अपने नये राजवंश की स्थापना की।

इस वंश का सबसे अधिक प्रसिद्ध राजा बैंकट (प्रथम) था। उसने राज्य को सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न किया परन्तु उसके उत्तराधिकारी अयोग्य तथा निर्बल निकले। इससे विजयनगर राज्य उत्तरोत्तर पतन की ओर अग्रसर होता गया। अन्त में उत्तर का बहुत सा भाग मुसलमानों ने दबा लिया और दक्षिण में मदुरा तथा तंजौर के नायकों ने विजयनगर राज्य के टुकड़ों से अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। इस प्रकार विजयनगर राज्य का अन्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

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मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य मध्य एशिया से आए आक्रांताओं के साथ भारत में आई। मध्यकालीन स्थापत्य में मीनारों एवं गुम्बदों की प्रमुखता है।

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य मध्य एशिया से आए बर्बर तुर्क शासकों एवं उनके बाद आए मुगल आक्रांताओं द्वारा रचा गया। इन आक्रांताओं के भारत में आने के पीछे तीन उद्देश्य प्रमुख थे-

1. भारत की अपार सम्पदा को लूटना,

2. भारत से कुफ्र को हटाकर इस्लाम का प्रसार करना तथा

3. भारत पर सत्ता स्थापित करना।

इन तीनों ही उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये तुर्कों ने भारत में भारी मारकाट मचाई। इसके कारण न केवल भारत के स्थापत्य को भारी क्षति पहुँची अपितु हजारों अच्छे संगीतकारों, शिल्पकारों, गायकों, नर्तकों चित्रकारों, लेखकों, विद्वानों एवं चिंतकों को मार डाला गया।

इसके कारण बहुत सी कलात्मक सामग्री, भवन एवं साहित्य नष्ट हो गया तथा भारतीय कला, स्थापत्य एवं साहित्य का विकास अवरुद्ध हो गया। तुर्क शासक अपने साथ जो इस्लामी संस्कृति भारत में लाये उसके आधार पर भारत में नवीन कला, स्थापत्य एवं साहित्य की रचना आरम्भ हुई।

सारसैनिक या इस्लामिक स्थापत्य कला

जिस समय तुर्कों ने दिल्ली पर विजय प्राप्त की, उस समय तक मध्य एशिया में स्थापत्य कला की एक मिश्रित शैली विकसित हो चुकी थी यह। शैली एक ओर ट्रान्स-ऑक्सियाना, ईरान, ईराक, अफगानिस्तान, मिò, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण-पश्चिम यूरोप की स्थानीय शैलियों और दूसरी ओर अरब की मुस्लिम शैली के समन्वय से बनी थी।

इस शैली को सारसैनिक या इस्लामिक कला कहा जाता है किंतु यह स्थापत्य शैली न तो पूर्ण रूप से मुस्लिम थी और न अरबी। यह एक मिश्रित शैली थी जिसकी कुछ निश्चित मौलिक विशेषताएँ थीं, जैसे-नोकदार तिपतिया मेहराब, मेहराबी डाटदर छतें, इमारतों का अठपहला रूप, गुम्बज आदि। यह स्थापत्य शैली भारत की परम्परागत स्थापत्य शैली से पर्याप्त भिन्न थी। मंगोलों के भारत आने से पहले मुस्लिम स्थापत्य शैली भारत में भली-भांति स्थापित हो चुकी थी।

हिन्दू स्थापत्य कला

मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आगमन से पहले भारत में जो भारतीय स्थापत्य शैलियां विद्यमान थीं, उन्हें विदेश से आई मुस्लिम शैली से अलग करने के लिये इतिहासकारों ने हिन्दू स्थापत्य शैली कहा है। वस्तुतः ऐसी कोई एक शैली नहीं थी जिसे हिन्दू स्थापत्य शैली कहा जा सके।

यह परम्परागत भारतीय स्थापत्य शैलियों का समुच्चय थी जिसका विकास अलग-अलग सदियों तथा अलग-अलग राज्यवंशों के काल में अलग-अलग प्रकार से हुआ था। उत्तर एवं दक्षिण भारत की स्थापत्य शैलियों में बहुत अंतर था, गुप्तों तथा प्रतिहारों के काल की स्थापत्य शैलियों में भी पर्याप्त अंतर था।

चोलों तथा चालुक्यों की स्थापत्य शैलियों में भी अंतर था। फिर भी इस्लामिक शैली से अलग करने के लिये समस्त भारत की स्थापत्य शैलियों को सामूहिक रूप से हिन्दू स्थापत्य शैली कहा जा सकता है क्योंकि समस्त भारतीय स्थापत्य शैलियों में कुछ बातें एक जैसी अवश्य थीं।

हिन्दू स्थापत्य कला एवं इस्लामिक स्थापत्य कला में अन्तर

इस्लामिक स्थापत्य (अथवा सारसैनिक कला) और हिन्दू स्थापत्य कला में अन्तर स्पष्ट दिखाई देता था। मोटे तौर पर ये अन्तर इस प्रकार से थे-

(1.) हिन्दू स्थापत्य कला में अलंकरणों की भरमार थी किन्तु इस्लामिक कला सादगी पर आधारित थी।

(2.) हिन्दू स्थापत्य कला के अन्तर्गत मन्दिरों के ऊपर शिखर बनाये जाते थे, जबकि इस्लामिक कला में मस्जिदों के ऊपर गुम्बद बनाये जाते थे।

(3.) हिन्दू स्थापत्य कला में मजबूती और सुन्दरता को अधिक महत्त्व दिया जाता था जबकि इस्लामिक कला में विशालता, स्थान की अधिकता और सरलता को महत्त्व दिया जाता था।

(4.) हिन्दू मन्दिरों के गर्भगृह में प्रकाश एवं वायु का प्रवेश बहुत कम होता था जबकि मस्जिद का भीतरी भाग प्रकाश एवं वायु से युक्त होता था।

(5.) हिन्दू कला में स्तम्भों एवं सीधे पाटों का महत्त्व था जबकि इस्लामिक कला में मेहराबों एवं गुम्बदों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।

हिन्दू स्थापत्य कला एवं इस्लामिक स्थापत्य कला में समानताएँ

अनेक विभिन्नताओं के उपरांत भी हिन्दू स्थापत्य शैली तथा इस्लामिक स्थापत्य शैली में कुछ समानताएँ भी थीं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

(1.) दोनों ही स्थापत्य शैलियों में धार्मिक महत्व के भवनों को इस प्रकार से बनाया जाता था कि वे दूर से ही पहचान लिये जायें।

(2.) दोनों ही शैलियों में शासकों के आवासीय भवन विशाल होते थे। दोनों ही शैलियों में रनिवास अथवा हरम के लिये भिन्न प्रकार का निर्माण किया जाता था।

हिन्दू स्थापत्य कला एवं इस्लामिक स्थापत्य कला में समन्वय

जब मुसलमान स्थाई रूप से भारत में रहने लगे तब मुस्लिम स्थापत्य कला पर स्थानीय भारतीय स्थापत्य कला का प्रभाव पड़ा। फलस्वरूप भारत में एक नई स्थापत्य कला विकसित हुई। इसके विकास में निम्नलिखित तत्त्वों का योगदान रहा-

(1) यह स्वाभाविक ही था कि मंगोल शासक अपने साथ मध्य एशिया से बड़ी संख्या में भवन निर्माताओं एवं शिल्पकारों को लेकर नहीं आ सकते थे। इसलिये उन्हें अपने लिये भवनों के निर्माण में भारतीय शिल्पकारों की सेवाओं की आवश्यकता पड़ी। भारतीय शिल्पकारों ने मुस्लिम बादशाहों एवं अमीरों के लिये निर्मित भवनों में मुस्लिम शिल्पकारों द्वारा बताये गये ढंग के साथ-साथ परम्परागत भारतीय शैली का भी प्रयोग किया अतः अनजाने में ही हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला का समन्वय हो गया।

(2) हिन्दू-मन्दिरों एवं मुस्लिम-मस्जिदों में कुछ समानताएँ थीं, दोनों में खुला आँगन होता था, जिसके चारों ओर खम्भेदार बरामदे एवं कमरे होते थे। इसलिये मंगोल शासक प्रायः हिन्दू एवं जैन मन्दिरों की पटी हुई छतों को गिरा कर उनके स्थान पर गुम्बदें और मीनारें बनवा देते थे। इस प्रकार बनी मस्जिदों में भी हिन्दू एवं मुस्लिम स्थापत्य का समन्वय हो गया। ऐसे कुछ भवन अजमेर, दिल्ली एवं आगरा आदि नगरों में आज भी देखे जा सकते हैं।

(3) मुस्लिम आक्रान्ताओं ने अनेक हिन्दू भवनों को मस्जिदों, मकबरों, राजकीय आावासों एवं महलों में बदला। इन भवनों के बाह्य आकारों को तो पूरी तरह मुस्लिम शैली के अनुसार बना दिया गया किंतु उनके भीतर का निर्माण भारतीय स्थापत्य के अनुसार ही रहा। आगे चलकर इस प्रकार के भवनों को ही आदर्श स्थापत्य मान लिया गया। और नये बनने वाले भवनों में उनका अनुकरण किया गया। इस कारण भी हिन्दू एवं मुस्लिम स्थापत्य कलाआंे का समन्वय हुआ।

भारतीय मुस्लिम कला

हिन्दू स्थापत्य एवं मुस्लिम स्थापत्य शैलियों के समन्वय के फलस्वरूप एक नई स्थापत्य शैली का विकास हुआ जिसे हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला अथवा भारतीय मुस्लिम कला कहा गया।

डा. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘जिन परिस्थितियों में भारतीय मुस्लिम कला का प्रादुर्भाव हुआ, उसके कारण दोनों के आदर्शों में भी समन्वय अनिवार्य हो गया। हिन्दुओं में मूर्तिपूजा थी, मुसलमान इसका विरोध करते थे। हिन्दू अलंकरण और शृंगार चाहते थे और इस्लाम सादगी पर जोर देता था। इन विरोधी आदर्शों ने मिलकर ऐसी नवीन कला को जन्म दिया कि जिसे हम सुविधा की दृष्टि से ‘भारतीय मुस्लिम कला’ कहते हैं।’

स्थापत्य कलाओं के इस समन्वयन में हिन्दू स्थापत्य कला अधिक प्रभावित हुई अथवा मुस्लिम स्थापत्य कला, इस प्रश्न पर विद्वानों में मतभेद है। स्मिथ, फर्ग्यूसन और एल्फिंसटन आदि अधिकांश विद्वानों का मानना है कि मध्यकालीन भवनों पर हिन्दू स्थापत्य का प्रभाव नगण्य था। जबकि डॉ. परमात्मा शरण आदि अधिकांश भारतीय विद्वानों का मानना है कि मध्ययुगीन स्थापत्य कला में हिन्दू कला का बाहुल्य है। हेवल ने भी इस मत का समर्थन किया है।

डॉ. परमात्मा शरण ने लिखा है- ‘फर्ग्यूसन जैसे विद्वानों ने यह समझने में भूल की है कि पठानकालीन सुल्तानों ने एक नई शैली का विकास किया। वास्तव में न तो पठानों की कोई नई शैली थी, न तुर्कों की, न मंगोलों की, वे सब प्राचीन कला के रूपान्तर थे। हिन्दू घरों, मन्दिरों तथा बौद्ध विहारों के चौक और दालान मस्जिदों के नामाजशाह बन गये।

भारतीय देवालयों के तोरण, मस्जिदों में मक्के की मेहराबों की तरह बनाये जाने लगे, अंतर केवल इतना था कि मस्जिदों में कोई प्रतिमा नहीं होती थी।’ वस्तुतः भारतीय जयस्तम्भों को देखकर ही मस्जिदों के ऊपर मीनारें बनवाई गई थीं। छज्जे, बालकनी और तोरण भी स्पष्टतः भारतीय थे, जो मुस्लिम स्थापत्य में पाये जाते हैं। मुस्लिम स्थापत्य में सजावट तो शुद्ध भारतीय ही है।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि स्थापत्य कलाओं के इस समन्वयन एवं सम्मिश्रण में मुस्लिम कला अधिक प्रभावित हुई थी न कि भारतीय कला। वास्तव में मुस्लिम शासकों ने भारतीय और मुस्लिम शैलियों का प्रयोग ऐसे समुचित ढंग से किया था कि वह एक सर्वथा नई शैली दिखाई देने लगी।

सल्तनतकालीन स्थापत्य कला

गुलाम शासकों का स्थापत्य

कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद

कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 1197 ई. में निर्मित दिल्ली की कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद प्रथम मुस्लिम भवन है जो एक हिन्दू मन्दिर के चबूतरे पर 27 हिन्दू एवं जैन मन्दिरों की ध्वस्त सामग्री से बनाई गई थी। इसमें मेहराबदार दरवाजों की पर्दे जैसी दीवार विशिष्ट इस्लामिक शैली की है जिस पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण हैं। मस्जिद के बहुत-से स्तम्भों के शिरोभाग हिन्दू मन्दिरों से लेकर लगाये गये हैं। मेहराबों की सजावट हिन्दू शैली की है।

कुतुबमीनार

कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में निर्मित दूसरा महत्वपूर्ण भवन कुतुबमीनार है। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसकी पहली मंजिल बनवाई। इल्तुतमिश ने 1232 ई. में इसे पूरा किया। फीरोज तुगलक ने इस मीनार की दो मंजिलें और बनवाईं। इस मीनार की ऊँचाई इल्तुतमिश के काल में 225 फुट थी जो फीरोज तुगलक के काल में 240 फुट की गई।

यह मीनार वृत्ताकार है। इसका व्यास आधार भाग पर 46 फुट और शिखर भाग पर 10 फुट है। कुछ विद्वानों का मत है कि कुतुबमीनार की उत्पत्ति हिन्दू है। मुसलमानों ने इसकी ऊपरी सतह को पुनः गढ़ा था। इस मत की पुष्टि कुतुबमीनार पर खुदे हुए देवनागरी अभिलेखों की उपस्थिति से होती है।

अढाई दिन का झौंपड़ा

अजमेर में स्थित ‘अढाई दिन का झौंपड़ा’ आज एक मस्जिद के रूप में स्थित है। चौहानों के काल में इसे संस्कृत विद्यालय और मन्दिर के रूप में बनाया गया था। चौहान काल में पूरे भारत में इससे सुंदर भवन और कोई नहीं था। कुतुुबुद्दीन ऐबक ने इस भवन का ऊपरी भाग गिराकर उस पर गुम्बजें और महराबें बनावा दीं। इसकी मेहराबें इस्लामिक कला की प्रतीक होते हुए भी, हिन्दू निर्माण पद्धति का परिचय देती हैं।

