बसीन की संधि (1802 ई.)

बसीन की संधि ई.1802 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा अपदस्थ पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के बीच हुई। इस संधि के बाद से ही मराठा शक्ति का पतन आरम्भ हो गया तथा कुछ ही वषोँ में मराठे सहायक संधियों के माध्यम से कम्पनी सरकार के अधीन हो गए।

मराठों में परस्पर संघर्ष

पेशवा बाजीराव (द्वितीय) (1796-1851 ई.) अयोग्य व्यक्ति था। उसके समय में नाना फड़नवीस शासन का कार्य संभालता था। 13 मार्च 1800 को नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों में परस्पर संघर्ष प्रारम्भ हो गये।

दो मराठा सरदारों- ग्वालियर के दौलतराव सिन्धिया तथा इन्दौर के यशवंतराव होलकर के बीच इस विषय को लेकर प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गयी कि पेशवा पर किसका प्रभाव रहे। पेशवा बाजीराव (द्वितीय) किसी शक्तिशाली मराठा सरदार का संरक्षण चाहता था। अतः उसने दौलतराव सिन्धिया का संरक्षण स्वीकार कर लिया। बाजीराव  तथा सिन्धिया ने होलकर के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना लिया।

होलकर के लिये यह स्थिति असहनीय थी। इस कारण 1802 ई. के प्रारम्भ में सिन्धिया एवं होलकर के बीच युद्ध छिड़ गया। जब होलकर मालवा में सिन्धिया की सेना के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त था, तब पेशवा ने पूना में होलकर के भाई बिट्ठूजी की हत्या करवा दी। होलकर अपने भाई की हत्या का बदला लेने पूना की ओर चल पड़ा।

होलकर ने पूना के निकट पेशवा और सिन्धिया की संयुक्त सेना को परास्त किया और एक विजेता की भाँति पूना में प्रवेश किया। होलकर ने राघोबा के दत्तक पुत्र अमृतराव के बेटे विनायकराव को पेशवा घोषित कर दिया। इस पर पेशवा बाजीराव (द्वितीय) भयभीत होकर बसीन (बम्बई के पास अँग्रेजों की बस्ती) चला गया।

बसीन में उसने वेलेजली से प्रार्थना की कि वह उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दे। वेलेजली भारत में कम्पनी की सर्वोपरि सत्ता स्थापित करना चाहता था। मैसूर की शक्ति को नष्ट करने के बाद अब मराठे ही उसके एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी रह गये थे। अतः वह मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर ढूंढ रहा था। पेशवा द्वारा प्रार्थना करने पर वेलेजली को यह अवसर मिल गया।

बसीन की संधि (1802 ई.)

लॉर्ड वेलेजली ने पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह सहायक सन्धि स्वीकार कर ले तो उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दी जा सकती है। पेशवा ने वेलेजली की शर्त को स्वीकार कर लिया। 31 दिसम्बर 1802 को पेशवा और कम्पनी के बीच बसीन की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) पेशवा अपने राज्य में 6,000 अँग्रेज सैनिकों की एक सेना रखेगा तथा इस सेना के खर्चे के लिए 26 लाख रुपये वार्षिक आय का भू-भाग अँग्रेजों को देगा।

(2.) पेशवा बिना अँग्रेजों की अनुमति के मराठा राज्य में किसी अन्य यूरोपियन को नियुक्ति नहीं देगा और न अपने राज्य में रहने की अनुमति देगा।

(3.) पेशवा सूरत पर से अपना अधिकार त्याग देगा।

(4.) निजाम और गायकवाड़ के विरुद्ध पेशवा के झगड़ों के पंच निपटारे का कार्य कम्पनी द्वारा किया जायेगा।

(5.) पेशवा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी देशी राज्य के साथ सन्धि, युद्ध अथवा पत्र-व्यवहार नहीं करेगा।

बसीन की सन्धि का महत्त्व

बसीन की सन्धि के द्वारा पेशवा ने मराठों के सम्मान एवं स्वतंत्रता को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों बेच दिया, जिससे मराठा शक्ति को भारी धक्का लगा। सिडनी ओवन ने लिखा है- ‘इस सन्धि के पश्चात् सम्पूर्ण भारत में, कम्पनी का राज्य स्थापित हो गया।’

अँग्रेज इतिहासकारों ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। इस सन्धि का सबसे बड़ा दोष यह था कि अब अँग्रेजों का मराठों से युद्ध होना प्रायः निश्चित हो गया, क्योंकि वेलेजली ने मराठों के आन्तरिक झगड़ों को तय करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया था।

वेलेजली ने कहा था कि इससे शान्ति तथा व्यवस्था बनी रहेगी किन्तु इस संधि के बाद सबसे व्यापक युद्ध हुआ। वेलेजली ने सन्धि का औचित्य बताते हुए कहा था कि अँग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय था किन्तु जब मराठे स्वयं अपने झगड़ों में उलझे हुए थे, तब फिर अँग्रेजों पर आक्रमण करने का प्रश्न ही नहीं था।

वास्तविकता यह थी कि वेलेजली भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने पर तुला हुआ था और वह मराठों को ऐसी सन्धि में उलझा देना चाहता था, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग खुल जाये। अतः बसीन की सन्धि ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

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बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

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मराठा शक्ति का पतन

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