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थियोसॉफिकल सोसायटी

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थियोसॉफिकल सोसायटी

थियोसॉफिकल सोसायटी भारत का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आन्दोलन था जिसने देश के धार्मिक तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित किया।

थियोसॉफी का अर्थ होता है- ‘ईश्वर का ज्ञान।’ संस्कृत में इसे ‘ब्रह्मविद्या’ कहते हैं। थियोसॉ फी  शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तीसरी शताब्दी ईस्वी में एलेक्जेण्ड्रिया के ग्रीक विद्वान इम्बीकस ने किया था।

आधुनिक काल में इस शब्द का प्रयोग थियोसॉफिकल सोसायटी ने किया। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था थी जिसकी स्थापना कर्नल एच. एम. आलकाट और सुश्री एच. पी. ब्लेवटास्की ने 7 सितम्बर 1876 को अमरीका के न्यूयार्क शहर में की। इस संस्था के उद्देश्य इस प्रकार से थे-

(1.) प्रकृति के नियमों की खोज करना तथा मनुष्य की दैवी शक्तियों का विकास करना।

(2.) किसी भी धर्म की कट्टरता को प्रश्रय न देकर समस्त धर्मों में समन्वय स्थापित करना।

(3.) प्राचीन धर्म, दर्शन और विज्ञान जो संसार में कहीं भी पाया जा सकता है, उसके अध्ययन में सहयोग देना।

(4.) विश्व बन्धुत्व अथवा विश्व मान्यता का विकास करना।

(5.) पूर्वी देशों के धर्मों तथा दर्शन का अध्ययन तथा प्रसार करना।

थियोसॉफिकल सोसायटी का भारत में आगमन

आलकाट व ब्लेवटास्की ई.1879 में स्वामी दयानन्द के निमन्त्रण पर भारत आए। उन्होंने हिन्दू-धर्म के गुणों पर प्रकाश डालते हुए भारतीयों को उपदेश दिया कि यह सब धर्मों से श्रेष्ठ है तथा इसमें सम्पूर्ण सत्य निहित है। थियोसॉफिकल सोसायटी का लक्ष्य भारतीयों को उनके प्राचीन गौरव और महानता की याद दिलाना है ताकि भारत अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर सके।

सात साल तक आलकाट व ब्लेवटास्की आर्य समाज के साथ मिलकर ईसाई धर्म के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न करते रहे। स्वामी दयानन्द वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे, जो थियोसॉफिस्ट्स विचारकों को स्वीकार्य नहीं था। ई.1886 में उन्होंने मद्रास के उपनगर आडियार में थियोसॉफिकल सोसायटी का केन्द्र स्थापित किया। अब इस संस्था का कार्यक्षेत्र भारत हो गया तथा यहीं से अन्य देशों में इसके विचारों का प्रचार होने लगा।

श्रीमती एनीबीसेण्ट का भारत में आगमन

 श्रीमती एनीबीसेण्ट उच्च शिक्षा प्राप्त, कुलीनवंशी, आयरिश महिला थीं। 16 नवम्बर 1873 को 46 वर्ष की आयु में वह भारत आईं और भारत के सांस्कृतिक आन्दोलन में सक्रिय हो गईं। उन्होंने थियोसॉफिकल सोसायटी के कार्य को फैलाने में बड़ा योगदान दिया। वे जन्म से आयरिश थीं किन्तु उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि मान लिया। उन्हें भारतीयता, हिन्दू-धर्म और हिन्दू समाज से अगाध प्रेम था।

उनकी मान्यता थी कि भारत का भविष्य हिन्दू-धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अनेक विद्वान् और नेता, उनके महान् व्यक्तित्व से प्रभावित होकर थियोसॉफिकल सोसायटी में सम्मिलित हो गये। एनीबीसेण्ट की मान्यता थी कि वे पूर्व जन्म में हिन्दू थीं। इसलिए उन्होंने भारत आते ही स्वयं को पूर्ण रूप से हिन्दुत्व के रंग में रंग लिया तथा भारतीय वेश-भूषा और खानपान को अपना लिया।

वे हिन्दू तीर्थों में घूमती रहती थीं। उन्होंने अपना अधिकांश समय काशी में व्यतीत किया जहाँ उन्होंने सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की जो आगे चल कर हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। बनारस में रहते हुए उन्होंने रामायण और महाभारत की कथाएँ लिखीं और गीता का अनुवाद किया। उन्होंने हिन्दू-धर्म और संस्कृति के पक्ष में ओजस्वी भाषण दिये।

श्रीमती एनीबीसेण्ट द्वारा हिन्दू-धर्म की सेवा

श्रीमती एनीबीसेण्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हिन्दू-धर्म की सेवा था। राजा राममोहन राय एवं स्वामी दयानन्द ने निराकार ईश्वर की उपासना पर बल दिया तथा मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, तीर्थ, व्रत-अनुष्ठान एवं पौराणिक बातों का खण्डन किया किंतु एनीबीसेण्ट ने वेद और उपनिषदों के महत्त्व को मान्यता देते हुए मूर्ति-पूजा, बहुदेववाद, योग, पुनर्जन्म, कर्मवाद, तीर्थ, व्रत, गीता, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र और महाकाव्य आदि के द्वारा हिन्दुत्व के समग्र रूप का तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया।

श्रीमती एनीबीसेण्ट अपने भाषणों में प्रायः यह बात कहती थीं-

‘हिन्दुत्व ही भारत का प्राण है, हिन्दुत्व वह मिट्टी है जिसमें भारत का मूल गड़ा हुआ है। यदि वह मिट्टी हटा ली गई तो भारत रूपी वृक्ष सूख जायेगा। हिन्दुत्व के बिना भारत के सामने कोई भविष्य नहीं है

…….. हिन्दुत्व की रक्षा भारतवासी और हिन्दू ही कर सकते हैं। भारत में प्रश्रय पाने वाले अनेक धर्म हैं, अनेक जातियाँ हैं किन्तु इनमें किसी की भी शिरा भारत के अतीत तक नहीं पहुँची है। इनमें से किसी में भी यह दम नहीं कि भारत को एक राष्ट्र के रूप में जीवित रख सके। इनमें से प्रत्येक भारत से लोप हो जाये तब भी भारत, भारत ही रहेगा किन्तु यदि हिन्दुत्व लोप हो गया तो शेष कुछ भी नहीं बचेगा

…….. हिन्दुत्व के जागरण से ही विश्व का कल्याण हो सकता है।’

ई.1914 में एक भाषण में उन्होंने कहा था- ‘चालीस वर्ष के गम्भीर चिन्तन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि विश्व के समस्त धर्मों में मुझे हिन्दुत्व के समान कोई धर्म इतना पूर्ण, वैज्ञानिक, दर्शनयुक्त एवं आध्यात्मिकता से परिपूर्ण दिखाई नहीं देता। जितना अधिक तुमको इसका भान होगा, उतना ही अधिक तुम इससे प्रेम रखोगे।’

थियोसॉफिकल सोसायटी के धार्मिक सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी ने हिन्दू-धर्म की अनेक रहस्यमयी तथा आस्थापूर्ण बातों का वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया। जिस समय एनीबीसेण्ट भारत आईं, उस समय अँग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का, हिन्दू-धर्म तथा संस्कृति से विश्वास उठने लगा था। ऐसे समय में एनीबीसेण्ट ने भारतीय आदर्शों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। एनीबीसेण्ट ने स्वयं हिन्दू तीर्थों की यात्रा की।

उन्होंने नंगे पैर अमरनाथ की यात्रा की और वहाँ शीतल जल से स्नान करके मन्दिर में प्रवेश किया। एक विदेशी महिला को ऐसा करते देखकर हिन्दुओं के मस्तिष्क में यह बात बैठ गई कि उनका धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है। एनीबीसेण्ट ने काशी में रहकर गीता का अनुवाद किया, रामायण तथा महाभारत पर संक्षिप्त भाष्य लिखे।

यूरोप और अमरीका के लोगों के सामने हिन्दू-धर्म तथा संस्कृति की महत्ता और गौरवगान किया। जब भारत के अँग्रेजी पढ़े लिखे लोगों ने एक अँग्रेज महिला के मुँह से हिन्दू-धर्म और संस्कृति का गौरवगान सुना तो उन्हें अपने धर्म में पुनः आस्था जागृत होने लगी। एनीबीसेण्ट के भाषणों से भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना उत्पन्न हुई।

वेलेन्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘जब अतिश्रेष्ठ बौद्धिक शक्तियों तथा अद्भुत वक्तृत्व शक्ति से सुसज्जित यूरोपियन, भारत जाकर भारतीयों से यह कहे कि उच्चतम ज्ञान की कुँजी यूरोप वालों के पास नहीं, तुम्हारे पास है तथा तुम्हारे देवता, तुम्हारे दर्शन तथा तुम्हारी नैतिकता की छाया भी यूरोप वाले नहीं छू सकते, तब यदि भारतवासी हमारी सभ्यता से मुँह मोड़ लें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है!’

थियोसॉफिकल सोसायटी द्वारा राष्ट्रीय सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी तथा इसके संस्थापकों ने अपनी श्रेष्ठता के बारे में प्रचार किया किंतु सदस्यों के सम्बन्ध में अनेक झूठी-सच्ची बातें जनता के सामने प्रकट हुईं तो लोगों को इस सोसायटी के प्रति श्रद्धा कम होने लगी। इससे एनीबीसेण्ट को अत्यन्त दुःख हुआ और ई.1914 में उन्होंने अपना क्षेत्र धर्म से बदलकर राजनीति कर लिया।

वे लोकमान्य तिलक द्वारा चलाये गये होमरूल आन्दोलन में सम्मिलित हो गईं। ई.1917 में मद्रास सरकार ने एनीबीसेण्ट को नजरबन्द कर दिया किन्तु प्रबल जन-आन्दोलन के कारण सरकार ने उन्हें तत्काल मुक्त कर दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सभापति पद पर चुन ली गईं। काँग्रेस की सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में राजनीतिक चेतना जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

थियोसॉफिकल सोसायटी ने अनेक स्कूल, कॉलेज और छात्रावास स्थापित किये। इस संस्था ने बाल-विवाह, कन्या-वर-विक्रय, छुआछूत आदि कुरीतियों का विरोध कर समाज सुधार के कार्य किये। सोसायटी के कार्यों से न केवल धर्म एवं समाज सुधार आन्दोलन को बल प्राप्त हुआ, अपितु राष्ट्रीय आन्दोलन में भी नई जान आई। श्रीमती एनीबीसेण्ट ने हिन्दू जागरण के लिए जितना कार्य किया, किसी हिन्दू ने भी उतना काम नहीं किया।

गाँधीजी ने उनके बारे में लिखा है- ‘जब तक भारत वर्ष जीवित है, एनीबीसेण्ट की सेवाएं भी जीवित रहेंगी। उन्होंने भारत को अपनी जन्मभूमि मान लिया था। उनके पास देने योग्य जो कुछ भी था, उन्होंने भारत के चरणों में अर्पित कर दिया। इसलिए भारतवासियों की दृष्टि में वे इतनी प्यारी और श्रद्धेय हो गई हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

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विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में हिन्दू समाज में सुधार आंदोलन चले तब वे केवल हिन्दुओं तक सीमित नहीं रहे। अपितु भारत के विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन चले जिनसे उनमें भी नवीन ऊर्जा का आगमन हुआ।

भारत में ऐसे कई धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन हुए जिनके कार्य तथा उद्देश्य बहुत छोटे क्षेत्र तक सीमित थे। पारसियों ने अपने धर्म और समाज सुधार के लिए धार्मिक सुधार समुदाय की स्थापना की। दादा भाई नौरोजी पारसी पुरोहित परिवार से थे। उन्होंने पारसी धर्म के सुधार हेतु महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

महादेव गोविन्द रानाडे ने सामाजिक सुधारों के साथ डंकन एजूकेशन सोसायटी स्थापित कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। हिन्दुओं के वैष्णव सम्प्रदाय में भी कुछ धार्मिक आन्दोलन हुए। माधव सम्प्रदाय ने अपनी धर्म सुधार सभा बनायी। शंकराचार्य के समर्थकों ने अपने मत का अलग प्रचार किया।

ज्योति बा फुले और सत्य शोधक समाज

ज्योति बा फुले का जन्म ई.1828 में एक माली परिवार में हुआ। उन्होंने शक्तिशाली गैर ब्राह्मण आंदोलन को जन्म दिया तथा हिन्दू-धर्म में प्रचलित प्रथाओं का विरोध किया। ई.1854 में उन्होंने अछूतों के लिये विद्यालय खोले तथा विधवाओं के लिये अनाथालयों की स्थापना की।

ज्योति बा फुले को ब्राह्मणों की पुरोहिताई से गहरी घृणा थी। दलित वर्गों के उत्थान के लिये उन्होंने ई.1873 में सत्य शोधक समाज की स्थापना की। ब्राह्मण विरोधी गतिविधियों को संगठित रूप में प्रसारित करने हेतु उन्होंने दो पुस्तकों- सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक तथा गुलामगिरि की रचना की।

राधास्वामी सत्संग

ई.1861 में शिवदयाल ( ई.1818-1878) ने आगरा में राधास्वामी सत्संग की स्थापना की। राधास्वामी सत्संग के गुरु, ईश्वर के अवतार माने जाते थे। इसलिए इस संस्था में गुरु-भक्ति की प्रधानता थी। इस संस्था के अनुयायी जाति-पाँति के भेदभाव के बिना, ईश्वर की अराधना करते थे। वे ईश्वर, जीवात्मा और जगत को सत्य मानते थे। कबीर, दादू, नानक आदि सन्तों की वाणियाँ इनके धार्मिक ग्रन्थ थे।

ये समस्त धर्मों को समान मानते थे तथा प्रेम और भ्रातृत्व का प्रचार करते थे। राधास्वामी सत्संग भक्ति-मार्ग और योग-मार्ग का एक मिश्रण था। इस संस्था ने धार्मिक जागृति का काम किया। साथ ही जाति-प्रतिबन्धों का बहिष्कार किया, शिक्षा का प्रसार कर सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्र निर्माण के कार्य में बहुमूल्य योगदान दिया।

पारसी समाज में सुधार आंदोलन

दादा भाई नौरोजी तथा एस. एस. बंगाली ने पारसी धर्म और समाज में सुधार लाने के लिए बहुत कार्य किया। उन्होंने पारसियों की सामाजिक दशा सुधारने तथा पारसी धर्मिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से ई.1851 में रहनुमाई मज्दयासना सभा की स्थापना की। ई.1910 में पारसी धर्मगुरु ढोला के प्रोत्साहन से एक पारसी अधिवेशन का उद्घाटन हुआ जिसने पारसी वर्ग की बहुत सेवा की।

पारसियों ने अपने सुधार के साथ-साथ देश के सामाजिक तथा राजनैतिक उत्थान में भी योगदान दिया। देश की अनेक पारसी संस्थाएँ पारसी वर्ग की दानशीलता तथा धर्मपरायणता की द्योतक हैं। दादाभाई नौरोजी, सर फिरोजशाह मेहता, सर दीन शार्दूलजी आदि पारसी नेताओं ने भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रगति में बहुमूल्य योगदान दिया।

सिक्ख समाज में सुधार आंदोलन

उन्नीसवीं सदी में पंजाब में सिंह सभा तथा प्रधान खालसा दीवान नामक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने पंजाब में कई गुरुद्वारे तथा कॉलेज खोले। प्रगतिशील सिक्खों ने अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना की। सिक्खों ने अपने धार्मिक व सामाजिक जीवन को शुद्ध बनाने का प्रयास किया।

 ई.1921 में सिक्खों ने अकालियों के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त कराना था। सरकार महंतों का समर्थन कर रही थी किंतु अंत में सरकार को झुकना पड़ा। इसके परिणाम स्वरूप ई.1922 में सिक्ख गुरुद्वारा कानून बनाया गया तथा ई.1925 में इसमें संशोधन किया गया।

ईसाई समाज में सुधार आंदोलन

इस काल में भारतीय ईसाइयों में भी नवजागरण का काम हुआ। उनमें अन्य धर्मों की अपेक्षा अन्धविश्वास तथा रूढ़िवादिता कम थी। अतः उनमें सुधार और परिवर्तन भी अपेक्षाकृत कम हुए। विवेकशील ईसाई पादरियों और दूरदर्शी धर्माधिकारियों ने भारतीय ईसाइयों में प्रचलित अनेक धार्मिक प्रथाओं, जो पश्चिमी प्रथाओं से भिन्न थीं, के अन्तर को दूर करके एक विशाल संगठन स्थापित करने की चेष्टा की।

ईसाई धर्म प्रचारकों ने पाश्चातय-शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालय स्थापित किये तथा इनकी आड़ में अदिवासियों एवं दलितों को ईसाई धर्म में सम्मिलित किया। इन नवीन ईसाइयों को शिक्षा की सुविधा देकर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया गया। अनाथलायों, औषधालयों, विद्यालयों आदि परोपकारी संस्थाओं के माध्यम से ईसाई धर्म प्रचारकों ने जन-साधारण का विश्वास अर्जित किया तथा मानव समाज की विपुल सेवा की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

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मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

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सर सैयद अहमद खाँ

19वीं शताब्दी में भारत में मुस्लिम सुधार आन्दोलन आरम्भ हुए। मुस्लिम समाज दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था- पहला, उच्च अभिजात्य वर्ग जिसमें बादशाह, अमीर तथा उनके परिवार के लोग थे और दूसरा, जन-साधारण जिसमें सैनिक, श्रमिक, सेवक तथा छोटे कार्य करने वाले मुसलमान थे। दूसरे वर्ग में वे मुसलमान भी थे जो मूलतः हिन्दू थे तथा अनेकानेक कारणों से मुसलमान बन गये थे।

धर्म-परिवर्तन के बाद भी उनके सामाजिक स्तर में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। उच्च मुस्लिम अभिजात्य वर्ग 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में राजनीतिक प्रभुत्व खो चुका था किंतु हाथ से काम करने का अभ्यस्त नहीं होने के कारण तेजी से पिछड़ता जा रहा था। ई.1857 की सैनिक क्रांति की विफलता के बाद इस वर्ग की रही-सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो गयी, क्योंकि अँग्रेजों ने इस विप्लव के लिये उच्च वर्ग के मुसलमानों को उत्तरदायी माना।

मुस्लिम सुधार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य धनी-मुस्लिम वर्ग को परिवर्तित परिस्थितियों से परिचित कराना तथा पाश्चात्य शिक्षा की ओर ध्यान दिलाना था। मुसलमानों का सामाजिक और धार्मिक जीवन कुरान पर आधारित था। अतः प्राचीन सामाजिक और धार्मिक जीवन पद्धति में परिवर्तन करने के लिए आवश्यक था कि कुरान की सम-सामयिक व्याख्या की जाये तथा बताया जाये कि प्रचलित सामाजिक एवं धार्मिक पद्धति, कुरान या हदीस के अनुसार नहीं है।

वहाबी आंदोलन

मुस्लिम सुधार आन्दोलन की पहली प्रक्रिया वहाबी आंदोलन अथवा वलीउल्लाह आंदोलन के रूप में शुरु हुई। शाह वलीउल्लाह (ई.1703-63) मुसलमानों के प्रथम नेता थे जिन्होंने इस्लाम की उदारतापूर्ण व्याख्या करने तथा मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने की बात कही। वलीउल्लाह ने मुस्लिम समुदाय में व्याप्त भेदभवों को समाप्त करने के लिये सुधार आन्दोलन चलाया।

वलीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अजीज, उनके भतीजे मोहम्मद इस्माइल और उनके शिष्य अहमद बल्लवी ने वलीउल्लाह के विचारों को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ इसे राजनीतिक रंग भी दिया। सैयद अहमद बरेलवी के नेतृत्व में वहाबी आंदोलन ने पूर्णतः राजनीतिक स्वरूप धारण कर लिया। उनका कहना था कि अनुकूल राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से ही इस्लाम फल-फूल सकता है।

उन्होंने घोषणा की कि भारत एक दार-उल-हर्ब (काफिरों का देश) है और इसे दार-उल-इस्लाम (मुसलमानों का देश) बनाने हेतु समस्त गैर इस्लामी शासकों का तख्ता पलटना आवश्यक है। प्रारंभ में यह अभियान पंजाब में सिक्खों के विरुद्ध था किंतु ई.1849 में अँग्रेजों द्वारा पंजाब का विलय कर लिये जाने के बाद, इस आंदोलन ने अँग्रेजों के विरुद्ध जेहाद खोल दिया।

यह आंदोलन ई.1870 तक सीमांत प्रदेशों, पंजाब तथा बंगाल के कई हिस्सों में जारी रहा किंतु अँग्रेज सरकार ने इसे सैनिक बल की सहायता से कुचल दिया।

मुस्लिम सुधार आन्दोलन – अलीगढ़ आन्दोलन

सर सैयद अहमद खाँ (ई.1817-98) ने मुसलमानों में आत्मनिर्भर बनने, अपनी सहायता आप करने तथा अँग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर आधुनिक बनने की भावना उत्पन्न की। उनके द्वारा चलाया गया मुस्लिम सुधार आन्दोलन अलीगढ़ आन्दोलन कहलाता है, यह उनके कार्यक्षेत्र का केन्द्र बिन्दु रहा। सर सैयद अहमदखाँ का जन्म ई.1817 में दिल्ली में हुआ था।

20 वर्ष की आयु में वे सरकारी सेवा में चले गये। ई.1857 के सैनिक विप्लव के समय उन्होंने अँग्रेजों की विशेष सेवा की जिससे उन्होंने अँग्रेजों की सद्भावना प्राप्त कर ली। इस सद्भावना का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हित में किया। उस समय तक भारतीय मुसलमानों ने स्वयं को अँग्रेजी शिक्षा और सभ्यता से दूर बनाये रखा था।

अँग्रेजों से उनके सम्बन्ध भी अच्छे नहीं थे और यही उनकी अवनति का मुख्य कारण था। सर सैयद अहमदखाँ ने अपने जीवन के दो प्रमुख उद्देश्य बनाये-

