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जावा द्वीप का इतिहास (2)

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जावा द्वीप का इतिहास

जावा द्वीप का प्रारम्भिक इतिहास यवद्वीप के नाम से मिलता है। भारतीय संस्कृत साहित्य में इस द्वीप का उल्लेख यवद्वीप के नाम से हुआ है जहाँ चावल एवं स्वर्ण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था।

चीनी संदर्भों में भी जावाद्वीप का इतिहास मिलता है। चीनी पुराणों के अनुसार जावा में लगभग 2 शताब्दी ईस्वी पूर्व में भारतीय लोग पहुंच चुके थे। ये लोग भारत के कलिंग राज्य से आए थे।

डॉ. क्रोम नामक डच पुरातत्ववेत्ता के अनुसार हिन्दुओं के जावा पहुचंने से पहले ही जावा के लोग चावल की खेती करते थे। वे मछली पकड़ने, कपड़ा बुनने, वाद्ययंत्र बजाने, ज्योतिष जानने आदि कलाओं को जानते थे। जब भारतीय हिन्दू यहाँ पहुंचे तो यहाँ के लोगों ने हिन्दू विश्वासों एवं संस्कृति को अपना लिया और जावा की पुरानी संस्कृति भी उसमें घुल-मिल गई।

दूसरी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में हिन्दू राजा देववर्मन ने जावा द्वीप पर प्रबल हिन्दू राज्य की स्थापना की जो चौथी-पांचवी शताब्दी ईस्वी तक फलता-फूलता रहा। चीनी यात्री फाह्यान 400 शताब्दी ईस्वी में भारत आया था। जब वह ई. 412 में श्रीलंका होता हुआ समुद्र के रास्ते से चीन लौट रहा था, तब उसका जहाज समुद्रों में भटक गया तथा लगभग 100 दिनों तक समुद्री लहरों पर हिचकोले खाता हुआ जावा द्वीप पर पहुंचा। इस द्वीप पर उसने वैदिक एवं शैव धर्र्मों को मानने वाले लोगों को निवास करते हुए पाया।

गुप्तकाल में जावा द्वीप का इतिहास

जावा एवं अन्य ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर भारतीय राजाओं का प्रसार अत्यंत प्राचीन काल से है। उसका कोई लेखा-जोखा प्राप्त नहीं होता। फिर भी गुप्त काल से जावा के हिन्दू राजाओं के लिखित संदर्भ मिलने लगते हैं।

भारत में ई. 320 से 495 तक गुप्तवंश के राजाओं का शासन रहा जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है। उस काल में बौद्ध धर्म की जगह वैष्णव धर्म का उन्नयन किया गया। उस काल में सुमात्रा, जावा, बाली, बोर्नियो, चम्पा, कम्बोडिया, मलाया तथा मलक्का आदि द्वीपों में भारतीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा का खूब प्रचार हुआ। इन द्वीपों में नए सिरे से हिन्दू राज्यों की स्थापना हुई। जावा की एक अनुश्रुति के अनुसार इस काल में गुजरात के एक राजकुमार ने कई हजार मनुष्यों के साथ समुद्र पार कर जावा में उपनिवेश की स्थापना की।

गुप्त काल में ताम्रलिप्ति बंगाल का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। उत्तरी भारत का सारा व्यापार इसी बन्दरगाह द्वारा चीन, बर्मा तथा पूर्वी-द्वीप-समूह से होता था। इन देशों के साथ दक्षिण-भारत के राज्यों से भी व्यापार होता था। यह व्यापार गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मुहानों पर स्थित बन्दरगाहों के द्वारा होता था। इस प्रकार गुप्तकाल में पूर्वी द्वीप समूहों के साथ भारत के घनिष्ठ राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए।

इन द्वीपों में भारतीय सामाजिक प्रथाओं, धर्म, कला तथा शासन पद्धति का अनुसरण होने लगा। डॉ. अल्तेकर ने लिखा है- ‘यदि एक ओर भारत और दूसरी ओर चीन के बीच कोई सांस्कृतिक एकता विद्यमान है और यदि मूल्यवान स्मारक, जो भारत की संस्कृति के गौरव के मूक साक्षी हैं, समस्त इंडोचीन (विएतनाम), जावा, सुमात्रा तथा बोर्निया में विकीर्ण परिलक्षित होते हैं तो इसका श्रेय गुप्तकाल को ही प्राप्त है, जिसने भारतीय संस्कृति को बाहर विस्तारित करने की प्रेरणा प्रदान की।’

जावा में शैलेन्द्र राजवंश का उदय (मेदांग राज्य)

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चौथी शताब्दी ईस्वी में जब भारत में गुप्त राजाओं का राज्य विस्तार पा रहा था, जावा द्वीप पर शैलेन्द्र राजवंश की स्थापना हुई। यह राज्य मलाया (मलेशिया), सुमात्रा, जावा, बाली तथा बोर्नियो द्वीपों पर विस्तृत था। मलाया में उससे पहले भी हिन्दू बस्तियां थीं किंतु उनके राजनीतिक स्वरूप की जानकारी नहीं मिलती है। शैलेन्द्र साम्राज्य 11वीं शताब्दी ईस्वी तक चलता रहा। दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य के राजा राजेन्द्र चोल ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में इण्डोनेशिया के शैलेन्द्र राजवंश का अंत कर दिया। चोल राजा दक्षिण भारत से हजारों किलोमीटर दूर के क्षेत्र पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाए। इसलिए 12वीं शताब्दी में एक बार पुनः शैलेन्द्र राजवंश ने अपनी सत्ता विस्तृत कर ली। शैलेन्द्र राजवंश के राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए थे। इसलिए उन्होंने जावा में कई बौद्ध मंदिरों एवं विहारों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्वपूर्ण बौद्ध मठ नालंदा कहलाता था तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण विहार नागपट्टनम कहलाता था। ये दोनों स्थान जावा द्वीप में थे। शैलेन्द्र राजवंश ने चंडी कालासन (कालासन मंदिर) तथा बोरोबुदुर बौद्ध विहार का भी निर्माण करवाया।

कुछ शिलालेखों से प्रमाणित हुआ है कि जावा का शैलेन्द्र राज-परिवार प्राचीन मलाया भाषा का प्रयोग करता था। यह भाषा इस बात का प्रमाण है कि शैलेन्द्र राज-परिवार जावा में आने से पहले सुमात्रा द्वीप पर शासन करता था तथा यह श्रीविजय राजवंश से सम्बन्धित था। उसने मध्य जावा के स्थानीय शासकों को परास्त करके जावा द्वीप पर अधिकार किया। उन्होंने माताराम राज्य के संजय राजवंश को अपना जागीरदार बना लिया। शैलेन्द्रों की सत्ता का केन्द्र दक्षिण केडू था जो मगेलांग के निकट स्थित था। वर्तमान में यह योग्यकार्ता के उत्तर में स्थित है।

शैलेन्द्र राजवंश आरम्भ में शैव मत का अनुयायी था किंतु बाद में राजा संखरा (राकाई पनरबन अथवा पनंगकरन) द्वारा महायान बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिए जाने के बाद बौद्ध हो गया था। राजा संखरा के शिलालेख, सोजोमेर्तो शिलालेख एवं चरित परह्यंगान ग्रंथ के के अनुसार परवर्ती काल के शैलेन्द्र राजा पनंगकरन के वंशज, बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अनुयायी बने रहे। वे समरतुंग के शासन के अंत तक बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय देते रहे। सोजोमेर्तो शिलालेख अब उपलब्ध नहीं है।

सुंदा राज्य (पश्चिमी जावा)

सुंदा राज्य, पश्चिम जावा में स्थित हिन्दू राज्य था जिसकी स्थापना ई.669 में हुई। वर्तमान जकार्ता, पश्चिमी जावा, मध्य जावा का पश्चिमी भाग तथा बान्टेन इसी सुंदा राज्य में स्थित थे। ”बुजंग्गा माकिन” पाण्डुलिपि के अनुसार सुंदा राज्य की पूर्वी सीमा का निर्माण पामाली नदी नामक नदी करती थी जिसे अब ब्रेब्स नदी कहा जाता है। मध्य जावा में इसकी सीमा में सारायू नामक नदी बहती थी। ई.1579 में इस राज्य को मध्य जावा के मुस्लिम शासकों ने नष्ट कर दिया।

संजय राजवंश (माताराम राज्य)

संजय राजवंश एक प्राचीन जावाई राजवंश था। इस वंश के राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की, वह माताराम राज्य कहलाया। संभवतः जावा द्वीप की मातृ-सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण इस राज्य को माताराम कहा गया। माताराम राज्य की स्थापना ब्रांटाज नदी की घाटी में हुई थी। यहाँ की भूमि उपजाऊ थी और खेती प्रचुरता से होती थी।

कंग्गल लेख के अनुसार इस राजवंश की स्थापना ई.732 में संजय नामक राजा ने की। यह शिलालेख मागेलांग नामक नगर के दक्षिण-पश्चिम में मिला है। इसकी लिपि दक्षिण भारत के तत्कालीन पल्लव शासकों द्वारा प्रयुक्त होने वाली लिपि है तथा इसकी भाषा संस्कृत है। इस शिलालेख में कुंजरकुंजा क्षेत्र की पहाड़ी पर शिवलिंग स्थापित किए जाने के बारे में जानकारी दी गई है।

इस शिलालेख में कहा गया है कि राजा सन्न ने इस द्वीप पर फिर से अधिकार किया तथा उसने लम्बे समय तक बुद्धिमत्ता पूर्वक एवं कौशल पूर्वक राज्य किया। राजा सन्न की मृत्यु के बाद राजवंश की एकता भंग हो गई जिससे राज्य खण्डित होने लगा किंतु स्वर्गीय राजा सन्न की बहिन सन्नह के पुत्र संजय ने सत्ता संभाली। उसने राज्य में धर्म, साहित्य तथा विविध कलाओं का प्रचार किया तथा सैन्य शक्ति में वृद्धि की। उसने आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया तथा जनता को सुखी एवं समृद्ध बनाने का प्रयास किया। राजा सन्न एवं संजय को ”चरित परहयंगान” भी कहा जाता है।

पश्चवर्ती काल की एक पुस्तक के अनुसार राजा सुन्न को गलुह के राजा पुरबासोरा ने परास्त कर दिया। इसलिए उसे मेरापी के पर्वत में शरण लेनी पड़ी। संजय ने उसके खोए हुए राज्य को फिर से जीता तथा पश्चिमी जावा, मध्य जावा, पूर्वी जावा एवं बाली तक अपना राज्य फैला लिया। संजय ने मलयु तथा केलिंग परह्यंगान के राजा ”संग श्रीविजय” से भी युद्ध किया।

इसके बाद की अवधि में शैलेन्द्र राज्य द्वारा संजय राज्य को उत्तरी जावा में धकेल दिया गया। कालासन शिलालेख के अनुसार शैलेन्द्र राज्य का उत्थान ई.778 के लगभग हुआ था। इस काल में संजय राज्य एवं शैलेन्द्र राज्य एक दूसरे के पड़ौस में स्थित थे और यह काल शांति, सहयोग एवं सहअस्तित्व से युक्त था।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संजय राजवंश नामक कोई वंश नहीं था, केवल शैलेन्द्र राजवंश था जो मध्य जावा में शासन करता था। इस राज्य को मेदांग कहा जाता था। इसकी राजधानी माताराम क्षेत्र में थी तथा इसके शासक शैलेन्द्र वंश के थे। संजय वंश के राजा भी इसी शैलेन्द्र राजवंश से निकले थे।

संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातान का विवाह शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी (ई.833-56) से हुआ। समय के साथ संजय राजवंश का प्रभाव माताराम राज्य में बढ़ता गया तथा वे बौद्ध धर्म मानने वाले शैलेन्द्र राज्य को प्रतिस्थापित करते रहे। राकाई पिकातान ने शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग के पुत्र बालापुत्र को उसके राज्य से निकाल दिया जो कि राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी का भाई था।

जब मध्य जावा से शैलेंद्र वंश के राजा बालापुत्र का राज्य समाप्त हो गया तो वह भाग कर सुमात्रा चला गया। सुमात्रा में श्री विजय वंश के राजा राज्य करते थे। बालापुत्र ने श्री विजय साम्राज्य के तत्कालीन राजा को परास्त करके अपने अधीन कर लिया और स्वयं सुमात्रा का परमोच्च शासक बन गया। राजा पिकातान के काल में जावा में शैव धर्म को पुनः राजकीय प्रश्रय प्राप्त हुआ तथा यह संरक्षण मेदांग राज्य के अंत होने तक जारी रहा।

संजय वंश के हिन्दू राजाओं ने मध्य जावा में विश्वविख्यात शिव मंदिर बनवाया तथा जावा द्वीप पर हिन्दू संस्कृति का प्रसार किया। राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी ने 9वीं शताब्दी ईस्वी में विश्व प्रसिद्ध बोरोबुदुर बौद्ध विहार बनवाया। योग्यकार्ता, सुराकार्ता तथा मध्य जावा, माताराम राज्य के प्रमुख केन्द्र थे। यह अत्यंत ऊर्वर क्षेत्र में स्थित था इसलिए इस राज्य में परमबनन तथा बोरोबुदुर जैसे विशाल मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। ई.850 तक संजय राजवंश, सम्पूर्ण माताराम राज्य का शासक बन गया।

ई.907 के बालितुंग शिलालेख से भी संजय राजवंश की जानकारी मिलती है। इसके अनुसार जब संजय वंश का कोई राजा मर जाता था तो वह दिव्य रूप धारण कर लेता था। इसी शिलालेख के आधार पर संजय राजवंश के राजाओं की सूची तैयार की गई है। ई.929 में संजय वंश का राजा मपु सिंदोक, माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्व जावा में ले गया।

इसका कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान किया जाता है कि मेरापी ज्वालामुखी के फट पड़ने के कारण ऐसा किया गया होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सुमात्रा के श्री विजय राज्य द्वारा मध्य जावा पर आक्रमण कर देने के कारण राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले जाना पड़ा होगा। इसके साथ ही मध्य जावा से संजय राजवंश का शासन समाप्त हो गया तथा पूर्वी जावा में इस्याना नामक नवीन राजवंश का उदय हुआ।

चम्पा से सम्बन्ध

जावा राज्य का चम्पा राज्य से निकट का सम्बन्ध था जो कि दक्षिण-पूर्वी एशिया की मुख्य भूमि पर स्थित था। यह सम्बन्ध संजय राजवंश के उदय होने तक बना रहा। चम्पा के लोग चम कहलाते थे और उन्हें भारतीयकृत ऑस्ट्रोनेशियाई माना जाता है। मध्य जावा के द्वीप पर संजय राजवंश के काल में निर्मित मंदिरों की अनेक स्थापत्य विशेषताओं को चम मंदिरों में देखा जा सकता है।

इस्याना राजवंश

जावा द्वीप के माताराम हिन्दू राज्य के नए शासक वंश को इस्याना राजवंश कहा जाता है जिन्होंने संजय राजवंश के बाद सत्ता संभाली। इसकी स्थापना मपु सिंदोक ने की जो माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले गया। चोइदेस नामक लेखक ने लिखा है कि सिंदोक ने श्री इस्याना (विक्रमाधर्मोत्तुंगदेव) के नाम से पूर्वी जावा में नए राजवंश की स्थापना की। उसकी पुत्री इस्याना तुंगविजय, मपु सिंदोक की उत्तराधिकारी हुई।

इस्याना तुंगविजय के बाद इस्याना तुंगविजय का पुत्र मकुतावंशवर्द्धन पूर्वी जावा का राजा हुआ। उसके बाद धर्मवंग्सा उसका उत्तराधिकारी हुआ। इस्याना राजवंश के काल में ई.996 में भारत-युद्ध गाथा का जावाई भाषा में अनुवाद किया गया। ई.1016-17 में सुमात्रा द्वीप के श्री विजय साम्राज्य के राजा ने जावा द्वीप पर आक्रमण किया तथा राजा धर्मवंग्स की राजधानी को नष्ट कर दिया। इस युद्ध में इस्याना राजवंश समाप्त हो गया।

केदिरी वंश (काहुरिपन राज्य)

ई.1019 में ऐरलंग्गा ने मेदांग राज्य को फिर से इकट्ठा किया तथा काहुरिपन नामक नया राज्य अस्तित्व में आया। ऐरलंग्गा ई.1042 तक शासन करता रहा। ऐरलिंग्गा के वंशज केदिरी कहलाए। माना जाता है कि काहुरिपन नामक राज्य, इस्याना राज्य की ही निरंतरता में था। केदिरी राजवंश ई.1222 तक शासन करता रहा।

सिंघसरी वंश

ई.1222 में जावा के केदिरी राजा नष्ट हो गए तथा सिंघसरी राजवंश अस्तित्व में आया। वे ई.1292 तक शासन करते रहे। इस क्षेत्र को वर्तमान में मलांग कहते है।

मजापहित साम्राज्य

ई.1294 में जावा में विजय नामक राजा ने मजापहित साम्राज्य की स्थापना की। यह इण्डोनेशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी त्रोवुलान थी जो सुराबाया के निकट स्थित थी। ई.1350 में इस वंश में हायम वुरुक नामक राजा हुआ जो इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था।

हायम वुरुक का मंत्री ‘गजह मद’ वीर एवं बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने शपथ ग्रहण की कि जब तक वह सम्पूर्ण इण्डोनेशिया द्वीप समूह को मजापहित साम्राज्य के अधीन नहीं लाएगा, तब तक वह अपने भोजन में पलापा (मसाले) का उपयोग नहीं करेगा।

निश्चत ही उसने अपनी शपथ पूरी की जिसके कारण मजापहित साम्राज्य में वह सम्पूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हो गया जो वर्तमान में इण्डोनेशिया गणतंत्र में सम्मिलित है। हालांकि उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण केवल जावा, बाली एवं मदुरा पर था। हायम वुरुक ई.1389 तक शासन करता रहा। जब बीसवीं सदी में इण्डोनेशिया ने अपना पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा तो उसका नाम गजह मद के सम्मान में पलापा रखा गया। यह राजवंश ई.1478 तक हिन्दू राजवंश के रूप में शासन करता रहा।

देमक राज्य (मध्य जावा)

ई.1478 के पश्चात् जावा में इस्लाम की आंधी चलने लगी जिसके क्रूर झौंकों से मजापहित साम्राज्य के हिन्दू राजाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और सत्ता का केन्द्र मध्य जावा के सेमारांग से 30 किलोमीटर पूर्व में चला गया। यह जावा की हजारों साल पुरानी संस्कृति के लिए बहुत बड़ा आघात था। हजारों हिन्दू परिवार जावा द्वीप छोड़कर भाग गए और उन्होंने बाली द्वीप में ब्रोमो पर्वत (टेंगेर) के निकट जाकर शरण ली।

पंद्रहवीं शताब्दी में जावा के लोगों ने जब इस्लाम स्वीकार किया तो एक बार पुनः जावा की संस्कृति में बदलाव आया और हिन्दू-जावाई संस्कृति में इस्लाम ने प्रवेश करके जावा की वर्तमान संस्कृति को जन्म दिया। देमक राज्य का पहला राजा रादेन पाताह था। उसका पिता मजापहित वंश का अंतिम राजा था तथा माता जेआम्पा, एक मुस्लिम स्त्री थी। दूसरा राजा पातिउनूस और तीसरा राजा ट्रेंग्गोनो हुआ।

हिन्दू राज्य केलापा का पतन

देमक राज्य में नौ ”वली सोंगो” नामक इस्लामिक नेता हुए जिन्होंने जावा द्वीप पर इस्लाम को फैलाया। ई.1527 में देमक सुल्तानों ने जावा द्वीप के अंतिम हिन्दू राज्य ”केलापा” को भी जीत लिया और उसका नाम ”जयकार्ता” रखा जो अब ”जकार्ता” कहलाता है। उन्हीं दिनों उत्तर भारत का सर्वाधिक प्रबल-प्रतापी हिन्दू शासक महाराणा सांगा, बर्बर मुस्लिम आक्रांता बाबर के हाथों पराजित हुआ।

पाजांग राज्य

ट्रेंग्गोनो का जामाता जोको टिंग्किर, देमक राज्य का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। वह ई.1540 में देमक राज्य की राजधानी सोलो से 10 किलोमीटर पश्चिम में पाजांग में ले गया। वह टिंग्किर गांव का रहने वाला जोको (लड़का) था इसलिए उसे जोको टिंग्किर कहा जाता था।

मुस्लिम माताराम राज्य (द्वितीय)

माताराम राज्य (द्वितीय) में योग्यकार्ता तथा सुराकार्ता नामक क्षेत्र स्थित थे। पानेमबाहान सेनोपति माताराम (द्वितीय) राज्य का पहला राजा था। वह ई.1584 में राजा बना तथा ई.1601 तक राज्य करता रहा। उसका पिता पेमानाहान (की अगेंग माताराम) पाजांग राज्य का प्रमुख योद्धा था। उसका पड़दादा मजापहित राज्य का अंतिम राजा था।

पानेमबाहान का अर्थ होता है दोनों हाथ जोड़कर नाक से स्पर्श करते हुए आदर पूर्वक प्रणाम करना। प्राचीन जावाई संस्कृति में बड़ों को प्रणाम करने का यही तरीका रहा है। सुल्तान पानेमबाहान का जावा में बहुत सम्मान था। उसके बचपन का नाम सुतोविजोयो था।

उसकी जादुई शक्तियों और रहस्यमयी कारनामों की कहानियां कही जाती हैं। जिस महल में वह साधना करता था तथा अलौकिक शक्तियां प्राप्त करता था, वह योग्यकार्ता से 5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। उसकी कब्र पर प्रतिवर्ष हजारों यात्री तीर्थयात्रा करते हैं तथा इसे माताराम साम्राज्य का पवित्र स्थल माना जाता है। ई.1613-45 तक इस वंश में आगुंग हान्योक्रोकुसुमो नामक शक्तिशाली राजा हुआ। उसकी मृत्यु के बाद माताराम राजवंश का ह्रास होने लगा।

जावा की प्राचीन संस्कृति पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव

जावा के प्राचीन साहित्य, कला एवं संस्कृति पर भारतीय साहित्य, कला एवं संस्कृति का प्रभाव प्रभूत मात्रा में देखा जा सकता है। जावा द्वीप पर बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। मध्य जावा में स्थित लारा जोंग्गरांग का मंदिर भारतीय शैली में बना है जिसमें राम कथा और कृष्णलीला के प्रसंग उत्कीर्ण हैं।

