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ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

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ब्रिटिश कालीन स्थापत्य - www.bharatkaitihas.com
ब्रिटिश कालीन स्थापत्य - विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत में अनेक विशाल भवन बनाए जिनमें भारतीय एवं मुस्लिम स्थापत्य शैलियों के साथ यूरोपीय स्थापत्य शैलियों का भी समावेश किया। इसे ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कह सकते हैं।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि यूरोपीय जातियों ने भारत में प्रवेश किया। उन्होंने यूरोपियन शैली के कुछ चर्च, फोर्ट एवं चैपल बनवाए।

सत्रहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

ई.1639 में सेण्ट जॉर्ज फोर्ट मद्रास का निर्माण प्रारम्भ हुआ। ई.1696 में कलकत्ता में फोर्ट विलियम का निर्माण हुआ। इसी दुर्ग में चर्च भी स्थापित किया गया था।

अठारहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

कैप्टन जॉन ब्रोहिअर की डिजायन पर ई.1757 से 1773 तक फोर्ट विलियम का पुनर्निर्माण किया गया। ई.1787 में कलकत्ता में सेण्ट जॉन चर्च बना। इस चर्च का नक्शा लेफ्टिनेण्ट एजीजी ने तैयार किया था। पर्सी ब्राउन के अनुसार यह नक्शा बालबुक के सेण्ट स्टीफेंस चर्च के नक्शे के आधार पर बनाया गया था।

उन्नीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी की ब्रिटिश-भारतीय स्थापत्य कला पर यूरोप की गोथिक शैली का प्रभाव है। यरोपीय शैली के आधार पर ई.1802 में कलकत्ता का गवर्नमेण्ट हाउस बनाया गया। चार्ल्स वायट ने इस भवन का नक्शा बनाया था जो कि डर्बीशायर के केडिल्सटन हॉल के नक्शे पर आधारित था। अंग्रेजों ने कलकत्ता सहित भारत के अन्य नगरों में भवन बनवाए। इनमें से बहुत से भवन भारतीय स्थापत्य कला पर आधारित थे।

ब्रिटिश शासन काल में कुछ भारतीय पूंजीपतियों ने बड़े-बड़े भवनों का निर्माण करवाया जिन पर यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रभाव है। इन भवनों के सामने यूरोपीय पद्धति के लॉन एवं ऑर्चर्ड्स होते थे। परन्तु इन भवनों में गैलरी एवं खम्भे भारतीय स्थापत्य कला के आधार पर बनते थे।

इस प्रकार की अर्द्ध-यूरोपीय स्थापत्य कला अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी। भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय करने में मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर एफ. एस. ग्राउज ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। सर स्विनटन जैकब ने बीकानेर और जयपुर रियासतों की स्थापत्य कला का अध्ययन करके भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कलाओं का श्रेष्ठ समन्वयन किया। आर. एल. चिशहोम तथा एच. इर्विन ने मद्रास में ऐसे भवन बनवाए जिनमें भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य कला का मिश्रण किया गया था।

पंजाब में सरदार रामसिंह ने स्थापत्य कला का एक नया नमूना प्रस्तुत किया। लाहौर का सीनेट हॉल इसी आधार पर बनाया गया। संयुक्त प्रदेश (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में एफ. सी. ओर्टेल ने और बंगाल में ई. बी. हैवेल ने भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय प्रस्तुत करने वाले भवन बनवाए। बम्बई में जी. विटेट ने गेट वे ऑफ इण्डिया और प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम का निर्माण करवाया।

चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन

ई.1876 में अंग्रेजों ने बम्बई में चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन बनवाया। ई.1928 में इस रेल्वे स्टेशन भवन का पुनर्निर्माण किया गया। पहले इस स्थान पर सेंट जॉर्ज फोर्ट की तरफ जाने वाली सड़क पर चर्चगेट नामक एक द्वार बना हुआ था जो सेंट थॉमस कैथेड्रल चर्च की ओर जाता था। बम्बई नगर का आकार बढ़ाने के लिए ई.1860 में इस गेट को ध्वस्त कर दिया गया था। उसी गेट की स्मृति में इस स्टेशन का नाम चर्चगेट रखा गया।

इस भवन की स्थापत्य शैली को स्विस शैलेट शैली कहा जाता है। यह शैली मूलतः स्विट्जरलैण्ड और मध्य यूरोप की अल्पाइन पहाड़ियों में स्थित गांवों में बने शैलेटों पर आधारित है।

बीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

बीसवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने भारत में राजकीय भवनों के निर्माण के लिए जे. रेन्सम की अध्यक्षता में पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट स्थापित किया। इस विभाग ने कलकत्ता एवं दिल्ली सहित भारत के अनेक नगरों में बड़े एवं प्रसिद्ध भवन बनाए।

विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

अंग्रेज सरकार ने ई.1906 में कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल बनवाना आरम्भ किया जो ई.1921 में पूरा हुआ। इस भवन का डिजायन विलियम इमर्सन ने तैयार किया था। विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में मकराना का सफेद संगमरमर लगाया गया। यह भवन यूरोपीय पुनरुद्धार कला का श्रेष्ठ उदाहरण है।

नई दिल्ली के भवन

जब ई.1911 में अंग्रेज अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले आए, तब उन्होंने दिल्ली में नए भवन बनवाने आरम्भ किए। ई.1930 में सर एडविन ल्यूटेन्स तथा सर एडवर्ड बेकर ने नई दिल्ली का नक्शा तैयार किया। इस काल में नई दिल्ली में निर्मित समस्त भवन यूरोपीय और भारतीय स्थापत्य कला की मिश्रित शैली पर बने थे। ये विशाल भवन चौड़ी सड़कों के दोनों ओर बने हैं तथा अत्यंत सादगी पूर्ण हैं। इन भवनों के बाहरी हिस्सों में खम्भे, आर्च एवं लॉन आदि बनाकर उन्हें प्रभावशाली बनाया गया है।

ई.1911 से 1947 तक की अवधि में अंग्रेजों ने नई दिल्ली में राजकीय कार्यालयों के भवनों के साथ-साथ अनेक गिरजाघर और ईसाई कब्रिस्तान बनवाए जिनमें यूरोपीय स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस काल में दिल्ली में बनवाए गए भवनों में वायसराय भवन, इण्डिया गेट तथा संसद भवन सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश कालीन स्थापत्य हैं।

वायसराय भवन

भारत में कार्यरत अंग्रेज सरकार ने ने ई.1912 में नई दिल्ली में वायसराय भवन का निर्माण आरम्भ किया जिसे अब राष्ट्रपति भवन कहते हैं। वायसराय भवन में चार मंजिलें हैं जिनमें कुल 340 कमरे हैं। इस भवन का कारपेट एरिया दो लाख वर्ग फुट (19,000 वर्ग मीटर) है।

वायसरराय भवन के निर्माण में 70 करोड़ ईटें और दस लाख घन फुट (85,000 क्यूबिक मीटर) पत्थर लगा। इसके अतिरिक्त स्टील और लकड़ी का उपयोग भी बहुतायत से किया गया। वायसराय भवन की निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए लुटियंस ने भारतीय कारीगरों का उपयोग किया तथा उनके लिए दिल्ली और लाहौर में कार्यशालाएँ स्थापित कीं।

वायसराय भवन का डिजाइन यूरोप के एडवर्डियन बारोक काल का है, उस काल में शासन की भव्यता प्रदर्शित करने के लिए भारी शास्त्रीय रूपांकनों का प्रयोग किया जाता था। लुटियंस के आरम्भिक डिजाइन पूर्णतः यूरोपियन क्लासिकल स्टाइल के थे। बाद में लुटियंस ने इस भवन के बाहरी डिजाइन में इंडो-सारसेनिक रूपांकनों (इण्डो-मुस्लिम शैली) को शामिल किया तथा इसमें विभिन्न भारतीय तत्वों को जोड़ा गया।

इनमें भवन के शीर्ष पर कई गोलाकार पत्थर के बेसिन शामिल थे। पारंपरिक भारतीय छज्जा भी सम्मिलित किया गया। यह एक पतला, फैला हुआ एलीमेंट था जो भवन से 8 फुट आगे तक बढ़ा हुआ था और गहरी छाया बनाता था। छज्जे के उपयोग से खिड़कियों पर गिरने वाली धूप एवं बरसात की सीधी बौछारों को रोकने में सहायता मिली। छत पर कई चुटरी थीं जो गुंबद से ढकी हुई नहीं थी। लुटियंस ने भारतीय डिजाइन तत्वों का पूरे भवन में संयम और प्रभावी ढंग से उपयोग किया।

स्तंभ के शीर्ष पर एक विशिष्ट रूप से अनोखा मुकुट है जिसमें कांस्य कमल के फूल से एक कांच का सितारा निकलता है। वायसराय भवन में राजस्थानी शैली की लाल बलुआ पत्थर की जालियां भी प्रयुक्त की गईं। महल के सामने पूर्व की ओर असमान रूप से फैले हुए 12 विशाल स्तंभ हैं। लुटियंस ने इस भवन में एक नॉन्स ऑर्डर भी लगाया जिसमें अशोक का लेख अंकित है। चार लटकन वाली भारतीय घंटियों के साथ अकेंथस के पत्तों का मिश्रण है। घंटियाँ भारतीय हिंदू और बौद्ध मंदिरों की शैली के समान हैं, यह अंकन कर्नाटक के मूदाबिद्री जैन मंदिर से प्रेरित है।

स्तंभ के शीर्ष पर प्रत्येक कोने पर एक घंटी है। ये शांत घंटियाँ इस बात की प्रतीक हैं कि भारत में ब्रिटिश राजवंश का अंत कभी नहीं होगा। वायसराय भवन से पहले के ब्रिटिश भवनों में इंडो-सरसेनिक रिवाइवल वास्तुकला का उपयोग किया गया था जिनमें मुगल वास्तुकला के तत्वों को अनिवार्य रूप से पश्चिमी ढांचे पर ग्राफ्ट किया गया था।

लुटियंस ने बहुत इस भवन के स्थापत्य में मौर्य कालीन बौद्ध कला से भी प्रेरणा ली। इसे देहली ऑर्डर और मुख्य गुंबद में देखा जा सकता है जहाँ नीचे के ड्रम की सजावट सांची बौद्ध स्तूप के चारों ओर की रेलिंग की याद दिलाती है। इसमें मुगल और यूरोपीय औपनिवेशिक स्थापत्य तत्वों की उपस्थिति है। यह संरचना अन्य समकालीन ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रतीकों से पूरी तरह अलग है।

लुटियंस ने वायसराय भवन में कई छोटे-छोटे अभिनव प्रयोग भी किए, जैसे कि उद्यान की दीवारों में एक क्षेत्र और स्टेटरूम में दो वेंटिलेटर खिड़कियाँ जो उनके चश्मे जैसी दिखती थीं। वाइसरीगल लॉज का अधिकांश भाग ई.1929 तक पूरा हो गया था। नई दिल्ली के अन्य भवनों के साथ ई.1931 में इस भवन का आधिकारिक उद्घाटन किया गया। ई.1932-33 में वायसराय भवन के बॉलरूम में महत्वपूर्ण सजावट जोड़ी गई जिसे इतालवी चित्रकार टॉमासो कर्नलो ने बनाया।

जयपुर स्तंभ में हाथियों की मूर्तियाँ और नागों की फव्वारा मूर्तियाँ भी लगाई गईं। साथ ही जयपुर स्तंभ के आधार के चारों ओर उभरी हुई आकृतियाँ भी थीं जिन्हें ब्रिटिश मूर्तिकार चार्ल्स सार्जेण्ट जैगर ने बनाया था।
भवन का लेआउट प्लान एक विशाल वर्गाकार भवन के चारों ओर डिजाइन किया गया है जिसके भीतर कई आँगन और खुले भीतरी क्षेत्र हैं। योजना में दो विंग बनाने का प्रस्ताव था; एक वायसराय के परिवार और उसके स्टाफ के लिए तथा दूसरा अतिथियों के लिए।

वायसराय भवन का रेजीडेंस विंग एक अलग चार मंजिला भवन है, जिसके भीतर इसका दरबार क्षेत्र भी है। यह विंग इतना बड़ा है कि भारत की आजादी के बाद प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने छोटे अतिथि विंग में ही अपना निवास बनाया। बाद में भारत के समस्त राष्ट्रपतियों ने भी इसी विंग में अपना आवास बनाया। वायसराय के लिए बनी रेजीडेंस विंग का उपयोग अब राजकीय स्वागत समारोहों और राष्ट्राध्यक्षों के आगमन के समय गेस्ट विंग के रूप में किया जाता है।

वायसराय भवन में बने गणतंत्र मंडप का वास्तविक नाम दरबार हॉल था। यह मुख्य भवन के दोहरे गुंबद के ठीक नीचे स्थित है। आजादी से पहले इसे सिंहासन कक्ष के रूप में जाना जाता था। इसमें वायसराय और उसकी पत्नी के लिए दो अलग-अलग सिंहासन थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रपति की एक ऊंची कुर्सी, 33 मीटर की ऊंचाई से लटके बेल्जियम के कांच के झूमर के नीचे रखी जाती है।

हॉल का फर्श चॉकलेटी रंग के इटैलियन संगमरमर से बना है। गणतंत्र मंडप के स्तंभ दिल्ली ऑर्डर में बने हैं जिनमें खड़ी रेखाओं को घंटी की आकृति से जोड़ा गया है। स्तंभ की खड़ी रेखाओं का उपयोग कमरे के चारों ओर बनी फ्रिज में भी किया गया है जो कि स्तंभों के पारंपरिक ग्रीक ऑर्डर में नहीं किया जाता। स्तंभ पीले जैसलमेरी संगमरमर से बने हैं, जिनके बीच में एक मोटी रेखा चलती है। गणतंत्र मंडप में 500 मनुष्य बैठ सकते हैं। इसी भवन में जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

वायसराय भवन में बने अशोक मंडप का वास्तविक नाम अशोक हॉल है। 32 मीटर गुणा 20 मीटर का एक आयताकार कमरा है। इसे लकड़ी के फर्श वाले नृत्य कक्ष के रूप में बनाया गया था। इसकी छत पर फारसी चित्रकला शैली का चित्रण है। यह चित्र मूलतः मेहर अली द्वारा कजर युग में बनाई गई एक ऑयल पेंटिंग की अनुकृति है। इसमें राजा फतह-अली शाह कजर के नेतृत्व में एक शाही शिकार अभियान को दर्शाया गया है। दीवारों पर इतालवी कलाकार टॉमासो कोलोनेलो द्वारा परिकल्पित भित्तिचित्र हैं जो फारसी लघुचित्र शैलियों से प्रेरित हैं।

वायसराय भवन के बीच में स्थित गुंबद में भारतीय और ब्रिटिश शैलियों का मिश्रण किया गया है। इनके बीच में एक ऊँचा ताँबे का मुख वाला गुंबद है जिसके कई हिस्सों में एक बहुत ऊँचे ढोल के ऊपर एक आकृति बनी हुई है जो भवन के बाकी हिस्सों से अलग दिखाई देती है। यह गुंबद वायसराय भवन के चारों कोनों के विकर्णों के ठीक बीच में है। यह भवन की ऊँचाई से दोगुने से भी अधिक ऊँचा है और शास्त्रीय और स्थानीय शैलियों का मिश्रण है। लुटियंस ने गुंबद को डिजाइन करते समय रोम के पैंथियन को एक मॉडल के रूप में लिया था, हालाँकि गुंबद के बाहरी हिस्से को भी आंशिक रूप से प्रारंभिक बौद्ध स्तूपों के अनुरूप बनाया गया।