(1.) अँग्रेजों और मुसलमानों के सम्बन्ध ठीक करना।

(2.) मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना।

सर सैयद अहमदखाँ ने मुसलमानों को समझाया कि सरकार के प्रति वफादार रहने से उनके हितों की पूर्ति हो सकती है। उन्होंने अँग्रेजों को समझाया कि मुसलमान उनके शासन के विरुद्ध नहीं हैं, अँग्रेजों द्वारा दिखाई गई थोड़ी-सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे। सर सैयद अहमदखाँ ने ई.1864 में गाजीपुर में अँग्रेजी स्कूल स्थापित किया।

एक वर्ष बाद अँग्रेजी पुस्तकों का उर्दू अनुवाद करने के लिए विज्ञान समाज की स्थापना की। ई.1869 में लन्दन यात्रा के बाद उन्होंने मुसलमानों की सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए एक आन्दोलन आरम्भ किया। दिसम्बर 1870 में उन्होंने तहजीब-उल-अखलाक नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ कर मुसलमानों को बदलती हुई परिस्थितियों से अवगत कराया। सर सैयद अहमद खाँ मुसलमानों के प्राचीन सामाजिक मूल्यों तथा रहन-सहन के तरीकों को समय के अनुकूल नहीं मानते थे।

कुरान की नई व्याख्या करने के लिए उन्होंने तफसील-उल-कुरान लिखना आरम्भ किया जो पूरी नहीं हो सकी। सर सैयद अहमदखाँ ने अपने समाचार पत्र तहजीब-उल-अलखाक का उद्देश्य मुसलमानों को सभ्य बनाना बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज तब तक सभ्य नहीं बन सकता, जब तक वह प्राचीन परम्पराओं को छोड़कर नई परम्पराओं को न अपना ले।

उनकी मान्यता थी कि प्रत्येक परम्परा समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनाई जानी चाहिए क्योंकि बदलती हुई परिस्थितियों में परम्पराएँ भी अनुपयोगी सिद्ध हो जाती हैं। उन्होंने हज करने, जकात बाँटने, मस्जिद बनवाने आदि कार्यों की कटु आलोचना की तथा मुसलमानों को पश्चिमी सभ्यता एवं पद्धति अपनाने की सलाह दी।

अलीगढ़ आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में पश्चिमी शिक्षा को लोकप्रिय बनाना था जबकि मुसलमान अरबी, फारसी तथा धार्मिक शिक्षा को आवश्यक मानते थे तथा अँग्रेजी पढ़ना अच्छा नहीं समझते थे। कुछ मुल्ला-मौलवी भी अरबी, फारसी व धार्मिक शिक्षा को ही आवश्यक मानते थे। सर सैयद अहमदखाँ ने अँग्रेजी शिक्षा प्रणाली के दोषों को मुसलमानों की अरुचि का कारण बताया।

ई.1882 में उन्होंने हण्टर कमीशन के समक्ष गवाही देते हुए कहा- ‘मुसलमान ऐसी शिक्षण संस्थाओं में नहीं जाना चाहते, जहाँ अन्य सम्प्रदाय के लोग भी पढ़ते हों, क्योंकि मुसलमान उन्हें अपने से निम्न-स्तर का मानते हैं।’ मुसलमानों की मान्यता थी कि पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने से अधर्म बढ़ता है तथा अँग्रेजी पढ़ना ईसाई धर्म स्वीकार करने के समान है।

सर सैयद अहमद खाँ ने ई.1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना की, जिसका आरम्भिक रूप एक प्राइमरी स्कूल था। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का विधिवत् उद्घाटन किया तथा उत्तर प्रदेश के गवर्नर विलियम म्यूर ने इस कॉलेज के लिए भूमि प्रदान की। इस प्रकार आरम्भ से ही इस संस्था पर अँग्रेजों की कृपा दृष्टि रही।

यही कॉलेज आगे चलकर अलीगढ़ विश्वविद्यालय बना। इसमें आधुनिक विचारधारा के मुसलमानों ने शिक्षा प्राप्त की और यह अलीगढ़ आन्दोलन का केन्द्र बन गया। सर सैयद अहमदखाँ ने मोहम्मडन एजूकेशनल कांफ्रेंस की स्थापना करके ऐसे अनेक मुसलमानों को अपने साथ जोड़ लिया जो मुसलमानों को पाश्चात्य सभ्यता के सम्पर्क में लाने के उत्सुक थे।

अलीगढ़ मोहम्मडन कॉलेज मुसलमानों की शिक्षण संस्था होने के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक स्थिति सुधारने का केन्द्र भी बन गया। सर सैयद अहमदखाँ की मान्यता थी कि यहाँ से अध्ययन करके निकले हुए विद्यार्थी समाज में परिवर्तन लायेंगे। इस कॉलेज में विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर अधिक बल दिया जाता था।

वाद-विवाद प्रतियोगिता, खेलकूद, छात्रावास में अनिवार्य रूप से निवास तथा अँग्रेज अध्यापकों व अधिकारियों से मेल-जोल बढ़ाना, कॉलेज शिक्षा के अंग थे। सर सैयद अहमदखाँ ने अँग्रेजी शिक्षा पर अधिक बल दिया, क्योंकि सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक था।

उनकी मान्यता थी कि किसी समुदाय में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा इसी आधार पर आँकी जा सकती है कि राजकीय सेवा में उसे क्या स्थान प्राप्त है। वे प्रारम्भिक शिक्षा की अपेक्षा उच्च शिक्षा पर अधिक बल देते थे। अलीगढ़ मोहम्मडन कॉलेज के विद्यार्थी मुस्लिम सम्प्रदाय के हितों के लिए अधिक प्रयत्नशील रहते थे।

19वीं शताब्दी में मुसलमानों में समाज सुधार का मुख्य कार्य पुरुषों की अँग्रेजी शिक्षा तक सीमित था। सर सैयद अहमदखाँ मुस्लिम स्त्रियों के लिए शिक्षा को अनावश्यक तथा पर्दा-प्रथा को अनिवार्य मानते थे। वे बहु-विवाह को तर्क-संगत मानते थे। वे स्त्रियों को कुशल माताएँ व गृहणियाँ बनाने के पक्षधर थे न कि नौकरी करने वाली औरत। अतः अलीगढ़ आन्दोलन स्त्रियों के लिए परम्परागत शिक्षा तथा जीवन पद्धति को बदलने के पक्ष में नहीं था।

अलीगढ़ आन्दोलन एक ओर तो मुसलमानों में पश्चिमी सभ्यता के प्रति नया दृष्टिकोण लाने में सफल रहा किन्तु दूसरी ओर इसने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बहुत बढ़ावा दिया। अलीगढ़ कालेज के प्रथम प्रिंसिपल थियोडोर बेक की प्रेरणा से ई.1893 में मुसलमानों का एक संगठन बना जिसका लक्ष्य भारतीय मुसलमानों को राजनीति से पृथक् रखना था।

बेक के बाद जब मौरिसन, कॉलेज का प्रिन्सिपल बना तो उसने राष्ट्रीय काँग्रेस का विरोध करने के लिए मुसलमानों को संगठित करना आरम्भ किया। स्वयं सर सैयद अहमदखाँ भी काँग्रेस के कट्टर विरोधी हो गये। अधिकांश अवसरों पर उन्होंने साम्प्रदायिक कट्टरता से ओत-प्रोत विचार प्रकट किये।

अलीगढ़ कॉलेज के प्रिन्सिपल आर्किबाल्ड तथा अलीगढ़ कॉलेज के मन्त्री नवाब मोशी-उल-मुल्क की प्रेरणा से ई.1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। अलीगढ़ आन्दोलन भारतीय राष्ट्रीयता और राजनीति का विरोधी रहा। इस विरोध के कई कारण थे-

(1.) सर सैयद अहमद खाँ तथा उनका अलीगढ़ आन्दोलन प्रारम्भ से ही अँग्रेजों की सहानुभूति पर निर्भर थे। अतः यह आवश्यक था कि वे प्रगतिशील एवं राष्ट्रीय हिन्दुओं के विरुद्ध ब्रिटिश कूटनीति का समर्थन करें।

(2.) सर सैयद अहमदखाँ पश्चिमी सभ्यता से अत्यधिक प्रभावित थे इसलिए वे अँग्रेजों के बहुत बड़े समर्थक थे।

(3.) सर सैयद अहमदखाँ को भय था कि अल्पसंख्यक मुसलमान, बहुसंख्यक हिन्दुओं का मुकाबला नहीं कर सकेंगे। अतः अँग्रेजों का समर्थन करना तथा उनकी सहायता पर निर्भर रहना मुसलमानों के हितों के लिए आवश्यक था।

सर सैयद अहमदखाँ द्वारा प्रकट किये गये विचारों के अनुसार अलीगढ़ आन्दोलन के मुख्य रूप से चार आधार थे-

(1.) हिन्दु और मुसलमान दो अलग-अलग राजनीतिक इकाइयाँ हैं जिनके हितों और दृष्टिकोणों में काफी अन्तर है।

(2.) भारत में जनतन्त्र के आधार पर प्रतिनिधि सभाओं की स्थापना करने तथा असैनिक सेवाओं की परीक्षा भारत में करने से मुसलमानों के हितों की सुरक्षा सम्भव नहीं हो सकेगी, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक मुसलमान, बहुसंख्यक हिन्दू सत्ता के अधीन हो जायेंगे, जो अँग्रेजी शासन से भी बुरा होगा।

(3.) मुसलमानों को अँग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत ही अपने हितों को सुरक्षित समझना चाहिये। अतः मुसलमानों को अँग्रेजों के विरुद्ध किसी भी राजनैतिक आन्दोलन में भाग नहीं लेना चाहिये।

(4.) मुसलमानों के हित अँग्रेजों के हाथों में सुरक्षित हैं, अतः उन्हें राजनीति से अलग रह कर अपना सांस्कृतिक विकास करना चाहिये। राजनीति से पृथक् रहकर वे हिन्दुओं के राजनीतिक आन्दोलन को दुर्बल कर सकेंगे।

इस प्रकार अलीगढ़ आन्दोलन मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। यह सदैव भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के विरोध में रहा। पाकिस्तान के निर्माण में उसका बड़ा योगदान रहा किंतु इस आन्दोलन ने बहुत से मुसलमान युवकों को अँग्रेजी शिक्षा से जोड़ने में सफलता प्राप्त की। 

देवबंद आंदोलन

ई.1867 में मौलाना मुहम्मद कासिम के नेतृत्व में उलमा के एक दल ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद कस्बे में एक मदरसे की स्थापना की। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य कुरान तथा हदीस की शुद्ध शिक्षा का प्रसार करना था। अलीगढ़ आंदोलन पश्चिमी शिक्षा तथा अँग्रेजी सरकार का समर्थन करता था, जबकि देवबंद आंदोलन परम्परागत शैली में इस्लाम का प्रचार करता था।

इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार का जमकर विरोध किया। जहाँ सर सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध करते हुए मुसलमानों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी, वहीं देवबंद शाखा ने कांग्रेस का स्वागत करते हुए मुसलमानों का आह्वान किया कि वे आम राजनीतिक आंदोलन में भाग लें।

अबुल कलाम आजाद देवबंद से जुड़े हुए थे, उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुखता से हिस्सा लिया। देवबंद आंदोलन ने गांधीजी द्वारा आरम्भ किये गये असहयोग आंदोलन को समर्थन दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

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समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी ईस्वी में चले समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते समय इस बात पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए कि उस समय देश पराधीन था और सीमित साधनों के बीच जो भी व्यक्ति या संगठन जितना कुछ भी कर पाया, उसका मूल्य किसी भी तरह कम नहीं था।

19वीं शताब्दी के मध्य में समाज सुधार आन्दोलन व्यक्तिगत प्रयत्नों तक सीमित रहा किन्तु ई.1880 के बाद कुछ संगठित प्रयास किए गए। विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में सुधारकों को कुछ सफलता मिली। ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होता गया, ये कुरीतियां कम होती गईं। लार्ड विलियम बैंटिक ने सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया। इस कार्य में राजा राममोहन राय तथा द्वारिकानाथ टैगोर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

कानून का समर्थन प्राप्त होने पर भारत में यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गयी किन्तु सती-प्रथा के बन्द होने से विधवाओं की समस्या पहले से भी अधिक गम्भीर हो गई क्योंकि देश में बाल-विधवाओं की संख्या भी बहुत अधिक थी। अतः समाज-सुधारकों ने विधवा-विवाह के लिए आन्दोलन चलाया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए आन्दोलन चलाया।

उन्होंने शास्त्रों से उद्धरण देते हुए प्रमाणित किया कि शास्त्रों में विधवा के पुनर्विवाह का निषेध नहीं है। उनके प्रयत्नों से ई.1856 में सरकार ने विधवा-विवाह को वैध घोषित कर दिया गया। धीरे-धीरे भारतीयों ने इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया। ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित किया गया, जिसमें विधवा-विवाह और अन्तर्जातीय-विवाह को वैध मान लिया गया।

बाल-विवाह को रोकने के लिए सहवास-वय अधिनियम पारित किया गया। इन सारे प्रयासों का यद्यपि तुरन्त प्रभाव नहीं पड़ा तथापि लोगों को यह बात समझ आने लगी कि बाल-विवाह अनुचित है और विधवा-विवाह उचित है।

महाराष्ट्र समाज सुधार की दृष्टि से अग्रणी रहा। महाराष्ट्र में ईसाई धर्म में दीक्षित हिन्दुओं को पुनः हिन्दू-धर्म में शामिल करने की परम्परा थी। बाल-विवाह और विधवा-विवाह के अलावा वहाँ की दशा बंगाल की तरह पिछड़ी हुई नहीं थी। जाति-पाति के बन्धन थे किन्तु 19वीं शताब्दी के मध्य में इन बन्धनों को कम कने के लिए आन्दोलन आरम्भ हो चुका था।

समाज सुधार आन्दोलन की सबसे बड़ी दुर्बलता यह थी कि सुधारकों ने समाज सुधार के जिन सिद्धान्तों का प्रचार किया, उनका वे स्वयं उनका पालन नहीं कर सके, जिसका समाज पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। इसके अतिरिक्त समस्त सुधारक, समाज सुधार की प्रत्येक बात से सहमत हों, यह आवश्यक नहीं था।

जो स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे, उनमें से इस बात पर मतभेद था कि स्त्रियों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाय। कुछ सुधारक सरकार से कानून बनवाकर सुधारों को लागू करने के पक्ष में थे। इसके विपरीत कुछ सुधारकों की यह दृढ़ मान्यता थी कि सामाजिक मामलों में सरकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते समय प्रायः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या यह आन्दोलन समाज की समस्त कुरीतियों को समाप्त करने में सफल हो सका? वस्तुतः भारतीय हिन्दू समाज शताब्दियों से एक व्यवस्था की परिधि में बंधा हुआ था। अतः उस परिधि को तोड़कर एकाएक परिवर्तन करना असम्भव था। आज भी भारत में बाल-विवाह होते हैं, कुछ लोग आज भी विधवा-विवाह को हेय समझते हैं अतः यह नहीं कहा जा सकता कि समाज द्वारा इन प्रथाओं को मान्यता प्राप्त है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि 19वीं-20वीं सदी के समाज सुधार आंदोलन निष्फल हो गए।

सुधार आन्दोलनों की शुरूआत बंगाल से हुई थी और उसके नेता राजा राममोहन राय थे। राजा राममोहन राय की मृत्यु के सौ वर्ष बाद जब ई.1933 में बंगाल के पुनर्जागरण के प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति में उनकी मृत्यु-दिवस की शताब्दी मनाई गई, तब पुनर्जागरण काल के इतिहास का गौरवमय चित्र खींचा गया था, जिसमें राजा राममोहन राय को एक ‘चमकते सितारे’ के रूप में दिखाया गया।

कुछ विद्वानों ने समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते हुए इन प्रयासों को सामूहिक रूप से ‘भारतीय पुनर्जागरण’ कहा है। उनके अनुसार इन आन्दोलनों में बुद्धिवाद, विज्ञान, मानवतावाद जैसे कई ऐसे तत्त्व विद्यमान थे जो यूरोपिय पुनर्जागरण में भी उपस्थित थे किंतु तथ्यों के आधार पर यह धारणा पूर्णतः सत्य प्रतीत नहीं होती। इन आन्दोलनों का दृष्टिकोण छद्मवैज्ञानिकता पर आधारित था और मानवतावाद का व्यावहारिक पक्ष बहुत ही संकीर्ण था।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इनमें यूरोपीय पुनर्जागरण के कई तत्त्वों का पूर्णतः अभाव था। भौगोलिक खोज, वैज्ञानिक आविष्कार और कला एवं साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्ण प्रगति यूरोपीय पुनर्जागरण की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं किंतु भारतीय पुनर्जागरण में इन तत्त्वों का सर्वथा अभाव था। इस प्रकार भारतीय पुनर्जागरण, यूरोपीय पुनर्जागरण से कई अर्थोंं में भिन्न था। फिर भी, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में इन आन्दोलनों को ‘नवजागरण’ मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि इस पुनर्जागरण से भारत का आधुनिकीकरण हुआ, क्योंकि पुनर्जागरण के मूल में बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं वे आधुनिक विचार थे जो हर जगह आधुनिकता के वाहक रहे हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के समर्थकों ने भी इन आंदोलनों को भारत में आधुनिक युग का प्रारम्भ माना।

इन लोगों के अनुसार इन सुधार आन्दोलनों ने धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वास, रूढ़िवाद और क्रूर एवं अमानवीय प्रथाओं का विरोध किया, सामाजिक समता और विशेषकर महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थन किया तथा शिक्षा के माध्यम से आधुनिक ज्ञान, विचार एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया किंतु कुछ विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं।

उनके अनुसार आन्दोलनों से भले ही कुछ मौलिक परिवर्तन हुए हों परन्तु इनसे देश का आधुनिकीकरण नहीं हुआ। वस्तुतः जिसे देश का आधुनिकीकरण माना गया था, वह पश्चिमीकरण से अधिक कुछ नहीं था।

 यह सत्य है कि इन आन्दोलनों के परिणामस्वरूप देश में अंग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिमी विचारों का प्रसार शुरू हुआ किंतु इनसे देश आधुनिक हो गया हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। आधुनिकता के मुख्य आधार- मानव विवेक, ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानवतावाद आदि हैं किंतु ये समस्त तत्त्व किसी समाज या देश विशेष को तभी आधुनिक बना सकते हैं जब इनका उस समाज के सन्दर्भ में स्वाभाविक रूप से विकास और विवेकपूर्ण उपयोग हो।

अलग-अलग देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया एवं आयाम अलग-अलग हो सकते हैं। ब्रिटेन और भारतीय जीवन की पृष्ठभूमि एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न थी। ऐसी स्थिति में भारत का आधुनिकीकरण, ब्रिटेन के ही मॉडल पर हो, यह आवश्यक नहीं था। भारत में आधुनिकता केवल अंग्रेजी से नहीं, अपितु संस्कृत या हिन्दी के माध्यम से भी आ सकती थी और भारत के ज्ञान-विज्ञान को भारत के परम्परागत ज्ञान-विज्ञान (जैसे आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान आदि) के अध्ययन एवं विकास के माध्यम से आधुनिक बनाया जा सकता था।

जापान और चीन का आधुनिकीकरण इस तथ्य के सफल उदाहरण हैं। इन देशों का आधुनिकीकरण स्वदेशी भाषा एवं स्वदेशी साधनों के माध्यम से हुआ। इस दृष्टि से तो भारतीय पुनर्जागरण में व्याप्त पश्चिमी प्रभाव ने भारत के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को कुछ सीमा तक अवरुद्ध कर दिया था।

इन आन्दोलनों के दौरान भारत में पश्चिमी उदारवाद का प्रचार हुआ। व्यावहारिक तौर पर उदारवाद के समर्थन का अन्तर्निहित परिणाम पूँजीवाद का पोषण एवं शोषण का समर्थन था। उदारवाद की जो कुछ उपयोगिता हो सकती थी, भारतीय परिस्थितियों के बीच वह भी निष्क्रिय एवं निष्फल होकर रह गई। ऐसी स्थिति में राजा राममोहन राय या सर सैयद अहमद खाँ के प्रयत्न ब्रिटिश साम्राज्यवाद के औपनिवेशिक ढांचे में तालमेल बैठाने तक ही सीमित थे।

तात्कालिक समस्या एक ब्रह्म की उपासना, सती-प्रथा या बाल-हत्या नहीं थी, अपितु आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण एवं गरीबी थी। इन आधारभूत प्रश्नों पर सुधारकों का ध्यान नाममात्र को ही गया। इस दिशा में अधिकांश प्रयत्न अस्पष्ट तथा असफल रहे। दूसरी तरफ, आन्दोलनों पर पश्चिमी संस्कृति के अत्यधिक प्रभाव एवं उदारवादी विचारों में आस्था ने भारत के देशी साधनों के माध्यम से आधुनिकीकरण के अवसर अवरुद्ध कर दिए और देश पश्चिमी सभ्यता की चकाचैंध में ‘आधुनिकता’ के भ्रम में जीने लगा।

सुधार आन्दोलनों के फलस्वरूप भारतीय समाज के बहुत थोड़े से हिस्से में चेतना जागृत हुई किंतु व्यापक परिवर्तन नहीं आया। आन्दोलन का वास्तविक स्वरूप मध्यमवर्गीय बना रहा और इसका कार्यक्षेत्र शहरों तक सिमट कर रह गया। सुधारकों ने किसानों या आम आदमी तक पहुँचने की कोशिश नहीं की। उनके विचारों ने अशिक्षित लोगों में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ नहीं की।

यदि ये सुधारवादी आन्दोलन सच्चे अर्थों में प्रगतिशील होते तो वे समाज के प्रत्येक वर्ग एवं नगरों से लेकर गांवों तक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का शंखनाद कर सकते थे किंतु आधुनिकता का दम भरने के बावजूद ये आन्दोलन छद्म-वैज्ञानिकता के पोषक और एक सीमा तक रूढ़िवादी भी थे। पुर्जागरण काल का कोई भी आन्दोलन धर्म से ऊपर नहीं उठ सका।

ब्रह्मसमाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन आदि का सम्पूर्ण चिन्तन हिन्दू-धर्म पर आधारित था और अलीगढ़ आन्दोलन का इस्लाम पर। इनमें से कोई भी आन्दोलन समस्त भारतीय समाज को अपना कार्य-क्षेत्र नहीं बना सका। समस्त आन्दोलनों के मसले अलग-अलग थे। बाल-विवाह, सती-प्रथा एवं विधवा-विवाह हिन्दू समाज के दोष थे, जिनसे मुसलमानों का कोई सम्बन्ध नहीं था। इसी प्रकार बुरका-प्रथा एवं तीन तलाक से हिन्दुओं का कोई लेना-देना नहीं था।