जावा द्वीप की प्रतिमाओं में भारतीय आभूषणों की भरमार है जिनमें काल-मकर अधिक लोकप्रिय है। जावा का धार्मिक साहित्य रामायण एवं महाभारत की कथाओं पर आधारित है। भारतीय उपनिषदों का अध्यात्म एवं दर्शन तथा बाद के युगों में उत्पन्न होने वाले तांत्रिक विधानों का भी जावा की संस्कृति पर बहुतायत से प्रभाव है।

शिव एवं विष्णु की संयुक्त प्रतिमाएं भी जावा द्वीप पर मिली हैं। जावा की कविताओं एवं गीतों पर भी भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है। जावा के राजाओं के नाम भी भारतीय राजाओं से मिलते-जुलते हैं। उनके दरबारों में भी भारतीय राजपरम्पराएं प्रचलित थीं।

वर्तमान में जावा द्वीप में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहने के कारण हिन्दू संस्कृति के चिह्न विलुप्त प्रायः हैं किंतु हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के कुछ शब्द जावा द्वीप पर आज भी प्रचलित हैं जो भारत से जावा के प्राचीन सम्बन्धों के मुंह बोलते प्रमाण हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश (3)

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सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश

सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश मूलतः हिन्दू राजवंश था किंतु बाद में इसने बौद्ध मत अंगीकार कर लिया था। इण्डोनेशिया के इतिहास में इस राजवंश का बड़ा महत्व है।

प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य में सुमात्रा द्वीप को स्वर्णदीप तथा स्वर्णभूमि कहा गया है क्योंकि इस द्वीप के ऊपरी क्षेत्रों में स्वर्ण धातु के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। सुमात्रा में चौथी शताब्दी ईस्वी में भारतीय राजाओं ने अपने राज्य स्थापित किए। चीनी सदंर्भों के अुनसार सुमात्रा के श्री विजयन वंश के राजा ने ई.1017 में अपना दूत चीन के राजा के पास भेजा था। 10वीं शताब्दी ईस्वी से 13वीं शताब्दी ईस्वी के काल में अरब भूगोलवेत्ताओं ने इस द्वीप के लिए लामरी अथवा लामुरी शब्द का प्रयोग किया है।

13वीं शताब्दी इस्वी में मार्को पोलो ने इसे सामारा अथवा सामारचा कहा। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में विदेशी यात्री ऑडोरिक ऑफ पोरडेनोन ने समुद्र के लिए सुमोल्त्रा शब्द का प्रयोग किया। इसके बाद यूरोपीय लेखक इस द्वीप के लिए यही शब्द प्रयुक्त करने लगे। 14वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इस द्वीप पर ”समुद्र पासी” (समुद्र के पास) नामक राज्य की स्थापना हुई। यही ”समुद्रपासी” बाद में सुमात्रा कहलाने लगा। बाद में इस राज्य को मुसलमानों ने समाप्त कर दिया तथा अचेह सल्तनत की स्थापना की। अचेह के सुल्तान अलाउद्दीन शाह ने ई.1602 में इंगलैण्ड की रानी एलिजाबेथ प्रथम को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपना परिचय ”अचेह तथा सामुद्रा का सुल्तान” के रूप में दिया है।

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सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश मेलायु राज्य को समाप्त करने में सफल रहा। सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश मूलतः हिन्दू राजवंश था किंतु बाद में इसने बौद्ध मत अंगीकार कर लिया था। श्रीविजय राजवंश के राजा पालेमबांग के निकट केन्द्रित थे। सुमात्रा के राजाओं ने 7वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी तक इण्डोनेशिया द्वीप समूह में मलय संस्कृति का प्रसार किया। श्री विजय साम्राज्य के लोग समुद्री द्वीपों में व्यापार किया करते थे। श्री विजय राजाओं के काल में पालेमबांग शिक्षा एवं विद्या का उन्नत केन्द्र था तथा यहाँ चीन के बौद्ध भिक्षु, तीर्थयात्रा के लिए आया करते थे। चीनी बौद्ध यात्री चिंग ने ई.671 में भारत जाने से पहले सुमात्रा में संस्कृत भाषा का अध्ययन किया। जब वह भारत यात्रा के बाद चीन लौट रहा था तो एक बार पुनः सुमात्रा द्वीप पर रुका और वहाँ उसने अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया। श्री विजय वंश के राजाओं को 11वीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के चोल राजाओं से परास्त हो जाना पड़ा। इससे सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश कमजोर पड़ गया और इस्लाम को सुमात्रा में प्रवेश करने का अवसर मिल गया।

हालांकि अरब और भारत के मुस्लिम व्यापारी 6ठी एवं 7वीं शताब्दी ईस्वी से सुमात्रा में व्यापार करने आते थे। 13वीं शताब्दी के अंत में समुद्रा के हिन्दू राजा को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा तथा वे श्री विजय के स्थान पर अचेह सल्तनत कहलाने लगे।

ई.1292 में मार्को पोलो तथा ई.1345-46 में इब्न बतूता ने सुमात्रा द्वीप की यात्रा की तथा उन्होंने अचेह सल्तनत को देखा। बीसवीं शताब्दी ईस्वी तक अचेह सल्तनत अस्तित्व में रही। बाद में सुमात्रा द्वीप के बहुत से राज्य डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों अपनी स्वतंत्रता खो बैठे लेकिन अचेह सल्तनत ई.1873 से 1903 तक डचों से लोहा लेती रही।

ई.1903 में अचेह सल्तनत का पतन हो गया और सम्पूर्ण सुमात्रा द्वीप डचों के अधिकार में चला गया। इसके बाद से सुमात्रा डचों के लिए काली मिर्च, रबर तथा तेल का मुख्य उत्पादक द्वीप बन गया। सुमात्रा के अनेक विद्वानों एवं स्वतंत्रता सेनानियों ने इण्डोनेशिया के स्वतंत्रता युद्ध में भाग लिया जिनमें मोहम्मद हात्ता तथा सूतन स्जाहरिर प्रमुख थे। इनमें से मोहम्मद हत्ता इण्डोनेशिया गणतंत्र के प्रथम उप राष्ट्रपति एवं सूतन स्जाहरिर प्रथम प्रधान मंत्री बने।

ई.1976 से 2005 तक इण्डोनेशियाई सरकार के विरुद्ध स्वतंत्र अचेह आंदोलन चलाया गया। इस संघर्ष में वर्ष 2001 एवं 2002 में सुमात्रा द्वीप के हजारों नागरिक मारे गए। उत्तरी सुमात्रा में सात हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं। इन पर भारतीय मंदिर स्थापत्य, धर्म एवं दर्शन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इण्डोनेशिया के मुसलमान (4)

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इण्डोनेशिया के मुसलमान

इण्डोनेशिया के मुसलमान पूरी दुनिया के मुसलमानों से अलग हैं। पूरी दुनिया में मुसलमानों ने अपनी पुरानी संस्कृति को नष्ट कर दिया है। पूरी दुनिया में मुसलमानों ने अपने पुरखों द्वारा अर्जित ज्ञान को अपना शत्रु समझ लिया है। पूरी दुनिया में मुसलमानों ने अपने पुरखों के स्थापत्य एवं शिल्प तथा पुस्तकों को आग में झौंक दिया है किंतु इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमान अपने पुरखों द्वारा अर्जित ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति एवं कला को अपनी अस्मिता की पहचान समझते हैं।

जावा सहित, इण्डोनेशिया द्वीप समूह के अन्य द्वीपों के मुसलमान, अरब तथा पश्चिम एशिया के मुसमलानों से काफी भिन्न हैं। चूंकि इन द्वीपों पर मातृ प्रधान सत्ता हुआ करती थी इसलिए मुसलमान बनने के बाद भी इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमान पुरुष के स्थान पर स्त्री की प्रधानता को ही स्वीकार किए हुए हैं।

यहाँ तलाक देने का अधिकार पुरुष को नहीं होकर, स्त्री को है। अरब तथा पश्चिम एशिया के मुसमलान मूर्ति पूजा नहीं करते जबकि जावा आदि द्वीपों के मुसलमानों ने पूरी तरह से मूर्तियों का परित्याग नहीं किया है। यही कारण है कि आज भी इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में प्राचीन एवं नवीन मूर्तियां पाई जाती हैं।

इण्डोनेशिया के मुसलमान आज भी गीता पढ़ते हैं, रामलीला खेलते हैं तथा रामकथाओं का मंचन सार्वजनिक मंचों पर करते हैं। इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमानों में मांसाहार के विरुद्ध आंदोलन चल रहा है। इण्डोनेशियाई द्वीपों के मुसलमानों को हिन्दुत्व से नहीं अपितु इस्लाम की कट्टरता से दिक्कत है। बहुत से मुसलमान तो वापस हिन्दू धर्म में लौट भी रहे हैं।

इण्डोनेशिया के मुसलमान हाथों में रुद्राक्ष पहनते हैं, उन्हें अपनी दुकानों में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों एवं चित्रों को रखने में कोई कठिनाई नहीं है। इण्डोनेशिया में आज भी रुपए पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र हैं।

इतना सब होने पर भी जब से इण्डोनेशिया में जाकिर नायक ने जमात का काम आरम्भ किया है, तब से इण्डोनेशिया के मुसलमान भी बदल रहे हैं। वे भी धीरे-धीरे इस्लाम की कट्टरता का अवलम्बन ग्रहण कर रहे हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मसाला द्वीपों के लिए यूरोप में प्रतिस्पर्द्धा (5)

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इण्डोनेशिया में रामलीला का मंचन

पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में इण्डोनेशियाई एवं भारतीय मसाला द्वीपों के लिए यूरोप में प्रतिस्पर्द्धा हुई जिसने कुछ ही वर्षों में खूनी जंग का रूप धारण कर लिया। यूरोप के बहुत से देश इन मसाला द्वीपों से व्यापार करने एवं इस व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए पूरी दुनिया में एक-दूसरे पर तोपों से गोले बरसाते रहे।

भारत में गुप्त काल एवं उससे पहले भी ईस्ट-इण्डीज द्वीपों के साथ व्यापार होता आया था। 16वीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत में मुगल शासन की स्थापना हुई, तब भी यह व्यापार बिना किसी बड़ी बाधा के किया जा रहा था।

भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ, सूती कपड़ा, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लवंग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें, गेंडे तथा चीते की खाल, चंदन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थे। ये उत्पाद यूरोपीय देशों के साथ-साथ जावा, सुमात्रा, बोड़ा, मलाया, बोर्नियो, अकनि, पेगु, स्याम, बेटम आदि पूर्वी देशों को जाते थे।

उस काल में भारत से अफीम पेगु (लोअर बर्मा), जावा, चीन, मलाया, फारस एवं अरब देशों को भेजी जाती थी। जिस काल में भारत में मुगल शासन अपनी जड़ें जमा रहा था, उसी काल में यूरोप के छोटे-छोटे देशों में पूर्वी द्वीप समूह के मसाला द्वीपों से व्यापार करने की प्रतिस्पर्द्धा अपने चरम पर पहुंच रही थी।

यूरोपीय देशों में समुद्रों पर वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्द्धा

