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तनाहलोट मंदिर (23)

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तनाहलोट मंदिर

तमन अयुन टेम्पल देख लेने के बाद हम पुतु के सथ तनाहलोट मंदिर के लिए रवाना हुए। यह मेंगवी से लगभग एक घण्टे की दूरी पर है। लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट हिन्दू मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है।

दोपहर हो चुकी थी। इसलिए हमने पुतु से कहा कि किसी ऐसे स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ बैठक हम भोजन कर सकें। भोजन हमने प्रातः अपने सर्विस अपार्टमेंट में बनाकर अपने साथ ले लिया था। पुतु ने एक हरे-भरे स्थान पर सड़क के किनारे बने छपरे के नीचे गाड़ी रोकी।

यहाँ लकड़ी की दो चौकियां रखी हुई थीं। हमने उन्हीं पर बैठकर भोजन किया। यह एक अच्छी-खासी पिकनिक मनाने जैसा था। पास ही दो ठेले वाले खड़े थे जिन पर कुछ तरकारी और फल बिक रहे थे। उन दोनों ठेलों को एक ही महिला देख रही थी। जब हम भोजन करने बैठे तो वह महिला यह देखने के लिए हमारे पास चली आई कि हम क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं! यह ठीक वैसी ही उत्सुकता थी जैसी भारत के लोग सड़कों पर चलते फिरंगियों को देखकर व्यक्त करते हैं।

प्याज बेचने वाले की नीयत में खराबी

भोजन करने के बाद हमने वहाँ खड़े एक ठेले पर जाकर देखा। वहाँ सब्जी के नाम पर केवल प्याज थी, वह भी बहुत छोटे आकार की। मैंने बड़ी कठिनाई से उससे समझा कि प्याज क्या भाव है। महिला ने मुझे एक किलो का बाट और बीस हजार रुपए निकालकर दिखाये। सौ रुपए किलो के भाव की छोटी प्याज थी तो अखरने वाली किंतु मैंने खरीदने का निर्णय लिया।

जब महिला प्याज तोल चुकी, ठीक उसी समय उसका पुरुष साथी (संभवतः पति) वहाँ आया और उसने मुझे कैलकुलेटर पर टाइप करके बताया कि इस प्याज के लिए 40 हजार रुपए लगेंगे। मैंने अस्वीकृति में सिर हिलाया और तुली हुई प्याज वहीं छोड़ दी। महिला मुझ पर बहुत नाराज हुई और उसने मुझसे ईडियट कहा।

संभवतः अंग्रेजी का एक यही शब्द था जिसे वह जानती थी और न जाने कब उसने किससे सीखा होगा! संभवतः वह समझ ही नहीं सकी थी कि उसके पति ने क्य बदमाशी की थी! मैं महिला की तरफ देखकर मुस्कुराया और पुतु की गाड़ी में बैठ गया। 

तनाहलोट मंदिर के लिए तीन लाख रुपए के टिकट

लगभग एक घण्टे चलने के बाद हम तनाहलोट पहुंचे। प्राचीन तनाहलोट मंदिर, बाली द्वीप के तबनन रीजेंसी क्षेत्र में समुद्र के भीतर किंतु तट के काफी निकट बना हुआ है। पुतु ने हमें बताया कि यहाँ टिकट लेकर प्रवेश करना पड़ता है।  प्रत्येक व्यक्ति के लिए साठ हजार रुपए का टिकट था।

हमें पांच टिकट लेने पड़े इसलिए तीन लाख रुपए व्यय हो गए। यह एक विचित्र अनुभव था। भारत में किसी भी मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लेना पड़ता किंतु इण्डोनेशिया सरकार, देशी-विदेशी पर्यटकों से मंदिरों में प्रवेश के लिए भी इतना टिकट ले रही थी। संभवतः इण्डोनेशियाई सरकार की आय में पर्यटन से होने वाली आय बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। या फिर मुस्लिम देश होने के कारण हिन्दू मंदिरों पर टिकट लगाया गया है।

बाली, जावा और चीन के व्यापारियों का अनोखा संसार

तनाहलोट मंदिर परिसर का आरम्भ एक भव्य और विशाल तोरण द्वार से होता है जिसकी ऊपर की ताकों में पीताम्बरधारी लम्बे दाढ़ी वाले ऋषि की मूर्ति स्थापित हैं। तोरण द्वार से लेकर समुद्र तट तक पहुंचने के लिए हमें लगभग एक किलोमीटर चलना पड़ा। इस पूरे मार्ग में बाली, जावा तथा चीन के सैंकड़ों व्यवसायी दुकानें लगाए हुए बैठे हैं। इन दुकानों पर हिन्दू देवी-देवताओं की एक से बढ़कर एक पेंटिंग देखी जा सकती हैं। चटखीले रंग, तीखे नाक-नक्श और भाव पूर्ण मुद्राओं में अंकित हिन्दू देवी-देवताओं का यह संसार, धरती से नितांत विलग ही दिखाई देता है।

छः लाख रुपए के 10 रुद्राक्ष

यहाँ भी वस्तुओं के दाम भारत की तुलना में कई गुना अधिक थे। हमने एक चीनी दुकान पर लगभग 10 रुद्राक्षों की एक माला के दाम पूछे जिसे कड़े की तरह हाथ की कलाई में पहना जाता है। भारत में यह माला अधिक से अधिक 20 रुपयों में खरीदी जा सकती है किंतु वहाँ हमें इस माला का दाम छः लाख इण्डोनेशियन रुपए अर्थात् तीन हजार भारतीय रुपए बताया गया। यहाँ भी नारियल 20 हजार इण्डोनेशियन रुपए में बिक रहा था।

ज्ञान मुद्रा में सरस्वती

इस बाजार में सरस्वती की श्वेत रंग की एक मनुष्याकार प्रतिमा भी बिकने के लिए आई थी जिसे देखकर कोई भी भारतीय दंग रह जाए। बाली शैली की इस प्रतिमा में देवी सरस्वती एक कमल पुष्प पर खड़ी हैं जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वेद, तीसरे हाथ में बिंजौरा का पुष्प और चौथा हाथ ज्ञान मुद्रा में है। देवी के पैरों के पास हंस पंख खोले खड़ा है।

विशिष्ट शैली का द्वार

जहाँ सड़क समाप्त हुई, वहीं से समुद्र तक जाने के लिए सीढ़ियों का सिलसिला आरम्भ हो गया। ठीक यहीं पर बाली की विशिष्ट शैली का प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस द्वार के दोनों तरफ के स्तंभों की बनावट इस प्रकार की होती है मानो किसी शिखरबंद मंदिर को ठीक बीच में से चीर कर दोनों हिस्सों को सड़क के दानों किनारों पर सरका दिया गया हो। इस द्वार पर भी बांस की भव्य सजावट है।

भारतीय ऋषि की प्रतिमा

यहाँ समुद्र के किनारे कुछ छोटे-छोटे स्तंभों पर विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। इनमें से एक प्रतिमा जटाजूट-धारी भारतीय ऋषि की जान पड़ती है जिसके गले एवं भुजाओं में मोटे-मोटे रुद्राक्ष पड़े हुए हैं। उसके एक हाथ में फूल और एक हाथ में देवता के समक्ष बजाई जाने वाली हाथ की घण्टी है। ऋषि प्रतिमा के सिर पर एक गोल टोपनुमा मुकुट है। आज किसी श्रद्धालु ने इस ऋषि प्रतिमा को पीताम्बर धारण करवा दिया था जिससे प्रतिमा की शोभा कई गुणा बढ़ गई प्रतीत होती थी।

समुद्र ने मनाया तनाहलोट मंदिर में गुलंगान

जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमें ज्ञात हुआ कि इस समय समुद्र में ज्वार आया हुआ है इसलिए मंदिर तक जाने की अनुमति नहीं है। हमें  द्वीप की मुख्य भूमि पर खड़े रहकर, लगभग 100 मीटर दूर स्थित टापू पर स्थित तनाहलोट मंदिर को देखकर संतोष करना पड़ा। समुद्र की लहरें उस टापू से टकराकर लौट रही थीं। ऐसा लगता था मानो समुद्र भी गुलंगान त्यौहार पर, मंदिर की सीढ़ियों और दीवारों का स्पर्श करने के लिए चला आया था। समुद्र के इस प्रकार अड़ंगा लगा देने के कारण हमें लगा मानो तीन लाख रुपए के टिकट व्यर्थ ही चले गए।

तनाहलोट मंदिर में नहीं मिला पवित्र जल

पुतु ने हमें कहा कि जब आप समुद्र में होकर तनाहलोट मंदिर तक जाएं तो वहाँ से पवित्र जल लेकर अपने ऊपर छिड़कें तथा अपने साथ भी लेकर आएं। यह ठीक वैसा ही था जैसा भारत के लोग नदियों में स्नान के लिए जाते समय करते हैं तथा गंगाजल अपने साथ लेकर आते हैं। अब चूंकि हम मंदिर तक पहुंच ही नहीं सके थे, इसलिए पवित्र जल प्राप्त करना भी संभव नहीं रह गया था।

समुद्र किनारे सामूहिक पूजन

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जब हम समुद्र के किनारे पहुंचे तो हमने वहाँ लगभग 150 फुट लम्बे, 40 फुट चौड़े एवं लगभग 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर शानदार पीले रंग की छतरियां तनी हुई देखीं जो वहाँ स्थाई रूप से बने छोटे-छोटे लगभग दो-ढाई फुट ऊंचे देवालयों के ऊपर तानी गई थीं। इन लघु देवालयों के समक्ष केले एवं नारियल के पत्तों एवं बांस की बनी हुई छोटी-छोटी ट्रे अथवा थाली में पूजन सामग्री अर्पित की गई थी। इस पूरे चबूतरे को एक शानदार लम्बे पीले रंग के कपड़े से चारों ओर से ढंका गया था। इसके समक्ष सैंकड़ों नर-नारी परम्परागत नए परिधानों में सज-धज कर बैठे थे। कुछ पुजारी मंत्रों का उच्चारण करते हुए श्रद्धालुओं पर पवित्र जल का छिड़काव कर रहे थे। इस पूरे वातावरण में पीला और श्वेत रंग ही छाया हुआ था। सभी पुरुष सुखासन में अर्थात पालथी मार कर बैठे थे। अधिकांश महिलाएं भी उन्हीं की तरह सुखासन में विराजमान थीं किंतु कुछ महिलाएं बौद्ध भिक्षुओं की तरह घुटने मोड़कर, घुटनों और पंजों के सहारे उकड़ूं बैठी थीं। इस सामूहिक पूजन को देखना अत्यंत रोमांचकारी था।

सारा काम बिना किसी आवाज के, बिना किसी भागम-भाग और चिल्ल-पौं के हो रहा था। यहाँ माता-पिता अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर नहीं आए थे। पुरुषों ने पुतु जैसी टोपियां पहनी हुई थीं जिनके आगे के हिस्से को गांठें लगाकर भारतीय कौए जैसी आकृति दी गई थी।

पूजन क्षेत्र लोहे की जाली से घिरा हुआ था। इसके चारों ओर सैंकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक घूम रहे थे, किंतु श्रद्धालु जन उनकी तरफ से नितांत निश्चिंत थे। इस जाली के बाहर बहुत सी स्त्रियां अपने स्टॉल लगाकर खड़ी थीं जहाँ पूजा की थालियां बेची जा रही थीं।

हाथ जोड़कर नमस्कार

तनाहलोट मंदिर बैठकर पूजा कर रहे सभी स्त्री-पुरुष, देव पूजन के बीच-बीच में दोनों हाथ जोड़कर तथा उन्हें अपने माथे से लगाकर देवताओं को नमस्कार कर रहे थे, नमस्कार की यह मुद्रा ठीक वैसी ही थी, जैसी कि भारतीय हिन्दू, मंदिरों में देवताओं को प्रणाम करते हैं।

कुता में खरीददारी

अभी सायं के चार बजे थे किंतु धूप की चमक कम होने लगी। हम भी थकान का अनुभव कर रहे थे। इसलिए हमने मैंगवी लौटने का निर्णय लिया। यह मार्ग कुता से होकर जाता था जो बाली द्वीप के मुख्य नगरों में से एक है। हमने पुतु से कहा कि किसी बड़े जनरल स्टोर पर चले ताकि हम कुछ तरकारी और दूध खरीद सकें।

यदि हम भारत में होते तो अब तक तो मार्ग में दो-तीन बार चाय पी चुके होते किंतु यहाँ ऐसी कोई दुकान नहीं थी जिस पर चाय बिकती हो। तबनन क्षेत्र में एक रेस्टोरेंट में कॉफी थी किंतु वह भी बिना दूध-चीनी की। इसे पीना हमारे लिए न तो संभव था और न आनंददायक।

काफी देर चलने के बाद कुता में एक बड़े मॉल के सामने पुतु ने गाड़ी रोकी। पुतु के हिसाब से यह एक मॉल था किंतु भारत के हिसाब से यह एक मध्यम आकार के जनरल स्टोर से अधिक कुछ भी नहीं था। यहाँ हमें कई तरह की हरी तरकारियां देखने को मिलीं। आलू, प्याज, टमाटर, दूध, फल भी प्रचुर मात्रा में थे। वहाँ कई तरह की प्याज और आलू रखे हुए थे जिनके कंटेनर पर लगे लेबल पर उसके भाव के साथ-साथ उस देश का नाम भी लिखा हुआ था जहाँ से वह तरकारी आई थी।

यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि अधिकांश तरकारी न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा मुम्बई से आई थी। यहाँ तक कि केले भी विदेशी थे। बाली द्वीप के केले आकार में बहुत छोटे, स्वाद में खट्टे-मीठे और अपेक्षाकृत कम मुलायम थे। सेब कई प्रकार का था और विश्व के अनेक देशों से मंगाया गया था। विदेशों से आई हुई यह सारी तरकारी और फल, भारत की अपेक्षा कई गुना अधिक दामों पर उपलब्ध थी।

हमने आगे के दिनों के हिसाब से तरकारी और दूध के डिब्बे खरीद लिए। दूध के इन डिब्बों पर दुधारू पशुओं चित्र बने हुए थे किंतु उनमें मिल्क पाउडर के साथ-साथ कई तरह के प्रोटीन और वनस्पति तेल भी मिले हुए थे।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

गुलंगान पर्व के शानदार जुलूस (24)

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गुलंगान पर्व

गुलंगान पर्व इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय पर्व जैसा है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में दीपावली का त्यौहार। गुलंगान पर्व को भारत में मृतक लोगों की आत्मा की शांति हेतु मनाए जाने वाले श्राद्ध पक्ष तथा वसंत पंचमी का मिला-जुला रूप माना जा सकता है।

बांस के कण्डील

अभी हम कुता शहर में कुछ दूर चले थे कि हमें महिलाओं का एक जुलूस सड़क पर चलता हुआ दिखाई दिया। हमारे अनुरोध पर पुतु ने गाड़ी सड़क पर एक तरफ लगा दी और हम जुलूस देखने के लिए नीचे उतर गए। यह एक शानदार जुलूस था जिसमें मुख्यतः महिलाएं ही भाग ले रही थीं। इन महिलाओं ने अनिवार्य रूप से लम्बी सफेद कमीज तथा काले रंग की तहमद पहन रखी थी। सभी महिलाओं ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट पर लाल रंग के कपड़े का फेंटा बांध रखा था।

सभी महिलाओं के सिर पर बांस की खपच्चियों से बने हुए कंदील थे जिनके ऊपरी हिस्से में दीपक का प्रकाश जगमगा रहा था। ताजा बांस से निर्मित होने के कारण ये कंदीलें पीले रंग की दिखाई देती थीं तथा इन पर फूलों से सजावट भी की गई थी। ऐसा प्रतीत होता था कि ये कंदील किसी देवता के देवालय थे तथा इन देवताओं की शोभायात्रा निकाली जा रही थी। ये गुलंगान पर्व के कण्डील थे।