बाल-विवाह और विधवा-विवाह के सम्बन्ध में हिन्दू सुधारकों में मतभेद थे। केशवचन्द्र सेन एवं उनके समर्थक बाल-विवाह के विरोधी थे किंतु स्वयं केशव चन्द्र सेन ने अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह पूरे वैदिक कर्मकाण्ड के साथ कूचबिहार के राजा के साथ कर दिया। अंतद्र्वद्व से राजा राममोहन राय भी मुक्त नहीं थे। उनके पास दो घर थे।

एक में स्वयं राजा राममोहन राय को छोड़़कर सब कुछ विदेशी था, दूसरे में राजा साहब को छोड़़ कर सब कुछ देशी था। वैसे ही सर सैयद अहमद खाँ पश्चिम के आधुनिक विचारों से प्रभावित तो थे किन्तु पर्दा प्रथा जैसे कई मुद्दों पर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं था।

इन आन्दोलनों की विफलताओं का एक बड़ा कारण भारत का पराधीन होना भी था। साम्राज्यवादी शोषण और औपनिवेशिक ढांचे के भीतर होने वाले इन आन्दोलनों को बहुत अधिक सफलता मिल भी नहीं सकती थी। समस्त तरह की स्वतंत्रताओं की सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त आर्थिक एवं राजनैतिक शोषण से मुक्ति थी। भारत का तात्कालीन शासन तन्त्र ऐसी स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में सीमित उदारवादी सुधार ही हो सकते थे, कोई सामाजिक या सांस्कृतिक क्रांति नहीं।

आन्दोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विचारों का भारत में तेजी से प्रसार हुआ। इस काम में अंग्रेजों ने पश्चिमी विद्वानों तथा ईसाई पादरियों के साथ-साथ भारतीय सुधारकों के सहयोग एवं समर्थन का भी उपयोग किया। इससे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध थमा रहा। राजा राममोहन राय और सैयद अहमद खाँ आदि ने अंग्रेजों का समर्थन भी किया।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन यह तथ्य उजागर करता है कि इन सुधार आन्दोलनों पर पश्चिमी तत्त्वों का प्रभाव होने के कारण देश की वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को ठीक से समझ पाना कठिन हो गया जिससे अधिक महत्त्वपूर्ण मसलों को छोड़़कर सुधारक छोटे-छोटे मसलों से उलझते रहे। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव ने सुधारकों में स्वतन्त्र चिन्तन की प्रक्रिया को कमजोर किया और देश की तत्कालीन वास्तविकताओं की पृष्ठभूमि में पुनर्जागरण के आन्दोलन को स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं होने दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

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बाल गंगाधर तिलक

भारत में उग्र राष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक न केवल भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अप्रतिम सेनानी थे अपितु वे महान् विचारक और राजनीतिज्ञ भी थे।

भारत की आजादी की पहली लड़ाई ई.1857 की सशस्त्र-क्रांति को माना जाता है जिसे अंग्रेज सैनिक-विद्रोह एवं बगावत कहते थे। इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त हो गया तथा ब्रिटिश क्राउन की सत्ता स्थापित हो गई।

इसके बाद स्वाधीनता के जो प्रयास आरम्भ हुए तब से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक चले संघर्ष को भारत का राष्ट्रीय आंदोलन कहा जाता है। अर्थात् भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष को राष्ट्रीय आंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन में देश के लाखों नर-नारियों ने भाग लिया तथा अपने प्राणों की आहुति भी दी।

भारत में उग्र राष्ट्रवाद के जनक  बाल गंगाधर तिलक

भारत में उग्र राष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक न केवल भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अप्रतिम सेनानी थे अपितु वे महान् विचारक और राजनीतिज्ञ भी थे। पाश्चात्य संस्कृति का विरोध करने एवं भारतीय समाज की दशा सुधारने के कामों में वे सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने लगभग पचास वर्ष तक भारतीय समाज की दशा सुधारने के लिए कार्य किया। उन्हें ‘भारतीय लोकशक्ति की गंगोत्री’, ‘लोकमान्य’ तथा ‘भारतीय उग्र राष्ट्रवाद के पिता’ कहा जाता है।

बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके दादा केशवराव, पेशवा राज्य में उच्च पद पर आसीन थे। पेशवा के पतन के बाद उनके परिवार की पहले जैसी स्थिति नहीं रही थी। इसलिए तिलक के पिता गंगाधर पंत को अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। तिलक के बचपन का नाम बलवन्तराव था और उन्हें बाल कहा जाता था।

बाल गंगाधर तिलक के पिता ने उन्हें संस्कृत, गणित और मराठी का ज्ञान घर पर ही करा दिया था। ई.1866 में तिलक पूना नगर के एक स्कूल में भर्ती कराए गए। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उन्होंने संस्कृत के सैंकड़ों श्लोक कण्ठस्थ कर लिए। जब तिलक 10 वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। अतः उनके चाचा गोविन्दराम ने उनका पालन-पोषण किया। ई.1871 में पन्द्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह तापीबाई से हुआ।

ई.1873 में बाल गंगाधर तिलक ने दकन कॉलेज में प्रवेश लिया। वे पढ़ने-लिखने के साथ-साथ मित्रों के साथ बातचीत, व्यायाम तथा आमोद-प्रमोद में भी समय लगाया करते थे। तिलक कट्टर सनातनी विचारों के थे और घर के बाहर भोजन नहीं करते थे। ई.1876 में उन्होंने बी.ए. प्रथम श्रेणी में उतीर्ण किया। तत्पश्चात् कानून का अध्ययन करके ई.1879 में उन्होंने एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की। वे दो बार एम.ए. की परीक्षा में बैठे किंतु दोनों बार सफल नहीं हो सके।

शिक्षा प्राप्त करने के बाद बाल गंगाधर तिलक ने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में प्रारम्भ किया किंतु उन्होंने अनुभव किया कि जनता में शिक्षा का प्रसार पत्रकारिता के माध्यम से अधिक शीघ्रता से किया जा सकता है। अतः जनता में नव-चेतना और नव-जागृति उत्पन्न करने के लिए अपने मित्रों- आगरकर, नामजोशी और चिपलूणकर के सहयोग से तिलक ने दो साप्ताहिक पत्र प्रकाशित करने आरम्भ किए- अंग्रेजी भाषा में ‘मराठा’ और मराठी भाषा में ‘केसरी’।

इन पत्रों में साहित्य, धर्म, इतिहास, तथा विविध विषयों के लेखों द्वारा जनता में भारतीय संस्कृति का प्रचार किया जाता था। शीघ्र ही इन पत्रों में अंग्रेजी सरकार की नीतियों के विरोध में भी लेख प्रकाशित होने लगे। अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण तथा निर्भीक विचारों के कारण महाराष्ट्र में इन पत्रों की पाठ-संख्या बढ़ने लगी। इस कारण तिलक और आगरकर को अनेक कष्ट उठाने पड़े।

कोल्हापुर रियासत के प्रश्न को लेकर इन पत्रों में ब्रिटिश शासन की कड़ी आलोचना की गई। इस कारण कोल्हापुर के दीवान ने उन पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया जिनमें तिलक और आगरकर को चार-चार महीने के कारावास की सजा सुनाई गई। इस सजा ने इन दोनों को जननायक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

बाल गंगाधर तिलक ने अनुभव किया कि शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना के बिना जनजागृति सम्भव नहीं है। अतः ई.1884 में उन्होंने दक्षिण शिक्षा समाज की स्थापना की। इसी संस्था के माध्यम से तथा जनसहयोग से ई.1885 में उन्होंने एक आर्ट्स कॉलेज की स्थापना की जो बाद में फग्र्युसन कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लगभग चार वर्ष तक तिलक शिक्षा-प्रसार के कार्य में लगे रहे।

उन दिनों नई पार्टी के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर गठित कांग्रेस, अंग्रेजों के समक्ष कुछ रियायतों के लिए अनुनय-विनय कर रही थी और अंग्रेज सरकार कांग्रेस की मांगों की उपेक्षा करती जा रही थी। तिलक को कांग्रेस का यह व्यवहार देश का अपमान प्रतीत हुआ। अतः उन्होंने कांग्रेस के भीतर रह कर नए ढंग से कार्य करने की योजना बनाई।

ई.1889 में बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उस समय कांग्रेस पर मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों का अधिकार था। कांग्रेस के अधिकांश नेता अंग्रेजी शिक्षा, इतिहास, संस्कृति और नैतिकता से प्रभावित थे और वे भारत में ब्रिटिश शासन के बने रहेने के पक्ष में थे, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि भारत की उन्नति केवल अंग्रेजों की देखरेख में संभव है।

वे लोग पश्चिमी संस्कृति के आधार पर भारतीय समाज को सुधारना चाहते थे। वे समाज सुधार पहले चाहते थे और स्वराज्य उसके बाद। कांग्रेस पर इन उदारवादियों का प्रभाव था। उदारवादी नेता स्वराज्य का अर्थ अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत औपनिवेशिक शासन मानते थे किंतु तिलक स्वराज्य का अर्थ विदेशी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्रता मानते थे। तिलक ने उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की नीति का विरोध किया। ई.1896 से ही वे कांग्रेस को इस बात के लिए प्रेरित करते रहे कि वह मजबूती दिखाये।

तिलक ने कहा- ‘मैं जानता हँ कि हमें अपने अधिकारों के लिए मांग करनी चाहिए, पर हमें यह अनुभव करते हुए मांग करनी चाहिए कि वह मांग अस्वीकार नहीं की जा सके। मांग प्रस्तुत करने तथा याचना करने में बहुत बड़ा अन्तर है। अगर आप अपनी मांग नामंजूर किए जाने पर लड़ने को तैयार हैं, तो निश्चित मानिए कि आपकी मांग नामंजूर नहीं की जाएगी।’

कांग्रेस में सम्मिलित होने के बाद बाल गंगाधर तिलक ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति राष्ट्रीय आन्दोलन को शक्तिशाली बनाने में लगा दी। उन्होंने महाराष्ट्र के नवयुवकों में आत्म-निर्भरता, आत्म-बलिदान और आत्म-विश्वास के भाव जागृत करने हेतु अनेक समितियां, अखाड़े एवं क्लब आदि स्थापित किए। तिलक चाहते थे कि भारतीय अपनी स्वतंत्रता किसी की कृपा से नहीं अपितु अपने अधिकार के रूप में अपनी सामथ्र्य के बल पर अर्जित करें।

इसी उद्देश्य से तिलक ने ई.1893-94 में ‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणपति उत्सव’ मनाने की प्रथा आरम्भ की। इन उत्सवों के आयोजन में बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होने लगे और उन्हें अपने धर्म एवं संस्कृति की महानता का भान हुआ। विचारों के परस्पर आदान-प्रदान के कारण लोगों में देशभक्ति की भावना का अपूर्व प्रसार हुआ।

ई.1897 में तिलक बम्बई विधान परिषद के सदस्य चुने गए। इसी वर्ष महाराष्ट्र में भीषण अकाल पड़ा और फिर पूना में प्लेग की महामारी फैली। पूना में प्लेग से निबटने का कार्य सेना को सौंपा गया। कुछ सैन्य अधिकारियों ने जांच करने के बहाने घरों में घुसकर महिलाओं से अशोभनीय व्यवहार किया। ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में सरकारी उपायों की तीखी आलोचना की गई।

सरकारी नीति से क्षुब्ध होकर एक युवक ने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड और उसके सहायक अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर दी। यद्यपि तिलक का इस कृत्य से कोई सम्बन्ध नहीं था, किंतु सरकार ने उन पर अपने समाचार-पत्रों के माध्यम से हिंसा एवं राजद्रोह भड़काने का आरोप लगाकर उन पर मुकदमा चलाया तथा उन्हें 18 महीने की कड़ी सजा दी।

तिलक को दी गई सजा की सर्वत्र निन्दा की गई किंतु इससे उनकी ख्याति पूरे देश में व्याप्त हो गई। तिलक को दी गई यह सजा भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास में अत्यधिक महत्त्व रखती है। क्योंकि इससे पहले किसी भारतीय पर राजद्रोह के आरोप में मुकदमा नहीं चला था।

ई.1905 में लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। बाल गंगाधर तिलक और उसके साथियों ने इसका कड़ा विरोध किया तथा एक जन आन्दोलन खड़ा कर दिया। ‘केसरी’ के माध्यम से उन्होंने स्वेदशी अपनाने, विदेशी माल और नौकरियों के बहिष्कार और स्वराज्य के लिए अथक प्रयास का सन्देश जन-जन तक पहुँचाया। अब तिलक का कार्यक्षेत्र केवल महाराष्ट्र ही नहीं रहा, अपितु वे राष्ट्रीय नेता के रूप में पहचाने जाने लगे।

20वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में कांग्रेस में एक नए दल का उदय हो रहा था, जो कांग्रेस की भिक्षावृत्ति की नीति का विरोधी था। इस दल में लाला लाजपतराय, बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और अरविन्द घोष प्रमुख थे। इन्हें उग्रवादी नेता कहा जाता था। ये नेता बड़ी निर्भीकता से सरकार की आलोचना करते थे। उदारवादी दल के लोग अंग्रेजों से मधुर सम्बन्ध चाहते थे और इसलिए तिलक एवं उनके सहयोगियों को कांग्रेस से बाहर करना चाहते थे।

तिलक और उनके सहयोगियों की चिन्ता यह थी कि भारतीय चिन्तन, जीवन और राजनीति में पश्चिम का प्रभाव बढ़ रहा था। इसलिए तिलक कांग्रेस को ‘चापलूसों का सम्मेलन’ और काग्रेस के अधिवेशनों को ‘मनोरंजन के लिए छुट्टी का दिन’ कहते थे। धीरे-धीरे कांग्रेस में उदारवादियों और उग्रवादियों में मतभेद बढ़ते चले गए। ई.1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से निकाल दिया। इसे सूरत फूट कहा जाता है।

सरकार ने कांग्रेस की फूट का लाभ उठाया और ई.1908 में तिलक पर पुनः राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें छः वर्ष के कारावास की सजा दे दी। ई.1914 तक उन्हें मांडले जेल में रखा गया। जब ई.1914 में वे जेल से रिहा होकर आए, तब श्रीमती एनीबिसेन्ट ने कांग्रेस के दोनों दलों में मेल करवाया। अप्रैल 1916 में तिलक ने श्रीमती एनीबिसेन्ट के सहयोग से होमरूल आन्दोलन चलाया। ई.1919 में तिलक ने विल्सन के आत्म निर्णय के सिद्धान्त के आधार पर भारत के लिए भी इस अधिकार की मांग की। तिलक का विचार था कि कांग्रेस ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देना सीखे।

तिलक कहते थे कि हमें स्वराज्य हासिल करने के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। तिलक स्वराजय प्राप्ति के लिए हिंसा के पक्षधर नहीं थे किंतु जब शान्तिपूर्ण तरीके प्रभावशाली सिद्ध नहीं हों तो उन्हें हिंसात्मक तरीके अपनाने में भी कोई परहेज नहीं था।

 धीरे-धीरे कांग्रेस में उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा। फलस्वरूप उदारवादियों को लिबरल फेडरेशन नामक नया संगठन बनाना पड़ा और कांग्रेस पर उग्रवादियों का प्रभाव स्थापित हो गया। तिलक ने कांग्रेस को ब्रिटिश साम्राज्य का विद्रोही बना दिया। तिलक ने कहा- ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’

तिलक अपने समय के महान् विद्वान थे। मांडले जेल में उन्होंने ‘गीता रहस्य’ और ‘आर्कटिक होम इन द् वेदाज’ नामक पुस्तकें लिखीं। वे प्रथम कांग्रेसी नेता थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने का सुझाव दिया। तिलक के भाषणों में आग होती थी, वे सरकारी नीतियों की बेधड़क आलोचना करते थे। इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें ‘भारतीय अशान्ति का पिता’ कहा। वे अपने जीवन के अन्तिम समय तक स्वराज्य के लिए संघर्ष करते रहे। 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हो गया।

बाल गंगाधर तिलक के सामाजिक विचार

यद्यपि तिलक पहले स्वराज्य और बाद में समाज सुधार के पक्षधर थे किंतु समाज सुधार की आवश्यकता के प्रति उनकी दृष्टि कम नहीं थी। वे समाज सुधार के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण नहीं चाहते थे अपितु भारतीय संस्कृति की महान विशेषताओं को फिर से स्थापित करके पश्चिम के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ग्रहण करना चाहते थे।

वे भारतीयों का अंग्रेजीकरण नहीं चाहते थे।  वेलेन्टाइन शिरोल नामक लेखक ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि तिलक पुरातनवादी और रूढ़िवादी राजनीतिक नेता थे। वे किसी प्रकार का धार्मिक या सामाजिक सुधार नहीं चाहते थे। वस्तुतः शिरोल, तिलक के सामाजिक दर्शन को इसलिए उपेक्षित करना चाहते हैं क्योंकि वे तिलक को ब्रिटिश साम्राज्य का परम विद्रोही मानते थे। तिलक के सामाजिक विचारों को केसरी में छपे उनके लेखों में पढ़ा जा सकता है।

तिलक मद्यपान तथा बाल-विवाह के विरोधी थे, विधवा-विवाह को उचित मानते थे तथा शिक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करने के पक्षपाती थे किंतु तिलक चाहते थे कि ये कार्य समाज द्वारा किए जाएं न कि सरकार द्वारा। क्योंकि यदि सरकार इन कार्यों को करेगी तो उसे भारत के सामाजिक ढांचे में सेंध लगाने का अवसर मिल जाएगा। यही कारण था कि जब ब्रिटिश सरकार ने ई.1890-91 में सहवास-वय विधेयक प्रस्तुत किया तो तिलक ने उसका घोर विरोध किया।

तिलक ने समाज सुधारों के क्षेत्र में उतनी उग्रवादी नीति का उनुसरण नहीं किया जितना कि राजनीतिक क्षेत्र में। रानाडे से वैचारिक मतभेद होते हुए भी उन्होंने रानाडे द्वारा प्रस्तावित कतिपय सुधारों का समर्थन किया, तिलक इस बात से सहमत थे कि लड़कों का विवाह 16, 18 या 20 वर्ष से पहले न किया जाए तथा लड़कियों का विवाह 10, 12 या 14 वर्ष से पहले न किया जाय।

उन्होंने बहुपत्नी-प्रथा का विरोध किया तथा 60 वर्ष की आयु पर विवाह करने पर प्रतिबन्ध लगाने का समर्थन किया। रानाडे की सुधार योजना में लड़के व लड़की के विवाह में एक वर्ष से अधिक की आय न खर्च करने का प्रस्ताव भी स्वीकार किया। शराब पर प्रतिबन्ध तथा स्त्री-शिक्षा के विस्तार का भी उन्होंने समर्थन किया। यद्यपि तिलक ने हिन्दू समाज की मान्यताओं को स्वीकार किया किन्तु वे रूढ़ियों के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया।

तिलक ने अपनी पुत्रियों का विवाह 15वर्ष की आयु के पश्चात् किया। शिवाजी और गणपति उत्सवों में उन्होंने सवर्णों के साथ अवर्णों को भी शामिल किया और उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया। उनकी मान्यता थी कि भारत के गौरवपूर्ण अतीत को भुलाने के स्थान पर उन त्रुटियों को दूर किया जाए जिनके कारण सामाजिक कुरीतियां उत्पन्न हुई हैं।

तिलक ने लिखा है- ‘जिस प्रकार रूढ़िवादी मान्यताएं तथा उनके पोषक पंडित एक-पक्षीय हैं, उसी प्रकार अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त सुधारक भी एक पक्षीय एवं दकियनूसी हैं। पुराने शास्त्री तथा पंडित नवीन परिस्थितियों से उसी प्रकार अपरिचित हैं जिस प्रकार नवीन शिक्षा प्राप्त सुधारक हिन्दू-धर्म की परम्पराओं एवं दर्शन से। अतः यह नितान्त आवश्यक है कि नवीन शिक्षा प्राप्त वर्ग को प्राचीन मान्यताओं तथा दर्शन का उचित ज्ञान कराया जाए तथा पुराने पंडितों तथा शास्त्रियों को नवीन परिवर्तनों एवं परिवर्तनशील परिस्थितियों की जानकारी दी जाए।’

तिलक को इस बात से बड़ा कष्ट पहुँचता था कि भारतीय अपने महान् प्राचीन आदर्शों की उपेक्षा करके पश्चिम के अपरिष्कृत भौतिकवाद का अन्धानुकरण करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने लिखा है- ‘यदि पश्चिम का अन्धानुकरण करके भारत का पुनर्निमाण किया गया तो भारतीय अस्मिता संकट में पड़ जाएगी।’

तिलक का विश्वास था कि- ‘समाज के बाह्य रूप और व्यवहार में परिवर्तन मात्र से सामाजिक सुधार नहीं हो सकते। सुधार तो लोगों के मन के भीतर होने चाहिए। भारत में कुप्रथाएं रूढ़िवाद का परिणाम हैं और यह रूढ़िवाद एक हजार वर्ष की पराधीनता तथा गतिहीनता का परिणाम है। अतः जनसाधारण की आत्मा को जागृत किया जाए और लोगों को भारतीय संस्कृति के मौलिक तत्त्वों से परिचित कराया जाय।’

बाल गंगाधर तिलक भारतीयों की प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को मानव-प्रगति की सूचक मानते थे। तिलक के अनुसार आर्यों की वर्ण-व्यवस्था सामाजिक संगठन का निर्माण करके व्यक्ति की प्रकृति तथा प्रतिभा के अनुरूप काम करने की स्वतंत्रता देती है। वे इस आरोप को मिथ्या मानते हैं कि वर्ण व्यवस्था सामाजिक भेदभाव तथा अन्याय पर आधारित है।

