Home Blog Page 130

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

0
मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार - www.bharatkaitihas.com
मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

वैदिक आर्यों के काल से ही भारत में सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार पर ध्यान दिया गया। मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार भी वैदिक काल की तरह उन्नत था।

वैदिक काल की तरह मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार में अब भी अतिथि सत्कार, बड़ों का अभिवादन, भूखे को भोजन, जीवदया, अहिंसा आदि कर्तव्य सम्मिलित थे। फिर भी वैदिक काल की अपेक्षा मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार में कुछ बड़े परिवर्तन भी आ गए थे। अब स्त्री घर में आए निकट सम्बन्ध वाले पुरुषों से तो प्रत्यक्ष संवाद करती थी किंतु अपरिचित पुरुष से सीधा संवाद नहीं करती थी। समाज पूरी तरह पुरुष-प्रधान था।

मध्य-कालीन भारतीय समाज में जाति-प्रथा बुरी तरह से हावी थी। इस कारण सामाजिक शिष्टाचार भी अपनी जाति तक सीमित होकर रह गया था। दूसरी जातियों के साथ सामाजिक व्यवहार प्रायः नहीं के बराबर था। घरों की स्त्रियां, घर में आए पुरुष अतिथियों से प्रायः बातचीत नहीं करती थीं।

गांव की चौपाल पर पुरुष तो परस्पर मिलते रहते थे, किंतु स्त्रियों को मित्र और सम्बन्धियों से मिलने की अनुमति नहीं थी। शहरों में भी पुरुष अपने कार्य के सिलसिले में एक-दूसरे से मिलते थे किंतु स्त्रियों को ऐसे अवसर बहुत कम उपलब्ध थे। स्त्रियों में पर्दा-प्रथा प्रचलित थी। जन्म, विवाह, शव-यात्रा आदि के समय या किसी की बीमारी पर स्त्रियों को घर में आए सगे-सम्बन्धियों से मिलने के अवसर प्राप्त होते थे।

मध्ययुग में अतिथियों के स्वागत के लिए अनेक औपचारिकताएं की जाती थीं। अतिथि के आगमन पर घर का मुखिया द्वार पर जाकर उसका स्वागत करता था। प्रवेश द्वार पर ही अतिथि अपने जूते उतार देता था। पुरुष-अतिथि एवं संत आदि के आगमन पर हिन्दुओं में चन्दन, पुष्प, चावल आदि युक्त जल से उसके पैर धोये जाते थे, फिर उसे बैठक में ले जाया जाता था।

अमीरों के घर में बैठक का कमरा सजाकर रखा जाता था जिसमें मूल्यवान दरियां और मखमल के गद्दे बिछे रहते थे। साधारण घरों में चटाई और चारपाई होती थी। शाही पुरुष अपने अतिथियों से दीवानखाने में मिलते थे, जहाँ प्रतिदिन दरबार लगता था। इस कक्ष को सुन्दर कालीन और बहुमूल्य पर्दों से सजाया जाता था। अतिथि अपनी सामाजिक स्थिति के अनुसार गृहस्थ के दाईं या बाईं ओर बैठता था। अपरिचितों को भी बैठक में आकर मिलने की अनुमति होती थी।

शाही लोगों से मिलने पर भेंट देने की परम्परा थी। किसी बड़े ओहदेदार व्यक्ति के पास छोटे आदमी का खाली हाथ जाना अशिष्टता मानी जाती थी। बादशाह एवं शहजादे के जन्मदिन, विजय अभियान एवं शिकार से सकुशल वापसी, नौरोज आदि अवसरों पर नजराना दिया जाता था, जिनमें से कुछ हिस्सा रखकर शेष लौटा दिया जाता था।

भारतीयों के आचार-व्यवहार की अनेक विदेशी यात्रियों ने प्रशंसा की है। परस्पर वार्तालाप में लोग मर्यादा का ध्यान रखते थे। अपने से बड़े या श्रेष्ठ व्यक्ति से बातचीत में सावधानी बरती जाती थी और उसके प्रति सम्मान के लिए अपना सिर ढका जाता था। बड़ों की उपस्थिति में लोग प्रायः खड़े ही रहते थे। शाही दरबार में उपस्थित होने के विस्तृत नियम थे। अमीर, उमराव एवं दरबारियों को प्रतिदिन सुल्तान के समक्ष उपस्थित होना पड़ता था।

 विशिष्ट दरबारियों तथा शहजादों के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति दरबार में नहीं बैठ सकता था। राज्य के उच्च अधिकारियों, विदेशों से आए राजदूतों तथा वित्तीय एवं सैन्य सहायता के लिए आए पदच्युत रजवाड़ों के शासकों को भी इस नियम से छूट नहीं दी गई थी। बादशाह के जाने से पूर्व किसी को दरबार छोड़़ने की अनुमति नहीं थी। बादशाह का नाम जो भी सुने, जहाँ भी सुने उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह सम्मान के साथ अपना सिर झुकाए।

पत्रवाहक से शाही फरमान प्राप्त करने के लिए अमीरों, सेनापतियों और दरबारियों को थोड़ी दूर चलकर आना पड़ता था और फरमान लेते समय झुकना और उसे अपने सिर से लगाना पड़ता था। दरबार में भी उत्तम ढंग से शिष्टाचार का निर्वाह किया जाता था।

इस प्रकार मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार वैदिक काल की अपेक्षा अधिक जटिल हो गया था।

अभिावादन की परम्पराएं

मध्य-काल में अभिवादन की परम्पराएं बहुत कुछ आज की ही तरह थीं। हिन्दुओं में बराबरी वालों को राम-राम कहकर अभिवादन किया जाता था। उच्च पदस्थ व्यक्ति, सूबेदार, मंत्री या सेनापति का अभिवादन सिर से ऊपर हाथों को जोड़कर किया जाता था। छोटों के द्वारा बड़ों का अभिवादन उसके पैरों को छूकर किया जाता था। गुरु के अभिवादन में लेटकर दण्डवत् किया जाता था।

राजा का अभिवादन, ब्राह्मणों को छोड़़कर, शेष लोगों के द्वारा पैर छूकर या धरती को स्पर्श करके किया जाता था। ब्राह्मण राजा के अभिवादन में सिर से ऊपर अपने दोनों हाथ जोड़ लेते थे। विजयनगर दरबार में प्रत्येक व्यक्ति को नंगे पैर जाना होता था।

दरबार में जाने वाला व्यक्ति राजा के पांव चूमने के बाद हाथ बांधकर एक ओर खड़ा हो जाता था तथा तब तक धरती पर दृष्टि रखता था जब तक राजा उसे सम्बोधित नहीं करता था। गुरु नानक ने अपने अनुयाइयों को नमस्कार के उत्तर में ‘सत-कर्तार’ कहने की सलाह दी थी।

मुसलमान अभिवादन के लिए ‘सलाम’ अथवा ‘अस्सलाम वालेकुम’ कहते थे और प्रत्युत्तर में ‘वालेकुम अस्सलाम’ कहते थे। बराबरी के लोगों एवं मित्रों का अभिवादन करते समय दांये हाथ को मस्तक के सामने तक उठाते थे। एवं तीन बार गले लगाकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ते थे।

वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ जन के अभिवादन में आगे झुककर दायें हाथ को मस्तक के पास ले जाते हैं। सुल्तान के अभिवादन के लिए भी नियम बनाए गए थे। इसके लिए सामान्य तरीका ‘जमींबोसी’ (धरती चूमना) या ‘पांवबोसी’ (पैर चूमना) है। बलबन पांवबोसी का तरीका अधिक पसन्द करता था।

अबुल फजल ने बादशाह के प्रति सामूहिक अभिवादन के रूप में ‘कोर्निस’ और ‘तसलीम’ का उल्लेख किया है। कोर्निस में दायें हाथ की हथेली को ललाट पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाया जाता था। तसलीम पेश करते समय दायें हाथ को जमीन पर रखना होता था, जिसमें हथेली ऊपर की ओर रहती थी। फिर हथेली को छाती एवं माथे से लगाया जाता था।

अकबर ने आदेश जारी किया कि तसलीम की यह क्रिया एक साथ तीन बार की जानी चाहिए। उसने अभिवादन का दूसरा तरीका सिजदा अर्थात् बादशाह के सामने दण्डवत लेटना भी शुरू कराया था किन्तु कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसे व्यक्ति-पूजा मानकर इस तरीके पर आपत्ति की। अतः दीवान-ए-आम में इसकी मनाही हो गई फिर भी निजी कक्ष में इसकी अनुमति थी।

शाहजहाँ के शासन काल में इस तरीके को समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह जमींबोसी का तरीका अपनाया गया। बाद में इसे भी स्थगित कर तसलीम के पुराने ढंग को संशोधित करके अपनाया गया। नए तरीके में कम से कम चार बार तसलीम करनी होती थी। औरंगजेब ने इस प्रकार के समस्त अभिवादनों को मूर्ति-पूजा का परिचायक मानते हुए इन्हें समाप्त कर दिया और अभिवादन के लिए केवल ‘अस्सलाम वालेकुम’ को मान्यता दी।

इस प्रकार मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार में अभिवादन का बड़ा महत्व था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

0
मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण - www.bharatkaitihas.com
मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण लोगों की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार होते थे। विभिन्न समुदायों के लोग प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे।

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण वर्तमान काल की अपेक्षा काफी अलग थे। निर्धन लोगों के पास पूरा तन ढकने के लिए भी कपड़े नहीं होते थे। मध्यमवर्गीय परिवारों के वस्त्राभूषण भी अत्यंत साधारण होते थे। केवल सामंती परिवारों एवं श्रेष्ठि परिवारों के पास अच्छे वस्त्राभूषण उपलब्ध थे।

मध्यकालीन वेशभूषा

जन-सामान्य की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में हिन्दू पुरुषों में धोती, कुर्ता तथा पगड़ी अधिक प्रचलित थे और हिन्दू औरतों में कांचली, घाघरा ओढ़नी अधिक लोकप्रिय थी किंतु साड़ी-ब्लाउज और पेटीकोट भी समान रूप से प्रचलित थीं। औरतें घर से निकलते समय शरीर को चादर से लपेट लेती थीं। मजदूर और किसान वर्ग के लोग घुटनों से ऊपर तक छोटी सी धोती लपेटते थे।

सर्दियों में साधारण लोग सूती कोट पहना करते थे, जिसमें रुई भरी होती थी। उत्तर भारत में पगड़ी अथवा साफा प्रचलित था किंतु कश्मीर और पंजाब में रुई भरी हुई टोपी का चलन था। अत्यंत निर्धन लोग केवल लंगोट लगाकर जीवन बिताते थे। मुसलमानों के राज्य में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई थी।

सरकारी कारिंदों की वेशभूषा

मुसलमान सैनिकों की कोई विशेष पोशाक नहीं थी फिर भी वे चुस्त कपड़े पहनते थे जिन पर तलवार, ढाल, गुप्ती आदि हथियार कसे हुए होते थे। शाही कारिंदे एवं गुलाम कमरबंद, लाल जूते और ‘कुला’ पहनते थे।

तुर्की सुल्तानों के काल की वेशभूषा

दिल्ली सुल्तानों के काल में लम्बी तातारी टोपी पहनने का प्रचलन था किंतु बाद में तातारी टोपी का स्थान पगड़ी ने ले लिया। पगड़ी दोनों समुदायों के लोग सामान्य रूप से धारण करते थे। मुस्लिम सफेद और गोल पगड़ी बांधते थे जबकि हिन्दुओं में रंगीन, ऊँची और नोकदार पगड़ी प्रचलित थी। गर्मी के कारण जुर्राबें बहुत कम पहनी जाती थी।

अधिकांश हिन्दू नंगे पैर रहते थे। बलबन ने अपने गुलामों को जुर्राब पहनने का आदेश दिया था। कट्टर धार्मिक प्रवृत्ति के मुसलमान नमाज आदि में सफाई बनाए रखने के लिए जुर्राबों का इस्तेमाल आवश्यक मानते थे। उस समय तुर्की जूते अधिक प्रचलित थे, जो सामने से नोकदार तथा ऊपर से खुले हुए होते थे। इनको पहनने और उतारने में अधिक सुविधा रहती थी।

अमीर अपने जूते रंगीन मखमल या जरी के बनवाते थे जिन पर रेशम और चमड़े के फीते लगाए जाते थे। कुछ जूतों पर हीरे-जवाहरात भी जड़वाये जाते थे। कालीकट के ब्राह्मण जाड़ों में भूरे चप्पल तथा गर्मियों में काठ की खड़ाऊ पहनते थे। मध्यम-वर्गीय परिवार लाल चमड़े के जूते पहनते थे, जिन पर फूलों की आकृतियां बनी रहती थीं।

