इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम ई.1825 में आरम्भ हुआ जब इण्डोनेशिया की जनता ने डच शासन के विरुद्ध जबर्दस्त विद्रोह किया किंतु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। डचों का दमन चक्र इतना क्रूर था कि लगभग 95 वर्ष तक इण्डोनेशिया की जनता शांत बनी रही।
इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पुनः ई.1914 में आरम्भ हुआ जब प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में मित्रराष्ट्रों ने लोकतंत्र एवं स्वतंत्रता का नारा दिया। इससे इण्डोनेशिया में भी राजनीतिक जागृति आई तथा राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार हुआ किंतु जब विश्वयुद्ध समाप्त हो गया और इण्डोनेशिया को कुछ नहीं मिला तो ई.1920 में जावा और सुमात्रा में डच शासन के विरुद्ध असंतोष फूट पड़ा। शीघ्र ही आंदोलनकारियों में फूट पड़ गई और डच सरकार ने इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह कुचल दिया।
इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय दल का गठन
ई.1927 में डच सरकार ने इण्डोनेशिया के शासन में कई सुधार किए तथा संसद की स्थापना की जिसमें से दो तिहाई सांसद जनता द्वारा मनोनीत किए जाने तथा एक तिहाई सांसद डच सरकार द्वारा मनोनीत किए जाने का प्रावधान था। संसद का अध्यक्ष, सरकार द्वारा ही नियुक्त किया जाता था।
जनता इन सुधारों से संतुष्ट नहीं हुई तथा उसी वर्ष सुकाणों के नेतृत्व में ”इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी” का गठन किया गया। इस दल ने इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय आंदोलन को नए सिरे से आरम्भ किया तथा गांव-गांव में जाकर स्कूल खोले ताकि नवयुवकों को राष्ट्रभक्ति एवं आजादी की शिक्षा दी जा सके। ई.1929 में सरकार ने इस दल पर प्रतिबंध लगा दिया।
इण्डोनेशियाई द्वीपों पर जापान का अधिकार
द्वितीय विश्वयुद्ध (ई.1939-45) के दौरान ई.1942 में जापान ने इण्डोनेशियाई द्वीपों पर अधिकार करके सैनिक शासन स्थापित कर दिया। डचों को इण्डोनेशिया खाली करना पड़ा किंतु कुछ द्वीप तब भी उनके अधिकार में रहे। ई.1945 में जब जापान का पतन हुआ तो जापान सरकार ने आत्मसमर्पण करने से पहले इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने की घोषणा की।
इण्डोनेशियाई गणतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष
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सुकार्णो की इण्डोनेशियाई राष्ट्रीय पार्टी ने अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति में देश में सरकार बनाने का प्रयास किया किंतु डच लौट आए और उन्होंने इण्डोनेशिया को स्वतंत्र करने से मना कर दिया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अडिग रहे तथा दोनों के बीच वार्तालाप चलता रहा। अंत में 25 मार्च 1947 को लिंगायती (लिंगजाति/लिंग्गाडजती) समझौता हुआ जिसके अनुसार जावा, सुमात्रा और मदुरा में इण्डोनेशियाई गणराज्य को मान्यता दे दी गई। सुकार्णो इण्डोनेशिया के समस्त द्वीपों को मिलकार एक देश बनाना चाहता था और डच सरकार चाहती थी कि इण्डोनेशियाई द्वीपों और हौलेण्ड को मिलाकर एक संघ-राज्य बनाया जाए। फलतः दोनों पक्षों में फिर से संघर्ष आरम्भ हो गया। डच सरकार ने सुकार्णो के अधिकार वाले क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया तथा इसे पुलिस कार्यवाही कहा। इस पर भारत तथा ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में उठाया। सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप से जनवरी 1948 में युद्ध बंद हो गया।
”बैटेविया” की घटना के बाद दिसम्बर 1948 में दोनों पक्षों में पुनः युद्ध आरम्भ हो गया किंतु तब तक विश्व जनमत सुकार्णो के पक्ष मे हो चुका था। सुरक्षा परिषद में पुनः युद्धबंदी का प्रस्ताव पारित हुआ जिसे डच सरकार ने अस्वीकार कर दिया और सुकार्णो तथा उसके साथियों को बंदी बना लिया।
इण्डोनेशिया गणराज्य को मान्यता
23 अगस्त से 2 नवम्बर 1949 तक हेग में इण्डोनेशियाई समस्या को सुलझाने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें हुए निर्णय के बाद इण्डोनेशिया को संघ राज्य घोषित किया गया तथा डॉ. सुकार्णो द्वारा घोषित गणराज्य को मान्यता दी गई। इस प्रकार इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह सफल हो गया।
इस समझौते के अनुसार 27 नवम्बर 1949 को इण्डोनेशिया की वास्तविक सत्ता सुकार्णो के नेतृत्व वाली सरकार को सौंप दी गई किंतु इण्डोनेशियाई राज्य संघ में हॉलैण्ड की औपचारिक साझेदारी मानी गई। अर्थात् इण्डोनेशिया में हॉलैण्ड एवं इण्डोनेशियाई सरकार को बराबर सम्प्रभु राष्ट्र माना गया।
जनता इस सम्बन्ध को भी समाप्त करना चाहती थी। अतः 15 अगस्त 1950 को इण्डोनेशियाई एकीकृत गणतन्त्र की स्थापना की गई तथा ई.1955 में इण्डोनेशिया एवं हॉलैण्ड के बीच के समस्त सम्बन्ध समाप्त हो गए।
बाली में हिन्दू सभ्यता अनादि काल से अपनी जड़ें जमाए हुए है। वस्तुतः वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक इण्डोनेशिया को भारतीय उपमहाद्वीप का ही नहीं अपितु भारत का ही एक द्वीप-समूह समझा जाना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पर सैंकड़ों राजा एवं राजवंश शासन करते थे, उसी प्रकार इण्डोनेशियाई द्वीपों पर भी भारतीय राजकुमारों के राज्य अस्तित्व में थे।
बाली में ऑस्ट्रोनेशियन मानव सभ्यता का प्रारम्भ
बाली, इंडोनेशिया का एक ”द्वीप प्रान्त” है। यह जावा द्वीप के पूर्व में तथा लोम्बोक द्वीप के पश्चिम में स्थित है। ईसा से लगभग 2000 साल पहले यहाँ मानवीय बस्तियों के बसने का क्रम आरम्भ हुआ। ये मानव ऑस्ट्रोनेशियन जाति के थे जो दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीपों से आकर यहाँ बस रहे थे।
ये लोग आदिवासी थे तथा सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में थे जबकि इस काल में भारत में अत्यंत उन्नत सभ्यता एवं संस्कृति फल-फूल रही थी। बाली द्वीप से मिली एक अति प्राचीन मुद्रा पर जंगली भैंसे के कंधों पर हल रखकर चावल की खेती करने का दृश्य अंकित किया गया है।
बाली द्वीप में हिन्दू संस्कृति का प्रवेश
भारतीय हिन्दू, बाली तथा आसपास के द्वीपों पर सबसे पहले कब पहुंचे, यह ठीक से नहीं बताया जा सकता किंतु इतना स्पष्ट है कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले से ही हिन्दुओं की बस्तियां बड़ी संख्या में जावा, सुमात्रा, मलाया तथा बाली आदि द्वीपों पर बस गई थीं। सुमात्रा, जावा तथा बाली द्वीपों पर हिन्दुओं का सबसे बड़ा जमावड़ा था। बाली द्वीप से ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण कुछ लेख मिले हैं जो ईसा से दो शताब्दी से भी अधिक पुराने हैं। ब्राह्मी लिपि के ये लेख हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। बाली द्वीप का नाम भी बहुत पुराना है।
ईसा की चौथी एवं पांचवी शताब्दी में भारतीय राजकुमारों ने ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपने छोटे-बड़े अनेक राज्य स्थापित कर लिए थे। बाली तथा इसके आस-पास फैले हजारों द्वीपों पर हिन्दू जाति निवास करती थी। बाली से प्राप्त विष्णु, ब्रह्मा, शिव, नंदी, स्कन्द और महाकाल की मूर्तियों से इस तथ्य की पुष्टि होती है।
बहुत से बौद्ध भी बाली और उसके निकटवर्ती द्वीपों पर आ जुटे। पौराणिक हिन्दू धर्म के साथ-साथ इन द्वीपों में बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ। ये दोनों धर्म बाली तथा उसके निकटवर्ती द्वीप समूह पर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक बिना किसी संघर्ष के फलते-फूलते रहे।
ई.914 का एक शिलालेख बाली से मिला है जिसमें श्री केसरी वर्मा नामक राजा का उल्लेख है। ई.989 के लगभग जावा के राजा मपू सिंदोक की प्रपौत्री महेन्द्रदत्ता (गुण-प्रिय-धर्मा-पत्नी) का विवाह बाली के राजा उदयन वर्मदेव (धर्मोद्यनवर्मदेव) के साथ हुआ। इस विवाह के कारण बाली में जावा की हिन्दू संस्कृति एवं हिन्दू धर्म का प्रचार और भी अधिक विस्तार पा गया।
महेन्द्रदत्ता ने ई.1001 के लगभग ऐरलांग्गा नामक पुत्र को जन्म दिया जो बाली का राजा बना। ई.1098 में इसी वंश में राजकुमारी सकलेन्दु किरण का जन्म हुआ जिसने ई.1115 से 1119 तक बाली द्वीप पर शासन किया। उसके बाद सूराधिप, जयशक्ति, जयपंगुस, आदिकुंती केतन एवं परमेश्वर आदि राजा हुए। इस प्रकार बाली का यह हिन्दू राजवंश 1293 ईस्वी तक शासन करता रहा। 1293 ईस्वी में जावा के मजापहित वंश के राजा ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया। उसके राज्य में कई हजार द्वीप थे। इस प्रकार बाली में हिन्दू सभ्यता फलती-फूलती रही।
बाली द्वीप पर इस्लाम का प्रवेश
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सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब में इस्लाम की आंधी उठी जो देखते ही देखते बवण्डर बनकर चारों तरफ फैलने लगी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में ही अरब व्यापारियों के रूप में पहली बार मुसलमानों ने बाली द्वीप पर पैर रखा। उनके प्रभाव से कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। सोलहवीं शताब्दी आते-आते यह प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया कि बाली को छोड़कर शेष सभी द्वीपों के शासकों एवं प्रजा ने इस्लाम स्वीकर कर लिया। 15वीं शताब्दी में इस्लाम रूपी आन्धी के तेज झौंके इण्डोनेशयिाई द्वीपों को झकझोरने लगे। अंततः 1478 ईस्वी में जावा का मजापहित हिन्दू साम्रज्य ध्वस्त हुआ और अधिकांश द्वीपों पर मुसलमान सुलतानों ने सत्ता हथिया ली। उन्होंने इन द्वीपों के हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार किये। उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाना, उनकी सम्पत्ति तथा स्त्रियों का हरण कर लेना तथा हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार देना, अत्यंत साधारण बात थी। ऐसी स्थिति में जावा, सुमात्रा, मलाया और अन्य द्वीपों के अभिजात्य-वर्गीय हिन्दू भाग-भाग कर बाली आने लगे।
बाली में एकत्रित हुए हिन्दुओं ने मुसलमानों से मोर्चा लेने का निर्णय लिया। मुसलमानों ने बहुत प्रयास किये किंतु हिन्दुओं की संगठित शक्ति के कारण बाली द्वीप में हिन्दुओं का तथा हिन्दू धर्म का पतन नहीं हुआ। आसपास के द्वीपों में रह रहे हजारों बौद्धों को भी यहीं शरण मिल सकी। जब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मलाया द्वीप समूह (अब मलेशिया) से हिन्दू सभ्यता का अंत कर दिया गया तब बाली द्वीप ने वहाँ के हिन्दू राजाओं एवं संस्कृति को भी शरण दी। इस प्रकार बाली में हिन्दू सभ्यता बची रही।
बाली में ही बचे हिन्दू और बौद्ध
लगभग 100 साल तक इण्डोनेशियाई द्वीपों में मुसलमानों के अत्याचार निर्बाध रूप से जारी रहे और तब तक जारी रहे जब तक कि बाली को छोड़कर शेष द्वीपों में मुस्लिम सत्ताएं स्थापित नहीं हो गईं तथा वहाँ की लगभग समस्त प्रजा ने इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया। परिणामतः ईस्ट-इण्डीज द्वीपों में केवल बाली द्वीप पर ही हिन्दू जनसंख्या बची रह गई।
बाली द्वीप पर डचों का अधिकार