तिलक कहते थे- ‘यदि ईश्वर भी अछूत-प्रथा का समर्थन करते तो मैं ऐसे ईश्वर को स्वीकार नहीं करता।’ तिलक वर्ण-व्यवस्था को जाति-व्यवस्था से भिन्न मानते हुए, जाति-व्यवस्था को अत्यंत दोषपूर्ण मानते थे। वे छूआछूत को सनातन धर्म जनित न मानकर एक ऐसी व्याधि मानते थे, जिसे सनातन-धर्मी पुरातन-पंथियों ने आमंत्रित किया है। इस व्याधि से छुटकारा पाने के लिए सनातन धर्म का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है अपितु रूढ़िवादिता को त्यागने की आवश्यकता है।

तिलक के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है कि तिलक सामाजिक प्रतिक्रियावादी नहीं अपितु उदार परम्परावादी थे। वे प्रचीन भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में ही समाज सुधार के समर्थक थे।

बाल गंगाधर तिलक के धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचार

बालगंगाधर तिलक की सनातन हिन्दू-धर्म में पूर्ण निष्ठा थी। वे हिन्दू-धर्म की महानता, उदारता एवं सहिष्णुता के प्रशंसक थे। उन्होंने धार्मिक ग्रन्थों का विशद् अध्ययन किया तथा परम्परावादी सनातनी होते हुए भी धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया। उनके अनुसार वेदों, उपनिषदों तथा वेदान्त की वैज्ञानिक धारणाओं में सन्देह नहीं किया जा सकता।

तिलक ने हिन्दुओं की एकता पर बल दिया तथा हिन्दुओं के विभिन्न मत-मतान्तरों को समन्वित कर समस्त हिन्दू मतावलम्बियों को एक-जुट होने का आह्वान किया। उनका कहना था कि- ‘वैदिक-काल में भारत स्वावलम्बी देश था तथा एक महान् राष्ट्र की भांति संगठित था किंतु विदेशी आक्रमणों के कारण भारत की एकता छिन्न-भिन्न हो गई है जिससे हमारा पतन हुआ है। हमारे नेताओं का कत्र्तव्य है कि इस एकता को पुनः जीवित करें।’

तिलक ने धर्म को मनुष्य के लिए आवश्यक जीवन-मंत्र के रूप में देखा था। उनके अनुसार धर्म का उद्देश्य हिंसा, अपराध अथवा विध्वंस सिखाना नहीं है। वे समाज में व्याप्त संकीर्ण साम्प्रदायिकता को दूर करने के लिए धार्मिक शिक्षण पर जोर देते थे। तिलक ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों को अपने-अपने धर्म की उचित शिक्षा ग्रहण करने का आह्वान किया ताकि वे परस्पर धार्मिक सहिष्णुता का ज्ञान प्राप्त कर सकें।

तिलक ने रमाबाई द्वारा संचालित ‘शारदा-सदन’ की गतिविधियों का भंडाफोड़ करके यह सिद्ध किया कि ईसाई मिशनरियों द्वारा किस प्रकार धर्म की आड़ में अबोध हिन्दू बालिकाओं को ईसाई बनाया जा रहा है। तिलक के अनुसार- ‘किसी को अपने धर्म पर अभिमान कैसे हो सकता है, यदि वह उससे अनभिज्ञ है? धार्मिक शिक्षा का अभाव ही इस बात का एक मात्र कारण है कि देश भर में ईसाई मिशनरियांे का प्रभाव बढ़ गया है।’

तिलक उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद के पक्षधर थे किंतु संकीर्ण हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं थे। उनके द्वारा महाराष्ट्र में चलाये गए जन-आन्दोलनों को विभिन्न सम्प्रदायों का समर्थन प्राप्त होता था। ई.1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में तिलक ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों में साम्प्रदायिक समझौता करवाया।

उनके सहिष्णु दृष्टिकोण के कारण मुसलमानों को पृथक् प्रतिनिधित्व देने का निर्णय कांग्रेस ने स्वीकार किया। चूंकि तिलक एक धर्मनिष्ठ सनातनी हिन्दू थे इसलिए वे अपने धार्मिक विश्वास अन्य सम्प्रदायों पर नहीं थोपना चाहते थे, सभी धर्मों की स्वतंत्रता में विश्वास करते थे।

तिलक ने सनातन धर्म की व्यवस्था को स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों को सामान्य आध्यात्मिक प्रगति कर ओर ले जाने वाला माना। सनातन धर्म ने मोक्ष को जीवन का लक्ष्य मानकर धर्मयुक्त अर्थ तथा काम के सेवन का मार्ग दिखाया। हिन्दू-धर्म में जीवन के प्रति अकर्मण्यता एवं शिथिलता को दूर करने के लिए कर्मयोग का सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है। कर्म के अनुरूप चेतनामय जीवन, मोक्ष प्रदान करता है। वे सनातन-धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे तथा उसे विश्व-धर्म की संज्ञा देते थे।

बाल गंगाधर तिलक ने ‘गीता रहस्य’ में अपने आध्यात्मिक विचार प्रस्तुत किए हैं। वे मानते हैं कि परब्रह्म से साक्षात्कार के अनेक मार्ग हैं जिनमें से कर्म का मार्ग प्रधान है। ज्ञान-योग तथा भक्ति-योग ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने में सक्षम हैं किंतु मनुष्य कर्म से मुक्त नहीं हो सकता। ज्ञान से उत्पन्न वैरागय अथवा सन्यास में भी कर्म की स्थिति बनी रहती है। दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सन्यासी को भी विचरण करना पड़ता है।

व्यक्ति को ज्ञान तथा भक्ति में पूर्णता प्राप्त करके भी मोक्ष प्राप्ति के लिए कर्म करना होता है। मुनष्य का ईश्वर के साथ एकाकार होना ही उसे कर्म से मुक्ति दे सकता है। कर्म द्वारा मोक्ष प्राप्ति का अर्थ है प्राणी मात्र की सेवा करके सांसारिक बन्धनों से मुक्ति तथा चिरंतन सत्य के साथ एकरूपता। कर्म के रण-प्रांगण में विजय प्रप्ति ही मोक्ष है। तिलक ने गीता रहस्य में कर्मयोग की विशद् व्याख्या प्रस्तुत की है।

बाल गंगाधर तिलक के अनुसार कर्म-योग ब्रह्माण्ड की सृजनात्मक शक्ति का विवेकपूर्ण एवं संतुलित उपयोग है। यही प्रवृत्ति मार्ग है जो निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। तिलक ने मनुष्य में स्वार्थ एवं परमार्थ दोनों ही प्रवृत्तियों का दर्शन किया है। स्वार्थ पर परमार्थ की विजय ही व्यक्ति के चरमोत्कर्ष का मार्ग है।

शंकराचार्य की तरह तिलक भी अद्वैतवादी हैं। तिलक ने मानव तथा ईश्वर के बीच अद्वैत का समर्थन किया। तिलक ने वेदान्त में व्यक्त परब्रह्म की दृष्यमान अभिव्यक्ति को ईश्वर माना है। आध्यात्मिक साधना के प्रथम चरण में ईश्वर की उपासना श्रेष्ठ है। इसके पश्चात् ध्यानावस्था की चरम परिणति निर्विकल्प समाधि है जिसमें निराकार परब्रह्म के सच्चिदानन्द स्वरूप की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार तिलक ने ‘सांख्य दर्शन के अनीश्वरवादी परब्रह्म’ तथा ‘श्रीकृष्ण के ईश्वरीय अस्तित्त्व’ के वेदान्ती दृष्टिकोणों का गीता में सुन्दर समन्वय अनुभव किया है। आध्यात्मिक साधना से व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मोक्षार्थी को कर्म त्यागने के स्थान पर अहंकार तथा स्वार्थ का त्याग करना होता है। तिलक ने गीता के अवतारवाद को स्वीकार किया है तथा ईश्वर द्वारा धर्म की रक्षा के लिए बारम्बार पृथ्वी पर अवतरित होने को निष्काम कर्म का जीवन्त उदाहरण माना है। निष्काम कर्म ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है।

तिलक के योगदान का मूल्यांकन

बालगंगाधर तिलक अपने युग के महान पुरुष थे। वे जीवन भर युगानुकूल राजनीति, आध्यात्मिक विवेचन, सामाजिक चिन्तन, पत्रकारिता एवं स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न रहे। इस सबके बदले में तिलक को किसी प्रतिफल की आकांक्षा नहीं थी। यदि उन्हें कुछ चाहिए था तो भारत के लिए स्वराज्य, प्रजा की सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति। देश की आर्थिक एवं राजनीतिक प्रगति।

राष्ट्र ही उनका सबसे पहला देवता था जिसकी उन्होंने जीवन भर आराधना की। पत्रकारिता एवं राजनीतिक गतिविधियों के लिए जेल जाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अंग्रेजों ने अनेक बार उन्हें जेल भेजा। उन्होंने प्रखर राष्ट्रवाद की पैरवी की तथा कांग्रेस के उदारवादी नेताओं के भिक्षावृत्ति के लिए उनकी आलोचना कर भारतीयों में आत्म-सम्मान के भाव को पुनर्जागृत किया। उन्होंने समाज सुधार के लिए सरकार पर निर्भर होने की बजाय समाज को ही तैयार करने के लिए कार्य किया।

पाश्चात्य संस्कृति को वे भारत के लिए अनुकरणीय नहीं मानते थे। उन्होंने 19वीं एवं 20वीं सदी के भारत की जनता को भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का भान कराया। यदि तत्कालीन समालोचकों ने उन्हें भारतीय लोकशक्ति की गंगोत्री‘, ‘लोकमान्य’ तथा ‘भारतीय उग्र राष्ट्रवाद के पिता’ कहा जाता है तो यह सर्वथा उचित ही है। यदि अंग्रेज उन्हें ‘भारतीय अशान्ति का पिता’ कहते हैं तो भी यह उनके कार्य का सबसे बड़ा मूल्यांकन है। उन्होंने वास्तव में सदियों से सोए पड़े भारतीय समाज में उद्वेलन पैदा करके अंग्रेज सरकार के सामने जबर्दस्त चुनौती खड़ी कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

मोहनदास कर्मचंद गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

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मोहनदास कर्मचंद गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

मोहनदास कर्मचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोबंदर में हुआ। उनके पिता कर्मचंद गांधी पोरबंदर, राजकोट और वंकानेर रियासतों के दीवान रहे। गांधीजी ने ई.1914 के बाद भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और देश के स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से राजनीतिक आंदोलनों की एक क्रमबद्ध शृंखला चलाई तथा देश की जनता को बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यक्रमों से जोड़ा। यही उनकी सबसे बड़ी सफलता थी।

मोहनदास कर्मचंद गांधी अपने समय के महान समाज सेवी, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक आंदोलनकारी सिद्ध हुए। भारतीय धर्म एवं संस्कृति की बजाय उनके चिन्तन पर पाश्चात्य चिंतन की छाप अधिक थी। वे हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति पर गर्व करने की बजाय हिन्दू-मुस्लिम एकता पर अधिक बल देते थे। गांधीजी ने इंग्लैण्ड में कानून की पढ़ाई की जिससे उन्हें अंग्रेजी रीति-नीति, ईसाई धर्म तथा वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों का समुचित ज्ञान हो गया।

जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रथम कारावास की सजा भुगत रहे थे तब उन्होंने अमरीकी लेखक हेनरी डेविड थोरू की पुस्तक ‘ऐसे ऑन सिविल डिसओबीडियेन्स’ का अध्ययन किया। उससे प्रेरित होकर ही गांधीजी ने आगे चलकर भारत में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया। बाद में गांधजी ने सिविल डिसओबीडिएंस के स्थान पर ‘सिविल रेजिस्टेन्स’ शब्द का प्रयोग किया।

गांधीजी को टॉल्सटाय की पुस्तक ‘द किंग्डम ऑफ गॉड इज विदिन यू’ ने अत्यधिक प्रभावित किया। गांधीजी ने स्वयं स्वीकार किया है कि अहिंसा में उनकी निष्ठा टॉल्सटाय की पुस्तक से जागृत हुई। गांधीजी के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक विचारों में मूलभूत एकता दिखाई देती है। अतः उनके विचार-दर्शन को समग्र रूप से देखना समीचीन होगा। ब्रिटिश साम्राज्य और पाश्चात्य संस्कृति के विरोध में उनके द्वारा चलाये गए अहिंसात्मक आन्दोलनों ने विश्व राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की।

अहिंसा का विचार भारतीय उपनिषदों में सदियों से मौजूद था, इसलिए गांधीजी प्रथम व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा को श्रेष्ठ कर्म बताया था किंतु गांधीजी प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने अहिंसा और सत्य के आदर्शों का राजनीति में प्रयोग किया। वे कहते थे कि जिस प्रकार धर्म में सत्य का आग्रह होता है उसी प्रकार राजनीति में भी सत्य का आग्रह होना चाहिए। वे राजनीति में हिंसा, असत्य और षड़यन्त्र को अनुचित मानते थे।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का जीवन-वृत्त

गांधीजी का बाल्यकाल

गांधीजी का जन्म गुजरात में पोरबन्दर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर 1869 को हुआ। वे अपने चार भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। गांधीजी की प्राथमिक शिक्षा राजकोट में हुई। उनका लालन-पालन वैष्णव परिवार में हुआ था, किंतु माता पुतलीबाई का परिवार जैन धर्मावलम्बी था, इसलिए गांधीजी के विचारों में जैन-धर्म का प्रभाव दिखाई देता है।

गांधीजी के बचपन की एक घटना उल्लेखनीय है जो उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखी है। वे लिखते हैं कि किस प्रकार उन्होंने बचपन में चोरी की, छुपकर तथा झूठ बोलकर सिगरेट पी तथा मांस भक्षण किया। इन कृत्यों से उनके मन में बराबर संघर्ष चलता रहा। अन्त में उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर इन अपराधों को स्वीकार कर लिया और आग्रह किया कि उन्हें दण्ड दिया जाय।

उन्होंने अपने पत्र में यह भी लिखा कि आगे से वे ऐसा नहीं करेंगे। उनके पिता यह पत्र पढ़कर स्तब्ध रह गए और पिता की आंखों से आंसू छलक आए। ई.1882 अर्थात् 13 वर्ष की आयु में गांधीजी का विवाह कस्तूरबा से हुआ। ई.1887 में गांधीजी ने दसवीं कक्षा उतीर्ण की और कुछ समय बाद कानून की पढ़ाई करने इंग्लैण्ड गए। ई.1891 में वे बैरिस्टर की उपाधि लेकर भारत लौटे।

भारत में उन्होंने वकालात प्रारम्भ की किंतु इसमें उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। वे अब्दुल्ला कम्पनी के कानूनी कार्यों को सम्भालने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। ई.1893 से 1914 तक दक्षिण अफ्रीका ही उनकी कर्मभूमि रही। यहीं पर गांधी चिन्तन और विचारधारा का विकास हुआ।

दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास कर्मचंद गांधी

गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की रंगभेद नीति को अत्यंत निकट से देखा। प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी गांधीजी को सामान सहित डिब्बे से बाहर फैंक दिया गया क्योंकि एशियाई लोग अंग्रेजों के साथ यात्रा नहीं कर सकते थे। ट्रेन चली गई और उन्हें रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सर्दी की रात में खड़े रहना पड़ा। उनके मन में अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार की भावना उत्पन्न हुई।

गांधीजी ने स्वयं इस घटना को अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिकार का प्रारम्भ बिन्दु माना है। उस समय दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी सरकार ने एशियाई लोगों पर अनेक प्रतिबन्ध लगा रखे थे। इन प्रतिबन्धों के कारण श्रमिकों की दशा सबसे खराब थी। अतः गांधीजी ने ट्रांसवाल में रजिस्ट्रेशन अधिनियम के विरुद्ध आवाज उठाई।

इस अधिनियम के अनुसार एशियाई मूल के निवासियों को सरकारी रिकॉर्ड में अपना नाम, अंगूठे का निशान, हस्ताक्षर एवं चित्र दर्ज करवाकर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट प्राप्त करना अनिवार्य था, जबकि गोरे लोगों पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था। गांधीजी ने रंगभेद पर आधारित इस कानून का विरोध किया। उन्होंने भारतीयों को संगठित कर उनका एक संघ बनवाया और उन्हें रजिस्ट्रेशन नहीं करवाने की सलाह दी। सरकारी प्रतिनिधियों के समक्ष एक आम-सभा में रजिस्ट्रेशन कार्डों को जलाया गया।

इस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी द्वारा सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया गया। उन्होंने सत्याग्रह के दौरान स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति से नहीं अपितु व्यवस्था से है। वे अपने विरोधियों और आलोचकों के प्रति भी सद्भावना रखते थे। सत्याग्रह के संघर्ष के दौरान उन्होंने बाताचीत द्वारा समझौते के द्वार सदैव खुले रखे।

भारत में आन्दोलनों का नेतृत्व

ई.1915 में मोहनदास कर्मचंद गांधी भारत लौट आए। दक्षिण अफ्रीका में उनके सफल सत्याग्रह से भारतीय परिचित हो चुके थे। भारत में गांधीजी का ध्यान श्रमिकों की दयनीय स्थिति की ओर गया। ई.1917 में उनहोंने ‘चंपारन’ (बिहार) में नील की खेती करने के लिए बाध्य किए जाने वाले किसानों की स्थिति सुधारने हेतु आन्दोलन किया। उनके इस आन्दोलन के फलस्वरूप किसानों को कुछ रियायतें मिलीं।

इस आन्दोलन के फलस्वरूप लोगों की सोच और मानसिकता में परिवर्तन आया। चांपारन के बाद गांधीजी ने ‘खेड़ा’ में किसानों को लगान में छूट दिलवाने के लिए ‘कर नहीं’ आन्दोलन चलाया और सफलता प्राप्त की। इसी प्रकार ‘अहमदाबाद’ में मिल मजदूरों की मांगों के समर्थन में आमरण-अनशन करके उनकी मांगें पूरी करवाईं।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान गांधीजी ने भारतीयों से हर प्रकार से ब्रिटिश सरकार से सहयोग करने की अपील की। सम्भवतः उन्हें आशा थी कि संकट के समय ब्रिटिश सरकार की सहायता करने पर, युद्ध के बाद भारतीयों की मांगों पर उदार दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। स्वयं गांधीजी ने भारत सरकार को रंगरूटों की भर्ती तथा घायल व्यक्तियों की देखभाल के लिए अपनी सेवाएं दीं।

इन सेवाओं के कारण सरकार ने उन्हें पदक भी दिया किंतु युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया। इससे गांधीजी को बड़ी निराशा हुई, फिर भी गांधीजी ने सहयोग की नीति को नहीं छोड़़ा। ई.1919 के सुधार अधिनियम से यद्यपि समस्त राष्ट्रवादी असन्तुष्ट थे तथापि गांधीजी उस अधिनियम को कार्यान्वित कराने के पक्ष में थे किंतु शीघ्र ही कुछ घटनाएं ऐसी घटित हुईं कि गांधीजी ब्रिटिश सरकार के असहयोगी बन गए।

असहयोग आन्दोलन

रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग नरसंहार, ई.1919 के सुधार अधिनियम की खराब कार्यान्विति से निराश होकर ई.1920 में गांधीजी ने प्रथम देशव्यापी असहयोग आन्दोलन चलाया। गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार से सहयोग नहीं करने के लिए, सरकार द्वारा दी गई उपाधियों का त्याग करने, विधानसभाओं, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी समितियों का बहिष्कार करने का आह्वान किया।

स्वदेशी आन्दोलन को सशक्त बनाने के लिए गांधीजी ने खादी पहनने, सूत कातने, विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना देने, सरकारी नौकरियों एवं सरकारी शिक्षण संस्थाओं का त्याग करने को भी कहा। आन्दोलन में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई, देश भर में जुलूस निकाले गए, प्रार्थना सभाएं व जनसभाएं आयोजित की गईं। इस प्रकार कांग्रेस का आन्दोलन जन-आन्दोलन में परिवर्तित हो गया।

ई.1922 में चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलन ने आचानक हिंसक रूप ले लिया। इससे क्षुब्ध होकर गांधीजी ने आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। गांधीजी के इस कदम से देश भर में गांधीजी के विरुद्ध नाराजगी व्यक्त की गई।  आन्दोलन आरम्भ करने से पहले गांधीजी ने कहा था कि देश को एक वर्ष में स्वराज्य मिल जाएगा, खिलाफत की समस्या का समाधान होगा तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन हो जाएगा किंतु 2 साल के आंदोलन के बावजूद इनमें से एक भी बात पूरी नहीं हुई।

इस आन्दोलन का महत्त्व इस बात में है कि यह विश्व इतिहास में प्रथम अहिंसात्मक जन-आन्दोलन था। गांधीजी के इस प्रयोग से देश में राजनीतिक-जागृति का विस्तार हुआ। गांधीजी खादी के माध्यम से स्वावलम्बन और स्वाभिमान के आदर्शों को प्रतिष्ठित करने में सफल रहे।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन

ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समस्या का समाधान करने के लिए छः सदस्यों का एक दल नियुक्त किया जिसे ‘साइमन कमीशन’ कहते हैं। चूँकि इस कमीशन में एक भी भारतीय नहीं था, इसलिए भारत में इसे ‘व्हाइट कमीशन’ कहा गया और इस आयोग का बहिष्कार किया गया। पूरा देश ‘साइमन वापिस जाओ’ के नारों से गूंज उठा।

देश के प्रत्येक शहर में ‘साइमन गो बैक’ की तख्तियों के साथ जलूस निकाले गए। ई.1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ जिसमें पूर्ण-स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक व्यापक आन्दोलन चलाने का निर्णय लिया गया और गांधीजी को इसका नेतृत्व सौंपा गया। 31 दिसम्बर 1929 को रावी नदी के किनारे राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया तथा 26 जनवरी 1960 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। 

ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया तथा ‘दाण्डी यात्रा’ का आयोजन करके नमक-कानून तोड़ा। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नमक-कानून के उल्लंघन का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। एक अंग्रेज अधिकारी ने गांधीजी का उपहास करते हुए कहा- ‘गांधीजी समुद्र के पानी को केतली में उबाल कर ब्रिटिश साम्राज्य को हटाने की सोच रहे हैं।’