साधु-सन्तों, फकीरों एवं दरवेशों को उनकी पोषाक से पहचाना जाता था। मुस्लिम फकीर लम्बी ‘दरवेश-टोपी’ तथा पैरों में ‘काठ की चट्टी’ पहनते थे और शरीर पर एक लम्बा चोगा डालते थे। मुस्लिम दार्शनिक पगड़ी, चोगा तथा पाजामा पहनते थे। हिन्दू संन्यासी एवं योगी केवल लंगोटी से काम चलाते थे। हिन्दू पंडित कमर में रेशमी चादर लपेट लेते थे, जिसका एक छोर पांव तक लटकता रहता था और लाल रंग की रेशमी चादर कन्धों पर डाल लेते थे।

मुगलकाल में शाही अमीरों की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र महंगे होते थे। अमीर मुसलमान सलवार, सुतन्नी और पाजामा पहनते थे। शरीर के ऊपरी भाग पर कुर्ता, जैकेटनुमा कोट, काबा या लम्बा कोट पहना जाता था जो घुटनों तक लटकता था। यह मलमल या बारीक ऊन का बना होता था। मुगल बादशाह रोएंदार फर के कोट पहनते थे। धनी लोग कन्धे पर रंगीन ऊनी चादर रखते थे।

मध्य-युगीन सुल्तान, अमीर, खान आदि शाही पुरुष जरी वाले रेशमी और मखमली कपड़े पहनते थे। उनकी पोषाकों में दिबा-ए-हफ्तरंग (सप्तरंगी किमखाब), बीसात-ए-जमुरादी (मोतिया रंग की पोशाक), जामा-ए-जारबफ्त (जरी या सोने के तारों से बुना कपड़ा), कतान-ए-रूसी (रूस में बना कपड़ा), कतान-ए-बिरारी, बरकरमान (कई रंगों का ऊनी कपड़ा) आदि का भी प्रयोग होता था।

अकबर की वेशभूषा

अकबर ने अपनी पोशाकों के लिए कुशल दर्जी नियुक्त किए। आइन-ए-अकबरी में ग्यारह प्रकार के कोट का विवरण मिलता है। उनमें ‘टकन चिया पेशवाज’ सर्वाधिक महत्त्व का था। यह गोल-घेरदार कोट था, जो सामने से खुला रहता था और दांयी ओर से बंद होता था।

इसके साथ ही रोएंदार कोट ‘शाह आजीदाह’ का भी महत्त्व था। अकबर मुलायम रेशम की धोती भी पहनता था। मॉन्सेरट ने अकबर की पोशाक के बारे में लिखा है- ‘बादशाह सलामत की पोशाक रेशम की थी, जिस पर सोने का सुन्दर काम किया रहता था। उनकी पोशाक घुटनों तक झूलती थी तथा उसके नीचे पूरे गांव का जूता होता था। वे मोती और सोने के जेवर भी पहनते थे।’

मध्यकालीन महिलाओं की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में महिलाओं की पोशाक साधारण थी। गरीब स्त्रियां साड़ी पहनती थीं जिसके एक छोर से उनका सिर ढका रहता था। गरीब और अमीर दोनों वर्ग की स्त्रियां वक्ष पर अंगिया पहनती थीं। दक्षिण भारत में निम्न-वर्ग की स्त्रियां सिर नहीं ढकती थीं। गरीब उड़िया स्त्रियां कपड़ा प्राप्त न होने के कारण पत्तियों से शरीर को ढकती थीं। मुसलमान स्त्रियां सलवार-कमीज पहनती थीं, ऊपर से बुर्का डालती थीं।

मध्य-कालीन चित्रों में स्त्रियों को ओढ़नी के साथ पीठ पर बंधने वाली चोली पहने हुए चित्रित किया गया है। स्त्रियां घाघरा भी पहनती थीं, जिनमें किनारी एवं कसीदाकारी का काम होता था। बंगाली स्त्रियां कांचुली या चोली पहनती थीं। यह दो प्रकार की होती थी, एक छोटी होती थी, जिससे केवल स्तन ढकते थे, दूसरी लम्बी होती थी और कमर तक जाती थी।

धनी औरतें कश्मीरी ऊन का बना बारीक ‘कावा’ पहनती थीं। कुछ स्त्रियां उत्तम प्रकार के कश्मीरी शॉल ओढ़ती थीं। हिन्दू और मुसलमान महिलाएं सूती, रेशमी या ऊनी दुपट्टे से सिर ढकती थी। उस काल में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां जूतों का प्रयोग अधिक करती थीं।

मध्यकालीन समाज में सौन्दर्य प्रसाधन

मनुष्य में सुंदर एवं आकर्षक दिखने की ललक आदिकाल से है। इसलिए शरीर पर सुगंधित पदार्थों का लेप करने, अंगराग लगाने, उबटन मलने, बाल संवारने, काजल लगाने, वस्त्रों को रंगने, आभूषण पहनने आदि की परम्पराएं भी अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। मध्य-कालीन भारतीय समाज में भी ये परम्पराएं प्रचलन में थीं।

स्नान करने और कपड़ा धोने के लिए साबुन का उपयोग किया जाता था। शरीर एवं कपड़ों पर लगाने के लिए कई प्रकार की कीमती सुगंधियों का प्रयोग किया जाता था। केशों को काला करने के लिए ‘वस्मा’ और ‘खिजाब’ का प्रयोग होता था। कपड़ों को सफेद बनाए रखने के लिए नील का प्रयोग होता था। साबुन, पाउडर और क्रीम जैसी प्रसाधन सामग्रियों के रूप में ‘घासूल’, त्रिफला, उबटन और चन्दन का प्रयोग होता था।

अबुल फजल ने मुगल काल में स्त्रियों के सोलह शृंगारों का उल्लेख किया है जिनमें स्नान करना, केशों में तेल, लगाना, चोटी गूँथना, रत्नों से वेणी शृंगार करना, मोतियों से सजाकर बिन्दी लगाना, काजल लगाना, हाथ रंगना, पान खाना तथा स्वयं को फूलमालाओं तथा कर्णफूल, हार, करधनी आदि आभूषणों से सजाना आदि सम्मिलित हैं। हिन्दू महिलाएं अपने केश पीछे की ओर बांधती थीं।

धनी परिवारों की महिलाएं अपनी केशों को सिर के ऊपर शंक्वाकार गूँथकर उनमें सोने-चांदी के कांटे लगाती थीं। नकली केश लगाने का उल्लेख भी मिलता है। हिन्दू स्त्रियां सिन्दूर का टीका लगाने तथा उससे मांग भरने को शुभ मानती थीं। आंखों में काजल लगाती थीं तथा पलकों को रंगने के लिए सुरमे का प्रयोग करती थीं। भारतीय स्त्रियां अपने हाथों और पांवों में मेहन्दी लगाती थीं।

मुंह पर लगाने के लिए ‘गलगुना’ और ‘गाजा’ (लाल रंग) का प्रयोग किया जाता था। केश संवारने में लकड़ी, पीतल एवं हाथी दांत की कंघियों का प्रयोग होता था। अकबर ने शाही परिवार की सुगन्धित पदार्थों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए शेख मन्सूर की अध्यक्षता में ‘खुशबूखाना’ स्थापित किया था। जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ की माँ ने गुलाब से एक नवीन इत्र का निर्माण किया था जिसका नाम ‘इत्र-ए-जहाँगीरी’ रखा गया। नूरजहाँ स्वयं भी फूलों से इत्र तैयार करती थी और वह विभिन्न डिजाइनों के सुंदर कपड़े डिजाइन करती थी। उन पर चित्र भी बनाती थी।

मध्यकालीन समाज में आभूषण

सभ्यता के विकास के साथ ही स्त्रियों में आभूषणों के प्रति बोध उत्पन्न हुआ। वे अपने शरीर के विभिन्न अंगों को फूल, कौड़ी, छोटे शंख, मिट्टी, ताम्बे एवं सोने के बने मनकों तथा सिक्कों आदि से सजाती थीं। अत्यंत प्राचीन काल से ही हार, ताबीज एवं मनके मिलने लगते हैं।

मुगलकालीन लेखक अबुल फजल ने सैंतीस आभूषणों का उल्लेख किया है। चौक, मांग, कतबिलादर (संभवतः आधुनिक चंद्रमान), सेकर और बिंदुली आदि आभूषण सिर और ललाट पर धारण किए जाते थे। कर्णफूल, पीपल पत्ती, मोर भांवर और बाली कानों में पहने जाते थे। नाक में पहनने के आभूषणों की शुरुआत संभवतः मुसलमानों ने की थी। इनमें ‘नथ’ और ‘बेसर’ अधिक प्रचलित थे।

हिन्दू स्त्रियां सिर के आगे के भाग में सोने-चांदी का टीका या बोर धारण करती थीं। टीका माथे पर झूलता रहता था जबकि बोर माथे के अगले भाग पर स्थिर रहता था। नाक के बाएं भाग में सोने-चांदी की लौंग पहनी जाती थी जिसके आगे के भाग में मोती, हीरा या अन्य कीमती पत्थर जड़ा जाता था। गले में सोने-चांदी के हार पहने जाते थे जिनमें हीरे, जवाहरात एवं मोती आदि से बने नग जड़े जाते थे।

हार एक लड़ी से लेकर कई लड़ी के भी होते थे। धनी स्त्रियों के हार में पांच-सात लड़ियां होती थीं। हाथ के ऊपरी भाग में बाजूबन्द या तोड़े पहने जाते थे और कलाई में कंगन, चूड़ी एवं गजरा पहने जाते थे। कमर में तगड़ी, क्षुद्र खंटिका, कटि मेखला एवं सोने की पेटी धारण की जाती थी। अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थीं। पैरों में जेहर, घुंघरू, पायल आदि पहनते थे। पैरों की अंगुलियों में झांक, बिछुआ तथा आंवट पहने जाते थे।

हिन्दू पुरुष कानों में कर्णफूल, गले में साने की चेन तथा अंगुलियों में अंगूठियाँ पहनते थे। राजपूत पुरुषों में ‘कर्णफूल’ धारण करना अनिवार्य था। मुसलमान पुरुष आभूषणों के विरोधी थे, फिर भी कुछ मुसलमान ‘ताबीज’ और ‘गण्डा’ आदि पहनते थे। सुल्तान और मुगल बादशाह सोने, चांदी, हीरे, माणिक आदि के आभूषण पहनते थे।

सर टॉमस रो ने उल्लेख किया है कि- ‘जहाँगीर अपने जन्मदिन पर कीमती वस्त्रों तथा हीरे-जवाहर के आभूषणों से सजकर प्रजा के समक्ष आता था। उसकी पगड़ी सुंदर पक्षी के पंखों से सजी रहती थी, जिसमें एक ओर काफी बड़े आकार का माणिक, दूसरी ओर बड़े आकार का हीरा तथा बीच में हृदय की आकृति का पन्ना सुशोभित होता था। कन्धों पर मोतियों और हीरों की लड़ियां झूलती थीं तथा गले में मोतियों के तीन जोड़े हार होते थे। बाजुओं में हीरे के बाजूबन्द तथा कलाई में हीरे के तीन कंगन होते थे। हाथ की प्रायः प्रत्येक अंगुली में अंगूठी होती थी।’

बहूमूल्य हीरों की बनी ‘मांग टीका’ की कीमत पांच लाख टका तक हो सकती थी। सोने और चांदी के काम में गुजराती हिन्दू स्वर्णकार अधिक विख्यात थे। एक चतुर कारीगर की फीस 64 दाम प्रति तोला थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकालीन समाज का भोजन

0
मध्यकालीन समाज का भोजन - www.bharatkaitihas.com
मध्यकालीन समाज का भोजन - दाल-बाटी

मध्यकालीन समाज का भोजन आधुनिक समाज के भोजन से कई अर्थों में अलग था। अधिकांश लोग घर में बने हुए भोजन एवं व्यंजन उपयोग में लाते थे तथा शुद्धता का बहुत ध्यान रखा जाता था।

मध्यकालीन समाज का भोजन हिन्दुओं एवं मुसलमानों में मांस के अतिरिक्त एक जैसा ही था। हिन्दुओं के भोजन में विभिन्न प्रकार के अनाज एवं दाल, दूध, दही, मक्खन तथा तेल आदि से बने कई तरह के व्यंजन होते थे। धनी लोग अपने भोजन में गेहूँ एवं मक्का का आटा एवं दलिया, चावल, बेसन तथा उबली हुई सब्जियों का प्रयोग करते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा के धनी लोग पूड़ी और लूची का अधिक प्रयोग करते थे।

वे चावल के साथ बादाम, किशमिश आदि मिलाकर पुलाव तथा अन्य व्यंजन तैयार करते थे। सामान्यतः दाल-भात खाया जाता था। अल्पाहार में दही-चिउड़ा का प्रयोग अधिक होता था। मिष्ठान्न में हलवा, लापसी, खीर, मीठे चावल एवं मीठे दलिया का अधिक प्रचलन था। ब्राह्मण, वैश्य, जैन, बौद्ध-भिक्षु एवं अन्य उच्च वर्ग के लोग मांस, मछली, अण्डा, प्याज, लहसुन जैसे तामसिक भोजन को घृणास्पद मानते थे किंतु राजपूत इनका प्रयोग करते थे।