ई.1597 में पहली बार डच लोगों का बाली द्वीप पर आगमन हुआ। उस समय बाली द्वीप पर हिन्दू राजा का शासन था। डचों ने बाली द्वीप पर अपनी आर्थिक गतिविधियां आरम्भ कीं जो धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों में बदल गईं। ई.1839 में डच लोगों ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया तथा ई.1840 के आते-आते बाली द्वीप के उत्तरी तट पर डच लोगों का शासन हो गया। इसके बाद उन्होंने तेजी से बाली द्वीप के शेष भाग पर अधिकार जमाना आरम्भ किया।
ई.1906 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने बाली के हिन्दू राजवंश के लगभग 200 लोगों को मार डाला तथा उनके साथ ही बाली के हजारोें हिन्दू सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया। ई.1911 में उन्होंने बाली द्वीप को डच साम्राज्य में शामिल कर लिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ई.1942 में जापान ने बाली द्वीप पर अधिकार कर लिया ताकि वह बाली द्वीप को आधार-शिविर की तरह उपयोग करके मित्र राष्ट्रों से भलीभांति लड़ सके। जापानियों के दबाव में डच लोगों को बाली द्वीप खाली करना पड़ा किंतु वे निकटवर्ती द्वीपों पर अपना अधिकार जमाए रखने में सफल रहे।
हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये जाने के बाद अगस्त 1945 में जापान ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष घुटने टेक दिये। बाली के लोगों ने इसे अपने लिए सुअवसर समझा। उन्होंने अपनी स्वयं की एक सेना बना ली और बाली में रह रही जापानी सेना पर आक्रमण कर दिया। जापानियों को बाली द्वीप से भागना पड़ा किंतु इस समय स्वतंत्रता का सुख बाली के लोगों के भाग्य में लिखा ही नहीं था।
जापान का पतन होने के बाद डच लोग पुनः बाली लौट आए ताकि वे अपने खोये हुए राज्य का फिर से निर्माण कर सकें। बाली के लोगों ने डच सेना से संघर्ष करने की तैयारी की तथा मरते दम तक लड़ने का निर्णय लिया। कर्नल नगुरा राय के नेतृत्व में बाली के लोगों ने डच लोगों पर बड़ा आत्मघाती आक्रमण किया किंतु हिन्दुओं के दुर्भाग्य से इस युद्ध में विजय डच लोगों के हाथ लगी। बाली की सेना पूर्णतः नष्ट हो गई और बाली द्वीप फिर से डच लोगों के अधीन हो गया। यह स्थिति भी अधिक समय तक बनी नहीं रह सकी।
ई.1949 में कुछ मुस्लिम आंदोलनकारियों ने सुकार्णो तथा हात्ता के नेतृत्व में इण्डोनेशिया के हजारों द्वीपों को सम्मिलित करते हुए ”रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इण्डोनेशिया” नामक देश का निर्माण किया तथा उसमें बाली द्वीप को भी सम्मिलित कर लिया। डच सरकार ने इस नये देश को मान्यता दे दी। इसके बाद विश्व के अन्य देशों ने भी इण्डोनेशिया रिपब्लिक के निर्माण को स्वीकार कर लिया। डच लोगों को एक बार पुनः बाली द्वीप खाली करना पड़ा।
पांच लाख लोगों की हत्या
ई.1950-60 के बीच इण्डोनेशिया में एक बार फिर से राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई जिसके कारण सेना को हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया। निरंकुश सेना ने इण्डोनेशिया के विभिन्न द्वीपों में लगभग 5 लाख लोगों को मार डाला। बाली द्वीप पर 80 हजार से 1 लाख लोग मारे गये।
आगूंग पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट
अभी सैनिक ताण्डव समाप्त भी नहीं हुआ था कि ई.1963 में आगूंग पर्वत में विस्फोट होने से बाली द्वीप पर हजारों लोग मारे गये तथा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। हजारों बाली वासियों को द्वीप खाली करके अन्य द्वीपों को भाग जाना पड़ा।
पर्यटन को बनाया आर्थिक उन्नति का आधार
ई.1965-66 में सुहार्तो ने सुकार्नो की सरकार को अपदस्थ कर दिया। उसने बाली द्वीप को आर्थिक सम्बल देने के लिए पर्यटन को मुख्य आधार बनाया। इसके बाद से बाली की दशा में सुधार आने लगा। साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया। विश्व भर से पर्यटकों को बाली द्वीप पर लाने के प्रयास आरम्भ हुए। बाली के सुंदर सागरीय द्वीपों, चावल के हरे-भरे खेतों तथा प्राचीनतम हिन्दू मंदिरों को देखने के लिए लाखों लोग दुनिया भर से बाली आने लगे। बाली के लोगों को नये रोजगार प्राप्त हुए, लोगों में आत्मविश्वास तथा स्थिरता आने लगी।
मुस्लिम आतंकियों के बाली द्वीप पर हमले
बाली द्वीप को विश्व भर के पर्यटकों में अपनी पहचान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ किए हुए अभी कुछ दशक भी नहीं बीते थे कि ई.2002 में एक मुस्लिम आतंकवादी ने बाली द्वीप के सबसे प्रमुख केन्द्र कुता में बम विस्फोट करके 202 अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को मार डाला। पूरे विश्व में इस हमले का बुरा प्रभाव पड़ा।
केवल तीन साल बाद ई.2005 में एक बार पुनः मुस्लिम आतंकवादियों ने बाली द्वीप के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को निशाना बनाया। इसके बाद से बाली में आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत कम हो गई तथा बाली एक बार पुनः निर्धनता के खड्डे में जा गिरा। आज भी बाली में हिन्दू सभ्यता बची हुई है।
यदि वर्तमान समय में बाली की विवेचना की जाए तो वह लघु भारत के रूप में विकसित एक महान् द्वीप की तरह दिखाई देता है जिसमें हिन्दुतव के समस्त चिह्न उपस्थित हैं।
पर्यटकों का स्वर्ग बाली
वर्तमान समय में बाली द्वीप की कुल जनसंख्या में से 90 प्रतिशत हिन्दू है। शेष 10 प्रतिशत जनसंख्या में बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई हैं। यह विश्व विख्यात पर्यटन स्थान है जिसकी कला, संगीत, नृत्य और मन्दिर मनमोहक हैं। यहाँ की राजधानी देनपासार नगर है।
मध्य बाली में स्थित उबुद नामक नगर भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। यह बाली द्वीप में कला और संस्कृति का प्रधान स्थान है। दक्षिण बाली में स्थित ”कुता” एक प्रमुख नगर है। जिम्बरन बाली में मछुओं का ग्राम और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। द्वीप के उत्तरी तट पर सिंहराज नगर स्थित है। आगूंग पर्वत और ज्वालामुखी बतुर पर्वत दो ऊंची चोटियां हैं।
हँसते-मुस्कुराते चेहरों वाले लोग
बाली के लोग सरल, हंसमुख एवं श्रमजीवी किन्तु निर्धन, फटेहाल और अभावग्रस्त हैं। स्त्री और पुरुष दोनों ही, दिन भर हाड़-तोड़ परिश्रम करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। पुरुष अपेक्षाकृत अधिक परिश्रम के कामों अर्थात् वाहन चालन, कृषि एवं निर्माण कार्यों में संलग्न हैं, वहीं महिलाएं प्रायः किसी न किसी प्रकार की छोटी-मोटी दुकान चलाती हैं। या सड़कों के किनारे नारियल, केले और विभिन्न प्रकार के फूल बेचती हुई दिखाई देती हैं।
भारत और भारतीयों से है करते हैं प्यार
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वर्तमान समय में बाली कई अर्थों में भारत का एक संस्करण दिखाई देता है तो कई अर्थों में यह भारत से बिल्कुल अलग है। बाली के स्थानीय व्यक्ति भारतीयों को देखकर प्रसन्न होते हैं और पहली ही भेंट में यह बताना नहीं भूलते कि हम भी हिन्दू हैं। वे ये भी बताते हैं कि हमारे परिवार में कौन-कौन शाकाहारी है और कौन व्यक्ति भारत जाकर गंगा स्नान कर आया है। यह देखना और जानना किसी सुखद अश्चर्य से कम नहीं होता कि भारतीय हिन्दुओं के प्रति इनके मन में अपार आदर और स्नेह है। जैसे ही आप इनकी दुकान पर पहुंचते हैं, या मार्ग में मिलते हैं, बाली के अधिकांश लोग ”स्वस्तिम् अस्तु” कहकर दोनों हाथ जोड़ते हैं और मुस्कुराकर आपका स्वागत करते हैं। इनकी आंखें बताती हैं कि उन्हें यह ज्ञात है कि भारत बहुत धनी और सभ्य देश है तथा बाली के लोगों की जड़ें भारत में हैं।
साफ-सुथरा द्वीप
वर्तमान समय में बाली एक साफ-सुथरा द्वीप है, सड़कों पर गंदगी, भीड़-भड़क्का एवं शोरगुल नहीं है। सड़कें अपेक्षाकृत संकरी किंतु मजबूत हैं। कहीं भी टूटी-फूटी या उधड़ी हुई सड़कें देखने को नहीं मिलती हैं, इससे अनुमान होता है कि यहाँ भ्रष्टाचार या तो है ही नहीं और यदि है तो बहुत ही कम है।
ठेकेदारों और इंजीनियरों ने सड़क निर्माण में पूरी सामग्री का उपयोग किया है। सड़क के दोनों ओर पैदल यात्रियों के लिए पटरियां बनी हुई हैं, साइन बोर्ड भी भली भांति लगे हुए हैं। सड़कों के किनारे लगे सूचना पट्ट एवं दुकानों के बाहर लगे नामपट्ट बाली की स्थानीय भाषा ”बहासा इण्डोनेशियन” में लिखे हुए हैं, जो कि मलय भाषा से बनी है।
यह देखकर आश्चर्य होता है कि ये सभी पट्ट रोमन लिपि में लिखे हुए हैं जो देखने में तो अंग्रेजी भाषा के लगते हैं किंतु विदेशी पर्यटकों को पढ़ने में नहीं आते। यह ठीक वैसा ही है जैसे मराठी लोगों ने मराठी भाषा के लिए ”देवनागरी” लिपि अपना ली है।
बाली द्वीप के नगरों में बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर बहुत कम हैं। अधिकांश दुकानें बहुत छोटी हैं तथा उनमें बिक्री के लिए बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। ब्रेड (डबल रोटी), कोल्ड ड्रिंक, अण्डा, डिब्बाबंद चिकन, डिब्बाबंद मछली, पूजा के फूल, नारियल, अगरबत्ती, प्लास्टिक के छोटे-मोटे सामान आदि दैनिक उपयोग की सामग्री अधिक बिकती है। दुकानों के बाहर एक-एक लीटर की मिट्टी के तेल, डीजल और पैट्रोल से भरी बोतलें रखी रहती हैं, क्योंकि यहाँ पैट्रोल पम्प केवल मुख्य नगर की परिधि में ही उपलब्ध हैं, वे भी गिने-चुने।
गाय, गंगा और गेहूँ रहित बाली के हिन्दू
भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार गाय, भारतीय धर्म का मुख्य आधार गंगा और भारतीय भोजन की थाली का मुख्य आधार गेहूं, बाली द्वीप में देखने को नहीं मिलते। यहाँ दुधारू पशु नहीं पाले जाते। यहाँ घरों में दूध एवं चाय नहीं पिये जाते। किसी विशिष्ट अतिथि के आने पर, मध्यम एवं उच्च वर्गीय परिवारों में बिना दूध की कॉफी बनाई जाती है।
यहाँ के लोगों का पूरा जीवन बीत जाता है किंतु ये न तो गाय, भैंस, बकरी आदि दुधारू पशुओं के दर्शन कर पाते हैं और न ही पशुओं के दूध का स्वाद चख पाते हैं। शैशव अवस्था में शिशु लगभग एक साल तक माँ का दूध पीता है, उसके बाद चिकन खाने लगता है, और फिर सूअर का मांस तथा मछली आदि। ऊंट और घोड़ा भी बाली में नहीं हैं। आश्चर्य की बात है कि यहाँ की सड़कों पर पशु घूमते दिखाई नहीं देते। गांवों में जाएं तो गलियों में केवल इक्का-दुक्का कुत्ते दिखाई देते हैं।
गाय-भैंस के अभाव में सामान्यतः घरों में दूध-दही-छाछ-मक्खन-घी का उपयोग नहीं होता। बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर पर डिब्बाबंद योघर्ट मिलता है, इसका उपयोग केवल पर्यटक करते हैं। यह बहुत महंगा है, सामान्यतः 50 ग्राम योघर्ट के लिए भारतीय मुद्रा में 60 रुपए चुकाने होते हैं। इसका स्वाद दही से काफी अलग होता है तथा यह गोंद की तरह चिपचिपा होने के कारण आम भारतीय के लिए अनुपयोगी है।
फसलों के नाम पर खेतों में प्रायः चावल, मक्का और गन्ना दिखाई देता है। चावल बहुतायत में होता है किंतु बासमाती चावल या खुशबूदार अच्छा चावल भारत से मंगाया जाता है। गेहूं, जौ, चना, बाजरा आदि अनाज और मूंग, मोठ, उड़द, चंवला आदि दालें यहाँ नहीं उगाई जातीं। भिण्डी, आलू और प्याज जैसी सब्जियां भी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, भारत एवं अन्य देशों से आयात की जाती हैं। आयातित सब्जियां आम दुकानों पर नहीं मिलतीं। ये सब्जियां बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स में काफी ऊंची दरों पर प्लास्टिक के रैपर में बंद करके बेची जाती हैं एवं बड़े होटलों में विदेशी पर्यटकों के लिए उपलब्ध रहती हैं।
भारतीय देवी-देवताओं में है विश्वास