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप के विभिन्न देशों ने सुदूर देशों के समुद्री मार्गों का पता लगाने का अभियान चलाया ताकि उनके साथ व्यापार किया जा सके। इस अभियान में यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसाला द्वीपों तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाए रखने के लिए वे अन्य यूरोपीय देशों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- ‘पुर्तगालियों ने सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।’

पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिए पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाए नहीं रख सका। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया।

डच लोग हॉलैण्ड नामक छोटे से यूरोपीय देश में रहा करते थे। यह देश यूरोप में जर्मनी तथा बेल्जियम के बीच स्थित था। बाद में उन्होंने अपने देश का नाम बदलकर नीदरलैण्ड कर लिया। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिए परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। ई.1602 में डचों ने भारत तथा ईस्ट-इण्डीज द्वीपों से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया।

पुर्तगाल पर अधिकार कर लेने के कारण समुद्रों में स्पेन की तूती बोलने लगी थी किंतु ई.1588 में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिए उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा।

फ्रांस भी पुर्तगाल, नीदरलैण्ड, स्पेन तथा इंग्लैण्ड की तरह समुद्री रास्तों पर अपना दबदबा स्थापित करने के प्रयास करता रहता था किंतु फ्रांस देश के भीतर ही अशांति से गुजर रहा था इसलिए वह इस स्पर्द्धा में पीछे रह गया। ई.1604-19 के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने ई.1644 में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी को भारत तथा ईस्ट-इण्डीज देशों में व्यापार के साथ-साथ उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम सौंपा गया।

मसाला द्वीपों के लिए पुर्तगालियों एवं डचों में संघर्ष

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पुर्तगालियों ने ई.1511 में मलक्का पर अधिकार कर लिया तथा शीघ्र ही वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा स्थापित करने में सफल हो गए। हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) के डच व्यापारियों को ईस्ट-इण्डीज देशों के मसाले पुर्तगाल के बाजारों से खरीदने पड़ते थे किंतु जब ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन ने कब्जा जमा लिया और ई.1588 में स्पेन को इंग्लैण्ड ने पीट दिया तब डच लोगों ने सीधे ही ईस्ट-इण्डीज देशों की तरफ कदम बढ़ाने आरम्भ किए। ई.1602 में हॉलैण्ड में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई। वे भारत के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में प्रवेश करने के उद्देश्य से आए थे। शीघ्र ही डच लोग पुर्तगालियों पर हावी होने लगे। उन्होंने ई.1605 में अम्बोयाना पर सत्ता स्थापित कर ली तथा ई.1619 में जकार्ता जीतकर इसके खंडहरों पर ”बैटेविया” नामक नगर बसाया। ई.1639 में उन्होंने भारत में गोवा पर घेरा डाला और इसके दो साल बाद, ई.1641 में पुर्तगालियों से मलक्का भी छीन लिया।

ई.1658 में डचों ने सीलोन की अंतिम पुर्तगाली बस्ती पर अधिकार जमा लिया। डचों ने भारत के गुजरात प्रांत में कोरोमंडल समुद्र तट, बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अपनी व्यापारिक कोठियां खोलीं। डच लोग मुख्यतः मसालों, नीम, कच्चे रेशम, शीशा, चावल एवं अफीम का व्यापार करते थे। ई.1759 में हुए ”वेदरा के युद्ध” में अंग्रेजों से हार के बाद डचों का भारत में अंतिम रूप से पतन हो गया किंतु वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा बनाए रखने में सफल रहे।

इण्डोनेशिया पर डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज्य

 18वीं शताब्दी के मध्य में जावा माताराम मुस्लिम राजवंश को अपने क्षेत्र एवं शक्ति डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समक्ष समर्पित करने पड़े। ई.1749 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी जावा की वास्तविक शासक शक्ति बन गई।

डचों द्वारा मसाला द्वीपों का शोषण

डचों ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों का भयानक शोषण किया। 16वीं से 18वीं शताब्दी की अवधि में हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) यूरोप का सर्वाधिक धनी देश माना जाता था। इण्डोनेशिया के लोग सदियों से चावल की खेती करते आए थे जो कि उनका मुख्य आहार था किंतु डचों ने उन्हें पकड़कर दास बना लिया और उनसे गन्ना एवं कॉफी की खेती करवाने लगे ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक लाभ अर्जित कर सकें। इस कारण इन द्वीपों पर अनाज की कमी हो गई और भुखमरी फैल गई।

इण्डोनेशियाई द्वीपों पर नेपोलियन बोनापार्ट का शासन

ई.1789-99 के बीच फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के समय राजनीतिक एवं सामजिक क्रांति हुई। फ्रांस के नए सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने इण्डोनेशिया सहित पूर्वी एशिया एवं मध्य एशिया के बहुत से द्वीपों पर अधिकार कर लिया तथा इण्डोनेशिया में फ्रांस की प्रभुसत्ता स्थापित हो गई।

इण्डोनेशियाई द्वीपों पर इंगलैण्ड का शासन

ई.1811 में ब्रिटेन ने नेपोलियन बोनापार्ट से इण्डोनेशिया छीन लिया। इंग्लैण्ड भी केवल 8 वर्ष तक इण्डोनेशिया पर अधिकार बनाए रख सका। ई.1819 में आयोजित वियेना कांग्रेस में हुए निर्णय के अनुसार इंग्लैण्ड ने इण्डोनेशिया के द्वीप हॉलैण्ड (डचों) को सौंप दिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम (6)

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इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम

इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम ई.1825 में आरम्भ हुआ जब इण्डोनेशिया की जनता ने डच शासन के विरुद्ध जबर्दस्त विद्रोह किया किंतु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। डचों का दमन चक्र इतना क्रूर था कि लगभग 95 वर्ष तक इण्डोनेशिया की जनता शांत बनी रही।

इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पुनः ई.1914 में आरम्भ हुआ जब प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में मित्रराष्ट्रों ने लोकतंत्र एवं स्वतंत्रता का नारा दिया। इससे इण्डोनेशिया में भी राजनीतिक जागृति आई तथा राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार हुआ किंतु जब विश्वयुद्ध समाप्त हो गया और इण्डोनेशिया को कुछ नहीं मिला तो ई.1920 में जावा और सुमात्रा में डच शासन के विरुद्ध असंतोष फूट पड़ा। शीघ्र ही आंदोलनकारियों में फूट पड़ गई और डच सरकार ने इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह कुचल दिया।

इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय दल का गठन

ई.1927 में डच सरकार ने इण्डोनेशिया के शासन में कई सुधार किए तथा संसद की स्थापना की जिसमें से दो तिहाई सांसद जनता द्वारा मनोनीत किए जाने तथा एक तिहाई सांसद डच सरकार द्वारा मनोनीत किए जाने का प्रावधान था। संसद का अध्यक्ष, सरकार द्वारा ही नियुक्त किया जाता था।

जनता इन सुधारों से संतुष्ट नहीं हुई तथा उसी वर्ष सुकाणों के नेतृत्व में ”इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी” का गठन किया गया। इस दल ने इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय आंदोलन को नए सिरे से आरम्भ किया तथा गांव-गांव में जाकर स्कूल खोले ताकि नवयुवकों को राष्ट्रभक्ति एवं आजादी की शिक्षा दी जा सके। ई.1929 में सरकार ने इस दल पर प्रतिबंध लगा दिया।

इण्डोनेशियाई द्वीपों पर जापान का अधिकार

द्वितीय विश्वयुद्ध (ई.1939-45) के दौरान ई.1942 में जापान ने इण्डोनेशियाई द्वीपों पर अधिकार करके सैनिक शासन स्थापित कर दिया। डचों को इण्डोनेशिया खाली करना पड़ा किंतु कुछ द्वीप तब भी उनके अधिकार में रहे। ई.1945 में जब जापान का पतन हुआ तो जापान सरकार ने आत्मसमर्पण करने से पहले इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने की घोषणा की।

इण्डोनेशियाई गणतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष

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सुकार्णो की इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी ने अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति में देश में सरकार बनाने का प्रयास किया किंतु डच लौट आए और उन्होंने इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने से मना कर दिया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अडिग रहे तथा दोनों के बीच वार्तालाप चलता रहा। अंत में 25 मार्च 1947 को लिंगायती (लिंगजाति/लिंग्गाडजती) समझौता हुआ जिसके अनुसार जावा, सुमात्रा और मदुरा में इण्डोनेशियाई गणराज्य को मान्यता दे दी गई। सुकार्णो इण्डोनेशिया के समस्त द्वीपों को मिलकार एक देश बनाना चाहता था और डच सरकार चाहती थी कि इण्डोनेशियाई द्वीपों और हौलेण्ड को मिलाकर एक संघ-राज्य बनाया जाए। फलतः दोनों पक्षों में फिर से संघर्ष आरम्भ हो गया। डच सरकार ने सुकार्णो के अधिकार वाले क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया तथा इसे पुलिस कार्यवाही कहा। इस पर भारत तथा ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में उठाया। सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप से जनवरी 1948 में युद्ध बंद हो गया।

”बैटेविया” की घटना के बाद दिसम्बर 1948 में दोनों पक्षों में पुनः युद्ध आरम्भ हो गया किंतु तब तक विश्व जनमत सुकार्णो के पक्ष मे हो चुका था। सुरक्षा परिषद में पुनः युद्धबंदी का प्रस्ताव पारित हुआ जिसे डच सरकार ने अस्वीकार कर दिया और सुकार्णो तथा उसके साथियों को बंदी बना लिया।

इण्डोनेशिया गणराज्य को मान्यता

23 अगस्त से 2 नवम्बर 1949 तक हेग में इण्डोनेशियाई समस्या को सुलझाने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें हुए निर्णय के बाद इण्डोनेशिया को संघ राज्य घोषित किया गया तथा डॉ. सुकार्णो द्वारा घोषित गणराज्य को मान्यता दी गई। इस प्रकार इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह सफल हो गया।

इस समझौते के अनुसार 27 नवम्बर 1949 को इण्डोनेशिया की वास्तविक सत्ता सुकार्णो के नेतृत्व वाली सरकार को सौंप दी गई किंतु इण्डोनेशियाई राज्य संघ में हॉलैण्ड की औपचारिक साझेदारी मानी गई। अर्थात् इण्डोनेशिया में हॉलैण्ड एवं इण्डोनेशियाई सरकार को बराबर सम्प्रभु राष्ट्र माना गया।

जनता इस सम्बन्ध को भी समाप्त करना चाहती थी। अतः 15 अगस्त 1950 को इण्डोनेशियाई एकीकृत गणतन्त्र की स्थापना की गई तथा ई.1955 में इण्डोनेशिया एवं हॉलैण्ड के बीच के समस्त सम्बन्ध समाप्त हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली में हिन्दू सभ्यता (7)

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बाली में हिन्दू सभ्यता

बाली में हिन्दू सभ्यता अनादि काल से अपनी जड़ें जमाए हुए है। वस्तुतः वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक इण्डोनेशिया को भारतीय उपमहाद्वीप का ही नहीं अपितु भारत का ही एक द्वीप-समूह समझा जाना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पर सैंकड़ों राजा एवं राजवंश शासन करते थे, उसी प्रकार इण्डोनेशियाई द्वीपों पर भी भारतीय राजकुमारों के राज्य अस्तित्व में थे।

