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भारत की चित्रकला

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भारत की चित्रकला

भारत की चित्रकला अत्यंत प्राचीन है। भारत के धर्मशास्त्रों तक में चित्रकला का उल्लेख मिलता है। इन उल्लेखों से मानव समाज पर चित्रकला के प्रभाव की जानकारी मिलती है।

कलाओं में चित्रकला सबसे ऊँची है जिसमें धर्म, अर्थ, काम एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः जिस घर में चित्रों की प्रतिष्ठा अधिक रहती है, वहाँ सदा मंगल की उपस्थिति मानी गई है। – विष्णुधर्मोत्तर पुराण।

सिन्धु सभ्यता की चित्रकला

सभ्य मानव द्वारा की गई भारत की चित्रकला के सर्वप्रथम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता से प्राप्त हुए हैं। सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं, बर्तनों एवं अन्य सामग्री पर सुंदर चित्र मिलते हैं। कुछ मुहरों पर पशु-पक्षी, वृक्ष, मानव, देवी-देवता आदि के चित्र मिले हैं। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है।

ये चित्र वनस्पतियों की देवी के प्रतीत होते हैं। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। अलग-अलग चित्रों में पीपल की टहनियों पर पत्तों की संख्या अलग-अलग रखी गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।

कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। बैल की भांति भैंस और भैंसा के चित्र भी अनेक मुद्राओं पर मिले हैं। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं। सम्भव है कि ये पशु-पक्षी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों।

कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था। सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे। कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं।

आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

आर्य बस्तियों के प्राचीन चित्र

आर्य सभ्यता की वैदिक बस्तियों से मिले बर्तनों पर सफेद, काली एवं लाल रेखाओं के माध्यम से चित्रकारी की गई है। सभ्यता के विकास के साथ चित्रकला का भी विकास होता चला गया।

मौर्यकालीन चित्रकला

मौर्य काल में भारत की चित्रकला में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। बौद्ध शैली के चित्रों की रचना इस काल में प्रारम्भ हो गई थी। उस काल की चित्रकला के पर्याप्त नमूने उपलब्ध नहीं हो सके हैं। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मौर्यकालीन बौद्ध ग्रंथ विनय पिटक में राजप्रासादों में अंकित चित्रकला का उल्लेख हुआ है। ईसा पूर्व पहली शताब्दी के लगभग चित्रकला षडांग (चित्रकला के छः अंग) का विकास हुआ।

प्राचीन ग्रंथों में चित्रकला का उल्लेख

प्राचीन हिन्दू और बौद्ध साहित्य में कला के विभिन्न रूपों का उल्लेख हुआ है, यथा- लेप्यचित्र, आलेख्यचित्र और धूलिचित्र। पहली प्रकार की कला का सम्बन्ध भित्तिचित्रों से है। दूसरी प्रागैतिहासिक वस्त्रों पर बने रेखाचित्र और चित्रकला से सम्बद्ध है और तीसरे प्रकार की कला आंगन में बनाई जाती है।

पांचवी शताब्दी ईस्वी के मुद्राराक्षस नामक नाटक में चित्रों एवं चित्रपटों का उल्लेख है। छठी शताब्दी इस्वी के वात्स्यायन के ग्रंथ कामसूत्र में 64 कलाओं के अंतर्गत भारत की चित्रकला का भी उल्लेख हुआ है और कहा गया है कि यह कला वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। वात्स्यायन ने चित्रकला के छः अंगों का उल्लेख किया है। कामसूत्र के प्रथम अधिकरण के तीसरे अध्याय की टीका करते हुए यशोधर पंडित ने चित्रकला के छः अंग इस प्रकार बताये हैं-

रूपभेदाः प्रमाणनि भावलावण्ययोजनम्।

सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्र षंड्गकम्।।

अर्थात्- (1.) रूपभेद, (2.) प्रमाण- सही नाप और संरचना आदि, (3.) भाव, (4.) लावण्य योजना, (5.) दृश्य विधान, (6.) वर्णिकाभंग।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में मार्कण्डेय मुनि रचित विष्णुधर्मोत्तर पुराण के ‘चित्रसूत्र’ अध्याय में कला की विवेचना की गई है। इसमें चित्रकला को उच्च बताते हुए उसे धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाली कला माना गया है। जहाँ इसकी प्रतिष्ठा की जाती है, वहाँ मंगल होता है-

कलानां प्रवरं चित्र, धर्म कामार्थ मोक्षदम्।

मांगल्यं प्रथमं चैतद्, गृहे यत्र प्रतिष्ठितम्।।

मार्कण्डेय मुनि द्वारा चित्रकला के छः अंग बताए गए हैं- (1.) आकृति की विभिन्नता, (2.) अनुपात, (3.) भाव, (4.) चमक, (5.) दृश्य विधान, (6.) रंगों का प्रभाव आदि।

भारत की चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ

भारत में चित्रकला का प्रचलन देश के विभिन्न हिस्सों एवं इतिहास के समस्त कालखण्डों में विद्यमान रहा जिसके कारण अनेक शैलियाँ विकसित हो गईं। इनमें छः शैलियां मुख्य हैं- (1.) अजन्ता शैली, (2.) गुजरात शैली, (3.) मुगल शैली, (4.) राजपूत शैली, (5.) दकन शैली (6.) वर्तमान शैली।

अजन्ता चित्रकला शैली

अजन्ता की विश्व-विख्यात गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित हैं। इन गुफाओं की संख्या 20 है। इनमें से गुफा संख्या 9, 10, 19 और 26 चैत्य हैं, शेष गुफाएं बौद्ध-भिक्षुओं के रहने के विहार हैं। गुफा संख्या 8, 12 और 13 प्राचीनतम हैं। 13वीं गुफा की दीवारों पर पॉलिश है और वह ई.पू. 200 के लगभग (मौर्यकाल) की हो सकती है। इन तीनों गुफाओं में चित्र नहीं हैं। 8वीं और 13वीं गुफाएं हीनयान सम्प्रदाय की हैं और ये सम्भवतः ई.पू.200 से ई.पू.150 के मध्य (शुंगकाल में) खोदी गई थीं।

छठी और सातवीं गुफाएं सम्भवतः ई.450-550 के बीच (गुप्तकाल में) खोदी गई थीं। कुछ गुफाएं इससे भी बाद की हैं। सबसे पहली गुफा सम्भवतः सबसे अन्त में खुदी। इन गुफाओं के चित्र भिन्न-भिन्न काल के हैं। इन गुफाओं के चित्र ईसा से प्रायः सौ वर्ष पहले से लेकर ईसा बाद सातवीं सदी इस्वी तक के है।

नवीं-दसवीं गुफाओं में दो काल के चित्र है, इनमें प्राचीनतम चित्र पहली ई.पू. पहली शती के हैं जबकि बाद के चित्र गुप्तकाल (ई.320-495), वाकाटक (ई.250-500) और चालुक्य काल (ई.550-642) के हैं। इनमें से अधिकांश चित्र अब मिट गए हैं या धूमिल पड़ गए हैं। समस्त विश्व में इन भित्तिचित्रों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की गई है।

अजन्ता की गुफाओं में विकसित हुई चित्रशैली को अजन्ता शैली कहते हैं। ये चित्र किसी एक काल की नहीं है किंतु इस शैली की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि यह चित्रशैली केवल कन्दराओं की भित्तियों पर ही चित्रित मिलती है। इन्हें भित्ति-चित्र कहते हैं। दीवार पर चूना आदि का लेप लगाकर उन पर चित्र बनाए जाते हैं। इन्हें ‘फ्रेस्को-चित्रण’ भी कहते हैं।

अजन्ता की गुफाओं में की गई चित्रकारी कई शताब्दियों में तैयार हुई थी, इसकी सबसे प्राचीन चित्रकारी ई.पू. प्रथम शताब्दी की है। इन चित्रों मे भगवान बुद्ध को विभिन्न रूपों में दर्शाया गया है। अजन्ता की चित्रकला के विषय में श्रीमती ग्राबोस्का ने लिखा है- ‘अजन्ता की कला भारत की प्राचीन कला है। चित्रकारियों का सौन्दर्य आश्चर्यजनक है और वह भारतीय चित्रकारी की चरमोन्नति का प्रतीक है।’

गुप्तकालीन अजन्ता चित्रकला

गुप्तकाल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। अजन्ता तथा एलोरा की गुफाओं की दीवारों में इस काल की चित्रकला के सुन्दर उदाहरण विद्यमान हैं। इन चित्रों को वज्रलेप से बनाया गया है। इस काल में प्रकृति चित्रण के साथ-साथ मनुष्याकृतियां भी बड़ी संख्या में बनीं।

हर्ष कालीन अजन्ता चित्रकला

अजन्ता की गुफा संख्या 1 और 2 में हर्ष कालीन चित्र देखने को मिलते हैं। ये चित्र दो प्रकार के हैं- (1.) प्रथम प्रकार के चित्रों में गति और जीवन का अभाव है जबकि (2.) द्वितीय प्रकार के चित्रों में संयोजन की समानता का अभाव है। एक चित्र में पुलकेशिन (द्वितीय) को फारस के सम्राट खुसरो परवेज का स्वागत करते हुए दिखाया गया है। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध तथा पशु-पक्षियों के चित्र बहुतायत से बने हैं।

हर्ष काल के बाद की अजन्ता चित्रकला

हर्ष के बाद 7वीं-8वीं शताब्दी के लगभग अजन्ता चित्रकला अपने चरम पर पहुँच गई। इस काल में अजन्ता शैली का प्रभाव सम्पूर्ण देश पर किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। कालीदास, भारवि, माघ, भवभूति आदि लेखकों ने अपने ग्रंथों में इन चित्रों की ओर संकेत किया है।

अजन्ता गुफाओं के चित्रों के विषय

अजन्ता के चित्रों का मुख्य विषय बौद्ध धर्म है। अजन्ता की गुफाओं में महात्मा बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं की घटनाएं चित्रित की गई हैं। इन चित्रों को चार भागों में रखा जा सकता है-

(1.) बुद्ध और बोधिसत्वों के चित्र,

(2.) जातक ग्रन्थों की कथाओं के दृश्य।

(3.) पुष्प, वृक्ष, लताएं, पशु-पक्षी, देवी-देवता आदि।

(4.) रिक्त स्थान भरने के लिए अप्सराओं, गन्धर्वों तथा यक्षों का चित्रण।

बिम्बों की कल्पना, रंगों की योजना, रेखाओें के लालित्य और अभिव्यक्ति की सम्पन्नता के कारण अजन्ता के भित्ति चित्र अद्भुत दिखाई पड़ते हैं। ‘अजन्ता की कला इतनी पूर्ण, परम्परा में इतनी निर्दोष, अभिप्राय में इतनी सजीव तथा विषय-वैविध्य, आकृति तथा वर्ण के सौन्दर्य में इतनी समृद्ध है कि उसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों में सम्मिलित किया जाता है।

यद्यपि ये चित्र मानव जीवन की विभिन्न भावनाओं से ओत-प्रोत हैं तथापि उनमें एक ऐसी आध्यात्मिक विशिष्टता है जिनके कारण उनमें किंचित् भी अश्लीलता नहीं है। गुफा संख्या 1 का चित्रण अत्यंत विशिष्ट है। गुफा संख्या 2 की छत में भी इसी प्रकार के आकर्षक अलंकरण हैं। पहली गुफा की छत में चित्रित सांडों की लड़ाई में पशुओं की गति को बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।

गुफा संख्या नौ एवं दस के चित्र इस्वी-पूर्व पहली सदी के हैं। नौवीं गुफा की दीवार पर प्रणाम मुद्रा में बैठे एक योगी का चित्र है। दसवीं गुफा के चित्र भी बड़े सजीव हैं। दाहिनी दीवार पर हाथी का एक रेखाचित्र बना हुआ है। इस गुफा के अधिकतर चित्र मिट गए हैं। सोलहवीं गुफा के चित्र भी अब कम ही बचे हैं। ई.1874 में जब ग्रिफिथ ने इन चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार की थीं, तब काफी चित्र अस्तित्व में थे।

ग्रिफिथ ने अजन्ता कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वर्गेस ने 17वीं गुफा के चित्रों को सबसे सुन्दर बताया था। राजकुमार विजय का सिंहल भूमि पर अवतरण अपनी असाधारण गति और सौन्दर्य के लिए अप्रतिम माना जाता है। गुफा संख्या 1 में बोधिसत्व पद्मपाणि अविलोकितेश्वर का चित्र भारतीय चित्रण कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

इस चित्र के मुख पर करुण भावों का उन्मेष है। इसी गुफा में फारस के निवासियों के वेश में कुछ व्यक्तियों का आगमन चित्रित है। इसमें प्रस्तुत फारसी वातावरण, अजन्ता के अन्य चित्रों से सर्वथा भिन्न है। ये चित्र उन फारसी दूतों के हैं जिन्हें फारस के शाह खुसरो परवेज ने चालुक्यराज पुलकेशिन (द्वितीय) के पास भेजा था।

गुफा संख्या 2 में स्तम्भ से लगी खड़ी एक नायिका का चित्र है जो अपने बाएं पैर को मोड़कर स्तम्भ से टिकाए हुए है। उसने बाएं आथ के अंगूठे और अनामिका को मिला रखा है। गुफा संख्या 10 में रानियों से घिरा हुआ राजा चित्रित है। यह चित्र काफी प्राचीन है किंतु आकृतियों की अभिव्यक्ति बड़ी प्रबल है तथा मुख मण्डल पर अभूतपूर्व ताजगी विराजमान है। 17वीं गुफा में बने एक चित्र में एक माता और एक पुत्र बुद्ध को भिक्षा दे रहे हैं। उनके अंग-अंग से दैन्य भाव प्रकट हो रहा है, उनकी पलकें बिखरी हुई हैं, नेत्र अधखुले हैं। 17वीं गुफा में बने एक चित्र में एक स्त्री अपने शिशु को लिए हुए है।

अजन्ता के चित्रों में सौन्दर्य की साधना की गई है। इन चित्रों में कलाकारों ने मानव जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं छोड़ा है। अजन्ता के चित्रों में मैत्री, करुणा, पे्रम, क्रोध, लज्जा, हर्ष, उत्साह, घृणा आदि विभिन्न प्रकार के भाव, पद्ममणि बोधिसत्व, अवलोकितेश्वर, प्रशान्त तपस्वी और देवोपम राजपरिवार से लेकर क्रूर व्याध, निर्दय वधिक, साधु वेशधारी धूर्त, वार-वनिता, समाधिमग्न बुद्ध, प्रणयरत दम्पति और शृंगाररत नायिकाएँ अंकित हैं।

इन चित्रों में विविध प्रकार के अंग-विन्यास, मुख-मुद्राएँ, भाव-भंगिमाएँ, वेश-भूषाएँ, अंलकार, केश विन्यास, रूप-रंग आदि चित्रित हैं। अजन्ता के चित्रों में राहुल और उसकी माता, छदन्त जातक, क्रूर ब्राह्मण की कथा, शिवि जातक, गजराज की जल क्रीड़ा, कवियों का उल्लास, नन्द का पलायन आदि अनेक सुंदर चित्र बने हैं।

अजन्ता शैली में अंगुलियां कमल की पंखड़ियों जैसी चित्रित की गई हैं तथा नेत्र आधे बंद हैं। दोनों नेत्र छंद युक्त प्रतीत होते है। चित्रों के विषयों की विविधता, जीवन से उनकी अविच्छिन्नता और उनके सहज स्वाभाविक अंकन ने कला का एक अद्भुत संसार रच दिया है। नगरों, राजमहलों, साधारण आवासों, वन-प्रान्तरों आदि के दृश्य मानो चित्रों में सुरक्षित होकर रह गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

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मुस्लिम चित्रकला

भारत की मुस्लिम चित्रकला को दो भागों में बांटा जा सकता है- दिल्ली सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला तथा मुगल सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला। निश्चित रूप से भारत की मुस्लिम चित्रकला पर हिन्दू शैलियों का भी प्रभाव है।

दिल्ली-सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला

मूर्ति-पूजा करना और मनुष्यों के चित्र एवं मूर्तियाँ बनाना इस्लाम में वर्जित है। क्योंकि ऐसा करते समय मूर्तिकार कल्पना करने लगता है कि वह अपनी चित्रित वस्तुओं को जीवन प्रदान कर रहा है। इस प्रकार वह अल्लाह से समता करने लगता है। जबकि जीवन प्रदान करने वाला एकमात्र अल्लाह है। इस कारण मध्य-कालीन मुसलमान जीव-जन्तुओं को चित्रित करना पाप समझते थे।

इसलिए दिल्ली के सुल्तान, मुसलमान अमीर और जनसाधारण चित्रकला से दूर रहते थे और मूर्तिकारों एवं चित्रकारों को संरक्षण नहीं देते थे। फिर भी सल्तनतकाल में अपवाद स्वरूप कुछ चित्र बने जिन पर ईरानी प्रभाव है।

सिकन्दर लोदी ने अपने काल के किसी दक्ष चित्रकार से वल्लभाचार्यजी का चित्र अपने सामने बैठकर बनवाया। यह चित्र सिकन्दर लोदी के महल में हर समय लगा रहता था। बाद में जब मुगलों ने आगरा पर अधिकार किया तब यह चित्र मुगल बादशाहों के पास आ गया। मुगल बादशाह हुमायूँ ने इस चित्र की रक्षा की तथा इसे अपने महल में लगा लिया।

