Home Blog Page 136

मोहनदास कर्मचंद गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

0
मोहनदास कर्मचंद गांधी - www.bharatkaitihas.com
मोहनदास कर्मचंद गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

मोहनदास कर्मचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोबंदर में हुआ। उनके पिता कर्मचंद गांधी पोरबंदर, राजकोट और वंकानेर रियासतों के दीवान रहे। गांधीजी ने ई.1914 के बाद भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और देश के स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से राजनीतिक आंदोलनों की एक क्रमबद्ध शृंखला चलाई तथा देश की जनता को बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यक्रमों से जोड़ा। यही उनकी सबसे बड़ी सफलता थी।

मोहनदास कर्मचंद गांधी अपने समय के महान समाज सेवी, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक आंदोलनकारी सिद्ध हुए। भारतीय धर्म एवं संस्कृति की बजाय उनके चिन्तन पर पाश्चात्य चिंतन की छाप अधिक थी। वे हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति पर गर्व करने की बजाय हिन्दू-मुस्लिम एकता पर अधिक बल देते थे। गांधीजी ने इंग्लैण्ड में कानून की पढ़ाई की जिससे उन्हें अंग्रेजी रीति-नीति, ईसाई धर्म तथा वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों का समुचित ज्ञान हो गया।

जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रथम कारावास की सजा भुगत रहे थे तब उन्होंने अमरीकी लेखक हेनरी डेविड थोरू की पुस्तक ‘ऐसे ऑन सिविल डिसओबीडियेन्स’ का अध्ययन किया। उससे प्रेरित होकर ही गांधीजी ने आगे चलकर भारत में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया। बाद में गांधजी ने सिविल डिसओबीडिएंस के स्थान पर ‘सिविल रेजिस्टेन्स’ शब्द का प्रयोग किया।

गांधीजी को टॉल्सटाय की पुस्तक ‘द किंग्डम ऑफ गॉड इज विदिन यू’ ने अत्यधिक प्रभावित किया। गांधीजी ने स्वयं स्वीकार किया है कि अहिंसा में उनकी निष्ठा टॉल्सटाय की पुस्तक से जागृत हुई। गांधीजी के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक विचारों में मूलभूत एकता दिखाई देती है। अतः उनके विचार-दर्शन को समग्र रूप से देखना समीचीन होगा। ब्रिटिश साम्राज्य और पाश्चात्य संस्कृति के विरोध में उनके द्वारा चलाये गए अहिंसात्मक आन्दोलनों ने विश्व राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की।

अहिंसा का विचार भारतीय उपनिषदों में सदियों से मौजूद था, इसलिए गांधीजी प्रथम व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा को श्रेष्ठ कर्म बताया था किंतु गांधीजी प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने अहिंसा और सत्य के आदर्शों का राजनीति में प्रयोग किया। वे कहते थे कि जिस प्रकार धर्म में सत्य का आग्रह होता है उसी प्रकार राजनीति में भी सत्य का आग्रह होना चाहिए। वे राजनीति में हिंसा, असत्य और षड़यन्त्र को अनुचित मानते थे।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का जीवन-वृत्त

गांधीजी का बाल्यकाल

गांधीजी का जन्म गुजरात में पोरबन्दर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर 1869 को हुआ। वे अपने चार भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। गांधीजी की प्राथमिक शिक्षा राजकोट में हुई। उनका लालन-पालन वैष्णव परिवार में हुआ था, किंतु माता पुतलीबाई का परिवार जैन धर्मावलम्बी था, इसलिए गांधीजी के विचारों में जैन-धर्म का प्रभाव दिखाई देता है।

गांधीजी के बचपन की एक घटना उल्लेखनीय है जो उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखी है। वे लिखते हैं कि किस प्रकार उन्होंने बचपन में चोरी की, छुपकर तथा झूठ बोलकर सिगरेट पी तथा मांस भक्षण किया। इन कृत्यों से उनके मन में बराबर संघर्ष चलता रहा। अन्त में उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर इन अपराधों को स्वीकार कर लिया और आग्रह किया कि उन्हें दण्ड दिया जाय।

उन्होंने अपने पत्र में यह भी लिखा कि आगे से वे ऐसा नहीं करेंगे। उनके पिता यह पत्र पढ़कर स्तब्ध रह गए और पिता की आंखों से आंसू छलक आए। ई.1882 अर्थात् 13 वर्ष की आयु में गांधीजी का विवाह कस्तूरबा से हुआ। ई.1887 में गांधीजी ने दसवीं कक्षा उतीर्ण की और कुछ समय बाद कानून की पढ़ाई करने इंग्लैण्ड गए। ई.1891 में वे बैरिस्टर की उपाधि लेकर भारत लौटे।

भारत में उन्होंने वकालात प्रारम्भ की किंतु इसमें उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। वे अब्दुल्ला कम्पनी के कानूनी कार्यों को सम्भालने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। ई.1893 से 1914 तक दक्षिण अफ्रीका ही उनकी कर्मभूमि रही। यहीं पर गांधी चिन्तन और विचारधारा का विकास हुआ।

दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास कर्मचंद गांधी

गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की रंगभेद नीति को अत्यंत निकट से देखा। प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी गांधीजी को सामान सहित डिब्बे से बाहर फैंक दिया गया क्योंकि एशियाई लोग अंग्रेजों के साथ यात्रा नहीं कर सकते थे। ट्रेन चली गई और उन्हें रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सर्दी की रात में खड़े रहना पड़ा। उनके मन में अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार की भावना उत्पन्न हुई।

गांधीजी ने स्वयं इस घटना को अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिकार का प्रारम्भ बिन्दु माना है। उस समय दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी सरकार ने एशियाई लोगों पर अनेक प्रतिबन्ध लगा रखे थे। इन प्रतिबन्धों के कारण श्रमिकों की दशा सबसे खराब थी। अतः गांधीजी ने ट्रांसवाल में रजिस्ट्रेशन अधिनियम के विरुद्ध आवाज उठाई।

इस अधिनियम के अनुसार एशियाई मूल के निवासियों को सरकारी रिकॉर्ड में अपना नाम, अंगूठे का निशान, हस्ताक्षर एवं चित्र दर्ज करवाकर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट प्राप्त करना अनिवार्य था, जबकि गोरे लोगों पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था। गांधीजी ने रंगभेद पर आधारित इस कानून का विरोध किया। उन्होंने भारतीयों को संगठित कर उनका एक संघ बनवाया और उन्हें रजिस्ट्रेशन नहीं करवाने की सलाह दी। सरकारी प्रतिनिधियों के समक्ष एक आम-सभा में रजिस्ट्रेशन कार्डों को जलाया गया।

इस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी द्वारा सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया गया। उन्होंने सत्याग्रह के दौरान स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति से नहीं अपितु व्यवस्था से है। वे अपने विरोधियों और आलोचकों के प्रति भी सद्भावना रखते थे। सत्याग्रह के संघर्ष के दौरान उन्होंने बाताचीत द्वारा समझौते के द्वार सदैव खुले रखे।

भारत में आन्दोलनों का नेतृत्व

ई.1915 में मोहनदास कर्मचंद गांधी भारत लौट आए। दक्षिण अफ्रीका में उनके सफल सत्याग्रह से भारतीय परिचित हो चुके थे। भारत में गांधीजी का ध्यान श्रमिकों की दयनीय स्थिति की ओर गया। ई.1917 में उनहोंने ‘चंपारन’ (बिहार) में नील की खेती करने के लिए बाध्य किए जाने वाले किसानों की स्थिति सुधारने हेतु आन्दोलन किया। उनके इस आन्दोलन के फलस्वरूप किसानों को कुछ रियायतें मिलीं।

इस आन्दोलन के फलस्वरूप लोगों की सोच और मानसिकता में परिवर्तन आया। चांपारन के बाद गांधीजी ने ‘खेड़ा’ में किसानों को लगान में छूट दिलवाने के लिए ‘कर नहीं’ आन्दोलन चलाया और सफलता प्राप्त की। इसी प्रकार ‘अहमदाबाद’ में मिल मजदूरों की मांगों के समर्थन में आमरण-अनशन करके उनकी मांगें पूरी करवाईं।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान गांधीजी ने भारतीयों से हर प्रकार से ब्रिटिश सरकार से सहयोग करने की अपील की। सम्भवतः उन्हें आशा थी कि संकट के समय ब्रिटिश सरकार की सहायता करने पर, युद्ध के बाद भारतीयों की मांगों पर उदार दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। स्वयं गांधीजी ने भारत सरकार को रंगरूटों की भर्ती तथा घायल व्यक्तियों की देखभाल के लिए अपनी सेवाएं दीं।

इन सेवाओं के कारण सरकार ने उन्हें पदक भी दिया किंतु युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया। इससे गांधीजी को बड़ी निराशा हुई, फिर भी गांधीजी ने सहयोग की नीति को नहीं छोड़़ा। ई.1919 के सुधार अधिनियम से यद्यपि समस्त राष्ट्रवादी असन्तुष्ट थे तथापि गांधीजी उस अधिनियम को कार्यान्वित कराने के पक्ष में थे किंतु शीघ्र ही कुछ घटनाएं ऐसी घटित हुईं कि गांधीजी ब्रिटिश सरकार के असहयोगी बन गए।

असहयोग आन्दोलन

रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग नरसंहार, ई.1919 के सुधार अधिनियम की खराब कार्यान्विति से निराश होकर ई.1920 में गांधीजी ने प्रथम देशव्यापी असहयोग आन्दोलन चलाया। गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार से सहयोग नहीं करने के लिए, सरकार द्वारा दी गई उपाधियों का त्याग करने, विधानसभाओं, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी समितियों का बहिष्कार करने का आह्वान किया।

स्वदेशी आन्दोलन को सशक्त बनाने के लिए गांधीजी ने खादी पहनने, सूत कातने, विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना देने, सरकारी नौकरियों एवं सरकारी शिक्षण संस्थाओं का त्याग करने को भी कहा। आन्दोलन में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई, देश भर में जुलूस निकाले गए, प्रार्थना सभाएं व जनसभाएं आयोजित की गईं। इस प्रकार कांग्रेस का आन्दोलन जन-आन्दोलन में परिवर्तित हो गया।

ई.1922 में चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलन ने आचानक हिंसक रूप ले लिया। इससे क्षुब्ध होकर गांधीजी ने आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। गांधीजी के इस कदम से देश भर में गांधीजी के विरुद्ध नाराजगी व्यक्त की गई।  आन्दोलन आरम्भ करने से पहले गांधीजी ने कहा था कि देश को एक वर्ष में स्वराज्य मिल जाएगा, खिलाफत की समस्या का समाधान होगा तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन हो जाएगा किंतु 2 साल के आंदोलन के बावजूद इनमें से एक भी बात पूरी नहीं हुई।

इस आन्दोलन का महत्त्व इस बात में है कि यह विश्व इतिहास में प्रथम अहिंसात्मक जन-आन्दोलन था। गांधीजी के इस प्रयोग से देश में राजनीतिक-जागृति का विस्तार हुआ। गांधीजी खादी के माध्यम से स्वावलम्बन और स्वाभिमान के आदर्शों को प्रतिष्ठित करने में सफल रहे।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन

ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समस्या का समाधान करने के लिए छः सदस्यों का एक दल नियुक्त किया जिसे ‘साइमन कमीशन’ कहते हैं। चूँकि इस कमीशन में एक भी भारतीय नहीं था, इसलिए भारत में इसे ‘व्हाइट कमीशन’ कहा गया और इस आयोग का बहिष्कार किया गया। पूरा देश ‘साइमन वापिस जाओ’ के नारों से गूंज उठा।

देश के प्रत्येक शहर में ‘साइमन गो बैक’ की तख्तियों के साथ जलूस निकाले गए। ई.1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ जिसमें पूर्ण-स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक व्यापक आन्दोलन चलाने का निर्णय लिया गया और गांधीजी को इसका नेतृत्व सौंपा गया। 31 दिसम्बर 1929 को रावी नदी के किनारे राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया तथा 26 जनवरी 1960 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। 

ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया तथा ‘दाण्डी यात्रा’ का आयोजन करके नमक-कानून तोड़ा। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नमक-कानून के उल्लंघन का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। एक अंग्रेज अधिकारी ने गांधीजी का उपहास करते हुए कहा- ‘गांधीजी समुद्र के पानी को केतली में उबाल कर ब्रिटिश साम्राज्य को हटाने की सोच रहे हैं।’

6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दाण्डी के समुद्र-तट पर पहुँचकर नमक-कानून का उल्लंघन किया और इसी के साथ एक भीषण आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। स्थान-स्थान पर नमक-कानून का उल्लघंन किया गया। सरकार ने लगभग 92,000 सत्याग्रहियों को बन्दी बना लिया तथा प्रकाशनों और विभिन्न संगठनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अहिंसात्मक सत्याग्रहियों पर लाठियां और गोलियां चलाई गईं।

5 मई 1930 को गांधीजी को भी बन्दी बना लिया गया। फिर भी आन्दोलन चलता रहा। घरसाना के नमक गोदाम पर शान्तिपूर्ण पिकेटिंग करते हुए अहिंसक जत्थों पर लाठियां बरसाई गईं जिससे अनेक सत्याग्रही घायल हो गए। फिर भी आंदोलनकारी अहिंसक बने रहे। पूर्व के असहयोग आन्दोलन की तुलना में सविनय अवज्ञा आन्दोलन अधिक व्यापक था।

इस आंदोलन में भाग लेने के लिए हजारों स्त्रियों ने पर्दा त्याग दिया। किसान भी इस आन्दोलन से जुड़ गए। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त में सीमान्त गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ के ‘खुदाई खिदमतगार’ के पठानों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

आंदोलन के बीच ब्रिटिश सरकार ने ईस्वी 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया, कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया जिससे सम्मेलन विफल हो गया। जब द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का समय आया तो ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस से समझौते का वातावरण बनाने के लिए गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। 5 मार्च 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन और गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ जिसे ‘गांधी इरविन पैक्ट’ कहा जाता है।

इसके बाद गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया तथा दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया। इस सम्मेलन में सरकार ने भारत में संघीय व्यवस्था को अधार रूप में स्वीकार करते हुए राजनीतिक बन्दियों को रिहा करने का वादा किया।

लोगों में इस बात को लेकर गहरा रोष था कि गांधीजी ने इरविन से हुए समझौते में प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी को आजीवन कारारवास में बदलने के लिए कोई बात नहीं की। सविनय अवज्ञा आन्दोलन से स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय आन्दोलन का आधार अत्यन्त विस्तृत है तथा भारत के संवैधानिक विकास में भारतीयों के सहयोग के बिना कोई कदम उठाना सम्भव नहीं है।

गांधी इरविन समझौते के अनुसार गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के एक मात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने लन्दन गए किंतु सम्मेलन भारत की किसी भी समस्या का समाधान करने में असफल रहा। ई.1932 में गांधीजी खाली हाथ लन्दन से लौट आए। गांधीजी ने भारत लौटते ही वैयक्तिक स्तर पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

ई.1932 में ही सरकार ने ‘साम्प्रदायिक पंचाट’ की घोषणा करके हरिजनों एवं मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने का प्रयास किया। गांधीजी ने इस पंचाट के विरुद्ध जेल में आमरण अनशन आरम्भ कर दिया। अन्त में बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ हुए ‘पूना पैक्ट’ के बाद गांधीजी ने अपना आमरण अनशन समाप्त किया। इसके बाद गांधीजी को रिहा कर दिया गया।

इस समय तक गांधीजी का व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन मन्दा पड़ चुका था। इसलिए ई.1934 में यह आन्दोलन समाप्त कर दिया गया। अब गांधीजी ने हरिजनोद्धार कार्यक्रम का नेतृत्व किया। ई.1935 में ब्रिटिश सरकार ने एक सुधार अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार प्रान्तीय स्वायत्तता की स्थापना की गई तथा भारत में चुनाव करवाए गए। कांग्रेस ने चुनावों में भाग लिया और ग्यारह में से आठ ब्रिटिश-भारतीय प्रान्तों में कांग्रेस ने अपनी सरकारें बनाईं।

भारत छोड़ो आन्दोलन

ई.1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक दलों से पूछे बिना ही भारत को भी युद्ध में धकेल दिया। इसके विरोध में विभिन्न प्रान्तों के कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र दे दिए। ब्रिटिश सरकार इस समय भारतीयों का सहयोग चाहती थी। अतः भारतीयों को कुछ रियायतें देने के लिए ‘अगस्त प्रस्ताव’ की घोषणा की गई किंतु भारतीयों को अगस्त प्रस्ताव स्वीकार्य न होने के कारण संवैधानिक गतिरोध बना रहा।

देश में साम्प्रदायिक समस्या भी बढ़ती रही। 22 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ पारित किया गया तथा सरकार से कहा कि- ‘यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में भारत के लोगों की शान्ति एवं प्रसन्नता चाहती है तो इसका एक मार्ग है कि भारत को स्वतंत्र करने से पहले हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए दो राष्ट्र बनाए जाएं।’

मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका के दबाव के कारण भारतीय समस्या के समाधान के लिए सर-स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। इसे क्रिप्स कमीशन कहा जाता है। भारत की एकता को बनाए रखने की दृष्टि से कांग्रेस ने क्रिप्स प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए। मुस्लिम लीग ने पहले तो क्रिप्स-प्रस्ताव स्वीकार कर लिया किंतु बाद में अस्वीकार कर दिया।

इस बीच द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर पहुँचने लगा और सुभाषचंद्र बोस को भारत में सफलताएं मिलने लगीं। तब गांधीजी ने अंग्रेजों से भारत छोड़़ देने के लिए कहा। बम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया और उसमें ‘भारत छोड़़ो’ प्रस्ताव स्वीकार किया। इस अधिवेशन में गांधीजी ने भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। फिर भी गांधजी ने अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़़ा।

8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव स्वीकार होते ही 9 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व ही सरकार ने गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को बन्दी बना लिया। जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, सादिक अली आदि कांग्रेस के कई नेता भूमिगत हो गए। नेतृत्व के अभाव में तथा सरकारी दमन के फलस्वरूप आन्दोलन हिंसक हो उठा। कई स्थानों पर हिंसा हुई। फरवरी 1943 तक भारत छोड़ो आंदोलन चलता रहा। इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं।