बाली में ऑस्ट्रोनेशियन मानव सभ्यता का प्रारम्भ

बाली, इंडोनेशिया का एक ”द्वीप प्रान्त” है। यह जावा द्वीप के पूर्व में तथा लोम्बोक द्वीप के पश्चिम में स्थित है। ईसा से लगभग 2000 साल पहले यहाँ मानवीय बस्तियों के बसने का क्रम आरम्भ हुआ। ये मानव ऑस्ट्रोनेशियन जाति के थे जो दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीपों से आकर यहाँ बस रहे थे।

ये लोग आदिवासी थे तथा सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में थे जबकि इस काल में भारत में अत्यंत उन्नत सभ्यता एवं संस्कृति फल-फूल रही थी। बाली द्वीप से मिली एक अति प्राचीन मुद्रा पर जंगली भैंसे के कंधों पर हल रखकर चावल की खेती करने का दृश्य अंकित किया गया है।

बाली द्वीप में हिन्दू संस्कृति का प्रवेश

भारतीय हिन्दू, बाली तथा आसपास के द्वीपों पर सबसे पहले कब पहुंचे, यह ठीक से नहीं बताया जा सकता किंतु इतना स्पष्ट है कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले से ही हिन्दुओं की बस्तियां बड़ी संख्या में जावा, सुमात्रा, मलाया तथा बाली आदि द्वीपों पर बस गई थीं। सुमात्रा, जावा तथा बाली द्वीपों पर हिन्दुओं का सबसे बड़ा जमावड़ा था। बाली द्वीप से ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण कुछ लेख मिले हैं जो ईसा से दो शताब्दी से भी अधिक पुराने हैं। ब्राह्मी लिपि के ये लेख हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। बाली द्वीप का नाम भी बहुत पुराना है।

ईसा की चौथी एवं पांचवी शताब्दी में भारतीय राजकुमारों ने ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपने छोटे-बड़े अनेक राज्य स्थापित कर लिए थे। बाली तथा इसके आस-पास फैले हजारों द्वीपों पर हिन्दू जाति निवास करती थी। बाली से प्राप्त विष्णु, ब्रह्मा, शिव, नंदी, स्कन्द और महाकाल की मूर्तियों से इस तथ्य की पुष्टि होती है।

बहुत से बौद्ध भी बाली और उसके निकटवर्ती द्वीपों पर आ जुटे। पौराणिक हिन्दू धर्म के साथ-साथ इन द्वीपों में बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ। ये दोनों धर्म बाली तथा उसके निकटवर्ती द्वीप समूह पर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक बिना किसी संघर्ष के फलते-फूलते रहे।

ई.914 का एक शिलालेख बाली से मिला है जिसमें श्री केसरी वर्मा नामक राजा का उल्लेख है। ई.989 के लगभग जावा के राजा मपू सिंदोक की प्रपौत्री महेन्द्रदत्ता (गुण-प्रिय-धर्मा-पत्नी) का विवाह बाली के राजा उदयन वर्मदेव (धर्मोद्यनवर्मदेव) के साथ हुआ। इस विवाह के कारण बाली में जावा की हिन्दू संस्कृति एवं हिन्दू धर्म का प्रचार और भी अधिक विस्तार पा गया।

महेन्द्रदत्ता ने ई.1001 के लगभग ऐरलांग्गा नामक पुत्र को जन्म दिया जो बाली का राजा बना। ई.1098 में इसी वंश में राजकुमारी सकलेन्दु किरण का जन्म हुआ जिसने ई.1115 से 1119 तक बाली द्वीप पर शासन किया। उसके बाद सूराधिप, जयशक्ति, जयपंगुस, आदिकुंती केतन एवं परमेश्वर आदि राजा हुए। इस प्रकार बाली का यह हिन्दू राजवंश 1293 ईस्वी तक शासन करता रहा। 1293 ईस्वी में जावा के मजापहित वंश के राजा ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया। उसके राज्य में कई हजार द्वीप थे। इस प्रकार बाली में हिन्दू सभ्यता फलती-फूलती रही।

बाली द्वीप पर इस्लाम का प्रवेश

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सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब में इस्लाम की आंधी उठी जो देखते ही देखते बवण्डर बनकर चारों तरफ फैलने लगी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में ही अरब व्यापारियों के रूप में पहली बार मुसलमानों ने बाली द्वीप पर पैर रखा। उनके प्रभाव से कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। सोलहवीं शताब्दी आते-आते यह प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि बाली को छोड़कर शेष सभी द्वीपों के शासकों एवं प्रजा ने इस्लाम स्वीकर कर लिया। 15वीं शताब्दी में इस्लाम रूपी आन्धी के तेज झौंके इण्डोनेशयिाई द्वीपों को झकझोरने लगे। अंततः 1478 ईस्वी में जावा का मजापहित हिन्दू साम्रज्य ध्वस्त हुआ और अधिकांश द्वीपों पर मुसलमान सुलतानों ने सत्ता हथिया ली। उन्होंने इन द्वीपों के हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार किये। उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाना, उनकी सम्पत्ति तथा स्त्रियों का हरण कर लेना तथा हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार देना, अत्यंत साधारण बात थी। ऐसी स्थिति में जावा, सुमात्रा, मलाया और अन्य द्वीपों के अभिजात्य-वर्गीय हिन्दू भाग-भाग कर बाली आने लगे।

बाली में एकत्रित हुए हिन्दुओं ने मुसलमानों से मोर्चा लेने का निर्णय लिया। मुसलमानों ने बहुत प्रयास किये किंतु हिन्दुओं की संगठित शक्ति के कारण बाली द्वीप में हिन्दुओं का तथा हिन्दू धर्म का पतन नहीं हुआ। आसपास के द्वीपों में रह रहे हजारों बौद्धों को भी यहीं शरण मिल सकी। जब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मलाया द्वीप समूह (अब मलेशिया) से हिन्दू  सभ्यता का अंत कर दिया गया तब बाली द्वीप ने वहाँ के हिन्दू राजाओं एवं संस्कृति को भी शरण दी। इस प्रकार बाली में हिन्दू सभ्यता बची रही।

बाली में ही बचे हिन्दू और बौद्ध

लगभग 100 साल तक इण्डोनेशियाई द्वीपों में मुसलमानों के अत्याचार निर्बाध रूप से जारी रहे और तब तक जारी रहे जब तक कि बाली को छोड़कर शेष द्वीपों में मुस्लिम सत्ताएं स्थापित नहीं हो गईं तथा वहाँ की लगभग समस्त प्रजा ने इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया। परिणामतः ईस्ट-इण्डीज द्वीपों में केवल बाली द्वीप पर ही हिन्दू जनसंख्या बची रह गई।

बाली द्वीप पर डचों का अधिकार

ई.1597 में पहली बार डच लोगों का बाली द्वीप पर आगमन हुआ। उस समय बाली द्वीप पर हिन्दू राजा का शासन था। डचों ने बाली द्वीप पर अपनी आर्थिक गतिविधियां आरम्भ कीं जो धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों में बदल गईं। ई.1839 में डच लोगों ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया तथा ई.1840 के आते-आते बाली द्वीप के उत्तरी तट पर डच लोगों का शासन हो गया। इसके बाद उन्होंने तेजी से बाली द्वीप के शेष भाग पर अधिकार जमाना आरम्भ किया।

ई.1906 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने बाली के हिन्दू राजवंश के लगभग 200 लोगों को मार डाला तथा उनके साथ ही बाली के हजारोें हिन्दू सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया। ई.1911 में उन्होंने बाली द्वीप को डच साम्राज्य में शामिल कर लिया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ई.1942 में जापान ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया ताकि वह बाली द्वीप को आधार-शिविर की तरह उपयोग करके मित्र राष्ट्रों से भलीभांति लड़ सके। जापानियों के दबाव में डच लोगों को बाली द्वीप खाली करना पड़ा किंतु वे निकटवर्ती द्वीपों पर अपना अधिकार जमाए रखने में सफल रहे।

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये जाने के बाद अगस्त 1945 में जापान ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष घुटने टेक दिये। बाली के लोगों ने इसे अपने लिए सुअवसर समझा। उन्होंने अपनी स्वयं की एक सेना बना ली और बाली में रह रही जापानी सेना पर आक्रमण कर दिया। जापानियों को बाली द्वीप से भागना पड़ा किंतु इस समय स्वतंत्रता का सुख बाली के लोगों के भाग्य में लिखा ही नहीं था। 

जापान का पतन होने के बाद डच लोग पुनः बाली लौट आए ताकि वे अपने खोये हुए राज्य का फिर से निर्माण कर सकें। बाली के लोगों ने डच सेना से संघर्ष करने की तैयारी की तथा मरते दम तक लड़ने का निर्णय लिया। कर्नल नगुरा राय के नेतृत्व में बाली के लोगों ने डच लोगों पर बड़ा आत्मघाती आक्रमण किया किंतु हिन्दुओं के दुर्भाग्य से इस युद्ध में विजय डच लोगों के हाथ लगी। बाली की सेना पूर्णतः नष्ट हो गई और बाली द्वीप फिर से डच लोगों के अधीन हो गया। यह स्थिति भी अधिक समय तक बनी नहीं रह सकी।

ई.1949 में कुछ मुस्लिम आंदोलनकारियों ने सुकार्णो तथा हात्ता के नेतृत्व में इण्डोनेशिया के हजारों द्वीपों को सम्मिलित करते हुए ”रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इण्डोनेशिया” नामक देश का निर्माण किया तथा उसमें बाली द्वीप को भी सम्मिलित कर लिया। डच सरकार ने इस नये देश को मान्यता दे दी। इसके बाद विश्व के अन्य देशों ने भी इण्डोनेशिया रिपब्लिक के निर्माण को स्वीकार कर लिया। डच लोगों को एक बार पुनः बाली द्वीप खाली करना पड़ा।

पांच लाख लोगों की हत्या

ई.1950-60 के बीच इण्डोनेशिया में एक बार फिर से राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई जिसके कारण सेना को हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया। निरंकुश सेना ने इण्डोनेशिया के विभिन्न द्वीपों में लगभग 5 लाख लोगों को मार डाला। बाली द्वीप पर 80 हजार से 1 लाख लोग मारे गये।

आगूंग पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

अभी सैनिक ताण्डव समाप्त भी नहीं हुआ था कि ई.1963 में आगूंग पर्वत में विस्फोट होने से बाली द्वीप पर हजारों लोग मारे गये तथा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। हजारों बाली वासियों को द्वीप खाली करके अन्य द्वीपों को भाग जाना पड़ा।

पर्यटन को बनाया आर्थिक उन्नति का आधार

ई.1965-66 में सुहार्तो ने सुकार्नो की सरकार को अपदस्थ कर दिया। उसने बाली द्वीप को आर्थिक सम्बल देने के लिए पर्यटन को मुख्य आधार बनाया। इसके बाद से बाली की दशा में सुधार आने लगा। साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया। विश्व भर से पर्यटकों को बाली द्वीप पर लाने के प्रयास आरम्भ हुए। बाली के सुंदर सागरीय द्वीपों, चावल के हरे-भरे खेतों तथा प्राचीनतम हिन्दू मंदिरों को देखने के लिए लाखों लोग दुनिया भर से बाली आने लगे। बाली के लोगों को नये रोजगार प्राप्त हुए, लोगों में आत्मविश्वास तथा स्थिरता आने लगी।

