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सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने सड़कों पर अशर्फियां लुटा दीं (4)

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सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक - www.bharatkaitihas.com
सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने सड़कों पर अशर्फियां लुटा दीं!

सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं था। तख्त पर बैठते समय उसके तीन भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया।

ई.1324 में जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बंगाल विजय के लिये गया तब वह शहजादे जूना खाँ को राजधानी में छोड़ गया ताकि सुल्तान की अनुपस्थिति में कोई अमीर बगावत करके दिल्ली पर अधिकार नहीं कर ले। अब शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया।

कुछ महीने बाद जब सुल्तान गयासुद्दीन लखनौती तथा तिरहुत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त दिल्ली लौटने लगा तो उसने अपने बड़े शहजादे जूना खाँ को आज्ञा भेजी कि राजधानी से बाहर एक महल बनाया जाये जिससे सुल्तान उसमें रात्रि व्यतीत करके दूसरे दिन समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश कर सके।

इस पर जूना खाँ ने मीर-इमारत अहमद अयाज नामक एक अमीर को लकड़ी का एक महल बनाने की आज्ञा दी। जब सुल्तान वापस आया तब शहजादे ने तुगलकाबाद में बड़े समारोह के साथ उसका स्वागत किया। तुगलकाबाद से तीन-चार मील दूर अफगानपुर में सुल्तान को प्रीतिभोज देने के लिए एक शामियाना लगवाया गया।

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जब भोजन समाप्त हो गया तब समस्त आमन्त्रित अतिथि शामियाने के बाहर निकल गये। केवल सुल्तान तथा उसका एक छोटा पुत्र महमूद खाँ, जिसमें सुल्तान की विशेष अनुरक्ति थी, शामियाने के भीतर रह गये।

इसी समय शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान से पूछा कि क्या जो हाथी बंगाल से लाये गये हैं, उनका संचालन किया जाये! सुल्तान इस प्रस्ताव से सहमत हो गया। जब हाथियों का संचालन हो रहा था तब अचानक शामियाना गिर पड़ा और सुल्तान तथा उसके अल्पवयस्क पुत्र महमूद खाँ की मृत्यु हो गई।

उसी रात को सुल्तान का शरीर तुगलकाबाद के मकबरे में दफन कर दिया गया। इब्नबतूता ने सुल्तान की मृत्यु का सारा दोष जूना खाँ पर डाला है। राजनीति वैसे भी किसी को सगा नहीं मानती किंतु चौदहवीं शताब्दी में भारत की राजनीति रक्त-रंजित षड़यन्त्रों से भरी हुई थी।

इस युग में कोई किसी का कुछ नहीं लगता था। राज्य सत्ता, स्त्री, सम्पत्ति तथा भूमि के लिये लोग अपने भाई, बहिन, पुत्र, पिता, पत्नी तक के प्राण ले लेते थे। जूना खाँ ने भी यही किया था। उसने राज्य, धन और अधिकार हड़पने के लिये अपने पिता तथा भाई के प्राण ले लिये थे।

आखिर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के पिता गयासुद्दीन ने भी इसी राज्य, धन और अधिकार पाने के लिये पूर्ववर्ती सुल्तान के प्राण हरे थे। सुल्तान की मृत्यु के तीन दिन बाद जूना खाँ, मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तथा चालीस दिन तक काले वस्त्र पहन कर अफगानपुरी में शोक मनाता रहा। जब मरहूम सुल्तान गयासुद्दीन के समस्त अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो गये तब जूना खाँ ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। मार्च 1325 में भव्य समारोह के साथ जूना खाँ का राज्याभिषेक हुआ।

वह मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसे अपने पिता से अत्यन्त संगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था। तत्कालीन लेखक मेहदी हुसैन के अनुसार इतना विशाल साम्राज्य तब तक किसी भी तुर्क सुल्तान को अपने पिता से नहीं मिला था। उसके पिता का राजकोष भी धन तथा रत्नों से परिपूर्ण था।

सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं था। तख्त पर बैठते समय उसके तीन भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। इस प्रकार उसे न बाह्य आक्रमणों का भय था और न आन्तरिक विद्रोह का। अगली कड़ी में देखिए- मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां लुटा दीं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

किसानों की आय बढ़ाने का सपना देखने वाला पहला मुस्लिम शासक (5)

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किसानों की आय - www.bharatkaitihas.com
किसानों की आय बढ़ाने का सपना देखने वाला पहला मुस्लिम शासक

भारतीय राजा अपने राज्य में किसानों की आय बढ़ाने के लिए नहरें, तालाब आदि बनवाया करते थे किंतु मुहम्मद बिन तुगलक पहला ऐसा मुस्लिम शासक था जिसने किसानों की आय बढ़ाने का सपना देखा। हालांकि उसके लिए किसान का मतलब मुस्लिम किसान से था न कि हिन्दू किसान से।

पिछली कड़ी में आपने देखा कि किस प्रकार दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के पुत्र जूना खाँ ने अपने पिता की हत्या कर दी और स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने मुस्लिम अमीरों एवं उलेमाओं को प्रसन्न करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद एवं पदवियां दीं तथा साधारण मुस्लिम प्रजा को खुश करने के लिए दिल्ली की सड़कों पर सोने चांदी के सिक्कों की बिखेर की।

अपने पद को मजबूत बनाने के लिए उसने मिस्र के खलीफा से अपने लिए सुल्तान पद की स्वीकृति प्राप्त की तथा निष्कंटक होकर भारत पर राज्य करने लगा। इसके बाद उसने सल्तनत को मजबूती देने का काम आरम्भ किया। अब देखिए आगे-

आज भारतीय इतिहास मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में जितना जानता है, वह जियाउद्दीन बरनी नामक एक लेखक के माध्यम से जानता है। वह मुहम्मद बिन तुगलक का समकालीन सुन्नी उलेमा था। 

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बरनी चाहता था कि सुल्तान भारत पर इस्लामिक पद्धति से शासन करे जिसका मूल कार्य भारत में इस्लाम का प्रसार करना हो किंतु मुहम्मद बिन तुगलक ने इस्लाम के प्रसार के लिए कोई कदम उठाया।

वह भारत पर अपनी इच्छा के अनुसार शासन करना चाहता था तथा शासन में उलेमाओं के हस्तक्षेप को पसंद नहीं करता था। यही कारण था कि मुहम्मद बिन तुगलक उलेमाओं से कोई राय नहीं लेता था तथा अपनी मर्जी से काम करता था।

जब से दिल्ली में मुस्लिम सल्तन की शुरुआत हुई थी, तब से उलेमा, मौलफी, मुफ्ती और काजी लोग ही सुल्तान को हर कार्य में मशविरा देते आए थे किंतु अब उनकी पूछ कम हो गई थी।

 इस कारण उस युग के उलेमा, मौलवी, मुफ्ती और काजी, सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से नाराज हो गए। जियाउद्दीन बरनी ने जहाँ भी अवसर मिला, मुहम्मद बिन तुगलक की कड़ी आलोचना की ।

एक तरफ तो मुसलमान लेखक उसकी आलोचना कर रहे थे तो दूसरी ओर कुछ हिन्दू इतिहासकारों ने भी मामले को अतिरंजित कर दिया। उदाहरण के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने गंगा-यमुना के दो-आबे में भूराजस्व करों में वृद्धि की।

सुल्तान समर्थक मुस्लिम लेखकों के अनुसार यह वृद्धि एक बटा बीस से लेकर एक बटा दस अर्थात् 5 से 10 प्रतिशत थी किंतु हिन्दू लेखकों ने इसे दस से बीस गुना बता दिया।

जबकि अंग्रेज लेखकों ने करों को पहले की तुलना में दो गुना किया जाना बताया है। यही कारण है कि भारतीय इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया।

मुहम्मद बिन तुगलक के पास साम्राज्य विस्तार की बड़ी-बड़ी योजनाएं थीं इसके लिए उसे धन की आवश्यकता थी। उस काल में जनता से कर-उगाही के तीन मुख्य साधन थे।

पहला प्रमुख साधन था कृषि उपजपर कर। दूसरा प्रमुख साधन था कुटीर उद्योगों के माध्यम से उत्पादित होने वाले उत्पादों के नगर या मण्डी में बिकने के लिए आने पर ली जाने वाली चुंगी।