ई.1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया। इसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को ढूंढ-ढूंढ कर फांसी पर चढ़ाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया किंतु आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के समर्थन में भारतीय सेनाओं में विद्रोह हो गए। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते ई.1947 में भारत का विभाजन करके उन्हें भारत एवं पाकिस्तान के रूप में स्वतंत्रता दे दी गई।

विभाजन के बाद मुस्लिम जनसंख्या ने पाकिस्तान वाले क्षेत्रों की ओर तथा हिन्दू जनसंख्या ने भारतीय क्षेत्रों की ओर पलायन किया। इस दौरान स्थान-स्थान पर साम्प्रदायिक दंगे, हिंसा, बलात्कार, लूट एवं आगजनी हुई। देश के नेताओं एवं अंग्रेज अधिकारियों ने साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के प्रयास किए किंतु बड़ी संख्या में लोग मारे गए एवं घायल हुए। बड़ी संख्या में औरतों का सतीत्व भंग किया गया। गांधीजी ने देश की आजादी से पहले बनी अन्तरिम सरकार में भाग नहीं लिया। वे साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का प्रयास करते रहे। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में आयोजित प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गांधजी को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का चिन्तन

मोहनदास कर्मचंद गांधी का अहिंसा का सिद्धान्त

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने राजनीति में दो प्रयोग किए- (1.) सत्य का प्रयोग एवं (2.) अहिंसा का प्रयोग।

जब वे धरना-प्रदर्शन करते थे उसे सत्य के प्रति आग्रह अर्थात् सत्याग्रह कहते थे। अपने आंदोलनों को वे पूरी तरह अहिंसक रखते थे। यदि कोई आंदोलन हिंसक होता हुआ दिखाई देता था, तो वे उस आंदोलन को समाप्त कर देते थे। गांधीजी के अनुसार सच्ची अहिंसा सत्य पर आधारित निर्भीकता है। निर्भीक व्यक्ति ही अहिंसक रह सकता है। अहिंसा के अन्तर्गत बुराई के समक्ष अत्मसमर्पण करना नहीं होता अपितु बुराई के विरोध में अपनी समस्त आत्मिक शक्ति का प्रयोग करना होता है।

गांधीजी का कहना था कि अहिंसा, कायरता नहीं, वीरता है। भारतीय संस्कृति अहिंसा का समर्थन करती है न कि कायरता का। क्योंकि कायरता का अपमानपूर्ण जीवन जीने से तो हिंसा का मार्ग कहीं अधिक श्रेष्ठ है। हिंसा के द्वारा व्यक्ति कम-से-कम अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करने का तो प्रयास करता है। गांधजी भी कायरता और दुर्बलता को अनुचित मानते थे।

गांधीजी का कहना था कि हिंसक व्यक्ति किसी दिन अहिंसक बन सकता है किंतु कायर और दुर्बल व्यक्ति कभी अहिंसक नहीं बन सकता। यदि हम अपनी स्त्रियों तथा धार्मिक स्थानों की अहिंसा के द्वारा रक्षा नहीं कर सकते तो हमें लड़ते हुए रक्षा करनी चाहिए।

गांधीजी के अनुसार अहिंसा और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। यदि साधन की चिन्ता रखी जाए तो साध्य को भी किसी दिन प्राप्त किया जा सकता है। यद्यपि अहिंसा और सत्य का मार्ग कठिन है, फिर भी निरन्तर प्रयासों से इसे आत्मसात् किया जा सकता है। मृत्यु से डरने वाला अहिंसा का प्रयोग नहीं कर सकता। सत्याग्रह अथवा अनशन अहिंसा का महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके प्रयोग से अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन किया जा सकता है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का धर्म और दर्शन

गांधीजी यद्यपि भारतीय संस्कृति पर गर्व करने की बजाय साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने में अधिक विश्वास रखते थे तथापि वे वैष्णव धर्म के सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों पर चलना पसंद करते थे। यद्यपि वे अपनी मेज पर गीता के ऊपर कुरान रखते थे तथापि वे नरसी मेहता के प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जो पीर पराई जाणे रे’ को भी गाते थे और मुंह से ‘राम’ नाम का उच्चारण करते थे।

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने वेद, उपनिषद्, गीता, वेदान्त आदि धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया था। वे ईसाई धर्म से भी प्रभावित थे किंतु हिन्दुओं के मोक्ष-सिद्धांत में भी विश्वास करते थे। वे जीवन में ईश्वर की कृपा को अनिवार्य मानते थे किंतु वे भाग्यवादी नहीं थे।

वे ईश्वर को सृष्टि को रचयिता एवं विश्वव्यापी मानते थे तथा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु भाव रखते थे। गांधीजी के जीवन में ईश्वर की धारणा का बड़ा महत्त्व था। गांधीजी ने सत्य को ही ईश्वर बताया। ऐसा करके वे शायद निरीश्वरवादियों को सनतुष्ट करने का प्रयास करते थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू समाज के समक्ष वेदों की सर्वोच्चता को स्पष्ट किया तथा ‘वेदों की और लौटो’ तथा ‘वेद समस्त सत्य विद्याओं की पुस्तक है’ जैसे नारे दिए किंतु गांधीजी ने कहा- ‘केवल वेद ही श्रेष्ठ नहीं हैं अपितु बाइबिल, कुरान और जिन्दअवेस्ता भी ईश्वरीय ज्ञान हैं।’ उन्होंने हिन्दुओं की सुप्रसिद्ध रामधुन- ‘रघुपति राघव राजा राम’ में ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ तथा ‘चाहे वेद पढ़ो चाहे पढ़ो कुरान’ जैसे शब्द जुड़वाकर वेद और कुरान को एक जैसा पवित्र ग्रंथ घोषित किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि गांधीजी की धार्मिक मान्यताएं उनके राजनीतिक जीवन से प्रेरित थीं। उन्हें सभी लोगों का सहयोग चाहिए था इसलिए वे सभी धर्मों के लोगों को संतुष्ट रखना चाहते थे और उसी कारण किसी धर्म की आलोचना नहीं करते थे तथा कुरान को गीता के ऊपर रखकर मुसलमानों को खुश रखने का प्रयास करते थे।

गांधीजी धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानते थे। उनके अनुसार समस्त धर्म सच्चे हैं। कर्मकाण्ड और अन्धविश्वासों के कारण समस्त धर्मों में थोड़ी बहुत बुराइयां विद्यमान हैं। अतः स्वविवेक के अनुसार धर्म की अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए। वे हृदय परिवर्तन के बिना धर्म परिवर्तन को व्यर्थ मानते थे। धार्मिक सहिष्णुता एवं मैत्रीभाव का अर्थ यह है कि किस प्रकार एक हिन्दू को अच्छा हिन्दू, एक मुसलमान को अच्छा मुसलमान और ईसाई को अच्छा ईसाई बनाया जाए।

गांधीजी के अनुसार धर्म का सार नैतिकता में विद्यमान है। धर्म और नैतिकता एक दूसरे से गुंथे हुए हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। समस्त धर्मों का नैतिक आधार एक जैसा है जिसे हम विश्व-धर्म कह सकते हैं। वे सम्पूर्ण मानवता की आधारभूत एकता में विश्वास करते थे। ईश्वर भक्ति की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति मानव सेवा है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का सत्याग्रह का सिद्धान्त

गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ को ‘सत्य के प्रति आग्रह’ कहा जिसकी शक्ति से हम अपने विरोधी को झुकने पर विवश कर सकते हैं। सत्याग्रह का प्रयोग न केवल व्यक्ति के विरुद्ध अपितु शासन के विरुद्ध भी किया जा सकता है। जब भी कोई व्यक्ति, संस्था, समाज या शासन कोई गलत काम करता हुआ प्रतीत हो तब उसके विरुद्ध हिंसा का प्रयोग न करके अहिंसा का प्रयोग करना चाहिए और वह प्रयोग सत्याग्रह के माध्यम से ही हो सकता है।

दूसरे को दण्ड देने की बजाय, व्रत, उपवास, धरना आदि के माध्यम से स्वयं को दण्ड देना चाहिए। यहाँ तक कि इस दौरान विरोधी द्वारा किए जा रहे बलप्रयोग को भी शांति के साथ सहन करना चाहिए। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह में पराजय का कोई स्थान नहीं है। सत्याग्रह में पराजय का कारण केवल सत्याग्रही की व्यक्तिगत कमजोरी है।

सत्याग्रही को अनिवार्यतः सम्पत्तिहीन होना चाहिए। सत्याग्रही सम्पत्तिशाली हो सकता है, किंतु उसे सम्पत्ति को अपना देवता नहीं मान लेना चाहिए। सत्याग्रही को अपने परिवार से मोह भी त्यागना पड़ता है। सत्याग्रही को यातनाओं से विचलित नहीं होना चाहिए तथा धर्म में पूर्ण आस्था होनी चाहिए। सत्याग्रह अहिंसा का मार्ग है।

हिंसा जंगली पौधों के समान है जो जहाँ-तहाँ स्वयं उग आते हैं किन्तु सत्याग्रह की फसल के लिए स्वयं की प्रेरणा अथवा आत्मप्रवृत्ति रूपी खाद-पानी की आवश्यकता होती है। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का अर्थ केवल कानून की सविनय अवज्ञा तक ही सीमित नहीं है। कई बार सत्याग्रह का अर्थ अवज्ञा न करने पर भी प्रकट होता है।

कुछ विद्वानों और विचारकों ने सत्याग्रह को ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ कहा है तथा इसे दुर्बल व्यक्ति का शस्त्र बताया है। जबकि गांधीजी के अनुसार दुर्बल व्यक्ति का शस्त्र हिंसा एवं शारीरिक बल का प्रयोग होता है। बलवान व्यक्ति का शस्त्र ‘सत्याग्रह एवं अहिंसा’ होता है। गांधीजी विरोधी पर प्रहार करने अथवा उसे दुःख पहुँचाने के स्थान पर स्वयं को कष्ट देने में विश्वास करते थे।

निष्क्रिय प्रतिरोध में प्रेम का कोई स्थान नहीं होता जबकि सत्याग्रह प्रेम के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सत्याग्रही स्वयं को कष्ट पहुँचाकर अपने विरोधी पर विजय प्राप्त कर सकता है। गांधीजी के अनुसार व्यक्तिगत हितों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह नहीं किया जा सकता। गांधीजी ने सत्याग्रह करने से पहले अन्य उपायों को प्रयुक्त करने की सलाह दी है।

जब सारे उपाय विफल हो जाएं तभी सत्याग्रह किया जाना चाहिए। सत्याग्रही अपने हृदय को टटोलने में विश्वास करता है ताकि जिन बुराइयों के विरुद्ध वह संघर्ष कर रहा है, वे बुराईयां उसमें विद्यमान न हों। सत्याग्रही के लिए रचनात्मक कार्य करना आवश्यक है। उसे चरखा, खादी, छुआछूत का अन्त, मद्य निषेध, हिन्दू तथा मुसलमानों के मध्य मैत्री सम्बन्धों के रचनात्मक कार्यों का अनुभव एवं प्रशिक्षण होना अनिवार्य है। आमरण अनशन सत्याग्रही का अन्तिम शस्त्र है।

मोहनदास कर्मचंद गांधी का सामाजिक चिन्तन

गांधीजी अपने समय के महान सामाजिक चिंतक थे। वे जितने बड़े राजनीतिज्ञ थे, उससे कहीं अधिक बड़े समाज-सुधारक थे। उनका समाज-सुधार केवल वाणी-विलास तक सीमित नहीं था अपितु रचनात्मक-कार्यक्रमों पर आधारित था। उन्होंने भारतीय समाज की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। हिन्दु-मुस्लिम एकता, स्त्री-शिक्षा, स्त्रियों की स्थिति में सुधार, हरिजनोद्धार, मद्य-निषेध, राष्ट्रीय शिक्षा, ग्राम सुधार आदि सभी विषयों ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे गांवों में जाकर लोगों के बीच कार्य करें तथा उनकी सेवा करें।

हरिजन-उद्धार के लिए मोहनदास कर्मचंद गांधी जीवन भर संकल्पबद्ध रहे। वे हरिजनों के प्रति समाज के व्यवहार को बदलना चाहते थे तथा हरिजनों को हिन्दू समाज का अभिन्न अंग मानते थे। उस काल में हरिजनों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी तथा उन्हें अस्वास्थ्यकर परिवेश में रहना पड़ता था। हिन्दू होते हुए भी उन्हें मन्दिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता था और उनके लिए सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं एवं स्कूलों का उपयोग करना वर्जित था।

गांधीजी ने हरिजनोद्धार कार्यक्रमों को सवर्णों के बल पर चलाना चाहा, उन्होंने इन कार्यक्रमों में हरिजनों की भागदारी सुनिश्चित नहीं की। गांधीजी का कहना था कि हरिजन इतने कमजोर हैं कि वे स्वयं अपने अधिकारों की मांग नहीं कर सकते। अतः उनके प्रति होने वाले अन्याय का विरोध उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो अन्याय करने वाले समूह के सदस्य हैं। गांधीजी ने सवर्णों के मन से हरिजनों के प्रति घृणा, भेदभाव, अस्पश्र्यता की भावना समाप्त करने का प्रयास किया और हरिजनों के मन से हीनता का भाव मिटाने का प्रयास किया।

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने जाति-व्यवस्था का और साम्प्रदायिकता का विरोध किया तथा इन बुराइयों को मिटाने के लिए अन्तर्जातीय तथा अन्तर्धर्मीय विवाहों का समर्थन किया। गांधीजी के पिता यद्यपि तीन रियासतों के दीवान रहे तथा गांधीजी का पालन-पोषण रियासती परिवेश में हुआ तथापि गांधीजी लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के पक्षधर थे। इस कारण गांधीजी ने जीवन भर राजशाही और सामन्तशाही का विरोध किया।

गांधीजी ने समाज में व्याप्त मद्यपान का बहुत विरोध किया। उनके कार्यकर्ताओं ने स्थान-स्थान पर धरने देकर शराब की दुकानें बंद करवाईं। वे सरकार द्वारा मद्य-विक्रय पर कर लगाने को बुरा मानते थे। क्योंकि इसकी आड़ में सरकार मद्य-सेवन को बढ़ावा देती है। नैतिकता की दृष्टि से गांधीजी आबकारी-राजस्व को सबसे निम्न श्रेणी का राजस्व मानते थे।

गांधीजी ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए रचनात्मक सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया तथा स्त्रियों को पुरुषों के समान ही देश-सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया। गांधीजी के इस आह्वान को राष्ट्र-व्यापी समर्थन मिला। सहस्रों स्त्रियां स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के लिए आगे आईं तथा उन्होंने पुलिस की लाठी-गोली खाने और जेल जाने से भी परहेज नहीं किया। गांधीजी ने पुरुषों और स्त्रियों के लिए समान अधिकारों एवं समान अवसरों का समर्थन किया।

गांधीजी बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। वे चाहते थे कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह नहीं करना चाहिए किंतु वे ऐसी वयस्क विधवाओं के पुनर्विवाह के विरोधी थे जिनके बाल-बच्चे हों। गांधीजी प्रौढ़ विधुर के पुनर्विवाह का समर्थन नहीं करते थे।

 गांधीजी ने पर्दा-प्रथा का भी घोर विरोध किया। वे बुर्का पहनने वाली मुस्लिम औरतों से बात करने में संकोच नहीं करते थे। गांधीजी दहेज-प्रथा के भी विरोधी थे। उनके अनुसार दहेज-प्रथा ने मध्यम वर्गीय तथा निम्न आय वाले परिवारों को नारकीय जीवन बिताने के लिए विवश कर दिया था। अतः उन्होंने विवाह की रीति को सरल एवं सादा बनाने तथा विवाह के भोज पर अधिक धन के अपव्यय को रोकने के सम्बन्ध में भी विचार व्यक्त किए।

गांधीजी अपने पास आने वाले नव-दम्पत्ति को गीता की प्रति भेंट करते थे। गांधीजी कई मामलों में स्त्रियों को पुरुषों से श्रेष्ठ मानते थे। गांधीजी के अनुसार अहिंसक संघर्ष में स्त्रियोचित धैर्य, सहिष्णुता और कष्ट सहने की मूक क्षमता ऐसे गुण थे जिनके कारण स्त्रियां सत्याग्रह आन्दोलन को पुरुषों सें अधिक सफलतापूर्वक संचालित कर सकती थीं। गांधीजी स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले सौन्दर्य-प्रसाधनों के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि इनके माध्यम से स्त्रियों को पुरुषों के मनोरंजन का साधन बनाया जाता है। 

गांधीजी का आदर्श राज्य

गांधीजी मानव समाज के लिए राज्य-विहीन व्यवस्था चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि एक आदर्श समाज को अपने संस्कारों के बल पर जीवित रहना चाहिए न कि राज्य की दण्डात्मक एवं हिंसात्मक व्यवस्था के नीचे दबकर। इसलिए समाज में किसी राजनीतिक संस्था अर्थात् राज्य या सरकार की कोई आश्वयकता नहीं होनी चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए अपने कत्र्तव्यों का पालन करे तथा दूसरों के साथ सहयोग करे तो किसी को भी सरकार, पुलिस, जेल, दण्ड व्यवस्था आदि की आवश्यकता नहीं होगी।

ऐसी व्यवस्था में सामाजिक जीवन बाह्य नियंत्रणों से मुक्त होगा तथा आन्तरिक नैतिक नियंत्रणों द्वारा संचालित होगा। गांधीजी ने आदर्श समाज की कल्पना को कार्यान्वित करने के लिए एक आदर्श राज्य का स्वरूप भी प्रस्तुत किया। गांधीजी ने आदर्श राज्य व्यवस्था को ‘रामराज्य’ कहा।

रामराज्य में भूमि और राज्य जनता का होता है, न्याय शीघ्र और सस्ता होता है तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने तरीके से पूजा-प्रार्थना, स्वतंत्र विचाराभिव्यक्ति और लेखन की स्वतंत्रता होती है।