बाली के लोग रामायण, भगवान राम, देवी सीता एवं रामदूत हनुमान के प्रति श्रद्धा रखते हैं। चारों वेद, गीता, महाभारत, एवं पाण्डु पुत्र भीम तथा वीर अर्जुन की चर्चा करना गौरव का विषय मानते हैं। भगवान राम, इन्द्र, सरस्वती, कृष्ण, शिव, अर्जुन और भीम की विशाल एवं सुंदर प्रतिमाएं चौराहों पर लगी हुई हैं जो पर्यटकों के आकर्षण और कौतूहल का विषय हैं क्योंकि भारत में केवल हनुमानजी अथवा शिवजी की ही इतनी बड़ी प्रतिमाएं देखी जाती हैं।
हनुमानजी की प्रतिमाएं विकराल स्वरूप की हैं। सीता को ये देवी सिन्ता कहते हैं तथा उनमें बड़ी श्रद्धा रखते हैं। देवी सिन्ता की अत्यंत सुंदर और विशाल प्रतिमाएं चौराहों पर देखने को मिलती हैं। सरस्वती की बहुत सुन्दर प्रतिमाएं, दर्शकों का मन मोह लेती हैं। मूर्ति निर्माण की यह एक विशिष्ट परम्परा है, इसमें रागात्मकता एवं मनोरम्यता का तत्व अधिक है।
भारत के चौराहों पर मोहनदास गांधी, इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा बहुत से स्थानीय नेताओं आदि की मूर्तियां पाई जाती हैं किंतु भारतीय पर्यटक बाली द्वीप में भगवान श्रीराम, देवी सीता, भगवान श्रीकृष्ण तथा रामभक्त हनुमान की मूर्तियां देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं।
भगवान शिव, पार्वती एवं गणेश की प्रतिमाएं भी चौराहों, उद्यानों एवं होटलों आदि में दिखाई देती हैं। अधिकतर मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गणेश प्रतिमाएं लगी हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे आकार की हैं तथा ठीक वैसी ही हैं जैसी भारत में पाई जाती हैं। द्वारपालों की कुछ मूर्तियां दैत्यों जैसी दिखाई देती हैं। सामान्यतः ये मूर्तियां मंदिरों और नगरों के द्वारों के बाहर लगी रहती हैं।
प्रत्येक घर के अंदर तथा बाहर स्तम्भ मंदिर बने होते हैं। लगभग चार पांच फुट ऊंचे स्तम्भ पर एक छोटा आला होता है जिसे काला (स्तंभ पर स्थित लघु देवालय) कहते हैं। घर के भीतर बने काला को पुंगुनकरन अर्थात् धरती का देवता कहते हैं। घर के भीतर के काला में देवी दुर्गा के भी देवालय होते हैं। घर के बाहर के देव स्थान को इन्द्राब्लॉका कहा जाता है, यह गली-मौहल्ले की रक्षा करता है।
ब्रह्मा, विष्णु महेश को कुनिंगन्न (त्रिदेव) कहा जाता है। साल में एक बार यलो डे मनाया जाता है। उस दिन स्त्री-पुरुष पीले वस्त्र धारण करते हैं। यह भारत के बसंत पंचमी का ही रूप है। गलुगन्गन पर्व पर सार्वजनिक अवकाश होता है। पके हुए चावल को नासि तथा कच्चे चावल को सयुर कहा जाता है, जो वर्तमान समय में बाली का मुख्य खाद्य है।
इण्डोनेशिया के मंदिर आकार में विशाल हैं, विषय-वस्तु में विविधता लिए हुए हैं तथा हिन्दू पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं किंतु उनमें सजावट का अंश न के बराबर है।
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इण्डोनेशिया के मंदिर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दो भागों में विभक्त किए जा सकते हैं। पहले भाग में वे हिन्दू मंदिर आते हैं जो बड़ी संख्या में बने हुए हैं तथा इण्डोनेशिया के जिन द्वीपों पर मानव बस्तियां अस्तित्व में हैं, उन सभी द्वीपों में हिन्दू मंदिर स्थित हैं। दूसरे भाग में वे मंदिर हैं जो बौद्ध मत को मानते हैं। इनकी संख्या कम है तथा ये बहुत कम द्वीपों में देखने को मिलते हैं। इण्डोनेशिया के अनेक द्वीपों पर प्राचीन हिन्दू देवालय, बौद्ध चैत्य तथा विहार बने हुए थे जिनमें से अधिकतर मंदिर एवं चैत्य मुस्लिम आक्रांताओं की भेंट चढ़ गए। जब सुहार्तो की सरकार ने विश्व पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इण्डोनेशिया को नए सिरे से तैयार करने का काम आरम्भ किया तब से अब तक कई मंदिर एवं चैत्य खण्डहरों के नीचे से खोज निकाले गए हैं। इंडोनेशिया के मंदिरों पर सर्वाधिक प्रभाव राम कथा का देखने को मिलता है। परमबनन शिव मंदिर में लगी प्रस्तर शिलाओं पर रामायण के बहुत से दृश्य अंकित हैं। इस मंदिर में कृष्णलीला के प्रसंग भी बड़ी संख्या में उत्कीर्ण हैं।
जावा द्वीप के मंदिर
जावा में हिन्दू धर्म के प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता हैं। जावा द्वीप पर 15 बड़े हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं जिनमें परमबनन शिव मंदिरऔर बोरोबुदुर बौद्ध विहार मुख्य हैं।
दूसरे प्रमुख मंदिरों में ई.750 में बना देंग मंदिर, 9वीं शताब्दी का प्लाओसान मंदिर, 15वीं सदी में बना सथो मंदिर, सिंघसरी साम्राज्य के काल में ई.1248 में बना किदाल मंदिर, जन्म से पहले जीवन को दर्शाता 15वीं सदी मे बना सुख मंदिर और मजापहित साम्राज्य के समय में 12वीं तथा 15वीं सदी के दौरान बना ”पनतरन मंदिर” सम्मिलित हैं। इन मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सांस्कृतिक श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।
मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिंदू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यतः भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। परमबनन मंदिर विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
परमबनन शिव मंदिर समूह परिसर में काले रंग के चौकोर, आयातकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालाकाय पत्थरों के सैंकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी इस्वी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकम्प के दौरान हुआ।
परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। उस समय कुल 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था जिनमें केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर त्रिमूर्ति मंदिर कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के मंदिर हैं।
त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक आपित मंदिर है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक केलिर मंदिर तथा चारों कोनों पर एक-एक पाटोक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में कुल 224 मंदिरों के अवशेष स्थित हैं।
इस प्रकार कुल यहाँ कुल 240 मंदिर स्थित थे किंतु 16वीं शती ईस्वी में प्रबल भूकम्प से ये मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे।
बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पर्द्धा
भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवी शताब्दी ईस्वी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलतः हिन्दू धर्म को मानने वाला था किंतु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था।
आठवीं शताब्दी ईस्वी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया। शैलेन्द्र वंश के राजा लगभग एक शताब्दी तक मध्य जावा पर शासन करते रहे।
हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण
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नौवीं शताब्दी ईस्वी में एक बार पुनः शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुनः संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुनः शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए ई.850 के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके। इतिहासकारों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण इस बात की घोषणा थी कि अब मध्य जावा में माताराम साम्राज्य (मेदांग साम्राज्य) बौद्ध-महायान धर्म के स्थान पर हिन्दू-शैव धर्म में परिवर्तित हो गया है। राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। ई.856 के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलतः भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था।
जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी ईस्वी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया।
अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना राजा बालितुंग द्वारा की गई। इसके बाद से राज परिवार के समस्त धार्मिक आयोजन इसी मंदिर में होने लगे। बालितुंग के उत्तराधिकारी राजाओं- दक्ष एवं तुलोडोंग द्वारा भी मंदिर का विस्तार किया गया। उस काल में इस मंदिर के बाहरी क्षेत्र में सैंकड़ों ब्राह्मण परिवार निवास करते थे।
परमबनन शिव मंदिर समूह का विघटन
ई.930 के बाद के किसी वर्ष में मपू सिंदोक नामक राजा ने जावा में इस्याना वंश की स्थापना की तथा जावा की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा परमबनन के उत्तर में स्थित मेरापी पहाड़ में ज्वालामुखी के सक्रिय हो जाने के कारण किया गया। राज्याश्रय हट जाने के बाद से मंदिर का विघटन आरम्भ हो गया। फिर भी यह हिन्दू प्रजा की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना रहा।
सोलहवीं शताब्दी में आए एक भयंकर भूकम्प में इस मंदिर समूह के समस्त मंदिर धरती पर गिर गए। ई.1755 में माताराम साम्राज्य का विभाजन हुआ तथा यह योग्यकार्ता (जोगजा) एवं सुराकार्ता (सोलो) राज्यों में विभक्त हो गया। इन दोनों राज्यों के सीमा इसी मंदिर पर आकर समाप्त होती थी। अब उन राज्यों की पहचान योग्यकार्ता एवं सेंट्रल जावा के रूप में की जाती है।
परमबनन शिव मंदिर समूह की जीर्णोद्धार यात्रा
जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो ई.1811 में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। ई.1918 में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया। ई.1930 में जीर्णोद्धार के काम में तेजी आई तथा यह कार्य आज भी जारी है।
मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य आसान नहीं था। अधिकतर अलंकृत पत्थर दूरस्थ क्षेत्रों में ले जाकर भवन निर्माण में लगा दिए गए थे। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया कि केवल उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत सामग्री उपलब्ध है तथा जिनका कोई डिजाइन, चित्र अथवा नक्शा उपलबध है। मंदिर के पुननिर्माण के लिए इसके चारों ओर खड़े हो गए बाजार एवं मानव बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया।
रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण
मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इण्डोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएं हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया।
चंद्र ज्योत्सना के प्रकाश में इन नाटिकाओं का मंचन किया जाता है तो विश्व भर के पर्यटक मंत्र-मुग्ध रह जाते हैं। गलुंगन, तावुर केसंगा तथा नायेपी आदि हिन्दू पर्वों पर इस मंदिर परिसर में हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उस दौरान बहुत से दल रामकथाओं का मंचन करते हैं।
सुन्नी मुसमलान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन
ई.1953 में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इण्डोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किंतु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैंकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था।
भारत में जहाँ कि 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या निवास करती है, श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, श्री राम जन्म भूमि अयोध्या और विश्वनाथ मंदिर काशी के मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है, इन मंदिरों पर राजनीति करके, कुछ राजनीतिक दल मुसलमानों के और कुछ राजनीतिक दल हिन्दुओं के वोट प्राप्त करते हैं।