मुस्लिम आतंकियों के बाली द्वीप पर हमले

बाली द्वीप को विश्व भर के पर्यटकों में अपनी पहचान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ किए हुए अभी कुछ दशक भी नहीं बीते थे कि ई.2002 में एक मुस्लिम आतंकवादी ने बाली द्वीप के सबसे प्रमुख केन्द्र कुता में बम विस्फोट करके 202 अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को मार डाला। पूरे विश्व में इस हमले का बुरा प्रभाव पड़ा।

केवल तीन साल बाद ई.2005 में एक बार पुनः मुस्लिम आतंकवादियों ने बाली द्वीप के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को निशाना बनाया। इसके बाद से बाली में आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत कम हो गई तथा बाली एक बार पुनः निर्धनता के खड्डे में जा गिरा। आज भी बाली में हिन्दू सभ्यता बची हुई है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वर्तमान समय में बाली (8)

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वर्तमान समय में बाली

यदि वर्तमान समय में बाली की विवेचना की जाए तो वह लघु भारत के रूप में विकसित एक महान् द्वीप की तरह दिखाई देता है जिसमें हिन्दुतव के समस्त चिह्न उपस्थित हैं।

पर्यटकों का स्वर्ग बाली

वर्तमान समय में बाली द्वीप की कुल जनसंख्या में से 90 प्रतिशत हिन्दू है। शेष 10 प्रतिशत जनसंख्या में बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई हैं। यह विश्व विख्यात पर्यटन स्थान है जिसकी कला, संगीत, नृत्य और मन्दिर मनमोहक हैं। यहाँ की राजधानी देनपासार नगर है।

मध्य बाली में स्थित उबुद नामक नगर भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। यह बाली द्वीप में कला और संस्कृति का प्रधान स्थान है। दक्षिण बाली में स्थित ”कुता” एक प्रमुख नगर है। जिम्बरन बाली में मछुओं का ग्राम और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। द्वीप के उत्तरी तट पर सिंहराज नगर स्थित है। आगूंग पर्वत और ज्वालामुखी बतुर पर्वत दो ऊंची चोटियां हैं।

हँसते-मुस्कुराते चेहरों वाले लोग

बाली के लोग सरल, हंसमुख एवं श्रमजीवी किन्तु निर्धन, फटेहाल और अभावग्रस्त हैं। स्त्री और पुरुष दोनों ही, दिन भर हाड़-तोड़ परिश्रम करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। पुरुष अपेक्षाकृत अधिक परिश्रम के कामों अर्थात् वाहन चालन, कृषि एवं निर्माण कार्यों में संलग्न हैं, वहीं महिलाएं प्रायः किसी न किसी प्रकार की छोटी-मोटी दुकान चलाती हैं। या सड़कों के किनारे नारियल, केले और विभिन्न प्रकार के फूल बेचती हुई दिखाई देती हैं।

भारत और भारतीयों से है करते हैं प्यार

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वर्तमान समय में बाली कई अर्थों में भारत का एक संस्करण दिखाई देता है तो कई अर्थों में यह भारत से बिल्कुल अलग है। बाली के स्थानीय व्यक्ति भारतीयों को देखकर प्रसन्न होते हैं और पहली ही भेंट में यह बताना नहीं भूलते कि हम भी हिन्दू हैं। वे ये भी बताते हैं कि हमारे परिवार में कौन-कौन शाकाहारी है और कौन व्यक्ति भारत जाकर गंगा स्नान कर आया है। यह देखना और जानना किसी सुखद अश्चर्य से कम नहीं होता कि भारतीय हिन्दुओं के प्रति इनके मन में अपार आदर और स्नेह है। जैसे ही आप इनकी दुकान पर पहुंचते हैं, या मार्ग में मिलते हैं, बाली के अधिकांश लोग ”स्वस्तिम् अस्तु” कहकर दोनों हाथ जोड़ते हैं और मुस्कुराकर आपका स्वागत करते हैं। इनकी आंखें बताती हैं कि उन्हें यह ज्ञात है कि भारत बहुत धनी और सभ्य देश है तथा बाली के लोगों की जड़ें भारत में हैं।

साफ-सुथरा द्वीप

वर्तमान समय में बाली एक साफ-सुथरा द्वीप है, सड़कों पर गंदगी, भीड़-भड़क्का एवं शोरगुल नहीं है। सड़कें अपेक्षाकृत संकरी किंतु मजबूत हैं। कहीं भी टूटी-फूटी या उधड़ी हुई सड़कें देखने को नहीं मिलती हैं, इससे अनुमान होता है कि यहाँ भ्रष्टाचार या तो है ही नहीं और यदि है तो बहुत ही कम है।

ठेकेदारों और इंजीनियरों ने सड़क निर्माण में पूरी सामग्री का उपयोग किया है। सड़क के दोनों ओर पैदल यात्रियों के लिए पटरियां बनी हुई हैं, साइन बोर्ड भी भली भांति लगे हुए हैं। सड़कों के किनारे लगे सूचना पट्ट एवं दुकानों के बाहर लगे नामपट्ट बाली की स्थानीय भाषा ”बहासा इण्डोनेशियन” में लिखे हुए हैं, जो कि मलय भाषा से बनी है।

यह देखकर आश्चर्य होता है कि ये सभी पट्ट रोमन लिपि में लिखे हुए हैं जो देखने में तो अंग्रेजी भाषा के लगते हैं किंतु विदेशी पर्यटकों को पढ़ने में नहीं आते। यह ठीक वैसा ही है जैसे मराठी लोगों ने मराठी भाषा के लिए ”देवनागरी” लिपि अपना ली है।

बाली द्वीप के नगरों में बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर बहुत कम हैं। अधिकांश दुकानें बहुत छोटी हैं तथा उनमें बिक्री के लिए बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। ब्रेड (डबल रोटी), कोल्ड ड्रिंक, अण्डा, डिब्बाबंद चिकन, डिब्बाबंद मछली, पूजा के फूल, नारियल, अगरबत्ती, प्लास्टिक के छोटे-मोटे सामान आदि दैनिक उपयोग की सामग्री अधिक बिकती है। दुकानों के बाहर एक-एक लीटर की मिट्टी के तेल, डीजल और पैट्रोल से भरी बोतलें रखी रहती हैं, क्योंकि यहाँ पैट्रोल पम्प केवल मुख्य नगर की परिधि में ही उपलब्ध हैं, वे भी गिने-चुने।

गाय, गंगा और गेहूँ रहित बाली के हिन्दू

भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार गाय, भारतीय धर्म का मुख्य आधार गंगा और भारतीय भोजन की थाली का मुख्य आधार गेहूं, बाली द्वीप में देखने को नहीं मिलते। यहाँ दुधारू पशु नहीं पाले जाते। यहाँ घरों में दूध एवं चाय नहीं पिये जाते। किसी विशिष्ट अतिथि के आने पर, मध्यम एवं उच्च वर्गीय परिवारों में बिना दूध की कॉफी बनाई जाती है।

यहाँ के लोगों का पूरा जीवन बीत जाता है किंतु ये न तो गाय, भैंस, बकरी आदि दुधारू पशुओं के दर्शन कर पाते हैं और न ही पशुओं के दूध का स्वाद चख पाते हैं। शैशव अवस्था में शिशु लगभग एक साल तक माँ का दूध पीता है, उसके बाद चिकन खाने लगता है, और फिर सूअर का मांस तथा मछली आदि। ऊंट और घोड़ा भी बाली में नहीं हैं। आश्चर्य की बात है कि यहाँ की सड़कों पर पशु घूमते दिखाई नहीं देते। गांवों में जाएं तो गलियों में केवल इक्का-दुक्का कुत्ते दिखाई देते हैं।

गाय-भैंस के अभाव में सामान्यतः घरों में दूध-दही-छाछ-मक्खन-घी का उपयोग नहीं होता। बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर पर डिब्बाबंद योघर्ट मिलता है, इसका उपयोग केवल पर्यटक करते हैं। यह बहुत महंगा है, सामान्यतः 50 ग्राम योघर्ट के लिए भारतीय मुद्रा में 60 रुपए चुकाने होते हैं। इसका स्वाद दही से काफी अलग होता है तथा यह गोंद की तरह चिपचिपा होने के कारण आम भारतीय के लिए अनुपयोगी है।

फसलों के नाम पर खेतों में प्रायः चावल, मक्का और गन्ना दिखाई देता है। चावल बहुतायत में होता है किंतु बासमाती चावल या खुशबूदार अच्छा चावल भारत से मंगाया जाता है। गेहूं, जौ, चना, बाजरा आदि अनाज और मूंग, मोठ, उड़द, चंवला आदि दालें यहाँ नहीं उगाई जातीं। भिण्डी, आलू और प्याज जैसी सब्जियां भी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, भारत एवं अन्य देशों से आयात की जाती हैं। आयातित सब्जियां आम दुकानों पर नहीं मिलतीं। ये सब्जियां बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स में काफी ऊंची दरों पर प्लास्टिक के रैपर में बंद करके बेची जाती हैं एवं बड़े होटलों में विदेशी पर्यटकों के लिए उपलब्ध रहती हैं।

भारतीय देवी-देवताओं में है विश्वास

बाली के लोग रामायण, भगवान राम, देवी सीता एवं रामदूत हनुमान के प्रति श्रद्धा रखते हैं। चारों वेद, गीता, महाभारत, एवं पाण्डु पुत्र भीम तथा वीर अर्जुन की चर्चा करना गौरव का विषय मानते हैं। भगवान राम, इन्द्र, सरस्वती, कृष्ण, शिव, अर्जुन और भीम की विशाल एवं सुंदर प्रतिमाएं चौराहों पर लगी हुई हैं जो पर्यटकों के आकर्षण और कौतूहल का विषय हैं क्योंकि भारत में केवल हनुमानजी अथवा शिवजी की ही इतनी बड़ी प्रतिमाएं देखी जाती हैं।

हनुमानजी की प्रतिमाएं विकराल स्वरूप की हैं। सीता को ये देवी सिन्ता कहते हैं तथा उनमें बड़ी श्रद्धा रखते हैं। देवी सिन्ता की अत्यंत सुंदर और विशाल प्रतिमाएं चौराहों पर देखने को मिलती हैं। सरस्वती की बहुत सुन्दर प्रतिमाएं, दर्शकों का मन मोह लेती हैं। मूर्ति निर्माण की यह एक विशिष्ट परम्परा है, इसमें रागात्मकता एवं मनोरम्यता का तत्व अधिक है।

भारत के चौराहों पर मोहनदास गांधी, इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा बहुत से स्थानीय नेताओं आदि की मूर्तियां पाई जाती हैं किंतु भारतीय पर्यटक बाली द्वीप में भगवान श्रीराम, देवी सीता, भगवान श्रीकृष्ण तथा रामभक्त हनुमान की मूर्तियां देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं।

भगवान शिव, पार्वती एवं गणेश की प्रतिमाएं भी चौराहों, उद्यानों एवं होटलों आदि में दिखाई देती हैं। अधिकतर मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गणेश प्रतिमाएं लगी हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे आकार की हैं तथा ठीक वैसी ही हैं जैसी भारत में पाई जाती हैं। द्वारपालों की कुछ मूर्तियां दैत्यों जैसी दिखाई देती हैं। सामान्यतः ये मूर्तियां मंदिरों और नगरों के द्वारों के बाहर लगी रहती हैं।