समाज में निम्न समझी जाने वाली जातियों में मध्यकालीन समाज का भोजन थोड़ा अलग था। ये जातियाँ मांस-मछली एवं अण्डे का प्रयोग करती थीं।

दक्षिणी भारत में मध्यकालीन समाज का भोजन मुख्यतः शाकाहारी था। हिन्दुओं में सामिश भोजन का प्रचलन बहुत कम था। विदेशी यात्रियों का कथन है कि- ‘हिन्दू मांसाहार की कम जानकारी रखते थे तथा वैसा भोजन नहीं करते थे जिसमें रक्त हो।’ उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में ऐसी बहुत सी जातियां थीं जो मांसाहार से दूर रहती थीं जबकि पंजाब, बंगाल और कश्मीर में कुछ ब्राह्मण भी मांस-मछली खाते थे।

मुसलमानों के लिए मध्यकालीन समाज का भोजन विविध प्रकार के मांस से युक्त होता था। अर्थात्मु सलमान सामिष भोजन अधिक करते थे। मुसलमानों को मांस तथा उसके बने हुए विविध व्यंजन अधिक प्रिय थे। वे मांस-मछली से ‘दूजा ब्रियानी’ और ‘कीमा पुलाव’ बनाया करते थे। अकबर एवं उसके बाद के कुछ मुगल बादशाहों ने पवित्र दिनों में पशुवध का निषेध कर रखा था। अकबर ने पहले, शुक्रवार को फिर रविवार को मांसाहार करना छोड़़ दिया था। जहाँगीर ने अपने पिता के जन्मदिन पर पशुवध की मनाही कर दी थी तथा वह स्वयं सप्ताह में एक दिन व्रत रखता था और उस दिन केवल गुजराती खिचड़ी खाता था।

तुर्की सुल्तान और मुगल बादशाह काबुल से सूखी मेवा, बदख्शां से तरबूज, समरकंद से अंगूर और सेव, याज्द से अनार, यूरोप से अनानास और काबुल से बेर एवं जामुन आदि मंगवाते थे। सूखे मेवे में नारियल, खजूर, मखाना, कमलगट्टा, अखरोट, पिस्ता आदि होते थे। पीने के लिए नदी एवं कुएं आदि का ताजा जल काम में लाया जाता था।

साधारण लोग तालाबों एवं ताल-तलैयों का जल भी पीते थे। हिन्दू राजा, मुगल बादशाह तथा कुछ रईस लोग गंगाजल को स्वास्थ्यवर्धक और पवित्र मानते थे। अन्य नदियों का जल भी मंगवाया जाता था। मुगल बादशाह बर्फ के शौकीन थे। अमीर एवं उच्च वर्ग के मुसलमान विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों के मांस एवं अण्डों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार करवाते थे।

साधारण वर्ग के लोगों के लिए मध्यकालीन समाज का भोजन सामान्यतः सुपाच्य अर्थात् जल्दी पचने वाले दलिया, खिचड़ी, भात एवं पुलाव आदि से युक्त होता था। दक्षिण में लोगों का मुख्य भोजन चावल था। गुजराती लोग चावल और दही पसन्द करते थे। कश्मीरियों के भोजन में उबले चावल तथा नमकीन उबली सब्जियों की प्रमुखता थी। उत्तर के लोगों में गेहूँ, ज्वार या बाजरा की चपातियां खाई जाती थीं। बेझर एवं मिस्सी रोटियों का भी प्रचलन था। धनी एवं मध्यमवर्गीय लोग दिन में तीन बार तथा निर्धन लोग दिन में दो बार भोजन करते थे एवं दोपहर में चने तथा भुने हुए अनाज खाते थे।

माद्रक द्रव्य

मध्य-काल में प्रयोग किए जाने वाले मादक द्रव्यों में मुख्यतः शराब, अफीम, भांग और तम्बाकू थे। कुछ लोग गांजा एवं सुल्फा भी पीते थे। पान, चाय और कॉफी को भी माद्रक द्रव्य माना जाता था। जन-सामान्य मादक द्रव्यों के सेवन को दुर्गुण मानता था। अल्लाउद्दीन खलजी आदि तुर्की सुल्तानों और जहाँगीर एवं औरंगजेब आदि कुछ मुगल बादशाहों ने अपने शासन में मद्य-सेवन पर प्रतिबंध लगाए। बाबर मद्यपान करता था किंतु उसने अपनी सेना पर अपने नैतिक प्रभाव में वृद्धि करने के उद्देश्य से मद्यपान त्याग दिया था।

अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ भी मदिरापान करते थे किंतु औरंगजेब मद्यपान नहीं करता था। अधिकांश मुगल अमीर भी मद्यपान करते थे। मुगल काल में देशी शराब की विख्यात किस्मों में ताड़ी, नीरा, महुआ, खेरा, बधचार और जागरे प्रमुख थीं। पुर्तगाल और फारस से उत्तम किस्म की शराब मंगायी जाती थी।

राजपूतों में अफीम का सेवन अधिक प्रचलित था। वे युद्धकाल में अफीम का सेवन अधिक करते थे। कुछ मुगल बादशाह भी अफीम का सेवन करते थे। आरम्भ में भारत में तम्बाखू पैदा नहीं होता था किंतु पुर्तगाली अपने साथ पहली बार तम्बाखू लेकर आए। जन-साधारण में कुछ ही वर्षों में तम्बाखू पीने की लत इतनी अधिक बढ़ गई कि ई.1617 में जहाँगीर ने तम्बाखू के सेवन पर रोक लगाई किंतु जनता पर इस रोक का कोई असर नहीं हुआ।

इटावली यात्री मानुसी ने लिखा है कि अकेले दिल्ली में तम्बाकू पर लगाई गई चुंगी से प्रतिदिन 5,000 रुपये की आय होती थी। जहाँगीर ने ‘भांग’ को अस्वास्थ्यकर मानकर उसके सेवन पर रोक लगाई। सुसंस्कृत परिवारों में चाय और कॉफी को भी नशा माना जाता था। इनका प्रचलन कोरोमंडल के तटवर्ती क्षेत्रों में अधिक था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकालीन आवास

0
मध्यकालीन आवास - www.bharatkaitihas.com
मध्यकालीन आवास

भारत में मध्यकालीन आवास धनी, मध्यम एवं निर्धन वर्ग के लिए अलग-अलग प्रकार के थे। मध्यकालीन आवास के भीतर की सुख-सुविधा भी गृहस्वामी की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती थी।

मध्य-कालीन समाज में आज की ही तरह अमीरों के घर बड़े, पक्के एवं महंगे होते थे जबकि गरीबों के घर छोटे, कच्चे एवं सस्ते होते थे। घरों का निर्माण जलवायुवीय आवश्यकताओं के आधार पर होता था। देश के गर्म हिस्सों में जालीदार खिड़कियां और झरोखे अधिक बनाए जाते थे ताकि प्रकाश और वायु का आगमन निर्बाध रूप से हो। जबकि ठण्डे क्षेत्रों में खिड़कियां छोटी रखी जाती थीं। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती थी या बर्फ गिरती थी, उन क्षेत्रों में घरों की छतें ढलवां बनाई जाती थीं।

शाही लोगों के मध्यकालीन आवास

शाही आवास प्रायः किसी दुर्ग के भीतर बनाए जाते थे। ये दुर्ग किसी बड़ी नदी या पहाड़ी झरने के निकट होते थे। राजमहलों एवं शाही महलों में मुख्य प्रवेश द्वार के निकट मर्दाना महल एवं भीतर की ओर ‘जनाना’ महल एवं ड्यौढ़ी बनाए जाते थे। शाही महलों में दीवाने आम, दीवाने-ए-खास, शस्त्रागार, भण्डार, खजाना, घुड़साल, नक्कारखाना आदि भी बनाए जाते थे।

राजसी वर्ग के मध्यकालीन आवास में जनाना महलों में छोटे झरोखे होते थे जिनमें से हरम अथवा अन्तःपुर की औरतें संगीत समारोह, पशुओं की लड़ाई एवं दरबार की कार्यवाही आदि देखती थीं। महलों के चारों ओर बाग, बारादरी, फव्वारे और जलाशय बनाए जाते थे। मुगलों द्वारा बनाए गए भवनों में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का प्रयोग अधिक होता था।

धनी लोगों के मध्यकालीन आवास

धनी लोगों के मध्यकालीन आवास भी ‘मर्दाना’ और ‘जनाना’ दो हिस्सों में बनाए जाते थे। अतिथियों के लिए दीवान या बैठक, सोने के लिए शयनकक्ष, भोजन पकाने के लिए रसोई एवं नहाने के लिए स्नानागार बनाए जाते थे। अमीरों के घरों में शौचालय भी होते थे। प्रायः घर के मध्य में एक बड़ा सा आंगन होता था। औरतों की अधिकतर गतिविधियां प्रायः इसी आंगन में होती थीं।

घरों के ऊपर प्रायः समतल छत होती थी, जहां गर्मियों में रात के समय परिवार के लोग खुले में सोते थे। छत पर प्रायः एक कक्ष या छतदार बरामदा होता था जिसे बरसाती कहते थे जहाँ वर्षा के समय सोया जा सकता था। धनी लोगों के घरों के चारों ओर उद्यान लगाया जाता था। प्रायः साग-सब्जियों एवं पूजा के लिए फूलों की वाटिकाएं भी होती थीं। व्यापारियों के घर ईंट और चूने से बहुमंजिले भवन के रूप में बनते थे। मलाबार में धनिकों के घर टीक की लकड़ी से बनाए जाते थे, जो प्रायः दो मंजिले होते थे।

सोने के लिए खाट और पलंग का प्रयोग होता था। धनी लोगों के घरों में लकड़ी की आराम-कुर्सियां होती थीं। रईस लोगों के पलंगों एवं खाटों पर कीमती बिछावन और तकिए होते थे। वे लोग जाड़ों में कम्बल एवं गर्मियों में मच्छरदानी का प्रयोग करते थे। रईसों की बैठकें कालीनों से सजाई जाती थीं। बैठकों में गोलाकार गाव-तकिये या मसनद होते थे।

हाथ से झलने वाले पंखों का भी चलन था। ये पंखे ताड़पत्र, हाथीदांत, जरी, रेशम, मोटे कागज आदि से बनते थे। अमीरों की हवेलियों में दास-दासियां पंखे झलते थे। छत की कड़ियों से बड़े-बड़े पंखों को लटकाया जाता था जिन्हें कक्ष के बाहर बैठे सेवक डोरी से खींचते थे।  बादशाह या अमीरों के यहाँ पंखे के हत्थे सोने या चांदी के होते थे, जिनमें हीरे-जवाहरात जड़े होते थे।

जन-साधारण के आवास: साधारण आय वाले लोगों के घर रईसों के घरों की तुलना में छोटे और साधारण होते थे। यदि घर मुख्य सड़क पर होता था तो नीचे की मंजिल में दुकानों के लिए कुछ स्थान आगे की ओर निकाल दिया जाता था। घरों की छत के साथ छज्जे भी होते थे जिनसे मकानों की दीवारों पर छाया रहती थी तथा धूप एवं वर्षा से बचाव होता था। दीवारों पर सफेदी पोती जाती थी। मध्यम वर्गीय लोगों के घर प्रायः पक्के एवं एक-दो मंजिल के होते थे जबकि निम्न मध्यमवर्गीय लोगों के घर कच्चे एवं एक-मंजिले होते थे।

निर्धन लोगों के आवास

निर्धन घास-फूस की झोंपड़ियों में रहते थे जिनमें कोई खिड़की या अलग कोठरी नहीं होती थी। एक झोंपड़ी में ही पूरा परिवार रहता था। दो झोंपड़ियों को मिलाकर बड़ा घर तैयार करना विशेष बात समझी जाती थी। झोंपड़ी का एक दरवाजा प्रवेश द्वार के रूप में होता था। कच्चे घरों एवं झौंपड़ियों के आंगन तथा दीवारें मिट्टी और गोबर से लीपे जाते थे।

कश्मीर में अधिकांश मध्यकालीन आवास में लकड़ी से बनते थे। बहुत-से लोग नावों पर भी रहते थे। झौंपड़ियों एवं कच्चे घरों में सोने के लिए प्रायः चटाई का प्रयोग होता था। गरीब लोग बिछावन के लिए केवल दरी या चादर का प्रयोग करते थे। गरीब लोग ताड़ और नारियल के पत्तों से बने पंखे प्रयोग करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकाल में मनोरजंन के साधन

0
मध्यकाल में मनोरजंन के साधन- www.bharatkaitihas.com
चौपड़ का खेल

मध्यकाल में मनोरजंन के अनेक साधन उपलब्ध थे। अमीरों एवं गरीबों के खेल एवं मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। इसी प्रकार नगरों एवं गांवों के मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। गरीब लोग प्रायः कबड्डी, कुश्ती, गिल्ली डण्डा, गेंद आदि खेल खेलते थे।