मुझे जावा में सरदार पटेल का स्मरण हो आया जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षी इरादों को विफल करके सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया था। अन्यथा आज उसकी दशा भी अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ के मंदिरों जैसी ही होती।
वर्ष 2006 में पुनः भूकम्प से क्षति
अभी मंदिर को खुले लगभग 53 वर्ष ही हुए थे कि वर्ष 2006 में मध्य जावा में पुनः जोर का भूकम्प आया। मंदिर को फिर से क्षति पहुंची और इण्डोनेशिया के आर्कियोलोजी विभाग द्वारा मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करके इसे दर्शकों के लिए सुरक्षित बनाया गया। इस दौरान मंदिर कई महीनों तक बंद रहा।
सोलह मुख्य मंदिरों एवं दो लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण
वर्ष 2009 में नंदी मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह दर्शकों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर भगवान शिव के मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इसके बाद एक-एक करके मंदिरों का पुनर्निर्माण होता गया और वे दर्शकों के लिए खोले जाते रहे। वर्तमान में भीतरी मुख्य क्षेत्र के सभी 8 मुख्य मंदिरों एवं सभी 8 लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण पूरा कर लिया गया है। बाहरी क्षेत्र के 224 पेरवारा मंदिरों में से केवल 2 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा सका है।
वर्ष 2010 में परमबनन सेंचुरी घोषित
वर्ष 2010 में इण्डोनेशियाई सरकार ने परमबनन, रातू बोको, कालासन, सारी तथा प्लाओसान मंदिरों के समस्त क्षेत्रों को घेरते हुए परमबनन सेंचुरी घोषित किया। यह सेंचुरी 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है।
वर्ष 2014 में ज्वालामुखी की राख का सामना
परमबनन शिव मंदिर को दुबारा से खोले हुए आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित केलुड ज्वालामुखी फट पड़ा जिसका धमाका दो किलोमीटर दूर तक सुनाई दिया। इस ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में निकली काली और गर्म राख उड़कर इन मंदिरों तक भी आई और इन मंदिरों को भारी नुक्सान पहुंचा। इस कारण इस मंदिर सहित आसपास के समस्त मंदिरों को श्रद्धालुओं, दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया। इसे काफी दिनों बाद, राख हटाए जाने के पश्चात् ही फिर से खोला जा सका।
रारा जोंग्गरांग की कथा
परमबनन शिव मंदिर को जावा द्वीप वासी रारा जोंग्गरांग मंदिर कहते हैं। रारा जोंग्गरांग का अर्थ होता है- पतली कुमारी। जावा द्वीप की एक दंत कथा के अनुसार किसी समय जावा द्वीप पर पेंगिंग तथा बोको नामक दो राज्य थे। पेंगिंग राज्य समृद्ध एवं खुशहाल राज्य था जिस पर राजा प्रबु डामार मोयो का शासन था जिसके बंडुंग बोण्डोवोसो नामक पुत्र था। बोको राज्य पर मानवभक्षी क्रूर राक्षस प्रबु बोको का शासन था। उसका एक सहयोगी पातिह गुपोलो नामक राक्षस भी बड़ा क्रूर था।
प्रबु बोको की कन्या रारा जोंगरांग बहुत सुंदर थी। प्रबु बोको पेंगिंग राज्य को जीतकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसलिए उसने विशाल सेना का निर्माण किया। एक दिन अचानक उसकी सेनाओं ने पेंगिंग रज्य पर आक्रमण कर दिया। पेंगिंग का राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो अपनी सेना लेकर उस राक्षस राजा से लड़ने के लिए चला। एक भयानक युद्ध के बाद राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से राक्षस राजा प्रबु बोको को मार डाला।
प्रबु बोको का सहयोगी राक्षस पातिह गुपोलो बची हुई सेना को युद्ध क्षेत्र से लेकर भाग गया। वह मृत राजा की राजधानी बोको पहुंचा और राजमहल में जाकर राजकुमारी रारा जोंगराग को सूचित किया कि उसका पिता युद्ध में मर गया है। उसी समय पेंगिंग की सेना आ पहुंची और उन्होंने मृतराजा की राजधानी एवं उसके महल पर अधिकार कर लिया।
राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने राजकुमार रोरो जोंगराग को देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु राजकुमारी ने विवाह करने से मना कर दिया। जब राजकुमार ने राजकुमारी पर बार-बार जोर डाला तो राजकुमारी ने राजकुमार के समक्ष दो शर्तें रखीं।
पहली तो यह कि उसे जलतुण्ड नामक एक विशाल कूप बनाना पड़ेगा तथा दूसरी शर्त यह कि राजकुमार को अपनी शक्तियों के बल पर एक रात में 1000 मंदिरों का निर्माण करना पड़ेगा। राजकुमार ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं तथा तुरंत ही एक कूप का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। राजकुमार ने अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर शीघ्र ही कुआं खोद डाला तथा राजकुमारी को कुआं देखने के लिए बुलाया। राजकुमारी ने राजकुमार को कुएं में उतरकर दिखाने के लिए कहा।
जब राजकुमार कुएं में उतरा तो राजकुमारी के पिता के साथी राक्षस पातिह गुपोलो ने कुंए को मिट्टी एवं पत्थरों से बंद कर दिया। बड़ी कठिनाई से राजकुमार उसे कुएं से बाहर निकल सका। इस धोखे के बाद भी राजकुमारी के प्रति राजमकुमार का प्रेम कम नहीं हुआ। अब राजकुमारी ने राजकुमार से दूसरी शर्त पूरी करने के लिए कहा।
राजकुमार ने उन दिव्य आत्माओं का आह्वान किया जो उसकी सहायता करती थीं। वे आत्माएं जब 999 मंदिर बना चुकीं और 1000 वें मंदिर का निर्माण करने लगीं तो राजकुमारी ने अपने राक्षस साथियों की सहायता से पूर्व दिशा में चावल के खेतों और भूसे में भयानक आग लगा दी जिससे मंदिर बना रही आत्माओं को लगा कि सूर्य निकल आया है और वे काम छोड़कर फिर से धरती में प्रवेश कर गईं।
इस प्रकार एक हजारवां मंदिर अधूरा ही रह गया। जब राजकुमार को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी जोंग्गरांग को श्राप दिया कि वह पत्थर की मूर्ति में बदल जाए। राजकुमारी तत्काल ही पत्थर की मूर्ति में बदल गई और राजकुमार ने अधूरे पड़े मंदिर का निर्माण पूरा करके उस मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया। वही मूर्ति अब दुर्गा के रूप में पूजी जाती है जिसे स्थानीय लोग रारा जोंग्गरांग कहते हैं। यही मूर्ति शिव मंदिर के उत्तर वाले प्रकोष्ठ में लगी हुई है।
परमबनन शिव मंदिर समूह के मुख्य मंदिरों की आयोजना
सम्पूर्ण मंदिर परिसर लगभग 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। मंदिर परिसर के केन्द्रीय भाग में मुख्यतः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं। तीनों देवों की प्रतिमाओं के मुख पूर्व दिशा में हैं। प्रत्येक प्रधान मंदिर के सम्मुख पश्चिम दिशा में मुंह करके उसी देव से संबंधित एक मंदिर स्थित हैं जो तीनों देवों के वाहनों को समर्पित हैं। ब्रह्मा मंदिर के सामने हंस का, विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ का और शिव मंदिर के सामने नन्दी का मंदिर स्थित है।
शिव मंदिर बहुत बड़ा और सुंदर है। यह मंदिर तीनों प्रमुख मंदिरों के मध्य में है। शिव मंदिर के उत्तर में भगवान विष्णु का और दक्षिण में भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। रोरो जोंग्गरंग मंदिर या परमबनन मंदिर दुनिया भर के हिंदुओं के साथ-साथ, स्थानीय लोगों के लिए भी भक्ति एवं अध्यात्म का महत्वपूर्ण केन्द्र है।
परमबनन शिव मंदिर समूह के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएं
परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊंचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढ़ियों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है।
उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।
श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएं
मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं।
इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीड़न, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं।
एक पैनल में अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष हनुमानजी द्वारा रामकथा के निवेदन का बड़ा ही जीवन्त दृश्य अंकित किया गया है इस चित्र में माता सीता और हनुमानजी के चेहरे के भाव एवं मुद्राएं इतनी भाव प्रवण बनाई गई हैं कि संसार में इस दृश्य का ऐसा अद्भुत अंकन शायद ही कहीं और हुआ हो। यह बीच में से एक टूटा हुआ पैनल है किंतु सौभाग्य से दोनों चेहरे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीर्णोद्धार के दौरान इस पैनल को फिर से जोड़कर खड़ा किया गया है।
भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन
हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केंद्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है की इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं।
बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध और कृष्ण-बलराम द्वारा कालिय वध के प्रसंग इतने सुंदर बने हुए हैं जिन्हें देखकर दर्शक, मूर्तिकारों की समझ और कला के प्रति अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।
कमल-पुष्प पर मानव खोपड़ी
पास में ही एक शिव प्रतिमा है जिसमें शिव ध्यानस्थ हैं। उनके दाहनी ओर बहुत सुंदर त्रिशूल खड़ा हुआ है और बाईं ओर कमल नाल पर लगे पुष्प के ऊपर एक खोपड़ी रखी हुई दिखाई दे रही है। भगवान के शरीर पर विविध प्रकार के आभूषण एवं अलंकरण सुशोभित हैं। भगवान के हाथों में रुद्राक्ष की माला है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रतिमा में कोई सर्प दिखाई नहीं दे रहा है।
पशु-पक्षियों एवं कल्पतरू का अंकन
इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएं एवं अन्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोंच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है।
एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं। एक अन्य ताक में एक मादा तोता तथा एक नर तोता बैठे हुए हैं जिनमें मुंह के स्थान पर नर एवं नारी के मुख बने हुए हैं। मादा तोते में मानवीय आकृति का समावेश करते हुए स्तन भी बनाए गए हैं।
परग्रही प्राणी जैसे गरुड़
शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगावान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं, गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिश्र देश के उन लम्बी खोपड़ियों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे।
गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियां दिखाई गई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।
प्लाओसान बौद्ध मंदिर भी एक मंदिर समूह है जिसमें मंदिरों के खण्डहर स्थित हैं। यह मंदिर परमबनन मंदिर के उत्तर-पश्चिम में केवल एक किलोमीटर की दूरी पर है। इस स्थान को बुगिसान गांव कहते हैं। यह सेंट्रल जावा के परमबनन जिले की क्लाटेन रीजेंसी का कस्बे जैसा गांव है जहाँ पक्की दुकानों की पंक्तियां बनी हुई हैं। मंदिर के निकट लगभग 200 मीटर की दूरी से होकर डेंगोक नामक नदी बहती है। मंदिर के चारों ओर धान के खेत हैं। केले और नारियल के झुरमुट यत्र-तत्र दिखाई देते हैं।
प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। इसका निर्माण काल भी नौवीं शताब्दी इस्वी का है।
माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजकुमारी काहुलुन्नान अथवा प्रमोदवर्द्धिनी ने करवाया जो कि शैलेन्द्र वंश के सम्राट-उन्गा अथवा समरातुंगा की पुत्री थी। इस राजकुमारी का विवाह पूरे हिन्दू विधि विधान से राकाई पिकातान से हुआ था जो कि ई.850 के आसपास मध्य जावा का माताराम वंश (संजय वंश) का शासक था।
