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इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला

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इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला

दिल्ली सल्तनत काल में मुस्लिम शासकों द्वारा भारत में बनाए गए भवनों की कला को मुस्लिम कला, तुर्क स्थापत्य कला एवं इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला कहा जाता है। यह कला भारत में प्रचलित प्राचीन हिन्दू स्थापत्य एवं मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य से तो अलग थी ही, तुर्कों के बाद स्थापित होने वाली मुगल स्थापत्य कला से भी अलग थी।

इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला के तीन चरण

मुस्लिम वास्तु के तीन क्रमिक चरण स्पष्ट हैं-

(1.) पहला चरण

पहला चरण विजेता आक्रांताओं के विजय-दर्प एवं धर्मांधता से प्रेरित होकर हिन्दू स्थापत्य को नष्ट करने का था। मुहम्मद गौरी के साथ भारत आए हसन निज़ामी ने लिखा है कि प्रत्येक किला जीतने के बाद उसके स्तंभ और नींव तक महाकाय हाथियों के पैरों तले रौंदकर धूल में मिला दिए जाते थे। अनेक भारतीय नगर, दुर्ग एवं मंदिर इसी प्रकार नष्ट किए गए।

(2.) दूसरा चरण

दूसरा चरण सोद्देश्य और आंशिक विध्वंस का था जिसमें हिन्दू इमारतें इसलिए तोड़ी गईं ताकि विजेताओं की मस्जिदों और मकबरों के लिए तैयार शिल्प-सामग्री उपलब्ध हो सके। बड़ी-बड़ी धरनें और स्तम्भ मंदिरों एवं अन्य हिन्दू भवनों से निकालकर नई जगह ले जाए गए। इस काल में मंदिरों को विशेष क्षति पहुँची जो मुसलमानों द्वारा विजित प्रांतों की नई राजधानियों के निर्माण के लिए तैयार सामग्री की खान के रूप में प्रयुक्त हुए और उत्तर भारत से हिंदू वास्तु प्रायः सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गया।

(3.) तीसरा चरण

मुस्लिम वास्तु का तीसरा एवं अंतिम चरण तब आरंभ हुआ जब मुस्लिम आक्रांता देश के अनेक भागों में मस्जिदें एवं मकबरे बनाने लगे।

इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला की तीन शैलियाँ

मुस्लिम वास्तु-शैलियों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है-

(1.) दिल्ली वास्तु शैली (ई.1193-1554)

इसे पठान शैली एवं शहंशाही शैली भी कहा जाता है। इस शैली का अनुसरण दिल्ली सल्तनत के मध्य एशिया से आए तुर्की सुल्तानों एवं अफगानिस्तान से आए पठान सुल्तानों ने किया। इस शैली में दिल्ली की कुतुबमीनार (ई.1200), सुल्तान गढ़ी (ई.1231), अल्तमश का मकबरा (ई.1236), अलाई दरवाज़ा (ई.1305), निजामुद्दीन (ई.1320), गयासुद्दीन तुगलक (ई.1325) और फीरोजशाह तुगलक (ई.1388) के मकबरे, कोटला फीरोजशाह (ई.1354-1490), मुबारकशाह का मकबरा (ई.1434), मेरठ की मस्जिद (ई.1505), शेरशाह की मस्जिद (ई.1540-45) सहसराम का शेरशाह का मकबरा (ई.1540-45) और अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (ई.1205) आदि उल्लेखनीय हैं।

(2.) प्रांतीय वास्तु शैलियाँ

मध्ययुगीन प्रांतीय मुस्लिम शैलियों में निम्नलिखित शैलियों को रखा जा सकता है-

पंजाब शैली (ई.1150-1325) : इस शैली में शाह यूसुफ गर्दिजी (ई.1150), तब्रिजी (ई.1276), बहाउलहक (ई.1262) मुल्तान के श्रकने आलम (ई.1320) के मकबरे प्रमुख हैं।

बंगाल शैली (1203-1573) : इस शैली में पंडुआ की अदीना मस्जिद (ई.1364), गौर के फतेहखाँ का मकबरा (ई.1657), कदम रसूल (ई.1530) तथा तांतीमारा मस्जिद (ई.1475) प्रमुख हैं।  

गुजरात शैली (ई.1300-1572) : इस शैली में कैम्बे (ई.1325), अहमदाबाद (ई.1423), भड़ौंच और चमाने (ई.1523) की जामा मस्जिदें एवं नगीना मस्जिद (ई.1525) प्रमुख हैं।

जौनपुर शैली (ई.1376-1479) : इस शैली में जौनपुर की अटाला मस्जिद (ई.1408), लाल दरवाजा मस्जिद (ई.1450) और जामा मस्जिद (ई.1470) प्रमुख हैं।

मालवा शैली (1405-1569) : इस शैली में माण्डू के जहाज-महल (ई.1460), होशंग का मकबरा (ई.1440), जामा मस्जिद (ई.1440), हिंडोला महल (ई.1425), धार की लाट मस्जिद (ई.1405), चंदेरी का बदल महल फाटक (ई.1460), कुशक महल (ई.1445), शहज़ादी का रौजा (ई.1450) आदि प्रमुख हैं।

दक्षिणी शैली (1347-1617) : इस शैली में गुलबर्ग की जामा मस्जिद (ई.1367) और हफ्त गुंबज (ई.1378), बीदर का मदरसा (ई.1481), हैदराबाद की चारमीनार (ई.1591) आदि प्रमुख हैं।

बीजापुर खानदेश शैली (1425-1660) : इस शैली में बीजापुर के गोलगुंबज (ई.1660), रौजा इब्राहीम (ई.1615) और जामा मस्जिद (ई.1570), थालनेर खानदेश के फारूकी वंश के मकबरे (15वीं शती) आदि प्रमुख हैं।

कश्मीर शैली (15-17 वीं शती) : इस शैली में श्रीनगर की जामा मस्जिद (1400), शाह हमदन का मकबरा (17 वीं शती) आदि सम्मिलित हैं।

(3.) मुगल वास्तु शैली

तीसरे वर्ग में मुगल शैली आती है जिसके उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर, इलाहाबाद, औरंगाबाद आदि में किलों, मकबरों, मस्जिदों राजमहलों, उद्यान-मंडपों आदि के रूप में स्थित है। इसी काल में स्थापत्य-कला लाल-बलुआ पत्थर से आगे बढ़कर संगमरमर तक पहुँची और दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद और आगरा के ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध भवन बने।

हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय के कारण

हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय से इण्डो-सारसैनिक स्थापत्य का विकास हुआ। हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय की प्रक्रिया बहुत तेजी से घटित हुई इसके कुछ विशेष कारण थे-

(1.) मुसलमान शासकों ने जब भारत में महल, मस्जिद एवं मकबरे बनवाने आरम्भ किए तो उन्हें भारत में मुस्लिम स्थापत्य के शिल्पी उपलब्ध नहीं हुए। इसलिए कुछ शिल्पी फारस आदि स्थानों से बुलवाए गए। उनके निर्देशन में भारतीय शिल्पियों ने काम किया। अतः स्वाभाविक ही था कि मुस्लिम स्थापत्य में हिन्दू स्थापत्य के तत्व शामिल हो जाएं।

(2.) मुसलमानों ने बहुत तेजी से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार किया जिसके कारण उन्हें बड़ी संख्या में महलों, मस्जिदों एवं मकबरों आदि की आवश्यकता हुई। इन भवनों के निर्माण के लिए बहुत सामग्री की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति शीघ्रता से नहीं हो सकती थी, इस कारण बहुत से हिन्दू भवनों के अलंकरण को नष्ट करके उनके मूल निर्माण को काम में लेते हुए उन्हें इस्लामिक शैली में ढाल दिया गया। उन भवनों में हिन्दू एवं मुस्लिम शैलियों की छाप दिखाई देती है।

(3.) बहुत से मुस्लिम नवनिर्माण के लिए पुराने हिन्दू मंदिरों, महलों आदि को तोड़कर उनकी सामग्री काम में ली गई। इस कारण भी मुस्लिम शैली पर हिन्दू शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

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हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

मध्यकालीन हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य का अंतर बहुत स्पष्ट है। इस काल में हिन्दू स्थापत्य को बड़े स्तर पर क्षतिग्रस्त किया गया तथा हिन्दू भवनों को तोड़कर उसी सामग्री से मुस्लिम स्थापत्य का निर्माण किया गया।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला का प्रवेश हुआ। दिल्ली सल्तनत के तुर्क शासक अपने साथ जिस स्थापत्य कला को लेकर आए, उसका विकास ट्रान्स-ऑक्सियाना, ईरान, इराक, मिस्र, अरब, अफगानिस्तान, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण पश्चिम यूरोप की शैलियों के मिश्रण से हुआ था। इस मिश्रित स्थापत्य को ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला कहा गया।

इस शैली की कुछ विशेषताएं इसे भारतीय स्थापत्य शैलियों से अलग करती थीं, जैसे- नोकदार तिपतिया मेहराब, मेहराबी डाटदार छतें, अष्टकोणीय भवन, ऊंचे गोल गुम्बज, पतली मीनारें आदि। इस शैली को सारसैनिक या इस्लामिक कला भी कहा जाता है।

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में कई अंतर थे जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) भारतीय स्थापत्य में आदर्शवाद, काल्पनिकता, अलंकरण एवं रहस्य का समावेश था जबकि मुस्लिम स्थापत्य में यथार्थवाद, सादगी एवं वास्तविकता के तत्व अधिक थे।

(2.) भारतीय मंदिर पत्थरों में उत्कीर्ण एक मनोरम संसार का परिदृश्य प्रतीत होते हैं जबकि मुस्लिम स्थापत्य में बनी मस्जिदें सादगी का प्रतिबिम्ब प्रतीत होती हैं और उनका मुख सुदूर मक्का की दिशा में होता है।

(3.) मंदिर की दीवारों एवं शिखरों पर देवी-देवताओं एवं पौराणिक कथाओं का अंकन होता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की जाती हैं।

(4.) मंदिरों में देवी-देवताओं का मानवीय स्वरूप अंकित किया जाता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर मानवीय आकृतियों का अंकन निषिद्ध होता है।

(5.) हिन्दू मंदिरों पर शिखर होते थे जबकि मुस्लिम इमारतों पर गोल गुम्बद होते थे।

(6.) हिन्दू मन्दिरों का गर्भगृह प्रकाश एवं वायु से रहित होता था जबकि मस्जिद का भीतरी भाग प्रकाश एवं वायु से युक्त होता था।