मुगल गार्डन

मुगल गार्डन को अब अमृत उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान राष्ट्रपति भवन के पीछे स्थित है। इस उद्यान में मुगल और अंग्रेजी भूनिर्माण शैलियों का मिश्रण किया गया है और इसमें फूलों एवं वृक्षों की एक विशाल विविधता है। समकोण पर एक-दूसरे को काटती हुई दो मुख्य धाराएँ इस उद्यान को वर्गों के एक जाल में विभाजित करती हैं इनके संगम पर कमलकार छः फव्वारे हैं जिनकी ऊँचाई 12 फुट है।

पक्षियों को दाना खिलाने के लिए पक्षी-मेजें भी रखी गई हैं। मुख्य उद्यान के दोनों ओर ऊँचे स्तर पर, उद्यान की दो अनुदैर्ध्य पट्टियाँ हैं, जो उत्तरी और दक्षिणी सीमाएँ बनाती हैं। यहाँ उगाए गए पौधे मुख्य उद्यान के समान ही हैं। दोनों पट्टियों के मध्य में एक फव्वारा है, जो अंदर की ओर गिरता है और एक कुआँ बनाता है। पश्चिमी सिरे पर दो गजेबो और पूर्वी सिरे पर दो अलंकृत संतरी चौकियाँ हैं।

मुगल गार्डन के पश्चिम में पर्दा उद्यान है जो केंद्रीय फुटपाथ के दोनों ओर फैला हुआ है। यह फुटपाथ गोलाकार उद्यान की ओर जाता है। लगभग 12 फुट ऊँची दीवारों से घिरा यह उद्यान मुख्यतः गुलाबों का उद्यान है। इसमें 16 वर्गाकार क्यारियाँ हैं जो कम ऊँचाई वाली बाड़ों से घिरी हैं। केंद्रीय फुटपाथ के ऊपर बीच में लाल बलुआ पत्थर का एक परगोला है जो विभिन्न प्रकार की लताओं से घिरा हुआ है।

इण्डिया गेट

1920 के दशक तक दिल्ली में केवल एक ही रेलवे स्टेशन था जिसे अब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन कहते हैं। इस स्टेशन तक जाने वाली आगरा-दिल्ली रेलवे लाइन लुटियन्स दिल्ली और किंग्सवे अर्थात् राजाओं के गुजरने का रास्ता (आजादी के बाद राजपथ तथा अब कर्त्तव्य पथ) से होकर जाती थी। ई.1924 में अंग्रेज सरकार ने इस स्थान पर इण्डिया गेट बनाने का निश्चय किया। इसलिए यहाँ से निकलने वाली रेलवे लाइन को यमुना नदी के पास स्थानान्तरित किया गया।

ई.1931 में अंग्रेज सरकार ने किंग्सवे पर इण्डिया गेट का निर्माण करवाया। यह मूलतः युद्ध-स्मारक था जो प्रथम विश्वयुद्ध एवं अफगान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए 90 हजार भारतीय सैनिकों को समर्पित किया गया था। इसकी ऊँचाई 43 मीटर है। इसका डिजाइन सर बालेन शाह ने तैयार किया था। यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित है। इसे सन् 1931 में बनाया गया था। यूनाइटेड किंगडम के कुछ सैनिकों और अधिकारियों सहित कुल 13,300 सैनिकों के नाम इण्डिया गेट पर उत्कीर्ण हैं। यह स्मारक लाल और पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित है।

जब इण्डिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने इंग्लैण्ड के राजा जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी। उस मूर्ति को ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया। अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी रह गयी है। 625 मीटर के व्यास में स्थित इण्डिया गेट का षट्भुजीय क्षेत्र 306,000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला है।

मंदिरों का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर-वास्तु भी नवीन स्वरूप के साथ विकसित हुआ। दिल्ली का लक्ष्मीनारायण मंदिर, बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय के भवन, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी का भारत माता मंदिर बीसवीं शती के मंदिर-वास्तु की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

कुशीनगर में बने निर्वाण बिहार, बुद्ध मंदिर और सरकारी विश्रामगृह में बौद्ध कला को पुनर्जीवन मिला है। दिल्ली में लक्ष्मीनारायण मंदिर के साथ भी एक बुद्ध मंदिर है। इस काल में राजाओं के महलों और विद्यालय भवनों ने भी वास्तु-कला को नवीन स्वरूप प्रदान किया तथा हिन्दू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई स्थापत्य पद्धतियों के मेल से भारतीय स्थापत्य कला पूर्ण रूप से नवीन स्वरूप में ढल गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

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दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य से तात्पर्य दक्षिण भारत के मंदिर स्थापत्य एवं शैलियों से है जो प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल एवं आधुनिक काल में विकसित हुई हैं।

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य अपने आप में कितना अद्भुत है, इसका अनुमान प्रो. हीरेन के इस कथन से हो जाता है कि महाबलिपुरम् के कोरोमण्डल तट पर स्थित सात मंदिर या प्राचीन स्मारक ऐसी असाधारण रचनाएं हैं जिनके लिए यह सरलता से कहा जा सकता है कि वे मानव दक्षता और प्रवीणता के स्तर में बहुत विशिष्ट स्थान रखते हैं।

सामान्यतः नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित भूभाग को दक्षिण भारत कहा जाता है किंतु दक्षिण भारत को भी भौगोलिक आधार पर दो भागों में रखा जाता है- दक्षिणा-पथ और सुदूर दक्षिण। नर्बदा और कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्रों को दक्षिणा-पथ कहा जाता है और कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के दक्षिण के समस्त प्रायद्वीप को सुदूर दक्षिण कहा जाता है।

गुप्तकाल तक दक्षिण भारत में अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ किन्तु दक्षिण में मन्दिर-कला का वास्तविक विकास गुप्त-साम्राज्य के पतन के बाद अर्थात् छठी शताब्दी ईस्वी से आरम्भ हुआ। गुप्तों के पतन के बाद दक्षिणा-पथ में चालुक्यों और राष्ट्रकूटों की शक्ति का उदय हुआ।

इसी प्रकार सुदूर-दक्षिण में पल्लव, चोल, पाण्ड्य और चेर शक्तिशाली राज्य स्थापित हुए। इन राज्यों में मन्दिर-स्थापत्य की अच्छी प्रगति हुई जो कि मध्य-काल तक निरन्तर चलती रही।

दक्षिण भारत की मंदिर वास्तुकला उत्तर भारत की वास्तुकला से शैलीगत भिन्नताएं लिए हुए है। उत्तर भारत की मंदिर शैली को आर्य मंदिर शैली एवं नागर शैली कहा जाता था तथा दक्षिण भारत की मंदिर शैली द्रविड़़ मन्दिर शैली कहलाती थी। दोनों शैलियों के मिश्रण से निर्मित मन्दिर-शैली को बेसर शैली कहते थे।

यद्यपि इन शैलियों का उदय क्षेत्रीयता के आधार पर हुआ था किंतु इनकी सीमाएं अनुल्लंघनीय नहीं थीं। द्रविड़़ शैली के मन्दिर उत्तर भारत में भी मिले हैं और नागर शैली के मन्दिर दक्षिण भारत में। उदाहणार्थ, वृन्दावन का विशाल वैष्णव मन्दिर द्रविड़ शैली का है। इसी प्रकार बेसर शैली भी अपनी सीमाएं भेदकर दक्षिण भारत में चली गई।

बेसर शैली के मन्दिर चालुक्य नरेशों ने कन्नड़ प्रदेश में और होयसल राजाओं ने मैसूर में बनवाए। इनके स्थापत्य में ब्राह्मण, बौद्ध या जैन-धर्म का भेद नहीं रखा गया है। मंदिरों का विधान धर्म विशेष से पूरी तरह सम्बन्धित नहीं है।

कुछ वास्तुविदों ने बेसर शैली को पश्चात्वर्ती चालुक्य शैली कहा है परन्तु यथार्थतः यह आरम्भिक चालुक्य मन्दिरों की ही शैली है। होयसल मन्दिरों की भी यही शैली है। इन कारणों से इसे मात्र चालुक्य शैली कहना उचित नहीं होगा। वस्तुतः इस दिशा में होयसलों ने अधिक प्रयास किया। बेसर शैली के सुन्दरतम उदाहरण मैसूर राज्य में हलेबिद और वेलूर में हैं।

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य – द्रविड़ शैली

द्रविड़ शैली के मन्दिरों का निर्माण ऊँची जगति पर किया गया है तथा गर्भगृह और मण्डप साथ-साथ बनाए गए हैं। दक्षिण के अधिकांश मन्दिर शैव हैं, इसलिए मुख्य मण्डप के सामने नन्दी मण्डप को स्थान दिया गया है जिसमें गर्भगृह की ओर मुख किए हुए नन्दी की बैठी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

तल-विन्यास की दृष्टि से द्रविड़ शैली के मन्दिर गर्भगृह, मण्डप और नन्दी मण्डप एक प्राकार से आवेष्ठित होते हैं जिसमें बने प्रवेश द्वार को गोपुर कहते हैं। इस प्रकार द्रविड़़ शैली के प्रारम्भिक मन्दिरों में पांच अंग मिलते हैं- (1.) गर्भगृह (2.) मण्डप (3.) ननदी मण्डप (4.) प्राकार (5.) गोपुर।

बाद में बने द्रविड़ मंदिरों की शैली में अनेक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। बाद के मन्दिर बहुत बड़े क्षेत्र में बनाए जाने लगे। इन मंदिरों में चारों दिशाओं के मध्य में एक-एक द्वार बनाया जाता था। सबसे बाहर के प्राकार के प्रवेशद्वार (गोपुर) भव्य और ऊँचे होते थे।

इनकी तुलना में मूल विमान बहुत छोटा प्रतीत होता था। इन मन्दिरों के चारों ओर विशाल प्रांगण में अनेक प्रकार के भवन, पाठशालाएं और बाजार भी होते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार द्रविड़़ शैली के इन विशाल मन्दिरों को ‘मन्दिर-नगर’ कहना अधिक उचित होगा।

द्रविड़ शैली के मन्दिर गर्भगृह पर निर्मित विशाल पिरामिडनुमा शिखर के कारण दूर से ही पहचाने जाते हैं। द्रविड़़ शैली के मन्दिर में पाश्र्व से देखने में, ऊँचाई की दृष्टि से, पांच भाग दिखाई देते हैं। सबसे नीचे का भाग एक ऊँचा अधिष्ठान (प्लेटफॉर्म या जगती) है जिस पर गर्भगृह और मण्डप बनाए गए हैं। अधिष्ठान के ऊपर वर्गाकार गर्भगृह की दीवारें उठाई गई हैं।

दीवारों वाला लम्बवत् भाग जंघ कहलाता है जो तलवत् तीन भागों में विभक्त होता है, दीवार या जंघ के इन तीनों भागों में गवाक्ष बनाकर देव-प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। गर्भगृह की दीवारों के ऊपर पिरामिडाकार शिखर का उठान प्रारम्भ होता है। यह शिखर क्रमशः ऊपर उठते हुए तथा निरंतर संकरा होते हुए अनेक तलों के योग से अपना स्वरूप प्राप्त करता है।

पिरामिडाकार शैली में प्रत्येक तल सिमटते हुए अन्त में आधार तल का एक तिहाई रह जाता है। जाति-विमान के प्रत्येक तल को चारों ओर से लघु विमानों की पंक्ति से इस प्रकार अलंकृत किया जाता है कि कोनों पर कूट (वर्गाकार लघु विमान) और उसके बाद शाला (आयताकार पृष्ठ लघु विमान) और कूटों के रूप में क्रम से लगाए जाते हैं।

प्रत्येक तल पर इन लघु विमानों की पंक्ति एक मेखला के रूप में दिखाई देती है। शिखर के शीर्ष भाग पर, ग्रीवा के ऊपर, षड्कार विशाल पत्थर होता है जिसे ‘द्राविड़ी’ या ‘स्तूपी’ कहा जाता है। स्तूपी के ऊपर कलश स्थापित होता है। इस प्रकार गर्भगृह के ऊपर निर्मित शिखर दूर से ही दिखाई दे जाता है।

गर्भगृह के आगे स्तम्भों पर आधारित खुला या बन्द मण्डप बनाया जाता है जिसकी छत सपाट होती है। मुख्य मण्डप के आगे बना हुआ नन्दी मण्डप भी स्तम्भों पर आधारित सपाट छत से युक्त खुला मण्डप होता है। इस प्रकार द्रविड़ शैली के मन्दिर में नीचे से ऊपर की ओर जाति विमान के पांच भाग होते हैं- (1.) कलश, (2.) स्तूपी (3.) शिखर (अनेक तलों से युक्त) (4.) जंघा और (5.) अधिष्ठिान।

पश्चवर्ती-काल में गोपुरम् को विशेष महत्त्व दिया जाने लगा। यह मंदिर के आंगन का मुख्य द्वार होता है तथा प्रायः इतना ऊंचा होता है कि वह प्रधान मन्दिर के शिखर को छिपा देता है। आयताकार भूमि पर बना गोपुरम् ऊपर की ओर पतला होता हुआ अनेक मंजिलों में निर्मित ऐसी वास्तु-रचना है जिसके शिखर का मस्तक हाथी की पीठ के समान होता है।

इस पर तीन से ग्यारह तक कलश बैठाये जाते हैं। इसके नीचे के भाग में प्रवेश के लिए स्थान बना होता है। गोपुरम् का सौन्दर्य इसके तलों पर बनी असंख्य मूर्तियों के कारण प्रकट होता है। मदुरै के मीनाक्षी मन्दिर का गोपुरम् विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

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पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

गुप्तकाल एवं उससे पूर्ववर्ती काल में तमिल क्षेत्र को द्रविड़ प्रदेश कहा जाता था। उस काल की मंदिर कला में काष्ठ एवं कंदराओं का अधिक प्रयोग होता था। इसलिए प्रारम्भिक पल्लव शिल्पकारों ने पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला में उन्हीं प्रणालियों का उपयोग किया।

गुप्तकाल के पराभव के बाद जब छठी शताब्दी ईस्वी में सिंहविष्णु ने कांची एवं महाबलिपुरम् के आस-पास के प्रदेश पर अधिकार करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, तब पल्लव शिल्पकारों ने वास्तुकला में नए प्रयोग किए और मंदिर वास्तुकला को काष्ठकला और कन्दराकला के प्रभाव से मुक्त करने में विपुल सहयोग दिया। इसलिए यह कहना उचित होगा कि मंदिरों की द्रविड़ शैली का जन्म पल्लव शासकों के काल में महाबलिपुरम् और निकटवर्ती प्रदेश में हुआ।

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला को चार प्रमुख शैलियों में रखा जा सकता है- (1.) महेन्द्रवर्मन शैली, (2.) मामल्ल शैली (3.) राजसिंह शैली और (4.) नन्दिवर्मन शैली।

(1.) महेन्द्रवर्मन शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की महेन्द्रवर्मन शैली का विकास ई.610 से 640 के मध्य हुआ। इस शैली के मंदिरों को मण्डप कहा जाता है। ये मण्डप साधारण स्तम्भ युक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार में एक या अधिक कक्ष बनाये गये हैं। ये कक्ष कठोर पाषाण को काटकर गुहा मंदिर के रूप में बनाये गये हैं।

मण्डप के बाहरी द्वार पर दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। मण्डप के स्तम्भ सामान्यतः चैकोर हैं। महेन्द्र शैली के मण्डपों में मण्डगपट्टु का त्रिमूर्ति मण्डप, पल्लवरम् का पंचपाण्डव मण्डप, महेन्द्रवाड़ी का महेन्द्र विष्णुगृह मण्डप, मामण्डूर का विष्णु मण्डप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