जब शेरशाह सूरी ने हूमायूँ को भारत से भगा दिया तब भी वल्लभाचार्यजी का यह चित्र सुल्तान के महलों में सुरक्षित रहा। जब हुमायूँ लौटकर आया तब भी यह चित्र सुरक्षित था। अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहां ने भी इस चित्र को संभाल कर रखा। शाहजहाँ के काल में जब किशनगढ़ का राजा रूपसिंह बलख और काबुल विजय के बाद आगरा आया तब उसने यह चित्र अपनी विजय के पुरस्कार के रूप में शाहजहाँ से मांग लिया।

इस प्रकार यह चित्र आज भी किशनगढ़ में सुरक्षित है। इस घटना से यह कहा जा सकता है कि दिल्ली सल्तनत में सिकंदर लोदी के काल से ही चित्रकला को पुनः प्रतिष्ठा मिलने लगी थी जो मुगलों के समय भी तब तक जारी रही जब तक कि औरंगजेब मुगलों के तख्त पर नहीं बैठ गया।

मुगल कालीन मुस्लिम चित्रकला

मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही मुस्लिम चित्रकला में नवजीवन आ गया। मुगल बादशाह चित्रकला के महान् प्रेमी थे। हेरात में बहजाद नामक चित्रकार ने चित्रकला की एक नई शैली आरम्भ की जो चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, बैक्ट्रियाई और मंगोलियन तत्त्वों का प्रभाव था। इसे बहजाद कला कहा जाता था। फारस के तैमूरवंशी राजाओं ने इसे राजकीय सहायता दी।

बाबर के काल में मुस्लिम चित्रकला

बाबर जब हेरात में आया, तब उसका बहजाद की मुस्लिम चित्रकला से परिचय हुआ। बाबर ने इस चित्रशैली में अनेक हस्तलिखित ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ चित्रित करवाईं तथा इस कला को अपने साथ भारत ले आया।

हुमायूँ के काल में मुस्लिम चित्रकला

हुमायूँ भी चित्रकला प्रेमी था। उसका फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से अच्छा परिचय था। इनमें से एक हेरात का प्रसिद्ध चित्रकार बहजाद का शिष्य मीर सैय्यद अली था और दूसरा ख्वाजा अब्दुस समद था। हुमायूँ इन दोनों को अपने साथ भारत ले आया। अब्दुस्समद द्वारा तैयार किए जाने वाले चित्रों में कुछ चित्र जहाँगीर द्वारा संकलित ‘गुलशन चित्रावली’ में संकलित हैं। ‘हम्जनामा’, जिसे ‘दास्ताने अमीर हम्जा’ भी कहते हैं, मुगल चित्रकला शैली में चित्रित सबसे महत्वपूर्ण चित्र संग्रह है।

‘हम्जनामा’ मीर सैय्यद अली एवं अब्दुस्समद के नेतृत्व में देश के विभिन्न भागों से बुलाए गए लगभग 100 चित्रकारों के समूह द्वारा तैयार किया गया जिसे पूरा करने में लगभग पन्द्रह वर्ष लगे। हम्जनामा में लगभग 1400 पृष्ठों को चित्रित किया गया। हुमायूँ तथा अकबर ने ईरानी कलाकारों से चित्रकला का कुछ ज्ञान प्राप्त किया। इस काल में अधिकांश चित्र सूती-वस्त्रों पर बनाए जाते थे।

इन चित्रों में ईरानी, भारतीय तथा यूरोपीयन शैलियों का सम्मिश्रण है किन्तु ईरानी शैली की प्रधानता होने के कारण इसे ईरानी कलम कहा गया। इस शैली को मुगल काल की प्रारम्भिक चित्रकला शैली कहा जा सकता है।

अकबर के काल में मुस्लिम चित्रकला

अकबर के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण अकबर के शासनकाल में मुस्लिम चित्रकला की नई शैली विकसित हुई जो ईरानी और भारतीय शैली के सर्वोत्तम तत्त्वों का सम्मिश्रण थी। इस नवीन शैली में विदेशी तत्त्व भारतीय शैली में इस तरह घुल-मिल गये कि दोनों के पृथक् अस्तित्त्व का पत लगा पाना असम्भव हो गया और वह बिल्कुल भारतीय हो गई। अकबर ने चित्रकारी हेतु एक अलग विभाग स्थापित किया।

अबुल फजल ने आइने अकबरी में पन्द्रह प्रसिद्ध चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें तेरह हिन्दू थे। दसवन्त, बसावन महेश, लाल मुकुन्द, सावलदास, अब्दुस्समद, सैय्यद अली आदि अकबर के दरबारी चित्रकार थे। रज्मनामा में दसवन्त के बनाए चित्र हैं।

मुगल चित्रकला के इतिहास में रज्मनामा को मील का पत्थर माना जाता है। दसवन्त के द्वारा बनाई गई अन्य कलाकृतियों में खानदाने-तैमूरिया और तूतीनामा शामिल हैं। बसावन अकबर के दरबार के मुख्य चित्रकारों में से एक था। बसावन को चित्रकला के सभी पक्षों में सिद्धहस्तता प्राप्त थी। एक कृशकाय घोड़े के साथ निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ मजनूं का चित्र बसावन की उत्कृष्ट कृति है।

जहाँगीर के काल में चित्रकला

जहाँगीर का शासनकाल मुस्लिम चित्रकला का स्वर्ण-काल था। जहाँगीर स्वयं अच्छा चित्रकार था। इस काल की चित्रकला में कई प्रयोग हुए। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुके जहाँगीरी में लिखा है कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी जीवित चित्रकार द्वारा बनाया गया हो अथवा मृतक चित्रकार द्वारा, मैं चित्र को देखते ही बता सकता हूँ कि यह किसकी कृति है। यदि कोई चित्र विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाया गया है तो भी मैं उनके चेहरे अलग-अलग करके बता सकता हूँ कि कौन से अंग किस चित्रकार ने बनाएं हैं।

जहाँगीर ने हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार आकारिजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रशाला की स्थापना की। जहाँगीर के शासनकाल में शिकार, युद्ध और दरबारी दृश्यों, आकृति-चित्रण, पशुओं व फूलों आदि के चित्रांकन में विशेष उन्नति हुई। उस्ताद मंसूर और अबुल हसन इस काल के दो बड़े नाम थे. मंसूर पक्षी-विशेषज्ञ चित्रकार था जबकि अबुल हसन व्यक्ति-चित्र बनाने में निपुण था।

जहाँगीर ने मंसूर को  नादिर-उल्-सर तथा हसन को नादिर-उल-जमा की उपाधि दी। मंसूर की उत्कृष्ट कृतियों में साइबेरियाई सारस तथा बंगाल का अनोखा पुष्प सम्मिलित हैं। फारूखबेग, बिसनदास, दौलत एवं मनोहर भी जहाँगीर कालीन प्रमुख चित्रकार थे। जहाँगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल चित्रकला का विकास रुक गया।

शाहजहाँ के काल में चित्रकला

शाहजहाँ को चित्रकला में विशेष रुचि नहीं थी तो भी उसने चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया। फकीर उल्ला, मीर हाशिम, अनूप, चित्रा, मुहम्मद नादिर, हुनर एवं मुरार आदि शाहजहांकालीन प्रमुख चित्रकार थे।

औरंगजेब के काल में चित्रकला

औरंगजेब ने मुगल दरबार से चित्रकारों, संगीतज्ञों, कला-मर्मज्ञों आदि को निकाल दिया। इन कलाकारों ने राजस्थान और पंजाब के राजाओं के यहाँ आश्रय प्राप्त किया जिससे वहाँ नवीन चित्रकला शैलियों का विकास संभव हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

राजपूत चित्रकला

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राजपूत चित्रकला

राजस्थान में मुगल शासकों के काल में विकसित हुई चित्रकला शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जाता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव है।

राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से अब तक विकसित हुई चित्रकला की समृद्ध धारा के प्रवाह को देखा जा सकता है। कोटा जिले के आलणियां, दरा, बैराठ, झालावाड़ जिले के आमझीरी नाला तथा भरतपुर जिले के दर नामक स्थानों के शैलाश्रयों में आदिम मानव द्वारा उकेरे गये रेखांकन तथा मृद्भाण्डों पर उकेरी गयी कलात्मक रेखायें प्रदेश की अत्यंत प्राचीन चित्रण परंपरा की कहानी कहती हैं।

राजस्थान से प्राप्त विक्रम संवत के पूर्व के सिक्कों पर अंकित मानव, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, धनुष, बाण, स्तूप, स्वास्तिक, वज्र, पर्वत, नदी आदि धार्मिक चिह्न प्राप्त होते हैं। बैराठ, रंगमहल तथा आहाड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली तथा ज्यामितीय अंकन देखने को मिलते हैं।

सातवीं एवं आठवीं शताब्दी के लगभग राजपूताना में अजन्ता चित्रकला की समृद्ध परम्परा विद्यमान थी किन्तु अरबों के आक्रमण के कारण पश्चिमी क्षेत्र के कलाकार गुजरात से राजपूताना की ओर आ गये जिन्होंने स्थानीय शैली को आत्मसात करके एक नई शैली को जन्म दिया और अजन्ता शैली का प्रभाव नेपथ्य में चला गया।

इस नई शैली की चित्रकला से जैन ग्रंथों को बड़ी संख्या में चित्रित किया गया इसलिए इसे जैन शैली कहा गया। इस शैली का विकास गुजरात से आये कलाकारों ने किया था, इसलिये इसे गुजरात शैली भी कहा गया। धीरे-धीरे गुजरात और राजपूताना शैली में कोई भेद नहीं रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी में इस पर मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा।

ज्यों-ज्यों राजपूत शासकों ने मुगल बादशाह अकबर से राजनैतिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और उनका मुगल दरबार में आना-जाना होने लगा, त्यों-त्यों राजपूत चित्रकला पर मुगल प्रभाव बढ़ता गया, जिससे राजपूत शैली की पूर्व प्रधानता समाप्त हो गई।

राजस्थान में चित्रकला की अनेक शैलियां विकसित हुईं जिनमें मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, बीकानेरी शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, नाथद्वारा शैली, उणियारा शैली, अजमेर शैली, डूंगरपुर शैली, देवगढ़ शैली आदि प्रमुख हैं। इन सब शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जा सकता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव है।

राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण सर्वप्रथम डॉ. आनंद कुमार स्वामी ने ई.1916 में अपनी पुस्तक ‘राजपूत पेंटिंग’ में किया था। आनंद कुमार स्वामी, ओ. सी. गांगुली, हैवेल आदि विद्वानों ने इसे राजपूत चित्रकला कहा जबकि रामकृष्ण दास ने इसे राजस्थानी कला कहा।

मुस्लिम प्रभाव से इस शैली में विभिन्न रियासतों में अलग-अलग चित्र शैलियों का विकास हुआ। इन शैलियों को पृष्ठ भूमि, बॉर्डर, पशु पक्षियों का अंकन, पोशाकों का अंकन, आंखों की बनावट, चित्रों की विषय वस्तु, चेहरे की दाढ़ी-मूंछें, चिबुक, होंठ आदि की बनावट से अलग-अलग किया जाता है।

रंगों के आधार पर भी इनमें वर्गीकरण हो सकता है। जयपुर एवं अलवर शैलियों के चित्रों में हरे रंग का अधिक प्रयोग होता है। जोधपुर एवं बीकानेर शैलियों में पीले रंग का अधिक प्रयोग होता है। कोटा शैली में नीले रंग का अधिक प्रयोग होता है। बूंदी शैली में सुनहरी रंग का अधिक प्रयोग होता है।

किशनगढ़ शैली में सफेद एवं गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग होता है। बॉर्डर की पट्टी के रंगों से भी इन्हें अलग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये उदयपुर में पीला, किशनगढ़ में गुलाबी एवं हरा, बूंदी में लाल एवं सुनहरी तथा जयपुर में चंदेरी एवं लाल रंग के बॉर्डर अधिक संख्या में बनाये गये हैं।

राजपूत चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ

राजस्थानी चित्रकला को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित शैलियों एवं उप-शैलियों में रखा जा सकता है-

मेवाड़ स्कूल

नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, उदयपुर शैली, सावर उपशैली, बागौर ठिकाणे की उपशैली, बेगूं ठिकाणे की उपशैली, केलवा ठिकाणे की उपशैली।

मारवाड़ स्कूल

जोधपुर शैली, किशनगढ़ शैली, नागौर उपशैली, सिरोही शैली, बीकानेर शैली, जैसलमेर शैली, भिणाय ठिकाणे की उपशैली, घाणेराव शैली, जूनियां शैली।

हाड़ौती स्कूल

बूंदी शैली, झालावाड़ शैली, कोटा शैली।

ढूंढाड़ स्कूल

आम्बेर शैली, शेखावाटी शैली, उणियारा ठिकाणे की उपशैली, ईसरदा ठिकाणे की उपशैली, शाहपुरा शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली।

मेवाड़ प्रदेश की राजपूत चित्रकला

मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला के अंतर्गत उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, चावंड, बनेड़ा, बागौर, सावर, बेगूं तथा केलवा ठिकाणों की चित्रकला आती है।

मेवाड़ शैली

इसे उदयपुर शैली भी कहते हैं। ई.1260 का श्रावक प्रतिक्रमण चूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ मेवाड़ शैली का प्रथम उदाहरण है। यह ग्रंथ ताड़पत्रों से बनाया गया है। इसके चित्र नागदा के सास-बहू मंदिर तथा चित्तौड़ के मोकल मंदिर की तक्षण कला जैसे हैं।

गरुड़, नासिका, परवल की खड़ी फांक जैसे नेत्र, घुमावदार एवं लम्बी अंगुलियां, लाल-पीले रंग की प्रचुरता, छोटी ठोड़ी, अलंकारों की प्रधानता आदि इस शैली की विशेषतायें हैं। उदयपुर शैली में कदम्ब के वृक्ष एवं हाथियों का प्रमुखता से अंकन किया गया है। मेवाड़ में राणा कुंभा, राणा सांगा, मीरांबाई, राणा प्रताप, उदयसिंह, जगतसिंह, राजसिंह, जयसिंह, अमरसिंह आदि के काल में चित्रकला का अच्छा विकास हुआ। महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में यह अपने चरम पर पहुँची।

इसे मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। चावण्ड में ई.1605 में चित्रित भेंट, रसिक प्रिया, उदयपुर में ई.1648 में चित्रित रामायण तथा आर्ष रामायण, ई.1741 में चित्रित गीत गोविंद तथा ई.1719 में चित्रित बिहारी सतसई उदयपुर शैली के प्रमुख चित्र हैं। मेवाड़ शैली में चित्रित रागमाला, बारहमासा, पंचतंत्र तथा रसमंजरी भी उल्लेखनीय हैं।

नाथद्वारा शैली की राजपूत चित्रकला

ई.1670 में श्रीनाथजी के विग्रह के साथ ब्रज की चित्रण परंपरा मेवाड़ में आयी तथा उदयपुर शैली व ब्रज शैली के मिश्रण से नाथद्वारा शैली का विकास हुआ। इस शैली में आंखें हिरण के समान बनाई जाती हैं। गायों का अंकन अधिक किया जाता है। यमुना के तट, अन्नकूट, जन्माष्टमी उत्सव आदि का अंकन भी इस चित्र शैली की प्रमुख विशेषता है। इस शैली के चित्रों में हरे एवं पीले रंग का अधिक प्रयोग किया जाता है।

मेवाड़ की लघु चित्र शैली

महाराणा जगतसिंह प्रथम (ई.1628 से 1652) के काल में चित्रकला का खूब विकास हुआ। मेवाड़ के राणा शैव मत के उपासक थे किंतु इस काल में वल्लभ संप्रदाय के प्रसार के कारण श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों का निर्माण अधिक हुआ। इस काल में रागमाला (ई.1628), रसिकप्रिया (ई.1628-30), गीतगोविंद (ई.1629), भगवद् पुराण (ई.1648) एवं रामायण (ई.1649) आदि विषयों पर लघु चित्रों का निर्माण हुआ। इनमें से अधिकतर चित्र देश-विदेश के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

देवगढ़ उपशैली

इस शैली का विकास देवगढ़ के रावत द्वारकादास चूण्डावत द्वारा हुआ। यह मेवाड़ शैली की उपशैली है। मोटी एवं सधी हुई रेखाएं, पीले रंगों का बाहुल्य, मारवाड़ के अनुकूल स्त्री पुरुषों की आकृतियां, शिकार, गोठ, आदि से सम्बन्धित चित्र इसकी विशेषता है।

मरुप्रदेश की राजपूत चित्रकला

तिब्बती इतिहासकार तारानाथ (16वीं शताब्दी) ने मरूप्रदेश में 7वीं शताब्दी के श्रीरंगधर नामक एक चित्रकार का उल्लेख किया है। ई.1422-23 में लिखित सुपाश्र्वनाथ चरितम् के चित्रों में जैन एवं गुजराती शैली का प्रभाव दृष्टिगत होता है। ई.1450 के लगभग गीत-गोविंद तथा बालगोपाल-स्तुति की एक-एक प्रति प्राप्त हुई है जिनमें राजस्थान के प्रारंभिक चित्रण को देखा जा सकता है।

जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, घाणेराव तथा अजमेर शैलियों को मारवाड़ चित्रकला तथा मरुप्रदेश की चित्रकला भी कहते हैं। राजा मालदेव के समय (ई. 1532 से 1568) का जोधपुर शैली का उत्तराध्ययन सूत्र बड़े महत्व का है। अब यह चित्र बड़ौदा संग्रहालय में रखा है।

मारवाड़ शैली की राजपूत चित्रकला

ई.1623 की पाली रागमाला चित्रावली, 17वीं शताब्दी की ही जोधपुर शैली की सूरसागर पदों पर आधारित चित्रावली तथा रसिकप्रिया में रंगों की चटकता और वस्त्राभूषण आदि का चित्रांकन महत्त्वपूर्ण है। जोधपुर दुर्ग में चैखेलाव महल के भित्ति चित्र, राजा मालदेव के समय में बने थे। ये मार्शल टाइप के हैं।

राजा सूरसिंह के समय के अनेक लघुचित्र, ढोला मारू तथा भागवत आदि के चित्र भी उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं सदी में मारवाड़ नाथ संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित रहा। अतः राजा मानसिंह के समय के नाथ संप्रदाय के मठों के चित्र भी विशिष्ट बन पड़े हैं। इस शैली के पुरुष लम्बे-चैड़े, गठीले बदल के तथा गलमुच्छों, ऊंची पगड़ी एवं राजसी वैभव वाले वस्त्राभूषणों से युक्त हैं।

स्त्रियों की वेशभूषा में ठेठ राजस्थानी लहंगा, ओढ़नी, लाल फूंदने आदि का प्रयोग प्रमुख रूप से हुआ है। जोधपुर शैली में भी पीले रंग का अधिक प्रयोग हुआ है। इस शैली के चित्रों में आम के पेड़, कौवा एवं घोड़ा अधिक देखने को मिलते हैं। राम-रावण युद्ध, कौंधती बिजली, मरुस्थल के दृश्य, लोक देवताओं के चित्र, दुर्गा सप्तशती का चित्रण भी इस शैली की विशेषतायें हैं।

बीकानेर शैली की राजपूत चित्रकला

बीकानेर शैली में मुगल शैली के प्रभाव के कारण नारी अंकन में तन्वंगी देह चित्रित की गयी है। इस चित्रांकन में हरे, लाल, बैंगनी, जामुनी तथा सलैटी रंगों का प्रयोग किया गया है। पीले रंग को भी प्रमुखता दी गई है। शाहजहाँ और औरंगजेब शैली की पगड़ियों के साथ ऊंची मारवाड़ी पगड़ियां, ऊंट, हिरण आदि पशुओं और कौवा तथा चील आदि पक्षियों के साथ राजपूती जीवन शैली की छाप दिखायी देती है।

ऊँट की खाल पर चित्रों का अंकन इस शैली की विशेषता है। बीकानेर के मंदिरों में मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों ने विशाल संख्या में भित्ति चित्रों का निर्माण किया। भाण्डा शाह के जैन मंदिर के रंगमंडप का शिखर तथा इसकी कलात्मक चित्रकारी अत्यंत आकर्षक है।

नागौर उपशैली

नागौर उपशैली में पारदर्शी वेशभूषा एवं बुझे हुए रंगों का प्रयोग अधिक किया गया है। नागौर दुर्ग में काष्ठ के दरवाजों एवं किले के भित्तिचित्र तथा घाणेराव के ठिकाने में बने हुए अनेक लघुचित्र देखने योग्य हैं।

जैसलमेर शैली

इस शैली में दाढ़ी मूंछों की मुखाकृति प्रमुखता से बनाई जाती है। चेहरे पर ओज एवं वीरत्व की प्रधानता होती है। मूमल इस शैली का प्रमुख चित्र है।

किशनगढ़ शैली की चित्रकला

किशनगढ़ शैली में राधा कृष्ण की लीलायें, बणी-ठणी, रंग-बिरंगे उपवन आदि की बहुलता है। तारों एवं चंद्रमा से युक्त रातों का अंकन खूबसूरती से किया गया है। इस शैली के चित्रों में पुरुष लम्बे, इकहरे, नील छवि वाले, समुन्नत ललाट, कर्णांत तक खिंचे अरुणाभ नयन, मोती जड़ित श्वेत या मूंगिया पगड़ी वाले चित्रित किये गये हैं।

जबकि नारियां तन्वंगी, लम्बी, गौरवर्णा, नुकीली चिबुक, सुराहीदार गर्दन, क्षीणकटि, लम्बी कमल पांखुरी सी आँखों वाली चित्रित की गयी हैं। दूर-दूर तक फैली झीलों में जल क्रीड़ा करते हंस, बत्तख, सारस, नौकायें, केले के गाछ तथा रंग-बिरंगे उपवन किशनगढ़ शैली को दूसरी शैलियों से अलग करते हैं।

किशनगढ़ की चित्रकला को चरम पर पहुँचाने का श्रेय राजा सावंतसिंह (ई.1699-1764) को है जो नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे राजा राजसिंह के पुत्र थे। उनकी पे्रयसी का नाम बणी ठणी था। वह विदुषी, परम सुंदरी, संगीत में दक्ष तथा कवियत्री थी।

उसके प्रति राजा नागरीदास का आत्मनिवेदन काव्यधारा के रूप में प्रस्फुट हुआ। जिसने चित्रकारों को विषय वस्तु, कल्पना तथा सौंदर्य का विशाल आकाश प्रदान किया। भारत सरकार ने 5 मई 1973 को बणी-ठणी पर एक डाक टिकट भी जारी किया। इस चित्र को ई.1778 में किशनगढ़ के चित्रकार निहालचंद ने बनाया था।

हाड़ौती की राजपूत चित्रकला

चैहान वंशी हाड़ाओं का शासन बूंदी, कोटा तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों पर रहा। इस कारण इन क्षेत्रों से प्राप्त चित्र हाड़ौती शैली के अंतर्गत आते हैं।

बूंदी शैली

इस शैली में पशु-पक्षियों का सर्वाधिक अंकन किया गया है। वर्षा में नाचते हुए मोर, वृक्षों पर कूदते बंदर और जंगल में विचरण करते हुए सिंह सर्वाधिक इसी शैली के चित्रों में अंकित किये गये हैं। बूंदी शैली की आकृतियां लम्बी, शरीर पतले, स्त्रियों के अधर अरुण, मुख गोल, चिबुक पीछे की ओर झुकी तथा छोटी होती है। प्रकृति तथा स्थापत्य के चित्रांकन में श्वेत, गुलाबी, लाल, हरे रंगों का प्रयोग किया गया है।

राग-रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला, दरबार, हस्तियुद्ध, उत्सव आदि का अंकन इस शैली में प्रमुख स्थान रखता है। इस शैली में सुनहरी रंग का प्रयोग अधिक हुआ है। साथ ही खजूर के पेड़, बत्तख एवं हिरण का बहुतायत से अंकन किया गया है। महाराव उम्मेदसिंह के शासन काल में निर्मित चित्रशाला (रंगीन चित्र) बूंदी चित्र शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।

कोटा शैली

कोटा शैली बूंदी शैली से आई है। कोटा शैली में शिकार का बहुरंगी तथा वैविध्यपूर्ण चित्रण देखा जा सकता है। इस शैली में नीला रंग, खजूर के वृक्ष, बत्तख एवं शेर आदि का प्रमुखता से अंकन किया गया है। झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधा-कृष्ण लीला, रामलीला तथा राजसी वैभव के चित्र दर्शनीय हैं। झालावाड़ के राजकीय संग्रहालय में कुछ तांत्रिक देव-चित्र प्रदर्शित हैं जो पशु-पक्षी के रूप में अंकित किए गए हैं।

तंजौर शैली

भित्ति चित्रों की दृष्टि से कोटा सबसे सम्पन्न है। दक्षिण भारत के चित्रकारों ने भी कोटा में भित्ति चित्र बनाये। तंजौर शैली के अनेक चित्र कोटा के भवनों में चित्रित हैं।

ढूंढाड़ की राजपूत चित्रकला

आमेर, जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उणियारा, करौली आदि शैलियां ढूंढाड़ चित्रकला में आती हैं। झिलाय ठिकाणा भी ढूंढाड़ी चित्रकला के अंतर्गत आता है।

जयपुर शैली की राजपूत चित्रकला

जयपुर शैली में हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। मुगलों एवं ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का प्रभाव भी इस चित्रकला शैली पर देखा जा सकता है। आमेर की छतरियों, बैराठ के मुगल गार्डन, मौजमाबाद के निजी चित्रों में मुगल प्रभाव हावी है। राजा जयसिंह के समय के चित्रों में रीतिकालीन प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है।

इस काल में आदमकद चित्रों की भी परम्परा पड़ी। माधोसिंह (प्रथम) के काल में गलता के मंदिरों, शीशोदिया रानी के महल, चंद्रमहल तथा पुण्डरीक की हवेली में कलात्मक भित्ति-चित्रण हुआ। सवाई प्रतापसिंह के काल में राधाकृष्ण की लीलाएं, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा आदि का चित्रण हुआ।

अलवर शैली

इस शैली में भी जयपुर शैली की सारी विशेषतायें मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जयपुर शैली और दिल्ली शैली के मिश्रण से अलवर शैली बनी। हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष, मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है।

इस शैली में वेश्याओं के जीवन का खूबसूरती से अंकन किया गया है। जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम एवं नन्दलाल अलवर शैली के प्रसिद्ध चित्रकार थे। अलवर के राजकीय संग्रहालय में अलवर नरेशों द्वारा खरीदे गए बहुमूल्य चित्र संगृहीत हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

मौर्य कालीन स्थापत्य

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सांची का बौद्ध स्तूप : मौर्य कालीन स्थापत्य

मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं। कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है।

‘वास्तु’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की ‘वस्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ ‘बसना’ होता है। बसने के लिये भवन की आवश्यकता होती है अतः ‘वास्तु’ का अर्थ ‘रहने हेतु भवन’ है। ‘वस्’ धातु से ही वास, आवास, निवास, बसति, बस्ती आदि शब्द बने हैं। नगर-निर्माण योजना एवं भवन निर्माण योजना बनाने वाले मुख्य व्यक्ति को ‘स्थपति’ कहते थे। ‘स्थपति से ही ‘स्थापत्य’ शब्द बना है जिसका अर्थ नगर एवं भवन निर्माण कला है।

स्थापत्य कला को कलाओं की रानी कहा जाता है। भारत में स्थापत्य कला का सर्वप्रथम विकास सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है। यह नगरीय सभ्यता थी जिसमें पक्के घरों का निर्माण किया गया था। वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल की सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण थी तथा इस काल के आर्य कच्ची झौंपड़ियों में रहना अधिक पसंद करते थे।

यद्यपि वेदों में पुरों का उल्लेख हुआ है तथापि उस काल के पुरों के कोई अवशेष उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। ये संभवतः प्राकार से घिरे हुए लघु ग्राम ही थे। महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष कुरुक्षेत्र एवं मेरठ के पास की खुदाइयों में मिले हैं। इस काल तक सभ्यता काफी विकसित हो चुकी थी तथा मनुष्य ताम्र-सभ्यता की अवस्था में पहुँच गया था।

मौर्यकालीन सभ्यता से लेकर गुप्तकालीन, हर्षकालीन, राजपूत कालीन, दिल्ली सल्तनत कालीन, मुगल कालीन एवं ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कला के साक्ष्य प्रचुरता से प्राप्त होते हैं। इस कला के इतिहास एवं विभिन्न तत्त्वों के बारे में अलग अध्याय में विस्तार से चर्चा की गई है।

प्राचीन नगर निर्माण कला

प्राचीन आर्यों के नगरों के नाम महावन, तोरण एवं गोपुर आदि मिलते हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये बसावटें जंगलों एवं गौचरों आदि में विकसित हुई होंगी तथा इनके आवास कच्चे अर्थात् घास-फूस एवं मिट्टी से बनते होंगे। इस कारण उस काल के स्थापत्य के अवशेष नहीं मिलते हैं। जब पक्के भवनों का निर्माण होने लगा तो नगरों की स्थापना निश्चित नगर-योजना के आधार पर होने लगी।

ई.पू. 8वीं शती में मगध की राजधानी राजगृह उन्नति के शिखर पर थी। यद्यपि उस काल के पक्के भवन भी आदिकालीन झोपड़ियों के नक्शे के आधार पर गोलाकार ही बनते थे तथापि उनकी दीवारों में चौकोर दरवाजे एवं खिड़कियाँ लगते थे।

बौद्ध लेखक धम्मपाल के अनुसार, ईसा पूर्व पाँचवीं शती में महागोविन्द नामक स्थपति ने उत्तर भारत की अनेक राजधानियों के विन्यास (नक्शे अथवा नगर योजना) तैयार किए थे। चौकोर नगरियों के मध्य-भाग में एक दूसरे को समकोण पर काटने वाली दो-दो मुख्य सड़कें बनाई गई थीं जो सम्पूर्ण नगरी को चार भागों में बाँट देती थीं।

एक भाग में राजमहल होते थे जिनके विस्तृत वर्णन मिलते हैं। सड़कों के चारों छोरों पर नगरद्वार होते थे। मौर्यकाल (ई.पू. चौथी शती) के अनेक नगर यथा कपिलवस्तु, कुशीनगर, उरुबिल्व आदि एक ही नक्शे अथवा नगर-योजना के अनुसार बने थे। इनके नगरद्वार भी एक जैसे थे। इन नगरों से मिले भवनों के अवशेषों में बाहर निकले हुए छज्जों, अलंकृत गवाक्षों एवं स्तंभों से बौद्धकालीन नगरियों की भावुकता का आभास होता है।

अशोक की भाँति कनिष्क भी बहुत बड़ा निर्माता था। उसने दो नगरों का निर्माण करवाया। उसने एक नगर तक्षशिला के समीप बनवाया जिसके खंडहर आज भी विद्यमान हैं। यह नगर ‘सिरपक’ नामक स्थान पर बसाया गया था। कनिष्क ने दूसरा नगर काश्मीर में बसाया था जिसका नाम कनिष्कपुर था।

मौर्य कालीन स्थापत्य कला

मगध के मौर्य शासकों के काल में जिस स्थापत्य कला का विकास हुआ, उसे मौर्य कालीन स्थापत्य कहते हैं। मौर्य कालीन स्थापत्य कला के स्मारक पाँच स्वरूपों में प्राप्त होते हैं- (1.) आवासीय भवन (2.) राजप्रासाद (3.) गुहा-गृह (4.) स्तम्भ तथा (5.) स्तूप।

(1.) आवासीय भवनों का निर्माण

अशोक के पूर्व जो आवासीय भवन बने थे, वे ईटों तथा लकड़ी से निर्मित हुए। अशोक के शासन-काल में भवन निर्माण में लकड़ी तथा ईटों के स्थान पर पाषाण का प्रयोग आरम्भ हो गया। जो काम लकड़ी तथा ईटों पर किया जाता था, इस काल में वह पत्थर पर किया जाने लगा। काश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में ललितपाटन नामक नगरों की स्थापना उसी के शासन-काल में हुई थी।

 (2.) राजप्रासाद का निर्माण

मेगस्थिनीज ने पाटलिपुत्र में बने सुंदर राजप्रासाद का वर्णन किया है। यह राजप्रासाद इतना सुन्दर था कि इसके निर्माण के सात सौ वर्ष बाद जब फाह्यान ने इसे देखा तो वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने लिखा है कि अशोक के महल एवं भवनों को देखकर लगता है कि इस लोक के मनुष्य इन्हें नहीं बना सकते। ये तो देवताओं द्वारा बनवाये गये होंगे।

पटना से इस मौर्यकालीन विशाल राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। एरियन के अनुसार यह राजप्रासाद कारीगरी का एक आश्चर्यजनक नमूना है। राज-प्रासाद के अवशेषों में चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा भी मिली है। पतंजलि ने इस राजसभा का वर्णन किया है। यह सभा एक बहुत ही विशाल मण्डप के रूप में है। मण्डप के मुख्य भाग में, पूर्व से पश्चिम की ओर 10-10 स्तम्भों की 8 पंक्तियां हैं।

 डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यह ऐतिहासिक युग का प्रथम विशाल अवशेष है जिसके दिव्य स्वरूप को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाता है। उसके विभ्राट स्वरूप की स्थायी छाप मन पर पड़े बिना नहीं रह सकती।

(3.) गुहा स्थापत्य

बिहार में गया के पास बराबर एवं नागार्जुनी की पहाड़ियों में मौर्यकालीन सात गुहा-गृह प्राप्त हुए हैं। बराबर पर्वत समूह से चार गुफाएं मिली हैं- कर्ण चोपड़ गुफा, सुदामा गुफा, लोमस ऋषि गुफा तथा विश्व झौंपड़ी गुफा। नागार्जुनी पहाड़ियों से तीन गुफाएं मिली हैं- गोपी गुफा, वहियका गुफा तथा वडथिका गुफा।

इन गुहा-गृहों का निर्माण मौर्य-सम्राट अशोक तथा दशरथ के शासन काल में किया गया था। ये गुहा-गृह शासकों की ओर से आजीवकों को दान में दिये गये थे। इन गुहा-गृहों की दीवारें आज भी शीशे की भाँति चमकती हैं।

