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उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं (16)

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उबुद-वानर-वन - www.bharatkaitihas.com
उबुद-वानर-वन

बाली द्वीप के पडंग्टेगल गांव में स्थित उबुद-वानर-वन लगभग 12 हैक्टेयर क्षेत्र में स्थित है जिसमें लाल मुंह, अपेक्षाकृत छोटी काया एवं सफेद रंग की बड़ी मूंछो वाले लगभग 700 बंदर निवास करते हैं। यह संसार के प्राचीनतम वनों में से एक है तथा इस छोटे से वन में वृक्षों की 186 प्रजातियां चिह्ति की गई हैं। उबुद-वानर-वन में तीन प्रमुख मंदिर स्थित हैं-

(1.) पुरा दालेम अगुंग पडंग्टेगल : यह मंदिर मृत्यु के महान देवता अर्थात् शिव को समर्पित है। (बाली के हिन्दू भगवान शिव को मृत्यु का महान देवता मानते हैं।)

(2.) पुरा बेजी : यह मंदिर पाप नाशिनी देवी गंगा को समर्पित है।

(3.) पुरा प्रजापति : यह मंदिर जन्म देने वाले देवता ब्रह्मा को समर्पित है।

ये मंदिर लगभग 1000 साल पुराने हैं। स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र में देवी-देवताओं की बहुत सी मूर्तियां पाई जाएं किंतु इन मंदिरों के निर्माण से पहले भी इस क्षेत्र में सैंकड़ों मूर्तियां बनाई गईं जो आज भी देखी जा सकती हैं। उबुद-वानर-वन परिसर में विभिन्न प्रकार के मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जलचरों की अति प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाएं उपलब्ध हैं।

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अनेक मनुष्याकार प्रतिमाओं के चेहरे, मनुष्यों की बजाय, बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों जैसे दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरों वाले मनुष्य निवास करते थे। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र तथा सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां हैं। इनके चेहरे फूले हुए हैं जिन पर बनी गोल एवं मोटी नाक दूर से ध्यान आकर्षित करती है। होंठों के भीतर अथवा बाहर निकले हुए बड़े-बड़े दांत इन्हें आधुनिक मनुष्यों से अलग प्रदर्शित करते हैं। इनकी भुजाएं मांसल, जंघाएं पुष्ट तथा चेहरों पर विचित्र भाव दिखाई देते हैं। बहुत सी नर-नारी प्रतिमाओं की आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। यहाँ यह समझा जाना आवश्यक है कि भारत में भी श्रीराम कथा के काल में दक्षिण भारत के वनों में बहुत सी ऐसी मानव बस्तियां थीं जिनके चेहरे वानरों, रीछों एवं भालुओं से मिलते थे। लम्बे दांतों वाले मानवों की बस्तियां भी तब अस्तित्व में रहे होने का अनुमान है जिन्हें राक्षस कहा जाता है। पर्याप्त संभव है कि उबुद वानर वन परिसर की विचित्र प्रतिमाएं इसी काल के मानवों से सम्बन्धित हों।

उबुद-वानर-वन में स्थित प्रतिमाओं की बनावट, उनका अंग वैशिष्ट्य तथा प्रतिमाओं की वर्तमान अवस्था को देखकर कहा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण किसी एक सभ्यता द्वारा नहीं किया जाकर, कम से कम दो सभ्यताओं द्वारा किया गया है। इन प्रतिमाओं का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

(अ.) सभ्यताओं के आधार पर वर्गीकरण

1. प्राचीन सभ्यता की प्रतिमाएं

इनका निर्माण आधुनिक ”होमो सेपियन-सेपियन” प्रजाति के ”क्रोमैग्नन मानव” के समय में ही हुआ है किंतु उस युग में इन द्वीपों पर निवास करने वाला मानव आज के मानव जैसा चेहरा विकसित नहीं कर पाया था क्योंकि इन प्रतिमाओं के चेहरे मानवों की बजाय बंदर, चिम्पैंजी तथा ओरंगुटान से अधिक मिलते हैं। पर्याप्त संभव है कि ये प्रतिमाएं उन आदि मानवों को देखकर किन्हीं परग्रही जीवों ने बनाई हों! गोल आंखों वाली तथा टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं इसी काल की हैं।

2. आधुनिक सभ्यता की प्रतिमाएं

इनका निर्माण वर्तमान मानव सभ्यता के क्रोमैग्नन मानव द्वारा बहुत बाद के युगों में अर्थात् आज से 1100-1200 वर्ष पहले किया गया है, जब हिन्दू राजकुमार इन द्वीपों पर अपने राज्य स्थापित कर चुके थे। इनमें मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली प्रतिमाएं मिलती हैं। इन मूर्तियों को लम्बी एवं पतली आंखों से पहचाना जा सकता है।

(ब.) आंखों के आधार पर वर्गीकरण

1. गोल आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें नहीं हैं : ये प्रतिमाएं किसी अति प्राचीन सभ्यता की प्रतीत होती हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं में ओरंगुटान जैसे मनुष्यों, राक्षसों एवं बंदरों  की प्रतिमाएं हैं तथा इन सब के चेहरे एवं नथुने फूले हुए हैं।

2. टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं, जिन पर पलकें नहीं हैं : उबुद-वानर-वन में ऐसी केवल एक ही प्रतिमा देखने को मिली, यह किसी परग्रही देवता की जान पड़ती है। यह प्रतिमा क्रोमैग्नन मानव द्वारा बनाई गई नहीं है। इसे किसी परग्रही जीव द्वारा ही बनाया गया होगा।

3. आधुनिक मनुष्यों जैसी लम्बी आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें बनी हुई हैं : इस वर्ग में मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली, दोनों प्रकार की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।

(स.) मुखाकृति के आधार पर वर्गीकरण

1. राक्षसी चेहरों वाली प्रतिमाएं

2. मनुष्यों के मुख वाली प्रतिमाएं

3. पशुओं के मुख वाली प्रतिमाएं

उबुद-वानर-वन में प्राचीन सभ्यता एवं आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा इन तीनों ही प्रकार की मुखाकृतियों वाली प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, जिन्हें स्पष्ट रूप से अलग-अलग पहचाना जा सकता है।

(द.) जीभ के आधार पर वर्गीकरण

1. लम्बी जीभ वाली प्रतिमाएं : इस प्रकार की प्रतिमाओं में अधिकांश प्रतिमाएं गोल आंखों वाली तथा अत्यंत प्राचीन हैं। ये प्रतिमाएं प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाले देवी-देवताओं यथा अग्नि देव, वायु देव आदि की प्रतीत होती हैं। लम्बी जीभ वाली कुछ प्रतिमाओं की आंखें लम्बी एवं पतली हैं जो आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा बनाई गई हैं तथा प्राचीन प्रतिमाओं का आधुनिक संस्करण हैं।

2. सामान्य जीभ वाली प्रतिमाएं : उबुद-वानर-वन में कुछ प्रतिमाएं प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतीत होती हैं तथा कुछ, प्राचीन प्रतिमाओं का नवीन संस्करण जान पड़ती हैं जिनका निर्माण आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा किया गया है।

प्रतिमाओं के इस संक्षिप्त वर्गीकरण के बाद उबुद वानर वन की कुछ प्रमुख प्रतिमाओं का परिचय दिया जाना उचित होगा।

टेलिस्कोपिक आंखों वाले देवता की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में धरती में लगी एक देव-प्रतिमा का मुंह सामने से पूरी तरह चपटा है जिस पर आखें इस तरह बनाई गई हैं मानो वहाँ दूरबीन की नलियां रखी हुई हों। दोनों आंखों के बीच में एक मणि जैसी रचना है। इस मूर्ति में दिखाई दे रहा देवता अपने पैरों पर उकडूं बैठा है तथा घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़े होने अथवा उड़ने की तैयारी की मुद्रा में है। इस तरह की आखों वाली और कोई प्रतिमा इस परिसर में नहीं दिखी।

ऐसा लगता है कि इस प्रतिमा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि यहां कभी दूसरे ग्रह के लोग आए थे जो देखने के लिए टेलिस्कोप जैसे यंत्रों का प्रयोग करते थे। इसके वक्ष पर आधुनिक क्रॉस बेल्ट जैसा कवच धारण किया हुआ है। सिर पर गोल टोप है जिससे खोपड़ी पूरी तरह ढंक गई है। यह मूर्ति एक हजार साल अथवा उससे अधिक प्राचीन प्रतीत होती है। इसकी ठोड़ी और नाक काफी घिस गई है।

हंसती हुई नागकन्या

उबुद-वानर-वन में एक नागकन्या का अद्भुत अंकन किया गया है। यह नागकन्या आंखें बंद किये हुए बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में बैठी है जिसके लम्बे और वलयाकार केश आगे वक्ष तक लटके हुए हैं। इसके पेट पर बने हुए शल्कों से ज्ञात होता है कि यह मानवी नहीं है, अपितु नागकन्या है। इस नागकन्या की देहयष्टि, अन्य प्रतिमाओं के विपरीत अर्थात् कृशकाय है। इसके दोनों हाथों और दोनों पैरों में चार-चार अंगुलियों का अंकन किया गया है। किसी भी हाथ या पैर में अंगूठा नहीं बनाया गया है।

विचित्र आंखों वाली एक और प्रतिमा

उबुद-वानर-वन की बावड़ी के पास ही एक मनुष्य की प्रतिमा लगी है जिसकी आंखें पूरी तरह गोल हैं किंतु ये आंखें अन्य गोल आंखों वाली प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न हैं। दोनों आंखें पूरी तरह चेहरे से उभर कर बाहर आई हुई हैं। पलकें नहीं होने से पता नहीं लगता कि ये आंखें खुली हैं या बंद।

प्रतिमा के कान बहुत विशाल हैं। इस प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करके अपने वक्ष के पास बगल में ही रखी हुई हैं। मोटे-मोटे दांत स्पष्ट दिखाई देते हैं जिनमें से ऊपर वाली पंक्ति में से दोनों तरफ का एक-एक दांत बाहर आया हुआ है। इस प्रतिमा के मुख्य पत्थर में ही सिर पर छोटी सी पगड़ी तथा टांगों पर छोटी सी लंगोटी उत्कीर्ण की गई है।

बावड़ी में गणेश एवं गंगा

उबुद-वानर-वन में एक चौकोर बावड़ी है, जो अधिक गहरी नहीं है। इसकी एक दीवार पर भगवान गणेश की सैंकड़ों साल पुरानी, पत्थर की प्रतिमा लगी हुई है। इसके पास ही एक देवी प्रतिमा भी है, जो स्पष्ट पहचानने में नहीं आती किंतु यह देवी गंगा की प्रतिमा है जिसके हाथ में लिए गए पत्थर के कलश से जल की अविरल धारा आज भी बह रही है। इस जल को गंगाजल के समान ही पवित्र माना जाता है। इस बावड़ी एवं प्रतिमाओं का निर्माण भारतीय हिन्दू राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंच जाने के बाद हुआ है।

गीदड़ मुखी मनुष्य का आकाशीय प्राणियों से वार्तालाप

एक मनुष्याकार प्रतिमा में एक ऐसे मनुष्य का अंकन किया गया है जिसका मुख गीदड़ अथवा कुत्ते की तरह है तथा उसने अपना मुंह पूरी तरह खोलकर आकाश की तरफ उठा रखा है। ऐसा लगता है कि वह आकाश में स्थित प्राणियों को कोई संदेश दे रहा है। उसने एक हाथ में एक यंत्र उठा रखा है तथा दूसरा हाथ इस प्रकार की मुद्रा में है मानो वह अपनी अंगुलियों से इस यंत्र को संचालित करेगा।

इस प्रतिमा की आंखें लम्बी और पतली हैं जिनसे स्पष्ट है कि यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित है तथा संभव है कि किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा बनाई गई प्रतिमा की अनुकृति है जिसमें गोल आंखों के स्थान पर लम्बी एवं पतली आंखों का अंकन किया गया है।

गीदड़ के मुख वाली स्त्री प्रतिमा

एक अन्य प्रतिमा में एक ऐसी बैठी हुई स्त्री का अंकन किया गया है जिसका मुख मादा-गीदड़ जैसा है। इसका मुख आकाश की तरफ होते हुए भी पहली वाली प्रतिमा की अपेक्षा नीचा है। इसके हाथों की अंगुलियां अपेक्षाकृत अधिक लम्बी एवं पतली हैं। इसके गले में सुंदर हार है जिस पर जटिल अलंकरण किया गया है।

हाथों में कंगन, पैरों में पायजेब एवं कंधों पर अंगद भी देखे जा सकते हैं। अंगद का अंकन भुजाओं पर किया जाता है किंतु इस प्रतिमा में कंधों पर दिखाई दे रहा है। इसने अपना दायां हाथ दायें घुटने पर एवं बायां हाथ बायें घुटने पर रखा हुआ है। इसके अधो भाग पर किसी वस्त्र का अंकन किया गया है जबकि वक्ष पूरी तरह खुला हुआ है।

स्तन सामान्य आकार के एवं आकर्षक बनाए गए हैं। इसकी आंखें भी लम्बी एवं पतली हैं, चेहरा एवं होठ पतले हैं। इस अंकन के आधार पर कहा जा सकता है कि इसे आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित किया गया है।

पथ्य तैयार करते हुए मनुष्य की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक वटवृक्ष के नीचे स्थित चबूतरे पर एक भरी हुई देहयष्टि वाले व्यक्ति की प्रतिमा है जो पालथी लगाए हुए प्रसन्न मुद्रा में बैठा है। उसके सामने एक शिला रखी हुई है जिस पर एक गोल पत्थर रखा हुआ है।

यह एक वैद्य की प्रतिमा प्रतीत होती है जो किसी जड़ी-बूटी से दवा बनाने की तैयारी में है। इस वैद्य की आकृति मनुष्य से कम, औरंगुटान से अधिक मिलती है। ऐसा लगता है कि यह किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी है जिसने बाली-वासियों को चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान दिया है। इस प्रतिमा में एक बात और ध्यान देने की है कि यह मनुष्य आंखें बंद किये हुए है और इसके दोनों हाथ प्रार्थना के भाव से जुड़े हुए हैं जिससे प्रतीत होता है कि यह दवा तैयार करने से पहले किसी देवता अथवा दिव्य शक्ति का आह्वान कर रहा है।

लम्बी जीभ वाला विचित्र मनुष्य

उबुद-वानर-वन में लगभग पांच फुट की एक ऐसी मनुष्य प्रतिमा रखी हुई है जिसकी जीभ कई फुट लम्बी है तथा पेट तक लटकी हुई है। इस जीभ पर एवं उसके आसपास पानी की लहरें बनी हुई हैं जिससे अनुमान होता है कि यह जल का देवता है। इसकी आंखें गोल हैं तथा लगभग चेहरे से बाहर आई हुई हैं। इस मनुष्य के पैर बहुत छोटे हैं। यह प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित जान पड़ती है।

पैरों में नक्षत्र वाला विचित्र मनुष्य

उबुद-वानर-वन में लगी एक मनुष्य प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों में कोई गोला ले रखा है तथा एक पैर से वह उस गोले पर आघात करने की मुद्रा में है। मनुष्य के दांत बाहर दिख रहे हैं तथा चेहरे पर प्रसन्नता मिश्रित विचित्र भाव हैं जो किसी भी तरह सौम्य नहीं कहे जा सकते।

इस मनुष्य के हाथ और पैरों के अग्र भाग विशेष ध्यान देने योग्य हैं। इन पर अंगुलियों की जगह विशिष्ट प्रकार का अलंकरण है। मानो उसने किसी धातु ऐ बने ग्लव्ज (दस्ताने) पहन रखे हैं। गोले पर टिका हुआ पैर मछली जैसा दिखता है तथा हाथ किसी पक्षी के मजबूत पंजे की तरह दिखाई देता है।

गोले पर छिद्रनुमा केन्द्र का अंकन किया गया है तथा इस छिद्र से किरणें निकल रही हैं जिससे आभास होता है कि यह गोला कोई नक्षत्र है। इस मनुष्य की आंखें पूरी तरह गोल हैं जिन पर मोटी-मोटी भौंहों का अंकन किया गया है। गालों और ठोढ़ी पर हल्की दाढ़ी है तथा सिर पर पतली सी पगड़ी है।

पशु चर्म लपेटने वाली स्थूल स्त्री

निकट ही एक स्थूलकाय स्त्री की प्रतिमा है जिसने कमर पर मृगछाला की तरह किसी पशु की चर्म लपेट रखी है तथा उसकी नाभि पर एक नाग बंधा हुआ है। यह स्त्री घुटनों के बल बैठी हुई है तथा इसकी जीभ नाभि तक लटकी हुई है। वक्ष पर दिखाये गए स्तन सामान्य आकार के किंतु बेडौल हैं। सिर के बाल खुले हुए हैं।