अतः मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि की उपज बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाए ताकि किसानों के खेतों में उत्पन्न होने वाले अनाज में से कर के रूप में लिया जाने वाले हिस्से में बढ़ोतरी हो सके और उस अनाज का उपयोग सेनाओं के रख-रखाव के लिए हो सके।

ई.1193 में दिल्ली में मुस्लिम शासन की स्थापना होने के बाद से किसानों की हालत खराब हो गई थी। बहुत से किसान मुस्लिम सैनिकों के अत्याचारों से डरकर खेती-बाड़ी करना छोड़ देते थे और जंगलों में भाग जाते थे जिससे धरती बंजर हो जाती थी और उत्पादन गिर जाता था।

उस काल का किसान सूखे और अकाल से निबटने में बिल्कुल भी सक्षम नहीं था। इसका सीधा असर सरकार को मिलने वाले कर पर पड़ता था।

यह सही है कि उस काल में किसानी का काम प्रायः हिन्दू कर रहे थे क्योंकि मुस्लिम नौजवान शासन और सेना में भर लिए जाते थे और उनकी आय किसानों की अपेक्षा अधिक थी।

कुछ मुसलमान खेती भी करने लगे थे किंतु उनसे हिन्दुओं की अपेक्षा कम कर लिया जाता था।

मुहम्मद ने अनुभव किया कि किसानों को खेती करने का सही तरीका सिखाया जाना आवश्यक था। इसके लिए उसने अलग से कृषि विभाग की स्थापना की। उस विभाग का नाम दीवाने कोही था।

इस कार्य के लिये साठ वर्ग मील का एक भू-भाग चुनकर उसमें विभिन्न प्रकार की फसलें बोई गईं। ताकि किसानों को बताया जा सके कि अच्छी खेती किस प्रकार की जा सकती है तथा अधिक उत्पादन किस प्रकार लिया जा सकता है!

सुल्तान की ओर से कृषि विभाग अर्थात् दीवाने कोही पर तीन वर्ष में 70 लाख टका (रुपया) व्यय किया गया किंतु सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता तथा समय की कमी के कारण यह योजना असफल रही और बंद कर दी गई।

मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में कुछ नहरों का निर्माण करवाया ताकि यमुना का जल किसानों के खेतों तक पहुंचाया जा सके।

नहरों के निर्माण में काफी धन व्यय हो गया और उसके अनुपात में सुल्तान की आय में वृद्धि नहीं हुई। इनमें से कुछ नहरें उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भी मौजूद थीं।

अंग्रेजों ने दिल्ली के आसपास की नहरों की पैमाइश करवाई थी तथा कुछ नहरों की मरम्मत भी करवाई थी। ई.1801 में अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट जेम्स टॉड को दिल्ली के पास एक पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम दिया गया था तथा उसने ये नहरें देखी थीं।

किसानों की आय बढ़ाने सम्बन्धी योजनाओं की असफलता के लिए उलेमाओं और मौलवियों ने सुल्तान को पागल कहना आरभ कर दिया।

जबकि मुहम्मद बिन तुगलक भारत में पहला मुस्लिम शासक था जिसने देश में सबसे पहले कृषि विभाग की स्थापना करके किसानों की आय बढ़ाने का सपना देखा था। अगली कड़ी में देखिए- सुल्तान द्वारा की गई कर-वृद्धि के कारण गंगा-यमुना क्षेत्र के किसान खेती छोड़कर जंगलों में भाग गए!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गंगा-यमुना क्षेत्र के किसान जंगलों में भाग गए (6)

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गंगा-यमुना क्षेत्र - www.bharatkaitihas.com
गंगा-यमुना क्षेत्र के किसान जंगलों में भाग गए

तख्त पर बैठने के कुछ दिन बाद सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने गंगा-यमुना क्षेत्र के दोआब क्षेत्र में भू-राजस्व करों में वृद्धि की। किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त ‘घरी’ अर्थात गृहकर तथा ‘चरही’ अर्थात् चरागाह कर भी लगाया गया।

तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस से बीस गुना था। हालांकि यह बात बिल्कुल भी समझ में नहीं आती। मुस्लिम सुल्तान पहले से ही किसानों से आधी उपज कर के रूप में लिया करते थे, अतः उसका दस या बीस गुना कैसे लिया जा सकता है?

अंग्रेजों ने लिखा है कि किसानों पर कर पहले से दो गुने कर दिए गए थे। यह बात भी समझ में नहीं आती। यदि किसानों से उनकी पूरी फसल छीन ली जाती थी तो किसान जीवित कैसे बच सकते थे!

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कुछ मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार भू-राजस्व करों में वृद्धि एक बटा दस या एक बटा बीस कर ली गई थी। यह बात भी समझ में नहीं आती क्योंकि यदि कर में 5 प्रतिशत या 20 प्रतिशत की वृद्धि की गई होती तो किसान अपने घरों को छोड़कर नहीं भागते तथा उतने बड़े स्तर पर विद्रोह नहीं हुआ होता, जितने बड़े स्तर पर हुआ था।

अतः केवल इतना ही कहा जा सकता है कि किसानों पर कर पहले की अपेक्षा बढ़ा दिए गए थे। पहले से ही विपन्नता भोग रहे किसानों को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ। दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों दो-आब के क्षेत्र में भयानक अकाल पड़ गया और खेतों में उपज बहुत कम हुई।

जब सुल्तान के सैनिकों ने किसानों से कर-वसूलने में कठोरता की तो चारों ओर विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। शाही सेनाओं ने विद्रोहियों को कठोर दण्ड दिये। इस पर गंगा-यमुना क्षेत्र के किसान खेती-बाड़ी छोड़कर जंगलों में भाग गये।

खेत वीरान हो गये और गांवों में सन्नाटा छा गया। शाही सेना ने लोगों को जंगलों से पकड़कर उन्हें कठोर यातनाएं दीं तथा उन्हें मजबूर किया कि वे खेतों को फिर से बोएं।

इन यातनाओं से गंगा-यमुना क्षेत्र में बहुत से किसान मर गए। जब ये बातें सुल्तान तक पहुंचीं तो सुल्तान ने प्रजा की सहायता के लिए कुछ व्यवस्थाएँ करवाईं परन्तु तब तक प्रजा का सर्वनाश हो चुका था।

इस कारण किसान, सुल्तान की उदारता से कोई लाभ नहीं उठा सके।

इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा गंगा-यमुना के दो-आब क्षेत्र में की गई कर वृद्धि के अलग-अलग कारण बताये हैं-

सोलहवीं शताब्दी के अकबर-कालीन कट्टर-मुस्लिम उलेमा बदायूनीं का कहना है कि यह अतिरिक्त कर दो-आबे की विद्रोही प्रजा को दण्ड देने तथा उस पर नियन्त्रण रखने के लिए लगाया गया था। सर हेग ने भी इस मत का अनुमोदन किया है।

अंग्रेज इतिहासकार गार्डनर ब्राउन का कहना है कि दोआब साम्राज्य का सबसे अधिक धनी तथा समृद्धिशाली भाग था। इसलिये इस भाग से साधारण दर से अधिक कर वसूला जा सकता था।

अधिकांश मुस्लिम लेखकों का मानना है कि दोआब का कर, शासन-प्रबन्ध को सुधारने के विचार से बढ़ाया गया था। जबकि आधुनिक इतिहासकारों का कहना है कि सुल्तान ने अपने रिक्त-कोष की पूर्ति के लिए दोआब पर अतिरिक्त कर लगाया था।

इस प्रकार गंगा-यमुना के दोआबे में भू-राजस्व करों में वृद्धि की यह योजना सफल नहीं हुई। इस योजना के असफल हो जाने के कई कारण थे।

पहला कारण यह था कि प्रजा बढ़े हुए करों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि किसानों की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी तथा कोई भी व्यक्ति अधिक कर देना पसन्द नहीं करता।

दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों दोआब में अकाल पड़ गया था, जनता बढ़े हुए कर को चुका ही नहीं सकती थी।

तीसरा कारण यह था कि सरकारी कर्मचारी और सिपाही किसानों की फसल का आकलन करने में बेईमानी करते थे तथा किसान की उपज का अधिकांश भाग छीन लेते थे।