मध्यकाल में मनोरजंन के लिए शाही परिवारों के सदस्य, धनी लोग एवं मध्यमवर्गीय लोग चौपड़, गंजीफा एवं ताश और शतरंज खेलना अधिक पंसद करते थे। भारत में मुसलमानों द्वारा नाई का खेल आरम्भ किया गया था। पच्चीसी का खेल एक प्राचीन भारतीय खेल था जिसे अकबर ने बढ़ावा दिया।

मध्यकाल में मनोरजंन के साधन

चौपड़

चौपड़ मध्यकाल में मनोरजंन के के प्रमुख साधन के रूप में उपलब्ध था। यह एक प्राचीन भारतीय खेल था जो अब भी पच्चीसी, चौसर और चौपड़ आदि नामों से जाना जाता है। आज की तरह मध्य-काल में भी यह 16 गोटियों द्वारा खेला जाता था जो विभिन्न रंगों के 4 हिस्सों में होती थीं। साधारणतः यह खेल चार खिलाड़ियों द्वारा खेला जाता था, जो दो-दो सदस्यों के दो दलों में विभक्त होते थे। प्रत्येक खिलाड़ी के हिस्से में चार गोटियां आती थीं।

प्रत्येक खिलाड़ी पासे चलता था और पासे पर आए अंकों के अनुसार अपनी गोटियां चौपड़ के खानों पर आगे बढ़ाता था। चौपड़ का खेल महाभारत से लेकर मुगल बादशाहों के काल तक राजपरिवारों में अत्यधिक लोकप्रिय रहा।

अकबर ने चौपड़ के नियमों में कुछ परिवर्तन करके ‘चन्दर-मण्डल’ का खेल बनाया। इसमें खिलाड़ियों की संख्या 16 होती थी तथा उनमें बराबर बांटने के लिए गोटियों की संख्या 64 कर दी गई थी। औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा अपना अधिकांश समय अपनी सहेलियों के साथ चौपड़ खेलने में व्यतीत करती थी।

ताश

ताश प्राचीन भारतीय खेल था तथा मध्यकाल में मनोरजंन के प्रमुख साधन के रूप में उपलब्ध था। मध्य-कालीन ताश के खेल में ताश के 144 पत्ते होते थे। 12-12 पत्तों के 12 समूह हुआ करते थे, जिनमें बादशाह और उसके वजीर आदि सहयोगी होते थे। अकबर के समय तक इन समूहों के नाम संस्कृत भाषा में थे। अकबर ने इनमें से अन्तिम सात के नए नाम बदल दिए और पांचवें को ‘धनपति’ समूह नाम दिया।

मुगलों में यह खेल बहुत लोकप्रिय था। ताश के समस्त पत्तों पर एक ही चित्र होता था। एक ताश पर शकटासुर का वध करते हुए कृष्ण का चित्र अंकित था। राजस्थान में गोलाकार ताश के पत्तों का प्रचलन था। ताश के खेल की तरह गंजीफे का खेल भी खेला जाता था।

शतरंज

शतरंज भी भारत का पुराना खेल है, जो उस समय राजपरिवारों से लेकर जन-साधारण में समान रूप से लोकप्रिय था। इसमें एक चौकोर चौकी पर एक वर्गाकार आकृति बनाई जाती थी जिसमें आठ पंक्तियों में 8-8 वर्ग अर्थात् कुल 64 वर्ग बने हाते थे, ये वर्ग काले-सफेद रंगों से पुते होते थे।

इस वर्ग की दो तरफ एक-एक खिलाड़ी बैठता था जिनमें से एक के पास सफेद रंग के तथा दूसरे खिलाड़ी के पास काले रंग के 16-16 मोहरे होते थे। ये मोहरे एक सेना का प्रनिनिधित्व करते थे जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट एवं पैदल अर्थात् चतुरंगिणी सेना होती थी।

प्रत्येक सेना के केन्द्र में बादशाह एवं वजीर होता था। अकबर इस खेल को बहुत पसन्द करता था। शतरंज के अन्तर्राष्ट्रीय मुकाबले भी होते थे। जहाँगीर के एक दरबारी ‘खानखाना’ का पर्सिया के शाह सफी से मुकाबला हुआ, जिसमें तीन दिन के खेल के बाद ‘खानखाना’ पराजित हुआ था।

पच्चीसी का खेल

पच्चीसी एक प्राचीन हिन्दू खेल था जिसे अकबर विशेष रूप से पसन्द करता था। इसे बड़े आकार की चौपड़ कहा जा सकता है। आगरा तथा फतेहपुर सीकरी के शाही-महलों में संगमरमर के पत्थरों पर इस खेल के चतुर्भुजाकार खाने आज भी बने हुए हैं। गोटियों का खेल दो गोटी, तीन गोटी और बारह गोटी शहरी और देहाती दोनों क्षेत्रों में प्रचलित था।

दो गोटी के खेल में चौखाने में आमने-सामने दो गोटियां रखी जाती थीं और एक-दूसरे की गोटियां मारने के लिए चालें चली जाती थीं। इसी प्रकार तीन गोटी का खेल तीन गोटी से तथा नौ गोटी का नौ गोटियों से खेला जाता था।

गोटियों के अन्य खेल

मध्यकाल में मनोरजंन के साधन के रूप में गोटियों के अन्य खेल उपलब्ध थे। इन खेलों में मुगल.पठान, लाम.तुर्क, भाग.चल, भाग.चक्कर, छब्बीस गोटी तथा भेड़-बकरी के खेल अधिक प्रचलित थे।

घर के बाहर के खेल

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

मध्यकाल में मनोरजंन के साधन के रूप में घर के बाहर खेले जाने वाले अनेक खेल उपलब्ध थे। गोटियों के अन्य खेल उपलब्ध थे। घर के बाहर मैदानों में खेले जाने वाले खेलों में अमीर लोग चौगान, पशुओं का शिकार, जानवरों की लड़ाई आदि खेल खेलते थे। शाही परिवारों का प्रिय खेल चौगान था जिसे वर्तमान में पोलो कहते हैं। भारत में सम्भवतः मुसलमानों ने ही इस खेल को प्रचलित किया था। राजपूत भी इस खेल को बड़े चाव से खेलते थे। इस खेल में पांच-पांच सदस्यों के दो दल होते थे। अकबर के काल में दो चौगान-खिलाड़ी मीर शरीफ और मीर गियासुद्दीय अधिक प्रसिद्ध थे। मुगल अभिलेखों में ‘घोफरी’ खेल का भी उल्लेख मिलता है जो हॉकी के खेल से मिलता-जुलता था। यह ग्रामीण क्षेत्रों में गेंद और छड़ी से खेला जाता था। मुगलकाल में कुश्ती तथा मुक्केबाजी भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। अकबर अपने दरबार में फारसी और तूरानी मुक्केबाज रखता था। उच्चवर्गीय रईसों में घुड़सवारी भी मनोरंजन का साधन था। इसके लिए विशेष प्रकार के अरबी घोडे़ यमन, ओमन आदि से मंगाये जाते थे। घुड़सवारी में राजपूत और गुजराती मुख्य प्रतियोगी हुआ करते थे। तीरंदाजी, तलवारबाजी, गोला फेंकना, भाला फेंकना आदि में भी जन-सामान्य की रुचि थी और इसके लिए प्रतियोगिताएं होती थीं। साधारण लोग कुश्ती और मुक्केबाजी, पशु-दौड़ आदि खेल खेलते थे।

शिकार खेलना

बादशाहों, राजाओं एवं अमीरों में शिकार खेलना मध्यकाल में मनोरजंन के प्रमुख साधन के रूप में उपलब्ध था। इसे मनोरंजन का उत्तम साधन समझा जाता था जिसमें राजा और अमीरों के साथ-साथ साधारण लोग भी भाग लेते थे। शेर का शिकार केवल बादशाह, शहजादे एवं राजा किया करते थे। हाथियों का शिकार बादशाह या राजा की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता था। राजपूत योद्धा प्रायः शेर, बाघ एवं जंगली सूअर का शिकार करते थे।

अकबर ने भारत में शिकार खेलने का तुर्की तरीका प्रचलित किया जिसे ‘कमारघा शिकार’ कहते थे। इसमें ढोल-नगाड़े एवं मनुष्यों की चिल्लाहट का हाका लगाकर जंगली जानवरों को एक घेरे में ले लिया जाता था और फिर बादशाह एवं बेगम उन पशुओं का शिकार करते थे। पक्षियों का शिकार अमीर और गरीब दोनों का मनपसन्द खेल था। मध्य-काल में मछली पकड़ना भी मनोरंजन का प्रमुख साधन था। मछली पकड़ने के लिए विशेष प्रकार के जाल का प्रयोग किया जाता था जिसे सफरा या भँवर जाल कहते थे।

मेढ़ों, सांडों एवं भैंसों आदि की लड़ाई भी उस काल के खेलों में प्रमुख स्थान रखती थीं। निर्धन लोग छोटे जानवरों की लड़ाई से मनोरंजन करते थे। बुलबुल, बटेर एवं मुर्गे भी लड़ाए जाते थे। कबूतर उड़ाना भी व्यापक स्तर पर प्रचलित मनोरंजन था।

मध्य-कालीन समाज में बाजीगरी, जादूगरी, नटविद्या, कठपुतली के खेल, मुशायरा, नृत्य-संगीत के आयोजन, कलाबाजी और नाटक-तमाशे भी मनोरंजन के लोकप्रिय साधन थे। हिन्दू जनता रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन करती थी। राजस्थान में ‘पार्श्वनाथ चरित्र’ तथा ‘राजा हरिश्चन्द्र चरित्र’ के मंचन के भी प्रमाण मिलते हैं। गुजरात के कलाकार देश के विभिन्न भागों में नाटक तथा खेल-तमाशे किया करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

0
मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार - www.bharatkaitihas.com
मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार और वर्तमान में मनाए जाने वाले हिन्दू त्यौहारों में विशेष अंतर नहीं है किंतु मध्यकालीन हिन्दू समाज में त्यौहारों की संख्या अधिक थी। आज का हिन्दू समाज बहुत से त्यौहारों को मनाना भूल चुका है।

मध्य-कालीन समाज में त्यौहार, उत्सव और मेले

हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग त्यौहार मनाते थे। ये त्यौहार पूरे देश में एक समय पर मनाये जाते थे किन्तु इन्हें मनाने के ढंग में स्थानीय भिन्नताएं रहती थीं। दीपावली पर दीयों की सजावट, अतिशबाजी तथा सोने-चांदी और जवाहरात के प्रदर्शन होते थे।

अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ होली, दीपावली एवं राखी आदि कुछ हिन्दू त्यौहारों को मनाते थे किन्तु औरंगजेब ने अपने दरबार में कई हिन्दू तथा फारसी त्यौहारों का मनाया जाना बन्द कर दिया। हिन्दुओं के त्यौहार पूरे वर्ष में फैले हुए थे तथा लगभग प्रत्येक माह में आते थे, इन्हें विक्रम कलैण्डर की तिथियों के अनुसार मनाया जाता था।

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष से वर्ष का पहला महीना आरम्भ होता था। इसके शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक चैत्रीय नवरात्रियों का आयोजन किया जाता था। चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा, चैत्रीचन्द्र (चेटीचण्ड) मनाया जाता था। इस प्रकार चैत्र शुक्ला प्रतिपदा वर्ष में आने वाला प्रथम मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार था। यह परम्परा आज तक चल रही है। माना जाता है कि आज के दिन ही ईश्वर ने सृष्टि की रचना की थी।

शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवान राम का जन्मदिन अर्थात् रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता था। चैत्र-पूर्णिमा को हनुमान जयंती अर्थात् हनुमानजी का जन्म दिवस मनाया जाता था।

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री का पर्व होता था जिसमें पत्नी अपने पति की दीर्घ आयु की कामना के साथ व्रत करती थी। वट सावित्री का पर्व प्रमुख मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार था। इसका महाराष्ट्र में अधिक महत्व था। आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाते थे। इस दिन भगवान वेदव्यास का जन्मदिन होता है। इस दिन लोग अपने गुरु की पूजा करके उन्हें दक्षिणा आदि देते थे।

To purchase this book please click on Image.

