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रोम में चौथा दिन – 20 मई 2019

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रोम में चौथा दिन - bharatkaitihas.com
रोम में चौथा दिन

आज हमारा रोम में चौथा दिन था। आज हमें विश्व इतिहास में बदनाम कोलोजियम को देखने जाना था। यह वही स्थान था जहाँ ईसा की आरम्भिक शताब्दियों में रोमनवासियों ने हजारों योद्धाओं का रक्त केवल अपने मनोरंजन के लिए बहा दिया था।

रोम में तीसरा दिन अनुभवों से भरा रहा था और आज चौथे दिन हमें प्रातःकाल में कोलोजियम के लिए निकलना था। हमारे पास कोलोजियम, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल के टिकट थे जो हमने कल मेरूलाना प्लाजो से प्राप्त किए थे। ये तीनों स्थान एक दूसरे से सटे हुए हैं।

कोलोजियम में प्रवेश करने के लिए हमें 12 बजे का समय दिया गया था। हमने प्रातः 9.30 बजे अपार्टमेंट से निकलने का निश्चय किया ताकि कोलोजियम में प्रवेश करने से पहले हम, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देख सकें किंतु अपार्टमेंट से निकलने में विलम्ब हो गया और हम प्रातः10.15 पर सर्विस अपार्टमेंट से निकल सके।

इस प्रकार आज तीसरे दिन भी हमें साढ़े दस बजे वाली बस मिली। अब तक हमें अनुमान हो चुका था कि हम दक्षिणी रोम में प्रवास कर रहे थे और हमें यहाँ से मध्य रोम अथवा उत्तरी रोम की ओर जाना पड़ता था। इस बस ने हमें ‘विया अर्जेण्टीनिया’ नामक बस-स्टॉप पर उतारा। वहाँ से हमें कॉलोजियम के लिए दूसरी बस मिली। हम प्रातः 11.15 पर कॉलोजियम के सामने उतर गए।

कोलोजियम के सामने

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हम उस विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक भवन के ठीक सामने खड़े थे जो इस बात का साक्षी था कि मनुष्य कितना हिंसक, कितना अत्याचारी और कितना निर्दयी हो सकता है! यह वही कोलोजियम था जिसका निर्माण ईसा के जन्म के लगभग 70 वर्ष बाद रोमन सम्राट वेस्पेसियन के समय में रोम-वासियों के मनोरंजन के लिए करवाया गया था। यह वही कोलोजियम था जिसमें हजारों ग्लेडियेटरों को रोमन-वासियों का मनोरंजन करने के लिए अपने प्राण गंवाने पड़े थे। यह वही कोलोजियम था जिसमें रोम के राजा और धनी-सामंत धन कमाने के लिए हजारों ग्लेडियेटरों को एक-दूसरे के प्राण लेने पर विवश करते थे। यह वही कोलोजियम था जिसमें एक भूखे शेर ने ईसाई संत एण्ड्रोक्लस के समक्ष सिर झुकाकर, स्वयं पर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी। यह वही कोलोजियम था जिसमें एक दिन ग्लेडिएटरों ने ‘स्पार्तक’ नामक ग्लेडिएटर के नेतृत्व में बंद कोठरियों के दरजवाजे तोड़ डाले थे और रोम की सड़कों पर आकर बहुत से ‘पैट्रिशियन’ अर्थात् धनी-सामंतों को मार दिया था। यह वही कोलोजियम था जिसकी कोठरियों में बंद छः हजार ग्लेडिएटरों को एक साथ ‘एपियन’ नामक सड़क पर सूली पर चढ़ा दिया गया था किंतु अभी हमारे लिए कोलोजियम के दरवाजे एक घण्टे बाद खुलने वाले थे।

रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल में विफलता

हम मध्याह्न 12.00 बजे से 12.25 तक कोलोजियम में प्रवेश ले सकते थे। इस समय सवा ग्यारह ही बजे थे इसलिए हमने पहले, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देखने का निर्णय लिया किंतु हमें यह देखकर निराशा हुई कि वहाँ पहले से ही पर्यटकों की बहुत लम्बी कतारें लगी हुई थीं। अतः पिताजी ने रोमन फोरम की लाइन में लगने से मना कर दिया और वे कोलोजियम के बाहर ही एक छोटे से खाली चबूतरे पर बैठ गए।

200 रुपए की एक पॉलीथीन

हम कतारों में तो लग गए किंतु असमंजस में थे, संभवतः हमारे पास इतना समय नहीं था कि हम रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देखकर 12.25 से पहले बाहर आ सकें। इतने में ही बरसात आरम्भ हो गई। हमने अनुमान लगाया कि साढ़े ग्यारह बज गए क्योंकि विजय ने सुबह ही गूगल पर देखकर रोम के मौसम विभाग द्वारा की गई भविष्यवाणी के बारे में बता दिया था कि आज बारसात साढ़े ग्यारह बजे आरम्भ होगी।

कल जो छतरी हमने रास्ते से खरीदी थी, आज उसे सर्विस अपार्टमेंट में ही भूल आए थे। वैसे भी इतनी तेज बारिश में वह किसी काम की नहीं थी। यहाँ बहुत से बांग्लादेशी विक्रेता हाथों में छतरियां एवं मोमजामे की बरसातियां (कामचलाऊ रेनकोट) बेच रहे थे। जैसे ही बरसात आरम्भ हुई, वैसे ही छतरियों एवं मोमजामे की बरसातियों की बिक्री होने लगी। हमने भी चार बरसातियां खरीदीं, एक पिताजी के लिए, एक भानु के लिए, एक मेरे लिए और एक मधु के लिए। विजय और दीपा घर से वाटर-प्रूफ विण्ड चीटर पहनकर आए थे जिनमें कैप भी लगी थीं। इसलिए उन्हें बरसातियों की आवश्यकता नहीं थी।

बांग्लादेशी विक्रेताओं ने हमसे प्रत्येक बरसाती के लिए पाँच डॉलर मांगे। भारत में इस तरह की पॉलीथीन की कीमत मुश्किल से 30-40 रुपए होती। यह इतनी पतली पॉलीथीन थी कि जरा सा नाखून लगते ही फट जाती। थोड़े से मोलभाव के बाद हमें प्रत्येक बरसाती के लिए ढाई यूरो अर्थात् 200 भारतीय रुपए चुकाने पड़े।

बरसात तेज होती देखकर हम लोग कतारों से बाहर निकल गए और वहीं आ गए जहाँ पिताजी बैठे हुए थे। तब तक विजय ने दौड़कर पिताजी को पॉलीथीन की बरसाती पहना दी थी।

पर्यटकों को जानबूझ कर सुविधाओं से वंचित किया जा रहा था

हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि देश-विदेश से आए हजारों पर्यटक बरसात में खड़े-खड़े भीग रहे थे किंतु उनके लिए सरकार, नगर पालिका, कोलोजियम प्रबंधन, एनजीओ (स्वयं सेवी संगठन) आदि की तरफ से, किसी तरह के शेड, चबूतरे, बरामदे, लॉन, कुर्सी, प्याऊ, पेशाबघर आदि की व्यवस्था नहीं थी।

ऐसा लगता था कि यह सब सोच-समझ कर किया जा रहा था ताकि बंग्लादेशियों की पॉलिथीन एवं छतरियां बिक सकें। यह ठीक वैसा ही था जैसा कुछ साल पहले तक भारत में कुछ रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन के आगमन के समय रेलवे के नलों में पेयजल की आपूर्ति बंद कर दी जाती थी ताकि लोग वेण्डर्स से पानी की बोतलें खरीदें तथा 10 रुपए की बोतल के लिए 20 रुपए चुकाएं। हालांकि श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में इस तरह की व्यवस्थाओं में सुधार आया है।

अस्सी रुपए में लघुशंका

अब मुझे लघुशंका से निवृत्त होने की इच्छा होने लगी। हमने बांग्लादेशियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि कोलोजियम के पीछे एक टॉयलेट है। मैं किसी तरह पूछता हुआ और ढूंढता हुआ वहाँ तक पहुँचा, मुझे लगभग पौन किलोमीटर चलना पड़ा था। टॉयलेट के बाहर एक अफ्रीकी नस्ल का कर्मचारी बैठा हुआ सबसे 1 यूरो चार्ज कर रहा था, संभवतः वह नाइजीरियन था। मैं ठिठक गया, एक बार पेशाब करने के अस्सी रुपए! थी तो यह ज्यादती किंतु किया क्या जा सकता था!

कोलोजियम में प्रवेश

जब तक मैं टॉयलेट से लौटकर आया, तब तक बारह बज चुके थे और हम कोलोजियम में प्रवेश ले सकते थे। बारिश अब भी तेज थी। कोलोजियम के सामने दो तरह की कतारें थीं। एक तरफ की कतारों में वे पर्यटक थे जिन्होंने अभी-अभी टिकट खरीदे थे। उन्हें छोटे-छोटे समूहों में भीतर भेजा जा रहा था।

दूसरी तरफ की कतार के लोगों को तत्काल कोलोजियम में जाने दिया जा रहा था। यह कतार बहुत छोटी थी। चूंकि हमारे पास पहले से ही टिकट बुकिंग थी इसलिए हम तत्काल कोलोजियम में प्रवेश पा गए। बरसात की आपाधापी में हमारे छः टिकटों में से दो टिकट भीग गए इसलिए वे स्कैनर के सामने काम नहीं कर पाए। काउण्टर पर बैठी लड़की ने अपने से वरिष्ठ अधिकारी से बात की तो वह समस्या को तत्काल समझ गया और उसने हम सभी को भीतर जाने की अनुमति दे दी।

कॉलेजियम

यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज से लगभग दो हजार साल पहले बनी यह बिल्डिंग आज भी उन्मत्त भाव से खड़ी है। कुछ हिस्सों की अवश्य ही सरकार द्वारा मरम्मत करवाई गई है। कॉलेजियम का मुख्य डिजाइन इस प्रकार है कि बीच में वृत्ताकार मैदान है। उसके चारों तरफ छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई हैं जिनमें ग्लेडियेटर्स बंद रहते थे।

ऊपर की मंजिल में छज्जेदार एवं खुली बालकनियां बनी हुई हैं। इन बालकनियों में रोमन सम्राट एवं राजपरिवार के सदस्य, धनी-सामंत तथा जन-सामान्य बैठा करता था। यहाँ से ये लोग सामने मैदान में चल रहे भयानक रक्तपात के दृश्यों को देखते थे। प्रत्येक ग्लेडिएटर अपने प्राण बचाने के लिए अपने प्रतिद्धंद्वी के प्राण लेता था। इस प्रयास में प्रत्येक ग्लेडिएटर तब तक लड़ता रहता था जब तक कि वह किसी अन्य प्रतिद्वंद्वी द्वारा न मार दिया जाए।

जो ग्लेडियेटर लड़ने से मना करता था, उस पर भूखे शेर छोड़ दिए जाते थे और रोम के राजा एवं प्रजा उन भूखे शेरों द्वारा मनुष्यों की हड्डियों को चबाए जाने के वीभत्य दृश्य देखकर तालियां बजाते थे। इन सारे दृश्यों के दो परिणाम होते थे- पहला परिणाम मनोरंजन के रूप में मिलता था और दूसरा परिणाम धनी-सामंतों एवं राजा को होने वाली विपुल धनराशि के रूप में मिलता था।

हमने लगभग डेढ़ घण्टा कोलोजियम में बिताया। बाहर अब बरसात थम चुकी थी किंतु इस समय तक पिताजी पूरी तरह थक चुके थे। इसलिए हम अपने सर्विस अपार्टमेंट को लौट लिए। घर आकर भोजन किया तथा कुछ देर विश्राम करने के बाद सायं 4 बजे के आसपास हम लोग पेंथिऑन तथा पियाजा नवोना देखने के लिए निकल गए। इस बार पिताजी घर पर ही रहे। थकान हो जाने के कारण उन्होंने चलने से मना कर दिया। उन्हें हल्का सा बुखार भी हो आया था।

पेंथिऑन का रोमांच (मंगल देवता का प्राचीन मंदिर)

कुछ वर्ष पहले मैंने एक अमरीकी लेखक डेन ब्राउन का उपन्यास एंजिल्स एण्ड डेमॉन्स पढ़ा था। इस उपन्यास में रोम शहर में स्थित प्राचीन भवनों, चौराहों, फव्वारों, चित्रों, चर्चों को आधार बनाते हुए एक अद्भुत काल्पनिक कथा गढ़ी गई है। धर्म और विज्ञान के बीच हुए युद्ध एवं एक कार्डिनल द्वारा किए जा रहे षड़यंत्रों के कथानक ने उपन्यास को अत्यंत रोचक बना दिया है।

एण्टी मैटर को चुराने से लेकर उसके नष्ट होने के बीच होने वाली हत्याओं के सिलसिले को समाप्त करके जब पाठक उपन्यास पूरा करता है तो रोम शहर के पुराने चर्च, कब्रिस्तान, बेसिलिका, टॉवर, फव्वारे, चौराहे आदि जीवंत होकर पाठक की आंखों में तैरने लगते है। पाठक की स्मृति में पेंथिऑन की भी एक अमिट छाप अंकित हो जाती है। वही पेंथिऑन हमारे सामने था। इस प्राचीन रोमन मंदिर का वर्णन इस पुस्तक में पहले ही कर दिया गया है।

यह भवन ईसा के जन्म से पहले, ई.पू.31 में तत्कालीन रोमन शासक मार्कस एग्रिप्पा (लूसियस का पुत्र) के समय बनना आरम्भ हुआ। उसने एक्टियम के युद्ध में रोमन सेनाओं की विजय के उपलक्ष्य में तीन भवन बनाने का निर्णय लिया। इनमें से पहला भवन मंगल देवता का मंदिर (मार्स टेम्पल) था, दूसरा भवन एग्रिप्पा सार्वजनिक स्नानागार था तथा तीसरा भवन नेप्च्यून देवता (वरुण देवता) का मंदिर था। ये भवन प्रथम रोमन सम्राट ऑगस्टस सीजर ऑक्टेवियन के समय बनकर पूरे हुए। उस युग के भवनों को ऑगस्टस शैली के भवन कहा जाता है जिनमें से पैंथिऑन भी एक है।

आज भी रोम नगर के मध्य में ये तीनों संरचनाएं देखी जा सकती हैं जो उत्तर से दक्षिण में एक सीध में बनी हुई हैं। इनमें से मंगल देवता का मंदिर तथा वरुण देवता का मंदिर जनसामान्य के लिए नहीं थे, इनका उपयोग केवल सम्राट एवं उसके परिवार के सदस्य करते थे। जबकि एग्रिप्पा स्नानागार सार्वजनिक उपयोग के लिए था। पेंथिऑन के सामने आज भी लैटिन भाषा में एक प्राचीन शिलालेख लगा है जिसमें इसे पैंथिऑन डोम कहा गया है।

ई.54 से 68 के बीच नीरो रोम का सम्राट हुआ। उसके समय रोम में भयानक आग लगी जिसमें ये तीनों भवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। उसने रोम के क्षतिग्रस्त भवनों को दुबारा से बनवाया। नीरो ने अथवा उसके बाद के किसी राजा ने इस भवन का पुनर्निर्माण करवाया। यह राजा वेस्पेयिन भी हो सकता है जिसने रोम पर लगभग साढ़े नौ साल राज्य किया। ई.80 में रोमन सम्राट टाइटस के समय रोम में बड़ा ज्वालामुखी फटा जिसके कारण रोम में एक बार पुनः भयानक आग लग गई।

इस दौरान रोम के कई भवनों को क्षति पहुँची। नव-निर्मित पैंथिऑन भी इस आग की भेंट चढ़ गया। टाइटस के उत्तराधिकारी डोमिशियन ने पैंथिऑन को पुनः बनवाया। ई.97 से ई.117 तक ट्राजन नामक महान् रोमन सम्राट ने शासन किया। उसके समय में ई.110 में रोम पर आक्रमण करने वाले कुछ शत्रुओं ने पैंथिऑन को पुनः जला दिया। ट्राजन ने रोम नगर का पुनर्निर्माण करवाया। उसके समय में रोमन स्थापत्य एवं शिल्प अपनी नई ऊंचाइयों पर पहुँचा।

ई.114 में उसने पैंथिऑन को नए सिरे से बनवाना आरम्भ किया। उसके उत्तराधिकारी सम्राट हैड्रियन ने ट्राजन के समय आरम्भ हुए भवनों को पूरा करवाया। इस काल का शिलालेख भवन की दीवार में लगा हुआ है।

इस पुनर्निर्माण के बाद पैंथिऑन को फिर कभी पुनर्निर्मित नहीं किया गया। यही कारण है कि इन भवनों में आज भी ट्राजन एवं हैड्रियन युग की ईटें लगी हुई हैं। इसके निर्माण के बाद की शताब्दियों में हुए लेखकों के विवरणों में इस भवन के उल्लेख मिलते हैं। ई.202 में सैप्टिमियस सेरेवस तथा उसके पुत्र कैरेकाला ने इस भवन की मरम्मत करवाई।

उस काल का एक शिलालेख आज भी भवन की दीवार में लगा हुआ है।  ई.337 में रोमन सम्राट कॉन्स्टेन्टीन द्वारा ईसाई धर्म स्वीकार करने से पहले तक यह भवन रोम के राजाओं का प्रमुख देवालय बना रहा किंतु ई.337 के बाद यह मंदिर उजड़ने लगा। ई.609 में बिजैन्तिया के रोमन सम्राट फोकस ने पैंथिऑन भवन पोप बोनीफेस (चतुर्थ) को दे दिया।

उसने इस प्राचीन रोमन मंदिर को ईसा मसीह की माता मैरी तथा ईसाई धर्म में तब तक हुए शहीद संतों के नाम पर ‘सांक्टा मारिया एण्ड मारटायर्स रोटोण्डा’ नामक चर्च में बदल दिया। उस समय पोप द्वारा यह घोषणा की गई कि इस स्थान पर जिन्हें एंजिल (देवता) कहकर पूजा जाता था, वास्तव में वे डेमॉन्स (राक्षस) थे। संभवतः अमरीकी लेखक मार्क डेन को अपने उपन्यास का शीर्षक ‘एंजील्स एण्ड डेमॉन्स’ रखने का विचार यहीं से आया होगा। इस उपन्यास में पैंथिऑन की चर्चा बहुत विस्तार से की गई है।

सम्राट फोकस के आदेश से शहीद ईसाई संतों के अवशेष ‘कब्रिस्तानों’ से निकालकर पैंथिऑन के सीमा-क्षेत्र में गाढ़े गए। कहा जाता है कि ईसाई संतों के अवशेष 28 गाड़ियों में भरकर इस स्थान पर लाए गए। सम्राट पाफकस ने रोम के समस्त भवनों से धातुओं की चद्दरें उतार कर कुस्तुंतुनिया भिजवा दीं। ताम्बे, कांसे और पीतल की ये चद्दरें प्राचीन रोमन सम्राटों द्वारा रोम के राजकीय भवनों एवं देवालयों को सजाने के लिए लगाई गई थीं।

जब रोम की राजनीतिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई तब रोम के प्रमुख राजकीय एवं सार्वजनिक भवनों से संगमरमर के अलंकृत पत्थर, पट्टिकाएं तथा मूर्तियां भी लूट ली गईं। इनमें से कुछ सामग्री आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में देखी जा सकती है।

जब कुस्तुंतुनिया के पतन के बाद 15वीं शताब्दी ईस्वी में रोम में पुनर्जागरण का युग आरम्भ हुआ तब पैंथिऑन डोम के भीतरी भाग को रोम के प्रसिद्ध चित्रकारों द्वारा महत्त्वपूर्ण चित्रों से सजाया गया जिनमें मेलोज्जो दा फोरली तथा फिलिप्पो ब्रूनेलेश्ची का चित्र ‘घोषणा’ सर्वप्रमुख माना जाता है।

पुनर्जागरण युग के कई महत्त्वपूर्ण कलाकारों के शवों को भी पैंथिऑन परिसर में दफनाया गया। इनमें चित्रकार राफेल तथा एनीबाले कैराकी, गीतकार अर्कान्जिलो, शिल्पकार बलडेसर पेरुजी, आदि सम्मिलित थे।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में पोप उरबान अष्टम् बारबेरिनी (ई.1623-44) ने पैंथिऑन के पोर्टिको में लगी ब्रोंज की भारी भरकम चद्दरें उखाड़ लीं। इस धातु के 90 प्रतिशत भाग का उपयोग सैंट एन्जिलो कैसल के लिए तोपें तथा उनके गोले बनाने में किया गया तथा शेष 10 प्रतिशत धातु का उपयोग रोम के सुप्रसिद्ध वास्तुकार बरनिनी द्वारा सेंट पीटर बेसिलिका के ऊपर दिखाई देने वाली ‘टेकरी’ बनाने में किया गया।

 पैंथिऑन के दोनों ओर सजावट के लिए बनाई गई संरचनाओं को पोप उरबान (अष्टम्) ने ‘गधे के कान’ घोषित करके उन्हें भी हटवा दिया तथा उनके स्थान पर ईटों के दो कॉलम खड़े करवा दिए जो उन्नीसवीं सदी के अंत तक अपने स्थान पर मौजूद रहे। उस काल के एक कवि ने अपनी कविता में लिखा है कि जो काम बारबेरियन (बर्बर आक्रान्ता) नहीं कर पाए वह बरबेरिनिस (पोप उरबान अष्टम् के वंशज) ने कर दिखाया।

इटली के एकीकरण के बाद इटली के प्रथम सम्राट विटोरियो एमेनुएल (द्वितीय) का शव इसी परिसर में दफनाया गया। उसके बाद सम्राट उम्बेरतो (प्रथम) तथा उसकी रानी माग्रेरिटा के शव भी यहीं दफनाए गए। वर्तमान में पैंथिऑन एक कैथोलिक चर्च है। हर समय हजारों पयर्टकों की भारी भीड़ के बीच भी चर्च की गतिविधियां चलती रहती हैं।

भारी भीड़ के बीच ही, चर्च में विवाह भी करवाए जाते हैं। पैंथिऑन का मुख्य भीतरी भवन गोलाकार डोम है जिसका व्यास 142 फुट तथा फर्श से छत के गुम्बद तक की ऊँचाई भी 142 फुट है। इसके सामने एक बड़ा बरामदा बना हुआ है। यह चर्च जिस विशाल चौक में खड़ा है उसे ‘पियाजा डेल्ला रोटोण्डा’ अर्थात् ‘रोटोण्डा का चौक’ कहा जाता है।

इस भवन को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि महान् रोमन सम्राटों के शासन काल में, विशेषकर ट्राजन एवं हैड्रियन के समय में रोम में किस प्रकार के भवन बन रहे थे! उस काल में रोम में इस प्रकार के और भी भवन बने थे किंतु उनमें से अधिकांश नष्ट हो चुके हैं किंतु एग्रिप्पा सार्वजनिक स्नानागार के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं जिसका निर्माण पैंथिऑन के साथ करवाया गया था। ये भवन ईसाई धर्म के जन्म लेने से पहले के रोम का दर्शन करवाते हैं।

पियाजा नवोना

पैंथिऑन से निकलकर हम लोग पियाजा नवोना अर्थात् नवोना चौक गए। वर्ष 2000 में अमरीकी लेखक डेन ब्राउन द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘एंजील्स एण्ड डेमॉन्स’ में इस फव्वारे की भी विपुल चर्चा की गई है, जिसके बाद से यह फव्वारा विश्व-भर के पर्यटन मानचित्र पर आ गया है। पैंथिऑन तथा पियाजा नवोना के बीच लगभग आधा किलोमीटर की दूरी है। एक पतली सी गली से होकर वहाँ तक पहुँचा जा सकता है।

बीच में एक सड़क भी पार करनी होती है जिस पर तेज गति से वाहन चलते हैं किंतु वे पदयात्रियों को देखते ही एकदम यंत्रवत् स्थिर हो जाती हैं। पियाजा नवोना एक विशाल आयताकार चौक है जिसके दोनों छोर पर दो कलात्मक फव्वारे बने हुए हैं। इन दोनों के मध्य में भी एक अलग तरह का फव्वारा है। ये तीनों फव्वारे संगमरमर से बनी मूर्तियों से सजाए गए हैं। इनमें से बहुत सी मूर्तियां मनुष्यों के आकार से भी बड़ी हैं। ये मूर्तियां प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की हैं जिनमें से अधिकांश नग्न हैं। प्राचीन रोमन लोग देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं की ही पूजा किया करते थे।

रोमन सम्राट डोमिशियन ने पहली शताब्दी ईस्वी में इसी स्थान पर एक स्टेडियम का निर्माण करवाया था जिसे ‘स्टेडियम ऑफ डोमिशियन’ तथा ‘सर्कस एगोनालिस’ कहा जाता था। इस स्टेडियम में खेल-प्रतियोगिताएं होती थीं जिन्हें देखने के लिए सम्राट अपने परिवार एवं सामंतों सहित आता था।

 बाद की शताब्दियों में इसे ‘नवोना’ कहा जाने लगा। आज भी इस चौक का आकार एक स्टेडियम जैसा ही है जिसके चारों तरफ विगत दो हजार सालों में भवनों की एक विशाल शृंखला उग आई है। रोमन सम्राट इनोसेंट (दशम्)  के शासन काल (ई.1644-55)में इस क्षेत्र में ‘बैरोक रोमन स्थापत्य शैली’ में विशाल भवनों का निर्माण करवाया गया।

सम्राट इनोसेंट का राजमहल ‘पलाज्जो पैम्फिली’ भी पियाजा नवोना की तरफ मुंह करके बनाया गया था। इस चौक के केन्द्र में बना फव्वारा फोण्टाना देई क्वात्रो फियूमी (चार नदियों वाला फव्वारा) कहलाता है। इसे ई.1651 में जियान लॉरेन्जो बरनिनी ने डिजाइन किया था। इसके ऊपर एक विशाल स्तम्भ खड़ा है जिसे ऑबलिस्क ऑफ डोमिशियन कहा जाता है। इसे टुकड़ों के रूप में सर्कस ऑफ मैक्सीन्टियस से लाया गया था।

इसी चौक में दो और फव्वारे बनाए गए हैं। इसके दक्षिणी छोर पर फोण्टाना डेई मोरो स्थित है। इसे ई.1575 में जियाकोमो डेल्ला पोर्ता ने डिजाइन किया था। ई.1673 में बरनिनी ने इसमें मूर तथा डॉल्फिन की प्रतिमाएं बनाई। इसके चारों ओर एक कलात्मक खाई बनाई गई है। इसके बाईं ओर के छोर पर फाउण्टेन ऑफ नेपच्यून स्थित है जिसे ई.1574 में जियाकोमो डेल्ला पोर्ता ने डिजाइन किया था। इस फव्वारे में स्थित स्टेच्यू ऑफ नेपच्यून ई.1878 में एण्टोनियो डेल्ला बिट्टा ने बनाई थी ताकि इस फव्वारे का दृश्य फोण्टाना डेई मोरो के साथ संतुलन स्थापित कर सके।

इस चौक का उपयोग नाटक आदि खेलने के लिए भी किया जाता था, यह परम्परा आज भी जारी है। ई.1652 से ई.1866 तक अगस्त माह के प्रत्येक शनिवार एवं रविवार को इस चौक में पैम्फिली परिवार के लोग एकत्रित होकर उत्सव का आयोजन करते थे। किसी समय इस क्षेत्र में एक बाजार स्थापित किया गया था जिसे ई.1869 में निकटवर्ती कैम्पो डे फियोरी में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान समय में क्रिसमस के दिनों में इस चौक में अस्थाई बाजार लगता है।

जब हम इस चौक पर पहुँचे तो संध्या होने वाली थी। हालांकि रोम में सूर्य का प्रकाश रात नौ बजे तक रहता है, इसलिए चिंता की बात नहीं थी। हम कुछ समय इस स्थान पर रुक सकते थे। इस स्थान पर देश-विदेश से आए हजारों दर्शक थे। कुछ स्थानीय कलाकार सर्कस जैसे खेल दिखाकर पर्यटकों से चंदा मांग रहे थे।

कुछ युवक मण्डलियां सर्कस एवं नृत्य-नाटिका का सम्मिलित प्रदर्शन करके यूरो एकत्रित कर रहे थे। कुछ संगीत मण्डलियां वाद्य बजाकर लोगों का मनोरंजन कर रहे थे। हमारे सामने ही दूर देशों से आए युवक-युवतियों ने उस संगीत पर नृत्य करना आरम्भ किया और थोड़ी ही देर में वे एक गोल घेरे में ऐसे नाचने लगे जैसे वे एक-दूसरे को जानते हैं और वर्षों से इसी तरह नृत्य करने के अभ्यस्त हैं।

चौक के चारों ओर भारतीय थड़ियों जैसी स्टॉल लगी हुई थीं जिनमें रखे कुछ लैम्पों से आग की लपटें निकल रही थीं। कुछ महंगे रेस्टोरेंट्स वालों ने भी अपनी कुर्सियां चौक में लगा रखी थीं जिन पर बैठकर विदेशी पर्यटक जमकर अल्कोहल पी रहे थे।

सिगरेट के धुएं से बनते छल्ले, संगीत की लहरियां, युवक-युवतियों के नृत्य, थड़ियों पर कई फुट ऊंची उठती आग की लपटें, फव्वारों की जल-धाराएं सब मिलकर ऐसा दृश्य उत्पन्न कर रहे थे मानो हम ऐसी धरती पर आ गए हैं जहाँ न कोई दुःख है, न चिंता है, न भय है, न किसी तरह का संघर्ष है, न कोई प्रतियोगिता है, न कोई उद्विग्नता है। बस चारों ओर नृत्य है, शराब है, संगीत है, यौवन है, मादकता है, विलासिता है, भोग की इच्छा है। संभवतः इसी सबकी कामना में दुनिया भर के देशों से धनी पर्यटक इटली आते हैं।

आज की शाम वे सब यहाँ हैं, कल कहीं और होंगे, उनकी जगह नए पर्यटक होंगे। सुख प्राप्त करने की अभिलाषा कल भी यहाँ इसी प्रकार नृत्य करेगी, शराब ढलेगी और इटैलियन फूड स्टॉल्स के लैम्पों से निकलती आग की लपटें इसी प्रकार आकाश को चूम लेने के लिए लपकती रहेंगी। न जाने कब से यह सिलसिला चल रहा है और कौन जाने कब तक जारी रहेगा!