सरकारी कर्मचारी अनाज की दो ढेरियां बनाते थे, एक बहुत बड़ी और एक छोटी। वे इन दोनों ढेरियों को बराबर का बताते तथा बड़ी वाली ढेरी हड़प लेते।

तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने मुहम्मद बिन तुगलक की कर नीति की कटु आलोचना की है। जबकि यह तो कर्मचारियों की बेईमानी का मामला था।

कुछ इतिहासकारों ने जियाउद्दीन बरनी की आलोचना पर आक्षेप लगाये हैं कि बरनी उलेमा वर्ग का था जिसके साथ सुल्तान की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी। इसलिये सुल्तान की निन्दा करना बरनी के लिए स्वाभाविक ही था।

बरनी स्वयं भी दो-आबे के बरान क्षेत्र का रहने वाला था और बरान के लोगों को भी को भी दोआब के कर का शिकार बनना पड़ा था। इसलिये बरनी में सुल्तान के विरुद्ध कटुता का होना स्वाभाविक था।

बरनी द्वारा की गई कटु आलोचना बिल्कुल निर्मूल भी नहीं कही जा सकती। अकाल के समय की गई करों में वृद्धि को किसी भी प्रकार उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

अंग्रेज लेखक गार्डन ब्राउन ने मुहम्मद बिन तुगलक को बिल्कुल निर्दाेष सिद्ध करने का प्रयत्न किया है और प्रजा की हालत खराब होने का सारा दोष अकाल पर डाला है किंतु गार्डन ब्राउन का तर्क कई कारणों से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यदि गार्डन ब्राउन की बात सही है कि किसानों की हालत अकाल के कारण खराब हुई थी, तो सुल्तान को, अकाल आरम्भ होते ही अतिरिक्त कर हटा देने चाहिए थे और प्रजा की सहायता करनी चाहिए थी।

सुल्तान को शाही कर्मचारियों पर भी पूरा नियन्त्रण रखना चाहिए था।

जबकि सुल्तान ने यह सब बहुत विलम्ब से किया। इसलिये सुल्तान को उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता। 

वास्तविकता यह है कि सुल्तान को अपनी विशाल सेनाओं के वेतन के लिए अपार धन की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति किसी न किसी को लूट कर ही की जा सकती थी।

चाहे वह भारत के हिन्दू राजाओं को लूटे या फिर अपने राज्य में रह रही हिन्दू प्रजा को! और सुल्तान ने यही किया।

अगली कड़ी में देखिए- मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली के कुत्ते-बिल्लियों और भिखारियों को पकड़कर दौलताबाद ले गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजधानी दिल्ली से दौलताबाद चले गए कुत्ते-बिल्ली और भिखारी (7)

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राजधानी दिल्ली से दौलताबाद चले गए कुत्ते-बिल्ली और भिखारी

जब मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित की तब वह दिल्ली के कुत्ते-बिल्ली और भिखारी भी अपने साथ ले गया।

दिल्ली सल्तनत की स्थापना ई.1193 में मुहम्मद गौरी के जीवनकाल में ही हो गई थी। तब से लेकर ई.1325 में मुहम्मद बिन तुगलक के दिल्ली का सुल्तान बनने तक की 132 साल की दीर्घ अवधि में मुस्लिम शासकों ने भारत के बहुत बड़े भू-भाग को अपने अधीन कर लिया था।

उस काल में न तो संचार के साधन विकसित हुए और न परिवहन के। अतः इतने विशाल राज्य पर नियंत्रण रख पाना अत्यंत कठिन कार्य था। जबकि पुराने हिन्दू राजाओं के वंशज अब भी अपने पुराने खोए हुए राज्यों को प्राप्त करने के लिए स्थान-स्थान पर मुसलमानों से संघर्ष कर रहे थे।

दिल्ली सल्तनत की राजधानी दिल्ली थी जो कि सल्तनत के केन्द्र में न होकर उत्तर भारत में स्थित थी। इसलिए मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी सल्तनत के केन्द्र में नई राजधानी स्थापित करने का निर्णय लिया।

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उसकी दृष्टि देवगिरि पर गई जो किसी समय हिन्दू राजाओं का विख्यात राज्य हुआ करता था तथा खिलजयिों ने उसे मुस्लिम सल्तनत में शामिल किया था। यहाँ से सल्तनत के विभिन्न भागों पर यथोचित नियन्त्रण रखा जा सकता था।

यद्यपि दक्षिण भारत के बहुत से राज्यों को दिल्ली के सुल्तानों ने विजय कर लिया था परन्तु वहाँ उनकी सत्ता स्थायी रूप से नहीं रह पाती थी। इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक देवगिरि में अपनी राजधानी बनाकर वहाँ भी अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना सकता था।

याहया ने लिखा है कि दोआब में कर-वृद्धि तथा अकाल के कारण दिल्ली तथा उसके आसपास के क्षेत्र में बड़ा असन्तोष तथा अशान्ति फैल गई। इसलिये यहाँ की हिन्दू जनता को दण्ड देने के लिए सुल्तान ने समस्त दिल्ली वासियों को देवगिरि जाने की आज्ञा दी।

विदेशी यात्री इब्नबतूता के अनुसार कुछ लोग सुल्तान की नीति से असन्तुष्ट थे। इस कारण वे कागजों पर गालियाँ लिख कर और उन्हें तीरों में बाँध कर रात्रि के समय सुल्तान के महल में फेंका करते थे।

चूंकि तीर फेंकने वालों का पता लगाना कठिन था इसलिये सम्पूर्ण दिल्ली निवासियों को उन्मूलित करने के लिए सुल्तान ने राजधानी के परिवर्तन करने की योजना बनाई।

जियाउद्दीन बरनी के अनुसार सुल्तान ने मध्यम श्रेणी तथा उच्च-वर्ग के लोगों का विनाश करने के लिए राजधानी परिवर्तन की योजना तैयार की थी। कुछ विद्वानों की धारणा है कि पश्चिम की ओर से होने वाले विशाल मंगोल आक्रमणों से अपनी तथा अपनी राजधानी की सुरक्षा करने के लिए सुल्तान ने देवगिरि को राजधानी बनाने की योजना बनाई।

याहया, इब्नबतूता तथा बरनी द्वारा बताये गये ये समस्त मत निराधार हैं। मंगोलों के आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित बनाने के लिये उसे दूर ले जाने का तर्क भी अमान्य है क्योंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए ही अलाउद्दीन खिलजी तथा बलबन अपने राज्य की सीमा की सुरक्षा करने में सफल सिद्ध हुए थे।

अतः निश्चित रूप से केवल इतना ही कहा जा सकता है कि सल्तनत पर नियंत्रण स्थापित करने तथा दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ़ करने के लिए सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन की योजना बनाई थी। मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के प्रत्येक नागरिक को देवगिरि जाने के आदेश दिए तथा देवगिरि का नया नाम दौलताबाद रखा। 

कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि सल्तनत के प्रबन्धन के लिए सुल्तान ने दो राजधानियाँ रखने का निश्चय किया। उत्तरी साम्राज्य की राजधानी दिल्ली और दक्षिणी भाग की राजधानी देवगिरि होनी थी।

देवगिरि के महत्व को बढ़ाने के लिए सुल्तान ने तुर्की-राजवंश के सदस्यों, बड़े-बड़े अमीरों, विद्वानों, सूफी संतों आदि को दिल्ली से देवगिरि ले जाकर बसाने का निश्चय किया। इन लोगों के बसने पर ही देवगिरि मुस्लिम सभ्यता का प्रसार केन्द्र बन सकती थी।

सुल्तान का विचार था कि दक्षिण भारत में मुस्लिम जनसंख्या के बढ़ने पर ही दक्षिण भारत पर पूर्ण सत्ता स्थापित रह सकती थी। अतः सुल्तान ने अपनी माता मखदूम जहाँ को देवगिरि भेज दिया। सुल्तान की माता के साथ दरबार के अमीरों, विद्वानों, घोड़ों, हाथियों, राजकीय भण्डारों आदि को भी भेजा गया। इन लोगों की सुविधा के लिए सुल्तान ने अनेक प्रकार के प्रबन्ध किए।