(4.) स्तम्भ

सांची तथा सारनाथ में अशोक के काल में बने तीस से चालीस स्तम्भ आज भी विद्यमान हैं। इनका निर्माण चुनार के बलुआ पत्थरों से किया गया है। इन स्तम्भों पर की गई पॉलिश शीशे की तरह चमकती है। ये स्तम्भ चालीस से पचास फुट लम्बे हैं तथा एक ही पत्थर से निर्मित हैं। इनका निर्माण शुण्डाकार में किया गया है। ये स्तम्भ नीचे से मोटे तथा ऊपर से पतले हैं।

इन स्तम्भों के शीर्ष पर अंकित पशुओं की आकृतियाँ सुंदर एवं सजीव हैं। शीर्ष भाग की पशु आकृतियों के नीचे महात्मा बुद्ध के धर्म-चक्र प्रवर्तन का आकृति चिह्न उत्कीर्ण है। इन स्तम्भों के शीर्ष पर अत्यंत सुंदर, चिकनी एवं चमकदार पॉलिश की गई है जो मौर्य काल की विशिष्ट उपलब्धि है। लौरिया नंदन स्तम्भ के शीर्ष पर एक सिंह खड़ा है। संकिसा स्तम्भ के शीर्ष पर एक विशाल हाथी है तथा रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष पर एक वृषभ है।

अशोक के स्तम्भों में सबसे सुंदर एवं सर्वोत्कृष्ट सारनाथ के स्तम्भ का शीर्षक है। सारनाथ स्तम्भ के शीर्ष पर चार सिंह एक दूसरे की ओर पीठ किये बैठे हैं। मार्शल के अनुसार ईस्वी शती पूर्व के संसार में इसके जैसी श्रेष्ठ कलाकृति कहीं नहीं मिलती। ऊपर की ओर बने सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली हुई नसों में जैसी प्राकृतिकता है, और उनकी मांसपेशियों में जो तनाव है और उनके नीचे उकेरी गई आकृतियों में जो प्राणवंत वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है।

(5.) स्तूप

मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप निर्माण की परम्परा लौह कालीन तथा महापाषाणकालीन बस्तियों के समय से आरंभ हो चुकी थी किंतु अशोक के काल में इस परम्परा को विशेष प्रोत्साहन मिला। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं। कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है।

इन स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्व (सत्य-ज्ञान प्राप्त बौद्ध मतावलम्बी) के अवशेष रखने के लिये किया जाता था। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने लगभग चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था। इनमें से कुछ स्तूपों की ऊँचाई 300 फुट तक थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में इन स्तूपों को खड़े देखा था।

वर्तमान में कुछ स्तूप ही देखने को मिलते हैं। इनमें मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित सांची का स्तूप प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 77.5 फुट, व्यास 121.5 फुट तथा इसके चारों ओर लगी बाड़ की ऊँचाई 11 फुट है। इस स्तूप का निर्माण अशोक के काल में हुआ तथा इसका विस्तार अशोक के बाद के कालों में भी करवाया गया। इस स्तूप की बाड़ और तोरणद्वार कला की दृष्टि से आकर्षक एवं सजीव हैं।

साँची, भरहुत, कुशीनगर, बेसनगर (विदिशा), तिगावाँ (जबलपुर), उदयगिरि, प्रयाग, कार्ली (मुम्बई), अजन्ता, एलोरा, विदिशा, अमरावती, नासिक, जुनार (पूना), कन्हेरी, भुज, कोंडेन, गांधार (वर्तमान कंधार-अफगानिस्तान), तक्षशिला पश्चिमोत्तर सीमान्त में ईस्वी पूर्व चौथी शती से चौथी शती ईस्वी तक की वास्तुकृतियाँ कला की दृष्टि से अनूठी हैं।

सर जॉन मार्शल ने ‘भारत का पुरातत्व सर्वेक्षण 1912-13’ में लिखा है कि- ‘वे भवन तत्कलीन वास्तुकला की अद्वितीय सूक्ष्मता और पूर्णता का दिग्दर्शन कराते हैं। उनके कारीगर आज भी यदि संसार में आ सकते, तो अपनी कला के क्षेत्र में कुछ विशेष सीखने योग्य शायद न पाते।’

दक्षिण भारत में गुंतूपल्ले (कृष्ण जिला) और शंकरन् पहाड़ी (विजगापट्टम् जिला) में शैलकृत्त वास्तु के दर्शन होते हैं। साँची, नालन्दा और सारनाथ में अपेक्षाकृत बाद की वास्तुकृतियाँ हैं।

मौर्य कालीन स्थापत्य कला पर विदेशी प्रभाव

स्पूनर, मार्शल तथा निहार रंजन रे आदि अनेक विद्वानों ने मौर्यकाल की कला को भारतीय नहीं माना है। इन विद्वानों ने मौर्य काल की कला पर ईरानी कला का प्रभाव माना है। स्पूनर ने लिखा है कि पाटलिपुत्र का राजभवन फारस के राजमहल का प्रतिरूप था। स्मिथ ने लिखा है कि मौर्यों की कला ईरान तथा यवनों से प्रभावित हुई है। सिकंदर के आक्रमण के समय विदेशी सैनिक तथा शिल्पी भारत में बस गये थे, उन्हीं के द्वारा अशोक ने स्तम्भों का निर्माण करवाया।

स्मिथ की मान्यता है कि अशोक से पहले, भारत में भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग नहीं किया जाता था। विदेशी कलाकारों द्वारा इसे संभव किया गया। इन विद्वानों की धारणा को नकारते हुए अरुण सेन ने लिखा है कि मौर्य कला तथा फारसी कला में पर्याप्त अंतर है। फारसी स्तम्भों में नीचे की ओर आधार बनाया जाता था जबकि अशोक के स्तम्भों में कोई आधार नहीं बनाया गया है।

मौर्य स्तम्भ का लम्बा भाग गोलाकार है एवं चमकदार पॉलिश से युक्त है जबकि फरसी स्तम्भों में चमकदार पॉलिश का अभाव है। अतः मौर्य कला पर फारसी प्रभाव होने की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मौर्य कला अपने आप में पूर्णतः भारत में विकसित होने वाली कला है।

कनिष्क कालीन स्थापत्य

दूसरी शताब्दी ईस्वी के विदेशी शासक कनिष्क ने अपनी राजधानी पुष्पपुर में 400 फुट ऊँचा लकड़ी का स्तम्भ तथा बौद्ध-विहार बनवाया। यहीं पर उसने एक पीतल की मंजूषा में बुद्ध के अवशेष रखवाकर एक स्तूप बनवाया। इस स्तूप का निर्माण कनिष्क ने एक यूनानी शिल्पकार से करवाया। अपने साम्राज्य के अन्य भागों में भी कनिष्क ने बहुत से विहार तथा स्तूप बनवाये। चीनी यात्री फाह्यान ने गान्धार में कनिष्क द्वारा बनवाये गये विहारों तथा स्तूपों को देखा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 170 विहारों तथा स्तूपों का वर्णन किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

हिन्दू स्थापत्य कला

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हिन्दू स्थापत्य कला

हिन्दू स्थापत्य कला अत्यंत प्राचीन काल में विकसित हुई जिसमें देवालय, राजप्रासाद, दुर्ग, जलाशय, उद्यान आदि के भवन बनाए जाते थे।

मौर्य काल के बाद हिन्दू स्थापत्य कला का तेजी से विकास हुआ। हिन्दू स्थापत्य कला दो रूपों में मिलती है- (1.) निजी उपयोग के भवन, (2.) सार्वजनिक उपयोग के भवन।

निजी उपयोग के भवन प्रायः आवासीय थे। इनमें जन-साधारण के छोटे घरों से लेकर राजाओं के भव्य प्रासाद एवं सामंतों की हवेलियां तक सम्मिलित थे जबकि सार्वजनिक स्थापत्य कला में मंदिर, दुर्ग, उद्यान एवं जलाशय आदि आते थे। सार्वजनिक स्थापत्य के विकास में चार कारण प्रतीत होते हैं- (1.) धार्मिक प्रेरणा, (2.) सामरिक आवश्यकता, (3.) ऐश्वर्य, विलास एवं प्रतिष्ठा की आकांक्षा (4.) जनकल्याण की भावना।

भारत में सार्वजनिक स्थापत्य की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में जलाशयों, मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों का निर्माण पूर्त-धर्म माना जाता था। याज्ञवलक्य स्मृति की टीका मिताक्षरा में स्त्रियों एवं विधवाओं को भी पूर्त-धर्म हेतु धन व्यय करने की अनुमति दी गई है। प्राचीन काल में सार्वजनिक लाभ एवं उपयोग के लिए दातव्य कार्यों एवं वस्तुओं से सम्बन्धित नियम बने हुए थे।

स्मृतियों के अनुसार लोगों को कुएं, बांध जलयंत्र इत्यादि बनवाने चाहिए। कुछ ग्रंथकारों ने लिखा है कि यज्ञों से केवल स्वर्ग मिलता है परंतु मंदिरों एवं तालाबों के निर्माण से मुक्ति हो जाती है। स्मृति चंद्रिका, कात्यायन आदि ग्रंथों से ज्ञात होता है कि राजा लोग मंदिरों, तड़ागों, कूपों आदि सम्पत्तियों पर दृष्टि रखते थे और उन पर विपत्ति आने पर उनकी रक्षा करते थे।

मंदिर स्थापत्य कला

मंदिर मुख्यतः धार्मिक वास्तु है जिसमें भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट विकास देखने को मिलता है। देवी-देवताओं के मूर्त रूपों की पूजा हेतु मूर्ति स्थापना के लिए जो सुंदर भवन निर्मित हुए, वही भवन मंदिर कहलाए। मंदिरों की कल्पना ईश्वर के आवास के रूप में की जाती है इसलिए ईश्वर के प्रिय स्थलों को प्रतीकात्मक रूप में मंदिर में उत्कीर्ण किया जाता है।

यही कारण है कि नदियां एवं उद्यान आदि के अंकन का मंदिर-वास्तुकला में प्रमुख स्थान है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रतीकों का अंकन करके उपासकों एवं श्रद्धालुओं का मन एवं मस्तिष्क ईश्वर के ध्यान एवं दर्शन के लिए तैयार किया जाता है। भारतीय साहित्य में हिन्दू मंदिर की संकल्पना एक पर्वत के रूप में की गई है, जहाँ देवगण निवास एवं क्रीड़ा करते हैं।

इस संकल्पना का आधार विष्णुधर्मोत्तर पुराण है। बृहत्संहिता तथा भविष्य पुराण के अनुसार तीर्थों एवं धर्म-क्षेत्रों में देवताओं की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। बृहत्संहिता तथा मत्स्य पुराण में पर्वतों की सूची में उद्धृत प्रथम तीन पर्वतों- मरु, मन्दर तथा कैलाश का नाम मंदिरों के अन्तर्गत भी आता है। मंदिरों की कल्पना पर्वतों के रूप में न केवल स्थापत्य-ग्रंथों में मिलती है अपितु साहित्य तथा अभिलेखों में भी प्राप्त होती है।

गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य

 गुप्तकाल (ई.320-495) से पहले की स्थापत्यकला मंथर गति से चलती है। गुप्तकाल से पहले के काल में मंदिरों का निर्माण प्रायः लकड़ी से होता था। इसलिए गुप्तकाल से पहले का मंदिर-स्थापत्य बहुत पहले ही नष्ट हो गया। तत्कालीन ग्रंथों से भी उन मंदिरों की जानकारी नहीं मिलती। पाँचवीं शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्तकाल से भवन निर्माण में पक्की ईंटों का बहुतायत से प्रयोग होने लगा।

उस समय समाज में बौद्ध प्रभाव क्षीण होकर ब्राह्मण प्रभाव अपने चरम पर पहुँच गया था। इस काल में विष्णु, शिव, सूर्य, बुद्ध, बोधिसत्वों तथा तीर्थकरों की पूजा का महत्व बढ़ गया इस कारण उनकी पूजा के लिए बड़ी संख्या में मन्दिरों का निर्माण किया गया। इन मन्दिरों में पूजा-पाठ तथा देवताओं की उपासना की जाती थी।

गुप्तकाल में स्थापत्य के क्षेत्र में नवीन प्ररेणा, नवीन पद्धति और नवीन योजनाओं का विकास हुआ। इस कारण गुप्तकाल में मूर्ति-शिल्प एवं मंदिरों की स्थापत्य-कला ने भारतीय संस्कृति में अपना चिरस्थाई स्थान बना लिया। मान्यता है कि गुप्तकाल में ही सर्वप्रथम पाषाण मंदिरों का निर्माण हुआ।

गुप्तकाल के अनेक मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनसे उस काल के मंदिर-स्थापत्य की जानकारी मिलती है। गुप्तकाल में मंदिर निर्माण कला का विकास तीन चरणों में हुआ। सबसे प्रारम्भिक मंदिर एक कक्ष वाले होते थे और उस कक्ष में प्रतिमा प्रतिष्ठित रहती थी। दूसरे चरण में मंदिरों की छतों में पत्थरों के ऊर्ध्वरोही निर्माण हुए जो या तो सीधे अथवा वक्ररेखी भागों वाले पिरामिड जैसे दृष्टिगोचर होते थे। तीसरे चरण में गुप्तकालीन मंदिर शैली अपने चरम को प्राप्त कर गई।

गुप्तकालीन मंदिर शैली मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित हुई, इस शैली को ‘नागर शैली’ कहा जाता है। नागर शैली के मंदिरों में गर्भगृह, शिखर, मण्डप, प्रदक्षिणा-पथ, जगती, आमलक, कीर्तिमुख जंघा, रथिकाएं, स्तम्भ, प्रवेश द्वार, चौखट एवं गवाक्षों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाता है।

प्रतीक शास्त्रियों ने मंदिर के अंग-प्रत्यंग के निर्माण का उद्देश्य एवं विधान निश्चित किया है। मंदिर निर्माण की पृष्ठभूमि में दार्शनिक रहस्य निहित हैं। देव-मंदिर परम-पुरुष का प्रतीक है। आकार-प्रकार, स्वरूप, ऊँचाई, ध्वज, कलश, बाह्य अलंकरण, वेदी, प्राचीर, प्रदक्षिणा, आदि सभी का धर्मशास्त्रीय तथा आगमशास्त्रीय महत्व है। मंदिर की बनावट दो भागों में विभक्त होती है-

(1.) ऊर्ध्व छंद: नींव से लेकर शिखर की चोटी तक की ऊँचाई तथा

(2.) तल छंद: एक सिरे से दूसरे सिरे तक बने भवन की लम्बाई।

शिल्पियों ने देवालयों के विभिन्न भागों पर मूर्तियों के माध्यम से उत्कीर्ण पौराणिक वृत्तान्तों एवं कथानकों को प्रदर्शित करने के लिए निश्चित शिल्प-विधानों का पालन किया है। देवताओं तथा दिग्पालों के अंकन में उनके वाहन एवं आयुधों को एक निश्चित अनुपात में उत्कीर्ण किया गया है। मूर्तिकारों ने मूर्ति में निहित सौन्दर्य-मूल्यों को यथावत् बनाए रखा है।

मंदिरों का गर्भगृह छोटा तथा अन्धकारपूर्ण होता है। इसमें केवल प्रमुख देव स्थापित होता है तथा दीवारें एकदम सपाट होती हैं। गर्भगृह की बाह्य भित्ति अभिष्ठान, मंडोवर, प्रवेशद्वार तथा स्तम्भ मूर्तियों से भरे रहते हैं। गर्भगृह की बाह्यभित्ति पर अंकित देव, गन्धर्व, अप्सरा तथा गंधर्व आदि, मुख्य देव की प्रकृति के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करते हैं।

मंदिर की प्रत्येक प्रतिमा चाहे बाहर हो या भीतर, उनका एक निश्चित उद्देश्य होता है। देव-मूर्तियाँ मुख्य देव के विभिन्न स्वरूपों की मूर्त रूप हैं तथा उपासक के लिए भक्तिभाव का वातावरण उत्पन्न करती हैं एवं ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति करवाती हैं।

गुप्तकालीन ब्राह्मण मंदिरों में भीटागाँव (कानपुर जिला), बुधरामऊ (फतेहपुर जिला), सीरपुर और खरोद (रायपुर जिला) तथा तेर (शोलापुर के निकट) के मंदिरों की शृंखला उल्लेखनीय है। भीटागाँव का मंदिर, जो संभवतः अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन मंदिर है, 36 वर्ग फुट के ऊँचे चबूतरे पर मीनार की भाँति 70 फुट ऊँचा बना हुआ है।

बुधरामऊ का मंदिर भी ऐसा ही है। अन्य हिंदू मंदिरों की भाँति इनमें मण्डप आदि नहीं है, केवल गर्भगृह हैं। भीतर की दीवारें यद्यपि सादी हैं तथापि उनमें पट्टे, किंगरियाँ, दिल्हे, आले आदि बनाएं गए हैं। इनके विभिन्न भागों का अनुपात सुंदर है और वास्तु प्रभाव कौशलपूर्ण है। आलों में बौद्धचैत्यों की डाटों का प्रभाव अवश्य पड़ा दिखाई पड़ता है। इनकी शैलियों का अनुकरण शताब्दियों बाद बनने वाले मंदिरों में भी हुआ है।

गुप्तोत्तर कालीन मंदिर स्थापत्य

गुप्तकाल के बाद की मंदिर स्थापत्य कला का वर्गीकरण दो तरह से किया जाता है- (1.) क्षेत्रीयता के आधार पर तथा (2.) सम्प्रदाय के आधार पर।