नासिरूद्दीन महमूद का मकबरा

सल्तनकाल में बनाये गये मकबरों में इल्तुतमिश द्वारा बनवाया गया उसके ज्येष्ठ पुत्र नासिरूद्दीन महमूद का मकबरा प्रमुख है जो कुतुबमीनार से लगभग तीन मील की दूरी पर मलकापुर में बना है। इसके स्तम्भ, स्तम्भों के शिरो-भाग और अधिकांश सजावट हिन्दू स्थापत्य शैली की है किन्तु इसकी मेहराबें एवं गुम्बद इस्लामी स्थापत्य शैली के हैं।

इल्तुतमिश का मकबरा

इल्तुतमिश का मकबरा महत्त्वपूर्ण इस्लामी इमारत है जो लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। यह एक वर्गाकार इमारत है। इसके तीन ओर मेहराबदार प्रवेश-द्वार हैं। इस मकबरे का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य का प्रतीक है। इस पद्धति के अन्तर्गत चौकोर कमरे में गोलाई लाने के लिए कोनों में मेहराब बना दिये गये हैं। इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात् भवनों का निर्माण कार्य रुक गया।

बलबन का मकबरा

इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद बनी इमारतों में बलबन का मकबरा महत्त्वपूर्ण है जो कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिण-पूर्वी छोर पर स्थित है। इसके मेहराब, दीवारों के दोनों सिरों से एक के ऊपर एक पत्थर रखकर और इनमें से प्रत्येक थोड़ा आगे निकाल कर बनाये गये हैं।

खलजी शासकों का स्थापत्य

अलाउद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद, दिल्ली में हिन्दू-मुस्लिम शैली के नये युग का सूत्रपात हुआ। खिलजी काल की स्थापत्य कला की मुख्य विशेषता यह है कि इस काल में मुसलमानों ने सजावट के लिए पत्थर के बेल और फल आदि विषयों को स्थापत्य कला का अभिन्न अंग बना लिया था।

अलाई दरवाजा

अलाउद्दीन खिलजी कुतुब क्षेत्र में एक विशाल मस्जिद और अत्यंत ऊँची मीनार बनाना चाहता था किन्तु 1316 ई. में उसकी मृत्यु के कारण यह योजना कार्यान्वित नहीं की जा सकी। उसके द्वारा निर्मित अलाई दरवाजा इस्लामी स्थापत्य कला का सर्वाधिक कीमती रत्न समझा जाता है।

यह एक वर्गाकार कक्ष है जिसके ऊपर एक गुम्बद है। इसके चारों ओर दीवारों में एक-एक मेहराबदार दरवाजा है। यद्यपि सारी इमारत लाल पत्थर की बनी हुई है किन्तु सजावट के लिये सफेद संगमरमर की पट्टियों, कुरानी सुन्दर लिखावटी अभिलेखों और शोभनीय डिजाइनों का प्रयोग किया गया है।

हजार-सितुन

अलाउद्दीन ने कुतुब क्षेत्र के उत्तर में सीरी का नया नगर बसाया था, जहाँ बनाया गया ‘हजार-सितुन’ (हजार खम्भों वाला) महल अधिक महत्त्वपूर्ण है। अब यह नगर और महल खण्डहर अवस्था में है।

जमैयतखाना मस्जिद

अलाउद्दीन ने निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के अहाते में जमैयतखाना नामक मस्जिद बनवाई थी जो अलाई दरवाजे के नमूने पर बनी हुई है। इसमें मुसलमानी स्थापत्य कला के तत्त्वों को स्पष्ट देखा जा सकता है।

ऊरवा मस्जिद

अलाउद्दीन के उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन मुबारक ने बयाना में ऊरवा मस्जिद बनवाई थी जो खिलजी काल की श्रेष्ठ शैली का पतनोन्मुख रूप है।

तुगलक कालीन स्थापत्य कला

तुगलकों के उत्थान के साथ ही स्थापत्य कला के आदर्शों और शैली दोनों में परिवर्तन आया। घनी सजावट और विलासितापूर्ण वैभव का स्थान इस्लामिक सादगी और गंभीरता ने ले लिया। इस कारण तुगलकों की इमारतें खलजियों की इमारतों की तुलना में कम कलात्मक लगती हैं। गियासुद्दीन तुगलक के समय की महत्त्वपूर्ण इमारतें हैं- तुगलकाबाद में निर्मित महल, दुर्ग और गियासुद्दीन का मकबरा।

गियासुद्दीन का महल

इब्नबतूता सूचित करता है कि गियासुद्दीन का महल सुनहरी ईटों से निर्मित था। जब सूर्योदय होता था तो वह इतनी तेजी से चमकता था कि किसी की उस पर आँख नहीं ठहरती थी।

तुगलकाबाद का दुर्ग

नगर से ऊँचा उठा हुआ और दुहरे-तिहरे परकोटे से रक्षित दुर्ग अपनी विशालता और अभेड्ड मजबूती के लिए प्रसिद्ध था जो ग्वालियर, चितौड़, रणथम्भौर आदि हिन्दू शासकों द्वारा निर्मित स्थापत्य के अनुरूप दिखाई देता था।

गियासुद्दीन का मकबरा

तुगलकाबाद के दुर्ग के निकट ही बना मकबरा पंचभुजीय छोटी-सी गढ़ी जैसा है। यह लाल पत्थर का बना है और इसकी मेहराबों के ऊपर संगमरमर की पट्टियाँ जड़ी हुई हैं। इसका विशाल गुम्बज संगमरमर का है। इसका शिखर हिन्दू स्थापत्य कला के प्रतीक ‘कलश’ या ‘आमलक’ के अनुकरण पर निर्मित है।

मुहम्मद तुगलक का किला

मुहम्मद बिन तुगलक ने तुगलकाबाद नामक छोटे-से किले की नींव डाली थी किन्तु इसके भवन बहुत ही मामूली सामग्री से बनाये गये प्रतीत होते हैं। मुहम्मद तुगलक ने दौलताबाद में नवीन राजधानी का निर्माण किया जिसमें दिल्ली के अनुकरण पर कई भवन बनाये गये।

फीरोज तुगलक के निर्माण

फीरोजशाह तुगलक अपने समय का महान् निर्माता था किन्तु वह खर्चीले कार्य सम्पन्न करने में असमर्थ होने के कारण सादगीपूर्ण इमारतें ही बनवा सका। उसने अनेक सार्वजनिक इमारतें, जैसे- नगर, किले, मस्जिदें, नहरें एवं मकबरे बनवाये। उसने यमुना के किनारे अपनी नयी राजधानी फीरोजाबाद का निर्माण करवाया जो फीराजशाह कोटला के नाम से प्रसिद्ध है।

फीरोजबाद का दुर्ग

फीरोज तुगलक ने फीरोजबाद में चार दुर्ग और नौ मस्जिदें बनवाईं। उसके द्वारा निर्मित दुर्ग में दुर्ग की दीवार से बाहर निकली हुई मंुडेर है जिसमें शत्रु पर पिघली हुई धातु डालने के लिए छिद्र बने हुए हैं। यह नवीन शैली भारतीय स्थापत्य कला में पहली बार प्रयोग में लाई गयी थी।

फीरोजशाह द्वारा निर्मित मस्जिदें

फीरोजशाह ने अपने जीवन काल में अनेक मस्जिदें बनवाई थीं जिनमें ‘काबा मस्जिद’, ‘बेगमपुरी’, ‘खिर्की मस्जिद’ और ‘काली मस्जिद’ अधिक उल्लेखनीय हैं।

खान-ए-जहाँ तिलंगानी का मकबरा

फीरोजशाह के प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ तिलंगानी का मकबरा फीरोजशाह द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इमारत है। उस युग के मकबरे वर्गाकार बनाये जाते थे परन्तु तिलंगानी के मकबरे की योजना अठपहला थी। इसके ऊपर एक ही गुम्बद था और इसके चारों ओर नीचा मेहराबदार बरामदा था।

कबीरूद्दीन औलिया का मकबरा

तुगलक काल की एक अन्य इमारत कबीरूद्दीन का मकबरा है जो लाल गुम्बद के नाम से प्रसिद्ध है। यह नासिरूद्दीन महमूद (1389-92 ई.) के समय में बना। यह मकबरा गियासुद्दीन तुगलक के मकबरे की नकल है किन्तु इसमें खिलजी काल की श्रेष्ठ शैली का पुनः प्रदर्शन किया गया है। इस मकबरे के निर्माण के बाद तैमूर लंग के आक्रमण के कारण दिल्ली के सुल्तान बड़े पैमाने पर इमारतों का निर्माण नहीं करवा सके।

सैयद और लोदी काल का स्थापत्य

तुगलक वंश की समाप्ति के बाद पहले सैयदों ने और फिर लोदियों ने दिल्ली पर शासन किया। सैयदों और लोदियों के काल में निर्मित इमारतों में अब केवल  मकबरे ही बचे हैं। इन मकबरों में दो शैलियाँ दिखाई देती हैं- (1.) तिलंगानी मकबरे के अनुकरण पर बने अठपहला मकबरे और (2.) परम्परागत शैली में बनाये गये वर्गाकार मकबरे।

सिकन्दर लोदी का मकबरा

अठपहला मकबरों में मुहम्मद शाह सैयद के मकबरे के नमूने पर बना सिकन्दर लोदी का मकबरा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें पहली बार दुहरे गुम्बद का प्रयोग किया गया। चारदीवारी से घिरे सहन की विशालता और उसकी अर्धसजावट सर्वाधिक महत्त्वूपर्ण है।

इन्ही दो विशेषताओं ने मुगलकाल के मकबरों का मार्गदर्शन किया। वर्गाकार मबकरे ऊँचाई में अधिक हैं किन्तु लम्बाई चौड़ाई में कम हैं। इनके ऊपर एक गुम्बद है जिसके आधार के चारों ओर कमल की पत्तियों की बेल है। इसके चारों कोनों पर एक-एक स्तम्भ-युक्त छतरी बनी हुई है। इन वर्गाकार मकबरों में अठपहला मकबरों का गंभीर सौन्दर्य नहीं है।

मोठ की मस्जिद

लोदी काल में निर्मित मस्जिदों में मोठ की मस्जिद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें पाँच मेहराबदार प्रवेश द्वार हैं। इस मस्जिद के गुम्बद देखने में सुन्दर लगते हैं। सर जॉन मार्शल ने लिखा है- ‘लोदियों की स्थापत्य कला में जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ है उसका संक्षिप्त रूप मोठ की मस्जिद में वर्तमान है।’

सूरी वंश की इमारत

भारत में मुगल वंश की स्थापना के बाद शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित कर सूरी वंश की स्थापना की। शेरशाह न केवल विजयी सेनापति, विशाल साम्राज्य का संस्थापक एवं कुशल शासक ही था अपितु कला-प्रेमी भी था।

किला-ए-कुहन् मस्जिद

शेरशाह सूरी ने दिल्ली के पुराने किले के पास ‘किला-ए-कुहन् मस्जिद’ बनवाई। इसके प्रवेश द्वार और गुम्बद के चारों ओर की मीनारें ईरानी प्रभाव लिये हुए हैं। इमारत का शेष भाग भारतीय शैली के आधार पर निर्मित है। अतः यह इमारत हिन्दू-इस्लामी स्थापत्य का श्रेष्ठ उदाहरण है।

शेरशाह का मकबरा

सूरी काल में निर्मित हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला का दूसरा सुन्दर नमूना सहसराम (बिहार) में झील के बीच ऊँची कुर्सी पर बना शेरशाह का मकबरा है जिसे स्वयं शेरशाह ने बनवाया था। इसकी आकृति मुस्लिम है किन्तु इसके भीतर तोड़ों तथा हिन्दू शैली के खम्भों का सुन्दर प्रयोग किया गया है। विद्वानों का मत है कि यह मकबरा तुगलक काल की इमारतों के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान् कृति ताजमहल के यथोचित सौन्दर्य के बीच सम्पर्क स्थापित करता है। पर्सी ब्राउन तथा स्मिथ ने इस इमारत की बड़ी प्रशंसा की है।

सल्तनत कालीन चित्रकला

इस्लाम में मूर्ति पूजा की तरह चित्रकला भी वर्जित है क्योंकि चित्रकार जीव-जन्तुओं के चित्र बनाते हुए कल्पना करने लगता है कि वह अपनी चित्रित वस्तुओं को जीवन प्रदान कर रहा है। इस प्रकार वह अल्लाह से समता करने लगता है। जबकि जीवन प्रदान करने वाला एकमात्र अल्लाह है।

इस दृष्टिकोण के कारण कट्टर मुसलमान जीव-जन्तुओं को चित्रित करना पाप समझते थे। इसलिए दिल्ली के सुल्तान, मुसलमान अमीर और जनसाधारण चित्रकला से दूर रहते थे और सुल्तान चित्रकारों को संरक्षण नहीं देते थे। फिर भी सल्तनतकाल में इक्के-दुक्के चित्र बने जिन पर ईरानी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है

सल्तनत कालीन संगीत कला

यद्यपि मुसलमान संगीत को अधार्मिक मानते थे तथापि उन्होंने भारत में नवीन संगीत का प्रचलन किया। इस कारण भारतीय संगीत में भी परिवर्तन आ गये तथा नई रागों एवं वाद्य यंत्रों की उत्पत्ति एवं विकास संभव हो सका। अलाउद्दीन खलजी एवं जलालुद्दीन खलजी के दरबार में संगीत गोष्ठियाँ होती थीं। सूफी संत कव्वालियों के प्रेमी थे। अलाउद्दीन के दरबारी संगीतज्ञों में अमीर खुसरो विशेष उल्लेखनीय है जिसने हिन्दी एवं ईरानी रागों के सम्मिश्रण से नई रागों का आविष्कार किया।

माना जाता है कि अमीर खुसरो ने भारतीय वीणा एवं ईरानी तम्बूरे को मिलाकर सितार का आविष्कार किया तथा भारतीय मृदंग को तबले का रूप प्रदान किया। मुस्लिम शासकों के दरबार में गायक-गायिकाएं एवं नृतकियाँ स्थायी रूप से नियुक्त किये जाते थे। धीरे-धीरे भारतीय संगीत में ईरानी, अरबी एवं तुर्की धुनों का समावेश होता चला गया।