गांधीजी ने कहा- ‘मैं एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए कार्यरत रहूँगा जिसमें गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह अनुभव करे कि यह उसका अपना देश है, जिसके निर्माण में उसकी प्रभावशाली भूमिका है, एक ऐसा भारत जिसमें जनता का कोई उच्च वर्ग और कोई नीच वर्ग नहीं होगा, ऐसा भारत जिसमें समस्त जातियाँ परस्पर एकता और सद्भाव के स्नेह-सूत्र में बंधी हुई मिल-जुल कर रहेंगी। ऐसे सुन्दर भारत में अस्पृश्यता, मद्यपान और नशीली वस्तुओं के सेवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा। महिलाओं को भी वही अधिकार प्राप्त होंगे जो पुरुषों को प्राप्त हैं। मेरे सपनों के भारत का यही स्वरूप है।’

मोहनदास कर्मचंद गांधी के आदर्श समाज में भारी वाहनों, न्यायालयों, वकीलों, आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों तथा महानगरों की विसंगतियों का कोई स्थान नहीं था। अहिंसक समाज में बड़े उद्योगों तथा सेना की आवश्यकता न रहने के कारण भारी वाहनों का उपयोग नहीं होगा, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वाणिज्य नहीं होने के कारण औद्योगीकरण के समस्त उपकरणों को त्यागना होगा।

प्रजा के अहिंसक होने तथा पारस्परिक विवाद नहीं होने के कारण न्यायालयों तथा वकीलों की आवश्यकता नहीं होगी, स्वयं व्यक्ति द्वारा अपने आन्तरिक इन्द्रिय-निग्रह के कारण सामान्य रोगों से मुक्ति मिल जाएगी। यौगिक क्रियाओं द्वारा मानसिक, नैतिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकेगी। इन सबके कारण व्यावसायिक चिकित्सकों की आवयकता ही नहीं रहेगी।

इस प्रकार मोहनदास कर्मचंद गांधी के आदर्श समाज में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से लेकर मंत्रियों, उद्योगपतियों, व्यवसाइयों, न्यायाधीशों, वकीलों, थानेदारों एवं डॉक्टरों आदि की आवश्यकता नहीं थी। बहुत से आलोचकों ने इसे अव्यावहारिक कल्पना बताया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

सुभाष चन्द्र बोस का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

0
सुभाष चन्द्र बोस - www.bharatkaitihas.com
सुभाष चन्द्र बोस

भारत की राजनीति में सुभाष चन्द्र बोस अकेले ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने राष्ट्रसेवा के लिए विभिन्न मोर्चों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने समय की कठिनतम आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण की, एक कॉलेज के प्रिंसीपल रहे, एक विशाल सशस्त्र सेना की स्थापना की और उसके अध्यक्ष रहे, वे सैनिक के रूप में युद्ध के मोर्चों पर लड़े और नेता के रूप में कांगे्रस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

सुभाष चन्द्र बोस ने जापान, जर्मनी और बर्मा आदि देशों से अंतरर्राष्ट्रीय संधियां कीं और आजादी से पहले ही भारत के लिए एक सरकार की स्थापना भी की। एक व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में रहकर जितने भी रूपों में भारत की सेवा कर सकता है, उन्होंने की। वे गांधीजी के सबसे बड़े विरोधी रहे किंतु गांधाजी को सबसे पहले राष्ट्रपिता भी उन्होंने ही कहा।

सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। पांच वर्ष की आयु में उन्हें अंग्रेजी स्कूल भेजा गया। स्कूल में भारतीय बच्चों से कहा जाता था कि भारतीय होने के कारण वे कुछ छात्रवृत्ति परीक्षाओं में नहीं बैठ सकते, यद्यपि वार्षिक परीक्षाओं में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इससे सुभाषचन्द्र बोस ने अनुभव किया कि एक ही संस्था में पढ़ते हुए उन्हें और बच्चों से नीचा समझा जाता है।

जब वे भारतीय स्कूल में पढ़ने गए तब उन पर स्कूल के प्रधानाध्यापक बेनीमाधव प्रसाद के उच्च चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ा। उन पर दूसरा प्रभाव स्वामी विवेकानन्द के भाषणों एवं लेखों का था। इससे उनकी आत्मा को नई चेतना प्राप्त हुई। वे देश एवं मानवता की सेवा की ओर अग्रसर हुए। उनके माता-पिता ने उन्हें जितना अधिक नियंत्रण में रखने का प्रयास किया, वे उतने ही अधिक विद्रोही होते चले गए।

ई.1913 में 15 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण की तथा सम्पूर्ण विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद वे कलकत्ता के प्रसीडेन्सी कॉलेज में प्रविष्ट हुए। उस समय कलकत्ता में क्रांतिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं तथा कॉलेज का छात्रावास क्रांतिकारियों का मिलन स्थल बना हुआ था।

एक ओर अंग्रेजों की दमनकारी नीति ने सुभाष की राजनीतिक चेतना को झकझोरा तो दूसरी ओर प्रथम विश्व युद्ध ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि जिस राष्ट्र के पास सैनिक शक्ति नहीं है वह अपनी आजादी की रक्षा करने की आशा नहीं कर सकता। ई.1919 में सुभाषचन्द्र ने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। अगले ही वर्ष ई.1920 में उन्होंने इंग्लैण्ड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा दी।

सुभाष इस परीक्षा में सफल रहे किंतु उनका मन विदेशी सरकार की गुलामी करने को तैयार नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने नौकरी नहीं की। ई.1921 में उन्होंने बम्बई जाकर गांधीजी से भेंट की। उस समय गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन छेड़ रखा था। गांधीजी ने उनसे इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए कहा किंतु सुभाषचंद्र को यह कार्यक्रम प्रभावित नहीं कर सका। वे पुनः कलकत्ता लौट आए।

कुछ दिन बाद सुभाष बाबू देशबन्धु चितरंजन दास से मिले। उनसे मिलने पर उन्होंने अनुभव किया कि उन्हें एक योग्य नेता मिल गया है। जब तक देशबन्धु चितरंजनदास जीवित रहे, सुभाष बाबू उनके सहयोगी के रूप में कार्य करते रहे। असहयोग आंदोलन में जब गांधीजी के आह्वान पर बहुत से छात्रों ने कॉलेज छोड़़ दिया, तब उनकी शिक्षा के लिए देशबन्धु चितरंजन दास ने एक राष्ट्रीय कॉलेज की स्थापना की और सुभाष बाबू को उसका प्रिंसीपल बनाया।

कुछ समय बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली। यद्यपि सुभाष चंद्र वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे किंतु इस समय कांग्रेस में विभिन्न विचारधाराओं के लोग सदस्य होते थे, वामपंथी भी बड़ी संख्या में कांगे्रस में थे।

आन्दोलनकारी सुभाष

ई.1921 में प्रिन्स ऑफ वेल्स ने भारत की यात्रा की। उसकी यात्रा के बहिष्कार एवं विरोध के लिए देशव्यापी आन्दोलन की रूपरेखा बनाई गई तथा कलकत्ता के आंदोलन का नेतृत्व सुभाष बाबू को सौंपा गया। 10 दिसम्बर 1921 को ब्रिटिश सरकार ने देशबन्धु चितरंजन दास, सुभाष चन्द्र बोस तथा उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। कुछ दिनों बाद उन्हें रिहा किया गया।

ई.1922 में चैरीचैरा काण्ड होने पर गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। इस पर 1 जनवरी 1923 को चित्तरंजन दास, नरसिंह चिंतामन केलकर, मोतीलाल नेहरू और बिट्ठलभाई पटेल ने कांग्रेस छोड़कर स्वराज पार्टी का निर्माण किया। चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव बनाये गये। देशबन्धु चित्तरंजन दास ने स्वराज्य पार्टी का एक समाचार-पत्र ‘फारवर्ड’ आरम्भ किया और सुभाष बाबू को इस समाचार-पत्र का मैनेजर नियुक्त किया।

 मार्च 1924 में स्वराज्य पार्टी को कलकत्ता नगर निगम के चुनाव में भारी सफलता प्राप्त हुई और देशबन्धु चितरंजन दास नगर निगम के मेयर बने, तब उन्होंने सुभाष बाबू को कार्यपालक अधिकारी नियुक्त किया।

जून 1925 में चितरंजनदास की मृत्यु हो गई और सुभाष बाबू अकेले पड़ गए। इसका लाभ उठाकर अंग्रेजस सरकार ने अक्टूबर 1925 में सुभाष बाबू को एक क्रांतिकारी षड्यन्त्र करने के झूठे आरोप में गिरफ्तार करके मांडले भेज दिया। वे लगभग ढाई वर्ष तक जेल में रहे। मई 1927 में उन्हें रिहा किया गया। इस समय तक स्वराज्य पार्टी भी समाप्त हो चुकी थी। अतः सुभाष फिर से कांग्रेस में सक्रिय हो गए और उन्हें बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का प्रधान निर्वाचित किया गया।

कांग्रेस में वामपंथियों का प्रभाव

ई.1925 में सुभाष बाबू को पहली बार कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में शामिल किया गया तथा उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया। ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के सम्बन्ध में सुझाव देने के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया। भारत में इस आयोग का जबर्दस्त विरोध किया गया क्योंकि इस आयोग में एक भी सदस्य भारतीय नहीं था। सुभाष बाबू ने बंगाल में कमीशन के विरुद्ध किए गए प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

दिसम्बर 1928 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष बाबू का गांधीजी से वैचारिक संघर्ष हुआ। इस अधिवेशन में ‘नेहरू रिपोर्ट’ पर विचार किया गया जिसमें ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’ की मांग की गई थी। सुभाषचंद्र तथा उनके वामपंथी साथियों ने ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ का प्रस्ताव रखा। गांधीजी ने प्रस्ताव रखा कि यदि दिसम्बर 1929 तक ब्रिटिश सरकार भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा नहीं देती है तो कांग्रेस एक अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलायेगी।

इस पर सुभाष बाबू ने इसमें संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता से कम किसी भी दर्जे से सनतुष्ट नहीं होगी। यह संशोधन के विरोध में 1,350 तथा पक्ष में 973 मत आए। इस प्रकार सुभाष बाबू का प्रस्ताव तो गिर गया किंतु गांधजी एवं उनके साथियों को कांग्रेस के भीतर उभर चुकी सुभाष बाबू की शक्ति का पता लग गया।

एक वर्ष बाद पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में वामपंथियों ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव बड़े आराम से पारित करवा लिया। इसके बाद सुभाष चंद्र स्वाधीनता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेता माने जाने लगे।

ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया जिसमें सुभाषचन्द्र बोस ने बड़े उत्साह से भाग लिया। सुभाष बाबू को बन्दी बना लिया गया और गांधी-इरविन पैक्ट के बाद उन्हें रिहा किया गया। दूसरे गोलमेज सम्मेलन से लौटकर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की। इस बार भी सुभाष बाबू को गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। ऐसी स्थिति में उन्हें वियना जाकर इलाज कराने की अनुमति मिल गई।

सुभाष चन्द्र बोस का गांधीजी से तीव्र मतभेद

19 से 21 फरवरी 1938 तक गुजरात के सूरत जिले के हरिपुरा गांव में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें सुभाष बाबू को निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया। यद्यपि गांधीजी और सुभाष बाबू के बीच, कांग्रेस की नीति व कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद थे किन्तु वामपंथियों का प्रभाव देखकर किसी ने सुभाष बाबू का विरोध नहीं किया।

ई.1938 में सुभाष बाबू ने भरसक प्रयत्न किया कि जिन्ना से सुलह हो जाए और सारा राष्ट्र एक हो जाए ताकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का कारगर ढंग से विरोध कर सकें किन्तु जिन्ना टस से मस नहीं हुआ। सुभाष बाबू चटगांव गए तो मुस्लिम लीगियों ने उन पर एवं अन्य कांग्रेसियों पर पथराव किया जिससे सुभाष बाबू को चोटें आई और चैदह अन्य कांग्रेसी भी घायल हुए। सुभाषचंद्र ने जनता से अपील की कि वे धैर्य और आत्म-संयम से काम लें और घृणा की बजाय प्रेम का रास्ता अपनाएं।

सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया और इंग्लैण्ड भी जर्मन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गया। इस अवसर पर गांधीजी व सुभाष बाबू के मतभेद खुलकर सामने आए। सुभाष बाबू का मानना था कि ‘इंग्लैण्ड का संकट भारत के लिए अवसर है’ किंतु गांधीजी इंग्लैण्ड के संकट को भारत के लिए अवसर नहीं समझते थे तथा इस संकट में वे अंग्रेज सरकार से सहयोग करना चाहते थे।

ये मतभेद निरन्तर बढ़ते ही गए। उसी वर्ष कांग्रेस का त्रिपुरा अधिवेशन हुआ। इसमें सुभाष बाबू को पुनः कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़ा किया गया। गांधीजी तथा उनके साथी नहीं चाहते थे कि सुभाष बाबू पुनः अध्यक्ष बनें। उन्होंने पट्टाभिसीतारमैया को सुभाष बाबू के सामने खड़ा कर दिया। गांधजी ने सुभाष बाबू के विरुद्ध एढ़ी-चोटी को जोर लगा दिया किंतु पट्टाभि सीतारमैया हार गए।

गांधीजी ने हार से तिलमिलाकर कहा- ‘अब मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि कांग्रेस के प्रतिनिधि उन सिद्धन्तों और नीतियों को नहीं मानते जिनका मैं समर्थन करता हूँ।’ गांधीजी ने सुभाष का विरोध क्यों किया?

कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में सुभाष बाबू की जय-जयकार हुई तो गांधीजी ने एक वक्तव्य दिया- ‘जो लोग कांग्रेस में रहना पसंद नहीं करते वे बाहर आ सकते हैं।’

गांधीजी के संकेत पर कांग्रेस कार्य-समिति के 15 सदस्यों ने यह कहकर अपने पदों से त्याग-पत्र दे दिया कि सुभाष बाबू अपनी इच्छानुसार कार्य-समिति गठित कर लें। सुभाष बाबू नहीं चाहते थे कि कांग्रेस में फूट पड़े। इसलिए उन्होंने गांधी, नेहरू, कृपलानी आदि से बात करके मतभेद दूर करने का प्रयास किया किंतु कोई परिणाम नहीं निकला।

गांधीजी के समर्थकों ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि सुभाष बाबू, गांधीजी की इच्छानुसार कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य मनोनीत करें। गांधीजी एवं सुभाषचंद्र में मतैक्य नहीं हो सका। इधर सुभाष बाबू अस्वस्थ होने के कारण अधिवेशन में भाग नहीं ले सके। विषय समिति की बैठक में उन्हें स्ट्रेचर पर लाया गया।

सुभाष बाबू ने प्रस्ताव रखा कि ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दे देना चाहिए कि- ‘यदि छः महीने में ब्रिटिश सरकार भारत को आजाद नहीं करती है तो भारत युद्ध के अवसर का लाभ उठाकर ब्रिटिश विरोधी शक्तियों से सैनिक सहायता ले लेगा।’

गांधीजी ने इस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध किया। अतः यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग-पत्र दे दिया।

फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन

कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग-पत्र देने के बाद सुभाष बाबू ने कांग्रेस में ही रहकर ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक एक अलग दल बनाया। सुभाष ने फॉरवर्ड ब्लाक के तीन प्रमुख उद्देश्य बताए- (1.) देश की आजादी के लिए तेजी से कार्य करना, (2.) गांधी गुट के नेतृत्व को समाप्त करना, (3.) समझौते का कड़ा विरोध करना।

सुभाष बाबू ने कहा कि- ‘फारवर्ड ब्लॉक श्री गांधी के व्यक्तित्त्व और अहिंसात्मक असहयोग के उनके सिद्धान्त को पूरा सम्मान देता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस के मौजूदा हाई कमान में भी अपनी निष्ठा बनाए रखे।’

कांग्रेस के समस्त पदों से च्युत

एक तरफ सुभाष बाबू कांग्रेस की एकता के लिए कार्य कर रहे थे किंतु दूसरी तरफ गांधीजी के समर्थक सुभाष बाबू को पूरी तरह कांग्रेस से निकाल देना चाहते थे। कांग्रेस के नए अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सुभाष बाबू से उनकी गतिविधियों के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण पूछा।

सुभाष बाबू ने अपने जवाब में सब कुछ स्पष्ट कर दिया किन्तु फिर भी सुभाष बाबू को कांग्रेस के समस्त पदों से हटाकर मात्र चार आने वाला सामान्य सदस्य रहने दिया गया। इस प्रकार सुभाष कांग्रेस-संगठन से अलग कर दिए गए। निःसंन्देह संगठन में यह कार्य लोकतन्त्र की भावना के विरुद्ध था तथा सुभाषचंद्र को अपमानित करने वाला था।

सुभाष चन्द्र बोस की गिरफ्तारी और जर्मनी पहुँचना

द्वितीय विश्व-युद्ध के सम्बन्ध में सुभाषचंद्र बोस की स्पष्ट धारणा थी कि-

(1.) विश्व-युद्ध में ब्रिटेन पराजित होगा और ब्रिटिश साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

(2.) विषम परिस्थतियाँ होते हुए भी ब्रिटेन भारतीय जनता को अधिकार हस्तांतरित नहीं करेगा और भारतीयों को अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ना होगा।

(3.) यदि भारत ने युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध भाग लिया और जो राष्ट्र ब्रिटेन से लड़ रहे हैं उनसे सहयोग किया तो भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर लेगा।

फॉरवर्ड ब्लॉक ने सुभाष बाबू के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध जंग की तैयारियां आरम्भ कर दीं। सरकार ने सुभाष को एक खतरनाक क्रांतिकारी मानकर 2 जुलाई 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इस पर उन्होंने सरकार को अल्टीमेटम दिया- ‘मेरी गिरफ्तारी का कोई नैतिक कानूनी आधार नहीं है और यदि मुझे तुरन्त रिहा नहीं किया गया तो मैं अनशन करूंगा।’

सरकार ने इस अल्टीमेटम की कोई परवाह नहीं की। इस पर 29 नवम्बर 1940 को सुभाषचंद्र ने अनशन आरम्भ कर दिया। उन्होंने बंगाल के गवर्नर को लिखा- ‘व्यक्ति को मरना चाहिए ताकि राष्ट्र जिंदा रह सके। आज मुझे मरना चाहिए ताकि भारत अपनी आजादी और गौरव प्राप्त कर सके।’