क्षेत्र के आधार पर मंदिर स्थापत्य शैलियां

क्षेत्र के आधार पर हुए वर्गीकरण में उत्तर भारत की आर्य मंदिर शैली एवं दक्षिण भारत की अनार्य अथवा द्रविड़ मंदिर शैली आती हैं। ग्वालियर के तेली का मंदिर (11वीं शती) और भुवनेश्वर के बैताल देवल मंदिर (9वीं शती) उत्तरी शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि सोमंगलम् एवं मणिमंगलम् आदि के चोल मंदिर (11वीं शती) दक्षिणी शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मंदिरों की उत्तरी एवं दक्षिणी शैलियाँ पूरी तरह भौगोलिक सीमा में नहीं बँधतीं। चालुक्यों की राजधानी पट्टदकल के दस मंदिरों में से चार- (1.)  पप्पानाथ मंदिर ई.680, (2.) जंबुलिंग मंदिर, (3.) करसिद्धेश्वर मंदिर तथा (4.) काशी विश्वनाथ उत्तरी शैली के हैं जबकि छः मंदिर- (1.) संगमेश्वर ई.750, (2.) विरूपाक्ष ई.740, (3.) मल्लिकार्जुन ई.740, (4.) गलगनाथ ई.740, (5.) सुनमेश्वर और (6.) जैन मंदिर, दक्षिणी शैली के हैं।

10वीं एवं 11वीं शती में पल्लवों, चोलों, पांड्यों, चालुक्यों और राष्ट्रकूटों ने दक्षिणी शैली को संरक्षण दिया। दोनों ही शैलियों पर बौद्ध वास्तु का प्रभाव है, विशेषकर शिखरों में।

सम्प्रदायों के आधार पर मंदिर स्थापत्य की शैलियां

सम्प्रदायों के आधार पर किए गए वर्गीकरण में मंदिरों को नागर, द्रविड़ और बेसर कहा जाता है। नागर शैली में विष्णु के पवित्र पर्वतों का और द्रविड़ शैली में शिव के पवित्र पर्वतों का रूपांकन किया गया है। नागर और द्रविड़ मंदिर-स्थापत्य में स्तम्भों, गर्भक्षेत्रों और शिखरों को अत्यंत कलात्मक बनाया जाता था जबकि बेसर शैली में नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का मिश्रण होता है।

बेसर शैली में छतों का आकार-प्रकार कई प्रकार की विशेषताएं लिए हुए होता था। मध्य भारत तथा कर्नाटक के मन्दिरों में प्रायः आर्य तथा द्रविड़ दोनों शैलियों का सम्मिलित स्वरूप मिलता है। चालुक्यों और होयसालों ने मिश्रित बेसर शैली को प्रोत्साहन दिया। विमान शिखर छोटा, फैले कलश, मूर्तियों का आधिक्य, अलंकरण परम्परा का बाहुल्य ही इनकी विशेषता है।

फर्ग्यूसन का मत है कि नागर शैली हिमालय से लेकर विंध्याचल तक फैली हुई थी और द्रविड़ शैली कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थी। हैवेल ने इस मत से असहमति व्यक्त करते हए कहा है कि दोनों ही सम्प्रदायों का दोनों ही क्षेत्रों में एक साथ प्रचार हुआ। अनेक स्थानों पर विष्णु और शिव के देवालय साथ-साथ विद्यमान हैं।

बौद्ध स्थापत्य

बौद्ध धर्म के अनुयाई मंदिर न बनाकर स्तूपों, चैत्यगृहों एवं विहारों का निर्माण करते थे। पगोडा शैली स्तूपों का ही विकसित रूप है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मिट्टी का टीला’। सांची, भरहुत तथा अमरावती भारत के सबसे पुराने स्तूपों मे से हैं। स्तूप भगवान बुद्ध का रूप होता है। अर्थात् स्तूप स्वयं अपने आप में बुद्ध की विशालाकाय प्रतिमा है जो ध्यान मुद्रा में व्याघ्रजीन (सिंहासन) पर मुकुट धारण करके विराजमान है। स्तूप का शिखर भगवान बुद्ध का सिर है, स्तूप का मध्यभाग भगवान बुद्ध का धड़ है, स्तूप की सीढ़ियाँ भगवान के पैर हैं तथा स्तूप का आधार भगवान बुद्ध का सिंहासन है।

हर्षकालीन मंदिर स्थापत्य

हर्ष के शासन काल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। एलोरा का मंदिर, एलिफैण्टा का गुहा मंदिर, कांची में मामल्लपुरम् का शैल मंदिर इसी काल में बने। इस काल में मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में बनीं।

वृहत्तर भारत की भारतीय वास्तुकला

वृहत्तर भारत में आज के अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, लंका एवं इण्डोनेशिया आदि देश सम्मिलित थे। इन सभी देशों में भारतीय वास्तुकला से निर्मित भवन स्थित हैं। नेपाल, श्रीलंका, बर्मा, स्याम, जावा, सुमात्रा, बाली, हिंदचीन और कंबोडिया में भी भारतीय कला के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं।

नेपाल के भक्तपुर का पगोडा शैली का मण्डप-विहीन मन्दिर भारतीय वास्तुकला का ही प्रतिनिधित्व करता है। नेपाल के शंभुनाथ, बोधनाथ, मामनाथ मंदिर, लंका में अनुराधापुर का स्तूप और लंकातिलक मंदिर, बरमा के बौद्ध मठ और पगोडा, कंबोडिया में अंकोर के मंदिर, स्याम में बैंकाक के मंदिर, जावा में परमबनम का शिव मंदिर, कलासन मंदिर और बोरोबुदूर स्तूप आदि हिंदू और बौद्ध वास्तु के प्रमाण हैं।

जावा में भारतीय संस्कृति के प्रवेश के कुछ प्रमाण गुप्तकाल में 4थी शती ईस्वी में मिलते हैं। वहाँ के अनेक स्मारकों से पता लगता है कि मध्य जावा में ई.625 से ई.928 तक और पूर्वी जावा में ई.928 से ई.1478 तक वास्तुकला का स्वर्णकाल था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

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राजपूत स्थापत्य कला

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राजपूत स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला हिन्दू स्थापत्य कला का ही प्रमुख अंग है। राजपूत राजाओं के काल में विकसित इस स्थपत्य कला पर मुगल कला का भी न्यूनाधिक प्रभाव है। उत्तर भारत में बने अनेक देवालय, राजप्रासाद, दुर्ग, जलाशय, उद्यान आदि राजपूत स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

भारत के इतिहास में 7वीं से 12वीं सदी तक का काल राजपूत-काल कहलाता है। राजपूत स्थापत्य कला, हिन्दू स्थापत्य का ही अंग थी। मूलतः यह गुप्तकाल में विकसित नागर शैली से निकली थी किंतु इस पर बौद्ध एवं जैन शैलियों का भी प्रभाव था।

राजपूत स्थापत्य कला

नगर निर्माण

राजपूत काल के नगर स्थापत्य में नगर की सुरक्षा की चिंता स्पष्ट दिखाई देती है। उस काल के नगर बहुत छोटे होते थे तथा वे किसी परकोटे से घिरे हुए होते थे। परकोटों के बाहर गहरी एवं चौड़ी खाई होती थी। इन नगरों की स्थापना पहाड़ों की तलहटियों में अथवा जंगलों से आच्छादित स्थानों में की जाती थी। प्रायः समस्त दुर्गों के भीतर छोटे-छोटे नगर बनाए गए थे।

इस काल के नगरों की योजना अर्थशास्त्र एवं कामसूत्र आदि ग्रन्थों में दिए गए सिद्धान्तों के अनुरूप रखी जाती थी। नगर के भीतर छोटी-छोटी बस्तियां बनाई जाती थीं। एक बस्ती में प्रायः एक अथवा एक जैसे व्यवसाय करने वाले लोगों को बसाया जाता था। राजा अथवा ठाकुर का निवास नगर के पास किसी पहाड़ी पर बने दुर्ग में होता था अथवा नगर के मध्य में दुर्गनुमा संरचना के भीतर होता था।

नगर की गलियां बहुत संकरी रखी जाती थीं ताकि कम स्थान में अधिक लोग रह सकें। इन गलियों में दो घोड़े एक साथ बड़ी कठिनाई से चल सकते थे। जोधपुर, बीकानेर, आमेर, जालोर, उदयपुर आदि मध्य-कालीन नगरों में इन गलियों को आज भी देखा जा सकता है। 

राजपूत कालीन मंदिर स्थापत्य

राजपूत काल में देश के विभिन्न भागों में हिन्दू मन्दिरों का निर्माण बड़ी संख्या में हुआ। इस काल में निर्मित देवालयों के शिल्प-विधानों पर तांत्रिक मतों का प्रभाव दिखाई देता है। प्रतिहारों के काल में वास्तुकला पर शैव मत का प्रभाव छाया रहा। मध्ययुग में मंदिर निर्माण कला उत्तरी और दक्षिणी शैलियों में विभाजित हो गई, उत्तरी नमूने आधारित राजस्थानी वास्तुकला पर दक्षिण के कारीगरों की कुशल राजगीरी का भी प्रभाव पड़ा। सातवीं शताब्दी के मंदिरों में शिखरों का निर्माण अनिवार्य हो गया।

मध्य भारत के कुछ श्रेष्ठ मंदिर एक काल्पनिक राजकुमार जनकाचार्य द्वारा बनाए हुए बताए जाते हैं, जो ब्रह्महत्या के अपराध का प्रायश्चित्त करने के लिए बीस वर्ष तक मंदिर बनवाता रहा। एक अन्य किंवदंति के अनुसार ये असाधारण भवन एक ही रात में पाण्डवों न खड़े किए थे।

पश्चिमी भारत अर्थात् राजस्थान एवं गुजरात आदि प्रांतों में जैन मंदिरों का निर्माण भी बड़ी संख्या में होने लगा। उत्तरी गुजरात का विशाल मंदिर (ई.1125) गुजरात-नरेश सिद्धराज द्वारा और खानदेश के मंदिर गवाली राजवंश द्वारा निर्मित बताए जाते हैं।

हिन्दू और जैन मंदिरों ने वास्तुकला के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन किया। मंदिर का रूप-विधान तैयार करने के लिए स्थापक या मुख्य वास्तुकार ही उत्तरदायी होता था। मंदिर-योजना का निष्पादन करने वाले कारीगरों का वर्गीकरण शिल्पी, स्थपति, सूत्रग्राहिन, तक्षक और वर्धाकिन के रूप में होता था।

राजस्थान के जोधपुर जिले के ओसियां गांव से प्रतिहार कालीन (आठवीं से दसवीं शती) मंदिर समूह के अवशेष मिले है। इन हिन्दू मन्दिरों के स्थापत्य पर कल्पना तथा मौलिकता की छाप है। धीरे-धीरे राजस्थान के मन्दिर भी भुवनेश्वर के मन्दिरों की भांति विशाल आकार ग्रहण करते गए तथा वे शिखरों से अलंकृत एवं सुसज्जित होते गए।

मन्दिरों का मुख्य प्रवेश द्वार ‘तोरण द्वार’ कहलाता था। ये प्रायः अलंकृत होते थे। तोरण द्वार में प्रवेश करते ही उप-मण्डप आता था जिसके बाद सभा-मण्डप बनाया जाता था। सभा-मण्डप के दूसरी छोर पर गर्भगृह का प्रवेश-द्वार होता था जिसमें मुख्य देवता की प्रतिमा स्थापित की जाती थी।

गर्भगृह के ऊपर शिखर बनाया जाता था। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ का प्रावधान किया जाता था। इस काल के मंदिरों की दीवारों पर भगवान के असुर-दलन प्रसंगों यथा कालिया-मर्दन, पूतना वध, मेदिनी उद्धार आदि का अंकन किया जाता था। मंदिर की बाहरी दीवारों पर स्त्री-प्रतिमाओं का विलासमय अंकन किया जाता था जिनमें नृत्य, शृंगार, क्रीड़ा, प्रेम, आदि की अभिव्यक्ति की जाती थी।

राजपूत कालीन जैन मन्दिरों में देलवाड़ा एवं रणकपुर के मंदिर अपने समय के भव्यतम तक्षण से युक्त हैं। कुम्भलगढ़ के नीलकण्ठ मन्दिर, एकलिंगजी मन्दिर, रणकपुर मन्दिर आदि के चारों ओर ऊंची दीवारें, बड़े दरवाजे तथा बुर्ज आदि बनाकर उन्हें दुर्ग जैसा स्वरूप दिया गया है।

इस काल में बना चितौड़ का कीर्ति-स्तम्भ, देवमूर्तियों का संग्रहालय कहा जाता है। इसका स्थापत्य मन्दिरों के स्थापत्य के काफी निकट है। इसमें देवी-देवताओं तथा जन-जीवन से सम्बन्धित उत्कृष्ट मूर्तियों का अंकन किया गया है। पौराणिक देवताओं की समुचित जानकारी के लिए कीर्तिस्तम्भ एक अच्छा साधन है। प्रसिद्ध वास्तुविद् जी. एस. मूरे ने चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ को ‘हिन्दू प्रतिमाशास्त्र की अनुपम निधि’ कहा है।

मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद राजपूत स्थापत्य कला पर मुस्लिम स्थापत्य का प्रभाव दिखाई देने लगा। इस मिश्रित स्थापत्य शैली को हिन्दू-मुस्लिम शैली एवं इण्डो सारसैनिक शैली स्थापत्य शैली कहा गया। इस काल के मन्दिरों में यद्यपि मोर, तोते, कमल आदि का अंकन हिन्दू पद्धति से होता रहा किंतु उप-मण्डप और सभा-मण्डप के बीच खुला चौक, गर्भगृह के ऊपर के शिखर तथा द्वार की सजावट में मुस्लिम विशेषताएं दिखाई देने लगीं। सभामण्डप अधिक खुले रूप में बनने लगे।

शिखरों पर मुस्लिम गुम्बदों का प्रभाव भी दिखने लगा। बीकानेर के दुर्ग में स्थित देवी के मन्दिर में इस प्रभाव को देखा जा सकता है। इसी काल में बने डूँगरपुर के श्रीनाथजी मन्दिर तथा उदयपुर के जगदीश मन्दिर में हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता दिखाई देती है जबकि जोधपुर के घनश्यामजी मन्दिर में तथा जयपुर के जगत शिरोमणि मन्दिर में मुगल शैली की प्रधानता दिखाई देती है।

17वीं तथा 18 वीं सदी में वैष्णव मन्दिर अधिक संख्या में बने। क्योंकि औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता के कारण मथुरा-वृंदावन के अनेक मठों एवं मन्दिरों के आचार्य देव-विग्रहों को लेकर हिन्दू राजाओं के राज्य में चले आए। हिन्दू राजाओं ने इन देव-विग्रहों के लिए भूमि, भवन, धन एवं सुरक्षा प्रदान की। ऐसे मंदिरों में नाथद्वारा, कांकरोली, डूँगरपुर, केाटा, जयपुर, करौली आदि के मंदिर उल्लेखनीय हैं।

चूंकि औरंगजेब ने पुराने मंदिरों को गिराने एवं नए मंदिर नहीं बनाने का आदेश दिया था इसलिए मथुरा-वृंदावन से राजस्थान में आए देव-विग्रहों के लिए हवेलियों का निर्माण किया गया। इन हवेलियों में मंदिरों के परम्परागत अलंकरण लुप्त हो गए तथा सभा-मण्डप के स्तम्भों पर केवल कमल के फूल अथवा सामान्य रेखाकृतियों का अंलकरण किया गया। मुगलों के पराभव के बाद 19वीं शताब्दी में बने मन्दिरों में बड़े और खुले बरामदे बनाए जाने लगे।

आबू मंदिर शैली

राजस्थान प्रान्त के सिरोही ज़िले के माउंट आबू पर्वत पर देलवाड़ा के जैन मन्दिरों का एक समूह स्थित है जिसमें पांच मन्दिर हैं। इनमें से विमल वसहि तथा लूणवसहि प्रमुख हैं। ये दोनो मन्दिर एक ही ढंग से निर्मित हैं जो पहाड़ के नीचे वाले भाग में स्थित झाली बाव से लाकर लगाये गये सफेद संगमरमर से बनाये गये हैं।

विमलवसहि

आबू पर्वत पर स्थित देलवाड़ा के ऋषभदेव जैन मन्दिर को कर्नल टॉड ने भारत के समस्त मन्दिरों में उत्कृष्ट माना है। टॉड ने लिखा है- ‘ताजमहल को छोड़कर कोई भी इमारत इस मन्दिर की समता नही कर सकती।’ विक्रम संवत् 1031 में आबू के दण्डनायक विमलशाह द्वारा बनवाये जाने के कारण इसे ‘विमलवसहि’ कहते हैं। विमलशाह अन्हिलवाड़ा का व्यापारी था जिसे परमार राजा धुंधक ने आबू का दण्डनायक नियुक्त किया था।

शताब्दियां व्यतीत हो जाने के उपरांत भी इन मन्दिरों के कलात्मक वैभव की महक ताजा बनी हुई है। मुख्य मन्दिर के चारों और बावन जिनालय हैं तथा दायीं ओर के विशाल कक्ष में विमलशाह की कुलदेवी अम्बा माता का मन्दिर है। मन्दिर के सामने विमलशाह की अश्वारूढ़ मूर्ति स्थापित है जिसके आस-पास संगमरमर के 12 हाथी बने हुए हैं। इसे हस्तिशाला भी कहते हैं।