(7.) मंदिर का गर्भगृह छोटा होता था जबकि मस्जिद का मुख्यकक्ष विशाल होता था ताकि उसमें अधिक से अधिक लोग नमाज पढ़ सकें।

(8.) हिन्दू स्थापत्य में अलंकृत स्तम्भों एवं सीधे पाटों पर रखी अलंकृत छतों को प्रमुखता दी जाती थी जबकि इस्लामिक स्थापत्य में तिकाने मेहराबों, गोल गुम्बदों और लम्बी मीनारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।

(9.) हिन्दू मंदिरों के शिखरों पर कमल एवं कलश बनाए जाते थे, मंदिर के भीतरी स्तम्भों पर घण्टों, जंजीरों, घटपल्लवों, हथियों, कमल पुष्पों आदि का अंकन किया जाता था तथा खम्भों एवं छतों के जोड़ों पर कीचकों का अंकन किया जाता था किंतु मुस्लिम स्थापत्य में इस तरह के अलंकरणों का कोई प्रावधान नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

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मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला मुगलों के साथ भारत में नहीं आई थी। इसका विकास भारत में आने के बाद हिन्दू एवं फारसी शैलियों के मिश्रण से हुआ।

ई.1526 में मंगोल-वंशी बाबर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया। भारत में बाबर तथा उसके वंशज ‘मुगलों’ के नाम से जाने गए। बाबर के वंशज थोड़े बहुत व्यवधानों के साथ ई.1526 से ई.1765 तक भारत के न्यूनाधिक क्षेत्रों पर शासन करते रहे। बाबर के वंशजों में हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब प्रभावशाली शासक हुए तथा उनके समय देश में अनेक विशाल भवनों का निर्माण हुआ। इस काल की स्थापत्य शैली मुगल शैली कहलाती है।

फारसी और भारतीय शैली के मिश्रण से बनी मुगल शैली

मुगल अपने साथ स्थापत्य कला की कोई विशिष्ट शैली लेकर नहीं आए थे। उनकी स्मृतियों में समरकंद के मेहराबदार भवन, ऊँचे गुम्बद, बड़े दालान, कोनों पर बनी पतली और ऊँची मीनारें तथा विशाल बागीचे थे। उन्हीं स्मृतियों को मुगलों ने हिन्दू, तुर्की एवं फारसी वास्तुकला में थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ मिला दिया। इन सबके मिश्रण से जो स्थापत्य शैली सामने आई उसे मुगल स्थापत्य शैली कहा गया।

हालांकि मुगलों के स्थापत्य की सभी प्रमुख विशेषताएं यथा तिकोने या गोल मेहराब (।तबी), पतली और लम्बी मीनारें, झरोखेदार बुर्ज और गोलाकार गुम्बद पहले से ही तुर्कों के स्थापत्य में समाहित थे। अंतर केवल इतना था कि मुगलों के मेहराब, मीनारें, बुर्ज और गुम्बद पहले की अपेक्षा अधिक बड़े, कीमती पत्थरों से युक्त एवं हिन्दू तथा फारसी विशेषताओं को समेटे हुए थे। मुगल-इमारतों के भीतर विशाल कक्षों का एवं बाहर सुंदर एवं विशाल उद्यानों का निर्माण किया गया।

दिल्ली सल्तनत के तुर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित भवनों के स्थापत्य को मुगलों के स्थापत्य से भिन्न करने के लिए कहा जा सकता है कि तुर्की सुल्तानों के भवनों में पुरुषोचित दृढ़ता का समावेश है जबकि मुगलों के स्थापत्य में स्त्रियोचित-स्थापत्य-सौंदर्य के दर्शन होते हैं।

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

भारत में बने मुगल भवनों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

(1.) भवन के ऊपरी भाग में विशालाकाय प्याज की आकृति का गुम्बद बनता था जिसके चारों तरफ छोटे गुम्बद बनते थे।

(2.) इमारतों में लाल बलुआ पत्थर एवं सफेद संगमरमर का उपयोग।

(3.) पत्थरों पर नाजुक सजावटी अलंकरण, दीवारों के बाहरी एवं भीतरी हिस्सों पर पच्चीकारी एवं दीवारों और खिड़कियों में पत्थरों की अलंकृत जालियों का उपयोग।

(4.) मस्जिदों, मकबरों एवं महलों की भीतरी दीवारों पर फ्रैस्को अर्थात् भित्तिचित्र।

(5.) चारों ओर उद्यान से घिरे हुए स्मारक भवनों का निर्माण।

(6.) महलों एवं उद्यानों में जलापूर्ति के लिए कलात्मक नहरों, नालियों, फव्वारों एवं कृत्रिम झरनों का व्यापक स्तर पर उपयोग।

(7.) विशाल सहन सहित मस्जिदों का निर्माण।

(8.) फारसी एवं अरबी के अलंकृत शिलालेख, कुरान की आयतों का कलात्मक लेखन।

(9.) भवन परिसर के विशाल मेहराब युक्त मुख्य द्वारों का निर्माण।

(10.) दो तरफ या चार तरफ ईवान का निर्माण।

(11.) भवनों की छतों पर कलात्मक बुर्ज एवं छतरियों का निर्माण।

(12.) भवन के चारों ओर लम्बी एवं पतली मीनारों का निर्माण।

(13.) मुगल शैली में स्थानीय शैलियों के मिश्रण से उप-मुगल शैलियों का निर्माण यथा- राजपूत स्थापत्य शैली, सिक्ख स्थापत्य शैली, इण्डो सारसैनिक स्थापत्य शैली, ब्रिटिश राज स्थापत्य शैली।

लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर

मुगल स्थापत्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत में बहुतायत से मिलने वाला लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग है जिसे काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके सुंदर कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया। मुगलों ने भवन निर्माण में बहुत कम मात्रा में काला संगमरमर, क्वाट्जाईट एवं ग्रेनाइट का उपयोग किया।

मुगल भवनों की चिनाई सामान्यतः चूना-कंकर के गारे में होती थी। दीवारों के भीतरी हिस्से में अनगढ़ पत्थरों को चिना जाता था और बाहरी भाग को लाल बलुआ पत्थर अथवा सफेद संगमरमर की पट्टियों से ढका जाता था। कुछ भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया।

बाबर, हुमायूँ एवं अकबर के काल में बने भवनों में राजस्थान के करौली से मिलने वाले लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया किंतु जहाँगीर के काल में बने भवनों में राजस्थान के मकराना से मिले सफेद संगमरमर का व्यापक स्तर पर उपयोग हुआ। दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद एवं जामा मस्जिद, आगरा के ताजमहल, एतमादुद्दौला का मकबरा एवं मुस्समन बुर्ज, औरंगाबाद का बीबी का मकबरा आदि भवनों का निर्माण मकराना के संगमरमर से हुआ है। चिनाई के लिए उत्तम कोटि के चूने की आपूर्ति भी राजस्थान के नागौर जिले से होती थी।

हंगे रत्नों की भरमार

मुगलों ने अपने महलों में नीला लाजवर्त, लाल मूंगा, पीला पुखराज, हरा पन्ना, कत्थई गोमेद, सफेद मोती आदि मूल्यवान एवं अर्द्धमूल्यवान पत्थरों का भरपूर उपयोग किया। गहरे नीले रंग का लाजवर्त अफगानिस्तान से आता था। जबकि अन्य महंगे रत्न विश्व के अनेक देशों से मंगवाए जाते थे। शाही महलों एवं शाही मकबरों में संगमरमर में बने फूल-पत्तियों की डिजाइनों में वैदूर्य, गोमेद, सूर्यकान्त, पुखराज आदि कीमती रत्नों को जड़ा गया। उनसे पहले भारत के मुस्लिम भवनों में रत्नों का प्रयोग कभी नहीं हुआ था।

मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की कलाकृतियों में सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम भी मिलता है। सोने-चांदी के पतरों में रत्नों की ऐसी जड़ाई प्राचीन हिन्दू स्थापत्य में भी मिलती थी किंतु मुस्लिम आक्रमणों के कारण हिन्दू स्थापत्य कला का लगभग पूरी तरह विनाश हो चुका था।

नहरों एवं फव्वारों से युक्त मुगल उद्यान

मुगलों ने समरकंद के तैमूर शैली के उपवनों के अनुकरण पर भारत में कई बाग बनवाए जिन्हें मुगल उद्यान एवं चारबाग कहा जाता है। बाबर ने ई.1528 में आगरा में एक बाग बनवाया जिसे आराम बाग कहा जाता था। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान था। इसे अब रामबाग कहा जाता है। जहाँगीर काल में निर्मित हुमायूँ का मकबरा एक बड़े चारबाग के भीतर स्थित है।

जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ द्वारा निर्मित एतमादुद्दौला का मकबरा भी चारबाग शैली के विशाल उद्यान के भीतर बना हुआ है। जहाँगीर ने काश्मीर में शालीमार बाग बनवाया। नूरजहाँ के भाई आसफ खान (जो कि शाहजहाँ का श्वसुर और मुमताज महल का पिता था) ने ई.1633 में कश्मीर में निशात बाग बनवाया। प्रयागराज का जहाँगीर कालीन खुसरो बाग भी चारबाग शैली में बना हुआ है।

शाहजहाँ ने लाहौर में शालीमार बाग बनवाया जिसकी प्रेरणा काश्मीर के शालीमार बाग से ली गई थी। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल भी चारबाग शैली के एक बड़े उद्यान के बीच स्थित है।

ताजमहल की सीध में यमुना के दूसरी ओर भी शाहजहाँ द्वारा निर्मित एक उद्यान है जिसे मेहताब बाग कहा जाता है। यह भी चारबाग शैली में बना हुआ है। औरंगजेब ने पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया जो हरियाणा के पंचकूला जिले में अपने बदले हुए स्वरूप में अब भी मौजूद हैं तथा यदुवेन्द्र बाग कहलाता है। चारबाग शैली एक विशिष्ट प्रकार की शैली थी जिसमें उद्यान के केन्द्रीय भाग से चारों दिशाओं में चार नहरें जाती थीं जिनसे पूरे उद्यान को जल की आपूर्ति होती थी।