मन का एक कौना बार-बार सचेत करने का प्रयास करता था, पर्यटकों की ये समस्त चेष्टाएं, अपने द्वारा अर्जित किए गए धन को भोगने की अभिलिप्सा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते कि सुख कहाँ से आता है और उसकी सृजना कैसे होती है!

वे इसी को सुख समझ रहे थे, जो कि केवल आज शाम से अधिक समय तक उनके साथ नहीं रहने वाला था। हाँ इतना अवश्य था कि इन क्षणों में वे अपने उन हजारों दुःखों को भूले हुए थे जिनके कारण प्राणी का जीवन इस धरती पर हर समय कष्टमय और संकटग्रस्त रहता है!

सब-अर्बन स्टेशन

पियाजा नवोना की रंगीनियों से निकलकर हमने बस पकड़ी और रेल्वे स्टेशन आ गए। यहाँ हमें फ्लोरेंस जाने वाली ट्रेनों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी थी। आज 20 मई थी तथा 22 मई की सुबह हमें फ्लोरेंस के लिए ट्रेन पकड़नी थी। यह ट्रेन मुख्य रोम रेल्वे स्टेशन से मिलनी थी किंतु जहाँ हम ठहरे हुए थे वहाँ से रोम का मुख्य स्टेशन लगभग 5 किलोमीटर दूर था।

अतः हम चाहते थे कि हमारे अपार्टमेंट से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित  सब-अर्बन स्टेशन से हमें रोम रेल्वे स्टेशन के लिए कोई ट्रेन मिल जाए। रेल्वे स्टेशन पर कार्यरत रेलवे कर्मचारियों से पूछताछ में ज्ञात हुआ कि रेलवे ट्रेन से जाने की बजाय बस से जाना अधिक सुगम होगा।

हमें इसी सबअर्बन स्टेशन के बाहर से 63 नम्बर की बस मिलेगी जो हमें रोम के मुख्य रेल्वे स्टेशन पर छोड़ देगी। हालांकि हमारे पास मेरूलाना प्लाजो से लिए गए पास थे जिससे हम चार दिनों तक रोम में किसी भी बस और ट्राम में निःशुल्क यात्रा कर सकते थे किंतु हमारे पास सामान अधिक था।

हमें इतने सारे सामान को सर्विस अपार्टमेंट से घसीटकर रेल्वे स्टेशन के बस-स्टॉप तक लाना उचित नहीं लगा। अतः हमने निर्णय लिया कि रोम के मुख्य स्टेशन तक जाने के लिए ट्रेन या बस का उपयोग करने की बजाय कार-टैक्सी करना अधिक उचित होगा। बड़ा विचित्र शहर है, यहाँ न ऑटो रिक्शा है, न तांगा है, न साइकिल रिक्शा है। शहर में यात्रा करने के केवल तीन ही साधन हैं, बस, ट्राम और कार-टैक्सी। तीनों ही बहुत महंगे हैं।

विशाल दरवाजों एवं आश्चर्यजनक आर्चों का देश!

रोम के भवनों में विशाल दरवाजों तथा तरह-तरह के आर्च का प्रयोग आम बात है। इन भवनों के गोल, तिकोने, फ्लैट आर्च देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। कुछ पत्थर तो ऐसे भी हैं जो एक की बजाय दो आर्च का हिस्सा हैं। आधा पत्थर इधर वाली आर्च का और आधा हिस्सा दूसरी तरफ वाली आर्च का। बाद में हमें ऐसे आर्च और विशाल दरवाजे फ्लोरेंस में भी देखने को मिले।

इटली के भिखारी

सबअर्बन रेल्वे स्टेशन के ठीक सामने बनी एक पुलिया के नीचे हमने एक परिवार को देखा। एक बहुत सुंदर इटैलियन युवती, दो छोटे बच्चे और उनका पिता। भारत में ऐसी अच्छी शक्ल-सूरत वाले भिखारी देखने को नहीं मिलते। हमें आश्चर्य हुआ कि यहाँ भी भिखारी होते हैं! उस भिखारी दम्पत्ति ने कुछ आशा भरी दृष्टि से हमें देखा। मुझे उनकी आंखों में याचना के स्थान पर आक्रामकता अधिक दिखाई दी। इसलिए मैंने चाहकर भी उनसे बात नहीं की। कौन जाने कब ये लोग क्या नाटक कर बैठें!

हम स्टेशन परिसर से बाहर निकलकर पैदल ही सर्विस अपार्टमेंट की तरफ चल दिए जो इस स्थान से कठिनाई से 400 मीटर की दूरी पर था। रोम तथा वेनिस की गलियों में हमने इक्का-दुक्का कुछ और भिखारियों को भी देखा। वे शरीर से अत्यंत कमजोर थे तथा सभी वृद्धावस्था में दिखाई देते थे।

उनके शरीर पर पैण्ट-शर्ट एवं कोट, हाथ में मोबाइल फोन, भीख मांगने का कटोरा और एक ट्रैवलर बैग जैसा बैग भी था। किसी भी भिखारी के पास वैसी गठरी नहीं थी जैसी भारत के भिखारियों के पास होती है। इटली में भिखारियों की संख्या इतनी कम है कि मेरे अनुमान से सरकार बड़ी आसानी से उनका पुनर्वास कर सकती है।

संभवतः पूरे इटली में दो-सौ से अधिक भिखारी नहीं होंगे, या फिर और भी कम। इटली के भिखारी बड़ी आशा भरी दृष्टि से पर्यटकों की तरफ देखते हैं तथा अपनी समझ के अनुसार अभिवादन भी करते हैं किंतु वे पर्यटकों को तंग नहीं करते।

हम यहाँ किसी भी भिखारी को कुछ भी देने की स्थिति में नहीं थे। एक यूरो से कम तो क्या देते जो कि भारत में 80 रुपए का मूल्य रखता था। इतना हम देना नहीं चाहते थे और इससे कम देने पर कौन जाने कोई भिखारी हमारे साथ बदतमीजी ही कर ले, जैसे कि भारत के भिखारी कर लेते हैं!

किन्नरों से सामना नहीं!

सबअर्बन स्टेशन से हम पैदल ही अपने फ्लैट की ओर चल पड़े। इसी के साथ हमारा रोम में चौथा दिन पूरा हो गया। इटली की अपनी ग्यारह दिन की यात्रा में हमारा सामना किसी भी किन्नर से नहीं हुआ। कौन जाने यहाँ किन्नर होते भी हैं कि नहीं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोम में पांचवाँ दिन – 21 मई 2019 (6)

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रोम में पांचवाँ दिन

आज रोम में हमारा पांचवाँ दिन था। आज हमें सेंट एंजिलो कैसल जाना था। इस कारण आज का दिन भी बहुत से नए अनुभवों वाला होने वाला था।

शरीर भारतीय समय को भूलकर इटली का समय अपनाने लगा है। हालांकि अब भी आंख एक बार तो भारतीय समय के अनुसार प्रातः पाँच बजे खुल जाती है किंतु अब दोबारा सोने पर वापस नींद भी आ जाती है और इटली के समयानुसार प्रातः पांच बजे खुल जाती है। आज सुबह से ही बरसात आरम्भ हो गई थी। पिताजी ने हमारे साथ नहीं चलने का निर्णय लिया तथा घर पर ही विश्राम करने की इच्छा व्यक्त की। हमने उनसे कहा कि पिछले दिन दिनों से सायं काल में बरसात नहीं हो रही है, यदि आज भी मौसम अच्छा रहा तो आप हमारे साथ लंच के बाद चले चलना।

मरकातो फूडो

मैं सुबह आठ बजे तैयार हो कर मरकातो फूडो देखने चला गया। यह एक सब्जी एवं फल बाजार था किंतु कुछ दुकानों पर कच्चा मांस भी बिक रहा था जिसे कांच की अलमारियों में प्रदर्शित किया गया था। सारी सब्जियां और फल ताजी थे। अधिकतर वृद्ध महिलाएं इस बाजार में खरीदरारी कर रही थीं।

सेंट एंजेलो कैसल

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हमारे पास मेरूलाना प्लाजो से खरीदे गए टिकट थे जिनसे हम इटली के कुछ निश्चित स्थल देख सकते थे। इनमें सेंट एंजेलो कैसल भी सम्मिलित था। हमने वहीं जाने का निर्णय लिया। आज हम प्रातः नौ बजे घर से निकलने में सफल हो गए। बस भी जल्दी ही मिल गई। हमारे अपार्टमेंट से सेंट एंजिलो कैसल मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर था इसलिए हमें वहाँ पहुँचने में अधिक समय नहीं लगा। जिस समय हम सेंट एंजेलो कैसल में घुसे, वर्षा शुरु हो गई थी। यह एक प्राचीन गोलाकार दुर्ग है जो पार्को एड्रियानो क्षेत्र में टिब्रिस (ट्रेवी तथा टाइबर) नदी के तट पर स्थित है। एक तरह से टाइबर नदी इस दुर्ग की प्रथम रक्षा पंक्ति का निर्माण करती है। इस दुर्ग का निर्माण दूसरी शताब्दी ईस्वी के रोमन सम्राट हैड्रियन ने करवाया था। हैड्रियन तथा उसके परिवार के सदस्यों की समाधियाँ आज भी इस दुर्ग में स्थित हैं। हैड्रियन ई.117 में रोम का सम्राट बना था तथा उसकी मृत्यु ई.138 में ‘बेई’ नामक स्थान पर हुई थी। हैड्रियन की रानी सबीना तथा उसके एक दत्तक पुत्र भी संभवतः राजा के साथ ही मारे गए थे। राजा तथा उसके परिवार के लोगों के अवशेष लाकर इस दुर्ग में दफनाए गए। राजा ने अपनी मृत्यु से पहले ही यहाँ अपने लिए तथा अपने परिवार के सदस्यों के लिए कब्रें बनवा दी थीं।

परवर्ती काल में रोम के पोप ने इसे अपना आवास बना लिया। किसी युग में यह रोम का सबसे ऊंचा भवन था। आज भी बहुत कम भवन इस दुर्ग की ऊंचाई के बराबर हैं। हम इस दुर्ग के चारों ओर वैसे ही घूमते हुए चढ़ रहे थे जिस प्रकार पहाड़ी क्षेत्रों में बसें घुमावदार सड़कों पर चढ़ती हैं।

इस दुर्ग की छत पर मिशेल आर्केन्जिल नामक देवी की विशाल प्रतिमा लगी हुई है जिसके नाम पर इस दुर्ग का नामकरण किया गया है। इस दुर्ग तक पहुँचने के लिए ट्रेवी नदी पर बने हुए पोंटे सेंट एंजिलो नामक एक पुल को पार करना होता है जिसके दोनों तरफ प्राचीन कालीन ईसाई देवदूतों एवं देवियों की मूर्तियां लगी हुई हैं। हैड्रियन के बाद रोम के राजाओं के शवों को यहीं लाकर दफनाया जाता रहा।

यहाँ दफनाया जाने वाला अंतिम राजा कैराकैला था जिसकी मृत्यु ई.217 में हुई थी। ई.401 में इस दुर्ग को सैनिक मुख्यालय में बदल दिया गया। इसके कारण दुर्ग में स्थित प्राचीन काल के अनेक निर्माण ध्वस्त हो गए। ई.410 में जब विसिगोथ लुटेरों ने रोम में लूट मचाई तो इस दुर्ग में स्थित शाही कब्रों को भी खोद दिया गया ताकि वहाँ से कीमती सामग्री प्राप्त की जा सके। ई.537 में गोथ आक्रांताओं ने इसी प्रक्रिया को फिर से दोहराया तथा हैड्रियन एवं उसके बाद के सम्राटों के काल में बनी अनेक कीमती प्रतिमाओं को तोड़ डाला।

इन विध्वंसों के दौरान सम्राट हैड्रियन की कब्र पर रखा एक कीमती पत्थर साबुत बचा रहा जिसे बाद में सेंट पीटर्स बेसिलिका में सम्राट ऑट्टो की कब्र को ढंकने के लिए भेज दिया गया। जब रोम में ईसाई धर्म का बोलबाला हो गया तो इस दुर्ग में स्थित रोमन पैगन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को भी तोड़ डाला गया जिनमें से कुछ के खण्ड दुर्ग में हुई खुदाई एवं सफाई आदि के समय मिले हैं।

इन्हें दुर्ग के गलियारों में लगा दिया गया है। प्राचीन निर्माण के कुछ स्तम्भों के टुकड़े भी अब पर्यटकों एवं इतिहासकारों की सुविधा के लिए दुर्ग परिसर में प्रदर्शित किए गए हैं।

ई.590 में रोम में भयानक प्लेग फैल गया था जिसमें बहुत से रोमवासी मारे गए थे। उस समय रोम में पोप ग्रेगरी (प्रथम) का शासन था। एक लोक किंवदंती के अनुसार तब देवी आर्क एंजिल मिशेल इस दुर्ग की छत पर प्रकट हुई थी। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में एक यात्री ने इस लोक किंवदन्ती को रोमन लोगों के मुंह से सुना था तथा उस समय उसने दुर्ग पर एक देवी की प्रतिमा भी देखी थी।

उस काल में पोप ग्रेगरी (प्रथम) रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को नष्ट करवा रहा था। पोप ग्रेगरी (प्रथम) ने भी इस देवी की तलवार से खून टपकता हुआ देखा था। फिर भी पोप ने पैगन देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाना जारी रखा। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में पोप निकोलस (तृतीय) ने सेंट पीटर्स बेसिलिका से इस दुर्ग तक एक छतदार गलियारा बनवाया जिसे पैसेटो बोर्गो कहा जाता था। अब यह गलियारा मौजूद नहीं है। इसका उल्लेख केवल पुस्तकों में मिलता है।

ई.1527 में जब चार्ल्स (पंचम) ने रोम को घेर लिया तब पोप क्लेमेंट (सप्तम्) ने इसी दुर्ग में शरण ली थी। पोप के सिपाही इस दुर्ग की छतों पर खड़े होकर शत्रु सेना पर गोलियां बरसाया करते थे। लिओ (दशम्) ने मैडोना के साथ राफेएलो डा मॉण्टेलुपो के द्वारा एक चैपल का निर्माण करवाया।

ई.1536 में मॉण्टेलुपो ने सेंट मिशेल की एक संगमरमर की मूर्ति भी बनाई जिसके हाथ में एक तलवार थी। इस मूर्ति को दुर्ग के ऊपर स्थापित कर दिया गया। बाद में पोप पॉल (तृतीय) ने इस दुर्ग में एक विलासिता पूर्ण महल का निर्माण करवाया ताकि यदि भविष्य में फिर कभी रोम पर आक्रमण हो तो पोप इस महल में निवास कर सके।

ई.1753 में दुर्ग के ऊपर लगी हुई सेंट मिशेल की संगमरमर की प्रतिमा को एक नई कांस्य प्रतिमा द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया जिसका निर्माण फ्लेमिश शिल्पी पीटर एण्टोन वॉन वरशेफेल्ट ने किया था। अब यही मूर्ति दुर्ग पर लगी हुई दिखाई देती है। पुरानी प्रतिमा अब भी दुर्ग के भीतर एक खुले चौक में लगी हुई है। रोम के पोप शासकों ने इस दुर्ग का उपयोग बंदीगृह के रूप में भी किया। जियोर्डानो ब्रूनो को जीवित जलाने से पहले छः साल तक इसी दुर्ग में बंदी बनाकर रखा गया था। बेनवेनूटो सेलिनी नामक एक शिल्पी को भी इसी दुर्ग में बंदी बनाया गया। उस पर मुकदमा चलाने के लिए जेल में कोर्ट लगाई गई थी।

अब इस दुर्ग में एक संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। संसार भर से लगभग 12-13 लाख लोग इस दुर्ग को देखने के लिए प्रति वर्ष आते हैं। हम भी दुर्ग में लगी मूर्तियों को देखते हुए आगे बढ़ते रहे। दुर्ग भव्य और अद्भुत है किंतु भारत के रहस्यमय किलों के सामने यह एक बहुत छोटे परिंदे के जैसा है। इसके भीतर सुरंगनुमा मार्गों पर चलना भी किसी रहस्य को उजागर करने से कम नहीं है।

ये सुरंगनुमा मार्ग एक समान ऊंचाई पर ऊंचे उठते जाते हैं जिन पर कभी रोमन योद्धा घोड़ों पर सवार होकर सरपट दौड़ लगाते होंगे। इन सुरंगनुमा गलियारों के दोनों ओर छोटी-छोटी कोठरियां हैं जिन्हें देखकर भय लगता है।

राजकीय बंदी विद्रोही दार्शनिक एवं प्रतिद्वन्द्वी राजकुमार कभी इन्हीं कोठरियों में बंदी रखे जाते होंगे। बीच-बीच में शाही निवास के महल भी बने हुए हैं। इन महलों में संसार के श्रेष्ठ फ्रैस्कों (भित्तिचित्र) बने हुए हैं जिनमें बाइबिल की कथाएं तथा विभिन्न पोप से जुड़े हुए धार्मिक प्रसंग उत्कीर्ण हैं। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ एक गोल जादुई डिब्बे में बंद है।

हम सबसे ऊपर की मंजिल पर पहुँच गए जहाँ आजकल शस्त्रों का संग्रहालय स्थापित है। यहाँ तक पहुँचने के मार्ग में एक रेस्टोरेंट भी है जिसमें विदेशी पर्यटकों की अच्छी-खासी भीड़ थी। संग्रहालय के बाहर घुमावदार बरामदा बना हुआ है जिसमें खड़े होकर दुर्ग के एक हिस्से की छत पर पुरानी तोपों का संग्रहालय है।

बहुत से गोले भी सजाकर रखे गए हैं जो कभी तोपों में प्रयुक्त होने के लिए बनाए गए होंगे किंतु कभी भी तोपों में नहीं डाले गए। संभवतः ये तोपें और गोले उस समय के हैं जब पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में रोम के पोप दुर्ग में निवास करते होंगे।

ये तोपें सोलहवीं सदी ईस्वी की उन भारतीय तोपों से बिल्कुल अलग हैं जिनका प्रयोग मुगलों के समय भारत में किया जाता था। रोम के दुर्ग की तोपें बहुत कुछ वैसी ही हैं जिनका उल्लेख भारतीय प्राचीन ग्रंथों में चरिष्णु के नाम से किया गया है। इनसे गोला फैंकने की तकनीक बहुत कुछ भारतीय गोफन जैसी रही होगी।

जब हम इन तोपों को देखने में व्यस्त थे, तभी दुर्ग के बाहर बह रही ट्रेवी नदी का कोई पक्षी उड़कर इसी बरामदे के बाहर आकर बैठ गया। दीपा तुरंत ही उस पक्षी की ओर आकर्षित हुई। वह पक्षी और दीपा दोनों एक दूसरे को काफी देर तक देखते रहे। मानो दोनों के बीच कोई मूक संवाद चल रहा हो। मैंने इस दृश्य को अपने सैलफोन के कैमरे में कैद कर लिया। आज यह रोम यात्रा की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक है।

संग्रहालय देखने के बाद हम दुर्ग की छत पर पहुँचे। यहाँ से पूरा रोम दिखाई देता है। शताब्दियों एवं सहस्राब्दियों के अंतराल में बसा हुआ यह विशाल शहर ऐसा लगता है मानो किसी ने एक विशाल कैनवास पर रंगों से भवनों, सड़कों, नदियों और ऊँचे-ऊँचे गिरजाघरों को आकार दे दिया हो। सेंट पीटर्स स्क्वैयर तथा सेंट पीटर्स बेसिलिका यहाँ से बहुत साफ दिखाई देते हैं।

सेंट पीटर्स बेसिलिका के गुम्बद की लगभग 10-12 अनुकृतियां भी चारों तरफ दिखाई देती हैं मानो किसी ने इस भव्य पैरोनोमा को पूर्णता प्रदान करने के लिए इतने सारे विशाल चर्चों का निर्माण किया हो!

हम बहुत देर तक रोम शहर को देखते रहे। किसी ने सच ही कहा है- ‘रोम वाज नॉट बिल्ट इन ए डे!’  जहाँ तक पर्यटकों को जाने की अनुमति है उसके पास भी एक ऊंची दीवार है जिस पर सेंट एंजिलो मिशेल की मूर्ति लगी हुई है। इसी मूर्ति के कारण इस दुर्ग को अब सेंट एंजिलो कैसल कहा जाता है। कैसल के सामने एक इटैलियन युवती गिटार बजा रही थी और इटैलियन भाषा में कोई गीत गा रही थी।

रोम शहर की सफाई-व्यवस्था

दुर्ग के नीचे बह रही नदी की कलकल ध्वनि को तो यहाँ से नहीं सुना जा सकता किंतु नदी में तैरते रहने वाले सफेद बगुलों जैसे पक्षी पूरे परिवेश को जीवंत बनाए रहते हैं। नदी में तैरते हुए पक्षियों के झुण्ड भी यहाँ से साफ दिखाई देते हैं। इन पक्षियों की उपस्थिति दर्शकों को अचम्भित करती है।

 पूरे रोम शहर में एक भी गाय, साण्ड, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, कौआ, बंदर गिलहरी, छिपकली, मक्खी, मच्छर आदि देखने को नहीं मिलता किंतु रोम वासियों ने जैसे इन पक्षियों पर अनुकम्पा करके उन्हें शहर के आकाश में उड़ने की अनुमति दे रखी है। ये पक्षी इस शहर में प्रकृति की मनुष्येतर जैविक उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।

कुछ बूढ़ी औरतें और काले रंग के लम्बे ओवरकोट पहने इटेलियन युवतियां तरह-तरह की नस्ल के पालतू कुत्ते लेकर यदा-कदा शहर की सड़कों के किनारे बने फुटपाथों पर चलती हुई दिखाई दे जाती हैं किंतु वे इतने अनुशासित लगते हैं मानो उन पर भी महान् रोम के महान् इतिहास का महान् गौरव हावी हो गया है!