सल्तनत कालीन मूर्तिकला

मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला अत्यन्त ही उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम धर्म की सेवा तथा धार्मिक कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। मुहम्मद गौरी एवं कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण में दिल्ली, आगरा, अजमेर आदि में स्थित लगभग समस्त प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया।

बहुत से मंदिरों ने अपने मंदिर के बाहर इस्लामिक चिह्न अंकित किये ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर सकें। फिर भी इन मंदिरों की मूर्तियों को पूर्णतः अथवा अंशतः विक्षत कर दिया गया। सल्तनत काल में मंदिर एवं मूर्तियों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई इसलिये उत्तर भारत में मूर्तिकला का विकास ठप्प हो गया। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य सहित उन अन्य राज्यों में मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण होता रहा जहाँ हिन्दू शासक राज्य कर रहे थे।

सल्तनतकालीन धातुकला

सल्तनतकाल में रंग-बिरंगी डिजाइनों में सुसज्जित मिट्टी के बर्तनों और धातु की चीजें बनाने की कला विकसित अवस्था में थी। शाही महलों, अमीरों और मुस्लिम अधिकारियों के घरों में धातु के जड़ाऊ भांडों, चीनी मिट्टी, पीतल तथा चाँदी के बहुत ही सजावटपूर्ण बर्तनों का उपयोग किया जाता था।

सुन्दर कलात्मक खुदाई के बर्तन, पीतल के खिलौने, उभरी नक्काशी की ढालें, उभरे काम की धातु की थालियाँ, प्याले, प्यालियाँ, विभिन्न प्रकार की कलात्मक सुराहियाँ बड़े स्तर पर बनाई जाती थीं। दिल्ली के सुल्तान धातु के सजावटी काम के शौकीन थे। मुस्लिम बादशाहों एवं अमीरों की बेगमें भारत के रत्नाभूषणों की ओर आकर्षित हुईं जिससे स्वर्णकारों को आभूषण कला प्रदर्शित करने का पर्याप्त अवसर मिल गया। स्वर्णकार और जौहरी सदैव काम में लगे रहते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मध्यकालीन कला एवं साहित्य

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

मध्यकालीन साहित्य

मुगल कालीन चित्रकला एवं मूर्तिकला

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मध्यकालीन साहित्य

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मध्यकालीन साहित्य

भारत का मध्यकालीन साहित्य दो धाराओं में बंटा हुआ है। पहली धारा विदेशी आक्रांताओं की संस्कृति से अनुप्राणित है तथा दूसरी धारा विदेशी आक्रांताओं के संत्रास से से ग्रस्त हिन्दू प्रजा के मनोबल को ऊंचा उठाने उद्देश्य से लिखे गए साहित्य की है।

फारसी साहित्य

अधिकांश तुर्क शासक साहित्य प्रेमी थे और विद्वानों तथा कवियों के आश्रयदाता थे। अतः मध्ययुगीन भारत में महत्त्वपूर्ण साहित्यिक उन्नति हुई किन्तु अधिकतर साहित्य अरबी और फारसी भाषाओं में लिखा गया। इस काल का अधिकांश साहित्य इस्लामिक एवं विभिन्न सूफी मतों से सम्बन्धित है।

अलबरूनी

महमूद गजनवी के भारत आक्रमणों के समय उसके साथ कई कवि और लेखक भारत आए। अलबरूनी भी उन्हीं में से एक था। उसने संस्कृत भाषा एवं साहित्य का ज्ञान भी प्राप्त किया। उसने अपनी पुस्तक ‘तहकीकाते हिन्द’ में भारत की तात्कालिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का विस्तृत वर्णन किया है। भारत विषयक ज्ञान की गहराई और विस्तार में कोई भी अन्य मुसलमान लेखक अलबरूनी की बराबरी नहीं करता।

मिनहाज-उस-सिराज

इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज इल्तुतमिश के काल में शाही सेवा में था। उसने ‘तबकात-ए-नासिरी’ लिखी जिसमें प्रारम्भिक काल से लेकर 1260 ई. तक का इतिहास है। यद्यपि उसकी गद्य शैली प्रभावपूर्ण नहीं है तथापि घटनाओं की स्पष्टता के कारण ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

बलबन कालीन साहित्यकार

जब मंगोलों ने मध्य एशियन देशों को विध्वस्त कर डाला, तब इन देशों के मुस्लिम विद्वान् और कवियों ने भागकर दिल्ली में बलबन के दरबार में आश्रय लिया। इस प्रकार दिल्ली में फारसी साहित्य के इतिहास के एक नये युग का सूत्रपात हुआ। बलबन का ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद अच्छे कवियों का बड़ा आदर करता था। फारसी के दो महान् कवियों- अमीर खुसरो और मीर हसन देहलवी ने उसी के आश्रय में काव्य-सृजन आरम्भ किया था।

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो फारसी का सर्वश्रेष्ठ भारतीय कवि था। उसका जन्म 1253 ई. में उत्तर प्रदेश के वर्तमान इटावा जिले के पटियाली गाँव में हुआ था। उसका पिता सैफुद्दीन महमूद एक तुर्क था जो नासिरूद्दीन मुहम्मद के काल में भारत में आकर बस गया था और बाद में इल्तुतमिश और उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में उच्च प्रशासनिक पदों पर रहा।

अमीर खुसरो की माँ बलबन के एक अमीर इमादउलमुल्क की पुत्री थी। खुसरो में काव्य प्रतिभा बचपन से ही थी। उसने आठ वर्ष की आयु में कविता लिखना आरम्भ किया और 12 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते परिपक्व कवि बन गया। उसने फारसी काव्य से प्रेरणा प्राप्त की। धीरे-धीरे उसने स्वयं अपनी शैली का विकास कर लिया।

वह समस्त प्रकार की काव्य-रचना बड़ी सुगमता से कर लेता था। गीत लिखने में उसे विशेष दक्षता प्राप्त थी। तुर्की, फारसी और हिन्दी भाषाओं पर उसका पूर्ण अधिकार था। खुसरो ने कविता, कहानी, मनसवी और इतिहास के अनेक ग्रन्थ लिखे। उसके कुछ महत्त्वूपर्ण ग्रन्थ हैं- शीरी एवं फरहाद, लैला एवं मजनूं, आइने सिकन्दरी, हश्त-विहिश्त, देवलरानी एवं खिज्रखाँ, तुगलकनामा, तारीखे दिल्ली आदि।

अमीर खुसरो, बलबन से लेकर गियासुद्दीन तुगलक के समय तक कई सुल्तानों के दरबार में रहा। वह सूफी सन्त निजामुद्दीन औलिया का शिष्य था। वह प्रथम भारतीय मुसलमान लेखक था जिसने हिन्दी शब्द और मुहावरों का प्रयोग किया और भारतीय विषयों पर लिखा।

वह उच्चकोटि का कवि, कहानीकार और इतिहासकार होने के साथ-साथ संगीतकार भी था। उसने अपनी कविताओं, पहेलियों और गजलों में हिन्दी और फारसी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया। सूफी होने के कारण उसका दृष्टिकोण उदार था। उसने भारतीय विषयों पर भी लिखा।

अपनी प्रसिद्ध मसनवी ‘नूह सिफ’ (नौ आकाश) में उसने भारतीय जलवायु, पशु, पक्षी, धार्मिक विश्वासों और जन-भाषा का उल्लेख किया। मिनहाज-उस-सिराज की तरह उसने भी भारत की तुलना स्वर्ग के उद्यानों से की। वह भारतीय भूमि की ऊर्वरता, समशीतोष्ण जलवायु और मोरों की प्रशंसा करता है।

कहीं-कहीं तो वह भारत को विश्व के अन्य देशों से श्रेष्ठ ठहराता है। खुसरो भारतीय संगीत का बड़ा प्रेमी था। उसका कहना था कि भारतीय संगीत में विशेष आकर्षण है। माना जाता है कि अमीर खुसरो ने भारतीय वीणा और ईरानी तम्बूरे को मिलाकर सितार का आविष्कार किया।

मीर हसन देहलवी

सुप्रसिद्ध भारतीय मुसलमान कवि मीर हसन देहलवी, अमीर खुसरो का समकालीन और उसका मित्र था। वह अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवियों में से था तथा अपनी गजलों के लिए बहुत प्रसिद्ध था। गजलों के कारण वह हिन्दुस्तानी सादी कहलता था। मीर हसन भी निजामुद्दीन औलिया का शिष्य था।

उसने औलिया के वार्तालापों को अपने फवायद-उल-फौद नामक ग्रन्थ में उल्लेखित किया है। यह ग्रन्थ सूफी दर्शन का अमूल्य ग्रन्थ माना जाता है। इतिहासकार जियाउद्दीन बर्नी उसकी काव्य प्रतिभा से बड़ा प्रभावित हुआ था। उसकी मृत्यु, अमीर खुसरो की मृत्यु के दो वर्ष बाद 1327 ई. में हुई थी।

तुगलक कालीन साहित्यकार

तुगलक शासकों के काल में कई महत्वर्पूण ग्रंथ रचे गये जिनसे उस काल के इतिहास की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। उनमें से कुछ इतिहासकारों का परिचय इस प्रकार से है-

जियाउद्दीन बरनी

मुस्लिम इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी मुहम्मद-बिन-तुगलक के दरबार में 17 वर्ष तक रहा। उसने अपने ग्रन्थ का नाम अपने अन्तिम आश्रयदाता फीरोजशाह तुगलक के नाम पर ‘तारीख-ए-फीरोजशाही‘ रखा। इस ग्रन्थ में सुन्दर भाषा का प्रयोग हुआ है।

यद्यपि वह निजामुद्दीन औलिया का शिष्य था किन्तु अपने अनुदार दृष्टिकोण के कारण उसने उदार सुल्तानों की बड़ी निन्दा की है। अपने विरोधियों की चालों के कारण फीरोज तुगलक के काल में वह राज्याश्रय से वंचित हो गया। इस कारण उसने अपने अन्तिम वर्ष बड़ी निर्धनता में काटेे।

बदरूद्दीन मुहम्मद

मुहम्मद-बिन-तुगलक के दरबार में एक अन्य विद्वान चय (ताशकन्द) निवासी बदरूद्दीन मुहम्मद भी था। उसके दो ग्रन्थ- ‘दीवान‘ और ‘शाहनामा‘ प्रसिद्ध हैं।

इसामी

इसामी इस युग का प्रसिद्ध विद्वान था उसने ‘फुतूह-उल-फसलातीन’ नामक पद्यबद्ध ग्रन्थ लिखा जिसमें गजनवियों के काल से लेकर 1350 ई. तक के भारत के मुसलमान शासकों का इतिहास है।

फीरोज तुगलक

सुल्तान फीरोज तुगलक स्वयं भी इतिहास लेखन से प्रेम करता था। उसने ‘फतूहात-ए-फीरोजशाही’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें उसने अपने राज्यकाल का विवरण दिया है।

शम्ससिराज अफीफ

फीरोज तुगलक के समय में शम्ससिराज अफीफ ने ‘तारीखे फीरोजशाही’ नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखा।

मुहम्मद बिहामदखानी

तुगलक शासकों के अन्तिम काल में मुहम्मद बिहामदखानी ने ‘तारीखे मुहम्मदी’ लिखी।

शाइया-बिन-अहमद

शाइया-बिन-अहमद ने तुगलक शासकों के अन्तिम काल में ‘तारीखे मुबारकशाही’ लिखी।

सैयद और लोदी काल के साहित्यकार

सैयद और लोदी काल में भी फारसी साहित्य की प्रगति हुई। इस काल में रफीउद्दीन शीराजी, शेख अब्दुल्ला तुलावनी, शेख जमालुद्दीन के नाम उल्लेखनीय हैं। चौदहवीं सदी के अन्तिम चतुर्थांश में औषधि-शास्त्र, ज्योतिष, संगीत आदि के कुछ उपयोगी संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया।

फारसी विद्वानों ने मुख्य रूप से साहित्य, इतिहास और धर्म पर ग्रन्थ लिखे थे। इस काल में ऐतिहासिक ग्रन्थ अधिक लिखे गये, जिनमें इतिहासकारों ने अपने आश्रयदाता के शासन की घटनाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया। फिर भी इन ग्रन्थों से सल्तनकालीन इतिहास की अच्छी सामग्री प्राप्त हो जाती है।

प्रांतीय शासकों के समय के साहित्यकार

तुगलक वंश के पतन के बाद भारत में जो प्रान्तीय राज्य स्थापित हुए उनमें भी मध्यकालीन साहित्य विशेषकर फारसी साहित्य की अच्छी प्रगति हुई। दक्षिण के बहमनी वंश के शासकों में से कई स्वयं अच्छे विद्वान थे। सुल्तान ताजुद्दीन फीरोजशाह ज्योतिष का विद्वान् था। उसने दौलताबाद में एक वेधशाला बनवाई।

गुजरात के महमूद बेगड़ा के शासन काल में फजालुल्लाह जैनुल ओबिदीन ने प्रारम्भ से लेकर नौवीं सदी तक का इतिहास लिखा। बीजापुर के महमूद अयाज ने कामशास्त्र पर ग्रन्थ लिखा जिसमें विभिन्न प्रकार की स्त्रियों की विशेषताओं का वर्णन किया गया है।

संस्कृत साहित्य

दिल्ली के सुल्तानों ने संस्कृत साहित्य को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया। राजकीय संरक्षण नहीं मिलने पर भी मध्यकालीन साहित्य में संस्कृत साहित्य की वृद्धि होती रही। इस युग के अधिकांश संस्कृत ग्रन्थ विजयनगर, वारंगल, गुजरात और राजपूताने के हिन्दू राजाओं के संरक्षण में लिखे गये।

कुछ संस्कृत ग्रन्थों की रचना बंगाल और दक्षिण भारत के भक्ति आन्दोलन के कारण भी हुई। इस काल के ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थों में कल्हण कृत ‘राजतंरगिणी‘, न्यायचन्द्र का ‘हम्मीर काव्य’ और सोमचरित गुणी का ‘गुरु गुण रत्नाकर‘ उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। जयदेवकृत ‘गीत गोविन्द‘ इसी काल की रचना है।

इस काल में संस्कृत नाटक भी बड़ी संख्या में रचे गये। अलबरूनी संस्कृत का ज्ञाता था। उसने संस्कृत के कई ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद करके संस्कृत ग्रंथों के उपयोगी ज्ञान की जानकारी फारसी भाषा के पाठकों तक पहुंचाई।