प्रत्येक घर के अंदर तथा बाहर स्तम्भ मंदिर बने होते हैं। लगभग चार पांच फुट ऊंचे स्तम्भ पर एक छोटा आला होता है जिसे काला (स्तंभ पर स्थित लघु देवालय) कहते हैं। घर के भीतर बने काला को पुंगुनकरन अर्थात् धरती का देवता कहते हैं। घर के भीतर के काला में देवी दुर्गा के भी देवालय होते हैं। घर के बाहर के देव स्थान को इन्द्राब्लॉका कहा जाता है, यह गली-मौहल्ले की रक्षा करता है।

ब्रह्मा, विष्णु महेश को कुनिंगन्न (त्रिदेव) कहा जाता है। साल में एक बार यलो डे मनाया जाता है। उस दिन स्त्री-पुरुष पीले वस्त्र धारण करते हैं। यह भारत के बसंत पंचमी का ही रूप है। गलुगन्गन पर्व पर सार्वजनिक अवकाश होता है। पके हुए चावल को नासि तथा कच्चे चावल को सयुर कहा जाता है, जो वर्तमान समय में बाली का मुख्य खाद्य है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इण्डोनेशिया के मंदिर (9)

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इण्डोनेशिया के मंदिर

इण्डोनेशिया के मंदिर आकार में विशाल हैं, विषय-वस्तु में विविधता लिए हुए हैं तथा हिन्दू पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं किंतु उनमें सजावट का अंश न के बराबर है।

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इण्डोनेशिया के मंदिर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दो भागों में विभक्त किए जा सकते हैं। पहले भाग में वे हिन्दू मंदिर आते हैं जो बड़ी संख्या में बने हुए हैं तथा इण्डोनेशिया के जिन द्वीपों पर मानव बस्तियां अस्तित्व में हैं, उन सभी द्वीपों में हिन्दू मंदिर स्थित हैं। दूसरे भाग में वे मंदिर हैं जो बौद्ध मत को मानते हैं। इनकी संख्या कम है तथा ये बहुत कम द्वीपों में देखने को मिलते हैं। इण्डोनेशिया के अनेक द्वीपों पर प्राचीन हिन्दू देवालय, बौद्ध चैत्य तथा विहार बने हुए थे जिनमें से अधिकतर मंदिर एवं चैत्य मुस्लिम आक्रांताओं की भेंट चढ़ गए। जब सुहार्तो की सरकार ने विश्व पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इण्डोनेशिया को नए सिरे से तैयार करने का काम आरम्भ किया तब से अब तक कई मंदिर एवं चैत्य खण्डहरों के नीचे से खोज निकाले गए हैं। इंडोनेशिया के मंदिरों पर सर्वाधिक प्रभाव राम कथा का देखने को मिलता है। परमबनन शिव मंदिर में लगी प्रस्तर शिलाओं पर रामायण के बहुत से दृश्य अंकित हैं। इस मंदिर में कृष्णलीला के प्रसंग भी बड़ी संख्या में उत्कीर्ण हैं।

जावा द्वीप के मंदिर

जावा में हिन्दू धर्म के प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता हैं। जावा द्वीप पर 15 बड़े हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं जिनमें परमबनन शिव मंदिर और बोरोबुदुर बौद्ध विहार मुख्य हैं।

दूसरे प्रमुख मंदिरों में ई.750 में बना देंग मंदिर, 9वीं शताब्दी का प्लाओसान मंदिर, 15वीं सदी में बना सथो मंदिर, सिंघसरी साम्राज्य के काल में ई.1248 में बना किदाल मंदिर, जन्म से पहले जीवन को दर्शाता 15वीं सदी मे बना सुख मंदिर और मजापहित साम्राज्य के समय में 12वीं तथा 15वीं सदी के दौरान बना ”पनतरन मंदिर” सम्मिलित हैं। इन मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सांस्कृतिक श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

परमबनन शिव मंदिर समूह (10)

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परमबनन शिव मंदिर समूह

मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिंदू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यतः भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। परमबनन मंदिर विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।

परमबनन शिव मंदिर समूह परिसर में काले रंग के चौकोर, आयातकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालाकाय पत्थरों के सैंकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी इस्वी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकम्प के दौरान हुआ।

परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। उस समय कुल 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था जिनमें केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर त्रिमूर्ति मंदिर कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के मंदिर हैं।

त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक आपित मंदिर है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक केलिर मंदिर तथा चारों कोनों पर एक-एक पाटोक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में कुल 224 मंदिरों के अवशेष स्थित हैं।

इस प्रकार कुल यहाँ कुल 240 मंदिर स्थित थे किंतु 16वीं शती ईस्वी में प्रबल भूकम्प से ये मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे।

बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पर्द्धा

भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवी शताब्दी ईस्वी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलतः हिन्दू धर्म को मानने वाला था किंतु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था।

आठवीं शताब्दी ईस्वी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया। शैलेन्द्र वंश के राजा लगभग एक शताब्दी तक मध्य जावा पर शासन करते रहे।

हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण

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नौवीं शताब्दी ईस्वी में एक बार पुनः शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुनः संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुनः शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए ई.850 के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके। इतिहासकारों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण इस बात की घोषणा थी कि अब मध्य जावा में माताराम साम्राज्य (मेदांग साम्राज्य) बौद्ध-महायान धर्म के स्थान पर हिन्दू-शैव धर्म में परिवर्तित हो गया है। राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। ई.856 के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलतः भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था।

जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी ईस्वी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया।

अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना राजा बालितुंग द्वारा की गई। इसके बाद से राज परिवार के समस्त धार्मिक आयोजन इसी मंदिर में होने लगे। बालितुंग के उत्तराधिकारी राजाओं- दक्ष एवं तुलोडोंग द्वारा भी मंदिर का विस्तार किया गया। उस काल में इस मंदिर के बाहरी क्षेत्र में सैंकड़ों ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। 

परमबनन शिव मंदिर समूह का विघटन

ई.930 के बाद के किसी वर्ष में मपू सिंदोक नामक राजा ने जावा में इस्याना वंश की स्थापना की तथा जावा की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा परमबनन के उत्तर में स्थित मेरापी पहाड़ में ज्वालामुखी के सक्रिय हो जाने के कारण किया गया। राज्याश्रय हट जाने के बाद से मंदिर का विघटन आरम्भ हो गया। फिर भी यह हिन्दू प्रजा की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना रहा।

सोलहवीं शताब्दी में आए एक भयंकर भूकम्प में इस मंदिर समूह के समस्त मंदिर धरती पर गिर गए। ई.1755 में माताराम साम्राज्य का विभाजन हुआ तथा यह योग्यकार्ता (जोगजा) एवं सुराकार्ता (सोलो) राज्यों में विभक्त हो गया। इन दोनों राज्यों के सीमा इसी मंदिर पर आकर समाप्त होती थी। अब उन राज्यों की पहचान योग्यकार्ता एवं सेंट्रल जावा के रूप में की जाती है।

परमबनन शिव मंदिर समूह की जीर्णोद्धार यात्रा

जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो ई.1811 में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। ई.1918 में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया। ई.1930 में जीर्णोद्धार के काम में तेजी आई तथा यह कार्य आज भी जारी है।

मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य आसान नहीं था। अधिकतर अलंकृत पत्थर दूरस्थ क्षेत्रों में ले जाकर भवन निर्माण में लगा दिए गए थे। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया कि केवल उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत सामग्री उपलब्ध है तथा जिनका कोई डिजाइन, चित्र अथवा नक्शा उपलबध है। मंदिर के पुननिर्माण के लिए इसके चारों ओर खड़े हो गए बाजार एवं मानव बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया।

रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण

मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इण्डोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएं हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया।

चंद्र ज्योत्सना के प्रकाश में इन नाटिकाओं का मंचन किया जाता है तो विश्व भर के पर्यटक मंत्र-मुग्ध रह जाते हैं। गलुंगन, तावुर केसंगा तथा नायेपी आदि हिन्दू पर्वों पर इस मंदिर परिसर में हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उस दौरान बहुत से दल रामकथाओं का मंचन करते हैं।

सुन्नी मुसमलान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन

ई.1953 में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इण्डोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किंतु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैंकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था।

भारत में जहाँ कि 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या निवास करती है, श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, श्री राम जन्म भूमि अयोध्या और विश्वनाथ मंदिर काशी के मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है, इन मंदिरों पर राजनीति करके, कुछ राजनीतिक दल मुसलमानों के और कुछ राजनीतिक दल हिन्दुओं के वोट प्राप्त करते हैं।

मुझे जावा में सरदार पटेल का स्मरण हो आया जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षी इरादों को विफल करके सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया था। अन्यथा आज उसकी दशा भी अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ के मंदिरों जैसी ही होती।

वर्ष 2006 में पुनः भूकम्प से क्षति

 अभी मंदिर को खुले लगभग 53 वर्ष ही हुए थे कि वर्ष 2006 में मध्य जावा में पुनः जोर का भूकम्प आया। मंदिर को फिर से क्षति पहुंची और इण्डोनेशिया के आर्कियोलोजी विभाग द्वारा मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करके इसे दर्शकों के लिए सुरक्षित बनाया गया। इस दौरान मंदिर कई महीनों तक बंद रहा।

सोलह मुख्य मंदिरों एवं दो लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण

वर्ष 2009 में नंदी मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह दर्शकों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर भगवान शिव के मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इसके बाद एक-एक करके मंदिरों का पुनर्निर्माण होता गया और वे दर्शकों के लिए खोले जाते रहे। वर्तमान में भीतरी मुख्य क्षेत्र के सभी 8 मुख्य मंदिरों एवं सभी 8 लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण पूरा कर लिया गया है। बाहरी क्षेत्र के 224 पेरवारा मंदिरों में से केवल 2 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा सका है।

वर्ष 2010 में परमबनन सेंचुरी घोषित

वर्ष 2010 में इण्डोनेशियाई सरकार ने परमबनन, रातू बोको, कालासन, सारी तथा प्लाओसान मंदिरों के समस्त क्षेत्रों को घेरते हुए परमबनन सेंचुरी घोषित किया। यह सेंचुरी 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है।

वर्ष 2014 में ज्वालामुखी की राख का सामना

परमबनन शिव मंदिर को दुबारा से खोले हुए आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित केलुड ज्वालामुखी फट पड़ा जिसका धमाका दो किलोमीटर दूर तक सुनाई दिया। इस  ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में निकली काली और गर्म राख उड़कर इन मंदिरों तक भी आई और इन मंदिरों को भारी नुक्सान पहुंचा। इस कारण इस मंदिर सहित आसपास के समस्त मंदिरों को श्रद्धालुओं, दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया। इसे काफी दिनों बाद, राख हटाए जाने के पश्चात् ही फिर से खोला जा सका।

रारा जोंग्गरांग की कथा

परमबनन शिव मंदिर को जावा द्वीप वासी रारा जोंग्गरांग मंदिर कहते हैं। रारा जोंग्गरांग का अर्थ होता है- पतली कुमारी। जावा द्वीप की एक दंत कथा के अनुसार किसी समय जावा द्वीप पर पेंगिंग तथा बोको नामक दो राज्य थे। पेंगिंग राज्य समृद्ध एवं खुशहाल राज्य था जिस पर राजा प्रबु डामार मोयो का शासन था जिसके बंडुंग बोण्डोवोसो नामक पुत्र था। बोको राज्य पर मानवभक्षी क्रूर राक्षस प्रबु बोको का शासन था। उसका एक सहयोगी पातिह गुपोलो नामक राक्षस भी बड़ा क्रूर था।