ट्रेवी नदी के पक्षियों और इटैलियन युवतियों के कुत्तों के अतिरिक्त संभवतः और किसी मनुष्येतर प्राणी को शहर में प्रवेश करके मनुष्यों को देखने की अनुमति नहीं है। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रतीत हुआ। पूरा शहर साफ है, गंदगी और दुर्गंध का नामोनिशान नहीं है।

सड़क के किनारे हर 10-20 मीटर की दूरी पर लोहे के स्टैण्डों पर प्लास्टिक के बैग लटके हुए हैं। हर दुकान के आगे भी ये बैग लगे हुए हैं जिनमें कचरा डाला जाता है। लगभग हर आधा किलोमीटर पर प्लास्टिक के बड़े कंटेनर लगे हुए हैं जिनमें बड़ा कचरा डाला जा सकता है।

ट्रेवी फाउण्टेन

सेंट एंजिलो कैसल से निकलकर हम ट्रेवी फाउण्टेन पहुँचे। यहाँ बहुत भीड़ थी, इतनी कि फव्वारे के पास पहुँचने के लिए पैर धरने तक के लिए जगह नहीं थी। इटली की राजधानी रोम एक ऐसा नगर है जिसमें कई जिले हैं। इनमे से एक जिला ट्रेवी कहलाता है।

इस जिले में फोन्टाना डी ट्रेवी नामक फव्वारा स्थित है जो 86 फुट ऊँचा तथा 161 फुट चौड़ा है। यह रोम नगर में बैरोक शैली में निर्मित एकमात्र फव्वारा है तथा संसार के प्रसिद्धतम फव्वारों में से एक है। विभिन्न दशों में बनने वाले अनेक चलचित्रों में इस फव्वारे को दर्शाया गया है। संभवतः यही कारण है कि दुनिया भर से आए पर्यटकों की भीड़ सबसे ज्यादा यहीं पर होती है।

यह फव्वारा उस स्थान पर बना हुआ है जहाँ तीन सड़कें आकर समाप्त होती हैं। इसलिए इसे लैटिन भाषा में ट्रायवे कहा जाता है जो संस्कृत के शब्द त्रि-वाय से साम्य रखता है। इसे ‘एक्वा वर्जिन’ अर्थात् पवित्र जल भी कहा जाता है। इस फव्वारे के लिए जल की आपूर्ति एक प्राचीन काल में निर्मित नहर से होती है जिसका निर्माण रोमन साम्राज्ञी एग्रिप्पा के स्नानघर में पर्वतों के पवित्र जल की आपूर्ति के लिए किया गया था। यह नहर रोम से 13 किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ों से निकाली गई थी।

नहर काफी घूमकर आती है इसलिए इसकी कुल लम्बाई 22 किलोमीटर हो जाती है। जब रानी एग्रिप्पा मर गई तो इस नहर से रोम नगर को जल की आपूर्ति होने लगी। बाद के किसी काल में नहर के ऊपर एक फव्वारा बना दिया गया जिस पर एग्रिप्पा तथा त्रिविया नामक रोमन देवियों की सुंदर एवं विशाल मूर्तियां लगाई गईं। समय के साथ यह फव्वारा बिखरने लगा तथा देवियों की मूर्तियां भी टूट गईं।

ई.1629 में रोम के पोप उरबान (अष्टम्) ने गियान लॉरेंजो बरनिनी नामक एक शिल्पी से एक नया फव्वारा डिजाइन करने को कहा। बरनिनी ने नया डिजाइन तो तैयार कर दिया किंतु उसके कार्यान्वित होने से पहले ही पोप उरबान (अष्टम्) की मृत्यु हो गई। फिर भी बरनिनी ने इस फव्वारे में कुछ परिवर्तन किए जो आज भी मौजूद हैं। बाद में पियात्रो दा कोरटाना ने एक प्रभावशाली मॉडल बनाया किंतु फव्वारे का पुननिर्माण नहीं किया जा सका।

ई.1730 में पोप क्लेमेंट बारहवें ने इस फव्वारे का नया डिजाइन तैयार करने के लिए आर्चीटैक्चर्स की एक प्रतियोगिता आयोजित करवाई जिसमें एलेसैण्ड्रो गैलिली ने निकोला साल्वी के डिजाइन को परास्त कर दिया किंतु इससे रोम में विद्रोह हो गया और अंत में फव्वारे के पुनर्निर्माण का काम निकोला सालवी को दिया गया।

ई.1732 में फव्वारे के पुनर्निर्माण का काम आरम्भ हुआ। ई.1751 में सालवी की मृत्यु हो गई तथा उसका काम अधूरा रह गया किंतु अपनी मृत्यु से पहले उसने अपने द्वारा बनाए गए डिजाइन को फव्वारे के पीछे एक फूलदान में छिपा दिया ताकि उस डिजाइन को सालवी के शत्रु नष्ट न कर दें। इस फूलदान को ‘एसो दी कोप्पे’ कहा जाता है जिसका अंग्रेजी में उच्चारण एस ऑफ कप्स किया जाता है।

फव्वारे की सजावट के लिए चार शिल्पी पिएत्रो ब्राक्की, फिलिप्पो डेल्ला वाल्ले, जियोवान्नी ग्रोस्सी तथा एण्ड्रिया बरगोण्डी की सेवाएं प्राप्त की गईं। ज्यूसेप्पे पानिनी को आर्चीटैक्चर नियुक्त किया गया। ई.1762 में पानिनी ने ट्रेवी फाउण्टेन को अंतिम रूप दिया। इस नए डिजाइन में, पुराने फव्वारे में लगी एग्रिप्पा तथा त्रिविया नामक रोमन देवियों की पुरानी मूर्तियों को हटा दिया गया तथा उनके स्थान पर समुद्रों एवं नदियों के देवता ओसेनस तथा समृद्धि एवं आरोग्य की देवियों की मूर्तियां लगाई गईं।

पोप क्लेमेंट अष्टम् ने 22 मई 1762 को इस फव्वारे का उद्घाटन किया। इस फव्वारे के निर्माण में ट्रावरटाइन नामक पत्थर का उपयोग किया गया है जो रोम से 35 किलोमीटर पूर्व में स्थित ट्रिवोली से लाया गया है। इसके बाद भी कई बार इस फव्वारे का जीर्णोद्धार किया गया किंतु मूल डिजाइन में परिवर्तन नहीं किया गया। इस फव्वारे में पलाज्जो पोली नामक दीवार नुमा संरचना बनाई गई है जो किसी स्टेज के पीछे लगे पर्दे की तरह दिखाई देती है। इस दीवार में दो मंजिलें बनी हुई प्रतीत होती हैं।

नीचे की मंजिल में तीन बड़े आले हैं जिनमें एक-एक प्रतिमा लगी हुई है। बीच का आला तथा बीच की प्रतिमा सबसे बड़ी है, यह ओसेनस देवता की है तथा इसे मूर्तिकार पिएत्रो ब्राक्की ने बनाया था। ओसेनस एक रथ पर खड़े हैं तथा दो सेवक उस रथ के वेगवान घोड़ों को नियंत्रित कर रहे हैं।

ओसेनस प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मों में समुद्रों एवं नदियों के देवता के रूप में पूजे जाते थे। ओसनेस के पास के एक आले में समृद्धि की देवी है जो अपने कलश से जल गिरा रही है तथा दूसरी तरफ के आले में आरोग्य की देवी है जिसके हाथ में पकड़े हुए प्याले में से एक सांप कुछ पीता हुआ दिखाया गया है।

ऊपर वाली मंजिल के दो आलों में दो अलग-अलग दृश्य उत्कीर्ण हैं जिनमें रानी एग्रिप्पा के स्नानघर के लिए नहर निकालने का आदेश देने एवं नहर के पूरा होने पर रानी के चरणों में सूचना निवेदन करने के दृश्य दर्शाए गए हैं। शेष आले खिड़की के रूप में बनाए गए हैं। दीवार के ऊपर, मध्य भाग में एक मुकुट बनाया गया है जो रोम के अधिकांश भवनों में दिखाई देता है।

पलाज्जो पोली नामक दीवार के चरण भाग में प्राकृतिक चट्टान की आकृति में एक बड़ा प्लेटफार्म बनाया गया है। ओसोनस के रथ के नीचे से पानी बहकर चट्टान पर आता है और झरने की तरह सामने के कुण्डों में गिरता है। पूरा दृश्य कृत्रिम होते हुए भी प्राकृतिक लगता है। पर्यटक इन कुण्डों में दाएं हाथ से सिक्का उछालते हैं। सिक्के को बाएं कंधे के पीछे की ओर उछाला जाता है।

मान्यता है कि इससे उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। प्रतिदिन औसतन 300 यूरो इस फव्वारे में उछाले जाते हैं। वर्ष 2016 में 15 लाख अमरीकी डॉलर अर्थात् 10.35 करोड़ भारतीय रुपए इन कुण्डों में डाले गए। हम प्रातः नौ बजे के घर से निकले थे और इस समय ढाई बजने को आए थे। हम घर के लिए लौट पड़े जो यहाँ से केवल चार-साढ़े चार किलोमीटर ही दूर था।

चिएसा सेंट एग्नेसे इन एगोने

सायं चार बजे हम पिताजी को साथ लेकर पियाजा नोवाना गए। यहाँ का परिवेश आज भी कल की तरह गीत-संगीत, नृत्य, वाइन, पिज्जा, पास्ता, कॉफी से सराबोर है। चौक में बने तीनों फव्वारों को देखते हुए हम एक चर्च गए। चर्च के बाहर पीतल की एक चमचमाती प्लेट लगी है जिस पर रोमन लिपि एवं इटैलियन भाषा में ‘चिएसा सेंट एग्नेसे इन एगोने’ लिखा हुआ है तथा चर्च के नाम के नीचे स्थान का नाम ‘पियाजा नोवाना’ अंकित है।

मैं अपने जीवन में इससे पहले चर्च एवं मस्जिद में एक-दो बार ही गया हूँ जबकि गुरुद्वारों और सूफी दरवेशों की मजारों पर बीसियों बार जाने का अवसर मिला है। निश्चित रूप से हिन्दू धर्म के वैष्णव मंदिरों के बाद, ईसाई धर्म के कैथोलिक चर्च अत्यधिक भव्य एवं आकर्षक होते हैं। यह भी एक भव्य चर्च है जिसके भीतर संसार के कीमती फ्रैस्को बने हुए हैं।

चर्च की चारों दीवारों एवं गुम्बद की भीतरी छत पर इन फ्रैस्को की सहायता से कैथोलिक धर्म की जानकारी देने वाला पैरोरोमा ही बना दिया गया है। पूरे चर्च में कॉलम्स के सहारे-सहारे पैडस्टल खड़े करके उन पर प्राचीन काल के संतों की प्राचीन मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। बहुत से भित्तिचित्रों एवं मूर्तियों के निकट इंग्लिश, इटैलियन, स्पेनिश एवं फ्रैंच भाषाओं में ईसाई संतों के नाम एवं उनसे सम्बद्ध घटनाएं अंकित की गई हैं।

आज चर्च में कोई म्यूजिकल कंसर्ट होने वाली थी जिसकी तैयारियां चल रही थीं। चर्च के भीतर देश-विदेश से आए सैंकड़ों लोग मौजूद थे किंतु कोई भी पर्यटक न तो बात कर रहा था, न किसी का सैलफोन बज रहा था और न बच्चे इधर-उधर दौड़कर शांति भंग कर रहे थे। यहाँ तक कि पर्यटक चलने में भी इतनी सावधानी बरत रहे थे कि उनके पैरों की आहट भी सुनाई नहीं देती थी।

दुनिया के विभिन्न देशों से आए कुछ लोग लकड़ी की पॉलिशदार बैंचों पर बैठकर प्रार्थना कर रहे थे। चर्च में प्रवेश करते ही एक नोटिस बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है- ‘फोटो खींचना मना है’ किंतु सभी पर्यटक अपने मोबाइल फोन और कैमरों से फोटो एवं वीडियो शूट कर रहे थे। मैंने कुछ देर तक तो नोटिस बोर्ड पर लिखी सूचना का पालन किया और उसके बाद उन सैंकड़ों पर्यटकों की तरह कुछ चित्र तो उतार ही लिए जो बड़ी उत्सुकता से वहाँ अंकित फ्रैस्को को अपने कैमरों में बंद कर रहे थे।

पिताजी ने संगमरमर से बने एक पैनल की ओर मेरा ध्यान खींचा जिसमें किसी सामंत पुत्र के ईसाई होने तथा भिखारी का जीवन जीने की इच्छा प्रकट करने की कहानी अंकित है। इसी पैनल में उस संत की मृत्यु का दृश्य भी अंकित है जिसके निकट तत्कालीन पोप, संत के सामंत पिता और कुछ देवदूत खड़े हुए उसे शांति के साथ शरीर छोड़ते हुए देख रहे हैं।

यहाँ कुछ पैनल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाकर भी लगाए गए हैं। यहाँ से हमें पिताजी को पैंथियम दिखाने ले जाना था किंतु पिताजी थक चुके थे और उन्होंने घर लौटने की इच्छा व्यक्त की। हम उसी समय बस पकड़कर अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट आए। इसी के साथ रोम में पांचवाँ दिन लगभग पूरा हो गया।

फ्लोरेंस में पहला दिन – 22 मई 2019 (7)

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फ्लोरेंस में पहला दिन

फ्लोरेंस में पहला दिन हमने यूरोप की सबसे पुरानी फार्मेसी का भवन ढूंढने में बिताया। फ्लोरेंस के लोग इस फार्मेसी के बारे में बिल्कुल भूल चुके थे। अंत में एक नई उम्र की लड़की ने हमें पुरानी फार्मेसी के बारे में कुछ संकेत बताए।

आज हमें फ्लोरेंस के लिए निकलना है। हमारी ट्रेन प्रातः 11.30 पर है। फिर भी दीपा सहित सभी सदस्य प्रातः पाँच बजे (रोम का समय) उठ कर चलने की तैयारी करने लगे। मैंने प्रातः चार बजे उठकर कल की यात्रा के नोट्स तैयार किए। यहाँ से रोम रेलवे स्टेशन तक पहुँचने के तीन साधन हैं। या तो डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर 64 नम्बर की बस पकड़ो जिसमें चलने का प्रीपेड टिकट हमारे पास है।

दूसरा साधन वहीं से सबअर्बन ट्रेन पकड़ने का है, उसके लिए भी डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। तीसरा साधन टैक्सी बुलाने का है। छोटे-छोटे चार ट्रॉली बैग और चार हैण्ड बैग होने के कारण हम आसानी से अपना सामान डेढ़ किलोमीटर तक ले जा सकते थे किंतु हम हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। इसलिए हमने तीसरा साधन अर्थात् ‘कार-टैक्सी’ अपनाने का निश्चय किया।

टैक्सी ड्राइवर की बदमाशी

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टैक्सी ड्राइवर ने आते ही असंतोष व्यक्त करना शुरु कर दिया कि एक टैक्सी में इतना सामान और इतने व्यक्ति कैसे आएंगे! हम उसकी बात सुनकर हैरान थे, उससे पहले किसी भी टैक्सी ड्राइवर ने ऐसा नहीं कहा था। वह चाहता था कि हम एक टैक्सी और करें। उसने हमसे बिना पूछे एक और टैक्सी मंगवा ली और हमसे कहा कि आधे सदस्य और आधा सामान उसमें रखें।  हम 9.40 पर सर्विस अपार्टमेंट से बाहर आ गए। विजय ने मकान-मालकिन को व्हाटसैप पर सूचना दे दी कि हम जा रहे हैं और घर की चाबियों के दोनों सैट डाइनिंग टेबल पर रखकर घर बाहर से ऑटो-लॉक कर दिया है। विजय ने एक टैक्सी एप से एक सिक्स सीटर टैक्सी बुक की। वह 20 मिनट में अपार्टमेंट के सामने आकर रुकी। हम समझ गए कि टैक्सी वाले के मन में लालच है। अतः हमने टैक्सी ड्राइवर से कहा कि हमें केवल एक टैक्सी की आवश्यकता है। यदि आप नहीं चलना चाहते हैं तो आप दोनों चले जाएं। हम एयरपोर्ट से भी तो एक ही टैक्सी में आए थे। हमारे पास काफी समय था और हम यहाँ से पैदल चलकर भी सबअर्बन ट्रेन या 64 नम्बर की बस पकड़ सकते थे। पहली टैक्सी के ड्राइवर ने दूसरी टैक्सी को वापस लौटा दिया तथा हमारा सामान अपनी टैक्सी में जमाने लगा।

वह बोला कि आइए आपको एयर पोर्ट छोड़ देता हूँ। हमने उसे बताया कि हमने टैक्सी ‘रोमा टर्मिनी रेलवे स्टेशन’ के लिए बुक की है न कि एयरपोर्ट के लिए। इस पर वह बोला कि अभी तो आपने कहा कि हमें एयरपोर्ट जाना है। हम अपना सामान वापस उतारने लगे तो बोला कि अच्छा रेल्वे स्टेशन छोड़ देता हूँ।

यह टैक्सी वाला अंग्रेजी अच्छी तरह समझ रहा था किंतु नाटक कर रहा था कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। इसी बात की आड़ में वह बदमाशी करना चाहता था। हम फिर से टैक्सी में बैठ गए किंतु इस बहस में हमसे एक चूक हो गई।

टैक्सी के मीटर की रीडिंग देखना ही भूल गए। संभवतः मीटर में 14 यूरो की रीडिंग पहले से पड़ी थी जिसका अर्थ होता है भारतीय 1120 रुपए। पूरे रास्ते टैक्सी वाला अपने सैलफोन पर ऊँची आवाज में किसी से बात करता रहा। एक फोन खत्म करके दूसरा लगा लेता था। इससे हमें काफी असुविधा हुई।

जब विजय ने टैक्सी बुक की थी तो एप ने 12-13 यूरो ( 960-1040 भारतीय रुपए) का अनुमानित भाड़ा बताया था किंतु जब हम रेल्वे स्टेशन पर उतरे तो मीटर में 29.3 यूरो की रीडिंग थी। उसने टैक्सी रुकने से पहले ही हमें कह दिया कि 30 यूरो निकाल लो। हमने उसे 30 यूरो दिए जो भारतीय 2400 रुपए के बराबर होते हैं। ड्राइवर ने हमसे दो से ढाई गुने पैसे लिए थे।

हम समझ गए कि टैक्सी वाले ने जितनी अधिक बदमाशी हो सकती थी, कर ली है। हमारे पास कोई चारा नहीं था। हम यहाँ झगड़ा करने की स्थिति में नहीं थे। सच तो यह है कि हम तो भारत में भी किसी से झगड़ा करने की स्थिति में नहीं हैं! कुल मिलाकर यह एक खराब अनुभव था। ऐसा कोई खराब अनुभव हमें इण्डोनेशिया की यात्रा में नहीं हुआ था।

हमारे सर्विस अपार्टमेंट से रोमा टर्मिनी रेल्वे स्टेशन केवल 5 किलोमीटर दूर था जिसके लिए हमें 2400 भारतीय रुपए अर्थात् 480 रुपए प्रति किलोमीटर भाड़ा देना पड़ा था। 17 मई की रात्रि में भी हम लियोनार्डो दा विंची एयरपोर्ट से आए थे तब उस ड्राइवर ने हमसे 32 किलोमीटर के 60 यूरो अर्थात् 4800 भारतीय रुपए लिए थे अर्थात् डेढ़ सौ भारतीय रुपया प्रति किलोमीटर! हम समझ गए कि इटली में टैक्सी वालों पर कतई भरोसा नहीं किया जा सकता! अच्छा ही किया जो हम पिछले चार दिनों तक बसों एवं ट्राम में ही घूमते रहे थे।

रोमा टर्मिनी रेल्वे स्टेशन

रोमा टर्मिनी रेल्वे स्टेशन पर काफी भीड़ थी। पूरे प्लेटफॉर्म पर हजारों देशी-विदेशी पर्यटक खड़े थे। प्लेटफॉर्म पर न कोई वेटिंग रूम था, न कोई बेंच थी, न कोई प्याऊ थी, न कोई टॉयलेट था। हम 10.30 बजे स्टेशन पर पहुँच चुके थे और हमारी ट्रेन 11.50 बजे थी।

अतः हमारे पास अगले सवा घण्टे तक खड़े रहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। कुछ देर बाद लघुशंका की इच्छा हुई तो मैं और विजय टॉयलेट ढूंढने निकले। अंत में प्लेटफॉर्म के ऊपर बने हुए फर्स्ट फ्लोर पर एक पेड टॉयलेट मिला। हमने एक-एक यूरो अर्थात् 80-80 भारतीय रुपए देने की बजाय उल्टे पैर लौटना ही श्रेयस्कर समझा। इस फ्लोर पर बहुत से ओपन रेस्टोरेंट थे। विजय ने पिताजी को इन्हीं में से एक रेस्टोरेंट की चेयर पर लाकर बैठा दिया।

हम फिर से नीचे आ गए। जिसे हम प्लेटफॉर्म समझ रहे थे वास्तव में वह एक वेटिंग एरिया था, इससे लगते हुए लगभग 20 प्लेटफॉर्म आगे की तरफ बने हुए थे। चारों तरफ इलैक्ट्रोनिक पैनल डिस्प्ले हो रहे थे जिन पर बहुत सारी गाड़ियों के आने-जाने की सूचना प्रदर्शित की जा रही थी किंतु हमारी ट्रेन की सूचना के सामने प्लेटफॉर्म नम्बर अंकित नहीं था।

अंततः 11.40 पर इलैक्ट्रोनिक पैनल पर हमारी ट्रेन का प्लेटफॉर्म नम्बर 11 डिस्प्ले हुआ। अब तक विजय पिताजी को फिर से नीचे ले आया था। हम तुरंत 11 नम्बर प्लेटफॉर्म की तरफ दौड़े। हमें वहाँ तक पहुँचने में 5 मिनट लग गए। गाड़ी ठीक 11.50 पर प्लेटफॉर्म पर आकर लगी। हमने अपना सामान चढ़ाया तब तक 11.54 हो चुके थे और 11.55 पर ट्रेन के ऑटोमेटिक दरवाजे बंद हो गए।

हमने स्वयं को असहज स्थिति में पाया। यदि हमें चढ़ने में दो मिनट का भी विलम्ब हुआ होता तो हम ट्रेन से बाहर ही रह जाते। सामान और बच्चों के साथ ट्रेन में चढ़ने के लिए कुछ समय तो चाहिए ही! दूसरे यात्रियों को भी चढ़ना होता है।

यह एक बुलेट ट्रेन थी जो रोम से चलकर इटली के धुर उत्तर में जाती थी। इस गाड़ी में भीड़ बहुत कम थी। ट्रेन 250 से 300 किलोमीटर प्रति घण्टा की गति से चल रही थी किंतु ट्रेन इतनी कम हिल रही थी कि भीतर बैठे हमें पता ही नहीं चल रहा था कि हम ट्रेन में हैं। हमारे सामने की टेबल पर रखी बोतलों का पानी हिलने एवं खिड़की से बाहर देखने पर ही ज्ञात होता था कि ट्रेन चल रही है।

हमें ट्रेन में वैज-स्नैक्स तथा चाय-काफी जूस आदि दिए गए। इस कारण यात्रा पिकनिक में बदल गई थी। 1.25 बजे ट्रेन फ्लोरेंस पहुँच गई। हमने प्लेटफॉर्म पर लगे साइन बोर्ड पढ़े जिन पर रोमन लिपि में ‘सांटा मारिया नोवेला फिरेंजे’ लिखा हुआ था। इसी को फ्लोरेंस कहते हैं। फिर भी हम दो सहयात्रियों से पूछ कर ही ट्रेन से उतरने की हिम्मत जुटा सके। हमने 300 किलोमीटर से अधिक की दूरी 80 मिनट में पूरी की थी।

स्टेशन से बाहर निकलते ही ट्राम का स्टॉप बना हुआ था। विजय ने स्टॉप पर लगी एक मशीन में यूरो डालकर ट्राम के टिकट खरीदे। इसी समय ट्राम आ गई। हम बहुत आसानी से इसमें चढ़ पाए जैसे कि हम इसके अभ्यस्त हों।

यह सब गूगल के द्वारा दी जा रही सूचनाओं के बल पर हो रहा था। यह दो डिब्बों की ट्राम थी और लगभग पूरी तरह खाली थी। इस समय इक्का-दुक्का यात्री ही ट्राम में होता है, विशेषकर वे वृद्ध लोग जो दैनंदिनी के उपयोग की वस्तुओं की खरीददारी करने घरों से निकलते हैं।

लगभग तीन मिनट में ही हमारा स्टॉप ‘प्रातो अल प्रातो’ आ गया। हम यहाँ तक पैदल भी आ सकते थे किंतु जानकारी न होने के कारण ट्राम में आने के लिए हमने 10 यूरो अर्थात् 800 रुपए व्यय किए। हमने जैसे ही ट्राम से उतरकर एक साफ-सुथरी गली में प्रवेश किया। चौथी या पाँचवी बिल्ंिडग में ही दूसरी मंजिल पर हमारा सर्विस अपार्टमेंट था।

विजय ने रोम से चलते समय ही फ्लोरेंस में सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन को सूचित कर दिया था कि हम लगभग दोपहर डेढ़ बजे फ्लोरेंस पहुँचेंगे। विजय ने जैसे ही बिल्डिंग के बाहर पहुँच कर सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन को फोन किया, वह तुरंत बिल्डिंग का मुख्य दरवाजा खोलकर बाहर आ गई मानो दरवाजे के पीछे खड़ी रहकर हमारी प्रतीक्षा ही कर रही हो!

उसने हम सबसे हाथ मिलाए और फिर हमारा सामान उठाकर लिफ्ट में रखना शुरु कर दिया। हमने उसे सामान उठाने के लिए मना किया किंतु वह नहीं मानी!

सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन 26-27 साल की सुंदर इटैलियन महिला थी। उसका शरीर थोड़ा मोटापा लिए हुए था किंतु उसमें गजब की फुर्ती थी। उत्साह तो जैसे उसके मन में कूट-कूट कर भरा हुआ था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वह जीवन में हमसे पहली बार मिल रही है।

उसकी हर बात से, हर चेष्टा से खुशी फूट पड़ रही थी। वह प्रत्येक वाक्य के बाद हंसना नहीं भूलती थी। उसने बड़े चाव से हमारा स्वागगत किया। वह अपार्टमेंट की सुविधाओं के बारे में जानकारी देने लगी तो मैं और पिताजी एक सोफे पर बैठ गए। भानु, मधु और विजय मकान मालकिन के साथ सर्विस अपार्टमेंट देखने लगे।

मैं इस दौरान यही सोचकर हैरान होता रहा कि क्या कोई अनजान व्यक्ति हमें देखकर इतना खुश भी हो सकता है! इससे पहले मैंने अपने जीवन में केवल तीन महिलाओं को ही इतनी खुश होते हुए देखा था, मेरी माँ, मेरी नानी और मेरी सास! मुझे ये तीनों एक साथ याद आ गईं।

मकान मालकिन ने हमसे पासपोर्ट लेकर अपने मोबाइल से स्कैन किए और हमसे सिटी टैक्स की नगद राशि लेकर चली गई। शेष राशि का भुगतान हम पहले ही ऑनलाइन कर चुके थे। जाने से पहले उसने फ्लैट की चाबियों के दो सैट हमें सुपुर्द किए।

हमने अनुभव किया कि यह एक पैलेशियल स्टाइल का फ्लैट है जिसे सामंती परिवेश देने की चेष्टा की गई है। विशाल हॉल, वुडन फ्लोर, बड़े-बड़े कमरे, महंगा डिजाइनदार फर्नीचर, कई सोफा सैट, हर कार्य के लिए अलग टेबल-कुर्सी, स्टाइलिश पर्दे, टेबल लैम्प, पेंटिंग्स, लक्जरी बाथरूम्स, वाशिंग मशीन, ड्रायर, शॉवर, महंगे यूटेन्सिल्स सहज ही मकान मालकिन की सुरुचि एवं समृद्धि की कहानी कह रहे थे। हालांकि हमें इनमें से बहुत कम चीजों की आवश्यकता थी।

ये बाथरूम हमारे किसी काम के नहीं थे। न उनके टब, न शॉवर, न यूरोपियन स्टाइल के टॉयलेट! जो सुख हमें बाल्टी में पानी भरकर लोटे से नहाने में मिलता है, वैसा सुख तो ये यूरोपियन लोग जानते भी नहीं होंगे। मल त्याग के बाद कागज का प्रयोग करना तो हमारे लिए किसी सजा से कम होता ही नहीं। इसलिए हमने हर टॉयलेट में पानी की एक-एक बोतल रख ली। किसी भी बाथरूम में एक भी बाल्टी नहीं थी। कोई भी टॉयलेट या बाथरूम भीतर से बंद नहीं होता था। ऐसा संभवतः पर्यटकों के साथ आने वाले बच्चों के कारण किया गया था जो भीतर से दरवाजा लॉक करके फिर उसे खोल नहीं पाते थे!

हमारे लिए यह भी किसी सजा से कम नहीं था। हमने प्रत्येक दरवाजे के बाहर एक सफेद नैपिकिन लटकाने की व्यवस्था की ताकि इस नैपकिन को देखकर कोई दूसरा व्यक्ति बाथरूम या टॉयलेट का दरवाजा न खोले। वैसे भी प्रत्येक कमरे, हॉल और डाइनिंग रूम के साथ एक-एक लैट्रिन और बाथरूम बना हुआ था, इसलिए सभी को एक-एक लैट-बाथ अलॉट कर दिए गए।

भानु और मधु दोपहर का भोजन रोम में ही बनाकर अपने साथ लाई थीं। इसलिए इस समय भोजन तैयार नहीं करना था। मकान मालकिन के जाने के बाद हमने भोजन किया और सो गए। लगभग तीन बजे बरसात आरम्भ हो गई। देखते ही देखते वह काफी तेज हो गई। हमें लगा कि यदि यही स्थिति रही तो हम फ्लोरेंस में कुछ भी नहीं देख सकेंगे किंतु एक घण्टे में ही बरसात पूरी तरह रुक गई।

मधु और भानु ने शाम का खाना तैयार किया और हम सायं 6.40 पर फ्लोरेंस शहर देखने के लिए बाहर निकले। पिताजी घर में ही रहे। हमारे सर्विस अपार्टमेंट से लगभग चार सौ मीटर की दूरी पर इटली की दूसरी महत्वपूर्ण नदी ‘अर्नो’ बहती थी। हम उसी के किनारे टहलने के लिए चल दिए। जिस मौहल्ले में हम ठहरे थे यह कोई धनी सेठों की बस्ती जैसा दिख रहा था।

यह शहर रोम से बिल्कुल अलग दिखाई पड़ा। यहाँ केवल बूढ़े लोग नहीं थे, यहाँ हमने युवा दम्पत्तियों को अपने बच्चों के साथ देखा। माता-पिता बच्चों के हाथ पकड़कर चल रहे थे और वे बच्चों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क थे। कुछ दम्पत्ति बच्चों को बेबी-कार्ट में लेकर घूम रहे थे। रोम में ऐसे दृश्य शायद ही देखने को मिले हों!