हिन्दी साहित्य

तुर्की सुल्तानों का हिन्दी भाषा के प्रति कोई लगाव नहीं था किंतु इस काल में मध्यकालीन साहित्य में चले भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों ने अपने मत का प्रचार करने के लिए हिन्दी भाषा का सहारा लिया। रामानुज और रामानन्द ने भी हिन्दी भाषा में प्रचार किया। राजपूत शासकों की शौर्य गाथाएँ- पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, खुमाण रासो, आल्हा-ऊदल आदि ग्रन्थ हिन्दी भाषा के अन्य रूप डिंगल में लिखे गये।

अमीर खुसरो ने अनेक रचनाओं का हिन्दी भाषा में सृजन किया। खुसरो के समकालीन गोपाल नायक ने हिन्दी की ही एक बोली बृजभाषा में ध्रुपद के गीतों की रचना की। मौलाना दाऊद ने हिन्दी के एक अन्य रूप अवधी में ‘चन्दायन’ की रचना की और कुतबन ने ‘मृगावती’ लिखी। ये दोनों, प्रेम कथाएँ हैं।

उर्दू साहित्य

सल्तनतकाल अथवा उससे थोड़ा पहले मध्य एशियन तुर्कों और हिन्दुओं के सम्पर्क के फलस्वरूप उर्दू भाषा का विकास हुआ। आरम्भ में इसे ‘जबान-ए-हिन्दवी‘ कहा जाता था। बाद में इसे उर्दू कहने लगे। इस भाषा का व्याकरण भारतीय है तथा शब्दावली अरबी एवं फारसी है।

अमीर खुसरो पहला मुसलमान कवि था जिसने इस भाषा को अपनी कविता का माध्यम बनाया। तेरहवीं और चौदहवीं सदी की जनभाषा ‘जबान-ए-हिन्दवी’ ही थी। इसलिए सूफी सन्तों और भक्ति आन्दोलन के कुछ सन्तों ने उर्दू में अपने मत का प्रचार किया। सल्तनतकालीन दिल्ली के सुल्तानों ने उर्दू को प्रश्रय नहीं दिया।

मुगलकाल में भी 18वीं सदी के मध्य तक इसे कोई दरबारी संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रकार तेरहवीं सदी के प्रारंभ से लेकर अठारहवीं सदी के मध्य भाग तक फारसी ही दरबारी भाषा बनी रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मध्यकालीन कला एवं साहित्य

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

मध्यकालीन साहित्य

मुगल कालीन चित्रकला एवं मूर्तिकला

मुगलकालीन साहित्य

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन

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मध्यकालीन भक्ति आंदोलन भारत की जनता को आत्मिक सम्बल प्रदान करने के लिए चला ताकि वे विदेशी आक्रांताओं द्वारा दिए जा रहे संत्रास का सामना करके स्वयं को हिन्दू धर्म में दृढ़ता से खड़ा रख सकें।

भगवद्-भक्ति की अवधारणा

भगवद् प्राप्ति के लिये उसकी भक्ति करने की अवधारणा उपनिषद् काल में पनपी। श्रीमद्भगवद्गीता ने उसे दार्शनिक आधार प्रदान किया। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है- ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज।’

अर्थात् सब धर्मों को छोड़कर मेेरी शरण में आ। अर्थात् मेरी भक्ति कर। गीता के बारहवें अध्याय में भक्ति का अत्यन्त सौम्य निरूपण किया गया है। बौद्धों तथा जैनियों के धार्मिक आंदोलनों के कारण भक्ति प्रवाह अवरुद्ध होने लगा। शुंग, कण्व तथा गुप्त शासकों के काल में विष्णु भक्ति का पुनरुद्धार हुआ किंतु बाद में पुनः बौद्धों ने विष्णु भक्ति का मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

बौद्धों के मत का खण्डन करने के लिये आठवीं शताब्दी ईस्वी में श्री शंकराचार्य ने ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उनकी शिक्षाओं ने बौद्धों के प्रभाव को तो नष्ट किया ही, साथ ही हिन्दू धर्म में भक्ति के स्थान पर ज्ञान का बोलबाला हो गया। ग्यारहवीं शताब्दी में शंकराचार्य की शिक्षाओं के विरुद्ध घोर प्रतिक्रिया आरम्भ हुई और हिन्दू धर्म, ज्ञान रूपी नदी के तटों का बंधन तोड़कर भक्ति मार्ग पर चलने लगा।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन

दिल्ली सल्तनत के काल में भारत भूमि पर भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ तथा मध्यकालीन भक्ति आंदोलन चला। इसके बाद भक्ति आंदोलन तब तक वेगवती नदी के समान प्रवाहरत रहा जब तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत कमजोर न पड़ गई।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रभाव से हिन्दुओं को नवीन मनोबल प्राप्त हुआ तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से अनेक राज्य हिन्दू राजपूतों द्वारा शासित थे। उनके सरंक्षण में हिन्दू धर्म के भीतर भक्ति आंदोलन अपने चरम को पहुँच गया।

भक्ति आन्दोलन के पुनरुद्धार के कारण

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के निम्नलिखित कारण प्रतीत होते हैं-

(1) हारे को हरि नाम

बर्नीयर ने तारीखे फीरोजशाही में लिखा है-  ‘हिन्दुओं के पास धन संचित करने के लिये कोई साधन नहीं रह गये थे। उनमें से अधिकांश को निर्धनता, अभावों एवं अजीविका के लिये निरंतर संघर्ष में जीवन बिताना पड़ता था। हिन्दू प्रजा के रहन-सहन का स्तर बहुत निम्न कोटि का था। करों का सारा भार उन्हीं पर था। राज्य पद उनको अप्राप्य थे। अलाउद्दीन ने दोआब के हिन्दुओं से उपज का 50 प्रतिशत भाग बड़ी कठोरता से उगाहा था।’

इन विकट परिस्थतियों में हिन्दुओं में हारे को हरिनाम अर्थात् परास्त एवं कमजोर व्यक्ति का आसरा स्वयं परमेश्वर है, की भावना ने जन्म लिया तथा हिन्दुओं ने अपने कष्टों को कम करने के लिये ईश्वर की शरण में जाने का मार्ग पकड़ा। फलतः सल्तनत काल में हिन्दू धर्म में भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ।

(2.) क्रियात्मक शक्ति के नियोजन की आवश्यकता

जब हिन्दुओं को बड़ी संख्या में राजकीय सेवाओं से निकाल दिया गया, उनकी खेती-बाड़ी चौपट हो गई। खेत व घर मुसलमानों द्वारा छीन लिये गये, उन्हें सम्पत्ति कमाने तथा रखने के अधिकारों से वंचित कर दिया गया तब हिन्दुओं के पास अपनी क्रियात्मक शक्ति को नियोजित करने का कोई अन्य उचित माध्यम नहीं रहा। ऐसी स्थिति में संकटापन्न एवं विपन्न हिन्दुओं ने स्वयं को भगवद्-भक्ति में नियोजित किया। इस प्रकार भक्ति भावना की अपार धारा प्रवाहित हो चली।

(3.) सूफी सम्प्रदाय का तात्त्विक प्रभाव

तत्त्व रूप में सूफी मत भारतीय वेदांत के काफी निकट है। इसलिये यह संभव नहीं था कि हिन्दू जनता, सूफियों से असम्पृक्त रह जाती। दिल्ली सल्तनत के विस्तार के साथ-साथ भारत में सूफी सम्प्रदाय का प्रचार भी बढ़ा। सूफी प्रचारक अल्लाह से प्रेम एवं उपासना पर बल देते थे और समस्त मानवों को समान समझते थे। जब हिन्दू, सूफी प्रचारकों के सम्पर्क में आये तब वे उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। फलतः हिन्दू लोग भी ईश्वर की भक्ति पर जोर देने लगे।

(4.) सबके लिये सुलभ मार्ग की आवश्यकता

उस काल में हिन्दू धर्म की जटिलता, बाह्याडम्बरों एवं जाति प्रथा से तंग आकर बहुत से हिन्दू स्वेच्छा से मुसलमान बनने लगे। तब हिन्दू धर्म सुधारकों ने इस बात को अनुभव किया कि हिन्दू धर्म को सब लोगों के लिये सुगम बनाना होगा ताकि लोग इसे छोड़कर अन्य धर्म न अपनायें। इसलिये ईश्वर की सरल भक्ति का मार्ग विस्तारित किया गया जो सबके लिये सुलभ थी और सबको बराबर स्थान देती थी।

(5.) गुलामी के कष्टों को भूलने का साधन

दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा हिन्दुओं को आभूषण पहनने, घोड़े पर चढ़ने, राजकीय सेवा करने, सम्पत्ति रखने आदि अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। यह पराधीनता उन्हें सालती थी। भक्ति-मार्ग उनकी पराधीनता के विस्मरण का एक अच्छा साधन सिद्ध हुआ। ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष को सर्वप्रधान मानकर यह प्रचारित किया जाने लगा कि इसकी प्राप्ति केवल ईश्वर की दया अथवा भक्ति से हो सकती है।

(6.) परस्पर सहयोग की आवश्यकता

मनुष्य सामाजिक प्राणी है, साथ-साथ रहने से उसे एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह तभी संभव है जब दोनों के बीच कटुता नहीं हो। जिस तरह सूफियों में दूसरे धर्म के लोगों के प्रति कटुता नहीं थी उसी प्रकार भगवद्-भक्ति का आधार भी समस्त प्राणियों को ईश्वर की संतान मानकर उनसे प्रेम करने की प्रेरणा ही है। इस भावना को निरंतर विस्तारित करने की आवश्यकता थी, इसलिये भक्ति आंदोलन निरंतर आगे बढ़ता रहा।

भक्ति आन्दोलन की रूप-रेखा

श्रीमद्भगवत्गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताये गये हैं- ज्ञान, प्रेम और उपासना। इनमें से ज्ञान मार्ग सर्वाधिक कठिन है और भक्ति मार्ग सर्वाधिक सरल है। भक्ति अपने उपास्यदेव के प्रति भक्त की अपार श्रद्धा तथा असीम प्रेम है। इस भक्ति से प्रसाद प्राप्त होता है। प्रसाद उपास्यदेव की अपने भक्त के ऊपर विशेष कृपा है जिससे उसे मोक्ष मिलता है।

सल्तनत काल में मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू धर्म के आडम्बरों तथा जटिलताओं को दूर कर उसे सरल तथा स्पष्ट बनाने के प्रयास किया। इन लोगों ने एकेश्वरवाद को अपनाया अर्थात् एक ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया। ईश्वर की भक्ति विष्णु तथा उनके अवतारों- राम अथवा कृष्ण के रूप में की गई।

हिन्दू धर्म सुधारकों का विश्वास था कि मोक्ष केवल ईश्वर की दया से प्राप्त हो सकता है। भक्ति मार्गी सुधारकों ने नाम तथा गुरु की महत्ता पर बल दिया। उनके उपदेशों में भक्ति भावना की प्रधानता है तथा अहंकार का अभाव है। भक्तों ने स्वयं को अपने उपास्य देव की प्रेयसी घोषित किया।

भक्ति मार्ग की शाखाएँ

ईश्वर प्राप्ति के तीन प्रधान साधनों- ज्ञान, प्रेम तथा उपासना को आधार बनाकर भक्ति की तीन शाखाएं प्रवाहित हुईं- ज्ञान मार्गी, प्रेम मार्गी तथा भक्ति मार्गी।

ज्ञान मार्गी शाखा

ज्ञान मार्गी शाखा के संतों ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बाह्याडम्बरों तथा मिथ्याचारों की आलोचना करके दोनों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयत्न किया। इस शाखा के प्रधान प्रवर्तक कबीर थे। वे एकेश्वरवादी तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने नाम तथा गुरु दोनों की महत्ता को स्वीकार किया।

प्रेम मार्गी शाखा

प्रेम मार्गी शाखा के सन्तों ने ईश्वर को अपने प्रेम पात्र के रूप में देखने का प्रयत्न किया है। इन सन्तों ने सर्वेश्वरवाद को पुष्ट किया। अर्थात् सम्पूर्ण संसार ईश्वर है। इन सन्तों ने भौतिक प्रेम द्वारा ईश्वरीय प्रेम का प्रतिपादन किया। उन्होंने हिन्दू तथा सूफी सिद्धांतों का समन्वय करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयास किया।

भक्ति मार्गी शाखा

भक्ति मार्गी शाखा के सन्त अपने इष्टदेव की पूजा तथा उपासना में लीन रहते थे। वे देश तथा जाति का कल्याण ईश्वर भजन में ही पाते थे। भक्ति मार्गी सन्तों को राज-दरबार के ऐश्वर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। न उनका मुसलमानों से कोई विरोध था और न उनसे मेल करने का किसी प्रकार का आग्रह था।

इन सन्तों ने विष्णु एवं उनके अवतारों राम तथा कृष्ण के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। भक्ति मार्गी संत अपने इष्टदेव का गुणगान करना अपना परम धर्म समझते थे। इन सन्तों ने अपने कर्मों तथा गुणों की अपेक्षा भगवत् कृपा को अधिक महत्व दिया।

भक्ति मार्गी सन्तों की दो शाखायें हैं- राम भक्ति शाखा तथा कृष्ण भक्ति शाखा। राम भक्ति शाखा के सन्तों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अतिशय विनयशीलता तथा मर्यादाशीलता है। इन सन्तों ने विभिन्न मत मतान्तरों, उपासना-पद्धतियों तथा विचार धाराओं में समन्वय स्थापित किया तथा हिन्दू जाति को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।

कृष्ण भक्ति शाखा के सन्तों ने श्रीकृष्ण की लीलाओं का गुण गान किया और श्रीकृष्ण की उपासना पर बल दिया। रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य तथा तुलसीदास, राम भक्ति मार्गी सन्त थे जबकि निम्बार्काचार्य, चैतन्यमहाप्रभु तथा सूरदास, कृष्ण भक्ति मार्गी सन्त थे।

मध्य युगीन भक्ति सम्प्रदाय

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के भक्ति सम्प्रदायों में रामानुजाचार्य का श्री सम्प्रदाय, विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य का निम्बार्क सम्प्रदाय, माधवाचार्य का द्वैतवादी माध्व सम्प्रदाय, रामानंद का विशिष्टाद्वैतवादी रामानन्द सम्प्रदाय, वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवादी पुष्टि सम्प्रदाय, चैतन्य महाप्रभु का गौड़ीय सम्प्रदाय अथवा चैतन्य सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