प्रबु बोको की कन्या रारा जोंगरांग बहुत सुंदर थी। प्रबु बोको पेंगिंग राज्य को जीतकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसलिए उसने विशाल सेना का निर्माण किया। एक दिन अचानक उसकी सेनाओं ने पेंगिंग रज्य पर आक्रमण कर दिया। पेंगिंग का राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो अपनी सेना लेकर उस राक्षस राजा से लड़ने के लिए चला। एक भयानक युद्ध के बाद राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से राक्षस राजा प्रबु बोको को मार डाला।

प्रबु बोको का सहयोगी राक्षस पातिह गुपोलो बची हुई सेना को युद्ध क्षेत्र से लेकर भाग गया। वह मृत राजा की राजधानी बोको पहुंचा और राजमहल में जाकर राजकुमारी रारा जोंगराग को सूचित किया कि उसका पिता युद्ध में मर गया है। उसी समय पेंगिंग की सेना आ पहुंची और उन्होंने मृतराजा की राजधानी एवं उसके महल पर अधिकार कर लिया।

राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने राजकुमार रोरो जोंगराग को देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु राजकुमारी ने विवाह करने से मना कर दिया। जब राजकुमार ने राजकुमारी पर बार-बार जोर डाला तो राजकुमारी ने राजकुमार के समक्ष दो शर्तें रखीं।

पहली तो यह कि उसे जलतुण्ड नामक एक विशाल कूप बनाना पड़ेगा तथा दूसरी शर्त यह कि राजकुमार को अपनी शक्तियों के बल पर एक रात में 1000 मंदिरों का निर्माण करना पड़ेगा। राजकुमार ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं तथा तुरंत ही एक कूप का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। राजकुमार ने अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर शीघ्र ही कुआं खोद डाला तथा राजकुमारी को कुआं देखने के लिए बुलाया। राजकुमारी ने राजकुमार को कुएं में उतरकर दिखाने के लिए कहा।

जब राजकुमार कुएं में उतरा तो राजकुमारी के पिता के साथी राक्षस पातिह गुपोलो ने कुंए को मिट्टी एवं पत्थरों से बंद कर दिया। बड़ी कठिनाई से राजकुमार उसे कुएं से बाहर निकल सका। इस धोखे के बाद भी राजकुमारी के प्रति राजमकुमार का प्रेम कम नहीं हुआ। अब राजकुमारी ने राजकुमार से दूसरी शर्त पूरी करने के लिए कहा।

राजकुमार ने उन दिव्य आत्माओं का आह्वान किया जो उसकी सहायता करती थीं। वे आत्माएं जब 999 मंदिर बना चुकीं और 1000 वें मंदिर का निर्माण करने लगीं तो राजकुमारी ने अपने राक्षस साथियों की सहायता से पूर्व दिशा में चावल के खेतों और भूसे में भयानक आग लगा दी जिससे मंदिर बना रही आत्माओं को लगा कि सूर्य निकल आया है और वे काम छोड़कर फिर से धरती में प्रवेश कर गईं।

इस प्रकार एक हजारवां मंदिर अधूरा ही रह गया। जब राजकुमार को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी जोंग्गरांग को श्राप दिया कि वह पत्थर की मूर्ति में बदल जाए। राजकुमारी तत्काल ही पत्थर की मूर्ति में बदल गई और राजकुमार ने अधूरे पड़े मंदिर का निर्माण पूरा करके उस मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया। वही मूर्ति अब दुर्गा के रूप में पूजी जाती है जिसे स्थानीय लोग रारा जोंग्गरांग कहते हैं। यही मूर्ति शिव मंदिर के उत्तर वाले प्रकोष्ठ में लगी हुई है।

परमबनन शिव मंदिर समूह के मुख्य मंदिरों की आयोजना

सम्पूर्ण मंदिर परिसर लगभग 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। मंदिर परिसर के केन्द्रीय भाग में मुख्यतः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं। तीनों देवों की प्रतिमाओं के मुख पूर्व दिशा में हैं। प्रत्येक प्रधान मंदिर के सम्मुख पश्चिम दिशा में मुंह करके उसी देव से संबंधित एक मंदिर स्थित हैं जो तीनों देवों के वाहनों को समर्पित हैं। ब्रह्मा मंदिर के सामने हंस का, विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ का और शिव मंदिर के सामने नन्दी का मंदिर स्थित है।

शिव मंदिर बहुत बड़ा और सुंदर है। यह मंदिर तीनों प्रमुख मंदिरों के मध्य में है। शिव मंदिर के उत्तर में भगवान विष्णु का और दक्षिण में भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। रोरो जोंग्गरंग मंदिर या परमबनन मंदिर दुनिया भर के हिंदुओं के साथ-साथ, स्थानीय लोगों के लिए भी भक्ति एवं अध्यात्म का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

परमबनन शिव मंदिर समूह के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएं

परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊंचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढ़ियों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है।

उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएं

मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं।

इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीड़न, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं।

एक पैनल में अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष हनुमानजी द्वारा रामकथा के निवेदन का बड़ा ही जीवन्त दृश्य अंकित किया गया है इस चित्र में माता सीता और हनुमानजी के चेहरे के भाव एवं मुद्राएं इतनी भाव प्रवण बनाई गई हैं कि संसार में इस दृश्य का ऐसा अद्भुत अंकन शायद ही कहीं और हुआ हो। यह बीच में से एक टूटा हुआ पैनल है किंतु सौभाग्य से दोनों चेहरे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीर्णोद्धार के दौरान इस पैनल को फिर से जोड़कर खड़ा किया गया है।

भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन

हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केंद्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है की इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं।

बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध और कृष्ण-बलराम द्वारा कालिय वध के प्रसंग इतने सुंदर बने हुए हैं जिन्हें देखकर दर्शक, मूर्तिकारों की समझ और कला के प्रति अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

कमल-पुष्प पर मानव खोपड़ी

पास में ही एक शिव प्रतिमा है जिसमें शिव ध्यानस्थ हैं। उनके दाहनी ओर बहुत सुंदर त्रिशूल खड़ा हुआ है और बाईं ओर कमल नाल पर लगे पुष्प के ऊपर एक खोपड़ी रखी हुई दिखाई दे रही है। भगवान के शरीर पर विविध प्रकार के आभूषण एवं अलंकरण सुशोभित हैं। भगवान के हाथों में रुद्राक्ष की माला है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रतिमा में कोई सर्प दिखाई नहीं दे रहा है।

पशु-पक्षियों एवं कल्पतरू का अंकन

इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएं एवं अन्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोंच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है।

एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं। एक अन्य ताक में एक मादा तोता तथा एक नर तोता बैठे हुए हैं जिनमें मुंह के स्थान पर नर एवं नारी के मुख बने हुए हैं। मादा तोते में मानवीय आकृति का समावेश करते हुए स्तन भी बनाए गए हैं।

परग्रही प्राणी जैसे गरुड़

शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगावान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं, गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिश्र देश के उन लम्बी खोपड़ियों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे।

गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियां दिखाई गई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्लाओसान बौद्ध मंदिर (11)

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प्लाओसान बौद्ध मंदिर

प्लाओसान बौद्ध मंदिर भी एक मंदिर समूह है जिसमें मंदिरों के खण्डहर स्थित हैं। यह मंदिर परमबनन मंदिर के उत्तर-पश्चिम में केवल एक किलोमीटर की दूरी पर है। इस स्थान को बुगिसान गांव कहते हैं। यह सेंट्रल जावा के परमबनन जिले की क्लाटेन रीजेंसी का कस्बे जैसा गांव है जहाँ पक्की दुकानों की पंक्तियां बनी हुई हैं। मंदिर के निकट लगभग 200 मीटर की दूरी से होकर डेंगोक नामक नदी बहती है। मंदिर के चारों ओर धान के खेत हैं। केले और नारियल के झुरमुट यत्र-तत्र दिखाई देते हैं।

प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। इसका निर्माण काल भी नौवीं शताब्दी इस्वी का है।

माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजकुमारी काहुलुन्नान अथवा प्रमोदवर्द्धिनी ने करवाया जो कि शैलेन्द्र वंश के सम्राट-उन्गा अथवा समरातुंगा की पुत्री थी। इस राजकुमारी का विवाह पूरे हिन्दू विधि विधान से राकाई पिकातान से हुआ था जो कि ई.850 के आसपास मध्य जावा का माताराम वंश (संजय वंश) का शासक था।

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इस मंदिर समूह में दो प्रकार के बौद्ध मंदिर हैं- प्लाओसान लोर एवं प्लाओसान किडुल। इन दोनों प्रकार के मंदिरों को एक सड़क द्वारा अलग किया गया है। प्लाओसान लोर उत्तर में एवं प्लाओसान किडुल दक्षिण की ओर स्थित है। प्लाओसान मंदिर परिसर में 174 छोटे भवन हैं। इनमें से 116 स्तूप हैं तथा 58 चैत्य हैं। बहुत से भवनों पर शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से दो लेख यह सूचित करते हैं कि यह मंदिर राकाई पिकातान द्वारा उपहार स्वरूप बनाए गए हैं। इन लेखों की तिथियां 825-850 ईस्वी के बीच की हैं जबकि परमबनन मंदिर की तिथि 856 ईस्वी की है। इन दोनों मंदिरों का निर्माण एक ही राजा के द्वारा करवाया गया किंतु इनके शिल्प में पर्याप्त अंतर है। परमबनन मंदिर विशुद्ध हिन्दू स्थापत्य विधि से बने थे जबकि प्लाओसान मंदिरों का निर्माण परम्परागत बौद्ध शैली में कराया गया था। प्लाओसान लोर में दो मुख्य मंदिर हैं जिन्हें जुड़वां मंदिर कहा जा सकता है। दोनों मंदिरों के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल बैठे हुए हैं।

इनका खुला हुआ भाग मण्डप कहलाता है। इन मंदिरों को उच्च एवं निम्न स्तरों में विभक्त किया गया है तथा तीन कक्षों में विभक्त किया गया है। निम्न स्तर के कक्षों में बहुत सी प्रतिमाएं स्थित थीं किंतु वर्तमान में प्रत्येक कक्ष के दोनों ओर बोधिसत्व की एक-एक प्रतिमा ही स्थित है।

मुख्य आधार की केन्द्रीय प्रतिमा गायब हो गई है। यह कांसे की बुद्ध प्रतिमा थी जिसके दोनों ओर पत्थर की बोधिसत्व प्रतिमाएं विराजमान थीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि प्रत्येक मुख्य मंदिर में कुल 9 प्रतिमाएं रही होंगी जिनमें से 6 बोधिसत्व प्रस्तर प्रतिमाएं तथा 3 कांस्य बुद्ध प्रतिमाएं थीं। इन प्रकार दोनों जुड़वा मंदिरों में कुल 18 प्रतिमाएं रही होंगी। इन जुड़वा मंदिरों के एक कक्ष में एक खमेर राजा की प्रतिमा भी खुदी हुई है जो संभवतः बाद में खोदी गई होगी। इस प्रतिमा को उसके मुकुट से पहचाना जा सकता है।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

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