6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दाण्डी के समुद्र-तट पर पहुँचकर नमक-कानून का उल्लंघन किया और इसी के साथ एक भीषण आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। स्थान-स्थान पर नमक-कानून का उल्लघंन किया गया। सरकार ने लगभग 92,000 सत्याग्रहियों को बन्दी बना लिया तथा प्रकाशनों और विभिन्न संगठनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अहिंसात्मक सत्याग्रहियों पर लाठियां और गोलियां चलाई गईं।

5 मई 1930 को गांधीजी को भी बन्दी बना लिया गया। फिर भी आन्दोलन चलता रहा। घरसाना के नमक गोदाम पर शान्तिपूर्ण पिकेटिंग करते हुए अहिंसक जत्थों पर लाठियां बरसाई गईं जिससे अनेक सत्याग्रही घायल हो गए। फिर भी आंदोलनकारी अहिंसक बने रहे। पूर्व के असहयोग आन्दोलन की तुलना में सविनय अवज्ञा आन्दोलन अधिक व्यापक था।

इस आंदोलन में भाग लेने के लिए हजारों स्त्रियों ने पर्दा त्याग दिया। किसान भी इस आन्दोलन से जुड़ गए। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त में सीमान्त गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ के ‘खुदाई खिदमतगार’ के पठानों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

आंदोलन के बीच ब्रिटिश सरकार ने ईस्वी 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया, कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया जिससे सम्मेलन विफल हो गया। जब द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का समय आया तो ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस से समझौते का वातावरण बनाने के लिए गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। 5 मार्च 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन और गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ जिसे ‘गांधी इरविन पैक्ट’ कहा जाता है।

इसके बाद गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया तथा दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया। इस सम्मेलन में सरकार ने भारत में संघीय व्यवस्था को अधार रूप में स्वीकार करते हुए राजनीतिक बन्दियों को रिहा करने का वादा किया।

लोगों में इस बात को लेकर गहरा रोष था कि गांधीजी ने इरविन से हुए समझौते में प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी को आजीवन कारारवास में बदलने के लिए कोई बात नहीं की। सविनय अवज्ञा आन्दोलन से स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय आन्दोलन का आधार अत्यन्त विस्तृत है तथा भारत के संवैधानिक विकास में भारतीयों के सहयोग के बिना कोई कदम उठाना सम्भव नहीं है।

गांधी इरविन समझौते के अनुसार गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के एक मात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने लन्दन गए किंतु सम्मेलन भारत की किसी भी समस्या का समाधान करने में असफल रहा। ई.1932 में गांधीजी खाली हाथ लन्दन से लौट आए। गांधीजी ने भारत लौटते ही वैयक्तिक स्तर पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

ई.1932 में ही सरकार ने ‘साम्प्रदायिक पंचाट’ की घोषणा करके हरिजनों एवं मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने का प्रयास किया। गांधीजी ने इस पंचाट के विरुद्ध जेल में आमरण अनशन आरम्भ कर दिया। अन्त में बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ हुए ‘पूना पैक्ट’ के बाद गांधीजी ने अपना आमरण अनशन समाप्त किया। इसके बाद गांधीजी को रिहा कर दिया गया।

इस समय तक गांधीजी का व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन मन्दा पड़ चुका था। इसलिए ई.1934 में यह आन्दोलन समाप्त कर दिया गया। अब गांधीजी ने हरिजनोद्धार कार्यक्रम का नेतृत्व किया। ई.1935 में ब्रिटिश सरकार ने एक सुधार अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार प्रान्तीय स्वायत्तता की स्थापना की गई तथा भारत में चुनाव करवाए गए। कांग्रेस ने चुनावों में भाग लिया और ग्यारह में से आठ ब्रिटिश-भारतीय प्रान्तों में कांग्रेस ने अपनी सरकारें बनाईं।

भारत छोड़ो आन्दोलन

ई.1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक दलों से पूछे बिना ही भारत को भी युद्ध में धकेल दिया। इसके विरोध में विभिन्न प्रान्तों के कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र दे दिए। ब्रिटिश सरकार इस समय भारतीयों का सहयोग चाहती थी। अतः भारतीयों को कुछ रियायतें देने के लिए ‘अगस्त प्रस्ताव’ की घोषणा की गई किंतु भारतीयों को अगस्त प्रस्ताव स्वीकार्य न होने के कारण संवैधानिक गतिरोध बना रहा।

देश में साम्प्रदायिक समस्या भी बढ़ती रही। 22 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ पारित किया गया तथा सरकार से कहा कि- ‘यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में भारत के लोगों की शान्ति एवं प्रसन्नता चाहती है तो इसका एक मार्ग है कि भारत को स्वतंत्र करने से पहले हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए दो राष्ट्र बनाए जाएं।’

मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका के दबाव के कारण भारतीय समस्या के समाधान के लिए सर-स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। इसे क्रिप्स कमीशन कहा जाता है। भारत की एकता को बनाए रखने की दृष्टि से कांग्रेस ने क्रिप्स प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए। मुस्लिम लीग ने पहले तो क्रिप्स-प्रस्ताव स्वीकार कर लिया किंतु बाद में अस्वीकार कर दिया।

इस बीच द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर पहुँचने लगा और सुभाषचंद्र बोस को भारत में सफलताएं मिलने लगीं। तब गांधीजी ने अंग्रेजों से भारत छोड़़ देने के लिए कहा। बम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया और उसमें ‘भारत छोड़़ो’ प्रस्ताव स्वीकार किया। इस अधिवेशन में गांधीजी ने भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। फिर भी गांधजी ने अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़़ा।

8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव स्वीकार होते ही 9 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व ही सरकार ने गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को बन्दी बना लिया। जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, सादिक अली आदि कांग्रेस के कई नेता भूमिगत हो गए। नेतृत्व के अभाव में तथा सरकारी दमन के फलस्वरूप आन्दोलन हिंसक हो उठा। कई स्थानों पर हिंसा हुई। फरवरी 1943 तक भारत छोड़ो आंदोलन चलता रहा। इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं।

ई.1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया। इसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को ढूंढ-ढूंढ कर फांसी पर चढ़ाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया किंतु आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के समर्थन में भारतीय सेनाओं में विद्रोह हो गए। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते ई.1947 में भारत का विभाजन करके उन्हें भारत एवं पाकिस्तान के रूप में स्वतंत्रता दे दी गई।

विभाजन के बाद मुस्लिम जनसंख्या ने पाकिस्तान वाले क्षेत्रों की ओर तथा हिन्दू जनसंख्या ने भारतीय क्षेत्रों की ओर पलायन किया। इस दौरान स्थान-स्थान पर साम्प्रदायिक दंगे, हिंसा, बलात्कार, लूट एवं आगजनी हुई। देश के नेताओं एवं अंग्रेज अधिकारियों ने साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के प्रयास किए किंतु बड़ी संख्या में लोग मारे गए एवं घायल हुए। बड़ी संख्या में औरतों का सतीत्व भंग किया गया। गांधीजी ने देश की आजादी से पहले बनी अन्तरिम सरकार में भाग नहीं लिया। वे साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का प्रयास करते रहे। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में आयोजित प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गांधजी को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का चिन्तन

मोहनदास कर्मचंद गांधी का अहिंसा का सिद्धान्त

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने राजनीति में दो प्रयोग किए- (1.) सत्य का प्रयोग एवं (2.) अहिंसा का प्रयोग।

जब वे धरना-प्रदर्शन करते थे उसे सत्य के प्रति आग्रह अर्थात् सत्याग्रह कहते थे। अपने आंदोलनों को वे पूरी तरह अहिंसक रखते थे। यदि कोई आंदोलन हिंसक होता हुआ दिखाई देता था, तो वे उस आंदोलन को समाप्त कर देते थे। गांधीजी के अनुसार सच्ची अहिंसा सत्य पर आधारित निर्भीकता है। निर्भीक व्यक्ति ही अहिंसक रह सकता है। अहिंसा के अन्तर्गत बुराई के समक्ष अत्मसमर्पण करना नहीं होता अपितु बुराई के विरोध में अपनी समस्त आत्मिक शक्ति का प्रयोग करना होता है।

गांधीजी का कहना था कि अहिंसा, कायरता नहीं, वीरता है। भारतीय संस्कृति अहिंसा का समर्थन करती है न कि कायरता का। क्योंकि कायरता का अपमानपूर्ण जीवन जीने से तो हिंसा का मार्ग कहीं अधिक श्रेष्ठ है। हिंसा के द्वारा व्यक्ति कम-से-कम अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करने का तो प्रयास करता है। गांधजी भी कायरता और दुर्बलता को अनुचित मानते थे।

गांधीजी का कहना था कि हिंसक व्यक्ति किसी दिन अहिंसक बन सकता है किंतु कायर और दुर्बल व्यक्ति कभी अहिंसक नहीं बन सकता। यदि हम अपनी स्त्रियों तथा धार्मिक स्थानों की अहिंसा के द्वारा रक्षा नहीं कर सकते तो हमें लड़ते हुए रक्षा करनी चाहिए।

गांधीजी के अनुसार अहिंसा और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। यदि साधन की चिन्ता रखी जाए तो साध्य को भी किसी दिन प्राप्त किया जा सकता है। यद्यपि अहिंसा और सत्य का मार्ग कठिन है, फिर भी निरन्तर प्रयासों से इसे आत्मसात् किया जा सकता है। मृत्यु से डरने वाला अहिंसा का प्रयोग नहीं कर सकता। सत्याग्रह अथवा अनशन अहिंसा का महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके प्रयोग से अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन किया जा सकता है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का धर्म और दर्शन

गांधीजी यद्यपि भारतीय संस्कृति पर गर्व करने की बजाय साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने में अधिक विश्वास रखते थे तथापि वे वैष्णव धर्म के सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों पर चलना पसंद करते थे। यद्यपि वे अपनी मेज पर गीता के ऊपर कुरान रखते थे तथापि वे नरसी मेहता के प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जो पीर पराई जाणे रे’ को भी गाते थे और मुंह से ‘राम’ नाम का उच्चारण करते थे।

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने वेद, उपनिषद्, गीता, वेदान्त आदि धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था। वे ईसाई धर्म से भी प्रभावित थे किंतु हिन्दुओं के मोक्ष-सिद्धांत में भी विश्वास करते थे। वे जीवन में ईश्वर की कृपा को अनिवार्य मानते थे किंतु वे भाग्यवादी नहीं थे।

वे ईश्वर को सृष्टि को रचयिता एवं विश्वव्यापी मानते थे तथा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु भाव रखते थे। गांधीजी के जीवन में ईश्वर की धारणा का बड़ा महत्त्व था। गांधीजी ने सत्य को ही ईश्वर बताया। ऐसा करके वे शायद निरीश्वरवादियों को सनतुष्ट करने का प्रयास करते थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू समाज के समक्ष वेदों की सर्वोच्चता को स्पष्ट किया तथा ‘वेदों की और लौटो’ तथा ‘वेद समस्त सत्य विद्याओं की पुस्तक है’ जैसे नारे दिए किंतु गांधीजी ने कहा- ‘केवल वेद ही श्रेष्ठ नहीं हैं अपितु बाइबिल, कुरान और जिन्दअवेस्ता भी ईश्वरीय ज्ञान हैं।’ उन्होंने हिन्दुओं की सुप्रसिद्ध रामधुन- ‘रघुपति राघव राजा राम’ में ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ तथा ‘चाहे वेद पढ़ो चाहे पढ़ो कुरान’ जैसे शब्द जुड़वाकर वेद और कुरान को एक जैसा पवित्र ग्रंथ घोषित किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि गांधीजी की धार्मिक मान्यताएं उनके राजनीतिक जीवन से प्रेरित थीं। उन्हें सभी लोगों का सहयोग चाहिए था इसलिए वे सभी धर्मों के लोगों को संतुष्ट रखना चाहते थे और उसी कारण किसी धर्म की आलोचना नहीं करते थे तथा कुरान को गीता के ऊपर रखकर मुसलमानों को खुश रखने का प्रयास करते थे।

गांधीजी धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानते थे। उनके अनुसार समस्त धर्म सच्चे हैं। कर्मकाण्ड और अन्धविश्वासों के कारण समस्त धर्मों में थोड़ी बहुत बुराइयां विद्यमान हैं। अतः स्वविवेक के अनुसार धर्म की अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए। वे हृदय परिवर्तन के बिना धर्म परिवर्तन को व्यर्थ मानते थे। धार्मिक सहिष्णुता एवं मैत्रीभाव का अर्थ यह है कि किस प्रकार एक हिन्दू को अच्छा हिन्दू, एक मुसलमान को अच्छा मुसलमान और ईसाई को अच्छा ईसाई बनाया जाए।

गांधीजी के अनुसार धर्म का सार नैतिकता में विद्यमान है। धर्म और नैतिकता एक दूसरे से गुंथे हुए हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। समस्त धर्मों का नैतिक आधार एक जैसा है जिसे हम विश्व-धर्म कह सकते हैं। वे सम्पूर्ण मानवता की आधारभूत एकता में विश्वास करते थे। ईश्वर भक्ति की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति मानव सेवा है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का सत्याग्रह का सिद्धान्त

गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ को ‘सत्य के प्रति आग्रह’ कहा जिसकी शक्ति से हम अपने विरोधी को झुकने पर विवश कर सकते हैं। सत्याग्रह का प्रयोग न केवल व्यक्ति के विरुद्ध अपितु शासन के विरुद्ध भी किया जा सकता है। जब भी कोई व्यक्ति, संस्था, समाज या शासन कोई गलत काम करता हुआ प्रतीत हो तब उसके विरुद्ध हिंसा का प्रयोग न करके अहिंसा का प्रयोग करना चाहिए और वह प्रयोग सत्याग्रह के माध्यम से ही हो सकता है।

दूसरे को दण्ड देने की बजाय, व्रत, उपवास, धरना आदि के माध्यम से स्वयं को दण्ड देना चाहिए। यहाँ तक कि इस दौरान विरोधी द्वारा किए जा रहे बलप्रयोग को भी शांति के साथ सहन करना चाहिए। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह में पराजय का कोई स्थान नहीं है। सत्याग्रह में पराजय का कारण केवल सत्याग्रही की व्यक्तिगत कमजोरी है।

सत्याग्रही को अनिवार्यतः सम्पत्तिहीन होना चाहिए। सत्याग्रही सम्पत्तिशाली हो सकता है, किंतु उसे सम्पत्ति को अपना देवता नहीं मान लेना चाहिए। सत्याग्रही को अपने परिवार से मोह भी त्यागना पड़ता है। सत्याग्रही को यातनाओं से विचलित नहीं होना चाहिए तथा धर्म में पूर्ण आस्था होनी चाहिए। सत्याग्रह अहिंसा का मार्ग है।

हिंसा जंगली पौधों के समान है जो जहाँ-तहाँ स्वयं उग आते हैं किन्तु सत्याग्रह की फसल के लिए स्वयं की प्रेरणा अथवा आत्मप्रवृत्ति रूपी खाद-पानी की आवश्यकता होती है। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का अर्थ केवल कानून की सविनय अवज्ञा तक ही सीमित नहीं है। कई बार सत्याग्रह का अर्थ अवज्ञा न करने पर भी प्रकट होता है।

कुछ विद्वानों और विचारकों ने सत्याग्रह को ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ कहा है तथा इसे दुर्बल व्यक्ति का शस्त्र बताया है। जबकि गांधीजी के अनुसार दुर्बल व्यक्ति का शस्त्र हिंसा एवं शारीरिक बल का प्रयोग होता है। बलवान व्यक्ति का शस्त्र ‘सत्याग्रह एवं अहिंसा’ होता है। गांधीजी विरोधी पर प्रहार करने अथवा उसे दुःख पहुँचाने के स्थान पर स्वयं को कष्ट देने में विश्वास करते थे।

निष्क्रिय प्रतिरोध में प्रेम का कोई स्थान नहीं होता जबकि सत्याग्रह प्रेम के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सत्याग्रही स्वयं को कष्ट पहुँचाकर अपने विरोधी पर विजय प्राप्त कर सकता है। गांधीजी के अनुसार व्यक्तिगत हितों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह नहीं किया जा सकता। गांधीजी ने सत्याग्रह करने से पहले अन्य उपायों को प्रयुक्त करने की सलाह दी है।

जब सारे उपाय विफल हो जाएं तभी सत्याग्रह किया जाना चाहिए। सत्याग्रही अपने हृदय को टटोलने में विश्वास करता है ताकि जिन बुराइयों के विरुद्ध वह संघर्ष कर रहा है, वे बुराईयां उसमें विद्यमान न हों। सत्याग्रही के लिए रचनात्मक कार्य करना आवश्यक है। उसे चरखा, खादी, छुआछूत का अन्त, मद्य निषेध, हिन्दू तथा मुसलमानों के मध्य मैत्री सम्बन्धों के रचनात्मक कार्यों का अनुभव एवं प्रशिक्षण होना अनिवार्य है। आमरण अनशन सत्याग्रही का अन्तिम शस्त्र है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का सामाजिक चिन्तन

गांधीजी अपने समय के महान सामाजिक चिंतक थे। वे जितने बड़े राजनीतिज्ञ थे, उससे कहीं अधिक बड़े समाज-सुधारक थे। उनका समाज-सुधार केवल वाणी-विलास तक सीमित नहीं था अपितु रचनात्मक-कार्यक्रमों पर आधारित था। उन्होंने भारतीय समाज की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। हिन्दु-मुस्लिम एकता, स्त्री-शिक्षा, स्त्रियों की स्थिति में सुधार, हरिजनोद्धार, मद्य-निषेध, राष्ट्रीय शिक्षा, ग्राम सुधार आदि सभी विषयों ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे गांवों में जाकर लोगों के बीच कार्य करें तथा उनकी सेवा करें।

हरिजन-उद्धार के लिए मोहनदास कर्मचंद गांधी जीवन भर संकल्पबद्ध रहे। वे हरिजनों के प्रति समाज के व्यवहार को बदलना चाहते थे तथा हरिजनों को हिन्दू समाज का अभिन्न अंग मानते थे। उस काल में हरिजनों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी तथा उन्हें अस्वास्थ्यकर परिवेश में रहना पड़ता था। हिन्दू होते हुए भी उन्हें मन्दिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता था और उनके लिए सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं एवं स्कूलों का उपयोग करना वर्जित था।

गांधीजी ने हरिजनोद्धार कार्यक्रमों को सवर्णों के बल पर चलाना चाहा, उन्होंने इन कार्यक्रमों में हरिजनों की भागदारी सुनिश्चित नहीं की। गांधीजी का कहना था कि हरिजन इतने कमजोर हैं कि वे स्वयं अपने अधिकारों की मांग नहीं कर सकते। अतः उनके प्रति होने वाले अन्याय का विरोध उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो अन्याय करने वाले समूह के सदस्य हैं। गांधीजी ने सवर्णों के मन से हरिजनों के प्रति घृणा, भेदभाव, अस्पश्र्यता की भावना समाप्त करने का प्रयास किया और हरिजनों के मन से हीनता का भाव मिटाने का प्रयास किया।

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने जाति-व्यवस्था का और साम्प्रदायिकता का विरोध किया तथा इन बुराइयों को मिटाने के लिए अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धर्मीय विवाहों का समर्थन किया। गांधीजी के पिता यद्यपि तीन रियासतों के दीवान रहे तथा गांधीजी का पालन-पोषण रियासती परिवेश में हुआ तथापि गांधीजी लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के पक्षधर थे। इस कारण गांधीजी ने जीवन भर राजशाही और सामन्तशाही का विरोध किया।

गांधीजी ने समाज में व्याप्त मद्यपान का बहुत विरोध किया। उनके कार्यकर्ताओं ने स्थान-स्थान पर धरने देकर शराब की दुकानें बंद करवाईं। वे सरकार द्वारा मद्य-विक्रय पर कर लगाने को बुरा मानते थे। क्योंकि इसकी आड़ में सरकार मद्य-सेवन को बढ़ावा देती है। नैतिकता की दृष्टि से गांधीजी आबकारी-राजस्व को सबसे निम्न श्रेणी का राजस्व मानते थे।

गांधीजी ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए रचनात्मक सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया तथा स्त्रियों को पुरुषों के समान ही देश-सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया। गांधीजी के इस आह्वान को राष्ट्र-व्यापी समर्थन मिला। सहस्रों स्त्रियां स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के लिए आगे आईं तथा उन्होंने पुलिस की लाठी-गोली खाने और जेल जाने से भी परहेज नहीं किया। गांधीजी ने पुरुषों और स्त्रियों के लिए समान अधिकारों एवं समान अवसरों का समर्थन किया।

गांधीजी बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। वे चाहते थे कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह नहीं करना चाहिए किंतु वे ऐसी वयस्क विधवाओं के पुनर्विवाह के विरोधी थे जिनके बाल-बच्चे हों। गांधीजी प्रौढ़ विधुर के पुनर्विवाह का समर्थन नहीं करते थे।

 गांधीजी ने पर्दा-प्रथा का भी घोर विरोध किया। वे बुर्का पहनने वाली मुस्लिम औरतों से बात करने में संकोच नहीं करते थे। गांधीजी दहेज-प्रथा के भी विरोधी थे। उनके अनुसार दहेज-प्रथा ने मध्यम वर्गीय तथा निम्न आय वाले परिवारों को नारकीय जीवन बिताने के लिए विवश कर दिया था। अतः उन्होंने विवाह की रीति को सरल एवं सादा बनाने तथा विवाह के भोज पर अधिक धन के अपव्यय को रोकने के सम्बन्ध में भी विचार व्यक्त किए।

गांधीजी अपने पास आने वाले नव-दम्पत्ति को गीता की प्रति भेंट करते थे। गांधीजी कई मामलों में स्त्रियों को पुरुषों से श्रेष्ठ मानते थे। गांधीजी के अनुसार अहिंसक संघर्ष में स्त्रियोचित धैर्य, सहिष्णुता और कष्ट सहने की मूक क्षमता ऐसे गुण थे जिनके कारण स्त्रियां सत्याग्रह आन्दोलन को पुरुषों सें अधिक सफलतापूर्वक संचालित कर सकती थीं। गांधीजी स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले सौन्दर्य-प्रसाधनों के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि इनके माध्यम से स्त्रियों को पुरुषों के मनोरंजन का साधन बनाया जाता है। 