भक्ति मार्गी सन्त

रामानुजाचार्य

भक्ति मार्ग के सबसे बड़े समर्थक स्वामी रामानुजाचार्य थे। उनका जन्म 1016 ई. में हुआ था। रामानुज सगुण मार्गी उपासक तथा विशिष्टाद्वैतवादी तत्त्व चिंतक थे। वे ईश्वर को प्रेम तथा सौन्दर्य के रूप में मानते थे। वे विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजा के समर्थक थे। उनका मानना था विष्णु सर्वेश्वर हैं। वे मनुष्य पर दया करके इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। रामानुज राम को विष्णु का अवतार मानते थे और राम की पूजा पर जोर देते थे। उनका कहना था कि पूजा तथा भक्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

निम्बार्काचार्य

भक्ति मार्ग के दूसरे समर्थक निम्बार्काचार्य थे। वे रामानुज के समकालीन थे। रामानुज की भांति निम्बार्क ने भी शंकराचार्य के सिद्धान्तों का खण्डन किया। निम्बाकाचार्य मध्यम मार्गी थे। वे द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों में विश्वास करते थे। उनका कहना था कि जीवात्मा तथा परमात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है। ब्रह्म इस विश्व का रचयिता है। निम्बाकाचार्य कृष्ण मार्गी थे और कृष्ण को ईश्वर का अवतार मानते थे। उनके विचार से कृष्ण भक्ति से मोक्ष मिल सकता है।

माधवाचार्य

तीसरे भक्ति मार्गी सन्त माधवाचार्य थे। उनका जन्म 1200 ई. में हुआ। वे विष्णु के उपासक थे। उनके विचार में मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य हरि का दर्शन प्राप्त करना है। हरि दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो जाता है। माधव के विचार में ज्ञान से भक्ति प्राप्त होती है और भक्ति से मोक्ष मिलता है।

रामानन्दाचार्य

रामानन्द राम मार्गी शाखा के सन्त थे। उनका जन्म चौहदवीं शताब्दी में हुआ था जब तुगलक सुल्तानों को भयानक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। रामानन्द के विचार रामानुज के विचारों से भी अधिक क्रान्तिकारी थे। रामानन्द वैष्णव थे परन्तु वे जाति प्रथा को नहीं मानते थे। रामानन्दी लोग राम तथा सीता की पूजा करते हैं।

वल्लभाचार्य

वल्लभाचार्य कृष्ण मार्गी शाखा के सन्त थे। यह कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे और उन्हें विष्णु का अवतार मानते थे। वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत का उपदेश दिया था। उनका कहना था कि ईश्वर से प्रेम तथा उसकी भक्ति करके हम ईश्वर की दया को प्राप्त कर सकते है। यद्यपि वल्लभाचार्य ने संसार के भोग-विलास  त्याग कर विरक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया था परन्तु उनके अनुयायी इसका अनुसरण नहीं कर सके।

चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीन थे। वे बंगाल के सबसे बड़े धर्म सुधारक थे। उनका मानव के भ्रातृत्व में दृढ़ विश्वास था। वे जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। उनके विचार में केवल कर्म से कुछ नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति के लिए हरि भक्ति तथा उनका गुणगान करना आवश्यक है। प्रेम तथा लीला इस सम्प्रदाय की विशेषताएँ हैं।

चैतन्य निम्बार्काचार्य की भांति भेदाभेद के सिद्धान्त को मानते थे अर्थात् जीवात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है। केवल भक्ति के बल से ही मानव की आत्मा श्रीकृष्ण तक पहुँच सकती है। मनुष्य की आत्मा ही राधा है। उसे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहना चाहिए। दास के रूप में, मित्र के रूप में तथा प्रेम के रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम करना मानव जीवन का प्रधान लक्ष्य है।

जिस समय उत्तरी भारत में तुर्क शासकों का अत्याचार चरम पर था। उस समय सूरदास ने कृष्णभक्ति की धारा बहाई। वे वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे तथा मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे। सूरदास जन्म से अंधे थे। वे उपदेशक अथवा सुधारक नहीं थे। उन्होंने तैलंग ब्राह्मण वल्लभाचार्य को अपना गुरु बनाया और भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया।

सूरदास

सूरदास ने भागवत् पुराण में वर्णित भगवद् लीलाओं को आधार बनाकर कई हजार भक्ति पदों की रचना की। इन पदों में भगवान श्रीकृष्ण के यशोदा माता के आंगन में विहार करने से लेकर उनके दुष्ट-हंता स्वरूप का बहुत सुंदर एवं रसमय वर्णन किया गया है। सूरदास ने भ्रमर गीतों की रचना करके सरस भक्ति की धारा को प्रबल किया तथा भगवान के निर्गुण निराकार स्वरूप के स्थान पर सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति का पक्ष प्रबल किया।

कबीर

रामानन्द के शिष्यों में कबीर का नाम अग्रण्य है। उनका जन्म 1398 ई. में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ था। माता द्वारा लोकलाज के कारण त्याग दिये जाने से कबीर एक जुलाहे के घर में पलकर बड़े हुए थे। कबीर बहुत बड़े सुधारक थे। वे अद्वैतवादी थे तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे जाति-पाँति के भेदभाव को नहीं मानते थे।

वे मूर्ति-पूजा और बाह्याडम्बर से घृणा करते थे। उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को पाखण्ड तथा आडम्बर छोड़ने तथा ईश्वर की सच्ची भक्ति करने का उपदेश दिया। इससे हिन्दू तथा मुसमलान दोनों ही उनके शिष्य हो गये। 1518 ई. में उनका निधन हुआ। इस प्रकार उनकी आयु 120 वर्ष मानी जाती है।

गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे। वे रामानंदाचार्य के शिष्य नरहरि आनंद के शिष्य थे। तुलसीदास मुगल शासक अकबर के समकालीन थे। उन्होंने भगवान राम को अराध्य मानकर उनके जीवन-चरित्र के माध्यम से भगवद् भक्ति का प्रचार किया तथा हिन्दू समाज के समक्ष शक्ति, शील एवं सौंदर्य के प्रतिमान के रूप में भगवान राम का स्वरूप रखा जिसके कारण करोड़ों-करोड़ हिन्दुओं में राम-भक्ति का प्रचार हुआ। तुलसीदास ने रामचरित मानस, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, एवं हनुमान बाहुक आदि ग्रंथों की रचना की तथा उनके माध्यम से हिन्दू धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय स्थपित करके हिन्दू धर्म का लोकमान्य स्वरूप स्थापित किया।

मीरा

नारी भक्तों में मीरा का नाम अग्रणी है। उनका जन्म मेड़ता के राजपरिवार में 1498 ई. में हुआ तथा विवाह मेवाड़ राजपरिवार में हुआ था। वे बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। उन्होंने राजसी वैभव त्याग कर वैराग्य धारण किया तथा चमार जाति में जन्मे संत रैदास को अपना गुरु बनाया।

वे जाति-पांति तथा ऊँच नीच में विश्वास नहीं करती थीं। उन्होंने ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे उच्चकोटि की कवयित्री थीं। उनके भजन आज भी बड़े प्रेम एवं चाव से गाए जाते हैं।

नामदेव

दक्षिण के सन्तों में नामदेव का नाम अग्रणी है। उन्होंने ईश्वर के एक होने का उपदेश दिया। वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे तथा बाह्याडम्बर को उचित नहीं मानते थे। ईश्वर में उनकी अटल भक्ति थी और वे इसी को मोक्ष का साधन मानते थे।

गुरु नानक

पंजाब के सन्तों में गुरु नानक का नाम अग्रणी है। उनका जन्म 1469 ई. में पंजाब के तलवण्डी गांव में हुआ। वे सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरु थे। उनकी शिक्षाएँ ‘आदि ग्रन्थ’ में पाई जाती हैं। नानक एकेश्वरवादी थे और जाति-पाँति के भेद भाव को नहीं मानते थे। वे मूर्ति पूजा के भी घोर विरोधी थे। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। नानक का कहना था कि संसार में रह कर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का प्रभाव

भक्ति आन्दोलन का भारतीयों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा-

(1.) हिन्दू जाति में साहस का संसार

हिन्दू जनता मुस्लिम शासन द्वारा किये जा रहे दमन के कारण नैराश्य की नदी में डूब रही थी। भगवद्गीता से प्रसूत ईश्-भक्ति का अवलम्बन प्राप्त हो जाने से उसमें मुसलमानों के अत्याचारों को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो गई।

(2.) मुसलमानों के अत्याचारों में कमी

भक्ति मार्गी सन्तों के उपदेशों का मुसलमानों पर भी प्रभाव पड़ा। इन सन्तों ने ईश्वर के एक होने का उपदेश दिया और बताया कि एक ईश्वर तक पहुँचने के लिये विभिन्न धर्म विभिन्न मार्ग की तरह हैं। इससे मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों में कमी हुई।

(3.) बाह्याडम्बरों में कमी

भक्तिमार्गी सन्तों ने धर्म में बाह्याडम्बरों की घोर निन्दा की और जीवन को सरल तथा आचरण को शुद्ध बनाने का उपदेश दिया। इन उपदेशों का हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा।

(4.) वर्ग भेद तथा संकीर्णता में कमी

भक्तिमार्गी सन्तों ने जाति प्रथा तथा ऊँच-नीच के भेदभाव की निन्दा की। इससे सामाजिक वर्ग भेद तथा संकीर्णता में कमी आई।

(5.) मूर्ति-पूजा का खंडन

कबीर, नामदेव तथा नानक आदि संत निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा में विश्वास रखते थे। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया जिससे मुसलमानों को घृणा थी और जिसके उन्मूलन का उन्होंने अथक प्रयास किया था। इस कारण मुसलमानों के मन की कटुता में कमी आई।

(6.) उदारता के भावों का संचार

भक्ति मार्गी सन्तों के उपदेशों के फलस्वरूप हिन्दुओं तथा मुसलमानों में उदारता की भावनाओं का संचार होने लगा और वे एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता प्रदर्शित करने लगे।

(7.) हिन्दू-धर्म तथा इस्लाम में समन्वय का प्रादुर्भाव

भक्ति मार्गी सन्तों तथा सूफी प्रचारकों के उपदेशों के फलस्वरूप हिन्दू धर्म तथा इस्लाम में समन्वय का अविर्भाव हुआ। इससे हिन्दुओं तथा मुसलमानों की पारस्परिक कटुता में कमी आई जिसका भारतीय संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा।

(8.) धर्मों की मौलिक एकता का प्रदर्शन

भक्तिमार्गी सन्तों तथा सूफी प्रचारकों ने एकेश्वरवाद, ईश्वर प्रेम एवं भक्ति पर जोर देकर दोनों धर्मो की मौलिक एकता प्रदर्शित की। इसका हिन्दू तथा मुसलमान, दोनों पर प्रभाव पड़ा और वे एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करने लगे।

(9.) जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव की उत्पति

भक्ति मार्गी सन्तों द्वारा विष्णु एवं उसके अवतारों के भक्त वत्सल होने तथा अत्याचारी का दमन करने के लिये अवतार लेने का संदेश बड़ी मजबूती से जनमसामान्य तक पहुँचाया गया। इससे हिन्दुओं में जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव उत्पन्न हुआ। वे निर्बल की रक्षा करना ईश्वरीय गुण मानने लगे और स्वयं को भी इस कार्य के लिये प्रस्तुत करने लगे। उन्होंने गौ, स्त्री तथा शरणागत की रक्षा को ईश कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना।

(10.) प्रान्तीय भाषाओं का विकास

भक्ति मार्गी सन्तों ने अपने उपदेश जन सामान्य तक पहुँचाने के लिये लोक भाषाओं को अपनाया। फलतः प्रान्तीय भाषाओं तथा हिन्दी भाषा की प्रगति को बड़ा बल मिला और विविध प्रकार के साहित्य की उन्नति हुई।

(11.) लित समझी जाने वाली जातियों को नवजीवन

सन्तों के उपदेशों से भारत की दलित समझी जाने वाली जातियों में नवीन उत्साह तथा नवीन आशा जागृत हुई। भक्ति, प्रपत्ति और शरणागति के मार्ग का अवलम्बन करके हर वर्ग एवं हर जाति का मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता था। इस आन्दोलन ने भारतीय समाज में उच्च एवं निम्न जातियों के बीच बढ़ती हुई खाई को कम किया तथा हिन्दू समाज में नवीन आशा का संचार किया।

(12.) राष्ट्रीय भावना की जागृति

भक्ति आन्दोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बहुत बड़ा पड़ा। इसी आन्दोलन के परिणामस्वरूप पंजाब तथा महाराष्ट्र में मुगल काल में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुए। इस आन्दोलन को पंजाब में गुरु गोविन्दसिंह ने और महाराष्ट्र में शिवाजी ने चलाया था। यह प्रभाव ब्रिटिश शासन काल में भी चलता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में सूफी सम्प्रदाय

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भारत में सूफी सम्प्रदाय

इस्लाम के साथ-साथ भारत में सूफी सम्प्रदाय का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम।

भारत में सूफी सम्प्रदाय

सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघांे में विभक्त थे। उनके अलग-अलग केन्द्र थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

सूफी सम्प्रदाय का आदि स्रोत

सूफी मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधारशिला रति भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और मुहम्मद साहब ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी ‘इश्क मजाजी’ को ‘इश्क हकीकी’ की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद एवं विशिष्टाद्वैतवाद, नव अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट है। सूफी मत जीवन का एक क्रियात्मक धर्म तथा नियम है।

सूफी सम्प्रदाय का अर्थ

वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी मत अथवा ससव्वुफ इन्हीं संतों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत कहे जाते हैं-

(1.) सूफी शब्द अरबी भाषा के सफा शब्द से बना है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो।

(2.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है। अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।

(3.) इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे।

(4.) अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है। यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा एवं सरल जीवन यापन करने वाले संत (इसमें ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन इस्लामी संतों ने भी इसे अपना लिया। वे इसी वस्त्र को धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे।

(5.) कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कुछ उल्लेख इसके सम्बन्ध में मिलते हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।

चिश्तिया सम्प्रदाय एवं उसके प्रमुख सूफी संत

सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे।

सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये। ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी सम्प्रदाय का फकीर था। इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर अल्लाह की आराधना का उपदेश दिया करते थे।

मुसलमानों के धर्म गुरु पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था। ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम धर्म से अलग माना।

ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लंे। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है। मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी मत के मूल में प्रेम का निवास है।

ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफीमत के संसर्ग का परिणाम है।