इसने बायां हाथ अपने सिर पर रखा हुआ है जिसके कारण बाईं बगल खुली हुई दिखाई देती है तथा कंधे पर पड़े हुए एक सांप का मुख इस बगल में झांक रहा है। स्त्री का दायां हाथ दिखाई नहीं देता किंतु दायें हाथ की अंगुलियां दायें स्तन पर रखी हुई हैं। इसकी आंखें काफी बड़ी और गोल हैं जो एक गोलक में रखी हुई हैं। होठ काफी मोटे हैं तथा चेहरे की भाव भंगिमा अपेक्षाकृत शांत है। यह मूर्ति भी कई शताब्दियों पुरानी प्रतीत होती है। इसकी लम्बी जीभ यह संकेत करती है कि यह किसी प्राकृतिक शक्ति पर नियंत्रण रखने वाली देवी की प्रतिमा है। अंकन के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि यह तूफान की देवी है।

अग्निदेव एवं उनकी पत्नी

उबुद-वानर-वन में एक चबूतरे के कौने पर एक स्त्री-पुरुष की युगल प्रतिमा बनी हुई है जिसमें उनके सिर एवं मुख दिखाई दे रहे हैं। यह प्रतिमा किसी और स्थान से लाकर इस चबूतरे पर स्थापित की गई है। दोनों चेहरों पर बनी आंखें पतली एवं सुंदर हैं। यह प्रतिमा काफी बाद के काल की है तथा यहां रखी अन्य प्रतिमाओं की शैली से मेल नहीं खाती है।

पुरुष की आंखें स्पष्ट रूप से खुली हुई हैं जबकि स्त्री की आंखें बंद हैं। दोनों की जिह्वाएं मुख से बाहर निकलकर लटकी हुई हैं और आपस में मिल रही हैं। पुरुष की जिह्वा अधिक चौड़ी, अधिक बड़ी है। इस जिह्वा पर अग्नि की लम्बी लपटों का अंकन किया गया है। स्त्री की जिह्वा पर अपेक्षाकृत छोटी ज्वालाओं का अंकन है।

ये संभवतः अग्निदेव तथा उनकी पत्नी हैं। दोनों मुखों के होंठ, आंख, नाक, कान, दांत सभी कुछ आज के मनुष्य के समान बहुत सुंदर बनाए गए हैं। दोनों के ही चेहरों के भाव सौम्य हैं। दोनों चेहरे मुस्कुरा रहे हैं जिसके कारण इनकी दंतपक्तियां स्पष्ट और लुभावनी बन पड़ी हैं।

दोनों के कानों में आभूषणों का अलंकरण है। दोनों के गले में बारीक एवं मोटे मनकों की कई-कई मालाएं हैं जो वक्षों तक लटक रही हैं। स्त्री के केश वेणी के रूप में बांधे गए हैं जिन पर अच्छा अलंकरण किया गया है। स्त्री के बाएं कान का कर्णफूल बहुत सुंदर है तथा सूर्य की तरह गोल है। पुरुष की भौहें ऊपर उठकर सिर के बालों से मिल गई हैं तथा सिर के केश अग्नि की ज्वाला की तरह ऊर्ध्वगामी हैं।

स्त्री के माथे पर सुंदर मुकुट बांधा गया है। मुकुट का अंकन एक मेखला के रूप में किया गया है जिसके बीच में एक कलात्मक पैण्डल बांधा हुआ है। स्त्री के बालों का जूड़ा कलात्मक रूप देकर बांधा गया है। यह प्रतिमा भी भारतीय राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंचन के बाद की प्रतीत होती है क्योंकि भारतीय पुराणों में वर्णित अग्निदेव का इस प्रतिमा पर पूरा प्रभाव दृष्टिगत होता है।

बड़े स्तनों वाली स्त्री प्रतिमा

राक्षस प्रतिमा के निकट ही एक स्त्री प्रतिमा रखी हुई है जिसका केवल धड़ एवं ऊपरी भाग दिखाई देता है। इस स्त्री प्रतिमा में स्थूलकाय स्तन बने हुए हैं। स्तनों को आगे की ओर लम्बा बनाने के लिए उनमें वलय बनाए गए हैं। इन स्तनों की तुलना आधुनिक काल की बकरियों के स्तनों से की जा सकती है। इस स्त्री की मुखमुद्रा में प्रसन्न्ता के स्थान पर पीड़ा का भाव अधिक है। ऐसे स्तनों वाली और भी प्रतिमाएं बाली द्वीप पर देखने को मिलीं। बाली के कुछ प्राचीन चित्रों में भी ऐसे स्तनों वाली स्त्रियां दिखाई गई हैं।

लम्बी जीभ और सुंदर चेहरे वाली स्त्री

उबुद-वानर-वन में रखी एक स्त्री प्रतिमा में, वर्तमान मानव सभ्यता में दिखाई देने वाली नारी का अंकन किया गया है जिसकी गर्दन के दोनों ओर से गुंथी हुई चोटियां सामने आ रही हैं। इन चोटियों को सजाने के लिए बड़े मनकों का प्रयोग किया गया है। सिर के पीछे के केश खुले हुए हैं और कंधों के दूसरी तरफ दिखाई दे रहे हैं। स्त्री का चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा है, दांतों की सुंदर पंक्तियां दूर से दिखाई देती हैं, आंखें पतली, नुकली एवं आनुपतिक हैं और पूरी तरह खुली हुई हैं।

स्त्री के वक्ष पर साड़ी जैसे किसी वस्त्र का अंकन किया गया है। चेहरे पर सौम्य भाव हैं तथा पूरा चेहरा प्रसन्नता से दमकता हुआ प्रतीत होता है। यह प्रतिमा, गोल आंखों वाली प्रतिमा से कई सौ साल बाद की प्रतीत होती है। इसके चेहरे के भाव आज की स्त्रियों से मिलते जुलते हैं किंतु बाली की स्त्रियों से नहीं, भारतीय देवियों के चेहरों से।

दो दांतों वाली राक्षस प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक स्थूलाकाय पुरुष प्रतिमा के मुंह से दोनों तरफ एक-एक दांत बाहर निकला हुआ है। चेहरे पर दाढ़ी है तथा मुख के भाव अपेक्षाकृत क्रूर हैं। यह बैठी हुई मुद्रा में है जिसने अपने दोनों पैर आगे की ओर सिकोड़ कर हाथों की तरह मिला लिए हैं। इसकी बाईं भुजा कंधे के ऊपरी हिस्से से निकलती हुई है जबकि दाईं भुजा सामान्य से कुछ नीचे से निकल रही है। इस राक्षस ने अधो-वस्त्र धारण कर रखा है तथा ऊपरी हिस्सा नग्न है।

आंखों का गोलक पूरी तरह गोल बनाया गया है जिसके ऊपरी आधे हिस्से को पलकों से ढंक दिया गया है तथा नीचे का आधा हिस्सा खुला हुआ है जिसमें से आखों का रैटीना एवं कोर्निया वाला भाग इस तरह बनाया गया है कि दोनों के रंग अलग दिखाई देते हैं मानो यह मूर्ति न होकर चित्र हो।

इस तरह की आँखों वाली यह अकेली प्रतिमा यहां देखेने को मिली। इस राक्षस का बायां हाथ उसके बायें घुटने पर है तथा दायां हाथ दायीं बगल के पास इस प्रकार रखा हुआ है मानो अभय मुद्रा में रखना चाहता हो किंतु हाथों की अंगुलियां आगे की ओर मुड़ी हुई हैं।

गांधार शैली के वस्त्रों वाली प्रतिमाएं

उबुद-वानर-वन में कुछ प्रतिमाओं के वस्त्र गांधार शैली की तरह लहरदार बनाए गए हैं। इन प्रतिमाओं में मनुष्य शरीर भरे हुए तथा आधुनिक मनुष्यों की आकृतियों से मिलते हैं। सहज ही समझा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं पर बौद्धों का प्रभाव है। ऐसी ही एक स्त्री प्रतिमा के सिर पर बंदर का सुंदर अंकन किया गया है। स्त्री के स्तन अपेक्षाकृत छोटे बनाए गए हैं जो कि वस्त्र से ढंके हुए हैं। स्त्री की लम्बी एवं पतली आंखें बंद हैं, चेहरे का भाव सौम्य नहीं है। यह बौद्ध भिक्षुणी जान पड़ती है।

कौन थे औरंगुटान जैसी मानव प्रतिमाओं को बनाने वाले

जावा द्वीप पर मानव की उपस्थिति लगभग 10 लाख वर्ष पुरानी है। यहाँ से ”होमो इरैक्टस” (अर्थात् सीधे खड़े होने में दक्ष) मानव प्रजाति के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म प्राप्त किये गये हैं। इसे ”पिथेकेंथ्रोपस इरैक्टस” (अर्थात् सीधा खड़ा होने वाला बंदर जैसा मानव) भी कहते हैं। बड़े मस्तिष्क वाला हमारा यह पूर्वज काफी घुमक्कड़ था।

वह प्रथम प्राचीन मानव था जो अफ्रीकी महाद्वीप से बाहर निकलकर पूरे विश्व में अपनी जाति का प्रसार करने लगा। यह आज के मनुष्य और प्राचीन बंदर के मध्य की अंतिम कड़ी थी। इस मानव प्रजाति में से ही आज से लगभग डेढ़ लाख साल पहले ”होमो सैपियन सैपियन” प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 40 हजार साल पहले ‘होमो सैपियन सैपियन” का आधुनिक संस्करण अर्थात् ”क्रोमैग्नन मैन” प्रकट हुआ।

उबुद-वानर-वन में स्थित प्राचीनतम प्रतिमाएं उस काल की हैं जब क्रौमैग्नन का चेहरा पूर्णतः आज के मानव जैसा नहीं बन पाया था। एक संभावना यह भी है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण उस काल में धरती पर आने वाले परग्रही जीवों द्वारा किया गया हो क्योंकि पर्याप्त संभव है कि उस काल का मानव, मूर्ति निर्माण करने में असक्षम हो किंतु उन्हें देखकर परग्रही जीवों ने उनकी प्रतिमाएं इस वन प्रांतर में बनाई हों ताकि भविष्य का मानव इस सभ्यता के बारे में जान सके।

इन्हीं मूर्तियों में एक मूर्ति उन्होंने अपनी भी बनाई जिसकी आंखों पर दूरबीन की नलियां लगी हुई हैं। इस मूर्ति का चेहरा न तो औरंगुटान जैसी शक्लों वाले मोटे आदमियों से मिलता है, न राक्षसों की शक्लों वाले आदमियों से मिलता है न वहाँ मौजूद परवर्ती काल की मूर्तियों के देवताओं से मिलता है। बाली एवं जावा द्वीप में खड़े विशाल मंदिर समूह भी इन द्वीपों पर परग्रही जीवों के आने का साक्ष्य देते हैं तथा इन द्वीपों की दंत कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन द्वीपों पर कभी राक्षस राजा राज्य करते थे जो एक रात में 1000 प्रतिमाएं बनाने में सक्षम थे। 

गाय-बछड़े की अद्भुत वात्सल्य प्रतिमा

जहाँ से हम उबुद-वानर-वन में प्रवेश करते हैं, वहीं लगभग 100 मीटर की दूरी पर चलते ही दीवार पर गाय-बछड़े की अद्भुत प्रतिमा रखी हुई दिखाई देती है। इस प्रतिमा में गाय अपने बछड़े को अपने वक्ष से चिपका कर मनुष्य की तरह बैठी हुई है। उसका एक खुर बछड़े की गर्दन पर इस तरह रखा हुआ है मानो वह बछड़े को इसी खुर के सहारे संभाले हुए हो। गाय तथा बछड़े, दोनों के कान लम्बे हैं, दोनों की आंखें बहुत सुंदर हैं तथा खुली हुई हैं।

गाय के सिर पर छोटे-छोटे सींग हैं। सिर पर दोनों तरफ दो-दो सींग उकेरे गए हैं। गाय एवं बछड़े की लम्बी आंखों से स्पष्ट पहचाना जा सकता है कि इस प्रतिमा का निर्माण आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा किया गया है न कि आदिम सभ्यता के लोगों द्वारा।

ड्रैगन प्रतिमाएं

कभी इस द्वीप पर विशालाकाय कोमोडो ड्रैगन रहे होंगे। कुछ प्राचीन कोमोडो ड्रैगन प्रतिमाएं उबुद-वानर-वन में बावड़ी के निकट दिखाई पड़ती हैं। कोमोडो ड्रैगन से हटकर भी कुछ ड्रैगन प्रतिमाएं हैं जो चीनी ड्रैगन जैसी दिखाई देती हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं सर्प की तरह लेटी हुई मुद्रा में हैं तो कुछ मनुष्य की तरह खड़ी हुई मुद्रा में हैं।

एक ड्रैगन प्रतिमा के मुख में एक बंदर बैठा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह ड्रैगन के मुंह को फाड़ने का प्रयास कर रहा हो। इस ड्रैगन के शरीर पर अन्य ड्रैगन उत्कीर्ण किया हुआ है जो किसी अन्य बंदर को निकट आने से रोकता हुआ प्रतीत होता है। यह आधुनिक काल के मानवों द्वारा निर्मित सैंकड़ों साल पुरानी प्रतिमा है।

तलवार एवं ढाल वाले योद्धा की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक स्तम्भ पर भरे हुए शरीर वाले योद्धा की मनुष्याकर प्रतिमा खड़ी है जिसने बाएं हाथ में ढाल एवं दायें हाथ में तलवार ले रखी है। इसकी आंखें लम्बी, मूछें बड़ी एवं भाव-भंगिमा कठोर है। यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं में से है। इसके सिर पर छोटा मुकुट है तथा कान किसी धातु की चद्दर से ढके हुए प्रतीत होते हैं। यह प्रतिमा बहुत बाद की जान पड़ती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली एवं जावा द्वीपों पर ग्यारह दिन (17)

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बाली द्वीप में भगवान राम एवं सीताजी

बाली एवं जावा द्वीपों पर लेखक ने अपने परिवार के साथ ग्यारह दिन का प्रवास किया। इस प्रवास में लेखक को इन द्वीपों पर हिन्दू संस्कृति की छाप दिखाई दी। लेखक ने अपनी पुस्तक हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया नाम पुस्तक में बाली एवं जावा द्वीपों पर वर्तमान समय में हिन्दू धर्म की स्थिति का आंखों देखा विवरण लिखा है।

यद्यपि इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथापि इण्डोनेशियाई रुपयों एव डाक टिकटों पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें धर्नुधारी श्रीराम, सर्पधारी भगवान शिव, शुंडधारी भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, विष्णु के वाहन गरुड़ आदि प्रमुख हैं।

इण्डोनेशिया के साढ़े सत्रह हजार द्वीपों में बाली नामक एक ऐसा द्वीप भी है जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या हिन्दू धर्मावलम्बी है तथा अनेक प्राचीन हिन्दू मंदिर स्थित हैं। संसार का सबसे बड़ा कहा जाने वाला बोरोबुदुर मंदिर भी इण्डोनेशिया के जावा द्वीप में स्थित है जो कि एक बौद्ध मंदिर है।

हमारे मन में सात समंदर पार के इन हिन्दुओं की संस्कृति एवं उनके मंदिरों को देखने की लालसा थी। इसी कारण हमने अपनी ग्यारह दिवसीय पारिवारिक यात्रा के लिए इण्डोनेशिया का चयन किया। इण्डोनेशिया में सत्रह हजार से अधिक द्वीप हैं, इनमें से हमने केवल दो द्वीपों बाली एवं जावा का चयन किया।

सामान की ऊहापोह

हमारे इस पारिवारिक दल में छः सदस्य थे जिनमें मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता, मेरी पत्नी मधुबाला, पुत्र विजय, पुत्र-वधू भानुप्रिया एवं डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा सम्मिलित थी। हमारा परिवार विशुद्ध शाकाहारी है जो मांस, मछली, अण्डा किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करता।

बाली एवं जावा द्वीपों पर कुल 11 दिन की यात्रा में छः व्यक्तियों के लिए शाकाहारी भोजन एवं अल्पाहार की व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम नहीं था। हमें अनुमान था कि इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु हम इस बात को लेकर आशंकित थे कि जावा द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलना कठिन है क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत जनसंख्या इस्लाम को मानने वालों की है जिनमें शायद शाकाहार के प्रति आग्रह न हो।

हम इस बात को लेकर भी आशंकित थे कि बाली एवं जावा द्वीपों पर मछली और अण्डा को मांसाहार नहीं माना जाता जबकि हमारे लिए तो ये वस्तुएं मांसाहार ही हैं। इसलिए हमने भोजन बनाने के लिए प्रेशर कुकर, तवा, बेलन, चाकू तथा अन्य आवश्यक बर्तन और कच्ची सामग्री यथा गेहूं का आटा, घी, मसाले एवं दालें आदि अपने साथ ले लीं।