गांधीजी का आदर्श राज्य

गांधीजी मानव समाज के लिए राज्य-विहीन व्यवस्था चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि एक आदर्श समाज को अपने संस्कारों के बल पर जीवित रहना चाहिए न कि राज्य की दण्डात्मक एवं हिंसात्मक व्यवस्था के नीचे दबकर। इसलिए समाज में किसी राजनीतिक संस्था अर्थात् राज्य या सरकार की कोई आश्वयकता नहीं होनी चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए अपने कत्र्तव्यों का पालन करे तथा दूसरों के साथ सहयोग करे तो किसी को भी सरकार, पुलिस, जेल, दण्ड व्यवस्था आदि की आवश्यकता नहीं होगी।

ऐसी व्यवस्था में सामाजिक जीवन बाह्य नियंत्रणों से मुक्त होगा तथा आन्तरिक नैतिक नियंत्रणों द्वारा संचालित होगा। गांधीजी ने आदर्श समाज की कल्पना को कार्यान्वित करने के लिए एक आदर्श राज्य का स्वरूप भी प्रस्तुत किया। गांधीजी ने आदर्श राज्य व्यवस्था को ‘रामराज्य’ कहा।

रामराज्य में भूमि और राज्य जनता का होता है, न्याय शीघ्र और सस्ता होता है तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने तरीके से पूजा-प्रार्थना, स्वतंत्र विचाराभिव्यक्ति और लेखन की स्वतंत्रता होती है।

गांधीजी ने कहा- ‘मैं एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए कार्यरत रहूँगा जिसमें गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह अनुभव करे कि यह उसका अपना देश है, जिसके निर्माण में उसकी प्रभावशाली भूमिका है, एक ऐसा भारत जिसमें जनता का कोई उच्च वर्ग और कोई नीच वर्ग नहीं होगा, ऐसा भारत जिसमें समस्त जातियाँ परस्पर एकता और सद्भाव के स्नेह-सूत्र में बंधी हुई मिल-जुल कर रहेंगी। ऐसे सुन्दर भारत में अस्पृश्यता, मद्यपान और नशीली वस्तुओं के सेवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा। महिलाओं को भी वही अधिकार प्राप्त होंगे जो पुरुषों को प्राप्त हैं। मेरे सपनों के भारत का यही स्वरूप है।’

मोहनदास कर्मचंद गांधी के आदर्श समाज में भारी वाहनों, न्यायालयों, वकीलों, आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों तथा महानगरों की विसंगतियों का कोई स्थान नहीं था। अहिंसक समाज में बड़े उद्योगों तथा सेना की आवश्यकता न रहने के कारण भारी वाहनों का उपयोग नहीं होगा, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वाणिज्य नहीं होने के कारण औद्योगीकरण के समस्त उपकरणों को त्यागना होगा।

प्रजा के अहिंसक होने तथा पारस्परिक विवाद नहीं होने के कारण न्यायालयों तथा वकीलों की आवश्यकता नहीं होगी, स्वयं व्यक्ति द्वारा अपने आन्तरिक इन्द्रिय-निग्रह के कारण सामान्य रोगों से मुक्ति मिल जाएगी। यौगिक क्रियाओं द्वारा मानसिक, नैतिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकेगी। इन सबके कारण व्यावसायिक चिकित्सकों की आवयकता ही नहीं रहेगी।

इस प्रकार मोहनदास कर्मचंद गांधी के आदर्श समाज में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से लेकर मंत्रियों, उद्योगपतियों, व्यवसाइयों, न्यायाधीशों, वकीलों, थानेदारों एवं डॉक्टरों आदि की आवश्यकता नहीं थी। बहुत से आलोचकों ने इसे अव्यावहारिक कल्पना बताया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

सुभाष चन्द्र बोस का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

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सुभाष चन्द्र बोस - www.bharatkaitihas.com
सुभाष चन्द्र बोस

भारत की राजनीति में सुभाष चन्द्र बोस अकेले ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने राष्ट्रसेवा के लिए विभिन्न मोर्चों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने समय की कठिनतम आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण की, एक कॉलेज के प्रिंसीपल रहे, एक विशाल सशस्त्र सेना की स्थापना की और उसके अध्यक्ष रहे, वे सैनिक के रूप में युद्ध के मोर्चों पर लड़े और नेता के रूप में कांगे्रस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

सुभाष चन्द्र बोस ने जापान, जर्मनी और बर्मा आदि देशों से अंतरर्राष्ट्रीय संधियां कीं और आजादी से पहले ही भारत के लिए एक सरकार की स्थापना भी की। एक व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में रहकर जितने भी रूपों में भारत की सेवा कर सकता है, उन्होंने की। वे गांधीजी के सबसे बड़े विरोधी रहे किंतु गांधाजी को सबसे पहले राष्ट्रपिता भी उन्होंने ही कहा।

सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। पांच वर्ष की आयु में उन्हें अंग्रेजी स्कूल भेजा गया। स्कूल में भारतीय बच्चों से कहा जाता था कि भारतीय होने के कारण वे कुछ छात्रवृत्ति परीक्षाओं में नहीं बैठ सकते, यद्यपि वार्षिक परीक्षाओं में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इससे सुभाषचन्द्र बोस ने अनुभव किया कि एक ही संस्था में पढ़ते हुए उन्हें और बच्चों से नीचा समझा जाता है।

जब वे भारतीय स्कूल में पढ़ने गए तब उन पर स्कूल के प्रधानाध्यापक बेनीमाधव प्रसाद के उच्च चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ा। उन पर दूसरा प्रभाव स्वामी विवेकानन्द के भाषणों एवं लेखों का था। इससे उनकी आत्मा को नई चेतना प्राप्त हुई। वे देश एवं मानवता की सेवा की ओर अग्रसर हुए। उनके माता-पिता ने उन्हें जितना अधिक नियंत्रण में रखने का प्रयास किया, वे उतने ही अधिक विद्रोही होते चले गए।

ई.1913 में 15 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण की तथा सम्पूर्ण विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद वे कलकत्ता के प्रसीडेन्सी कॉलेज में प्रविष्ट हुए। उस समय कलकत्ता में क्रांतिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं तथा कॉलेज का छात्रावास क्रांतिकारियों का मिलन स्थल बना हुआ था।

एक ओर अंग्रेजों की दमनकारी नीति ने सुभाष की राजनीतिक चेतना को झकझोरा तो दूसरी ओर प्रथम विश्व युद्ध ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि जिस राष्ट्र के पास सैनिक शक्ति नहीं है वह अपनी आजादी की रक्षा करने की आशा नहीं कर सकता। ई.1919 में सुभाषचन्द्र ने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। अगले ही वर्ष ई.1920 में उन्होंने इंग्लैण्ड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा दी।

सुभाष इस परीक्षा में सफल रहे किंतु उनका मन विदेशी सरकार की गुलामी करने को तैयार नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने नौकरी नहीं की। ई.1921 में उन्होंने बम्बई जाकर गांधीजी से भेंट की। उस समय गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन छेड़ रखा था। गांधीजी ने उनसे इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए कहा किंतु सुभाषचंद्र को यह कार्यक्रम प्रभावित नहीं कर सका। वे पुनः कलकत्ता लौट आए।

कुछ दिन बाद सुभाष बाबू देशबन्धु चितरंजन दास से मिले। उनसे मिलने पर उन्होंने अनुभव किया कि उन्हें एक योग्य नेता मिल गया है। जब तक देशबन्धु चितरंजनदास जीवित रहे, सुभाष बाबू उनके सहयोगी के रूप में कार्य करते रहे। असहयोग आंदोलन में जब गांधीजी के आह्वान पर बहुत से छात्रों ने कॉलेज छोड़़ दिया, तब उनकी शिक्षा के लिए देशबन्धु चितरंजन दास ने एक राष्ट्रीय कॉलेज की स्थापना की और सुभाष बाबू को उसका प्रिंसीपल बनाया।

कुछ समय बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली। यद्यपि सुभाष चंद्र वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे किंतु इस समय कांग्रेस में विभिन्न विचारधाराओं के लोग सदस्य होते थे, वामपंथी भी बड़ी संख्या में कांगे्रस में थे।

आन्दोलनकारी सुभाष

ई.1921 में प्रिन्स ऑफ वेल्स ने भारत की यात्रा की। उसकी यात्रा के बहिष्कार एवं विरोध के लिए देशव्यापी आन्दोलन की रूपरेखा बनाई गई तथा कलकत्ता के आंदोलन का नेतृत्व सुभाष बाबू को सौंपा गया। 10 दिसम्बर 1921 को ब्रिटिश सरकार ने देशबन्धु चितरंजन दास, सुभाष चन्द्र बोस तथा उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। कुछ दिनों बाद उन्हें रिहा किया गया।

ई.1922 में चैरीचैरा काण्ड होने पर गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। इस पर 1 जनवरी 1923 को चित्तरंजन दास, नरसिंह चिंतामन केलकर, मोतीलाल नेहरू और बिट्ठलभाई पटेल ने कांग्रेस छोड़कर स्वराज पार्टी का निर्माण किया। चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव बनाये गये। देशबन्धु चित्तरंजन दास ने स्वराज्य पार्टी का एक समाचार-पत्र ‘फारवर्ड’ आरम्भ किया और सुभाष बाबू को इस समाचार-पत्र का मैनेजर नियुक्त किया।

 मार्च 1924 में स्वराज्य पार्टी को कलकत्ता नगर निगम के चुनाव में भारी सफलता प्राप्त हुई और देशबन्धु चितरंजन दास नगर निगम के मेयर बने, तब उन्होंने सुभाष बाबू को कार्यपालक अधिकारी नियुक्त किया।

जून 1925 में चितरंजनदास की मृत्यु हो गई और सुभाष बाबू अकेले पड़ गए। इसका लाभ उठाकर अंग्रेजस सरकार ने अक्टूबर 1925 में सुभाष बाबू को एक क्रांतिकारी षड्यन्त्र करने के झूठे आरोप में गिरफ्तार करके मांडले भेज दिया। वे लगभग ढाई वर्ष तक जेल में रहे। मई 1927 में उन्हें रिहा किया गया। इस समय तक स्वराज्य पार्टी भी समाप्त हो चुकी थी। अतः सुभाष फिर से कांग्रेस में सक्रिय हो गए और उन्हें बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का प्रधान निर्वाचित किया गया।

कांग्रेस में वामपंथियों का प्रभाव

ई.1925 में सुभाष बाबू को पहली बार कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में शामिल किया गया तथा उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया। ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के सम्बन्ध में सुझाव देने के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया। भारत में इस आयोग का जबर्दस्त विरोध किया गया क्योंकि इस आयोग में एक भी सदस्य भारतीय नहीं था। सुभाष बाबू ने बंगाल में कमीशन के विरुद्ध किए गए प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

दिसम्बर 1928 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष बाबू का गांधीजी से वैचारिक संघर्ष हुआ। इस अधिवेशन में ‘नेहरू रिपोर्ट’ पर विचार किया गया जिसमें ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’ की मांग की गई थी। सुभाषचंद्र तथा उनके वामपंथी साथियों ने ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ का प्रस्ताव रखा। गांधीजी ने प्रस्ताव रखा कि यदि दिसम्बर 1929 तक ब्रिटिश सरकार भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा नहीं देती है तो कांग्रेस एक अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलायेगी।

इस पर सुभाष बाबू ने इसमें संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता से कम किसी भी दर्जे से सनतुष्ट नहीं होगी। यह संशोधन के विरोध में 1,350 तथा पक्ष में 973 मत आए। इस प्रकार सुभाष बाबू का प्रस्ताव तो गिर गया किंतु गांधजी एवं उनके साथियों को कांग्रेस के भीतर उभर चुकी सुभाष बाबू की शक्ति का पता लग गया।

एक वर्ष बाद पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में वामपंथियों ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव बड़े आराम से पारित करवा लिया। इसके बाद सुभाष चंद्र स्वाधीनता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेता माने जाने लगे।

ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया जिसमें सुभाषचन्द्र बोस ने बड़े उत्साह से भाग लिया। सुभाष बाबू को बन्दी बना लिया गया और गांधी-इरविन पैक्ट के बाद उन्हें रिहा किया गया। दूसरे गोलमेज सम्मेलन से लौटकर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की। इस बार भी सुभाष बाबू को गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। ऐसी स्थिति में उन्हें वियना जाकर इलाज कराने की अनुमति मिल गई।

सुभाष चन्द्र बोस का गांधीजी से तीव्र मतभेद

19 से 21 फरवरी 1938 तक गुजरात के सूरत जिले के हरिपुरा गांव में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें सुभाष बाबू को निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया। यद्यपि गांधीजी और सुभाष बाबू के बीच, कांग्रेस की नीति व कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद थे किन्तु वामपंथियों का प्रभाव देखकर किसी ने सुभाष बाबू का विरोध नहीं किया।

ई.1938 में सुभाष बाबू ने भरसक प्रयत्न किया कि जिन्ना से सुलह हो जाए और सारा राष्ट्र एक हो जाए ताकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का कारगर ढंग से विरोध कर सकें किन्तु जिन्ना टस से मस नहीं हुआ। सुभाष बाबू चटगांव गए तो मुस्लिम लीगियों ने उन पर एवं अन्य कांग्रेसियों पर पथराव किया जिससे सुभाष बाबू को चोटें आई और चैदह अन्य कांग्रेसी भी घायल हुए। सुभाषचंद्र ने जनता से अपील की कि वे धैर्य और आत्म-संयम से काम लें और घृणा की बजाय प्रेम का रास्ता अपनाएं।

सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया और इंग्लैण्ड भी जर्मन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गया। इस अवसर पर गांधीजी व सुभाष बाबू के मतभेद खुलकर सामने आए। सुभाष बाबू का मानना था कि ‘इंग्लैण्ड का संकट भारत के लिए अवसर है’ किंतु गांधीजी इंग्लैण्ड के संकट को भारत के लिए अवसर नहीं समझते थे तथा इस संकट में वे अंग्रेज सरकार से सहयोग करना चाहते थे।

ये मतभेद निरन्तर बढ़ते ही गए। उसी वर्ष कांग्रेस का त्रिपुरा अधिवेशन हुआ। इसमें सुभाष बाबू को पुनः कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़ा किया गया। गांधीजी तथा उनके साथी नहीं चाहते थे कि सुभाष बाबू पुनः अध्यक्ष बनें। उन्होंने पट्टाभिसीतारमैया को सुभाष बाबू के सामने खड़ा कर दिया। गांधजी ने सुभाष बाबू के विरुद्ध एढ़ी-चोटी को जोर लगा दिया किंतु पट्टाभि सीतारमैया हार गए।

गांधीजी ने हार से तिलमिलाकर कहा- ‘अब मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि कांग्रेस के प्रतिनिधि उन सिद्धन्तों और नीतियों को नहीं मानते जिनका मैं समर्थन करता हूँ।’ गांधीजी ने सुभाष का विरोध क्यों किया?

कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में सुभाष बाबू की जय-जयकार हुई तो गांधीजी ने एक वक्तव्य दिया- ‘जो लोग कांग्रेस में रहना पसंद नहीं करते वे बाहर आ सकते हैं।’

गांधीजी के संकेत पर कांग्रेस कार्य-समिति के 15 सदस्यों ने यह कहकर अपने पदों से त्याग-पत्र दे दिया कि सुभाष बाबू अपनी इच्छानुसार कार्य-समिति गठित कर लें। सुभाष बाबू नहीं चाहते थे कि कांग्रेस में फूट पड़े। इसलिए उन्होंने गांधी, नेहरू, कृपलानी आदि से बात करके मतभेद दूर करने का प्रयास किया किंतु कोई परिणाम नहीं निकला।

गांधीजी के समर्थकों ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि सुभाष बाबू, गांधीजी की इच्छानुसार कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य मनोनीत करें। गांधीजी एवं सुभाषचंद्र में मतैक्य नहीं हो सका। इधर सुभाष बाबू अस्वस्थ होने के कारण अधिवेशन में भाग नहीं ले सके। विषय समिति की बैठक में उन्हें स्ट्रेचर पर लाया गया।

सुभाष बाबू ने प्रस्ताव रखा कि ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दे देना चाहिए कि- ‘यदि छः महीने में ब्रिटिश सरकार भारत को आजाद नहीं करती है तो भारत युद्ध के अवसर का लाभ उठाकर ब्रिटिश विरोधी शक्तियों से सैनिक सहायता ले लेगा।’

गांधीजी ने इस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध किया। अतः यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग-पत्र दे दिया।

फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन

कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग-पत्र देने के बाद सुभाष बाबू ने कांग्रेस में ही रहकर ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक एक अलग दल बनाया। सुभाष ने फॉरवर्ड ब्लाक के तीन प्रमुख उद्देश्य बताए- (1.) देश की आजादी के लिए तेजी से कार्य करना, (2.) गांधी गुट के नेतृत्व को समाप्त करना, (3.) समझौते का कड़ा विरोध करना।

सुभाष बाबू ने कहा कि- ‘फारवर्ड ब्लॉक श्री गांधी के व्यक्तित्त्व और अहिंसात्मक असहयोग के उनके सिद्धान्त को पूरा सम्मान देता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस के मौजूदा हाई कमान में भी अपनी निष्ठा बनाए रखे।’

कांग्रेस के समस्त पदों से च्युत

एक तरफ सुभाष बाबू कांग्रेस की एकता के लिए कार्य कर रहे थे किंतु दूसरी तरफ गांधीजी के समर्थक सुभाष बाबू को पूरी तरह कांग्रेस से निकाल देना चाहते थे। कांग्रेस के नए अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सुभाष बाबू से उनकी गतिविधियों के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण पूछा।

सुभाष बाबू ने अपने जवाब में सब कुछ स्पष्ट कर दिया किन्तु फिर भी सुभाष बाबू को कांग्रेस के समस्त पदों से हटाकर मात्र चार आने वाला सामान्य सदस्य रहने दिया गया। इस प्रकार सुभाष कांग्रेस-संगठन से अलग कर दिए गए। निःसंन्देह संगठन में यह कार्य लोकतन्त्र की भावना के विरुद्ध था तथा सुभाषचंद्र को अपमानित करने वाला था।

सुभाष चन्द्र बोस की गिरफ्तारी और जर्मनी पहुँचना

द्वितीय विश्व-युद्ध के सम्बन्ध में सुभाषचंद्र बोस की स्पष्ट धारणा थी कि-

(1.) विश्व-युद्ध में ब्रिटेन पराजित होगा और ब्रिटिश साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

(2.) विषम परिस्थतियाँ होते हुए भी ब्रिटेन भारतीय जनता को अधिकार हस्तांतरित नहीं करेगा और भारतीयों को अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ना होगा।

(3.) यदि भारत ने युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध भाग लिया और जो राष्ट्र ब्रिटेन से लड़ रहे हैं उनसे सहयोग किया तो भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर लेगा।

फॉरवर्ड ब्लॉक ने सुभाष बाबू के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध जंग की तैयारियां आरम्भ कर दीं। सरकार ने सुभाष को एक खतरनाक क्रांतिकारी मानकर 2 जुलाई 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इस पर उन्होंने सरकार को अल्टीमेटम दिया- ‘मेरी गिरफ्तारी का कोई नैतिक कानूनी आधार नहीं है और यदि मुझे तुरन्त रिहा नहीं किया गया तो मैं अनशन करूंगा।’

सरकार ने इस अल्टीमेटम की कोई परवाह नहीं की। इस पर 29 नवम्बर 1940 को सुभाषचंद्र ने अनशन आरम्भ कर दिया। उन्होंने बंगाल के गवर्नर को लिखा- ‘व्यक्ति को मरना चाहिए ताकि राष्ट्र जिंदा रह सके। आज मुझे मरना चाहिए ताकि भारत अपनी आजादी और गौरव प्राप्त कर सके।’

कुछ दिनों के अनशन के बाद सुभाष की स्थिति बिगड़ गई। इस पर सरकार ने उन्हें जेल से रिहा करके उनके ही घर में नजरबंद कर दिया। लगभग 40 दिनों तक सुभाष अपने शयनकक्ष से बाहर नहीं निकले। अचानक एक दिन भारत और ब्रिटेन के लोग यह सुनकर स्तम्भित रह गए कि ब्रिटिश सरकार के कड़े पहरे के बावजूद सुभाषचंद्र पुलिस को चकमा देकर भाग गए।

सुभाषचंद्र वेश बदलकर काबुल पहुँचे, कुछ दिन वहाँ रहने के बाद वे मास्को गए और वहाँ से 28 मार्च 1941 को बर्लिन के लिए रवाना हो गए। बर्लिन में जर्मनी के विदेश मन्त्री रिबेनट्राप ने सुभाषचंद्र का स्वागत किया और जर्मनी के रेडियो द्वारा ब्रिटेन के विरुद्ध अपने विचारों को प्रसारित करने की अनुमति दी। नवम्बर 1942 में सुभाषचंद्र ने जर्मनी रेडियो से अपना सन्देश प्रसारित किया। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर का पलड़ा भारी था। हिटलर ने सुभाष बाबू को भारत के स्वाधीनता संग्राम में सहायता देने का आश्वासन दिया।

सुभाष चन्द्र बोस का दक्षिण-पूर्वेशिया में आगमन

जून 1942 में रासबिहारी बोस ने सुभाषचंद्र बोस को पूर्वी एशिया में आने तथा उनके द्वारा स्थापित आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सम्भालने का निमन्त्रण दिया। सुभाष बाबू 8 फरवरी 1943 को एक जर्मन यू-बोट से फ्रेकेन बर्ग से रवाना होकर मेडागास्कर होते हुए समुद्र में 400 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक जापानी पनडुब्बी में बैठकर सुमात्रा के उत्तर में स्थित साबन द्वीप पहुंचे।

यहाँ उनके पुराने परिचित कर्नल यामामोटो ने जापान सरकार की ओर से उनका स्वागत किया। वहाँ से चलकर सुभाष बाबू 16 मई 1943 को हवाई जहाज से टोकियो पहुंचे। नेताजी के टोकियो पहुँचने के पूर्व ही जर्मनी कई मोर्चों पर पराजित हो चुका था और मित्र राष्ट्रों की स्थिति सुदृढ़ होती जा रही थी। सुभाषचन्द्र बोस ने टोकियो में जापान के प्रधानमंत्री तोजो से लम्बी बातचीत की।