ये चार नहरें, कुरान में वर्णित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों का प्रतीक होती थीं। भारत में मुगलों द्वारा बनाए गए छः उद्यानों को यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूचि में सम्मिलित किया गया है। इनमें जम्मू-कश्मीर के परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्म-ए-शाही, वेरिनाग गार्डन तथा अचबल गार्डन सम्मिलित हैं।

भारत में मुगल स्थापत्य कला के प्रसिद्ध उदाहरण

भारत में मुगल स्थापत्य शैली के उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर (अब पाकिस्तान), काबुल (अब अफगानिस्तान), कांधार (अब अफगानिस्तान), ढाका (अब बांगलादेश) आदि नगरों में हैं। मुगल शैली के कुछ प्रसिद्ध भवन इस प्रकार हैं-

(1.) मकबरे

एतमादुद्दौला का मकबरा (आगरा), हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली), अकबर का मकबरा (आगरा के निकट सिकंदरा), जहाँगीर का मकबरा (लाहौर), ताजमहल (आगरा), अनारकली का मकबरा (लाहौर), बीबी का मकबरा (औरंगाबाद) आदि।

(2.) मस्जिद

दिल्ली, आगरा एवं फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिदें, लाहौर, दिल्ली एवं आगरा की मोती मस्जिदें, आगरा की नगीना मस्जिद, फतेहाबाद की मस्जिद, दिल्ली की किला-ए-कुहना मस्जिद आदि।

(3.) किले

दिल्ली का दीन पनाह, आगरा एवं दिल्ली के लाल किले, लाहौर का किला, प्रयागराज का किला, अजमेर का दौलताबाद किला। 

(4.) महल

फतेहपुर सीकरी के महल, आगरा एवं दिल्ली के लाल किलों के महल।

(5.) उद्यान

बाग-ए-बाबर (लाहौर), आराम बाग (अगरा), शालीमार बाग (काश्मीर), चारबाग (हुमायूँ का मकबरा), निशातबाग (श्रीनगर), अंगूरी बाग (आगरा) आदि।

(6.) सरकारी कार्यालय

आगरा, फतेहरपुर सीकरी एवं दिल्ली के दीवान-ए-आम तथा दीवान-ए-खास, फतेहपुर सीकरी की ट्रेजरी।

(7.) दरवाजा

फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा, अजमेर में खामख्वा के दरवाजे, दिल्ली का दिल्ली दरवाजा आदि।

(8.) बारादरियां

अजमेर में आनासागर झील की बारादरियां।

(9.) हवामहल

फतेहपुर सीकरी का पंचमहल।

(10.) सराय

जालंधर की नूरमहल सराय।

(11.) बुर्ज

मुसम्मन बुर्ज, जामा मस्जिद की बुर्ज आदि।

(12.) मीनारें

फतेहपुर सीकरी एवं लाहौर की हिरन मीनार आदि।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

बाबर कालीन स्थापत्य

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बाबर कालीन स्थापत्य

बाबर कालीन स्थापत्य मस्जिद एवं मकबरों के निर्माण तक सीमित था। बाबर एक क्रूर विध्वंसक था, इसलिए उसने भगवान श्रीराम का जन्मभूमि मंदिर तोड़कर वहाँ भी मस्जिद बनवाई।

ई.1526 में बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद बाबर ने खानवा, चंदेरी एवं घाघरा के युद्ध जीतकर भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना की। वह भारत में केवल चार साल राज्य कर सका। इतने कम समय में वह अपना राज्य भी ढंग से व्यवस्थित नहीं कर सका इसलिए भवन निर्माण के बारे में सोचना भी कठिन था। फिर भी बाबर ने भारत में कुछ विध्वंस एवं कुछ निर्माण किए।

बाबर को तुर्क तथा अफगान सुल्तानों द्वारा दिल्ली और आगरा में निर्मित इमारतें पसंद नहीं आईं। उस काल में ग्वालियर के महल ही हिन्दू कला के सुंदर उदाहरण के रूप में शेष बचे थे। यद्यपि बाबर के अनुसार इनके निर्माण में किसी निश्चित नियम एवं योजना का पालन नहीं हुआ था तथापि वे बाबर को सुंदर एवं हृदयग्राही प्रतीत हुए। बाबर ने अपने लिए ग्वालयिर के अनुकरण पर महल बनवाए।

बाबर ने स्वयं अपनी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि ‘मैंने आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं कोल नामक स्थानों पर भवन निर्माण के कार्य में संगतराशों को लगाया।’

सतीश चन्द्र ने लिखा है- ‘बाबर के लिए स्थापत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियम-निष्ठता एवं समरूपता थी जो उसे भारतीय इमारतों में दिखाई नहीं दी। बाबर भारतीय कलाकारों के साथ काम करने के लिए उत्सुक था। इस कार्य हेतु उसने प्रसिद्ध अलबानियाई कलाकार ‘सिनान’ के शिष्यों को बुलाया। बाबर को भारत में स्थापत्य के क्षेत्र में ज्यादा कुछ करने का समय नहीं मिला और उसने जो कुछ बनवाया उसमें से अधिकतर भवन अब नष्ट हो चुके हैं।’

बाबर ने या तो आगरा, सीकरी, बयाना आदि स्थानों पर बड़े निर्माण अर्थात् महल एवं दुर्ग आदि नहीं बनवाकर मण्डप, स्नानागार, कुएं, तालाब एवं फव्वारे जैसी लघु रचनाएं ही बनवाई थीं या फिर बाबर द्वारा निर्मित इमारतें मजबूत सिद्ध नहीं हुईं। क्योंकि वर्तमान में पानीपत के काबुली बाग की विशाल मस्जिद एवं रूहेलखण्ड में संभल की जामा मस्जिद को छोड़कर, बाबर द्वारा निर्मित कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। या तो वे बनी ही नहीं थीं या फिर वे समस्त इमारतें खराब गुणवत्ता के कारण नष्ट हो चुकी हैं।

यद्यपि पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद एवं रूहेलखण्ड की मस्जिद पर्याप्त विशाल रचनाएं हैं तथापि उनमें शिल्प, स्थापत्य एवं वास्तु का कोई सौंदर्य दिखाई नहीं देता। इन दोनों भवनों के बारे में स्वयं बाबर ने स्वीकार किया है कि इनकी शैली पूरी तरह भारतीय थी। यहाँ भारतीय शैली से तात्पर्य मुगलों के पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत-काल की पठान शैली से है। बाबर को भारत में समरकंद जैसी इमारतें बना सकने योग्य कारीगर उपलब्ध नहीं हुए। न बाबर के पास इतना धन एवं इतना समय था कि वह इमारतों का निर्माण करवा सके।

बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के ‘जन्मस्थानम्’ मंदिर को तोड़कर, उसी सामग्री से वहीं एक ढांचा खड़ा किया जिसे मुगल रिकॉर्ड्स में ‘मस्जिद-जन्मस्थानम्’ कहा गया। मीर बाकी ने इस ढांचे पर दो शिलालेख लगवाए। इन शिलालेखों में बाबर के नाम का उल्लेख होने के कारण इस ढांचे को जन-साधारण की भाषा में ‘बाबरी-मस्जिद’ कहा जाने लगा।

इस ढांचे को वर्ष 1992 में एक जन-आंदोलन में ढहा दिया गया। ई.1528 में बाबर ने आगरा में आरामबाग था का निर्माण करवाया। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान है। इस उद्यान में विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय रचनाएं बनाई गई हैं। यह बाग ऊँची चाहरदिवारी से घिरा है जिसके कोने की बुर्जियों के ऊपर स्तम्भयुक्त मंडप हैं। नदी के किनारे दो-दो मंजिले भवनों के बीच में एक ऊँचा पत्थर का चबूतरा है।

जहाँगीर ने इस बाग की संरचनाओं में कुछ परिवर्तन किए। ब्रिटिश शासनकाल में भी कुछ नव-निर्माण करवाए गए। इस स्मारक के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर एक और चबूतरा है जहाँ से हम्माम के लिए रास्ता है। हम्माम की छत मेहराबदार है। नदी से पानी निकालकर एक चबूतरे से बहते हुए चौड़े नहरों, कुंडों एवं झरनों के रास्ते दूसरे चबूतरे तक लाया जाता था।

बाबर ने आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। इसलिए उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में कुछ भवनों का निर्माण किया गया जो अब शेष नहीं बचे हैं। धौलपुर नगर के बाहर स्थित कमलताल के निकट बाबर कालीन स्थापत्य के ध्वंसावशेष देखे जा सकते हैं। जब बाबर खानवा के युद्ध के लिए धौलपुर पहुँचा था तब यह कमलताल मौजूद था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

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हुमायूँ कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य कुछ मस्जिदों तक सीमित था। उसने दिल्ली के पुराने किले में निवास स्थापित करने के लिए उसका परकोटा मरम्मत करवाया तथा वहाँ एक पुस्तकालय भी बनवाया।

बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्तकालीन मुद्राएं, मूर्तियाँ एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है।

दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं।

दीनपनाह के भीतर शेरमण्डल नामक एक भवन है। इसका निर्माण हुमायूँ ने अपने लिए पुस्तकालय के रूप में करवाया। शेरशाह सूरी कि समय में यह शेरमण्डल कहलाने लगा। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।

हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता। हिसार के फतेहाबाद कस्बे में भी हुमायूँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई।

मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूँ की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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अकबर कालीन स्थापत्य

अकबर ने भारत में प्रचलित तत्कालीन स्थापत्य शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये विचार दिये। अकबर कालीन स्थापत्य कला वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

अकबर कालीन स्थापत्य

अकबर ने लगभग 50 वर्ष भारत पर शासन किया। इस अवधि में उसका राज्य काफी विस्तृत हो गया था तथा मुगल सल्तनत की आय बहुत बढ़ गई थी। इसलिए उसने भारत के अनेक नगरों में भवनों का निर्माण करवाया। अकबर का शासन-काल शासन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था।

इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये।

अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’

अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर कालीन स्थापत्य की शैली वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

अकबर कालीन स्थापत्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं-

(1.) भवन निर्माण में अधिकांशतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है, कहीं-कहीं पर सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

(2.) अकबरी स्थापत्य शैली में मेहराबी और शहतीरी शैलियों का समान अनुपात में प्रयोग किया गया है।

(3.) आरम्भ में गुम्बद लोदी शैली में बनते रहे जो भीतर से खोखले होते थे किंतु तकनीकी दृष्टि से यह दोहरा गुम्बद नहीं था।