श्रावण माह की पूर्णिमा को रक्षा-बन्धन मनाया जाता था इस दिन बहिनें अपने भाइयों के घर जाकर उनकी कलाई पर राखी बांधती थीं और उनकी रक्षा की कामना करती थीं। भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी मनाया जाता था। दिन में निराहार अथवा फलाहार के साथ उपवास करते थे एवं अर्द्ध-रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर गुड़-धनिये का प्रसाद बांटते थे। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते थे। आश्विन (कार्तिक) माह के शुक्ल पक्ष के पहले नौ दिन में शारदीय नवरात्रि का आयोजन किया जाता था। दसवें दिन दशहरा अर्थात् विजयादशमी का आयोजन होता था। इस दिन को भगवान राम द्वारा रावण के वध के दिवस के रूप में मनाया जाता था। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस, चतुर्दशी को रूप चौदस एवं अमावस्या को दीपावली मनाई जाती थी। इस दिन को भगवान राम के अयोध्या में लौटने का दिन माना जाता था और उनके स्वागत में प्रत्येक, गांव, नगर मौहल्ले, गलियों एवं घरों में दिए जलाए जाते थे। रात्रि में माँ लक्ष्मी की पूजा होती थी एवं कुछ लोग द्यूतक्रीड़ा करना अच्छा समझते थे। दीपावली के अगले दिन यम द्वितीया होती थी जिसे भाई दूज के रूप में मनाया जाता था। इस दिन भाई अपनी बहिन के घर जाकर उससे टीका करवाता था।

इसी दिन गोवर्द्धन का आयोजन किया जाता था। गोवर्द्धन पूजा में अकबर भी भाग लेता था। बहुत सी गायों को नहला-धुलाकर एवं आभूषणों से सजाकर बादशाह के सामने लाया जाता था। बादशाह उनकी पूजा करता था। जहाँगीर ने भी इस त्यौहार का उल्लेख किया है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को भी दिए जलाए जाते थे। इस दिन त्रिपुरी पूर्णिमा का आयोजन किया जाता था।

माघ माह में जब सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता था तब पूरे देश में मकर संक्रान्ति मनाई जाती थी। इस दिन नदियों में स्नान करके निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान दिया जाता था एवं अपने से बड़ों को भेंट दी जाती थी। इस दिन तमिनाडु में पोंगल का आयोजन किया जाता था।

माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसन्त पंचमी के रूप में सरस्वतीजी का जन्म-दिवस मनाया जाता था। इस दिन पीले कपड़े पहनते थे एवं पीले व्यंजन बनाए जाते थे। माघ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता था। इस दिन पूरे दिन एवं पूरी रात निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा की जाती थी।

फाल्गुन माह वर्ष का अंतिम माह होता था। इसमें सबसे बड़ा त्यौहार होली मनाया जाता था। फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता था। इस दिन हिरणाकश्यप की बहिन होलिका का दहन किया जाता था तथा प्रहलाद की रक्षा की जाती थी। होली की अग्नि में नया धान सेककर खाया जाता था। अगले दिन रंग खेला जाता था जिसे धुलण्डी कहते थे।

इनके अतिरिक्त करवा चौथ, सकट चौथ, शीतला सप्तमी, बड़ अमावस, हरियाली अमावस आदि अनेक छोटे-छोटे त्यौहार मनाए जाते थे। प्रत्येक एकादशी को निराहार रहकर व्रत किया जाता था तथा अगले दिन प्रदोष का व्रत किया जाता था।

कुछ प्रांतों में कुछ विशिष्ट त्यौहार भी मनाए जाते थे। केरल में ओणम, ओडिसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, विषु, बिहार में छठ पूजा, पंजाब में लोहड़ी एवं वैशाखी, बंगाल में काली पूजा इसी प्रकार के विशिष्ट त्यौहार थे।

हिन्दुओं के ये समस्त त्यौहार अत्यंत प्राचीन काल से मनाए जाते रहे थे एवं वर्तमान समय में भी ये त्यौहार सामाजिक जन-जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वर्ष भर में आने वाले सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण भी दान-पुण्य एवं स्नान के कारण पर्व की तरह दिखाई देते थे। अबुल फजल ने राम-नवमी और कृष्ण-जन्माष्टमी का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हिन्दू त्यौहारों के रूप में किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

0
मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार - www.bharatkaitihas.com
मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मध्यकालीन भारत के मुस्लिम समाज में मुहर्रम, मीलाद उन-नबी, सबे-उल-फितर और ईद-उल-जुहा मुसलमानों के प्रमुख प्रमुख त्यौहार थे। मध्य-कालीन मुस्लिम समाज इन त्यौहारों को बड़ी श्रद्धा से मनाता था। मुहर्रम के पहले दस दिनों में शिया मुसलमान शोक मनाते थे।

शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख को ताजिये निकाल कर शोक मानते हैं। इस दिन शिया मुसलमान पुरुष अपने शरीर को यातनाएं देते थे और अपने सिर पर धूल डालते थे। वे शोक की काली पोशाक पहनते थे। इब्नबतूता के अनुसार लोग उस दिन गरीबों को आटा, चावल और मांस बांटा करते थे।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

मुगल बादशाह यद्यपि सुन्नी थे तथापि उन्होंने मुहर्रम मनाये जाने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया था किन्तु औरंगजेब ने अपने राज्य में मुहर्रम का जुलूस निकालने की मनाही कर दी थी। फिर भी मुहर्रम का जमाव तथा ताजिये का जुलूस कभी बन्द नहीं हुआ। इस कारण मुहर्रम के दिन शिया और सुन्नियों में खूनी-संघर्ष हो जाते थे जिनमें कई लोग मारे जाते थे। हिजरी महीने ‘रबी-उल-अव्वल’ के बाहरवें दिन हजरत मुहम्मद के जन्मदिन को मीलाद उन-नबी के रूप में मनाया जाता था। यह मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार की सूची में सबसे ऊपर था। इस दिन शाही-महल में सैयदों, विद्वानों और सन्तों की सभा होती थी और कुरान पढ़ी जाती थी। गुलाब-जल का छिड़काव करने के साथ गरीबों में मिठाई और हलुआ बांटा जाता था। शाहजहाँ इस अवसर पर एक बड़ी रकम खैरात के रूप में बांटता था। इसी दिन हजरत मुहम्मद का निधन भी हुआ था। हिजरी माह ‘शाबान’ के चौदहवें दिन ‘सबे-बरात’ मनाया जाता था। इस दिन पैगम्बर मुहम्मद स्वर्ग में दाखिल हुए थे। इसलिए मुसलमान उस दिन खुशियां मनाते थे। शाबान के तेरहवें दिन लोग अपने परिवार के मृतक व्यक्तियों के नाम पर दही और मिठाइयों की थालियां सजाकर उन पर ‘फातिहा’ पढ़ते थे। आपस में मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान होता था।

इस पर्व की दूसरी विशेषता घरों तथा मस्जिदों में दीपक जलाना तथा आतिशबाजी का खेल था। फीरोज तुगलक इस पर्व पर तीन दिनों तक आतिशबाजी करता था। शाही परिवार के साथ ही दिल्ली की जनता भी रोशनी तथा सजावट देखने के लिए सड़कों पर निकलती थी। राजमहलों, सरकारी इमारतों, बाग-बगीचों तथा बावलियों पर रोशनी की जाती थी और बादशाह एवं अमीर लोग गरीबों में पैसे बांटते थे।

रमजान महीने में मुसलमान दिन में निराहार रहकर ‘रोजे’ रखते थे। रोजे मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार थे। इस दौरान वे पानी की एक बूंद भी नहीं पीते थे। रमज़ान महीने का आखरी जुमा (शुक्रवार) जुमातुल विदा के रूप में मानाया जाता था।  ईद-उल-फितर तथा ईद-उल-जुहा मुसलमानों के महत्त्वपूर्ण त्यौहार थे। ईद-उल-फितर रमजान के महीने के अंत में आता था। ईद की घोषणा तोप दाग कर तथा बिगुल बजाकर की जाती थी।

ईद के दिन तथा उसके अगले दिन मुसलमान अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के गले लगकर उन्हें मुबारक देते थे। इस अवसर पर घरों में मिठाइयां बनाकर गरीबों में बांटी जाती थी एवं घर पर ईद की बधाई देने के लिए आने वालों को परोसी जाती थीं। अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों के घर भी मिठाइयाँ भेजी जाती थीं। परिवार के बड़े सदस्य अपने से छोटों को ‘ईदी’ (कुछ रुपये एवं उपहार) दिया करते थे।

फिरोज तुगलक इस अवसर पर अपने दरबारियों, कर्मचारियों तथा गुलामों को कपड़े एवं मिठाई देता था। सुल्तन हाथी-घोड़ों के जुलूस के साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था। सिकन्दर लोदी ने इस अवसर पर कुछ कैदियों को जेल से रिहा करने की प्रथा शुरू की थी। जहाँगीर और शाहजंहा ने ईद के दिन जरूरतमंदों और गरीबों में बांटने के लिए खैरात की बड़ी राशि निश्चित की थी। औरंगजेब भी इस पर्व को धूमधाम से मनाता था।

हिजरी कलैण्डर के शव्वाल मास की पह्ली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाई जाती थी। हिजरी कलैण्डर के बारहवें महीने ‘जई-उल-हज्जा’ के दसवें दिन ईद-उल-अज़हा या बकरा ईद मनाई जाती थी। इसकी तैयारियां कई दिन पहले से होती थीं। बादशाह जुलूस एवं लाव-लश्कर के साथ ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ता था।

इसके बाद बादशाह की उपस्थिति में ऊँट की बलि दी जाती थी। तुर्की सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक और मुगल बादशाह जाहंगीर अपनी तलवार से बकरे की बलि किया करते थे। सम्पन्न लोग भी अपने घरों में बकरे या भेड़ की बलि देते थे। घरों में मिठाइयां, पूडियां आदि तैयार करते थे तथा अपने पूर्वजों के नाम का फातिहा पढ़ते थे।

समकालीन ग्रंथों से पता चलता है कि मध्य-कालीन मुस्लिम समाज में बड़ा-वफात’, आखिर-चहर और शंबा नामक पर्व भी प्रचलित थे। इन के अलावा योम अल जुमा अर्थात् प्रत्येक साधारण शुक्रवार भी ईद उल मोमिनीन अर्थात् इस्लाम के विश्वासियों का पर्व कह्लाता है। मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में नौरोज, मीना बाजार और आबे-पशम भी मनाए जाने लगे थे।

अकबर के काल में नौरोज के अवसर पर किए जाने वाले आयोजन मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार बन गए थे। ‘नौरोज’ फारसी वर्ष के पहले महीने ‘फरवारदीस’ के प्रथम दिवस को (20 या 21 मार्च) को मनाया जाता था। इस समारोह को मुख्यतः उच्च वर्गीय मुसलमान और अमीर मनाते थे। इसका समारोह उन्नीस दिनों तक चलता था। यही समय भारत में बंसत के जाने का और गर्मी के आने का होता था। इस पर्व की तैयारियां महीने पहले शुरू हो जाती थीं।

शाही राजधानी में बाजार, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम जैसे स्थानों को किनखाब, मखमल, जरी के सुनहले कपड़ों से सजाया जाता था। मुख्य समारोह का आयोजन दीवान-ए-आम में होता था जहाँ बड़ी वैभवपूर्ण सजावट की जाती थी। अमीर लोग भी अपने महलों को सजाते थे। साधारण-जन अपने मकानों की सफाई करके बंदनवार आदि लटकाते थे।

बहुत से स्थानों पर नौरोज का मेला लगता था। इस त्यौहार पर जुआ खेलने पर से प्रतिबंध हट जाता था। सप्ताह में एक दिन समस्त प्रजा के लिए बादशाह का दरबार खोल दिया जाता था। मुगल बादशाहों ने ऐसे अवसर पर ‘निसार’ के नाम से नए सिक्के चलाने की प्रथा प्रारम्भ की जो उस अवसर पर गरीबों को बांटने तथा लोगों को नजराने के लिए काम आते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर भी ऐसे सिक्के चलाये जाते थे।

इन उन्नीस दिनों में शराब भी खूब पी जाती थी और चारों ओर आनन्द एवं उत्साह रहता था। फारस के कई गायक, वादक और नर्तक बादशाह के दरबार में पहुँचते थे। बादशाह का चंदोबा बीच में लगाया जाता था जो हीरे-मोती और कीमती जवाहरात से सुसज्जित होता था। इसके चारों ओर अमीरों के चंदोबे होते थे। बादशाह तथा उसके अमीर एक दूसरे को मूल्यवान भेंट देते थे।

बादशाह का जन्मदिन भी बड़े उत्साह और आनन्द से मनाया जाता था। अकबर ने यह प्रथा प्रारम्भ की कि उसका जन्मदिन सूर्य-वर्ष और चन्द्र-वर्ष दोनों के अनुसार मनाया जाए। इस दिन नौरोज की तरह ही शाही महल और दरबार को सजाया जाता था। हाथी-घोड़ों को सजाकर बादशाह के समक्ष पेश किया जाता था। बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर अपनी माता से आशीर्वाद लेने जाता था।

हुमायूँ ने इस अवसर पर बादशाह को मूल्यवान धातुओं तथा उपयोगी वस्तुओं से तौलने की प्रथा आरम्भ की। अकबर यह रस्म वर्ष में दो बार- सूर्य वर्ष तथा चन्द्र वर्ष के अनुसार करता था। यह प्रथा जहाँगीर तक तथा कुछ परिवर्तनों के साथ शाहजहाँ के समय तक चलती रही किन्तु औरंगजेब ने वर्ष में एक बार तौले जाने की पुरानी पद्धति अपनाई तथा 51 वर्ष की उम्र में इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