हम लगभग एक घण्टे तक घूमते रहे। विजय ने बताया कि जिस स्थान पर हम घूम रहे हैं, वहाँ से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर यूरोप का सबसे पुराना फार्मेसी है। क्या हमें वह स्थान देखना चाहिए? सभी लोग तुरंत ही वहाँ जाने पर सहमत हो गए। बहुत सी पतली गलियों से गुजरने के बाद गूगल ने हमें एक विशाल चौक में लाकर छोड़ दिया।

यहीं कहीं उस फार्मेसी को होना चाहिए था। हम लगभग एक घण्टे तक आास-पास की गलियों एवं उस विशाल चौक में बने भवनों के बीच उस फार्मेसी को ढूंढते रहे तथा स्थानीय लोगों से पूछते रहे, बार-बार गूगल टटोलते रहे किंतु उस ओल्ड फार्मेसी की बिल्डिंग के बारे में कोई नहीं बता सका।

वहाँ कोई सरकारी कार्यालय भी चल रहा था जिसमें शाम के आठ बजे भी कुछ लड़कियां काम कर रही थीं। मैंने उनसे ओल्ड फार्मेसी के बारे में पूछा तो उनमें से एक लड़की ने इटेलियन भाषा में बोलते हुए, अपने हाथों से कुछ संकेत किए किंतु मैं नहीं समझ सका कि वह किस भवन की ओर संकेत कर रही है। अंत में हम थक कर उस चौक में लगी पत्थर की बैंचों पर बैठ गए।

 यह एक भव्य और विशाल चौक था जिसके चारों तरफ बड़े-बड़े भवन बने हुए थे। एक तरफ एक विशाल चर्च भी दिखाई पड़ रहा था निःसंदेह यह बहुत पुराना रहा होगा किंतु रंग-रोगन के कारण साफ-सुथरा और आकर्षक दिखाई दे रहा था, हमने सोचा कि भीतर जाकर देखें किंतु चर्च का मुख्य दरवाजा बंद था।

इस समय रात्रि के साढ़े आठ बज रहे थे किंतु अभी भी दिन बाकी था। अचानक हमारी दृष्टि चौक के एक तरफ बने एक विशाल भवन पर गई। इसका बाहरी डिजाइन और खम्भे वैसे ही थे जैसे रोम में पेंथिऑन के थे। लगभग ऐसे ही खम्भे रोम में सेंट पीटर्स स्क्वैयर पर भी लगे हुए थे।

इस भवन के ऊपरी भाग में  कुछ पुरानी मूर्तियां दिखाई दे रही थीं जिनसे उनके यूनानी चिकित्सक अथवा कीमियागर होने का आभास मिलता था। अंतर केवल इतना था कि इस भवन के खंभे तो बहुत प्राचीन काल का दिखाई देते थे किंतु इस पर लगी मूर्तियां अपेक्षाकृत नई थीं।

हमारे सामने सारी स्थिति स्वतः ही स्पष्ट हो गई। उस सरकारी कार्यालय में काम कर रही लड़की ने भी ठीक इसी तरफ संकेत किया था। आज से सौ-दो सौ साल पहले या उससे भी दो-चार सौ साल पहले इस भवन में फार्मेसी का कारखाना खुला होगा जहाँ यूनानी दवाएं बनती होंगी। तब इसे फार्मेसिया कहा जाता होगा किंतु अब यह भवन किसी और काम आता होगा इसलिए स्थानीय लोग इसके बारे में बताने में असमर्थ थे।

गूगल पर किसी इतिहासकार ने इसकी जानकारी डाली होगी! फिर भी कुछ लोग अवश्य ही उस फार्मेसिया के बारे में जानते थे अन्यथा उस लड़की ने इस भवन की दिशा में संकेत नहीं किया होता! इस समय यह भवन पूरी तरह बंद था। हम अपने सर्विस अपार्टमेंट की ओर लौट पड़े। इसी के साथ हमारा फ्लोरेंस में पहला दिन पूरा हुआ।

 इस समय शहर की गलियों में बनी सड़कों के आधे हिस्से में मेज-कुर्सियां बिछ चुकी थीं जिन पर बैठकर देशी-विदेशी पर्यटक वाइन पी रहे थे। एक सुनसान गली में लगभग बीस-बाईस कुर्सियां बिछी हुई थीं। मेरी दृष्टि वहाँ बैठी एक यूरोपियन लड़की पर पड़ी। वह अकेली बैठी वाइन पी रही थी। मैं हैरान रह गया। यह गली पूरी तरह सुनसान थी। रात के लगभग नौ बजने वाले थे और वह अकेली बैठकर शराब पी रही थी! क्या भारत के एक भी शहर में ऐसा किया जाना संभव है, मैंने स्वयं से प्रश्न किया।

घर पहुँचे तो सवा नौ बज रहे थे, दिन का उजाला अभी बाकी था। पिताजी इटेलियन टीवी चैनल देख-देखकर थक गए थे और हम तो निरंतर चलते रहने के कारण थके हुए थे ही। अतः चाय तो बननी ही थी। यदि हम चाय का सामान भी नोएडा से लेकर नहीं चले होते तो हमारी हालत खराब हो जाती।

दूध की चाय यहाँ कौन बनाकर देता! भारत में चाय का कितना आराम है किसी भी धर्मशाला में ठहरो, बाहर से इलायची और अदरक वाली बढ़िया चाय बनवाकर ले आओ! भारत जैसे आनंद यूरोप में कहाँ! यह अलग बात है कि जब यूरोपियन्स भारत जाते होंगे तो ब्लैक कॉफी के लिए तरस जाते होंगे! भारत में वह मिलती तो है किंतु हर जगह तो नहीं न मिलती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फ्लोरेंस में दूसरा दिन – 23 मई 2019 (8)

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फ्लोरेंस में दूसरा दिन

हमारा फ्लोरेंस में दूसरा दिन भारत के आम चुनावों के परिणाम देखने तथा पीसा शहर की यात्रा करने में व्यतीत हुआ। संसार भर के यात्री फ्लोरेंस एवं पीसा देखने के लिए आते हैं।

रात भर नींद नहीं आई। हम जब भारत से चले थे तो सत्रहवीं लोकसभा के लिए मतदान करके चले थे और आज उनके परिणाम आने वाले थे। इसलिए रात भर बेचैनी सी रही। भारत में लोकसभा के चुनाव हमेशा से ही बहुत उत्तेजना भरे होते हैं, भले ही हर बार उत्तेजना का कारण अलग-अलग होता है। इस बार के चुनाव भी बहुत विचित्र सी उत्तेजना लिए हुए थे। 2014 के चुनावों में नरेन्द्र मोदी की सरकार चुनी गई थी।

इसे भारतीय जनता पार्टी की नहीं अपितु नरेन्द्र मोदी की जीत माना गया था। कारण बहुत स्पष्ट था। पिछले दस साल तक सत्ता में रही डॉ. मनमोहनसिंह की सरकार में इतने घोटाले हुए थे तथा अल्पसंख्यक कहे जाने वाले एक खास वोट-बैंक का इतना तुष्टिकरण हुआ था कि भारत के लोग कांग्रेस की सरकार से न केवल तंग आ गए थे अपितु उससे जले-भुने बैठे थे। लोग उसे डॉ. मनमोहन सिंह की या कांग्रेस की सरकार नहीं समझते थे अपितु इटली वालों की सरकार समझते थे।

इसलिए 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में देखा गया था किंतु नरेन्द्र मोदी सरकार ने नोटबंदी तथा जीएसटी जैसे कड़वे फैसले लागू करके भारत के मध्यमवर्ग एवं बुद्धिजीवी वर्ग को नाराज कर लिया था। इसलिए मध्यम वर्ग एवं बुद्धिजीवी वर्ग अपना असंतोष मुखर होकर प्रकट कर रहा था किंतु भीतर ही भीतर वह यह सोचकर डरा हुआ भी था कि पिछले पाँच सालों में नरेन्द्र मोदी ने तुष्टिकरण की नीतियों को त्यागकर आम भारतीय को पूरी तरह से अपने पक्ष में कर लिया है।

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साथ ही अपने भाषणों को और अधिक पैनी शब्दावली देकर स्वयं को राष्ट्रवाद के अनन्यतम प्रतीक के रूप में स्थापित कर लिया है। उनके भाषणों में प्रत्येक भारतवासी के लिए कुछ न कुछ रहता है। इसलिए नरेन्द्र मोदी का हारना संभव नहीं है। जिस प्रकार जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में लोग कांग्रेस को न चुनकर जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को चुनते थे उसी प्रकार भारत के लोग अब भारतीय जनता पार्टी को न चुनकर नरेन्द्र मोदी को चुनते हैं। भारत में मध्यम वर्ग एवं बुद्धिजीवी वर्ग का गठजोड़ सदा से रहा है। उच्च आयवर्ग अपनी अमीरी के कारण और निम्न आयवर्ग अपनी गरीबी के कारण सरकारें बदलने, समाज में बदलाव लाने और क्रांति करने के बारे में नहीं सोचा करता। निम्न आय वर्ग तो मध्यम वर्ग तथा बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा आरम्भ की गई क्रांति के औजार के रूप में प्रयुक्त होता है जबकि उच्च आय वर्ग उस क्रांति की सफलता का फल भोगा करता है। मनमोहनसिंह की सरकार को हराकर नरेन्द्र मोदी की सरकार के बनने तथा सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों के मुंह तक आ खड़े होने तक के काल में भारत में एक बार फिर लगभग यही दृश्य रहा है किंतु इस बार के चुनावों के बाद क्या दृश्य बनेगा, इसके बारे में सिवाय नरेन्द्र मोदी के कोई भी आश्वस्त नहीं है।

भारत का मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग इस बात से आशंकित है कि इस बार भारत का ‘निम्न आय वर्ग’, मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा पर्दे के पीछे की जा रही क्रांति का औजार बनने को तैयार नहीं है।

इसका कारण यह है कि भारत में आजकल एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी उभर आया है जो हिन्दुत्व तथा राष्ट्रवाद को गालियां देता रहता है। इन्हें प्रधानमंत्री की गरिमा की भी कोई चिंता नहीं है। इस कारण जब ये तथाकथित बुद्धिजीवी लोग टीवी के पर्दे पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को गालियां दे रहे थे तो चुनावी रैलियों में लाखों किसान और मजदूर हर्षोन्मत्त होकर ‘मोदी-मोदी’ चिल्ला रहे थे।

ये दोनों वर्ग एक दूसरे की बात सुनने के लिए कतई उत्सुक नहीं थे। इस बात ने सिद्ध कर दिया है कि नरेन्द्र मोदी के दौर में न केवल निम्न आय वर्ग, तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा प्लान की जा रही क्रांति का औजार बनने से मना कर रहा है अपितु भारत के मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग के चिंतन भी अलग दिशाएं पकड़ चुके हैं। मध्यम वर्ग बढ़े हुए टैक्सों से भयभीत है और बुद्धिजीवी वर्ग भारत के विश्वविद्यालयों में चल रही अपनी दुकानों के उठ जाने से भयभीत है।

जबकि उच्च आर्य वर्ग आश्वस्त है कि उसके हितों पर कहीं कोई कुठाराघात नहीं होने जा रहा और निम्न आय वर्ग उत्साहित है कि यदि नरेन्द्र मोदी सरकार इस बार दुबारा आई तो उनमें से प्रत्येक के बैंक खाते में पन्द्रह लाख नहीं तो कुछ न कुछ लाख रुपया अवश्य आ जाएगा। भारत का मध्यम वर्ग एक और बड़ी दुविधा से संत्रस्त है, कहीं इटली वालों की सरकार वापस न आ जाए! उनकी सरकार आने से बढ़िया है कि एकाध नोटबंदी, एकाध जीएसटी और कुछ बढ़े हुए कर और झेल लिए जाएं।

भारत का आम आदमी जिसे यह पता नहीं है कि वह कौनसे वर्ग में है, तथा जिसे वैचारिक मंथन अर्थात् फालतू की माथा-फोड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं है, उसकी चिंता बिल्कुल अलग है। भारतीय संस्कृति में भले ही कितनी ही विद्रूपताएं हों किंतु एक बात तय है कि भारत के लोग सार्वजनिक रूप से गाली-गलौच पसंद नहीं करते।

भारत के अधिकतर पुरुष गंदी से गंदी गाली बोलते हैं, यहाँ तक कि कुछ औरतें भी मौका मिलने पर गाली-गलौच से परहेज नहीं करतीं किंतु सार्वजनिक जीवन में उन्हें साफ-सुथरी भाषा ही बोलना और सुनना पसंद है।

2014 के बाद से विपक्ष ने जिस प्रकार की गंदी भाषा का प्रयोग प्रधानमंत्री के लिए किया है, उससे भारत का आम-आदमी तिलमिलाया हुआ है। कोई भी भारतीय यह नहीं चाहता कि उसके प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से गाली दी जाए, उसके लिए मर्यादा-विहीन एवं अभद्र शब्दों का प्रयोग किया जाए।

जबकि विपक्ष इटली वालों के नेतृत्व में पूरे पाँच साल तक पानी पी-पीकर प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से गालियां देता रहा है। इसलिए भारत का आम-आदमी इन चुनावों में उन गालियों का बदला लेना चाहता है। भारत के इस आम आदमी में भारत का धनी से धनी और निर्धन से निर्धन व्यक्ति आता है।

भारत में इटली वालों से अलग भी कुछ पार्टियां हैं जिनमें यूपी वाली बहिनजी से लेकर कलकत्ता वाली दीदी तक आती हैं। इटावा वाले नेताजी से लेकर दक्षिण वाले बाबूजी तक इसी थैली के हिस्से हैं। इन लोगों ने तो गाली-गलौच की वे सीमाएं भी पार कर दीं जिन्हें पार करने की हिम्मत इटली वाले भी नहीं कर पाए।

दुनिया में शायद ही कोई देश हो जो अपने प्रधानमंत्री के लिए पागल कुत्ता, हत्यारा, नीच आदमी, चोर जैसे गंदे शब्दों को सुनना चाहे! एक छोटी सी थैली और है जो लाल रंग के कपड़े से सिली गई है। आजकल इस थैली में ज्यादा पोदीना नहीं है फिर भी गाहे-बगाहे यह भी सड़कों पर चमकती है। अतः कुल मिलाकर इस बार के चुनाव एक नवीन प्रकार की उत्तेजना  से भरे हुए थे। कौन जाने देशी ऊंट किस करवट बैठ जाए!

हम सुबह छः बजे से लेकर 10 बजे तक इण्टरनेट के माध्यम से टीवी चैनलों पर चुनाव परिणाम देखते रहे। इस समय तक भारत में दोपहर के डेढ़ बज चुके थे और चुनाव परिणाम पूरी तरह स्पष्ट हो चुके थे। नरेन्द्र मोदी पहले से भी अधिक बहुमत के साथ लौट आए थे। भारत से आने वाली ‘मोदी-मोदी’ की आवाजें हमें यहाँ फ्लोरेंस में भी सुनाई दे रही थीं।

हम लगभग 10.40 पर घर से निकले। आज हमें पीसा की मीनार देखने के लिए जाना था। घर से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर सबअर्बन रेल्वे स्टेशन है किंतु हमने ट्राम से ही जाना श्रेयस्कर समझा ताकि हम थक न जाएं और आगे आवश्यकता होने पर पैदल चल सकें। ट्राम का स्टॉप हमारे सर्विस अपार्टमेंट से केवल 100 मीटर दूर है।

यह 100 मीटर की यात्रा अत्यंत सुखदाई होती है क्योंकि यहाँ का पूरा परिवेश असीम शांति देने वाला है। इस 100 मीटर के बीच शायद ही कोई आदमी दिखाई देता है। चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल मुस्काते हैं। हल्की ठण्ड के बीच धूप का स्पर्श मन में आनंद की लहरें उत्पन्न कर देता है। आज बरसात भी नहीं थी और भगवान सूर्य नारायण आकाश के एक किनारे पर बैठकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

उन्हें पता था कि वैसे भी उन्हें रात 8-9 बजे तक फ्लोरेंस के आकाश में उड़ रहे रंग-बिरंगे पक्षियों के साथ खेलते रहना है। उन्हें शायद दीपा से ईर्ष्या हो रही थी क्योंकि जहाँ भी कोई पक्षी दिखाई देता था, दीपा उसे बिस्किट खिलाना शुरु कर देती थी। इसी आनंद के साथ हमारा फ्लोरेंस में दूसरा दिन पूरा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पीसा में एक दिन (9)

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पीसा में एक दिन

फ्लोरेंस से लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर पीसा नामक शहर है जहाँ झुकी हुई मीनार स्थित है। दूरबीन के आविष्कारक गैलीलियो का जन्म ई.1564 में इसी पीसा शहर में हुआ था। हम सही समय पर रेल्वे स्टेशन पहुँच गए। फ्लोरेंस से प्रत्येक आधे घण्टे में पीसा के लिए ट्रेन है। यहाँ कई हॉल थे जिनमें बहुत से टिकट काउंटर बने हुए थे।

एक हॉल में कम से कम दो दर्जन कतारें लगी हुई थीं। समझ ही नहीं आ रहा था कि पीसा के लिए टिकट कहाँ से मिलेगी। प्रत्येक काउण्टर पर इटैलियन भाषा में ही सूचनाएं लिखी हुई थीं। हमें लगा कि हम भारत के ही पंजाब या आंध्रप्रदेश जैसे किसी प्रांत में आ गए हैं जहाँ रेल्वे स्टेशन, ट्रेन और बसों पर स्थानीय भाषाओं में ही सूचनाएं लिखी जाती हैं।

मैंने एक काउण्टर पर बैठे कर्मचारी से पूछा कि हमें पीसा का टिकट कहाँ से मिलेगा, तो उसने कहा कि हमारी कम्पनी पीसा के टिकट नहीं बेचती। इसके लिए हमें दूसरे हॉल में जाना पड़ेगा। अंततः इसी तरह की पूछताछ करते हुए हम लोग किसी तरह पीसा की टिकट वाले हॉल में पहुँचे। मैं एक कतार में लग गया।

यहाँ मैंने एक सरदारजी को देखा। यदि ये हिन्दी नहीं तो अंग्रेजी तो अवश्य ही समझते होंगे, मैंने मन में सोचा और उनसे पीसा के लिए टिकट खिड़की के बारे में पूछा। सरदारजी ने अपनी अंगुली एक थड़ी की तरफ घुमाई और बोले- ‘उत्थे जाओ!’

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यह एक छोटी सी स्टॉल थी जहाँ सिगरेट से लेकर की-चेन, पर्स, बेल्ट जैसी चीजें बिक रही थीं। काउण्टर पर कोई अधेड़ महिला थी जिसके हाथ बहुत धीरे चल रहे थे। वह कई तरह के काम एक साथ कर रही थी। यहाँ तक कि लोगों को जीरोक्स कॉपी करके भी दे रही थी। अंततः मेरा नम्बर भी आ ही गया। टिकट बहुत महंगा था। एक घण्टे की यात्रा की दूरी के लिए उसने 8.6 यूरो अर्थात् 688 रुपए प्रति व्यक्ति चार्ज किए। हम टिकट लेकर फिर से प्लेटफॉर्म के वेटिंग ऐरिया में आ गए और इलैक्ट्रोनिक पैनल को आशा भरी दृष्टि से देखने लगे। जैसे ही इलैक्ट्रोनिक पैनल पर हमारी ट्रेन का प्लेटफॉर्म नम्बर फ्लैश हुआ, हम लोग तेज कदमों से प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ गए। क्योंकि ट्रेन के चलने का समय हो चला था। यह एक शानदार चमचमाती हुई लक्जरी ट्रेन थी। जैसे ही हम ट्रेन में सवार हुए, ट्रेन चल पड़ी। मानो केवल हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। ट्रेन में भीड़ तो नहीं थी किंतु यह खाली भी नहीं थी। हमारे जैसे हजारों पर्यटक पीसा जा रहे थे। ट्रेन में मधु के पास बैठी एक यूरोपियन लेडी ने मधु की साड़ी को छूकर पूछा- ‘इज इट सारी?’ जब मधु ने उसे हाँ में जवाब दिया तो बोली- ‘इट इज वैरी ब्यूटीफुल। इण्डियन वीमन वीयर इट।’

मधु ने मुस्कुराकर उसकी बात का समर्थन किया तो वह बहुत खुश हुई। जिस प्रकार हम इटैलियन परिवारों को उत्सुकता भरी दृष्टि से देखते थे, वह एक इण्डियन परिवार को इतनी निकटता से देखकर खुश थी किंतु वह संभवतः इटैलियन नहीं थी, किसी दूसरे यूरोपीय देश की थी।

हम लगभग 12.30 बजे पीसा रेल्वे स्टेशन पर उतरे। स्टेशन के बाहर से ही बसें मिलती हैं। यहाँ ट्राम सेवा नहीं है। बस का टिकट काउंटर प्लेटफार्म पर ही एक ओर बना हुआ था। हम टिकट लेकर बस में बैठ गए। जब हम बस से उतरे तो हमें पीसा की मीनार दिखाई देने लगी।

यहाँ बहुत भीड़ थी। पीसा की मीनार को देखकर कोई भी दर्शक आश्चर्य में पड़ सकता है। यह अपने धरातल पर कम से कम 10 से 12 डिग्री झुकी हुई है। इतनी ऊंची बिल्डिंग का इतना झुक जाना और फिर भी नहीं गिरना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। मीनार पर शानदार रंग-रोगन किया गया है जिसके कारण यह ऐसी दिखाई देती है मानो इसे आज ही बनाया गया हो!

इटली की सरकार ने इसे गिरने से रोकने के लिए इसके चारों ओर खुदाई करके काफी नीचे तक सीमेंट कंकरीट भर दिया है। कहा जाता है कि तब से इस मीनार का झुकना बंद हो गया है।

फ्लोरेंस की अपेक्षा यहाँ ठण्ड अधिक थी। इसलिए धूप और अधिक अच्छी लगने लगी। पिताजी तो मीनार के परिसर में जाते ही एक बड़े से लॉन में लेट गए। आज हम पॉलिथीन की बरसातियां लाना नहीं भूले थे, इसलिए उन बरसातियों ने तकिए का काम किया। इसी लॉन में हमने खाना खाया। रोम और फ्लोरेंस की तरह यहाँ भी सार्वजनिक निःशुल्क नागरिक सुविधाएं नहीं थीं।

यहाँ टॉयलेट के लिए 0.8 यूरो (64 भारतीय रुपए) लिया जा रहा था। हम खाना खाकर लॉन में बैठे ही थे कि मेरा ध्यान अपनी जेब पर गया। मेरी जेब में मधु का और मेरा पासपोर्ट रहता था किंतु इस समय दोनों पासपोर्ट मेरी जेब में नहीं थे। मुझे लगा कि अवश्य ही कहीं गिर गए हैं या छूट गए हैं। या फिर जेब कट गई है।

मैंने अपनी चिंता विजय तथा मधु को बताई तो मधु ने कहा कि उसने पासपोर्ट कल शाम को मेरे बैग में रखे थे। यह सुनकर मेरी चिंता काफी कम हो गई किंतु जब तक आंखों से देख न लें, तब तक निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। अतः हम लगभग साढ़े तीन बजे ही वहाँ से लौट पड़े। अन्यथा एक घण्टे और रुक सकते थे।

हम लोग कुछ ही कदम चले होंगे कि पीछे से पिताजी की आवाज आई। मैंने पीछे पलट कर देखा तो पिताजी हम से लगभग 20-25 कदम दूर थे और तेज कदमों से हमारी तरफ आ रहे थे। उन्होंने बताया कि उन्हें अभी-अभी दो जेबकतरों ने घेर लिया था। एक जेब कतरे ने उनसे समय पूछा, जब पिताजी घड़ी देखने लगे तो दूसरे व्यक्ति ने पिताजी के पीछे से उनके कुर्ते की दोनों जेबों पर हाथ रखकर जेबें टटोलनी शुरु कर दीं। पिताजी ने जैसे ही जोर से कहा- ‘व्हाट आर यू डूइंग’ वैसे ही वे दोनों जेबकतरे ‘सॉरी-सॉरी’ कहते हुए भाग छूटे।

हम हैरान थे, इतने लोगों के बीच दिन-दहाड़े वे ऐसा करने की हिम्मत रखते थे! क्या इटली की पुलिस को ज्ञात नहीं होगा कि ये दोनों जेब कतरे हैं और यहाँ विदेशी पर्यटकों के बीच घूम रहे हैं!