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इस मंदिर समूह में दो प्रकार के बौद्ध मंदिर हैं- प्लाओसान लोर एवं प्लाओसान किडुल। इन दोनों प्रकार के मंदिरों को एक सड़क द्वारा अलग किया गया है। प्लाओसान लोर उत्तर में एवं प्लाओसान किडुल दक्षिण की ओर स्थित है। प्लाओसान मंदिर परिसर में 174 छोटे भवन हैं। इनमें से 116 स्तूप हैं तथा 58 चैत्य हैं। बहुत से भवनों पर शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से दो लेख यह सूचित करते हैं कि यह मंदिर राकाई पिकातान द्वारा उपहार स्वरूप बनाए गए हैं। इन लेखों की तिथियां 825-850 ईस्वी के बीच की हैं जबकि परमबनन मंदिर की तिथि 856 ईस्वी की है। इन दोनों मंदिरों का निर्माण एक ही राजा के द्वारा करवाया गया किंतु इनके शिल्प में पर्याप्त अंतर है। परमबनन मंदिर विशुद्ध हिन्दू स्थापत्य विधि से बने थे जबकि प्लाओसान मंदिरों का निर्माण परम्परागत बौद्ध शैली में कराया गया था। प्लाओसान लोर में दो मुख्य मंदिर हैं जिन्हें जुड़वां मंदिर कहा जा सकता है। दोनों मंदिरों के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल बैठे हुए हैं।
इनका खुला हुआ भाग मण्डप कहलाता है। इन मंदिरों को उच्च एवं निम्न स्तरों में विभक्त किया गया है तथा तीन कक्षों में विभक्त किया गया है। निम्न स्तर के कक्षों में बहुत सी प्रतिमाएं स्थित थीं किंतु वर्तमान में प्रत्येक कक्ष के दोनों ओर बोधिसत्व की एक-एक प्रतिमा ही स्थित है।
मुख्य आधार की केन्द्रीय प्रतिमा गायब हो गई है। यह कांसे की बुद्ध प्रतिमा थी जिसके दोनों ओर पत्थर की बोधिसत्व प्रतिमाएं विराजमान थीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि प्रत्येक मुख्य मंदिर में कुल 9 प्रतिमाएं रही होंगी जिनमें से 6 बोधिसत्व प्रस्तर प्रतिमाएं तथा 3 कांस्य बुद्ध प्रतिमाएं थीं। इन प्रकार दोनों जुड़वा मंदिरों में कुल 18 प्रतिमाएं रही होंगी। इन जुड़वा मंदिरों के एक कक्ष में एक खमेर राजा की प्रतिमा भी खुदी हुई है जो संभवतः बाद में खोदी गई होगी। इस प्रतिमा को उसके मुकुट से पहचाना जा सकता है।
बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार महायान बौद्ध विहार है जो मध्य जावा प्रान्त के मगेलांग नगर में स्थित है। यह भी परमबनन शिव मंदिर तथा प्लाओसान बौद्ध विहार की भांति मूलतः 9वीं सदी ईस्वी में निर्मित है। जिस समय यह बना था उस समय यह संसार का सबसे बड़ा बौद्ध विहार था। इसका यह स्थान आज भी सुरक्षित है।
बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार छः वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन चबूतरों का ऊपरी भाग वृत्ताकार है। इस विहार में उत्कीर्णित प्रतिमाओं वाली 2,672 प्रस्तर शिलाएं (Relief panels) और 504 बौद्ध प्रतिमाएं पाई गई हैं। इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुम्बद के चारों ओर स्तूप वाली 72 बुद्ध प्रतिमाएं हैं।
बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार का निर्माण 9वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। विहार की बनावट जावाई बुद्ध स्थापत्यकला के अनुरूप है जो इंडोनेशियाई जावाई मूल के स्थानीय लोगों की पूर्वज पूजा और बौद्ध निर्वाण अवधारणा का मिश्रित रूप है।
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विहार के स्थापत्य में भारत की चौथी-पांचवी शताब्दी की गुप्त कालीन स्थापत्य कला का प्रभाव भी दिखाई देता है किंतु इण्डोनेशियाई स्थापत्य तत्व पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हैं जिसके कारण इसे इंडोनेशियाई स्थापत्य संरचना माना जाना चहिए। इसकी रचना एक विशालाकाय स्तूप के रूप में मण्डलाकार है तथा सम्पूर्ण निर्माण, किसी स्मारक की तरह दिखाई देता है। वस्तुतः बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार भगवान बुद्ध का पूजा-स्थल और विश्व-प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ-स्थल है। इस स्मारक के चारों ओर बौद्ध ब्रह्माण्डिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तर बने हुए है जो कामध्यान (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) कहलाते हैं। दर्शक इन तीनों स्तरों का चक्कर लगाते हुए इसके शीर्ष पर अर्थात् बुद्धत्व की अवस्था को पहुँचता है। स्मारक में हर ओर से सीढ़ियों और गलियारों की विस्तृत व्यवस्था है।
गलियारों में होते हुए निकलने पर 1,460 शिलालेखों (Narrative Relief Panels) और स्तम्भ-वेष्टनों; सीढ़ियों पर लगने वाली घुमावदार छड़ों- ठंसनेजतंकमे) के माध्यम से दर्शनार्थियों को आगे बढ़ने के लिए स्वतः ही मार्गदर्शन मिलता रहता है। इस स्मारक का निर्माण कार्य 9वीं शताब्दी में आरम्भ हुआ था, मुख्य निर्माण तभी पूरे कर लिए गए थे किंतु उसके बाद की शताब्दियों में कुछ न कुछ निर्माण निरंतर चलता ही रहा था।
इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी कहा जाता है। इस कारण बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ” चण्डी बोरोबुदुर ” भी कहा जाता है। जावा में चण्डी शब्द प्राचीन बनावट के द्वार और स्नान से सम्बन्धित रचनाओं के लिए प्रयुक्त होता है। बोरोबुदुर शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है।
इस शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अंग्रेज इतिहासकार सर थॉमस रैफल्स की पुस्तक History of Jawa में हुआ था किंतु इस नाम का इससे पुराना कोई उल्लेख किसी शिलालेख अथवा ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होता है। ई.1365 के एक तालपत्र (ताड़पत्र) में कहा गया है कि ”पवित्र बौद्ध पूजा स्थल नगरकरेतागमा” को ”बुदुर” कहा जाता है। यह तालपत्र मजापहित राजदरबारी एवं बौद्ध विद्वान मपु प्रपंचा द्वारा ई.1365 में लिखा गया था। संभवतः थॉमस रैफल्स ने (ई.1814 में) उसी तालपत्र के आधार पर इस बौद्ध स्मारक का नाम बोरो बुदुर लिखा।
कुछ विद्वानों के अनुसार बोरोबुदुर, बोरे-बुदुर का अपभ्रंश है जिसका अर्थ ”बोरे गाँव के निकट बुदुर (बुद्ध) का मंदिर” था। इण्डोनेशिया में अधिकांश मंदिरों के नाम निकटतम गाँवों के नाम पर रखे हुए हैं। जावा भाषा के अनुसार इस स्मारक का नाम ”बुदुरबोरो” होना चाहिए। रैफल्स ने यह भी सुझाव दिया कि बुदुर सम्भवतः आधुनिक जावा भाषा के शब्द बुद्ध से बना है।
अन्य पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार नाम का दूसरा घटक (बुदुर) जावा भाषा के ”भुधारा” शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ”पहाड़”। ध्यान देने की बात है कि भारत में भूधर का अर्थ पहाड़ होता है। अन्य सम्भावित शब्द-व्युत्पतियों के अनुसार बोरोबुदुर ”बुद्ध उहर” अर्थात् बुद्ध-विहार है और यह जावा भाषा के ”बियरा बेदुहुर” शब्द का अपभ्रंश उच्चारण है।
बुद्ध-उहर का अर्थ ”बुद्ध का नगर” भी हो सकता है। जावा भाषा में बेदुहुर शब्द का अर्थ ”एक उच्च स्थान” भी होता है। कसपरिस के अनुसार बोरोबुदूर का मूल नाम भूमि सम्भार भुधार है जो एक संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ ”बोधिसत्व के दस चरणों के संयुक्त गुणों का पहाड़” है।
धार्मिक बौद्ध इमारत का निर्माण और उद्घाटन
चण्डी बोरोबुदुर के निर्माण एवं उद्घाटन के सम्बन्ध में दो शिलालेख मिले हैं। ये दोनों शिलालेख तमांगगंग रीजेंसी में केदु नामक स्थान पर मिले हैं। ई.824 के कायुमवुंगान शिलालेख के अनुसार राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी ने जिनालया (उन लोगों का क्षेत्र जिन्होंने सांसारिक इच्छा और और अपने आत्मज्ञान पर विजय प्राप्त कर ली) नामक धार्मिक भवन का उद्घाटन किया।
ई.824 के ही त्रितेपुसन शिलालेख में लिखा है कि क्री कहुलुन्नण (प्रमोदवर्द्धिनी को कहुलुन्नण भी कहते हैं) ने भूमिसम्भार नामक कमूलान को धन और रख-रखाव सुनिश्चित करने के लिए (कर-रहित) भूमि प्रदान की। कमूलान का अर्थ ”उद्गम स्थल” होता है। यह पूर्वजों की याद में बनाया गया एक धार्मिक स्थल है जो शैलेन्द्र राजंवश से सम्बंधित है।
बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत का रहस्य
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बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर, योग्यकर्ता नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर और सुरकर्ता नगर से 86 किलोमीटर दूर स्थित है। यह दो जुड़वां ज्वालामुखियों, सुंदोरो-सुम्बिंग और मेर्बाबू-मेरापी एवं दो नदियों प्रोगो और एलो के बीच एक ऊंचे क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र को केदू का मैदान भी कहा जाता है। स्थानीय मिथकों एवं दंतकथाओं के अनुसार केदू का मैदान, जावा के पवित्र स्थलों में से एक है। इस क्षेत्र की उच्च कृषि उर्वरता के कारण इसे The Garden of Jawa अर्थात् जावा का बगीचा भी कहा जाता है। 20वीं सदी में मरम्मत कार्य के दौरान यह पाया गया कि इस क्षेत्र के तीनों बौद्ध मंदिर, बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत, एक सीधी रेखा में स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों मंदिर किसी धार्मिक कारण से एक सीध में बनाए गए थे, यह कारण क्या था, इसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे पिरामिड पाए गए हैं जो एक सीधी रेखा में स्थित हैं और यह माना जाता है कि ये पिरामिड धरती के मुनष्यों ने नहीं बनाए थे अपितु दूसरे ग्रहों से धरती पर आए परग्रही इंसानों ने बनाए थे।
झील में तैरता पुष्प कमल था चण्डी बोरोबुदुर
चण्डी बोरोबुदुर अर्थात् बोरोबुदुर मंदिर का निर्माण समुद्र तल से 265 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक झील में खड़ी 49 फुट ऊंची चट्टान पर किया गया था। इस प्राचीन झील का अस्तित्व, 20वीं सदी के आरम्भ में पुरातत्वविदों के बीच गहन चर्चा का विषय था। ई.1931 में हिंदू और बौद्ध वास्तुकला के डच विद्वान डब्ल्यू ओ. जे. नियूवेनकैम्प द्वारा विकसित सिद्धांत के अनुसार ”केदू मैदान” प्राचीन काल में एक झील हुआ करता था और बोरोबुदुर अपने निर्माण के समय इसी झील में कमल पुष्प के समान तैरता था।
चण्डी बोरोबुदुर के निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चावचों और 8वीं तथा 9वीं सदी के दौरान सामान्य रूप से प्रयुक्त शाही पात्रों के अभिलेखों की तुलना से अनुमानित किया जाता है। बोरोबुदुर सम्भवतः ई.800 के लगभग स्थापित हुआ। यह मध्य जावा में शैलेन्द्र राजवंश के शिखर काल ई.760 से 830 से मेल खाता है। इस समय यह श्रीविजय राजवंश के प्रभाव में था। इसके निर्माण का अनुमानित समय 75 वर्ष है और निर्माण कार्य ई.825 के लगभग समरतुंग के कार्यकाल में पूर्ण होना अनुमानित है।
जावा में हिन्दू और बौद्ध शासकों के समय में भ्रम की स्थिति है। शैलेन्द्र राजवंश को बौद्ध धर्म का कट्टर अनुयायी माना जाता है। यद्यपि सोजोमेर्टो में प्राप्त प्रस्तर शिलालेखों के अनुसार वे हिन्दू थे। उनके काल में केदु मैदान के निकट स्थित मैदानों और पहाड़ों में हिन्दू मंदिरों एवं बौद्ध स्मारकों का निर्माण हुआ।