शोभा यात्रा में सम्मिलित समस्त महिलाओं का शरीर सधा हुआ, कमर सीधी, गर्दन तनी हुई तथा चाल मंद थी। जुलूस के अगले हिस्से में एक महिला सफेद कमीज के नीचे सफेद तहमद धारण करके आई थी। उसके साथ एक पुरुष भी चल रहा था, उसने भी सफेद कमीज तथा सफेद तहमद धारण कर रखी थी। ये दोनों इस शोभायात्रा में धार्मिक महत्व रखने वाले पुजारी अथवा ओझा जैसे प्रतीत हो रहे थे।

इस शोभायात्रा के साथ कुछ ऐसी महिलाएं भी चल रही थीं जिन्होंने अपने सिर पर कंदील-नुमा देवालय नहीं उठा रखे थे। उनकी पोषाक की शैली तो वही थी किंतु उनकी कमीज, तहमद तथा फेंटे के रंग अलग थे। शोभायात्रा के अग्रभाग में कुछ पुरुष लाल रंग के दो छत्र उठाए चल रहे थे जैसे कि भारत में रामनवमी, अग्रसेन जयंती एवं चेटीचंड के जुलूसों में देखने को मिलते हैं।

शानदार संगीतमय जुलूस

कंदील वाली महिलाओं की शोभायात्रा जैसे ही हमारे सामने से आगे बढ़ गई, हमें कुछ दूरी पर सड़क पर चलता हुआ एक शानदार संगीतमय जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। इसमें केवल पुरुष और बच्चे सम्मिलित थे। कुछ छोटी लड़कियां भी अपने पिताओं की अंगुली पकड़ कर इस जुलूस में चल रही थीं। पुरुषों और लड़कों ने अनिवार्य रूप से सफेद शर्ट तथा सफेद रंग की ठीक वैसी ही टोपी पहन रखी थी जैसी टोपी सुबह से पुतु धारण किये हुए था और जिसके स्थान पर भारतीय कौआ बैठे हुए होने का आभास होता था।

पुरुषों तथा लड़कों ने एक विशेष शैली में तहमद बांध रखी थी। यह तहमद दो लड़ी थी। अर्थात् एक तहमद के ऊपर दूसरी तहमद बांधी हुई थी। नीचे वाली तहमद अधिक लम्बी थी तथा ऊपर वाली तहमद कम लम्बी थी। इस कारण दोनों तहमदें आसानी से दिखाई दे रही थीं।

इनमें से एक तहमद प्रायः सफेद रंग की थी तथा दूसरी तहमद पीले अथवा लाल-पीले और सफेद-काली चौकड़ियों के कपड़े से बनी हुई थी। बाली के हिन्दुओं के लिए सफेद-काली चौकड़ी के कपड़े की तहमद का अवश्य ही कोई धार्मिक महत्व है क्योंकि इस तरह की तहमद नगर में बने हुए विभिन्न तोरणद्वारों के बाहर बनी मूर्तियों, स्तम्भनुमा देवालयों पर भी बंधी हुई हैं।

गुलंगान पर्व के जुलूस में सबसे आगे चल रहे युवक मृंदग, झांझ तथा कुछ विचित्र से वाद्ययंत्र बजाते हुए चल रहे थे। इनमें से कुछ वाद्ययंत्र भारतीय प्राचीन मंदिरों में अप्सराओं और गंधर्वों के हाथों में दिखाई देते हैं। इन वाद्ययंत्रों से निकल रही संगीतमय ध्वनि यद्यपि हमने जीवन में प्रथम बार सुनी थी किंतु यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था कि यह एक धार्मिक आयोजन का संगीत है।

गुलंगान पर्व के जुलूस को, साथ चल रहे युवक ही नियंत्रित कर रहे थे। चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस का एकाध कर्मचारी शायद ही कहीं दिखाई देता था किंतु इसके उपरांत भी कहीं कोई भागम-भाग, धक्का-मुक्की, चिल्ल-पौं जैसी स्थिति नहीं थी।

सभी लोग बहुत शांत भाव से कदम से कदम मिलाते हुए आधी सड़क खाली छोड़कर चल रहे थे। छोटे बच्चों ने अपने पिताओं के हाथ अनिवार्य रूप से पकड़े हुए थे। इस जुलूस को देखकर वाहन स्वतः ही रुक जाते थे ताकि जुलूस निर्बाध रूप से चलता रहे।

बाली के नागरिकों का आत्मानुशासन देखकर मुझ जैसे व्यक्ति को अचंभित होना स्वाभाविक था जिसने अपना पूरा जीवन भारत के भीड़-भड़ाके और शोर-शराबे में व्यतीत किया हो। जहाँ लोग अनिवार्य रूप से एक-दूसरे को धक्का देते हुए, एक दूसरे का कंधा छीलते हुए, जोर-जोर से चिल्लाते और बतियाते हुए सड़कों पर निकलते हैं। भारत में जुलूस का अर्थ ही सड़क पर फैली अफरा-तफरी से है। भारत की सड़कों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूसों में आधी सड़क खाली कौन छोड़ता है!

बारोंग के समक्ष बलि

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गुलंगान पर्व के जुलूसों का आनंद लेकर फिर से पुतु की कार में सवार हो गए। अभी लगभग दो किलोमीटर चले थे कि पुतु ने गाड़ी को ब्रेक लगाये। हमने देखा कि सामने से एक और जुलूस चला आ रहा है। एक बड़ी सी खुली गाड़ी पर एक विशालाकाय बारोंग की प्रतिमा रखी हुई है। यह एक विशालयाकाय एवं भयानक दिखने वाली आकृति का वाराह था। लोग उसके सामने नृत्य कर रहे हैं। ठीक इसी समय दूसरी दिशा से सैंकड़ों स्त्री-पुरुषों का एक और जुलूस आया। ये लोग बहुत सजे-धजे थे और इन्होंने नये वस्त्र धारण कर रखे थे। अधिकांश महिलाओं ने सफेद अथवा पीले रंग के जालीदार कपड़े की लम्बी कमीजें पहन रखी थीं जिन पर लाल अथवा गुलाबी रंग के फेंटे बंधे थे। इन महिलाओं ने अपने सिरों पर बांस की टोकरियां उठा रखी थीं जिनमें फल-फूल रखे थे। कुछ लोगों ने अपने हाथों में केले के पत्ते लिए हुए थे। ये दोनों जुलूस एक चौरोहे की दो विपरीत दिशाओं से आए और चौराहे पर आकर ठहर गए। इसका अर्थ यह था कि एक जुलूस बारोंग के साथ आया था और दूसरा जुलूस बारोंग की पूजा करने के लिए आया था।

बारोंग की आकृति अब शांत खड़ी थी तथा उसके समक्ष नृत्य बंद हो गया था। दूसरी तरफ से जो स्त्रियां टोकरियों में पूजन सामग्री लाई थीं, वह पूजन सामग्री टोकरियों सहित बारोंग के समक्ष रख दी गईं।

बारोंग के साथ चल रहे ओझा जैसे दिखने वाले एक मनुष्य ने बारोंग की स्तुति में मंत्र बोलने आरम्भ किये। ये बाली की स्थानीय भाषा में थे, इसलिए हमारी समझ में नहीं आए। लगभग 15 मिनट तक मंत्रोच्चार एवं पूजन चलता रहा। इसके बाद ओझा को मुर्गी का एक छोटा चूजा दिया गया। एक व्यक्ति ने ओझा को बड़ी सी छुरी पकड़ाई। छोटा सा चूजा भय से कांप रहा था। ऐसा लगता था, वह समझ गया था कि उसके साथ क्या होने वाला है!

मैं भी समझ चुका था कि यहाँ क्या होने वाला है! इसलिए इससे आगे देख पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं तस्वीरें उतारना छोड़कर पुतु की गाड़ी में आकर बैठ गया। मैंने कुछ क्षणों के लिए आंखें बंद करके ईश्वर से प्रार्थना की कि चूजे को इस प्रक्रिया में कष्ट न हो। पता नहीं इससे चूजे का कष्ट कम हुआ या नहीं, किंतु इससे मेरे मन को शांति अवश्य मिली थी।

मैंने आंखें खोलकर पुतु से पूछा कि क्या उसकी बलि दी गई? पुतु ने बुझे स्वर से कहा कि हाँ बारोंग को चिकन की बलि दी गई ताकि वह प्रसन्न हो और इस नगर से समस्त बुराइयों को नष्ट करके यहाँ के लोगों की रक्षा करे। उसकी आवाज बता रही थी कि उसे भी इससे कष्ट हुआ है।

हो भी क्यों नहीं, इन दिनों वह शाकाहारी बनने का अभ्यास जो कर रहा था और सप्ताह में दो दिन केवल शाकाहार कर रहा था। चौराहे पर सार्वजनिक बलि का आयोजन बहुत अटपटी लगने वाली बात है किंतु यह बाली के हिन्दू समाज में प्रचलित महत्वपूर्ण प्रथाओं में ऐ एक है जो सर्वजनहिताय- सर्वजनसुखाय की भावना से प्रेरित है।

वैष्णव धर्म के प्रसार से पहले भारत के हिन्दुओं में भी यह कुप्रथा भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित थी। मुझे स्मरण हो आया कि 27 जून 2002 को नेपाल के हिन्दू राजा ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह ने भारत के कामाख्या मंदिर में देवी के समक्ष भैंसा, बकरा, भेड़, कबूतर तथा बत्तख की पंचबलि करवाई थी।

इस घटना के पश्चात् छः साल से भी कम समय में नेपाल की जनता ने राजा ज्ञानेन्द्र शाह को गद्दी से उतारकर, नेपाल से राजशाही का समपापन कर दिया था। मुर्गी के बच्चे की बलि के बाद समस्त मनुष्य उठकर चले गए किंतु जाने से पहले वहाँ उपस्थित प्रत्येक वस्तु को उठाकर अपने साथ ले गए। सड़क और चौराहा ऐसे साफ हो गए जैसे कुछ देर पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं था।

पपीते की सब्जी

जब मैंगवी गांव के बाहर चावल के खेतों में बने हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचे तो संध्या के छः बजे थे। सूर्य देवता पश्चिम में काफी नीचे आ गए थे किंतु दिन का उजाला अभी भी बना हुआ था। पिताजी की दृष्टि सर्विस अपार्टमेंट से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे खड़े पपीते के एक लम्बे पेड़ पर गई। पूरा पेड़ लम्बी आकृति के बड़े फलों से लदा हुआ था।

पिताजी ने पुतु से पूछा कि क्या हम एक पपीता तोड़ सकते हैं! पुतु ने कहा कि ये पपीते पूरे मौहल्ले के हैं, इन्हें कोई भी तोड़कर अपने उपयोग में ले सकता है किंतु उसे बाजार में बेच नहीं सकता। पुतु को यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि हम कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खाने वाले थे।

पिताजी ने ही वह पपीता तोड़ा। पपीता तोड़ने के प्रयास में पपीता उनकी नाक पर आ गिरा और उन्हें हल्की सी चोट भी लगी किंतु पपीते की सब्जी इतनी स्वादिष्ट बनी कि उसके लिए यह चोट सहन की जा सकती थी।

चावल के खेतों में चाय पीते और सूर्यास्त देखते हुए बीती संध्या

हिन्दुस्तानी आदमी की सबसे बड़ी विलासिता है, सामूहिक रूप से बैठकर चाय पीना। हमारे पास दूध पर्याप्त मात्रा में आ चुका था। हमने सर्विस अपार्टमेंट में घुसते ही चाय बनाई और चावल के खेतों में खुलने वाले उसी लॉन में बैठकर पी जहाँ से धरती स्वर्ग जैसी दीख पड़ती थी।

वह संध्या चावल के खेतों के बीच सूर्यास्त देखते हुए बीती। चाय का एक चरण पूरा होने पर दूसरा चरण भी आयोजित किया गया। गुलंगान पर्व के जुलूस अब भी हमारे मस्तिष्क में चलचित्रों की भांति चल रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप में तीसरा दिन (25)

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बाली द्वीप में तीसरा दिन

आज हमारा बाली द्वीप में तीसरा दिन था। आज हमें उलूवातू में वानर उद्यान तथा कुता शहर में राजा का महल देखने जाना था।

तीसरी सुबह 16 अप्रेल को भी आंख जल्दी ही खुल गई। सूर्योदय का आनंद हमने उसी लॉन में बोगनविलिया के छज्जे के नीचे बैठकर चाय पीते हुए लिया। आज भी हमने पुतु को लगभग दस बजे बुलाया था ताकि हम सुबह का नाश्ता और दिन का खाना बनाकर अपने साथ ले सकें।

मूंछों वाले बंदर

ठीक दस बजे पुतु गाड़ी लेकर आ गया और हम उसके साथ चल पड़े। सबसे पहले वह हमें उलूवातू के प्रसिद्ध मंकी गार्डन में ले गया। यहाँ पूरे उद्यान में लाल मुंह के एवं अपेक्षाकृत छोटे आकार के बंदर हैं जिन की मूंछें देखकर आश्चर्य होता है। उस उद्यान में बंदरों एवं अन्य पशु-पक्षियों तथा जलचरों की बहुत सारी मूर्तियां हैं जो दर्शक का ध्यान बरबास ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

यहाँ बहुत सी नर-प्रतिमाएं ऐसी हैं जिनकी आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। मोटे होठों और फूल हुए गालों वाली औरंगुटान की देहयष्टि वाली मनुष्य प्रतिमाएं यहाँ भी दर्शकों को आश्चर्य में डाल देती हैं। यहाँ एक भी प्रतिमा ऐसी नहीं है जिसे सामान्य माना जाए अथवा उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाएं कुछ पर्यटक बंदरों को खिलाने के लिए केले लाए थे।

कुछ बंदर पर्यटकों के हाथों से केले लेकर शालीन भाव से खा रहे थे किंतु कई बंदर केलों को प्राप्त करने के लिए पर्यटकों के कंधों और सिर पर आकर बैठ रहे थे। यहाँ स्थित कुछ मूर्तियों को दखने से अनुमान हुआ कि इस वन के बंदर शताब्दियों से मनुष्यों के सिर पर बैठते आए हैं। हम लगभग दो घण्टे उबुद वानर वन में रुके। इस वन को देखने का अनुभव कभी न भुलाए जाने वाले अनुभवों में से है।

राजा का उदास महल

मूर्तियों एवं मूंछों वाले बंदरों के संसार से निकल कर हम कुता शहर के मुख्य भाग में आ गए जहाँ हमें कुता के प्राचीन शासक का महल देखने को मिला। महल का काफी हिस्सा खण्डहर हो गया है तथा जो कुछ भी ठीक-ठाक अवस्था में है, वह लगभग बंद कर दिया गया है। यह लाल रंग की ईंटों से बना हुआ भवन समूह है। इन ईंटों का निर्माण भारत में बनने वाली ईंटों के समान प्रतीत होता हैं अर्थात् कच्चे गारे से बनी की ईंटों को तेज आंच में पकाया गया है। पूरा महल अपनी भव्यता को खोकर उदास सा खड़ा हुआ प्रतीत होता है।

जन सामान्य के बीच नृत्य-नाटिका

इस महल के एक हिस्से में कुछ स्थानीय महिला एवं पुरुष कलाकार इण्डोनेशियाई भाषा में किसी नृत्य-नाटिका का अभ्यास कर रहे थे। निकट बने लकड़ी के एक बड़े मण्डप में बहुत से कलाकार विविध प्रकार के वाद्ययंत्र बजा रहे थे। इनमें से अधिकांश वाद्ययंत्रों की आकृतियां भारतीय वाद्ययंत्रों से मेल नहीं खातीं। संसार के विभिन्न देशों से आए हुए दर्जनों  पर्यटक इन कलाकारों को देखने के लिए उन्हें घेरा बनाकर खड़े थे। यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा था कि यहाँ नृत्य-नाटिकाओं के कलाकार खुले स्थान पर आकर अभ्यास करते हैं जबकि भारत में इस प्रकार का अभ्यास प्रायः बंद कमरों में किया जाता है।

इतिहास एवं संस्कृति की पुस्तकें

इस महल के चारों ओर, कुता का अत्यंत व्यस्त बाजार है। महल से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर हमें एक बड़ा बुक-स्टोर मिला जिसमें इण्डोनेशिया के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बन्धित कई पुस्तकें उपलब्ध थीं। अन्य वस्तुओं की तरह किताबें भी बहुत महंगी थीं। फिर भी हमने अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुन लीं।

कलाकृतियों की दुकानों में सन्नाटा

यहाँ से पुतु हमें टैरेस फील्ड्स की तरफ ले गया जहाँ पहाड़ियों की ढलानों को सीढ़ी की तरह समतल बनाकर वहाँ चावल की खेती की जाती है। वहाँ तक जाने के लिए हमें एक नगरीय क्षेत्र से होकर निकलना पड़ा। यह देखकर हमारे आश्चर्य का पार नहीं था कि सड़क के दोनों ओर सजावटी कलाकृतियों की सैंकड़ों दुकानें स्थित थीं। बांस, लकड़ी तथा अन्य सामग्री से बनी कलाकृतियां। अत्यंत सुंदर पेंटिंग, सैंकड़ों तरह के समुद्री जीवों के खोल, रंग-बिरंगे आभूषण, क्या नहीं था वहाँ!