कुछ दिनों के अनशन के बाद सुभाष की स्थिति बिगड़ गई। इस पर सरकार ने उन्हें जेल से रिहा करके उनके ही घर में नजरबंद कर दिया। लगभग 40 दिनों तक सुभाष अपने शयनकक्ष से बाहर नहीं निकले। अचानक एक दिन भारत और ब्रिटेन के लोग यह सुनकर स्तम्भित रह गए कि ब्रिटिश सरकार के कड़े पहरे के बावजूद सुभाषचंद्र पुलिस को चकमा देकर भाग गए।

सुभाषचंद्र वेश बदलकर काबुल पहुँचे, कुछ दिन वहाँ रहने के बाद वे मास्को गए और वहाँ से 28 मार्च 1941 को बर्लिन के लिए रवाना हो गए। बर्लिन में जर्मनी के विदेश मन्त्री रिबेनट्राप ने सुभाषचंद्र का स्वागत किया और जर्मनी के रेडियो द्वारा ब्रिटेन के विरुद्ध अपने विचारों को प्रसारित करने की अनुमति दी। नवम्बर 1942 में सुभाषचंद्र ने जर्मनी रेडियो से अपना सन्देश प्रसारित किया। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर का पलड़ा भारी था। हिटलर ने सुभाष बाबू को भारत के स्वाधीनता संग्राम में सहायता देने का आश्वासन दिया।

सुभाष चन्द्र बोस का दक्षिण-पूर्वेशिया में आगमन

जून 1942 में रासबिहारी बोस ने सुभाषचंद्र बोस को पूर्वी एशिया में आने तथा उनके द्वारा स्थापित आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सम्भालने का निमन्त्रण दिया। सुभाष बाबू 8 फरवरी 1943 को एक जर्मन यू-बोट से फ्रेकेन बर्ग से रवाना होकर मेडागास्कर होते हुए समुद्र में 400 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक जापानी पनडुब्बी में बैठकर सुमात्रा के उत्तर में स्थित साबन द्वीप पहुंचे।

यहाँ उनके पुराने परिचित कर्नल यामामोटो ने जापान सरकार की ओर से उनका स्वागत किया। वहाँ से चलकर सुभाष बाबू 16 मई 1943 को हवाई जहाज से टोकियो पहुंचे। नेताजी के टोकियो पहुँचने के पूर्व ही जर्मनी कई मोर्चों पर पराजित हो चुका था और मित्र राष्ट्रों की स्थिति सुदृढ़ होती जा रही थी। सुभाषचन्द्र बोस ने टोकियो में जापान के प्रधानमंत्री तोजो से लम्बी बातचीत की।

प्रधानमंत्री तोजो, सुभाष के व्यक्तित्व तथा उनकी बातचीत से बहुत प्रभावित हुआ और उसने जापानी संसद (डीट) में घोषणा की कि- ‘जापान ने दृढ़ता के साथ फैसला किया है कि वह भारत से अँग्रेजों को; जो भारतीय जनता के दुश्मन हैं, निकाल बाहर करने और उनके प्रभाव को खत्म करने के लिये सब तरह की सहायता देगा तथा भारत को वास्तविक अर्थ में पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने में समर्थ बनायेगा।’

भारतीयों के लिये सुभाष चन्द्र बोस के मर्मस्पर्शी संदेश

2 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर पहुंचे जहाँ उनका शानदार स्वागत किया गया। 4 जुलाई को कैथे सिनेमा हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में उन्होंने विधिवत् ढंग से आजाद हिन्द फौज का अध्यक्ष पद ग्रहण किया। ले. कर्नल के. भौंसले ने सैनिकों की तरफ से उनका अभिनन्दन किया।

इस अवसर पर नेताजी ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाने और आजाद हिन्द फौज को लेकर हिन्दुस्तान जाने की घोषणा की। 5 जुलाई 1943 को सुभाष बाबू ने आजाद हिन्द फौज के पुनर्निर्माण की घोषणा की तथा सेना का निरीक्षण किया।

इस अवसर पर उन्होंने कहा- ‘यह केवल अँग्रेजी दासता से भारत को मुक्त कराने वाली सेना नहीं है, अपितु बाद में स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रीय सेना का निर्माण करने वाली सेना भी है। साथियों आपके युद्ध का नारा हो- चलो दिल्ली, चलो दिल्ली। इस स्वतन्त्रता संग्राम में हम में से कितने जीवित बचेंगे, यह मैं नहीं जानता परन्तु मैं यह जानता हूँ कि अन्त में विजय हमारी होगी और हमारा ध्येय तब तक पूरा नहीं होगा जब तक हमारे शेष जीवित साथी ब्रिटिश साम्राज्य की एक अन्य कब्रगाह- लाल किले पर विजयी परेड नहीं करेंगे।’

सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से भारतीयों के नाम मर्मस्पर्शी संदेश दिया- ‘एक वर्ष से मैं मौन एवं धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कर रहा था। वह घड़ी आ पहुंची है कि मैं बोलूँ। ब्रिटिश दासता से भारतीयों को मुक्ति मिल सकती है- उन अँग्रेजों से जिन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से अब तक हमें गुलाम बना रखा है। ब्रिटिश साम्राज्य के शत्रु हमारे स्वाभाविक मित्र हैं। समस्त भारतीयों की ओर से मैं घोषणा करता हूँ कि ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक भारत आजाद न हो जाये।’

उन्होंने भारतीयों से अपील की- ‘दिल्ली चलो। यह रास्ता खून, पसीने और आंसू से भरा हुआ है……।’

लोकप्रिय नारों का निर्माण

भारत की आजादी के लिये भारतीयों को जागृत करने के उद्देश्य से सुभाष बाबू ने संसार के सर्वश्रेष्ठ नारों का निर्माण किया। उनका विश्वविख्यात उद्घोष जयहिंद पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनका दूसरा नारा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ दिल्ली चलो नारा भी खूब लोकप्रिय हुआ।

सफलताओं एवं असफलताओं पर बोलते हुए एक बार सुभाषचंद्र बोस ने कहा था- अस्थाई असफलता से हताश न हों। दुनिया की कोई ताकत भारत को गुलाम नहीं रख सकती।

अस्थायी भारत सरकार का गठन

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वतन्त्र भारत के अस्थायी मन्त्रिमण्डल का गठन किया जिसमें कप्तान लक्ष्मी स्वामीनाथन सहित कई लोगों को मंत्री बनाया गया। 23 अक्टूबर को सुभाषचन्द्र बोस ने भारत की अस्थायी सरकार की तरफ से ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

कुछ दिनों के अन्दर ही धुरी राष्ट्रों- जर्मनी, जापान और इटली तथा उनके प्रभाव के अन्तर्गत काम करने वाली सरकारों- स्याम, बर्मा, फिलिपीन इत्यादि ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार को मान्यता दे दी। जापान ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूहों का प्रशासन इस अस्थायी सरकार को सौंप दिया।

सुभाष चन्द्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

अब सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को पुनर्गठित करने का काम आरम्भ किया। कुछ ही दिनों में चार ब्रिगेडों- गांधी ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड का गठन किया गया । भारतीय स्त्री सैनिकों की सेना गठित करने के लिये सिंगापुर में एक प्रशिक्षण-शिविर स्थापित किया गया। इसमें 500 महिला सैनिक रखे गये।

आईएनए का कमाण्डर इन चीफ बनने के बाद पूर्व एशिया में इण्डियन इण्डिपेण्डेंस आंदोलन का नेतृत्व भी सुभाष चंद्र के हाथों में आ गया। आजाद हिन्द फौज में सैनिकों की भर्ती और प्रशिक्षण की अलग-अलग व्यवस्था की गई। स्त्री तथा पुरुष सैनिकों के लिये अलग-अलग प्रशिक्षण शिविर स्थापित किये गये। सैनिकों को हिन्दुस्तानी भाषा में निर्देश दिये जाते थे।

6 माह के प्रशिक्षण के बाद रंगरूटों को आजाद हिन्द फौज में सम्मिलित कर लिया जाता था। प्रवासी भारतीयों को इस आन्दोलन से जोड़ने के लिये सुभाषचन्द्र बोस ने हाँगकाँग, शंघाई, मनीला, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो तथा अन्य स्थानों का दौरा किया और प्रवासी भारतीयों को अपने उद्देश्यों से अवगत कराया। उनके प्रेरक और चुम्बकीय व्यक्तित्व ने प्रवासी भारतीयों को बहुत आकर्षित किया और उन्होंने तन-मन-धन से इस आन्दोलन को सहयोग दिया।

सुभाष चन्द्र बोस युद्ध के मोर्चे पर

सुभाषचंद्र की योजना थी कि आजाद हिन्द फौज बर्मा मोर्चे से भारत की सीमा में प्रवेश करके बंगाल और असम से ब्रिटिश फौजों के पीछे धकेल दे। उनका विश्वास था कि आजाद हिन्द फौज की सफलता देखकर भारतीय जनता, अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर देगी जिससे भारत को मुक्त करवाना सरल हो जायेगा। भारत की जो भूमि मुक्त कराई जायेगी, उसका शासन आाजद हिन्द फौज को सौंप दिया जायेगा और उस भूमि पर केवल भारत का तिंरगा फहराया जायेगा।

इस योजना के अनुसार आजाद हिन्द फौज की सुभाष ब्रिगेड भारत-बर्मा की सीमा पर पहुँच गई। सुभाषचन्द्र बोस ने रंगून में अपना मुख्यालय स्थापित किया। सुभाष ब्रिगेड की छोटी-छोटी टुकड़ियों ने भारतीय अधिकारियों के नेतृत्व में आगे बढ़ना आरम्भ किया। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों का मनोबल काफी ऊँचा था परन्तु युद्ध की दृष्टि से फौज पूरी तरह से सुसज्जित नहीं थी।

जनवरी 1944 के अन्त में सुभाष ब्रिगेड की एक बटालियन को अराकान की कलादान घाटी में तथा दूसरी और तीसरी बटालियन को चिन पहाड़ियों की ओर भेजा गया। पहली बटालियन ने कलादान घाटी में पश्चिमी अफ्रीका की हब्शी सेना को परास्त कर आगे बढ़ना आरम्भ किया तथा पलेतवा व दलेतमे नामक स्थानों पर शत्रु सेना को परास्त कर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

मई 1944 में उसने मादोक नामक स्थान जीत लिया जो भारत की भूमि पर अँग्रेजों की अग्रिम चैकी थी। इस प्रकार आजाद हिन्द फौज ने भारत की भूमि पर कदम रख दिये परन्तु शीघ्र ही अँग्रेजों की सेना ने जोरदार आक्रमण किया। इस अवसर पर जापानी सेना मादोक के सैनिकों को सहायता पहुँचाने में असमर्थ रही। अतः आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों को मादोक से हट जाने को कहा गया परन्तु भारतीय सैनिक डटे रहे और मई से सितम्बर तक उन्होंने इस क्षेत्र की रक्षा की और तब तक मादोक में तिरंगा लहराता रहा।

सुभाष ब्रिगेड की दूसरी और तीसरी बटालियनों ने भी अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। उन्हें कलेवा से होकर टासू और फोर्ट हवाइट के मार्ग की रक्षा का भार सौंपा गया। इस क्षेत्र में आजाद हिन्द फौज के सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों के छापामारों का सफाया किया तथा मेजर मार्निंग की सेना को परास्त करके अँग्रेजों के सामरिक दुर्ग क्लैंग-क्लैंग को जीत लिया।

आजाद हिन्द फौज की वीरता से प्रसन्न होकर जापानी सेनापति ने समस्त सुभाष ब्रिगेड को कोहिमा की ओर कूच करने का आदेश दिया। यह निश्चय किया गया कि इम्फाल का पतन होते ही सुभाष ब्रिगेड ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके बंगाल में प्रवेश कर जाये। इस बीच आजाद हिन्द फौज की दूसरी टुकड़ियां जापान के मंजूरियाई डिवीजन के साथ कोहिमा पहुँच गईं और घमासान युद्ध के बाद कोहिमा पर अधिकार जमा लिया।

इसके बाद युद्ध के अन्य क्षेत्रों में जापानियों की पराजय का सिलसिला आरम्भ हो गया। इसका लाभ उठाते हुए अँग्रेज इम्फाल में नई कुमुक पहंचाने में सफल रहे। इससे इम्फाल बच गया। अब अँग्रेजों ने दीमापुर और कोहिमा की तरफ से जोरदार हमला किया। आजाद हिन्द फौज को पीछे हटना पड़ा।

गांधी ब्रिगेड को अप्रैल के आरम्भ में इम्फाल की तरफ भेजा गया। जापानियों ने सोचा था कि अब तक इम्फाल का पतन हो गया होगा परन्तु मार्ग में सूचना मिली कि फलेल के निकट घमासान युद्ध चल रहा है। इस पर गांधी ब्रिगेड के छापामार सैनिकों ने फलेल के हवाई अड्डे पर अधिकार करके वहाँ मौजूद वायुयानों को नष्ट कर दिया।

इस अभियान में गांधी ब्रिगेड के लगभग 250 सैनिक मारे गये। फिर भी गांधी ब्रिगेड बहादुरी के साथ डटी रही और अँग्रेजों को आगे नहीं बढ़ने दिया। जून 1944 में रसद पानी और गोला-बारूद की कमी से गांधी ब्रिगेड की स्थिति बिगड़ने लगी, जबकि दूसरी तरफ नई कुमुक आ जाने से अँग्रेज सेना की स्थिति मजबूत हो गई।

वर्षा ऋतु में टास-फलेल सड़क बह गई और आजाद हिन्द फौज को रसद मिलना भी बन्द हो गया। ऐसी स्थिति में कुछ दिनों बाद गांधी ब्रिगेड को भी जापानी सेना के साथ बर्मा लौटना पड़ा। इस प्रकार, आजाद हिन्द फौज का मुख्य अभियान जो मार्च 1944 में आरम्भ हुआ था, वह समाप्त हो गया।

इस अभियान के दौरान वह भारतीय सीमा में लगभग 150 मील भीतर तक प्रवेश करने में सफल रही परन्तु रसद और गोला-बारूद के अभाव में उस क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकी। इस अभियान में आजाद हिन्द फौज के लगभग 4000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

सुभाष चन्द्र बोस के अन्तिम दिन

अब ब्रिटिश सेना ने बर्मा पर पुनः अधिकार करने के लिये आक्रमण किया। उनका आक्रमण इतना जोरदार था कि जापानियों को निरन्तर पीछे हटना पड़ा। जापानी सेना रंगून का भार, आजाद हिन्द फौज को देकर बर्मा से चली गई। आजाद हिन्द फौज ने कुछ दिनों तक बहादुरी के साथ नगर की रक्षा की परन्तु मई 1945 के आरम्भ में रंगून पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया। आजाद हिन्द फौज के सैकड़ों सैनिक बन्दी बना लिये गये।

 नेताजी सुभाषचन्द्र बोस रंगून से बैंकाक और वहाँ से सिंगापुर चले गये। इस समय तक जापान के साथी राष्ट्रों- जर्मनी और इटली का पतन हो चुका था और जापान अकेला ही मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ रहा था। अमरीका ने 6 और 8 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिराये। इसके बाद रूस ने भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र-राष्ट्रों के समक्ष समर्पण कर दिया। सुभाषचन्द्र बोस अपने एक साथी कर्नल हबीब उर रहमान के साथ 17 अगस्त 1945 को एक लड़ाकू विमान से सैगांव से टोकियो के लिये रवाना हुए। 17 अगस्त की रात्रि को विमान में सवार लोगों ने तूरेन (हिन्द-चीन) में विश्राम किया। अगले दिन विमान ताइपेह पहुँचा। ताइपेह से रवाना होते ही विमान में अचानक आग लग गई।

इस कारण कुछ जापानी अधिकारियों सहित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की भी मृत्यु हो गई। कर्नल हबीब उर रहमान जीवित बच गये। बहुत से लोगों का विश्वास है कि नेताजी उस दुर्घटना में नहीं मारे गये थे। मित्र राष्ट्रों के हाथों में पड़ने से बचने के लिये वे भूमिगत हो गये थे। उनकी भस्मी को सम्मानपूर्वक टोकियो लाया गया और 14 सितम्बर 1945 को उसे रियो कोजू मन्दिर में रख दिया गया।

सुभाष चन्द्र बोस की उपलब्धियों का मूल्यांकन

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की उपलब्धियां उनके समकालीन नेताओं से कहीं अधिक बड़ी हैं। उन्होंने आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की, कॉलेज के प्रिंसीपल रहकर युवकों को पढ़ाया, जनजागृति के लिए समाचार पत्र का सम्पादन किया, फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे लोकप्रिय राजनीतिक दल का गठन किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया, कांग्रेस का नेतृत्व किया तथा सशस्त्र सेना के माध्यम  से देश को आजाद करवाने का प्रयास किया।

वे भारत की कुछ भूमि को अंग्रेजों से आजाद करवाने वाले एवं अपनी सरकार स्थापित करके विश्व के कई देशों से मान्यता प्राप्त करने वाले एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी थे। वे गांधीजी की अहिंसा की भूल-भुलैया में उलझने की बजाय ठोस परिणाम में विश्वास रखते थे तथा देश की आजादी के लिए प्रत्येक उपाय को उचित मानते थे। वे कांग्रेस में एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने गांधीजी के विचारों एवं उनकी कार्यप्रणाली को खुलकर चुनौती दी तथा उनके प्रत्याशी पट्टाभिसीतारमैया को अध्यक्ष पद के चुनावों में परास्त किया।

सुभाषचंद्र की राय में दूसरा विश्व-युद्ध भारत के लिए सुनहरा अवसर था। इसे भुनाने के लिए जर्मनी एवं जापान के राष्ट्राध्यक्षों की आंख में आंख डालकर बात करने वाले वे एकमात्र नेता थे। जिस समय वायसराय वेवेल भारतीय नेताओं को शिमला-सम्मेलन में बुलाकर डोमिनियन स्टेटस देने के लिए ललचा रहा था, उस समय सुभाष बाबू जापान की भूमि से रेडियो प्रसारण के माध्यम से भारतीय नेताओं से अपील कर रहे थे कि वे भारत के लिए आधी-अधूरी आजादी प्राप्त करने हेतु वायसराय भवन की ओर न दौड़ें। हालांकि वे भारत की आजादी का सूरज नहीं देख सके किंतु भारत की आजादी में उनका बहुत बड़ा योगदान है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