ई.720 में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित वुकिर पहाड़ी पर परमबनन शिव मंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया। कुछ विद्वानों के अनुसार उस काल में बोरोबुदुर सहित इस क्षेत्र के अन्य बौद्ध मंदिरों का निर्माण इसलिए सम्भव था क्योंकि संजय के उत्तराधिकारी राकाई पिकातान ने बौद्ध अनुयाइयों को इस तरह के मंदिरों के निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी थी। ई.778 के कलसन राजपत्र के अनुसार, पिकातान ने बौद्धों के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध समुदाय को कलसन नामक गाँव दिया।
कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि एक हिन्दू राजा द्वारा बौद्ध स्मारकों की स्थापना में सहायता करना, इस बात का प्रमाण है कि जावा में कभी भी बड़ा धार्मिक टकराव नहीं था। यद्यपि इस समय वहाँ दो विरोधी राजवंश राज्य कर रहे थे जिनमें से शैलेन्द्र राजवंश बौद्ध धर्म का अनुयाई था और संजय राजवंश शैव धर्म का।
इन दोनों राजवंशों में आगे चलकर रातु बोको महालय को लेकर ई.856 में युद्ध हुआ। भ्रम की स्थिति परमबनन परिसर के रारा जोंग्गरंग मंदिर के बारे में भी मौजूद है जो संजय राजवंश के बोरोबुदुर के प्रत्युत्तर में शैलेन्द्र राजवंश के विजेता रकाई पिकातान ने स्थापित करवाया। अन्य मतों के अनुसार वहाँ पर शान्तिपूर्वक सह-अस्तित्व का वातावरण था जहाँ ”रारा-जोंग्गरंग” शैलेन्द्र राजवंश की राजकुमारी होकर भी संजय राजवंश में रानी बनकर आई और शिव मंदिर के निर्माण में भागीदार रही।
गुमनामी के अंधेरों में गुम चण्डी बोरोबुदुर
ई.928 से 1006 के बीच मेरापी पहाड़ में शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियों के फूट पड़ने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश (इसे संजय राजवंश भी कहते हैं) की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया। इस कारण बोरोबुदुर का क्षेत्र निर्जन हो गया और यह मंदिर कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख तथा जंगल के बीच छिपा रहा।
चण्डी बोरोबुदुर का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में ई.1365 के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक नगरकरेतागमा में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई। इसमें ‘बुदुर में विहार’ होने का उल्लेख है। मनुष्यों की दृष्टि से ओझल हो जाने के बाद भी यह स्मारक लोक कथाओं में जीवित रहा और इसके साथ कई दंतकथाएं जुड़ गईं।
14वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश का पतन हो गया और जावाई लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। इस कारण चौदहवीं शताब्दी में इस द्वीप पर समस्त निर्माण कार्य बन्द हो गए। अधिकतर लोग मुसलमान बन चुके थे तथा बचे हुए बौद्ध जान बचाकर बाली द्वीप तथा भारत आदि देशों को भाग गए थे। इसलिए बोरोबुदुर की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं रहा। इस बीच जावा द्वीप पर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए और सत्ताओं के परिवर्तन होते रहे।
18वीं सदी के दो प्राचीन ”बाबाद” (जावाई वृत्तांत) में इस स्मारक के साथ जुड़ी हुई असफलताओं की कथा का उल्लेख मिलता है। ”बाबाद तनाह जावी” (अथवा जावा का इतिहास) के अनुसार ई.1709 में माताराम साम्राज्य के राजा ”पकुबुवोनो प्रथम” के प्रति विद्रोह करना ”मास डाना” के लिए घातक सिद्ध हुआ।
इसमें लिखा है कि ”रेडी बोरोबुदुर” पहाड़ी की घेराबंदी की गई। इसमें विद्रोहियों की पराजय हुई तथा राजा ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। ”बाबाद माताराम” (माताराम साम्राज्य का इतिहास) में बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ई.1757 में योग्यकार्ता सल्तनत के युवराज ”मोंचोनागोरो” के दुर्भाग्य से जोड़ा गया है।
इसके अनुसार चण्डी बोरोबुदुर में प्रवेश निषेध होने पर भी वह एक छिद्रित स्तूप के भीतर छिपकर इसके भीतर गया। अपने महल में वापस आने के बाद वह बीमार हो गया और अगले दिन उसका निधन हो गया। सोक्मोनो नामक एक लेखक ने ई.1976 में लौकिक मत का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 15वीं सदी में जावा के लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया तो इस मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।
अंग्रेजों द्वारा चण्डी बोरोबुदुर की खोज
ई.1811-16 की अवधि में जावा द्वीप ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रहा। जावा के ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने जावा के इतिहास में गहरी रुचि ली। उसने जावा द्वीप का दौरा किया तथा द्वीप पर उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं को आधार बनाकर एवं स्थानीय निवासियों से चर्चा करके जावा का इतिहास तैयार किया।
उसके समय में जावा द्वीप पर कई प्राचीन स्मारकों को खोज निकाला गया। ई.1814 में सेमारंग के निरीक्षण दौरे पर, बुमिसेगोरो गाँव के निकट के जंगल में एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। वह स्वयं इसकी खोज करने में असमर्थ था। अतः उसने एच. सी. कॉर्नेलियस नामक एक अभियंता को अन्वेषण का काम सौंपा।
कॉर्नेलियस तथा उसके 200 साथियों ने यहाँ फैले जंगल के पेड़ों को काट डाला तथा दूर-दूर तक फैली घास को जलाकर मैदान की तरह साफ कर दिया। बोरोबुदुर स्मारक ज्वालामुखीय राख के नीचे दबा हुआ था, उसे भी खोदकर बाहर निकाला गया। स्मारक के ढहने के खतरे को देखते हुए उन्होंने खुदाई का काम बहुत अधिक नहीं किया। इस प्रकार रैफल्स को इस स्मारक के पुनरुद्धार का श्रेय प्राप्त है।
डच ईस्ट-इण्डीज सरकार द्वारा संरक्षण
1816 ई. में ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स को जावा छोड़ देना पड़ा और जावा द्वीप पर नीदरलैण्ड की ”डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी” का अधिकार हो गया। इसके बाद जावा को ”ईस्टइण्डीज कॉलॉनी” कहा जाने लगा। केदु के डच प्रशासक हार्टमान ने कॉर्नेलियस के कार्य को आगे बढ़ाया और 1835 ई. में पूरे परिसर को भूमि से बाहर निकाल लिया।
बोरोबुदुर के पुनरुत्थान में उसने व्यक्तिगत दिलचस्पी ली। उसने इस बारे में कोई लेखन कार्य नहीं किया किंतु दंतकथाओं को आधार बनाकर स्मारक स्थल की खुदाई को जारी रखा तथा मुख्य स्तूप में बुद्ध की बड़ी मूर्ति को खोज निकाला। 1842 ई. में हार्टमान ने मुख्य गुम्बद का अन्वेषण किया, हालांकि उसके द्वारा खोजा गया कार्य अज्ञात है।
जावा की डच ईस्ट-इण्डीज सरकार ने डच अभियंता एफ. सी. विल्सन तथा जे. एफ. जी. ब्रुमुण्ड को स्मारक के अध्ययन का कार्य सौंपा। विल्सन ने इस स्मारक की प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के सैकड़ों रेखाचित्र बनाए तथा ब्रुमुण्ड ने राइटअप तैयार किए। ब्रुमुण्ड का कार्य 1859 ई. में पूरा हुआ।
डच सरकार विल्सन के रेखाचित्रों को साथ जोड़कर ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित लेख प्रकाशित करना चाहती थी लेकिन ब्रुमुण्ड ने सहयोग नहीं किया। सरकार ने बाद में एक अन्य शोधार्थी सी. लीमान्स को यह कार्य सौंपा। उसने विल्सन के स्रोतों और ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित निबन्ध लिपिबद्ध किए।
ई.1873 में ”बोरोबुदुर का निबंधात्मक अध्ययन” अंग्रेजी भाषा में में प्रकाशित हुआ और उसके एक वर्ष बाद इसका फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया गया। स्मारक का प्रथम चित्र 1873 ई. में डच-फ्लेमिश तक्षणकार इसिडोर वैन किंस्बेर्गन ने लिया।
धीरे-धीरे इस स्थान की चर्चा होने लगी और यह विश्व भर के शोधार्थियों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। ई.1882 में सांस्कृतिक कलाकृतियों के मुख्य निरीक्षक ने स्मारक की कमजोर स्थिति के कारण प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) को किसी अन्य स्थान पर संग्रहालय में स्थानान्तरित करने का आग्रह किया।
इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पुरातत्वविद् ग्रोयन वेल्ड्ट को स्थान का अन्वेषण करने और परिसर की वास्तविक स्थिति ज्ञात करने के लिए नियुक्त किया। उसने अपने प्रतिवेदन में कहा कि यह डर अनुचित है इसलिए इसे इसी स्थिति में बनाए रखा जाए।
चण्डी बोरोबुदुरकी शिल्प सामग्री
जब इस स्मारक की प्रसिद्धि होने लगी तो देशी-विदेशी लोगों ने बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री को स्मृतिचिह्न के रूप में चुराना आरम्भ कर दिया और इसकी मूर्तियों तथा कलात्मक पत्थरों को लूट लिया। इनमें से कुछ भाग तो औपनिवेशिक सरकार की सहमति से भी लूटे गए। 1886 ई. में श्यामदेश के राजा चुलालोंगकॉर्न ने जावा की यात्रा की और बोरोबुदुर से कुछ मूर्तियाँ अपने देश ले जाने का आग्रह किया।
उसे मूर्तियों के आठ छकड़े भरकर ले जाने की अनुमति मिल गई। इस सामग्री में विभिन्न स्तंभों से उतारे गए तीस मूर्ति-शिलापट्ट, पांच बुद्ध प्रतिमाएं, दो सिंह मूर्तियाँ, एक व्यालमुख प्रणाल, कुछ सीढ़ियों और दरवाजों के कला अनुकल्प और एक द्वारपाल प्रतिमा सम्मिलित थीं। इनमें से कुछ प्रमुख कलाकृतियाँ, जैसे शेर, द्वारपाल, काल, मकर और विशाल जलस्थल (नाले) आदि, बैंकॉक राष्ट्रीय संग्रहालय के जावा कला कक्ष में प्रदर्शित की गई हैं।
चण्डी बोरोबुदुरमंदिर का पुनर्स्थापन
1885 ई. में योग्यकार्ता की पुरातत्व सोसाइटी के अध्यक्ष यजेर्मन ने बोरोबुदुर स्मारक में एक छुपे हुए पैर को खोजा। प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के छुपे हुए पैर व्यक्त करने वाले चित्र 1890-91 ई. में बने। जावा की डच ईस्टइण्डीज सरकार ने इस खोज के बाद बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक के संरक्षण देने की दिशा में काम आगे बढ़ाया।
1890 ई. में सरकार ने इसके सरंक्षण हेतु योजना तैयार करने के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बैठाया। इसमें डच कलाविद् एवं इतिहासकार ब्रांडेस, डच सैन्य अभियंता थियोडोर वैन एर्प और डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभियंता वैन डी कमर को सम्मिलित किया गया।
इस आयोग ने 1902 ई. में ईस्टइण्डीज सरकार के सामने तीन प्रस्तावों वाली योजना रखी। पहले प्रस्ताव में स्मारक के कोनों को पुनः स्थापित करने, अव्यवस्थित पत्थरों को हटाने, वेदिकाओं को सुदृढ़ करने और झरोखे, महराब (तोरण), स्तूप तथा मुख्य गुम्बद को पुनर्स्थापित करने के सुझाव सम्मिलित थे ताकि तत्काल होने वाली संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सके। दूसरे प्रस्ताव में प्रकोष्ठ को हटाने, उचित रखरखाव करने, तलों (छतों) और स्तूपों की मरम्मत करके जल-निकासी में सुधार करने के सुझाव सम्मिलित थे। उस समय इस कार्य की अनुमानित लागत लगभग 48,800 डच गिल्डर थी।
1907 से 1911 ई. के मध्य थियोडोर वैन एर्प के सुझावों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया। इस कार्य के पहले चरण में प्रथम सात माह तक स्मारक के आसपास खुदाई की गई ताकि बुद्ध की मूर्तियों के सिर और स्तम्भों के पत्थर खोजे जा सकें। इसके बाद वैन एर्प ने तीनों ऊपरी वृत्ताकार चबूतरों और स्तूपों को ध्वस्त करके उनका पुनः निर्माण करवाया।
इसी बीच, वैन एर्प ने स्मारक में सुधार हेतु अन्य विषयों की खोज की जिनके आधार पर 34,600 गिल्डर की लागत के नए कार्य स्वीकृत किए गए। वैन एर्प ने मुख्य स्तूप के शिखर पर छत्र (तीन स्तरीय छतरी) का पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया किंतु बाद में उसने छत्र को पुनः हटा दिया क्योंकि शिखर के निर्माण के लिए मूल पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे तथा बोरोबुदुर के शिखर की मूल बनावट ज्ञात नहीं थी। हटाया गया छत्र अब बोरोबुदुर से कुछ सौ मीटर उत्तर में स्थित कर्म विभांगगा संग्रहालय में रखा है।