(2.) मामल्ल शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की मामल्ल शैली का विकास ई.640 से 674 तक की अवधि में राजा नरसिंहवर्मन (प्रथम) के शासन काल में हुआ। नरसिंहवर्मन ने महामल्ल की उपाधि धारण की थी इसलिये इस शैली को महामल्ल अथवा मामल्ल शैली कहा जाता है। इसी राजा ने मामल्लपुरम् की स्थापना की जो बाद में महाबलीपुरम् कहलाया। इस शैली में दो प्रकार के मंदिरों का निर्माण हुआ है- (1.) मण्डप शैली के मंदिर तथा (2.) रथ शैली के मंदिर।

मण्डप शैली

मण्डप शैली के मंदिर महेन्द्रवर्मन शैली के जैसे ही हैं किंतु मामल्ल शैली में उनका विकसित रूप दिखाई देता है। महेन्द्रवर्मन शैली की अपेक्षा मामल्ल शैली के मण्डप अधिक अलंकृत हैं। इनके स्तम्भ सिंहों के शीर्ष पर स्थित हैं तथा स्तम्भों के शीर्ष मंगलघट आकार के हैं। आदिवराह मण्डप, महिषमर्दिनी मण्डप, पंचपाण्डव मण्डप तथा रामानुज मण्डप विशेष उल्लेखनीय हैं।

रथ शैली

रथ शैली के मंदिर विशाल चट्टानों को काटकर, काष्ठ-रथों की आकृतियों में बनाये गये हैं। इनकी वास्तुकला मण्डप शैली जैसी है। इन रथों का विकास बौद्ध विहार तथा चैत्यगृहों से हुआ है। प्रमुख रथ मंदिरों में द्रोपदी रथ, अर्जुन रथ, नकुल-सहदेव रथ, भीम रथ, धर्मराज रथ, गणेश रथ, पिडारि रथ आदि हैं। ये सब शैव मंदिर हैं। द्रोपदी रथ सबसे छोटा है।

धर्मराज रथ सबसे भव्य एवं प्रसिद्ध है। इसका शिखर पिरामिड के आकार का है। यह मंदिर दो भागों में है। नीचे का खण्ड वर्गाकार है तथा इससे लगा हुआ संयुक्त बरामदा है। यह रथ मंदिर आयताकार तथा शिखर ढोलकाकार है। मामल्ल शैली के रथ मंदिर मूर्तिकला के लिये भी प्रसिद्ध हैं। इन रथों पर दुर्गा, इन्द्र, शिव, गंगा, पार्वती, हरिहर, ब्रह्मा, स्कन्द आदि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। नरसिंहवर्मन (प्रथम) के साथ ही इस शैली का भी अंत हो गया।

(3.) राजसिंह शैली

नरसिंहवर्मन (द्वितीय) ने राजसिंह की उपाधि धारण की थी। इसलिये उसके नाम परपल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की इस शैली को राजसिंह शैली कहा जाता है। महाबलीपुरम् में समुद्रतट पर स्थित तटीय मंदिर और कांची में स्थित कैलाशनाथ मंदिर तथा बैकुण्ठ पेरुमाल मंदिर इस शैली के प्रमुख मंदिर हैं। इनमें महाबलीपुरम् का तटीय शिव मंदिर पल्लव स्थापत्य एवं शिल्प का अद्भुत स्मारक है।

यह मंदिर एक विशाल प्रांगण में बनाया गया है जिसका गर्भगृह समुद्र की ओर है तथा प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ तथा सीढ़ीदार शिखर है। शीर्ष पर स्तूपिका निर्मित है। इसकी दीवारों पर गणेश तथा स्कंद आदि देवताओं और गज एवं शार्दुल आदि बलशाली पशुओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

कांची के कैलाशनाथ मंदिर में राजसिंह शैली का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। इसका निर्माण नरसिंहवर्मन (द्वितीय) के शासन काल में आरंभ हुआ तथा उसके उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन (द्वितीय) के शासनकाल में पूर्ण हुआ। द्रविड़ शैली की समस्त विशेषतायें इस मंदिर में दिखाई देती हैं। मंदिर में शिव क्रीड़ाओं को अनेक मूर्तियों के माध्यम से अंकित किया गया है।

इस मंदिर के निर्माण के कुछ समय बाद ही बैकुण्ठ पेरुमल का मंदिर बना। इसमें प्रदक्षिणा-पथ युक्त गर्भगृह है तथा सोपान युक्त मण्डप है। मंदिर का विमान वर्गाकार तथा चार मंजिला है जिसकी ऊँचाई लगभग 60 फुट है। प्रथम मंजिल में भगवान विष्ण के विभिन्न अवतारों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर की भीतरी दीवारों पर राज्याभिषेक, उत्तराधिकार चयन, अश्वमेध, युद्ध एवं नगरीय जीवन के दृश्य अंकित किये गये हैं। यह मंदिर पल्लव वास्तुकला का पूर्ण विकसित स्वरूप प्रस्तुत करता है।

(4.) नन्दिवर्मन शैली

इस शैली के मंदिरों में वास्तुकला का कोई नवीन तत्व दिखाई नहीं देता किंतु आकार-प्रकार में ये निरंतर छोटे होते हुए दिखाई देते हैं। इस शैली के मंदिर, पूर्वकाल के पल्लव मंदिरों की प्रतिकृति मात्र हैं। ये मंदिर नंदिवर्मन तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासन में बने थे। इस शैली के मंदिरों में स्तम्भ शीर्षों में कुछ विकास दिखाई देता है।

इस शैली के मंदिरों में कांची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मंदिर तथा गुड़ीमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर उल्लेखनीय हैं। इनमें सजीवता का अभाव है जिससे अनुमान होता है कि इन मंदिरों के निर्माता किसी संकट में थे। दसवीं शताब्दी के अंत तक इन मंदिरों का निर्माण बंद हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

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राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला - कैलाश मंदिर एलोरा

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला दक्षिण भारत की प्रमुख मंदिर स्थापत्य शैलियों में से है। राष्ट्रकूट राजा उत्तर भारत में आने से पहले दक्षिण भारत में शासन करते थे।

एलौरा का कैलाश नाथ मन्दिर

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण एलौरा का कैलाश नाथ मन्दिर है। यह स्थान आन्ध्रप्रदेश के औरंगाबाद नगर से 15 मील की दूरी पर है।

कैलाश नाथ मन्दिर को राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम (ई.758-773) ने बनवाया था। इसमें गुहा-मन्दिर कला की एक अन्य शैली दिखाई देती है। गुहामंदिर के निर्माण में परम्परागत रूप से पर्वत के निचले भाग से खुदाई की जाती थी और उसे खोखला करते हुए ऊपर तक जाते थे परन्तु कैलाशनाथ मन्दिर को बनाने के लिए शिल्पकारों ने एक लम्बी पहाड़ी को शीर्ष से तराशना प्रारम्भ करके समूची पहाड़ी को ऊपर से नीचे तक तराश कर मन्दिर के समस्त अंग- छत, द्वार, झरोखे, खिड़कियां, स्तम्भ, तोरण, मण्डप, शिखर, गर्भगृह, चारों ओर के बरामदे आदि बनाए।

कैलाश नाथ मन्दिर का विमान समानान्तर चतुर्भज आकार में है। यह 150 फुट लम्बा और 100 फुट चैड़ा है। यह विमान 25 फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। मन्दिर के ऊपर के शिखर की ऊंचाई 95 फुट है। मन्दिर में एक गर्भगृह है जिसके आगे स्तम्भ युक्त मण्डप है, जो 70 फुट लम्बा और 60 फुट चौड़ा है।

इस प्रमुख इमारत के बाद एक नन्दी-मण्डप है जिसके दोनों ओर 51-51 फुट ऊंचे दो ध्वज स्तम्भ हैं। इन पर त्रिशूल स्थापित हैं। मुख्य मन्दिर के चारों ओर बरामदे हैं जिनके चारों ओर स्तम्भ पंक्तियां एवं कक्ष बनाए गए हैं। यह मन्दिर दो-मंजिला है तथा बिना किसी जोड़ के केवल एक चट्टान को तराश कर बनाया गया है।

मन्दिर के स्तम्भों पर प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, द्वारों पर मनोहर लताएं एवं पुष्प मन्जरियां बनाई गई हैं और शिखर पर शिव-पार्वती विवाह, इन्द्र-इंद्राणी की मूर्तियाँ और रावण द्वारा कैलाश-उत्तोलन आदि पौराणिक कथाओं के दृश्यों का अंकन किया गया है। तोरण के दोनों ओर एक-एक हाथी है।

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला – ऐलिफेण्टा की गुफाएं

बम्बई से लगभग 6 मील दूर धारापुरी नामक टापू में दो पहाड़ियों के ऊपरी भाग को काटकर मन्दिर एवं मूर्तियों का निर्माण किया गया है। इन्हें ऐलिफेण्टा की गुफाएं कहते हैं। ये भी राष्ट्रकूट काल में निर्मित मानी जाती हैं।

मूल रूप से इस स्थान को श्रीपुरी नाम दिया गया था जिसका अर्थ होता है लक्ष्मी की नगरी। जब पुर्तगालियों ने इस क्षेत्र पर अधिकार किया, तब यहां पर हाथी की विशाल मूर्ति का निर्माण किया गया। इस कारण इसे एलीफेण्टा कहने लगे।
एलोरा का कैलाश मंदिर और एलीफेंटा की गुफाओं के मंदिरों का स्थापत्य एक जैसा है। एलीफेंटा गुफाओं के प्रवेश द्वार पर द्वारपालों की विशाल प्रतिमाएं हैं।

गर्भगृह की दीवारों पर जटिल मूर्तिकला उकेरी गई है जिनमें नटराज, गंगाधर, अर्धनारीश्वर, सोमस्कंद और प्रसिद्ध त्रिमूर्ति की मूर्तियाँ शामिल हैं। छह मीटर ऊँची मूर्ति भगवान शिव के तीन रूपों- सर्जक, पालक और संहारक का प्रतिनिधित्व करती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

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चोल मन्दिर स्थापत्य कला

द्रविड़ मंदिर शैली का चरमात्कर्ष चोल मन्दिर स्थापत्य कला में हुआ। चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों का स्थान लिया था। इसलिए चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों की स्थापत्य कला को ही आगे बढ़ाया।

चोल मन्दिर स्थापत्य कला का कालखण्ड

चोल मन्दिरों का निर्माण ई.850 से 1200 तक निरन्तर होता रहा। इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है-

(1.) प्रारम्भिक मन्दिर- जिनकी रचना ई.850 से 985 के बीच हुई,

(2.) उत्तरवर्ती मन्दिर – जिनकी रचना ई.985 से 1200 के बीच हुई।

उत्तरवर्ती चोल काल (ई.1070-1250) में भी मन्दिरों का निर्माण उसी गति से होता रहा। इन मन्दिरों में दो प्रमुख हैं-

(1.) तंजौर जिले में स्थित कंपहेश्वर (त्रिभुवनाविरेश्वर) का मन्दिर और

(2.) तंजौर जिले में ही दारासुरम का एरावतेश्वर मन्दिर।

चोल मन्दिर स्थापत्य कला के प्रमुख उदाहरण

प्रारम्भिक चोल मन्दिरों में (1.) विजयालय (2.) भुवनकोणम् (3.) मुकुंदेश्वर (4. कदम्बर (5.) बाला सुब्रह्मण्य (6.) नत्तमलई (7.) कलियपट्टी (8.) त्रिचण्डीश्वर (9.) सुन्दरेश्वर (10.) नागेश्वर (11.) कोरंगनाथ और (12.) अगस्तेश्वर मन्दिर अधिक प्रसिद्ध हैं।

साढ़े तीन सौ साल के चोलों के दीर्घकालीन शासन में समूचा तमिल प्रदेश छोटे-बड़े मन्दिरों से भर गया। चोलों के शासन काल में प्रारम्भ में पत्थरों के भवन एवं बाद में ईंटों के भवन बने। इनमें सबसे पहला चिगलपट्ट जिले का तरूक्कलुक्कुनरम है। इसकी वास्तुकला परवर्ती-पल्लव या पूर्ववर्ती-चोल शैली से मिलती है।

इसके खम्भों के निचले अर्ध-भाग में पैर मोड़कर बैठे सिंह की आकृतियां हैं और खम्भों के शीर्ष पर मोटे शीर्ष-फलक हैं। चोल युग के प्रारम्भ में अपेक्षाकृत लघु मन्दिर बने थे। उनकी बनावट कांची के मुक्तेश्वर एवं बाहुर मन्दिरों के समान है। इसके बाद परांतक (प्रथम) से लेकर राजराजा (प्रथम) के शासन काल तक चोल मन्दिरों का भव्य स्वरूप सामने आया।

इन मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें मुख्य मंदिर शेष उपमन्दिरों पर आच्छादित सा प्रतीत होता है। इन मंदिरों में गर्भगृह के सामने का ‘अन्तराल’ मुख्य मन्दिर का ही समन्वित अंग है। ‘अन्तराल’ अपने वास्तविक अर्थों में गर्भगृह और सामने के महामण्डप के बीच आने-जाने का मार्ग है। इन मन्दिरों में ‘विमान’ गर्भगृह के ऊपर उठता गया है।

‘उपपीठ’ में कुमुदय का प्रारम्भ अष्ट-भुजा से होता है। बाद में यही ऊपर जाकर गोलाकार हो जाता है। मंदिरों के स्तम्भों में दण्ड और शीर्ष  के बीच ‘पद्मबन्ध’ है। शीर्ष में नीचे की ओर ‘कलश’ है। स्तम्भों के ‘शीर्ष-फलकों’ का विस्तार होता है जिन पर छत टिकती है।

एक वर्गाकार मोटा पत्थर जिसके साथ नीचे की ओर पंखुड़ी की बनावट भी रहती है, स्तम्भ की मुख्य विशेषता हो जाती है। चोल शासक आदित्य (प्रथम) ने कई शैव मन्दिर बनवाए जिनमें सुन्दरेश्वर मन्दिर, कुम्भकोणम का नागेश्वर तथा परान्तक (प्रथम) द्वारा निर्मित निवास नल्लूर का कोरंगनाथ मन्दिर बहुत प्रसिद्ध हुए।

कोरंगनाथ का मन्दिर

परान्तक (प्रथम) के समय का सबसे प्राचीन मन्दिर त्रिचनापल्ली जिले के श्रीनिवासनल्लूर में है। इसे कोरंगनाथ का मन्दिर कहते हैं। इस मन्दिर की लम्बाई 50 फुट है। इसमें 25 फुट गुणा 25 फुट का गर्भगृह और 25 फुट गुणा 25 फुट का मण्डप है। गर्भगृह के ऊपर 20 फुट ऊंचा शिखर है। विमान पर ऊभरी हुई मूर्तियों का प्रचुर अलंकरण है।

इन मूर्तियों में सबसे प्रसिद्ध मूर्ति काली की है। इसके एक ओर सरस्वती एवं दूसरी ओर लक्ष्मी की मूर्ति है। काली के नीचे एक असुर की मूर्ति उत्कीर्ण है। पल्लव कला में सिंह-मुखों के स्थान पर कुछ विचित्र पशुओं के मुख उत्कीर्ण किए गए हैं।

चोल मन्दिरों के दूसरे वर्ग में तीन मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है- तंजौर का राजराजेश्वर, गंगईकोण्ड चोलपुरम् का वृहदीश्वर तथा दारासुरम का एरावतेश्वर। ये तीनों मन्दिर द्रविड़ शैली और चोल कला के श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।

बृहदीश्वर मन्दिर

चोल शासक राजराज महान् ने तंजौर में बृहदीश्वर नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था जो बाद में ‘राजराजेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण के मन्दिरों में यह सबसे बड़ा तथा ऊंचा है। यह मन्दिर अपने गर्भगृह, मुख्य मण्डप, अर्ध मण्डप और नन्दी मण्डप के साथ 500 फुट लम्बे और 250 फुट चैड़े प्रांगण में स्थित है। सम्पूर्ण मन्दिर एक प्राकार के भीतर बना हुआ है।