इनमें से आधी से अधिक दुकानें बंद थीं तथा खुली हुई दुकानों में भी शायद ही किसी दुकान पर कोई ग्राहक खड़ा हुआ दिखाई दिया। यह बाली के लोगों के जीवन की वास्तविकता थी। यहाँ बहुत से परिवारों की आजीविका पर्यटकों के आगमन पर टिकी हुई है। चूंकि यह पर्यटकों के आने का मौसम नहीं था और बाली द्वीप पर बहुत कम पर्यटक मौजूद थे इसलिए इन दुकानों पर सन्नाटा था।

राइस टैरेस फील्ड्स

यह एक पहाड़ी क्षेत्र था, यहाँ बहुत सघन वनावली के बीच, चावल के टैरेस फील्ड्स स्थित थे। कुछ खेतों में किसान काम कर रहे थे। उनकी नुकीली शंक्वाकार टोपियां देखने वाले का मन मोह लेती हैं। हमें लग रहा था जैसे हम अलग ही संसार में आ गए हैं।

पुतु ने एक स्थान पर गाड़ी रोककर हमें वहाँ से पैदल चलकर पहाड़ी उतरने तथा लगभग आधा किलोमीटर दूर दिखाई दे रही पहाड़ी पर पहुंचकर टैरेस फील्ड्स का आनंद लेने के लिए कहा। हमने बहुत से पर्यटकों को वहाँ जाते हुए भी देखा। हमारे पैरों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हम एक पहाड़ी उतर कर और दूसरी पहाड़ी चढ़कर वहाँ तक पहुंचें और फिर इतना ही चलकर लौटें। इसलिए हमने वहाँ जाना टाल दिया तथा अगले गंतव्य के लिए चलने का अनुरोध किया।

जंगल में मंगल

थोड़ी देर चलने पर चावल के खेतों की शृंखला समाप्त हो गई तथा सघन पहाड़ियां आरम्भ हो गईं। यहाँ इतना सघन वन था कि हरीतिमा अपने चरम पर पहुंच गई प्रतीत होती थी। हमने पुतु से अनुरोध किया कि किसी स्थान पर गाड़ी रोक ले जहाँ हम दोपहर का भोजन कर सकें।

पुतु यहाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित था। शीघ्र ही उसने सड़क के किनारे बने एक मंदिर के निकट स्थित बरामदे को तलाश लिया। यहाँ कोई मनुष्य नहीं था। मंदिर पर ताला पड़ा हुआ था तथा बारामदा भी पूरी तरह खाली था। हमने वहीं बैठकर भोजन करने का निर्णय लिया। जंगल में परिवार के साथ बैठकर इस प्रकार भोजन करने का हमारा यह पहला ही अवसर था। इस भोजन में ऐसा स्वाद आया जिसका वर्णन करना संभव नहीं है।

दान-पुण्य एवं पूजा वाली थाली

जहाँ बैठकर हमने भोजन किया, उसके निकट एक बंद दुकान थी जिसके बाहर लगे सूचीपट्ट से ज्ञात होता था कि यहाँ नारियल, पुष्प एवं अन्य पूजन सामग्री बिकती थी। इस सूचीपट्ट पर रोमन लिपि में यह शीर्षक अंकित था- ”दान पुण्य पूजा वाली रिंग पुरा दालेम” अर्थात् दान-पुण्य एवं मंदिर में पूजा की गोल थाली की वस्तुओं के मूल्य। इस सूची की वस्तुओं के नाम तो मेरी समझ में नहीं आए किंतु उनकी दरों को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता था कि ये बहुत महंगी थीं।

चूजे के करतब

हम भोजन कर ही रहे थे कि किसी पक्षी का एक रंगीन चूजा कहीं से भटक कर हमारे पास आ गया। यह चटख पीले रंग का पक्षी था जो उड़ नहीं सकता था। जैसे ही डेढ़ साल की दीपा की दृष्टि उस पर पड़ी, वह उसके पीछे लग गई। चूजा भी जैसे उसी के साथ खेलने आया। वह गोल-गोल घूमता हुआ दीपा को अपने पीछे दौड़ाने लगा। दीपा ने बहुत प्रयास किया किंतु उसे पकड़ नहीं सकी। जब दीपा थककर रुक जाती, चूजा उसके पास आकर खड़ा हो जाता और दीपा फिर से उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ती। यह क्रम काफी देर तक चला।

देवता का थान

भोजन करने के बाद हम लोग ऐसे ही थोड़ा बहुत पैदल चलकर जंगल देखने लगे। मैंने देखा कि निकट ही एक अन्य चबूतरा बना हुआ था जिसके चारों ओर लगभग डेढ़ फुट ऊंची चारदीवारी थी। मैं उत्सुकतावश उसके निकट चला गया। चबूतरे पर एक छोटा सा देवरा बना हुआ था जिसमें पत्थर की एक अनगढ़ प्रतिमा रखी थी। थान के पीछे की ओर एक लम्बा पेड़ खड़ा था जिससे देवालय पर छाया हो रही थी। यह लगभग वैसा ही था जिस प्रकार राजस्थान में खेजड़ी के नीचे गोगाजी और बायासां के थान होते हैं। मैंने इस थान की कई तस्वीरें उतारीं।

इन्द्र का मंदिर

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जंगल में लंच का आनंद उठाकर हम फिर से पुतु की गाड़ी में चल पड़े। इस बार वह हमें पहाड़ों के बीच बने एक मंदिर ले गया। यह इन्द्र को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था। मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता और वापस ऊपर चढ़ना पड़ता। इसके लिए हमारे दल के सदस्य तैयार नहीं थे। हमारी अन्यमनस्कता का एक कारण यह भी था कि इस छोटे से मंदिर को देखने के लिए हमें अच्छी-खासी राशि व्यय करके टिकट खरीदने पड़ते। भारतीय होने के कारण हमें मंदिर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना जंच नहीं रहा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए अलग से टिकट लेना पड़ रहा था। इसलिए हमने मंदिर तक उतरने का विचार त्याग दिया और मंदिर परिसर तथा भवन को ऊपर सड़क पर खड़े होकर देखा। यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जान पड़ता था। बाली की परम्परा के अनुसार पूरा मंदिर काले पत्थर का बना हुआ था जिसकी दीवारों पर उगी हुई काई यह बता रही थी कि यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है तथा दीवारें वर्ष में अधिकांश दिनों में भीगी रहती हैं।

मंदिर परिसर में बने जल-कुण्ड और उनमें कमल के पुष्प इस तरह का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे जिस तरह के दृश्यों का अंकन भगवान वेदव्यास ने महाभारत में कई स्थानों पर किया है। विशेषकर यक्ष-प्रश्न वाले प्रकरण में।

झरने से निराशा

पुतु ने हमें एक प्राकृतिक जल प्रपात तक ले जाने का निर्णय लिया। यह बहुत हरा-भरा पहाड़ी स्थान था। यहाँ भी इण्डोनेशियाई सरकार के पर्यटन विभाग ने टिकट लगा रखा था। गाड़ी खड़ी करने के लिए भी अलग से राशि चुकानी पड़ती थी।

 चूंकि हमने सुबह से केवल गाड़ी में भ्रमण किया था तथा पैदल चलकर किसी भी स्थान को निकट से नहीं देखा था। इसलिए यहाँ हमने रुकने का निर्णय लिया। लगभग आधा किलोमीटर तक पैदल चलकर तथा कुछ सीढ़ियां उतर कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ से झरना दिखाई देता था। इस पूरे मार्ग में बहुत से रेस्टोरेंट थे जिनमें नारियल, ब्लैक कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, चिकन, फिश, आमलेट जैसी बहुत सी चीजें बिक रही थीं किंतु इनमें से एक भी चीज हमारे काम की नहीं थी। हम चाय पीना चाहते थे किंतु बाली में चाय, वह भी दूध वाली चाय का मिलना असंभव जैसा ही था।

 जिस स्थान से झरना दिखाई देता था, मैं और पिताजी वहीं रुक गए। मधु, बच्चों को साथ लेकर झरने के निकट तक गई। झरना यहाँ से लगभग एक किलोमीटर और दूर था। यह इतना छोटा था कि मुझे लगा कि इससे बड़े झरने तो वर्षाकाल में रेगिस्तान के बीच स्थित अरणा-झरणा की पहाड़ियों में दिखाई देते हैं।

यह देखकर अफसोस हुआ कि इसे दिखाने के लिए भी इण्डोनेशियाई सरकार पर्यटकों से टिकट के पैसे वसूल रही है। लगभग एक घण्टे बाद मधु ने लौटकर बताया कि यह स्थान उनके लिए है जो शराब पीकर झरने में नहाने का आनंद लेना चाहते हैं। नीचे शराब की कुछ दुकानें हैं जहाँ से यूरोपीय पर्यटक शराब खरीद रहे हैं और झरने में नहा रहे हैं।

सर्विस अपार्टमेंट को वापसी

शाम के लगभग तीन बज चुके थे। हम सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट पड़े। यहाँ से मैंगवी लगभग दो घण्टे की दूरी पर था। वहाँ पहुंचते-पहुंचते सूर्य देव का प्रकाश कम होने लगा। सर्विस अपार्टमेंट में पहुंचते ही भानु ने चाय बनाई और हमने उसी शीशे वाले बरामदे के सामने बने लॉन में बैठकर पी जो सीधा चावल के खेतों में खुलता था। गर्म चाय पाकर आनंद का कोई पार नहीं था। इस प्रकार बाली द्वीप में तीसरा दिन पूरा हुआ। पूरा दिन नए अनुभवों से भरा हुआ रहा।

हमें पुतु ने बताया कि अगले दिन हम एक-दो मंदिर तथा समुद्र-तट देख सकते हैं किंतु हमने अगला दिन विश्राम के लिए निर्धारित किया। हमें जोधपुर से चले लगभग एक सप्ताह हो गया था और अब हमें आराम की जरूरत थी। अब तक जो कुछ भी देखा था, उसे भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता थी। इसलिए हमने पुत्तु से कहा कि वह अगले दिन न आए।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

बाली द्वीप में चौथा दिन (26)

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तमन अयुन जल मंदिर

आज हमारा बाली द्वीप में चौथा दिन था। आज का दिन हमने मेंगवी गांव के विश्रामगृह में ही बिताने का निश्चित किया था। इसलिए हमने दिन में मेंगवी गांव तथा उसके आसपास का क्षेत्र देखने का निर्णय लिया।

17 अप्रेल को भी नींद प्रातः पांच बजे के आसपास खुल गई। इस समय भारत में तो ढाई बज रहे होंगे। आज का दिन भी हमने चावल के खेतों में बने हुए लॉन में चाय पीने से आरम्भ किया। चूंकि आज पुतु को नहीं आना था, इसलिए हम ज्यादा रिलैक्स की स्थिति में थे।

सुबह-सवेरे ही मैं लैपटॉप लेकर बैठ गया और पिछले तीन दिनों की यात्रा के अनुभवों को लिखने का प्रयस करने लगा। दस बजे के लगभग मधु ने कहा कि आज थोड़ी देर के लिए पैदल ही घूम आते हैं। इसलिए मैं, विजय और मधु पैदल ही पुरा तमन अयुन टेम्पल की तरफ चल पड़े।

मुख्य द्वार पर स्वस्तिक एवं गणेश

हम आज उस मार्ग पर चले जो खेतों के बीच से न होकर, गांव के बीच से होकर जाता था। हमने देखा कि अधिकांश घरों के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर या तो गणेशजी की प्रतिमा स्थापित है या फिर वहाँ स्वस्तिक आकृति अंकित है जिसे भारत में गणेशजी का प्रतीक माना जाता है। मार्ग में कुछ मंदिर देखे जिनके बाहर उसी प्रकार द्वारपाल बने हुए थे जिस प्रकार भारत में बनाए जाने की परम्परा है।

अंतर केवल इतना था कि भारत में द्वारपालों को प्रमुखता नहीं दी जाती है इसलिए सहज ही उन पर ध्यान नहीं जाता जबकि बाली में मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर द्वारपालों की मनुष्याकार प्रतिमाएं प्रमुखता से स्थापित की गई हैं जिन पर चटख रंग किये गए हैं।

चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं का विचित्र संसार

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तमन अयुन पुराडेसा मंदिर के मार्ग में हमारी दृष्टि अचानक एक विकराल स्त्री प्रतिमा पर गई। लगभग आठ फुट ऊंची यह विकराल प्रतिमा एक भवन की दीवार के बाहरी आले में लगी हुई थी। हमारा ध्यान उस भवन की ओर गया। यह एक प्रदर्शनी थी जिसमें बाली शैली के देवी-देवताओं और राक्षसों की सात से आठ फुट ऊँची प्रतिमाएं लगी हुई थीं। पैदल चलने के कारण हम थक चुके थे और भीतर जाने की हिम्मत नहीं थी। अभी तो हमें वापस भी लौटना था। इसलिए हमने विजय से कहा कि वह इस प्रदर्शनी का वीडियो बना लाए। हम उस वीडियो को ही देख लेंगे। इस प्रदर्शनी देखने के लिए पच्चीस हजार रुपए का टिकट था। जब विजय वीडियो बनाने प्रदर्शनी घर में चला गया तो मैं और मधु प्रदर्शनी घर के बाहर ही बैठ गए। विजय द्वारा बनाकर लाई गई वीडियो में हम चुड़ैलों, राक्षसों और देवी-देवताओं के अनोखे संसार को देखकर दंग रह गए। इसमें रामायण और महाभारत के प्रसंगों को दर्शाने वाली प्रतिमाएं थीं तो शिव-पार्वती, श्रीराम-जानकी आदि की बहुत सुंदर प्रतिमाएं भी थीं। सभी प्रतिमाएं विशुद्ध बाली शैली में थी। इनका अंग-सौष्ठव भिन्न प्रकार का था।

प्रतिमाओं पर तेज चटख रंग किये हुए थे। प्रदर्शनी देखने के बाद हम अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट आए। शेष दिवस बाली यात्रा के संस्मरण लिखते हुए निकला। बाली द्वीप में चौथा दिन पूरा हुआ।

बाली द्वीप से जावा द्वीप पर

18 अप्रेल को हमें बाली द्वीप से विदा लेनी थी। हमारा विमान दोपहर 2.00 बजे का था किंतु हमने पुतु को प्रातः 9.00 बजे ही बुला लिया था। मैंगवी अर्थात् जिस स्थान पर हम ठहरे हुए थे, से देनपासार हवाई अड्डे की दूरी लगभग डेढ़ घण्टे की थी। देनपासार से हमें योग्यकार्ता जाना था जो कि जावा द्वीप पर स्थित है तथा इण्डोनेशिया के प्रमुख शहरों में से एक है। इसे जोगजकार्ता तथा जोगजा के नाम से भी जाना जाता है।

बाली से योग्यकार्ता की हवाई दूरी 502 किलोमीटर है। इसलिए यह केवल 1 घण्टे 10 मिनट की घरेलू उड़ान थी। चूंकि बाली का समय योग्यकार्ता से एक घण्टे आगे है। इस कारण जब हम 2.00 बजे बाली से रवाना होकर तथा 1 घण्टे 10 मिनट की यात्रा करने के पश्चात् योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर उतरे तो हमारी घड़ियों में 2.10 बज रहे थे।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

जावा द्वीप पर पांच दिन (27)