दिल्ली से दौलताबाद जाने वाली सड़क की मरम्मत कराई गई और उसके किनारे आवश्यक वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था की गई। लोगों के लिए सवारियों का भी प्रबन्ध किया गया।

यात्रियों को कई प्रकार की सुविधायें दी गईं। दौलताबाद में भव्य भवनों का निर्माण कराया गया और समस्त प्रकार की सुविधाओं को देने का प्रयत्न किया गया। सुल्तान के दुर्भाग्य से जो लोग दिल्ली से दौलताबाद गए, वे इस परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्हें दिल्ली की यादें तंग किया करती थीं। इस कारण उन्हें यह स्थानान्तरण दण्ड के समान प्रतीत हुआ और वे सुल्तान की निंदा करने लगे।

जब सुल्तान को लोगों के असन्तोष की जानकारी हुई तब उसने असन्तुष्ट लोगों को फिर दिल्ली लौटने की आज्ञा दे दी। बरनी के अनुसार इनमें से बहुत कम लोग वापस दिल्ली जीवित लौट सके।

इस योजना को कार्यान्वित करने में सुल्तान को बड़ा धन व्यय करना पड़ा। जिससे राजकोष को धक्का पहुँचा। प्रजा में बड़ा असन्तोष फैला जिससे सुल्तान की लोकप्रियता को बड़ा धक्का लगा और उसे अपना पुराना गौरव नहीं मिल सका।

दिल्ली से दौलताबाद जाने तथा वापस दिल्ली आने में अनेक लोगों को अपने प्राण खो देने पड़े तथा सहस्रों परिवारों के आय के साधन एवं कमाई समाप्त हो गई। दक्षिण भारत में चले जाने के बाद सुल्तान को अपनी पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर नियंत्रण रख पाना कठिन हो गया।

यद्यपि दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग तथा वहाँ के राजकोष के परिपूर्ण हो जाने से आरम्भ में दक्षिण के विद्रोहियों का दमन करने में बड़ी सुविधा हुई परन्तु अन्त में जब दक्षिण में विद्रोहों का विस्फोट हुआ, तब दुर्ग तथा कोष का यही बल साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ क्योंकि इसका प्रयोग सुल्तान के विरुद्ध होने लगा।

मुहम्मद बिन तुगलक के इस कार्य की इतिहासकारों ने तीव्र आलोचना की है और सुल्तान को क्रूर, अदूरदर्शी तथा प्रजापीड़क बताया है। कुछ इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहा है।

देखा जाए तो राजधानी का परिवर्तन कोई पागलपन भरी योजना नहीं थी। इसके पहले भी हिन्दू राजाओं ने अपनी राजधानियों का परिवर्तन किया था। आधुनिक काल में भी राजधानियों का परिवर्तन होता रहता है।

सुल्तान की यह आलोचना तर्क तथा उपयोगिता पर आधारित थी। फिर भी वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। इसका कारण यह था कि आयोजना के कार्यान्वित करने का ढंग ठीक नहीं था।

उसे यह कार्य धीरे-धीरे करना चाहिए था। पहले केवल सरकारी कार्यालयों तथा सरकारी कर्मचारियों को ले जाना चाहिए था। फिर कुछ समय के प्रयोग तथा अभ्यास के उपरान्त अन्य लोगों को वहाँ भेजा जाना चाहिये था।

अगली कड़ी में देखिए- मुहम्मद बिना तुगलक ने सोने-चांदी के सिक्के बंद करके ताम्बे के सिक्के ढलवाए!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ताम्बे के सिक्के ढलवाए मुहम्मद बिन तुगलक ने (8)

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ताम्बे के सिक्के - www.bharatkaitihas.com
ताम्बे के सिक्के ढलवाए मुहम्मद बिन तुगलक ने

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने राज्य में सोने-चांदी की मुद्रा के स्थान पर ताम्बे के सिक्के ढलवाए। यह भारत में सांकेतिक मुद्रा का प्रथम प्रचलन था किंतु दुर्भाग्य से यह विफल हो गया।

आज संसार में कई तरह की मुद्राएं चलती हैं जिनमें पेपर करंसी, मेटल करंसी, प्लास्टिक करंसी, क्रिप्टो करंसी आदि प्रमुख हैं। पेपर करंसी में कागज का प्रॉमिसरी नोट आता है। इसमें डॉलर, यूरो, येन, भारतीय रुपया, रूबल आदि विभिन्न मुद्राएं उपलब्ध हैं।

प्लास्टिक करंसी में डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, प्रीपेड कैश-कार्ड आदि प्रमुख हैं। मेटल करंसी में कॉइन अर्थात् सिक्के की गिनती होती है।

क्रिप्टो-करंसी कंप्यूटर एल्गोरिथ्म पर बनती है। अर्थात् यह डिजिटल करेंसी है जिसके लिए क्रिप्टोग्राफी का प्रयोग किया जाता है। यह करेंसी किसी अथॉरिटी के नियंत्रण में नहीं होती। आमतौर पर इसका प्रयोग सामग्री या सेवा खरीदने के लिए किया जाता है।

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क्रिप्टो करेंसी की शुरुआत वर्ष 2009 में बिटकॉइन के रूप में हुई थी। आज लगभग 1000 तरह की क्रिप्टो-करेंसी मौजूद हैं। इनमें बिटकॉइन, रेडकॉइन, सियाकॉइन, सिस्कोइन, वॉइसकॉइन और मोनरो अधिक प्रसिद्ध हैं।

मुहम्मद बिन तुगलक के युग में अधिकतर देशों में सोने-चांदी के सिक्कों की करंसी चला करती थी। तुगलक ने चौदहवीं सदी के भारत में सोने-चांदी की मुद्रा बंद करके उसके स्थान पर ताम्बे के सिक्के के रूप में सांकेतिक मुद्रा चलाने की योजना बनाई। यह भारत के लोगों के लिए बिल्कुल नई बात थी।

सांकेतिक मुद्रा उसे कहते हैं जिसका धात्विक मूल्य उस पर अंकित मूल्य से कम होता है। सुल्तान ने सोने-चांदी की मुद्राओं के स्थान पर ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं। सुल्तान द्वारा सांकेतिक मुद्रा की योजना, राजधानी परिवर्तन के विफल हो जाने के उपरान्त लागू की गई थी।

ताम्बे के सिक्के चलाने के कई कारण थे-

उस काल में पूरे विश्व में चांदी की मांग बढ़ जाने से भारत में चाँदी का अभाव हो गया था। अतः मुद्रा बनाने के लिए पर्याप्त चांदी उपलब्ध नहीं रह गई थी। इस कारण राजकोष में तथा बाजार में मुद्रा की कमी हो गई थी और व्यापारिक लेन-देन में असुविधा होने लगी थी।

सुल्तान को शाही सेना को वेतन देने के लिए मुद्रा की आवश्यकता थी।सल्तनत में उठ खड़े हुए विद्रोहों को दबाने, अकाल-पीड़ितों की सहायता करने, नई योजनाएं चलाने, नए भवन बनाने तथा मुक्त-हस्त से पुरस्कार देने के कारण मुहम्मद का राजकोष रिक्त हो गया था और वह बड़े आर्थिक संकट में पड़ गया था।

मुहम्मद बिन तुगलक को ज्ञात था कि चीन तथा फारस आदि देशों में संकेत मुद्रा का प्रचलन है। भारत में ताम्बा प्रचुरता से उपलब्ध था इसलिए सुल्तान ने सोने-चांदी की बजाय ताम्बे की मुद्रा चलाने की आज्ञा दी।

व्यापारियों ने ताम्बे की मुद्रा स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्हें लगा कि सरकार ने चाँदी की मुद्राओं का अपहरण करने के लिये यह योजना चलाई है। सुल्तान, जनता से चाँदी की मुद्राएँ लेकर अपने राजकोष में भर लेगा और जनता को ताँबे की मुद्राएँ थमा देगा।

इस पर सुल्तान ने आदेश दिए कि यदि कोई व्यक्ति ताम्बे के सिक्के को चांदी की मुद्राओं से बदलना चाहे तो उसे राजकोष से चांदी की मुद्राएं दे दी जाएं। इस पर बहुत से लोगों ने अपने घरों में टकसालें बना लीं और ताँबे की मुद्राएं ढालने लगे। तत्कालीन उलेमा जियाउद्दीन बरनी के अनुसार प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया जिसमें ताम्बे की नकली मुद्राएं बनने लगीं।

