पुराणों में कालगणना: भारतीय परम्परा में समय का विशाल स्वरूप
पुराणों में कालगणना की मूल अवधारणा
कालगणना भारतीय परम्परा में समय को समझने की एक विशिष्ट पद्धति प्रस्तुत करती है। पुराणों में समय की गणना अत्यन्त सूक्ष्म इकाइयों से लेकर ब्रह्मा की सम्पूर्ण आयु तक की गई है। इस परम्परा में परमाणु, अणु, त्रुटि, निमेष, काष्ठा, मुहूर्त, दिन, मास, वर्ष, युग, मन्वन्तर और कल्प जैसी इकाइयों का वर्णन मिलता है।
पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। कालगणना का अध्ययन भारतीय इतिहास-दृष्टि, धार्मिक मान्यताओं और ब्रह्माण्ड की चक्रीय अवधारणा को समझने में सहायक है।
पुराणोक्त कालगणना एवं कालमान सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा की आयु पर समाधारित है। इसे आरोही और अवरोही दोनों क्रमानुसार निर्दिष्ट किया गया है। आरोही क्रम का आरंभ जहाँ परमाणु से होता है वहीं अवरोही क्रम ब्रह्म की पूर्णायु ‘‘पर’’ से गणनीय है। विविध पुराणों में वर्णित कालगणना से सम्बंधित तथ्यों को सरल, सुबोध तथा सारणीबद्ध रूप से विवेचित करने का प्रयास किया जा रहा है। अतः कालगणना को इस विमर्श का एक प्रमुख आधार माना गया है।
कालगणना के प्रमुख स्रोत
श्रीमद्भागवत पुराण में कालगणना
श्रीमद्भागवत पुराण में समय की छोटी इकाइयों से लेकर युगों और कल्पों तक का विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग को मिलाकर चतुर्युग कहा गया है। एक हजार चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन माना गया है। ब्रह्मा की रात्रि भी इतनी ही अवधि की होती है। पुराणों में कालगणना के इस विवरण में चौदह मन्वन्तरों का भी उल्लेख है।
विष्णु, कूर्म और मत्स्य पुराण में कालगणना
विष्णु पुराण में युगों, मन्वन्तरों तथा ब्रह्मा के दिन-रात का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के समान मिलता है। कूर्म पुराण में युगों की संध्या और सन्ध्यांश का विवरण दिया गया है, जबकि मत्स्य पुराण में पितरों, देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुव के कालमान का उल्लेख है। इन ग्रन्थों के तुलनात्मक अध्ययन से पुराणों में कालगणना की विभिन्न इकाइयों और मान्यताओं को समझा जा सकता है।
पुराणों के अनुसार चार युग
सत्ययुग से कलियुग तक का कालमान
पौराणिक परम्परा में चार युगों की अवधि इस प्रकार बताई गई है:
- सत्ययुग: 17,28,000 मानव वर्ष
- त्रेतायुग: 12,96,000 मानव वर्ष
- द्वापरयुग: 8,64,000 मानव वर्ष
- कलियुग: 4,32,000 मानव वर्ष
इन चारों युगों की कुल अवधि 43,20,000 मानव वर्ष मानी गई है। इसे महायुग अथवा चतुर्युग कहा जाता है। पुराणों के अनुसार 71 चतुर्युगों से कुछ अधिक अवधि एक मन्वन्तर की होती है। चौदह मन्वन्तरों से ब्रह्मा के एक दिन का काल निर्धारित होता है।
पुराणों में वर्तमान कालखण्ड
विष्णु, कूर्म और हरिवंश पुराणों में वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर तथा अट्ठाईसवें चतुर्युग का उल्लेख मिलता है। पारम्परिक गणना के अनुसार वर्तमान में कलियुग चल रहा है और इसका आरम्भ श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के समय से जोड़ा जाता है। आलेख में आर्यभट्ट, चोल अभिलेखों और सिद्धान्त-शिरोमणि के आधार पर कलियुग के आरम्भ का निर्धारण 3101 ईसा पूर्व बताया गया है। ये विवरण पारम्परिक कालगणना के दावों को प्रस्तुत करते हैं; इनकी ऐतिहासिक व्याख्या के लिए स्रोतों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
निष्कर्ष:कालगणना का महत्त्व
पुराणों में कालगणना केवल समय की इकाइयों का विवरण नहीं है, बल्कि सृष्टि, युग-चक्र, मन्वन्तर और कल्प की एक व्यापक अवधारणा भी प्रस्तुत करती है। इसका अध्ययन प्राचीन भारतीय धार्मिक विचारों, ब्रह्माण्ड-विज्ञान और इतिहास-लेखन की परम्पराओं को समझने का अवसर देता है। विभिन्न पुराणों के विवरणों की तुलना तथा साहित्यिक और अभिलेखीय साक्ष्यों के परीक्षण से इस विषय का अधिक संतुलित अध्ययन किया जा सकता है।
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