मोइनुद्दीन चिश्ती

गौस उल आजम के शिष्य मोइनुद्दीन का जन्म 1142 ई. में सीस्तान में हुआ था। 1186 ई. में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें।

सूफी दरवेश जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे। वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये। इनमें से मोइनुद्दीन चिश्ती भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन, गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर आये। इसके साथ ही भारत में सूफी सम्प्रदाय का प्रवेश हुआ।

मोइनुद्दीन ने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।

शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया किंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।

मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ

मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो।

एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे फकीर के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की। ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता।

तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थना की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और समस्त के ज्ञान के लिये लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी। शेख हमीदुद्दीन ने फकीर के जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-

(1.) किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।

(2.) किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।

(3.) सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।

(4.) यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।

(5.) किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।

(6.) यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।

(7.) यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।

(8.) इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।

(9.) व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। उसे केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।

ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग अल्लाह की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये। हिन्दू धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है।

जब हिंदुओं को उसी प्रेम के दर्शन सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे। वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती।

कुछ स्रोतों के अनुसार 1227 ई. में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि 1235-36 ई. के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं।

बाबा फरीदुद्दीन

बाबा फरीदुद्दीन दूसरे प्रसिद्ध सूफी संत थे। फरीद का जन्म काबुल के राजवंश में हुआ था। फरीद ने धन-वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया। सतलज नदी के तट पर स्थित एक सड़क जो मुल्तान से दिल्ली आती है बाबा फरीद अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। उनके विचार बड़े ऊँचे थे। उनके उपदेशों से हिन्दू तथा मुसलमान दोनों प्रभावित हुए थे। 1265 ई. में 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

गेसू दराज

सूफी संत गेसू दराज भी विख्यात सूफी थे। वे अपने लम्बे बालों के लिये प्रसिद्ध थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था परन्तु वे दक्षिण भारत चले गये और बहमनी राज्य में स्थायी रूप से निवास करने लगे। गेसू दराज का ज्ञान अत्यन्त व्यापक था। कहा जाता है कि उन्होंने 175 पुस्तकों की रचना की। 1422 ई. में 101 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ।

इस प्रकार बहुत से और भी सूफी फकीर हुए और भारत में सूफी सम्प्रदाय फलता-फूलता रहा। आज भी भारत में सूफी आंदोलन कुछ विकृतियों के साथ चल रहा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का भारत आगमन

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बाबर का भारत आगमन

बाबर का भारत आगमन मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। उसके आगमन के साथ ही दिल्ली में अंतिम सांस लेती हुई अफगान सत्ता दम तोड़ देती है तथा दिल्ली में नए मुस्लिम शासन की स्थापना होती है।

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर

बाबर का वंश परिचय

 बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा, तैमूर लंग का वंशज था। शेख मिर्जा फरगना के एक छोटे से राज्य का शासक था जो उसे अपने पूर्वजों से मिला था। बाबर की माता का नाम कूललूक निगार खानम था जो मंगोल सरदार यूनस खाँ की पुत्री थी। यूनस खाँ, चंगेज खाँ का वंशज था।

इस प्रकार बाबर, तैमूर लंग का पांचवा वंशज था तथा मातृपक्ष में चंगेज खाँ की चौदहवीं पीढ़ी में था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में तुर्कों तथा मंगोलों का मिश्रित रक्त प्रवाहित हो रहा था। उसका परिवार चगताई शाखा में था किंतु आम तौर पर उन्हें मंगोल माना जाता था। भारत में वे मुगल कहलाये।

बाबर का प्रारम्भिक जीवन

बाबर का वास्तविक नाम जहीरूद्दीन मुहम्मद था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ। वह अत्यंत निर्भीक बालक था, इसलिये सब उसे बाबर कहने लगे। तुर्की भाषा में बाबर बाघ को कहते हैं। बाबर के आठ भाई-बहिन थे जिनमें बाबर सबसे बड़ा था। उसने बचपन में ही फारसी भाषा पर पूरा अधिकार कर लिया था। वह एक प्रतिभा सम्पन्न बालक था।

डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने लिखा है कि बाबर अकाल प्रौढ़ बालक था। उसकी मानसिक शक्तियों का ऐसा सुन्दर विकास हुआ था कि वह राजनीतिक घटनाओं के महत्व को आसानी से समझ लेता था और मानव चरित्र को सरलता से परख लेता था। बाबर जब ग्यारह वर्ष का हुआ तब उसके पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु हो गई।

फरगना के तख्त की प्राप्ति तथा आरंभिक कठिनाइयाँ

 उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद बाबर को फरगना का शासक बना दिया गया किंतु उसी समय उसके चाचा अहमद मिर्जा ने फरगना पर आक्रमण कर दिया। अहमद मिर्जा समरकंद का शासक था। उसने बाबर के कुछ नगरों को दबा लिया। बाबर के मामा महमूदखां ने भी बाबर के राज्य के कुछ परगने दबा लिये।

काशनगर के सुल्तान ने भी फरगना का कुछ हिस्सा दबा लिया। एक साथ आई इन मुसीबतों से भी बाबर नहीं घबराया। भाग्य से अहमद मिर्जा की सेना में रोग फैल गया और वह बाबर से संधि करके उसके क्षेत्रों को खाली करके चला गया। इसके बाद बाबर ने अपने मामा महमूद खाँ को अक्षी के कड़े युद्ध में परास्त किया।

दो शत्रुओं से निबटने के बाद बाबर ने काशनगर की सेना पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। इस प्रकार बाबर को तीनों शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसकी आरम्भिक कठिनाइयां दूर हो गईं।

फरगना और समरकंद की आवाजाही

कुछ समय बाद समरकंद के शासक और बाबर के चाचा अहमद मिर्जा की मृत्यु हो गई तथा उसका अयोग्य पुत्र अहमद मिर्जा समरकंद का शासक बना। समरकंद तुर्की सभ्यता का केन्द्र था तथा बाबर के पूर्वजों की राजधानी था। इसलिये बाबर ने समरकंद पर सैनिक अभियान करने का निर्णय लिया।

इतिहासकारों का मानना है कि अत्यंत महत्वाकांक्षी बाबर के लिये फरगना का छोटा सा राज्य पर्याप्त नहीं था। बाबर अपने पूर्वजों की तरह मध्य-एशिया के विशाल साम्राज्य का शासक बनना चाहता था। 1496 ई. में बाबर ने अपने पूर्वज तैमूर लंग की राजधानी समरकन्द पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर लौट आया।

1497 ई. में उसने पुनः समरकंद पर आक्रमण किया। इस बार बाबर समरकंद पर अधिकार करने में सफल रहा। वह समरकंद में रहकर शासन करने लगा। इसी बीच बाबर बीमार पड़ा। इस पर कुछ अमीरों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। इसे सुनकर बाबर के छोटे भाई जहाँगीर ने फरगना पर अधिकार कर लिया।

यह सुनकर बाबर सेना सहित फरगना के लिये रवाना हुआ किंतु वह जहाँगीर से फरगना प्राप्त नहीं कर सका। निराश होकर वह समरकंद लौटा किंतु तब तक समरकंद भी उसके हाथ से निकल गया। कुछ दिनों तक इधर-उधर ठोकरें खाने के बाद बाबर ने पुनः फरगना पर आक्रमण किया तथा उसने फरगना पर अधिकार कर लिया किंतु 1500 ई. में फरगना पुनः उसके हाथ से निकल गया।

बाबर ने पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। 1502 ई. में शैबानी ने बाबर पर आक्रमण किया। सराय-पुल नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान हुआ जिसमें बाबर परास्त हो गया। समरकंद पर शैबानी का अधिकार हो गया। बाबर को अपनी बहिन का विवाह शैबानी के साथ कर देना पड़ा। इस प्रकार तीसरी बार समरकंद बाबर के हाथ से निकल गया।

काबुल, गजनी तथा कान्धार पर अधिकार

1505 ई. में बाबर ने काबुल तथा गजनी पर आक्रमण किये। ये दोनों शहर बड़ी सरलता से बाबर के अधिकार में आ गये। 1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग करके बादशाह की उपाधि धारण कर ली। इसी वर्ष उसने गान्धार पर अधिकार कर लिया।

1513 ई. में शैबानी के मर जाने पर बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इस बार उजबेगों ने बाबर को समरकंद से मार भगाया। कांधार भी बाबर के हाथ से निकल गया।

युद्धों का विशद अनुभव

बाबर का अब तक का जीवन युद्धों में बीता था जिनमें से कई युद्ध उसने हारे तथा कई युद्ध जीते किंतु इन युद्धों ने उसे एक जबर्दस्त योद्धा बना दिया। उजबेगों से युद्ध करने के दौरान बाबर ने तुलगमा पद्धति सीखी। मंगोलों एवं अफगानों से युद्ध करते समय उसने अपनी सेना को शत्रु की आँखों से छिपा कर रखना सीखा।

ईरानियों से उसने बंदूक का प्रयोग करना तथा सजातीय तुर्कों से उसने गतिशील अश्वारोहिणी का संचालन करना सीखा। अपने शत्रुओं से ही उसने युद्ध क्षेत्र में योजनाबद्ध व्यूह रचना करना सीखा। इस प्रकार वह एक जबर्दस्त योद्धा एवं सेनापति बन गया। ई.1514 में बाबर को उस्ताद अली नामक एक तुर्क तोपची की सेवाएँ प्राप्त हुईं। इस तोपची की सहायता से बाबर ने एक शक्तिशाली तोपखाना तैयार किया।

बाबर का भारत आगमन

समरकंद तथा फरगना हाथ से निकल जाने के कारण वह मध्य एशिया से निराश हो चुका था। कंदहार भी उसके हाथ से निकल चुका था। काबुल तथा गजनी के अनुपजाऊ प्रदेश बाबर की महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते थे इसलिये उसने भारत पर अपनी दृष्टि गड़ाई।

बाबर के आक्रमण के समय भारत की दशा

जिस समय बाबर ने आक्रमण करने का निर्णय लिया, उस समय भारत की राजनीतिक दशा हमेशा की तरह अत्यंत शोचनीय थी तथा अनेक परिस्थितियाँ बाबर के अनुकूल थीं। इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार से है-

(1.) दिल्ली सल्तनत का विघटन

तैमूर के आक्रमण के पश्चात् उत्तरी भारत फिर कभी नहीं संभल सका था। दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर अनेक तुर्क तथा अफगान अमीरों ने छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे। इस कारण दिल्ली सल्तनत की सीमाएं सिकुड़कर एक छोटे से प्रांत के रूप में रह गई थीं।

(2.) इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अमीरों का षड़यंत्र

इन दिनों दिल्ली में इब्राहीम लोदी शासन कर रहा था। उसके अमीर उससे असंतुष्ट थे और उसके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के षड्यन्त्र रच रहे थे।

(3.) जौनपुर तथा दिल्ली की प्रतिद्वंद्विता

जौनपुर में शर्की सुल्तानों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था और दिल्ली सल्तनत के प्रतिद्वन्द्वी बन गये थे। उनकी दृष्टि सदैव दिल्ली के तख्त पर लगी रहती थी और वे उसे हड़पने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

(4.) बिहार में स्वतंत्र राज्य की स्थापना

बिहार में लोहानी अथवा नुहानी अफगानों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था।

(5.) बाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना

हुसैनशाह तथा नसरत शाह ने बाल में स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे तथा दक्षिण बिहार पर अधिकार करने के लिये लालायित थे।

(6.) नसरत शाह द्वारा तिरहुत पर अधिकार

नसरत शाह ने 1521 ई. में तिरहुत पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा को मुंगेर तथा हाजीपुर तक बढ़ा लिया। यदि लोहानी अमीर उसका विरोध न करते तो जौनपुर तथा चुनार दोनों ही खतरे में पड़ जाते। इसके विपरीत यदि लोहानी अमीर नसरत शाह से संधि कर लेते तो दिल्ली सल्तनत का सम्पूर्ण पूर्वी भाग खतरे में पड़ जाता।

(7.) उड़ीसा में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना

उड़ीसा में भी एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई थी। इसके शासकों की रुचि उत्तरी भारत की राजनीति में उतनी नहीं थी जितनी दक्षिण भारत की राजनीति में थी।

(8.) मेवाड़ के शासक राणा सांगा का उदय

दिल्ली सल्तनत के दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में राजपूताना स्थित था जिसमें राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य थे। इन राजपूतों ने राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के विरुद्ध प्रबल संघ बना लिया था। राणा सांगा वीर योद्धा था और अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर चुका था।

1519 ई. में राणा सांगा ने मालवा के शासक महमूद (द्वितीय) को कैद कर लिया। 1520 ई. में सांगा ने अहमदनगर के शासक मुबारिजुल को परास्त करके अहमदनगर पर अधिकार कर लिया था। अब सांगा के लिये दिल्ली की ओर बढ़ने से पहले केवल गुजरात से निबटना ही शेष रह गया था।

(9.) गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह का भय

मालवा तथा अहमदनगर की विजयों के फलस्वरूप राणा सांगा, गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह से सीधा संघर्ष करने की स्थिति में आ गया था। दिल्ली सल्तनत के लिए यह स्थिति बड़ी भयावह थी। यदि राणा सांगा को मुजफ्फरशाह के विरुद्ध सफलता प्राप्त हो जाती तो उसकी विजयी सेना निश्चित रूप से राजपूताने के पूर्व में स्थित दिल्ली की ओर बढ़ती और दिल्ली सल्तनत के लिए भयानक संकट उत्पन्न कर देती और यदि राणा की पराजय हो जाती तो मुजफ्फर शाह के लिए दिल्ली तक का मार्ग साफ हो जाता।

(10.) पंजाब में दौलत खाँ लोदी का स्वतंत्र राज्य

दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पंजाब में लोदी अमीर बड़े शक्तिशाली हो गये थे। वे दौलत खाँ के नेतृत्व में संगठित थे। दौलत खाँ लोदी, तातार खाँ का पुत्र था जो दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी का घोर विरोधी था। दौलत खाँ लगभग बीस वर्षों से पंजाब में स्वतंत्र शासक की तरह शासन कर रहा था।

वह इब्राहीम लोदी को किसी भी प्रकार की सहायता देने के लिए तैयार नहीं था। वास्तव में वह बाबर तथा इब्राहीम लोदी दोनों को ही अपना शत्रु समझता था। वह जानता था कि चक्की के इन दो पाटों के बीच में पड़कर वह कभी भी पिस सकता है।