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बाली द्वीप पर पांच दिन बिताने के बाद आज से हमारे जावा द्वीप पर पांच दिन आरम्भ हो रहे थे। जावा द्वीप संसार का ऐसा भूभाग है जहाँ आज से लाखों साल पहले बंदरों ने मानव का रूप धारण किया था। संस्कृत साहित्य में इसका उल्लेख यवद्वीप के नाम से किया गया है। वैदिक काल में यहाँ अवश्य ही जौ के खेत रहे होंगे, इसीलिए भारतीय ऋषियों ने इसे यव द्वीप कहा।

जावा द्वीप पर पहला दिन

जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूं कि हमने एक वैबसाइट के माध्यम से योग्यकार्ता में एक सर्विस अपार्टमेंट बुक करवा रखा था। यह मासप्रियो नामक मुस्लिम शिक्षक का फ्लैट था। उसने हमें भरोसा दिलाया कि हम उसके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी।

इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने उन्हें भोजन बनाने के लिए मना कर दिया था क्योंकि हमारी संतुष्टि भारतीय प्रकार के भोजन से ही होने वाली थी। इम इस बात से आशंकित भी थे कि हर देश में शाकाहारी होने की परिभाषा बिल्कुल अलग है।

जो भी हो, वैबसाइट पर उपलब्ध चित्रों के आधार पर हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया। सर्विस अपार्टमेंट के मालिक मि. मासप्रियो ने हमारे लिए एक ड्राइवर का प्रबंध किया जो हमें योग्यकार्ता एयरपोर्ट पर लेने के लिए आने वाला था। एयरपोर्ट से सर्विस अपार्टमेंट तक की टैक्सी के लिए 750 भारतीय रुपए भाड़ा बताया गया था, जो हमें ठीक ही लगा।

मि. अन्तो से भेंट

हमारी आशा के अनुरुप मि. मासप्रियो द्वारा भेजा गया ड्राइवर एयरपोर्ट के बाहर विजय के नाम की कागज की पट्टी लेकर खड़ा था। यह एक गोरे रंग और मंझले कद का हंसमुख युवक था। उसने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया तथा भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। इस अभिवादन का जादू हमें विदेशी धरती पर जाकर ही ज्ञात हुआ।

जैसे ही कोई इण्डोनेशियन व्यक्ति हाथ जोड़कर अभिवादन करता तो हमारे और उसके बीच की आधी दूरी उसी समय समाप्त हो जाती। ड्राइवर ने हमें अपना नाम अन्तो बताया तथा हम सबसे भी हमारे नाम पूछे। मुझे अनुमान है कि उसने उसी समय हमारे नाम याद भी कर लिए क्योंकि कुछ समय बाद उसने मुझे मि. मोहन कहकर सम्बोधित किया।

उसके बाद मैंने भी उसे मि. अन्तो कहकर ही सम्बोधित किया। मैंने नोट किया कि जब भी मैं उसे मि. अन्तो कहता था तो उसके चेहरे पर विशेष प्रकार की मुस्कान आती थी। मि. अन्तो ने हमारे सामान को अपनी गाड़ी में जमाया। उसकी गाड़ी भी मि. पुतु की गाड़ी की तरह काफी बड़ी थी और हम अपने परिवार तथा सामान सहित मजे से उसमें बैठ गए।

आई एम सॉरी

अभी गाड़ी कुछ मीटर ही सरकी होगी कि मि. अन्तो ने आगे की सीट पर बैठे पिताजी से कहा- ‘आई एम सॉरी, सीट बैल्ट प्लीज!’ पिताजी ने भी उससे क्षमा मांगते हुए सीट बैल्ट लगाई। बाद में ज्ञात हुआ कि कुछ भी बोलने से पहले ‘आईएम सॉरी’ तथा बात के अंत में ‘थैंक्यू’ कहना उसकी आदत थी।

आगे चलकर हमें उसकी कुछ और अच्छी आदतें ज्ञात हुईं। गाड़ी रोकते ही वह नीचे उतर कर कार का दरवाजा खोलता था और गाड़ी चलाने से पहले वह स्वयं सारे दरवाजे जांचता था कि वे बंद हुए हैं या नहीं। इस कार्य में वह बहुत ही कम समय लगाता था। उसकी एक अच्छी आदत यह भी थी कि जहाँ कहीं जरूरी होता था, वह हमें मार्ग में पड़ने वाले स्थान के नाम अथवा उसकी विशेषता के बारे में संक्षेप में अवश्य बताता था।

योग्यकार्ता की चमचमाहट

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जब मि. अन्तो की गाड़ी एयरपोर्ट से बाहर निकलकर योग्यकार्ता की सड़कों पर फर्राटे भरने लगी तो हम इस नगर की चमक-दमक देखकर दंग रह गए। यह पूना जैसा एक बड़ा एवं आधुनिक शहर है। सड़कें काफी चौड़ी हैं जो डिवाइडर के  माध्यम से दो प्रमुख हिस्सों में बंटी हुई हैं। प्रत्येक हिस्सा पुनः दो हिस्सों में बंटा हुआ है, बाईं ओर का हिस्सा दो पहिया वाहनों के लिए और दायीं ओर का हिस्सा चार पहिया वाहनों के लिए। इस व्यवस्था से वाहन तेजी से चल पा रहे थे और सड़क पर हॉर्न बजाने की नौबत ही नहीं आती थी। बीच-बीच में लालबत्ती पर जेबरा क्रॉसिंग की व्यस्था थी जहाँ से पैदल यात्री आसानी से आ-जा रहे थे। पूरी सड़क एकदम साफ-सुथरी, कहीं कोई भिखारी नहीं। चौराहों पर खड़े होकर सामान बेचने वाले अवांछित वैण्डर्स तक नहीं। सड़क के दोनों ओर भव्य बाजार था जिसका सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इस क्षेत्र में बड़े मॉल और भव्य दुकानों की संख्या का कोई अंत नहीं था। लगभग आधा-पौन घण्टे तक योग्यकार्ता की सड़कों पर चलने के बाद हम समझ गए कि बाली और योग्यकार्ता में कोई समानता नहीं है।

बाली की शांत और सीधी-सरल जिंदगी, योग्यकार्ता के चमक भरे आकर्षण से बिल्कुल अलग है। योग्यकार्ता की तुलना में बाली को साफ-सुथरा और सभ्य देहात ही कहा जा सकता है। हालांकि वहाँ भी कुता जैसे शहर हैं, किंतु वे योग्यकार्ता की तुलना में काफी छोटे हैं।

मॉल की चमक-दमक और लड़कियों का शानदार व्यवहार

हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि किसी शॉप से हमें दूध एवं सब्जियां खरीदनी हैं तो वह हमें एक मॉल में ले गया। मैं और विजय मॉल के भीतर गए। परिवार के शेष सदस्य गाड़ी में बैठे रहे। इस मॉल की संसार के किसी भी भव्य मॉल से तुलना की जा सकती थी। कांच और प्रकाश के घालमेल से बना हुआ एक अनोखा और चमचमाता संसार ही था वह।

हमने वहाँ कुछ लोगों से बात करने का प्रयास किया ताकि हम पता कर सकें कि हमें दूध और सब्जियां किस हिस्से में अथवा किस मंजिल पर मिलेंगी किंतु हमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो अंग्रेजी जानता हो। वहाँ रोमन लिपि में इण्डोनेशियाई भाषा लिखी हुई थी जिसे समझना संभव नहीं था। इसलिए हमने अपने विवेक से ही दूध और सब्जियां तलाशने का निर्णय लिया। हमें शीघ्र ही एक मंजिल पर फल एवं सब्जियां दिखाई दीं।

यहाँ दुनिया के बहुत से देशों से आई हुई सब्जियां रखी थीं। कितनी तरह की प्याज या कितने तरह के आलू या कितने तरह के सेब या कितने तरह के टमाटर थे, कहा नहीं जा सकता। केले, तरबूजे और खरबूजे भी कई प्रकार के थे। यहीं से हमें दूध के बंद डिब्बे भी मिल गए।

हम इन जिंसों का भुगतान करने के लिए पेमेंट काउंटर पर गए तो हमें हर काउण्टर पर 18-20 साल की लड़कियां काम करती हुई दिखाई दीं। सभी के कान और सिरों पर स्कार्फ बंधे हुए थे। सभी के हाथ तेजी से काम करते थे। वे आनन-फानन में ग्राहक से भुगतान लेकर उसे निबटा देती थीं ताकि उसका समय खराब न हो।

उन्होंने हमें देखते ही पहचान लिया कि ये भारतीय हैं, अतः हाथ जोड़कर हमें नमस्ते कहा और मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया। बड़ी फुर्ती से उन्होंने हमारे सामान का बिल बनाया और हमसे भुगतान लेकर बचे हुए रुपए लौटाए। क्या भारत में इस प्रकार की शालीनता और तेजी से काम नहीं हो सकता, मैंने स्वयं से प्रश्न किया!

यह एक विशाल मॉल था। चारों तरफ ग्राहक थे किंतु भीड़-भड़क्का कहीं भी नहीं था। किसी प्रकार की कोई चिल्ल-पौं, धक्का-मुक्की, बेचैनी, भागमभाग, बदतमीजी, काम में ढिलाई, कुछ भी तो ऐसा नहीं कि इन लड़कियों के काम में कोई कमी निकाली जा सके। बहुत कम स्टॉल्स पर हमने नौजवान लड़कों को खड़े हुए देखा, वहाँ 90 प्रतिशत अथवा उससे अधिक संख्या में लड़कियां ही काम कर रही थीं।

निश्चित रूप से इण्डोनेशिया एक मुस्लिम देश है, इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। इस पर भी भारत संसार के समक्ष यह दावा बार-बार दोहराता है कि संसार के सर्वाधिक मुसलमान हमारे यहाँ रहते हैं किंतु दोनों देशों के मुसलमानों में कितना अंतर है!

भारत के मुसलमान अपनी गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और जनसंख्या वृद्धि के लिए जाने जाते हैं। भारत की मुस्लिम औरतें अभी तक बुरका और तीन तलाक में उलझी हुई हैं किंतु इण्डोनेशिया की मुस्लिम लड़कियों ने संसार के समक्ष सिद्ध कर दिया है कि उनके बराबर शालीन और सभ्य व्यवहार किसी देश की औरतें नहीं कर सकती हैं। वे हर कार्य को धैर्य, शांति और कौशलपूर्ण ढंग से निबटाती हैं।

आवासीय बस्तियों की चमक-दमक

मॉल से निकलकर हम पुनः पार्किंग में खड़ी मि. अन्तो की गाड़ी तक आए और गाड़ी फिर से चल पड़ी। एयरपोर्ट से लगभग एक घण्टा चलने के बाद बाजार का सिलसिला समाप्त हो गया और आवासीय बस्तियां आरम्भ हुई। यहाँ दुकानों की संख्या इक्का-दुक्का रह गई। आवासीय क्षेत्र में आलीशान कोठियों की कोई कमी नहीं थी। एक से बढ़कर एक भवन।

उजाड़ बस्ती में

हमें चलते हुए लगभग एक घण्टा हो गया था। अंत में आवासीय बस्तियों का यह चमकदार सिलसिला भी समाप्त हो गया और मि. अन्तो की गाड़ी एक ऐसी सड़क पर मुड़ गई जहाँ से एक उजाड़ सी बस्ती आरम्भ होती थी। गाड़ी को इस सड़क पर मुड़ते देखकर हमारा माथ ठनका।

यहाँ हरे रंग के पुते हुए छोटे-छोटे घर थे जिनके सामने मुर्गे दौड़ लगाते हुए दिखाई दिए। एक मस्जिद से लाउड स्पीकर पर अजान की आवाज आ रही थी। शीघ्र ही मि. अंतो की गाड़ी लोहे के एक बंद गेट के सामने रुक गई। यह वही दरवाजा था जिसका चित्र हमने वैबसाईट पर देखा था। बाहर से हालात अच्छे नहीं लगे किंतु हमने गाड़ी से सामान उतारना आरम्भ किया।

सच्चाई से सामना होने पर हमारे होश उड़े

गेट के भीतर दस फुट लम्बा और तीन फुट चौड़ा एक संकरा सा प्लेटफार्म नुमा मार्ग, भवन मुख्य कक्षों तक जाता था। इस मार्ग के दोनों तरफ पानी का एक विशाल हौद था जिसमें काले रंग का गंदा पानी दिखाई दे रहा था। डेड़ वर्ष की दीपा इस हौद में कभी भी गिर सकती थी। हर समय-भागम-भाग मचाए रहने वाली दीपा को तो हर समय पकड़ कर भी नहीं रखा जा सकता। कभी तो आदमी का ध्यान चूकेगा ही!

कमरों की हालत और भी खराब थी। कमरों की छतों पर पंखे, एयरकण्डीशनर कुछ भी नहीं। दरवाजे टूटे हुए थे जिन पर लगी छोटी-छोटी कीलें, दरवाजों पर हाथ रखते ही चुभती थीं। दोनों कमरों में एक-एक टैबल फैन रखा था जिनमें से कठिनाई से ही हवा निकल रही थी।

दोनों कमरों में एक-एक छोटी सीएफएल लटक रही थी जिनमें से बहुत कम उजाला फर्श तक पहुंच पा रहा था। वॉशबेसिन पर टोंटी नहीं थी और टॉयलेट की व्यवस्थाएं इतनी खराब थीं कि हमारा कलेजा कांप गया। दानों टॉयलेट में मल-त्याग के पश्चात् प्रक्षालन की व्यवस्था नहीं थी।

एक कमरे के टॉयलेट में दरवाजे के स्थान पर पर्दा टंगा हुआ था। टॉयलेटों की दीवार में एक-एक घुण्डी लगी थी जिसे घुमाने पर छत के पास टंगे एक फव्वारे से पानी आता था। कैसे रहा जाएगा यहाँ, हममें से हर कोई अपने आप से यही सवाल कर रहा था।

रसोई का पता किया तो ज्ञात हुआ कि वह अगले घर में है जहाँ मकान मालिक का भी भोजन बनता था। रसोई का फ्रिज खोला तो उसमें कटी हुई मछलियां और चिकन रखा था। मधु ने हाथ खड़े कर दिये कि वह उस रसोईघर में जाकर भोजन नहीं बनाएगी जहाँ पहले से ही फिश और चिकन रखा हुआ है। हमारे लिए भी यह संभव नहीं था कि हम वहाँ तैयार किया गया भोजन ग्रहण कर लें!

इस व्यवस्था को देखते-समझते शाम के साढ़े पांच बजे से ऊपर का समय हो गया। हाथों-हाथ पदरेश में दूसरा सर्विस अपार्टमेंट ढूंढना संभव नहीं था। होटल में जाना इसलिए संभव नहीं था कि वहाँ भोजन तैयार करने की सुविधा नहीं होगी। हमने मकान मालिक से पूछा कि क्या आसपास और कोई दूसरा अपार्टमेंट मिल सकता है जो अधिक सुविधाजनक हो!