चूंकि बहुत से देशों में साबुत बीज तथा लिक्विड नहीं ले जाया जा सकता, इसलिए हमने तेल तथा चावल अपने साथ नहीं लिए। इसका खामियाजा हमें पूरी यात्रा में भुगतना पड़ा। इस कच्ची भोजन सामग्री के कारण सामान का वजन बढ़ जाने की समस्या उत्पन्न हो गई, इसका समाधान हमने कपड़ों में कमी करके किया। ओढ़ने-बिछाने के लिए कुछ नहीं लिया तथा पहनने के कपड़े भी कम से कम लिए।

समय की घालमेल और शरीर की जैविक घड़ी

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यह 13 अप्रेल की शाम थी जब हम मलिण्डो एयर फ्लाइट से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुआलालम्पुर के लिए रवाना हुए। 13 अप्रेल की रात 10.05 बजे दिल्ली से रवाना होकर यह फ्लाईट 14 अप्रेल को प्रातः 6 बजे कुआलालम्पुर पहुंची। वस्तुतः हम विमान में कुल साढ़े पांच घण्टे ही बैठे थे। इस हिसाब से भारत में सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे किंतु मलेशिया, भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित होने के कारण वहाँ का समय भारत से ढाई घण्टे आगे चल रहा था, इसलिए वहाँ सुबह के छः बज चुके थे। डेढ़ घण्टे बाद अर्थात् प्रातः 7.30 बजे हमें कुआलालम्पुर एयरपोर्ट से बाली देनपासार के लिए फ्लाइट मिली जो इण्डोनिशयाई समय के अनुसार प्रातः 10.30 बजे बाली की प्रांतीय राजधानी देनपासार पहुंची। समय की घालमेल इण्डोनेशिया से भारत वापसी के समय भी हुई। हम 23 अप्रेल को प्रातः 11.30 बजे इण्डोनेशिया एयर एशिया फ्लाइट द्वारा जकार्ता से चलकर दोपहर ढाई बजे कुआलालम्पुर पहुंचे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन घण्टे नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे।

23 अप्रेल को मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे हम एयर एशिया की फ्लाइट द्वारा कुआलालम्पुर से चलकर रात्रि 10.00 बजे नई दिल्ली पहुंचे। भारत का समय कुआलालम्पुर से ढाई घण्टे पीछे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में साढ़े तीन घण्टे नहीं अपितु 5.30 घण्टे लगे।

यह आश्चर्य-जनक बात थी कि केवल एयरपोर्ट की घड़ियों में ही समय का हेरफेर नहीं हो रहा था। हमारे शरीर की जैविक घड़ी भी अपने भीतर का समय उसी प्रकार बदल रही थी और हमें दिन या रात्रि की अनुभूति स्थानीय समय के अनुसार हो रही थी। यह संभवतः उन चुम्बकीय तरंगों के कारण था जो हर स्थान पर अपना अलग प्रभाव रखती हैं।

मलिण्डो और एयर एशिया की एयर होस्टेस

मलिण्डो एयर फ्लाइट सर्विस मलेशिया की है। मलिण्डो फ्लाइट की एयर होस्टेस विशेष प्रकार की ड्रेस पहनती हैं। गले से लेकर कमर तक कसा हुआ कोट तथा कमर से नीचे छींटदार खुली हुई तहमद होती है जो कमर पर केवल एक बार लपेटी हुई होती है। इस तहमद में लगभग पूरी टांगें दिखाई देती हैं। इण्डोनेशिया एयर एशिया एयर फ्लाइट सर्विस इण्डोनेशिया देश की है।

इस फ्लाइट की एयर होस्टेस गले से कमर तक खुले कॉलर वाला एक कोट पहनती हैं तथा कमर से नीचे एक अत्यंत कसी हुई मिनी स्कर्ट धारण करती हैं। मुझे यह देखकर हैरानी थी कि जहाँ भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश की अधिकांश मुस्लिम महिलाएं बुर्के में रहने को अनिवार्य मजहबी रस्म मानती हैं, वहीं मलेशिया एवं इण्डोनेशिया जो कि दोनों ही मुस्लिम देश हैं, की एयर होस्टेस बुर्का डालना तो दूर, अपनी टांगों को खुला रखने में भी बहुत सहजता का अनुभव करती हैं।

दोनों ही देशों की एयर होस्टेस को देखकर तब तो और भी अधिक हैरानी होती है जब वे यात्रियों का स्वागत भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर तथा मुस्कुराकर करती हैं। उनका व्यवहार विशेष रूप से विनम्र तथा सहयोग एवं सेवा की भावना वाला है। वे यात्रियों की सीट बैल्ट बांधने-खोलने, उन्हें गर्म-ठण्डा पेयजल देने, उनका सामान रैक में लगाने जैसी छोटी-छोटी सेवाएं मुस्कुरा कर करती हैं। अपनी बात विनम्रता से कहती हैं तथा यात्रियों को विदा देते समय पुनः हाथ जोड़कर अभिवादन करती हुई उन्हें आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं देती हैं।

मलिण्डो की आवभगत

मलेशिया की एयर फ्लाइट सर्विस ‘मलिण्डो’ की आवभगत हमारे लिए अविस्मरणीय घटना बन गई है। 13 अप्रेल की रात्रि का भोजन हमने बुक करवा रखा था तथा विशेष हिदायत दे रखी थी कि हमें ‘जैन-भोजन’ उपलब्ध कराया जाए। यह हमारी अपेक्षा के अनुरूप था लेकिन हैरानी तब हुई जब 14 अप्रेल को प्रातः नौ बजे एयर होस्टेस गर्म नाश्ता लेकर उपस्थित हुई। हमने यह सोचकर मना कर दिया कि यह अवश्य ही नॉनवेज होगा किंतु एयर होस्टेस ने आग्रह पूर्वक कहा कि यह पूरी तरह वैजीटेरियन है तथा इसमें केवल गेहूं के आटे के परांठे एवं अरहर की दाल है।

यह नाश्ता हमने बुक नहीं करवा रखा था किंतु एयर सर्विस द्वारा अपनी ओर से उपलब्ध कराया गया था। उन गर्म परांठों और भारतीय तरीके से छौंक लगी हुई अरहर की दाल इतनी स्वादिष्ट थी कि भारतीयों को भी हैरानी में डाल दे। हिन्द महासागर के ऊपर से उड़ते हुए यह अनपेक्षित दाल-परांठों का नाश्ता जीवन भर याद रखने योग्य था। मलिण्डो जैसी सदाशयता और आवभगत हमें अपनी यात्रा के दौरान इण्डिोनेशिया एयर एशिया की तीनों फ्लाईट्स में देखने को नहीं मिली।

सर्विस अपार्टमेंट्स की बुकिंग

चूंकि होटलों में खाना नहीं बनाया जा सकता इसलिए हमारे सामने समस्या यह थी कि हमारे रहने की व्यवस्था किसी शाकाहारी हिन्दू परिवार में हो जाए। यह कार्य सरल नहीं था, ऐसे परिवार को भारत में बैठे हुए ढूंढ निकालना, समुद्र में से किसी सुईं को ढूंढ निकालने जैसा था। इस समस्या का समाधान किया आधुनिक समय में प्रचलन में आई सर्विस अपार्टमेंट्स की सुविधा ने।

विश्व के बहुत से देशों में विशेषकर उन देशों में जहाँ पर्यटन, अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, बहुत से परिवार अपने घर का खाली हिस्सा पर्यटकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इन्हें सर्विस अपार्टमेंट्स कहा जाता है। कुछ वैबसाइट्स ने इन सर्विस अपार्टमेंट्स को अपने तंत्र पर जोड़ रखा है, विश्व भर में बैठे पर्यटक इनका लाभ उठा सकते हैं। हमने उन सर्विस अपार्टमेंट्स का चयन किया जिनमें भोजन बनाने के लिए अलग से रसोई-घर हो।

सौभाग्य से बाली में एक ऐसा परिवार हमें मिल गया जिसमें पति का नाम पुतु तथा पत्नी का नाम पुतु एका था। यह एक हिन्दू परिवार है और इसने पर्यटकों के लिए अलग से एक पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं वाला और कांच की दीवारों से घिरा हुआ एक अत्यंत रमणीय और आरामदायक फ्लैट चावल के खेतों के बीच बना रखा है। यह ऐसा ही था जैसे भारत में आकर कोई किसी छोटी से ढाणी में रहे तथा सुविधाजनक आवास का आनंद उठाए।

हमारे मन में एक आशंका अपनी सुरक्षा को लेकर थी। खेतों के बीच अनजान देश में इस प्रकार अकेले परिवार का निवास करना, कहीं किसी संकट को आमंत्रण देना तो नहीं था! फिर भी जब हमें ज्ञात हुआ कि श्रीमती पुतु एका बहुत पढ़ी-लिखी हैं और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भाग लेने के लिए मलेशिया, सिंगापुर तथा अन्य देशों को जाती रहती हैं तो हमने पांच दिन के लिए इस सर्विस फ्लैट को बुक करवा लिया।

योग्यकार्ता में निवास करने वाले मासप्रियो नामक एक मुस्लिम शिक्षक ने हमें अपनी वैबसाइट के माध्यम से भरोसा दिलाया कि हम उनके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया।

बाली और योग्यकार्ता में तो यह व्यवस्था हो गई किंतु जकार्ता में ऐसा किया जाना संभव नहीं था क्योंकि जकार्ता विश्व के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले शहरों में से है जहाँ लगभग हर समय जाम लगा रहता है। चूंकि सर्विस अपार्टमेंट्स प्रायः शहर के कुछ दूर ही मिलते हैं इसलिए उनका चयन करना इस खतरे को आमंत्रण देता था कि हम अपनी यात्रा के अंतिम दिन प्रातः साढ़े ग्यारह बजे की फ्लाइट ट्रैफिक जाम में फंसने के कारण चूक जाएं। अतः हमने अपने प्रवास की अंतिम बुकिंग जकार्ता एयर पोर्ट के निकट ही किसी होटल में करने का निर्णय लिया।

होटल में किसी तरह का भोजन बनाया जाना संभव नहीं था इसलिए हमने योजना बनाई कि जब हम 21 अप्रेल की सुबह को योग्यकार्ता से चलेंगे तो 22 और 23 के भोजन भी व्यवस्था कर लेंगे। आपात्कालीन व्यवस्था के तहत हमने जोधपुर से लड्डू, मठरी, शकरपारे और खाखरे आदि अपने साथ ले लिए।

समुद्र के किनारे दौड़

14 अप्रेल की प्रातः लगभग सवा दस बजे हमें विमान की खिड़की से बाली द्वीप का किनारा दिखाई देने लगा और 15 मिनट पश्चात् अर्थात् प्रातः साढ़े दस बजे हम बाली द्वीप की प्रांतीय राजधानी देनपासार में उतर गए। यह एयरपोर्ट किसी बंदरगाह की तरह समुद्र तट पर बना हुआ है।

हवाई जहाज कुछ समय तक समुद्र के किनारे बने विशाल रनवे पर दौड़ता रहा। यह एक बहुत ही अद्भुत दृश्य था। राजस्थान में रेलगाड़ी और बसें रेगिस्तान के किनारों पर दौड़ती हैं और हम यहाँ समुद्र के किनारे सरपट भागे जा रहे थे। बाली का समुद्र बहुत शांत, साफ और निर्मल है जिसके किनारे नारियल के झुरमुट इसे बहुत आकर्षक बनाए हुए हैं। इस समुद्र के जल का रंग भी सहज ही आकर्षित करने वाला है।

खाली हाथ

इण्डोनेशिया में पर्यटकों के लिए वीजा निःशुल्क है तथा पर्यटकों के वहाँ पहुंचने पर ही हाथों-हाथ दिया जाता है। वीजा लेने, आव्रजन (इमीग्रेशन) की औपचारिकताएं पूरी करने तथा एयरपोर्ट अथॉरिटी से अपना सामान प्राप्त करने में हमें लगभग एक घण्टे का समय लग गया। इतना सब कर लेने के बाद भी हमारी हिम्मत एयरपोर्ट से बाहर निकलने की नहीं हो रही थी। इण्डोनेशियाई मुद्रा की दृष्टि से हम खाली हाथ जो थे।

हमारी जेब में भारतीय मुद्रा तथा अमरीकी डॉलर थे जिनकी व्यवस्था हमने दिल्ली में ही कर ली थी। चूंकि भारत में कानूनन इण्डोनेशिया की मुद्रा उपलब्ध नहीं होती, इसलिए हमें एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले इण्डोनेशियाई मुद्रा की व्यस्था करनी थी। सौभाग्य से एयर पोर्ट के निकास पर ही कुछ मनीचेंजर एजेंट बैठते हैं, उन्होंने हमारी चिंता दूर की।

देखते ही देखते मालामाल

भारतीय मुद्रा से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना घाटे का सौदा था। इसलिए हमने भारत में 64.54 रुपए की दर से अमरीकी डॉलर खरीद लिए थे। यहाँ हमें अमरीकी डॉलर से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना था। डॉलर में इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना लाभ का सौदा था। इस अल्टा-पल्टी में हमें भारत के 1 रुपए के बदले 205 इण्डोनेशियाई रुपए मिल गए।

हमने 700 डॉलर एक्सचेंज करवाये जिनके लिए हमने भारत में 45,178 रुपए चुकाये थे। यहाँ हमें 700 डॉलर के बदले 92 लाख 61 हजार 490 इण्डोनेशियाई रुपए प्राप्त हुए। भारत में 92 लाख रुपए की रकम बहुत बड़ी होती है। इतने रुपए में भारत में कोई आदमी पूरी जिंदगी निकाल सकता है जबकि हमें इण्डोनेशिया में केवल 10 दिन निकालने थे।

इस बड़ी राशि के बारे में सोचकर हमें बहुत ही अटपटा लग रहा था कि हमारी जेब में 92 लाख रुपए हैं। जो भी हो, हम देखते ही देखते मालामाल तो हो ही गए थे। बाली एवं जावा द्वीपों पर ग्यारह दिन हमें इसी राशि के बल पर बिताने थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप पर पांच दिन (18)

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मेंगवी गांव में बांस की खपच्चियों से टोकरियां बुनते हिन्दू!

इण्डोनेशिया देश में हमारी ग्यारह दिनों की यात्रा में से बाली द्वीप पर पांच दिन निर्धारित थे। वस्तुतः भारत के लोगों के लिए इण्डोनेशिया में सबसे बड़ा आकर्षण बाली द्वीप ही है।

पुतु से भेंट

अब हम एयरपोर्ट से बाहर जा सकते थे। हमने बाली द्वीप के मैंगवी नामक एक छोटे से गांव में अपना सर्विस अपार्टमेंट बुक कराया था जो देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। इसी अपार्टमेंट का मालिक पुतु स्वयं पर्यटकों को वाहन उपलब्ध कराता है तथा ड्राइविंग भी स्वयं ही करता है।

हमें आशा थी कि पुतु हमें लेने आएगा किंतु एयरपोर्ट पर हमें बहुत विलम्ब हो गया था, इसलिए मन में आशंका भी थी कि कहीं लौट नहीं गया हो किंतु सौभाग्य से पुतु, विजय तायल के नाम की कागज की पट्टी लिए एयरपोर्ट के बाहर ही खड़ा मिल गया।

यह एक अच्छे-खासे डील-डौल वाला लम्बा चौड़ा, हंसमुख और गौर-वर्ण नवयुवक था जिसने बड़े करीने से अपने बाल बना रखे थे और बेहद साफ सुथरे पैण्ट-शर्ट पहन रखे थे। उसने हमारा स्वागत दोनों हाथ जोड़कर तथा होठों पर लम्बी मुस्कान के साथ किया। उसने हमें नमस्ते कहा तथा हमसे हाथ भी मिलाया। उसके चेहरे से स्पष्ट ज्ञात होता था कि जितनी प्रसन्नता हमें उसे देखकर हुई है, उससे कहीं अधिक प्रसन्नता उसे अपने भारतीय अतिथियों को देखकर हुई है।

पुतु काफी बड़ी वातानुकूलित कार लेकर आया था जिसमें हम छः सदस्य मजे से बैठ सकते थे तथा हमारा सामान भी आराम से आ सकता था। हमारे भाग्य से वह अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह से समझ सकता था। उसने न केवल हमारा सामान अपनी कार के पिछले हिस्से में जमाया अपितु हमारे लिए कार के दरवाजे भी खोले। भारत में ऐसे विनम्र एवं अनुशासित टैक्सी चालक शायद ही देखने को मिलें।

पुतु ने कार स्टार्ट करते ही पूछा- क्या आप लोग हिन्दू हैं?