हस्तिशाला के बाहर सिरोही के शासक लूणकर्ण देवड़ा के वि.सं. 1372 एवं 1373 के दो शिलालेख अंकित हैं। चौदहवीं शती में मुस्लिम आक्रमण के दौरान मन्दिर का एक हिस्सा तोड़ा गया था जिसे बाद में पुनः बनाया गया।  सम्पूर्ण मन्दिर श्वेत संगमरमर से निर्मित है। मण्डपों, स्तम्भों, छतरियों तथा वेदियों के निर्माण में श्वेत पत्थर पर इतनी बारीक एवं भव्य खुदाई की गई है जो अन्यत्र दुर्लभ है। मण्डप गोल, चौकोर, गुम्बदकार तथा पिरामिडाकार आदि ज्यामितियी आकृतियों में उत्कीर्ण किये गये हैं।

तोरणों एवं प्रवेशद्वार की कला से लेकर मण्डपों के भीतर उत्कीर्ण पौराणिक प्रसंगों की कला एक ही कलाकार के हाथों की प्रतीत होती है जबकि इनका निर्माण सैंकड़ों कारीगरों की सहायता के बिना संभव नहीं है।

लूणवसहि

विमलवसहि के पास ही स्थित नेमिनाथ मन्दिर भी विक्रम की तेरहवीं शताब्दी का बना हुआ है। इसका निर्माण चौलुक्य राजा वीर धवल के महामंत्री वस्तुपाल एवं तेजपाल ने वि.सं.1287 में करवाया था। आकार-प्रकार में यह मन्दिर भी विमलवसहि जैसा ही है। इसमें मुख्य मंन्दिर, सभामण्डप, जिनालय तथा हस्तिशाला हैं। मुख्य मन्दिर के द्वार के दोनों ओर दो ताक हैं जिन्हें देवराणी-जेठाणी का गवाक्ष कहते हैं। मन्दिर का मुख्य शिल्पी शोभनदेव था।

चार हजार फुट से भी ऊंची पहाड़ी पर संगमरमर के देवालयों का यह जगमगाता हुआ संसार धरती पर एक आश्चर्य ही प्रतीत होता है। बाहर से इन मन्दिरों की बनावट सादी है किन्तु भीतरी भाग में स्तंभों, छतों, मण्डपों एवं द्वारों आदि की तक्षणकला अनुपम है।

एच. कोसेन ने ‘स्ट्रगल फॉर एम्पायर’ में इन मन्दिरों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘संगमरमर की पतली और पारदर्शी छिलके जैसे पत्थर का कला, कला से आगे बढकर सुंदरता के स्वप्न में बदल गई है।’

मन्दिर में उत्कीर्ण मूर्तियों से तत्कालीन वेशभूषा, रीति-रिवाज और सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं की जानकारी प्राप्त होती है। गुरु-शिष्य परम्परा, राजसभा के शिष्टाचार और जन जीवन की विविध झांकियों से सम्बन्धित मूर्तियाँ भी उत्कीर्ण हैं।

संगीत और नृत्य आदि विषयों पर प्रकाश डालने वाले अनेक नृत्य और वाद्य यंत्रों को भी पत्थरों में बनाया गया है। इनका कला सौष्ठव अनुपम है। देलवाड़ा का यह मन्दिर समूह शिल्पशास्त्र, नाट्यशास्त्र, इतिहास तथा सामाजिक शास्त्र का अध्ययन केन्द्र ही जान पड़ता है। फर्ग्यूसन तथा हेवल स्मिथ आदि वास्तु शास्त्रियों ने भी इन मन्दिरों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

स्ट्रगल फॉर एम्पायर में इन मन्दिरों के मण्डपों की प्रशंसा के साथ-साथ दोषों की भी चर्चा की गई है- ‘इन मण्डपों में कई प्रकार के तक्षण को बार-बार दोहराया गया है जो स्थापत्य के सिद्धांत  की स्पष्ट अवहेलना है। मन्दिर के भीतरी भाग में कई स्थानों पर अनुपात तथा साम्य का अभाव दिखाई देता है जो साधारण दर्शक को भी खटकता है। छतों से लटकने वाले मण्डप का भाग इस तरह बनाया गया है कि सारे मण्डपों को एक साथ नहीं देखा जा सकता। छतें सामान्य अनुपात से नीची हैं। ये दर्शक में थकावट पैदा करने के दोष से भी मुक्त नहीं हैं।’

भीमाशाह मन्दिर

यह मन्दिर विक्रम की पन्द्रहवी शताब्दी में भीमाशाह ने बनवाया था। जैन तीर्थंकर आदिनाथ की 108 मन की पीतल प्रतिमा के कारण इस मन्दिर को ‘पितलहर’ भी कहते हैं। इस मन्दिर में वि.सं.1489 का देवड़ा चूंडा का एक लेख है जिसमें देलवाड़ा के जैन मन्दिरों के दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों को कर माफी दिये जाने का उल्लेख है।

चौमुखा पार्श्वनाथ

इस मंदिर समूह का चौथा मंदिर चौमुखा पार्श्वनाथ मंदिर है। यह तीन-मंजिला है तथा इसे सिलावटों का मन्दिर भी कहते हैं। इसमें दो कलात्मक तोरण, खड्गासन प्रतिमायें, यक्षों एवं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। गंभारे के बाहर चतुर्दिश कोरणी है।

महावीर स्वामी मन्दिर

मंदिर समूह का पांचवा मंदिर महावीर स्वामी को समर्पित है। इसकी दीवारों एवं गुम्बद में प्राचीन चित्रकारी विद्यमान है।

स्मारक स्थापत्य

राजपूत शासकों, सामन्तों, श्रेष्ठियों, संतों एवं धनी लोगों की स्मृति में स्मारक बनाने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आयी थी। मध्ययुगीन राजपूत स्मारक स्तम्भों पर वीर योद्धा एवं उसके आयुधों का अंकन किया जाता था। इन्हें देवली भी कहते थे। राजपूत योद्धा प्रायः घोड़े पर सवार होता था और उसके निकट सतियों का अंकन किया जाता था।

मुगलों से सम्पर्क होने के बाद इन स्मारकों पर मुगल शैली का प्रभाव दिखने लगा। 17वीं से 19वीं शताब्दी तक निर्मित छतरियां प्रायः एक वर्गाकार चबूतरे पर बनी हुई हैं, जिन पर एक छोटा वर्गाकार अथवा गोलाकार चबूतरा रहता है और उस पर चार, छः आठ और बारह खम्भों पर आधारित गोलाकार गुम्बद बना रहता है। इनके खम्भे विभिन्न कोणीय अथवा गोलाकृतियों में बने हुए होते हैं जिन्हें विभिन्न रेखाकृतियों द्वारा अंलकृत किया गया है।

गुम्बदों की छतें प्रायः सादी हैं। कुछ छतरियों में शिवलिंग स्थापित हैं। साथ ही सम्बन्धित राजा, सामंत या योद्धा की आकृति से युक्त पाषाण पट्टियां और उस पर लेख भी उत्कीर्ण कराए गए हैं। मध्य-कालीन छतरियों में बीकानेर में बीकाजी की छतरी और रायसिंह की छतरी, जोधपुर में मण्डोर उद्यान में स्थित राव मालदेव की छतरी और अजीतसिंह की छतरी तथा उदयपुर के आहड़ ग्राम में स्थित अमरसिंह और कर्णसिंह की छतरियां विशेष उल्लेखनीय हैं। नागौर जिले के ताउसर गांव में अप्पाजी सिंधिया की छतरी में शिललिंग स्थापित है।ण्डोर में स्थित स्मारक मंदिरों की आकृतियों में बने हैं, इन्हें देवल कहा जाता है।

अन्य राजपूत स्थापत्य

पूर्व मध्य-काल एवं मध्य-काल में राजपूत स्थापत्य के अंतर्गत विजेता राजाओं द्वारा बनाए जाने वाले विजय-स्तम्भ एवं कीर्तिस्तम्भ, हवेली, स्मारक छतरियां एवं देवल आदि भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। इन भवनों की स्थापत्य शैलियां क्षेत्रीय विशेषताएं लिए हुए हैं तथा इन पर मध्ययुगीन मुस्लिम कला का भी प्रभाव है।

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

खजुराहो मंदिर शैली

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खजुराहो मंदिर शैली

खजुराहो मंदिर शैली हिन्दू स्थापत्य कला का ही प्रमुख अंग है। इस शैली के मंदिर चंदेल राजपूत राजाओं के काल में खजुराहो में बनाए गए थे। इसलिए इसे खजुराहो मंदिर शैली कहा जाता है। इस शैली के मंदिर मुख्यतः दसवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच बने थे।

खजुराहो मंदिर शैली

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो प्राचीन एवं मध्य-कालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। इसे प्राचीन काल में खजूरपुरा और खजूर वाहिका कहा जाता था। यहाँ बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। खजुराहो मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन एवं मध्य-कालीन प्रस्तर-शिल्पियों एवं मूर्तिकारों ने खजुराहो के मंदिरों में हिन्दू तक्षणकला को सदियों के लिए सुरक्षित कर दिया। इन मंदिरों में भोग-विलास एवं काम-क्रीड़ा के विभिन्न दृश्यों को अत्यंत कौशल के साथ उत्कीर्ण किया गया है।

खजुराहो चन्देल साम्राज्य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक मध्य-काल के गुर्जर शासक थे। राजा चन्द्रवर्मन स्वयं को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण ई.950 से 1050 के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया।

कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड में चन्देल की उत्पत्ति का वर्णन किया है। राजा चन्द्रवर्मन ने कई युद्धों में विजय प्राप्त की। राजा चन्द्रवर्मन ने अपनी माता के कहने पर तालाबों और उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों का निर्माण करवाया। चन्द्रवर्मन के उत्तराधिकारियों ने भी खजुराहो में मंदिर निर्माण जारी रखा।

खजुराहो मंदिर शैली – पश्चिमी समूह

शिवसागर के निकट स्थित मंदिरों के एक विशाल समूह को पश्चिमी समूह कहा जाता है। यह खजुराहो के सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। इस मंदिर समूह का निर्माण ई.954 में हुआ। इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत ज्यादा सजावट की गई है जो चंदेल शासकों की संपन्नता और शक्ति को प्रकट करती है। मंदिरों में प्रदर्शित देवकुलों में शिव एवं विष्णु को दर्शाया गया है।

इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठ में विराजमान दिखाया गया है। चार फुट ऊंची विष्णु की इस प्रतिमा के तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह रूप में दर्शाए गए हैं। इस मंदिर के तल के बाएं हिस्से में जन-जीवन से सम्बन्धित क्रियाकलापों, कूच करती हुई सेना, घरेलू जीवन तथा नृतकों को दिखाया गया है।

मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक वेदियां हैं। इस मंदिर का सम्बन्ध तांत्रिक संप्रदाय से है। इसका अग्रभाग दो प्रकार की मूर्तिकलाओं से सजा है जिसके मध्य खंड में मिथुन या आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाया गया है। मंदिर के सामने दो लघु वेदियां हैं। एक देवी और दूसरी वराह देव को समर्पित है। विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर के एक ही खण्ड से बनी है।

कंदरिया महादेव मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता के लिए प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण चन्देल राजा विद्याधर ने ई.1050 में किया था। यह एक शैव मंदिर है। मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है।

मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहाँ मिथुनों की सर्वाधिक आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियों और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थी।

देवी जगदम्बा मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। यह मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण ई.1000 से 1025 के बीच हुआ। सैकड़ों वर्षों पश्चात इस मंदिर में छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई जिसके कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहाँ उत्कीर्ण मैथुन-मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।

सूर्य मंदिर (चित्रगुप्त मंदिर)

खजुराहो में स्थित सूर्य मंदिर को चित्रगुप्त मंदिर कहते हैं। यह मंदिर एक ही चबूतरे पर स्थित चौथा मंदिर है। इसका निर्माण भी राजा विद्याधर के काल में हुआ था। इसमें भगवान सूर्य की सात फुट ऊंची प्रतिमा कवच धारण किए हुए स्थापित है। भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। एक मूर्तिकार को काम करते हुए कुर्सी पर बैठे दिखाया गया है। दक्षिण की दीवार पर ग्यारह सिर वाली विष्णु प्रतिमा स्थापित है।

विश्वनाथ मन्दिर

शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण विश्वनाथ मंदिर का निर्माण ई.1002-03 में हुआ। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदर है। पंचायतन शैली का संधार प्रासाद भगवान शिव को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ ही नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है।

अन्य मंदिर

लक्ष्मण मंदिर के सामने लक्ष्मी मंदिर स्थित है तथा कंदरिया महादेव मंदिर और देवी जगदम्बा मंदिर के बीच सिंह मंदिर बना हुआ है। बगीचे के रास्ते में पूर्व की ओर पार्वती मंदिर स्थित है। यह एक छोटा-सा मंदिर है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह द्वारा ई.1843-से 1847 के बीच बनवाया गया था।

इसमें देवी पार्वती को एक गोह पर आरूढ़ दिखाया गया है। पार्वती मंदिर के दायीं तरफ विश्वनाथ मंदिर है जो खजुराहो का विशालतम मंदिर है। यह मंदिर  भगवान शंकर को समर्पित है। यह मंदिर राजा धंग द्वारा ई.999 में बनवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर चिट्ठियां लिखती अप्सराओं एवं संगीत सभाओं के दृश्य अंकित किए गए हैं। विश्वनाथ मंदिर के सामने नन्दी मंदिर स्थित है।

खजुराहो मंदिर शैली – पूर्वी समूह

पूर्वी समूह के मंदिरों को दो विषम समूहों में बांटा गया है। इस श्रेणी के प्रथम चार मंदिरों का समूह प्राचीन खजुराहो गांव के निकट है। दूसरे समूह में जैन मंदिर हैं जो गांव के स्कूल के पीछे स्थित हैं। हिन्दू मंदिर पुराने गांव के दूसरे छोर पर घंटाई मंदिर स्थित है जिसके निकट वामन मंदिर, जायरी मंदिर और ब्रह्मा मंदिर स्थित हैं।

वामन मंदिर का निर्माण ई.1050 से 1075 के बीच किया गया। जबकि जायरी मंदिर का निर्माण ई.1075-से 1100 के बीच हुआ। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। ब्रह्मा मंदिर की स्थापना ई.925 में हुई। इस मंदिर में चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर का सम्बन्ध ब्रह्मा से न होकर भगवान शिव से है।

जैन मंदिर

जैन मंदिरों का समूह एक अलग परिसर में स्थित है। ये दिगम्बर सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं। इस समूह का सबसे विशाल मंदिर तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित हैं जो कि पार्श्वनाथ मंदिर के उत्तर में स्थित है। जैन समूह का अन्तिम शान्तिनाथ मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर में यक्ष दम्पत्ति की आकर्षक मूर्तियाँ हैं।

खजुराहो मंदिर शैली – दक्षिणी समूह

इस भाग में दो मंदिर हैं। एक भगवान शिव को समर्पित दुलादेव मंदिर है और दूसरा विष्णु को समर्पित चतुर्भुज मंदिर है। दुलादेव मंदिर खुद्दर नदी के किनारे स्थित है। इसे ई.1130 में राजा मदनवर्मन ने बनवाया था। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण ई.1100 में किया गया था। इसके गर्भगृह में 9 फुट ऊंची भगवान विष्णु की प्रतिमा को संत-वेश में दिखाया गया है। इस समूह के मंदिर को देखने लिए दोपहर का समय उत्तम माना जाता है। दोपहर में पड़ने वाली सूर्य-किरणें इन मूर्तियों को आकर्षक बनाती हैं।

चतुर्भुज मंदिर

यह निरधार प्रकार का विष्णु मंदिर जटकारा ग्राम से आधा किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। इसमें अर्धमण्डप, मण्डप, संकीर्ण अंतराल के साथ-साथ गर्भगृह है। मंदिर की योजना सप्ररथ है। इस मंदिर का निर्माणकाल जवारी तथा दुलादेव मंदिर के निर्माणकाल के मध्य माना जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित खजुराहो का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव दिखाई देता है।

इस मंदिर की शिल्प कला अवनति का संकेत करती है। मूर्तियों के आभूषण का रेखांकन तो हुआ है किंतु उनका  सूक्ष्म अंकन अपूर्ण छोड़ दिया है। मंदिर की दीवारों पर बनी पशु-प्रतिमाएँ भी अपरिष्कृत अरुचिकर हैं। अप्सराओं सहित अन्य शिल्प विधान रूढ़िगत हैं, जिनमें सजीवता और भावाभिव्यक्ति का अभाव है। विद्याधरों का अंकन आकर्षक मुद्राओं में किया गया है।

यह मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के आधार पर सबसे बाद में निर्मित दुल्हादेव के निकट माना जाता है। चतुर्भुज मंदिर के द्वार के शार्दूल सर्पिल प्रकार के हैं। कुछ सुर-सुंदरियाँ अधबनी ही छोड़ दी गयी हैं। मंदिर की अधिकांश अप्सराएँ और कुछ देव दोहरी मेखला धारण किए हुए हैं। मंदिर की रथिकाओं के अर्धस्तंभ वर्तुलाकार हैं।