आचार्य सुश्रुत

0
आचार्य सुश्रुत - bharatkaitihas.com
आचार्य सुश्रुत

भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था।

भारतीय संस्कृति को आधुनिक विज्ञान ने अत्यधिक प्रभावित किया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने एक ओर मानव जीवन को सुखी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है तो दूसरी ओर विश्व के विनाश का खतरा भी पैदा कर दिया है।

भारतीय संस्कृति के केन्द्र में प्राचीन काल में धर्म की बहुलता थी, मध्य-काल में विदेशी संस्कृतियों से संघर्ष की बहुलता रही तथा आधुनिक काल में वैज्ञानिक चिंतन की बहुलता है। फिर भी यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि भारतीयों के पास वैज्ञानिक चिंतन आधुनिक काल में ही आया। जब दुनिया के अधिकांश देश जंगलों में निवास करने वाली आदिवासी व्यवस्था से बाहर भी नहीं निकल पाए थे तब भी भारतीयों के पास उन्नत विज्ञान था।

भारत के महान् वैज्ञानिक

वेदों में विज्ञान सम्बन्धी बहुत सी बातें हैं। भारतीय ऋषियों को खगोल विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, सौर विज्ञान, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद एवं रसायन विज्ञान का भी अच्छा ज्ञान था। प्राचीन काल के वैज्ञानिकों में महर्षि कणाद, वराह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत, बोधायन, भास्कराचार्य आदि के नाम श्रद्धा से लिए जाते हैं। आधुनिक काल के वैज्ञानिकों में जगदीश चन्द्र बोस, सी. वी. रमन, विक्रम साराभाई, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आदि के निाम लिए जा सकते हैं।

आचार्य सुश्रुत

भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा विज्ञान में विशेष स्थान प्राप्त है। सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। यहाँ किस विश्वामित्र से आशय है, यह स्पष्ट नहीं है। आचार्य सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। औपधेनव तथा वैतरणी आदि सुश्रुत के सहपाठी थे। सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी मिलता है। अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है; वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता; इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी। कुछ विद्वान सुश्रुत के उत्तरतंत्र को किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा बनाया गया मानते हैं। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पक्षों को विस्तार से समझाया गया है। सुश्रुत शल्य क्रिया के लिए 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए ही बनाए गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि सम्मिलित हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की शल्य-प्रक्रियाओं की खोज की। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता प्राप्त की। सुश्रुत नेत्रों की शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुत संहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्य या अन्य औषधियां देते थे।

मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे।

मानव शारीर की भीतरी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय-चिकित्सा, बाल-रोग, स्त्री-रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

महर्षि चरक

0
महर्षि चरक - bharatkaitihas.com
महर्षि चरक

महर्षि चरक को प्राचीन भारत के आयुर्वेद के महान ज्ञाता के रूप में ख्याति प्राप्त है। कुछ विद्वानों का मत है कि चरक कनिष्क के राजवैद्य थे अर्थात् वे ईसा की प्रथम शताब्दी में हुए परन्तु कुछ लोग उन्हें बौद्ध-काल से भी पहले का मानते हैं अर्थात् वे ई.पू. 600 से भी पूर्व हुए।

त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। चूंकि कनिष्क और उसका कवि अश्वघोष, बौद्ध थे और चरक संहिता में बौद्ध-मत का प्रबल विरोध किया गया है, इसलिए चरक और कनिष्क का साथ होना असंभव जान पड़ता है।

चरक ने प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ की रचना की। इस ग्रन्थ में रोगनाशक एवं रोगनिरोधक औषधियों का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ के उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु थे, इस ग्रन्थ के मूल ग्रंथकर्ता अग्निवेश थे और इस ग्रंथ के प्रति-संस्कारक चरक थे।

अर्थात् आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के ग्रंथ अग्निवेश-तन्त्र में संशोधन एवं परिवर्द्धन करके उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता कहा जाता है। महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई।

चरक संहिता में व्याधियों के उपचार तो बताए ही गए हैं, साथ ही दर्शन और अर्थशास्त्र के विषयों का भी उल्लेख है। उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया। चरक ने बहुत से स्थानों का भ्रमण करके, उस काल के चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श किया तथा उनके विचार एकत्र करके और अपने अनुभव तथा शोधों के आधार पर आयुर्वेद के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।

प्राचीन वाङ्मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी, जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अतः संभव है कि चरक संहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।

चरक संहिता में पालि-साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक-विनय-पिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा) आदि। इससे चरक संहिता का उपदेश काल उपनिषदों के बाद का और बुद्ध से पहले का निश्चित होता है। इसका प्रति-संस्कार कनिष्क के समय ई.78 के लगभग हुआ होगा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह ग्रन्थ पश्चिमी देशों तक जा पहुँचा। इस ग्रंथ को आज भी आयुर्वेद में बहुत आदर की दृष्टि से देखा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

आर्यभट्ट

0
आर्यभट्ट - www.bharatkaitihas.com
आर्यभट्ट

आर्यभट्ट (ई.476-550) प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है। इस ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्म-स्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है। आर्यभट्ट का जन्म-स्थल कुसुमपुर दक्षिण भारत में था।

एक अन्य मान्यता के अनुसार उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक देश में हुआ था। उनके वैज्ञानिक कार्यों का आदर तत्कालीन गुप्त सम्राट की राजधानी में ही हो सकता था। अतः उन्होंने पाटलिपुत्र के समीप कुसुमपुर में रहकर अपनी रचनाएँ पूर्ण की। गुप्तकाल में मगध के नालन्दा विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए अलग विभाग था। आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे।

आर्यभट्ट का भारत और विश्व के ज्योतिष विज्ञान पर बहुत प्रभाव पड़ा। केरल की ज्योतिष परम्परा पर आर्यभट्ट का विशेष प्रभाव रहा। वे भारतीय गणितज्ञों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ में 120 आर्याछंदों में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और उससे सम्बन्धित गणित को सूत्ररूप में लिखा।

उन्होंने एक ओर तो गणित में ‘पाई’ के मान को अपने पूर्ववर्ती आर्किमिडीज़ से भी अधिक सही निरूपित किया तो दूसरी ओर खगोलविज्ञान में पहली बार उदाहरण के साथ घोषित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। आर्यभट्ट ने ज्योतिषशास्त्र के उन्नत साधनों के बिना महत्वपूर्ण खोजें कीं।

कोपरनिकस (ई.1473 से 1543) ने जिस सिद्धांत की खोज की थी उसकी खोज आर्यभट्ट एक हजार वर्ष पहले कर चुके थे। गोलपाद में आर्यभट्ट ने लिखा है नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं।

उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रकार आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है।

आर्यभट्ट ने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को एक-समान माना है। उनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) तथा एक चतुर्युग में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग को समान माना है। आर्यभट्ट के अनुसार किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात 62,832: 20,000 आता है जो चार दशमलव स्थान तक शुद्ध है।

आर्यभट्ट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूह से निरूपित करने की अत्यन्त वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया।

आर्यभट्ट के ग्रंथ

आर्यभट्ट द्वारा रचित चार ग्रंथों की जानकारी उपलब्ध होती है- (1.) दशगीतिका, (2.) आर्यभट्टीय, (3.) तंत्र तथा (4.) आर्यभट्ट सिद्धांत।

आर्यभट्टीय

आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीय नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का उल्लेख है। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल 3 पृष्ठों में समा सकने वाले 33 श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा 5 पृष्ठों में 75 श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया।

आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अनेक क्रान्तिकारी अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं। आर्यभट्टीय, गणित और खगोल विज्ञान का ग्रंथ है जिसके सिद्धांतों को भारतीय गणित में बड़े स्तर पर उद्धृत किया गया है और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है। आर्यभट्टीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति सम्मिलित हैं।

इसमें सतत भिन्न (कँटीन्यूड फ्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण (क्वाड्रेटिक ईक्वेशंस), घात शृंखला के योग (सम्स ऑफ पावर सीरीज) और ज्याओं की एक तालिका (ज्ंइसम व िैपदमे) शामिल हैं।

आर्यभट्ट के शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा अश्मकतंत्र या अश्माका में किए गए उल्लेख के अनुसार इस ग्रंथ को आर्यभट्टीय नाम बाद के टिप्पणीकारों द्वारा दिया गया है, आर्यभट्ट ने स्वयं इसे कोई नाम नहीं दिया। चूंकि इस ग्रंथ में 108 छंद हैं इसलिए इसे आर्य-शत-अष्ट (अर्थात् आर्यभट्ट के 108) भी कहा जाता है। यह ग्रंथ सूत्र साहित्य के समान बहुत ही संक्षिप्त शैली में लिखा गया है।

प्रत्येक पंक्ति एक जटिल प्रणाली को याद करने में सहायता करती है। ग्रंथ में 108 छंदों के साथ 13 परिचयात्मक श्लोक अलग से दिए गए हैं। सम्पूर्ण ग्रंथ को चार अध्यायों में विभाजित किया गया है-

(1.) गीतिकपाद (13 छंद)

इसमें समय की बड़ी इकाइयाँ, यथा- कल्प, मन्वन्तर, युग, जो प्रारंभिक ग्रंथों से अलग, ब्रह्माण्ड-विज्ञान प्रस्तुत करते हैं, यथा- लगध का वेदांग ज्योतिष, (पहली सदी ईस्वी पूर्व, इसमें जीवाओं (साइन) की तालिका ज्या भी शामिल है जो एक एकल छंद में प्रस्तुत है। एक महायुग के दौरान, ग्रहों के परिभ्रमण के लिए 4.32 मिलियन वर्षों की संख्या दी गयी है।

(2.) गणितपाद (33 छंद)

इसमें क्षेत्रमिति (क्षेत्र व्यवहार), गणित और ज्यामितिक प्रगति, शंकु छायाएँ, सरल, द्विघात, युगपत और अनिश्चित समीकरण (कुट्टक) का समावेश है।

(3.) कालक्रियापाद (25 छंद)

इसमें समय की विभिन्न इकाइयाँ और किसी दिए गए दिन के लिए ग्रहों की स्थिति का निर्धारण करने की विधि दी गई है। अधिक मास की गणना के विषय में (अधिकमास), क्षय-तिथियां। सप्ताह के दिनों के नामों के साथ, सात दिन का सप्ताह प्रस्तुत करते हैं।

(4.) गोलपाद: (50 छंद)

इसमें आकाशीय क्षेत्र के ज्यामितिक एवं त्रिकोणमितीय पहलू, क्रांतिवृत्त, आकाशीय भूमध्य रेखा, आसंथि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण, क्षितिज पर राशि-चक्रीय संकेतों का बढ़ना आदि की विशेषताएं दी गई हैं। कुछ संस्करणों के अंत में कृति की प्रशंसा में कुछ पुष्पिकाएं भी जोड़ी गई हैं।

आर्यभट्टीय ने गणित और खगोल विज्ञान में पद्य रूप में कुछ नवीन प्रस्तुतियां दीं जो कई सदियों तक प्रभावशाली रहीं। ग्रंथ की संक्षिप्तता की चरम सीमा का वर्णन उनके शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा किया गया है। ई.1465 में नीलकंठ सोमयाजी द्वारा आर्यभट्टीय भाष्य लिखा गया।

(5.) आर्य-सिद्धांत

आर्य-सिद्धांत, खगोलीय गणनाओं पर एक कार्य है जो अब लुप्त हो चुका है, इसकी जानकारी हमें आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर की रचनाओं एवं बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों- ब्रह्मगुप्त और भास्कर के ग्रंथों में मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कार्य पुराने सूर्य सिद्धांत पर आधारित है और आर्यभट्टीय में सूर्योदय की अपेक्षा मध्यरात्रि-दिवस गणना का उपयोग किया गया है।

इस ग्रंथ में नोमोन (शंकु-यन्त्र), परछाई यन्त्र (छाया-यन्त्र), संभवतः कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार (धनुर-यन्त्र, चक्र-यन्त्र), एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र, छत्र-यंत्र, धनुषाकार जल घड़ी और बेलनाकार जल घड़ी आदि अनेक खगोलीय उपकरणों का वर्णन किया गया है।

(6.) अल न्त्फ या अल नन्फ़

आर्यभट्ट का यह ग्रन्थ अरबी अनुवाद के रूप में मिलता है, इसे ‘अल न्त्फ़’ या ‘अल नन्फ़’ कहा गया है। इसका संस्कृत नाम अज्ञात है। 10-11वीं सदी के फारसी विद्वान अबू रेहान अल्बरूनी ने इसका उल्लेख किया गया है।

(7.) आर्यभट्ट सिद्धांत

7वीं शताब्दी ईस्वी में यह ग्रंथ अत्यन्त लोकप्रिय था किंतु अब इस ग्रंथ के केवल 34 श्लोक उपलब्ध होते हैं।

गणित

स्थानीय मान प्रणाली और शून्य: स्थान-मूल्य अंक प्रणाली, जिसे सर्वप्रथम तीसरी सदी की बख्शाली पाण्डुलिपि में देखा गया, आर्यभट्ट के कार्यों में स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। उन्होंने निश्चित रूप से प्रतीक का उपयोग नहीं किया परन्तु फ्रांसीसी गणितज्ञ जार्ज इफ्रह के मतानुसार- रिक्त गुणांक के साथ, दस की घात के लिए एक स्थान धारक के रूप में शून्य का ज्ञान आर्यभट्ट के स्थान-मूल्य अंक प्रणाली में निहित था।

आर्यभट्ट ने ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया था; वैदिक-काल से चली आ रही संस्कृत परंपरा को निरंतर रखते हुए उन्होंने संख्या को निरूपित करने के लिए वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग किया, यथा- मात्राओं (जैसे ज्याओं की तालिका) को स्मरक के रूप में व्यक्त करना।

अपरिमेय (इर्रेशनल) के रूप में π

आर्यभट्ट ने पाई के सन्निकटन पर कार्य किया और संभवतः उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया था कि पाई इर्रेशनल है। आर्यभट्टीयम् (गणितपाद) के दूसरे भाग में वे लिखते हैं-

चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।

अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः।।

100 में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें। इस नियम से 20000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है-

 (100 + 4) X 8 + 62000/20000 = 3.1416

इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात 3.1416 है, जो पाँच महत्वपूर्ण आंकड़ों तक बिलकुल सटीक है।

आर्यभट्ट ने आसन्न (निकट पहुँचना), पिछले शब्द के ठीक पहले आने वाला, शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह न केवल एक सन्निकटन है, वरन यह कि मूल्य अतुलनीय (या इर्रेशनल) है। यूरोप में पाइ की तर्कहीनता का सिद्धांत लैम्बर्ट द्वारा केवल ई.1761 में सिद्ध हो पाया था। आर्यभट्टीय के अरबी में अनुवाद के पश्चात् ई.820 में बीजगणित पर मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख्वारिज्मी की पुस्तक में इस सन्निकटन का उल्लेख किया गया।

क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिति

गणितपाद 6 में, आर्यभट्ट ने त्रिकोण के क्षेत्रफल को इस प्रकार बताया है- त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः। अर्थात् किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है। आर्यभट्ट ने द्विज्या (साइन) के विषय में चर्चा की है और उसे अर्ध-ज्या कहा है। लोगों ने इसे ज्या कहना शुरू कर दिया।

जब अरबी लेखकों द्वारा आर्यभट्ट के काम का संस्कृत से अरबी में अनुवाद किया गया, तो उन्होंने इसको जिबा कहा और बाद में वे इसे ज्ब कहने लगे। बाद में लेखकों को समझ में आया कि ‘ज्ब’ जिबा का ही संक्षिप्त रूप है। जिबा का अर्थ है खोह या खाई।

बारहवीं सदी में, जब क्रीमोना के घेरार्दो ने इस ग्रंथ का अरबी से लैटिन भाषा में अनुवाद किया, तब उन्होंने अरबी जिबा की जगह उसे साइनस कहा जिसका लैटिन भाषा में अर्थ खोह या खाई ही है। यही साइनस अंग्रेजी में साइन बन गया।

अनिश्चित समीकरण: प्राचीन कल से भारतीय गणितज्ञों की रुचि उन समीकरणों के पूर्णांक हल ज्ञात करने में रही है जो ax + b = cy  के स्वरूप में होती है। इस विषय को वर्तमान समय में डायोफैंटाइन समीकरण कहा जाता है। आर्यभट्टीय पर भास्कर द्वारा की गई व्याख्या में एक उदाहरण इस प्रकार दिया गया है-

वह संख्या ज्ञात करो जिसे 8 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 5 बचता है, 9 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 4 बचता है, 7 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 1 बचता है। अर्थात, बताएं N = 8x+ 5 = 9y +4 = 7z +1. इससे N के लिए सबसे छोटा मान 85 निकलता है। सामान्य तौर पर, डायोफैंटाइन समीकरण कठिनता के लिए बदनाम थे।

इस तरह के समीकरणों की व्यापक रूप से चर्चा प्राचीन वैदिक ग्रन्थ सुल्व सूत्र में है, जिसके अधिक प्राचीन भाग ई.पू.800 तक पुराने हो सकते हैं। ऐसी समस्याओं के हल के लिए आर्यभट्ट की विधि को कुट्टक विधि कहा गया है। कुट्टक का अर्थ है पीसना, अर्थात छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना और इस विधि में छोटी संख्याओं के रूप में मूल खंडों को लिखने के लिए एक पुनरावर्ती कलनविधि का समावेश था।

आज यह कलनविधि, ई.621 में भास्कर की व्याख्या के अनुसार, पहले क्रम के डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करने के लिए मानक पद्धति है, और इसे प्रायः आर्यभट्ट एल्गोरिद्म कहा जाता है। डायोफैंटाइन समीकरणों का उपयोग क्रिप्टोलौजी में होता है। आरएसए सम्मलेन-2006 ने अपना ध्यान कुट्टक विधि और सुल्वसूत्र के पर केन्द्रित किया।