हमने मीनार के कैम्पस से बाहर आकर बस-टिकट की तलाश शुरु की। अब तक हमें ज्ञात हो चुका था कि जिस दुकान पर टिकट मिलते हैं, उनके बाहर BILGITTIE लिखा होता है। हमें एक रेस्टोरेंट के बाहर BILGITTIE लिखा हुआ दिख गया। रेस्टोरेंट में हमें वह महिला भी दिख गई जिसने मधु से ट्रेन में साड़ी के बारे में पूछा था। उसने टिकट खरीदने में हमारी सहायता की।

उसी रेस्टोरेंट के सामने से रेलवे स्टेशन के लिए बस मिलती थी। हम बस पकड़कर कुछ ही मिनटों में पीसा रेल्वे स्टेशन पर पहुँच गए। यहाँ केवल तीन टिकट विण्डो थीं। मैं एक विण्डो पर जाकर लाइन में लग गया। जैसे ही मेरा नम्बर आया, विजय ने मेरे पास आकर सूचित किया कि उसने वेंडिंग मशीन से टिकट खरीद लिया है। मैं पंक्ति से बाहर आ गया।

मैंने पिताजी को बताया कि यहाँ टिकट खिड़की पर रेलवे कम्पनी की ओर से स्टिकर लगाकर पर्यटकों को सावधान किया गया है कि वे टिकट खरीदते समय अपनी जेब का ध्यान रखें, यहाँ आपकी जेब कट सकती है। हम समझ गए कि गैलीलियो का पीसा आजकल जेब-कतरों की गिरफ्त में है।

फ्लोरेंस आकर मैंने रेलवे स्टेशन पर स्थित उसी क्योस्क पर सम्पर्क किया जहाँ से मैंने सुबह टिकट खरीदे थे। इस समय कोई और महिला कर्मचारी यहाँ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा कि क्या आपको यहाँ कोई इण्डियन पासपोर्ट मिला है, तो उसने अनभिज्ञता प्रकट की और मुझे सलाह दी कि मैं तुरंत पुलिस को फोन करूं। हमने पुलिस से सम्पर्क करने की बजाय पहले सर्विस अपार्टमेंट में जाकर अपना बैग चैक करने का निर्णय लिया।

हम इस बार ट्राम में नहीं बैठे, पैदल चलकर ही सर्विस अपार्टमेंट पहुँचे। केवल एक किलोमीटर पैदल चलकर हमने 1.5 यूरो के हिसाब से 5 टिकटों के पूरे 600 रुपए बचा लिए थे। जब घर में घुसे तो शाम के साढ़े पाँच बजने को थे। हमने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि पासपोर्ट बैग में ही थे।

चाय पीकर हमने हिसाब लगाया तो ज्ञात हुआ कि हमारी इस छोटी सी यात्रा पर हमें ट्रेन, बस एवं ट्राम के टिकटों के लिए 9,280 रुपए व्यय करने पड़े थे। जबकि खाने-पीने के लिए तो वैसे भी इटली की दुकानों में हमारे लिए कुछ नहीं होता और हमने, निःसंदेह, टॉयलेट के लिए भी कुछ व्यय नहीं किया था।

हमने चाय पीते-पीते एक बार फिर भारत में हो रहे लोकसभा चुनाव के परिणाम देखे। भारत में इस समय रात्रि के नौ बज चुके थे। एकाध सीट को छोड़कर सभी सीटों के परिणाम आ गए थे। बीजेपी ‘अब की बार तीन सौ पार’ से भी आगे निकल गई थी और एनडीए ‘तीन सौ तिरपेन’ जीत चुकी थी। अचानक मुझे याद आया कि एक बार इटली वालों की पार्टी ने चुनावों में ‘टू सेवंटी टू’ (भारतीय लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा) का नारा दिया था जिसे पत्रकार लोग बिगाड़कर ‘तू सेवंती तू’ कहा करते थे।

किचन में एमरजेंसी

मधु ने सूचित किया कि इस बार आटा अधिक तेजी से समाप्त हो रहा है। इसलिए उसने रोम की मकान मालकिन द्वारा दी गई एक किलो मैदा और भानु द्वारा नोएडा से लाई गई एक किलो सूजी और एक किलो बेसन भी आटे में मिला लिए ताकि आटे की मात्रा बढ़ सके। हुआ यह था कि इस बार हमने चावल, पोहा, दलिया का बहुत कम उपयोग किया था जबकि इण्डोनेशिया की यात्रा में हम नाश्ते में पोहा तथा डिनर में चावल, दलिया एवं खिचड़ी ही बनाते थे।

चपातियां केवल दोपहर के भोजन में बनती थीं। जबकि इस बार सुबह के नाश्ते में परांठे बन रहे थे और दोपहर तथा शाम को चपातियां बन रही थीं। अतः आज से किचन में एमरजेंसी लागू कर दी गई और एक समय दलिया, खिचड़ी एवं चावल आदि बनने लगे। मैं पिछले दो दिन से डायरी नहीं लिख पा रहा था।

अतः आज शाम को बाहर जाने की बजाय डायरी लिखने बैठ गया। एक दिन की डायरी आज लिखी और एक दिन की डायरी लिखने का काम अगले दिन के लिए छोड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फ्लोरेंस में तीसरा दिन – 24 मई 2019 (10)

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फ्लोरेंस में तीसरा दिन

आज फ्लोरेंस शहर देखने का कार्यक्रम बनाया था जिसे स्थानीय भाषा में फिरेंजे कहते हैं। किसी भी शहर के भीतरी भाग को देखना हो तो सबसे बढ़िया माध्यम पैदल चलना ही हो सकता है।

आंख खुली तो देखा पाँच बज रहे हैं। यह कमाल ही था कि शरीर की जैविक घड़ी में भी अब भारत के पाँच बजे की बजाय इटली के पाँच बजे का अलार्म स्थिर हो गया था। हमें आज इटली में आठवां दिन था। उठते ही सैलफोन चार्जिंग पर लगाया तथा उसमें कैद तस्वीरों एवं वीडियो को गूगल पर ट्रांसफर किया।

ये दोनों कार्य भी यात्रा के दौरान अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इस कार्य में एक भी दिन की चूक की तो भारी गड़बड़ हो सकती है। इस बार मैं लैपटॉप साथ नहीं लाया था, इसलिए फोटो और वीडियो प्रतिदिन गूगल पर ट्रांसफर करने पड़ रहे हैं। इसके बाद डायरी लिखने बैठ गया और सात बजे तक लिखता रहा।

घर से निकलते-निकलते 10.30 बज गए। आज फ्लोरेंस शहर देखने का कार्यक्रम बनाया था जिसे स्थानीय भाषा में फिरेंजे कहते हैं। किसी भी शहर के भीतरी भाग को देखना हो तो सबसे बढ़िया माध्यम पैदल चलना ही हो सकता है।

हमने पिताजी को घर पर छोड़ा और हम ट्राम से फ्लोरेंस रेल्वे स्टेशन पहुँचे। यहांँ से हमने पैदल यात्रा आरम्भ की। स्टेशन से थोड़ी दूरी पर एक चौक है जहाँ एक पुराना किंतु विशाल प्रेयर हाउस है। यहीं से घने बाजार का सिलसिला आरम्भ होता है। पर्यटकों के लिए प्रार्थना घर में प्रवेश करना प्रतिबंधित है, इस आशय की सूचना पढ़कर हम बाजार की तरफ मुड़ गए।

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यहाँ कुछ चित्रकार सड़क के किनारे मेज-कुर्सी लगाकर चित्र बना रहे थे। ये चित्र इतने सुंदर, मनोहारी और संतुलित थे कि कम्प्यूटर के लिए भी बनाने कठिन हैं। सदियों पहले फ्लोरेंस शहर ने इन्हीं चित्रों और मूर्तियों के निर्माण से इटली की जड़ता को समाप्त करके नवयुग का अवतरण किया था। वह युग भी कभी का बीत गया किंतु चित्र और मूर्तियां बनाने की परम्परा शहर ने आज भी जीवित रख रखी है। इस चौक के मध्य भाग में फ्लोरेंस के किसी दार्शनिक या चित्रकार की बड़ी प्रतिमा लगी हुई है। थोड़ा आगे चलने पर लैदर से बने सामान के क्योस्क लगे हुए थे। ये क्योस्क लकड़ी के अस्थाई ढांचों से बने हैं तथा दोनों ओर से सड़क के इतने बीच में आ गए हैं कि यात्रियों के लिए चलना भी कठिन हो जाता है। यहाँ चमड़े की कमर-पेटियां और लेडीज पर्स अधिक बिक रहे थे। भारतीय रुपए के हिसाब से यहाँ की प्रत्येक चीज बहुत महंगी थी। इन्हीं गलियों में चलते हुए हम एक विशाल चौक पर पहुँचे। इस चौक में इतनी अधिक भीड़ थी कि देखने वाले को लगता है मानो पूरी दुनिया ही सिमट कर इस स्थान पर आ गई हो! यहाँ ई.1408 में निर्मित एक बैपिस्ट्री है। सफेद और हरे रंग के इटैलियन पत्थरों से निर्मित यह बैपिस्ट्री अत्यंत कलात्मक है।

इसके आसपास भी अन्य कई विशाल भवन हैं। एक भवन तो ऊँची मीनार की तरह आकाश में जा घुसा प्रतीत होता है। कुछ पर्यटक क्रेन में बने प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर इस सैंकड़ों फुट ऊंची मीनार के ऊपर तक जा रहे थे और वहाँ से नीचे की दुनिया देख रहे थे। हर ओर भीड़ ही भीड़। पर्यटकों के रेले के रेले समुद्री लहरों की तरह आ रहे थे और रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। इनमें से एक भवन में म्यूजियम भी बना हुआ था जिसमें प्रवेश करने के लिए लोग घण्टों से तिहरी कतारों में लगे हुए थे।

 इस भवन के बाहर एक सूचना पट्ट लगा है जिसके अनुसार इस बैपिस्ट्री के उत्तरी द्वार का जीर्णोद्धार करने के लिए दुनिया भर के सेठों ने धन दिया था। उनमें भारतीय उद्योगपति एवं स्वतंत्रता सेनानी जमना लाल बजाज का नाम सबसे ऊपर है।

चौक पर विक्टोरिया जैसी शैली में बनी घोड़ा-बग्घियां चल रही थीं जिन पर दुनिया भर से आए पर्यटक पूरे चौक एवं आसपास की गलियों का चक्कर लगा रहे थे। भारत में इन्हें टमटम कहा जाता है। संभवतः इस गाड़ी पर लगी घण्टियों की आवाज के कारण! इस चौक में एक लम्बी कतार में बहुत से चित्रकार बैठकर चित्र बना रहे थे। बहुत से पर्यटक इन चित्रकारों से बात करने का प्रयास करते हैं। इन चित्रकारों में 14-15 साल की किशोरियों से लेकर 80-85 साल के वृद्ध चित्रकार शामिल हैं। सचमुच फ्लारेंस चित्रकारों का नगर है।

यू हैव टेकन माई ग्लासेज

हम इन दृश्यों को देखते हुए उस चौक पर घूम ही रहे थे कि अचानक एक विदेशी युवती ने विजय की आंखों पर से चश्मा उतार लिया। शक्ल-सूरत से वह कोई चीनी लड़की दिखाई दे रही थी। उस युवती ने बहुत गुस्से में अंग्रेजी भाषा में विजय को डांटा- ‘हाऊ डेयर यू टू टेक माई ग्लासेज!‘

इस अप्रत्याशित छीन-झपट से विजय हक्का-बक्का रह गया और यह समझने का प्रयास करने लगा कि यह अनाजन स्त्री ऐसा क्यों कर रही है? इससे पहले कि विजय कुछ जवाब दे पाता, उस लड़की का साथी दौड़ता हुआ आया और उसने युवती को अपने हाथ में रखा एक चश्मा दिखाते हुए (संभवतः चीनी भाषा में) कुछ कहा। उस लड़की ने तुरन्त चश्मा विजय को लौटा दिया और माफी मांगती हुई बोली- ‘आई एम सॉरी, आई थौट यू हैव टेकन माई ग्लासेज।’ विजय अब भी कुछ नहीं बोल पाया, केवल मुस्कुरा दिया।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हम विजय के पास ही खड़े हुए थे किंतु हम सभी का ध्यान चौक में चल रही विभिन्न गतिविधियों की तरफ होने से हम इस घटना को देख ही नहीं पाए। जब वह युवती जाने लगी तब विजय ने हमें पूरा घटनाक्रम बताया।

दैत्याकार मूर्तियां

यहाँ से हम कुछ गलियां पार करके लगभग 650 मीटर दूर स्थित एक अन्य चौक में पहुँचे। गूगल मैप हमारा पथ-प्रदर्शन करता रहा। इन गलियों से गुजरते हुए हमें बड़े-बड़े दरवाजों वाले भवनों के सामने से गुजरना होता था। हमें यह देखकर आश्चर्य होता था कि हर घर का दरवाजा पूरी तरह बंद था।

इसलिए उनके भीतर एक दृष्टि फैंकना भी संभव नहीं था। इस चौक के बीचों-बीच एक बड़ा सा फव्वारा है जिसके चारों ओर बहुत सारी मनुष्याकार से भी बड़े आकार की मूर्तियां लगी हुई हैं। ज्यादातर मूर्तियां सफेद संगमरमर की हैं और लगभग सभी मूर्तियां बिना वस्त्रों के हैं। फव्वारे की बाहरी रिंग पर बनी हुई कुछ दैत्याकार मूर्तियां कांसे की हैं जो पानी बहते रहने के कारण गहरी हरी हो गई हैं।

पियाजा डेला सिगनोरिया

वस्तुतः इस समय हम जिस चौक में पहुँच गए थे, उसका नाम पियाजा डेला सिगनोरिया अर्थात् सिगनोरिया चौक है। इस चौक में विश्व-प्रसिद्ध ‘फोंटाना डेल नेट्टूनो’ अर्थात् ‘नेपच्यून देवता का फव्वारा’ स्थित है। यह फव्वारा प्राचीन रोमन देवता नेपच्यून को समर्पित है जिसे भारत में वरुण देव कहा जाता है।

वेदों में वरुण को असुर माना गया है जो बाद में देवताओं से मित्रता हो जाने के कारण देवता बन गया था। इटली में भी नेपच्यून की जो प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं, उनकी आकृति देवताओं की तरह सौम्य न होकर दैत्यों की तरह क्रूर दिखाई देती हैं। प्राचीन यूनानी धर्म में नेपच्यून को शुद्ध जल एवं समुद्रों का देवता माना जाता था।

यह यूनानी देवता पोजीडोन का सहयोगी देवता है तथा इसे जूपीटर (बृहस्पति) एवं प्लूटो (यम) का भाई माना जाता है। प्राचीन रोमन-वासी नेपच्यून को लैटिन भाषा में नेप्ट्यूनस कहते थे तथा जल एवं झरनों के देवता के रूप में उनकी पूजा करते थे। नेपच्यून स्वर्ग, धरती तथा पाताल लोक का देवता था।

इसे घोड़ों के देवता के रूप में भी स्वीकार किया गया। नेपच्यून देवता की पत्नी का नाम सेलेसिया था। प्राचीन यूनानी धर्म में ओसेनस को भी समुद्र और नदियों का देवता माना जाता था। रोम वासियों ने भी इस यूनानी देवता को उसी रूप में स्वीकार किया। इटली की राजधानी रोम तथा अन्य नगरों में नेपच्यून तथा ओसेनस दोनों देवताओं के नाम वाले झरने एवं फव्वारे मिलते हैं जिनमें नेपच्यूटन अथवा ओसेनस देवताओं के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लगी हुई हैं।

प्राचीन यूनानी एवं प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की अधिकांश प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं। कुछ मूर्तियों की कमर अथवा वक्ष पर एक कपड़ा उत्कीर्ण किया जाता है। यही कारण है कि इटली की राजधानी रोम एवं अन्य नगरों में चौराहों, मुख्य गलियों एवं झरनों तथा फव्वारों आदि पर संगमरमर एवं कांसे की विशाल निर्वस्त्र प्रतिमाएं दिखाई देती हैं।

यूनानी एवं रोमन देवी-देवता वस्तुतः भारतीय वैदिक देवी-देवताओं के ही बदले हुए नाम हैं। वेदों में नेपच्यून को वरुण, जूपीटर को बृहस्पति तथा प्लूटो को यम कहा गया है जबकि ओसेनस ऋग्वेद में वर्णित वृत्र का बदला हुआ रूप है। वेदों में वृत्र को असुर माना गया है जिसने समुद्रों के जल को बांध लिया था और इन्द्र ने वृत्र का वध करके समुद्रों के जल को मुक्त करवाया। रोम का मुख्य फव्वारा ओसेनस अर्थात् वृत्र को एवं फ्लोरेंस का मुख्य फव्वारा नेपच्यून अर्थात् वरुण देवता को समर्पित है।

फ्लोरंस में नेपच्यून फाउंटेन के नाम से कई फव्वारे हैं जिनमें से पियाजा डेला सिगनोरिया अर्थात् सिगनोरिया चौक पर स्थित नेपच्यून फाउंटेन प्रमुख है। यह फव्वारा पलाज्जो वेचियो के सामने बना हुआ है। इस फव्वारे की मूर्तियों के निर्माण में संगमरमर तथा कांसे का प्रयोग हुआ है।

यह फव्वारा मूलतः ई.1565 में बना था। इसका डिजाइन बेक्कियो बैण्डिनेली नामक शिल्पकार ने तैयार किया था। इस फव्वारे की मूर्तियां बर्टोलोमियो नामक मूर्तिकार ने बनाई थीं। कांसे से निर्मित समुद्री-घोड़ों का निर्माण जियोवानी डा बोलोग्ना ने किया था। ई.1559 में फ्लोरेंस नगर में पेयजल की आपूर्ति के लिए एक नवीन नहर का निर्माण किया गया।

तब फ्लोरेंस के शासक कोसीमो प्रथम मेडिसी ने इस फव्वारे को डिजाइन करने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। उस समय रोम साम्राज्य का विस्तार लगभग सम्पूर्ण भू-मध्य सागरीय क्षेत्र पर था।

इसलिए उस काल में रोम एवं फ्लोरेंस में बने अधिकांश फव्वारों में समुद्रों के देवता नेपच्यून एवं उससे सम्बद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगती थीं। जो रोमन साम्राज्य के भूमध्यसागर पर अधिकार होने का प्रतीक थीं। नेपच्यून को सामान्यतः रथ पर आरूढ़ दिखाया जाता था जिसे काल्पनिक समुद्री घोड़ों द्वारा खींचा जाता था।

फ्लोरेंस में हुई प्रतियोगिता में बेक्कियो बैण्डिनेली का डिजाइन चुना गया किंतु काम पूरा होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिल्पकार अम्मान्नाटी को काम पूरा करने के लिए नियुक्त किया गया। इस फव्वारे में लगे नेपट्यून देवता का चेहरा, फ्लोरेंस के ग्राण्ड ड्यूक कोसीमो के चेहरे की अनुकृति है।

यह प्रतिमा लगभग 13 फुट ऊंची है। इसे अपून मार्बल से बनाया गया है। यह मार्बल मकराना के मार्बल से भी अधिक सफेद है। यह फव्वारा ई.1565 में बनकर तैयार हुआ ताकि फ्लोरेंस के तत्कालीन शासक फ्रैंसिस्को डे मेडिसी प्रथम तथा ऑस्ट्रिया की राजकुमारी ग्राण्ड ड्यूश जोहान्ना के विवाह को यादगार बनाया जा सके। फ्लोरेंसवासियों को यह फव्वारा  पसंद नहीं आया और उन्होंने फव्वारे में लगी नेपट्यून की मूर्ति को ‘विशाल सफेद दैत्य’ कहकर नकार दिया।

 नेपच्यून की प्रतिमा के चारों ओर कांसे की देव-प्रतिमाएं लगाई गई हैं जिन्हें उनके गहरे हरे रंग के कारण सहज ही पहचाना जा सकता है। फव्वारे के निकट अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ नेप्ट्यून की पत्नी देवी सैयला तथा चैरीब्डिस की प्रतिमाएं बनाई गई हैं। ये सभी प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं क्योंकि प्राचीन यूनानी एवं रोमन देवता इसी प्रकार बिना कपड़ों के ही बनाए जाते थे।

फव्वारे के चारों ओर लगी तथा उसके निकट चौक में यत्र-तत्र बनी हुई संगमरमर एवं कांसे की प्रतिमाओं के निर्माण में लगभग 10 साल लगे। फव्वारे के चारों ओर अष्टकोणीय कुण्ड बनाया गया है। उसके ठीक मध्य में नेप्ट्यून का प्लेटफॉर्म खड़ा किया गया है। इस चौक में खड़ी समस्त प्रतिमाएं ई.1574 तक बनकर तैयार हुईं। ई.1800 में उन प्रतिमाओं की अनुकृतियां तैयार करवाई गईं तथा मूल प्रतिमाओं को राष्ट्रीय संग्रहालय में भेज दिया गया।

विगत चार सौ सालों में इस फव्वारे को अनेक प्रकार के नुक्सान सहन करने पड़े। कुछ समय बाद फव्वारा उजड़ गया तथा इसका कुण्ड धोबियों द्वारा कपड़े धोने के काम में लिया जाने लगा। 25 जनवरी 1580 को इस फव्वारे में वाण्डाल आक्रांताओं द्वारा तोड़-फोड़ की गई।

इस फव्वारे में एक ‘सैटिर’ की प्रतिमा लगी हुई थी जिसे ई.1830 के कार्निवल के दौरान किसी ने चुरा लिया। जंगल के देवता को ‘सैटिर’ कहते हैं। यूनान में इसका अंकन एक ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान तथा पूंछ घोड़े की तरह हों। रोमन सैटिर में इसका अंकन ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान, पूंछ, पैर तथा सींग बकरी के जैसे होते थे। कुछ देशों में इस देवता का अंकन पंख वाले मनुष्य के रूप में किया जाता था।

ई.1848 में इस फव्वारे पर बमों से हमला किया गया। सरकार द्वारा इसे बनाया जाता था तथा उपद्रवी तत्वों द्वारा इसे तोड़ दिया जाता था। इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि इस काल में ईसाई संघ के कुछ पदाधिकारी नहीं चाहते थे कि प्राचीन रोमन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लोगों को दिखाई दें तथा उनमें अपने पुराने धर्म के प्रति आस्था का उदय हो।

फिर भी सरकार समय-समय पर फ्लोरेंस शहर की पहचान के रूप में इस फव्वारे का जीर्णोद्धार करवाती रही। 4 अगस्त 2005 की रात्रि में कुछ गुण्डों ने फव्वारे पर हमला किया। तीन लोग नेप्ट्यून देवता की प्रतिमा पर चढ़ गए और उन्होंने प्रतिमा का हाथ एवं त्रिशूल तोड़ दिया। वर्ष 2007 में इस प्रतिमा की मरम्मत की गई। वर्ष 2007 में एक बार पुनः चार लड़कों ने इस फव्वारे को नुक्सान पहुँचाया।

इटली में लगभग एक दर्जन नेप्ट्यून (नेप्चयून) फाउण्टेन हैं। फ्लोरेंस शहर के बोबोली गार्डन्स में पलाजो पित्ती के पीछे भी एक नेप्ट्यून फाउण्टेन है। इस फव्वारे की प्रतिमाएं भी बोलोग्ना ने बनाई थीं। इस फव्वारे को देखने के लिए संसार भर से आए पर्यटकों की इतनी भीड़ रहती है कि इसका चित्र उतारना भी आसान नहीं है।

उन्हीं दिनों जियोवान्नी एंजिलो मोण्टोर्सोली ने इटली के सिसली राज्य में स्थित मेसीना शहर में ऐसा ही फव्वारा बनाया। ई.1878 में रोम में भी नेप्ट्यून फाउण्टेन बनाया गया जिसमें नेप्ट्यून को एक ऑक्टोपस से लड़ते हुए दिखाया गया है।

चौक के बीचों-बीच एक विशाल और ऊंचे घोड़े पर किसी घुड़सवार योद्धा की प्रतिमा है। यह कांसे की विशाल प्रतिमा है तथा गहरे हरे रंग की दिखाई देती है। मेरे अनुमान से यह प्रतिमा इस फव्वारे को बनवाने वाले राजा फ्रैंसिस्को डे मेडिसी (प्रथम) की है तथा यह भी फव्वारे के साथ ई.1565 में बनकर तैयार हुई थी। इस प्रतिमा में बने घोड़े तथा राजा की आकृति का शिल्प और धातु ठीक वैसे ही हैं जैसे फव्वारे में लगी कांस्य-निर्मित देव-मूर्तियों के हैं।

लघु शंका

फव्वारे को देखकर हम चले ही थे कि मुझे लघुशंका से निवृत्त होने की इच्छा होने लगी। हम लगभग पूरा शहर घूम आए थे किंतु किसी भी स्थान पर हमें टॉयलेट की सुविधा दिखाई नहीं दी थी। क्या यहाँ के लोगों को पेशाब नहीं लगता!

मैंने विजय से प्रश्न किया तो वह समझ गया कि मेरी समस्या क्या है! उसने भानु से कहा कि वह सामने वाली शॉप पर काम कर रही लड़की से टॉयलेट के बारे में पूछे। भानु ने उस लड़की से बात की। हमारे सौभाग्य से वह अंग्रेजी जानती थी। उसने भानु को बताया कि यहाँ कोई पब्लिक टॉयलेट नहीं होता। आप किसी रेस्टोरेंट में जाइए, वहाँ से कुछ खरीदिए या खाइए, वहाँ आपको टॉयलेट की फैसिलिटी मिल जाएगी।

भानु द्वारा लाई गई यह सूचना किसी बड़े ताले को खोलने के लिए चाबी से कम नहीं थी। मैंने तुरंत ही एक रेस्टोरेंट वाले से टॉयलेट के लिए रिक्वेस्ट की क्योंकि यहाँ के रेस्टोरेंटों में हम कुछ खरीदने की तो सोच ही नहीं सकते थे। मांस-मछली और अण्डों की तरफ देखते ही हमें मतली आती थी।

रेस्टोरेंट का मालिक कुछ मजाकिया किस्म का आदमी था। उसे रोज मेरे जैसे पर्यटकों से पाला पड़ता होगा। इसलिए उसने हंसकर कहा- फिफ्टीन यूरो!’ उसकी बात सुकनकर मेरा मुंह उतर गया। यह तो बहुत बड़ी राशि थी। भारत के हिसाब से 1200 रुपए। फिर भी मैंने किसी तरह हिम्मत बटोर कर उससे कहा- ‘दिस इज वैरी हाई!’

दुकानदार फिर हंसकर बोला- ‘आ’म जोकिंग, प्लीज गो इनसाइड।’ उसने एक कौने में बने टॉयलेट की तरफ संकेत कर दिया। मेरी जान में जान आई। यहाँ से हम अपने घर की तरफ चल दिए। यह रास्ता ठीक उसी नदी की तरफ होकर जाता था जिसके किनारे-किनारे हम पहले दिन एक घण्टा टहले थे।

सोना सस्ता और टमाटर महंगा!

मार्ग में एक ज्यूलरी मार्केट था। इस बाजार को देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं। सोने-चांदी, प्लेटिनम, हीरे, जवाहरात एवं सेमी-प्रीशियस स्टोन से बनी ज्यूलरी की इतनी सारी दुकानें एक साथ देखकर हैरानी हुई। दुकानों के शोकेस आभूषणों से ठसाठस भरे हुए हैं और गलियां दुनिया भर से आए पर्यटकों से भरी हैं।

इतनी सारी दुकानें, इतनी सारी ज्यूलरी और इतने सारे पर्यटकों की उपस्थिति देखकर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ प्रतिदिन कई सौ करोड़ रुपयों के आभूषणों की बिक्री होती होगी। यहाँ सोने का भाव 350 यूरो अर्थात् 28 हजार भारतीय रुपए रुपए प्रति 10 ग्राम है। जबकि इन दिनों भारत में सोने का भाव 32000 रुपए प्रति 10 ग्राम है।

दूसरी ओर यदि इटली में भारतीय मुद्रा में 32 हजार रुपए का टमाटर खरीदा जाए तो केवल 100 किलो टमाटर आएंगे किंतु भारत में इतने ही रुपए में 1,000 किलो टमाटर खरीदे जा सकते हैं। यह मेरी समझ से बाहर की बात थी कि यदि इटली में टमाटर का भाव भारत की तुलना में 10 गुना महंगा है तो सोना भारत से भी सस्ता क्यों है? हम भारत में सस्ता टमाटर खा रहे हैं या इटली के लोग सस्ता सोना खरीद रहे हैं?

मैं और विजय इन ज्यूलरी शॉप को देखते हुए आगे बढ़ गए। आगे वही नदी थी जिसके किनारे हम पहले ही दिन एक घण्टे तक घूमते रहे थे। नदी के किनारे पहुँचकर हमने देखा कि मधु, भानु और दीपा हमारे साथ नहीं हैं। हम दोनों वापस बाजर की तरफ लौटे। वे तीनों ठीक उसी स्थान पर खड़ी हुई थीं

जहाँ से बाजार समाप्त होता था और नदी का तट आरम्भ होता था। नदी के किनारे आधे घण्टे चलने के बाद हम अपने सर्विस अपार्टमेंट पहुँचे। अब तक दोपहर के डेढ़ बज गए थे। हम पूरे तीन घण्टे तक या तो चलते रहे थे या खड़े रहे थे। शहर में बैठने की बेंच इक्का-दुक्का स्थानों पर थीं और उन पर पर्यटक पहले से ही जमे हुए थे।

इस कारण हमें बैठने का अवसर कहीं नहीं मिला था। सायं सवा पाँच बजे मैं और विजय पिताजी के साथ घूमने निकले। हमने ट्राम के टिकट खरीदे। इन्हीं टिकटों से किसी भी सिटी बस में भी यात्रा की जा सकती थी। हमारा विचार पूरे डेढ़ घण्टे में ट्राम या बस में बैठे रहकर शहर घूमने का था ताकि पिताजी को पैदल नहीं चलना पड़े।

हम ट्राम से शहर के अंतिम छोर तक गए। इस स्थान पर हमें पहली बार इटली की मिट्टी और घास दिखाई दी। हम दूसरी ट्राम पकड़ कर वापस लौटे और इस बार शहर के दूसरे छोर पर उतरे।

रोमांचक अनुभव रोम और फ्लोरेंस की मैट्रो रेल यात्रा

इटली के नगरों में ट्राम सेवा को चलते हुए देखना और उसमें यात्रा करना एक आनंद दायक अनुभव है। रोम संसार के प्राचीन नगरों में से एक है किंतु जिस तरह से उसका आधुनिकीकरण हुआ है, उसे देखकर लगता है कि रोम हाल ही में कुछ वर्षों में बनकर तैयार हुआ है। ट्राम सेवा उसकी सुंदरता में चार-चांद लगा देती है।

इसके लिए न तो ऊंचे प्लेट फार्म बनाने पड़ते हैं और न पटरियों के किनारे गिट्टी बिछानी पड़ती है। इसलिए बच्चे, बूढ़े, स्त्रियां सभी इसकी सवारी पसंद करते हैं। यह नगर के आवागमन को तो सुगम बनाती ही है, साथ ही सिटी बस की सेवा से भी अधिक सुगम है। यह बहुत कम समय में शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पहुँचा देती है।

बसों, कारों तथा अन्य साधनों की अपेक्षा यह अधिक सुरक्षित एवं आराम देह सेवा है। फ्लोरेंस संसार के सबसे सुंदर शहरों में से एक है। इस नगर की ट्राम सेवा दर्शकों को लुभाती है। फ्लोरेंस आने वाले पर्यटक ट्राम का आनंद उठाना कभी नहीं भूलते।

जिस स्थान पर हम ट्राम से उतरे, वहाँ से वह चौक निकट ही था जहाँ आज प्रातः हमने विशाल बैपिस्ट्री देखी थी। हमें एक मिनी बस दिखाई दी। हम उसी बस से बैपिस्ट्री तक पहुँचे। इस समय भी यहाँ सुबह जैसी ही भीड़ थी। लोग विक्टोरिया गाड़ियों का आनंद ले रहे थे। इस चौक को देखने के बाद हम बस में बैठकर सर्विस अपार्टमेंट लौट आए।

दिन अब भी काफी बाकी था। इसलिए इस बार पिताजी घर पर रहे और बाकी के सदस्य दूध, फल और तरकारी खरीदने के लिए निकल गए। इन्हें आंख मींचकर खरीदना पड़ा था। भारत में दूध और सब्जियां 60 रुपए किलो तथा फल 100-125 रुपए किलो मिल जाते हैं किंतु यहाँ दूध से लेकर आलू-प्याज, टमाटर, सेब, केला, और आड़ू 300-350 रुपए किलो मिलते हैं।

रात को नौ बजे जब हम सर्विस अपार्टमेंट पर लौटे, तब भी दिन का पर्याप्त उजाला मौजूद था। आज दिन भर हमें बहुत पैदल चलना पड़ा था इस कारण बुरी तरह थक गए। खाना खाकर लेटते ही नींद आ गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में पहला दिन – 25 मई 2019 (11)

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वेनेजिया में पहला दिन

वेनेजिया में पहला दिन हमें अब तक विदेश यात्राओं में हुए अनुभवों से पूरी तरह अलग अनुभव देने वाला रहा। समझ में नहीं आता कि यह कैसा शहर है। शहरों में से नदी या नहरें गुजरती हुई तो हमने देखी थीं किंतु यह शहर समुद्री नदियों एवं नहरों के बीच से होकर गुजरता हुआ प्रतीत होता है।

सुबह 5.27 पर आंख खुली। शौचादि से निवृत्त होकर कल की यात्रा का विवरण लिखने बैठ गया। आज हमें प्रातः 11 बजे वेनिस के लिए निकलना है। दोपहर 12 बजे की ट्रेन है। वेनिस में जो सर्विस अपार्टमेंट विजय ने बुक करवाया था, उसके मालिक को विजय ने यहीं से मैसेज कर दिया कि हम दोपहर 2.30 बजे वेनिस पहुँचेंगे।

उसका जवाब आया कि नहीं आप 2.30 बजे नहीं आ सकते, आपका समय दोपहर बाद तीन बजे से है। विजय ने वापस लिखा कि हमारी ट्रेन 2.35 पर वेनिस पहुँचेगी। हम उसके बाद ही सर्विस अपार्टमेंट पहुँचेंगे। तब तक तीन बज ही जाएंगे!