हालांकि जियाउद्दीन का यह आरोप गलत है, उस काल में लोग अपराध करने से डरते थे, हिन्दू प्रजा के लिए तो यह संभव ही नहीं था कि वह सुल्तान तथा उसके सिपाहियों के क्रोध को आमंत्रित कर सके। नकली मुद्राएं बनाने का काम केवल उन सुनारों द्वारा किया गया था जो पहले से ही राजकीय टकसाल के लिए काम करते थे।

कुछ ही दिनों में राजकोष ताम्बे की मुद्राओं से भर गया और सोने-चांदी की मुद्राएं राजकोष से गायब हो गईं। जब बाजार में केवल ताम्बे की मुद्रा दिखाई देने लगी तो व्यापारियों ने तांबे की मुद्राओं के बदले सामान देना बन्द कर दिया। देश में हाहाकार मच गया।

इस पर सुल्तान ने ताम्बे की मुद्रा बंद कर दीं और फिर से सोने-चांदी की मुद्रा बनाने के आदेश दिए। इसके बाद सुल्तान के आदेश से शाही सिपाही व्यापारियों एवं धनी लोगों के घरों एवं दुकानों में घुस गए और दुकानों तथा घरों में छिपाई गई सोने-चांदी की मुद्राओं को जबर्दस्ती छीन लाए।

इस प्रकार सुल्तान की अदूरदर्शिता तथा जनता की बेईमानी के कारण सांकेतिक मुद्रा की योजना असफल हो गई। । इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा चलाई गई संकेत मुद्रा की कड़ी आलोचना की है और उस पर पागल होने का आरोप लगाया है परन्तु वास्तव में यह योजना मुहम्मद तुगलक के पागलपन की नहीं, वरन् उसकी बुद्धिमता की परिचायक थी।

चीन तथा फारस में पहले से ही संकेत मुद्रा चल रही थी। आधुनिक काल में भी पूरे विश्व में संकेत मुद्रा का प्रचलन है। सुल्तान के विरोध में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह अपने समय से बहुत आगे था। सुल्तान को चाहिए था कि वह टकसाल पर राज्य का एकाधिकार रखता और ऐसी व्यवस्था करता जिससे लोग अपने घरों में संकेत मुद्रा को नहीं ढाल पाते।

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुल्तान की योजना गलत नहीं थी अपितु उसके कार्यान्वयन का ढंग और समय गलत था।

अगली कड़ी में देखिए- मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों को धन देकर उनसे पीछा छुड़ाया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगोलों से संधि (9)

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मंगोलों से संधि

मुहम्मद बिन तुगलक ने लड़ने की बजाय मंगोलों से संधि करने का मार्ग अपनाया तथा मंगोलों को सोने-चांदी के रुपए दिए किंतु इस नीति से वह मंगोलों का विश्वास नहीं जीत सका।

चीन के उत्तर में स्थित गोबी-रेगिस्तान में मंगोल नामक घुमंतू एवं अर्द्धसभ्य जाति रहती थी जिसका मुख्य पेशा घोड़ों और अन्य पशुओं का पालन करना था। वे बहुत गंदे रहते थे और सभी प्रकार का मांस खाते थे। एक मंगोल निरंतर 40 घण्टे तक घोड़े की पीठ पर बैठकर यात्रा कर सकता था।

उनमें स्त्री सम्बन्धी नैतिकता का सर्वथा अभाव था किंतु वे माँ का सम्मान करते थे। वे विभिन्न कबीलों में बंटे हुए थे जिनमें परस्पर शत्रुता रहती थी। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में उन्हीं कबीलों में से एक कबीले का सरदार येसूगाई था जिसने एक अन्य कबीले के सरदार की औरत को छीन लिया।

इस औरत के पेट से ई.1163 में तेमूचिन नामक बालक का जन्म हुआ। जब येसूगाई मर गया तब उसकी औरत एवं बच्चों को मजदूरी करके पेट भरना पड़ा किंतु जब तेमूचिन बड़ा हुआ तो उसने विश्व के सबसे बड़े मंगोल साम्राज्य की नींव रखी और वह इतिहास में चंगेजखां के नाम से जाना गया।

उसने चीन का अधिकांश भाग, रूस का दक्षिणी भाग, मध्य एशिया, टर्की (तुर्की), पर्शिया (ईरान), और अफगानिस्तान के प्रदेशों को जीत लिया। इस काल में मंगोल, इस्लाम से घृणा करते थे। इस कारण तुर्किस्तान का ख्वारिज्म साम्राज्य एवं बगदाद के खलीफा का राज्य, मंगोलों द्वारा धूल में मिला दिये गये। इसके बाद उसने भारत के मुस्लिम शासकों की ओर रुख किया।

मंगोलों की सेना एक रात्रि में 20 मील से अधिक का मार्ग तय कर लेती थी। वे तेजी से दौड़ते हुए घोड़े की पीठ पर बैठकर अपने शत्रुओं को तीरों से मार डालते थे।

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मंगोल जहाँ-कहीं गये, उन्होंने वहाँ की सभ्यता के समस्त चिह्नों को नष्ट कर दिया। बारहवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक सम्पूर्ण एशिया एवं यूरोप में मंगोल आक्रमणों का भय एवं आतंक व्याप्त रहा। भारत पर उनका पहला आक्रमण ई.1221 में  हुआ। उस समय इल्तुतमिश, दिल्ली का शासक था।

चंगेजखाँ, ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन का पीछा करते हुए भारत आ पहुँचा तथा उसका पीछा करते हुए उसी गति से लौट गया किंतु इसी शताब्दी में मंगोलों ने सिन्धु नदी को पार करके सिन्ध तथा पश्चिमी पंजाब में अपने शासक नियुक्त कर दिये।

उस समय दिल्ली सल्तनत पर बलबन का शासन था। उसके लिये यह संभव नहीं था कि वह मंगोलों को निष्कासित कर सके। मंगोलों ने कई बार व्यास को पार करके आगे बढ़ने का प्रयत्न किया किंतु दिल्ली सल्तनत की सेनाओं ने उन्हें व्यास नदी पार नहीं करने दी।

ई.1221 से लेकर ई.1526 तक मंगोल आक्रमणकारियों की कई लहरें भारत में आईं। इस दौरान वे विदेशी आक्रांता बने रहे। वे नृशंस हत्याओं, भयानक आगजनी तथा क्रूरतम विध्वंस के लिये कुख्यात थे।

तुर्कों ने मंगोलों से अपनी लड़कियों की शादियां करनी भी आरंभ कर दीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंगोलों में तुर्की-रक्त का मिश्रण हो गया। कुछ ही समय में मंगोल, मध्य-एशिया के उजबेकिस्तान, समरकंद, ताशकंद तथा फरगना आदि क्षेत्रों पर शासन करने लगे। मध्य-एशिया से ही वे भारत में आए।

भारत में मंगोलों को अत्यंत घृणा की दृष्टि से देखा जाता था क्योंकि चंगेज खाँ तथा तैमूर लंग जैसे अनेक मंगोल नेता भारत में भारी रक्तपात और हिंसा करते आए थे। ई.1292 में सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी पुत्री का विवाह चंगेज खाँ के पुत्र उलूग खाँ से करके मंगोलों के साथ शांति स्थापति की।

ई.1302 में जब मंगोलों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो तब तक का सबसे शक्तिशाली सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी, दिल्ली से भाग कर सीरी के दुर्ग में छिप गया। मंगोलों ने तीन महीनों तक दिल्ली में ताण्डव किया और सुल्तान कुछ नहीं कर सका। सुल्तान जानता था कि न तो मंगोलों से संधि की जा सकती है और न युद्ध।

दिल्ली के सुल्तान लाखों सैनिकों को मरवाकर तथा करोड़ों रुपया गंवा कर पिछले सवा सौ साल से मंगोलों को भारत से दूर रखने में सफल रहे थे। फिर भी मंगोल टिड्डी दलों की भांति भारत में घुस जाते थे और भारी तबाही मचाते थे।