जब हमने कहा कि हाँ हम हिन्दू हैं, तो पुतु के चेहरे की मुस्कान और भी चौड़ी हो गई। उसने विनम्रता से कहा कि मैं भी हिन्दू हूँ तथा मेरी वाइफ भी हिन्दू है। ऐसा कहते समय उसके चेहरे पर गर्व और आनंद के जो भाव थे, उनका वर्णन किया जाना कठिन है, केवल कल्पना ही की जा सकती है। लगे हाथों उसने बता दिया कि उसकी पत्नी जिसका नाम पुतु एका है, पूरी तरह शाकाहारी है। मैं अभी शाकाहारी होने का प्रयास कर रहा हूं तथा सप्ताह में दो दिन चिकन या अन्य प्रकार का मांस नहीं खाता।

देनपासार एयरपोर्ट से मैंगवी गांव तक लगभग डेड़ घण्टे का समय लगने वाला था। अधिकांश मार्ग, देनपासार शहर से होकर जाता था। इस समय का उपयोग हमने शहर के बाजारों, घरों तथा सड़क के ट्रैफिक को देखने में किया।

शोर और गंदगी से पूरी तरह मुक्त

हमारे आश्चर्य का पार नहीं था। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक तो था किंतु वाहन चालकों में किसी तरह की भागमभाग, बेचैनी, प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी। सब अपनी लेन में चल रहे थे। दुपहिया वाहनों के लिए सड़क के बाईं ओर का हिस्सा निर्धारित था। कोई वाहन एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास नहीं कर रहा था। न कोई हॉर्न बजा रहा था। सड़कें पूरी तरह साफ थीं। कचरे का ढेर दिखाई देना तो दूर, कहीं कागज या पेड़ों के पत्ते तक दिखाई नहीं दे रहे थे। सड़कों के किनारे कचरापात्र लगे थे, लोग अपने हाथों का कचरा, कचरापात्रों में ही फैंकने के अभ्यस्त थे।

घास-फूस का दूध तीस हजार रुपए किलो

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हमने पुतु से पूछा कि क्या सर्विस अपार्टमेंट में दूध की व्यस्था हो जायेगी। तो उसने साफ कह दिया कि नहीं, यहाँ आपको कहीं भी दूध नहीं मिलेगा। आप चाहें तो पैक्ड मिल्क खरीद सकते हैं। हमें झटका तो लगा किंतु अन्य कोई उपाय नहीं था। एक जनरल स्टोर के सामने पुतु ने अपनी कार रोकी तथा हमें दूध खरीदने के लिए कहा। स्टोर में जाकर मुझे एक और बड़ा झटका लगा। मैं किसी भी तरह दुकानदार को यह नहीं समझा पाया कि मैं क्या खरीदना चाहता हूँ। न ही मैं स्वयं, स्टोर में दूध की थैलियां खोज सका। पुतु की कार मुझसे काफी दूर थी। इसलिए उसकी सहायता लेने के लिए मुझे काफी चलना पड़ता। अंत में एक अन्य ग्राहक ने मेरी बात समझी और मुझे एक फ्रिज में से कागज का एक डिब्बा दिखाया। मैंने डिब्बे को पढ़ा तो एक झटका और खा गया। यह न्यूजीलैण्ड से आया हुआ दूध था जिसका निर्माण वनस्पतियों, वनस्पति तेलों और कई तरह के प्रोटीनों से मिलकर हुआ था। मुझे विवश होकर यही दूध खरीदना पड़ा।

एक बड़ा झटका उस समय और लगा जब दुकानदार ने मुझसे एक लीटर दूध के लिए तीस हजार इण्डोनेशियन रुपयों की मांग की। मैंने तत्काल भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया कि यह डेढ़ सौ रुपया लीटर पड़ा। मुझे समझ में आने लगा था कि मालामाल हो जाने की खुशी अधिक समय तक टिकी नहीं रहने वाली है।

बीस हजार रुपए का नारियल

दूध की दुकान के बाहर पानी वाले नारियलों की एक थड़ी थी। पिताजी ने वहाँ से एक नारियल खरीदा। मैंने पूछा कितने रुपए दूं तो थड़ी पर बैठी औरत ने अपने गल्ले में से बीस हजार रुपए का नोट दिखाया। मैंने फिर भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया। यह 100 रुपए का था।

भारत में जहाँ पानी वाला नारियल 25-30 रुपए में मिल जाता है, बाली में यह 100 रुपए का था। बाली में वस्तुओं का मूल्य भारत की तुलना में कहीं अधिक था। इण्डोनेशियाई रुपयों के बल पर मालामाल होने का उत्साह अब काफी कम पड़ गया था। अब तो यह सोचना आरम्भ हो गया था कि बाली द्वीप पर पांच दिन बिताने के लिए क्या हमारी धनराशि पर्याप्त होगी?

मेंगवी गांव का वह कांच का बंगला

देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर मेंगवी गांव का सर्विस अपार्टमेंट देखते ही हमारी मंत्र मुग्ध होने जैसी स्थिति हो गई। यह एक शानदार छोटा सा बंगला था जिसके आरामदेह कमरों में बड़े-बड़े पलंग, सफेद सूती चद्दरें, आधुनिक शैली में बने शावर युक्त बाथरूम और आदमकद शीशों वाले ड्रेसिंग रूम तो मन को मोहते ही थे, साथ ही बंगले का बरामदा एक बड़े और खुले लॉन में खुलता था जो सीधा चावल के विशाल खेतों से जुड़ा हुआ था।

यहाँ शानदार बोगनविलिया और तरह-तरह के फूलों वाली झाड़ियां लगी हुई थीं जिनके बीच में बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां और सेंट्रल टेबल का प्रबंध किया गया था। बंगले में एयर कण्डीशनर, गीजर, इलेक्ट्रिक आयरन, वाई-फाई जैसी सारी आधुनिक सुख-सुविधाएं दिल खोलकर जुटाई गई थीं। बंगले का बाहरी बरामदा शीशे की दीवारों से बना हुआ था। यहाँ से बैठकर चावल के खेतों का दृश्य देखते ही बनता था। एक छोटी सी लाइब्रेरी का भी प्रबंध किया गया था।

इस बंगले की सबसे बड़ी विशेषता थी इसका रसोई-घर। यह भी आधुनिक शैली में बनी हुई रसोई थी जिसमें फ्रिज, कुकिंग गैस, रोस्टर, आर ओ से साफ किया गया पानी आदि सभी सुविधाएं मौजूद थीं। यदि इसमें कुछ नहीं था तो वे थे चकला, बेलन और तवा जिनका प्रबन्ध हम भारत से ही करके लाए थे। हमारे बाली द्वीप पर पांच दिन इसी बंगले में निकलने वाले थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप में पहला दिन (19)

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बाली के एक मंदिर प्रांगण में नुक्कड़ नाटक

14 अप्रेल 2017 को हम अपने सर्विस अपार्टमेंट में लगभग एक बजे पहुंच गए। इसी के साथ हमारा बाली द्वीप में पहला दिन आरम्भ हो गया। रास्ते में हमने एक सब्जी मण्डी देखी जिसे देखकर तबियत प्रसन्न हो गई और निर्णय लिया गया कि संध्या काल में इस सब्जी मण्डी से सब्जियां खरीदी जाएंगी।

हम लम्बी यात्रा की थकान से बुरी तरह थके हुए थे। इसलिए हमने बाली द्वीप में पहला दिन आराम करने, चाय पीने और लॉन में बैठकर चावल के खेतों को देखने में बिताया। पुतु ने हमें बताया कि कल बाली द्वीप पर हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। इसलिए वह अगले दिन थोड़ा विलम्ब से आएगा।

हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि हमें भी अपनी दैनंदिनी से निवृत्त होने और अपना भोजन तैयार करने में प्रातः के साढ़े दस तो बजने ही थे। हमें पुतु ने एक दुपहिया स्कूटर दे दिया ताकि हम यदि आसपास कहीं जाना चाहें तो जा सकें।

फूलों का अनोखा संसार

शाम के समय मैं और विजय, पुतु का दुपहिया स्कूटर लेकर तरकारी और दूध खरीदने के लिए उसी सब्जी मण्डी में पहुंचे जो प्रातः काल में हमने मैंगवी आते समय देखी थी। यह पुरा तमन अयुन टेम्पल का निकटवर्ती क्षेत्र था। हमारे लिए यह एक और झटका खाने वाला समय था। वहाँ सब्जी मण्डी नहीं थी, केवल फूलों की थड़ियां और दुकानें थीं, जिन्हें हम सुबह हरी सब्जियां समझ बैठे थे।

कई तरह के फूल, कई रंगों के फूल। चारों तरफ फूल ही फूल। प्राकृतिक रूप से उत्पन्न फूलों के साथ-साथ बांस की खपच्चियों से बने हुए दर्जनों प्रकार के फूल सजे हुए थे। ये सारे फूल हिन्दुओं के अगले दिन के बड़े त्यौहार में उपयोग लिए जाने हेतु बिकने आए थे।

मण्डी में भीड़-भाड़ थी किंतु हिन्दुस्तान की भीड़ की तुलना में कुछ भी नहीं। बहुत से लोग अपने परिवारों के साथ फूल खरीदने आए थे। वे फूल खरीदते थे, मोलभाव भी करते थे किंतु कहीं कोई बहस नहीं थी, कोई भी जोर-जोर से नहीं बोल रहा था। लोग आपस में हंस-बोल रहे थे किंतु एक शालीनता जैसे विद्यमान थी।

फल एवं सब्जी मण्डी की वे महिला दुकानदार

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फूलों की मण्डी से सटी हुई एक पतली गली थी जिसमें जाने पर हमें वास्तव में एक फल और सब्जी मण्डी दिखाई दी। इस मण्डी में भारत की तरह छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई थीं और लकड़ी के बने हुए ठेले भी देखे जा सकते थे। हमें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि वहाँ कई तरह के फल मौजूद थे किंतु यह देखकर मन उदास भी हुआ कि सब्जियां बहुत ही कम थीं। सेब थे किंतु चालीस से पचास हजार रुपए किलो अर्थात् भारतीय मुद्रा में दो सौ से ढाई सौ रुपए किलो। केले थे किंतु चार हजार रुपए का एक केला। अर्थात् भारतीय मुद्रा में बीस रुपए का एक केला। हजारों में भाव सुनकर ही मुझे पसीना आ जाता था। हालांकि भारतीय मुद्रा में हिसाब लगाकर कुछ तसल्ली मिलती थी, किंतु समस्त फल एवं सब्जियां भारत की तुलना में बहुत महंगी थीं। कुछ ठेलों पर सब्जियां थीं जिनमें आलू, प्याज, लौकी, पत्ता गोभी, बैंगन और तुरई ही प्रमुख थीं। एकाध सब्जियां स्थानीय प्रवृत्ति की थीं जिनके नाम पूछने पर भी हमें याद नहीं रहे। उनका उपयोग कैसे किया जा सकता था, यह जानने में तो हम पूरी तरह असफल रहे। क्योंकि समस्त दुकानदार जो कि शत-प्रतिशत महिलाएं थीं, अंग्रेजी का एक भी अक्षर नहीं जानती थीं। वे हमें बाट और रुपए दिखाकर समझाने का प्रयास करती थीं कि कितनी सब्जी के लिए हमें कितने रुपए देने पड़ेंगे।

हम जहाँ भी रुक जाते, आस-पास की दुकानों की महिलाएं भी उठकर हमारे पास आ जातीं। वे यह देखना और सुनना चाहती थीं कि हम तरकारी कैसे खरीदते हैं, उनकी बात को कैसे समझते हैं और हम किस प्रकार बोलते हैं!

सब्जी बेचने वाली उन महिलाओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता था कि वे बहुत निर्धन हैं, भारतीय सब्जी बेचने वाली महिलाओं से भी अधिक निर्धन। भले ही उनके द्वारा बोला जा रहा एक भी शब्द हमारे पल्ले नहीं पड़ रहा था किंतु उनकी वाणी और मुखमुद्रा हमें यह बता रही थी कि वे हमें अपने बीच पाकर प्रसन्न थीं और किसी न किसी बहाने से हमसे बात करना चाहती थीं।

हमने किसी तरह आलू, प्याज और टमाटर खरीदे तथा यह निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह आकर ताजी तरकारी खरीदेंगे। इसी के साथ हमारा बाली द्वीप में पहला दिन पूरा हो गया।

विदेशियों को पहचानने वाले कुत्ते

यद्यपि इस समय संध्या के सात ही बजे थे किंतु अंधेरा बहुत घिर आया था हम लौट पड़े। सर्विस अपार्टमेंट पहुंचते-पहुंचते तो गहरी रात हो गई। यद्यपि अभी साढ़े सात ही बजे थे। मार्ग में हमें यह भय भी लगा कि हमें विदेशी और असुरक्षित जानकर कोई हम पर आक्रमण न कर दे।

यद्यपि ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ, मैंगवी गांव के उन कुत्तों ने हमें फिर से पहचान कर भौंकना आरम्भ कर दिया था। कुत्तों की आंखें हमें स्पष्ट रूप से धमका रही थीं कि हम जानते हैं कि तुम विदेशी हो, इसलिए अपने अपार्टमेंट में ही रहो, इधर-उधर मत घूमो। मुझे याद आया कि भारत में भी गलियों के कुत्ते विदेशी पर्यटकों को देखकर इसी प्रकार भौंकते हैं। स्वयं के लिए विदेशी शब्द सोच पाना भी बड़ा अटपटा सा था।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

बाली द्वीप में दूसरा दिन (20)

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बाली द्वीप में दूसरा दिन

15 अप्रेल 2017 को दूसरे दिन प्रातः पांच बजे ही आंख खुल गई। आज हमारा बाली द्वीप में दूसरा दिन था। इस समय भारत में तो रात के ढाई ही बजे होंगे किंतु हमारे शरीर में लगी जैविक घड़ी ने स्थानीय समय से पूरी तरह से तालमेल बैठा लिया था। चावल के खेतों के बीच बने उस लॉन में पूरे परिवार के साथ बैठकर सुबह की चाय पीना, अपने आप में एक अलग ही अनुभव था। इसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

मैं और विजय जल्दी ही तैयार होकर, पुतु का स्कूटर लेकर प्रातः आठ बजे फिर से उसी सब्जी मण्डी की ओर चल पड़े ताकि दूध और तरकारी खरीदी जा सकें। इस शांत प्रातः बेला में चावल के खेतों के बीच से निकलना एक सुखद अनुभव था। सड़क के दोनों किनारों पर फलों से लदे हुए केले, पपीते, खजूर और नारियल के वृक्ष सहज ही ध्यान आकर्षित करते थे।

नृत्यलीन बारोंग

अभी हम कुछ दूर ही चले थे कि मार्ग में हमें एक जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। हमने स्कूटर सड़क के किनारे खड़ा कर दिया तथा उसकी तस्वीरें उतारने लगे। जुलूस के बीच कपड़े का एक विशालाकाय जानवर नृत्य कर रहा था जिसके मुंह पर वाराह (शूकर) का मुखौटा लगा हुआ था।

कपड़े के भीतर दो आदमी थे जो अपने हाथों और पैरों से इस प्रकार की भंगिमाएं बना रहे थे जिनसे वह विशालाकाय वाराह नृत्य करता हुआ दिखाई देता था और उसके गले में पड़ी पीतल की बड़ी सी घण्टी से सुमधुर ध्वनि निकल रही थी। उसके चारों ओर चल रहे कुछ श्रद्धालु अपने हाथों में ढोल, मंजीरे तथा स्थानीय वाद्य बजा रहे थे जिससे चारों ओर का वातावरण धार्मिक श्रद्धा से आप्लावित हो रहा था। एक महिला बांस की खपच्चियों पर कपड़े से बनी छतरी उठाए हुए एब शूकर के साथ चल रही थी।

हमें बताया गया कि यह बारोंग है जो धरती पर बुरी आत्माओं के सफाए के लिए आया है और घर-घर जाकर वहाँ से बुराइयों का सफाया कर रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार बारोंग एक बुरी ”रांग्डा” अर्थात् विधवा स्त्री से युद्ध कर रहा है जो समस्त बुराइयों की जड़ है। यह कथा जावा की राजकुमारी महेन्द्रदत्ता से भी जुड़ी हुई है जो बाली द्वीप की महारानी थी तथा उसी ने बाली द्वीप के आदिवासियों में हिन्दू धर्म का प्रचलन किया था।