औरंगजेब ने यह प्रथा अपने पुत्रों के लिए बीमारी के उपरान्त स्वस्थ होने पर, इस शर्त पर कायम रखी कि इसमें प्राप्त धन और वस्तुएं गरीबों में बांट दी जाएं। तौलने की रस्म शहजादे के दो वर्ष के होने पर शुरू होती थी, जबकि उसे केवल एक वस्तु से तौला जाता था। फिर वस्तुओं की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ाई जाती थी, जो धीरे-धीरे सात-आठ तक पहुँच जाती थी किन्तु किसी भी स्थिति में यह बारह से अधिक नहीं होती थी।

ये वस्तुएं बाद में फकीरों तथा जरूरतमंद लोगों को बांट दी जाती थीं। इस समारोह के बाद बादशाह तख्त पर बैठकर लोगों से उपहार ग्रहण करता था। बादशाह इस अवसर पर कुछ लोगों के लिए मनसबदारी घोषित करता था तथा कुछ लोगों को महंगे उपहार तथा जागीरें देता था।

मीना बाजार की शुरूआत सर्वप्रथम हुमांयू ने की थी। अकबर इन दिनों को ‘खुशरोज’ कहता था। शाहजहाँ प्रत्येक समारोह के बाद इस प्रकार का बाजार लगवाया करता था, नौरोज के बाद इस बाजार का लगना अनिवार्य हो गया था। अकबर के समय इस बाजार की सबसे अधिक उन्नति हुई। पहले माह बाजार बादशाह के महल के अन्दर नावों पर लगाया जाता था किंतु बाद में हरम की बारादरी में लगने लगा।

इसमें अमीरों की स्त्रियां और पुत्रियां दुकानें लगाकर बैठती थीं। राजपूत स्त्रियां भी इसमें भाग लेती थीं। अधिकांश दुकानें बहुमूल्य कपड़ों और जेवरातों की होती थीं। बादशाह शहजादियों तथा हरम की बेगमों के साथ बाजार में आता था और दुकानों से दुगने-तिगुने दाम देकर सौदा खरीद लेता था। बादशाह जिस स्त्री से प्रसन्न हो जाता, उससे अधिक वस्तुएं खरीदकर आवश्यकता से अधिक धन प्रदान कर देता था।

 शाहजहाँ ने मुमताज महल को पहली बार मीना बाजार में ही देखा और पसंद किया था। औरतों के इस बाजार के बाद मर्दों का बाजार लगता था, जहाँ संसार के कई देशों के व्यापारी सामान बेचने आते थे।

वर्षा के आरम्भ में मुगल दरबार में होली की तरह एक पर्व मनाया जाता था। जहाँगीर इस पर्व को ‘आब-ए-पशम’ कहता था किन्तु इतिहासकार लाहोरी ने ‘पडशनामा’ में इसे ‘ईद-ए-गुलाबी’ कहा है। इस अवसर पर शाहजादे, प्रमुख अमीर एवं दरबारी एक-दूसरे पर गुलाब-जल छिड़कते थे। बादशाह को भेंट तथा उपहार प्रदान किए जाते थे।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मध्ययुगीन भारतीय समाज में हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने त्यौहार मनाते थे। मुस्लिम बादशाहों ने कुछ हिन्दू त्यौहारों को अपना लिया था तथा हिन्दू भी मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार में भाग लेते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

भारतीय कला

0
भारतीय कला - bharatkaitihas.com
भारतीय कला

भारतीय कला चाहे वह शिल्पकला हो, मूर्तिकला हो, चित्रकला हो, संगीत कला हो या फिर और किसी भी प्रकार की कला हो, वह अपने माधुर्य, लावण्य एवं कला के चरमोत्कर्ष के लिए जानी जाती है।

ई. बी. हावेल ने लिखा है- किसी भी राष्ट्रीय कला का वास्तविक मूल्यांकन करते समय हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि उस कला ने क्या उधार लिया है अपितु यह देखना चाहिए कि उसने क्या दिया है। इस प्रकाश में देखने पर भारतीय कला को यूरोप या एशिया में महान स्कूलों में भी महानतम स्थान पर रखना चाहिए।

आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (ई.पू.4000 से ई.पू.1000) में कला शब्द का प्रयोग हुआ है- ‘यथा कला, यथा शफ, मध, शृण स नियामति।’ भरतमुनि (ई.पू.400 से ई.100 के बीच किसी समय) ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में भी कला शब्द का प्रयोग किया है- ‘न तज्जानं न तच्छिल्पं न वाधि न सा कला।’ अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जिसमें कोई शिल्प नहीं, कोई विधा नहीं या जो कला न हो।

भरतमुनि द्वारा प्रयुक्त ‘कला’ का आशय ‘ललित कला’ से लगाया जाता है और ‘शिल्प’ का आशय सम्भवतः किसी उपयोगी कला से। सामान्यतः कला उन क्रियाओं को कहते हैं जिन्हें करने के लिए थोड़ी चतुराई अथवा कौशल की आवश्यकता होती है। भारतीय कला-चिंतन में मन की सात्विक प्रवृत्तियों को उजागर करने पर बल दिया गया है।

कला के उद्देश्य

‘कला’ सृजन के अनेक उद्देश्य होते हैं। कला में आत्म-चैतन्य की प्रधानता होती है। कला का विचार भौतिक स्वरूप में प्रकट होता है किन्तु उसका उद्देश्य वस्तु के भौतिक स्वरूप को दर्शाना मात्र नहीं होता अपितु उसके आन्तरिक लक्षणों को भी दर्शाना होता है जिसमें कलाकार के अन्तर्मन की प्रतिच्छाया देखी जा सकती है। ‘कला’ मनुष्य को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है।

भारतीय कलाकारों का मुख्य उद्देश्य स्थूल में सूक्ष्म की चेतना को जागृत करना रहा है। कला-सृजन के द्वारा मन और आत्मा का सौन्दर्य से साक्षात्कार होता है तथा आत्मा को शांति का अनुभव होता है। कला के माध्यम से रूप और सौन्दर्य का सृजन होता है। कला ‘अव्यक्त’ को ‘व्यक्त’ और ‘अमूर्त’ को मूर्त रूप प्रदान करती है।

भारतीय दृष्टिकोण से कला ‘रसानुभूति’ के लिए किया गया ‘सृजन’ है। कला मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। दार्शनिकों के अनुसार ‘कला ही जीवन है।’ वास्तव में कला जीवन जीने का ढंग है। कला के द्वारा मनुष्य जीवन को पूर्णता प्राप्त होती है। कला मनुष्य की चेतना को स्पर्श करती है।

कला की परिभाषाएँ

‘कला’ वह मानवीय क्रिया है, जिसमें मानव की प्रकृति, रूप और भाव सम्मिलित रहते हैं। पाश्चात्य चिंतन में ‘कला’ शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए होता है। कौशलविहीन या बेढंग से किये गये कार्यों को कला नहीं माना जाता। आधुनिक काल में ‘कला’ की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं जिनमें से कुछ के अनुसार ‘कला’ मानवीय भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है।

‘कला’ कल्याण की जननी है। कल्पना की सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति का नाम ही ‘कला’ है। कल्पना की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से एवम् भिन्न-भिन्न माध्यमों से हो सकती है। कला का उद्गम सौन्दर्य की प्रेरणा से हुआ है। अतः ललित का आकलन ही कला है। प्रत्येक प्रकार की कलात्मक प्रक्रिया का लक्ष्य सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है।

महाकवि कालीदास (गुप्तकालीन) ने ‘रघुवंश’ में ‘ललिते कला विधौ’ का उल्लेख इसी प्रसंग में किया है। भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार, ‘अभिराम अंकन चाहे वह वाग्विलास के क्षेत्र में हों, चाहे राग-रेखाओं में, चाहे वास्तु-शिल्प में, वह कला ही है।’ जयशंकर प्रसाद के अनुसार- ‘ईश्वर की कर्त्तव्य-शक्ति का मानव द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कौशलपूर्ण निर्माण कला है।’

कला और विज्ञान में अंतर

कला और विज्ञान में बहुत अंतर है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल और कल्पना का। विज्ञान में प्रामाणिकता का निर्णय सूंघकर, चखकर, देखकर, नापकर, तौलकर तथा प्रयोगशाला में परख कर किया जाता है जबकि कला को प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं होती, उसका निर्णय मनुष्य की रसानुभूति करती है। विज्ञान की कृति हर काल, देश एवं परिस्थिति में एक जैसा परिणाम एवं प्रभाव उत्पन्न करती है जबकि ‘कला’ की रसानुभूति देश, काल एवं पात्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

कला और प्रकृति में अंतर

‘कला’ का कार्य ‘प्रकृति’ के कार्य से भिन्न है। कला का अर्थ है- रचना करना अर्थात् उसमें कृत्रिमता है जबकि प्रकृति में कृत्रिमता नहीं होती। कला उस प्रत्येक कार्य में है जो मनुष्य करता है जबकि प्रकृति स्वतः-स्फूर्त रचना है। कला को प्रकृति से प्रेरणा प्राप्त होती है। कला को कौशल की आवश्यकता होती है जबकि प्रकृति को किसी कौशल की आवश्यकता नहीं होती। कला में कल्पना होती है जबकि प्रकृति कल्पना से भी विचित्र होती है।

कला के प्रकार

वात्स्यायन के ग्रंथ कामसूत्र, उशनस् के ग्रंथ शुक्रनीति, जैन ग्रंथ प्रबंधकोश, कलाविलास तथा ललितविस्तर आदि ग्रंथों में कला एवं उसके प्रकारों की चर्चा हुई है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 दी गई है। प्रबंधकोश आदि कुछ ग्रंथों में 72 कलाओं की सूची मिलती है। ललितविस्तर में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं।

प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ कलाविलास में सर्वाधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज सम्बन्धी, 16 कायस्थ सम्बन्धी कलाओं तथा 100 सार-कलाओं की चर्चा की गई है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची कामसूत्र की है।

कलाओं का वर्गीकरण

भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में कलाओं का वर्गीकरण ‘गौण’ एवं ‘मुख्य’ कलाओं के रूप में किया गया है। यही कलाएं आगे चलकर ‘कारू’ और ‘चारू’ कलाएँ कहलाईं जिन्हें ‘आश्रित’ और ‘स्वतंत्र’ कलाएं भी कहा जा सकता है। विद्वानों ने काव्य, संगीत, चित्र-शिल्प, नृत्य-नाट्य और वास्तु आदि में तादात्म्य स्थापित करते हुए, इन्हें कला में सम्मिलित किया है।

ये सभी ललित कलाएँ स्वतंत्र रूप में पहचानी जाती हैं। आधुनिक काल में कला को मानविकी विषय के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषा-विज्ञान आदि भी आते हैं। पाश्चात्य संस्कृति में कला के दो भेद किये गए हैं-

(1.) उपयोगी कलाएँ (Practice Arts)  तथा

(2.) ललित कलाएँ (Fine Arts½)

परम्परागत रूप से लोकप्रिय कलाओं के मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं-

(1.) स्थापत्य कला (Architecture),

(2.) मूर्त्तिकला (Sculpture),

(3.) चित्रकला (Painting),

(4.) संगीत (Music),

(5.) काव्य (Poetry),

(6.) नृत्य (Dance),

(7.) रंगमंच (Theater and Cinema)

आधुनिक काल में फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापन और कॉमिक्स के साथ-साथ अन्य विषय भी कला के प्रकारों में जुड़ गये हैं। आधुनिक काल की कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से श्रेणीकृत कर सकते हैं-

(1.) साहित्य- काव्य, उपन्यास, लघुकथा, महाकाव्य आदि;

(2.) निष्पादन कलाएँ (Performing arts)- संगीत, नृत्य, रंगमंच;

(3.) पाक कला (Culinary arts)- बेकिंग, चॉकलेटरिंग, मदिरा बना;

(4.) मीडिया कला- फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, विज्ञापन;

(5.) दृष्य कलाएँ- ड्राइंग, चित्रकला, मूर्त्तिकला आदि।

कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।

भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य

भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता (ई.पू.3500 से ई.पू.1500 के बीच) की खुदाई में उपलब्ध सामग्री से प्राप्त हुए हैं। सैंधव सभ्यता में नगर-निर्माण कला, भवन निर्माण कला, कूप निर्माण कला, मूर्तिकला, नृत्य कला, संगीत कला, धातुकला, वस्त्र निर्माण कला, मिट्टी के बर्तन निर्माण कला, मुद्रा निर्माण कला आदि विविध कलाओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

इस सभ्यता से मंदिर निर्माण कला के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। सैंधव सभ्यता के बाद विविध कलाओं के साक्ष्य मौर्य काल (ई.पू.322 से ई.पू.184) में मिलते हैं तथा इसके बाद भारतीय कलाओं के साक्ष्य निरंतर मिलते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय कलाएँ