इसका ‘गोपुरम्’ पूर्व दिशा में है। ‘मदिल’ से सटी स्तम्भों की पंक्तियां हैं। मंदिर परिसर में 35 उपमन्दिर स्थित हैं। इसका जाति-विमान 190 फुट ऊंचा है और इसका शिखर जंघा के ऊपर बने तेरह तलों में निर्मित है। क्षैतिज रूप में शिखर के प्रत्येक तल पर कूट, शाला और पंजर प्रकृति के लघु शिखरों का हार बना हुआ है। अन्तिम तल के हार पर चार नन्दी भी बने हुए हैं।

 विमान की ग्रीवा अष्टकोणीय है और उस पर विशाल एकाश्म किंतु अष्टकोणीय स्तूपी प्रतिष्ठित है। शिखर का शीर्ष भाग गोले के समान है। इसके चारों ओर चार पंखदार ताक बनाए गए हैं। मन्दिर का जाति विमान आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता है। कला की दृष्टि से यह मन्दिर उच्च कोटि का है। द्रविड़़ कला शैली के मन्दिरों में सम्भवतः यह सर्वश्रेष्ठ है।

गंगैकेाण्ड-चोलपुर मन्दिर

राजराज महान् के पुत्र राजेन्द्र चोल ने अपनी नवनिर्मित राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुर में एक बृहदीश्वर मन्दिर का निर्माण कराया। यह मंदिर 25 वर्षों में बनकर तैयार हुआ। देखने में यह तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर के सदृश्य है। इसलिए पर्सी ग्राउन ने इसे ‘तंजोर की संगिनी’ की संज्ञा दी है।

दोनों में अन्तर केवल अधिक विस्तार, अलंकरण और ब्यौरे का है। मन्दिर आयताकार है, जिसकी भुजाएं 340 फुट गुणा 100 फुट हैं। इसका शिखर 150 फुट ऊंचा है। मन्दिर को मुख्य रूप से पांचा भागों में बांटा जा सकता है- (1.) गर्भगृह, (2.) अन्तराल (3.) मण्डप (4.) अर्धमण्डप और

(5.) बहिर्भाग। इसका मण्डप 175 फुट लम्बा और 95 फुट चैड़ा है। मण्डप के  उत्तर और दक्षिणी सिरों पर दो भव्य द्वार हैं जिनके दोनों ओर ‘द्वारपालों’ की प्रभावशाली मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के सम्मुख विशाल मण्डप बना हुआ है जो 240 स्तम्भों पर खड़ा है। यह कक्ष एक चपटी छत से ढका है जिसकी धरती से ऊंचाई 18 फुट है। मन्दिर का विमान 160 फुट ऊंचा है।

इसका आधार 100 फुट गुणा 100 फुट है जो बीच में बनी एक भारी कार्निस के द्वारा दो भागों में विभक्त है। गर्भगृह की दीवारों की ऊंचाई 35 फुट है। इसमें दो मंजिल हैं। विमान का आकार पिरामिडनुमा है। इसमें आठ मंजिलें (तल) हैं। ऊपर की प्रत्येक मंजिल नीचे की मंजिल से छोटी है। तंजौर के मंदिर में मध्य भाग की रेखा सीधी है परन्तु गंगैकोण्ड चोलपुर के मन्दिर के मध्य भाग की रेखा वक्र है।

परिणास्वरूप यह मन्दिर देखने में अधिक सुन्दर लगता है परन्तु इसकी मजबूती कम हो गई है। तंजौर के मन्दिर में शक्ति सन्तुलन और गाम्भीर्य अधिक है। इस मन्दिर में सौन्दर्य और विलास अधिक है।

दारासुरम का मन्दिर

दारासुरम का मन्दिर चोल-पाण्ड्यकालीन है। इस समय तक चोल मन्दिर संरचना विशाल आकार के प्रतीक प्रतिबद्ध न होकर नए तत्त्वों का अन्वेषण करती प्रतीत होती है। इसलिए दारासुरम का मन्दिर न तो अधिक विशाल है और न प्राकार से घिरा हुआ है। इस मन्दिर की कल्पना एक ऐसे रथ के रूप में की गई है जिसे हाथी खींच रहे हैं। इसका जाति-विमान पंचतल है और ऊपरी तल पत्थर के स्थान पर ईंटों से निर्मित है।

चोल मूर्तिकला

चोल शिल्पी अपने समय के उत्कृष्टतम वास्तुकार एवं मूर्तिकार थे। उनकी शैली में सरलता और भव्यता का अपूर्व समन्वय था। उनके द्वारा निर्मित कांस्य मूर्तियाँ अद्वितीय हैं। चोल शिल्पियों ने विशाल मूर्तियों को बनाने के लिए धातु गलाने की उच्च-कोटि की तकनीक विकसित की।

पल्लव और चोल मन्दिर स्थापत्य कला में अंतर

मन्दिर वास्तु के संयोजन की दृष्टि से पल्लव और चोल मन्दिर स्थापत्य कला में कोई विशेष भेद नहीं है परन्तु स्थानीय शैलीगत विशेषताओं के कारण चोल मन्दिर स्थापत्य कला का विशिष्टि महत्त्व है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

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चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- एहोल, वातापी (बादामी) और पट्टडकल। एहोल में लगभग 70 मन्दिर मिले हैं जिनके कारण इस नगर को ‘मन्दिरों का नगर’ कहते हैं। समस्त मन्दिर गर्भगृह और मण्डपों से युक्त हैं परन्तु छतों की बनावट अलग-अलग है।

कुछ मन्दिरों की छतें चपटी हैं तो कुछ की ढलवां। ढलवां छतों पर शिखर भी हैं। स्थापत्य की दृष्टि से ये मंदिर अधिक परिपूर्ण नहीं हैं। चैलुक्यों के प्रारम्भिक मन्दिरों में लालाखां का मन्दिर और दुर्गा मन्दिर विशेष उल्लेखनीय हैं।

वातापी (बादामी) में चालुक्य वास्तुकला का निखरा हुआ रूप देखने को मिलता है। यहाँ पहाड़ को काटकर चार मण्डप बनाए गए हैं जो स्तम्भ युक्त हॉल के समान है। इनमें एक मण्डप जैनियों का है और शेष तीन मण्डप हिन्दू-धर्म के हैं। इनके तीन मुख्य भाग हैं- गर्भगृह, मण्डप और अर्धमण्डप।

पट्टडकल के मन्दिर स्थापत्य की दृष्टि से अधिक सुन्दर हैं। पट्टडकल में आर्य शैली के चार मन्दिर और द्रविड़ शैली के छः मन्दिर बने हुए हैं। आर्य शैली का सर्वाधिक सुन्दर ‘पापनाथ का मन्दिर’ है। द्रविड़ शैली का सर्वाधिक आकर्षक मन्दिर ‘विरूपाक्ष का मन्दिर’ है।

पापनाथ का मन्दिर 90 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल भी एक मण्डप जैसा प्रतीत होता है। गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है, जो ऊपर की तरफ संकरा होता चला गया है। मन्दिर की बनावट काफी सुन्दर है। विरूपाक्ष मन्दिर चालुक्य मंदिर शैली का अच्छा उदाहरण है। यह 120 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल काफी छोटा है। मन्दिर के विभिन्न भागों को मूर्तियों से सजाया गया है। हैवेल ने इस मन्दिर के स्थापत्य की प्रशंसा की है।

चालुक्य राजा पुलकेशिन (प्रथम) ने अपनी राजधानी बादामी को अनेक नवीन भवनों एवं मन्दिरों से सजाया। उसके भाई मंगलेश ने कुछ गुहा-मन्दिरों का निर्माण करवाया। विजयादित्य के शासन काल में कला को खूब प्रोत्साहन मिला। उसने पट्टडकल में भगवान शिव का एक सुन्दर मन्दिर बनवाया। कल्याणी के जयसिंह (द्वितीय) ने अपनी राजधानी कल्याणी को सुन्दर भवनों एवं मन्दिरों से सजाया।

सोमेश्वर (प्रथम) ने भी कल्याणी में अनेक निर्माण करवाए। विक्रमादित्य (षष्ठम्) ने ‘विक्रमपुर’ नामक नवीन नगर की स्थापना की और एक विशाल एवं भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया। इस प्रकार चालुक्य राजाओं ने स्थापत्य कला को निरन्तर प्रोत्साहन दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

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दक्षिण भारत की मूर्तिकला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला न केवल दक्षिण के मंदिर स्थापत्य एवं वास्तु आदि का परिचय देती हैं अपितु विभिन्न कालों में दक्षिण भारत की संस्कृति में आ रहे परिवर्तनों की भी सूचना देती है।

दक्षिण भारत के मन्दिरों में मन्दिर की बाहरी दीवारों पर इतनी अधिक मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं कि मन्दिर की वास्तुगत विशिष्टताएं मूर्तियों की चकाचैंध में छिप सी जाती है।  पल्लव मूर्तिकला की जानकारी हमें पहाड़ों की चट्टानों पर उत्कीर्ण मूर्तियों के माध्यम से मिलती है। मामल्ल शैली के मण्डपों में पहाड़ों की चट्टानों पर गंगावरण, शेषशायी विष्णु, महिषासुर वध, वराह-अवतार और गोवर्धन धारण के सुंदर दृश्य उत्कीर्ण किए गए हैं।

इन दृश्यों में नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। मामल्ल शैली के ‘सप्तपेगोडा’ पर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों और नर-नारियों की बड़ी सुन्दर मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। रथ मन्दिरों के समान ये मूर्तियाँ भी अद्भुत हैं। गंगा को पृथ्वी पर अवतरित करने वाले भगीरथ की मूर्ति 98 फुट लम्बी और 43 फुट चैड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है। ये मन्दिर और मूर्तियाँ पल्लव शैली की अमर पताकाएं प्रतीत होती हैं।

राष्ट्रकूट मूर्तिकला का परिचय एलौरा के कैलाशनाथ मन्दिर, बौद्ध विहारों एवं जैन मन्दिरों से मिलता है। कैलाशनाथ मन्दिर में उत्कीर्ण इन्द्र-इंद्राणी की मूर्तियाँ तथा रावण द्वारा कैलाश-उत्तोलन का अंकन बहुत ओजस्वी एवं भावपूर्ण है। इस दृश्य में रावण कैलाश को उठा रहा है और भयभीत पार्वती शिव के विशाल भुजदण्ड का सहारा ले रही हैं, पार्वती की सखियां भाग रही हैं; भगवान शिव अचल खड़े हैं और अपने चरणों से कैलाश पर्वत को दबाकर उसे स्थिर कर रहे हैं।

तोरण के दोनों ओर बनाए गए हाथी भी मूर्तिकला की अमूल्य निधियां हैं। इन मूर्तियों की विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। एलिफेण्टा गुफा मन्दिरों में विद्यमान प्रतिमाओं में महेश्वर की त्रिमूर्ति, शिव-ताण्डव और शिव-पार्वती विवाह की मूर्तियाँ अत्यंत भव्य और कलात्मक हैं। इनमें भगवान शिव की तीन मुखों वाली त्रिमूर्ति प्रतिमा सबर्वाधिक प्रसिद्ध है। भगवान के तीनों मुखों पर दिव्य शान्ति का भाव है।

बाशम ने लिखा है- ‘भारतीय देव-प्रतिमाओं में यह त्रिमूर्ति अपनी अनेक विशेषताओं के लिए अद्वितीय कही जाएगी।’ शिव-ताण्डव मूर्ति में पावर्ती का अनुराग भाव अत्यंत सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया गया है।

चोल मन्दिरों में भी मूर्तिकला की अद्भुद छटा दिखाई देती है। मूर्तियों का प्रयोग दीवारों, स्तम्भों, भवनों की कुर्सियों, छतों और अन्य स्थानों को सजाने के लिए हुआ है। चोल मूर्तिकारों ने गर्भगृह की बाहरी दीवारों, मण्डपों, स्तम्भों और गोपुरों पर अत्यधिक संख्या में मूर्तियों को उत्कीर्ण किया है किंतु मूर्तिकला और स्थापत्य में अपूर्व सन्तुलन दिखाई देता है।

चोल मन्दिरों में की यह विशेषता सभी चोल मंदिरों में दिखाई देती है, चाहे वह तंजौर का बृहदीश्वर मन्दिर हो, गंगैकोण्ड-चोलपुरम का राजराजेश्वर मन्दिर हो अथवा दारासुरम का एरातेश्वर मन्दिर। चोल युगीन मूर्तिकला शैव-मत से प्रभावित है।

इनमें शिव, पार्वती और शिव के अनेक रूपों की अभिव्यक्ति हुई है। इन रूपों में विष्णु अनुग्रह, भिक्षाटन, वीरभद्र, दक्षिणा, कंकाल, आलिंगन चन्द्रशेखर, वृषवाहन, त्रिपुरान्तक, कल्याण सुन्दर, कालारि, अर्जुन-अनुग्रह, अर्द्धनारीश्वर, लिंगोद्भव, भैरव, मदनान्तक, रावणानुग्रह और चण्डेशानुग्रह विशेष उल्लेखनीय हैं। चोल-मन्दिर शिव रूपों की लम्बी शृंखला प्रस्तुत करते हैं। शैव-प्रतिमाओं का वर्चस्व होने पर भी वैष्णव धर्म के देवी-देवताओं का भी अंकन प्रचुरता से हुआ है।

चोल मंदिरों में मन्दिर-निर्माता शासकों की प्रतिमाएं भी बनाई गई हैं। तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर में राजाराज महान् और उसकी रानी लोक महादेवी की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। मंदिर की मूर्तिकला में द्वारपालों, ऋषियों, नर्तकों और वादक समूहों को भी स्थान दिया गया है। मंदिरों के द्वारपाल त्रिशूल धारण किए हुए हैं और उनके नेत्र बाहर की ओर निकले हुए हैं।

चोल मन्दिरों की मूर्तियों से उस काल की नृत्य परम्परा की भी जानकारी मिलती है। इन मन्दिरों में भरतनाट्यम् की 108 भंगमिाओं का जीवन्त चित्रण हुआ है। बृहदीश्वर मन्दिर की भित्तियों पर स्वयं शिव के माध्यम से इन नृत्य भंगिमाओं का अंकन किया गया है, जबकि अन्य स्थानों पर नर्तकों को यह नृत्य करते हुए दर्शाया गया है। चिदम्बरम् के गोपुर पर मूर्तियों के साथ उनका परिचय भी लिखा गया है।

प्रारम्भिक चोल-मूर्तियों पर पल्लव-कला का प्रभाव है। दसवीं शताब्दी तक बनी चोल-प्रतिमाएं पल्लव-प्रतिमाओं के समान लम्बी देह-यष्टि और कोमल प्रभाव से युक्त हैं। शरीर की रेखाएं स्वाभाविक एवं गतिशील है और वस्त्र शरीर का आवश्यक अंग जान पड़ते हैं परन्तु इसके बाद के काल की मूर्तियों में चोल-कला पल्लव-कला के प्रभाव से मुक्त हो जाती है।

अब मूर्तियों की देह-यष्टि भारी और मांसल हो जाती है तथा उनकी लम्बाई कम हो जाती है। वस्त्र शरीर से चिपके हुए, आकुचंन-मुक्त और भारहीन प्रतीत होते हैं। आभूषण भी शरीर के सौन्दर्य प्रदर्शन में सहायक हुए हैं तथा बोझिल न होकर हल्के हैं। इन मूर्तियों के मुकुट अत्यधिक अलंकृत और भारी प्रतीत होते हैं। मूर्तियों की गोलाकार मुखकृति, भारी कन्धे, पृथुल होठ और अलंकृत कमरबंध से युक्त पुरुष आकृति विशिष्ट प्रभाव डालती हैं।