प्रधानमंत्री तोजो, सुभाष के व्यक्तित्व तथा उनकी बातचीत से बहुत प्रभावित हुआ और उसने जापानी संसद (डीट) में घोषणा की कि- ‘जापान ने दृढ़ता के साथ फैसला किया है कि वह भारत से अँग्रेजों को; जो भारतीय जनता के दुश्मन हैं, निकाल बाहर करने और उनके प्रभाव को खत्म करने के लिये सब तरह की सहायता देगा तथा भारत को वास्तविक अर्थ में पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने में समर्थ बनायेगा।’

भारतीयों के लिये सुभाष चन्द्र बोस के मर्मस्पर्शी संदेश

2 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर पहुंचे जहाँ उनका शानदार स्वागत किया गया। 4 जुलाई को कैथे सिनेमा हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में उन्होंने विधिवत् ढंग से आजाद हिन्द फौज का अध्यक्ष पद ग्रहण किया। ले. कर्नल के. भौंसले ने सैनिकों की तरफ से उनका अभिनन्दन किया।

इस अवसर पर नेताजी ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाने और आजाद हिन्द फौज को लेकर हिन्दुस्तान जाने की घोषणा की। 5 जुलाई 1943 को सुभाष बाबू ने आजाद हिन्द फौज के पुनर्निर्माण की घोषणा की तथा सेना का निरीक्षण किया।

इस अवसर पर उन्होंने कहा- ‘यह केवल अँग्रेजी दासता से भारत को मुक्त कराने वाली सेना नहीं है, अपितु बाद में स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रीय सेना का निर्माण करने वाली सेना भी है। साथियों आपके युद्ध का नारा हो- चलो दिल्ली, चलो दिल्ली। इस स्वतन्त्रता संग्राम में हम में से कितने जीवित बचेंगे, यह मैं नहीं जानता परन्तु मैं यह जानता हूँ कि अन्त में विजय हमारी होगी और हमारा ध्येय तब तक पूरा नहीं होगा जब तक हमारे शेष जीवित साथी ब्रिटिश साम्राज्य की एक अन्य कब्रगाह- लाल किले पर विजयी परेड नहीं करेंगे।’

सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से भारतीयों के नाम मर्मस्पर्शी संदेश दिया- ‘एक वर्ष से मैं मौन एवं धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कर रहा था। वह घड़ी आ पहुंची है कि मैं बोलूँ। ब्रिटिश दासता से भारतीयों को मुक्ति मिल सकती है- उन अँग्रेजों से जिन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से अब तक हमें गुलाम बना रखा है। ब्रिटिश साम्राज्य के शत्रु हमारे स्वाभाविक मित्र हैं। समस्त भारतीयों की ओर से मैं घोषणा करता हूँ कि ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक भारत आजाद न हो जाये।’

उन्होंने भारतीयों से अपील की- ‘दिल्ली चलो। यह रास्ता खून, पसीने और आंसू से भरा हुआ है……।’

लोकप्रिय नारों का निर्माण

भारत की आजादी के लिये भारतीयों को जागृत करने के उद्देश्य से सुभाष बाबू ने संसार के सर्वश्रेष्ठ नारों का निर्माण किया। उनका विश्वविख्यात उद्घोष जयहिंद पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनका दूसरा नारा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ दिल्ली चलो नारा भी खूब लोकप्रिय हुआ।

सफलताओं एवं असफलताओं पर बोलते हुए एक बार सुभाषचंद्र बोस ने कहा था- अस्थाई असफलता से हताश न हों। दुनिया की कोई ताकत भारत को गुलाम नहीं रख सकती।

अस्थायी भारत सरकार का गठन

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वतन्त्र भारत के अस्थायी मन्त्रिमण्डल का गठन किया जिसमें कप्तान लक्ष्मी स्वामीनाथन सहित कई लोगों को मंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर को सुभाषचन्द्र बोस ने भारत की अस्थायी सरकार की तरफ से ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

कुछ दिनों के अन्दर ही धुरी राष्ट्रों- जर्मनी, जापान और इटली तथा उनके प्रभाव के अन्तर्गत काम करने वाली सरकारों- स्याम, बर्मा, फिलिपीन इत्यादि ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार को मान्यता दे दी। जापान ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूहों का प्रशासन इस अस्थायी सरकार को सौंप दिया।

सुभाष चन्द्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

अब सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को पुनर्गठित करने का काम आरम्भ किया। कुछ ही दिनों में चार ब्रिगेडों- गांधी ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड का गठन किया गया । भारतीय स्त्री सैनिकों की सेना गठित करने के लिये सिंगापुर में एक प्रशिक्षण-शिविर स्थापित किया गया। इसमें 500 महिला सैनिक रखे गये।

आईएनए का कमाण्डर इन चीफ बनने के बाद पूर्व एशिया में इण्डियन इण्डिपेण्डेंस आंदोलन का नेतृत्व भी सुभाष चंद्र के हाथों में आ गया। आजाद हिन्द फौज में सैनिकों की भर्ती और प्रशिक्षण की अलग-अलग व्यवस्था की गई। स्त्री तथा पुरुष सैनिकों के लिये अलग-अलग प्रशिक्षण शिविर स्थापित किये गये। सैनिकों को हिन्दुस्तानी भाषा में निर्देश दिये जाते थे।

6 माह के प्रशिक्षण के बाद रंगरूटों को आजाद हिन्द फौज में सम्मिलित कर लिया जाता था। प्रवासी भारतीयों को इस आन्दोलन से जोड़ने के लिये सुभाषचन्द्र बोस ने हाँगकाँग, शंघाई, मनीला, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो तथा अन्य स्थानों का दौरा किया और प्रवासी भारतीयों को अपने उद्देश्यों से अवगत कराया। उनके प्रेरक और चुम्बकीय व्यक्तित्व ने प्रवासी भारतीयों को बहुत आकर्षित किया और उन्होंने तन-मन-धन से इस आन्दोलन को सहयोग दिया।

सुभाष चन्द्र बोस युद्ध के मोर्चे पर

सुभाषचंद्र की योजना थी कि आजाद हिन्द फौज बर्मा मोर्चे से भारत की सीमा में प्रवेश करके बंगाल और असम से ब्रिटिश फौजों के पीछे धकेल दे। उनका विश्वास था कि आजाद हिन्द फौज की सफलता देखकर भारतीय जनता, अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर देगी जिससे भारत को मुक्त करवाना सरल हो जायेगा। भारत की जो भूमि मुक्त कराई जायेगी, उसका शासन आाजद हिन्द फौज को सौंप दिया जायेगा और उस भूमि पर केवल भारत का तिंरगा फहराया जायेगा।

इस योजना के अनुसार आजाद हिन्द फौज की सुभाष ब्रिगेड भारत-बर्मा की सीमा पर पहुँच गई। सुभाषचन्द्र बोस ने रंगून में अपना मुख्यालय स्थापित किया। सुभाष ब्रिगेड की छोटी-छोटी टुकड़ियों ने भारतीय अधिकारियों के नेतृत्व में आगे बढ़ना आरम्भ किया। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों का मनोबल काफी ऊँचा था परन्तु युद्ध की दृष्टि से फौज पूरी तरह से सुसज्जित नहीं थी।

जनवरी 1944 के अन्त में सुभाष ब्रिगेड की एक बटालियन को अराकान की कलादान घाटी में तथा दूसरी और तीसरी बटालियन को चिन पहाड़ियों की ओर भेजा गया। पहली बटालियन ने कलादान घाटी में पश्चिमी अफ्रीका की हब्शी सेना को परास्त कर आगे बढ़ना आरम्भ किया तथा पलेतवा व दलेतमे नामक स्थानों पर शत्रु सेना को परास्त कर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

मई 1944 में उसने मादोक नामक स्थान जीत लिया जो भारत की भूमि पर अँग्रेजों की अग्रिम चैकी थी। इस प्रकार आजाद हिन्द फौज ने भारत की भूमि पर कदम रख दिये परन्तु शीघ्र ही अँग्रेजों की सेना ने जोरदार आक्रमण किया। इस अवसर पर जापानी सेना मादोक के सैनिकों को सहायता पहुँचाने में असमर्थ रही। अतः आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों को मादोक से हट जाने को कहा गया परन्तु भारतीय सैनिक डटे रहे और मई से सितम्बर तक उन्होंने इस क्षेत्र की रक्षा की और तब तक मादोक में तिरंगा लहराता रहा।

सुभाष ब्रिगेड की दूसरी और तीसरी बटालियनों ने भी अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। उन्हें कलेवा से होकर टासू और फोर्ट हवाइट के मार्ग की रक्षा का भार सौंपा गया। इस क्षेत्र में आजाद हिन्द फौज के सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों के छापामारों का सफाया किया तथा मेजर मार्निंग की सेना को परास्त करके अँग्रेजों के सामरिक दुर्ग क्लैंग-क्लैंग को जीत लिया।

आजाद हिन्द फौज की वीरता से प्रसन्न होकर जापानी सेनापति ने समस्त सुभाष ब्रिगेड को कोहिमा की ओर कूच करने का आदेश दिया। यह निश्चय किया गया कि इम्फाल का पतन होते ही सुभाष ब्रिगेड ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके बंगाल में प्रवेश कर जाये। इस बीच आजाद हिन्द फौज की दूसरी टुकड़ियां जापान के मंजूरियाई डिवीजन के साथ कोहिमा पहुँच गईं और घमासान युद्ध के बाद कोहिमा पर अधिकार जमा लिया।

इसके बाद युद्ध के अन्य क्षेत्रों में जापानियों की पराजय का सिलसिला आरम्भ हो गया। इसका लाभ उठाते हुए अँग्रेज इम्फाल में नई कुमुक पहंचाने में सफल रहे। इससे इम्फाल बच गया। अब अँग्रेजों ने दीमापुर और कोहिमा की तरफ से जोरदार हमला किया। आजाद हिन्द फौज को पीछे हटना पड़ा।

गांधी ब्रिगेड को अप्रैल के आरम्भ में इम्फाल की तरफ भेजा गया। जापानियों ने सोचा था कि अब तक इम्फाल का पतन हो गया होगा परन्तु मार्ग में सूचना मिली कि फलेल के निकट घमासान युद्ध चल रहा है। इस पर गांधी ब्रिगेड के छापामार सैनिकों ने फलेल के हवाई अड्डे पर अधिकार करके वहाँ मौजूद वायुयानों को नष्ट कर दिया।

इस अभियान में गांधी ब्रिगेड के लगभग 250 सैनिक मारे गये। फिर भी गांधी ब्रिगेड बहादुरी के साथ डटी रही और अँग्रेजों को आगे नहीं बढ़ने दिया। जून 1944 में रसद पानी और गोला-बारूद की कमी से गांधी ब्रिगेड की स्थिति बिगड़ने लगी, जबकि दूसरी तरफ नई कुमुक आ जाने से अँग्रेज सेना की स्थिति मजबूत हो गई।

वर्षा ऋतु में टास-फलेल सड़क बह गई और आजाद हिन्द फौज को रसद मिलना भी बन्द हो गया। ऐसी स्थिति में कुछ दिनों बाद गांधी ब्रिगेड को भी जापानी सेना के साथ बर्मा लौटना पड़ा। इस प्रकार, आजाद हिन्द फौज का मुख्य अभियान जो मार्च 1944 में आरम्भ हुआ था, वह समाप्त हो गया।

इस अभियान के दौरान वह भारतीय सीमा में लगभग 150 मील भीतर तक प्रवेश करने में सफल रही परन्तु रसद और गोला-बारूद के अभाव में उस क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकी। इस अभियान में आजाद हिन्द फौज के लगभग 4000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

सुभाष चन्द्र बोस के अन्तिम दिन

अब ब्रिटिश सेना ने बर्मा पर पुनः अधिकार करने के लिये आक्रमण किया। उनका आक्रमण इतना जोरदार था कि जापानियों को निरन्तर पीछे हटना पड़ा। जापानी सेना रंगून का भार, आजाद हिन्द फौज को देकर बर्मा से चली गई। आजाद हिन्द फौज ने कुछ दिनों तक बहादुरी के साथ नगर की रक्षा की परन्तु मई 1945 के आरम्भ में रंगून पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया। आजाद हिन्द फौज के सैकड़ों सैनिक बन्दी बना लिये गये।

 नेताजी सुभाषचन्द्र बोस रंगून से बैंकाक और वहाँ से सिंगापुर चले गये। इस समय तक जापान के साथी राष्ट्रों- जर्मनी और इटली का पतन हो चुका था और जापान अकेला ही मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ रहा था। अमरीका ने 6 और 8 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिराये। इसके बाद रूस ने भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र-राष्ट्रों के समक्ष समर्पण कर दिया। सुभाषचन्द्र बोस अपने एक साथी कर्नल हबीब उर रहमान के साथ 17 अगस्त 1945 को एक लड़ाकू विमान से सैगांव से टोकियो के लिये रवाना हुए। 17 अगस्त की रात्रि को विमान में सवार लोगों ने तूरेन (हिन्द-चीन) में विश्राम किया। अगले दिन विमान ताइपेह पहुँचा। ताइपेह से रवाना होते ही विमान में अचानक आग लग गई।

इस कारण कुछ जापानी अधिकारियों सहित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की भी मृत्यु हो गई। कर्नल हबीब उर रहमान जीवित बच गये। बहुत से लोगों का विश्वास है कि नेताजी उस दुर्घटना में नहीं मारे गये थे। मित्र राष्ट्रों के हाथों में पड़ने से बचने के लिये वे भूमिगत हो गये थे। उनकी भस्मी को सम्मानपूर्वक टोकियो लाया गया और 14 सितम्बर 1945 को उसे रियो कोजू मन्दिर में रख दिया गया।

सुभाष चन्द्र बोस की उपलब्धियों का मूल्यांकन

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की उपलब्धियां उनके समकालीन नेताओं से कहीं अधिक बड़ी हैं। उन्होंने आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की, कॉलेज के प्रिंसीपल रहकर युवकों को पढ़ाया, जनजागृति के लिए समाचार पत्र का सम्पादन किया, फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे लोकप्रिय राजनीतिक दल का गठन किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया, कांग्रेस का नेतृत्व किया तथा सशस्त्र सेना के माध्यम  से देश को आजाद करवाने का प्रयास किया।

वे भारत की कुछ भूमि को अंग्रेजों से आजाद करवाने वाले एवं अपनी सरकार स्थापित करके विश्व के कई देशों से मान्यता प्राप्त करने वाले एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी थे। वे गांधीजी की अहिंसा की भूल-भुलैया में उलझने की बजाय ठोस परिणाम में विश्वास रखते थे तथा देश की आजादी के लिए प्रत्येक उपाय को उचित मानते थे। वे कांग्रेस में एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने गांधीजी के विचारों एवं उनकी कार्यप्रणाली को खुलकर चुनौती दी तथा उनके प्रत्याशी पट्टाभिसीतारमैया को अध्यक्ष पद के चुनावों में परास्त किया।

सुभाषचंद्र की राय में दूसरा विश्व-युद्ध भारत के लिए सुनहरा अवसर था। इसे भुनाने के लिए जर्मनी एवं जापान के राष्ट्राध्यक्षों की आंख में आंख डालकर बात करने वाले वे एकमात्र नेता थे। जिस समय वायसराय वेवेल भारतीय नेताओं को शिमला-सम्मेलन में बुलाकर डोमिनियन स्टेटस देने के लिए ललचा रहा था, उस समय सुभाष बाबू जापान की भूमि से रेडियो प्रसारण के माध्यम से भारतीय नेताओं से अपील कर रहे थे कि वे भारत के लिए आधी-अधूरी आजादी प्राप्त करने हेतु वायसराय भवन की ओर न दौड़ें। हालांकि वे भारत की आजादी का सूरज नहीं देख सके किंतु भारत की आजादी में उनका बहुत बड़ा योगदान है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

आचार्य सुश्रुत

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आचार्य सुश्रुत

भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था।

भारतीय संस्कृति को आधुनिक विज्ञान ने अत्यधिक प्रभावित किया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने एक ओर मानव जीवन को सुखी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है तो दूसरी ओर विश्व के विनाश का खतरा भी पैदा कर दिया है।

भारतीय संस्कृति के केन्द्र में प्राचीन काल में धर्म की बहुलता थी, मध्य-काल में विदेशी संस्कृतियों से संघर्ष की बहुलता रही तथा आधुनिक काल में वैज्ञानिक चिंतन की बहुलता है। फिर भी यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि भारतीयों के पास वैज्ञानिक चिंतन आधुनिक काल में ही आया। जब दुनिया के अधिकांश देश जंगलों में निवास करने वाली आदिवासी व्यवस्था से बाहर भी नहीं निकल पाए थे तब भी भारतीयों के पास उन्नत विज्ञान था।

भारत के महान् वैज्ञानिक

वेदों में विज्ञान सम्बन्धी बहुत सी बातें हैं। भारतीय ऋषियों को खगोल विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, सौर विज्ञान, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद एवं रसायन विज्ञान का भी अच्छा ज्ञान था। प्राचीन काल के वैज्ञानिकों में महर्षि कणाद, वराह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत, बोधायन, भास्कराचार्य आदि के नाम श्रद्धा से लिए जाते हैं। आधुनिक काल के वैज्ञानिकों में जगदीश चन्द्र बोस, सी. वी. रमन, विक्रम साराभाई, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आदि के निाम लिए जा सकते हैं।

आचार्य सुश्रुत

भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा विज्ञान में विशेष स्थान प्राप्त है। सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। यहाँ किस विश्वामित्र से आशय है, यह स्पष्ट नहीं है। आचार्य सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। औपधेनव तथा वैतरणी आदि सुश्रुत के सहपाठी थे। सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी मिलता है। अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है; वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता; इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी। कुछ विद्वान सुश्रुत के उत्तरतंत्र को किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा बनाया गया मानते हैं। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पक्षों को विस्तार से समझाया गया है। सुश्रुत शल्य क्रिया के लिए 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए ही बनाए गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि सम्मिलित हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की शल्य-प्रक्रियाओं की खोज की। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता प्राप्त की। सुश्रुत नेत्रों की शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुत संहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्य या अन्य औषधियां देते थे।

मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे।

मानव शारीर की भीतरी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय-चिकित्सा, बाल-रोग, स्त्री-रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

महर्षि चरक

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महर्षि चरक

महर्षि चरक को प्राचीन भारत के आयुर्वेद के महान ज्ञाता के रूप में ख्याति प्राप्त है। कुछ विद्वानों का मत है कि चरक कनिष्क के राजवैद्य थे अर्थात् वे ईसा की प्रथम शताब्दी में हुए परन्तु कुछ लोग उन्हें बौद्ध-काल से भी पहले का मानते हैं अर्थात् वे ई.पू. 600 से भी पूर्व हुए।

त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। चूंकि कनिष्क और उसका कवि अश्वघोष, बौद्ध थे और चरक संहिता में बौद्ध-मत का प्रबल विरोध किया गया है, इसलिए चरक और कनिष्क का साथ होना असंभव जान पड़ता है।

चरक ने प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ की रचना की। इस ग्रन्थ में रोगनाशक एवं रोगनिरोधक औषधियों का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ के उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु थे, इस ग्रन्थ के मूल ग्रंथकर्ता अग्निवेश थे और इस ग्रंथ के प्रति-संस्कारक चरक थे।

अर्थात् आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के ग्रंथ अग्निवेश-तन्त्र में संशोधन एवं परिवर्द्धन करके उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता कहा जाता है। महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई।

चरक संहिता में व्याधियों के उपचार तो बताए ही गए हैं, साथ ही दर्शन और अर्थशास्त्र के विषयों का भी उल्लेख है। उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया। चरक ने बहुत से स्थानों का भ्रमण करके, उस काल के चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श किया तथा उनके विचार एकत्र करके और अपने अनुभव तथा शोधों के आधार पर आयुर्वेद के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

प्राचीन वाङ्मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी, जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अतः संभव है कि चरक संहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।

चरक संहिता में पालि-साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक-विनय-पिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा) आदि। इससे चरक संहिता का उपदेश काल उपनिषदों के बाद का और बुद्ध से पहले का निश्चित होता है। इसका प्रति-संस्कार कनिष्क के समय ई.78 के लगभग हुआ होगा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह ग्रन्थ पश्चिमी देशों तक जा पहुँचा। इस ग्रंथ को आज भी आयुर्वेद में बहुत आदर की दृष्टि से देखा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

आर्यभट्ट

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आर्यभट्ट

आर्यभट्ट (ई.476-550) प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है। इस ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्म-स्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है। आर्यभट्ट का जन्म-स्थल कुसुमपुर दक्षिण भारत में था।

एक अन्य मान्यता के अनुसार उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक देश में हुआ था। उनके वैज्ञानिक कार्यों का आदर तत्कालीन गुप्त सम्राट की राजधानी में ही हो सकता था। अतः उन्होंने पाटलिपुत्र के समीप कुसुमपुर में रहकर अपनी रचनाएँ पूर्ण की। गुप्तकाल में मगध के नालन्दा विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए अलग विभाग था। आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे।

आर्यभट्ट का भारत और विश्व के ज्योतिष विज्ञान पर बहुत प्रभाव पड़ा। केरल की ज्योतिष परम्परा पर आर्यभट्ट का विशेष प्रभाव रहा। वे भारतीय गणितज्ञों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ में 120 आर्याछंदों में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और उससे सम्बन्धित गणित को सूत्ररूप में लिखा।

उन्होंने एक ओर तो गणित में ‘पाई’ के मान को अपने पूर्ववर्ती आर्किमिडीज़ से भी अधिक सही निरूपित किया तो दूसरी ओर खगोलविज्ञान में पहली बार उदाहरण के साथ घोषित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। आर्यभट्ट ने ज्योतिषशास्त्र के उन्नत साधनों के बिना महत्वपूर्ण खोजें कीं।

कोपरनिकस (ई.1473 से 1543) ने जिस सिद्धांत की खोज की थी उसकी खोज आर्यभट्ट एक हजार वर्ष पहले कर चुके थे। गोलपाद में आर्यभट्ट ने लिखा है नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं।

उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रकार आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है।

आर्यभट्ट ने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को एक-समान माना है। उनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) तथा एक चतुर्युग में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग को समान माना है। आर्यभट्ट के अनुसार किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात 62,832: 20,000 आता है जो चार दशमलव स्थान तक शुद्ध है।