बीजगणित

आर्यभट्टीय में वर्गों और घनों की श्रेणी के रोचक परिणाम दिए हैं।

खगोल विज्ञान

आर्यभट्ट की खगोल विज्ञान प्रणाली औदायक प्रणाली कहलाती थी, श्रीलंका, भूमध्य रेखा पर स्थित है, वहाँ भोर होने से दिन की शुरुआत होती थी। खगोल विज्ञान पर आर्यभट्ट के कुछ लेख, जो द्वितीय मॉडल (अर्ध-रात्रिका, मध्यरात्रि), प्रस्तावित करते हैं, खो गए हैं, परन्तु इन्हें आंशिक रूप से ब्रह्मगुप्त के खण्डखाद्यक में हुई चर्चाओं से पुनः निर्मित किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में वे पृथ्वी के घूर्णन को आकाश की आभासी गति का कारण बताते हैं।

सौर प्रणाली की गतियाँ

आर्यभट्ट मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है। यह श्रीलंका को सन्दर्भित एक कथन से ज्ञात होता है, जो तारों की गति का पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णन करता है-

अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्।

अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लंकायाम्।। (आर्यभट्टीय गोलपाद 9)

अर्थात्- जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है।

अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है-

उदय-अस्तमय-निमित्तम् नित्यम् प्रवहेण वायुना क्षिप्तस्।

लंका-सम-पश्चिम-गस् भ-पंजरस् स-ग्रहस् भ्रमति।।  (आर्यभट्टीय गोलपाद 10)

उनके उदय और अस्त होने का कारण इस तथ्य की वजह से है कि प्रोवेक्टर हवा द्वारा संचालित गृह और एस्टेरिस्म्स चक्र श्रीलंका में निरंतर पश्चिम की तरफ चलायमान रहते हैं। लंका का नाम भूमध्य रेखा पर एक सन्दर्भ बिन्दु के रूप में लिया गया है, जिसे खगोलीय गणना के लिए मध्याह्न रेखा के सन्दर्भ में समान मान के रूप में ले लिया गया था।

आर्यभट्ट ने सौर मंडल के एक भूकेंद्रीय मॉडल का वर्णन किया है जिसमें सूर्य और चन्द्रमा गृहचक्र द्वारा गति करते हैं, जो पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस मॉडल में पितामह-सिद्धान्त पाया जाता है। इसमें प्रत्येक ग्रहों की गति दो ग्रहचक्रों द्वारा नियंत्रित है, एक छोटा मंद (धीमा) ग्रहचक्र और एक बड़ा शीघ्र (तेज) ग्रहचक्र।

पृथ्वी से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम इस प्रकार है- चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूरज, मंगल, बृहस्पति, शनि और नक्षत्र। ग्रहों की स्थिति और अवधि की गणना समान रूप से गति करते हुए बिन्दुओं से सापेक्ष के रूप में की गयी थी, जो बुध और शुक्र के मामले में, जो पृथ्वी के चारों ओर औसत सूर्य के समान गति से घूमते हैं और मंगल, बृहस्पति और शनि के मामले में, जो राशिचक्र में पृथ्वी के चारों ओर अपनी विशिष्ट गति से गति करते हैं।

खगोल विज्ञान के अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह द्वि-ग्रहचक्र वाला मॉडल टॉलेमी के पहले के ग्रीक खगोल विज्ञान के तत्वों को प्रदर्शित करता है। आर्यभट्ट के मॉडल के एक अन्य तत्व सिघ्रोका, सूर्य के सम्बन्ध में बुनियादी ग्रहों की अवधि, को कुछ इतिहासकारों द्वारा एक अंतर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल के चिन्ह के रूप में देखा जाता है।

ग्रहण

आर्यभट्ट ने कहा कि चंद्रमा और ग्रह सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। तत्कालीन मान्यताओं से अलग, जिसमें ग्रहणों का कारक छद्म ग्रह निस्पंद बिन्दु राहू और केतु थे, उन्होंने ग्रहणों को पृथ्वी द्वारा डाली जाने वाली और इस पर गिरने वाली छाया से सम्बद्ध बताया।

इस प्रकार चंद्र-ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है (छंद गोला 37) और पृथ्वी की इस छाया के आकार और विस्तार की विस्तार से चर्चा की (छंद गोला 38-48) और फिर ग्रहण के दौरान ग्रहण वाले भाग का आकार और इसकी गणना की।

बाद के भारतीय खगोलविदों ने इन गणनाओं में सुधार किया, लेकिन आर्यभट्ट की विधियों ने प्रमुख सार प्रदान किया था। यह गणनात्मक मिसाल इतनी सटीक थी कि 18वीं सदी के वैज्ञानिक गुइलौम ले जेंटिल ने, पांडिचेरी की अपनी यात्रा के दौरान पाया कि भारतीयों की गणना के अनुसार 30 अगस्त 1765 के चंद्रग्रहण की अवधि 41 सेकंड कम थी, जबकि उसके चार्ट द्वारा (टोबिअस मेयर, ई.1752) 68 सेकंड अधिक दर्शाते थे।

आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2 प्रतिशत कम है। आर्यभट्ट द्वारा प्रस्तुत यह सन्निकटन ई.200 के यूनानी गणितज्ञ एराटोसथेंनस की संगणना में उल्लेखनीय सुधार था।

नक्षत्रों के आवर्तकाल

समय की आधुनिक अंग्रेजी इकाइयों में जोड़ा जाये तो, आर्यभट्ट की गणना के अनुसार पृथ्वी का आवर्तकाल (स्थिर तारों के सन्दर्भ में पृथ्वी की अवधि) 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सैकंड थी; आधुनिक समय 23 : 56 : 4.091 है। इसी प्रकार, उनके हिसाब से पृथ्वी के वर्ष की अवधि 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट 30 सेकंड, आधुनिक समय की गणना के अनुसार इसमें 3 मिनट 20 सेकंड की त्रुटि है। नक्षत्र समय की धारणा उस समय की अधिकतर खगोलीय प्रणालियों में ज्ञात थी, परन्तु संभवतः यह संगणना उस समय के हिसाब से सर्वाधिक शुद्ध थी।

सूर्य केंद्रीयता

आर्यभट्ट का कहना था कि पृथ्वी अपनी ही धुरी पर घूमती है और उनके ग्रह सम्बन्धी ग्रहचक्र मॉडलों के कुछ तत्व उसी गति से घूमते हैं जिस गति से सूर्य के चारों ओर ग्रह घूमते हैं। इस प्रकार ऐसा सुझाव दिया जाता है कि आर्यभट्ट की संगणनाएँ अन्तर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल पर आधारित थीं, जिसमें ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। एक समीक्षा में इस सूर्य केन्द्रित व्याख्या का विस्तृत खंडन है।

यह समीक्षा बी. एल. वान डर वार्डेन की एक किताब का वर्णन इस प्रकार करती है- ‘यह किताब भारतीय गृह सिद्धांत के विषय में अज्ञात है और यह आर्यभट्ट के प्रत्येक शब्द का सीधे तौर पर विरोध करता है।’

हालाँकि कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि आर्यभट्ट की प्रणाली पूर्व के एक सूर्य केन्द्रित मॉडल से उपजी थी जिसका ज्ञान उनको नहीं था। यह भी दावा किया गया है कि वे ग्रहों के मार्ग को अंडाकार मानते थे, हालाँकि इसके लिए कोई भी प्राथमिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।

हालाँकि सामोस के एरिस्तार्चुस (तीसरी शताब्दी ई.पू.) और कभी कभार पोन्टस के हेराक्लिड्स (चैथी शताब्दी ई.पू.) को सूर्य केन्द्रित सिद्धांत की जानकारी होने का श्रेय दिया जाता है, प्राचीन भारत में ज्ञात ग्रीक खगोल शास्त्र (पौलिसा सिद्धांत- संभवतः अलेक्जेण्ड्रिया वासी) सूर्य केन्द्रित सिद्धांत के विषय में कोई चर्चा नहीं करता है।

विश्व-विज्ञान पर आर्यभट्ट का प्रभाव

भारतीय खगोलीय परंपरा में आर्यभट्ट के कार्य का बड़ा प्रभाव था और इनके अनुवादों ने विश्व की कई संस्कृतियों के ज्ञान को प्रभावित किया। ई.820 के दौरान इसका अरबी अनुवाद विशेष प्रभावशाली था। उनके कुछ परिणामों को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया है और 10वीं सदी के अरबी विद्वान अल्बरूनी द्वारा उनका संदर्भ दिया गया है।

उसने लिखा है कि आर्यभट्ट के अनुयायी मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। साइन (ज्या), कोसाइन (कोज्या) के साथ ही, वरसाइन (उक्रमाज्या) की उनकी परिभाषा, और विलोम साइन (उत्क्रम ज्या), ने त्रिकोणमिति की उत्पत्ति को प्रभावित किया। वे पहले व्यक्ति भी थे जिन्होंने साइन और वरसाइन (कोसएक्स) तालिकाओं को, 0 डिग्री से 90 डिग्री तक 3.75 डिग्री अंतरालों में, 4 दशमलव स्थानों की सूक्ष्मता तक तैयार किया।

आर्यभट्ट की खगोलीय-गणन विधियाँ बहुत प्रभावशाली थीं। त्रिकोणमितिक तालिकाओं के साथ, वे अरब देशों में प्रचलित खगोलीय तालिकाओं (जिज) की गणना के लिए प्रयुक्त की जाती थीं । विशेष रूप से, अरबी स्पेन वैज्ञानिक अल-झर्काली (11वीं सदी) के कार्यों में पाई जाने वाली खगोलीय तालिकाओं का लैटिन में तोलेडो की तालिकाओं (12वीं सदी) के रूप में अनुवाद किया गया और ये यूरोप में सदियों तक सर्वाधिक सूक्ष्म पंचांग के रूप में इस्तेमाल में रही।

आर्यभट्ट और उनके शिष्यों द्वारा की गयी तिथिगणना पंचांग के रूप में भारत में निरंतर व्यवहार में रही है। मुसलमान विद्वानों ने इससे जलाली तिथिपत्र तैयार किया जिसे ई.1073 में उमर खय्याम सहित कुछ खगोलविदों ने प्रस्तुत किया। इसे ई.1925 में संशोधित किया गया जो वर्तमान में ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रचलित है।

जलाली तिथिपत्र अपनी तिथियों का आकलन वास्तविक सौर पारगमन के आधार पर करता है, जैसा आर्यभट्ट ने किया है और उससे पहले के सिद्धांत कैलेंडर में भी प्रयुक्त होता था। इस प्रकार के तिथि पत्र में तिथियों की गणना के लिए एक पंचांग की आवश्यकता होती है। यद्यपि तिथियों की गणना करना कठिन था, पर जलाली तिथिपत्र में ग्रेगोरी तिथिपत्र से कम मौसमी त्रुटियां थीं।

भारत द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा तब महान खगोलज्ञ एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट के सम्मान में उसका नाम भी आर्यभट्ट रखा गया। खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईएस) रखा गया है।

आर्यभट्ट के नाम पर अंतर्विद्यालयीय आर्यभट्ट गणित प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा ई.2009 में खोजी गयी बैक्टीरिया एक प्रजाति का नाम बैसीलस आर्यभट्ट रखा गया है। स्वतंत्र भारत में आर्यभट्ट के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय- भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

वराहमिहिर

0
वराहमिहिर - bharatkaitihas.com
वराहमिहिर

वराहमिहिर अथवा वरःमिहिर ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। उन्होंने अपने ग्रंथ पंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वे बचपन से मेधावी थे।

अपने पिता आदित्य दास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर उन्होंने इन्हीं विषयों में व्यापक शोध किया। समय-मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण पर जुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला की स्थापना उनके द्वारा किए गए कार्यों में सम्मिलित माने जाते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य गणित एवं विज्ञान को जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाना था।

वराहमिहिर की जीवनी

वराहमिहिर का जन्म ई.499 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। यह परिवार उज्जैन के निकट कपित्थक (कायथा) नामक गांव का निवासी था। उनके पिता आदित्य दास सूर्य-भगवान के भक्त थे। उन्होंने ही वराहमिहिर को ज्योतिष विद्या सिखाई। कुसुमपुर (पटना) जाने पर वराहमिहिर अपने काल के महान खगोलज्ञ और गणितज्ञ आर्यभट्ट से मिले।

आर्यभट्ट से मिली प्रेरणा से वराहमिहिर ने ज्योतिष विद्या और खगोल ज्ञान को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया और वे उज्जैन आ गए जो उस समय शिक्षा का बड़ा केंद्र था। गुप्त शासन के अन्तर्गत वहाँ कला, विज्ञान और संस्कृति के अनेक गुरुकुल फलफूल रहे थे। इस कारण देश भर से विद्यार्थी एवं विद्वान उज्जैन आते थे।

वराहमिहिर के ज्योतिषज्ञान से प्रभावित होकर गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने उन्हें अपने दरबार के नवरत्नों में सम्मिलित किया। वराहमिहिर ने ईरान एवं यूनान आदि देशों की यात्रा की। ई.587 में उनकी मृत्यु हुई।

वराहमिहिर के ग्रन्थ

वराहमिहिर ने ई.550 के आसपास कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं जिनमें पंचसिद्धांतिका, लघुजातक, बृहज्जातक, बृहत्संहिता, टिकनिकयात्रा, बृहद्यात्रा या महायात्रा, योगयात्रा या स्वल्पयात्रा, वृहत् विवाहपटल, लघु विवाहपटल, कुतूहलमंजरी, दैवज्ञवल्लभ, लग्नवाराहि आदि प्रमुख हैं। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए गए हैं, जो वराहमिहिर के उच्च-स्तरीय त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।

पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं- (1.) पोलिश सिद्धांत, (2.) रोमक सिद्धांत, (3.) वसिष्ठ सिद्धांत, (4.) सूर्य सिद्धांत तथा (5.) पितामह सिद्धांत। वराह मिहिर ने इन पूर्व-प्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से ‘बीज’ नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें। उन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीन ग्रंथ लिखे।

ज्योतिष सम्बन्धी अपनी पुस्तकों के बारे में वराह मिहिर ने लिखा है- ‘ज्योतिष विद्या एक अथाह सागर है और हर कोई इसे आसानी से पार नहीं कर सकता। मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नाव है, जो इसे पढ़ेगा वह उसे पार ले जायेगी।’ इस पुस्तक को अब भी ज्योतिष विद्या के ग्रन्थों में ग्रन्थरत्न माना जाता है। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।

वराहमिहिर के वैज्ञानिक विचार

वराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे किंतु वह अलौकिक में आंखे बंद करके विश्वास नहीं करते थे। उनकी चिंतन-पद्धति वैज्ञानिक जैसी थी जो अंध-विश्वास करने की बजाय शोधपरक ज्ञान में विश्वास करता है। अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की तरह उन्होंने भी कहा कि पृथ्वी गोल है। वे विश्व के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने कहा कि कोई ऐसी शक्ति है जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाये रखती है।

आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। वराहमिहिर का मानना था कि पृथ्वी गतिमान नहीं है। उनका कहना था कि यदि पृथ्वी घूम रही होती तो आकाश में उड़ते हुए पक्षी पृथ्वी की गति की विपरीत दिशा में (पश्चिम की ओर) अपने घोंसले में उसी समय वापस पहुँच जाते।

उन्होंने पर्यावरण विज्ञान (इकोलोजी), जल विज्ञान (हाइड्रोलोजी), भूविज्ञान (जिआलोजी) के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। उनका कहना था कि पौधे और दीमक जमीन के नीचे के पानी को इंगित करते हैं। संस्कृत व्याकरण में दक्षता और छंद पर अधिकार के कारण उन्होंने स्वयं को एक अनोखी शैली में व्यक्त किया।

अपने विशद ज्ञान और सरस प्रस्तुति के कारण उन्होंने खगोल जैसे शुष्क विषयों को भी रोचक बना दिया जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। उनकी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका (पांच सिद्धांत), बृहत्संहिता, बृहज्जात्क (ज्योतिष) ने उन्हें फलित ज्योतिष में वही स्थान दिलाया है जो राजनीति दर्शन में कौटिल्य का तथा व्याकरण में पाणिनि का है।

वराहमिहिर का योगदान

त्रिकोणमिति

निम्ननिखित त्रिकोणमितीय सूत्र वराहमिहिर ने प्रतिपादित किये हैं-

sin2 x + cos2 x = 1

sinx = cos(π /2) – x

(1 – cos 2x)/2 = sin2 x

वराहमिहिर ने आर्यभट्ट (प्रथम) द्वारा प्रतिपादित ‘ज्या सारणी’ को और अधिक शुद्ध बनाया।

अंकगणित

वराहमिहिर ने शून्य एवं ऋणात्मक संख्याओं के बीजगणितीय गुणों को परिभाषित किया।

संख्या सिद्धान्त

वराहमिहिर ने ‘संख्या-सिद्धान्त’ नामक एक गणित ग्रन्थ भी लिखा जिसके बारे में बहुत कम ज्ञात है। इस ग्रन्थ का एक छोटा अंश ही प्राप्त हुआ है। इसमें उन्नत अंकगणित, त्रिकोणमिति के साथ-साथ कुछ अपेक्षाकृत सरल संकल्पनाओं का भी समावेश है।

क्रमचय-संचय

वराहमिहिर ने वर्तमान समय में पास्कल त्रिकोण (Pascal’s triangle) के नाम से प्रसिद्ध संख्याओं की खोज की। इनका उपयोग वे द्विपद गुणाकों (Binomial Coefficients) की गणना के लिये करते थे।

प्रकाशिकी

वराहमिहिर का प्रकाशिकी में भी योगदान है। उन्होंने कहा है कि परावर्तन कणों के प्रति-प्रकीर्णन (Back & Scattering) से होता है। उन्होंने अपवर्तन की भी व्याख्या की है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

जगदीश चन्द्र बसु

0
जगदीश चन्द्र बसु - www.bharatkaitihas.com
जगदीश चन्द्र बसु

डॉ. (सर) जगदीश चन्द्र बसु भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था। वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण खोजें कीं। वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया।

उन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है। वे विज्ञान कथाएँ भी लिखते थे और उन्हें बंगाली विज्ञान कथा-साहित्य का पिता माना जाता है। उन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरु किया किंतु अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की बजाय उन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकत्र्ता इन पर आगे काम कर सकें।

इसके बाद उन्होंने वनस्पति एवं जीव विज्ञान में अनेक खोजें कीं। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ़ नामक यन्त्र का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इस तरह उन्होंने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के ऊतकों में काफी समानता है। मित्रों के कहने पर उन्होंने केवल एक पेटेंट के लिए आवेदन किया और उसे प्राप्त किया।