ई.1328 में मंगोलों ने तरमाशिरीन नामक एक मंगोल सेनापति के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। वे लोग सिंध नदी को पार करके, पंजाब को रौंदते हुए दिल्ली के निकट आ गये। इस काल में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का सुल्तान था। कई खर्चीली योजनाओं के कारण उसका खजाना खाली हो चुका था तथा उसके पास विशाल सेनाओं को वेतन देने के लिए धन नहीं था। इसलिए मुहम्मद ने मंगोलों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें कुछ धन देकर उनसे अपना पीछा छुड़ाने की योजना बनाई।

सुल्तान ने मंगोलों से बात की तथा उन्हें धन देकर संतुष्ट किया। मंगोलों ने भविष्य में तुगलक के राज्य पर आक्रमण नहीं करने तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को अपना दोस्त मानने का वचन दिया।

मंगोलों से संधि की बात सुनकर, पहले से ही चिढ़े हुए मौलवियों, मुफ्तियों, काजियों तथा उलेमाओं को सुल्तान की आलोचना करने का नया अवसर मिल गया। उन्होंने पानी पी-पीकर सुल्तान को गालियां दीं तथा जनता में प्रचार किया कि सुल्तान ने असभ्य मंगोलों के हाथों महान तुर्कों की नाक कटवा कर फैंक दी है।

मुहम्मद बिन तुगलक से धन स्वीकार करने के बाद तरमाशिरीन ने दिल्ली के सुल्तान के साथ सदैव मैत्री-भाव रखा।

निष्कर्ष रूप में केवल यही कहा जा सकता है कि उलेमाओं में यह समझने की शक्ति ही नहीं थी कि सुल्तान उन दिनों ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि मंगोलों का सामना कर सके। सुल्तान के पास सल्तनत को नष्ट-भ्रष्ट होने तथा पराजय से बचाने का कोई दूसरा उपाय ही नहीं था।

अगली कड़ी में देखिए- कटोच राजपूतों ने मुहम्मद बिन तुगलक को पहाड़ी तलवार का स्वाद चखाया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कटोच राजपूत और मुहम्मद बिन तुगलक (10)

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कटोच राजपूत - www.bharatkaitihas.com
कटोच राजपूत और मुहम्मद बिन तुगलक

कांगड़ा घाटी में नगरकोट नामक एक प्रसिद्ध राज्य था जिस पर एक प्राचीन हिन्दू राजवंश शासन करता था। इस राजवंश को कटोच राजपूत राजवंश कहा जाता था।

तुगलकों के काल में दिल्ली सल्तनत अपने चरम-विस्तार को प्राप्त कर गई। तुगलक वंश के दूसरे सुल्तान अर्थात् मुहम्मद बिन तुगलक ने भी अनेक हिन्दू राजाओं का राज्य नष्ट करके अपने राज्य का विस्तार किया।

उस काल में हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में नगरकोट नामक एक प्रसिद्ध राज्य था जिस पर एक प्राचीन हिन्दू राजवंश शासन करता था। इस राजवंश को कटोच राजपूत राजवंश कहा जाता था तथा यहाँ के शासक महाभारत कालीन सु-सरमन नामक एक योद्धा को अपना पूर्वज मानते थे।

किसी समय यह राज्य सतलज एवं रावी नदियों के बीच फैला हुआ था किंतु विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में मुस्लिम सल्तनत का विस्तार हो जाने से यह राज्य केवल कांगड़ा की पहाड़ियों तक सीमित रह गया था।

नगरकोट में देवी वज्रेश्वरी का एक प्राचीन शक्तिपीठ था जिसमें भारत भर के हिन्दू अपार श्रद्धा रखते थे।

किसी समय महमूद गजनवी इसी शक्तिपीठ से अपार सम्पत्ति ऊंटों, हाथियों एवं घोड़ों की पीठ पर लादकर अफगानिस्तान ले गया था। अंग्रेज इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है कि नगरकोट की लूट में महमूद को इतना धन मिला था कि सारी दुनिया भारत की अपार धनराशि को देखने के लिये चल पड़ी।

गुलाम वंश के सबसे ताकतवर सुल्तान बलबन ने भी इस दुर्ग पर आक्रमण किया था किंतु वह युद्ध जीतकर भी कटोच राजपूत राज्य को भंग नहीं कर सका था।

नगरकोट के शक्तिपीठ से लगभग दो किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाड़ी पर कटोचों का किला बना हुआ था जिसके तीन तरफ विशाल और गहरी नदी बहती थी। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित होने के कारण कटोच राजपूत अपने नगरकोट दुर्ग को अभेद्य समझते थे।

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इस क्षेत्र में न तो पैदल सिपाही जा सकते थे, न घोड़े आसानी से चल सकते थे, न ऊंट और हाथी जा सकते थे, केवल खच्चरों और टट्टुओं की सहायता से ही इस क्षेत्र में युद्ध एवं रसद सामग्री ढोई जा सकती थी।

इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र को पार करके नगरकोट तक पहुंच पाना एक बेहद खर्चीला अभियान था। मुस्लिम सैनिक इस क्षेत्र में जाने से डरते थे।  इसलिए सुल्तान ने सैनिकों को बहुत सारा धन देकर नगरकोट पर आक्रमण करने के लिए तैयार किया।

ई.1337 में मुहम्मद बिन तुगलक ने एक लाख सैनिकों के साथ नगरकोट के किले पर आक्रमण कर दिया कटोच राजा पृथ्वीचन्द्र ने मुस्लिम सेनाओं का बहादुरी से सामना किया किंतु एक लाख शत्रु सैनिकों के समक्ष उसकी छोटी से सेना अधिक समय तक नहीं टिक सकती। थी।

दूसरी ओर सुल्तान के एक लाख सैनिक इस बीहड़ वन में, बिना पर्याप्त रसद सामग्री के  अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते थे। अतः दोनों पक्षों में संधि के प्रयास आरम्भ हुए। कहा नहीं जा सकता कि संधि की पहल किसने की!

उस काल में हुए लेखक बद्रे चाच ने इस युद्ध का वर्णन किया है जिसके अनुसार सुल्तान ने राय पृथ्वीचंद्र पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु वह इस बात का उल्लेख नहीं करता कि यदि सुल्तान ने विजय हासिल की थी तो यह दुर्ग राजपूतों के हाथों में कैसे रहा!

निश्चित रूप से किसी सम्मानजनक संधि के तहत ही ऐसा होना संभव है। मुहम्मद बिन तुगलक के दिल्ली लौटते ही कटोचों ने वह संधि भंग कर दी और सुल्तान के सैनिकों को आसपास के क्षेत्र से मार भगाया और वे दिल्ली सल्तनत की चौकियों पर धावे मारने लगे।

यही कारण था कि मुहम्मद बिन तुगलक का इस पूरे क्षेत्र से अधिकार समाप्त हो गया।

इस प्रकार अपार धनराशि व्यय करके भी मुहम्मद बिन तुगलक को किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली। न दुर्ग हाथ आया और न नगरकोट से कोई बड़ी राशि हाथ लगी। मुहम्मद की असफलताओं के इतिहास में एक अध्याय और जुड़ गया।

अगली कड़ी में देखिए- मुहम्मद बिन तुगलक ने ईरान, तिब्बत तथा चीन में स्थित राज्यों को जीतने के सपने देखे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कराजल अभियान में मुहम्मद बिन तुगलक की सेना नष्ट हो गई (11)

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कराजल अभियान में मुहम्मद बिन तुगलक की सेना नष्ट हो गई

कराजल अभियान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ। कराजल क्षेत्र के पहाड़ी हिन्दू योद्धाओं ने तुगलक की समस्त सेना नष्ट कर दी। !