आर्यभट्ट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूह से निरूपित करने की अत्यन्त वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया।

आर्यभट्ट के ग्रंथ

आर्यभट्ट द्वारा रचित चार ग्रंथों की जानकारी उपलब्ध होती है- (1.) दशगीतिका, (2.) आर्यभट्टीय, (3.) तंत्र तथा (4.) आर्यभट्ट सिद्धांत।

आर्यभट्टीय

आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीय नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का उल्लेख है। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल 3 पृष्ठों में समा सकने वाले 33 श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा 5 पृष्ठों में 75 श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया।

आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अनेक क्रान्तिकारी अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं। आर्यभट्टीय, गणित और खगोल विज्ञान का ग्रंथ है जिसके सिद्धांतों को भारतीय गणित में बड़े स्तर पर उद्धृत किया गया है और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है। आर्यभट्टीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति सम्मिलित हैं।

इसमें सतत भिन्न (कँटीन्यूड फ्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण (क्वाड्रेटिक ईक्वेशंस), घात शृंखला के योग (सम्स ऑफ पावर सीरीज) और ज्याओं की एक तालिका (ज्ंइसम व िैपदमे) शामिल हैं।

आर्यभट्ट के शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा अश्मकतंत्र या अश्माका में किए गए उल्लेख के अनुसार इस ग्रंथ को आर्यभट्टीय नाम बाद के टिप्पणीकारों द्वारा दिया गया है, आर्यभट्ट ने स्वयं इसे कोई नाम नहीं दिया। चूंकि इस ग्रंथ में 108 छंद हैं इसलिए इसे आर्य-शत-अष्ट (अर्थात् आर्यभट्ट के 108) भी कहा जाता है। यह ग्रंथ सूत्र साहित्य के समान बहुत ही संक्षिप्त शैली में लिखा गया है।

प्रत्येक पंक्ति एक जटिल प्रणाली को याद करने में सहायता करती है। ग्रंथ में 108 छंदों के साथ 13 परिचयात्मक श्लोक अलग से दिए गए हैं। सम्पूर्ण ग्रंथ को चार अध्यायों में विभाजित किया गया है-

(1.) गीतिकपाद (13 छंद)

इसमें समय की बड़ी इकाइयाँ, यथा- कल्प, मन्वन्तर, युग, जो प्रारंभिक ग्रंथों से अलग, ब्रह्माण्ड-विज्ञान प्रस्तुत करते हैं, यथा- लगध का वेदांग ज्योतिष, (पहली सदी ईस्वी पूर्व, इसमें जीवाओं (साइन) की तालिका ज्या भी शामिल है जो एक एकल छंद में प्रस्तुत है। एक महायुग के दौरान, ग्रहों के परिभ्रमण के लिए 4.32 मिलियन वर्षों की संख्या दी गयी है।

(2.) गणितपाद (33 छंद)

इसमें क्षेत्रमिति (क्षेत्र व्यवहार), गणित और ज्यामितिक प्रगति, शंकु छायाएँ, सरल, द्विघात, युगपत और अनिश्चित समीकरण (कुट्टक) का समावेश है।

(3.) कालक्रियापाद (25 छंद)

इसमें समय की विभिन्न इकाइयाँ और किसी दिए गए दिन के लिए ग्रहों की स्थिति का निर्धारण करने की विधि दी गई है। अधिक मास की गणना के विषय में (अधिकमास), क्षय-तिथियां। सप्ताह के दिनों के नामों के साथ, सात दिन का सप्ताह प्रस्तुत करते हैं।

(4.) गोलपाद: (50 छंद)

इसमें आकाशीय क्षेत्र के ज्यामितिक एवं त्रिकोणमितीय पहलू, क्रांतिवृत्त, आकाशीय भूमध्य रेखा, आसंथि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण, क्षितिज पर राशि-चक्रीय संकेतों का बढ़ना आदि की विशेषताएं दी गई हैं। कुछ संस्करणों के अंत में कृति की प्रशंसा में कुछ पुष्पिकाएं भी जोड़ी गई हैं।

आर्यभट्टीय ने गणित और खगोल विज्ञान में पद्य रूप में कुछ नवीन प्रस्तुतियां दीं जो कई सदियों तक प्रभावशाली रहीं। ग्रंथ की संक्षिप्तता की चरम सीमा का वर्णन उनके शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा किया गया है। ई.1465 में नीलकंठ सोमयाजी द्वारा आर्यभट्टीय भाष्य लिखा गया।

(5.) आर्य-सिद्धांत

आर्य-सिद्धांत, खगोलीय गणनाओं पर एक कार्य है जो अब लुप्त हो चुका है, इसकी जानकारी हमें आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर की रचनाओं एवं बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों- ब्रह्मगुप्त और भास्कर के ग्रंथों में मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कार्य पुराने सूर्य सिद्धांत पर आधारित है और आर्यभट्टीय में सूर्योदय की अपेक्षा मध्यरात्रि-दिवस गणना का उपयोग किया गया है।

इस ग्रंथ में नोमोन (शंकु-यन्त्र), परछाई यन्त्र (छाया-यन्त्र), संभवतः कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार (धनुर-यन्त्र, चक्र-यन्त्र), एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र, छत्र-यंत्र, धनुषाकार जल घड़ी और बेलनाकार जल घड़ी आदि अनेक खगोलीय उपकरणों का वर्णन किया गया है।

(6.) अल न्त्फ या अल नन्फ़

आर्यभट्ट का यह ग्रन्थ अरबी अनुवाद के रूप में मिलता है, इसे ‘अल न्त्फ़’ या ‘अल नन्फ़’ कहा गया है। इसका संस्कृत नाम अज्ञात है। 10-11वीं सदी के फारसी विद्वान अबू रेहान अल्बरूनी ने इसका उल्लेख किया गया है।

(7.) आर्यभट्ट सिद्धांत

7वीं शताब्दी ईस्वी में यह ग्रंथ अत्यन्त लोकप्रिय था किंतु अब इस ग्रंथ के केवल 34 श्लोक उपलब्ध होते हैं।

गणित

स्थानीय मान प्रणाली और शून्य: स्थान-मूल्य अंक प्रणाली, जिसे सर्वप्रथम तीसरी सदी की बख्शाली पाण्डुलिपि में देखा गया, आर्यभट्ट के कार्यों में स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। उन्होंने निश्चित रूप से प्रतीक का उपयोग नहीं किया परन्तु फ्रांसीसी गणितज्ञ जार्ज इफ्रह के मतानुसार- रिक्त गुणांक के साथ, दस की घात के लिए एक स्थान धारक के रूप में शून्य का ज्ञान आर्यभट्ट के स्थान-मूल्य अंक प्रणाली में निहित था।

आर्यभट्ट ने ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया था; वैदिक-काल से चली आ रही संस्कृत परंपरा को निरंतर रखते हुए उन्होंने संख्या को निरूपित करने के लिए वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग किया, यथा- मात्राओं (जैसे ज्याओं की तालिका) को स्मरक के रूप में व्यक्त करना।

अपरिमेय (इर्रेशनल) के रूप में π

आर्यभट्ट ने पाई के सन्निकटन पर कार्य किया और संभवतः उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया था कि पाई इर्रेशनल है। आर्यभट्टीयम् (गणितपाद) के दूसरे भाग में वे लिखते हैं-

चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।

अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः।।

100 में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें। इस नियम से 20000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है-

 (100 + 4) X 8 + 62000/20000 = 3.1416

इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात 3.1416 है, जो पाँच महत्वपूर्ण आंकड़ों तक बिलकुल सटीक है।

आर्यभट्ट ने आसन्न (निकट पहुँचना), पिछले शब्द के ठीक पहले आने वाला, शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह न केवल एक सन्निकटन है, वरन यह कि मूल्य अतुलनीय (या इर्रेशनल) है। यूरोप में पाइ की तर्कहीनता का सिद्धांत लैम्बर्ट द्वारा केवल ई.1761 में सिद्ध हो पाया था। आर्यभट्टीय के अरबी में अनुवाद के पश्चात् ई.820 में बीजगणित पर मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख्वारिज्मी की पुस्तक में इस सन्निकटन का उल्लेख किया गया।

क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिति

गणितपाद 6 में, आर्यभट्ट ने त्रिकोण के क्षेत्रफल को इस प्रकार बताया है- त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः। अर्थात् किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है। आर्यभट्ट ने द्विज्या (साइन) के विषय में चर्चा की है और उसे अर्ध-ज्या कहा है। लोगों ने इसे ज्या कहना शुरू कर दिया।

जब अरबी लेखकों द्वारा आर्यभट्ट के काम का संस्कृत से अरबी में अनुवाद किया गया, तो उन्होंने इसको जिबा कहा और बाद में वे इसे ज्ब कहने लगे। बाद में लेखकों को समझ में आया कि ‘ज्ब’ जिबा का ही संक्षिप्त रूप है। जिबा का अर्थ है खोह या खाई।

बारहवीं सदी में, जब क्रीमोना के घेरार्दो ने इस ग्रंथ का अरबी से लैटिन भाषा में अनुवाद किया, तब उन्होंने अरबी जिबा की जगह उसे साइनस कहा जिसका लैटिन भाषा में अर्थ खोह या खाई ही है। यही साइनस अंग्रेजी में साइन बन गया।

अनिश्चित समीकरण: प्राचीन कल से भारतीय गणितज्ञों की रुचि उन समीकरणों के पूर्णांक हल ज्ञात करने में रही है जो ax + b = cy  के स्वरूप में होती है। इस विषय को वर्तमान समय में डायोफैंटाइन समीकरण कहा जाता है। आर्यभट्टीय पर भास्कर द्वारा की गई व्याख्या में एक उदाहरण इस प्रकार दिया गया है-

वह संख्या ज्ञात करो जिसे 8 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 5 बचता है, 9 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 4 बचता है, 7 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 1 बचता है। अर्थात, बताएं N = 8x+ 5 = 9y +4 = 7z +1. इससे N के लिए सबसे छोटा मान 85 निकलता है। सामान्य तौर पर, डायोफैंटाइन समीकरण कठिनता के लिए बदनाम थे।

इस तरह के समीकरणों की व्यापक रूप से चर्चा प्राचीन वैदिक ग्रन्थ सुल्व सूत्र में है, जिसके अधिक प्राचीन भाग ई.पू.800 तक पुराने हो सकते हैं। ऐसी समस्याओं के हल के लिए आर्यभट्ट की विधि को कुट्टक विधि कहा गया है। कुट्टक का अर्थ है पीसना, अर्थात छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना और इस विधि में छोटी संख्याओं के रूप में मूल खंडों को लिखने के लिए एक पुनरावर्ती कलनविधि का समावेश था।

आज यह कलनविधि, ई.621 में भास्कर की व्याख्या के अनुसार, पहले क्रम के डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करने के लिए मानक पद्धति है, और इसे प्रायः आर्यभट्ट एल्गोरिद्म कहा जाता है। डायोफैंटाइन समीकरणों का उपयोग क्रिप्टोलौजी में होता है। आरएसए सम्मलेन-2006 ने अपना ध्यान कुट्टक विधि और सुल्वसूत्र के पर केन्द्रित किया।

बीजगणित

आर्यभट्टीय में वर्गों और घनों की श्रेणी के रोचक परिणाम दिए हैं।

खगोल विज्ञान

आर्यभट्ट की खगोल विज्ञान प्रणाली औदायक प्रणाली कहलाती थी, श्रीलंका, भूमध्य रेखा पर स्थित है, वहाँ भोर होने से दिन की शुरुआत होती थी। खगोल विज्ञान पर आर्यभट्ट के कुछ लेख, जो द्वितीय मॉडल (अर्ध-रात्रिका, मध्यरात्रि), प्रस्तावित करते हैं, खो गए हैं, परन्तु इन्हें आंशिक रूप से ब्रह्मगुप्त के खण्डखाद्यक में हुई चर्चाओं से पुनः निर्मित किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में वे पृथ्वी के घूर्णन को आकाश की आभासी गति का कारण बताते हैं।

सौर प्रणाली की गतियाँ

आर्यभट्ट मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है। यह श्रीलंका को सन्दर्भित एक कथन से ज्ञात होता है, जो तारों की गति का पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णन करता है-

अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्।

अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लंकायाम्।। (आर्यभट्टीय गोलपाद 9)

अर्थात्- जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है।

अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है-

उदय-अस्तमय-निमित्तम् नित्यम् प्रवहेण वायुना क्षिप्तस्।

लंका-सम-पश्चिम-गस् भ-पंजरस् स-ग्रहस् भ्रमति।।  (आर्यभट्टीय गोलपाद 10)

उनके उदय और अस्त होने का कारण इस तथ्य की वजह से है कि प्रोवेक्टर हवा द्वारा संचालित गृह और एस्टेरिस्म्स चक्र श्रीलंका में निरंतर पश्चिम की तरफ चलायमान रहते हैं। लंका का नाम भूमध्य रेखा पर एक सन्दर्भ बिन्दु के रूप में लिया गया है, जिसे खगोलीय गणना के लिए मध्याह्न रेखा के सन्दर्भ में समान मान के रूप में ले लिया गया था।

आर्यभट्ट ने सौर मंडल के एक भूकेंद्रीय मॉडल का वर्णन किया है जिसमें सूर्य और चन्द्रमा गृहचक्र द्वारा गति करते हैं, जो पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस मॉडल में पितामह-सिद्धान्त पाया जाता है। इसमें प्रत्येक ग्रहों की गति दो ग्रहचक्रों द्वारा नियंत्रित है, एक छोटा मंद (धीमा) ग्रहचक्र और एक बड़ा शीघ्र (तेज) ग्रहचक्र।

पृथ्वी से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम इस प्रकार है- चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूरज, मंगल, बृहस्पति, शनि और नक्षत्र। ग्रहों की स्थिति और अवधि की गणना समान रूप से गति करते हुए बिन्दुओं से सापेक्ष के रूप में की गयी थी, जो बुध और शुक्र के मामले में, जो पृथ्वी के चारों ओर औसत सूर्य के समान गति से घूमते हैं और मंगल, बृहस्पति और शनि के मामले में, जो राशिचक्र में पृथ्वी के चारों ओर अपनी विशिष्ट गति से गति करते हैं।

खगोल विज्ञान के अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह द्वि-ग्रहचक्र वाला मॉडल टॉलेमी के पहले के ग्रीक खगोल विज्ञान के तत्वों को प्रदर्शित करता है। आर्यभट्ट के मॉडल के एक अन्य तत्व सिघ्रोका, सूर्य के सम्बन्ध में बुनियादी ग्रहों की अवधि, को कुछ इतिहासकारों द्वारा एक अंतर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल के चिन्ह के रूप में देखा जाता है।

ग्रहण

आर्यभट्ट ने कहा कि चंद्रमा और ग्रह सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। तत्कालीन मान्यताओं से अलग, जिसमें ग्रहणों का कारक छद्म ग्रह निस्पंद बिन्दु राहू और केतु थे, उन्होंने ग्रहणों को पृथ्वी द्वारा डाली जाने वाली और इस पर गिरने वाली छाया से सम्बद्ध बताया।

इस प्रकार चंद्र-ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है (छंद गोला 37) और पृथ्वी की इस छाया के आकार और विस्तार की विस्तार से चर्चा की (छंद गोला 38-48) और फिर ग्रहण के दौरान ग्रहण वाले भाग का आकार और इसकी गणना की।

बाद के भारतीय खगोलविदों ने इन गणनाओं में सुधार किया, लेकिन आर्यभट्ट की विधियों ने प्रमुख सार प्रदान किया था। यह गणनात्मक मिसाल इतनी सटीक थी कि 18वीं सदी के वैज्ञानिक गुइलौम ले जेंटिल ने, पांडिचेरी की अपनी यात्रा के दौरान पाया कि भारतीयों की गणना के अनुसार 30 अगस्त 1765 के चंद्रग्रहण की अवधि 41 सेकंड कम थी, जबकि उसके चार्ट द्वारा (टोबिअस मेयर, ई.1752) 68 सेकंड अधिक दर्शाते थे।

आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2 प्रतिशत कम है। आर्यभट्ट द्वारा प्रस्तुत यह सन्निकटन ई.200 के यूनानी गणितज्ञ एराटोसथेंनस की संगणना में उल्लेखनीय सुधार था।

नक्षत्रों के आवर्तकाल

समय की आधुनिक अंग्रेजी इकाइयों में जोड़ा जाये तो, आर्यभट्ट की गणना के अनुसार पृथ्वी का आवर्तकाल (स्थिर तारों के सन्दर्भ में पृथ्वी की अवधि) 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सैकंड थी; आधुनिक समय 23 : 56 : 4.091 है। इसी प्रकार, उनके हिसाब से पृथ्वी के वर्ष की अवधि 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट 30 सेकंड, आधुनिक समय की गणना के अनुसार इसमें 3 मिनट 20 सेकंड की त्रुटि है। नक्षत्र समय की धारणा उस समय की अधिकतर खगोलीय प्रणालियों में ज्ञात थी, परन्तु संभवतः यह संगणना उस समय के हिसाब से सर्वाधिक शुद्ध थी।

सूर्य केंद्रीयता

आर्यभट्ट का कहना था कि पृथ्वी अपनी ही धुरी पर घूमती है और उनके ग्रह सम्बन्धी ग्रहचक्र मॉडलों के कुछ तत्व उसी गति से घूमते हैं जिस गति से सूर्य के चारों ओर ग्रह घूमते हैं। इस प्रकार ऐसा सुझाव दिया जाता है कि आर्यभट्ट की संगणनाएँ अन्तर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल पर आधारित थीं, जिसमें ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। एक समीक्षा में इस सूर्य केन्द्रित व्याख्या का विस्तृत खंडन है।

यह समीक्षा बी. एल. वान डर वार्डेन की एक किताब का वर्णन इस प्रकार करती है- ‘यह किताब भारतीय गृह सिद्धांत के विषय में अज्ञात है और यह आर्यभट्ट के प्रत्येक शब्द का सीधे तौर पर विरोध करता है।’

हालाँकि कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि आर्यभट्ट की प्रणाली पूर्व के एक सूर्य केन्द्रित मॉडल से उपजी थी जिसका ज्ञान उनको नहीं था। यह भी दावा किया गया है कि वे ग्रहों के मार्ग को अंडाकार मानते थे, हालाँकि इसके लिए कोई भी प्राथमिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।

हालाँकि सामोस के एरिस्तार्चुस (तीसरी शताब्दी ई.पू.) और कभी कभार पोन्टस के हेराक्लिड्स (चैथी शताब्दी ई.पू.) को सूर्य केन्द्रित सिद्धांत की जानकारी होने का श्रेय दिया जाता है, प्राचीन भारत में ज्ञात ग्रीक खगोल शास्त्र (पौलिसा सिद्धांत- संभवतः अलेक्जेण्ड्रिया वासी) सूर्य केन्द्रित सिद्धांत के विषय में कोई चर्चा नहीं करता है।

विश्व-विज्ञान पर आर्यभट्ट का प्रभाव

भारतीय खगोलीय परंपरा में आर्यभट्ट के कार्य का बड़ा प्रभाव था और इनके अनुवादों ने विश्व की कई संस्कृतियों के ज्ञान को प्रभावित किया। ई.820 के दौरान इसका अरबी अनुवाद विशेष प्रभावशाली था। उनके कुछ परिणामों को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया है और 10वीं सदी के अरबी विद्वान अल्बरूनी द्वारा उनका संदर्भ दिया गया है।

उसने लिखा है कि आर्यभट्ट के अनुयायी मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। साइन (ज्या), कोसाइन (कोज्या) के साथ ही, वरसाइन (उक्रमाज्या) की उनकी परिभाषा, और विलोम साइन (उत्क्रम ज्या), ने त्रिकोणमिति की उत्पत्ति को प्रभावित किया। वे पहले व्यक्ति भी थे जिन्होंने साइन और वरसाइन (कोसएक्स) तालिकाओं को, 0 डिग्री से 90 डिग्री तक 3.75 डिग्री अंतरालों में, 4 दशमलव स्थानों की सूक्ष्मता तक तैयार किया।

आर्यभट्ट की खगोलीय-गणन विधियाँ बहुत प्रभावशाली थीं। त्रिकोणमितिक तालिकाओं के साथ, वे अरब देशों में प्रचलित खगोलीय तालिकाओं (जिज) की गणना के लिए प्रयुक्त की जाती थीं । विशेष रूप से, अरबी स्पेन वैज्ञानिक अल-झर्काली (11वीं सदी) के कार्यों में पाई जाने वाली खगोलीय तालिकाओं का लैटिन में तोलेडो की तालिकाओं (12वीं सदी) के रूप में अनुवाद किया गया और ये यूरोप में सदियों तक सर्वाधिक सूक्ष्म पंचांग के रूप में इस्तेमाल में रही।

आर्यभट्ट और उनके शिष्यों द्वारा की गयी तिथिगणना पंचांग के रूप में भारत में निरंतर व्यवहार में रही है। मुसलमान विद्वानों ने इससे जलाली तिथिपत्र तैयार किया जिसे ई.1073 में उमर खय्याम सहित कुछ खगोलविदों ने प्रस्तुत किया। इसे ई.1925 में संशोधित किया गया जो वर्तमान में ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रचलित है।

जलाली तिथिपत्र अपनी तिथियों का आकलन वास्तविक सौर पारगमन के आधार पर करता है, जैसा आर्यभट्ट ने किया है और उससे पहले के सिद्धांत कैलेंडर में भी प्रयुक्त होता था। इस प्रकार के तिथि पत्र में तिथियों की गणना के लिए एक पंचांग की आवश्यकता होती है। यद्यपि तिथियों की गणना करना कठिन था, पर जलाली तिथिपत्र में ग्रेगोरी तिथिपत्र से कम मौसमी त्रुटियां थीं।

भारत द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा तब महान खगोलज्ञ एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट के सम्मान में उसका नाम भी आर्यभट्ट रखा गया। खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईएस) रखा गया है।

आर्यभट्ट के नाम पर अंतर्विद्यालयीय आर्यभट्ट गणित प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा ई.2009 में खोजी गयी बैक्टीरिया एक प्रजाति का नाम बैसीलस आर्यभट्ट रखा गया है। स्वतंत्र भारत में आर्यभट्ट के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

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