अब तक हम इटली के तीन नगर देख चुके हैं। हमारी योजना में सम्मिलित चौथा और अंतिम नगर वेनिस है जो विश्व भर में श्रेष्ठ वाइन बनाने के लिए जाना जाता है। हम ठीक 11 बजे सर्विस अपार्टमेंट से बाहर आ गए।

यहाँ से 100 मीटर चलकर ट्राम का स्टेशन था तथा 750 मीटर चलकर शॉर्टकट से हम सीधे मुख्य रेल्वे स्टेशन पहुँच सकते थे। हमने 750 मीटर वाला रास्ता लिया ताकि 7.5 यूरो अर्थात् 600 भारतीय रुपए बचाए जा सकें। जब हम संकरी गलियों से होते हुए रेल्वे स्टेशन जा रहे थे तो हमने देखा कि ये गलियां भी इतनी साफ सुथरी थीं जिनकी भारत में कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आई डोण्ट केयर

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हमारे जैसे बहुत से पर्यटक अपना सामान खींचते हुए वेनेजिया रेल्वे स्टेशन की तरफ जा रहे थे। इसका अर्थ यह था कि केवल हम ही यूरो नहीं बचा रहे थे अपितु दुनिया भर से आए लोगों में से बहुत से हमारे जैसे ही थे। हम 11.20 पर रेल्वे स्टेशन पहुँचे जबकि हमारी गाड़ी 12.30 पर थी। यहाँ भी रोम रेल्वे स्टेशन की तरह बैठने की कोई सुविधा नहीं थी अतः हम लगभग सवा घण्टे तक खड़े ही रहे। 12.20 पर इलैक्ट्रोनिक पैनल पर गाड़ी का प्लेटफॉर्म नम्बर डिस्प्ले हुआ, 12.25 पर गाड़ी आई और जैसे ही हम गाड़ी में बैठे, ठीक 12.30 पर चल पड़ी। यह भी एक बुलेट ट्रेन थी तथा पूरे रास्ते में 250-300 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चलती रही। मार्ग में 2-3 स्टॉप ही थे किंतु वेनेसिया इटली के लगभग धुर उत्तरी क्षेत्र में एण्ड्रिाटिक समुद्र के तट पर स्थित है। इसलिए इस यात्रा में 2 घण्टे लग गए। ट्रेन ठीक 2.35 पर पहुँच गई। रेलवे स्टेशन पर उतरकर  विजय ने वेनेसिया के सर्विस अपार्टमेंट के मालिक को व्हाट्सैप पर सूचित किया कि हमारी ट्रेन पहुँच गई है। हम लगभग आधे घण्टे में सर्विस अपार्टमेंट पहुँच जाएंगे। इस पर सर्विस अपार्टमेंट के मालिक का जवाब आया कि आई डोण्ट केयर, व्हेदर योअर ट्रेन ऑर यू रीचेज एट 2.35, योअर टाइम स्टार्ट्स एट थ्री!

हमें उसका संदेश पढ़कर कुछ चिंता हुई। यह झगड़ालू किस्म का आदमी लग रहा था। कहीं वह हमें अपना अपार्टमेंट देने से ही मना न कर दे। हमने उसे 55 हजार रुपए केवल तीन रात्रियों के लिए दिए थे। रेलवे स्टेशन से सर्विस अपार्टमेंट लगभग 400 मीटर था तथा यहाँ से केवल पैदल ही जाया जा सकता था। गूगल की सहायता से हम लगभग 10-12 मिनट में सर्विस अपार्टमेंट वाली गली में पहंच गए।

 यहाँ विजय के फोन पर मकान मालिक का फोन आया- ‘आयम वेटिंग फॉर यू गाइज फॉर ए लोंग टाइम! व्हेयर आर यू!’

विजय ने कहा- ‘वी हैव एण्टर्ड द स्ट्रीट एण्ड सर्चिंग योअर हाउस।’

इतना सुनते ही एक मकान के सैकण्ड फ्लोर की खिड़की से किसी की आवाज आई- ‘हे! लुक हीयर।’

हमने उस ओर देखा तो पाया कि कोई हमें अपनी ओर बुला रहा था। हम समझ गए कि यही मकान मालिक है। मैंने उसे हाथ हिलाते हुए देखकर राहत की सांस ली तथा सोचा कि अब यह हमें सर्विस अपार्टमेंट देने से मना नहीं करेगा।

इतना बुरा भी नहीं!

हम मकान का बाहरी दरवाजा खोलकर और दो मंजिल सीढ़ियां चढ़कर जब सर्विस अपार्टमेंट में पहुँचे तो वह सीढ़ियों पर ही खड़ा था। उसने हंसकर हमें वेलकम कहा और अपना नाम लॉरेंजो बताया। उसने हमारे हाथों से सामान ले लिया। हमने उससे मना किया किंतु वह नहीं माना। उसका यह एटीट्यूट देखकर मुझे और अधिक तसल्ली हो गई। पता नहीं उसे क्या कन्फ्यूजन हुआ था, आदमी तो बुरा नहीं था! या तो उसे विजय के द्वारा लिखी जा रही अंग्रेजी समझ में नहीं आ रही थी, या फिर वह हमारे पाँच-दस मिनट पहले पहुँचने की बात से परेशान था!

हे गाइज! यू डोण्ट टच!

उसने विजय, मधु और भानु को सर्विस अपार्टमेंट की सारी व्यवस्थाएं समझाई। पासपोर्ट स्कैन किए। सिटी टैक्स लिया और चाबियों के दो सैट दिए। इस दौरान मैं और पिताजी एक सोफे पर बैठे रहे। अंत में अपनी बात समाप्त करके जाते समय उसने विजय को डूज एण्ड डोण्ट्स की भी हिदायत दी। उसने विजय से हाथ मिलाया और फिर अपना हाथ मधु की तरफ बढ़ा दिया। मधु ने हंसकर दोनों हाथ जोड़ दिए। इस पर वह जोर से हंसा और बोला- ‘हे गाइज यू डोण्ट टच!’ और फिर मुझसे तथा पिताजी से हाथ मिलाकर चला गया।

भारत के नक्शे में नहीं है काश्मीर!

यह एक मध्ययुगीन वेनेजियन शैली का आलीशान बहुमंजिला घर है। हमारा फ्लैट दूसरी मंजिल पर है। फ्लैट काफी बड़ा है और इसमें दो कमरे, एक बड़ा हॉल, एक बहुत बड़ी किचन, दो लैट-बाथ, एक लॉबी है। फ्लैट में बढ़िया किस्म की सागवान के ऊँचे दरवाजे और खिड़कियां हैं जिन पर महंगे पर्दे पड़े हैं। हर कमरा महंगे फर्नीचर और इलैक्ट्रोनिक सामान से भरा हुआ है। हॉल के एक कोने में एक बड़ा सा पियानो भी रखा है।

पूरे मकान में इटैलियन मार्बल का फर्श है जिसकी पॉलिश इतनी चमकदार है कि शीशे को भी मात दे। घर के प्रत्येक कमरे में लकड़ी के लम्बे-लम्बे रैक लगे हुए हैं जिनमें जियोग्राफी की मोटी-मोटी किताबें और एटलस भरे पड़े हैं। कुछ फिक्शन भी है जो इटैलियन, स्पेनिश अंग्रेजी आदि भाषाओं में है। हमने अनुमान लगाया कि यह किसी भूगोल के प्रोफेसर का मकान है। संभवतः लॉरेंजो का पिता स्थानीय यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर होगा या रहा होगा क्योंकि लॉरेंज के व्यवहार से लगता नहीं कि वह अधिक पढ़ा-लिखा है।

मैंने एक एटलस खोल कर देखा, पहला पन्ना ही भारत का पॉलिटिकल मैप निकला। इसमें काश्मीर को चीन एवं पाकिस्तान में दिखा रखा था। यह देखकर मेरे मन में खिन्नता हुई। क्यों दुनिया भारत को समझ ही नहीं पाती! आखिर हमारी गलती क्या है! क्यों दुनिया भर के एटलसों में काश्मीर को पाकिस्तान में दिखाया जाता है?

संकरी गलियों का शहर

हम खाना खाकर सो गए। आज भी भानु और मधु फ्लारेंस से दोपहर का भोजन बनाकर लाईं थी। शाम 6.00 बजे हम चाय पीकर पैदल ही घूमने निकले। हमने जीवन में इतनी संकरी गलियों का शहर पहली बार देखा था। कुछ गलियां तो केवल तीन फुट चौड़ी हैं। कुछ गलियों के ऊपर मुश्किल से साढ़े-पाँच छः फुट की ऊंचाई पर छतें बनी हुई हैं।

थोड़ी-थोड़ी दूरी पर नहरें बनी हुई हैं जिसके पार जाने के लिए छोटी-छोटी पुलियाएं हैं। इटली के उत्तरी भाग में एण्ड्रियाटिक समुद्र के तट पर बसा हुआ वेनिस शहर संसार के अत्यंत पुराने शहरों में से एक है। इसकी कहानी आज से डेढ़ हजार साल पहले आरम्भ होती है।

पाँचवी शताब्दी ईस्वी में जब अतिला नामक हूण आक्रांता, इटली में मारकाट मचाता हुआ घूम रहा था तो उसके भय से हजारों लोग इटली के दक्षिणी भागों को छोड़कर उत्तर की तरफ भाग आए ताकि वे एल्प्स पर्वत के जंगलों में छिप सकें। मार्ग में उन्होंने बहुत से टापुओं को देखा जो एण्ड्रिायिटक समुद्र में दलदल के सूख जाने से उभर आए थे। बहुत से लोग इन्हीं टापुओं पर जाकर छिप गए। अतिला तो समय के साथ मारा गया किंतु बहुत से लोग यहीं बस गए। उन्होंने इन्हीं टापुओं पर अपने घर बना लिए।

कालांतर में ये टापू नहरों के माध्यम से जुड़कर कर एक बड़े शहर में बदल गए। आगे चलकर वेनिस एक बड़े बंदरगाह के रूप में विकसित हो गया तथा इस शहर के बड़े-बड़े मालवाहक जहाज, इटली के दक्षिण में स्थित राज्यों से लेकर उत्तरी अफ्रीकी तटों पर स्थित मिस्र आदि देशों तथा भारत जैसे दूरस्थ देशों से भी व्यापार करने लगे।

व्यापारिक जहाजों एवं शहर की रक्षा केे लिए वेनेशिया वासियों ने अपनी एक नौ-सेना भी खड़ी कर ली। यहाँ तक कि उन्होंने अपना एक गणराज्य स्थापित कर लिया। जब शहर में धन की आवक होने से विशाल भवनों का निर्माण होने लगा तो इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुँचने लगी। वेनिसया के व्यापारी अपनी धन-सम्पदा के लिए पूरे यूरोप में प्रसिद्ध हो गए।

यहाँ तक कि धन के प्रति अपने लालच के लिए भी। सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के अंग्रेज नाटककार शेक्सपीयर ने वेनिस के व्यापारियों को लेकर एक नाटक लिखा था- ‘मर्चेण्ट ऑफ दी वेनिस।’ यह नाटक संसार भर के देशों में खेला एवं पढ़ा जाता है। इसमें इटली के एक लालची व्यापारी के माध्यम से वेनेसिया वासियों की उन दिनों की प्रवृत्ति का बहुत बारीक चित्रण किया गया है।

उत्तरी इटली में स्थित वेनिस अथवा वेनेजिया शहर सातवीं-आठवीं शताब्दियों में उत्तरी यूरोप के बर्बर कबीलों के आक्रमणों से त्रस्त था। वे इस शहर के धनी व्यापारियों को लूटने के लिए शहर पर भयानक आक्रमण करते थे। इन बर्बर सैनिकों के हमलों से नगर-वासियों की सुरक्षा करने के लिए इस शहर में पतली गलियां बनाने की परम्परा आरम्भ हुई।

 मध्य काल में इस शहर पर ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इटली तथा जर्मनी की सेनाओं के हमले होते रहते थे। इन हमलावरों से बचने में इन पतली गलियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। ये पतली गलियां निश्चित रूप से किसी दूसरी-तीसरी गलियों में खुलती हुई अंत में किसी बड़े चौक में खुलती हैं जहाँ बड़ी संख्या में वेनेसिया के सैनिक मौजूद रहते थे।

यदि कोई शत्रु सैनिक किसी गली में घुसकर उसके पार निकले की कोशिश करता तो गली के दूसरे मुंह पर खड़े वेनेसिया के सिपाही उसकी गर्दन उड़ा देते थे।

इस कारण शत्रु सेना इन गलियों में घुसने का साहस ही नहीं कर पाती थी। इस प्रकार युद्ध-काल में पूरा शहर एक खुले दुर्ग में बदल जाता था। घुड़सवार योद्धा के लिए इस शहर में दो कदम भी चल पाना संभव नहीं था। कुछ गलियां तो इतनी नीची और इतनी संकरी हैं कि अकेला सिपाही अपने हथियार लेकर भी उसमें से नहीं गुजर सकता था। आज भी ये गलियां ज्यों की त्यों हैं।

गलियों में बनी हुई सड़कों पर कोलतार नहीं बिछा हुआ है अपितु पत्थरों के टुकड़े समतल करके बिछाए गए हैं। शहर की गलियों के मिलन बिंदुओं पर बनने वाले सैंकड़ों चौक में प्रायः रेस्टोरेंट एवं बाजार चलते हैं। खुले आकाश के नीचे 8-10 कुर्सियों से लेकर 100-150 कुर्सियों तक वाले ओपन एयर रेस्टोरेंट इस शहर को अलग ही स्वरूप प्रदान करते हैं।

इन कुसियों पर बैठकर, देश-विदेश से आए स्त्री-पुरुषों की की भीड़ दिन-रात सिगरेट एवं शराब पीती रहती है। पूरे शहर में ये दृश्य हर गली, हर नुक्कड़ एवं हर चौक में दिखाई देते हैं। वैसे यह पिज्जा और पास्ता का देश है किंतु ओपन एयर रेस्टोरेंट इसे वाइन और सिगरेट का शहर होने की घोषणा करते हुए दिखाई देते हैं।

पूरे देश में जगह-जगह पिज्जेरियो खुले हुए हैं जिनमें रखी हुई शीशे की अलमारियों से बकरों, भेड़ों एवं सूअरों के कटे हुए सिर झांकते रहते हैं। किसी कटे हुए सिर की आंखों में देखने का साहस कर सकें तो आप उन आंखों में उस दर्द की फोटो देख सकते हैं जिसकी अनुभूति इस सिर को अपने धड़ से अलग होते हुए हुई थी।

यह शहर 100 से अधिक टापुओं से बना है जिनके बीच में समुद्र का जल भरा हुआ है। समुद्री जल का प्रवाह नियंत्रित करके उसे सैंकड़ों नहरों में बदल दिया गया है। ये नहरें कहीं पर विशाल नदी के समान चौड़ी हैं तो कहीं पर पतले से नाले के समान संकरी। इन नहरों की चौड़ाई के अनुसार इनमें जहाज, फैरी, स्टीमर, बोट, शिकारे आदि चलते हैं जिनके माध्यम से शहर की यात्री-परिवहन एवं माल-ढुलाई सम्बन्धी आवश्यकताएं पूरी होती हैं।

एक टापू पर स्थित बाजार एवं मोहल्ले आदि तक जाने के लिए पतली गलियों का प्रयोग करना होता है तथा विभिन्न टापुओं को जोड़ने के लिए नहरों के ऊपर पुलियाएं बनी हुई हैं। इस शहर में सड़कें लगभग नहीं के बराबर हैं और जो भी हैं उनमें पैदल चलकर किसी नाव या फैरी तक पहुँचना होता है।

यात्री-परिवहन एवं माल ढुलाई की दृष्टि से यह शहर संसार भर में अनूठा है और अपनी तरह का अकेला देश है। शहर के जल-मल निकासी के लिए भी कुछ पतली नहरें बनाई गई हैं जो सीवर के पानी को दूर समुद्र में ले जाकर छोड़ती हैं।

खारेपन और झगड़ालूपन का शहर

विदेशों से आने वाले पर्यटकों के लिए शहर में कुली सेवा उपलब्ध है। ये कुली बहुत ही छोटे-छोटे हथ-ठेलों पर सामान लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते हैं। बसावट की विचित्रता के कारण आज वेनेजिया अथवा वेनिस संसार के सुंदरतम शहरों में से एक माना जाता है किंतु मुझे यह शहर बसावट के हिसाब से अलग लगते हुए भी सुंदर तो कतई नहीं लगा!

इससे अधिक सुंदर तो रोम और फ्लोरेंस हैं। जाने क्यों मुझे यह अनुभव होता रहा था कि रोम की हवाओं में उदासी भरी हुई है और फ्लोरेंस की हवाओं में जिंदगी की खुशियां भरी हुई हैं जबकि वेनिस की हवाओं में समुद्र के खारेपन के साथ-साथ शहरवासियों का झगड़ालूपन भी मौजूद है। शहरवासियों के झगड़ालूपन का अनुभव हमें अगले तीन दिनों तक लगातार हुआ।

गनेश रेस्टोरेंट

अभी हम एक नहर को पार करके थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि हमें एक पुराना सा ढाबा दिखाई दिया जिस पर ‘गनेश रेस्टोरेंट’ लिखा हुआ था। अवश्य ही कोई भारतीय यहाँ आकर बस गया था।

दीपा की ड्राइंग

एक चौक में तीन-चार साल के छोटे-छोटे बच्चे चॉकस्टिक से फर्श पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचकर ड्रॉइंग बना रहे थे तथा रोमन एल्फाबैट्स लिख रहे थे। इनके साथ इनके माता-पिता भी थे जो उनकी सुरक्षा का ध्यान रख रहे थे। एकाध जगह 3-4 बच्चे गेंद खेलते हुए भी दिखाई दिए। ये भी बहुत छोटे बच्चे थे और उनके माता-पिता उनके लिए बार-बार गेंद उठाकर ला रहे थे।

उन बच्चों को देखकर दीपा भी उनके साथ खेलने की जिद करने लगी। मैंने मना किया किंतु मधु ने वहाँ खेल रहे बच्चों को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि वे दीपा को भी अपने साथ बॉल खेलने देंगे और अपनी चॉक से ड्राइंग करने देंगे। मधु में संसार के किसी भी प्राणी से संवाद स्थापित कर लेने की अद्भुत क्षमता है।

वह गली के कुत्ते-बिल्लियों और गायों से लेकर संसार के किसी भी मनुष्य से बिना किसी संकोच के संवाद कर लेती है, फिर ये तो इटली के छोटे-छोटे बच्चे ही थे। न वे मधु की भाषा जानते थे और न मधु उन बच्चों की भाषा जानती थी किंतु वे कुछ क्षणों में मधु की हर बात मानने को तैयार थे।

संभवतः उन बच्चों के माता-पिता को भी यह देखकर अच्छा लग रहा था कि इण्डियन साड़ी पहने हुए कोई औरत उनके बच्चों को खिला रही थी और ड्राइंग बनाना सिखा रही थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पूरे उपक्रम में दीपा की तो लॉटरी लग गई थी। थोड़ी ही देर में वहाँ मौजूद सारी गेंदें और सारे चॉकस्टिक दीपा के लिए उपलब्ध थे!

चीनी दम्पत्ति के चिंतातुर चेहरे!

थोड़ी देर में हम एक बहुत चौड़ी नहर के किनारे पहुँचे। यह शायद शहर की मुख्य नहरों में से एक थी। इसे पार करने के लिए यहाँ कोई पुलिया नहीं थी। केवल मोटर बोट चल रही थीं। हम एक मोटरबोट स्टैण्ड पर खड़े होकर टिकट आदि खरीदने की व्यवस्था समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि एक चीनी युवक हमारे पास आकर हमसे पूछने लगा कि मोटरबोट का टिकट कहाँ से मिलेगा?

उसके साथ एक चीनी युवती भी थी। दोनों के चेहरे घबराए हुए से लग रहे थे। मैंने एक साइन बोर्ड की तरफ संकेत करते हुए कहा कि देखिए यहाँ कुछ निर्देश लिखे हुए हैं। मेरे द्वारा उस साइन बोर्ड की तरफ 7-8 बार संकेत करने और अपनी बात बार-बार दोहराने के बाद भी वह चीनी युवक समझ नहीं पाया कि मैं क्या कह रहा हूँ!

चीनी युवती इस दौरान बिल्कुल चुप खड़ी रही। इस पर मैंने विजय से कहा कि वह उन्हें समझाए। विजय ने उसके हाथ से सैलफोन लेकर उसे गूगल के माध्यम से समझाने का प्रयास किया किंतु वह विजय को अपना सैलफोन देने को तैयार नहीं हुआ। युवक और युवती बुरी तरह घबराए हुए थे। हमें उनकी बातों से लगा कि वे अपने साथियों से बिछड़ गए हैं और गूगल के अनुसार उनके साथी नहर के दूसरी तरफ कहीं पर हैं और यह चीनी दम्पत्ति उन तक न तो पैदल पहुँच पा रहा है और न मोटरबोट का टिकट खरीद पा रहा है।

 मोटर बोट के स्टैण्ड तक जाने के लिए जो गेट था, उस पर इलैक्ट्रोनिक लॉक लगा था और वह बिना टिकट लिए खोला नहीं जा सकता था। वह चीनी दम्पत्ति हमारी बातों से निराश होकर वहाँ से चला गया। हम वहीं खड़े रहकर उनकी हालत पर तरस खाते रहे। लगभग 5-7 मिनट बाद वह चीनी दम्पत्ति फिर से लौट आया और मुझसे पूछने लगा कि इस नहर को पार करने का क्या तरीका है?

मैंने दुबारा मोर्चा संभाला और उसे बताया कि यहाँ दो तरह के रेट लिखे हुए हैं, डेढ़ यूरो और साढ़े सात यूरो। यह संभव है कि यहाँ के स्थानीय नागरिकों के लिए डेढ़ यूरो टिकट लगता हो और विदेशी पर्यटकों से सात यूरो लिए जाते हों। इसलिए वह चाहे तो दो यूरो का सिक्का इस बोर्ड के पास लगी मशीन में डालकर देख ले! यदि दो यूरो में टिकट नहीं निकले तो पाँच यूरो और डाल दे।

 एक टिकट खरीदने के बाद दूसरे टिकट के लिए भी यही प्रक्रिया करे। बड़ी मुश्किल से मैं उसे यह बात समझाने में सफल हुआ। इस बार उन्होंने हमारी बात ज्यादा ध्यान से सुनी क्योंकि वे भी समझ गए थे कि हम भले ही स्थानीय नहीं हों किंतु केवल हम ही वहाँ थे जिन्हें अंग्रेजी बोलनी आती थी और वे केवल हमारी बात ही समझ सकते थे।

नो क्रिकेट!

हमें नहीं मालूम कि बाद में क्या हुआ क्योंकि हम उसके बाद वहाँ से वापस अपने सर्विस अपार्टमेंट को लौट लिए। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पूरे शहर में एक भी जगह लड़कों का झुण्ड क्रिकेट नहीं खेल रहा था। दो-चार स्थानों पर हमने लड़कों को वॉलीबॉल, फुटबॉल और बैडमिण्टन खेलते हुए देखा। संभवतः इटली के लोग स्वयं को अंग्रेजों से अधिक श्रेष्ठ समझते थे इसलिए वे अंग्रेजों का खेल खेलना भी अपनी तौहीन समझते थे।

यहाँ आकर ही यह बात समझ में आती है कि क्रिकेट वास्तव में अंग्रेजों तथा उनके गुलाम रहे देशों का खेल है। हालांकि इटली भी सैंकड़ों साल तक फ्रांस, विएना, ग्रीस तथा ऑस्ट्रिया देशों के राजाओं के झण्डों के नीचे रहा था किंतु वह गुलामों जैसी स्थिति नहीं थी अपितु उन्होंने अपनी स्वेच्छा से उन देशों के राजाओं को इटली का सम्राट मान लिया था क्योंकि उस काल में पूरा यूरोप एक देश की ही तरह व्यवहार करता था!

यूँ तो रोम ने सैंकड़ों साल तक यूरोप के कई देशों पर शासन किया था किंतु वेनेजिया पर नहीं। यह कभी गणराज्य तो कभी राज्य रहा और कुछ समय के लिए ऑस्ट्रिया के अधीन भी रहा किंतु रोम से काफी दूर ही रहा। यही कारण था कि वेनेजिया की संस्कृति और रोम की संस्कृति में काफी अंतर देखने को मिलता है। इन शहरों में रहने वाले लोगों के स्वभाव भी अलग हैं, बहुत अलग!

नो हाफ पैण्ट!