नगरकोट अभियान के बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने खुरासान विजय की योजना बनाई। उसके दरबार में उन दिनों कुछ खुरासानी अमीर भी रहते थे जिन्होंने सुल्तान को खुरासान की दयनीय राजनीतिक स्थिति की जानकारी दी तथा उसे खुरासान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया।

खुरासान फारस के शाह के अधीन एक पहाड़ी राज्य था। उन दिनों फारस में अबू सईद नामक अल्पवयस्क एवं दुराचारी शाह शासन कर रहा था। उसके अमीर एवं वजीर उससे असन्तुष्ट थे तथा उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करते थे।

शाह अबू सईद का संरक्षक अमीर चौगन, फारस के शाह को हटाकर उसका राज्य छीनने का प्रयास कर रहा था। इसलिए अबू सईद ने चौगन की हत्या करवा दी और चौगन के पुत्र अपने पिता की हत्या का बदला लेने का अवसर ढूँढने लगे।

उन दिनों खुरासान प्रान्त में भी गड़बड़ी फैली हुई थी और वहाँ का शासक भी फारस के शाह से अपना पीछा छुड़ाना चाहता था। उसने अपने अमीरों के माध्यम से मुहम्मद बिन तुगलक से कहलवाया कि वह खुरासान पर दिल्ली की सेना का अधिकार करवा देगा।

इन परिस्थितियों में मुहम्मद बिन तुगलक के लिए खुरासान विजय की योजना बनाना स्वाभाविक ही था। मुहम्मद बिन तुगलक ने इस अभियान के लिए एक लाख नए सैनिकों की भर्ती की तथा उन्हें एक वर्ष का अग्रिम वेतन दिया।

जब ईरान के शाह को मुहम्मद बिन तुगलक की तैयारियों के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने मिस्र के शासक से मैत्री कर ली ताकि दिल्ली की सेनाओं का आक्रमण होने पर मिस्र से सैन्य सहायता मंगवाई जा सके। दिल्ली के मुल्ला-मौलवियों ने भी शोर मचाना शुरु कर दिया था कि सुल्तान को काफिरों के देश जीतने चाहिए, उसे अपने ही सहधर्मियों से युद्ध करके सैनिक शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिए।

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मुहम्मद बिन तुगलक को भी अब तक समझ में आ चुका था कि हिन्दूकुश पर्वत के उस पार सेना तथा रसद भेजना आसान काम नहीं था।

इसलिए सुल्तान ने खुरासान विजय की योजना को त्याग दिया और अपना ध्यान हिमाचल से लेकर तिब्बत एवं चीन की तरफ के क्षेत्रों में स्थित हिन्दू राज्यों पर केन्द्रित किया।

अब मुहम्मद बिन तुगलक ने भारत एवं चीन के बीच स्थित कराजल को अपने नए लक्ष्य के रूप में चुना। कराजल को करांचल तथा कूमेचिल भी कहा जाता था तथा अब कुमायूं-गढ़वाल के नाम से जाना जाता है। उस समय चंद्रवंशी राजा त्रिलोकचंद कराजल का शासक था।

मुहम्मद बिन तुगलक के समकालीन उलेमा जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि सुल्तान ने कराजल के पर्वतीय प्रदेश पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई ताकि वह खुरासान पर सरलता से विजय प्राप्त कर सके परन्तु कराजल खुरासान के मार्ग में नहीं पड़ता, अतः बरनी का मत अमान्य है।

मुस्लिम लेखक हजीउद्दबीर का कहना है चूंकि कराजल की स्त्रियाँ अपने रूप तथा गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक उनसे विवाह करके उन्हें अपने रनिवास में लाना चाहता था। सुन्दर स्त्रियों की प्राप्ति के लिए कराजल अभियान बनाने की बात सही प्रतीत नहीं होती।

हजीउद्दबीर का मत इसलिए भी अमान्य है क्योंकि मुहम्मद बिन तुगलक का निजी आचरण बड़ा पवित्र था। विदेशी लेखक इब्नबतूता का कहना है कि चीन ने इन हिंदू राज्यों में घुसपैठ की थी इसलिए सुल्तान ने खुसरो मलिक को सीमावर्ती हिंदू राज्यों पर अधिकार करने के लिए भेजा। ताकि चीन की ओर से होने वाली विदेशी घुसपैठ को रोका जा सके।

मुगल कालीन इतिहासकार फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन के धन को लूटने के लिए यह योजना बनाई। यह मत भी आधुनिक इतिहासकारों द्वारा अमान्य कर दिया गया है।

ई.1338 में खुसरो मलिक की सेना ने पर्वत की तलहटी में स्थित जिद्या नामक नगर पर आक्रमण किया तथा उसे जलाकर राख कर दिया।

राजा त्रिलोकचंद की मुट्ठी भर सेना, एक लाख मुस्लिम सैनिकों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं थी। इसलिए वह गहन पर्वतीय क्षेत्र में छिपकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगी।

जिद्या पर मुहम्मद बिन तुगलक की पताका फहराने लगी। शाही सेना की जीत की सूचना मिलने पर पर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने मुस्लिम सेना को पुनः दिल्ली लौटने का आदेश भिजवाया परन्तु खुसरो मलिक ने सुल्तान का आदेश नहीं माना और तिब्बत की ओर बढ़ गया।

करांजल पहुंचने से पहले ही अमीर खुसरो की सेना को भारी बरसात ने घेर लिया। पहाड़ी नालों और झरनों ने आगे बढ़ने और पीछे लौटने के सभी मार्ग अवरुद्ध कर दिए।

कुछ ही दिनों में मुस्लिम सेना की रसद सामग्री भी समाप्त हो गई तथा अधिक वर्षा के कारण, दिल्ली से आ रही रसद मार्ग में ही रुक गई।

अब राजा त्रिलोकचंद की सेना ने मोर्चा संभाला और पहाड़ों से निकलकर खुसरो मलिक की सेना पर आक्रमण करने लगी। स्थानीय लोगों ने भी अपने राजा का साथ दिया। उन्होंने शाही सेना पर ईंटों तथा पत्थरों की बरसात कर दी।

शाही सैनिक पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से अनभिज्ञ थे। उन्हें पर्वतीय क्षेत्रों में युद्घ करने का कोई अनुभव भी नही था। इस कारण उनकी स्थिति पिंजरे में बंद चूहे जैसी हो गई।

देखते ही देखते मुस्लिम सैनिकों के शव पहाड़ों पर गिरने लगे और कुछ ही समय में एक लाख कब्रें खुले आसमान के नीचे बन गयीं।

बरनी का कथन है कि कराजल अभियान से एक लाख की विशाल शाही सेना में से मात्र दस लोग ही बचकर दिल्ली पहुंचे। जबकि इब्नबतूता ने बचे हुए सैनिकों की संख्या मात्र तीन बताई है।

कुछ इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक की कराजल अभियान योजना की भी बड़ी आलोचना की है और उसे पागल कहा है परन्तु इसमें पागलपन की कोई बात नहीं थी।

ऐसे पर्वतीय प्रदेश में धन तथा जन की क्षति होना स्वाभाविक था। आगे चलकर मुगलों ने भी ऐसे बड़े अभियान किए। अंग्रेजों को भी नेपाल विजय करने में बड़ी क्षति उठानी पड़ी थी।

अगली कड़ी में देखिए- सुल्तान ने अपने चचेरे भाई के टुकड़े करके चावल में पकवाए!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बागियों का दमन करने में बड़ी क्रूरता दिखाई सुल्तान ने ! (12)

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बागियों का दमन करने में बड़ी क्रूरता दिखाई सुल्तान ने

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी सल्तनत में होने वाले व्रिदोहों का बड़ी दृढ़ता से दमन किया तथा बागियों का दमन करने में बड़ी क्रूरता दिखाई ! उस युग में बागियों का दमन करने में ऐसी ही क्रूरता दिखाई जाती थी।

मुहम्मद बिन तुगलक संसार के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक का स्वामी था। उसने अपनी सल्तनत के विस्तार एवं समृद्धि के लिए कई योजनाएं बनाई थीं किंतु दुर्भाग्य से उसके अमीर एवं सूबेदार उन योजनाओं को समझ नहीं पाए।

सल्तनत के मुल्ला-मौलवियों ने भी जमकर सुल्तान की योजनाओं का विरोध किया इस कारण सुल्तान की सभी योजनाएं विफल हो गईं। इनका परिणाम यह हुआ कि राज्य का खजाना खाली हो गया और सेनाओं को वेतन चुकाने में विलम्ब होने लगा। इस कारण स्थान स्थान पर विद्रोह होने लगे।