दुल्हादेव मन्दिर: यह मूलतः शिव मंदिर है। इसको कुछ इतिहासकार कुंवरनाथ मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माणकाल लगभग ई.1000 है। यह मंदिर प्रतिमा वर्गीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। निरंधार प्रासाद प्रकृति का यह मंदिर अपनी नींव योजना में समन्वित प्रकृति का है। मंदिर सुंदर प्रतिमाओं से सुसज्जित है। गंगा की चतुर्भुज प्रतिमा अत्यंत सुंदर है। मंदिर के भीतरी एवं बाहरी भाग में अनेक प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं जिनकी भावभंगिमाएँ सुंदर तथा उद्दीपक हैं। नारियों, अप्सराओं एवं मिथुनरत युगलों की प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में बनाई गई हैं।

मंदिर के पत्थरों पर ‘वसल’ नामक कलाकार का नाम अंकित है। मंदिर के वितान गोलाकार तथा स्तंभ अलंकृत हैं। नृत्य मुद्रा वाली प्रतिमाएं सुंदर एवं आकर्षक हैं। मंदिर के गर्भगृह में योनि-वेदिका पर शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के बाहर तीन पट्टियों पर मूर्तियाँ अंकित हैं। यहाँ हाथी, घोड़े, योद्धा और सामान्य जीवन के दृश्य उत्कीर्ण हैं। अप्सराएं स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं निर्बाध जीवन का प्रतीक मालूम पड़ती हैं। अप्सरा टोड़ों में अप्साओं को दो-दो, तीन-तीन की टोली में दर्शाया गया है।

मंदिर, मण्डप, महामण्डप तथा मुखमंडप युक्त है। मुखमण्डप भाग में गणेश और वीरभद्र की प्रतिमाएँ अपनी रथिकाओं से झांकती हुई प्रतीत होती हैं। विद्याधर और अप्सराएँ गतिशील जान पड़ते हैं परन्तु प्रतिमाओं पर अलंकरण का भार अधिक दिखाई देता है। अष्टवसु मगरमुखी है। यम तथा नऋत्ति की केश सज्जा परंपराओं से पृथक है एवं पंखाकार है।

मंदिर की जगती उँची है तथा सुंदर एवं दर्शनीय है। जंघा पर प्रतिमाओं की पंक्तियाँ स्थापित की गई हैं। प्रस्तर पर पत्रक सज्जा भी है। छज्जों को देवी-देवता, दिग्पाल, अप्सराओं, मानव युगलों एवं मिथुन-युगलों से सजाया गया है। भद्रों के छज्जों पर रथिकाएँ हैं। वहाँ देव प्रतिमाएँ भी उतकीर्ण हैं। दक्षिणी भद्र के कक्ष-कूट पर गुरु-शिष्य की प्रतिमा अंकित की गई है।

शिखर सप्तरथ मूल मंजरी युक्त है। इसे भूमि-आमलकों से सुसज्जित किया गया है। उरुः श्रृंगों में से दो सप्तरथ तथा एक पंचरथ प्रकृति का है। शिखर के प्रतिरथों पर शृंग हैं, किनारे की नंदिकाओं पर दो-दो शृंग हैं तथा प्रत्येक करणरथ पर तीन-तीन शृंग हैं। शृंग सम आकार के हैं। अंतराल भाग का पूर्वी मुख का अग्रभाग सुरक्षित है जिसपर नौं रथिकाएँ बनाई गई हैं, नीचे से ऊपर की ओर उद्गमों की चार पंक्तियाँ हैं।

आठ रथिकाओं पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं। स्तंभ शाखा पर तीन रथिकाएँ हैं, जिन पर शिव प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं, जो परंपरा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु से घिरी हुई हैं। भूतनायक प्रतिमा शिव प्रतिमाओं के नीचे हैं, जबकि विश्रांति भाग में नवग्रह प्रतिमाएँ खड़ी मुद्रा में हैं। इस स्तंभ शाखा पर जल-देवियाँ त्रिभंगी मुद्राओं में हैं।

मगर और कछुआ अंकित किये गये हैं। मुख्य प्रतिमाएँ गंगा-यमुना की प्रतीक मानी जाती है। एक प्रतिमा महाकाल की भी है, जो खप्पर युक्त है। मंदिर के बाहरी भाग की रथिकाओं में दक्षिणी मुख पर नृत्य-मुद्रा में छः भुजायुक्त भैरव, बारह भुजायुक्त शिव तथा एक अन्य रथिका में त्रिमुखी दश भुजायुक्त शिव प्रतिमा है।

इसकी दीवार पर बारह भुजा युक्त नटराज, चतुर्भुज, हरिहर, उत्तरी मुख पर बारह भुजा युक्त शिव, अष्ट भुजा युक्त विष्णु, दश भुजा युक्त चामुंडा, गजेंद्र-मोक्ष रूप में चतुर्भुज विष्णु तथा शिव-पार्वती युग्म मुद्रा में हैं। पश्चिमी मुख पर चतुर्भुज नग्न नऋति, वरुण, वृषभमुखी वसु की दो प्रतिमाएँ हैं। उत्तरी मुख पर वायु की भग्न प्रतिमा के अतिरिक्त वृषभमुखी वसु की तीन तथा चतुर्भुज कुबेर एवं ईशान की एक-एक प्रतिमा उत्कीर्ण है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

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कलिंग मंदिर शैली

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कोणार्क का सूर्यमंदिर : कलिंग मंदिर शैली

उड़ीसा का स्थापत्य प्राचीनकाल में विकसित कलिंग वास्तुकला शैली में निर्मित है। उड़ीसा के मंदिर कलिंग मंदिर शैली के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

कोणार्क का सूर्य मंदिर

कोणार्क का सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी ईस्वी में गंगा राजवंश के राजा नरसिंघेव (प्रथम) ने बनवाया था। यह कलिंग शैली में बना है तथा भगवान बिरंचि-नारायण (सूर्य) को समर्पित है। कोणार्क शब्द, कोण और अर्क शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा।

प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है। इसे ई.1236-54 में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया। यह मन्दिर, भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। कलिंग शैली में निर्मित इस मन्दिर में सूर्य देव को रथ में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है।

मन्दिर को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। वर्तमान में केवल एक घोड़ा बचा है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को व्यक्त करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है।

इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मण्डप में जहाँ मूर्ति थी, अंग्रेज़ों ने सभी द्वारों को रेत एवं पत्थर भरवा कर बंद करवा दिया था ताकि मन्दिर और क्षतिग्रस्त नहीं हो। मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं- (1.) बाल्यावस्था-उदित सूर्य – 8 फुट, (2.) युवावस्था-मध्याह्न सूर्य – 9.5 फुट, (3.) प्रौढ़ावस्था-अपराह्न सूर्य- 3.5 फुट।

प्रवेश-द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रमण के लिए तत्पर दिखाये गए हैं। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये 28 टन की 8.4 फुट लम्बी, 4.9 फुट चौड़ी तथा 9.2 फुट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार किया है।

ये 10 फुट लम्बे एवं 7 फुट चौड़े हैं। मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके प्रवेश द्वार पर नट मंदिर है। यहाँ मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करतीं थीं। मंदिर में फूल, बेल और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की प्रतिमाएं भी एन्द्रिक मुद्राओं में प्रदर्शित की गई हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं और कामसूत्र से लीं गई हैं।

मंदिर लगभग खंडहर हो चुका है। यहाँ की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मन्दिर के बारे में लिखा है-‘कोणार्क जहाँ पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।’

यह सूर्य मन्दिर भारतीय मन्दिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी संरचना) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से भिन्न नहीं लगता है। 229 फुट ऊंचा मुख्य गर्भगृह 128 फुट ऊंची नाट्यशाला के साथ बना है।

इसमें बाहर को निकली हुई अनेक प्रतिमाएं हैं। मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फुट गुणा 540 फुट आकार का है। मंदिर पूर्व-पश्चिम दिशा में बना है।

जगन्नाथ मंदिर: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन काल की है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य देव की प्रतिमा स्थापित है तथा गर्भगृह के ऊपर ऊंचा शिखर बना हुआ है। उसके चारों ओर सहायक शिखर हैं। मंदिर परिसर एक दीवार से घिरा हुआ है, जिसमें से प्रत्येक तरफ एक द्वार है, जिसके ऊपर एक पिरामिड-आकार की छत है। राज्य में सबसे बड़ा मंदिर होने के कारण, इसमें रसोईघर सहित दर्जनों सहायक भवन स्थित हैं। मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातुओं के मिश्रण से बना एक पहिया है।

कलिंग मंदिर शैली का मुक्तेश्वर मंदिर

यह छोटा मंदिर 10.5 मीटर ऊंचा है। इसके बाहरी हिस्सों पर मूर्तियों का अंकन किया गया है जिनमें देवी-देवताओं के साथ पौराणिक दृश्य भी दर्शाए गए हैं। मंदिर का तोरण द्वारा नक्काशीदार युक्त है। सभा भवन की छत में प्रत्येक पंखुड़ी पर मूर्ति के साथ एक अष्ट-दल कमल की सुंदर चंदवा बनाई गई है।

कलिंग मंदिर शैली का लिंगराज मंदिर

भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर 12वीं सदी में बना। यह मंदिर उड़ीसा की स्थापत्य कला का चरम माना जाता है। इसकी ऊँचाई 150 फुट है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है।

राजारानी मंदिर

भुवनेश्वर के राजारानी मंदिर का निर्माण ई.1000 के आसपास हुआ। इस मंदिर ने मध्य भारत के अन्य मंदिरों के वास्तुकला के विकास के लिए विशेष रूप से खजुराहो के मंदिरों का मार्गदर्शन किया। अप्सराओं और मिथुन मूर्तियों की कामुक नक्काशी के कारण प्रेम मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

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कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

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हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में है। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ दुर्ग का राजा होता है। अर्थात् ऋग्वैदिक काल में भी भारतीयों को दुर्ग बनाने एवं उसमें रहने के महत्व का ज्ञान था।

‘दुः’ का तात्पर्य दुष्कर (कठिन) से है तथा ‘ग’ का तात्पर्य गमन करने से है। अर्थात् दुर्ग का तात्पर्य उस रचना से है जिस तक गमन करना कठिन होता है। दुर्ग से ही दुर्गम बना है। अतः कहा जा सकता है कि ‘दुर्ग’ स्थापत्य की वह रचना है जो शत्रु से सुरक्षा तथा युद्ध के लिये विशेष रूप से तैयार की गई हो।

सामान्य शब्दों में कहें तो जिस भवन अथवा भवन-समूह के चारों ओर ‘प्राकार’ (प्राचीर अथवा परकोटा) हो, जिसमें सैनिक सन्नद्ध हों, जिसकी प्राचीर पर युद्ध उपकरण लगे हों, जिसमें शत्रु आसानी से प्रवेश न कर सके, जिसका मार्ग दुर्गम हो, शत्रु जिसमें प्रवेश करके भी राजा तक न पहुँच पाये, आदि गुणों से युक्त भवन को दुर्ग कहा जा सकता है।

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक दुर्ग में ये सभी गुण हों। सामान्यतः वह भवन जिसके चारों ओर सुदृढ़ एवं ऊँचा परकोटा हो, दुर्ग कहा जा सकता है। मानव जाति ने दुर्ग अथवा दुर्ग की तरह का परिघा (प्राकार अथवा परकोटा) तथा परिखा (खाई) से युक्त आवासीय बस्तियों की रचना करने की कला मध्य-पाषाण काल में ही सीख ली थी ताकि वह वन्य पशुओं तथा अचानक आक्रमण करने वाले शत्रुओं से अपनी और अपने समूह की रक्षा कर सके।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, प्राकार निर्माण मानव सभ्यता की आवश्यकता बन गया। जब ‘राज्य’ नामक व्यवस्था आरम्भ हुई तो राजा के लिये दुर्ग का निर्माण करना आवश्यक हो गया। ऋग्वेद में दुर्ग अथवा पुर के कई उदाहरण मिलते हैं। उस काल में दुर्ग चौड़े (पृथ्वी), विस्तृत (उर्वी) और और आयस (लौहवर्ण) होते थे और उनके अंदर विस्तृत क्षेत्र होता था-

वि दुर्गा वि द्विषः पुरा घ्नंति राजान् एषाम्। नयंति दुरिता तिरः।

रामायण काल के आते-आते हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के सिद्धांतों में काफी उन्नति हो गई। रामायण में चार प्रकार के किलों का वर्णन आता है। शुक्रनीति में राज्य के सात अंग- राजा, मंत्री, सुहृत, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना बताए गए हैं। अर्थात् इन सात चीजों के होने पर ही राज्य स्थापित हो सकता था। शुक्रनीति में दुर्ग को राज्य का हाथ और पैर कहा गया है-

दृग मांत्यं सुहच्छोत्रं मुखं कोशो बलं मनः

हस्तौ पादौ दुर्गे राष्ट्रे राज्यांगानि स्मृतानि हि।।

मनुस्मृति में कहा गया है कि दुर्ग में स्थित एक धनुर्धारी, दुर्ग से बाहर खड़े सौ योद्धाओं का सामना कर सकता है तथा दुर्ग में स्थित सौ धनुर्धारी, दस हजार सैनिकों से युद्ध कर सकते हैं-

एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।

शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्ग विधीयते।।

आगे चलकर जब जनपदों, महाजनपदों एवं चक्रवर्ती साम्राज्यों की स्थापना हुई तो एक-एक सम्राट के अधीन कई-कई दुर्ग होने लगे तथा हिन्दू दुर्ग स्थापत्य में भी परिवर्तन आने लगे। सम्राट अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये दुर्गों की विशाल शृंखला खड़ी करने लगे। ये दुर्ग-शृंखलाएं बड़े-बड़े साम्राज्यों का आधार बन गईं। यही कारण है कि राजा, महाराजा, सामंत, ठिकानेदार तथा सेनापतियों ने अपनी तथा अपने राज्य अथवा क्षेत्र की सुरक्षा के लिये विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण करवाया।

समय के साथ, दुर्ग के स्थापत्य एवं शिल्प में विकास होता गया और दुर्गों की रचना जटिल होती चली गई। दुर्ग का प्राकार दोहरा और कहीं-कहीं तो तिहारा भी हो गया। भरतपुर के दुर्ग में दुर्ग-प्राचीर के बाहर मिट्टी की प्राचीर बनवाई गई थी ताकि तोप के गोले मिट्टी की दीवार में धंस जायें और दुर्ग का वास्तविक प्राकार सुरक्षित रह सके। दुर्ग के चारों ओर खाई खोदकर उसमें पानी भरने की व्यवस्था की गई ताकि शत्रु आसानी से दुर्ग की प्राचीर तक नहीं पहुँच सके।

भारत के अनेक प्राचीन ग्रंथों में हिन्दू दुर्ग स्थापत्य सम्बन्धी विवेचन किया गया है जिनमें शुक्रनीति, नरपति जयचर्चा, मनुस्मृति, विष्णुधर्म सूत्र, नीति वाक्यामृत, याज्ञवलक्य स्मृति आदि प्रमुख हैं। वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मत्स्य पुराण, श्रीमद्भागवत् पुराण आदि में भी विभिन्न दुर्गों के सम्बन्ध में संदर्भ आए हैं।

मत्स्य पुराण में दुर्ग निर्माण की विधि तथा राज्य द्वारा दुर्ग के संगृहीत उपकरणों के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण दिया गया है। महाभारत में छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु स्मृति में भी छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु ने गिरि दुर्ग को अधिक गुणों वाला बताया है, इसमें नाना प्रयत्नों से शत्रु का संहार किया जा सकता है-

सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत्।

एषां हि बहुगुण्येन गिरिदुर्ग विशिष्यते।

मौर्य कालीन सुप्रसिद्ध लेखक कौटिल्य ने दुर्गों की चार प्रमुख कोटियां निर्धारित की हैं- औदुक, पार्वत, धान्वन तथा वन दुर्ग। शुक्रनीति में नौ तरह के दुर्ग- एरण दुर्ग, पारिख दुर्ग, पारिघ दुर्ग, वन दुर्ग, धन्व दुर्ग, जल दुर्ग, गिरि दुर्ग, सैन्य दुर्ग तथा सहाय दुर्ग बताये गए हैं। नरपति जयाचार्य ने आठ प्रकार के दुर्ग बताये हैं। विष्णुधर्मसूत्र में दुर्गों के छः प्रकार इस प्रकार बताये हैं-

(1.) धन्व दुर्ग: जलविहीन, खुली भूमि पर पांच योजन के घेरे में।

(2.) महीदुर्ग: प्रस्तर खण्डों या ईंटों से निर्मित प्राकारों वाला।

(3.) वार्क्ष दुर्ग: जो चारों ओर से एक योजन तक कंटीले एवं लम्बे वृक्षों, कंटीले लता गुल्मों एवं झाड़ियों से युक्त हो।

(4.) जल दुर्ग: चारों ओर जल से आवृत्त।

(5.) नृदुर्ग: जो चारों ओर से चतुरंगिणी सेना से सुरक्षित हो।

(6.) गिरि दुर्ग: पहाड़ों वाला दुर्ग जिस पर कठिनाई से चढ़ा जा सके और जिसमें केवल एक ही संकीर्ण मार्ग हो।

किला और गढ़ सामान्यतः एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं, किंतु वस्तुतः इनमें थोड़ा अंतर है। किला पहाड़ी पर बनाया जाता है, जबकि गढ़ का निर्माण भूमि पर होता है। दोनों के चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर बनाई जाती थी किंतु गढ़ चूंकि भूमि पर निर्मित होता है, अतः उसके चारों ओर खाई भी खोदी जाती थी।