मि. मासप्रियो ने स्पष्ट मना कर दिया। हमने मि. अन्तो से पूछा, उसने भी कहा कि वह किसी होटल में तो ले जा सकता है किंतु किसी सर्विस अपार्टमेंट के बारे में नहीं जानता।

चूंकि योग्यकार्ता का समय बाली के समय से एक घण्टा पीछे था जबकि वास्तविक दूरी केवल 502 किलोमीटर ही थी, इसिलिए यहाँ अंधेरा बहुत जल्दी हो गया था। अफरा-तफरी करने से कुछ नहीं होने वाला था। इसलिए हमने धैर्य से काम लेने का निश्चय किया।

मि. मासप्रियो से अनुरोध किया गया कि वह एक गैस और चूल्हे का प्रबंध हमारे कक्षों के सामने के संकरे से बरामदे में कर दे, लकड़ी की एक टेबल लगा दे और बाजार से आरओ वाटर की बीस लीटर की बोतल मंगवा दे ताकि हम अपना भोजन इस बरामदे में तैयार कर सकें। हमारी दशा देखकर मि. मासप्रियो को हम पर दया आ गई। उसने हमारी ये मांगें पूरी कर दीं।

मुसीबत पर मुसीबत

इधर तो मधु और भानु चाय तथा भोजन तैयार करने में जुटीं और उधर मैं और विजय इण्टरनेट के माध्यम से अगले तीन दिनों के लिए कोई अन्य सर्विस अपार्टमेंट बुक करवाने में जुटे। यहाँ भी एक संकट खड़ा हो गया। कमरों के भीतर वाई-फाई की कनैक्टिविटी नहीं मिल रही थी और कमरे के बाहर लैपटॉप नहीं चल पा रहा था क्योंकि थोड़ी देर चलने के बाद लैपटॉप की बैटरी डिस्चार्ज हो गई।

बरामदे में कोई इलेक्ट्रिक सॉकेट नहीं था जहाँ से लैपटॉप जुड़ सकता था। हम लगभग तीन घण्टे तक प्रयास करते रहे, जैसे-तैसे हमने एक सर्विस अपार्टमेंट चुन तो लिया किंतु उसकी बुकिंग नहीं हो पाई क्योंकि वाईफाई की लो-कनैक्टिविटी के कारण हमारे पासपोर्ट की स्कैन कॉपी वैबसाईट तक नहीं पहुंच पा रही थी।

सुषमा ने किया समाधान

विजय ने अपनी छोटी बहिन सुषमा से सम्पर्क कर उसे अपनी समस्या बताई। इन्फोसिस में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम कर रही सुषमा वैसे तो चण्डीगढ़ रहती है किंतु इस दिन वह अपने ससुराल नई दिल्ली आई हुई थी। सुषमा के पति अर्थात् मेरे जामता उस दिन अपनी कम्पनी के काम से कतर थे।

सुषमा ने दिल्ली से हमारे लिए उसी सर्विस अपार्टमेंट की बुकिंग करवा दी जो हमने वैबसाइट पर देखकर चुना था। इसका चैक-इन टाइम दिन में दो बजे के बाद का था किंतु हम वहाँ प्रातःकाल में शिफ्ट हो जाना चाहते थे। इसलिए विजय ने सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन मिस रोजोविता से सम्पर्क किया तथा उसे अपनी समस्या बताई। मिस रोजोविता ने कहा कि अपार्टमेंट की सफाई करवाने में समय लगेगा। इसलिए हम प्रातः 8 बजे नहीं अपितु प्रातः 11 बजे आ सकते हैं।

मुर्गे बोलते रहे, मुल्ले बांग देते रहे और मच्छर काटते रहे

जैसे-तैसे भोजन करके हम लोग सोए। रात निकालनी तो कठिन थी किंतु मन में इस बात से शांति भी थी कि केवल एक रात की ही बात है। हम तकलीफ सहन कर सकते थे किंतु गंदगी में बना भोजन, मांस-मछली की गंध और टॉयलेट में मलत्याग के पश्चात् शरीर को साफ करने की व्यवस्था के अभाव की स्थिति को सहन करने में सक्षम नहीं थे।

दोनों कमरों के पंखों में से पूरी रात हवा नहीं निकली। गंदे पानी के हौद के कारण मच्छर बड़ी संख्या में मौजूद थे और पूरी रात हिन्दुस्तानी खून की दावत उड़ाते रहे। हर थोड़ी देर में गली में उपस्थित कोई न कोई मुर्गा बांग देता रहा और थोड़ी थोड़ी देर में पास की किसी मस्जिद से मुल्ला द्वारा दी जा रही अजान की आवाज गूंजती रही।

नींद का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था। यह कैसी रात थी! मैंने कुछ रातें भारत-पाक सीमा पर पूरी-पूरी रात जीप में यात्रा करते हुए भी बिताई हैं, किंतु ऐसी खराब अनुभूति तो तब भी नहीं हुई।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

जावा द्वीप पर दूसरा दिन (28)

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जावा द्वीप पर दूसरा दिन

जैसे-तैसे प्रातः हुई। हम अपनी आदत के अनुसार प्रातः पांच बजे उठ गए। इसी के साथ जावा द्वीप पर हमारा दूसरा दिन आरम्भ हो गया। पहले दिन का अनुभव बहुत बुरा रहा था। आज का दिन हम उतना बुरा नहीं बिताना चाहते थे।

गंदगी और बदबू से विदा तथा मासप्रियो का उपदेश

टॉयलेट में हमने अपने स्तर पर व्यवस्थाएं कीं। मधु और भानु ने बाहर उसी बरामदे में चाय बनाई और चिवड़ा भी तैयार कर लिया। ठीक नौ बजे मि. अन्तो अपनी गाड़ी लेकर आ गया। हमने गाड़ी में सामान रखा और मकान मालकिन से विदा लेने के लिए पास वाले घर में गए क्योंकि मासप्रियो इस समय स्कूल गया हुआ था।

मकान मालकिन कम उम्र की भली सी लड़की थी। उसकी आंखें बता रही थी कि उसे अपने अतिथियों को हुई तकलीफ के लिए खेद था। संभवतः उसका पति समझ ही नहीं पाया होगा कि बेहतर आवासीय सुविधा किसे कहते हैं, सफाई में रहना किसे कहते हैं, और एक शाकाहारी परिवार के लिए मांस-मछली की उपस्थिति से होने वाली तकलीफ किसे कहते हैं!

विजय ने चलते समय मि. मासप्रियो को एक मेल लिखा कि हम जा रहे हैं हम क्षमा चाहते हैं कि हम यहाँ अधिक नहीं रुक सके। इस पर मासप्रियो ने मेल पर ही विजय को उपदेश दिया कि आपको सावधानी से अपने लिए अपार्टमेंट बुक करवाने चाहिये। आपके साथ छोटी बच्ची है, दादाजी हैं, स्त्रियां हैं और आप इतने लापरवाह हैं।

हम तो प्राकृतिक वातावरण चाहने वालों को अपना अपार्टमेंट देते हैं। बहुत से देशों के विदेशी यहाँ आकर ठहरे हैं और उन्होंने यहाँ की सुविधाओं की तारीफ की है। आपको पता होना चाहिये कि दिन में काटने वाले मच्छरों से डेंगू होता है। संभवतः वह यह कह रहा था कि मासप्रियो ने हमें बिना डेंगू वाले मच्छरों  के बीच रखा था और अब हम जहाँ जा रहे हैं वहाँ हमारा सामना डेंगू वाले मच्छरों से होगा।

उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली स्थिति संभवतः इसी को कहते हैं। उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था कि हमें कितनी परेशानी हुई थी और वैबसाइट को दिये गए हमारे रुपए भी बर्बाद हो गए थे। मासप्रियो के उपदेशों का क्या प्रत्युत्तर दिया जा सकता था।

संभवतः मासप्रियो सही कह रहा था क्योंकि जिन विदेशियों को यहाँ की सुविधाएं पसंद आई होंगी उनमें ताजे मुर्गे की उपलब्धता, गंदे पानी के हौद में से स्वयं ही मछलियों को छांटकर पकवाने की सुविधा और गली में बहुतायत से फिर रहे सूअरों की हर समय उपलब्धता जैसे सुविधाएं उन विदेशियों को शायद कहीं और नहीं मिलने वाली थीं।

उन्हें लैट्रिन धोने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि वे तो इस कार्य के लिए टिश्यू पेपर का प्रयोग करते हैं। शराब के नशे में धुत्त होने के बाद किसी पंखे और एसी की जरूरत भी उन्हें कैसे हो सकती थी। इसलिए उनके लिए यहाँ सुख ही सुख पसरा हुआ था।

वे लोग जो गंदगी और बदबू में रहना पसंद करते हैं, मांसाहार करते और शराब पीते हैं, उनकी दृष्टि में गलत हम ही हैं। हमारे जैसे लोग तो अपने ही देश में असहिष्णु कहलाते हैं क्योंकि हम गंदगी, बदबू, शराब और मांस से परहेज करने के कारण दूसरों के साथ सामंजस्य क्यों नहीं बैठा पाते, फिर यदि विदेश में हमें कोई उपदेश दे रहा था, तो शायद ठीक ही दे रहा था!

मि. अन्तो की निराशा

मि. अन्तो हमें योग्यकार्ता शहर के मध्य भाग में स्थित प्रेसीडेंसी बिल्डिंग दिखाने ले गया। इस बिल्डिंग को देखने के लिए अच्छा खासा टिकट था और हमें कार से उतरकर काफी पैदल भी चलना पड़ता। रात की अनिद्रा ने हमें इस लायक नहीं छोड़ा था कि हम इतना पैदल चलें।

भारत में ऐसी बिल्डिंगों को बिना कोई पैसा दिये देखा जा सकता है। इसलिए हमने इसे केवल बाहर से ही देखा। हमने भीतर जाने से मना कर दिया। मि. अन्तो को हमारी इस अरुचि से निराशा हुई किंतु वह मुस्कुराकर बोला ऑलराइट हम वाटर फोर्ट में चलते हैं जहाँ किंग अपनी क्वीन के साथ नहाता था।

बेचाक और डोकार

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राजा के महल के चारों ओर शानदार सड़कें बनी हुई थीं जिन पर कारों और पैदल चलने वालों को तांता लगा हुआ था। सड़क के एक किनारे पर खड़े हुए हमें विचित्र प्रकार के रिक्शे चलते हुए दिखाई दिए। इन्हें नई दिल्ली में चलने वाले साइकिल रिक्शों की तरह मनुष्य द्वारा चलाया जाता है किंतु उन्हें खींचने की बजाय धकेला जाता है। अर्थात् आगे की तरफ दो यात्रियों के बैठने की जगह बनी हुई है और रिक्शा चालक की सीट रिक्शे के पिछले भाग में बनी हुई है। ऐसा संभवतः पर्यटकों की सुविधा के लिए किया गया था ताकि वे आराम से सड़कों का व्यू देख सकें। हालांकि ऐसे रिक्शे में रिक्शा चालक को अधिक ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है। मि. अन्तो से ज्ञात हुआ कि पर्यटकों की सुविधा के लिए जालान मालियो से लेकर बोरो केरटॉन तक इसी तरह के रिक्शे चलते हैं जिन्हें जावाई भाषा में बेचाक (Becak) कहा जाता है। जावाई भाषा में अंग्रेजी के सी लैटर को हिन्दी भाषा का ‘च’ उच्चारित किया किया जाता है। शीघ्र ही हमारा ध्यान घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले तांगों पर गया। ये हल्के रथों की आकार में बने हुए हैं।

इस तरह के रिक्शे किसी समय दिल्ली की सड़कों पर भी चला करते थे। इन्हें जावाई भाषा में एन्डोंग एवं डोकार कहा जाता है।

जल महल और राजस्थानी परिधान वाली महिलाओं का समूह कुछ ही देर में हम लोग जल महल के सामने थे। यह एक बड़ा सा महल था जिसे चारों ओर ऊंची चारदीवारी से घेरा गया था। महल के बाहर एक सूचना पट्ट लगा हुआ था जिस पर इस स्थान का नाम नगायोग्यकार्ता तथा भवन का नाम कांटोर कागुनगन डालेम लिखा हुआ था।

हमारा सारा सामान कार में लदा हुआ था क्योंकि हम पुराना अपार्टमेंट खाली करके आए थे और नए अपार्टमेंट में पहुंचने का समय नहीं हुआ था। यद्यपि मि. अन्तो एक सुसभ्य और सुशिक्षित मनुष्य जान पड़ता था तथापि परदेश में किसी तरह का खतरा नहीं उठाया जा सकता था। अतः पिताजी कार में बैठे रहे और शेष सदस्य जल महल देखने कार से नीचे उतरे। यहाँ प्रति पर्यटक 25 रुपए का टिकट था।

यह वास्तव में एक भव्य जल महल था। एक ऐसा महल जिसके भीतर नहाने के ताल थे और उसके चारों ओर वस्त्र बदलने के कक्ष। महल कई हिस्सों में विभक्त था। हर हिस्से के प्रवेश-द्वार के ऊपर राक्षसी आकृतियों के चेहरे वाली मूर्तियां लगी हुई थीं। महल के मुख्य प्रवेश द्वार पर भी ऐसी ही एक मूर्ति का चेहरा लगा था।

संयोगवश उसी समय जल महल में महिलाओं का एक समूह आया जिसके परिधान देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। लगभग बीस महिलाओं के इस समूह की प्रत्येक महिला ने एक जैसे परिधान धारण कर रखे थे। दूर से देखने पर लगता था कि इन्होंने राजस्थानी महिलाओं की तरह छींट का घाघरा और गुलाबी रंग का ओढ़ना धारण कर रखा था किंतु निकट से देखने पर ज्ञात हुआ कि उन्होंने छींट का घाघरा नहीं अपितु एक चोगा पहन रखा था जिस पर सिर से लेकर कमर तक ओढ़ी गई गुलाबी ओढ़नी के कारण ऐसा लगता था कि उन्होंने राजस्थानी ढंग के परिधान धारण कर रखे हैं।

इन स्त्रियों से बात करके यह जानना कठिन था कि वे किस देश से अथवा इण्डोनेशिया के किस द्वीप आई हैं। वे सभी महिलाएं पढ़ी-लिखीं और शिष्ट जान पड़ती थीं किंतु अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थीं। उन्होंने धूप के चश्मे लगा रखे थे, हाई हील की सैण्डिलें पहन रखी थीं तथा उनके कंधों पर महंगे लेडीज बैग लटक रहे थे। वे सैल्फी भी ले रही थीं। यह तय था कि ये महिलाएं इस द्वीप की नहीं थीं क्योंकि इस द्वीप पर रहने वाली महिलाओं के परिधान भिन्न प्रकार के थे।

मिस रोजोविता से भेंट

जल महल से बाहर आते-आते हमें लगभग 11.30 बज गए। अब हम आराम से अपने नए सर्विस अपार्टमेंट जा सकते थे। इसलिए हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि वह हमें नए अपार्टमेंट में ले चले ताकि कार में लदा सामान वहाँ उतारा जा सके तथा दोपहर का भोजन बनाया जा सके। हम लोग मि. मासप्रियो के अपार्टमेंट से चाय और चिवड़ा लेकर निकले थे।

लगभग आधे घण्टे में हम नए अपार्टमेंट के सामने थे। यह अपार्टमेंट योग्यकार्ता स्पेशल रीजन के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र में स्थित है। इसे जावा द्वीप का मध्यवर्ती क्षेत्र कहा जा सकता है। जावा का राजा इसी क्षेत्र में निवास करता था, इसलिए इसे योग्यकार्ता स्पेशल रीजन कहा जाता है।

यहाँ गलियों और मकानों के नम्बर एक के बाद एक लगे हुए थे इसलिए मिस रोजोविता को ढूंढने में हमें कोई कठिनाई नहीं हुई। मिस रोजोविता हमें अपार्टमेंट के सामने वाले बंगले में मिल गईं। हमें ज्ञात हुआ कि हमने सर्विस अपार्टटमेंट के रूप में जिस बंगले को बुक करवाया था, ठीक उसके सामने वाले बंगले में मिस रोजोविता अपने परिवार के साथ रहती थीं।

मिस रोजोविता ने हाथ मिलाकर हम सभी का स्वागत किया। वे प्रसन्नचित्त, मिलनसार और हंसमुख क्रिश्चियन महिला हैं तथा बहुत पढ़े-लिखे परिवार की सदस्य हैं। उनके पिता किसी समय योग्यकार्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुआ करते थे और किसी जमाने में उन्हें अमरीका की एक प्रतिष्ठित संस्था द्वारा बैस्ट मैन ऑफ योग्यकार्ता सिटी का पुरस्कार दिया गया था। ये सारी जानकारी हमें बंगले में लगे मैडलों, पुरस्कारों और चित्रों के माध्यम से हुई।

नया अपार्टमेंट

हमारा नया अपार्टमेंट समस्त सुख-सुविधाओं से सम्पन्न एक आरामदेह अपार्टमेंट था, जहाँ दीपा आराम से खेल सकती थी और उसके किसी हौद में गिरने का खतरा नहीं था। हम मच्छरों की पिन-पिन, मुर्गों की बांग और मुल्लाओं की अजान सुने बिना, पूरी रात आराम से सो सकते थे। इस बंगले की किचन से लेकर बैडरूम, कॉमन रूम, लॉबी, बाथरूम तथा टॉयलेट, सभी कुछ एक विशिष्ट योजना के अनुसार बनाए गए थे।