लम्बी काया में नारी-मूर्ति के नाभि प्रदेश पर उत्कीर्ण त्रिवली शरीर के लालित्य और गति को स्पष्ट करती है। ये प्रतिमाएं ग्रेनाइट पत्थर से बनी हैं। चोल मूर्तियों में नटराज की प्रधानता है। नागेश्वर के नटराज समस्त नटराजों में सबसे बड़े और सबसे सुन्दर हैं। चोल कलाकारों ने नटराज की अभिव्यक्ति में विशेष दक्षता प्राप्त की।

यद्यपि चोल मूर्तियाँ बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक बनती रहीं किंतु बाद की मूर्तियों में पहले जैसा सौष्ठव दिखाई नहीं देता है। इनसे स्पष्ट होता है कि देश की राजनीतिक परिस्थितियां अपना संतुलन खोती जा रही थीं जिसका प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र एवं कलाओं पर भी पड़ रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

कालीदास

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कालीदास

वैदिक एवं उत्तरवैदिक धार्मिक ग्रंथों के बाद संस्कृत साहित्य में महाकवि कालीदास को जितनी सफलता मिली, उतनी अन्य किसी कवि को नहीं मिली। 

काउण्ट ब्जोन्सर्टजेरेना ने लिखा है कि भारत का साहित्य हमें अतीत काल के महान राष्ट्र से परिचित कराता है जिसका ज्ञान की हर शाखा पर अधिकार था और जो सदा ही मानव सभ्यता के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान ग्रहण करेगा।

भारत में वैदिक-काल से ही उत्कृष्ट कोटि की साहित्य रचना की परम्परा आरम्भ हुई जो प्रत्येक युग में चलती रही। भारत का सबसे पहला महाकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण तथा दूसरा महाकाव्य वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत है। ईसा बाद की शताब्दियों में भी संस्कृत भाषा के अनेक महाकवि हुए जिनमें कालीदास, भारवि, दण्डी एवं माघ बहुत प्रसिद्ध हैं। इनके बारे में एक उक्ति बड़ी प्रसिद्ध है-

उपमा कालीदासस्य,  भारवैः अर्थ गौरवं

दण्डि तु पद लालित्यं माघः संति त्रयो गुणाः।

महाकवि कालीदास के संस्कृत साहित्य में हमें गुप्तकालीन समाज और संस्कृति के दर्शन होते है। मध्य-काल में तुलसीदास, सूरदास, कबीर और मीराबाई आदि अनेक विख्यात कवि हुए जिन्होंने लोकभाषा में रचनाएं लिखकर देश को महान साहित्य प्रदान किया। गोस्वामी तुलसीदास का साहित्य, भारतीय संस्कृति के उच्चतम आदर्शों की अभिव्यक्ति है। मीराबाई का भक्ति साहित्य हिन्दी साहित्य की अमर निधि है। इन साहित्यकारों ने देश के साहित्यिक और सांस्कृतिक जागरण में अमूल्य योगदान दिया।

महाकवि कालीदास

वैदिक एवं उत्तरवैदिक धार्मिक ग्रंथों के बाद संस्कृत साहित्य में महाकवि कालीदास को जितनी सफलता मिली, उतनी अन्य किसी कवि को नहीं मिली।  महाकवि कालीदास भारतीय संस्कृति के उत्कर्ष काल के प्रतिनिधि कवि हैं। कालीदास के जीवन के सम्बन्ध में प्रमाणिक जानकारी का अभाव है। विभिन्न ग्रंथों से मिलने वाली अनुश्रुतियों के अनुसार कालीदास का जन्म उज्जैन के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।

वे शैव मतावलम्बी थे। कुछ विद्वान् कालीदास के काव्यों और नाटकों में कश्मीर के वर्णन के आधार पर उन्हें काश्मीर का ही मानते हैं। अनेक बंगाली साहित्यकारों ने उन्हें बंगाल का निवासी बताया है। प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ का मत है कि कालीदास मालवा प्रदेश के मन्दसौर के निवासी थे।

महाकवि का काल निर्णय

कालीदास ने ‘विक्रमोर्वशीय’ नाटक में ‘विक्रम’ शब्द का प्रयोग किया है। इसके आधार पर कालीदास के काल के सम्बन्ध में दो मत बनाए गए हैं। प्रथम मत के अनुसार कालीदास, महाराजा विक्रमादित्य की राजसभा के नवरत्नों में से एक थे। विक्रमादित्य परमारवंशीय राजा महेन्द्रादित्य का पुत्र था जो ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में उज्जयिनी का राजा हुआ। उसने शकों को पराजित किया तथा अपनी विजय के उपलक्ष में ई.पू. 57 में विक्रम संवत् चलाया। अतः इस मत के आधार पर कालीदास का काल ई.पू. प्रथम शताब्दी ठहरता है।

दूसरे मत के अनुसार कालीदास गुप्त शासक चन्द्रगुप्त (द्वितीय) (ई.380-413) के समकालीन थे जिसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की थी। इस मत के समर्थकों का तर्क है कि-

(1.) ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में विक्रमादित्य नामक किसी राजा के होने का ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता, अतः कालीदास चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समकालीन थे।

(2.) कालीदास ने ‘कुमार-सम्भव’ महाकाव्य की रचना की। यह ग्रंथ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म के उपलक्ष में लिखा गया।

(3.) कालीदास के महाकाव्य ‘रघुवंश’ में रघु-दिग्विजय का वर्णन हुआ है। यह वर्णन इलाहाबाद-स्तम्भ-लेख में वर्णित समुद्रगुप्त की दिग्विजय के वर्णन से मेल खाता है जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) का पिता था।

(4.) कालीदास ने ‘रघुवंश’ में हूण नामक विदेशी जाति का उल्लेख किया है, जो गुप्त काल में ही भारत में प्रविष्ट हुए थे।

(5.) कालीदास की रचनाओं में संस्कृत भाषा की ‘गुप्’ धातु का बार-बार प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘रक्षा करना’। चूंकि गुप्तों ने अत्यंत शक्तिशाली एवं बर्बर हूणों से युद्ध करके देश की रक्षा की थी। इसलिए कालीदास द्वारा गुप् धातु का प्रयोग करके उसी ओर संकेत किया गया है।

(6.) कालीदास तथा बौद्ध कवि अश्वघोष की रचनाओं में, अनेक स्थानों पर समानता है। दोनों रचनाओं में कालीदास की रचना, निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ है। ऐसा प्रतीत होता है कि कालीदास ने अश्वघोष का अनुसरण करके अपनी शैली का परिष्कार एवं सुधार किया। चूँकि अश्वघोष का समय प्रथम शताब्दी ईस्वी है, इसलिए कालीदास उनके बाद में अर्थात् गुप्त-काल में हुए होंगे।

(7.) ई.473 के गुप्तकालीन मन्दसौर अभिलेख में कालीदास की रचनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कालीदास इस लेख के लिखे जाने के समय अथवा उससे पूर्व हुए होंगे। अतः वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में ही हुए होंगे।

(8.) जिस परिष्कृत संस्कृत भाषा, सुख, वैभव, शान्ति, समृद्धि तथा उल्लासमय वातावरण का वर्णन कालीदास के काव्यों में पाया जाता है, वह गुप्त काल में ही सम्भव था, अन्य किसी युग में नहीं।

(9.) परमारों का उदय अन्य राजपूत वंशों अर्थात् चैहानों, चैलुक्यों, प्रतिहारों के साथ हुआ जबकि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में भारत के इतिहास में परमार वंश का कोई अस्तित्व नहीं था। अतः कालीदास गुप्तवंश के समकालीन हो सकते हैं न कि किसी परमार वंशी राजा के।

उपरोक्त तर्कों के आधार पर कालीदास को गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का समकालीन माना जाता है।

कालीदास का जीवन-परिचय

कालीदास के बाल्यकाल और शिक्षा आदि के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। उनके जीवन का परिचय विभिन्न ग्रंथों में आए हुए उल्लेखों से मिलता है जिनमें अविश्वसनीय किंवदंतियां भी सम्मिलित हैं। कहा जाता है कि कालीदास महामूर्ख थे। वे पेड़ की जिस डाल पर बैठते थे, उसी को काटने लग जाते थे।

वहाँ के राजा की पुत्री विद्योत्तमा समस्त विद्याओं और कलाओं में निपुण थी किंतु अभिमानी होने के कारण वह राज्य के पण्डितों का अपमान करती थी। इसलिए राज्य पंडितों ने राजकुमारी का मानमर्दन करने के लिए मूर्ख कालीदास को पकड़कर राजा के दरबार में यह कहकर प्रस्तुत किया कि यह अत्यंत विद्वान है तथा किसी को भी शास्त्रार्थ में परास्त कर सकता है।

राजा ने अपनी विदुषी पुत्री का विवाह मूर्ख कालीदास के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात् विद्योत्तमा को कालीदास की मूर्खता का ज्ञान हुआ और उसने कालीदास का घनघोर अपमान किया। कालीदास घर छोड़कर विद्याध्ययन के लिए चले गए। अनेक वर्षों तक व्याकरण और काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने के बाद जब वे घर लौटे तो विद्योत्तमा ने उनका स्वागत किया।

कहा जाता है कि विद्योत्तमा द्वारा कहे गए स्वागत-वाक्य- ‘अस्तिकाश्चिद्वागर्थ’ को आधार मानकर ही कालीदास ने कुमार-सम्भव, मेघदूत और रघुवंश की रचना की। 

एक दूसरी मान्यता यह भी है कि अपनी पत्नी से अपमानित होकर वे घर से सीधे काली के मन्दिर में पहुँचे और उन्होंने देवी को प्रसन्न करने के लिए अपनी जिह्वा काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दी। देवी ने प्रसन्न होकर कालीदास को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता और महाकवि बना दिया। माना जाता है कि देवी काली की कृपा प्राप्त करने के कारण उनका नाम कालीदास पड़ा।

मुंशी प्रेमचन्द ने इन किंवदंतियों के सम्बन्ध में लिखा है- ‘ये अधिकांशतः निर्मूल एवं निराधार हुआ करती हैं और तथ्य से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। जहाँ इतिहास अधूरा रह जाता है या मौन हो जाता है वहाँ इस प्रकार की गाथाएं गढ़ लेना साधारण सी बात है।’

किंवदन्तियों को अलग कर दें तो भी यह स्पष्ट है कि कालीदास ने अनेक वर्षों तक विद्याध्ययन करके शास्त्रों एवं व्याकरण में निपुणता प्राप्त की और बाद में गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके अनेक विख्यात ग्रन्थों की रचना की।

माना जाता है कि गुप्त शासकों ने कालीदास को कश्मीर का राजा बनाया। इसी कारण उनकी रचनाओं में केसर की क्यारियों एवं कश्मीर की घाटियों का बहुतायत से उल्लेख हुआ है।

कालीदास के काव्य ग्रंथ

कालीदास की रचनाओं में चार काव्य- ऋतु-संहार, कुमार-सम्भव, रघुवंश और मेघदूत तथा तीन नाटक- विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्रम् और अभिज्ञान शाकुन्तलम् प्रमुख हैं।

(1.) ऋतु संहार

यह एक गीति-काव्य है। इसमें छः सर्ग हैं और प्रत्येक सर्ग में एक ऋतु क्रमशः ग्रीष्म, वर्षा, शरद् हेमन्त, शिशिर और बसन्त ऋतु का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया गया है। ऋतु संहार को कालीदास की प्रथम कृति माना जाता है। ऋतु संहार में महाकवि की भावनाओं तथा भाषा का वह परिष्कृत और विकसित रूप नहीं मिलता जो उनकी अन्य रचनाओं में मिलता है।

(2.) कुमार-सम्भव

महाकवि कालीदास का यह एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसमें 17 सर्ग हैं। कुमार-सम्भव की कथा-वस्तु का आधार शिव-पुराण और विष्णु-पुराण में वर्णित कथाएं हैं किन्तु कालीदास ने अपनी कल्पना के मिश्रण से पौराणिक घटनाओं में नवीनता, सरलता एवं लालित्य उत्पन्न किया है। इस कारण यह मौलिक काव्य बन गया है।

इसके प्रथम सर्ग में पर्वतराज हिमालय के सौन्दर्य का हृदयग्राही वर्णन, दूसरे सर्ग में बसन्त ऋतु एवं वन की अनुपम शोभा, तीसरे में शिव की समाधि, चैथे में शिव द्वारा कामदेव का दहन तथा रति का करुण विलाप, पांचवे में पार्वती की तपस्या तथा शिव और पार्वती में संवाद तथा बाद के सर्गों में शिव-पार्वती विवाह, कुमार कार्तिकेय का जन्म, देवताओं का सेनापति नियुक्त होना तथा तारकासुर-वध आदि का वर्णन है।

कुमार-सम्भव में पार्वती के यौवन एवं सौन्दर्य, रति का विलाप तथा शिव-पार्वती विवाह आदि प्रसंग अत्यन्त ही भावपूर्ण एवं सुन्दर बन पड़े हैं। काव्य कला की दृष्टि से यह उच्च-कोटि की रचना है। किंवदंति है कि माता पार्वती के सौन्दर्य का शृंगारिक वर्णन करने के कारण कालीदास को कोढ़ हो गया था जो बाद में शिव-पार्वती की कृपा से ही ठीक हुआ।

(3.) रघुवंश

रघुवंश एक अनुपम महाकाव्य है जिसमें 19 सर्ग हैं। कालीदास की रचनाओं में तथा सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में रघुवंश को सर्वाधिक ख्याति प्राप्त है। इस ग्रंथ का मूल स्रोत वाल्मीकिकृत रामायण है। रघुवंश में सूर्यवंशी राजा दिलीप से लेकर रघु, अज, दशरथ, राम, कुश आदि उन्तीस राजाओं की जीवन-घटनाओं और उनके एक हजार साल के इतिहास को क्रमबद्ध रूप से सजाया गया है तथा यत्र-तत्र बिखरी हुई घटनाओं और कथाओं को जोड़कर एक अविरल प्रवाह वाला महाकाव्य बनाया गया है। रघुवंश में सभी प्रधान रसों का समावेश हुआ है।

वशिष्ठ तथा वाल्मीकि ऋषियों के आश्रमों के वर्णन में शान्त रस का, अज तथा राम के युद्धों के वर्णन में वीर रस का और राजा अग्निवर्ण के विलास-वर्णन में शृंगार रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है। रघुवंश की रचना का मूल उद्देश्य महाराज रघु की वंश-परम्परा का वर्णन करने के साथ श्रीराम की जीवन-घटनाओं का सविस्तार वर्णन करना रहा है। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु राम और उनके जीवन-वृत्त का वर्णन 10वें सर्ग से 16वें सर्ग तक सात सर्गों में किया गया है।

जबकि राम के पूर्वज दिलीप, रघु, अज और दशरथ के जीवन-वृत्तों का वर्णन प्रारम्भ के 9 सर्गों में तथा राम के आगे की वंश-परम्परा का वर्णन अन्तिम तीन सर्गों में संक्षिप्त रूप से किया गया है। रघुवंश में रघु के पुत्र अज का इन्दुमति से विवाह, कोमल माला के गिरने से इन्दुमति की मृत्यु और अज का करुण विलाप, पुष्पक विमान द्वारा राम और सीता का रमणीय स्थलों का भ्रमण आदि प्रसंगों का अत्यन्त मनोहारी चित्रण है।

(4.) मेघदूत

मेघदूत संस्कृत साहित्य का ही नहीं अपितु विश्व-साहित्य का ऐसा दूत-काव्य है, जिसकी समता का कोई अन्य दूत-काव्य अब तक उपलब्ध नहीं हुआ है। मेघदूत में 111 पद्य हैं। इस ग्रंथ के दो खण्ड हैं- पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ। इस काव्य में एक यक्ष का वर्णन है जिसे अपने स्वामी कुबेर के शाप के कारण अपनी पत्नी को अलकापुरी में छोड़कर रामगिरी पर्वत पर रहना पड़ा।