(4.) स्तम्भ का अग्रभाग बहुफलक युक्त था और इनके शीर्ष पर बै्रकेट या ताक होते थे।

(5.) भवनों का अलंकरण प्रायः नक्काशी या पच्चीकारी द्वारा होता था और उनमें चमकीले रंग भरे जाते थे।

अकबर कालीन स्थापत्य का विकास दो चरणों में हुआ। प्रथम चरण में फतेहपुर सीकरी से पहले के स्थापत्य को रखा जाता है जिसमें आगरा, इलाहाबाद और लाहौर के किला शामिल हैं। दूसरे चरण में फतेहपुर सीकरी के निर्माण हैं।

दिल्ली में निर्मित भवन

अकबर के समय दिल्ली में बने प्रमुख भवनों में हुमायूं का मकबरा (ई.1562) सर्वप्रमुख है। इस मक़बरे की चारबाग शैली भारत में पहली बार प्रयुक्त हुई थी। इसके अनुकरण पर ही आगे चलकर ताजमहल तथा उसके चारों ओर के उद्यान का निर्माण हुआ। समकालीन इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदायूनीं के अनुसार इस भवन का मुख्य वास्तुकार मिराक मिर्जा घियास था जिसे अफगानिस्तान के हेरात शहर से इस मकबरे के निर्माण के लिए विशेष रूप से बुलवाया गया था।

उसने हेरात में कई भवन बनाए थे। मकबरे का निर्माण पूर्ण होने से पहले ही मिराक मिर्जा घियास की मृत्यु हो गई। अतः शेष कार्य उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियाथुद्दीन ने पूरा करवाया। मकबरे का मुख्य भवन ई.1571 में बनकर तैयार हुआ। यह मुगल सल्तनत की पहली इमारत थी जिसमें लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था।

इस भवन-समूह में बादशाह हुमायूँ तथा शाही परिवार के सदस्यों की कब्रें हैं जिनमें हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो, हुमायूँ की छोटी बेगम, शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह, मुगल बादशाह जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, बादशाह रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला एवं आलमगीर (द्वितीय) आदि की कब्रें शामिल हैं।

मकबरा निर्माण की यह शैली पूर्ववर्ती मंगोल शासक तैमूर लंग के समरकंद (उजबेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित थी तथा यही मकबरा आगे चलकर भारत में मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ताजमहल के निर्माण के साथ ही मकबरा निर्माण की यह स्थापत्य शैली अपने चरम पर पहुँच गई।

हुमायूं के मकबरे के दक्षिण-पूर्वी कौने में ई.1590 में निर्मित शाही-नाई का गुम्बद है। यह मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिस तक पहुँचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हुई हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना हुआ है। भीतर स्थित दो कब्रों पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक कब्र पर 999 अंकित है जिसका अर्थ हिजरी सन् 999 अर्थात् ई.1590-91 से है।

हुमायूँ के मकबरे की मुख्य चहारदीवारी के बाहर स्थित स्मारकों में ‘बूहलीमा का मकबरा’ प्रमुख है। इसका स्थापत्य एक आयताकार साधारण मकान के रूप में है जिस पर कोई गुम्बद, मीनार, बुर्ज, ईवान, मेहराब आदि फारसी संरचनाएं नहीं हैं। इस मकान को स्थानीय क्वार्टजाइट पत्थरों से बनाया गया है। बूहलीमा के मकबरे के निकट ‘अरब सराय’ स्थित है जिसे हुमायूं की विधवा हमीदा बेगम ने अरब से आए 300 कारीगरों के लिए बनवाया था।

इस सराय का मुख्य द्वारा एक बड़े ईवान के रूप में बनाया गया है जिसमें दो विशाल मेहराब बनाए गए हैं। इस द्वारा से प्रवेश करने पर सराय का मुख्य हिस्सा दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है जिनमें एक जैसी मेहराबदार कोठरियां बनी हुई हैं तथा अब भग्न अवस्था में हैं। इस मेहंदी बाजार भी कहा जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे जहाँगीर के मुख्य हींजड़े मिहर बानू ने बनाया था।

अरब सराय के निकट एक प्लेटफार्म पर अफसर वाला मकबरा तथा अफसरवाली मस्जिद निर्मित हैं तथा दोनों इमारतें स्थानीय क्वार्टजाईट पत्थर से बनी हैं। दोनों भवनों की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर से सजावट की गई है। लाल बलुआ पत्थर में सफेद संगमरमर से पर्चिनकारी की गई है।

इन इमारतों के भीतर की बनावट फारसी शैली पर आधारित है तथा सादगी पूर्ण है। दोनों ही भवन अब जीर्ण अवस्था में हैं। मस्जिद का मुख्य कक्ष ‘थ्री बे’ बना हुआ है। बीच की ‘बे’ के चारों ओर मेहराब बने हुए हैं जिनके ऊपर एक गुम्बद स्थित है।

गुम्बद के भीतरी हिस्से में चित्रों का एक पूरा पैनल है। मस्जिद का ‘तिहरा ईवान’ फारसी शैली में निर्मित है। अफसरवाला मकबरे के भीतर एक ही कक्ष है जिसमें संगमरमर की कब्रें बनी हुई हैं जिनमें से एक कब्र पर कुरान की नौ सौ चौहत्तरवीं आयत लिखी गई है जो संभवतः हिजरी 974 की द्योतक है। अफसर वाला मकबरा के ऊपर दो गुम्बद बने हुए हैं। यह मकबरा बाहर से अष्टकोणीय है।

इनमें से चार तरफ की दीवारों में मेहराबदार चार प्रवेशद्वार बने हैं जो सीधे ही कब्र वाले कमरे में खुलते हैं। मेहराबों को लाल बलुआ पत्थरों के अलंकरणों से सजाया गया है। गुम्बद के ऊपर एक उलटा कमल लगा है जो कलश के लिए आधार बनाता है। इस आधार पर एक मंगल-कलश रखा हुआ है। अकबर कालीन भवन में इस प्रकार का कमल एवं कलश बहुत कम दिखाई देता है।

अकबर ने अपनी धाय माहम अनगा के पुत्र आदम खाँ अथवा (अदहम खाँ) के लिए दिल्ली में एक मकबरा बनवाया। यह मक़बरा दक्षिणी दिल्ली के लालकोट की दीवार पर बने एक चबूतरे पर बना है। इस अष्टकोणीय इमारत के गुम्बद को 15-16वीं सदी के सैयद और लोदी शासन-काल में बनी इमारतों की शैली में बनाया गया है। मक़बरे में चारों तरफ मेहराबदार बरामदे बने हैं। प्रत्येक बरामदे में तीन दरवाजे हैं।

आगरा में निर्मित भवन

आगरा का किला एक प्राचीन हिन्दू दुर्ग था जिसमें लोदी शासकों ने कुछ निर्माण करवाए थे। बाबर ने भी इस दुर्ग में एक बावली बनवाई थी। अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ ने भी इस दुर्ग में कुछ महल बनवाए तथा पुराने महलों का जीर्णोद्धार किया। अबुल फजल ने लिखा है- ‘यह किला ईंटों से बना हुआ था और बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहाँ लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं।’

यह किला अत्यंत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था इसलिए अकबर ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया। उसने धौलपुर के निकट करौली से लाल पत्थर मंगवाकर ईंटों की दीवारों पर चढ़वा दिया और लगभग सम्पूर्ण दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। 8 साल तक लगभग 4,000 कारीगर एवं श्रमिक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करते रहे। ई.1573 में यह दुर्ग दुबारा से बनकर तैयार हुआ और अकबर अपने परिवार सहित इसमें निवास करने लगा। किले का मुख्य द्वार अर्थात् दिल्ली दरवाजा और जहाँगीरी महल अकबर के समय के ही निर्मित हैं।

आगरा दुर्ग का ई.1566 में निर्मित दिल्ली दरवाजा अकबर के प्रारम्भिक काल की स्थापत्य कला विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस किले का निर्माण तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इन भवनों के मेहराब, दोनों ओर झुकी हुई अष्टकोणीय दीवारें, तोरणयुक्त छतें, मण्डप, कंगूरे, लाल बलुआ पत्थर पर सफेद पत्थर का अलंकरण प्रमुख हैं। अकबरी महल की स्थापत्य शैली, जहाँगीरी महल के स्थापत्य की तुलना में कम कलात्मक है एवं भद्दी सी दिखाई देती है। अकबरी महल में बंगाली शैली के बुर्ज बने हुए हैं तथा यह महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

इलाहाबाद दुर्ग में निर्मित भवन

प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला मूलतः किसी हिन्दू राजा ने बनवाया था जिसे अकबर ने नए सिरे से बनवाया। नदी की कटान से यहाँ की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया। अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दुर्ग में जहाँगीर महल, तीन बड़ी गैलरी तथा ऊँची मीनारें हैं। मुगलों ने दुर्ग में कई फेरबदल कराये।

अजमेर दुर्ग में निर्मित भवन

अकबर पहाड़ी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त नहीं था। वह आगरा, लाहौर, इलाहाबाद तथा फतहपुर सीकरी के मैदानी दुर्गों में रहना पसंद करता था जहाँ बड़े-बड़े बाग बनाए जा सकें। इसलिये उसने अजमेर में भी एक प्राचीन हिन्दू दुर्ग को मुस्लिम शैली में ढालकर उसका जीर्णोद्धार करवाया। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया।

यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं। इसका द्वार नगर की तरफ मुंह किये हुए है। केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी है। दुर्ग के चारों कोनांे में एक-एक बुर्ज बनी हुई है। इसकी पश्चिमी दिशा में एक सुंदर दरवाजा है तथा इसके मध्य में भवन बना हुआ है। इस दुर्ग का दरवाजा 84 फुट ऊँचा तथा 43 फुट चौड़ा है।

फतहपुर सीकरी का स्थापत्य

फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर ई.1571 में बनना आरम्भ हुआ और ई.1580 में बनकर तैयार हुआ। फतेहपुर सीकरी के भवनों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) मजहबी इमारतें- जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना (केन्द्रीय कक्ष या दीवाने आम) आदि।

(2.) रिहाइशी इमारतें- ख्वाबगाह, जोधाबाई महल, बीरबल महल (जनाना महल), बीबी मरियम महल, तुर्की सुल्ताना महल, अबुल फजल एवं फैजी के महल आदि।

(3.) कार्यालयी इमारतें- खजाना, दीवाने आम, दीवाने खास (खास महल) आदि।

क्या फतेहपुर सीकरी की शैली राष्ट्रीय स्थापत्य शैली है?

फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए स्तम्भों के तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशु-पक्षियों के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं।

संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर से बना हुआ बुलन्द दरवाजा स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’ 

डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके। हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’

इन इतिहासकारों ने अकबर-कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्व ढूंढे हैं जबकि इस वास्तविकता को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि फतेहपुर सीकरी के अधिकांश महलों का निर्माण सिकरवार राजपूतों ने करवाया था, अकबर ने तो केवल उनके बाहरी रूप को बदला था। अंग्रेजी इतिहासकार, लेखक एवं पुरातत्ववेत्ता इस बात को नहीं समझ पाए थे, इसलिए उन्होंने मुगल कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के दर्शन किए।

बाद के भारतीय लेखकों ने भी उन्हीं के लिखे हुए को सच मान लिया। बहुत से भारतीय लेखकों ने तो इन भवनों को अपनी आंखों से देखे बिना ही यूरोपीय लेखकों का अनुसरण किया। यहाँ तक कि कुछ इतिहासकारों ने फतेहपुर सीकरी के भवनों को राष्ट्रीय स्थापत्य शैली भी घोषित कर दिया। न तो फतहपुर सीकरी की शैली कोई अलग है और न फतहपुर सीकरी के स्थापत्य का देश के किसी भी हिस्से में अनुसरण हुआ, इसलिए इसे राष्ट्रीय स्थापत्य शैली नहीं कहा जा सकता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

अ. मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

ब. बाबर कालीन स्थापत्य

स. हुमायूँ कालीन स्थापत्य

द. अकबर कालीन स्थापत्य

य. जहाँगीर कालीन स्थापत्य

र. शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ल. ताजमहल का स्थापत्य

व. औरंगजेब कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

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जहाँगीर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य का सबसे पहला उदाहरण आगरा से बाहर बना हुआ सिकन्दरा का मकबरा है जिसकी योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी किंतु इसका निर्माण जहाँगीर ने अकबर की मृत्यु के बाद अपनी निगरानी में करवाया। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है।

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर को भवन निर्माण में अकबर जैसी रुचि नहीं थी। इसलिए जहाँगीर कालीन स्थापत्य का कोई विशेष विकास नहीं हुआ। जहाँगीर ने स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला को अधिक महत्व दिया। यद्यपि जहाँगीर के शासन-काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और उसके साले आसफ खाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी मौजूद है।

अकबर ने अपने जीवन काल में आगरा के बाहर सिकन्दरा में अपना मकबरा बनाने की योजना बनाई। संभवतः उसके जीवनकाल में ही इसका निर्माण कार्य भी आरम्भ हो गया किंतु इस इमारत को बाद में जहाँगीर ने पूरा करवाया। जहाँगीर की प्रिय बेगम नूरजहाँ ने आगरा में यमुना नदी के तट पर सफेद संगमरमर से अपने पिता एतिमादुद्दौला का विशाल मकबरा बनवाया। नूरजहाँ ने लाहौर के निकट जहाँगीर का मकबरा भी बनवाया। दिल्ली में बना खानखाना का मकबरा भी जहाँगीर काल की प्रमुख इमारतों में से है।

जहाँगीर के समय आगरा में निर्मित भवन

आगरा से बाहर सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे की योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी किंतु इसका निर्माण जहाँगीर ने अकबर की मृत्यु के बाद अपनी निगरानी में करवाया। मकबरे के चारों ओर बाग लगाया गया तथा एक बड़ा एवं ऊँचा दरवाजा सफेद पत्थर की मीनारों सहित बनाया गया। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है।

मुसलमानों के मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है। इसकी बनावट बौद्ध विहार जैसी है और इसका आकार पिरामिड के जैसा है। मकबरे के बाहर बने उद्यान के चारों ओर सुंदर प्रवेशद्वार हैं किंतु इसका मुख्य प्रवेश-द्वार सर्वाधिक आकर्षक है जिस पर संगमरमर का जड़ाऊ कार्य किया गया है। इसके चारों ओर तथा चारों कोनों पर संगमरमर की एक-एक ऊँची मीनार है। प्रवेश द्वार पर कुशलतापूर्वक की गई पच्चीकारी इसकी शोभा बढ़ाती है।

पर्सी ब्राउन के अनुसार ‘अब तक इस प्रकार की एक भी मीनार भारतीय स्थापत्य कला में प्रयुक्त हुई दिखाई नहीं देती है।’

यह मकबरा पाँच मंजिली इमारत है जिसमें प्रत्येक ऊपर की मंजिल नीचे की मंजिल की अपेक्षा आकार में छोटी होती गई है। इसके प्रत्येक प्रवेशद्वार पर फारसी की पंक्तियां खुदी हुई हैं। ये पंक्तियां अकबर के जीवन पर प्रकाश डालती हैं। अकबर की कब्र संगमरमर की बनी हुई है। भू-तल पर बनी कब्र असली है जबकि पहली मंजिल पर बनी कब्र नकली है।

दोनों कब्रों का निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है तथा उन पर विभिन्न प्रकार के फूल बनाए गए हैं। कब्र के सिराहने अल्लाहु अकबर और पैरों की तरफ जल्ले-जलालहु उभरे हुए अक्षरों में खुदा हुआ है। मकबरे में अल्लाह के निन्यानवे नामों के साथ हिन्दुओं का स्वास्तिक चिह्न तथा ईसाइयों का क्रॉस भी बना हुआ हैं।

जहाँगीर काल का दूसरा प्रमुख भवन एतमादुद्दौला का मकबरा है। इसका निर्माण ई.1625 में नूरजहाँ ने अपने पिता घियासुद्दीन बेग की स्मृति में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से आगरा में करवाया था। मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे शृंगारदान भी कहा जाता है। इस मकबरे पर पैट्रा ड्यूरा की सजावट की गई है। इस मकबरे का स्थापत्य ताजमहल से साम्य रखता है। इस कारण इसे ‘बेबी ताज’ भी कहा जाता है।

कई जगह इस मकबरे की नक्काशी ताजमहल से भी अधिक सुंदर है। इस मकबरे के मध्य में एशियाई शैली का गुम्बद स्थित है। यहाँ के बगीचे और रास्ते इसकी सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं। यह भारत में बना पहला मकबरा है जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया। मकबरे को बड़े बगीचे में बनया गया है। मकबरे में रोशनी लाने के लिए जालीदार संगमरमर लगाया गया है।

मकबरे की दीवारों पर पेड़ पौधों, जानवरों और पक्षियों एवं मनुष्यों के चित्र उकेरे गए हैं। जबकि इस्लाम में मनुष्य आकृति को सजावट के रूप में इस्तेमाल करने की मनाही है। बटेश्वर से मिले शिलालेख के अनुसार यह मूलतः कच्छवाहा राजा परमार्दिदेव का महल था।

शाहजहाँ ने ई.1637 में आगरा में अंगूरी बाग का निर्माण करवाया। यह चारबाग शैली का उद्यान है तथा इसमें संगमरमर की बारादरियां, हौज, फव्वारे एवं बरामदे बने हुए हैं। बाग के उत्तर-पूर्व में शाही हम्माम बना हुआ है जिसमें आकर्षक भित्ति चित्र बने हैं। यह उद्यान लाल किले के खास बाग का हिस्सा है तथा शाहजहाँ के हरम की औरतों द्वारा प्रयुक्त किया जाता था। उस काल में इस बाग में उत्तम किस्म के अंगूरों की बेलें लगाई गई थीं।

जहाँगीर के समय अन्य नगरों में निर्मित भवन

प्रयागराज में स्थित खुसरो बाग का निर्माण जहाँगीर ने कवाया था। उसने इस उद्यान में अपनी कच्छवाही बेगम मानबाई, उसके पुत्र खुसरो मिर्जा तथा पुत्री सुल्ताना निथार बेगम के मकबरे बनवाए। ये मकबरे मुगल शाहजादों एवं बेगमों के मकबरों की तुलना में बहुत छोटे तथा साधारण हैं।

जहाँगीर ने अपनी बेगम मेहरुन्निसा के लिये श्रीनगर में डल झील के किनारे शालीमार बाग बनवाया। इस बाग में चार स्तर पर उद्यान बने हैं एवं जलधारा बहती है। इसकी जलापूर्ति निकटवर्ती हरिवन बाग से होती है। जहाँगीर की बेगम नूरजहां ने जालंधर से 40 किलोमीटर दूर नूरमहल सराय का निर्माण करवाया। यह लाल पत्थर से बना हुआ दो मंजिला भवन है। इसे अष्टकोणीय बनाया गया है।

इसके पश्चिमी दरवाजे को लाहौर दरवाजा कहा जाता है। इसके बाहरी पैनल्स पर पशु-पक्षी उत्कीर्ण हैं। हाथियों की लड़ाई तथा घुड़सवारों द्वारा चौगान खेलने के दृश्य भी बनाए गए थे।

ई.1607 में जहाँगीर ने पंजाब में लौहार से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में शेखुपुरा नामक उपनगर की स्थापना की जो अब पाकिस्तान में है। जहाँगीर ने यहाँ स्थित प्राचीन दुर्ग में कई निर्माण करवाए तथा अपने एक प्रिय हिरन ‘मनसिराज’ की स्मृति में ‘हिरन मीनार’ का निर्माण करवाया। यह संभवतः अकेला स्मारक है जो मुगलों ने किसी पशु की स्मृति में करवाया था।

फतेहपुर सीकरी में भी हिरन मीनार है किंतु वह हिरनों के शिकार के लिए है। हिरन मीनारों के नाम से अन्य स्थानों पर भी मीनारें मिलती हैं। अकबर ने कोस मीनारों पर उन हिरनों के सींग लगाए थे जिना शिकार उसने या उसके सैनिकों ने किया था।

जहाँगीर ने अजमेर में आनासागर झील के किनारे दौलत बाग बनवाया जिसमें संगमरमर की बारादरियां एवं मेहराबयुक्त दरवाजे बनवाए। जहाँगीर ने दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। जहाँगीर ने यहाँ पर कुछ बारादरियां भी बनवाईं। दौलतबाग की तरफ आनासागर झील की सुंदर रेलिंग भी संभवतः जहाँगीर द्वारा बनवाई गई थी। झील के तट पर बने ऊंचे चबूतरे पर जहाँगीर द्वारा कुछ खूबसूरत मेहराबदार दरवाजे बनाए गए थे। ये दरवाजे भी संगमरमर से बने हैं।

तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में जहाँगीर ने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। तारागढ़ की घाटी में जहाँगीर ने एक शिकारगाह का भी निर्माण करवाया। जहाँगीर तथा उसके अमीरों एवं बेगमों ने लाहौर तथा उसके आसपास के नगरों में कई इमारतें बनवाईं। इनमें अनारकली का मकबरा, मकातिब खाना, बेगम शाही मस्जिद, वजीर खाँ मस्जिद, जहाँगीर का मकबरा अधिक प्रसिद्ध हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

अ. मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

ब. बाबर कालीन स्थापत्य

स. हुमायूँ कालीन स्थापत्य

द. अकबर कालीन स्थापत्य

य. जहाँगीर कालीन स्थापत्य

र. शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ल. ताजमहल का स्थापत्य

व. औरंगजेब कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

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शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य मुगल शासन काल की स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। कुछ इतिहासकारों ने शाहजहाँ को निर्माताओं का शहजादा कहा है।

स्थापत्य कला का स्वर्णयुग

इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन-काल स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला का ज्ञाता था। शाहजहाँ युगीन भवन कला अकबर एवं जहाँगीर के काल की भवन कला से आगे का विकास है।

इस समय तक भारत के सुदूर क्षेत्र भी मुगलों के अधीन आ चुके थे और उन क्षेत्रों की स्थापत्य कला भी मुगलों द्वारा अपने भवनों में शामिल की गई। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे ‘निर्माताओं का शहजादा’ कहा जाता है।

अकबर ने अपने समय के सबसे सुंदर महल बनाए थे। जहाँगीर के काल में मुगल स्थापत्य में ‘यूरोपीय मोटिफ’ शामिल किए गए। शाहजहाँ कालीन स्थापत्य में तकनीकी रूप से आमूलचूल परिवर्तन हो गया तथा निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया।

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य में आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बने।

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था।

कतिपय अन्य विद्वान शाहजहाँ कालीन स्थापत्य को भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी। वस्तुतः इस काल में भी बहुत से प्राचीन हिन्दू भवनों को मुगल स्थापत्य में ढाला गया।

इस काल में नक्काशी युक्त या पर्णिल मेहराब (फोलिएटेड आर्च) बनने लगे। गुम्बद ने भी फारसी आकार ले लिया। भवनों के आकार, शैली और सजावट की दृष्टि से इस काल में बने भवन सम्पूर्ण मुगल काल में बने भवनों से अधिक महत्वपूर्ण थे। शाहजहाँ के काल में बने भवनों की कुछ विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

(1.) इस काल में मेहराब ने नया आकार ग्रहण कर लिया जिसमें घुमावदार फूल-पत्ती का प्रयोग और संगमरमर का तोरण-पथ (छतयुक्त मेहराबों की शृंखला) प्रमुख था। इस काल में नक्काशीयुक्त एवं दांतेदार मेहराब भी बने।

(2.) शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है।

(3.) गुम्बद कंदीय आकृति (बल्ब शेप) में बनने लगे और दोहरे गुम्बद का प्रचलन आम हो गया। इस काल के गुम्बद ऊँचे उठे हुए हैं।

(3.) अलंकरण और पच्चीकारी के लिए रंगीन टाइलों का प्रयोग तथा पच्चीकारी के रूप में पैट्रा ड्यूरा तकनीक का प्रचुर रूप से प्रयोग हुआ।

(4.) भवनों के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर की जगह सफेद संगमरमर को प्रमुखता दी गई। हालांकि लाल बलुआ पत्थर का उपयोग भी जारी रहा।

(5.) इस काल के भवनों में बंगला शैली के कंगूरे भी देखे जाते हैं।

(6.) शाहजहाँ कालीन भवनों में कुछ बड़े परिवर्तन भी दिखाई देते हैं। इस काल में आयताकार महलों के स्थान पर वृत्ताकार महल भी बने।

(7.) आगरा की मोती मस्जिद तथा दिल्ली की जामा मस्जिद में शाहजहाँ ने स्थापत्य सम्बन्धी कुछ ऐसे प्रयोग किए जिनसे मस्जिद में आने वाले नमाजियों को प्रसन्नता का अनुभव हो। इन मस्जिदों के विभिन्न निर्माणों में संतुलन स्थापित किया गया तथा उन्हें विस्तृत आकार में बनाया गया।

शाहजहाँ कालीन आगरा के भवन

शाहजहाँ ने आगरा के दुर्ग में पहले से ही बने हुए बलुआ पत्थर के बहुत से भवनों को संगमरमर से सजाया। इस दुर्ग में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, मुसम्मन-बुर्ज, शीश महल, खास महल, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद मुख्य हैं। खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है।

यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था। शाहजहाँ ने इन भवनों के साथ ताजमहल की तरफ उन्मुख आलिन्द (छज्जे) वाला एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज़ बनवाया था जिसे मुसम्मन बुर्ज तथा शाह बुर्ज कहते थे।

यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा ने ई.1648 में आगरा के किले के उत्तर-पश्चिम में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। मस्जिद की छत के प्रत्येक कोने पर एक-एक अष्टकोणीय गुम्बददार छतरी है। इसके ऊपरी भाग पर तीन बड़े गुम्बद तथा चार सुंदर मीनारें स्थित हैं।

वी. पी. सक्सेना ने लिखा है- ‘यह साहसी विधवा की एक सुंदर कृति है।’ आगरा स्थित चीनी का रौजा में शाहजहाँ के मंत्री अल्लामा अफज़ल खान मुल्ला की कब्र है। मकबरे का मुख्य द्वार मक्का की ओर रखा गया है। इस मकबरे के बाहरी भाग पर चमकदार टायल्स लगाई गई हैं जिन्हें ‘कशीकारी’ एवं ‘चीनी कला’ भी कहा जाता है।

इसके गुम्बद मुगल शैली के अन्य गुम्बदों की तरह आनुपातिक नहीं हैं। नीची गुम्बदों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह ईरानी शैली का मकबरा है। गुंबद की भीतरी छत पर तस्वीरों और इस्लामिक लिखावट के चिह्न देखे जा सकते हैं। गुंबद के ऊपर कुरान की कुछ आयतें खुदी हुई हैं।

शाहजहाँ कालीन दिल्ली के भवन

ई.1638 में शाहजहाँ ने यमुना नदी के दाएं तट पर एक सुनिश्चित योजना के अनुसार शाहजहाँनाबाद बसाना आरम्भ किया। इसके मुख्य दरवाजों से दो बड़े आम रास्ते निकलते थे जो नगर की दीवारों में बने दरवाजों तक जाते हैं और इस प्रकार जो कोण बनता है उसी में जामा मस्जिद बनाई गई है। शाहजहाँनाबाद उत्तर से दक्षिण की ओर समानांतर चतुर्भुज के आकार का बना हुआ है।

आगरा के किले की तरह यह भी एक परकोट से घिरा हुआ है। शाहजहाँ ने ई.1638 में लाल किले का निर्माण आरम्भ करवाया। यह ई.1647 में बनकर तैयार हुआ। दिल्ली के लाल किले को प्रारम्भ में किला-ए-मुल्ला कहा जाता था। यह आगरा के लाल किले की तुलना में बहुत छोटा है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं। तीनों ओर का मार्ग स्तम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन स्तम्भों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई थी तथा पत्थरों को खोदकर उनमें रत्नों की जड़ाई की गई थी।

लाल किले की इमारतों में दीवान-ए-खास सर्वाधिक अलंकृत भवन है। इसके बाहरी भाग में पाँच मेहराबदार रास्ते हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है।

यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं और पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।

रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। दिल्ली के लाल किले में स्थित रंगमहल एक महत्त्वपूर्ण इमारत है। यह शाहजहाँ का हरम था। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।

शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है। इसका निर्माण ई.1650 में आरम्भ करवाया गया और ई.1656 में पूरा हुआ। यह भारत की सबसे विशाल मस्जिद है। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।

मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिये विशाल स्थान उपलब्ध है। इसके सामने के सहन में वजू करने का कुण्ड है। नमाज स्थल के बीच के बाहरी दरवाजे के दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं। इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं।

इसका मुख्य कक्ष बहुत सुंदर है। इसमें ग्यारह मेहराब हैं जिसमें बीच वाला मेहराब अन्य से कुछ बड़ा है। इसके ऊपर बने तीन विशाल गुंबदों को सफेद और काले संगमरमर से सजाया गया है जो निजामुद्दीन दरगाह की याद दिलाते हैं।

शाहजहाँ ने दिल्ली में चांदनी चौक का निर्माण करवाया। इसकी योजना शहजादी जहाँआरा ने तैयार की। इसमें मूल रूप से एक दूसरे को काटने वाली सीधी नहरें बनाई गई थीं जिनमें चंद्रमा की चांदनी झिलमिलाया करती थी। इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा।

शाहजहाँ कालीन अन्य इमारतें

शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली और लाहौर के अतिरिक्त काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और काशमीर आदि नगरों में भी लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाईं। शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह ने कश्मीर में मौलवी अखूंद मस्जिद और परी महल बनवाए तथा आगरा एवं दिल्ली में पुस्तकालयों का निर्माण करके ईरान आदि देशों से महत्वपूर्ण पुस्तकें मंगवाकर उनके अनुवाद एवं प्रतिलिपियां तैयार करवाईं।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा में भी वास्तुकला सहित विभिन्न प्रकार की कलाओं के प्रति प्रेम था। शाहजहाँ के काल में मुगल शहजादों एवं शहजादियों ने जो भवन बनवाए, वैसे उत्कृष्ट भवन फिर कभी मुगलों द्वारा नहीं बनाए जा सके। सिंध प्रांत के थट्टा नगर में शाहजहाँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे शाहजहाँ मस्जिद कहा जाता है।

नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ ने ई.1633 में श्रीनगर की डल झील के पूर्वी तट पर निशात बाग बनवाया। यह कश्मीर घाटी का सबसे बड़ा उद्यान है। इसे सीढ़ीदार शैली में बनाया गया है जिसे अंग्रेजी में ‘टैरेस गार्डन’ कहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

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ताजमहल का स्थापत्य

मुख्य भवन के बाहर बने इवान, ऊपरी हिस्से में बने गुम्बद तथा इसके चारों ओर बनी मीनारों के आधार पर ताजमहल का स्थापत्य निश्चित रूप से एक मुगल स्थापत्य होने की गवाही देता है किंतु इस भवन का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य की विशेषताओं से युक्त है।