धीरे-धीरे गढ़ और किले का अंतर लुप्त हो गया और वर्तमान में गढ़, किला, अरसाल, कोट, बरण, आसेद तथा दुर्ग समान अर्थ वाले प्रतीत होते हैं। दुर्ग मूलतः राज्य की सुदृढ़ता एवं सामरिक-शक्ति का प्रतीक माना जाता था। दुर्ग के निर्माण का बुनियादी सिद्धांत प्रायः एक समान रहा है- चारों ओर ऊँचे परकोटे, मजबूत दरवाजे, बुर्ज, कंगूरे, घुमावदार मार्ग इत्यादि।

संस्कृत साहित्य में गढ़ की रचना के संदर्भ में ‘कपिशीश’ नामक एक संरचना का उल्लेख मिलता है। बाद में इन्हें जीवरखा एवं अंगरखा भी कहा जाना लगा। जीवरखा, टेढ़-मेढ़े ढलान युक्त मार्गों पर बनाया गया एक छोटा गढ़ होता था जिसमें सैनिक रखे जाते थे। दुर्ग के ऊपर चार-पांच अश्वों के एक साथ चल सकने योग्य चौड़ी प्राचीर बनाई जाती थी इन्हीं पर घुमटियों के रूप में जीवरखे अथवा अंगरखे बनाये जाते थे।

यहाँ से दुर्गरक्षक सैनिक, आक्रांता सैनिकों पर तीर, गर्म तेल, पत्थर आदि फैंकते थे। जब तोपों का प्रचलन हो गया तो प्राचीर के ऊपरी हिस्से में मोखे बनाये जाने लगे जिनमें तोपों के मुंह खुलते थे। दुर्ग की प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसके बीच-बीच में गोलाकार बुर्ज बनाई जाने लगी जो भीतर से पोली होती थी। यह एक प्रकार से कपिशीश का ही परिष्कृत रूप थी।

इसके भीतर सैनिक एवं युद्ध सामग्री संगृहीत की जाती थी। दुर्ग में स्थित राजा अथवा सम्राट के आवास तक पहुँचने के लिये एक से अधिक संख्या में दरवाजों का निर्माण होता था जिन्हें पोल कहते थे। इन पोलों पर सैनिकों का कड़ा पहरा रहता था। पूर्व की तरफ का दरवाजा सूरजपोल, पश्चिम की ओर का चांदपोल तथा उत्तर की ओर का धु्रवपोल कहलाता था।

दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर फैंकने के यंत्र लगाये जाते थे। यह चड़स जैसा यंत्र होता था जिसके माध्यम से पत्थर के गोले दूर तक फैंके जा सकते थे। इन यंत्रों का आविष्कार मनुष्य द्वारा उत्तर-वैदिक-काल में कर लिया गया था। इन्हें, ढेंकुली, नालि, भैंरोयंत्र तथा मरकटी यंत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। इन यंत्रों का उपयोग सोलहवीं शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् तब तक होता रहा जब तक कि भारतीय शासकों को तोपें और बंदूकें प्राप्त नहीं हो गईं।

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के सिद्धांतों पर बने किलों को तोड़ना अत्यंत कठिन होता था। मुगलों ने हिन्दू किलों को तोड़ने में मुख्यतः तीन प्रकार की रचनाएं काम में लीं- पाशीब, साबात तथा बारूद। किले की प्राचीर के बाहर किले की ऊंचाई तक मिट्टी तथा पत्थरों की सहायता से चबूतरा बनाया जाता था जिसे पाशीब कहते थे। पाशीब का निर्माण सरल नहीं था क्योंकि पाशीब बनाने वाले शिल्पियों एवं सैनिकों पर दुर्ग की प्राचीर से पत्थर के गोले एवं तीर बरसाये जाते थे। उन्हें सुरक्षा देने के लिये साबात बनाये जाते थे।

साबात गाय, बैल, भैंस या भैंसे आदि पशुओं के मोटे चमड़े की छावन को कहते थे। किले से बरसने वाले पत्थरों एवं तीरों की मार से बचने के लिये मोटे चमड़े की लम्बी छत बनाई जाती थी जिसके नीचे रहकर सैनिक दुर्ग की दीवार तक पहुँच जाते थे तथा दुर्ग की नींव एवं दीवारों में बारूद भरकर उसमें विस्फोट करते थे। अकबर ने चित्तौड़ के किले को तोड़ने के लिये ये तीनों तरीके काम में लिए थे।

दुर्ग के भीतर सम्पूर्ण नगर बसाने, खेती करने एवं पशु पालन करने की भी परम्परा थी ताकि यदि दुर्ग को शत्रु द्वारा घेर लिया जाये तो लम्बे समय तक दुर्ग के भीतर खाद्य एवं अन्य जीवनोपयोगी सामग्री की उपलब्धता बनी रह सके।

चित्तौड़ दुर्ग, रणथंभौर दुर्ग, जालोर दुर्ग तथा सिवाना दुर्ग सहित अनेक किलों पर मुसलमान शासकों ने कई-कई वर्ष लम्बे घेरे डाले किंतु दुर्ग के भीतर की स्वावलम्बी व्यवस्था के कारण वे दुर्ग पर तभी विजय प्राप्त कर सके जब या तो दुर्ग के भीतर रसद सामग्री समाप्त हो गई या किसी अपने ने दुर्ग के गुप्त-मार्गों के भेद, आक्रमणकारी को दे दिये। जालोर, सिवाना, रणथंभौर, जैसलमेर आदि दुर्गों का पतन ऐसे ही धोखों से हुआ था।

राज-प्रासादों का स्थापत्य

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य में राज-प्रासादों का एक विशिष्ट रूप दिखाई देता है। नगर-निर्माण में अथवा दुर्ग-निर्माण में राज-प्रासाद का होना अनिवार्य माना जाता था। प्रसिद्ध शिल्पी मण्डन ने राजप्रासाद बनाने का स्थान या तो नगर के बीच में या नगर के एक कोने में ऊँचे स्थान पर ठीक माना है। राजप्रासादों के निर्माण में जो भव्यता को प्रधानता दी गयी वह राजपूत शासकों की बढ़ती हुई शक्ति को प्रदर्शित करती है।

राज-प्रासादों में जनानी ड्योढ़ी एवं मर्दानी ड्योढ़ी, अनिवार्यतः बनायी जाती थीं तथा दोनों को सुगम मार्ग से जोड़ा जाता था। मर्दानी ड्योढ़ी में दरबार लगाने, आम जनता तथा दरबारियों से मिलने, राजकुमारों के निवास आदि की व्यवस्था होती थी।

जनानी ड्योढ़ी में राजपरिवार की महिलाओं के निवास व रसोड़े आदि की व्यवस्था होती थीं। राजप्रासाद के इन समस्त अंगों को जोड़कर एक पूर्ण इकाई का रूप दिया जाता था तथा दुर्ग-स्थापत्य के समान बुर्ज आदि भी बनवाये जाते थे। राजपूत शासकों के राज-प्रासादों के स्थापत्य में बहुत साम्य पाया जाता है।

मुगलों से सम्पर्क स्थापित होने के बाद राज-प्रासादों को चमक-दमक वाले बनाने का क्रम आरम्भ हो गया। उनमें फव्वारे, छोटे उद्यान, पतले खम्भे और उन पर बेल-बूटों की नक्काशी तथा संगमरमर का प्रयोग होने लगा। राजप्रासादों का अलंकरण विशेष रूप से आरम्भ हुआ। बारीक खुदाई, नक्काशी, अलंकृत छज्जे,गवाक्ष आदि राजस्थानीय राजप्रासादों की अपनी विशेषता रही है।

उदयपुर के अमरसिंह महल, पिछोला झील में स्थित जगनिवास और जगमन्दिर, जोधपुर दुर्ग में स्थित फूल महल, आमेर व जयपुर में दीवाने आम व दीवाने खास, बीकानेर में रंगमहल, शीशमहल व अनूप महल आदि में राजपूत स्थापत्य की प्रधानता होते हुए भी सजावट में मुगल शैली अपनायी गयी है।

ज्यों-ज्यों राजपूत शासक एवं सामन्त मुगल दरबार में अधिकाधिक जाने लगे, उनमें मुगलों के वैभव के अनुरूप स्थापत्य में रुचि बढ़ने लगी। मुगलों के पतन के बाद मुगल-आश्रित अनेक शिल्पकारों के परिवारों को राजपूत शासकों ने आश्रय दिया। इनके द्वारा न केवल शासकों के महलों के स्थापत्य में, अपितु सामन्तों के राज-प्रासादों में भी मुगल शैली प्रगति करने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हिन्दू जल स्थापत्य - रानी की बाव गुजरात

हिन्दू जल स्थापत्य अथवा जल संग्रहण स्रोतों की स्थापत्य कला अत्यंत प्राचीन काल से ही उन्नत दशा में थी। भारत में जल को देवता के रूप में सम्मान दिया जाता था और जल की पूजा की जाती थी इसलिए जलाशयों को तीर्थ की तरह पवित्र बनाया जाता था।

भारत में सार्वजनिक उपयोग हेतु कुओं, तालाबों, बावड़ियों एवं अन्य प्रकार के जलाशयों के निर्माण की सुदीर्घ परम्परा रही है। ऋग्वेद में पुष्करिणी (तालाब) का उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद का यह उल्लेख हिन्दू जल स्थापत्य का संसार भर में सबसे पहला लिखित उल्लेख है। शांखायनगृह्यसूत्र, अपरार्क, हेमाद्रि, दानक्रिया कौमुदी, जलाशयोत्सर्गतत्व, प्रतिष्ठामयूख, उत्सर्गमयूख, राजधर्म कौस्तुभ आदि ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के कूप, तालाब एवं जलाशयों को खुदवाने एवं उनकी प्रतिष्ठा करवाने की विधि लिखी है।

विष्णुधर्मसूत्र में कहा गया है कि जो व्यक्ति जनहित के लिए कूप खुदवाता है, उसके आधे पाप उसमें पानी निकालने के समय नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति तालाब खुदवाता है वह सदा निष्पाप रहता है एवं वरुण लोक में निवास करता है। जनकल्याण हेतु खुदवाए गए जलाशय चार प्रकार के होते हैं- कूप, वापी, पुष्करिणी एवं तड़ाग्। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि चतुर्भुजाकार या वृत्ताकार होने से कूप का व्यास 5 हाथ से 50 हाथ तक हो सकता है।

इसमें साधारणतः पानी तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां नहीं होतीं। वापी वह कूप है जिसमें चारों ओर से अथवा तीन अथवा दो अथवा एक ओर से जल तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां बनी होती हैं तथा जिसका मुख 50 से 100 हाथ तक हो। पुष्करिणी 100 से 200 हाथ व्यास की होती है। तड़ाग 200 से 300 हाथ लम्बा होता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार वापी 10 कुओं के बराबर एवं हृद (गहरा जलाशय) 10 वापियों के बराबर होता है। एक पुत्र 10 हृदों के बराबर एवं एक वृक्ष 100 पुत्रों के बराबर होता है। वसिष्ठ संहिता के अनुसार पुष्करिणी 400 हाथ लम्बी और तड़ाग उसका 5 गुना बड़ा होता है। मिताक्षरा के अनुसार तड़ागों की सुरक्षा के लिए बने नियमों की पालना करना राजा का कर्त्तव्य है।

विवादरत्नाकर के अनुसार जब कोई व्यक्ति वाटिका, कूप, बांध, जलाशय को तोड़ दे तो उनका जीर्णोद्धार होना चाहिए तथा अपराधी को 800 पणों का दण्ड मिलना चाहिए।

हिन्दू जल स्थापत्य : वापी एवं रहट

भारत में रहट (जलपात्रों के चक्र से युक्त कुंआ) और बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) का निर्माण अत्यंत प्राचीन काल से होता था। वासुदेव शरण अग्रवाल का अनुमान है कि रहट और बावड़ी, दो विशेष प्रकार के कुएं शकों द्वारा भारत में लाये गये। बावड़ी के लिये प्राचीन नाम शकन्धु (शक देश का कुंआ) और रहट के लिये कर्कन्धु  थे।

बाण ने भी हर्षचरित में रहट का उल्लेख किया है। राजस्थान के प्राचीन शिलालेखों में उल्लेखित अरहट्ट भी इसी का द्योतक है। संभव है कि राजस्थान में वापी और रहट दोनों ही विदेशी सम्पर्क के कारण प्रचलित हुए हों।

जयपुर क्षेत्र में नगर नामक प्राचीन स्थल के विक्रम संवत् 741 (ई.684) के शिलालेख में एक वापी निर्माण का श्रेय मारवाड़ भीनमाल के कुशल शिल्पियों को दिया गया है और उन वास्तुविद्या विशारद सूत्रधारों की पर्याप्त प्रशंसा की गई है कि वे तो वास्तुविद्या के प्रगाढ़ पण्डित थे। सातवीं शती की यह वापी आज तक ज्ञात प्राचीनतम वापी है।

कुछ वर्ष पूर्व तक मृदभाण्डों वाले रहटों का राजस्थान के कुछ भागों में प्रयोग किया जाता रहा है और यही स्थिति बैलगाड़ी की भी है। भीनमाल में मध्य-कालीन, आयताकार वापी चण्डीनाथ मंदिर में आज भी स्थित है इसमें पूर्वमध्य-युगीन दो स्तंभ जडे़ हैं। भीनमान के वास्तुकारों का वापी निर्माण कला में अत्यन्त दक्ष होना इसी बात को इंगित करता है कि शकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया और उनके साथ आई वास्तुकला को सीखकर यहाँ के शिल्पी उस विद्या में पारंगत हुए जिन्हें वापी निर्माण हेतु दूर-दूर तक बुलाया जाता था। 

परमार शासक पूर्णपाल के वि.सं.1102 (ई.1045) के भडुण्ड अभिलेख के अनुसार पूर्णपाल के शासनकाल में 22 ब्राह्मण और 1 क्षत्रिय द्वारा एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया। अभिलेख के अनुसार भडुण्ड गांव के ब्राह्मणों ने संसार की असारता का अनुभव करते हुए सज्जनों और साधुओं के हृदयों को आनंदित करने वाली सुंदर वापी बनवाई।

रानी की वाव

गुजरात के पाटण में रानी की वाव नामक एक प्राचीन वापिका अथवा बावड़ी है। इसे ई.1063 में चौलुक्य राजा भीमदेव (प्रथम) की रानी उदयामति ने बनवाया था। इस सीढ़ी युक्‍त बावड़ी में किसी समय सरस्वती नदी का जल आता था। यह वापिका 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। यह संसार भर में अपनी तरह की अकेली वापिका है।

रानी की वाव के स्तम्भ चौलुक्य कालीन वास्तुकला के अनुपम उदाहरण हैं। वापिका की भीतरी दीवारों और स्तंभों पर भगवान विष्णु के दशावतारों, राम, वामन, कल्कि तथा महिषासुरमर्दिनी आदि की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।

यह बावड़ी सात मंजिला है तथा मारू-गुर्जर शैली में बनी है। जब सरस्वती नदी का जल कम पड़ने लगा तब यह बावड़ी जल के साथ आई गाद (मिट्टी) से भर गई। धीरे-धीरे यह मिट्टी में दब गई और लोग इसके बारे में भूल गए। भारतीय पुरातत्व सर्वे ने इस बावड़ी को खोजकर उसका उद्धार किया।

राजपूत काल में हिन्दू जल स्थापत्य

न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में जल संग्रहण की सुदीर्घ  परम्परा रही है। इस कड़ी की मजबूती सिर्फ शासकों पर नहीं छोड़ी गई थी अपितु समाज के वे अंग जो आज भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर माने जाते हैं, बंध-बंधा, ताल-तलाई, जोहड़-जोहड़ी, नाडी, तालाब, सरवर, सर, झील, देईबंध, डहरी, खडीन आदि बनाते थे।

राजपूत स्थापत्य शैली में बने जलाशयों पर कलात्मक भित्तियों एवं घाटों का निर्माण करवाया जाता था जिनके ऊपरी भाग में छतरियाँ बनी रहती थीं। जलाशय के निकट एक कलात्मक स्तम्भ लगाया जाता था जिसके ऊपरी भाग में शिखर बना रहता था और नीचे चारों ओर बनी ताकों में देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण की जाती थीं। स्तम्भ के मध्य में जलाशय के निर्माण से सम्बन्धित सूचना लिखी जाती थी।

जलाशय तक पहुँचने के लिए कलात्मक सीढ़ियां एवं घाट बनाए जाते थे। इस काल में जैसलमेर में कौशिकराम का कुण्ड, जैत सागर तथा ब्रह्म्रासागर; बूँदी में फूलसागर और सूरसागर; जोधपुर में बालसमन्द, गुलाब सागर, चौखेलाव तालाब और सरूप सागर; बीकानेर में सूरसागर, अनूपसागर, नाथूसर आदि जलाशय बनाए गए।

17वीं शताब्दी में उदयपुर में महाराणा राजसिंह द्वारा निर्मित राजसंमद जलाशय निर्माण-कला का श्रेष्ठतम उदाहरण है जिसके तोरण द्वार विशुद्ध हिन्दू शैली के हैं किन्तु मण्डपों में बनी जालियां तथा बेल-बूटों के अलंकरण पर मुगल शैली का प्रभाव है। जलाशय-निर्माण की यह पद्धति 19वीं शताब्दी तक काम में ली गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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