भारतीय कला

भारतीय मूर्ति कला

भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

भारतीय मूर्ति कला

0
भारतीय मूर्ति कला - www.bharatkaitihas.com
भारतीय मूर्ति कला

ई. बी. हावेल ने भारतीय मूर्ति कला की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि सर्वोत्तम भारतीय मूर्ति सर्वोत्तम यूनानी मूर्ति की अपेक्षा अनुभूति के गहनतर स्वर और उत्कृष्ट मनोभावों को स्पर्श करती है।                     

सिन्धु सभ्यता कालीन भारतीय मूर्ति कला

सैन्धव सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता के काल से ही आग में पकी हुई मिट्टी की मूर्तियाँ, चूड़ियाँ, बर्तन, खिलौने एवं मुहरें बड़ी संख्या में मिलने लगती हैं। पूजा में प्रयुक्त होने वाले लिंग, योनियाँ, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों के अंकन वाली मुहरें, योगी एवं योगिनी के अंकनों से युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं जिनसे उस काल के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, नृत्य, संगीत आदि विभिन्न कलाओं की जानकारी मिलती है।

ये मृण्मूर्तियाँ सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं। इन मूर्तियों से ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं का विकास कर लिया था।

सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है किंतु उस काल की मूर्तियों, मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से उस काल की सभ्यता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन मुद्राओं पर परमपुरुष, परमनारी एवं प्रजनन देवी की आकृतियां अंकित हैं। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान भी मिले हैं।

मौर्य कालीन भारतीय मूर्ति कला

पाटलिपुत्र, मथुरा, विदिशा तथा अन्य कई क्षेत्रों से मौर्यकालीन पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं। इन पर मौर्य काल की विशिष्ट चमकदार पॉलिश मिलती है। इन मूर्तियों में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ सर्वाधिक सजीव एवं सुंदर हैं। इन्हें मौर्यकालीन लोककला का प्रतीक माना जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध दीदारगंज (पटना) से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी की मूर्ति है जो पौने सात फुट ऊँची है।

यक्षी का मुखमण्डल अत्यंत सुंदर है। अंग-प्रत्यंग में समुचित भराव कला की सूक्ष्म छटा है। मथुरा के परखम गांव से प्राप्त यक्ष-मूर्ति भी 8 फुट 8 इंच की है। इसके कटाव में सादगी है तथा अलंकरण कम है। बेसनगर की स्त्री मूर्ति भी इस काल की मूर्तियों में विशिष्ट स्थान रखती है। अशोक के स्तम्भ शीर्षों पर बनी हुई विभिन्न पशुओं की मूर्तियाँ उस काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ हैं।

पटना, अहिच्छत्र, मथुरा, कौशाम्बी आदि में मिले भग्नावशेषों से बड़ी संख्या में मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ प्राप्त की गई हैं। ये कला की दृष्टि से सुंदर हैं तथा मौर्य काल के परिधान, वेशभूषा एवं आभूषणों की जानकारी देती हैं। बुलंदीबाग (पटना) से प्राप्त मौर्य कालीन नर्तकी की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

भारतीय मूर्ति कला पर विदेशी प्रभाव

मौर्य साम्राज्य के बिखर जाने के बाद भारत में यूनानी, शक, कुषाण, हूण पह्लव एवं सीथियन आदि जातियाँ प्रवेश कर गईं। इन्होंने भारत के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस कारण भारतीय कला पर विदेशी कला, विशेषकर गान्धार-शैली का बहुत प्रभाव हो गया।

कनिष्क कालीन मूर्तिकला

रॉलिसन ने लिखा है- ‘भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुषाण काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।’ कनिष्क के काल में मूर्तिकला की खूब उन्नति हुई। मथुरा में इस काल की कई मूर्तियाँ मिली हैं। कनिष्क काल की मथुरा शैली की मूर्तियाँ सरलता से पहचानी जाती हैं क्योंकि इनके निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है जो मथुरा के निकट ‘सीकरी’ से प्राप्त होता था।

मथुरा शैली की मूर्तियाँ आकार में विशालाकाय हैं। इन मूर्तियों पर मूंछें नहीं हैं। बालों और मूछों से रहित मूर्तियों के निर्माण की परम्परा विशुद्ध रूप से भारतीय है। मथुरा की कुषाणकालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता। दाहिना हाथ अभय की मुद्रा में उठा हुआ होता है। मथुरा शैली की कुषाण कालीन मूर्तियों में बुद्ध सिंहासन पर बैठे हुए दिखाये गये हैं।

कनिष्क काल में मूर्तिकला की गान्धार-शैली की भी बड़ी उन्नति हुई। कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों ने जो बौद्ध-मूर्तियाँ बनवाईं, उनमें से अधिकांश मूर्तियां, पाकिस्तान के गान्धार जिले में मिली हैं। इसी से इस कला का नाम गान्धार-कला रखा गया है। गान्धार-कला की बहुत सी प्रतिमाएँ मुद्राओं पर भी उत्कीर्ण मिलती हैं।

 गान्धार-कला को इण्डो-हेलेनिक कला अथवा इण्डो-ग्रीक कला भी कहा जाता है, क्योंकि इस पर यूनानी कला की छाप है। बुद्ध की मूर्तियों में यवन देवताओं की आकृतियों का अनुसरण किया गया है। इस कला को ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियों में बुद्ध कमलासन मुद्रा में मिलते हैं किंतु मुखमण्डल और वस्त्रों से बुद्ध, यूनानी राजाओं की तरह लगते हैं। बुद्ध की ये मूर्तियाँ यूनानी-देवता अपोलो की मूर्तियों से काफी साम्य रखती हैं। इनमें बुद्ध को यूरोपियन वेश-भूषा तथा रत्नाभूषणों से युक्त दिखाया गया है।

गुप्तकालीन भारतीय मूर्ति कला

गुप्त-काल में शिल्प-कला की बड़ी उन्नति हुई। गुप्तकाल की मूर्तिकला शैली को कनिष्ककालीन मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। गुप्त कालीन शिल्प-कला के सम्बन्ध में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- ‘गुप्त काल के शिल्पकारों की कृतियों की यह विशेषता है कि उनमें ओज, अंसयम का अभाव तथा शैली का सौष्ठव पाया जाता है।’

गुप्त काल की शिल्पकला तथा चित्रकला के सम्बन्ध में डॉ. नीलकान्त शास्त्री ने लिखा है- ‘शिल्प कला तथा चित्रकला के क्षेत्र में गुप्त कालीन कला भारतीय प्रतिभा में चूड़ान्त विकास की प्रतीक है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण एशिया पर दीप्तिमान है।’

डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने गुप्त कालीन शिल्प की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘सामान्यतः उच्चकोटि का आदर्श और माधुर्य तथा सौन्दर्य की उच्चकोटि की विकसित भावना गुप्त काल की शिल्प कला की विशेषता है।’

अपने पूर्ववर्ती युगों की अपेक्षा गुप्त काल में मूर्ति-पूजा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इसलिये इस काल में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनाई गईं। इस काल की मूर्तिकला की कई विशेषताएँ हैं-

(1.) इस काल की मूर्तियाँ बहुत सुन्दर हैं।

(2.) वे विदेशी प्रभाव से मुक्त हैं और विशुद्ध भारतीय हैं।

(3.) इनमें नैतिकता पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।

(4.) इस काल में नग्न मूर्तियों का निर्माण बन्द हो गया और उन्हें झीने वस्त्र पहनाए गए।

(5.) ये बड़ी ही सरल हैं। इन्हें अत्यधिक अलंकृत करने का प्रयत्न नहीं किया गया।

(6.) गुप्तकाल की स्त्री प्रतिमाएं अधिक मांसल हैं तथा उनमें स्थूल स्तनों का अंकन प्रमुखता से किया गया है।

इस काल की सारनाथ की बौद्ध प्रतिमा बड़ी सुन्दर तथा सजीव है। मथुरा से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति गुप्तकाल की कला का श्रेष्ठ उदाहरण है। गुप्तकाल में बनारस, पाटलिपुत्र एवं मथुरा मूर्तिकला के प्रसिद्ध केन्द्र थे।

हर्षकालीन मूर्ति कला

हर्ष के शासनकाल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी बड़ी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। मंदिरों के निर्माण के कारण मूर्तिकला का भी पर्याप्त विकास हुआ। बौद्धों ने बुद्ध की तथा हिन्दुओं ने शिव तथा विष्णु आदि देवताओं की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। इस काल की मूर्तिकला में भारशिव शैली तथा मथुरा शैली का सम्मिलन हो गया तथा गोल मुख के स्थान पर लम्बे चेहरे बनाये जाने लगे। अजन्ता की गुफा संख्या 1 एवं 2 की मूर्तियाँ इसी काल की हैं।

सल्तनत कालीन मूर्ति कला

मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला अत्यन्त ही उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम धर्म की सेवा तथा धार्मिक कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। मुहम्मद गौरी एवं कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण में दिल्ली, आगरा, अजमेर आदि में स्थित लगभग समस्त प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया।

बहुत से मंदिरों ने अपने मंदिर के बाहर इस्लामिक चिह्न अंकित किये ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर सकें। फिर भी इन मंदिरों की मूर्तियों को पूर्णतः अथवा अंशतः विक्षत कर दिया गया। सल्तनत काल में मंदिर एवं मूर्तियों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई इसलिये उत्तर भारत में मूर्तिकला का विकास ठप्प हो गया। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य सहित उन अन्य राज्यों में मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण होता रहा जहाँ हिन्दू शासक राज्य कर रहे थे।

मुगल कालीन मूर्तिकला

मुगलों के काल में भी भारत की मूर्तिकला का निरंतर ह्रास होता रहा। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान शासक थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं उनकी मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई। औरंगजेब के शासन काल में मूर्तिकला को सर्वाधिक हानि हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय कलाएँ

भारतीय कला

भारतीय मूर्ति कला

भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

भारत के शैलचित्र

0
भारत के शैलचित्र - www.bharatkaitihas.com
भारत के शैलचित्र

भारत के शैलचित्र कम से कम बीस हजार साल पुराने हैं। ये भारत के लगभग समस्त प्रांतों में स्थित पहाड़ियों की गुफाओं में मिलते है। भारत के शैलचित्र इस बात की गवाही देते हैं कि भारत की सभ्यता कितनी पुरानी है।

भारत के शैलचित्र के सबसे प्राचीन साक्ष्य आदिमकालीन गुफाओं से मिलते हैं। आदिम युगीन मानवों ने गुफाओं में गेरू, रामरज एवं खड़िया आदि से पशु, पक्षी, कीट-पतंग, छिपकली तथा मानव आकृतियों के साथ-साथ नृत्य, शिकार, कृषि, पशुपालन आदि दृश्यों का चित्रण किया है। ये भारत की चित्रकला के सबसे पुराने प्रमाण हैं।

ये चित्र भारत के विभिन्न प्रांतों में सैंकड़ों स्थानों पर मिले हैं। मध्यप्रदेश के विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित भीमबेटका शैलाश्रयों में एक प्यालेनुमा चित्र बना हुआ है जिसे एक लाख वर्ष पुराना माना जाता है। कुछ स्थानों पर पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण काल के चित्र एक ही गुफा में साथ-साथ मिले हैं।

भारत के शैलचित्र

जम्मू-काश्मीर प्रान्त से प्राप्त शैलचित्र

श्रीनगर की मदानी मस्जिद में चट्टान के एक टुकड़े पर 5000 साल पुराने शैलचित्र मिले हैं जिनमें एक ओर तारे बने हुए हैं तथा दूसरे छोर पर ड्रैगन जैसा सिर है। इस स्थान का मूल भित्तिचित्र धुंधला पड़ चुका है किंतु उसकी एक प्रति कश्मीर विश्वविद्यालय में सहेजकर रखी गई है।

इस भित्तिचित्र में भारतीय खगोल की एक दुर्लभ घटना का चित्रांकन किया गया है तथा इसमें दो सूर्य एक साथ दिखाए गए हैं। इस भित्तिचित्र में दिखाई दे रहा दूसरा सूर्य वास्तव में एक सुपरनोवा है जो किसी पुराने तारे के टूटने से उत्पन्न हुई ऊर्जा होती है। भीषण विस्फोट के बाद यह कई दिनों तक चमकदार दिखाई देता है जो दूसरे सूर्य के समान लगता है। इस चित्र में तारों के साथ सूर्य दिखाने का आशय है कि यह सुपरनोवा तब भी चमक रहा था जब रात्रि में तारे चमक रहे थे।

