पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल के समान ही अत्यंत संतोषजनक थी। पौराणिक काल में नारी अपने विवाह आदि के सम्बन्ध में निर्णय स्वयं ले सकती थी। उसे पर्दा नहीं करना पड़ता था।

पौराणिक काल

पौराणिक काल उस कालखण्ड को कहते हैं जिसमें पुराणों की रचना हुई। पुराणों में धर्म एवं अध्यात्म के साथ-साथ इतिहास एवं काल्पनिक कथाओं का समावेश हुआ है। पौराणिक काल कब आरम्भ हुआ और कब तक चलता रहा, इसके सम्बन्ध में इतिहासकार एक मत नहीं हैं।

पुराणों में वैदिक देवी-देवताओं का मानवीकरण किया गया है तथा रामायण एवं महाभारत कालीन राजाओं तथा योद्धाओं का दैवीकरण किया गया है। इस कारण बहुत से लोग पुराणों को वैदिक काल से लेकर महाकाव्य काल में रचा हुआ मान लेते हैं किंतु यह धारणा सही नहीं है।

बहुत से इतिहासकारों के अनुसार पौराणिक काल ईस्वी 300 से ईस्वी 600 तक चला। यदि हम भारतीय इतिहास के इसी कालखण्ड को पौराणिक काल स्वीकार करते हैं तो यह सम्पूर्ण कालखण्ड गुप्त साम्राज्य का कालखण्ड है। इस काल में गुप्त सम्राट मगध को राजधानी बनाकर भारत के विशाल क्षेत्र पर शासन कर रहे थे।

पौराणिक काल को गुप्त काल तक सीमित करना उचित नहीं है। पुराणों की रचना गुप्त शासकों के बाद भी होती रही। अतः हर्ष के शासनकाल को भी पौराणिक काल में समाहित करना चाहिए।

गुप्तकाल में नारी की स्थिति

भारतीय इतिहास में गुप्त काल धार्मिक पुनरुत्थान का काल है जिसमें वैदिक धर्म को भागवत् धर्म के रूप में प्रस्तुत किया गया तथा जन-सामान्य को रिझाने के लिए पौराणिक कथाओं की रचना की गई।

पौराणिक काल में नारी की शिक्षा

गुप्तकाल ई.275 से ई.550 तक विस्तृत था। विभिन्न पुराणों से ज्ञात होता है कि पौराणिक काल में नारी की स्थिति बहुत अच्छी थी। उन्हें वैदिक काल, स्मृतिकाल, सूत्रकाल, महाकाव्यकाल आदि प्राचीन कालों की ही तरह शिक्षा पाने का पूरा अधिकार था। पौराणिक काल में नारी शिक्षा के दो रूप थे- (1.) आध्यात्मिक और (2.) व्यावहारिक। आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने वाली कन्याएँ ब्रह्मवादिनी होती थीं।

इस काल के साहित्य में वृहस्पति-भगिनी, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मेना, धारिणी, संनति एवं शतरूपा आदि ब्रह्मवादिनी कन्याओं का उल्लेख हुआ है। ऐसी कन्याओं का उल्लेख भी मिलता है जिन्होंने अपनी तपश्चर्या से अभीष्ट की प्राप्ति की थी। उमा, पीवरी, धर्मव्रता आदि कन्याओं ने तपस्या के बल पर अपनी इच्छानुसार वर प्राप्त किया था।

व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करने वाली ऐसी कन्याओं का सन्दर्भ मिलता है जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर मनोनुकूल वर प्राप्त किया था। घर-गृहस्थी में रहने वाली कन्याएँ गृहस्थी के कार्यों में निपुण होती थीं। पूर्व-वैदिक-युगीन अपाला अपने पिता के कृषि कार्य में सहयोग प्रदान करती थी। उस युग की अधिकांश कन्याएँ गाय दुहना जानती थीं, इसलिए कन्याओं को ‘दुहिता’ कहा जाता था। वे सूत कातना, बुनना और वस्त्र सिलना जानती थीं एवं ललित कलाओं में निपुण होती थीं।

पौराणिक काल में नारी का विवाह

गुप्तकाल तक आते-आते भी कन्या के विवाह की स्थिति पूर्ववत् रही किंतु इस काल में गान्धर्व-विवाह (समाज से छिपकर किये गए प्रेम विवाह) के उल्लेख मिलते हैं जो युवती होने पर स्त्री के विवाह के द्योतक हैं।

हर्ष के काल में नारी की स्थिति

थानेश्वर के राजा हर्ष वर्द्धन का शासनकाल ई.606 से ई.647 तक रहा। हर्षकालीन ग्रंथों से अनुमान होता है कि हर्ष-काल तक आते-आते सामान्य परिवारों में नारी शिक्षा का प्रसार लगभग अवरुद्ध हो गया था किंतु समाज के अभिजात्य वर्ग की कन्याओं के लिए शिक्षा के द्वार इस काल में भी पूरी तरह खुले हुए थे। वे प्राकृत और संस्कृत काव्य, संगीत, नृत्य, वाद्य एवं चित्रकला में प्रवीण होती थीं।

हर्षकालीन कवि बाण ने ‘हर्षचरित्’ में लिखा है- ‘राज्यश्री नृत्य-गीत आदि में विदग्ध सखियों के बीच सकल कलाओं का प्रतिदिन अधिकाधिक परिचय प्राप्त करती हुई शनैःशनैः बढ़ रही थी।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

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