एक क्षेपक के अनुसार रानी महेन्द्रदत्ता तंत्र-मंत्र करती थी इसलिए बाली के राजा धर्मोदयाना ने उसे अपने महल से निकाल दिया। वह जंगल में जाकर रहने लगी। राजा धर्मोदयाना के मरने पर रानी विधवा हो गई। इसे बाली में ”रांग्डा” कहा जाता है। यह शब्द उत्तर भारत में विधवा स्त्री के लिए मध्यकाल में प्रचलित ”रांड” शब्द से काफी मिलता जुलता है।

हमने देखा कि वह जुलूस बारी-बारी से प्रत्येक घर के सामने जाकर रुकता था, बारोंग का नृत्य और भी तेज हो जाता था तथा गृहस्थ लोग घर से बाहर आकर, जुलूस के साथ चल रहे पुजारी को रुपए देते थे। शूकर के नृत्य की भाव-भंगिमा तथा जुलूस के द्वारा बजाया जा रहा संगीत, दोनों ही अपने आप में विशिष्ट थे।

हमें याद आया कि पुतु ने बताया था कि आज हिन्दुओं का बड़ा त्यौहार है जिसे गुलंगान कहते हैं। हमें स्वतः स्पष्ट हो गया कि यह जुलूस गुलंगान का हिस्सा है। हमें ज्ञात हुआ कि वाराह के चेहरे वाले बारोंग की तरह बाघ तथा शेर के मिले जुले रूप वाला बारोंग भी आता है। वह शिव की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वह भी धरती पर से बुरी आत्माओं को नष्ट करने वाला माना जाता है।

स्वर्ग से आती हैं आत्माएं

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बालीवासी गुलंगान का त्यौहार अधर्म पर धर्म की विजय के उत्सव के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से पूर्वजों की आत्माएं भी उत्सव मनाने धरती पर आती हैं। इस त्यौहार की तुलना विश्व भर के हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाली दीपावली त्यौहार से की जा सकती है। हमें बताया गया कि यह उत्सव, मुख्य दिवस के तीन दिन पहले आरम्भ होकर मुख्य उत्सव के ग्यारह दिन बाद तक चलता है। मुख्य दिवस के तीन दिन पहले पेन्येकेबान मनाया जाता है। इस दिन हर हिन्दू के घर में केले का प्रसाद बनाकर देवता को अर्पित किया जाता है। अगले दिन अर्थात् मुख्य दिवस के दो दिन पहले पेन्याजान का आयोजन किया जाता है। इस दिन तले हुए चावलों का केक बनाकर देवताओं को अर्पित किया जाता है जिसे जाजा कहते हैं। इसके अगले दिन अर्थात् मुख्य त्यौहार से एक दिन पहले पेनाम्पाहान का आयोजन किया जाता है। इस दिन दावत का आयोजन किया जाता है जिसमें सूअर तथा मुर्गे काटे जाते हैं। मुख्य दिवस के अगले दिन परिवार के पुरुष सदस्य, बारोंग के साथ नाचते-गाते हुए जुलूस के रूप में घर-घर जाते हैं। गृहस्थ जन अपने घरों के आगे सजावट करते हैं तथा एक दूसरे के घर जाकर त्यौहार की बधाई देते हैं और मिठाई खाते हैं।

त्यौहार के आयोजन के दस दिन बाद विशेष रूप से सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन किया जाता है तथा स्वर्ग से धरती पर आई पूर्वजों की आत्माओं को विदाई दी जाती है। पूर्वज आत्माओं के जाने के एक दिन बाद लोग मौज-मस्ती करते हैं। हंसी-ठट्ठा होता है, आनंद मनाया जाता है। चूंकि बाली का परम्परागत कलैण्डर 210 दिन का होता है इसलिए यह त्यौहार हर दस माह बाद मनाया जाता है।

बांस ही बांस

हम थोड़ी दूर और गए तो हमारा ध्यान घरों के आगे लगे हुए लम्बे से बांस की ओर गया जो लगभग 15-20 फुट की ऊँचाई पर जाकर फिर से धरती की तरफ मुड़ता था। इन्हें पेंजोर कहा जाता है। प्रत्येक बांस रंगीन कपड़ों, कागजों और फूलों से ढंका हुआ था। बांस के साथ ही धरती से लगभग पांच-छः फुट की ऊंचाई पर बांस की खपच्चियों से बना हुआ लघु देवालय लटका हुआ था।

इसके भीतर देवता के प्रतीक के रूप में कोई प्रतिमा थी जिसके समक्ष कई रंगों के पुष्प, फल और अण्डे आदि रखे हुए थे। कुछ बांसों को तो इतनी अच्छी तरह से और इतने भव्य प्रकार से सजाया गया था कि दर्शक बांसों की कलाकृतियों को देखकर दांतों तले अंगुलियां दबा लें।

हम समझ गए कि हर घर के आगे की गई यह सजावट भी आज के गुलंगान त्यौहार की अभिन्न आयोजना है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि भारत में दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर कण्डीलों की सजावट की जाती है तथा रात्रि में दीप जलाकर देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। पेंजोर पर लगे इन्द्रब्लाका में भी रात्रि के समय दीप जलाकर प्रकाश किया जाता है।

सब्जी मण्डी में फिर से निराशा

हम लगभग 9.30 बजे सब्जी मण्डी पहुंचे किंतु तब तक सब्जी मण्डी खुली नहीं थी। एकाध दुकानें ही खुली थीं जिन पर फल रखे थे। हमने बाली द्वीप पर उत्पन्न होने वाले दो स्थानीय फल खरीदे जिनके नाम हम याद नहीं रख सकते थे। इनमें से पहला फल बाहर से लगभग भारतीय लीची की तरह दिखाई देता था किंतु इसके भीतर एक बड़ा सा बीज था जिसके चारों ओर पीले रंग का सुगंधित और मीठा गूदा था। इसमें से पके हुए कटहल के बीज की सी सुगंध आ रही थी।

दूसरा फल बाहर से तो चीकू की तरह दिखाई देता था किंतु उसके भीतर छोटे-छोटे बीजों वाला रसीला गूदा भरा हुआ था जो स्वादिष्ट तथा हल्का खट्टा था। चूंकि सब्जियां प्राप्त करना संभव नहीं था, इसलिए हम वे फल खरीद कर ही वापस लौट लिए। हमने कुछ जनरल स्टोर्स पर दूध का डिब्बा खरीदने का प्रयास किया किंतु वह किसी भी स्टोर पर उपलब्ध नहीं हुआ।

कौए की आकृति वाली पगड़ी

ठीक साढ़े दस बजे पुतु अपनी गाड़ी लेकर आ गया। आज वह कल वाली पोषाक में नहीं था। उसने स्थानीय परम्परागत वस्त्र धारण किये थे जो गुलंगान त्यौहार पर विशेष रूप से पहने जाते थे। उसने सफेद कोटनुमा एक शर्ट धारण कर रखी थी। कमर के नीचे विशेष शैली में बांधी हुई तहमद थी और सिर पर एक टोपी थी जिसमें आगे की ओर कुछ गांठें लगाकर ऐसी आकृति बनाई गई थी कि वहाँ किसी पक्षी के बैठे होने का आभास होता था। मैंने अनुमान लगाया कि इस पक्षी की आकृति भारतीय कौए से मिलती है।

दुर्गा पूजा

पुतु के साथ एक और दम्पत्ति आया था। महिला के हाथ में बांस की खपच्चियों से बनी हुई बड़ी सी टोकरी थी जिसमें बांस से बनी हुई छोटी-छोटी गोल थालियां रखी हुई थीं। इन थालियों में केला तथा सेब आदि फल, चावल से बनाई हुई दलिया जैसी कोई डिश और कई तरह के फूल रखे हुए थे। महिला ने बहुत ही सुसंस्कृत ढंग के आकर्षक कपड़े पहने हुए थे।

वह एक मंझले कद की गौर-वर्ण महिला थी जिसकी आयु कठिनाई से 25 साल रही होगी। उसने अपनी टोकरी में से एक गोल थाली निकाली और उसे लॉन के एक कौने में काले रंग के पत्थरों से बने एक मंदिरनुमा स्तम्भ के सबसे ऊपरी आले में रख दिया। फिर उसी आले के समक्ष दो अगरबत्तियां जलाईं तथा मंदिर के समक्ष हाथ जोड़कर अपना मस्तक झुकाया।

हमने देवालय के भीतर रखी पूजा की थाली में झांककर देखा तो हमें फूलों के बीच मुर्गी का भूरे रंग का एक अण्डा भी दिखाई दिया। हमने पुतु को बताया कि भारत में देवताओं की पूजा में अण्डा काम में नहीं लिया जाता। केवल पुष्प, फल एवं मिठाइयां अर्पित की जाती हैं।

नेपाल के हिन्दू भी, बाली के हिन्दुओं की तरह मुर्गी का अण्डा, भगवान की पूजा में चढ़ाते हैं। हमने उस महिला से जानने का प्रयास किया कि इस आले को क्या कहते हैं! किंतु वह अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थी। उसका पति भी अंग्रेजी नहीं जानता था। पुतु ने हमें बताया कि इस स्तम्भनुमा लघु देवालय को टुडुकरंग कहते हैं। यह प्रत्येक घर के भीतर, सामने वाले हिस्से में बना हुआ होता है। यह देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त है। देवी दुर्गा प्रत्येक घर की रक्षा करती हैं। यह पूजा उन्हीं के निमित्त हो रही है।

धरती माता की पूजा

टुडुकरंग की पूजा करने के बाद उस महिला ने पूजा की एक थाली, लॉन के एक कौने में नीचे धरती पर रखी तथा वहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं। इस गोल थाली में भी पहले वाली थाली के समान ही पूजन सामग्री रखी हुई थी। पुतु ने बताया कि पूजा की जो थाली धरती पर रखी गई है वह धरती माता की पूजा के लिए है, जो हर समय हमारी रक्षा करती है।

काल पूजन

अब बारी थी काल पूजन की। जिस प्रकार गृह परिसर में देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त टुडुकरंग बना हुआ होता है, ठीक उसी प्रकार बाली द्वीप पर प्रत्येक घर के बाहर, मुख्य द्वार के निकट कालराऊ बना हुआ होता है। यह भी काले पत्थर से निर्मित एक स्तम्भ देवालय होता है जिसमें काल की पूजा होती है। बाली में इसे मृत्यु का देवता माना जाता है। यह घर के मुख्य द्वार के साथ-साथ पूरी गली की रक्षा करता है।

मैंने अनुमान लगाया कि घर के भीतर दुर्गा का तथा घर के बाहर शिव का मंदिर है। भारत में भी शिव को महाकाल कहते हैं, वही महाकाल यहाँ आकर कालराऊ बन गया है। भारत में राऊ, राजा को कहते हैं। यहाँ भी पूजा करने वाली उस युवती ने कालराऊ के समक्ष बांस की एक थाली अर्पित की तथा दो अगरबत्तियां जलाईं। इस थाली में भी फल-फूल तथा चावलों से बनी हुई कोई डिश थी। कालराऊ के देवालय के बाद उसने पहले की ही तरह फल-फूलों से युक्त एक थाली धरती पर रखी तथा यहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं।

इन्द्राब्लाका

कालराऊ के बाद महिला ने पास ही लगे लम्बे बांस के साथ लटके लघु देवालय में पूजा की एक थाली अर्पित की। पुतु ने बताया कि इसे इन्द्राब्लाका कहते हैं। यह इन्द्र भगवान की पूजा के निमित्त बनाया गया है। भगवान इन्द्र पूरे मौहल्ले की रक्षा करते हैं। गुलंगान के त्यौहार पर लगने वाले बांस पर तो इन्द्राब्लाका बनाया ही जाता है, यह प्रत्येक मौहल्ले भी स्थाई रूप से रहता है। 

सातू को पहचाना पुतु ने

हमने सर्विस अपार्टमेंट परिसर में बने मंदिरों में पूजा करने आई उस महिला, उसके पति एवं पुतु को लड्डू खाने के लिए दिए जो हम भारत से अपने साथ बनाकर ले गए थे। वे तीनों, इस भारतीय मिठाई को खाकर बड़े प्रसन्न हुए। हमने उनके चेहरों की प्रसन्नता से अनुमान लगाया कि उनके लिए यह क्षण किसी उत्सव से कम नहीं था।

लड्डू खाने के बाद पुतु ने हमें बताया कि इण्डोनेशिया में इस डिश को सातू कहा जाता है। मुझे स्मरण हुआ कि राजस्थान में तीज के अवसर पर जो सातू बनाया जाता है, उसे लड्डू की तरह ही बांधा जाता है। पुतु ने इसे वही सातू समझा था।

आज बाली द्वीप में दूसरा दिन प्रातःकाल से ही बाली की संस्कृति के दर्शन करवाने में जुट गया था।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

तमन राम सीता (21)

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तमन राम सीता

तमन राम सीता में भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं।

दुर्गा और इन्द्र का पूजन देखने के बाद हम लोग पुतु के साथ तमन अयुन पुराडेसा के लिए रवाना हो गए। मार्ग में सड़क के किनारे एक पार्क दिखाई दिया जिसमें खड़ी हल्के नीले रंग की दो प्रतिमाएं दूर से ही दिखाई दे रही थीं। हमने पुतु से अनुरोध किया कि वह गाड़ी रोके।

तमन राम सीता

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यह स्थान तमन राम सीता कहलाता है। यहाँ भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं। भगवान राम और देवी सीता की इतनी सुंदर, इतनी भव्य एवं इतनी विलक्षण प्रतिमाओं का वर्णन करना कठिन है। दोनों प्रतिमाओं को विविध प्रकार के आभूषणों से अलंकृत किया गया है जिन पर सुनहरी रंग किया गया है जिसके कारण प्रतिमाओं का आकर्षण कई गुना बढ़ गया है। सीता अभय मुद्रा में हैं और राम इस मुद्रा में खड़े हैं मानो बाली द्वीपवासियों को सम्बोधित कर रहे हों! भगवान के रथ के अश्वों को भी स्वर्णिम आभा युक्त आभूषणों से सजाया गया है। रथ में आगे की ओर एक सारथी है जो रथ के जुए के ठीक मध्य में बैठा है और अश्वों को हांक रहा प्रतीत होता है। उसके निकट एक योद्धा हाथ में तलवार और ढाल लिए बैठा है। वह इतना जीवंत है, मानो अभी राक्षसों पर अपने हथियार लेकर टूट पड़ेगा। इन प्रतिमाओं के निकट एक काले ग्रेनाइट पर बड़े-बड़े अक्षरों में रोमन लिपि में लिखा है- तमन राम सीता।

गदाधारी भीम

तमन राम सीता से थोड़ी ही दूरी पर तमन अयुन पुराडेसा स्थित है। यह मंदिर एक दोहरे परकोटे के भीतर स्थित है। बाहरी परकोटा इतना बड़ा है मानो इसके भीतर पूरा नगर समाया हो। इस परकोटे के प्रवेश द्वार पर राम सीता की प्रतिमा की शैली की ही एक विशाल प्रतिमा स्थित है। यह भी हल्के नीले रंग की प्रतिमा है जिसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है।

महाबली भीम के कंधे पर भारी-भरकम गदा, सिर पर मुकट, शरीर पर कवच तथा वस्त्र, सभी कुछ विलक्षण शैली में बने हुए हैं। यहाँ भी आभूषणों को सुनहरे रंग से पोता गया है, जिससे उनकी आभा कई गुणा बढ़ गई है। इस प्रतिमा के अंग सौष्ठव पर विशेष ध्यान दिया गया है जिससे भीम के महाबली होने का अनुमान स्वतः ही हो जाता है।

द्वार पाल युग्म

तमन अयुन पुराडेसा के बाहरी परकोटे के मुख्य द्वार के दोनों ओर (दाईं और बाईं) तथा दोनों तरफ (बाहर और भीतर) विशिष्ट शैली में द्वारपाल की प्रतिमाएं खड़ी दिखाई देती हैं। इनके मुख, भारत की कथकली नृत्य-कलाकारों के मुखौटों जैसे चौड़े और फैले हुए हैं जबकि मुख के भाव विकराल एवं उग्र हैं।

इनके एक कंधे पर भारी-भरकम दण्ड बना हुआ होता है जो इनके द्वारपाल होने का साक्ष्य देता है। बाली में एक भी ऐसा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का स्थान, मंदिर अथवा धार्मिक स्थल नहीं होगा जहाँ मुख्य द्वार पर यह द्वारपाल युग्म दिखाई नहीं दे।

हमने अनेक मंदिरों में भीतरी परिसर में भी जहाँ-तहाँ इन द्वारपाल प्रतिमाओं को खड़े हुए देखा। वस्तुतः ये भैंरव हैं। एकाध स्थान पर तो हमने इन्हें काले एवं सफेद रंग में भी देखा, ठीक वैसे ही जैसे भारत में काला और गोरा भैंरू पाए जाते हैं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

तमन अयुन पुराडेसा (22)

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तमन अयुन पुराडेसा
तमन अयुन पुराडेसा