पत्नी से वियोग उसके लिए असहनीय सिद्ध हुआ। उसने वर्षा ऋतु में एक मेघ को उत्तर दिशा में पर्वत की ओर जाते देखा तो मेघ से आग्रह करने लगा कि वह मेरी प्रिया तक मेरा विरह-सन्देश पहुँचा दे। पूर्व मेघ में प्रकृति के मनोरम दृश्यों तथा बरसात की मादकताओं का साहित्यिक वर्णन किया गया है। इसमें रामगिरि से अलका तक पहुँचने के लिए मार्ग भी बताया गया है।

उत्तर मेघ सौन्दर्य और प्रेम के नवीनतम, अनोखे और अभिरामतम चित्रण से परिपूर्ण है। भावाभिव्यंजना तथा प्राकृतिक सौन्दर्य वर्णन की दृष्टि से यह अत्यन्त ही सुन्दर काव्य है। कुछ विद्वानों ने इस कृति को कवि की व्यक्ति-व्यंजक अर्थात् आत्मपरक रचना माना है।

कालीदास के नाटक

कालीदास की जितनी ख्याति कवि के रूप में है, उतनी ही ख्याति नाट्यलेखक के रूप में भी है। उन्हें भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है। उनके द्वारा लिखित तीन नाटक विश्वविख्यात हैं-

(1.) विक्रमोर्वशीय

विक्रमोर्वशीय नाटक के नायक और नायिका पुरूरवा और उर्वशी हैं जिनका उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण तथा मत्स्य-पुराण में हुआ है। कालीदास ने उनकी प्रेमकथा को विक्रमोर्वशीय नामक नाटक में ढाल दिया है।

नाटक में पुरूरवा का देवलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम होना, निषिद्ध वन में जाने से उर्वशी का लता बन जाना, पुरूरवा का उसके वियोग में पागल होकर इधर-उधर भटकना, संगमनीय मणि द्वारा उर्वशी का पुनः अपने असली रूप में प्रकट होना और अन्त में दोनों का पुनर्मिलन होना आदि का बड़ा मार्मिक चित्रण हुआ है।

(2.) मालविकाग्निमित्रम्

यह एक ऐतिहासिक नाटक है। इसमें पांच अंक हैं। इसमें शुंगवंशीय राजा अग्निमित्र तथा उसकी रानी इरावती की परिचारिका मालविका की प्रेम-कथा है। मालविका अपने सौन्दर्य से अग्निमित्र का हृदय जीत लेती है। रानी इरावती को जब इस बात का पता लगता है तो वह मालविका को कारावास में बन्द करवा देती है।

अन्त में यह मालूम होने पर कि मालविका भी राजकुमारी है, तब उसका अग्निमित्र से विवाह हो जाता है। नाट्य कला की दृष्टि से मालविकाग्निमित्रम् एक अत्यन्त सुन्दर रचना है तथा इसके संवाद बड़े ही आकर्षक एवं हृदय को छूने वाले हैं।

(3.) अभिज्ञानशाकुन्तलम्

कालीदास का यह नाटक संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट रचना है। इस नाटक की कथा-वस्तु महाभारत और पद्मपुराण के उस कथानक से ली गई है जिसमें ऋषि विश्वामित्र के तपोभंग, शकुन्तला की उत्पत्ति और दुष्यन्त से प्रेम तथा गन्धर्व-विवाह का वर्णन है। कालीदास ने इस पौराणिक कथानक को सात अंकों वाले नाटक में ढाल दिया। नाटक में हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त तथा ऋषि-पुत्री शकुन्तला के प्रेम, वियोग तथा पुनर्मिलन की कथा का वर्णन किया गया है।

प्रथम एवं द्वितीय अंक में राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला में एक-दूसरे के प्रति अनुराग उत्पन्न होना, तीसरे अंक में दुष्यन्त तथा शकुन्तला का समागम और फिर गान्धर्व विवाह होना, चतुर्थ अंक में ऋषि कण्व द्वारा शकुन्तला को पति-गृह के लिए विदा करना, पंचम अंक में ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण दुष्यन्त का शकुन्तला को न पहचानना तथा शकुन्तला का अपनी माता मेनका के साथ मारीच ऋषि के आश्रम में जाकर रहना, छठे अंक में अंगूठी के मिलने पर दुष्यन्त को शकुन्तला की याद आना और दुःखी होना, सातवें अंक में स्वर्ग से लौटते समय दुष्यन्त का मारीच ऋषि के आश्रम में अपने पुत्र सर्वदमन (भरत) तथा शकुन्तला से मिलना आदि प्रसंगों का वर्णन किया गया है।

नाटक के संवाद रोचक और भाषा पात्रों के अनुरूप है। नाटक में शृंगार और करुणा रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है। शकुन्तला के हृदय में दुष्यन्त के प्रति पे्रम, दोनों के मिलन और गान्धर्व विवाह में शृंगार रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है और ऋषि कण्व द्वारा शकुन्तला को पतिगृह के लिए विदा करने के अवसर पर करुण रस का निष्पादन हुआ है। पांचवे अंक में राजा दुष्यन्त द्वारा अपमानित होकर रोती हुई शकुन्तला के गमन का दृश्य भी बड़ा करुणाजनक है।

कालीदास के साहित्य की विशेषताएं

पुराणों में जिस धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का परिपाक हुआ उसने साहित्य में लालित्य परम्परा को जन्म दिया। महाकवि कालीदास ने साहित्य में लालित्य को ऊँचाई प्रदान की। कालीदास द्वारा प्रस्तुत मर्यादित व्यवस्था और सन्तुलित जीवन के आदर्श ने, भारतीय धर्म और संस्कृति को बल प्रदान किया। उनके साहित्य की अनेक विशेषताएं हैं-

(1.) कालीदास की भाषा और छन्द योजना

कालीदास के साहित्य में भाषा की परिपक्वता और अद्भुत छन्द योजना के दर्शन होते हैं। कहीं भी अनावश्यक या अनुपयुक्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। उनकी शैली और लेखन प्रवाह अत्यन्त रोचक है। किसी विषय के दीर्घ वर्णन में भी शिथिलता अथवा बोरियत नहीं पाई जाती।

भाषा का माधुर्य, उसकी सुकोमलता, सुन्दर वाक्य-विन्यास और भावनुकूल शब्द-चयन उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताएं हैं। महाकवि कालीदास छन्द रचना में सिद्धहस्त थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में घटना एवं भावों के अनुकूल ही छन्दों का प्रयोग किया। छन्द योजना का उन्होंने इतना अधिक ध्यान रखा है कि जहाँ कहीं रस और भाव में परिवर्तन होता है, वहीं उसी के अनुरूप छन्द भी बदल जाते हैं।

(2.) कालीदास के विषयों में सरसता

कालीदास ने गंभीर, दार्शनिक एवं शुष्क समझे जाने वाले विषयों में भी काव्य प्रतिभा के बल से सरसता एवं रोचकता का सृजन किया है। कालीदास ने वेद, पुराण, इतिहास, दर्शन ग्रंथों से अपने विषयों एवं नायक-नायिकाओं का चुनाव किया और उन्हें रोचक रचनाओं में ढाल दिया। कालीदास ने ठूँठ वृक्षों और निर्जन खण्डहरों में भी सौन्दर्य का सृजन किया। ऋतु-संहार में ग्रीष्म के तपते हुए दिनों में ठूँठ वृक्षों और जंगली झड़बेरियों में कालीदास की कलम ने सौन्दर्य की सृष्टि की है।

(3.) रूपक एवं उपमाओं का प्रयोग

कालीदास का साहित्य ना-ना प्रकार की उपमाओं एवं रूपकांे से समृद्ध है जो पाठक को आनन्द देता है। उनकी उपमाएं सजीव एवं चित्रात्मक हैं जिनके बिना छन्द सौन्दर्य-विहीन एवं नीरस हो जाते हैं। कालीदास ने गंगा की लहरें, चन्द्रमा की शीतल चांदनी, तारों की जगमगाहट, सूर्य का ताप, हिरण के चचंल नेत्र, खिलते हुए कमल का सौन्दर्य, कोयल की मदभरी कूक, पपीहे की पुकार, मयूर का नृत्य, हंसों की किल्लोल आदि उपमाओं से अपनी रचनाओं को सजीव बनाया है।

(4.) प्रकृति के साथ तादात्मय

कालीदास का साहित्य प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता हुआ चलता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् के प्रथम अंक में चचंल हिरणों की क्रीड़ाएँ, भौरों की रागमयी गुजाँर, माधवी और केतकी की मादक सुगन्ध, शीतल छाया प्रदान करने वाले अशोक और कदम्ब के वृक्ष कथानक का सजीव वातावरण तैयार करते हैं।

अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चैथे अंक में जब ऋषि कण्व शकुन्तला को पति-गृह के लिए विदा करते हैं तो आश्रमवासियों के साथ वृक्ष एवं लताएं भी दुःखी होते हैं। पति-गृह को जाने के लिए उद्यत शकुन्तला को वृक्षों ने अनेक उपहार दिए परन्तु शकुन्तला के विछोह को वे सहन नहीं कर सके। मृगियों ने तृण खाना छोड़ दिया है, मोरों ने नाचना छोड़ दिया है और लताएं पत्तों के रूप में आंसू बहा रही हैं। शकुंतला द्वारा पालित मृग-शिशु भी शकुन्तला से लिपट जाता है।

कालीदास ने जिस सूक्ष्मता के साथ प्रकृति का मानवीकरण किया है, वह भविष्य के कवियों के लिए अनुकरणीय बन गया। रघुवंश में महाकवि कहते हैं- ‘मृग सीता के दुःख में मुँह से घास गिरा देते हैं, मोर नाचना छोड़ देते हैं, वृक्षों से पुष्प गिर पड़ते हैं। सीता के रोने पर सारा वन रो रहा है।’ मेघदूत में भी कवि ने मानव और प्रकृति के बीच संवेदना के भाव प्रदर्शित किए हैं। प्रकृति के साथ मानव का ऐसा तादाम्य केवल कालीदास के साहित्य में ही देखने को मिलता है।

(5.) मानवीय भावनाओं का चित्रण

कालीदास की रचनाओं में मानव-हृदय की कोमल भावनाओं एवं विचारों का अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है। महाकवि ने मानव जीवन के ऐसे गुह्यतम रहस्यों का भी सजीव चित्रण किया है, जिन पर साधारण व्यक्ति की दृष्टि ही नहीं जाती। कालीदास ने मानव-हृदय की भावनाओं को इतने सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है कि सहृदय पाठक उनकी रचना को पढ़कर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।

जब आश्रम में दुष्यन्त और शकुन्तला एक-दूसरे को देखते हैं तो दोनों के हृदय में प्रेम की तरंगें हिलोर लेती हैं। दुष्यन्त संकेतों के माध्यम से अपना प्रेम प्रकट करता है किंतु शकुन्तला नारी-सुलभ लज्जा के कारण, नयन झुकाये और मौन रहती है। महाकवि ने नारी मन के सुकोमल भावों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।

शकुन्तला को विदा करते हुए समस्त संसार से विमुख होकर निर्जन आश्रम में रहते हुए वीतरागी कण्व की पीड़ा के वर्णन में कालीदास ने कण्व ऋषि के हृदय का एक-एक कोना छानकर उनकी व्यथा का वर्णन किया है। ‘रघुवंश’ में इन्दुमति के स्वयंवर के पश्चात् विवाहोत्सव के वर्णन में भी कालीदास ने प्रेम-भावनाओं का ऐसा ही चित्रण किया है, जिसमें लज्जा की मर्यादा और प्रेम की उच्छृंखलता के बीच एक द्वंद्व दिखाई देता है।

(6.) सौन्दर्य वर्णन

कालीदास ने अपनी रचनाओं में प्रकृति और नारी के सौन्दर्य का हृदयग्राही वर्णन किया है। कुमार सम्भव में हिमालय पर्वत की शोभा-वर्णन, रघुवंश में वशिष्ठ ऋषि का तपोवन तथा त्रिवेणी के सौन्दर्य का वर्णन तथा ऋतु-संहार में षड्ऋतुओं के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त मनोहारी है।

मेघदूत भी प्राकृतिक दृश्यों के चित्रण से भरा पड़ा है। मालिनी की रेती में खेलते हुए हंस-युगल, पर्वत की तलहटी मे मृग के सींग से आंख खुजलाती हुई मृगी और वृक्षों की शाखाओं पर सूखते हुए ऋषियों के वल्कलों से प्रकृति का सौन्दर्य मानो मुंह से बोल उठता है।

प्रकृति-सौन्दर्य के साथ-साथ कालीदास का नारी-सौन्दर्य वर्णन भी मनमोहक है। महाकवि ने कुमार-सम्भव में पार्वती के सौन्दर्य का नख-शिख वर्णन किया है। इसी प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला के यौवन और सौन्दर्य का वर्णन हुआ है। कवि कहता है कि शकुन्तला को बनाने से पहले ब्रह्मा ने उसे चित्त में परिकल्पित किया होगा।

मेघदूत में यक्ष, मेघ से अपनी पत्नी के सौन्दर्य का वर्णन करता है। कवि ने नारी के बाह्य सौन्दर्य को प्रधानता न देकर उसके शुभ-गुणों के सौन्दर्य को प्रधानता दी है। अतः कालीदास ने सौन्दर्य के साथ-साथ मर्यादा का भी पालन किया है।

इस प्रकार कालीदास की रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि कालीदास न केवल अपने समय के, न केवल संस्कृत साहित्य के अपितु सम्पूर्ण विश्व-साहित्य के कालजयी कवि एवं नाटककार थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय साहित्यिक विरासत

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तुलसीदास

मीराबाई

रवीन्द्र नाथ टैगोर

संत तुलसीदास का साहित्य

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संत तुलसीदास का साहित्य

भारतीय इतिहास के मध्य-काल में तथा आर्य-संस्कृति के लिए सर्वाधिक कठिन समय में संत तुलसीदास आर्य-संस्कृति के प्रतिनिधि कवि हुए। वे हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध और सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि थे।

संत तुलसीदास की जीवनी

संत तुलसीदास के जीवन के बारे में ठीक-ठीक जानकारी नहीं मिलती किन्तु उनके जीवन की बहुत सी घटनाओं से उनके काल एवं आयु आदि का अनुमान लगाया जाता है।

संत तुलसीदास सोलहवीं सदी के मुगल बादशाह अकबर के समकालीन थे। अधिकांश विद्वान तुलसीदास का जनम ई.1532 में होना मानते हैं। उनका जन्म सोरों (उत्तरप्रदेश) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे तथा माता का नाम हुलसी था। तुलसी का जन्म मूल-नक्षत्र में हुआ था। किंवदंतियों के अनुसार तुलसी ने जन्मते ही राम नाम का उच्चारण किया जिसके कारण उन्हें रामबोला कहा जाता था।

जन्म के समय ही उनके मुंह में पूरे दाँत थे। तुलसी जब छोटे बालक थे, तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया और उन्हें भिक्षा मांगकर जीवन-यापन करना पड़ा। काशी में रहते हुए उन्होंने गुरु नरहरिदास से संस्कृत भाषा की शिक्षा ली तथा वेद-पुराणों का अध्ययन किया। युवा होने पर इनका विवाह दीनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ। तुलसीदास अपनी पत्नी में अत्यधिक आसक्ति रखते थे और वियोग सहन नहीं कर पाते थे।