जगदीश चन्द्र बसु का प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा

बसु का जन्म 30 नवम्बर 1858 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रान्त के ढाका जिले में फरीदपुर के मेमनसिंह (अब बांग्लादेश) में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बसु ब्रह्म समाज में सक्रिय थे और फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य स्थानों पर उप-मजिस्ट्रेट एवं सहायक कमिश्नर आदि पदों पर रहे।

उनका परिवार रारीखाल गांव, बिक्रमपुर से आया था, जो आजकल बांग्लादेश के मुन्शीगंज जिले में है। ग्यारह वर्ष की आयु तक उन्होंने गांव के ही बांग्ला विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। उनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अच्छी तरह सीखनी चाहिए।

ई.1915 में विक्रमपुर में आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए बसु ने कहा- ‘उस समय बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजना हैसियत की निशानी माना जाता था। मैं जिस बांग्ला स्कूल में भेजा गया वहाँ पर मेरे दायीं तरफ मेरे पिता के मुस्लिम परिचारक का बेटा बैठा करता था और मेरी बाईं ओर एक मछुआरे का बेटा। ये ही मेरे खेल के साथी भी थे। उनकी पक्षियों, जानवरों और जलजीवों की कहानियों को मैं कान लगा कर सुनता था। शायद इन्हीं कहानियों ने मेरे मस्तिष्क में प्रकृति की संरचना पर अनुसंधान करने की गहरी रुचि जगाई।’

विद्यालयी शिक्षा के बाद वे कलकत्ता आ गये और सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया। जगदीश चंद्र की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी। स्नातक की उपाधि प्राप्त करने बाद 22 वर्ष की आयु में वे चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए किंतु स्वास्थ खराब हो जाने के कारण वे डॉक्टर बनने का विचार त्यागकर कैम्ब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय चले गये। भौतिकी के विख्यात प्रोफेसर फादर लाफोण्ट ने बोस को भौतिकशास्त्र के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

ई.1885 में वे स्वदेश लौटे तथा ई.1915 तक भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाते रहे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। जगदीश चन्द्र बसु ने इस भेदभाव का विरोध किया और तीन वर्षों तक बिना वेतन के काम करते रहे, जिसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई और उन पर काफी कर्जा हो गया।

इस कर्ज को चुकाने के लिये उन्हें अपनी पैतृक-भूमि बेचनी पड़ी। चैथे वर्ष जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरा वेतन दिया गया। उनका विवाह कलकता के विख्यात एडवोकेट एवं ब्रह्मसमाजी दुर्गामोहन दास की पुत्री अबाला से हुआ। अबाला देशबन्धु चितरंजन दास की चचेरी बहिन थी।

अबाला अपने पति के लिए सदैव पे्ररणा स्रोत रही। बोस एक अच्छे शिक्षक थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के छात्र सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने।

रेडियो की खोज

ब्रिटिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने गणितीय रूप से विविध तरंग दैध्र्य की विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी, पर उनकी भविष्यवाणी के सत्यापन से पहले ई.1879 में उनका निधन हो गया। ब्रिटिश भौतिकविद ओलिवर लॉज मैक्सवेल ने ई.1887-88 में तरंगों के अस्तित्व का प्रदर्शन कर उन्हें तारों को प्रेषित किया।

जर्मन भौतिकशास्त्री हेनरिक हट्र्ज ने ई.1888 में मुक्त अंतरिक्ष में विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व को प्रयोग करके दिखाया। इसके बाद लॉज ने हट्र्ज का काम जारी रखा और जून 1894 में एक स्मरणीय व्याख्यान दिया। हट्र्ज की मृत्यु के बाद उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। लॉज के काम ने जगदीश चन्द्र बसु सहित विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा।

बोस के माइक्रोवेव अनुसंधान का उल्लेखनीय पहलू यह था कि उन्होंने तरंग-दैध्र्य को लगभग 5 मिलीमीटर तरंग दैध्र्य स्तर पर ला दिया। वे प्रकाश के गुणों के अध्ययन के लिए लंबी तरंग दैध्र्य की प्रकाश तरंगों के नुकसान को समझ गए थे।

ई.1895 में जगदीश चन्द्र बसु ने कलकत्ता के टाउन हॉल में बंगाल के गवर्नर विलियम मैकेंजी की उपस्थिति में अपने आविष्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उनके रेडिएटर से निकली तंरगें 75 फुट की दूरी पर तीन दीवारों को पार करके रिसीवर तक जा पहुंचीं जिससे पिस्तौल दागी गई और घण्टी बज उठी। अपने रेडिएटर से यह प्रयोग करने के लिए बोस ने आधुनिक वायरलैस टैलीग्राफी के एण्टीना की रूपरेखा तैयार कर दी।

यह 20 फुट लम्बे खम्भे के ऊपर एक गोलाकार धातु की तश्तरी थी जिसको रेडिएटर के साथ जोड़ा गया और इसी प्रकार की एक तश्तरी रिसीवर से जोड़ी गयी थी। अब वे अधिक दूरी तक संदेश भेजने का प्रयास करने लगे। इस अनुसन्धान से गवर्नर विलियम मैकेन्जी बहुत प्रभावित हुआ और उसने बोस को अपने शोध को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

उनके शोध-निबन्ध विज्ञान की अग्रणी शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे जिन्होंने समस्त वैज्ञानिक संसार को आश्चर्यचकित कर दिया।

जगदीश चन्द्र बसु ने एक बंगाली निबंध, ‘अदृश्य आलोक’ में लिखा- ‘अदृश्य प्रकाश आसानी से ईंट की दीवारों, भवनों आदि को पार कर सकता है, इसलिए तार के बिना भी प्रकाश के माध्यम से संदेश संचारित हो सकता है।’ रूस में पोपोव ने ऐसा ही एक प्रयोग किया।

जगदीश चन्द्र बसु का ‘डबल अपवर्तक क्रिस्टल द्वारा बिजली की किरणों के ध्रुवीकरण’ पर पहला वैज्ञानिक लेख, लॉज के लेख के एक साल के भीतर मई 1895 में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी को भेजा गया। उनका दूसरा लेख अक्टूबर 1895 में लंदन की रॉयल सोसाइटी को लार्ड रेले द्वारा भेजा गया। दिसम्बर 1895 में लंदन पत्रिका इलेक्ट्रीशियन ने अपने छत्तीसवें अंक में जगदीश चंद्र बोस का लेख ‘नए इलेक्ट्रो-पोलेरीस्कोप’ पर प्रकाशित किया।

उस समय लॉज द्वारा गढ़े गए शब्द ‘कोहिरर’ का प्रयोग हट्र्ज़ के तरंग रिसीवर या डिटेक्टर के लिए किया जाता था। इलेक्ट्रीशियन ने तत्काल बोस के ‘कोहिरर’ पर टिप्पणी की- ‘यदि प्रोफेसर बोस अपने कोहिरर को बेहतरीन बनाने में और पेटेंट पाने में सफल होते हैं तो हम शीघ्र ही एक बंगाली वैज्ञानिक के प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रयोगशाला में अकेले शोध के कारण नौ-परिवहन की तट प्रकाश व्यवस्था में नई क्रांति देखेंगे।’

बोस ने अपने कोहिरर को बेहतर करने की योजना बनाई लेकिन उसे पेटेंट कराने के बारे में कभी नहीं सोचा।

जगदीश चन्द्र बसु का रेडियो डेवलपमेंट में स्थान

जगदीश चन्द्र बसु ने अपने प्रयोग उस समय किये थे जब रेडियो एक संपर्क माध्यम के तौर पर विकसित हो रहा था। रेडियो माइक्रोवेव ऑप्टिक्स पर बोस ने जो काम किया था वह रेडियो कम्युनिकेशन से जुड़ा हुआ नहीं था, लेकिन उनके द्वारा किये हुए सुधार एवं उनके द्वारा इस विषय में लिखे हुए तथ्यों ने दूसरे रेडियो आविष्कारकों को प्रभावित किया।

ई.1894 के अंत में गुगलिएल्मो मारकोनी एक रेडियो सिस्टम पर काम कर रहे थे जो वायरलेस टेलीग्राफी के लिए विशिष्ठ रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था। ई.1896 के आरंभ तक यह प्रणाली फिजिक्स द्वारा बताये गए रेंज से अधिक दूरी में रेडियो संकेत प्रसारित कर रही थी।

जगदीश चन्द्र बसु पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो तरंगें पहचानने के लिए सेमीकंडक्टर जंक्शन का प्रयोग किया और इस पद्धति में कई माइक्रोवेव अवयवों की खोज की। इसके बाद अगले 50 साल तक मिलीमीटर लम्बाई की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ। ई.1897 में जगदीश चंद्र बोस ने लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूशन में मिलीमीटर तरंगो पर किए हुए शोध का प्रदर्शन किया।

उन्होंने अपने शोध में वेवगाइड्स, हॉर्न ऐन्टेना, डाई-इलेक्ट्रिक लेंस, विभिन्न पोलराइज़र और 60 गीगा हट्र्ज तक के सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल किया। ये समस्त उपकरण आज भी कोलकाता के बोस इंस्टिट्यूट में रखे हैं। एक 1.3 एमएम मल्टीबीम रिसीवर जो की एरिज़ोना के छत्।व् 12 मीटर टेलिस्कोप में हैं, आचार्य बोस द्वारा 1897 में लिखे हुए शोध पत्र के सिद्धांतों पर बनाया गया है।

सर नेविल्ले मोट्ट को ई.1977 में सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक्स में किए गए शोधकार्य के लिए नोबल पुरस्कार मिला। उन्होंने आचार्य जगदीश चन्द्र बोस पर टिप्पणी करते कहा था कि बोस अपने समय से 60 साल आगे थे। बोस ने ही  च्  टाइप और छ टाइप सेमीकंडक्टर के अस्तित्व का पूर्वानुमान किया था।

जगदीश चन्द्र बसु का वनस्पति पर अनुसंधान

जगदीश चन्द्र बसु ने सिद्ध किया कि पौधों में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल) माध्यम से होता है न कि केमिकल माध्यम से। उन्होंने सबसे पहले माइक्रोवेव के वनस्पति के उतकों पर होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पौधों पर बदलते हुए मौसम से होने वाले असर का भी अध्ययन किया।

उन्होंने ‘कैमिकल इन्हिबिटर्स’ का पौधों पर असर और बदलते हुए तापमान से पौधों पर असर का भी अध्ययन किया था। अलग-अलग परिस्थितियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुँचे कि पौधे संवेदनशील होते हैं वे ‘दर्द एवं स्नेह’ अनुभव कर सकते हैं।

मेटल फटीग और कोशिकाओं की प्रतिक्रिया का अध्ययन

जगदीश चन्द्र बसु ने अलग-अलग धातु और पौधों के उतकों पर फटीग रिस्पांस का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने अलग-अलग धातुओं को इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, रासायनिक और थर्मल तरीकों के मिश्रण से उत्तेजित किया और कोशिकाओं तथा धातुओं की प्रतिक्रिया की समानताओं को चिह्ति किया। बोस के प्रयोगों ने नकली कोशिकाओं और धातु में चक्रीय (ब्लबसपबंस) फटीग प्रतिक्रिया दिखाई।

इसके साथ ही उन्होंने जीवित कोशिकाओं और धातुओं में अलग अलग तरह के उत्तेजनाओं के लिए विशेष चक्रीय फटीग और रिकवरी रिस्पांस का भी अध्ययन किया। आचार्य बोस ने बदलते हुए इलेक्ट्रिकल स्टिमुली के साथ पौधों की बदलते हुई इलेक्ट्रिकल प्रतिक्रिया का एक ग्राफ बनाया और यह भी दिखाया कि जब पौधों को ज़हर या एनेस्थेटिक (बेहोशी की दवा) दी जाती है तब उनकी प्रतिक्रिया कम होने लगती है और आगे चलकर शून्य हो जाती है किंतु जब जिंक धातु को ऑक्जिलिक एसिड के साथ उपचारित किया गया तब यह प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी।

नाइट की उपाधि

ई.1917 में जगदीश चन्द्र बसु को ‘नाइट’ (ज्ञदपहीज) की उपाधि प्रदान की गई तथा वे भौतिक एवं जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुने गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य साधारण उपकरणों और साधारण प्रयोगशाला में किया था। इसलिए वे भारत में अच्छी प्रयोगशाला बनाना चाहते थे। उनके विचार को मूर्तरूप देते हुए उनके नाम से ‘बोस इंस्टीट्यूट’ स्थापित की गई जो वर्तमान समय में वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है।

ई.1902 में निर्मित जगदीश चन्द्र बसु का घर (आचार्य भवन) अब संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। जगदीश चंद्र बोस सेवानिवृत्ति के बाद अपनी निजी प्रयोगशाला में प्रयोग एवं अनुसंघान करते रहे। कठोर परिश्रम के कारण उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता गया। ई.1933 में वे गम्भीर रूप से बीमार हो गए। डॉक्टरों की सलाह पर वे जलवायु परिवर्तन के लिए बिहार के गिरीडीह चले गए किंतु उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और 23 नवम्बर 1937 को उनका देहान्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

चन्द्रशेखर वेंकटरमन (सी. वी. रमन)

0
चन्द्रशेखर वेंकटरमन (सी. वी. रमन) - www.bharatkaitihas.com
चन्द्रशेखर वेंकटरमन (सी. वी. रमन)

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. चन्द्रशेखर वेंकटरमन विश्व भर के भौतिक-विज्ञानियों में विशेष स्थान रखते हैं। वे प्रथम भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्हें विश्व के सर्वोच्च ‘नोबल पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
To purchase this book please click on Image.

चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर के पास तिरूवालेक्कावाल गांव में में हुआ। उनके पिता चन्द्रशेखर अय्यर भौतिकी के प्राध्यापक थे तथा माता पार्वती अम्मल सुसंस्कृत परिवार की महिला थीं। चन्द्रशेखर वेंकटरमन की प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापत्तनम में हुई। वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और विद्वानों की संगति ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को बहुत प्रभावित किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने बारह वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। उन्हीं दिनों चन्द्रशेखर वेंकटरमन को श्रीमती एनी बेसेंट के भाषण सुनने और लेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। इससे उनके हृदय में भारत के गौरवशाली अतीत के बारे में चेतना उत्पन्न हुई। ई.1903 में उन्होंने चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। वेंकटरमन शरीर से बहुत दुबले-पतले थे किंतु उनका मस्तिष्क अत्यंत प्रतिभा-सम्पन्न था। उनके अध्यापक उनकी योग्यता से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कक्षाओं में उपस्थित होने से छूट मिल गई। इस समय का उपयोग वे प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय में करते थे। वे बी. ए. की परीक्षा में विश्वविद्यालय में अकेले ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उन्हें भौतिकी में स्वर्णपदक मिला तथा अंग्रेजी निबंध पर भी पुरस्कृत किया गया।

ई.1907 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से गणित में प्रथम श्रेणी में एम. ए. की डिग्री विशेष योग्यता के साथ प्राप्त की। उन्होंने इस विषय में इतने अंक प्राप्त किए जितने पहले किसी विद्यार्थी ने नहीं लिए थे।

स्नातकोत्तर परीक्षा उतीर्ण करने के बाद वे उच्च-शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे। भौतिक विज्ञान के प्राध्यापकों की अनुशंसा पर भारत सरकार ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर इंग्लैण्ड भेजना स्वीकार कर लिया किन्तु यूरोपीय डॉक्टरों ने शारीरिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण उन्हें इंग्लैण्ड जाने से रोक दिया।

शोध कार्य

ई.1906 में 18 वर्ष की अल्पायु में उनका प्रकाश विवर्तन पर पहला शोधपत्र- ‘आयताकृत छिद्र के कारण उत्पन्न असीमित विवर्तन पट्टियाँ’ लंदन की फिलॉसोफिकल पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यह शोध-पत्र  ध्वनि-विज्ञान के क्षेत्र में उनकी मौलिक खोज पर था। जब प्रकाश की किरणें किसी छिद्र में से अथवा किसी अपारदर्शी वस्तु के किनारे पर से गुजरती हैं तथा किसी पर्दे पर पड़ती हैं, तो किरणों के किनारे पर मंद-तीव्र अथवा रंगीन प्रकाश की पट्टियां दिखाई देती हैं।

यह घटना ‘विवर्तन’ कहलाती है। विवर्तन प्रकाश का सामान्य लक्षण है। इससे पता चलता है कि प्रकाश तरगों में निर्मित है। इसके दूसरे वर्ष उनका एक और शोधपत्र ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जो ‘प्रकाश-विज्ञान’ से सम्बन्धित था। इस अन्तराल में उन्होंने भौतिक विज्ञान पर कई ग्रन्थ लिखे।

चन्द्रशेखर वेंकटरमन की पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए उन्होंने नौकरी पाने के लिए भारत सरकार के वित्त विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा दी जिसमें वे प्रथम आए और जून 1907 में वे असिस्टेंट एकाउटेंट जनरल बनकर कलकत्ता चले गए। उन्हीं दिनों उनका विवाह कृष्णस्वामी की पुत्री त्रिलोक सुन्दरी से हुआ।

एक दिन जब वे कार्यालय से लौट रहे थे, उन्होंने एक साइन बोर्ड देखा जिस पर लिखा था ‘वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भारतीय परिषद (इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ़ साईंस)’। वे उसी समय ट्राम से उतरकर परिषद् कार्यालय में पहुँच गए और परिषद् की प्रयोगशाला में प्रयोग करने की अनुमति प्राप्त की।

कुछ समय बाद उनका स्थानांतरण पहले रंगून और फिर नागपुर हुआ। उन्होंने अपने घर में ही प्रयोगशाला बना ली और समय मिलने पर उसी में प्रयोग करने लगे। ई.1911 में उनका स्थानांतरण पुनः कलकत्ता हो गया। वे फिर से परिषद् की प्रयोगशाला में प्रयोग करने लगे।

ई.1917 तक वे प्रयोग करते रहे। इस अवधि में उन्होंने ‘ध्वनि के कम्पन और कार्य का सिद्धान्त’ विषय पर कार्य किया। ई.1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक का पद स्वीकृत हुआ, कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को यह पद स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर यह पद स्वीकार कर लिया।

चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने कुछ वर्षों तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में ‘वस्तुओं में प्रकाश के चलने’ का अध्ययन किया। इनमें किरणों का पूर्ण समूह बिल्कुल सीधा नहीं चलता है। उसका कुछ भाग अपनी राह बदलकर बिखर जाता है।

आशुतोष मुकर्जी ने उन्हें विदेश जाकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने का सुझाव दिया किंतु उन्होंने विदेश जाने से यह कहकर मना कर दिया कि- ‘ज्ञान का समस्त भण्डार तो भारत ही है, इसलिए पश्चिम में ज्ञान प्राप्त करने की कोई बात नहीं है। भारत विश्व को ज्ञान देता आया है और आज भी वह विश्व को ज्ञान प्रदान करने की क्षमता रखता है।’

ई.1919 तक वेंकटरमन भारतीय वैज्ञानिक अनुसंघान परिषद के उप-सभापति थे किंतु संस्था के प्रधान डॉ. अृतलाल सरकार की मृत्यु हो जाने के कारण वेंकटरमन को संस्था का अवैतनिक प्रधान बनाया गया। ई.1921 में ब्रिटिश साम्राज्य के विश्वविद्यालयों का लन्दन में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, उसमें उन्हें कलकता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने भेजा गया।

वहाँ जब अन्य प्रतिनिधि लंदन में दर्शनीय स्थलों को देखकर अपना मनोरंजन कर रहे थे, तब चन्द्रशेखर वेंकटरमन सेंट पॉल गिरजाघर में उसके फुसफुसाते गलियारों का रहस्य समझने में लगे हुए थे। ई.1924 में उन्हें रॉयल सोसायटी लंदन का फैलो बनाया गया।

रमन प्रभाव

प्रो. रमन की रुचि ध्वनि-विज्ञान के साथ-साथ प्रकाश-विज्ञान में भी थी। वे प्राकृतिक रंगों से अत्यधिक आकर्षित होते थे। इंग्लैण्ड की यात्रा करते समय समुद्र की अद्भुत नीलिमा एवं दूधियापन ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉर्ड रैले ने समुद्र के नीला दिखने का कारण एक प्रकार का प्रकीर्णन बताया था जिससे प्रोफेसर वेंकटरमन सन्तुष्ट नहीं थे।

कलकत्ता लौटने पर उन्होंने इस पर शोध आरम्भ किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन लगभग सात वर्ष तक प्रकाश तरंगों का अध्ययन करते रहे। ई.1927 में उनका ध्यान इस बात पर गया कि जब एक्स किरणें प्रकीर्णित होती हैं तो उनकी तरंग लम्बाइयाँ बदल जाती हैं। उन्होंने विचार किया कि साधारण प्रकाश में भी ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए? उन्होंने स्पेक्ट्रोस्कोप में पारद आर्क के प्रकाश का स्पेक्ट्रम बनाया।

वेंकटरमन ने इन दोनों के मध्य विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ रखे तथा पारद आर्क के प्रकाश को उनमें से गुजार कर अलग-अलग स्पेक्ट्रम बनाए। उन्होंने देखा कि प्रत्येक स्पेक्ट्रम में अन्तर पड़ता है और प्रत्येक पदार्थ अपनी-अपनी प्रकार का अन्तर डालता है। स्पेक्ट्रम चित्रों को मापकर उनकी सैद्धान्तिक व्याख्या की गई तथा यह प्रमाणित किया गया कि यह अन्तर पारद-प्रकाश की तरंग-लम्बाइयों में परिवर्तित होने के कारण पड़ता है।

चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने यह प्रमाणित किया कि समुद्र का पानी सूर्य के प्रकाश के कारण नीला दिखाई देता है। केवल पारदर्शक द्रव्यों में ही नहीं अपितु बर्फ और स्फटिक जैसे ठोस पारदर्शक पदार्थो में भी अणुओं की गति के कारण प्रकाश का परिपेक्षण होता है। इसी सिद्धांत को ‘रमन प्रभाव’ के नाम से जाना गया।

29 फरवरी 1928 को चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने अपनी इस खोज को सार्वजनिक कर दिया। 31 मार्च 1928 को ‘नेचर’ पत्रिका में उनकी शोध पर आधारित एक शोध-पत्र- ‘ए न्यू टाइप ऑफ ए सैकण्डरी रेडिएशन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। चन्द्रशेखर वेंकट रमन ने 28 फरवरी को रमन प्रभाव की खोज की थी, इसकी स्मृति में भारत में इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

वाद्य-यन्त्रों की ध्वनियों का अध्ययन

चन्द्रशेखर वेंकटरमन वीणा वादन में अत्यंत निपुण थे। उन्होंने ‘कम्पन्न’ विषय पर अनुसंधान के दौरान विभिन्न वाद्य-यंत्रों की ध्वनियों का अध्ययन किया तथा संगीत और वाद्य-यंत्रों के सम्बन्ध में अनेक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने वाद्ययंत्रों की विभिन्न प्रकार की संगीत-ध्वनियों के अध्ययन हेतु अनेक नवीन यंत्रों का आविष्कार भी किया।

वाद्यों की भौतिकी का उन्हें इतना गहरा ज्ञान था कि ई.1927 में जर्मनी में प्रकाशित बीस खण्डों वाले भौतिकी विश्वकोश के आठवें खण्ड के लिए वाद्ययंत्रों की भौतिकी का आलेख चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने ही तैयार किया था। इस कोश में वे अकेले गैर-जर्मन वैज्ञानिक थे।

पुरस्कार एवं उपाधियां

चन्द्रशेखर वेंकटरमन को ई.1930 में रमन प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इससे रमन प्रभाव के अनुसंधान के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ब्रिटिश सरकार ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को ‘नाइट’ की उपाधि से अलंकृत किया जिसे उन्होंने गुलामी का प्रतीक कहकर अस्वीकार कर दिया। उन्हें इटालियन साइन्स कौंसिल द्वारा मटुची पदक, ह्यूज पदक एवं विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।

 ई.1948 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने रमन शोध संस्थान बैंगलोर की स्थापना की और इसी संस्थान में शोध करने लगे। स्वाधीन भारत की सरकार ने ई.1949 में उन्हें सर्वप्रथम ‘राष्ट्रीय प्रोफेसर’ बनाया और ई.1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया। ई.1957 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार प्राप्त हुआ।

ऑपथैलोमोस्कोप का आविष्कार

ई.1960 में चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने आंख के रेटिना को देखने के लिए ‘ ऑपथैलोमोस्कोप’ यंत्र का आविष्कार किया जिससे आंख के अन्दर की रचना और क्रियाएं आसानी से देखी जा सकती हैं। इतना ही नहीं आपने रेटिना में तीन रंगों की भी खोज की तथा इन रंगों के कार्य और प्रभाव का भी पता लगाया।

प्रो. रमन अत्यन्त ही शान्त प्रकृति के व्यक्ति थे तथा अपने कार्य में आने वाली बाधाओं से विचलित नहीं होते थे। व कहते थे- ‘हम उस समय तक के लिए प्रयत्नशील हैं जब तक कि हम पूर्व के ज्ञान की ज्योति से पश्चिमी जगत् को प्रकाशित न कर दें।’ 2 अक्टूबर 1970 को उन्होंने विज्ञान अकादमी के तत्त्वावधान में गांधी स्मारक व्याख्यान दिया जो उनका अन्तिम व्याख्यान था। 21 नवम्बर 1970 को उनका निधन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

प्रस्तावना – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

0
प्रस्तावना - हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया
प्रस्तावना - हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

प्रस्तावना – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया पृष्ठ पर पुस्तक की विषय वस्तु को स्पष्ट किया गया है। इस पुस्तक के लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता हैं।

अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय ऋषि-मुनि मानव मात्र को सुखी बनाने के उद्देश्य से धरती के विभिन्न द्वीपों और दूरस्थ देशों की यात्रा करके अहिंसा, प्रेम, सद्भाव एवं शांति का संदेश देते आए हैं जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है। यह भारतीय संस्कृति ईसाई रिलीजन तथा इस्लाम के प्रादुर्भाव से सैंकड़ों साल पूर्व ही, विश्व के अनेक द्वीपों, प्रायद्वीपों एवं महाद्वीपों में फैल गई थी।

भारतीय संस्कृति को दूसरे देशों में ले जाने वाले उपदेशक हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म के प्रचारकों के रूप में नहीं गए थे। वे धरती पर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने तथा मुनष्यों को हिंसा का मार्ग त्यागकर प्रेम से रहने का उपदेश देने के उद्देश्य से गए थे, बाद में इन्हें हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म का प्रचारक कहकर उनके योगदान को कम करके आंकने का प्रयास किया गया। आज से लगभग 2000 साल पहले ईसाई धर्म तथा 1400 साल पहले इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात्, पूरी धरती से हिन्दू धर्म तेजी से समाप्त हुआ है।

चीन, जापान, वियतनाम, थाइलैण्ड तथा बर्मा आदि अनेकानेक एशियाई देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार हो जाने से बौद्ध धर्म का उतना ह्रास नहीं हुआ जबकि हिन्दू धर्म सैंकड़ों द्वीपों और देशों में दम तोड़ चुका है। भारत के अतिरिक्त केवल नेपाल देश तथा इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में ही हिन्दुओं का बड़ी संख्या में अधिवास है। भारत को आपातकाल में ई.1976 में 42वें संविधान संशोधन से धर्म-निरपेक्ष देश घोषित किया गया। धर्म-निरपेक्ष बनने वाला यह संसार का पहला देश था।

हाल ही के दशकों में नेपाल में चीन ने जिस प्रबलता के साथ साम्यवाद का आक्रमण किया, उसके प्रभाव में आकर नेपाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित हो गया। संसार में इन दो देशों के अतिरिक्त और कहीं भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं पाई जाती। बाली के हिन्दू जिस देश के निवासी हैं, उस देश में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहती है।

To purchase this book please click on this photo.

विश्व के मानचित्र पर हिन्दू हर तरह से नष्ट हो रहे हैं, जनसंख्या से लेकर संस्कृति तक सब कुछ समाप्त हो रहा है किंतु हिन्दू जाति मदांध होकर सोई हुई है। ई.1947 में पाकिस्तान में 20 प्रतिशत हिन्दू थे जो आज केवल 2-3 प्रतिशत रह गए हैं। बांगलादेश में भी हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया है, उनकी लड़कियों से बलपूर्वक विवाह किया जा रहा है, उनके घरों को जलाया जा रहा है। यहाँ तक कि पश्चिमी बंगाल में भी ऐसी घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में देखने का मिली हैं। केरल, काश्मीर, आसाम में भी हिन्दू जाति का अस्तित्व मिट रहा है। वोटों की राजनीति के समक्ष सब-कुछ समर्पित किया जा रहा है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, इसे देखा और समझा जाना आवश्यक है। अप्रेल 2017 के तीसरे एवं चौथे सप्ताह में प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, हमारे परिवार ने इण्डोनेशिया गणराज्य के दो द्वीपों- बाली तथा जावा की यात्रा की। इस दौरान हमें देनपासार, उबुद, मेंगवी, कुता, जोग्यकार्ता तथा जकार्ता आदि नगरों का भ्रमण करने का अवसर मिला।

हमने सुन रखा था कि बाली और जावा द्वीपों पर सैंकड़ों साल पुराने कुछ ऐसे हिन्दू तथा बौद्ध मंदिर स्थित हैं जिनका निर्माण देवताओं द्वारा किया गया। ये देवता किसी अन्य ग्रह से आए हुए परग्रही जीव रहे होंगे जिनकी तकनीक तथा शिल्प उस काल के इंसानों की तकनीक तथा शिल्प की तुलना में अत्यंत उच्च कोटि की रही होगी। तभी वे सैंकड़ों की संख्या वाले हिन्दू मंदिरों के समूह तथा विश्व के सबसे बड़े पिरामिडीय रचना वाले बौद्ध मंदिरों का निर्माण कर पाये। हमने इन मंदिरों को देखने की लालसा में इण्डोनेशिया भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था।

इण्डोनेशिया निश्चित ही एक सुंदर देश है जो भारतीयों को अपनी वैविध्यपूर्ण हिन्दू संस्कृति तथा सुन्दर समुद्री तटों के कारण आकर्षित करता है। हमने इसे एक धार्मिक यात्रा की तरह आरम्भ किया किंतु शीघ्र ही हमारी यह यात्रा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों की खोजपूर्ण यात्रा में बदल गई तथा एक-एक करके बहुत से रहस्यों पर से आवरण हटाने वाली सिद्ध हुई। जैसे-जैसे हम अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते गये, नए-नए रहस्यों पर से पर्दा उठता गया।

कुछ ही दिनों में हमने समझ लिया कि हमने प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, अनजाने में ही बाली द्वीप के रूप में सात समुद्रों के बीच एक रहस्यमय किंतु निर्धन भारत के अवशेषों को खोज निकाला है। एक ऐसा निर्धन भारत जहाँ गाय नहीं है, गंगाजी नहीं हैं, गेहूं नहीं है। दूध, घी, दही, छाछ, रोटी, सोगरा, ढोकला, दाल-बाटी कुछ भी नहीं है। स्वाभाविक है कि ऐसा देश नितांत निर्धन ही हो सकता है। 

यह सचमुच एक रहस्यमय निर्धन भारत है जो अपने समस्त प्राचीन वैभव को खोकर और अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर सांस्कृतिक प्रदूषण की आंधी के झौंकों में संघर्ष कर रहा है।  बाली द्वीप पर भले ही आज भी 85-90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु जावा द्वीप पर 90 प्रतिशत लोग इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं।

इण्डोनेशिया के सबसे बड़े द्वीप सुमात्रा में भी मुसलमानों की जनसंख्या की यही स्थिति है जिसका परिणाम यह है कि आज इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथा इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। हिन्दुओं का छोटा सा दीपक बाली देश के रूप में टिमटिमा रहा है। इस सच्चाई के बीच बाली और जावा द्वीपों के हिन्दू और बौद्ध धर्मस्थलों को देखना कम रोमांचक नहीं है।

इण्डोनेशिया के मुसलमानों और भारत के मुसलमानों में भी सांस्कृतिक भिन्नता है। इस भिन्नता को देखना और समझना काफी रोचक है। इण्डोनेशिया के मुसलमानों ने यूनेस्को की सहायता से हिन्दू और बौद्ध मंदिरों को धरती में से खोज निकाला है और फिर से खड़ा करके पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।

इण्डोनेशिया के नगरों एवं द्वीपों में मुख्य चौराहों पर भवनों के सामने, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को बड़ी शान से दिखाया जाता है। इण्डोनेशियाई समाज हजारों साल से स्त्री प्रधान रहा है। आज भी इण्डोनेशियाई समाज इस विशेषता से सम्पन्न है। यही कारण है कि वहाँ की औरतें बुरका, हिजाब आदि नहीं पहनतीं। वे आधुनिक संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं और अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति पर गौरव करती हैं। एक ऐसी संस्कृति जो इस्लाम का हिस्सा नहीं है, अपितु इण्डोनेशियाई समाज के इतिहास और गौवमयी अतीत का हिस्सा है।

हमारे अनुभव, नितान्त हमारे अपने हैं किंतु अपने इन अनुभवों को सार्वजनिक करना इसलिए आवश्यक हो गया ताकि भारत के लोग भी समुद्रों के बीच बसने वाले एक और निर्धन भारत की सच्चाई एवं त्रासदी को जान सकें। इस निर्धन भारत की यात्रा से पहले हमें इसके भौगोलिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों को संक्षेप में जान लेना आवश्यक है। इसलिए पुस्तक के आरम्भ में उन्हें भी समुचित स्थान दिय गया है। आशा है, पाठकों को यह पुस्तक पसंद आएगी। शुभम्।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अनुक्रमणिका – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

0
अनुक्रमणिका - हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया
अनुक्रमणिका - हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया

अनुक्रमणिका – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों का क्रम दिया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके अध्यायों तक सीधे ही पहुंचा जा सकता है।

1. प्रस्तावना

2. इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ

3. जावा द्वीप का प्रारम्भिक इतिहास

4. सुमात्रा में बौद्ध धर्मानुयायी श्री विजय राजवंश

5. इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमानों की संस्कृति

6.    मसाला द्वीपों से व्यापार के लिए यूरोप में प्रतिस्पर्द्धा

7. इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम

8. बाली द्वीप में हिन्दू सभ्यता का विकास

9. वर्तमान समय में बाली

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

10.  इण्डोनेशिया के प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर

11. परमबनन शिव मंदिर समूह

12. प्लाओसान बौद्ध मंदिर

13. बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार

14. चण्डी बोरोबुदुर

15.  जकार्ता के मंदिर

16.  बाली द्वीप के मंदिर

17.  उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं

18.  बाली एवं जावा द्वीपों पर ग्यारह दिन

19.  बाली द्वीप पर पांच दिन

20.  बाली द्वीप में पहला दिन

21. बाली द्वीप में दूसरा दिन 

22. तमन राम सीता

23. तमन अयुन पुराडेसा 

24.  तनाहलोट मंदिर की ओर

25. गुलंगान पर्व के शानदार जुलूस 

26. बाली द्वीप में तीसरा दिन

27. बाली द्वीप में चौथा दिन 

28. जावा द्वीप पर पांच दिन

29. जावा द्वीप पर दूसरा दिन 

30. परमबनन शिव मंदिर

31. जावा द्वीप पर तीसरा दिन

32. विशालाकाय पहाड़नुमा स्थापत्य संरचना 

33. गैम्बीरा लोका जू 

34. राशन की खोज 

35. योग्यकार्ता से विदा

36. इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में तीन दिन

37. जावा द्वीप पर अंतिम दिन

अनुक्रमणिका – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों का क्रम दिया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके अध्यायों तक सीधे ही पहुंचा जा सकता है।

- Advertisement -

Latest articles

हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा - bharatkaitihas.com

हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा

0
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा धरती पर घटित उन विलक्षण घटनाओं में से है जो मानवता के इतिहास में बहुत...
मोहन भागवत के नाम खुला पत्र - bharatkaitihas.com

मोहन भागवत के नाम खुला पत्र

0
मोहन भागवत के नाम खुला पत्र मोहन भागवत के नाम खुला पत्र राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से लिखा गया है। आज...
सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...