(11.) आलम खाँ का षड़यंत्र

दौलत खाँ लोदी के साथ सुल्तान इब्राहीम लोदी का चाचा आलम खाँ लोदी भी इन दिनों पंजाब में विद्यमान था। वह बहुत दिनों से आगरा पर दृष्टि लगाये हुए था और इब्राहीम लोदी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता था।

(12.) सिंध का राज्य

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद से ही सिंध स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय सिंध पर अरब वालों का अधिकार था।

(13.) काश्मीर का राज्य

बाबर के आक्रमण के समय काश्मीर का राज्य महत्वपूर्ण था। उस समय कश्मीर के प्रधान वजीर ने सुल्तान मुहम्मदशाह को अपदस्थ करके स्वयं सत्ता हथिया ली थी।

(14.) खानदेश

खानदेश ताप्ती नदी के किनारे स्थित एक छोटा सा किंतु समृद्ध राज्य था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ महमूद प्रथम का शासन था।

(15.) बहमनी राज्य

बाबर के आक्रमण के समय बहमनी राज्य अपना वैभव खोकर पांच राज्यों- बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा में विभक्त हो चुका था। ये राज्य आपस में लड़ते रहते थे। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण भारत में मुस्लिम शक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी।

(16.) विजयनगर राज्य

बाबर के आक्रमण के समय विजयनगर राज्य पर राजा कृष्णदेवराय का शासन था। वह अशोक, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज के समान ख्याति प्राप्त श्रेष्ठ सम्राट था। उसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था। बाबर ने लिखा है कि सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

(17.) पुर्तगाली राज्य

बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार कर लिया था। उनके कारण भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता व्याप्त थी।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का झुण्ड था जो एक ओर तो परस्पर शत्रु थे तथा दूसरी ओर किसी भी तरह दिल्ली सल्तनत को समाप्त कर देना चाहते थे। इस कारण भारत में किसी भी प्रबल आक्रमणकारी का सामना करने का बल नहीं था। इन परिस्थितियों में बाबर जैसे महत्वाकांक्षी आक्रांता का भारत पर आक्रमण करने के लिए आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था।

बाबर के भारत पर आक्रमण करने के कारण

(1.) साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा

बाबर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह अपने पूर्वज तैमूर लंग की भाँति एक विशाल साम्राज्य खड़ा करना चाहता था। उसने पहला प्रयास मध्य-एशिया में किया। वहाँ असफल रहने के बाद उसने काबुल तथा गजनी में अपना राज्य स्थापित किया किंतु वह काबुल तथा गजनी से संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिये वह अपना साम्राज्य भारत में फैलाना चाहता था।

(2.) भारत पर जीत का गौरव हासिल करने की आकांक्षा

उन दिनों इस्लामी जगत में काफिरों के देश भारत पर विजय प्राप्त करना किसी भी मुस्लिम शासक के लिये गौरव की बात माना जाता था। इसलिये बाबर भारतवर्ष अथवा उसके एक बहुत बड़े भाग को जीतकर भारत विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

(3.) भारत पर वंशानुगत राज्य होने का दावा

बाबर, तैमूर लंग का वंशज होने के कारण तैमूर द्वारा विजित भारतीय क्षेत्रों को अपने वंशानुगत राज्य में होने का दावा करता था। जब तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया था तब उसने पंजाब के पश्चिमी भाग को अपने राज्य में मिला लिया था परन्तु बाद में अफगानों ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। इसलिये बाबर पंजाब पर अपना वंशानुगत अधिकार समझता था और उसे फिर से पाना चाहता था।

(4.) काबुल तथा गजनी पर अधिकार

समरकंद तथा फरगना के हाथ से निकल जाने के बाद बाबर काबुल तथा गजनी पर अधिकार जमाने में सफल रहा था इस कारण उसके राज्य की सीमा भारत के काफी निकट आ गई थी।

(5.) भारत की अपार सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा

बाबर भारत पर आक्रमण करके अपने पूर्वजों की भांति अपार सम्पत्ति प्राप्त करना चाहता था।

(6.) काफिरों को नष्ट कर इस्लाम फैलाने की लालसा

बाबर की धमनियों में तैमूरलंग तथा चंगेज खाँ का रक्त विद्यमान था। इसलिये बाबर भी उनकी तरह भारत के काफिरों को मारकर इस्लाम फैलाने को लालायित था।

(7.) भारत की परिस्थितियाँ

भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थ्तिियों ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्साहित किया। वह जानता था कि भारत का कोई भी प्रांतीय शासक तथा राणा सांगा, इब्राहीम लोदी का साथ नहीं देगा।

(8.) लाहौर के अफगान अमीरों का निमंत्रण

लाहौर के अफगान अमीरों ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित करने का निश्चय किया। आलम खाँ तथा दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बाबर के पास भेजकर आग्रह किया गया कि बाबर इब्राहीम लोदी को दिल्ली के तख्त से हटाकर, आलम खाँ को सुल्तान बनाने में सहायता करे क्योंकि इब्राहीम लोदी बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक है। इससे बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं।

बाबर की भारत में उपलब्धियाँ

भारत में बाबर की उपलब्धियाँ तीन प्रकार की हैं- (1.) सामरिक उपलब्धियाँ, (2.) राजनीतिक उपलब्धियाँ तथा (3.) सांस्कृतिक उपलब्धियाँ। इन तीनों उपलब्धियों का आधार सामरिक उपलब्धियाँ ही हैं। अतः सबसे पहले उसकी सामरिक उपलब्धियों का अध्ययन करना उचित होगा।

भारत पर बाबर के प्रारंभिक आक्रमण

पहला आक्रमण

1519 ई. में बाबर ने भारत पर पहला आक्रमण किया। उसने बाजोर के दुर्ग को घेर लिया। दुर्ग में नियुक्त सैनिक बाबर की बंदूकों के समक्ष नहीं टिक सके। अलीकुली ने तोपों का प्रयोग किया। कुछ ही घण्टों में तीन हजार सैनिक मारे गये। बाबर ने बाजोर में रहने वाली हिन्दू जनता के साथ बड़ा कठोर व्यवहार किया।

समस्त पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया तथा स्त्रियों एवं बच्चों को गुलाम बना लिया गया। इसके बाद उसने झेलम के तट पर स्थित भीरा को अपने अधिकार में ले लिया। भीरा के लोगों ने बिना लड़े ही भीरा बाबर को समर्पित कर दिया।

दूसरा आक्रमण

1519 ई. में बाबर ने भारत पर दूसरा आक्रमण किया। वह युसूफ जई अफगानों को अपने अधीन करके पेशावर पर अधिकार जमाना चाहता था किंतु उसी समय बदख्शां में उपद्रव हो गया और बाबर इस आक्रमण को अधूरा छोड़कर लौट गया।

तीसरा आक्रमण

1520 ई. में बाबर बाजोर, भीरा होता हुआ स्यालकोट तक आ पहुँचा। बाबर स्यालकोट से आगे बढ़ता इससे पहले उसे समचार मिला कि कांधार के शासक शाह बेग अर्जुन ने बगावत कर दी है। अतः बाबर स्यालकोट से वापस लौट गया। 1522 ई. में उसने कांधार पर अधिकार कर लिया तथा अपने दूसरे पुत्र कामरान को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

चौथा आक्रमण

पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से स्वतंत्र होने के लिये बाबर को दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भिजवाया। 1524 ई. में बाबर सेना लेकर चौथी बार भारत आया। इब्राहीम लोदी पंजाब की गतिविधियों से अनजान नहीं था। उसने एक सेना पंजाब पर आक्रमण करने भेजी जिसने बड़ी सरलता से लाहौर पर अधिकार कर लिया।

इसी बीच बाबर की सेना ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया। दिल्ली की सेना परास्त हो गई तथा बाबर ने लाहौर पर अधिकार जमा लिया। अब बाबर की सेना लाहौर से आगे बढ़ी और उसने दिपालपुर पर अधिकार कर लिया। चूँकि बाबर के साथी आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं थे और उसे अपने राज्य में उजबेगों का विद्रोह होने की भी सूचना मिली इसलिये बाबर दिपालपुर से काबुल लौट गया।

पाँचवां आक्रमण

बाबर के काबुल लौट जाने पर दौलत खाँ तथा दौलत खाँ के चाचा आलम खाँ ने दिल्ली पर आक्रमण किया परन्तु इब्राहीम लोदी की सेना ने उन्हें मार भगाया। इस पर आलम खाँ तथा दौलत खाँ का पुत्र दिलावर खाँ, बाबर की शरण में पहुँचे। उनके निमंत्रण पर बाबर ने पुनः दिसम्बर 1525 में विशाल सैन्य के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया।

जब वह मार्ग में ही था तब उसे सूचना मिली कि दौलत खाँ अपनी सेना लेकर लाहौर की ओर बढ़ रहा है। इसलिये बाबर ने अपनी चाल तेज कर दी और दौलत खाँ के लाहौर पहुँचने से पहले लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर दौलत खाँ के साथी घबरा उठे और वे दौलत खाँ का साथ छोड़कर बाबर से जा मिले।

दौलत खाँ ने भी विवश होकर बाबर के समक्ष समर्पण कर दिया। बाबर ने दौलत खाँ को बंदी बनाकर भेरा भेज दिया किंतु भेरा पहुँचने से पहले ही दौलत खाँ की मृत्यु हो गई। इस प्रकार पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

पानीपत का प्रथम युद्ध

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पानीपत का प्रथम युद्ध

पानीपत का प्रथम युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी तथा जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर के बीच हुआ। यह भारत के इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक था। इस युद्ध ने भारत में एक नवीन मुस्लिम राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया।

पानीपत का प्रथम युद्ध – पूर्व तैयारियाँ

बाबर की सेना

अप्रेल 1526 में बाबर अपनी सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। वह अपने साथ 12 हजार सैनिक लाया था किंतु मार्ग में बहुत से भारतीय सैनिक भी उसके साथ हो लिये। इस प्रकार जब बाबर पानीपत के मैदान में पहुँचा तो उसके सैनिकों की संख्या 25 हजार हो चुकी थी।

बाबर की तैयारी

बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनानायक था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। चूँकि बाबर की सेना इब्राहीम लोदी की सेना की अपेक्षा संख्या में केवल एक-चौथाई थी इसलिये बाबर ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अश्वारोहियों तथा तोपखाने के संयुक्त प्रयोग का निश्चय किया।

उसने सबसे पहले अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा की व्यवस्था की ताकि शत्रु अचानक उसकी सेना में न आ घुसे। बाबर ने अपनी सेना के एक पक्ष की सुरक्षा के लिये पानीपत नगर को ढाल के रूप में प्रयुक्त किया। अपनी सेना के दूसरे पक्ष की सुरक्षा के लिये खाइयां खुदवाकर उनके दोनों तरफ कटे हुए पेड़ तथा कँटीली झाड़ियां डलवा दीं।

बाबर ने सेना के सामने 700 गाड़ियाँ खड़ी करके उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा एक-दूसरे से बँधवा दिया। इन गाड़ियों के पीछे उसने अपनी सेना को सजाया।

लोदी की सेना

इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। उसके पास लगभग दो हजार हाथी थे। इन हाथियों को तोपखाने का सामना करने की शिक्षा नहीं दी गई थी। इसलिये यह सम्भावना अधिक थी कि तोपेखाने की आग तथा गोलों की आवाज से बिगड़कर हाथी उलटे लौट पड़ेंगे तथा अपने ही सैनिकों को रौंद डालेंगे किंतु इब्राहीम लोदी को, हाथियों को प्रयुक्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझा।

लोदी की तैयारी

इब्राहीम लोदी अदूरदर्शी सुल्तान था। उसने बाबर के आक्रमण की कोई गंभीर तैयारी नहीं की। उसे अपनी सेना की विशालता पर पूरा विश्वास था। इसलिये जब बाबर ने पंजाब पर अधिकार कर लिया तब इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना लेकर दिल्ली से पंजाब की ओर चल पड़ा तथा पानीपत के मैदान में आ डटा।

पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर की विजय

12 अप्रेल 1526 को दोनों सेनाएं एक दूसरे के समक्ष आ खड़ी हुईं। नौ दिन तक दोनों सेनाएँ एक दूसरे के समक्ष डटी रहीं। अन्त में 21 अप्रेल को इब्राहीम लोदी ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। इब्राहीम की सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन नहीं हो सका।

बाबर की सेना ने इब्राहीम लोदी की सेना को चारों ओर से घेरकर उस पर तोपेखाने तथा बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। यह युद्ध प्रातः 9 से 10 बजे के बीच आरम्भ हुआ तथा दोपहर बाद तक भयंकर रूप से होता रहा। अंत में इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। उसके 15 हजार सैनिक मारे गये और शेष सेना लड़ाई के मैदान से भाग खड़ी हुई। इब्राहीम लोदी स्वयं लड़ता हुआ मारा गया। इस प्रकार बाबर को पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय प्राप्त हो गई।

दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार

जिस दिन बाबर को पानीपत युद्ध में विजय प्राप्त हुई उसी दिन बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को आगरा पर और अपने दामाद मेंहदी ख्वाजा को दिल्ली पर अधिकार करने के लिए भेज दिया। इन दोनों ने अपना कार्य सरलता से सम्पन्न कर लिया। इस प्रकर दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया। 27 अप्रैल 1526 को शुक्रवार के दिन दिल्ली की मस्जिद में बाबर के नाम खुतबा पढ़ा गया और गरीबों को दान-दक्षिणा दी गई। इस प्रकार बाबर दिल्ली का बादशाह बन गया।

पानीपत के युद्ध में बाबर की विजय के कारण

यद्यपि इब्राहीम लोदी की सेना बाबर की सेना की तुलना में अधिक विशाल थी परन्तु बाबर ने छोटी सेना की सहायता से ही उस पर विजय प्राप्त कर ली। इस विजय के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) बाबर का कुशल सेनापतित्त्व

बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनापति था। उसे युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। वह अनेक युद्धों में सेना का संचालन करके युद्ध कला की व्यवहारिक बारीकियों का ज्ञान प्राप्त कर चुका था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी युद्ध के अनुभव से शून्य था। उसने इससे पहले एक भी बड़े युद्ध में भाग नहीं लिया था। न ही वह विदेशी रणपद्धतियों से परिचित था। ऐसी स्थिति में वह बाबर की सेना का सामना करने की क्षमता नहीं रखता था।