एक दिन इनकी पत्नी उनकी अनुपस्थिति में अपने भाई के साथ मायके चली गई। तुलसीदास भी रात के समय नदी को पार करके अपने ससुराल जा पहुँचे। इस कामासक्ति को देखकर रत्नावली ने तुलसीदास को झिड़कते हुए कहा कि आपने मेरी हाड़-चर्म युक्त देह से इतना स्नेह किया है, यदि ऐसी प्रीति ईश्वर में रखी होती तो आप सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते।

पत्नी की इस झिड़की ने तुलसी के भावुक हृदय पर प्रहार किया और उन्हें सासांरिक जीवन से विरक्ति हो गई। उन्होंने घर का त्याग कर दिया और अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए काशी में जाकर बस गए। यहाँ रहते हुए उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अन्तिम समय में सुख एवं शान्ति के साथ भगवान श्रीराम का यशोगायन करते हुए वि.सं.1680 (ई.1623) में उन्होंने देह का त्याग किया। उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है –

संवत सोलह सो असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।

संत तुलसीदास राम-काव्य के पुरोधा कवि हैं क्योंकि इन्होनें अपने युग की परिस्थितियों को सामने रखकर सकल मानव जाति के लिए भक्तिपूर्ण, सामाजिक, संस्कृति-प्रधान एवं मार्गदर्शक ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ की रचना की। प्रसिद्ध इतिहासकार ‘वेन्सेंट स्मिथ’ ने तुलसीदास को अपने युग का सर्वश्रेष्ठ पुरुष माना है और इन्हें अकबर से भी महान स्वीकार किया है।

क्योंकि तुलसीदास ने अपने द्वारा रचे गए साहित्य के द्वारा करोड़ों मानवों के हृदयों पर विजय प्राप्त की, उनके सामने सम्राट अकबर की विजयें नगण्य हैं। गोस्वामी तुलसीदास अपने समय के महान रामभक्त, महान कवि, महान संत एवं महान् चिंतक थे। उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे जिन्होंने भारतीय जन-मानस को रामभक्ति की तरफ मोड़ा। उनके द्वारा लिखित ‘रामचरित मानस’ उनकी कीर्ति का सबसे ऊँचा स्तम्भ है।

संत तुलसीदास का साहित्य

तुलसीदास वैष्णव-भक्ति की रामभक्ति शाखा के महान् कवि थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य में प्रचलित समस्त काव्य-शैलियों में रचना की। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार तुलसीदास ने बारह ग्रंथों की रचना की। कुछ विद्वान तुलसीदास के ग्रंथों की संख्या 25 मानते हैं।

इनमें से रामचरित मानस महाकाव्य है। शेष रचनाएं यथा- बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका, और रामलला नहछू आदि रचनाएँ खंड काव्य, मुक्तक काव्य, प्रबंधात्मक मुक्तक और लोकगीतात्मक मुक्तक काव्य के रूप में रचित हैं।

(1.) रामचरित मानस

रामचरित मानस एक प्रबन्ध काव्य है तथा न केवल हिन्दी साहित्य में अपितु सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता है। विषय, उद्देश्य, भाव, भाषा, प्रबन्ध कौशल, छन्द, अलंकार योजना, शैली, कथा प्रवाह, नीति, धर्म एवं सामाजिक सरोकार आदि समस्त दृष्टियों से रामचरित मानस विश्व-साहित्य का अद्वितीय ग्रन्थ है।

इस काव्य में रामकथा का विस्तृत वर्णन है। रामचरित मानस में सात अध्याय हैं जिन्हें वाल्मीकि रामायण के अनुकरण में काण्ड कहा गया है। किसी ग्रंथ के प्रबंध काव्य होने की पहली शर्त यही होती है कि उसमें कम से कम सात अध्याय हों।

इस ग्रंथ में अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र श्रीराम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में तथा मिथिला के राजा जनक की पुत्री सीता को लक्ष्मी के अवतार के रूप में स्थापित किया गया है। रामचरित मानस की कथा के माध्यम से भगवान के दुष्ट-हंता, भक्त-वत्सल स्वरूप की अराधना की गई है।

रामकथा के प्रसंग भारतीय जनमानस में अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित थे। सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि द्वारा दशरथ नंदन राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानकर स्वतंत्र प्रबंध काव्य लिखा गया। चैथी शताब्दी ईस्वी में राम को विष्णु का अवतार मानकर रामकथा को महाभारत का अंश बना दिया गया तथा नौवीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के आलवार संतों ने राम-भक्ति परम्परा को विकसित स्वरूप प्रदान किया। इस परम्परा को गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में चरम पर पहुँचा दिया।

गोस्वामीजी ने रामचरित मानस के विभिन्न पात्रों के माध्यम से समाज के समक्ष उच्च-आदर्श उपस्थित किए हैं तथा वाल्मीकि द्वारा आरम्भ किए गए कार्य को नवीन ऊंचाइयां प्रदान कीं। राजा के रूप में दशरथ और जनक, गुरु के रूप में वसिष्ठ एवं विश्वामित्र, माता के रूप में कौशल्या और सुमित्रा, पुत्र के रूप में राम, लक्षमण, भरत और शत्रुघ्न, पत्नी के रूप में सीता, मित्र के रूप में सुग्रीव एवं विभीषण तथा सेवक के रूप में हनुमान एवं अंगद के चरित्रों को आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है।

राजा दशरथ सत्यवादी धर्मनिष्ठ राजा हैं जो वचन देकर धर्म की और प्राण देकर पुत्र-प्रेम की रक्षा करते हैं। सीता आदर्श भारतीय नारी की प्रतिमूर्ति हैं जो कत्र्तव्य और पति के साथ वन जाने हेतु तर्क पूर्ण उत्तर द्वारा राम को भी निरूत्तर कर देती हैं- ‘जिय बिनु देहु, नदी बिनु वारि। तैसिय नाथ पुरुष बिनु नारी।’ तुलसी के लक्ष्मण चपल और उग्र स्वभाव के हैं किंतु भातृ-प्रेम के अनूठे आदर्श हैं।

भरत का चरित्र शीलता का चरमोत्कर्ष है। मानवीय चरित्र इससे ऊपर नहीं जा सकता। भरत का चरित्र इतना उज्ज्वल है कि प्रकृति भी उनके प्रति सहानुभूति रखती है- ‘जहँ जहँ जायँ भरत रघुराया, तहँ तहँ मेघ करहिं नवछाया।’

खर, दूषण, रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाथ जैसे राक्षसी चरित्र वाले अहंकारी पात्र हैं जो धर्म एवं नीति से च्युत हो गए हैं। ऐसे पात्रों का अंत राम के हाथों होता है जो असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

समन्वय का अद्भुत ग्रंथ

रामचरित मानस समन्वय का अद्भुत ग्रंथ है। उन्होंने भारत में प्रचलित विभिन्न धार्मिक मतों एवं सम्प्रदायों में समन्वय स्थापित करके उन्हें एक ही केन्द्र-बिंदु ‘राम’ से जुड़ा हुआ बताया। दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था।

यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे। संत तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया।

इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया। राम भक्त तुलसी ने ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के’ कहकर शंकर की स्तुति की।

इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- ‘औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर’ कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- ‘जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।’

तुलसी ने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा’ कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार- ‘तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विरोट चेष्टा है।’ ग्रियर्सन के अनुसार- ‘भारत का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करना जानता हो’ तुलसी का मानस समन्वय की विराट चेष्टा है। उन्होंने द्वैत-अद्वैत, निर्गुण-सगुण, माया एवं जीव का भेद एवं अभेद, कर्म ज्ञान, भक्ति, ब्राह्मण, शूद्र, शैव, शाक्त, वैष्णव समाज संस्कृति के संगम के साथ-साथ भाव-पक्ष और कला-पक्ष का भी समन्वय किया है।

साहित्य की परिपक्व रचना

साहित्य की दृष्टि से भी रामचरित मानस एक परिपक्व रचना है। इसमें शास्त्रीय लक्षणों का भली-भांति निर्वाह हुआ है। इसकी भाषा सधी हुई है जिसमें भाषा की तीनों शक्तियों- अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना का भरपूर गुम्फन किया गया है। सम्पूर्ण ग्रंथ में छंदों एवं अलंकारों का शास्त्रीय विधान प्रयुक्त हुआ है तथा रसों का परिपाक प्रसंगानुकूल एवं पात्रानुकूल है।

इसमें शृंगार रस, वीर रस, भक्ति रस (शान्त रस) की प्रधानता है। पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी तुलसी ने महान् कौशल प्रदर्शित किया है। सम्पूर्ण महाकाव्य दोहा और चैपाइयों में लिखा गया है। यह संगीतमय काव्य है, जिसके पद श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध कर देते हैं। समग्र रूप में यह भारतीय संस्कृति का आदर्श धार्मिक ग्रन्थ है।

मानस पर 500 से अधिक पीएच.डी. एवं डी.लिट्. डिग्रियां

महाकवि तुलसीदास पर विश्व में सबसे पहला शोधग्रंथ ‘रामचरित और रामायण’ इटली के विद्वान एल एल. पी. टेस्सीटोरी ने लिखा था। उन्होंने ई.1911 में फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से इस ग्रंथ के लिए पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

संत तुलसीदास पर दूसरा शोध कार्य लंदन में ई.1918 में जे. एन. कापैनर ने किया। भारत में तुलसीदास पर पहली पीएचडी ई.1938 में नागपुर विश्वविद्यालय से बलदेव प्रसाद मिश्र ने की थी। ई.1949 में हरिशचन्द्र राय ने तुलसीदास पर लंदन से पीएचडी की तथा फादर कामिल बुल्के ने प्रयाग विश्वविद्यालय से डी.फिल. की डिग्री प्राप्त की।

तुलसीदास के साहित्य पर अब तक विश्वभर में पीएचडी और डीलिट की पांच सौ से अधिक डिग्रियां दी जा चुकी हैं। इतनी संख्या में हिन्दी में किसी लेखक पर शोधकार्य नहीं हुआ है।

सर्वाधिक शब्दों का प्रयोग

विश्व में सर्वाधिक शब्दों का प्रयोग संत तुलसीदास ने किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में 36 हजार से अधिक विभिन्न शब्दों का प्रयोग किया है जबकि शेक्सपियर ने लगभग 35 हजार शब्दों का प्रयोग किया है।

विश्व का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ

संत तुलसीदास पर लगभग 250 आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। रूस के विख्यात लेखक वरात्रिकोव ने विश्व की 2,796 भाषाओं के साहित्य में से रामचरित मानस को सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य घोषित किया। उन्होंने ई.1938 से 1942 के बीच रामचरित मानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था।

(2.) विनय पत्रिका

ब्रज भाषा में लिखे हुए इस मुक्तक काव्य में अनेक राग-रागनियों में बंधे हुए विनय सम्बन्धी पद हैं। इसमें मुक्ति के आत्म-निवेदन का तथा आराध्य देव राम से उद्धार की कामना का मार्मिक चित्रण हुआ है। यह दास्य-भक्ति की उत्कृट कृति है। इसके गीतों में दैन्य-भाव तथा शान्त-रस की प्रधानता है। इसमें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य सम्बन्धी विचारों का सुन्दर वर्णन है तथा इसके गीत संवेदनापूर्ण तथा संगीत प्रधान हैं। इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है तथा उसमें अल्प मात्रा में फारसी-अरबी शब्दों का मिश्रण है।

(3.) कवितावली

यह खण्ड-काव्य है, जिसमें गोस्वामीजी ने अपने इष्ट-देव राम का स्तुतिगान किया है। इसमें वात्सल्य, शृंगार, वीभत्स तथा भयानक रसों का परिपाक है। इसमें केवट प्रसंग, लंका दहन तथा हनुमानजी के युद्ध का बड़ा सजीव चित्रण है। इसमें एक क्रम और योजना का पालन किया गया है।

(4.) गीतावली

यह भी संत तुलसीदास का एक सुन्दर गीति-काव्य है, जिसमें ब्रज भाषा के गीतों में रामचरित का सुन्दर वर्णन किया गया है। यह सरल तथा लीला-प्रधान रचना है जिसमें वात्सल्य रस का सजीव एवं हृदयग्राही वर्णन है।

(5.) दोहावली

इसमें दोहों के रूप में राम-भक्ति का वर्णन है। इसमें 573 दोहों का संकलन है। ये दोहे जनमानस में उक्तियों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।

(6.) रामाज्ञाप्रश्न

यह ज्योतिष शास्त्रीय ग्रंथ है। इस ग्रन्थ में सात सर्ग हैं तथा राम कथा का दोहों में वर्णन किया गया है जिसमें प्रश्न और उत्तर समाहित हैं। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रंथ रामकथा के विविध मंगल एवं अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। इसमें कथा-शृंखला का अभाव है तथा अनेक दोहों में वाल्मीकी रामायण के प्रसंगों का अनुवाद है।

(7.) बरवै रामायण

इस लघु ग्रंथ में बरवै छन्द के अंतर्गत बांधकर रामकथा से सम्बन्धित घटनाओं का वर्णन किया गया है।

(8.) रामललानहछू

यह संस्कार-गीत है। इसमें कतिपय उल्लेख राम-विवाह कथा से भिन्न हैं। इसे पूर्वी-अवधी भाषा के छंदों में लिखा गया है।

(9.) कृष्ण गीतावली

इसमें ब्रज भाषा में कृष्ण चरित्र का स्फुट पदों में वर्णन किया गया है।

(10.) वैराग्य संदीपनी

इसमें वैरागय सम्बन्धी छन्द हैं, जिनमें धर्म और ज्ञान के साधारण सिद्धन्तों का विवेचन है।

(11.) पार्वती मंगल

इस लघु-ग्रंथ में शिव-पार्वती विवाह का वर्णन है।

(12.) जानकी मंगल

यह भी लघु-ग्रंथ है। इसमें ब्रज भाषा में राम और सीता के विवाह का वर्णन किया गया है।

(13.) हनुमानबाहुक

इस लघु रचना में हनुमानजी को सम्बोधित करके उनके प्रति भक्ति भाव से पूर्ण प्रार्थनाएं लिखी गई हैं। यह एक प्रौढ़ रचना है जिसमें भाषा और भाव नवीन ठाठ के साथ उपस्थित हुए हैं।

महान् लोकनायक संत तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास अपने समय के सर्वश्रेष्ठ कवि, संत, रामभक्त एवं विचारक ही नहीं थे अपितु वे महान लोकनायक भी थे। महाकवि अपने युग का ज्ञापक एवं निर्माता होता है। तुलसी ने मध्य-कालीन भारत में हिन्दू जाति में व्याप्त निराशा को अनुभव किया तथा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में भक्ति एवं विनय के साथ-साथ शौर्य, साहस एवं स्वातंत्र्य भाव का संचरण किया। 

भक्ति-काल के निर्गुणोपासक सन्त, धर्म और समाज में प्रचलित परम्पराओं की निन्दा कर सामाजिक और धार्मिक मर्यादाओं पर भी प्रहार कर रहे थे जिनके प्रभाव से लोगों का मूर्ति-पूजा तथा पौराणिक धर्म से विश्वास उठने लगा था। ऐसे समय में गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति का मार्ग खोला तथा राम के रूप में समाज को ऐसा महानायक प्रदान किया जो शक्ति, शील एवं सौंदर्य की प्रतिमूर्ति था।

 वह सर्वशक्तिमान, दयालु, दुष्टहंता, भक्त-वत्सल तथा मोक्ष प्रदान करने में समर्थ था। उन्होंने रामचरित मानस के पात्रों के माध्यम से प्रजा में आदर्श समाज की रचना का संदेश दिया। उन्होंने जनभाषा में रामचरित मानस की रचना करके उसे सर्वजन के लिए सुलभ बनाया। उन्होंने समाज को आचरणगत दूषण त्यागकर दीनता और हीनता से स्वतः मुक्त होने का संदेश दिया। उन्होंने श्रीराम को गौ, ब्राह्मण, धरती, स्त्री, दीन-दुःखी एवं शरणागत का रक्षक बताकर वस्तुतः मानवता आधारित सम्पूर्ण हिन्दू-संस्कृति का रक्षक बताया।