पुनर्स्थापन के कार्य को सामान्यतः मूर्तियों की सफाई पर केन्द्रित रखा गया तथा वैन एर्प ने जलनिकासी की समस्या का समाधान नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पन्द्रह वर्षो में स्मारक के गलियारों की दीवारें झुकने लगी और प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) में दरारें दिखने लगीं।
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वैन एर्प ने मरम्मत कार्य में कंकरीट का उपयोग किया था जिससे क्षारीय लवण तथा कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का घोल बाहर आने लगा और उसका बहाव शेष हिस्सों पर भी होने लगा। 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और उसके समाप्त होते ही 1945 ई. में इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति आरम्भ हो गई जो 1949 ई. तक चली। इन कारणों से बोरोबुदुर का पुनर्स्थापन कार्य बीच में ही रुक गया।
इस दौरान चण्डी बोरोबुदुर स्मारक को मौसम की प्रतिकूलता तथा जल-निकासी की समस्या का सामना करना पड़ा जिसके कारण पत्थरों की मूल बनावट खिसकने लगी और दीवारें धरती में धँसने लगीं। 1950 के दशक तक बोरोबुदुर ढहने की कगार पर पहुँच गया। 1965 ई. में इंडोनेशिया ने यूनेस्को से बोरोबुदुर सहित अन्य स्मारकों का अपक्षय रोकने के लिए सहायता मांगी। 1968 ई. में इंडोनेशिया के पुरातत्व सेवा के प्रमुख प्रोफेसर सोेक्मोनो ने ”बोरोबुदुर सरंक्षण अभियान” आरम्भ किया और बड़े पैमाने पर मरम्मत परियोजना आरम्भ की।
1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में इंडोनेशिया सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से बोरोबुदुर स्मारक को बचाने के लिए बड़ा नवीनीकरण कराने का अनुरोध किया। इण्डोनेशिया सरकार के इस अनुरोध पर ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, साइप्रस, फ्रांस तथा जर्मनी ने इस कार्य के लिए धन उपलब्ध कराया।
इस धन से इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने 1975-82 ई. तक बड़ी नवीनीकरण परियोजना के अंतर्गत चण्डी बोरोबुदुर स्मारक का जीर्णोद्धार करवाया। नवीनीकरण के दौरान दस लाख से भी अधिक पत्थर हटाकर उन्हें एक तरफ विशाल आरे के आकार में जमाकर रखा गया जिससे उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सके तथा सूचीबद्ध रूप से सफाई और परिरक्षण के काम किए जा सकें।
पत्थरों को सूक्ष्मजीवियों से मुक्त करने के लिए कीटनाशकों से उपचारित किया गया। स्मारक की नींव को सुदृढ़ बनाया गया तथा समस्त 1460 स्तम्भों की सफाई की गई। पुनर्स्थापन में पाँच वर्गाकार चबूतरों को हटाकर वापस लगाने तथा जल-निकासी प्रणाली में सुधार लाने का कार्य भी सम्मिलित था। इस विशाल परियोजना में लगभग 600 लोगों ने कार्य किया और कुल 69,01,243 अमीरीकी डॉलर व्यय हुए। नवीनीकरण का कार्य पूर्ण होने के बाद यूनेस्को ने 1991 ई. में बोरोबुदुर को विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध किया। वर्तमान में बोरोबुदुर स्मारक तीर्थ-यात्रियों एवं विश्व भर के पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।
धार्मिक समारोह
यूनेस्को द्वारा विशाल नवीनीकरण के बाद, बोरोबुदुर को पुनः तीर्थयात्रा और पूजास्थल के रूप में काम में लिया जाने लगा। वर्ष में एक बार, मई या जून माह में पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्म के लोग गौतम बुद्ध के जन्म, निधन और शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के उपलक्ष्य में वैशाख उत्सव मनाते हैं। वैशाख का यह दिन इंडोनेशिया में राष्ट्रीय छुट्टी के रूप में मनाया जाता है तथा तीन बौद्ध मंदिरों मेदुत से पावोन होते हुए बोरोबुदुर तक समारोह मनाया जाता है।
बम विस्फोटों से उड़ाने का षड़यंत्र
21 जनवरी 1985 को चण्डी बोरोबुदुर स्मारक में अचानक हुए नौ बम विस्फोटों से स्मारक के नौ स्तूप बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। यह षड़यंत्र कुछ मुस्लिम उग्रवादियों ने रचा था। एक मुस्लिम धर्मोपदेशक हुसैन अली अल हब्स्याई को पकड़ लिया गया तथा लगभग 6 साल तक चले मुकदमे के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बम ले जाने वाले उग्रवादी समूह के दो अन्य सदस्यों को 20 वर्ष के कारावास की एवं एक अन्य व्यक्ति को 13 वर्ष के कारावास की सजा मिली।
पर्यटकों की संख्या में वृद्धि
चण्डी बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक इंडोनेशिया में विश्व भर के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। 1974 ई. में स्मारक को देखने के लिए 2 लाख 60 हजार पर्यटक आए जिनमें से 36 हजार विदेशी पर्यटक थे। देश में अर्थव्यवस्था संकट से पूर्व 1990 के दशक के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 25 लाख प्रति वर्ष तक पहुँच गई जिनमें से 80 प्रतिशत घरेलू पर्यटक थे।
भूकम्प से अप्रभावित
27 मई 2006 को मध्य जावा के दक्षिणी तट पर रिक्टर पैमाने पर 6.2 तीव्रता का भूकम्प आया। इस घटना से योग्यकर्ता नगर के निकट के क्षेत्रों में गंभीर क्षति के साथ बहुत से लोग हताहत हुए किंतु चण्डी बोरोबुदुर इससे अप्रभावित रहा।
मेरापी पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट
वर्ष 2010 के अक्टूबर और नवम्बर माह में बोरोबुदुर मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित मेरापी पर्वत में भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए जिनसे बोरोबुदुर स्मारक को भारी क्षति पहुंची तथा ज्वालामुखीय राख मंदिर पर आकर गिरी। 3 से 5 नवम्बर तक मंदिर की मूर्तियों पर राख की 2.5 सेंटीमीटर मोटी परत चढ़ गई। आस-पास के पेड़-पौधों को भी हानि पहुंची।
5 से 9 नवम्बर तक मंदिर परिसर को राख की सफाई करने के लिए बन्द रखा गया। यूनेस्को ने मेरापी पर्वत से ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बोरोबुदुर के पुनर्स्थापन की लागत के रूप में 30 लाख अमरीकी डॉलर की सहायता प्रदान की। मंदिर की जल निकासी प्रणाली में ज्वालामुखीय राख भर गई थी जिसे हटाने के लिऐ फिर से 55 हजार से अधिक प्रस्तर शिलाएं हटाई गईं। इस पूरे कार्य में लगभग एक साल लग गया।
जर्मनी द्वारा संरक्षण कार्य
जनवरी 2012 में जर्मनी की सरकार के दो प्रस्तर सरंक्षण विशेषज्ञों ने 10 दिन मंदिर में रहकर मन्दिर की स्थिति का अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर जून 2012 में जर्मनी ने द्वितीय चरण के पुनर्स्थापन कार्यों के लिए यूनेस्को को 1,30,000 अमीरी डॉलर की सहायता देने का प्रस्ताव किया।
अक्टूबर 2012 में पत्थर सरंक्षण, सूक्ष्मजैविकी, सरंचना अभियांत्रिकी और रासायनिक अभियान्त्रिकी के छः विशेषज्ञों ने एक सप्ताह तक बोरोबुदुर में रहकर इसका पुनः निरीक्षण किया। इसके बाद यहाँ एक बार फिर से संरक्षण कार्य करवाए गए। जून 2012 में बोरोबुदुर को विश्व के सबसे बड़े पुरातत्व स्थल के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। अगस्त 2014 में इस स्मारक की सीढ़ियों पर लकड़ी का आवरण लगाया गया ताकि मूल सीढ़ियों को जूतों से घिसने से बचाया जा सके।
केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट
13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित पूर्वी जावा के केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ जो योग्यकर्ता तक सुनाई दिया। इससे निकली राख से प्रभावित होने के कारण बोरोबुदुर, परमबनन और रातु बोको सहित योग्यकर्ता और मध्य जावा के बड़े पर्यटन स्थल कुछ दिनों के लिए बन्द कर दिये गये। इस दौरान बोरोबुदुर की सरंचना को ज्वालामुखीय राख से बचाने के लिए प्रतिष्ठित स्तूपों और मूर्तियों को ढक दिया गया।
आईसिस के निशाने परचण्डी बोरोबुदुर
अगस्त 2014 में आईएसआईएस (आईसिस) की इंडोनेशियाई शाखा ने सोशियल मीडिया पर धमकी दी कि वह बोरोबुदुर सहित इंडोनेशिया की अन्य मूर्ति परियोजनाओं को शीघ्र ही ध्वस्त करेगा। इसके बाद इंडोनेशियाई पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा बोरोबुदुर मंदिर की सुरक्षा बढ़ाई गई। सरकार ने मंदिर परिसर में सीसीटीवी लगाए और रात में सुरक्षा पहरा बढ़ा दिया।
जावाई स्थापत्य स्मारक घोषित
जब जावा में रह रहे भारतीय बौद्धांे और हिन्दुओं को इस स्मारक के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बोरोबुदुर की पहाड़ी पर बड़ी संख्या में निर्माण कार्य आरम्भ कर दिये। इण्डोनेशिया की मुस्लिम सरकार को इस स्थान से कोई भी हिन्दू अथवा बौद्ध पुण्य स्थान संरचना नहीं मिली। इस कारण सरकार ने इसे हिन्दू अथवा बौद्ध स्थल न मानकर स्थानीय जावा संस्कृति का स्मारक घोषित किया है।
बौद्ध चैत्य एवं स्मारक का प्रारूप
बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप की तरह निर्मित किया गया है ऊपर से देखने पर यह विशाल तांत्रिक बौद्ध मंडल जैसा दिखाई देता है। यह बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और मन के स्वभाव को निरूपित करता है। इसका मूल आधार वर्गाकार है जिसकी प्रत्येक भुजा 118 मीटर है।
इसमें नौ मंजिलें हैं। निचली छः मंजिलें वर्गाकार तथा ऊपरी तीन मंजिलें वृत्ताकार हैं। ऊपरी मंजिल के मध्य में एक बड़े स्तूप के चारों ओर घण्टी के आकार के 72 छोटे स्तूप हैं जो सजावटी छिद्रों से युक्त है। बुद्ध की मूर्तियाँ इन छिद्रयुक्त सहस्रपात्रों के अन्दर स्थापित हैं।
बोरोबुदुर का स्वरूप पिरामिड से प्रेरित है। पश्चिम जावा के प्रागैतिहासिक ऑस्ट्रोनेशियाई महापाषाण संस्कृति के स्थल पुंडेन बेरुंडक, पंग्गुयांगां, किसोलोक और गुनुंग पडंग नामक स्थानों पर विभिन्न स्थल दुर्ग और पत्थरों से निर्मित सोपान-पिरामिड संरचनाएं पाई गई हैं।
पत्थर से बने पिरामिडों के निर्माण के पीछे स्थानीय विश्वास है कि पर्वतों और ऊँचे स्थानों पर पैतृक आत्माओं अथवा ह्यांग का निवास होता है। बोरोबुदुर स्मारक की आधारभूत बनावट को पुंडेन बेरुंडक पिरमिड से प्रेरित माना जाता है तथा महायान बौद्ध विचारों और प्रतीकों के साथ निगमित पाषाण परंपरा का विस्तार माना जाता है।
चण्डी बोरोबुदुरका आध्यात्मिक महत्व
स्मारक के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से तीन लोकों को निरूपित करते हैं। ये तीन लोक क्रमशः कामधातु (इच्छाओं की दुनिया), रूपधातु (रूपों की दुनिया) और अरूपधातु (रूपरहित दुनिया) हैं। साधारण मनुष्य का जीवन इनमें से निम्नतर जीवन स्तर, अर्थात् इच्छाओं की दुनिया में रहता है।
जो लोग अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे प्रथम स्तर से उपर उठकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से रूपों को देख तो सकते हैं लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती। अंत में मनुष्य उन्नति करता हुआ पूर्ण बुद्धत्व को प्राप्त करता है। यह मानव का मूल एवं विशुद्ध स्तर होता है। इसमें वह रूपरहित निर्वाण को प्राप्त होता है।
संसार के जीवन चक्र से ऊपर हो जाता है, जहाँ प्रबुद्ध आत्मा शून्य के समान, सांसारिक रूप के साथ संलग्न नहीं होती, उसे पूर्ण शून्य अथवा अपने आप अस्तित्वहीन रखना आता है। बोरोबुदुर स्मारक में कामधातु को आधार से निरूपित किया गया है, रूपधातु को पाँच वर्गाकार मंजिलों (सरंचना) से और अरूपधातु को तीन वृत्ताकार मंजिलों तथा विशाल शिखर स्तूप से निरूपित किया गया है।