किचन बहुत बड़ी थी जिसमें खाना बनाने के साथ-साथ, बड़ी डायनिंग टेबल लगी हुई थी। फ्रिज, गैस-प्लेट और वाटर कूलर से लेकर कीमती क्रॉकरी, कटलरी, यूटेन्सिल्स, मिनरल वॉटर किसी चीज की वहाँ कमी नहीं थी। सब-कुछ बहुत साफ-सुथरा और सलीके से लगा हुआ था।

सारे कमरों में आरामदेह डलब-बैड सोफे और एयरकण्डीशनर लगे हुए थे। टीवी देखने के लिए अलग से एक कमरा था जहाँ बहुत महंगा सोफा रखा था। ड्राइंगरूम में केन का महंगा फर्नीचर था और एक कोने में एक्सरसाइज करने के लिए साइकिल भी रखी हुई थी। यह ऐसा घर था जिसका आराम किसी पांच सितारा होटल में भी उपलब्ध नहीं हो सकता था।

इस घर के लिए हमें बहुत कम राशि व्यय करनी पड़ी थी जबकि किसी पांच सितारा होटल के लिए हमें कई गुना राशि व्यय करनी पड़ती। हम अपने चयन पर इतने प्रसन्न थे कि कल रात की सारी मनहूसियत शीघ्र ही हमारे मस्तिष्क से गायब हो गई। लगभग एक घण्टे में भोजन तैयार हो गया।

हमने दोपहर का भोजन भी उसी समय कर लिया ताकि हमारा आज का दिन बर्बाद नहीं हो। हम आज परमबनन मंदिर देखना चाहते थे। हमारे विचार से यह देवताओं का बनाया हुआ वही मंदिर था जिसे देखने की लालसा में हम जावा आए थे।

बंगले की दीवारों पर भारतीय झाड़ू

 मिस रोजोविता के बंगले के कमरों की दीवारें विभिन्न प्रकार की कलात्मक सामग्री से सजाई गई थीं। इनमें से एक ऐसी चीज भी थी जिसे सजावट की वस्तु के रूप में देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। यह थी नारियल की सीकों से बनी एक भारतीय झाड़ू। दो कमरों में इन झाड़ुओं को कलाकृतियों की तरह लटकाया गया था।

जंगल में जावा संस्कृति की पोषाकों का प्रदर्शन

मि. अन्तो हमें योग्यकार्ता से लेकर सेंट्रल जावा के लिए रवाना हुआ। मिस रोजोविता के अपार्टमेंट से परमबनन मंदिर तक की दूरी लगभग 40 किलोमीटर थी। बाहर धूप काफी तेज थी। मार्ग में एक स्थान पर लगभग 15-20 व्यक्ति विशिष्ट प्रकार के परिधान पहनकर खड़े थे। उनके सिर पर लाल, हरे एवं नीले रंग की टोपियां थीं जिनके किनारे आग की लपटों की तरह ऊपर की ओर उठे हुए थे।

उन्होंने अपने हाथों में लम्बे भाले ले रखे थे जिन्हें लेकर वे अपने स्थान पर सीधे खड़े थे। उनकी कमर पर दोहरी तहमद या घुटनों से कुछ नीचे आने वाली चौड़ी सलवार थी। वे लोग धड़ के ऊपरी भाग में लम्बे कोट धारण किये हुए थे तथा कपड़े से बनी एक छोलदारी के नीचे खड़े थे। हमने मि. अन्तो से पूछा कि ये लोग कौन हैं और इस जंगल में क्यों खड़े हैं?

मि. अन्तो ने बताया कि ये लोग पर्यटकों का मनोरंजन करने के लिए जावा द्वीप की संस्कृति को दर्शाने वाले कपड़े पहनकर खड़े हैं। मैंने उनके कुछ चित्र उतारे। मैंने अनुभव किया कि इन लोगों को अच्छा लगता था जब कोई विदेशी पर्यटक इनके फोटो खींचता था। वे फोटो खिंचवाने के लिए सीधे खड़े हो जाते थे और कैमरे की तरफ देखते थे।

मंदिर में प्रवेश के लिए 1100 रुपए का शुल्क

परमबनन शिव मंदिर, योग्यकार्ता नगर से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर, मध्य जावा क्षेत्र में स्थित है। मार्ग में एक स्थान पर रुककर, मि. अन्तो ने हमारे लिए परमबनन मंदिर में प्रवेश हेतु रियायती टिकटों का प्रबंध किया। विदेशी पर्यटकों से प्रति पर्यटक लगभग 1100 भारतीय रुपए का शुल्क लिया जाता है, हमें यह टिकट लगभग 1000 रुपए प्रति व्यक्ति की दर से मिल गया।

हमें बताया गया कि इस मंदिर का प्रबन्धन यूनेस्को द्वारा किया जाता है तथा प्रवेश शुल्क का निर्धारण भी यूनेस्को द्वारा किया जाता है। हम यह सोचकर विस्मित थे कि आखिर इस मंदिर में ऐसी क्या विशेषता है जिसमें प्रवेश के लिए यूनेस्को द्वारा विदेशी पर्यटकों से इतनी भारी राशि ली जाती है!

कार से उतरते ही मि. अन्तो ने हमें कार की डिक्की से निकाल कर दो बड़ी छतरियां दीं तथा सुझाव दिया कि इन्हें साथ रखिये, आपको इनकी आश्यकता होगी। हमें आश्चर्य हुआ कि आकाश में दूर-दूर तक बादल दिखाई नहीं दे रहे तथा धूप भी इतनी तेज नहीं लग रही, फिर भी हमने मि. अन्तो का सुझाव मान  लिया।

मंदिर ट्रस्ट द्वारा शानदार चाय से स्वागत

मि. अन्तो हमें छोड़ने के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित कार्यालय तक आया तथा वहाँ के कर्मचारी को उसने रियायती कूपन दिए। यह सब उसने हमारे बिना कहे किया। कार्यालय से टिकट लेकर हमें सौंपते हुए मि. अन्तो ने कहा कि यहाँ चाय अवश्य पिएं, यह विदेशी पर्यटकों के टिकट में शामिल है, इसके लिए आपको अलग से शुल्क नहीं देना पड़ेगा।

हमने मि. अन्तो का आभार व्यक्त किया और चाय की स्टॉल की तरफ बढ़ गए। यूनेस्को के कर्मचारियों द्वारा जावा द्वीप पर विदेशी अतिथियों के लिए चाय का अर्थात् दूध वाली चाय का शानदार प्रबंध किया गया था। यह अलग बात थी कि दूध, पाउडर को पानी में घोलकर बनाया गया था।

दो अनजान देशों के दो अनजान बच्चों का अपूर्व स्नेह-मिलन

जब हम लोग चाय पी रहे थे तभी दीपा की दृष्टि बेबी ट्रॉली में बैठे एक विदेशी बच्चे पर पड़ी जो मुश्किल से आठ-नौ माह का रहा होगा। यह परिवार किसी पूर्वी एशियाई देश से आया हुआ लग रहा था। दीपा उसकी ट्रॉली पर चढ़ गई और बच्चे को दुलारने-पुचकारने लगी।

हमने दीपा को उस बच्चे से अलग करने का प्रयास किया किंतु दीपा हाथ आए अपने से छोटे बच्चे को आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी। वह बच्चा भी दीपा से लिपट गया। उस बच्चे के अभिभावक भी हमारी ही तरह, दो भिन्न देशों के अपरिचित बच्चों का यह स्नेह-मिलन देखकर कम आश्चर्य में नहीं थे। लगभग एक घण्टे बाद जब मंदिर परिसर में इन दानों बच्चों का एक बार पुनः सामना हुआ तो स्नेह-मिलन की यह प्रक्रिया पूर्ववत् पुनः दोहराई गई।

निश्चित रूप से जावा द्वीप पर दूसरा दिन बुरे अनुभवों वाला नहीं था।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

परमबनन शिव मंदिर (29)

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परमबनन शिव मंदिर

धूप तेज थी और जहाँ से हमने परमबनन मंदिर के लिए चलना आरम्भ किया था, वहाँ से परमबनन शिव मंदिर के शिखर लगभग एक किलोमीटर दूर दिखाई दे रहे थे। जैसे-जैसे मंदिर के शिखर निकट आते गए, उनके चारों तरफ बिखरे हुए काले रंग के चौकोर एवं तराशे हुए सुगढ़ पत्थरों के विशाल ढेर हमारे सामने स्पष्ट होते गए।

निकट जाने पर ज्ञात हुआ कि पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। यहाँ लगे सूचना-पट्टों से ज्ञात हुआ कि परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था। उस समय 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था। केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर ‘त्रिमूर्ति मंदिर’ कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं।

इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के ‘वाहन मंदिर’ हैं। त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक ‘आपित मंदिर’ है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक ‘केलिर मंदिर’ हैं तथा चारों कोनों पर एक-एक ‘पाटोक मंदिर’ हैं।

मुख्य परमबनन शिव मंदिर के चारों ओर चार पंक्तियों में 224 मंदिर स्थित हैं। इस प्रकार कुल 240 मंदिर बने हुए थे किंतु सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के प्रबल भूकम्प में ये समस्त मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे। मंदिर समूह के दूर-दूर तक फैले इन खण्डहरों को देखकर हमारी रुचि बढ़ती जा रही थी। खोज-बीन के पश्चात् जो इतिहास हमें ज्ञात हुआ वह किसी रहस्य और रोमांच भरी कहानी से कम नहीं था।

रहस्य और रोमांच की ओर

हम मंदिर की तरफ एक-एक कदम आगे बढ़ाते जा रहे थे। रहस्य और रोमांच से भरी एक दुनिया हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। उस समय तक हमें अनुमान नहीं था कि हम क्या देखने जा रहे हैं! यदि मस्तिष्क में कुछ था तो केवल इतना ही कि यह इण्डोनेशिया द्वीप का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है तथा भारत से बाहर स्थित हिन्दू मंदिरों में यह सबसे बड़ा है। हमें यह भी जानकारी थी कि इण्डोनेशिया के समस्त 17,508 द्वीपों पर स्थित किसी भी धर्म के मंदिरों में यह सबसे बड़ा है।

परमबनन मंदिर से विदा

परमबनन शिवमंदिर समूह के समस्त मंदिरों को देखना हमारे लिए संभव नहीं था। इसलिए हम लगभग तीन घण्टे तक मंदिर परिसर में रहने के बाद लौट लिए। इस समय तक धूप काफी मंदी पड़ गई थी और आकाश में बादल भी दिखाई देने लगे थे। मि. अन्तो एक्जिट के पास ही खड़ा मिल गया। हम थके हुए थे, चाय पीने की इच्छा थी किंतु यहाँ दूध वाली चाय मिलना संभव नहीं था। अतः थकान उतारने के लिए नारियल पानी से अच्छा कोई विकल्प नहीं था।

प्लाओसान बौद्ध मंदिर

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मि. अन्तो हमें परमबनन मंदिर जैसे ही खण्डहरों से युक्त एक और मंदिर परिसर में ले गया। पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह प्लाओसान बौद्ध मंदिर है। यहाँ भी मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए टिकट खरीदना आवश्यक था। थकान होने के कारण हमारे लिए भीतर जाकर मंदिरों को देख पाना अत्यंत कठिन था। इसलिए हमने बाहर सड़क पर खड़े रहकर मंदिर परिसर एवं उसमें दूर तक बिखरे पड़े पत्थरों के विशाल ढेरों एवं उनके बीच खड़े भग्न मंदिरों का अवलोकन किया। आकाश में बादल घिर आए थे और बूंदा-बांदी आरम्भ हो गई थी। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक महिला अंगीठी पर भुट्टे सेक रही थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि एक भुट्टा इण्डोनेशियाई मुद्रा में 15 हजार रुपए का तथा भारतीय मुद्रा में 75 रुपए का था। भारत में यह भुट्टा 15-20 रुपए में उपलब्ध हो जाता है। इसलिए भुट्टे का विचार भी त्याग देना पड़ा। इसी बीच बरसात बहुत जोरों से आरम्भ हो गई थी। हम मि. अन्तो की गाड़ी में बैठकर अपने निवास की ओर चल पड़े जो यहाँ से लगभग 20 किलोमीटर दूर था किंतु इस समय तक कार्यालयों का अवकाश हो गया था और योग्यकार्ता की सड़कें वाहनों से ठसाठस भर गई थीं।

इस कारण ट्रैफिक बहुत रेंग-रेंग कर सरक रहा था। घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा पूरी तरह घिर आया जबकि अभी मुश्किल से साढ़े छः बजे थे।

घर के बाहर मिस रोजोविता ने छोलदारी-नुमा एक छपरा बना रखा था जिसमें बैठकर लॉन तथा चारदीवारी के भीतर की वनस्पति एवं बारिश दोनों को देखने का आनंद लिया जा सकता था। हम यहीं बैठ गए। मधु और भानु चाय की तैयारियों में जुट गईं तथा मैंने और विजय ने मि. अंतों द्वारा आज किए गए व्यय का भुगतान किया तथा अगले दिन की कार्ययोजना निर्धारित की।

पिताजी हमारे पास ही बैठ गए। थोड़ी देर में चाय बनकर आ गई। दिन भर की थकान के बाद बरसात के इस मौसम में गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए हमने मिस रोजोविता को इस आरामदेह घर के सामने इस आरामदेह छोलदारी बनाने के लिए मन ही मन धन्यवाद दिया। दीपा की शैतानियां अब भी बदस्तूर जारी थीं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

जावा द्वीप पर तीसरा दिन

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जावा द्वीप पर तीसरा दिन

आज 19 मई हो चुकी थी। जावा के समयानुसार प्रातः चार बजे मेरी आंख खुल गई। आज जावा द्वीप पर तीसरा दिन था।मैंने हिसाब लगाया, इस समय बाली द्वीप पर सुबह के तीन ही बजे होंगे और भारत में रात के बारह बज रहे होंगे। यह शरीर भी कितना विचित्र है! इसमें लगी जैविक घड़ी स्वतः ही स्वयं को स्थानीय समय से समायोजित कर लेती है।

कैसे होता है यह सब! पूरी दुनिया को जानने की लालसा रखने वाले हम, स्वयं अपने शरीर की क्षमताओं के बारे में कितना कम जानते हैं! मैंने देखा कि परिवार के अन्य सदस्य भी ठीक पांच बजे उठ गए थे। मानो वे भारत में हों और उनके उठने का सही समय हो गया हो!