तमन अयुन पुराडेसा में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत की गई है।

तमन अयुन पुराडेसा मंदिर में प्रवेश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को बीस हजार इण्डोनेशियन रुपए मूल्य का टिकट खरीदना होता है। हमने पांच टिकट खरीदे इसलिए एक लाख रुपए खर्च हो गए। यदि यह मुद्रा हमसे भारतीय रुपए में ली जाती तो हमें पांच सौ रुपए देने पड़ते जो कि इतने नहीं अखरते किंतु एक लाख रुपए सुनकर हमारा मन बैठ गया।  

यह बाली के प्राचीन राजवंश का मंदिर है। इसके भीतर प्राचीन झौंपड़ीनुमा मंदिर बने हुए हैं। ये एक मंजिल से लेकर ग्यारह मंजिले तक हैं तथा इन्हें मेरू कहा जाता है। इनकी ऊंचाई लगभग चालीस-पचास फुट है। आधार वाली झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे चौड़ा होता है, इसके ऊपर हर मंजिल की चौड़ाई कम होती जाती है। सबसे ऊपर की झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे कम चौड़ा होता है। इनके छज्जों पर काले रंग की लम्बी-लम्बी घास जैसी सजावट की गई है।

 पर्यटकों को बाहर से ही मंदिर देखने की अनुमति है। पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य मंदिर परिसर के चारों ओर एक पक्का गलियारा बनाया गया है। पर्यटक इस गलियारे में चारों ओर घूम कर मंदिर के बाहरी हिस्से में बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के चित्र उतार सकते हैं। मंदिर परिसर में कुछ लोग समूह के रूप में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह एक सुंदर प्राकृतिक स्थान है तथा सघन वनस्पति से आच्छादित है।

जनजीवन की झांकी

तमन अयुन मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप स्थित है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक एवं जन-जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। एक दृष्य में दो पुरुष मुर्गा लड़ाते हुए दिखाए गए हैं तथा दो मनुष्य उन्हें मुर्गा लड़ाते हुए देख रहे हैं।

इनमें से एक धनी मनुष्य कुर्सी पर बैठा है जिसने हाथ में चिलम जैसी कोई चीज उठा रखी है। दूसरा व्यक्ति हाथ ऊपर करके लड़ाई प्रारम्भ करने का संकेत कर रहा है। एक तरफ बैलों की एक जोड़ी है जिसके कंधों पर हल रखा हुआ है। इनमें से एक बैल काले रंग का है और दूसरा बैल सफेद रंग का है। पास ही एक नृत्यांगना नृत्य की मुद्रा में है।

देव प्रतिमाओं का खुला संग्रहालय

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तमन अयुन पुराडेसा मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर सैंकड़ों प्रतिमाएं रखी हुई हैं जिनमें से पत्थर से निर्मित बहुत सी प्रतिमाएं सैंकड़ों साल पुरानी प्रतीत होती हैं तो क्ले से निर्मित कुछ प्रतिमाएं आधुनिक काल की हैं। इन मूर्तियों के हाथों में तरह-तरह के पुष्प, वाद्ययंत्र एवं अस्त्र-शस्त्र लगे हुए हैं। बहुत सी अप्सराओं के वस्त्र भारतीय तथा यूनानी देवियों से मिलते-जुलते हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं पंखों वाले सिंहों की हैं तो कुछ प्रतिमाएं पंखों वाली अप्सराओं की भी हैं। यहाँ स्थित बहुत सी मनुष्याकार प्रतिमाओं चेहरे मनुष्यों जैसे होते हुए भी बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों से मिलते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरे वाले मनुष्य पाए जाते होंगे! ऐसे मनुष्यों की आकृतियां हमने बाली द्वीप पर और भी कई स्थानों पर देखीं। उबुद वानर वन में ऐसी मूर्तियों का खुला संग्रहालय ही प्रतीत होता है। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र, सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां, चेहरे फूले हुए, नाक गोल एवं मोटी, होंठों के भीतर स्थित बड़े-बड़े दांत, मांसल भुजाएं, पुष्ट जंघाएं तथा चेहरों पर हंसी दिखाई देती है।

गोल आंखों वाले देवता

मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर छोटे चबूतरे बने हुए हैं जिन पर तरह-तरह की आकृतियों एवं आकारों वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं। इनमें से कुछ देवताओं की आंखे गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। ये अत्यंत प्राचीन जान पड़ती हैं, लगभग एक हजार साल पुरानी भी हों तो आश्चर्य नहीं। इन मूर्तियों के माध्यम से मूर्तिकार, भविष्य के मानवों के लिए क्या संदेश छोड़कर गए, कुछ कहा नहीं जा सकता! पत्थर-नुमा जिन चबूतरों पर ये मूर्तियां खड़ी हैं, वे भी बहुत पुराने हैं। कुछ चबूतरों पर रखी मूर्तियां वर्षा, आंधी एवं समय के थपेड़ों से घिस-टूटकर, भारत में रखे जाने वाले शिवलिंगों की तरह, गोल-लम्बी पिण्डियों में बदल गई हैं।

दीपा की शैतानियां

मंदिर परिसर में ही रंग-बिरंगे पक्षियों का एक छोटा सा चिड़ियाघर बना हुआ है। अलग-अलग आकार और रंगों वाले पक्षी अपने-अपने पिंजरे में भांति-भांति की किल्लोल कर रहे थे। मेरी डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा इन पक्षियों को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। सभी पक्षी अलग-अलग प्रकार की आवाजें निकाल रहे थे। दीपा ने भी पक्षियों की नकल उतारने का प्रयास किया तथा अपने हाव-भाव से हमें यह समझाने का प्रयास किया कि देखो यहाँ कितनी तरह के पक्षी हैं।

बाली वासियों से दोस्ती

हम बड़ी कठिनाई से दीपा को पक्षियों वाले खण्ड से निकाल कर बाहर लाए। यहाँ कुछ पुरुष और महिलाएं एक तरफ छाया में बैठकर बांस की खपच्चियों की टोकरियां बुन रहे थे। दीपा ने इस तरह का काम होते हुए पहली बार देखा था। वह गोद से उतरकर उन लोगों की तरफ भाग गई और टोकरी बुनने वाली एक महिला की गोद में जाकर बैठ गई।

उसने अपनी अटपटी शब्दावली में उन लोगों से बात करने का प्रयास किया मानो पूछना चाहती हो कि इतनी सुंदर टोकरियां आप कैसे बुन लेती हैं! हम भी हैरान थे, वातावरण का बच्चों पर कितना शीघ्र और कितना गहरा प्रभाव होता है!

रंगीन घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां

 मंदिर से बाहर निकले तो हमने मंदिर के बाहर एक अच्छा-खासा मेला लगा हुआ पाया। यह मेला गुलंगान के अवसर पर लगा था। इसका स्वरूप किसी भारतीय मेले जैसा ही दिखाई देता था किंतु इसमें बिकने वाली सामग्री भारतीय मेलों की अपेक्षा बहुत अलग थी। इसमें रंग-बिरंगे घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं, मछलियां और कई प्रकार के पक्षियों के चूजे बिकने आए थे।

इनमें से बहुत से पक्षी एवं मछलियां प्राकृतिक तौर पर ही चटख रंगों की थीं किंतु अधिकांश घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां कृत्रिम रूप से रंगे गए थे। दीपा ने जब उन्हें देखा तो उसकी प्रसन्नता का पार न रहा। दीपा को वे सब पक्षी, घोंघे और कछुए खेलने के लिए चाहिये थे और हम उनमें से एक भी दिलवाने को तैयार नहीं थे।

काफी देर तक छोटी चिड़ियाओं के एक पिंजरे को ध्यान से देखते रहने के बाद दीपा ने उनकी ही तरह चीं-चीं की आवाज लगानी शुरु कर दी। तमन अयुन पुराडेसा का भ्रमण याद रखने वाला बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तनाहलोट मंदिर (23)

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तनाहलोट मंदिर

तमन अयुन टेम्पल देख लेने के बाद हम पुतु के सथ तनाहलोट मंदिर के लिए रवाना हुए। यह मेंगवी से लगभग एक घण्टे की दूरी पर है। लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट हिन्दू मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है।

दोपहर हो चुकी थी। इसलिए हमने पुतु से कहा कि किसी ऐसे स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ बैठक हम भोजन कर सकें। भोजन हमने प्रातः अपने सर्विस अपार्टमेंट में बनाकर अपने साथ ले लिया था। पुतु ने एक हरे-भरे स्थान पर सड़क के किनारे बने छपरे के नीचे गाड़ी रोकी।

यहाँ लकड़ी की दो चौकियां रखी हुई थीं। हमने उन्हीं पर बैठकर भोजन किया। यह एक अच्छी-खासी पिकनिक मनाने जैसा था। पास ही दो ठेले वाले खड़े थे जिन पर कुछ तरकारी और फल बिक रहे थे। उन दोनों ठेलों को एक ही महिला देख रही थी। जब हम भोजन करने बैठे तो वह महिला यह देखने के लिए हमारे पास चली आई कि हम क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं! यह ठीक वैसी ही उत्सुकता थी जैसी भारत के लोग सड़कों पर चलते फिरंगियों को देखकर व्यक्त करते हैं।

प्याज बेचने वाले की नीयत में खराबी

भोजन करने के बाद हमने वहाँ खड़े एक ठेले पर जाकर देखा। वहाँ सब्जी के नाम पर केवल प्याज थी, वह भी बहुत छोटे आकार की। मैंने बड़ी कठिनाई से उससे समझा कि प्याज क्या भाव है। महिला ने मुझे एक किलो का बाट और बीस हजार रुपए निकालकर दिखाये। सौ रुपए किलो के भाव की छोटी प्याज थी तो अखरने वाली किंतु मैंने खरीदने का निर्णय लिया।

जब महिला प्याज तोल चुकी, ठीक उसी समय उसका पुरुष साथी (संभवतः पति) वहाँ आया और उसने मुझे कैलकुलेटर पर टाइप करके बताया कि इस प्याज के लिए 40 हजार रुपए लगेंगे। मैंने अस्वीकृति में सिर हिलाया और तुली हुई प्याज वहीं छोड़ दी। महिला मुझ पर बहुत नाराज हुई और उसने मुझसे ईडियट कहा।

संभवतः अंग्रेजी का एक यही शब्द था जिसे वह जानती थी और न जाने कब उसने किससे सीखा होगा! संभवतः वह समझ ही नहीं सकी थी कि उसके पति ने क्य बदमाशी की थी! मैं महिला की तरफ देखकर मुस्कुराया और पुतु की गाड़ी में बैठ गया। 

तनाहलोट मंदिर के लिए तीन लाख रुपए के टिकट

लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है। पुतु ने हमें बताया कि यहाँ टिकट लेकर प्रवेश करना पड़ता है।  प्रत्येक व्यक्ति के लिए साठ हजार रुपए का टिकट था।

हमें पांच टिकट लेने पड़े इसलिए तीन लाख रुपए व्यय हो गए। यह एक विचित्र अनुभव था। भारत में किसी भी मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लेना पड़ता किंतु इण्डोनेशिया सरकार, देशी-विदेशी पर्यटकों से मंदिरों में प्रवेश के लिए भी इतना टिकट ले रही थी। संभवतः इण्डोनेशियाई सरकार की आय में पर्यटन से होने वाली आय बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। या फिर मुस्लिम देश होने के कारण हिन्दू मंदिरों पर टिकट लगाया गया है।

बाली, जावा और चीन के व्यापारियों का अनोखा संसार

तनाहलोट मंदिर परिसर का आरम्भ एक भव्य और विशाल तोरण द्वार से होता है जिसकी ऊपर की ताकों में पीताम्बरधारी लम्बे दाढ़ी वाले ऋषि की मूर्ति स्थापित हैं। तोरण द्वार से लेकर समुद्र तट तक पहुंचने के लिए हमें लगभग एक किलोमीटर चलना पड़ा। इस पूरे मार्ग में बाली, जावा तथा चीन के सैंकड़ों व्यवसायी दुकानें लगाए हुए बैठे हैं। इन दुकानों पर हिन्दू देवी-देवताओं की एक से बढ़कर एक पेंटिंग देखी जा सकती हैं। चटखीले रंग, तीखे नाक-नक्श और भाव पूर्ण मुद्राओं में अंकित हिन्दू देवी-देवताओं का यह संसार, धरती से नितांत विलग ही दिखाई देता है।

छः लाख रुपए के 10 रुद्राक्ष

यहाँ भी वस्तुओं के दाम भारत की तुलना में कई गुना अधिक थे। हमने एक चीनी दुकान पर लगभग 10 रुद्राक्षों की एक माला के दाम पूछे जिसे कड़े की तरह हाथ की कलाई में पहना जाता है। भारत में यह माला अधिक से अधिक 20 रुपयों में खरीदी जा सकती है किंतु वहाँ हमें इस माला का दाम छः लाख इण्डोनेशियन रुपए अर्थात् तीन हजार भारतीय रुपए बताया गया। यहाँ भी नारियल 20 हजार इण्डोनेशियन रुपए में बिक रहा था।

ज्ञान मुद्रा में सरस्वती

इस बाजार में सरस्वती की श्वेत रंग की एक मनुष्याकार प्रतिमा भी बिकने के लिए आई थी जिसे देखकर कोई भी भारतीय दंग रह जाए। बाली शैली की इस प्रतिमा में देवी सरस्वती एक कमल पुष्प पर खड़ी हैं जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वेद, तीसरे हाथ में बिंजौरा का पुष्प और चौथा हाथ ज्ञान मुद्रा में है। देवी के पैरों के पास हंस पंख खोले खड़ा है।

विशिष्ट शैली का द्वार

जहाँ सड़क समाप्त हुई, वहीं से समुद्र तक जाने के लिए सीढ़ियों का सिलसिला आरम्भ हो गया। ठीक यहीं पर बाली की विशिष्ट शैली का प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस द्वार के दोनों तरफ के स्तंभों की बनावट इस प्रकार की होती है मानो किसी शिखरबंद मंदिर को ठीक बीच में से चीर कर दोनों हिस्सों को सड़क के दानों किनारों पर सरका दिया गया हो। इस द्वार पर भी बांस की भव्य सजावट है।

भारतीय ऋषि की प्रतिमा

यहाँ समुद्र के किनारे कुछ छोटे-छोटे स्तंभों पर विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। इनमें से एक प्रतिमा जटाजूट-धारी भारतीय ऋषि की जान पड़ती है जिसके गले एवं भुजाओं में मोटे-मोटे रुद्राक्ष पड़े हुए हैं। उसके एक हाथ में फूल और एक हाथ में देवता के समक्ष बजाई जाने वाली हाथ की घण्टी है। ऋषि प्रतिमा के सिर पर एक गोल टोपनुमा मुकुट है। आज किसी श्रद्धालु ने इस ऋषि प्रतिमा को पीताम्बर धारण करवा दिया था जिससे प्रतिमा की शोभा कई गुणा बढ़ गई प्रतीत होती थी।

समुद्र ने मनाया तनाहलोट मंदिर में गुलंगान

जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमें ज्ञात हुआ कि इस समय समुद्र में ज्वार आया हुआ है इसलिए मंदिर तक जाने की अनुमति नहीं है। हमें  द्वीप की मुख्य भूमि पर खड़े रहकर, लगभग 100 मीटर दूर स्थित टापू पर स्थित तनाहलोट मंदिर को देखकर संतोष करना पड़ा। समुद्र की लहरें उस टापू से टकराकर लौट रही थीं। ऐसा लगता था मानो समुद्र भी गुलंगान त्यौहार पर, मंदिर की सीढ़ियों और दीवारों का स्पर्श करने के लिए चला आया था। समुद्र के इस प्रकार अड़ंगा लगा देने के कारण हमें लगा मानो तीन लाख रुपए के टिकट व्यर्थ ही चले गए।

तनाहलोट मंदिर में नहीं मिला पवित्र जल

पुतु ने हमें कहा कि जब आप समुद्र में होकर तनाहलोट मंदिर तक जाएं तो वहाँ से पवित्र जल लेकर अपने ऊपर छिड़कें तथा अपने साथ भी लेकर आएं। यह ठीक वैसा ही था जैसा भारत के लोग नदियों में स्नान के लिए जाते समय करते हैं तथा गंगाजल अपने साथ लेकर आते हैं। अब चूंकि हम मंदिर तक पहुंच ही नहीं सके थे, इसलिए पवित्र जल प्राप्त करना भी संभव नहीं रह गया था।