इन तीन स्तरों के स्थापत्य गुणों में लाक्षणिक अन्तर हैं। उदाहरण के लिए रूपधातु में मिलने वाले वर्ग और विस्तृत अलंकरण, अरूपधातु के सरल वृत्ताकार मंजिल में लुप्त हो जाते हैं, जिससे रूपों की दुनिया को निरूपित किया जाता है। जहाँ लोग नाम और रूप से जुड़े रहते हैं और रूपहीन दुनिया में परिवर्तित हो जाते हैं।
बोरोबुदुर में सामूहिक पूजा इस तरह की जाती है मानो किसी तीर्थ में भ्रमण कर रहे हों। मंदिर की सीढ़ियां और गलियारा तीर्थ यात्रियों को शिखर तक जाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। प्रत्येक मंजिल आत्मज्ञान के एक स्तर को निरूपित करती है। तीर्थ यात्रियों का मार्गदर्शन करने वाला पथ बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान को प्रतीकात्मक रूप में परिकल्पित करता है।
1885 ई. में इस स्मारक के आधार में छिपी हुई एक संरचना आकस्मिक रूप से खोजी गई। छुपे हुये पैर में, प्रतिमा उत्कीर्णित शिलापट्ट ;त्मसपमद्धि भी शामिल हैं, जिनमें से 160 वास्तविक कामधातु के विवरण की व्याख्या करते हैं। शिलालेखित चौखटों पर भी शिल्पकारों द्वारा नक्काशियों के बारे में कुछ आवश्यक अनुदेश लिखे हुए थे।
वास्तविक आधार के ऊपर झालरदार आधार बना हुआ है जिसका उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। माना जाता है कि यह झालर पहाड़ी में विनाशकारी आपदा आने की स्थिति में वास्तविक आधार को आच्छादित करने के लिए है। अन्य मतों के अनुसार झालरदार आधार बनाने का कारण, स्मारक के मूल आधार की बनावट के उन दोषों को छिपाना है, जो प्राचीन भारतीय वास्तु शास्त्र का उल्लंघन करते हैं।
पांच सौ चार बुद्ध प्रतिमाएं
चण्डी बोरोबुदुर मंदिर में भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। पाँच वर्गाकार चबूतरों (रूपधातु स्तर) के साथ-साथ ऊपरी चबूतरे (अरूपधातु स्तर) पर पद्मासन मूर्तियाँ स्थित हैं। रूपधातु स्तर पर देवली में बुद्ध की प्रतिमाएं स्तंभ वेष्टन (वेदिका) के बाहर पंक्तियों में क्रमबद्ध हैं। ऊपरी स्तर पर मूर्तियों की संख्या लगातार कम होती जाती है।
प्रथम वेदिका में 104 देवली, दूसरी में 88, तीसरी में 72, चौथी में 72 और पाँचवी में 64 देवली हैं। कुल मिलाकर रूपधातु स्तर तक 432 बुद्ध मूर्तियाँ हैं। अरूपधातु स्तर (तीन वृत्ताकार चबूतरों) पर बुद्ध की मूर्तियाँ स्तूपों के अन्दर स्थित हैं।
प्रथम वृत्ताकार चबूतरे पर 32 स्तूप, दूसरे पर 24 और तीसरे पर 16 स्तूप हैं जिनका योग 72 स्तूप होता है। मूल 504 बुद्ध मूर्तियों में से 300 से अधिक क्षतिग्रत हैं जिनमें से अधिकतर मूर्तियों के सिर गायब हैं। कुल 43 मूर्तियाँ गायब हैं। स्मारक की खोज होने से पहले, इन मूर्तियों के सिरों को मूर्ति-तस्करों ने चुराया और पश्चिमी देशों के संग्राहलयों को बेच दिया।
बुद्ध मूर्तियों के इन सिरों में से कुछ एम्स्टर्डम के ट्रोपेन म्यूजियम और कुछ लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय सहित विभिन्न संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। बुद्ध की समस्त मूर्तियाँ दूर से देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं किंतु इनकी मुद्रा अथवा हाथों की स्थिति में भिन्नता है।
मुद्रा के पाँच समूह हैं- उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और शिरोबिंदु। ये सभी मुद्राएं महायान के अनुसार पाँच क्रममुक्त दिक्सूचक को निरुपित करती हैं। प्रथम चार वेदिकाओं में पहली चार मुद्राएं (उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में प्रत्येक मूर्ति कम्पास की एक दिशा को निरुपित करती है।
पाँचवी वेदिका में बुद्ध की मूर्ति और ऊपरी चबूतरे के 72 स्तूपों में स्थित मूर्तियाँ समान मुद्रा (शिरोबिंदु) में हैं। प्रत्येक मुद्रा, पाँच ध्यानी बुद्ध में से किसी एक को निरूपित करती है जिनमें प्रत्येक का अलग आध्यात्मिक कारण है।
जकार्ता के मंदिर मुख्यतः भगवान शिव को समर्पित हैं जिनसे ज्ञात होता है कि आज से कई हजार साल पहले से लेकर सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी तक जकार्ता में शैव मत को मानने वाले हिन्दू बड़ी संख्या में निवास करते थे।
जकार्ता शहर जावा द्वीप में स्थित है। जावा द्वीप से उन आदिम मानवों के अस्थि अवशेष भी मिले हैं जो होमो-सेपियन जाति के अस्तित्व में आने से पहले ही इस द्वीप में मानव बस्तियों के होने के प्रमाण देते हैं।
जकार्ता शहर का वास्तविक नाम जयकार्ता है। यह पश्चिमी जावा में स्थित है तथा इंडोनेशिया की राजधानी है। जकर्ता में 17 प्रमुख हिन्दू मंदिर पाए गए हैं जिनमें नौवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित विशाल शिव मंदिर, 926 ई. में बना तीर्थ एम्पुल मंदिर, 11वीं सदी में बना गोवा गजह (शिव मंदिर), 14वीं शताब्दी में निर्मित बेसैख का माता मंदिर और 1633 ई. में निर्मित पुरा उलुंदनु ब्रतन (शिव मंदिर) प्रमुख हैं।
जकार्ता के मंदिर इस द्वीप के प्राचीन राजनीतिक इतिहास एवं हिन्दू संस्कृति के प्रसार पर भी प्रकाश डालते हैं।
योग्यकार्ता के मंदिर
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योग्यकार्ता शहर मध्य-जावा द्वीप में स्थित है। फरवरी 2010 में योग्यकर्ता में स्थित एक निजी मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में दो मंदिरों के अवशेष मिले जब विश्वविद्यालय ने वहाँ बनी एक मस्जिद के पास पुस्तकालय बनाने के लिए खुदाई आरम्भ की। ये मंदिर लगभग 1100 साल पुराने हैं तथा विशाल और अद्वितीय हैं। ऐसे मंदिर इंडोनेशिया के इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए। इन मंदिरों में भगवान् शिव के शिवलिंगों के साथ-साथ भगवान् गणेश की प्रतिमाएं मिली हैं। एक अन्य स्थान पर हुई खुदाई में पुरातत्व विभाग को भगवान् शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा मिली। नंदी की यह प्रतिमा, सामान्य नंदी प्रतिमाओं से काफी अलग है और दूसरी मूर्तियों की तरह चौड़ी भी नहीं है। इन मंदिरों की प्राप्ति से स्पष्ट है कि इस द्वीप पर भगवान शिव के और भी बहुत से मंदिर धरती के भीतर दबे पड़े होंगे जिन्हें खोज कर निकाले जाने की आवश्यकता है। इनमें से बहुत से मंदिर तो भूकम्प एवं ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हुए होंगे तथा बहुत से मंदिर को मुसलमान आक्रांताओं ने नष्ट किया होगा।
आवश्यकता इस बात की है जकार्ता के मंदिर ढूंढ कर निकाले जाएं। पर्याप्त संभव है कि उन मंदिरों से कुछ शिलालेख भी प्राप्त हों जो इस द्वीप के प्राचीन इतिहास पर और अधिक प्रकाश डाल सकें।
सिंघसरी शिव मंदिर
13वीं शताब्दी में बना सिंघसरी शिव मंदिर पूर्वी-जावा के सिंघसरी नामक स्थान पर बना हुआ है। यह विशाल शिव मंदिर अपनी भव्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जिसके पूजन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। भगवान शिव से सम्बन्धित समस्त पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते हैं।
बाली द्वीप के मंदिर हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। इनमें भगवान विष्णु, शिव, माता दुर्गा, सरस्वती तथा गणेश प्रमुख हैं। बाली में मंदिरों को पुरा कहा जाता है जो कि संस्कृत भाषा के ‘पुर’ शब्द से बना हुआ है जिसका आशय नगर एवं दुर्ग दोनों से लिया जाता है।बाली भाषा में ”पुरा” का अर्थ मंदिर होता है।
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अक्टूबर 2012 में इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने बाली द्वीप का सर्वेक्षण किया तथा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के एक विशाल हिन्दू मंदिर को खोज निकालने का दावा किया। पुरातत्वविदों ने देश को सूचित किया कि पूर्वी देन्पासार में नदी बेसिन में हो रही खुदाई में धरती से तीन फुट नीचे उन्हें एक विशालकाय पत्थर मिला तथा आगे हुई खुदाई में पाया गया कि यह वास्तव में एक विशाल मंदिर की आधारशिला है। ऐसे पत्थर बड़ी संख्या में मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि चौदहवीं सदी में इस नदी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ। बाली के हिंदू मंदिर यद्यपि सांस्कृतिक रूप से दक्षिण भारत के हिन्दू मंदिरों की ही परम्परा का प्रसार हैं तथापि बाली के हिन्दू मंदिरों की मूल संरचना एवं दक्षिण भारत के हिंदू मंदिरों की मूल संरचना एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। दक्षिण भारत के हिन्दू मंदिरों में गोपुरम एक अनिवार्य संरचना है किंतु बाली के मंदिरों में इस प्रकार की संरचना नहीं पाई जाती है। भारतीय मंदिरों को भीतर से बहुत अलंकृत किया जाता है जबकि बाली के मंदिरों को जटिल रूप से सजाए गए छत वाले द्वार और विभाजित द्वारों की शृंखला से युक्त किया जाता है।
इण्डोनेशिया में सामान्यतः तीन प्रकार के हिंदू मंदिर देखने को मिलते हैं-
कैंडी: इन्हें जावा के प्राचीन हिंदू मंदिरों के रूप में देखा जा सकता है।
पुरा: इन्हें बाली के हिन्दू मंदिरों के रूप में देखा जा सकता है।र
कुइल: इन्हें बाली एवं जावा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी देखा जा सकता है। बोलचाला की भाषा में इन्हें काला कहा जाता है।
पुरा तमन अयुन (सरस्वती मंदिर)
तमन अयुन मंदिर बाली के प्रमुख मंदिरों में से है। यह बाली में दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मेंगवी राजवंश का पारिवारिक मंदिर था जो बाली पर शासन करने वाले नौ राज्यों में से एक था। तमन अयुन मंदिर का निर्माण ईस्वी 1632 में हुआ था। देवी सरस्वती को समर्पित यह मंदिर बाली के उबुद नगर में है।
देवी सरस्वती को हिन्दू धर्म में विद्या, ज्ञान और संगीत की देवी माना जाता हैं, इसलिए यहाँ पर भी देवी सरस्वती की पूजा ज्ञान और विद्या की देवी के रूप में ही की जाती है। यहाँ पर एक सुन्दर कुंड भी बना है, जो इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यहाँ प्रतिदिन संगीत के कार्यक्रम होते हैं। संस्कृत में अयन का अर्थ होता है- घर। बाली द्वीप का अयुन शब्द संस्कृत के अयन शब्द से ही बना है।
पुरा बेसकिह मंदिर
बाली द्वीप के माउंट अगुंग में स्थित यह मंदिर प्रकृति की गोद में बसा इंडोनेशिया का सबसे सुन्दर मंदिर है। यह बाली का सबसे बड़ा और पवित्र मंदिर भी है, जो बाली के महत्वपूर्ण मंदिरों की शृंखला में सम्मिलित किया गया है। 1995 ई. में इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।
गिन्यार क्षेत्र के मंदिर
बाली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित गिन्यार में 1986 ई. में हुई खुदाई में वासा मदिर सामने आया जो 11 मीटर चौड़ा है। 2010 ई. तक इंडोनेशिया के पुरातत्वविद, गिन्यार में धरती के नीचे दबे हुए 16 और मंदिरों को ढूँढ़ने में सफल हो गए।
तनाहलोट मंदिर (विष्णु मंदिर)
बाली द्वीप पर स्थित विशाल समुद्री चट्टान पर भगवान विष्णु को समर्पित तनाहलोट मंदिर 15वीं में निर्मित हुआ। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है तथा इण्डोनेशिया के मुख्य आकर्षणों में से एक है। यह मंदिर बाली द्वीप के हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है।
जब समुद्र में ज्वार आता है तो मंदिर में जाने का मार्ग बंद हो जाता है तथा भाटा आने पर यह मार्ग खुल जाता है जिससे मंदिर तक जा सकते हैं। पर्यटकों को मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे बाहर की रेलिंग से भीतर का दृश्य देख सकते हैं।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...