मि. अन्तो को हमने प्रातः 9 बजे आने का समय दिया था। वह ठीक समय पर गाड़ी लेकर आ गया। इस समय आकाश साफ था। धूप में तेजी नहीं थी और मौसम सुहावना था। हम सुबह का नाश्ता कर चुके थे और दोपहर का भोजन अपने साथ ले चुके थे। अतः मि. अन्तो के साथ चलने में हमें अधिक समय नहीं लगा।

हमारा आज का सबसे पहला लक्ष्य बोरोबुदुर बौद्ध विहार था किंतु वहाँ जाने से पहले हम कम से कम दो काम करना चाहते थे। हमारी इण्डोनेशियाई मुद्रा समाप्त हो चली थी इसलिए हमें किसी विश्वसनीय मनी एक्सचेंजर से डॉलर के बदले इण्डोनेशियाई रुपए लेने थे।

हम एक साथ अपने डॉलर एक्सचेंज नहीं कर रहे थे क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि जब हम इण्डोनेशिया से विदा हों तो हमें अपनी इण्डोनेशियाई मुद्रा फिर से डॉलर में कन्वर्ट कराने की फीस देनी पड़े। दूसरा काम यह था कि हम रेलवे स्टेशन जाकर, आने वाले कल की ट्रेन यात्रा के बोर्डिंग पास लेना चाहते थे। विजय ने नई दिल्ली से इस ट्रेन के लिए ऑनलाइन बुकिंग करवाई थी जिसका प्रिण्ट-आउट हमारे पास था किंतु ट्रेन में बैठने से पहले बोर्डिंग पास प्राप्त करने आवश्यक थे।

करंसी एक्सचेंजर

मि. अन्तो हमें सेंट्रल जावा के जालान मालियो क्षेत्र में बने एक पांच सितारा होटल में ले गया, जिसमें घुसते ही एक प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय मनी एक्सचेंजर ऑफिस था। हमने अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ डॉलर एक्सचेंज कराए। हमने देखा कि यहाँ भी समस्त काउण्टरों पर बीस-बाइस साल की लड़कियां दुनिया भर के देशों से आए विदेशियों की करंसी एक्सचेंज कर रही थीं।

काउण्टर पर बैठी लड़की ने हमें छोटा सा फार्म भरने के लिए तथा अपना पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा। हमने उससे पूछा कि वह हमें एक डॉलर के बदले में कितने इण्डोनेशियाई रुपए देगी। उसने हमें एक इलेक्ट्रोनिक बोर्ड देखने के लिए संकेत किया जिसमें उस समय की इण्टरनेशनल रेट्स डिस्प्ले हो रही थीं। हमने संतोष में सिर हिलाया और उसे डॉलर दे दिये। उस लड़की ने फिर से हिसाब लगाया और हमें एक कागज पर लिखकर दिखाया कि हमें कितने इण्डोनेशियाई रुपए मिलेंगे।

बिल्कुल सुलझी हुई कार्यवाही, कहीं कोई छिपाव-दुराव नहीं। समस्त व्यवहार बहुत ही मृदुल और कम शब्दों में। उसने हमारे पासपोर्ट से हमारी फार्म की डिटेल्स का मिलान किया और राशि हमें पकड़ा दी। इस पूरे काम में कठिनाई से पांच मिनट लगे होंगे। हम मनी एक्सचेंजर के ऑफिस से निकल कर जालान मालियो में आ गए।

जालान मालियो में चहल-कदमी

हमने जालान मालियो में कुछ दूर तक चहल-कदमी करने का निर्णय लिया। जावाई भाषा में जालान का अर्थ होता है गली (lane) और मालियो से आशय जावा के मालियो सरनेम वाले लोगों से है। जावा में 55 लाख लोगों का सरनेम मालियो है। यह गली उन्हीं में से किसी प्रतिष्ठित मालियो के नाम से जानी जाती है।

सेंट्रल जावा प्रांत का जालान मालियो, नई दिल्ली के कनाट प्लेस की तरह भीड़ वाला क्षेत्र है। यहाँ शानदार चमचमाते हुए मॉल खड़े हैं। विदेशी सैलानियों का जमघट लगा रहता है। मालियो की चौड़ी सड़क के दोनों ओर चार सितारा और पांच सितारा होटलों की संख्या का कोई पार ही नहीं है। इस पूरी स्ट्रीट में बेचाक और डोकार काफी संख्या में चलते हुए दिखाई दिए जिन पर विदेशी पर्यटकों को घूमते हुए आसानी से देखा जा सकता है। 

तुगु स्टेस्यन

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मि. अन्तो हमें जालान मालियो से योग्यकार्ता शहर के तुगु रेलवे स्टेशन ले गया। यह जालान मालियो से अधिक दूर नहीं था। यद्यपि इस रेलवे स्टेशन को वर्तमान में योग्यकार्ता स्टेस्यन कहते हैं किंतु इसका पुराना नाम तुगु स्टेस्यन है तथा स्थानीय जनता में वही प्रचलित है। जावा में स्टेशन को स्टेस्यन उच्चारित किया जाता है। रेलेवे स्टेशन के मुख्य भवन पर बाहर की ओर बड़े-बड़े केसरिया रंग के अक्षरों एवं रोमन लिपि में केवल जोगजकार्ता लिखा हुआ है। यह क्षेत्र डच औपनिवेशिक युग में जावा का प्रसिद्ध स्थान हुआ करता था। प्रायः समस्त प्रमुख डच औपनिवेशिक अधिकारी इसी क्षेत्र में निवास करते थे। योग्यकार्ता का राजा भी उस काल में बताविया से तुगु स्टेशन के बीच यात्रा किया करता था। ई.2000 में इस स्टेशन का आधुनिकीकरण करके वर्तमान स्वरूप दिया गया। तभी इसका नाम तुगु की बजाय योग्यकार्ता किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि तुगु शब्द का सम्बन्ध औपनिवेशिक काल के डच शासकों से रहा होगा। मैंने और विजय ने स्टेशन पर बने ग्लास कैबिन में बैठे एक रेलवे अधिकारी के केबिन में जाकर पूछा कि हमें बोर्डिंग पास कहाँ से मिलेंगे।

उस अधिकारी ने कहा कि बाहर एक वेंडिंग मशीन है, वहाँ से प्रिण्ट कर लीजिए। वह अधिकारी अंग्रेजी में बोल रहा था किंतु उसका लहजा ऐसा था मानो जावा द्वीप की किसी भाषा में बोल रहा हो। इसलिए मैं उसकी बात का एक भी शब्द नहीं समझ सका किंतु पता नहीं विजय को कैसे उसकी बात समझ में आ गई! मैं आज भी इस बात को सोचकर हैरान होता हूँ कि आखिर विजय ने उसकी बात को समझा कैसे!

वेंडिंग मशीन पूरी तरह से ऑटोमैटिक थी। जैसे ही विजय ने ऑनलाइन बुकिंग के प्रिण्टआउट पर लगे बार कोड को मशीन के स्कैनर के सामने दिखाया, हमारे टिकट निकल कर बाहर आ गए। यदि यह काम मुझे करना होता तो कई लोगों के समझाए जाने के बाद ही मुझे समझ में आता कि बोर्डिंग टिकट का प्रिंट आउट कैसे लिया जायेगा! यह जैनरेशन गैप था। कोडिंग बार को समझने वाली आधुनिक मशीनों पर काम करना मेरी प्रौढ़ पीढ़ी के लोगों को कठिनाई से ही समझ में आता है।

आधुनिकतम सुविधाओं से लैस इण्डोनेशिया

अब तक मैं इस बात को कई बार अनुभव कर चुका था कि भले ही इण्डोनेशिया गरीब देश है और दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है, किंतु यहाँ की हर बात हैरान करने वाली है। यहाँ की दुकानों, मंदिरों, सरकारी कार्यालयों, स्टेशनों तथा ट्रेनों सहित हर स्थान पर अत्याधुनिक कम्प्यूटराइज्ड उपकरण लगे हैं। छोटी-छोटी लड़कियां इन्हें धड़ल्ले से संचालित करती हैं।

भारत अभी इन सुविधाओं से कोसों दूर है। इण्डोनेशिया के नगरों से लेकर गांव और कस्बे अच्छी साफ-सफाई के कारण बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। भारत को सफाई का यह स्तर छूने में संभवतः कई शताब्दियां लगेंगी। यहाँ कहीं भी भीड़-भाड़, चिल्ल-पों तथा शोर-शराबा नहीं है। भारत के लोगों को इस नागरिक-समझ (Civic sense)  तक पहुंचने में संभवतः कई हजार वर्ष लगेंगे।

मुस्लिम देश होने के बावजूद इण्डोनेशिया में हर उम्र की लड़कियां और औरतें वाणिज्यिक संस्थाओं, सार्वजनिक स्थलों एवं सरकारी विभागों में खुलकर काम करती हैं। कोई औरत बुरका नहीं पहनती। वे केवल अपना सिर और कान ढंकती हैं, वह भी अनिवार्य नहीं है। बहुत सी लड़कियां, मिनी स्कर्ट में दिखाई देती हैं। सभी लड़कियां अपने काम में दक्ष हैं।

हमने किसी लड़की को या कर्मचारी को आपस में या मोबाईल फोन पर बात करते हुए नहीं देखा। अधिकतर स्थानों पर ड्रेस कोड लागू है। समस्त लड़कियां ड्रेस कोड का अनुसरण करती हैं। यदि लाउड स्पीकरों पर बजने वाली नमाज को छोड़ दें तो वहाँ गली-मुहल्लों और सड़कों पर न दिन में, न रात में, किसी तरह का शोर सुनाई नहीं देता।

फलों की खरीददारी

जब रेलेवे स्टेशन से रवाना हुए तो कार में बैठते ही पिताजी ने कहा कि रास्ते में किसी दुकान से फल खरीदने हैं। हमने मि. अन्तो से अनुरोध किया कि वह ऐसी जगह कार रोक ले जहाँ से हम फल खरीद सकें। मि. अन्तो कार चलाता रहा किंतु कहीं भी ऐसा स्थान नहीं मिला जहाँ कार रोकी जा सके। इण्डोनेशिया में ट्रैफिक नियम बहुत कड़े हैं।

यदि कोई ड्राइवर या नागरिक उनकी अवहेलना करता है तो वह बड़े संकट में फंस सकता है। हम मध्य जावा से बाहर निकलकर ग्रामीण क्षेत्र में आ गए। अंततः एक क्योस्क-नुमा दुकान पर मि. अन्तो ने कार रोकी। उसने हमसे माफी मांगी कि वह शहर में फलों की किसी दुकान पर क्यों नहीं रुक सका था। यहाँ चूंकि किसी तरह की कठिनाई नहीं है इसलिए आप लोग यहाँ से फल खरीद लें। हम उसकी कठिनाई को समझते थे। इसलिए हमने बिना किसी तरह का मुंह बिगाड़े हुए उसे यहाँ रुकने के लिए धन्यवाद दिया।

यह एक छोटी सी दुकान थी जिसमें कई तरह के फल रखे हुए थे। यहाँ चमचमाते हुए विशाल मॉल में उपलब्ध रहने वाले विदेशी फलों का जखीरा नहीं था अपितु इण्डोनेशिया में पैदा होने वाले देशी फल थे। इनमें पीले रंग के छोटे-छोटे वे केले भी शामिल थे जो खाने में मीठे कम और खट्टे ज्यादा होते हैं। हमने वही केले लिए। इसी प्रकार छोटी-छोटी लीचियों जैसे गुच्छों में बंधा कोई भूरे रंग का फल था। इसे जावा की देशी लीची कहा जा सकता था। इसमें गूदा, रस और सुगंध तीनों ही कम थे। संतरों का आकार भी बहुत छोटा था। सेब अवश्य ही विदेशी रहे होंगे, पर वे भी छोटे आकार के थे।

फल विक्रेता अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं समझता था किंतु विदेशियों को अपनी दुकान पर देखकर खुशी के मारे फूला नहीं समाया। उसके लिए उस गांव में यह गौरव का विषय था कि वह विदेशियों को अपनी दुकान से फल बेचे। वह दुकानदार भले ही नहीं समझता हो किंतु हम अब तक अच्छी तरह समझ चुके थे कि इण्डोनेशिया में खरीदरारी कैसे की जा सकती है।

इसलिए हमने उससे थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कई प्रकार के फल लिए। दुकानदार का रोम-रोम पुलकित था। उसने शायद ही कभी सोचा होगा कि एक दिन वह उन विदेशियों को सफलता पूर्वक अपना सौदा बेच देगा जिनकी भाषा भी वह नहीं जानता। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हमारी जेब में इण्डोनिशाई रुपए थे जिनका इस्तेमाल करना भी हमें बखूबी आता था। फलों की खरीददारी हो चुकी थी।

मि. अन्तो की कार फिर से बोरोबुदुर विहार की तरफ बढ़ने लगी। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कस्बाई फलों की दुकान के आसपास भी किसी तरह का कचरा या छिलके नहीं पड़े हुए थे। इसी के साथ जावा द्वीप पर तीसरा दिन पूरा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बोरोबुदुर का पहाड़नुमा स्थापत्य (31)

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बोरोबुदुर का पहाड़नुमा स्थापत्य

बोरोबुदुर का पहाड़नुमा स्थापत्य हमारी आंखों के सामने था। इसे देखकर विश्वास नहीं होता कि कुछ साल पहले तक यह विशाल संरचना मिट्टी में दबकर इंसानों की दृष्टि से ओझल हो चुकी थी और लोग इसके बारे में भूल चुके थे। केव कुछ लोककथाओं में बोरोबुदुर के उल्लेख जीवित थे।

लगभग एक घण्टा चलने के बाद हम बोरोबुदुर बौद्ध विहार पहुंचे। मार्ग में एक स्थान पर रुककर मि. अन्तो ने हमारे लिए रियायती टिकटों का प्रबंध करने का प्रयास किया किंतु इस बार वह सफल नहीं हो सका। मंदिर के प्रवेश द्वार पर टिकट खिड़की के पास उसने हमें छोड़ा।

यहाँ एक व्यक्ति के टिकट का मूल्य 3 लाख इण्डोनेशियाई रुपए अर्थात् डेढ़ हजार भारतीय रुपए है। जब तक हमने टिकट खरीदे, तब तक मि. अन्तो अपनी कार पार्क करके आ चुका था। उसने फिर से हमें दो छतरियां पकड़ाईं तथा कहा कि यहाँ भी आप चाय पी सकते हैं, इसके लिए अलग से शुल्क नहीं लगेगा, यह विदेशी पर्यटकों के लिए ही है।

हमने उसके हाथ से छतरियां लीं तथा उसे धन्यवाद देकर चाय के काउंटर की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में हम छतरियां हाथ में लेकर बौद्ध विहार की ओर बढ़ गए। लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद भी हमें विहार दिखाई नहीं दिया। फिर जैसे ही हम पेड़ों के झुरमुट को पार करके एक सड़क पर मुड़े, अचानक ही वह प्रकट हुआ। यह एक विशाल पहाड़ जैसा दिखाई देता है। भारत में बड़े-बड़े दुर्ग एवं विशालाकाय मंदिर हैं किंतु इससे पहले हमने इतनी विशालाकाय पहाड़नुमा स्थापत्य संरचना नहीं देखी थी।

कठिन चढ़ाई

इतनी ऊंचाई तक चढ़ना न केवल पिताजी के लिए, अपितु मेरे लिए भी काफी कठिन था। दीपा के लिए भी स्वतंत्र रूप से शिखर तक चढ़ पाना संभव नहीं था। हम सड़क पर कदम बढ़ाते हुए अंततः स्तूप के काफी निकट पहुंच गए। यहाँ आकर पिताजी की हिम्मत ने जवाब दे दिया। वे एक बैंच पर बैठ गए।

मैंने, विजय तथा भानु से दीपा को लेकर चढ़ाई आरम्भ करने के लिए कहा और स्वयं पिताजी के साथ बैंच पर बैठ गया। लगभग आधे घण्टे बाद पिताजी ने कहा कि मैं पूरी चढ़ाई तो नहीं कर पाउंगा किंतु एक या दो मंजिल तक चलता हूँ। लगभग अस्सी वर्ष की आयु में इतनी चढ़ाई भी एक कठिन बात थी किंतु हम दोनों ने चढ़ाई आरम्भ कर ही दी।

पिताजी दो मंजिल तक मेरे साथ चले। इस बीच उन्हें दो बार रुक जाना पड़ा। विजय और भानु भी दूसरी मंजिल पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। पिताजी ने दो मंजिलों तक का शिल्प और स्थापत्य देखने के बाद, नीचे उतरने का निर्णय लिया। मैंने उनसे कहा कि वे उसी बैंच पर जाकर बैठ जाएं जहाँ से हम आए थे। थोड़ी देर में हम भी आते हैं।

पिताजी के लौट जाने के बाद मैंने मि. अन्तो द्वारा दी गई छतरियों को छड़ी की तरह प्रयोग करते हुए ऊपर चढ़ना आरंभ किया। पत्थरों का यह संसार निःसंदेह अचरज से भरा हुआ था। चूंकि पत्थरों की सीढ़ियों को लकड़ी की सीढ़ियों से ढंक दिया गया था इसलिए चढ़ने में आसानी रही। अन्यथा जूतों से घिसकर चिकने हुए पत्थरों पर चढ़ पाना और भी अधिक कठिन होता।