समुद्र किनारे सामूहिक पूजन

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जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमने वहाँ लगभग 150 फुट लम्बे, 40 फुट चौड़े एवं लगभग 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर शानदार पीले रंग की छतरियां तनी हुई देखीं जो वहाँ स्थाई रूप से बने छोटे-छोटे लगभग दो-ढाई फुट ऊंचे देवालयों के ऊपर तानी गई थीं। इन लघु देवालयों के समक्ष केले एवं नारियल के पत्तों एवं बांस की बनी हुई छोटी-छोटी ट्रे अथवा थाली में पूजन सामग्री अर्पित की गई थी। इस पूरे चबूतरे को एक शानदार लम्बे पीले रंग के कपड़े से चारों ओर से ढंका गया था। इसके समक्ष सैंकड़ों नर-नारी परम्परागत नए परिधानों में सज-धज कर बैठे थे। कुछ पुजारी मंत्रों का उच्चारण करते हुए श्रद्धालुओं पर पवित्र जल का छिड़काव कर रहे थे। इस पूरे वातावरण में पीला और श्वेत रंग ही छाया हुआ था। सभी पुरुष सुखासन में अर्थात पालथी मार कर बैठे थे। अधिकांश महिलाएं भी उन्हीं की तरह सुखासन में विराजमान थीं किंतु कुछ महिलाएं बौद्ध भिक्षुओं की तरह घुटने मोड़कर, घुटनों और पंजों के सहारे उकड़ूं बैठी थीं। इस सामूहिक पूजन को देखना अत्यंत रोमांचकारी था।

सारा काम बिना किसी आवाज के, बिना किसी भागम-भाग और चिल्ल-पौं के हो रहा था। यहाँ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर नहीं आए थे। पुरुषों ने पुतु जैसी टोपियां पहनी हुई थीं जिनके आगे के हिस्से को गांठें लगाकर भारतीय कौए जैसी आकृति दी गई थी।

पूजन क्षेत्र लोहे की जाली से घिरा हुआ था। इसके चारों ओर सैंकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक घूम रहे थे, किंतु श्रद्धालु जन उनकी तरफ से नितांत निश्चिंत थे। इस जाली के बाहर बहुत सी स्त्रियां अपने स्टॉल लगाकर खड़ी थीं जहाँ पूजा की थालियां बेची जा रही थीं।

हाथ जोड़कर नमस्कार

तनाहलोट मंदिर बैठकर पूजा कर रहे सभी स्त्री-पुरुष, देव पूजन के बीच-बीच में दोनों हाथ जोड़कर तथा उन्हें अपने माथे से लगाकर देवताओं को नमस्कार कर रहे थे, नमस्कार की यह मुद्रा ठीक वैसी ही थी, जैसी कि भारतीय हिन्दू, मंदिरों में देवताओं को प्रणाम करते हैं।

कुता में खरीददारी

अभी सायं के चार बजे थे किंतु धूप की चमक कम होने लगी। हम भी थकान का अनुभव कर रहे थे। इसलिए हमने मैंगवी लौटने का निर्णय लिया। यह मार्ग कुता से होकर जाता था जो बाली द्वीप के मुख्य नगरों में से एक है। हमने पुतु से कहा कि किसी बड़े जनरल स्टोर पर चले ताकि हम कुछ तरकारी और दूध खरीद सकें।

यदि हम भारत में होते तो अब तक तो मार्ग में दो-तीन बार चाय पी चुके होते किंतु यहाँ ऐसी कोई दुकान नहीं थी जिस पर चाय बिकती हो। तबनन क्षेत्र में एक रेस्टोरेंट में कॉफी थी किंतु वह भी बिना दूध-चीनी की। इसे पीना हमारे लिए न तो संभव था और न आनंददायक।

काफी देर चलने के बाद कुता में एक बड़े मॉल के सामने पुतु ने गाड़ी रोकी। पुतु के हिसाब से यह एक मॉल था किंतु भारत के हिसाब से यह एक मध्यम आकार के जनरल स्टोर से अधिक कुछ भी नहीं था। यहाँ हमें कई तरह की हरी तरकारियां देखने को मिलीं। आलू, प्याज, टमाटर, दूध, फल भी प्रचुर मात्रा में थे। वहाँ कई तरह की प्याज और आलू रखे हुए थे जिनके कंटेनर पर लगे लेबल पर उसके भाव के साथ-साथ उस देश का नाम भी लिखा हुआ था जहाँ से वह तरकारी आई थी।

यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि अधिकांश तरकारी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा मुम्बई से आई थी। यहाँ तक कि केले भी विदेशी थे। बाली द्वीप के केले आकार में बहुत छोटे, स्वाद में खट्टे-मीठे और अपेक्षाकृत कम मुलायम थे। सेब कई प्रकार का था और विश्व के अनेक देशों से मंगाया गया था। विदेशों से आई हुई यह सारी तरकारी और फल, भारत की अपेक्षा कई गुना अधिक दामों पर उपलब्ध थी।

हमने आगे के दिनों के हिसाब से तरकारी और दूध के डिब्बे खरीद लिए। दूध के इन डिब्बों पर दुधारू पशुओं चित्र बने हुए थे किंतु उनमें मिल्क पाउडर के साथ-साथ कई तरह के प्रोटीन और वनस्पति तेल भी मिले हुए थे।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

गुलंगान पर्व के शानदार जुलूस (24)

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गुलंगान पर्व

गुलंगान पर्व इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय पर्व जैसा है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में दीपावली का त्यौहार। गुलंगान पर्व को भारत में मृतक लोगों की आत्मा की शांति हेतु मनाए जाने वाले श्राद्ध पक्ष तथा वसंत पंचमी का मिला-जुला रूप माना जा सकता है।

बांस के कण्डील

अभी हम कुता शहर में कुछ दूर चले थे कि हमें महिलाओं का एक जुलूस सड़क पर चलता हुआ दिखाई दिया। हमारे अनुरोध पर पुतु ने गाड़ी सड़क पर एक तरफ लगा दी और हम जुलूस देखने के लिए नीचे उतर गए। यह एक शानदार जुलूस था जिसमें मुख्यतः महिलाएं ही भाग ले रही थीं। इन महिलाओं ने अनिवार्य रूप से लम्बी सफेद कमीज तथा काले रंग की तहमद पहन रखी थी। सभी महिलाओं ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट पर लाल रंग के कपड़े का फेंटा बांध रखा था।

सभी महिलाओं के सिर पर बांस की खपच्चियों से बने हुए कंदील थे जिनके ऊपरी हिस्से में दीपक का प्रकाश जगमगा रहा था। ताजा बांस से निर्मित होने के कारण ये कंदीलें पीले रंग की दिखाई देती थीं तथा इन पर फूलों से सजावट भी की गई थी। ऐसा प्रतीत होता था कि ये कंदील किसी देवता के देवालय थे तथा इन देवताओं की शोभायात्रा निकाली जा रही थी। ये गुलंगान पर्व के कण्डील थे।

शोभा यात्रा में सम्मिलित समस्त महिलाओं का शरीर सधा हुआ, कमर सीधी, गर्दन तनी हुई तथा चाल मंद थी। जुलूस के अगले हिस्से में एक महिला सफेद कमीज के नीचे सफेद तहमद धारण करके आई थी। उसके साथ एक पुरुष भी चल रहा था, उसने भी सफेद कमीज तथा सफेद तहमद धारण कर रखी थी। ये दोनों इस शोभायात्रा में धार्मिक महत्व रखने वाले पुजारी अथवा ओझा जैसे प्रतीत हो रहे थे।

इस शोभायात्रा के साथ कुछ ऐसी महिलाएं भी चल रही थीं जिन्होंने अपने सिर पर कंदील-नुमा देवालय नहीं उठा रखे थे। उनकी पोषाक की शैली तो वही थी किंतु उनकी कमीज, तहमद तथा फेंटे के रंग अलग थे। शोभायात्रा के अग्रभाग में कुछ पुरुष लाल रंग के दो छत्र उठाए चल रहे थे जैसे कि भारत में रामनवमी, अग्रसेन जयंती एवं चेटीचंड के जुलूसों में देखने को मिलते हैं।

शानदार संगीतमय जुलूस

कंदील वाली महिलाओं की शोभायात्रा जैसे ही हमारे सामने से आगे बढ़ गई, हमें कुछ दूरी पर सड़क पर चलता हुआ एक शानदार संगीतमय जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। इसमें केवल पुरुष और बच्चे सम्मिलित थे। कुछ छोटी लड़कियां भी अपने पिताओं की अंगुली पकड़ कर इस जुलूस में चल रही थीं। पुरुषों और लड़कों ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट तथा सफेद रंग की ठीक वैसी ही टोपी पहन रखी थी जैसी टोपी सुबह से पुतु धारण किये हुए था और जिसके स्थान पर भारतीय कौआ बैठे हुए होने का आभास होता था।

पुरुषों तथा लड़कों ने एक विशेष शैली में तहमद बांध रखी थी। यह तहमद दो लड़ी थी। अर्थात् एक तहमद के ऊपर दूसरी तहमद बांधी हुई थी। नीचे वाली तहमद अधिक लम्बी थी तथा ऊपर वाली तहमद कम लम्बी थी। इस कारण दोनों तहमदें आसानी से दिखाई दे रही थीं।

इनमें से एक तहमद प्रायः सफेद रंग की थी तथा दूसरी तहमद पीले अथवा लाल-पीले और सफेद-काली चौकड़ियों के कपड़े से बनी हुई थी। बाली के हिन्दुओं के लिए सफेद-काली चौकड़ी के कपड़े की तहमद का अवश्य ही कोई धार्मिक महत्व है क्योंकि इस तरह की तहमद नगर में बने हुए विभिन्न तोरणद्वारों के बाहर बनी मूर्तियों, स्तम्भनुमा देवालयों पर भी बंधी हुई हैं।

गुलंगान पर्व के जुलूस में सबसे आगे चल रहे युवक मृंदग, झांझ तथा कुछ विचित्र से वाद्ययंत्र बजाते हुए चल रहे थे। इनमें से कुछ वाद्ययंत्र भारतीय प्राचीन मंदिरों में अप्सराओं और गंधर्वों के हाथों में दिखाई देते हैं। इन वाद्ययंत्रों से निकल रही संगीतमय ध्वनि यद्यपि हमने जीवन में प्रथम बार सुनी थी किंतु यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था कि यह एक धार्मिक आयोजन का संगीत है।

गुलंगान पर्व के जुलूस को, साथ चल रहे युवक ही नियंत्रित कर रहे थे। चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस का एकाध कर्मचारी शायद ही कहीं दिखाई देता था किंतु इसके उपरांत भी कहीं कोई भागम-भाग, धक्का-मुक्की, चिल्ल-पौं जैसी स्थिति नहीं थी।

सभी लोग बहुत शांत भाव से कदम से कदम मिलाते हुए आधी सड़क खाली छोड़कर चल रहे थे। छोटे बच्चों ने अपने पिताओं के हाथ अनिवार्य रूप से पकड़े हुए थे। इस जुलूस को देखकर वाहन स्वतः ही रुक जाते थे ताकि जुलूस निर्बाध रूप से चलता रहे।

बाली के नागरिकों का आत्मानुशासन देखकर मुझ जैसे व्यक्ति को अचंभित होना स्वाभाविक था जिसने अपना पूरा जीवन भारत के भीड़-भड़ाके और शोर-शराबे में व्यतीत किया हो। जहाँ लोग अनिवार्य रूप से एक-दूसरे को धक्का देते हुए, एक दूसरे का कंधा छीलते हुए, जोर-जोर से चिल्लाते और बतियाते हुए सड़कों पर निकलते हैं। भारत में जुलूस का अर्थ ही सड़क पर फैली अफरा-तफरी से है। भारत की सड़कों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूसों में आधी सड़क खाली कौन छोड़ता है!

बारोंग के समक्ष बलि

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गुलंगान पर्व के जुलूसों का आनंद लेकर फिर से पुतु की कार में सवार हो गए। अभी लगभग दो किलोमीटर चले थे कि पुतु ने गाड़ी को ब्रेक लगाये। हमने देखा कि सामने से एक और जुलूस चला आ रहा है। एक बड़ी सी खुली गाड़ी पर एक विशालाकाय बारोंग की प्रतिमा रखी हुई है। यह एक विशालयाकाय एवं भयानक दिखने वाली आकृति का वाराह था। लोग उसके सामने नृत्य कर रहे हैं। ठीक इसी समय दूसरी दिशा से सैंकड़ों स्त्री-पुरुषों का एक और जुलूस आया। ये लोग बहुत सजे-धजे थे और इन्होंने नये वस्त्र धारण कर रखे थे। अधिकांश महिलाओं ने सफेद अथवा पीले रंग के जालीदार कपड़े की लम्बी कमीजें पहन रखी थीं जिन पर लाल अथवा गुलाबी रंग के फेंटे बंधे थे। इन महिलाओं ने अपने सिरों पर बांस की टोकरियां उठा रखी थीं जिनमें फल-फूल रखे थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में केले के पत्ते लिए हुए थे। ये दोनों जुलूस एक चौरोहे की दो विपरीत दिशाओं से आए और चौराहे पर आकर ठहर गए। इसका अर्थ यह था कि एक जुलूस बारोंग के साथ आया था और दूसरा जुलूस बारोंग की पूजा करने के लिए आया था।

बारोंग की आकृति अब शांत खड़ी थी तथा उसके समक्ष नृत्य बंद हो गया था। दूसरी तरफ से जो स्त्रियां टोकरियों में पूजन सामग्री लाई थीं, वह पूजन सामग्री टोकरियों सहित बारोंग के समक्ष रख दी गईं।

बारोंग के साथ चल रहे ओझा जैसे दिखने वाले एक मनुष्य ने बारोंग की स्तुति में मंत्र बोलने आरम्भ किये। ये बाली की स्थानीय भाषा में थे, इसलिए हमारी समझ में नहीं आए। लगभग 15 मिनट तक मंत्रोच्चार एवं पूजन चलता रहा। इसके बाद ओझा को मुर्गी का एक छोटा चूजा दिया गया। एक व्यक्ति ने ओझा को बड़ी सी छुरी पकड़ाई। छोटा सा चूजा भय से कांप रहा था। ऐसा लगता था, वह समझ गया था कि उसके साथ क्या होने वाला है!

मैं भी समझ चुका था कि यहाँ क्या होने वाला है! इसलिए इससे आगे देख पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं तस्वीरें उतारना छोड़कर पुतु की गाड़ी में आकर बैठ गया। मैंने कुछ क्षणों के लिए आंखें बंद करके ईश्वर से प्रार्थना की कि चूजे को इस प्रक्रिया में कष्ट न हो। पता नहीं इससे चूजे का कष्ट कम हुआ या नहीं, किंतु इससे मेरे मन को शांति अवश्य मिली थी।

मैंने आंखें खोलकर पुतु से पूछा कि क्या उसकी बलि दी गई? पुतु ने बुझे स्वर से कहा कि हाँ बारोंग को चिकन की बलि दी गई ताकि वह प्रसन्न हो और इस नगर से समस्त बुराइयों को नष्ट करके यहाँ के लोगों की रक्षा करे। उसकी आवाज बता रही थी कि उसे भी इससे कष्ट हुआ है।

हो भी क्यों नहीं, इन दिनों वह शाकाहारी बनने का अभ्यास जो कर रहा था और सप्ताह में दो दिन केवल शाकाहार कर रहा था। चौराहे पर सार्वजनिक बलि का आयोजन बहुत अटपटी लगने वाली बात है किंतु यह बाली के हिन्दू समाज में प्रचलित महत्वपूर्ण प्रथाओं में ऐ एक है जो सर्वजनहिताय- सर्वजनसुखाय की भावना से प्रेरित है।

वैष्णव धर्म के प्रसार से पहले भारत के हिन्दुओं में भी यह कुप्रथा भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित थी। मुझे स्मरण हो आया कि 27 जून 2002 को नेपाल के हिन्दू राजा ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह ने भारत के कामाख्या मंदिर में देवी के समक्ष भैंसा, बकरा, भेड़, कबूतर तथा बत्तख की पंचबलि करवाई थी।

इस घटना के पश्चात् छः साल से भी कम समय में नेपाल की जनता ने राजा ज्ञानेन्द्र शाह को गद्दी से उतारकर, नेपाल से राजशाही का समपापन कर दिया था। मुर्गी के बच्चे की बलि के बाद समस्त मनुष्य उठकर चले गए किंतु जाने से पहले वहाँ उपस्थित प्रत्येक वस्तु को उठाकर अपने साथ ले गए। सड़क और चौराहा ऐसे साफ हो गए जैसे कुछ देर पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं था।

पपीते की सब्जी

जब मैंगवी गांव के बाहर चावल के खेतों में बने हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचे तो संध्या के छः बजे थे। सूर्य देवता पश्चिम में काफी नीचे आ गए थे किंतु दिन का उजाला अभी भी बना हुआ था। पिताजी की दृष्टि सर्विस अपार्टमेंट से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे खड़े पपीते के एक लम्बे पेड़ पर गई। पूरा पेड़ लम्बी आकृति के बड़े फलों से लदा हुआ था।