आगरा का ताजमहल, शाहजहाँ द्वारा बनवाई गई सर्वाधिक शानदार इमारत है। यह शाहजहाँ की प्रिय बेगम अर्जुमंद बानो का मकबरा है। इस भवन के निर्माण में बहुत बड़ी मात्रा में महंगे रत्न लगाए गए। इस मकबरे को मुगल स्थापत्य का अंतिम पड़ाव माना जा सकता है। यह श्वेत संगमरमर से निर्मित सुंदर भवन है जिसकी गणना विश्व के सुंदरतम भवनों में होती है। 

ताजमहल तीन ओर से एक चारदीवारी से घिरा हुआ है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी है। इन दीवारों के भीतर, बागों से लगे हुए, स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं। यह हिंदू मन्दिरों की शैली है। दीवार में बीच-बीच में गुम्बद वाली गुमटियाँ भी हैं। परिसर के चारों कोनों पर चार चौड़े-चौड़े मेहराबदार मण्डप हैं। चाहरदीवारी के भीतर एक वर्गाकार बाग है जिसके उत्तरी सिरे पर ऊँची कुर्सी पर सफेद संगमरमरी मकबरा स्थित है जिसे ताजमहल कहते हैं।

तीन ओर की चाहर-दीवारी में से एक दीवार में मुख्य दरवाज़ा बना हुआ है जिसका निर्माण भव्य स्मारक की तरह किया गया है। यह संगमरमर एवं लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की नकल है। इसके पिश्ताक एवं मेहराबों पर सुलेखन से अलंकरण किया गया है।

ताजमहल का स्थापत्य बास रिलीफए पैट्रा ड्यूरा की पच्चीकारी एवं पुष्प आदि आकृतियों से सजाया गया है। मेहराबी छत एवं दीवारों पर यहाँ की अन्य इमारतों के समान ज्यामितीय अंकन किए गए हैं। मकबरे के मुख्य भवन के बाहर संगममर से निर्मित एक भव्य ‘ईवान’ अर्थात् ‘विशाल मेहराब रूपी द्वार’ है।

मुख्य मकबरे के भवन के ऊपरी भाग में एक प्याजनुमा दोहरा गुम्बद (बल्बस डबल डोम) बना हुआ है। यह उच्च कोटि के सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इस इमारत का सर्वाधिक शानदार भाग है। इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर अर्थात् 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है। गुम्बद का शिखर एक उलटे रखे हुए कमल से अलंकृत है।

यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर जोड़ता है। मुख्य गुम्बद के शिखर पर एक कलश रखा हुआ है। यह शिखर-कलश सत्रहवीं एवं अठराहवीं सदी तक सोने का बना हुआ था। उन्नीसवीं सदी में स्वर्णकलश के स्थान पर कांसे का कलश रख दिया गया। यह शिखर-कलश हिन्दू वास्तुकला का अंग है तथा हिन्दू मन्दिरों के शिखरों पर अनिवार्यतः पाया जाता है। इस कलश पर द्वितीया का चंद्रमा बना हुआ है, जिसकी नोक स्वर्ग की ओर संकेत करती है।

गुम्बद के चारों ओर लगी चार छोटी गुम्बदाकार छतरियों से गुम्बद को और भव्यता प्राप्त होती है। छतरियों के गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार की प्रतिलिपियाँ ही हैं, केवल आकार का अंतर है। इनके स्तम्भाकार आधार, छत पर आंतरिक प्रकाश की व्यवस्था हेतु खुले हैं। संगमरमर के ऊँचे सुसज्जित गुलदस्ते, गुम्बद की ऊँचाई को और अधिक बल देते हैं।

मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दृश्य को एक चौखटे में बांधती हुई प्रतीत होती हैं। ये मीनारें 40-40 मीटर ऊँची हैं तथा बनावट में तिमंजिली हैं। मीनारों के कारण मकबरे का वास्तु-कलात्मक प्रभाव चारों ओर विस्तारित हो गया है। इन मीनारों को देखकर भ्रम होता है कि ये मस्जिद में अजान देने के लिए बनाई गई हैं। प्रत्येक मीनार दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है।

मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है, जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं। इन पर वही कमलाकार आकृति एवं किरीट कलश भी हैं। चारों मीनारें बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुई हैं ताकि यदि कभी ये गिरें तो बाहर की ओर गिरें एवं मुख्य इमारत को कोई क्षति न पहुँचे।

ताजमहल का स्थापत्य पूर्ववर्ती मुगल संरचनाओं से कुछ अलग है। ताजमहल की मेहराबों की बनावट में, पूर्ववर्ती भवनों की तुलना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। ताजमहल की लगभग समस्त मेहराबें पत्तियोंदार या नोंकदार हैं। मकबरे का मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है। इसका मुख्य-कक्ष अष्टकोणीय एवं घनाकार बना हुआ है जिसकी प्रत्येक भुजा 55 मीटर है।

यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतः सममितीय है, जो कि इस इमारत को अष्टकोणीय बनाती है परन्तु कोने की चारों भुजाएं शेष चार भुजाओं से काफी छोटी होने के कारण, इसे वर्गाकार रचना कहना ही उचित होगा। इस कक्ष के प्रत्येक फलक में एक प्रवेश-द्वार है। इनमें से केवल दक्षिण बाग की ओर का प्रवेशद्वार ही प्रयोग होता है।

आंतरिक दीवारें लगभग 25 मीटर ऊँची हैं एवं एक आभासी आंतरिक गुम्बद से ढंकी हैं जिस पर सूर्य का चिह्न अंकित है। इस कक्ष में कुल आठ पिश्ताक बने हैं। बाहरी ओर प्रत्येक निचले पिश्ताक पर एक दूसरा पिश्ताक लगभग दीवार के मध्य तक जाता है।

चार केन्द्रीय ऊपरी मेहराब छज्जा बनाते हैं एवं हरेक छज्जे की बाहरी खिड़की एक संगमरमर की जाली से ढंकी है। छज्जों की खिड़कियों के अलावा, छत पर बनीं छतरियों से ढंके खुले छिद्रों से भी प्रकाश आता है।

मुख्य कक्ष को बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की ‘लैपिडरी-आर्ट’ से सजाया गया है। साथ ही कक्ष की प्रत्येक दीवार ‘डैडो बास रिलीफ’ एवं ‘कैलिग्राफी’ से भी अलंकृत की गई है जो कि इमारत के बाहरी नमूनों को बारीकी से दिखाती है। आठ संगमरमर के फलकों से बनी जालियों का अष्टकोण, कब्रों को घेरे हुए है।

हरेक फलक की जाली पच्चीकारी के महीन कार्य से गठित है। शेष सतह पर बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की अति महीन जड़ाऊ पच्चीकारी की गई है, जो कि पुष्प, लता एवं फलों से सज्जित है। जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है। अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं।

मेहराब के दोनों ओर के स्पैन्ड्रल में अमूर्त प्रारूप प्रयुक्त किए गए हैं, विशेषकर आधार, मीनारें, द्वार, मस्जिद, और मकबरे की सतह पर। बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में पत्थर की नक्काशी से, विस्तृत ज्यामितीय नमूने बनाकर अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं। यहाँ ‘हैरिंगबोन’ शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है।

लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमरमर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं। संगमरमर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है।

इनकी डिजाइनों में अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं। फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को ‘टैसेलेशन’ नमूने में प्रयोग किया गया है। मकबरे की निचली दीवारों पर पादप रूपांकन मिलते हैं।

ये श्वेत संगमरमर के नमूने हैं जिनमें सजीव ‘बास रिलीफ’ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है। संगमरमर को खूब चिकना करके और चमकाकर महीनतम ब्यौरे को भी निखारा गया है। ‘डैडो’ साँचे एवं मेहराबों के ‘स्पैन्ड्रल’ पर भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकन हैं।

इन्हें ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है। इनमें पीले एवं काले संगमरमर, जैस्पर तथा हरे पत्थर जडे़ गए हैं जिन्हें दीवार की सतह से मिलाने के लिए घिसाई की गई है।

ताजमहल की अत्यन्त सुन्दर खुदाई और जड़ाई भारतीय शिल्पकारों की स्थापत्य दक्षता का प्रमाण है। इस काल में पत्थर के शिल्पकार के छैनी-हथौड़े का स्थान, संगमरमर में पैट्रा ड्यूरा करने वाले कारीगरों एवं संगमरमर पर पाॅलिश करने वाल कारीगरों के बारीक औजारों ने ले लिया था।

मुख्य भवन में शाहजहाँ एवं मुमताज महल की नकली कब्रें स्थित हैं जो धरती से 22 फुट ऊँचाई पर बनाई गई हैं। बादशाह एवं बेगम की असली कब्रें इस कक्ष के ठीक नीचे बनी हुई हैं। इनके मुख मक्का की ओर हैं। मुमताज महल की कब्र आंतरिक कक्ष के मध्य में स्थित है। आधार एवं ऊपर का शृंगारदान रूप, दोनों ही बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों से जड़े हैं।

इस पर मुमताज की प्रशंसा में सुलेख लिखा गया है। इसके ढक्कन पर एक उठा हुआ आयताकार लोज़ैन्ज बना है, जो कि एक लेखन पट्ट का आभास देता है। शाहजहाँ की कब्र मुमताज की कब्र के दक्षिण ओर है। यह पूरे क्षेत्र में, एकमात्र दृश्य असम्मितीय घटक है। यह कब्र मुमताज की कब्र से बड़ी है, परंतु वही घटक एक वृहत्तर आधार दर्शाती है, जिस पर बना कुछ बड़ा शृंगारदान, लैपिडरी एवं सुलेखन से सुसज्जित है।

ताजमहल की दीवारों पर किए गए अलंकरण में सुलेखन, निराकार आकृतियां, ज्यामितीय आकृतियां तथा पादप रूपांकन प्रयुक्त किए गए हैं। ताजमहल में किया गया सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि का है। ये सुलेख फारसी लिपिक अमानत खाँ द्वारा लिखे गए हैं। सुलेखन के लिए जैस्पर को श्वेत संगमरमर के फलकों में जड़ा गया है। संगमरमर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अत्यंत नाजु़क, कोमल एवं महीन है। ऊँचाई का ध्यान रखा गया है।

ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है ताकि नीचे से पढ़ने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो। पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतें लिखी गई हैं। इन आयतों का चुनाव अमानत खाँ ने किया था। ताजमहल भवन के दोनों ओर लाल बलुआ पत्थर की दो इमारतें बनी हुई हैं। ये इमारतें मुख्य मकबरे की ओर मुंह किए हुए हैं।

सफेद संगमरमर के मकबरे के विपरीत प्रभाव को दर्शाने के लिए इन इमारतों में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। इनकी पीठ क्रमशः पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुड़ी हुई हैं एवं दोनों इमातरें एक दूसरे की प्रतिबिम्ब जान पड़ती हैं। पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है एवं पूर्वी इमारत को ‘जवाब’ कहते हैं जिसका प्राथमिक उद्देश्य सम्पूर्ण दृश्य में वास्तु-संतुलन स्थापित करना है।

यह आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती थी। मस्जिद में एक मेहराब कम है तथा उसमें मक्का की ओर आला बना है। ‘जवाब’ के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं जबकि ‘मस्जिद’ के फर्श में नमाज़ पढ़ने हेतु 569 बिछौनों (जा-नमाज़) के काले संगमरमर के प्रतिरूप बने हैं। मस्जिद का मूल रूप दिल्ली की जामा मस्जिद के समान है। एक बड़े दालान या कक्ष पर तीन गुम्बद बने हैं।

ताजमहल के चारों ओर चारबाग बना हुआ है। इस बाग में ऊँचा उठा हुआ पथ है जो इस चार बाग को 16 निम्न स्तर पर बनी क्यारियों में बांटता है। बाग के मध्य में एक उच्चतल पर बने तालाब में ताजमहल का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। यह मकबरे एवं मुख्य द्वार के बीच में बना हुआ है। बाग में वृक्षों की कतारें लगी हुई हैं एवं मुख्य द्वार से लेकर मकबरे तक फव्वारे लगाए गए हैं।

इस उच्च तल के तालाब को ‘अल हौद अल कवथार’ कहते हैं, जो कि मुहम्मद द्वारा प्रत्याशित अपारता के तालाब को दर्शाता है। चारबाग के बगीचे फारसी बागों से प्रेरित हैं। यह जन्नत की चार नदियों एवं पैराडाइज़ या फिरदौस के बागों की ओर संकेत करते हैं। यह शब्द फारसी शब्द पारिदाइजा़ से बना शब्द है, जिसका अर्थ है- ‘दीवारों से रक्षित बाग’।

फारसी रहस्यवाद में मुगल कालीन इस्लामी पाठ्य में फिरदौस को एक आदर्श बाग बताया गया है। इसमें कि एक केन्द्रीय पर्वत या स्रोत या फव्वारे से चार नदियाँ चारों दिशाओं, उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम की ओर बहतीं हैं, जो बाग को चार भागों में बांटतीं हैं।

चारबाग शैली के मुगल उद्यानों के केन्द्र में मुख्य भवन स्थित होता है किंतु ताजमहल इस उद्यान के अंत में स्थित है। यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के प्रारूप का हिस्सा थी और उसे भी स्वर्ग की नदियों में से एक गिना जाना चाहिए था।

बाग के प्रारूप एवं उसके वास्तु-लक्षण जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमरमर के पैदल पथ एवं काश्मीर के शालीमार बाग की तरह बनी ज्यामितीय ईंट-जड़ित क्यारियों से अनुमान होता है कि शालीमार बाग तथा ताजमहल के बाग का वास्तुकार संभवतः एक ही था अर्थात् अली मर्दान ने इन दोनों बागों की योजना बनाई थी। बाग के आरम्भिक विवरणों में इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों-वृक्षों की अधिकता का उल्लेख है।

ई.1908 में लॉर्ड कर्जन ने चारबाग को इंगलैण्ड की गार्डन शैली में ढाल दिया। बैंगलोर के सैयद महमूद के पास उपलब्ध ग्रंथ दीवान-ए महन्दीस से पता चलता है कि ताजमहल का वास्तुकार उस्ताद अहदम लाहौरी था जिसे शाहजहाँ ने नादिर-उल-अस्र की उपाधि दी थी। ताजमहल का प्रधान मिस्त्री फारस का उस्ताद ईसा एफेंदी था। 

मुगल स्थापत्य की सर्वश्रेष्ठ इमारत

आगरा का ताजमहल शाजहाँ काल तथा सम्पूर्ण मुगल काल का सर्वोत्कृष्ट  स्थापत्य है। इसे विश्व के सात आश्चर्यों में भी गिना जाता है। ताजमहल की प्रशंसा करते हुए एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘सामग्री की सम्पन्नता, चित्र के वैचित्र्य तथा प्रभाव में इसकी समता करने वाला यूरोप अथवा एशिया में दूसरा मकबरा नहीं है।’

प्रसिद्ध इतिहासकार हेवेल ने लिखा है- ‘यह भारतीय स्त्री जाति का देवतुल्य स्मारक है। सुन्दर बाग और अनेक फव्वारों के मध्य स्थित ताजमहल एक काव्यमय रोमाण्टिक सौन्दर्य का सृजन करता है। वस्तुतः ताजमहल दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक और कला-पे्रमियों का मक्का बन गया है।’

डॉ. बनारसी ने लिखा है- ‘चाहे ऐतिहासिक साहित्य का पूर्ण पु´ज नष्ट हो जाये और केवल यह भवन ही शाहजहाँ के शासनकाल की कहानी कहने को बाकी रह जाये तो इसमें संदेह नहीं, तब भी शाहजहाँ का शासनकाल सबसे अधिक शानदार कहा जायेगा।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

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औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य सर्वथा गौरवहीन है। इसका मुख्य कारण यह है कि वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसे यह पसंद नहीं था कि ऐसा कोई भवन बने जो इस्लाम की सादगी के सिद्धांत के विरुद्ध हो।

औरंगजेब के पिता शाहजहाँ तथा औरंगजेब के तीनों भाई चित्रकला, संगीतकला तथा स्थापत्य में रुचि रखते थे। औरंगजेब की दृष्टि में ये सब इस्लाम विरोधी कार्य थे। 

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब के शासनकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के निकट औरंगजेब की मरहूम बेगम रबिया-उद्-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का मकबरा बनवाया गया। इसे ‘बीबी का मकबरा’ तथा दक्कन का ताज’ भी कहा जाता है। इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया किंतु मीनारों में संतुलन न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया।

यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों तथा अन्य सजावटों में कोई विशेषता नहीं है। मक़बरे का गुम्बद संगमरमर के पत्थर से बना है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है। औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है।

औरंगजेब ने लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है। इसमें गोलाकार बंगाली छत और फूले हुए गुम्बद बनाए गए हैं। मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि भवन के ऊपर के गुम्बद तथा मीनारों के ऊपर के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में यह तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है।

यह लाल पत्थर से बनी मण्डलीय मस्जिदों में अंतिम है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई। औरंजेब द्वारा निर्मित लाहौर की बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनवाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति पर बनी है किंतु यह दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है।

औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजा के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। शाहजहाँ द्वारा निर्मित जामा मस्जिद से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है। शाहजहाँ की पुत्री रौशनआरा का निधन ई.1671 में हुआ। उसका मकबरा दिल्ली में बनाया गया।

इस मकबरे के चारों ओर बड़ा उद्यान था जिसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है। लाहौर दुर्ग के आलमगीरी दरवाजे का निर्माण औरंगजेब के काल में ई.1673 करवाया गया। औरंगजेब के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने चण्डीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर पिंजोर गार्डन बनवाया। यह बाग श्रीनगर के शालीमार बाग की शैली पर बना हुआ है तथा सात सीढ़ीदार क्यारियों (टैरेस-बैड) में लगा हुआ है।

बाग का मुख्य द्वार बाग के सबसे ऊँचे टैरेस में खुलता है। यहाँ पर एक महल बना हुआ है जिसका निर्माण राजस्थानी-मुगल शैली में हुआ है। इसे शीशमहल कहा जाता है। इससे लगता हुआ हवामहल है। दूसरी टैरेस पर रंगमहल है जिसमें मेहराबदार दरवाजे हैं।

औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी। इस काल में केन्द्रीय सत्ता के कमजोर हो जाने के कारण स्थापत्य शैली भी स्थानीय सत्ता की भांति आंचलिक प्रभाव ग्रहण करने लगी क्योंकि भवनों का निर्माण कार्य मुगल शहजादों के हाथों से निकलकर अवध के नवाब तथा अन्य आंचलिक प्रमुखों के हाथों में चला गया था।

कुछ भवन खानदेश और दक्षिण के अन्य भागों में भी बने किंतु वे शाहजहाँ कालीन स्थापत्य का स्तर प्राप्त करने में असफल रहे। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’

ई.1753-54 में दिल्ली में वजीर सफदर जंग का मकबरा बना। इस मकबरे का ऊध्र्व अनुपात (वर्टिकल प्रपोरशन) आवश्यकता से कहीं अधिक है फिर भी इसे मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है। मकबरे में सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। केन्द्रीय भवन में सफ़ेद संगमरमर से निर्मित एक बड़ा गुम्बद है। शेष भवन लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है।

इसका स्थापत्य हुमायूँ के मकबरे की डिजाइन पर आधारित है। मोती महल, जंगली महल और बादशाह पसंद नाम से पैवेलियन भी बने हुए हैं। चारों ओर पानी की चार नहरें हैं, जो चार इमारतों तक जाती हैं। मुख्य भवन से जुड़ी हुई चार अष्टकोणीय मीनारें हैं।

 दक्षिणी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित ज़फ़र महल मुगल काल का अंतिम ऐतिहासिक भवन है। इसके भीतरी ढांचे का निर्माण मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय) ने तथा बाहरी भाग और दरवाजे का निर्माण बहादुरशाह (द्वितीय) ने करवाया। संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से बनी इस तीन मंजिला इमारत का प्रवेशद्वार 50 फुट ऊँचा और 15 मीटर चैड़ा है।

इस द्वार का निर्माण बहादुर शाह ज़फ़र ने करवाया था। प्रवेश द्वार पर घुमावदार बंगाली गुंबजों और छोटे झरोखों का निर्माण किया गया है। जफर महल के मुख्य दरवाजे की मेहराब के ऊपरी भाग में दोनों तरफ पत्थर के दो कमल लगाए गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

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