(2.) बाबर को योग्य सेनापतियों की सेवाएँ

बाबर यद्यपि स्वयं प्रधान सेनापति था परन्तु अपनी सेना के विभिन्न अंगों का संचालन उसने बड़े ही योग्य तथा कुशल सेनापतियों को सौंप रखा था। उसे दो तुर्की सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त थीं जो नवीन रण-पद्धतियों का उपयोग करने में दक्ष थे। बाबर का पुत्र हुमायूँ भी कुशल योद्धा तथा दक्ष सेनापति था। इब्राहीम लोदी को इस प्रकार के योग्य सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त नहीं थीं। उसे अपने अमीरों तथा प्रांतपतियों का सहयोग प्राप्त नहीं था। दौलत खाँ तथा पंजाब के अन्य अमीर उसके विरुद्ध थे तथा बाबर का साथ दे रहे थे।

(3.) बाबर के सैनिकों में जीत के प्रति उत्साह

बाबर के सैनिक बड़े लड़का तथा रणकुशल थे। उन्हें शत्रु की धरती पर खड़े रहकर युद्ध करने का व्यापक अनुभव था। वे कई तरह की पेंतरेबाजी में कुशल थे और स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढालने और उसमें लड़ने की क्षमता रखते थे। अफगानिस्तान जैसे निर्धन देश से होने के कारण वे धन प्राप्ति के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। उनमें जीत के प्रति अदम्य उत्साह था जबकि इब्राहीम लोदी के सैनिक उतने रणकुशल नहीं थे, जितने बाबर के। उन्हें न तो युद्धों का उतना अनुभव था और न उनमें उतना उत्साह तथा साहस ही था जितना बाबर के सैनिकों में था।

(4.) बाबर की कुशल व्यूह-रचना

बाबर शत्रु सैन्य के बल के अनुसार सैन्य-व्यूह रचने में दक्ष था। उसने पानीपत के मैदान में पहुंॅचते ही सैन्य-व्यूह की रचना का कार्य आरम्भ कर दिया था। उसने अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा का प्रबंध किया और फिर केन्द्र में तोपों और दोनों पक्षों में तेजी से आक्रमण करने वाले अश्वारोहियों की व्यवस्था की।

ये अश्वारोही, मुख्य सेना की गति भंग हो जाने पर उसे चारों ओर से सहायता पहुँचा सकते थे। यह बड़ी ही वैज्ञानिक व्यूह-रचना थी जिसमें रक्षात्मक तथा आक्रमणात्मक दोनों प्रकार की व्यवस्था थी। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी की व्यूह-रचना परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थी। उसने अपनी सेना की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की।

उसने हाथियों को अपनी सेना के हरावल में रखकर अपनी पराजय का प्रबंध स्वयं ही कर लिया था। जब तोपों से गोले बरसने आरम्भ हुए तो हाथी पीलवानों के नियंत्रण से बाहर हो गये और उन्होंने अपने ही सैनिकों को रौंद डाला। इससे उनमें भगदड़ मच गयी।

(5.) बाबर का कुशल सैन्य संचालन

बाबर ने अपनी सेना का संचालन कुशलता से किया था। छोटी होने के कारण उसकी सेना में गति थी। वह तेजी से आक्रमण कर सकती थी और संकट आने पर भाग सकती थी। उसकी सेना के बाईं तथा दाहिनी ओर के सैनिक बड़ी तेजी से शत्रु पर आक्रमण करते थे और उसे चारों ओर से घेर लेने का प्रयत्न करते थे।

वह अपने तोपखाने तथा अपने अश्वारोहियों द्वारा ऐसा संयुक्त आक्रमण करता था कि शत्रु को उसके सामने ठहरना कठिन हो जाता था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी में सैन्य संचालन की कुशलता नहीं थी। उसकी सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन करना कठिन था। उसमें न गति थी और न पैंतरेबाजी।

बाबर की तोप गाड़ियों के कारण इब्राहीम की सेना के अग्रिम भाग का आगे बढ़ना रुक गया किंतु पीछे की सेना इस बात को नहीं जान सकी और वह निरंतर आगे बढ़ने का प्रयत्न करती रही इससे सेना में धकापेल आरम्भ हो गई। वह मनुष्यों का एक ढेर बन गई और बाबर की सेना ने भीषण नरसंहार आरम्भ कर दिया।

(6.) बाबर द्वारा तोपखाने का प्रयोग

अभी तक उत्तर-पश्चिम के मार्ग से भारत पर जितने आक्रमण हुए थे उनमें से किसी ने भी तोपेखने का प्रयोग नहीं किया था। इसलिये भारत के सैनिक इस तोपखाने के समक्ष युद्ध करने के अभ्यस्त नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि जब तोपों ने गोले और आग बरसाना आरम्भ किया तब उसी समय बाबर के अश्वारोहियों ने भी पार्श्वों से निकलकर इब्राहीम की सेना पर तेजी से आक्रमण किया।

इससे इब्राहीम लोदी की सेना में अफरा-तफरी मच गई। तोपखाने के साथ-साथ बाबर के सैनिक इब्राहीम लोदी के सैनिकों से अधिक अच्छे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। इससे वे अधिक सफलतापूर्वक प्रहार कर सकते थे।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

पानीपत का प्रथम युद्ध भारत के निर्णयात्मक युद्धों में से है। इसने भारत की राजनीति से एक युग का अंत करके दूसरे युग का आरम्भ कर दिया। उत्तर भारत की राजनीति में इस युद्ध ने भारी फेर बदल कर दिया।

(1.) लोदी वंश का अंत

इस युद्ध ने लोदी वंश के भाग्य का उसी प्रकार निर्णय कर दिया जिस प्रकार तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश के भाग्य का निर्णय कर दिया था। लोदी वंश सदा के लिये अस्ताचल में चला गया।

(2.) दिल्ली सल्तनत का अंत

लोदी वंश के पराभव के साथ ही दिल्ली सल्तनत का युग भी समाप्त हो गया। उत्तर भारत में एक नया वंश शासन करने के लिये आ गया।

(3.) भारत में मुगल सम्राज्य की स्थापना

पानीपत की पहली लड़ाई का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हो गई जो अपनी शान-शौकत, सैनिक शक्ति तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में मुस्लिम जगत् के राज्यों में सबसे अधिक महान् था और जो रोमन साम्राज्य की बराबरी का दावा कर सकता था।

(4.) राजधानी दिल्ली के स्थान पर आगरा स्थानांतरित

बाबर दिल्ली में कुछ ही दिन रहा। वह दिल्ली से आगरा चला गया और वहीं पर सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा। अब आगरा ही उसकी राजधानी बन गया।

(5.) अफगानों के संगठन पर बुरा प्रभाव

लोदी वंश के उदय के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उत्तरी पंजाब में अफगान अमीरों का दबदबा स्थापित हो गया था किंतु इस युद्ध ने अफगानों के संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनका नैतिक बल कमजोर हो गया।

(6.) जन साधारण में भय

पानीपत की पराजय के बाद न केवल लोदी सेना के सैनिक वरन् जन साधारण भी आक्रमणकारियों से भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ा हुआ। किलेबंदी वाले नगरों के फाटक बन्द कर दिये और लोग अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने लगे।

(7.) बाबर के गौरव में वृद्धि

पानीपत की विजय से बाबर के गौरव तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई और उसकी गणना एशिया के महान् विजेताओं में होने लगी।

(8.) बाबर को अपार धन की प्राप्ति

बाबर को दिल्ली तथा आगरा से अपार धन की प्राप्ति हुई। इससे पहले उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी। भारत से मिले धन को बाबर ने मुक्त हस्त से अपने सैनिकों में बंटवाया। उसने समरकंद, ईराक, खुरासान व काशनगर में स्थित अपने सम्बन्धियों को भी उपहार भेजे। मक्का एवं मदीना में पवित्र आदमियों को भी उसने भेंट भिजवाई। उसकी इस उदारता के लिये उसे कलंदर नाम दिया गया।

(9.) राजपूतों में निराशा

इस युद्ध से राजपूतों की बड़ी निराशा हुई क्योंकि लोदी साम्राज्य के बाद दिल्ली में राजपूत राज्य स्थापित करने का उनका स्वप्न समाप्त हो गया ।

पानीपत के युद्ध के उपरान्त बाबर की समस्याएँ

पानीपत की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार स्थापित कर लिया परन्तु उसे अनेक समस्याओं का सामना करना था। उसकी प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) जन साधारण में अविश्वास की समस्या

बाबर की पहली समस्या जन साधारण में विश्वास उत्पन्न करने की थी जो या तो अपने नगरों को छोड़कर भागे जा रहे थे या नगरों के फाटकों को बन्द करके अपनी सुरक्षा करने में लगे हुए थे। लोग तैमूर लंग के आक्रमण को भूले नहीं थे इसलिये मंगोल भारत में घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे।

(2.) अराजकता की समस्या

शासन के प्रति जन साधारण में अविश्वास के कारण सरकारी कर्मचारी भी अपना काम छोड़कर बैठ गये। इस कारण चारों ओर अराजकता फैल गई। बाजारों में खाद्य सामग्री की कमी हो गई। अवसर पाकर चोर तथा डकैत जन साधारण को लूटने लगे।

(3.) अफगान सरदारों की समस्या

पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु हो जाने से अफगानों का संगठन बिखर गया। इस कारण अफगान सरदार अपनी सेनाओं के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। इनमें से अनेक सरदार छोटे-छोटे भू-भागों पर स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा

दिल्ली तथा आगरा विजय करने के पश्चात् बाबर के सैनिक तथा सरदार अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर हो रहे थे। यद्यपि बाबर ने दिल्ली तथा आगरा से प्राप्त विपुल धन अपने सैनिकों तथा सरदारों में मुक्त हस्त से बाँट दिया था परन्तु अब वे भारत में ठहरने के लिए तैयार नहीं थे।

ये सैनिक पहाड़ियों तथा घाटियों के निवासी होने के कारण भारत की गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे थे। चूंकि अधिकतर किसान अपनी खेतीबाड़ी छोड़कर भाग खड़े हुए थे इसलिये उत्तर भारत में खाने-पीने की सामग्री का बड़ा अभाव हो गया था।

जब इन सैनिकों एवं सरदारों को यह ज्ञात हुआ कि बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया है तब वे समझ गये कि उन्हें भी बहुत दिनों तक भारत में रहना पडे़गा और निरन्तर युद्ध तथा संघर्ष करना पडे़गा। चूंकि अब उनके पास पर्याप्त धन था इसलिये वे अपना शेष जीवन युद्धों में बिताने की बजाय आराम से अपने घरों में बिताना चाहते थे।

(5.) राणा सांगा की समस्या

इन दिनों राजपूतों का नेता मेवाड़ का शासक राणा संग्रामसिंह था जिसे राणा सांगा भी कहते हैं। वह अट्ठारह युद्धों में विजय प्राप्त कर चुका। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। उसके शरीर पर अस्सी घावों के चिह्न थे।

वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। पानीपत के युद्ध में वह भाग नहीं ले सका था क्योंकि उसे गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह की ओर से आक्रमण की आशंका थी परन्तु अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और राणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ पर बाबर ने अधिकार कर लिया था।

राणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में राणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की कामनाओं पर पानी फेर दिया था।

समस्याओं का समाधान

बाबर ने उपरोक्त समस्याओं का बड़ी सावधानी तथा चतुराई के साथ सामना किया।

(1.) जन साधारण में विश्वास की उत्पत्ति

बाबर ने जन साधारण में मंगोलों के शासन के प्रति विश्वास जागृत करने के लिये उदारता तथा सहानुभूति की नीति का अनुसरण किया और अपने व्यवहार से स्पष्ट कर दिया कि जो लोग उसकी शरण में आकर उसकी अधीनता स्वीकार कर लेंगे, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जायेगा तथा उन्हें नौकरी में समुचित पद भी दिये जायेंगे।

(3.) अफगान सरदारों को जागीरें

बाबर ने अफगान सरदारों को शांत करने तथा अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें वचन दिया कि जो अफगान सरदार उसके स्वामित्व को स्वीकार कर लेंगे उनकी रक्षा की जायेगी और उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दी जायेंगी। इस घोषणा का अफगान सरदारों पर अच्छा असर हुआ।

बहुत से अफगान सरदार बाबर के समक्ष उपस्थित हो गये। बाबर ने उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दे दीं। शेष अफगान सरदारों की समस्या को सुलझाने के लिए उसने अविजित भू-भागों को अपने सरदारों में बाँट दिया और उन्हें आदेश दिया कि वे विद्रोही अफगानों पर विजय प्राप्त करें और राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करें।

जो अफगान सरदार बड़े ही शक्तिशाली थे और सरलता से नियन्त्रण में नहीं लाये जा सकते थे उनका दमन बाद में करने का निर्णय लिया गया।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा

बाबर ने अपने सैनिकों को अपने घरों को लौटने से रोकने के लिये अपने सैनिकों की एक सभा आयोजित की और उसमें ओजपूर्ण भाषण दिया। उसने अपने सैनिकों को समझाया कि अनेक वर्षों के परिश्रम से, कठिनाइयों का सामना करके, लम्बी यात्रा करके, अपनी सेना को युद्धों में झौंककर और भीषण हत्याएं करके हमने अल्लाह की कृपा से शत्रुओं के झुण्ड को परास्त किया है जिससे हम उनकी विशाल भूमि को प्राप्त कर सकें।

अब वह कौनसी शक्ति है जो हमें विवश कर रही है, कौनसी ऐसी आवश्यकता उत्पन्न हो गई है कि हम ‘अकारण ही उन प्रदेशों को छोड़ दें जिन्हें हमने अपने जीवन को संकट में डालकर प्राप्त किया है!’ बाबर के इस ओजपूर्ण भाषण का उसके सैनिकों एवं सेनापतियों पर इतना प्रभाव पड़ा कि कुछ को छोड़कर शेष ने भारत में रहने और बाबर के उद्देश्य को पूरा करने का निश्चय कर लिया।

(5.) राणा सांगा से युद्ध का निश्चय

महत्वाकांक्षी राणा सांगा रूपी समस्या का समाधान एक ही तरह से हो सकता था कि बाबर सांगा को युद्ध में परास्त करे। अतः बाबर ने राणा सांगा पर आक्रमण करने का निश्चय किया। राणा सांगा से लोहा लेने के पूर्व बाबर ने उसके मार्ग में आने वाले धौलपुर, बयाना तथा ग्वालियर के छोटे-छोटे अफगान शासकों को भी नतमस्तक करने का निश्चय किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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