उत्तर प्रदेश से प्राप्त शैलचित्र

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

मिर्जापुर से 30 किलोमीटर दूर कैमूर की पहाड़ियों में सोन नदी की घाटी में एक सौ से अधिक चित्रित गुफाएं मिली हैं। एक पहाड़ी में पंखों से बनी पोषाक वाले मानव-चित्र मिले हैं जो खुरदरे पत्थर पर निर्मित हैं। मिर्जापुर क्षेत्र में विजयगढ़ के निकट घोड़मंगर में पूरक शैली में अंकित गैंडे के शिकार का चित्रांकन किया गया है। कोहवर, विजयगढ़, सौहरीरौप, सोरहोघाट, भल्डारिया, लिखुनियाँ, कंडाकोट, घोड़मंगर, खोडहवा आदि स्थानों से ई.पू.5000 के चित्र मिले हैं। मोहरापथरी, बागापथरी, सहवाइयापथरी, लकहटपथरी नामक पहाड़ियों में भी आदिमयुगीन शैलचित्र मौजूद हैं। सोरहोघाट क्षेत्र में साही के आखेट, हाथ के छापे, मानव आकृतियां एवं पशुचित्र मौजूद हैं। एक गुफा में गेरूए रंग से बना सूअर के आखेट का चित्र बहुत प्रसिद्ध है। इसमें सूअर का आधा खुला हुआ मुंह उसकी पीड़ा को व्यक्त करता है। लिखुनियां की पहाड़ियों में आदिमयुगीन नृत्य एवं वादन के सुंदर शैलचित्र बने हुए हैं। लम्बे भाले लिए हुए कुछ घुड़सवारों को एक हथिनी को पकड़ने का प्रयास करते हुए दर्शाया गया है। बांदा जिले के मानिकपुर में सरहाट, कर्परिया एवं करियाकुंड आदि स्थलों से मिले शैलचित्रों में तीन अश्वों का ओजपूर्ण अंकन किया गया है। एक सुसज्जित द्वार पर एक चोंचदार पुरुष बैठाया गया है जिससे अनुमान होता है कि यह कोई तंत्र-मंत्र शाला रही होगी।

करियाकुंड में बारहसिंगा का पीछा करते हुए धुनर्धरों को चित्रित किया गया है। मलवा में एक ऐसी गाड़ी चित्रित है जिसमें पहिए नहीं हैं। इसमें एक व्यक्ति बैठा हुआ है और उसके दोनों ओर दो अनुचर धनुष-बाण एवं दण्ड लिए खड़े हैं। एक अन्य चित्र में तीन दण्डधारी अश्वारोही अपने-अपने घोड़े की रास थामे हुए एक ही दिशा में पैदल चल रहे हैं। इससे अनुमान होता है कि यह शैलचित्र उस समय का है जब उत्तर-वैदिक आर्य मिर्जापुर की पहाड़ियों तक फैल गए थे तथा उनमें राजन्य व्यवस्था स्प्ष्ट हो गई थी और शक्तिशाली राजा अस्तित्व में आ चुके थे।

दक्षिण भारत से प्राप्त शैलचित्र

दक्षिण भारत के रायचूर, कुप्पगल्लू (बेलारी), वसनवगुडी (बैंगलोर), तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, छोटा नागपुर से प्रागैतिहासिक युग के शैल-चित्रों का पता चला है। कर्नाटक में रायचूर के निकट स्थित रामायण कालीन ऋष्यमूक पर्वत के निकट से प्राप्त चित्रों का समय ई.पू. 3000 माना जाता है। मद्रास के निकट पूर्व-प्रस्तर युग के कलापूर्ण शिलाखण्ड का पता लगा है।

महाराष्ट्र से प्राप्त शैलचित्र

महाराष्ट्र के नरसिंहगढ़ की गुफाओं के चित्रों में चितकबरे हरिणों की खालों को सूखता हुआ दिखाया गया है।

उड़ीसा से प्राप्त शैलचित्र

उड़ीसा से भी प्रागैतिहासिक युग के पाषाण चित्रों का पता चला है।

मध्यप्रदेश से प्राप्त शैलचित्र

मध्यप्रदेश के आदमगढ़, रायगढ़, चक्रधरपुर, होशंगाबाद, सिंघनपुर आदि स्थानों से बड़ी संख्या में चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। चक्रधरपुर से प्राप्त गुफाचित्रों को ई.पू.3000 का माना जाता है। पंचमढ़ी के निकट 5 मील के घेरे में लगभग 50 गुफाओं में प्रागैतिहासिक शैल-चित्र मिले हैं। यहीं पर महादेव पर्वत के निकट इमली खोह में सांभर के आखेट का दृश्य, भाडादेव गुफा की छत पर शेर के आखेट का दृश्य और महादेव बाजार में विशालाकाय बकरी का चित्र प्राप्त हुआ है।

लश्करिया खोह, सोनभद्रा, जम्बूद्वीप, निम्बूभोज, बनिया बेरी, माड़ादेव, नाकिया और झलाई आदि स्थानों से भी शैल-चित्रों से युक्त शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। यहाँ से पशु तथा आखेट चित्रों के अतिरिक्त शस्त्र-युद्ध, नृत्य एवं वादन के चित्र मिले हैं, दैनिक जीवन के दृश्य भी अंकित हैं। यहाँ के शैलचित्रों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) पहले स्तर में तख्तीनुमा एवं डमरूनुमा मानवाकृतियों को बनाया गया है जिनके शारीरिक गठन को लहरदार रेखाओं से दिखाया गया है। इनमें लाल (गेरू) एवं पीले रंग की बहुलता है।

(2.) दूसरे स्तर के चित्रों में आकृतियों का रूप-विन्यास बेडौल, ओजपूर्ण एवं असंतुलित है। इनमें केवल शिकारी का ही चित्रांकन किया गया है।

(3.) तीसरे स्तर में आकृतियां कुछ स्वाभाविक हैं। इनमें घरेलू जन-जीवन के चित्र हैं। आखेट के लिए प्रस्थान करते हुए, शहद एकत्रित करते हुए, घुड़सवार योद्धा, वाद्ययंत्रों को बजाते हुए वादक, शस्त्रधारी सैनिक आदि का अंकन किया गया है। इन चित्रों में आकृतियों को लाल रेखाओं से बनाकर उनमें काले एवं सफेद रंगों को भरा गया है।

सरगुजा रियासत के जोगीमारा से लाल-पीले रंगों से बने रेंगते हुए कीड़े, पशु-पक्षी, मनुष्य तथा असुर आकृतियों के चित्रण मिले हैं। ग्वालियर से 150 किलोमीटर दूर मुरैना जिले में पहाड़गढ़ के निकट असान नदी के तट पर एक घाटी में लगभग ई.पू.10,000 से लेकर ई.पू.100 तक के शैलचित्र मिले हैं। इनमें मनुष्यों, घोड़ों, हाथी पर सवार योद्धाओं, भालों, धनुषों एवं तीरों के चित्र मिले हैं।

मध्यप्रदेश के रायगढ़ के निकट बौतालदा की गुफाओं के शैलचित्रों में हिरण, छिपकली, जंगली भैंसों आदि का अंकन है। एक दृश्य में मानवों का एक समूह भैंसे का शिकार करने के लिए उसे घेर कर खड़ा है। कुछ चित्र पालतू पशुओं, युद्धरत मनुष्यों एवं नृत्यरत मनुष्यों के हैं। ये चित्र गेरू तथा रामरज जैसे भूरे रंगों से बने हैं।

विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर 200 से अधिक गुफाओं में पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल-चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व तक माना जाता है। भीमबेटका की गुफाओं में हिरण, बारहसिंगा, सूअर, रीछ जंगली भैंसे, हाथी, घोड़े एवं अश्वारोहियों का अंकन किया गया है।

एक चित्र में मनुष्य जंगली भैंसे को घेरकर नृत्य करते दिखाए गए हैं जिसे ‘शिकार-नृत्य’ की संज्ञा दी गई है। कुछ गुफाओं में उस काल के चित्र भी मिले हैं जब मानव ने खेती करना सीख लिया था। इनमें आखेटक, कृषक एवं ग्वाले चित्रित किए गए हैं।

मंदसौर जिले में मोरी नामक स्थान पर मिली 30 गुफाओं से मिले चित्रों में सूर्य, चक्र, स्वास्तिक, सर्बतोभद्र, अष्टदल-कमल एवं पीपल की पत्तियों का अंकन मिला है जिनसे स्पष्ट है कि इन गुफाओं में धार्मिक अनुष्ठान किए गए होंगे तथा ये चित्र उस समय के हैं जब सभ्यता ने पर्याप्त विकास कर लिया था तथा उत्तर-वैदिक आर्यों की बस्तियां यहाँ तक पहुँच गई थीं। कुछ चित्र बांस से बनाई गई गाड़ियों, नृत्यरत मानवों एवं चरवाहों के हैं।

होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी से ढाई किलोमीटर दूर आदमगढ़ पहाड़ी पर एक दर्जन से अधिक शैलाश्रयों में जंगली भैंसे, घोड़े, शस्त्रधारी अश्वारोही, हाथी सवार मनुष्य, आदि का अंकन हुआ है। जिराफ का एक समूह एवं चार धनुर्धारी दिखाए गए हैं जिनका अंकन क्षेपन विधि से किया गया है। अर्थात् किसी लकड़ी की तख्ती पर आकृतियां काट कर उन्हें गुफा की दीवार से सटा कर ऊपर से रंग लगाया गया है जिससे दीवार पर वे आकृतियां अंकित हो गई हैं।

आदमगढ़ की एक गुफा में एक हाथी पर चढ़े हुए मनुष्यों को जंगली भैंसे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में गहरी पीली रखाओं से एक बारहसिंगे को छलांग लगाते हुए बनाया गया है। मध्यप्रदेश के रायसेन, रीवा, पन्ना, छतरपुर, कटनी, सागर, नरसिंहपुर, बस्तर, ग्वालियर एवं चम्बल घाटी में कई स्थानों से शैलचित्र मिले हैं। भोपाल क्षेत्र में धरमपुरी गुहा मंदिर, शिमलारिल, बरखेड़ा सांची, उदयगिरि आदि में भी आदिम चित्रकला प्राप्त हुई है। शिवपुरी के पास भी शैलचित्र मिले हैं।

मांठ नदी के किनारे सिंघनपुर नामक गांव से पचास चित्रित गुफाएं मिली हैं। एक गुफा के द्वार पर कंगारू जैसे किसी पशु का अंकन किया गया है। यहाँ से अश्व, हिरण, बारहसिंगा, जंगली भैंसा, सांड, सूंड उठाये हुए हाथी, खरगोश आदि के चित्र भी मिले हैं। एक गुफा की दीवार पर जंगली सांड को पकड़ने का दृश्य अंकित है। कुछ पशु हवा में उछाले गए हैं तो कुछ धरती पर गिरे पड़े हैं। इसी दीवार पर एक अन्य चित्र में घायल भैंसा बहुत सारे तीरों से बिंधा हुआ दिखाया गया है। उसके चारों ओर भाले लिए हुए शिकारियों का दल खड़ा है।

राजस्थान के शैलाश्रयों से प्राप्त चित्र

राजस्थान में शेखवाटी क्षेत्र के अजीतगढ़, डोकन, सोहनपुरा, गुढागौड़जी आदि स्थानों से शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। रावतभाटा से 33 कलिोमीटर दूर दरा अभ्यारण्य में तिपटिया नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के शैल-चित्र मिले हैं। धरती से लगभग 500 फुट ऊँचा तीन मंजिल वाला शैलाश्रय है जिसकी दूसरी एवं तीसरी मंजिलें चित्रित हैं। उत्तरपाषाण कालीन मानवों द्वारा चित्रित इन शैल-चित्रों में बैल, गाय, हिरण, सूअर एवं काल्पनिक पशुओं के चित्रों का अंकन किया गया है।

इन चित्रों का रंग गहरा कत्थई तथा लाल है और ये रेखाओं के माध्यम से बनाए गए हैं। प्रागैतिहासिक काल के अनेक चित्रों के ऊपर ही ऐतिहासिक काल के चित्र भी बना दिए गए हैं। इस काल के चित्रों में देवी-देवता, योद्धा, घुड़सवार एवं ऊँट सवार प्रमुख हैं। ये पीले रंग तथा गेरू से बने हैं। इस काल के चित्रों में गौपालक द्वारा गायों को चराने, कहारों द्वारा वधू की डोली ले जाने एवं एक नृत्यांगना द्वारा नृत्य करने के दृश्य भी अंकित हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस काल में मानव सभ्यता काफी आगे बढ़ चुकी थी।

आहू नदी के तट पर झालावाड़ जिले में आमझीरी नाला के निकट कई शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें प्रस्तर युगीन मानवों द्वारा बनाई गई चित्रशाला देखी जा सकती है। इन चित्रों में बैल, हिरण, बकरी, बारहसिंघा, नीलगाय, चीता, मानव आकृतियां, धनुष-बाण, पशु-शिकार के दृश्य आदि अंकित हैं।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि भारत के शैलचित्र आदिम युग से लेकर ईसा पूर्व की कुछ शताब्दियों पूर्व तक के काल में बनाए गए। भारत के शैलचित्र पूरे भारत में छितराए हुए हैं जो आरम्भिक मानवों की गतिविधियों के प्रमाण हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...