रूप धातु से निर्वाण स्तर तक

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बोरोबुदुर चैत्य की रचना एक विशाल वर्तुलाकार स्तूप के रूप में है इसके चारों ओर बौद्ध ब्रह्माण्डिकी के तीन प्रतीकात्मक स्तर बने हुए हैं जो कामध्यान (इच्छा की दुनिया), रूपध्यान (रूपों की दुनिया) और अरूपध्यान (निराकार दुनिया) कहलाते हैं। दर्शक इन तीनों स्तरों का चक्कर लगाते हुए इसके शीर्ष पर अर्थात् बुद्धत्व की अवस्था को पहुँचता है। स्मारक में हर ओर से सीढ़ियों और गलियारों की विस्तृत व्यवस्था है। मुझे विगत अक्टूबर में चिकनगुनिया हुआ था जिसके कारण पैर अब तक दर्द करते थे, घुटनों में स्थित कार्टिलेज की पर्त भी अधिक चलते रहने के कारण भीतर की ओर दब गई थी, जिसके कारण घुटने बहुत दर्द कर रहे थे। फिर भी मैं सौभाग्य से हाथ आए इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। मैं बच्चों के साथ-साथ चलता हुआ तथा धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ, रूपधातु स्तर को पार करके अरूप धातु स्तर से होता हुआ निर्वाण स्तर को पहुंच ही गया। यहाँ का दृश्य बहुत अद्भुत था। दूर-दूर तक चावल के खेत लहरा रहे थे। मंद, सुहावनी एवं निर्मल वायु प्रवाहित हो रही थी। सूर्य देव भी अपनी प्रखरता छोड़कर मानो यहाँ के वायुमण्डल को अलौकिक तथा कम ऊष्ण प्रकाश प्रदान कर रहे थे।

मोक्ष क्या होता है, यह तो मैं नहीं जानता किंतु इतनी ऊंचाई पर बैठकर हजारों बौद्ध भिक्षु निश्चय ही महात्मा बुद्ध द्वारा बताए गए प्रतीत्यसमुत्पात, चत्वारि आर्य सत्यानि तथा अष्टांग मार्ग पर चलते हुए अपने महान गंतव्य की ओर, अनदेखे, अनजाने अनंत की ओर यात्रा की तैयारी करते होंगे, इसमें किसी तरह का संदेह नहीं रह गया था।

बोरोबुदुर चैत्य से वापसी

यहाँ से हमें वापसी करनी थी। इस बार निर्वाण स्तर से नीचे उतर कर अरूप धातु स्तर से होते हुए रूप धातु स्तर पर लौटना था। मुझे लगा, हिन्दू दर्शन में जीव को अक्षर अर्थात् कभी नष्ट न होने वाला माना गया है तथा जीव के, ऊपरी लोकों से नश्वर शरीर में बार-बार आवागमन का जो सिद्धांत दिया गया है, वह यही है।

मनुष्य अपनी तपस्या और भक्ति के बल पर कामनाओं को नष्ट करता हुआ सिद्धियों के आलोकमाय लोक में पहुंचता है, वहाँ कुछ अवधि तक अलौकिक सुख का उपभोग करता है और फिर से मृत्यु लोक में उतर आता है। ठीक वैसी ही प्रक्रिया तो थी यह! हिन्दू धर्म में भी मोक्ष की अवधारणा है, किंतु उस लक्ष्य को बहुत विरले जीव प्राप्त कर पाते हैं, उसके लिए वनस्पतियों के बीज की तरह अपने अहंकार को दूसरों की सेवा और ईश भक्ति की ऊर्वरा मिट्टी में गला कर नष्ट कर देना होता है।

बोरोबुदुर चैत्य के लिए चढ़ाई आरम्भ करने के लगभग दो घण्टे बाद हम बोरोबुदुर चैत्य से नीचे उतर आए। जिस रास्ते से हम नीचे उतरे, वह चढ़ाई वाले रास्ते से अलग था। यह वैसा ही था जैसे किसी जीवात्मा का पुनर्जन्म किसी दूसरे गांव में हो गया हो और उसकी पुराने जन्म की स्मृतियां उसे पहले वाले गांव में जाने के लिए कह रही हों।

स्तूप के दूसरी तरफ उतर जाने के कारण हमारे समक्ष एक नई समस्या खड़ी हो गई। पिताजी उसी मार्ग की तरफ बनी बैंच पर बैठकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे जहाँ से हमने चढ़ाई आरम्भ की थी। उन्हें ढूंढकर लाना कठिन काम हो गया क्योंकि उन तक पहुंचने के लिए मंदिर के चारों ओर चक्कर काटते हुए हमें कम से कम दो किलोमीटर चलना था।

हमने मधु एवं भानू को दीपा के साथ वहीं एक बैंच पर बैठने के लिए कहा और मैं एवं विजय पिताजी को ढूंढने के लिए चढ़ाई की दिशा वाले मार्ग की ओर चल दिए। लगभग एक किलोमीटर चलने के बाद विजय ने मुझे वापस लौटा दिया और स्वयं अकेला ही पिताजी को लेने गया।

मैंने उससे कहा कि वह पिताजी को लेकर यहाँ नहीं आए अपितु सीधा बाहर जाए। वहाँ कार पार्किंग में उसे मि. अन्तो मिल जाएगा। मैंने एक्जिट-वे पर लौटकर मधु, भानू एवं दीपा को लिया और हम लोग बोरोबुदुर परिसर से बाहर निकलने के लिए रवाना हुए। इसी मार्ग में समुद्ररक्षा नामक संग्रहालय स्थित है। इस विशुद्ध भारतीय नाम को पढ़कर हम सुखद आश्चर्य से भर गए।

दीपा का इण्टरनेशनल फोटो

अभी कुछ दूर ही चले होंगे कि इण्डोनेशियाई लड़कियों के एक समूह ने हमें घेर लिया। वे सैकण्डरी और हायर सैकेण्डरी स्टैण्डर्ड में पढ़ने वाली जान पड़ती थीं तथा दीपा के साथ फोटो खिंचवाना चाहती थीं। भानू ने उन्हें सहर्ष अनुमति दे दी। दीप की तो जैसे लॉटरी लग गई। एक लड़की उसे गोद में लेकर खड़ी हो गई और बाकी की लड़कियां उसके दोनों ओर खड़ी हो गईं।

इतने में ही उन लड़कियों की टीचर दौड़ती हुई आई, उसने हमसे माफी मांगी और उन लड़कियों से नाराजगी भरे स्वर में पूछा कि क्या तुमने इस बच्ची के माता-पिता से परमिशन ले ली है! उसने कम से कम तीन बार यह प्रश्न पूछा और जब तीनों ही बार जवाब हाँ में आया तो वह भी दीपा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए खड़ी हो गई। इसी बीच पास से गुजर रही कुछ अन्य देशों की लड़कियां भी दीपा को देखकर रुक गईं। उन्होंने भी अपने कैमरे क्लिक किए। मैं भी एक स्नैप क्लिक किए बिना नहीं रह सका।

डेढ़ साल की दीपा अभी बोल भी नहीं सकती। उस ग्रुप में उन अनाजन लड़कियों में से बहुतों को एक-दूसरे की भाषा भी समझ में नहीं आती थी किंतु यह प्रेम की भाषा थी, बाल्यावस्था के प्रति सहज आकर्षण की भाषा थी जिसे वे सब बहुत अच्छी तरह समझती थीं। जाने किन-किन देशों की लड़कियों ने वह फोटो एक दूसरे से शेयर किया होगा।

कितना अच्छा होता यदि धरती पर चारों ओर ऐसा ही स्नेहमय वातावरण होता! यदि ऐसा हुआ होता तो निश्चित ही लोग स्वर्ग, मोक्ष और परमात्मा की खोज में समय खराब नहीं करते। क्योंकि ये तीनों कहीं और नहीं, केवल प्रेम में निवास करते हैं।

बाजार की लम्बी दीर्घा

हम दीपा को उन लड़कियों से लेकर फिर से आगे बढ़े किंतु शीघ्र ही उस रास्ते ने हमें एक बाजार में ले जाकर छोड़ दिया। यह लगभग वैसा ही बाजार था जैसा कि भारत में तिब्बती और नेपाली लोग लगाकर बैठ जाते हैं। यहाँ इण्डोनेशियाई कलाकृतियां, कपड़े, चित्र, विभिन्न प्रकार के मनकों की मालाएं आदि बिक रहे थे।

हम थके हुए थे और हमारी रुचि इनमें से किसी चीज में नहीं थी। फिर भी हमें इस बाजार में आगे ही बढ़ते रहना था। बाजार की हर गली का अंत एक नई गली में हो रहा था। लगभग डेढ़-दो किलोमीटर चलने के बाद हम पूरी तरह थक गए और एक नारियल पानी की दुकान पर बैठ गए। यहाँ भी 20 हजार रुपए का नारियल मिल रहा था। हमने 15 हजार रुपए में नारियल तय किया तथा एक बड़ा सा दिखने वाला नारियल छांटकर दुकान पर बैठी लड़की को छीलने के लिए दे दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गैम्बीरा लोका जू (32)

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गैम्बीरा लोका जू

जावाई भाषा में गैम्बीरा का अर्थ होता है प्रसन्न, लोक का अर्थ होता है सार्वजनिक और जू का अर्थ होता है चिड़ियाघर। इस प्रकार गैम्बीरा लोका जू चिड़ियाघर के नाम में गैम्बीरा जावाई भाषा से, लोका संस्कृत से ओर जू अंग्रेजी भाषा से लिया गया प्रतीत होता है।

बोरोबुदुर के पहाड़नुमा स्थापत्य से नीचे उतरकर हम उसके निकट बने बाजार में थकान मिटाने के लिए नारियल पीने बैठ गए।नारियल पानी वाली लड़की ने नारियल काटकर उसमें दो स्ट्रॉ डालकर हमें दे दिया।

एक तो वहाँ के नारियल वैसे ही भारत में मिलने वाले नारियलों के मुकाबले दो से तीन गुने बड़े हैं, उस पर यह नारियल तो वहाँ के नारियलों में से भी बहुत बड़े आकार का था। हमने वह पानी अपने गिलासों में और पानी की बोतलों में भर लिया। उस नारियल में से लगभग दो लीटर पानी निकला। यह हम सबके के लिए एक बार में पीने के लिए पर्याप्त था।

तुम पास आए, जरा मुस्कुराए

हम नारियल पानी पी ही रहे थे कि 20-22 साल के दो जावाई लड़के हमारे पास आकर गिटार बजाते हुए गाने लगे। इण्डोनेशिया में वे पहले भिखारी थे जो हमने देखे। वे दोनों अच्छे कपड़े पहने हुए थे। अच्छा गिटार बजा रहे थे। उनके गिटार से एक भारतीय हिन्दी फिल्मी की धुन निकलने लगी, और शीघ्र ही उन्होंने गाना शुरु कर दिया- ‘तुम पास आए, जरा मुस्कराए ……. कुछ-कुछ होता है।’

हम चौंके, इन्हें कैसे पता लगा कि हम भारतीय हैं किंतु अगले ही क्षण समझ  में आ गया कि मधु के साड़ी पहने हुए होने से कोई भी हमें आसानी से पहचान सकता था कि हम भारतीय हैं।

इतने अच्छे कपड़ों में और इतना अच्छा गिटार बजा रहे उन लड़कों को कुछ भी देने की हमारी इच्छा नहीं हुई। मेरा मन इसलिए भी खराब हो गया था कि अब तक मैं यह सोचता रहा था कि यहाँ भिखारी नहीं हैं, किंतु इन लड़कों ने वह धारणा तोड़ दी थी। कुछ ही देर में विजय पिताजी को लेकर वहीं आ गया। हमने उन्हें भी नारियल पानी पीने के लिए दिया और कुछ देर बाद हम वहाँ से चल दिये। इस समय दोपहर के तीन बज रहे थे। मि. अन्तो हमें पार्किंग एरिया में मिल गया।

चलती हुई कार में लंच

हमने मि. अन्तो से कहा कि कहीं किसी पार्क में गाड़ी रोक ले ताकि हम दोपहर का भोजन कर सकें। मि. अन्तो ने सुझाव दिया कि चूंकि शाम होने में बहुत कम समय बचा है इसलिए बेहतर होगा कि हम चलती कार में लंच कर लें, अन्यथा आगे वाला स्पॉट नहीं देख पाएंगे। यह एक अच्छा सुझाव था। इसलिए हमने कार में ही लंच कर लिया। ऐसा करने में किसी तरह की असुविधा भी नहीं हुई।

गैम्बीरा लोका जू

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जावाई भाषा में गैम्बीरा का अर्थ होता है प्रसन्न, लोक का अर्थ होता है सार्वजनिक और जू का अर्थ होता है चिड़ियाघर। इस प्रकार इस चिड़ियाघर के नाम में गैम्बीरा जावाई भाषा से, लोका संस्कृत से ओर जू अंग्रेजी भाषा से लिया गया प्रतीत होता है। हमें जू तक पहुंचते-पहुंचते लगभग चार बज गए। यह चिड़ियाघर 54 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है तथा सायं साढ़े पांच बजे तक खुला रहता है, क्योंकि इसके बाद अंधेरा हो जाता है। हमारे पास कम समय बचा था। एक-डेढ़ घण्टे की अवधि में इसे पूरा देखना संभव नहीं था। फिर भी हमने जल्दी से टिकट लिए और जू में प्रवेश कर लिया। इस चिड़ियाघर को ई.1956 में खोला गया था। इसमें विविध प्रकार के पशुओं की 470 प्रजातियां रहती हैं जिनमें से ओरंगुटान, कोमोडो, ड्रैगन, गिब्बन और हिप्पोपोटोमस हमारे लिए विशेष आकर्षण के थे। हमने अपना ध्यान इन्हीं पर फोकस किया। यह चिड़ियाघर गजाहवोंग नदी पर बना हुआ है। जावा में हाथी को गज कहा जाता है। इस नदी के क्षेत्र में हाथी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

संभवतः इसलिए इस नदी का नाम गजाह वोंग पड़ा होगा। एक बाड़े में जवाई हाथी प्रदर्शित किए गए हैं जो डीलडौल एवं शारीरिक बनावट में भारतीय हाथियों के मुकाबले में कहीं नहीं टिकते।

फिर भी इन्हें देखना इसलिए रोचक था कि ये अपनी लम्बी सूण्ड फैलाकर देशी-विदेशी सैलानियों से केले आदि उपहार स्वीकार कर रहे थे। एक बाड़े में हमें भूरे रंग के दो ओरंगुटान दिखाई दिए। इनमें से एक ओरंगुटान लकड़ी के एक ऊंचे से मचान पर बैठा हुआ, देश-विदेशी पर्यटकों को देखने का आनंद ले रहा था जबकि उसका साथी गुफानुमा केबिन में आराम कर रहा था।

लगभग एक घण्टे में हमने कोमोडो, ड्रैगन, गिब्बन और हिप्पोपोटोमस और विशालाकाय तोतों को देख लिया। एक बाड़े में चार-पांच ऊंट प्रदर्शित किए गए हैं। यह हमारे लिए पहला अवसर था जब हमने किसी ऊंट को चिड़ियाघर में प्रदर्शनकारी जंतुओं के बीच देखा था। ये एक थुम्बी वाले ऊंट हैं जैसे कि भारत के थार रेगिस्तान में पाए जाते हैं।

भगवान भुवन भास्कर काफी नीचे झुक आए थे तथा चिड़ियाघर में प्रकाश काफी कम हो गया था। इसी बीच हमने एक पतले सांप को भी एक पिंजरे के बाहर रेंगते हुए देखा। अंधेरे में रुकना उचित नहीं था क्योंकि यह आम भारतीय चिड़ियाघरों की तरह नहीं था जो शहर के बीच कृत्रिम पार्क में स्थापित किए जाते हैं, यह वास्तविक घने जंगल के बीच फैला हुआ चिड़ियाघर था जहाँ पिंजरों के बाहर भी जानवर रहते हैं। अतः हम बाहर की ओर चल दिए।

इसी बीच चिड़ियाघर के गार्ड अपनी मोटरसाइकिलों पर बैठकर जायजा लेते हुए दिखाई दिए कि अब कितने पर्यटक चिड़ियाघर में घूम रहे हैं। वहाँ केवल हम ही थे, हमारे बाहर निकलते ही गार्ड्स ने चिड़ियाघर का मुख्य फाटक बंद कर दिया। इस समय साढ़े पांच बजे से पांच-सात मिनट ऊपर हुए होंगे किंतु ऐसा लग रहा था मानो शाम के साढ़े सात बज गए हों। मि. अन्तो को इस बात की प्रसन्नता थी कि उसके बताए हुए दोनों स्थलों में हमने पूरी रुचि ली थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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