महात्मा बुद्ध एवं शंकाराचार्य के बाद भारत में यदि कोई सबसे बड़े लोकनायक हुए तो वह गोस्वामी तुलसीदास ही थे जिनका शिक्षित एवं अशिक्षित, धनी एवं निर्धन, राजा एवं प्रजा आदि सम्पूर्ण समाज पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ा। उनकी रामचरित मानस घर-घर गाई जाने लगी। उसके सामूहिक गायन के विशाल आयोजन होने लगे।

रामचरित मानस को आधार बनाकर नगर-नगर एवं गांव-गांव में रामलीलाएं खेली जाने लगीं। लोग संकट के समय, अपनी सत्यता प्रमाणित करते समय एवं एक-दूसरे को धैर्य बंधाते समय रामचरित मानस की चैपाइयां बोलकर सुनाने लगे। समाज में ऐसी व्यापक क्रांति कोई महानायक ही कर सकता था और तुलसीदास ने उसमें सफलता प्राप्त की।

संस्कृति के रक्षक एवं समाज सुधारक संत तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास भारतीय संस्कृति के रक्षक, पोषक एवं उन्नायक थे। उनका स्वयं का व्यक्तित्त्व हिन्दू-धर्म और संस्कृति का प्रतिनिधि व्यक्तित्व था। वे त्याग, तपस्या एवं साधना की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें हिन्दू शास्त्रों का अद्भुत ज्ञान था। उन्होंने जो कुछ लिखा वही धर्म, संस्कृति एवं परम्परा बन गया। उन्होंने हिन्दू-धर्म में प्रचलित आडम्बर तथा पाखण्डों का रामचरित मानस के माध्यम से खण्डन करके वास्तविक धर्म की प्रतिष्ठा की।

उन्होंने दया, करुणा, परोपकार, अहिंसा आदि नैतिक गुणों को निजी जीवन और सार्वजनिक आचरण का आधार बताया तथा अभिमान, पर-पीड़ा, हिंसा आदि दुर्गणों को पाप तथा नर्क की तरफ ले जाने वाला घोषित किया। तुलसीदास अपने समय के महान् समाज सुधारक भी थे। उन्होंने लोगों से पाखण्ड पूर्ण आचरण, दम्भ, कपट, हिंसा एवं अनाचार त्यागकर सद्व्यवहार एवं सादगी पर आधारित जीवन जीने का मंत्र दिया। उन्होंने कलियुग में होने वाले कदाचारों का विशद वर्णन करके लोगों को उनसे दूर रहने के लिए कहा।

कुछ लोग तुलसीदास पर नारी-विरोधी मानसिकता रखने का आरोप लगाते हैं किंतु वे गलत हैं। माता कौशल्या, सीता, मन्दोदरी और तारा के उज्जवल चरित्रों की प्रशंसा करके उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे समाज में किस तरह की नारी चाहते हैं। वे उच्छृंखलता और कदाचार के विरोधी हैं न कि नारी जाति के।

‘ढोल-गंवार शूद्र पशु नारी’ वाला संवाद समुद्र के मुंह से कहलवाया गया है और यह तत्कालीन समाज में नारी के प्रति प्रचलित धारणा को व्यक्त करता है, यह संवाद राम अथवा किसी ऐसे पात्र ने नहीं कहा है जिससे यह कहा जा सके कि तुलसीदास नारी की प्रताड़ना करके उसे नियंत्रण में रखना चाहते थे। न ही यह बात गोस्वामीजी ने अपनी ओर से कही है।

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मीराबाई

मध्यकालीन राजस्थान में सगुण-भक्ति-रस की धारा प्रवाहित करने वाले संत-कवियों में सन्त शिरोमणि मीराबाई का नाम सर्वोपरि है

मीराबाई के जन्मकाल की घटनाएं तो मिलती हैं किंतु जन्म-मृत्यु के सम्बन्ध में निश्चित तिथियाँ नहीं मिलती हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीराबाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा के कुछ पदों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि वह कबीर, तुलसीदास, रैदास और अकबर की समकालीन थीं किन्तु कबीर के जन्म और अकबर की मृत्यु के बीच 200 वर्षों से भी अधिक समय का अंतराल होने से यह सत्य प्रतीत नहीं होता।

मीरां के जन्म के सम्बन्ध में ओझा आदि विद्वानों का मत अधिक सही प्रतीत होता है अतः मीराबाई का जन्म कबीर के निधन के बाद और अकबर के बादशाह बनने से पहले हुआ।

मीराबाई का प्रारम्भिक जीवन

मीराबाई मेड़ता के राव दूदा के द्वितीय पुत्र राठौड़ रतनसिंह की इकलौती पुत्री थी। मीरा का जन्म मेड़ता से लगभग 21 मील दूर कुड़की गांव में हुआ। मीरा की अल्पायु में ही उनकी माँ का निधन हो गया। मीराबाई के दादा राव दूदा तथा उनका परिवार भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे। राव दूदा ने पण्डित गजाधर को मीरा का शिक्षक नियुक्त किया जो पूजा-पाठ के साथ-साथ मीरा को पुराणों की कथाएं एवं स्मृतियां आदि सुनाया करते थे।

इस प्रकार मीरा में कृष्ण के प्रति भक्ति-भावना का बीजारोपण बाल्यकाल में ही हो गया था। मान्यता है कि किसी साधु ने मीरा को उसके बाल्यकाल में भगवान मुरलीधर की मूर्ति दी थी। मीरा उन्हें अपना पति मानने लगीं। राव दूदा की मृत्यु के बाद मीरा के ताऊ वीरमदेव मेड़ता के शासक हुए। ई.1516 में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ।

विवाह के बाद मीरा भगवान मुरलीधर की मूर्ति को तथा पण्डित गजाधर को चित्तौड़ ले गयी। मीरा ने चित्तौड़ दुर्ग में मुरलीधरजी का मन्दिर बनवाया तथा उनकी सेवा का दायित्व पण्डित गजाधर को सौंप दिया। इस सेवा के बदले गजाधर को मांडल एवं पुर में 2,000 बीघा जमीन प्रदान की गई जो अब भी उनके वंशजों के पास है।

 विवाह के 7 वर्ष बाद मीरा के पति भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। मीराबाई सांसारिक सुखों से विरक्त होकर सत्संग और भजन-कीर्तन करने लगीं। ई.1528 में मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा भी खानवा की लड़ाई में घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बाद महाराणा रत्नसिंह और उसके बाद महाराणा विक्रमादित्य मेवाड़ के शासक बने। उन दोनों को यह पसंद नहीं था कि मीरा साधुओं के बीच उठे-बैठे। उन्होंने मीरां का अपमान किया तथा उसे मारने का भी प्रयत्न किया। इस पर मीराबाई चित्तौड़ छोड़कर अपने पीहर मेड़ता लौट गई।

कुछ समय बाद जोधपुर के राव मालदेव ने मीरा के ताऊ वीरमदेव का मेड़ता राज्य छीन लिया। अतः मीरा वृन्दावन चली गईं। महाराणा विक्रमादित्य द्वारा यहाँ भी तंग किए जाने पर मीराबाई वृन्दावन छोड़़कर द्वारिका चली गईं। कुछ समय बाद मीरा के ताऊ के पुत्र जयमल राठौड़ ने मेड़ता पुनः अधिकृत कर लिया और मीरा को द्वारिका से मेड़ता बुलाया किंतु मीरा ने द्वारिका छोड़़ने से मना कर दिया। इस पर जयमल ने कुछ पुरोहितों को द्वारिका भेजा। वे मीरा के द्वार पर बैठ कर उपवास करने लगे।

तब मीराबराई मन्दिर में गयी और एक भजन गाया जिसका अर्थ था कि हे प्रभु! मैं तुम्हारे इस धाम को नहीं त्यागना चाहती, यह मेरा प्रण है किंतु यदि ये ब्राह्मण भूख से मृत्यु को प्राप्त हुए तो मुझे ब्रह्महत्या का दोष लगेगा। अतः आप ऐसा उपाय करें जिससे मेरा प्रण और ब्राह्मणों के प्राण दोनों की रक्षा हो जाए। इस भजन के गाते हुए मीरा के प्राण-पँखेरू उड़ गए और वह द्वारिकाधीश की प्रतिमा में विलीन हो गई।

मीरा की भक्ति भावना

मीरा की रचनाओं में उनकी आध्यात्मिक यात्रा के तीन पड़ाव दिखाई देते हैं। प्रारम्भ में उनकी आत्मा भगवान श्रीकृष्ण के लिए लालायित रहती है और वे प्रेमविरह में व्याकुल होकर कहती हैं- ‘मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली’ ….. ‘दरस बिन दूखण लागे नैण।’ भक्ति के दूसरे पड़ाव में उन्हें श्री कृष्ण की उपलब्धि हो जाती है वह कहती हैं- ‘पायोजी मैंने रामरतन धन पायो’ ……. ‘साजन म्हारे घरि आया हो, जुगा-जुगा री जोवता, विरहणी पिव पाया हो।’

मीरा की भक्ति का तीसरा और अन्तिम पड़ाव है जब उन्हें भक्ति एवं ईश-प्राप्ति के फलस्वरूप उत्पन्न चरम-आनंद की प्राप्ति होती है- ‘अंसुवन जल सींच-सींच प्रेम बेल बोई, अब तो बेल फैल गई आनन्द फल होई।’

भारतीय अध्यात्म में चार प्रकार के मोक्ष माने गए हैं- सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य और सामीप्य। सायुज्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है। सारूप्य मोक्ष में भक्त, ईश्वर के समान रूप धारण कर लेता है, सालोक्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के लोक में जाकर स्थित हो जाता है।

सामीप्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के समीप स्थित होता है। मीरां को सगुण भक्ति के कारण तथा सगुण भक्ति में भी दाम्पत्य भाव की भक्ति के कारण सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसमें वे ईश्वर से एकाकार हो जाती हैं। इस अनुभूति को मीरा ने इस प्रकार व्यक्त किया है- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई।’

जनसाधारण में मीराबाई के पद भक्ति-भाव से गाए जाते हैं।  मीराबाई भले ही राजस्थान की भक्त-कवयित्री थीं किंतु उनके पदों का गायन पूरे देश में होता है। विभिन्न स्थानों का प्रभाव हो जाने के कारण इन पदों के स्वरूप एवं भाषा में अंतर मिलता है। कर्नल टॉड तथा स्ट्रैटन ने मीराबाई के जीवन पर प्रकाश डाला। नैणसी ने भी मीराबाई का उल्लेख इन शब्दों में किया है- ‘भोजराज सांगावत इणनु कहै छै, मीरांबाई राठौड़ परणाई हुती।’ मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ ने ‘मीराबाई का जीवन और उनका काव्य’ नामक पुस्तक लिखी। महादेवी वर्मा के अनुसार, ‘मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के रत्न हैं।’

मीराबाई की रचनाएं

मीराबाई ने अपने फुटकर पद लिखे हैं तथा उनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली है। कुछ पद विशुद्ध ब्रजभाषा में और कुछ पद गुजराती भाषा भी मिलते हैं। उनके पदों में हिंदी एवं राजस्थानी के साथ-साथ डिंगल, पिंगल, ब्रज, संस्कृत, सधुक्कड़ी भाषाओं के भी दर्शन होते हैं। मीरा के विरह गीतों में समकालीन कवियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविकता एवं मौलिकता पाई जाती है।

इनके लिखें पदों में शांत रस एवं शृंगार रस का प्रयोग अधिक हुआ है। माना जाता है कि मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की- (1.) बरसी का मायरा, (2.) गीत गोविंद टीका, (3.) राग गोविंद, (4.) राग सोरठ के पद। मीराबाई के लिखे पदों का संकलन ‘मीराबाई की पदावली’ नामक ग्रन्थ में भी किया गया है।

हृदय की गहरी पीड़ा, विरहानुभूति और प्रेम की तन्मयता से भरे हुए मीराबाई के पद हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। समर्पण की तीव्र अनुभूति, विरह की घनीभूत वेदना एवं मिलन की प्रसन्नता से निकल पड़ने वाले आँसुओं से सिंचित मीरा के पद गीतिकाव्य के उत्तम नमूने हैं। भावों की सुकुमारता, आडम्बरहीनता और भाषा के सहज प्रवाह के कारण इन्हें लोक में विशेष प्रसिद्धि मिली।

मीरा के पदों में माधुर्य-भक्ति के साथ प्रेम की गहन पीड़ा, विरह की आंतरिक अनुभूति और आध्यात्मिक उदात्तता व्यक्त हुई है जो हिन्दी-साहित्य की अप्रतिम थाती है। सामंती परिवेश की वर्जनाओं को तोड़कर कृष्ण-भक्ति में रंगी-पगी मीरा के पदों में सीधी-सरल एवं हृदय-ग्राही भाषा का प्रयोग हुआ है जो मार्मिक विरह-अभिव्यक्ति एवं अलंकारों के सहज-स्वाभाविक प्रयोग के कारण अनूठा बन पड़ा है।

मीराबाई को संगीत का अच्छा ज्ञान था, इस कारण उनका काव्य विभिन्न राग-रागनियों पर आधारित है। अतः शास्त्रीय गायन में भी मीरा के पदों का उपयोग किया जाता है।

मीरादासी सम्प्रदाय

मीरांबाई ने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की फिर भी मीराबाई के भक्ति मार्ग पर चलने वाले भक्त अपने आप को मीरादासी संप्रदाय से जोड़ते हैं। इस संप्रदाय के लोगों की संख्या बहुत कम है। इस संप्रदाय के लोग मीरांबाई की तरह तन्मय होकर हरि-कीर्तन एवं नृत्य करते हैं।

एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड एथिक्स के अनुसार मीरादासी सम्प्रदाय की भक्त-नारियों में कृष्ण के बाल-स्वरूप की अराधना पद्धति प्रचलित है। एच. एच. विल्सन ने भी इस सम्प्रदाय का उल्लेख किया है। माना जाता है कि मीराबाई ने राजस्थान में अनेक राजकुमारों और राजकुमारियों को भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

इनमें ईडर के अखैराज, बीकानेर के पृथ्वीराज, जयपुर के जयसिंह और प्रतापसिंह, किशनगढ़ के सावन्तसिंह (नागरीदास), पृथ्वीराज की पत्नी रानावतजी, सावंतसिंह की प्रेयसी रसिक बिहारी (बनी-ठनी) एवं उसकी बहिन सुन्दर कंवरी, मारवाड़ की किसनी आदि प्रमुख हैं। मीरा की दाम्पत्य भाव की भक्ति का विधवा स्त्रियों पर विशेष प्रभाव पड़ा जो मीरा की तरह श्रीकृष्ण को अपना पति मानने लगती थीं। मीरादासी सम्प्रदाय की भक्त-नारियां मीराबाई जैसे ही वस्त्र धारण करती थीं।

वर्तमान समय में मीराबाई की प्रसिद्धि

आज मीराबाई की ख्याति पूरे विश्व में है। राव दूदा की राजधानी मेड़ता में भगवान कृष्ण का मध्य-कालीन मंदिर है जिसमें मीराबाई की मनुष्याकार प्रतिमा लगी हुई है। चित्तौड़ दुर्ग में भी मीराबाई का मंदिर है जिस पर भारत सरकार के डाक विभाग ने विशेष आवरण जारी किया। मीराबाई को लेकर कई फीचर-फिल्मों का भी निर्माण हुआ। राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मीरा पुरस्कार के नाम से जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय साहित्यिक विरासत

कालीदास

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मीराबाई

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