पिताजी ने पुतु से पूछा कि क्या हम एक पपीता तोड़ सकते हैं! पुतु ने कहा कि ये पपीते पूरे मौहल्ले के हैं, इन्हें कोई भी तोड़कर अपने उपयोग में ले सकता है किंतु उसे बाजार में बेच नहीं सकता। पुतु को यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि हम कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खाने वाले थे।

पिताजी ने ही वह पपीता तोड़ा। पपीता तोड़ने के प्रयास में पपीता उनकी नाक पर आ गिरा और उन्हें हल्की सी चोट भी लगी किंतु पपीते की सब्जी इतनी स्वादिष्ट बनी कि उसके लिए यह चोट सहन की जा सकती थी।

चावल के खेतों में चाय पीते और सूर्यास्त देखते हुए बीती संध्या

हिन्दुस्तानी आदमी की सबसे बड़ी विलासिता है, सामूहिक रूप से बैठकर चाय पीना। हमारे पास दूध पर्याप्त मात्रा में आ चुका था। हमने सर्विस अपार्टमेंट में घुसते ही चाय बनाई और चावल के खेतों में खुलने वाले उसी लॉन में बैठकर पी जहाँ से धरती स्वर्ग जैसी दीख पड़ती थी।

वह संध्या चावल के खेतों के बीच सूर्यास्त देखते हुए बीती। चाय का एक चरण पूरा होने पर दूसरा चरण भी आयोजित किया गया। गुलंगान पर्व के जुलूस अब भी हमारे मस्तिष्क में चलचित्रों की भांति चल रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप में तीसरा दिन (25)

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बाली द्वीप में तीसरा दिन

आज हमारा बाली द्वीप में तीसरा दिन था। आज हमें उलूवातू में वानर उद्यान तथा कुता शहर में राजा का महल देखने जाना था।

तीसरी सुबह 16 अप्रेल को भी आंख जल्दी ही खुल गई। सूर्योदय का आनंद हमने उसी लॉन में बोगनविलिया के छज्जे के नीचे बैठकर चाय पीते हुए लिया। आज भी हमने पुतु को लगभग दस बजे बुलाया था ताकि हम सुबह का नाश्ता और दिन का खाना बनाकर अपने साथ ले सकें।

मूंछों वाले बंदर

ठीक दस बजे पुतु गाड़ी लेकर आ गया और हम उसके साथ चल पड़े। सबसे पहले वह हमें उलूवातू के प्रसिद्ध मंकी गार्डन में ले गया। यहाँ पूरे उद्यान में लाल मुंह के एवं अपेक्षाकृत छोटे आकार के बंदर हैं जिन की मूंछें देखकर आश्चर्य होता है। उस उद्यान में बंदरों एवं अन्य पशु-पक्षियों तथा जलचरों की बहुत सारी मूर्तियां हैं जो दर्शक का ध्यान बरबास ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

यहाँ बहुत सी नर-प्रतिमाएं ऐसी हैं जिनकी आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। मोटे होठों और फूल हुए गालों वाली औरंगुटान की देहयष्टि वाली मनुष्य प्रतिमाएं यहाँ भी दर्शकों को आश्चर्य में डाल देती हैं। यहाँ एक भी प्रतिमा ऐसी नहीं है जिसे सामान्य माना जाए अथवा उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाएं कुछ पर्यटक बंदरों को खिलाने के लिए केले लाए थे।

कुछ बंदर पर्यटकों के हाथों से केले लेकर शालीन भाव से खा रहे थे किंतु कई बंदर केलों को प्राप्त करने के लिए पर्यटकों के कंधों और सिर पर आकर बैठ रहे थे। यहाँ स्थित कुछ मूर्तियों को दखने से अनुमान हुआ कि इस वन के बंदर शताब्दियों से मनुष्यों के सिर पर बैठते आए हैं। हम लगभग दो घण्टे उबुद वानर वन में रुके। इस वन को देखने का अनुभव कभी न भुलाए जाने वाले अनुभवों में से है।

राजा का उदास महल

मूर्तियों एवं मूंछों वाले बंदरों के संसार से निकल कर हम कुता शहर के मुख्य भाग में आ गए जहाँ हमें कुता के प्राचीन शासक का महल देखने को मिला। महल का काफी हिस्सा खण्डहर हो गया है तथा जो कुछ भी ठीक-ठाक अवस्था में है, वह लगभग बंद कर दिया गया है। यह लाल रंग की ईंटों से बना हुआ भवन समूह है। इन ईंटों का निर्माण भारत में बनने वाली ईंटों के समान प्रतीत होता हैं अर्थात् कच्चे गारे से बनी की ईंटों को तेज आंच में पकाया गया है। पूरा महल अपनी भव्यता को खोकर उदास सा खड़ा हुआ प्रतीत होता है।

जन सामान्य के बीच नृत्य-नाटिका

इस महल के एक हिस्से में कुछ स्थानीय महिला एवं पुरुष कलाकार इण्डोनेशियाई भाषा में किसी नृत्य-नाटिका का अभ्यास कर रहे थे। निकट बने लकड़ी के एक बड़े मण्डप में बहुत से कलाकार विविध प्रकार के वाद्ययंत्र बजा रहे थे। इनमें से अधिकांश वाद्ययंत्रों की आकृतियां भारतीय वाद्ययंत्रों से मेल नहीं खातीं। संसार के विभिन्न देशों से आए हुए दर्जनों  पर्यटक इन कलाकारों को देखने के लिए उन्हें घेरा बनाकर खड़े थे। यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा था कि यहाँ नृत्य-नाटिकाओं के कलाकार खुले स्थान पर आकर अभ्यास करते हैं जबकि भारत में इस प्रकार का अभ्यास प्रायः बंद कमरों में किया जाता है।

इतिहास एवं संस्कृति की पुस्तकें

इस महल के चारों ओर, कुता का अत्यंत व्यस्त बाजार है। महल से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर हमें एक बड़ा बुक-स्टोर मिला जिसमें इण्डोनेशिया के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बन्धित कई पुस्तकें उपलब्ध थीं। अन्य वस्तुओं की तरह किताबें भी बहुत महंगी थीं। फिर भी हमने अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुन लीं।

कलाकृतियों की दुकानों में सन्नाटा

यहाँ से पुतु हमें टैरेस फील्ड्स की तरफ ले गया जहाँ पहाड़ियों की ढलानों को सीढ़ी की तरह समतल बनाकर वहाँ चावल की खेती की जाती है। वहाँ तक जाने के लिए हमें एक नगरीय क्षेत्र से होकर निकलना पड़ा। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि सड़क के दोनों ओर सजावटी कलाकृतियों की सैंकड़ों दुकानें स्थित थीं। बांस, लकड़ी तथा अन्य सामग्री से बनी कलाकृतियां। अत्यंत सुंदर पेंटिंग, सैंकड़ों तरह के समुद्री जीवों के खोल, रंग-बिरंगे आभूषण, क्या नहीं था वहाँ!

इनमें से आधी से अधिक दुकानें बंद थीं तथा खुली हुई दुकानों में भी शायद ही किसी दुकान पर कोई ग्राहक खड़ा हुआ दिखाई दिया। यह बाली के लोगों के जीवन की वास्तविकता थी। यहाँ बहुत से परिवारों की आजीविका पर्यटकों के आगमन पर टिकी हुई है। चूंकि यह पर्यटकों के आने का मौसम नहीं था और बाली द्वीप पर बहुत कम पर्यटक मौजूद थे इसलिए इन दुकानों पर सन्नाटा था।

राइस टैरेस फील्ड्स

यह एक पहाड़ी क्षेत्र था, यहाँ बहुत सघन वनावली के बीच, चावल के टैरेस फील्ड्स स्थित थे। कुछ खेतों में किसान काम कर रहे थे। उनकी नुकीली शंक्वाकार टोपियां देखने वाले का मन मोह लेती हैं। हमें लग रहा था जैसे हम अलग ही संसार में आ गए हैं।

पुतु ने एक स्थान पर गाड़ी रोककर हमें वहाँ से पैदल चलकर पहाड़ी उतरने तथा लगभग आधा किलोमीटर दूर दिखाई दे रही पहाड़ी पर पहुंचकर टैरेस फील्ड्स का आनंद लेने के लिए कहा। हमने बहुत से पर्यटकों को वहाँ जाते हुए भी देखा। हमारे पैरों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हम एक पहाड़ी उतर कर और दूसरी पहाड़ी चढ़कर वहाँ तक पहुंचें और फिर इतना ही चलकर लौटें। इसलिए हमने वहाँ जाना टाल दिया तथा अगले गंतव्य के लिए चलने का अनुरोध किया।

जंगल में मंगल

थोड़ी देर चलने पर चावल के खेतों की शृंखला समाप्त हो गई तथा सघन पहाड़ियां आरम्भ हो गईं। यहाँ इतना सघन वन था कि हरीतिमा अपने चरम पर पहुंच गई प्रतीत होती थी। हमने पुतु से अनुरोध किया कि किसी स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ हम दोपहर का भोजन कर सकें।

पुतु यहाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित था। शीघ्र ही उसने सड़क के किनारे बने एक मंदिर के निकट स्थित बरामदे को तलाश लिया। यहाँ कोई मनुष्य नहीं था। मंदिर पर ताला पड़ा हुआ था तथा बारामदा भी पूरी तरह खाली था। हमने वहीं बैठकर भोजन करने का निर्णय लिया। जंगल में परिवार के साथ बैठकर इस प्रकार भोजन करने का हमारा यह पहला ही अवसर था। इस भोजन में ऐसा स्वाद आया जिसका वर्णन करना संभव नहीं है।

दान-पुण्य एवं पूजा वाली थाली

जहाँ बैठकर हमने भोजन किया, उसके निकट एक बंद दुकान थी जिसके बाहर लगे सूचीपट्ट से ज्ञात होता था कि यहाँ नारियल, पुष्प एवं अन्य पूजन सामग्री बिकती थी। इस सूचीपट्ट पर रोमन लिपि में यह शीर्षक अंकित था- ”दान पुण्य पूजा वाली रिंग पुरा दालेम” अर्थात् दान-पुण्य एवं मंदिर में पूजा की गोल थाली की वस्तुओं के मूल्य। इस सूची की वस्तुओं के नाम तो मेरी समझ में नहीं आए किंतु उनकी दरों को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता था कि ये बहुत महंगी थीं।

चूजे के करतब

हम भोजन कर ही रहे थे कि किसी पक्षी का एक रंगीन चूजा कहीं से भटक कर हमारे पास आ गया। यह चटख पीले रंग का पक्षी था जो उड़ नहीं सकता था। जैसे ही डेढ़ साल की दीपा की दृष्टि उस पर पड़ी, वह उसके पीछे लग गई। चूजा भी जैसे उसी के साथ खेलने आया। वह गोल-गोल घूमता हुआ दीपा को अपने पीछे दौड़ाने लगा। दीपा ने बहुत प्रयास किया किंतु उसे पकड़ नहीं सकी। जब दीपा थककर रुक जाती, चूजा उसके पास आकर खड़ा हो जाता और दीपा फिर से उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ती। यह क्रम काफी देर तक चला।

देवता का थान

भोजन करने के बाद हम लोग ऐसे ही थोड़ा बहुत पैदल चलकर जंगल देखने लगे। मैंने देखा कि निकट ही एक अन्य चबूतरा बना हुआ था जिसके चारों ओर लगभग डेढ़ फुट ऊंची चारदीवारी थी। मैं उत्सुकतावश उसके निकट चला गया। चबूतरे पर एक छोटा सा देवरा बना हुआ था जिसमें पत्थर की एक अनगढ़ प्रतिमा रखी थी। थान के पीछे की ओर एक लम्बा पेड़ खड़ा था जिससे देवालय पर छाया हो रही थी। यह लगभग वैसा ही था जिस प्रकार राजस्थान में खेजड़ी के नीचे गोगाजी और बायासां के थान होते हैं। मैंने इस थान की कई तस्वीरें उतारीं।

इन्द्र का मंदिर

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जंगल में लंच का आनंद उठाकर हम फिर से पुतु की गाड़ी में चल पड़े। इस बार वह हमें पहाड़ों के बीच बने एक मंदिर ले गया। यह इन्द्र को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था। मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता और वापस ऊपर चढ़ना पड़ता। इसके लिए हमारे दल के सदस्य तैयार नहीं थे। हमारी अन्यमनस्कता का एक कारण यह भी था कि इस छोटे से मंदिर को देखने के लिए हमें अच्छी-खासी राशि व्यय करके टिकट खरीदने पड़ते। भारतीय होने के कारण हमें मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना जंच नहीं रहा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए अलग से टिकट लेना पड़ रहा था। इसलिए हमने मंदिर तक उतरने का विचार त्याग दिया और मंदिर परिसर तथा भवन को ऊपर सड़क पर खड़े होकर देखा। यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जान पड़ता था। बाली की परम्परा के अनुसार पूरा मंदिर काले पत्थर का बना हुआ था जिसकी दीवारों पर उगी हुई काई यह बता रही थी कि यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है तथा दीवारें वर्ष में अधिकांश दिनों में भीगी रहती हैं।

मंदिर परिसर में बने जल-कुण्ड और उनमें कमल के पुष्प इस तरह का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे जिस तरह के दृश्यों का अंकन भगवान वेदव्यास ने महाभारत में कई स्थानों पर किया है। विशेषकर यक्ष-प्रश्न वाले प्रकरण में।

झरने से निराशा

पुतु ने हमें एक प्राकृतिक जल प्रपात तक ले जाने का निर्णय लिया। यह बहुत हरा-भरा पहाड़ी स्थान था। यहाँ भी इण्डोनेशियाई सरकार के पर्यटन विभाग ने टिकट लगा रखा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए भी अलग से राशि चुकानी पड़ती थी।

 चूंकि हमने सुबह से केवल गाड़ी में भ्रमण किया था तथा पैदल चलकर किसी भी स्थान को निकट से नहीं देखा था। इसलिए यहाँ हमने रुकने का निर्णय लिया। लगभग आधा किलोमीटर तक पैदल चलकर तथा कुछ सीढ़ियां उतर कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ से झरना दिखाई देता था। इस पूरे मार्ग में बहुत से रेस्टोरेंट थे जिनमें नारियल, ब्लैक कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, चिकन, फिश, आमलेट जैसी बहुत सी चीजें बिक रही थीं किंतु इनमें से एक भी चीज हमारे काम की नहीं थी। हम चाय पीना चाहते थे किंतु बाली में चाय, वह भी दूध वाली चाय का मिलना असंभव जैसा ही था।

 जिस स्थान से झरना दिखाई देता था, मैं और पिताजी वहीं रुक गए। मधु, बच्चों को साथ लेकर झरने के निकट तक गई। झरना यहाँ से लगभग एक किलोमीटर और दूर था। यह इतना छोटा था कि मुझे लगा कि इससे बड़े झरने तो वर्षाकाल में रेगिस्तान के बीच स्थित अरणा-झरणा की पहाड़ियों में दिखाई देते हैं।

यह देखकर अफसोस हुआ कि इसे दिखाने के लिए भी इण्डोनेशियाई सरकार पर्यटकों से टिकट के पैसे वसूल रही है। लगभग एक घण्टे बाद मधु ने लौटकर बताया कि यह स्थान उनके लिए है जो शराब पीकर झरने में नहाने का आनंद लेना चाहते हैं। नीचे शराब की कुछ दुकानें हैं जहाँ से यूरोपीय पर्यटक शराब खरीद रहे हैं और झरने में नहा रहे हैं।

सर्विस अपार्टमेंट को वापसी

शाम के लगभग तीन बज चुके थे। हम सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट पड़े। यहाँ से मैंगवी लगभग दो घण्टे की दूरी पर था। वहाँ पहुंचते-पहुंचते सूर्य देव का प्रकाश कम होने लगा। सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचते ही भानु ने चाय बनाई और हमने उसी शीशे वाले बरामदे के सामने बने लॉन में बैठकर पी जो सीधा चावल के खेतों में खुलता था। गर्म चाय पाकर आनंद का कोई पार नहीं था। इस प्रकार बाली द्वीप में तीसरा दिन पूरा हुआ। पूरा दिन नए अनुभवों से भरा हुआ रहा।

हमें पुतु ने बताया कि अगले दिन हम एक-दो मंदिर तथा समुद्र-तट देख सकते हैं किंतु हमने अगला दिन विश्राम के लिए निर्धारित किया। हमें जोधपुर से चले लगभग एक सप्ताह हो गया था और अब हमें आराम की जरूरत थी। अब तक जो कुछ भी देखा था, उसे भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता थी। इसलिए हमने पुत्तु से कहा कि वह अगले दिन न आए।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

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