मार्ग में हमें एक चर्च दिखाई दिया। इसका भवन बता रहा था कि यह गोथिक शैली का एक मध्यकालीन चर्च है। हम लोग उत्सुकतावश चर्च में घुस गए। चर्च के प्रवेश द्वार पर विजिटर्स के लिए एक नोटिस लगा हुआ था जिसमें चित्रों के माध्यम से समझाया गया था कि इस चर्च में कोई भी व्यक्ति घुटनों से ऊपर के कपड़े पहनकर प्रवेश नहीं कर सकता। अकेला पुरुष एढ़ी तक लम्बी पैण्ट पहनकर ही आ सकता है।

विजिटर्स को चर्च के एक हिस्से तक ही प्रवेश करने की अनुमति थी। उसके आगे का क्षेत्र प्रार्थना करने वालों के लिए सुरक्षित था। चर्च के आखिरी छोर पर एक मंच बना हुआ था जिस पर माता मरियम की गोद में शिशु ईसा की प्रतिमा बनी है।

मूर्ति के नीचे खड़े पादरी भी विजिटर्स को साफ दिखाई देते हैं। इस चर्च के भीतर बहुत पुराने फ्रैस्को बने हुए हैं। समुद्र के किनारे स्थित होने के उपरांत भी फ्रैस्को बहुत अच्छी स्थिति में हैं। यह चर्च बाहर से जितना विशाल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही भव्य है।

हम कुछ देर तक एक चौक पर पड़ी बैंचों पर बैठे रहे। ये बेंचें एक पेड़ के नीचे रखी थीं। यहाँ से थोड़ी दूर खड़ा कोई व्यक्ति वायलिन बजा रहा था और पूरे परिवेश में अद्भुत शांति व्याप्त थी। इतनी शांति भरी जगहें भारत में तो ढूंढने से भी नहीं मिलती। ऐसा लगता है जैसे भारत का चप्पा-चप्पा आदमियों से भर गया है और सारा परिवेश मनुष्यों की चीख-चिल्लाहटों से भर गया है। जबकि रोम, फ्लोरेंस और वेनेजिया में शांति का साम्राज्य पसरा पड़ा है।

नाचती हुई लड़कियों का शहर

इस शहर के किसी भी चौक में युवतियों का कोई समूह नृत्य करता हुआ दिखाई दे जाता है। ये लड़कियां समाज के विभिन्न वर्गों से आती हैं तथा सार्वजनिक रूप से नृत्य करके पर्यटकों से रुपए मांगती हैं और थोड़ी ही देर में किसी पतली गली में गायब हो जाती हैं।

इसी प्रकार यहाँ के चौराहों, पुलियाओं एवं चौक आदि में कुछ लोग म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर पैसे मांगते हुए दिख जाते हैं। इसी प्रकार चित्रकार भी चित्र बनाने के लिए गलियों में बैठे रहते हैं। ये लोग भिखारी नहीं हैं, आर्टिस्ट हैं। वे मानव समाज के समक्ष अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं तथा समाज से उसके बदले में प्रतिदान चाहते हैं।

भारत में ऐसे कलाकारों के गांव के गांव हैं तथा सैंकड़ों जातियां हैं। भारत के ये कलाकार भी भिखारी नहीं हैं, वे भी घर, गली, गांव या मौहल्ले में अपनी कलाओं का प्रदर्शन करके समाज से प्रतिदान मांगते हैं।

हम गलती से उन्हें भिखारी समझ लेते हैं लेकिन भोपे, लंगा, मांगणियार, ढाढ़ी, राणीमंगा जैसी सैंकड़ों कलाकार जातियां इसी तरह कला का प्रदर्शन करके अपना गुजर बसर करती हैं। इटली में यह परम्परा अधिक मुखर और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

कला की प्रशंसा

एक गली में हमने कुछ चित्रकारों को मेज-कुर्सी लगाकर चित्र बनाते हुए देखा। हम लोग एक चित्रकार के पास रुक गए। वह चित्र बनाने में व्यस्त था फिर भी उसने अपने हाथ का ब्रुश रोककर हमसे हलो कहा। ऐसा लगता था जैसे वह हमें देखकर खुश है। मैंने एक चित्र का मूल्य पूछा।

यह चित्र ए-4 साइज के किसी कैनवास पर बना हुआ था तथा उसमें वाटरकलर का प्रयोग किया गया था। उसने कहा- फिफ्टी यूरो बिकॉज आई यूज वाटर कलर्स ओन्ली।’ सुनने में चार हजार रुपए भले ही अधिक लगते हैं किंतु वास्तविकता यह है कि उस चित्र को बनाने में 50 यूरो से कहीं अधिक की मेहनत और समय लगा होगा। इस चित्र को बनाने में व्यय हुई मानव प्रतिभा का मूल्य तो आंका ही नहीं जा सकता।

मैंने अंग्रेजी भाषा में उसके चित्रों की तारीफ की तो वह गदगद हो गया। उसकी आंखों से कृतज्ञता टपकती हुई साफ अनुभव की जा सकती थी। मुझे लगा कि वह अपनी कला की प्रशंसा सुनकर  इतना अधिक खुश था जितना कि चित्र खरीदने पर भी नहीं होता। जो कलाकार हैं, केवल वही इस बात को समझ सकते हैं कि कोई कलाकार अपनी कला की प्रशंसा सुनकर कितना खुश होता है।

यह ठीक वैसा ही अनुभव है जैसा कि यदि आप किसी के द्वारा बनाए गए पकौड़ों की तारीफ कर दें तो वह चाहता है कि अपने बनाए हुए सारे पकौड़े आपको खिला दे। जैसे उसका अपना पेट तो केवल तारीफ से भर जाता है!

गूगल बाबा!

एक जमाना था जब गांव में सबसे बूढ़े आदमी को सबसे अधिक ज्ञानी माना जाता था। हर बात उससे पूछी जाती थी और उम्मीद की जाती थी कि चूंकि इसने जीवन में बहुत अनुभव एकत्रित कर लिया है तो इसके पास सारे सवालों का जवाब है। आज उसे बूढ़े बाबा का स्थान गूगल ने ले लिया है। गूगल बाबा की कृपा से हम उन्हीं चौकों, गलियों, नहरों एवं पुलियाओं को पार करते हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में आ गए।

आज की दुनिया में गूगल पर लोगों की जासूसी करने का आरोप लगता है और कहा जाता है कि जितना आप स्वयं अपने बारे में नहीं जानते, उतना आपकी पत्नी आपके बारे में जानती है किंतु जितना आपकी पत्नी आपको जानती है उससे कहीं अधिक आपके बारे में गूगल जानता है। यहाँ तक कि गूगल तो आपकी पत्नी के बारे में भी जानता है, जो कि आप बिल्कुल भी नहीं जानते।

जासूसी के इस आरोप के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज गूगल मानव की सबसे अधिक सेवा कर रहा है, सचमुच बड़ी सेवा। यहाँ तक कि बहुत से लोगों की जान भी इसी गूगल के माध्यम से बच रही है, दुर्घटनाएं भी टल रही हैं और समय भी बच रहा है। यह अलग बात है कि कुछ तलाक भी इसी गूगल ने करवाए हैं। घर लौट कर हमने खाना खाया। मोबाइल फोन ही पर ही भारतीय टीवी चैनल देखे और दस बजते-बजते सो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में दूसरा दिन – 26 मई 2019 (12)

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वेनेजिया में दूसरा दिन

वेनेजिया में दूसरा दिन लगभग 90 साल की एक वृद्ध इटैलियन महिला से दीपा की हैलो के साथ आरम्भ हुआ जो एक विशाल बहुमंजिला भवन के किसी फ्लोर पर अकेली रहती थी।

हैलो दीपा!

सुबह पाँच बजे आंख खुल गई। मधु ने चाय बनाई। इस चाय के कारण ऐसा लगता ही नहीं है कि हम अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर हैं। दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर डायरी लिखने बैठ गया। आठ बजे तक लिखता रहा। जैसे ही मैंने लिखने का काम पूरा किया, दीपा मेरी मेज के पास आकर कहने लगी- ‘मुझे गोद में उठाकर उस खिड़की में दिखाओ!’

मैंने उसे गोद में उठा कर खिड़की तक उठा लिया। वह बाहर झांकने लगी तो पास वाले मकान की खिड़की से एक कमजोर और कांपती हुई आवाज आई- ‘हैलो डॉल!’

मैंने देखा कि पास वाले मकान की खिड़की से एक अत्यंत वृद्ध महिला झांक रही हैं, संभवतः 90 वर्ष के आसपास की आयु रही होगी उनकी।

मैंने दीपा से कहा- ‘गुड मॉर्निंग बोलो दादीजी को।’

जब दीपा ने गुड मॉर्निंग कहा तो वृद्ध महिला बहुत खुश हुईं। उन्होंने पूछा- ‘व्हाट इज योअर नेम?’

जब दीपा ने अपना नाम बताया तो वह समझ नहीं पाईं। शायद कुछ ऊँचा भी सुनती थीं। दीपा तो मेरी गोदी से उतर कर भाग गई। वृद्धा उस कुर्सी पर वहीं बैठी रहीं।

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हम इस बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर थे। इटली के वृद्ध लोगों में कितना अकेलापन है, यह हमने रोम में अनुभव कर लिया था किंतु यहाँ वेनेजिया में भी परिस्थितियाँ कोई ज्यादा अलग नहीं थीं। यहाँ भी लोग बच्चों की बजाय मशीनों पर अधिक निर्भर हैं। यह वृद्धा तो संभवतः कई-कई दिन तक किसी आदमी की शक्ल तक नहीं देख पाती होंगी! उनके लिए आज का दिन बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया होगा क्योंकि उन्होंने आज के दिन की शुरुआत एक छोटी बच्ची से हैलो और गुडमॉर्निंग के साथ की। सुबह का नाश्ता करके और दोपहर का भोजन साथ में लेकर हम लोग पौने ग्यारह बजे सर्विस अपार्टमेंट से निकल पाए। आज हम जिन गलियों से निकले, वे तो कल वाली गलियों से भी अधिक पतली थीं। आज हमारा कार्यक्रम मोटर बोट से पोण्टे दी रियाल्टो ब्रिज तक जाने का था जो हमारे घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। वहाँ से हमें लगभग 1 किलोमीटर दूर बेसिलिका दी सान मार्को होते हुए सान माकर्’स स्क्वैयर तक जाना था। इसलिए हम पोण्टे दी रियाल्टा ब्रिज तक मोटर बोट से जाकर शेष मार्ग पैदल तय करना चाहते थे ताकि बोटिंग भी हो जाए और हमें पैदल भी नहीं जाना पड़े। घर से निकलते ही विजय ने गूगल सर्च पर बोट पकड़ने के लिए टिकट खिड़की तक जाने का ऑप्शन डाला किंतु गूगल इस ऑप्शन को नहीं समझ पाया।

हम अंदाज से ग्राण्ड नहर के किनारे तक पहुँचे और वहाँ खड़े इटैलियन नागरिकों से टिकट खिड़की के बारे में पूछताछ की। एक इटैलियन स्त्री ने बताया कि टिकट खिड़की यहाँ से बहुत दूर है (फार अवे!) इस पॉइंट से केवल पासधारी यात्री चढ़ सकते हैं। यदि आप बॉक्स से टिकट खरीदते हैं तो डेढ़ यूरो लगेगा और यदि किसी अन्य टिकट खिड़की से खरीदते हैं तो साढ़े सात यूरो प्रति टिकट लगेगा।

अब हमारी समझ में आया कि गूगल टिकट खिड़की क्यों नहीं ढूंढ पा रहा था। उसे यहाँ बॉक्स कहते हैं तथा वह इस नहर के दूसरी तरफ था। अब यह भी समझ आया कि कल चीनी दम्पत्ति घबराया हुआ क्यों था, उसे टिकट खिड़की मिल नहीं रही होगी और वहाँ लगी वैण्डिंग मशीन से 7.5 यूरो में टिकट निकल रहा होगा जो कि हमारी ही तरह चीनी लोगों को भी बहुत महंगा लग रहा होगा। पिताजी ने उस स्त्री से पूछा कि डेढ़ यूरो वाला टिकट कौन लोग खरीद सकते हैं तो वह स्त्री पिताजी की बात समझ ही नहीं पाई।

हम वहीं एक चर्च की सीढ़ियों पर बैठ गए। वहाँ बहुत से कबूतर धरती पर ही चक्कर लगाते हुए घूम रहे थे। दीपा ने उन्हें बिस्किट और चावल के अरवे (भुने हुए चावल) खिलाकर उनसे दोस्ती कर ली। हम आगे की रणनीति पर विचार करने लगे। पिताजी इतनी दूर पैदल नहीं चल सकते थे तथा उस स्थान तक जाने का और कोई साधन नहीं था। अतः हमने पिताजी को सर्विस अपार्टमेंट छोड़ने का निर्णय लिया।

ये शहर दिन भर दारू पीता है!

सर्विस अपार्टमेंट से पोण्टे दी रियाल्टो पहुचंने में हमें एक घण्टा लग गया। यहाँ एक चौड़ी सी नहर थी जिस पर एक प्राचीन काल का पक्का पुल बना हुआ था।  वेनेजिया के इस क्षेत्र में पर्यटकों की भीड़ अधिक है। जिस बाजार के बीच से होकर हम यहाँ तक आए थे वह एक मध्यम चौड़ाई की अर्थात् लगभग 20 फुट चौड़ी सड़क है जिसके दोनों तरफ दुकानें और रेस्टोरेंट बने हुए हैं। बीच-बीच में चौक भी आते हैं जहाँ देश-विदेश से आए स्त्री-पुरुष बैठे हुए वाइन और सिगरेट पीते रहते हैं और अपने सामने रखी हुई प्लेटों में से मांस के टुकड़े उठाकर खाते रहते हैं। विजय ने एक स्थान पर टिप्पणी की- ‘बड़ा अजीब शहर है, दिन भर दारू पीता है!’

नृत्यरत रूपसियां

हमने वेनेजिया के एक छोटे से चौक पर कुछ युवतियों के एक समूह को सफेद, महंगे और अलंकृत परिधानों में नृत्य करते हुए देखा। इन लड़कियों ने अपने चेहरे सावधानी पूर्वक लीप-पोत रखे थे तथा अपने सिर पर ऐसे हैट लगा रखे थे जिनसे उनके चेहरे का लगभग एक तिहाई भाग छिपा हुआ था। संभवतः यह सब उपक्रम इसलिए किया गया था ताकि उन्हें कोई पहचाने नहीं! नृत्य स्थल पर एक टोपी रखी हुई थी जिसमें कोई-कोई पर्यटक यूरो डाल रहे थे। हम लोगों ने कुछ देर रुककर उनका नृत्य देखा और यह सोचकर आश्चर्य किया कि इटली में युवाओं का इस तरह पैसा कमाना बुरा नहीं माना जाता, अपितु कला माना जाता है!

माई स्कर्ट इज लाउडर दैन योअर वॉइस!

दुनिया का शायद ही कोई देश ऐसा होगा जहाँ के पर्यटक यहाँ वेनेजिया में मौजूद नहीं हों। इन पर्यटकों में पुरुषों की बजाय लड़कियों की संख्या अधिक है। लड़कियों के छोटे-बड़े ऐसे समूह भी दिखाई दे जाते हैं जिनके साथ पुरुष सदस्य नहीं हैं। अलग-अलग देशों से आई इन लड़कियों के चेहरे-मोहरे, रूप-रंग, चाल-ढाल तथा आदतें बिल्कुल अलग-अलग हैं किंतु एक बात में इन युवतियों में जबर्दस्त समानता है। ज्यादातर लड़कियों की स्कर्ट घुटनों से बहुत ऊपर है।

इन्हें देखकर मुझे कुछ साल पहले निर्भया काण्ड के बाद दिल्ली में एक नारी सशक्तीकरण संस्था द्वारा निकाले गए एक विरोध-जुलूस का स्मरण हो आया जिसमें कुछ तख्तियों पर लिखा हुआ था- ‘माई स्कर्ट इज लाउडर दैन योअर वॉइस!’ बहुत सी लड़कियों ने इस प्रकार की स्कर्ट्स पहनी हुई हैं जिनमें यत्नपूर्वक अधोवस्त्र प्रदर्शन का प्रबंध किया गया था। शायद यही कारण रहा हो या कोई और, मैं निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता कि  क्यों उस चर्च में घुटनों से ऊपर के स्कर्ट और पैण्ट पहनकर प्रवेश निषिद्ध किया गया है!

ओ अलबेली बीच बजरिया ना कर ऐसी बतियां!

यहाँ किसी भी गली में, किसी भी चौक में, किसी भी बाजार में तथा किसी भी पर्यटन स्थल पर युवा-जोड़े एक दूसरे का आलिंगन और स्नेह प्रदर्शन करते हुए दिखाई दे जाते हैं। शायद मेरी ही दृष्टि विकृत है जो मुझे यह सब दिखाई देता है किंतु इन्हें देखकर मुझे ‘मदर इण्डिया’ चलचित्र का वह गीत बार-बार याद आता है- ‘ओ अलबेली बीच बजरिया ना कर ऐसी बतियां, सुने सब लोगवा कटे नाक रे।’

जाने क्यों वह दुनिया ऐसी थी जिसमें उस फिल्म की नायिका की बातें सुनकर नायक की नाक कटने लगती थी। हो सकता है कि मैं गलत होऊं किंतु मुझे तो कम से कम यही लगता है कि वह पुरानी दुनिया ही अच्छी थी जिसमें बीच बाजार में बात करते हुए भी नाक कटती थी। उस दुनिया में तो बीच बाजार में ‘स्नेह-प्रदर्शन’ करने वाले कुत्ते-बिल्ली भी बुरे लगते थे। इटली की सड़कों पर कुत्ते-बिल्ली नहीं हैं किंतु उनकी कमी विदेशों से आए आलिंगनबद्ध पर्यटक कर देते हैं।

शरीर की दुःश्चिंताएं

अब तक डेढ़ बच चुका था और मेरे रक्त में शर्करा का स्तर कम होने लगा था। वैसे भी हम पौने ग्यारह बजे से लगातार चल ही रहे थे। हमने पोण्टे दी रियाल्टो ब्रिज पर बैठकर लड्डू और मठरी खाए जिन्हें मधु जोधपुर से बनाकर अपने साथ लाई थी। हिन्दुस्तानी आदमी कहीं भी चला जाए, लड्डू-मठरी के बिना उसका काम नहीं चलता। ये पिज्जा, पास्ता और बर्गर घर के बने इन लड्डू-मठरियों के सामने कुछ भी नहीं। लघुशंका की इच्छा भी होने लगी थी किंतु यह भारत नहीं था जहाँ सरकार और समाज, नगर निगम और सेठ आम व्यक्ति के लिए प्याऊ, पेशाबघर, शौचालय, सराय, टिन शेड आदि बनवाते हैं। यहाँ तो मनुष्य का जीवन ‘पैसा फैंको पेशाब करो!’ वाली उक्ति पर टिका हुआ है।

तुम हमारा समुद्र देखो!

लगभग सवा दो बजे हम सैन मार्क्’स स्क्वैयर पर पहुँचे। यहाँ हजारों आदमियों की भीड़ पहले से ही डटी हुई थी। इस चौक पर चारों ओर विशाल भवन बने हुए हैं। गगनचुम्बी सैन मार्को चर्च इनमें सबसे बहुत अनूठा, बहुत अलग और बहुत भव्य है। यह एक विशाल भवन है जिसके मुख्य द्वार के दोनों तरफ पर्यटकों की लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई थीं।

ये वे लोग थे जो टिकट लेकर घण्टों तक किसी भवन के बाहर प्रतीक्षा करने की हिम्मत और इच्छा रखते थे। पता नहीं क्यों ये लोग यह नहीं समझ पाते थे कि एक-दो चर्च भीतर से देख लिए तो काफी हैं! बाकी के चर्च उससे आखिर कितने अलग होंगे!

हमने बेसिलिका में भीतर नहीं जाने और बाहर के दृश्यों में ही समय व्यतीत करने का निर्णय लिया। यह समुद्र के किनारे पर बना हुआ एक विशाल चौक है। समुद्र में सैंकड़ों नावें और मोटरबोटें खड़ी थीं। चौक में सफेद रंग के सैंकड़ों समुद्री पक्षी उड़ान भर रहे थे। ऐसा लगता था मानो वे इंसान से कह रहे हों कि तुम हमारा समुद्र देखो और हम तुम्हारी धरती देखते हैं।

हाँ पेट भर गया!

कुछ देर बाद हमने बेसिलिका के बाईं ओर बने एक बरामदे में बैठकर दोपहर का खाना खाया। उसी समय एक भारतीय युवती हमारी बैंच पर आकर बैठ गई।

मैंने उससे पूछा- ‘कहाँ से आई हैं आप?’

लड़की ने जवाब दिया- ‘मध्य प्रदेश से।’

-‘आप भी खाना खाईए!’

 उसकी आंखों से साफ लगता था कि इटली में कुछ भारतीयों को रोटी-सब्जी खाते देखकर उसे आश्चर्य हो रहा था किंतु उसने केवल इतना ही कहा- ‘नहीं आप लोग खाइए। मैंने खाना खा लिया है।’

मैंने पूछा- ‘क्या खाया?’

लड़की ने हंसकर किंतु थोड़े से संकोच के साथ कहा- ‘पिज्जा!’

-‘क्या पिज्जा से पेट भर गया?’

मेरे इस प्रश्न पर उसने पहले से भी ज्यादा जोर से हंसकर कहा- ‘हाँ पेट भर गया!’

एक यूरो दे दीजिए!

लगभग तीन बजे हम वहाँ से लौट पड़े। रास्ते में हमने एक दुकान से केले खरीदे। दुकानदार भारत, बांगलादेश या पाकिस्तान का रहने वाला होगा। इसलिए हिन्दी जानता था। उसने छः केलों के लिए 2 यूरो मांगे। मैंने उससे केलों का वजन करने को कहा तो उसने कहा- ‘एक यूरो दे दीजिए।’

 आगे एक जनरल स्टोर से हमने दूध और सब्जियां खरीदीं। 650 ग्राम टमाटर, 900 मिलीलीटर दूध तथा 1500 ग्राम आलू के लिए हमें 5.75 यूरो अर्थात् 460 रुपए चुकाने पड़े। संभवतः यह वेनेजिया की सबसे सस्ती दुकान थी!

वेनेजिया में भी चलती है ट्राम!

सायं 6 बजे मैं, विजय एवं पिताजी रेल्वे स्टेशन की तरफ वाली नहर पर घूमने गए। इस समय यहाँ पर्यटकों की बहुत भीड़ थी। नहर के किनारे-किनारे बने प्लेटफॉर्म पर रखी कुर्सियों पर बैठकर लोग सिगरेट, शराब और मांस अर्थात् पदार्थ की तीनों अवस्थाओं गैस, द्रव और ठोस का सेवन कर रहे थे। हमें 28 मई को वापस भारत के लिए लौटना है।

एयरपोर्ट यहाँ से लगभग 13 किलोमीटर दूर है। इसलिए मैंने और विजय ने विचार किया कि हम यहाँ से एयरपोर्ट जाने का साधन पता कर लेते हैं। पिताजी वहीं नहर के किनारे बने पुराने चर्च की सीढ़ियों बैठ गए और हम गूगल की सहायता से टैक्सी स्टैण्ड की ओर बढ़े। लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद हम एक चौक में पहुँचे।

इस चौक से एक चौड़ी नहर तो 90 डिग्री पर मुड़ जाती है तथा यहीं पर एक और बहुत चौड़ी नहर आकर मिलती है। यहाँ बने एक पुलिया पर खड़े होकर तीनों तरफ की नहरों को देखा जा सकता है। चौड़ी नहर इतनी चौड़ी है कि वह समुद्र के मुहाने पर पहुँच जाने का अहसास करवाती है।

इसी चौक से बस सेवा, टैक्सी सेवा, मोटरबोट सेवा और ट्राम सेवा चलती हैं। इन चारों साधनों को एक साथ देखकर हम आश्चर्य चकित रह गए। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि वेनेजिया में ट्राम सेवा भी उपलब्ध है!

वेनिस शहर 100 से अधिक समुद्री टापुओं से मिलकर बना है जिनके बीच नहरों, पुलियाओं एवं नावों एवं स्टीमरों के माध्यम से आवागमन किया जाता है किंतु वेनिस शहर के कुछ टापू इतने बड़े हैं कि उनमें ट्राम सेवा आसानी से चलती है। हम शायद किसी बड़े टापू पर पहुँच गए।

यहाँ आकर हम रोम अथवा फ्लोरेंस में होने जैसा अनुभव कर रहे थे। यहाँ शहर खुली हवा में सांस ले रहा था। वेनेजिया की यह ट्राम सेवा केवल इसी द्वीप पर चलती है जो द्वीप के एक छोर से दूसरी छोर पर जाती है।

एयरपोर्ट  के लिए केवल बस सेवा और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। वेनेजिया की नगरपालिका ने सभी साधनों के भाड़े की दरें निश्चित कर रखी हैं। हमें यदि बस से जाना है तो प्रति व्यक्ति 8 यूरो देने होंगे और यदि टैक्सी से जाना है तो प्रति टैक्सी 40 यूरो देने होंगे।

 हम यदि यहाँ से बस पकड़ते तो भी हमें 5 सदस्यों के लिए 40 यूरो ही देने होते। बस में यात्रा करने पर केवल 13 किलोमीटर के लिए प्रति व्यक्ति 640 रुपए का भाड़ा बहुत अधिक है। हम चाहे जिस भी साधन से जाएं हमें भारतीय मुद्रा में 3200 रुपए व्यय करने होंगे। जबकि दिल्ली में हमें पाँच व्यक्तियों की टैक्सी के लिए लगभग 350 रुपए और बस के लिए लगभग 75 रुपए चुकाने पड़ते।

 इस चौक से टैक्सी सेवा 24 घण्टे मिलती है जबकि बस, बोट और ट्राम रात में बंद रहती हैं। यहाँ से पूछताछ करके हम पुनः उसी पुलिया से होते हुए स्टेशन के सामने लौट आए जहाँ चर्च की सीढ़ियों पर पिताजी बैठे थे। थोड़ी देर वहीं नहर के किनारे बैठकर हम लोग फिर से अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट लिए। इसी के साथ वेनेजिया में हमारा दूसरा दिन पूरा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में तीसरा दिन – 27 मई 2019 (13)

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वेनेजिया में तीसरा दिन

वेनेजिया में तीसरा दिन बरसात की भेंट चढ़ गया। दिन निकलने के साथ ही बरसात आरम्भ हो गई थी, इसलिए कहीं दूर आना-जान संभव नहीं था। इसलिए हमने शहर में ही एक छोटा सा चक्कर लगाने का निश्चय किया।

प्रातः 4 बजे आंख खुल गई। लगभग पूरी रात बरसात होती रही इसलिए सुबह तक ठण्ड काफी बढ़ गई थी। विजय की आंख भी मेरे साथ ही खुल गई थी। उसने चाय बनाई और मैं कल की यात्रा का विवरण लिखने बैठ गया। 8 बजे तक लिखता रहा। इस बीच दो कप चाय और पी ली। आज हमारा केवल एक ही जगह जाने का कार्यक्रम था।

विजय ने नेट पर पढ़ा था कि सोमवार को प्रातः 11 बजे एक नहर में नावों पर सब्जी मार्केट लगता है। यह विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। आज हमने वहीं जाने का निर्णय लिया। यह स्थान हमारे अपार्टमेंट से केवल 1 किलोमीटर दूर था। हम प्रातः 11.00 बजे सर्विस अपार्टमेंट से निकले। धीमी बूंदा-बादी अब भी हो रही थी। इसलिए पिताजी घर में ही रहे।

 हम लोग छतरियां और बरसातियां लेकर चले। अब तक हमें याद हो चला था कि यहाँ घर से बाहर निकलने से पहले छतरी या बरसाती लेनी चाहिए।

नावों का विशेष साप्ताहिक सब्जी-बाजार

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संकरी गलियों, पतली नहरों एवं उन पर बनी छोटी पुलियाओं से होते हुए हम लगभग 20 मिनट में उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ नावों में विशेष साप्ताहिक बाजार लगता है। हमें यह बाजार देखकर बहुत निराशा हुई। वहाँ केवल दो नावें थीं जिन पर दो-दो युवतियां सब्जी बेच रही थीं। उन पर सब्जियां बहुत कम थीं ज्यादातर तो फल एवं फूल थे। खरीददार भी एकाध ही मौजूद था। विदेशी खरीददार तो हम अकेले ही थे। सब्जी और फल ताजी तो थे किंतु उनके भाव वेजेनिया की अन्य नियमित दुकानों जैसे ही बहुत ऊँचे थे। फिर भी हमने कुछ सब्जियां और फल खरीदें ताकि वे कल रास्ते में काम आ सकें। जब मैंने कुछ फल छांटे तो नाव की मालकिन ने आकर मुझे टोका- ‘नो सैल्फ सर्विस। लीव इट।’ मैंने छांटे हुए फलों को फिर से टोकरी में रख दिया। उसने स्वयं फल और सब्जियां छांटकर हमें दीं। ऐसा लगता था जैसे वह इस बात को पसंद नहीं करती थी कि कोई हिन्दुस्तानी व्यक्ति उसकी सब्जियों को छुए! उसकी आंखों में गर्व के भाव को मैं स्पष्ट पढ़ सकता था।

महंगा म्यूजियम!

पास में ही एक चौक पर लियोनार्डो दा विंची के नाम से एक म्यूजियम है जिसमें लियोनार्डो द्वारा बनाए गए चित्रों में प्रदर्शित मशीनों के मॉडल बनाकर रखे गए हैं। एक टिकट 8 यूरो का है। इस छोटे से म्यूजियम के लिए यह टिकट बहुत महंगा है।

व्यापारियों की कुटिल वृत्ति

शेक्सपीयर के नाटक ‘ए मर्चेण्ट ऑफ वेनिस’ में वेनिस के व्यापारी की जो कुटिल वृत्ति दिखाई गई है, वह इटली के व्यापारियों में साफ दिखाई देती है। एयर पोर्ट पर …. रुपए का यूरो और बाहर बाजार में …. रुपए का यूरो! एयरपोर्ट पर पानी की बोतल 200 रुपए की, यह क्या है! 13 किलोमीटर की बस यात्रा के लिए 640 भारतीय रुपए, यह क्या है! पेशाब करने के लिए 160 रुपए, यह क्या है! हमारे चार दिन के अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि वेनिस के लोग अधिक कंजरवेटिव, घमण्डी और पैसे के भूखे लगते हैं।

अश्वेत भिखारी की गिड़गिड़ाहट

एक पुलिया पर अफ्रीकी या अमरीकी अश्वेत युवक भीख मांग रहा था। इसके जींस और टी-शर्ट भी ठीक दिख रहे थे और इसके पास रखा एयर बैग भी अच्छी किस्म का था। सिर पर टोपी से लेकर पैरों में जूते तक सभी कुछ तो ठीक लग रहा था!

मुझे उसका गिड़गिड़ाना बहुत ही कृत्रिम जान पड़ा। वह संभवतः इटेलियन भाषा में कुछ शब्द उच्चारित कर रहा था। इतना हट्टा-कट्टा नौजवान भीख मांगता हुआ इस शहर के वैभव से मैच नहीं करता है। वहाँ से गुजर रही इटैलियन महिलाओं ने उस युवक से इटैलियन भाषा में कुछ नाराजगी भरे शब्द भी कहे। उनकी नाराजगी उनकी मुखमुद्रा से व्यक्त हो रही थी! बूंदा-बांदी अब भी हो रही थी।

इसलिए पर्यटक अपने निवास स्थानों में ही दुबके पड़े थे। सारा शहर निर्जन सा दिखाई पड़ रहा था। गलियां सुनसान थीं और चौक में पड़ी कुर्सियों पर बैठकर वाइन, पिज्जा और सिगरेट का आनंद लेने वाले लोग गायब थे। हम भी अपने सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट लिए। वेनेजिया में तीसरा दिन लगभग इतना ही रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इटली में अंतिम दिन – 28 मई 2019 (14)

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इटली में अंतिम दिन

आज हमारा इटली में अंतिम दिन था। इस दिन की शुरुआत रास्ते के लिए खाना बनाने से आरम्भ हुई। इस दिन का दूसरा बड़ा काम कचरा फैंकने के लिए स्थान ढूंढना रहा।

कचरा फैंकने की मशक्कत

सुबह 4.30 बजे उठकर निकलने की तैयारियां कीं। मधु एवं भानु ने रात में ही पूड़ियां बना ली थीं। सब्जियां सुबह उठकर तैयार कीं। सारी तैयारियां हो जाने के बाद सुबह 6.47 बजे मैं और विजय कचरा फैंकने गए। रोम, फ्लोरेंस तथा वेनेजिया में तीनों ही सर्विस अपार्टमेंट्स के मालिकों ने हमें यह सख्त हिदायत दी थी कि अपार्टमेंट छोड़ने से पहले हम कचरा अवश्य ही बाहर फैंक दें।

हम जान गए थे कि यहाँ भारत की तरह नहीं है कि जहाँ चाहो कचरा फैंक दो। कचरे को कचरे के नियत स्थान पर ही फैंकना होता है। वेनेजिया में प्रातः 6.30 बजे एक सफाई कर्मचारी अपनी ट्रॉलियां लेकर आता है जो प्रातः 7.30 बजे तक उपलब्ध रहता है। हमने नहर के किनारे उसे कर्मचारी को ढूंढ लिया।

जब हमने उससे गारबेज-कंटेनर के बारे में पूछा तो उसने एक कौने में खड़ी ट्रॉली की ओर संकेत किया। उस कर्मचारी के कपड़े भारत के कलक्टरों से भी अच्छे लग रहे थे और उसकी आंखों में लगभग वैसा ही भाव था जैसा कल नाव में सब्जी बेचने वाली औरत की आंखों में देखने को मिला था! पता नहीं उसकी आंखों के अजीब से भाव को देखकर मुझे कुछ कठिनाई सी हो रही थी!

जब कचरा फैंककर लौटे तो सर्विस अपार्टमेंट का रास्ता भूल गए किंतु अधिक नहीं ढूंढना पड़ा। 7 बजकर 03 मिनट तक हम वापस अपार्टमेंट में लौट आए और 7 बजकर 06 मिनट पर हमने अपार्टमेंट छोड़ दिया।

13 किलोमीटर के 3200 रुपए

इस समय बरसात बंद थी। गूगल सर्च की सहायता से हम 7.23 पर टैक्सी स्टैण्ड पहुँच गए। यहाँ बहुत सी टैक्सियां खड़ी थीं। एक टैक्सी ने हमें 7.46 पर एयरपोर्ट के बाहर उतार दिया। केवल 13 किलोमीटर के लिए 3200 रुपए का भुगतान करते हुए हमें अच्छा नहीं लग रहा था किंतु और कोई उपाय भी तो नहीं था!

पीने का पानी नहीं!

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विजय ने भारत में ही फ्लाइट के जो टिकट बुक करवाए थे उनका बारकोड स्कैन करके एक वेंडिंग मशीन से हमें बोर्डिंग पास मिल गए। हमें भय था कि एयरपोर्ट पर बहुत भीड़ होगी किंतु यहाँ भीड़ नहीं के बराबर थी। इसका कारण संभवतः यह था कि यह एक स्थानीय एयरपोर्ट है जहाँ से केवल इटली के विभिन्न शहरों के लिए फ्लाइट्स मिलती है। हम यहाँ से रोम पहुँचकर ही दिल्ली के लिए इण्टरनेशनल फ्लाइट पकड़ सकते थे। हमने बोर्डिंग-पास प्रिण्ट करके नाश्ता किया, इतने में ही चैक-इन काउण्टर खुल गया। हमने अपना सामान इस काउंटर पर जमा करवाया। काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी ने हमें हिदायत दी कि हम किसी भी तरह का लिक्विड अपने हैण्डबैग में नहीं ले जाएं। इसलिए हमने पानी की सारी बोतलें चैक-इन से पहले खाली कर दीं। हमारा प्लेन 11.20 पर था। जब तक हम हैंगर के पास वाले दरवाजे के पास पहुँचे तब तक 9.30 ही बजे थे। कुछ देर बाद जब प्यास लगी तो हमने इधर-उधर पानी की तलाश की किंतु एयरपोर्ट के भीतर पीने का पानी उपलब्ध नहीं था। भारत के पालम इण्टरनेशनल एयरपोर्ट, मलेशिया के कुआलालम्पुर एयरपोर्ट और जकार्ता एयरपोर्ट के भीतर हम पीने का पानी अपनी बोतलों में भर चुके थे किंतु यहाँ यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

अंत में इटली में अंतिम दिन हमें 2.5 यूरो अर्थात् भारतीय मुद्रा में 200 रुपए की पानी की एक लीटर की बोतल खरीदनी पड़ी। रोम जाने वाला प्लेन 25 मिनट लेट हो गया। इसलिए 10 बजे की बजाय 12.25 पर रोम पहुँचा। हमारी अगली फ्लाइट 2.10 पर थी। यहाँ भी भीड़ बहुत कम थी। दिल्ली एयरपोर्ट जैसा बुरा हाल नहीं था।

संभवतः यहाँ से बहुत से पर्यटक सड़क मार्ग से यूरोप के दूसरे देशों को निकल जाते होंगे। हमें यहाँ सामान चैक-इन नहीं कराना था इसलिए हम समय पर ही प्लेन तक पहुँच गए। प्लेन में शाम 4 बजे (इटैलियन समय) हमें लंच मिला। इसमें पास्ता और बॉइल्ड राइस शािमल थे। पास्ता में से बदबू आ रही थी और राइस कच्चे थे। हममें से किसी से यह खाना नहीं खाया गया। इस खराब भोजन के लिए हमसे प्लेन के टिकट के साथ जाने कितना अधिक भुगतान लिया गया था!

हमने शाम आठ बजे (इटेलियन टाइम) घर से लाई गईं कल रात की पूड़ियां खाईं जो प्लेन के पास्ता और राइस से बहुत ज्यादा अच्छी थीं। 24 घण्टे पहले बनी पूड़ियां और 15 घण्टे पहले बनी सब्जियां अब तक खाने के योग्य थीं किंतु विमान में दिया गया गर्म खाना बदबू दे रहा था!

इटैलियन समय के अनुसार रात 11 बजे विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुँच गया। इस समय भारत की घड़ियों में रात्रि के ढाई बजे थे। भारत से रोम 5 हजार 950 किलोमीटर दूर है किंतु कुछ ही दिन पूर्व भारत पर पाकिस्तान की ओर से हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों के विरुद्ध एयर-ऑपरेशन किया था जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत की ओर से आने वाली सभी फ्लाइट्स पर रोक लगा दी थी। इस कारण हमारा विमान अंकारा होते हुए हिन्द महासागर, अरब सागर, अहमदाबाद, उदयपुर और जयपुर के ऊपर उड़ते हुए 7 हजार 400 किलोमीटर की दूरी पार करके दिल्ली पहुँचा था।

इस कारण साढ़े सात घण्टे की बजाय 9 घण्टे का समय लगा था। इमीग्रेशन पर चैक-आउट करने तथा लगेज-बेल्ट से अपना सामान प्राप्त करने में लगभग एक घण्टा लग गया। प्रातः 3.30 बजे हम एयरपोर्ट से बाहर आए। आजकल दिल्ली एयरपोर्ट पर टैक्सी पकड़ने के लिए लगभग आधा-पौन किलोमीटर चलना पड़ता है। यदि आप विमान से लेकर टैक्सी तक की बात करें तो यह सफर लगभग डेढ़-पौने दो किलोमीटर का हो जाता है।

अब भारतीय सिम ने काम करना आरम्भ कर दिया था। इसलिए विजय ने सैलफोन पर ऊबर की टैक्सी बुक की। हमें टैक्सी पकड़ने के लिए काफी दूर तक चलना पड़ा। टैक्सी का ड्राइवर एक हरियाणवी जवान था। उसने कोई प्रयास नहीं किया कि वह हमें देखे, उसे ढूंढने की सारी जिम्मेदारी हम पर ही थी। अंततः ड्राइवर हमें मिला, उसने हमें विलम्ब के लिए उलाहना दिया तथा टैक्सी का पिछला दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया।

मैंने उससे कहा- ‘सामान टैक्सी के भीतर जमाओ।’

ड्राइवर ने बहुत तेज आवाज में जवाब दिया- ‘ये मेरा काम नहीं है। अपने आप रखो सामान।’

मैंने कहा- ‘सामान तो टैक्सी ड्राइवर ही जमाता है, हम तो तुम्हें उठाकर दे सकते हैं।’

वह बोला- ‘मैं तेरा नौकर नहीं हूँ। गाड़ी का मालिक हूँ मैं!’

अजीब बदतमीज आदमी था। उसने तो बदतमीजी के मामले में रोम वाला टैक्सी ड्राइवर भी पीछे छोड़ दिया था। विजय ने नाराज होकर कहा- ‘हमें तेरी टैक्सी में नहीं जाना है, मैं बुकिंग कैंसिल कर रहा हूँ।’

वह बोला- ‘इसी में तुम सबकी भलाई है।’ वह जोर से दरवाजा बंद करके अपनी टैक्सी लेकर चला गया। आसपास खड़े ड्राइवर चुपचाप तमाशा देखते रहे। भारत में आते ही कितने कड़वे शब्दों से स्वागत हुआ था! विजय ने टैक्सी की बुकिंग कैंसिल करके ऊबर के एप पर ड्राइवर की शिकायत लॉज की तथा तत्काल दूसरी टैक्सी बुक की।

हमने दूसरी टैक्सी वाले को रास्ते में बताया कि किस प्रकार पहली टैक्सी वाले ने हमसे बदतमीजी की तो वह बोला- ‘अजी ये रोज का काम हो लिया। कोई मेव भाई होगा। उनकी बड़ी कम्पलेन आ रही है। आपसे तो कड़वा ही बोला है, ये तो मारपीट भी कर लें तो कोई बड़ी बात थोड़े ही है।’

हमने इस बदतमीजी का कारण पूछा तो वह बोला- ‘ये कोई ड्राइवर थोड़े ना हैं। इन्हें तो ये गाड़ी शाद्दी में मिली है, दहेज में। इब कोई रोजगार तो है ना। लड़की इसलिए मिल गई कि इनके बाप-दादों की ज्जमीनों के भाव हो गए करोड़ों में। लड़की के बाप ने दहेज में ये गाड्डी दे दी। इब के करेगा! टैक्सी में ई तो लगायगा!’

तो यह थी मेरे भारत महान् की महान् नंगी सच्चाई! अजीब सी बेरोजगारी है यहाँ, लोगों की जेबों में पैसा तो है किंतु बेरोजगारी और बदतमीजी भी प्रचुर मात्रा में है! लोग काम ढूंढते हैं किंतु काम के लिए आवश्यक कौशल प्राप्त नहीं करते! यहाँ तक कि ग्राहक से व्यवहार करने का सामान्य तरीका भी नहीं सीखते। जब टैक्सी घर के सामने जाकर रुकी तब तक पौ फटने में कुछ ही देर रह गई थी।

इस समय सवा चार बज रहे थे। घर पहुँचते ही सब सो गए। सुबह आंख खुली तो भारत की घड़ियों में सुबह के पौने सात बज रहे थे। इटली में तो इस समय रात के सवा तीन ही बज रहे होंगे किंतु शरीर की घड़ी संभवतः अपने देश की घड़ियों को पहचान गई थी।

सारा श्रेय मधु एवं भानु को!

यह विदेश यात्रा इसलिए संभव हो सकी थी क्योंकि हमें यात्रा के दौरान भोजन सम्बन्धी कोई कष्ट नहीं हुआ था। इस सफलता का सारा श्रेय मधु और भानु को जाता है। यदि हम पिज्जा और पास्ता के भरोसे इटली गए होते तो हमें यह यात्रा बीच में ही छोड़कर आनी पड़ती। हम पिज्जा और पास्ता तो खा सकते थे किंतु जिन दुकानों में भेड़, बकरी और सूअर के मांस पकते और बिकते थे, वहाँ से कुछ भी लेकर हम कैसे खा सकते थे! भोजन स्वयं बनाने के कारण हम यात्रा के व्यय को भी नियंत्रण में रख सके थे। 

हस्ती मिट रही है हमारी!

कुछ धूर्त किस्म के लोग शब्दों का आडम्बर खड़ा करके ऐसी मिथ्या और सारहीन बातें तैयार करते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता किंतु वे बातें उस देश के चालाक राजनीतिज्ञों द्वारा जनता में पवित्र मंत्रों की तरह फैलाई जाती हैं तथा कुछ ही दिनों में वे गलत बातें राष्ट्रीय अस्मिता और जातीय अभिमान की प्रतीक बनकर दैवीय उपलब्धि बन जाती हैं और देश की जनता आज्ञाकारिणी भेड़ों की तरह उन पवित्र मंत्रों को प्रतिदिन दोहराती है। ऐसा ही एक मंत्र है- ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा!’

भारत की आजादी से पहले डॉ. इकबाल ने लिखा था- ‘यूनान मिस्र रोम सब मिट गए जहाँ से, है बाकी अब तक नामओ निशाँ हमारा! कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहाँ हमारा!’

कितनी झूठी और मक्कारी भरी बात है यह! भारत की जनता इस गीत को गाते समय गर्व से अपना सीना फुला लेती है, हैरत होती है ऐसे लोगों को देखकर!

हम अपनी आंखों से देख आए हैं कि यूनान, रोम और मिस्र आज भी वहीं खड़े हैं, जहाँ वे थे। यदि संसार में सबसे ज्यादा कोई देश मिटा है तो वह भारत है जिसके 18 टुकड़े हो गए- 1. ईरान, 2. अफगानिस्तान, 3. पाकिस्तान, 4. भारत, 5. नेपाल, 6. भूटान, 7. तिब्बत, 8. बांगलादेश, 9. बर्मा, 10. थाइलैण्ड, 11. श्रीलंका, 12. इण्डोनेशिया, 13. मलेशिया, 14. ब्रुनेई, 15. मेडागास्कर, 16. वियतनाम, 17. कम्बोडिया और 18. मालदीव।

कुछ इतिहासकार तो इनकी संख्या 24 बताते हैं। इनमें से 7 टुकड़े तो अंग्रेजों ने ही भारत से तोड़कर अलग किए। ये देश भारत से टूट-टूट कर अलग हुए, कभी राजनीतिक कारणों से, कभी भौगोलिक कारणों से तो कभी सांस्कृतिक कारणों से।

ये देश भारत के हिस्से उस काल में थे जब पूरी दुनिया पाँच बड़ी सभ्यताओं में विभक्त थी- 1. रोमन साम्राज्य, 2. मिस्र साम्राज्य, 3. भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू राज्य, 4. चीन का हान साम्राज्य, 5. शेष दुनिया।

ऊँट भले ही सुईं की नोक में प्रवेश कर जाए!

इटली के शहरों में पर्यटकों की भारी भीड़ लगी रहने के कारण यहाँ के नागरिकों के जीवन में स्थाई व्यवधान उत्पन्न हो गया है। प्रत्येक वस्तु महंगी हो गई है। भीड़ के कारण नागरिकों का अपने घरों एवं गलियों से बाहर निकलना कठिन हो गया है। इसलिए बहुत से नागरिक अपने पुराने घरों को छोड़कर बाहरी कॉलोनियों में शिफ्ट हो गए हैं तथा कुछ नागरिक उन शहरों में चले गए हैं जहाँ पर्यटकों की आवाजाही नहीं होती।

 इटलीवासियों के देखकर समझ में आता है कि पर्यटन एवं पूंजीवाद एक सीमा तक ही किसी देश के लिए अनुकूल हो सकते हैं। बीमा पर जोर देना, अत्यधिक पर्यटन को बढ़ावा देना, करों में वृद्धि करना, सरकारी सेवाओं के शुल्क बढ़ाना, नागरिकों के जीवन में कानूनों तथा सरकारी नियमों का हस्तक्षेप बढ़ाना पूंजीवादी व्यवस्था के ‘साइड इफैक्ट्स’ हैं।

भारत इस समय इसी दिशा में बढ़ रहा है। गरीबी में जीना मानवता के प्रति अपराध है किंतु गरीब के लिए जिंदगी जीने के अवसर कम करना प्रकृति और ईश्वर दोनों के प्रति अपराध है। देश की अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें न तो किसी को गरीबी में जीना पड़े और न किसी गरीब को अपने जीवन से निराश होना पड़े।

मानव जीवन को सुख, आनंद, उमंग और उत्साह से भरने के लिए पैसा ही एकमात्र आवश्यकता नहीं है। सांस्कृतिक उदारता भी बहुत कम धन में, राष्ट्र के लोगों के जीवन को सुखी बना सकती है। महंगी शराब, महंगे पिज्जा और तरह-तरह के मांस एवं अण्डों के भोजन गरीबों को जीवन जीने की सुविधाओं से दूर करते हैं।

जबकि शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन, सादा कपड़े, कम धन में भी जीवन को सुखी बना सकते हैं। सामुदायिक सेवाओं में वृद्धि करने से आम आदमी कम धन में जीवन व्यतीत करने में सफल हो सकते हैं। एक बार टॉयलेट जाने के लिए 80 से 160 रुपए वसूलने वाले देश में कोई भी गरीब आदमी जीवित कैसे रह सकता है!

कम धन अर्जित करने के लिए झूठ, चोरी, मक्कारी, फरेब का सहारा नहीं लेना पड़ता और यह सब किए बिना अधिक धन कैसे अर्जित किया जा सकता है! एकाकी परिवारों को अपनी दैनंदिनी पर अधिक धन व्यय करना पड़ता है जबकि संयुक्त परिवार कम पैसों में जीवन जीने की सुविधा देते हैं। ईसा मसीह ने शायद यही सब बातें सोचकर कहा होगा कि ऊँट भले ही सुईं की नोक में प्रवेश कर जाए किंतु कोई अमीर व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता!

अंत में फ्लोरेंस के एक चर्च के पैनल में बने दृश्य का स्मरण करना चाहूंगा जिसमें एक धनी-सामंत का पुत्र ईसाई संत होकर भिक्षु का जीवन जीने की इच्छा व्यक्त करता है। वह भिखारी बन जाता है और जब उसकी मृत्यु होती है तो स्वर्ग से देवदूत उसे लेने के लिए आते हैं। इस संत को रोम के कैथोलिक समाज में ईसा मसीह जैसा ही आदर दिया जाता है।

भारत में भी महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी के आदर्श हमारे सामने हैं जहाँ ये राजकुमार भिक्षुओं का जीवन जिए और समाज को आडम्बर-रहित, विलासिता-रहित जीवन जीने के उपदेश देते रहे। भारतीय संस्कृति के महानायक राम और कृष्ण इसलिए कालजयी बन पाए क्योंकि एक ने 14 वर्ष तक वनों में निवास करके वनवासियों के लिए संघर्ष किया और दूसरे ने अपने जीवन का प्रारम्भिक हिस्सा गायों की सेवा करने के लिए ग्वाले के रूप में बिताया। सोने के पालनों में पलने वाले लोग किसी भी देश में, किसी भी संस्कृति में नायक नहीं बन सके!

ईसाई धर्म का मूल भी सादगी एवं आडम्बर रहित जीवन जीने में है किंतु इटली सहित यूरोप के कुछ देशों ने पूंजीवाद का विस्तार किया और साम्राज्यवाद को पूंजीवाद के औजार के रूप में प्रयुक्त किया। इस कारण सदियों से आधी दुनिया शोषण, अत्याचार और निर्धनता की शिकार रही है।

यदि यूरोपीय देश भारत से धन छीनकर नहीं ले गए होते तथा सादगी से रहे होते तो आज भारत में गरीबी नहीं होती और यूरोप-वासियों को अपने बेटे-पोतों से अलग-थलग एकाकी जीवन नहीं जीना पड़ता। भारत में अहिंसा, शाकाहार, सादगी, उच्च विचार, स्वदेशी आदि पर जोर दिए जाने का अर्थ पूंजीवाद से दूर जाना है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

सादगी और सरलता पर खड़ी है भारतीय संस्कृति!

भारतीय जीवन में सादगी कितनी गहराई से प्रतिष्ठित है, इसके ढेरों उदाहरण भारत के बड़े नेताओं के आचरण में देखी जा सकती है। मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, जॉर्ज फर्नाण्डीस आदि के जीवन भारतीय सादगी के महानतम् उदाहरण हैं।

मदनमोहन मालीवय कपड़े धोने से लेकर भोजन बनाने तक, अपना सारा काम स्वयं करते थे। लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू का दिया हुआ पुराना कोट पहन कर ताशकंद गए थे जिसका कॉलर फटा हुआ था। जॉर्ज फर्नाण्डीस अपने कपड़े स्वयं धोते थे और उन पर कभी इस्तरी नहीं करते थे। एक बार दिल्ली के एक बहुमंजिला इमारत में बम विस्फोट हुआ। उस फ्लैट में भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा रहते थे। उस समय अपराह्न के तीन बजे थे। 82 वर्ष के नंदा इसलिए जीवित बच गए क्योंकि वे स्नानघर में बैठे हुए कपड़े धो रहे थे!

आप चाय वापस ले जाइए!

पुराने नेताओं की सादगी आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन से नष्ट नहीं हुई है। इसका उदाहरण अरुण जेटली के जीवन में हुई एक घटना में देखा जा सकता है। जब वे भारत के वित्तमंत्री थे, तब उन्होंने किसी एयरपोर्ट पर चाय मंगवाई, जब उन्होंने उस चाय का दाम पूछा तो अरुण जेटली को उसके इतने अधिक दाम सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि-‘नहीं मैं इतनी महंगी चाय नहीं पी सकता, आप वापस ले जाइए!’

यदि आज हुआ होता वह ईसाई संत!

भारतीय सादगी के ठीक उलट, इटली में दो सौ रुपए लीटर के भाव से पानी तो खरीद कर पीना ही पड़ता है, लघुशंका से निवृत्त होने के लिए भी एक बार में एक व्यक्ति को अस्सी से एक सौ साठ रुपए तक देने पड़ते हैं। यदि रोम का वह राजकुमार जो ईसाई संत होकर भिखारी का जीवन जीता था, आज रोम में पैदा हुआ होता तो उसे पानी पीने और लघुशंका जाने की सुविधा तक उपलब्ध नहीं होती! हमने कैसी दुनिया का निर्माण किया है!

वी कान्ट डू, एज द रोमन्स डू!

पूरी दुनिया में एक कहावत कही जाती है- ‘व्हैन इन रोम, डू एज द रोमन्स डू!’ यह कहावत रोमन सभ्यता की उच्चता और उनके दंभ को प्रदर्शित करती है। संभवतः इस कहावत का निर्माण उस समय हुआ होगा जब यूरोपवासियों ने प्राचीन भारत और उसके निवासियों को नहीं देखा होगा। रोमन लोगों के इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा कि एक भारतीय, रोम में जाकर वैसा बर्ताव करे जैसा कि रोम के लोग करते हैं।

यह केवल दंभोक्ति प्रतीत होती है। रोम की बजाय भारतीयों के हृदय अधिक उदार हैं। रोम में बूढ़ी आबादी विशेषकर वृद्ध औरतें अधिक दिखाई देती हैं जो इस बात की गवाही देती हैं कि उन्हें गृहस्थी बसाने की अपेक्षा स्वेच्छाचारी और एकाकी जिंदगी अधिक पसंद है। ऐसा समाज संसार के लिए आदर्श कैसे हो सकता है जिसमें बच्चों की किलकारियों के लिए स्थान नहीं हो! यही कारण है कि आज इटली के मूल लोगों की जनसंख्या गिर रही है। वहाँ दूसरे देशों के लोग आकर बस रहे हैं।

हमारे अनुभव केवल हमारे हैं!

इस पुस्तक में लिखे गए अनुभव नितांत हमारे हैं। निश्चित रूप से अन्य पर्यटकों को हमसे बिल्कुल अलग अनुभव होते होंगे, अच्छे भी और बुरे भी! अतः यह तो नहीं कहा जा सकता कि पोप का देश बिल्कुल वैसा ही है, जैसा हमें दिखाई दिया किंतु जैसा हमें दिखाई दिया, वैसा पूरी ईमानदारी के साथ लिख दिया गया है, बिना किसी राग-द्वेष अथवा पूर्वाग्रह के!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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