ये विद्रोह अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में विस्तृत थे। यदि एक विद्रोह उत्तर में होता तो दूसरा दक्षिण में और यदि एक विद्रोह पश्चिम में होता तो दूसरा सुदूर पूर्व में। इससे सेना के संचालन में बड़ी कठिनाई होती थी। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चौंतीस विद्रोह हुए जिनमें से 27 दक्षिण भारत में हुए थे।

सुल्तान ने बागियों का दमन करने में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरती। फिर भी इन विद्रोहों के फलस्वरूप सल्तनत बिखरने लगी और कई स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी।

पहला विद्रोह ई.1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई वहाबुद्दीन गुर्शस्प ने किया जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। शाही सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। मुहम्मद बिन तुगलक ने बागियों का दमन बड़ी क्रूरता से किया! गुर्शस्प की खाल में भूसा भरवाकर उसे भारत के कई शहरों में प्रदर्शित करवाया और उसके शरीर के मांस को चावल के साथ पकाकर उसकी बीवी-बच्चों के पास खाने के लिये भिजवाया।

दूसरा विद्रोह ई.1328 में मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा उर्फ किश्लू खाँ ने किया। इस बार भी बागियों का दमन बड़ी क्रूरता से किया गया। स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक ने इस इस अभियान का नेतृत्व किया। बहराम आईबा का वध कर दिया गया।

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लाहौर का सूबेदार अमीर हुलाजू एक शक्तिशाली अमीर था। उसने भी मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह किया। मुहम्मद बिन तुगलक ने एक विशाल सेना लाहौर भिजवाई तथा हुलाजू को पकड़ कर मरवाया।

ई.1335 में मदुरा के गवर्नर जलालुद्दीन एहसान शाह ने सुल्तान से विद्रोह किया। इस समय दोआब में अकाल पड़ा हुआ था और प्रजा में असन्तोष फैला हुआ था। इससे लाभ उठाकर जलालुद्दीन ने विद्रोह कर दिया।

सुल्तान ने अपने प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ को इस विद्रोह का दमन करने के लिये भेजा परन्तु वह धार से वापस लौट आया। इस पर मुहम्मद बिन तुगलक ने स्वयं दक्षिण के लिये प्रस्थान किया।

जब सुल्तान तेलंगाना पहुँचा, तब वहाँ बड़े जोरों का हैजा फैल गया और मुहम्मद बिन तुगलक के बहुत से सैनिक मर गये। फलतः सुल्तान ने दिल्ली लौटने का निश्चय किया और एहसान शाह स्वतन्त्र हो गया।

एहसान शाह के विद्रोह का प्रभाव साम्राज्य के अन्य भागों पर भी पड़ा। उत्तर तथा दक्षिण भारत में यह खबर फैल गई कि सुल्तान की मृत्यु हो गई है। फलतः ई.1335 में दौलताबाद के सूबेदार मलिक हुशंग ने विद्रोह कर दिया।

सुल्तान की उस पर विशेष कृपा रहती थी परन्तु वह बड़ा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। अतः अवसर पाकर उसने विद्रोह कर दिया। अन्त में उसे भाग कर हिन्दू सरदारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी। मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे क्षमा कर दिया।

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु की सूचना पाकर उत्तर में एहसान शाह के पुत्र सैयद इब्राहीम ने भी विद्रोह कर दिया। इब्राहीम, सुल्तान का बड़ा विश्वासपात्र था। अन्त में उसने आत्म-समर्पण कर दिया। फिर भी उसकी हत्या करवा दी गई।

इन दिनों पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने ई.1337 में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का स्वतंत्र शासक बन गया। उसने अपने नाम की मुद्राएँ भी चलाईं। मुहम्मद बिन तुगलक इस समय कराजल में उलझा हुआ था इसलिए वह बंगाल में सेना नहीं भेज सका और बंगाल स्वतंत्र हो गया।

बंगाल के विद्रोह की सफलता देखकर ई.1338 में कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने भी विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने उसे पकड़ मंगवाया तथा उसके जीवित रहते ही उसकी खाल खिंचवा ली।

अलीशाह दिल्ली सल्तनत का एक उच्च अधिकारी था। उसे मुहम्मद बिन तुगलक ने दक्षिण में मालगुजारी वसूल करने के लिए गुलबर्गा भेजा परन्तु उसने गुलबर्गा के हाकिम की हत्या करके शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बीदर पर भी अधिकार कर लिया।

सुल्तान के आदेश कुतलुग खाँ ने नामक एक अमीर ने अलीशाह को परास्त करके बन्दी बना लिया। कुछ दिनों बाद उसका वध कर दिया गया। अवध तथा जफराबाद के गवर्नर आइन-उल-मुल्क ने दिल्ली सल्तनत की बड़ी सेवाएँ की थी। एक बार मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण के गवर्नर कुतलुग खाँ ख्वाजा के काम से असन्तुष्ट हो गया।

इसलिये उसने ख्वाजा को वापस बुला लिया और उसके स्थान पर आइन-उल-मुल्क को नियुक्त कर दिया तथा उसे अपने बाल-बच्चों के साथ दक्षिण जाने की आज्ञा दी।

यद्यपि आइन-उल-मुल्क के लिये यह बड़े गौरव की बात थी परन्तु उसे लगा कि सुल्तान ने उसे अवध से हटाने के लिए ऐसा किया है। इसलिये उसने विद्रोह कर दिया।

उसका विद्रोह सबसे भयानक था। फिर भी शाही सेना ने उसे परास्त करके बंदी बना लिया। जब वह सुल्तान के सामने लाया गया तो सुल्तान ने उसकी सेवाओं तथा उसकी विद्वता को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।

कुछ समय बाद शाहू अफगान लोदी ने मुल्तान के सूबेदार को कैद करके स्वयं को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की सूचना पाते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने बागियों का दमन करने के लिए दिल्ली से मुल्तान के लिये प्रस्थान किया।

शाहू अफगान मुल्तान छोड़कर पहाड़ों में भाग गया और सुल्तान के पास एक प्रार्थना पत्र भेज कर क्षमादान की याचना की। फलतः मुहम्मद बिन तुगलक दिपालपुर से ही दिल्ली लौट आया। इस प्रकार मुहम्मह बिन तुगलक का अधिकांश जीवन विद्रोहों को दबाने में बीता। 

अगली कड़ी में देखिए- विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हो गई और मुहम्मद बिन तुगलक कुछ नहीं कर सका!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना तथा मुहम्मद बिन तुगलक (13)

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विजयनगर साम्राज्य की स्थापना तथा मुहम्मद बिन तुगलक

सुल्तान ने हरिहर को उस क्षेत्र का शासक और बुक्का को उसका मन्त्री बनाकर भेज दिया। वहाँ पहुँचने पर धीरे-धीरे हरिहर ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कर ली।

मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों के कारण सल्तनत में स्थान-स्थान पर हो रहे विद्रोहों को देखकर हिन्दू राजाओं ने भी स्वतन्त्र होने का प्रयास किया।

ई.1336 में हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने विजयनगर राज्य की स्थापना की। हरिहर तथा बुक्का, राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) के सम्बन्धी थे और दिल्ली में बन्दी बना कर रखे गये थे।

ई.1335 में तेलंगाना के हिन्दुओं ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस गम्भीर स्थिति में सुल्तान ने हरिहर तथा बुक्का की सहायता से वहाँ पर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया।

सुल्तान ने हरिहर को उस क्षेत्र का शासक और बुक्का को उसका मन्त्री बनाकर भेज दिया। वहाँ पहुँचने पर धीरे-धीरे हरिहर ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कर ली।

आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य अपनी समृद्धि तथा उच्च सांस्कृतिक वैभव के कारण संसार भर में प्रसिद्ध हुआ। विजयनगर साम्राजय ने कई शताब्दियों तक दक्षिण में हिन्दू धर्म की पताका को लहराए रखा।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

महमूद बिन तुगलक के समय में कृष्ण नायक महान् काकतीय राजा हुआ। वह प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) का पुत्र था। दक्षिण के विद्रोहों से उसे बड़ा प्रोत्साहन मिला। ई.1343 में उसने मुसलमानों के विरुद्ध एक संघ बनाया।

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हिन्दू राजाओं के इस संघ को बड़ी सफलता मिली तथा इस संघ के राजाओं ने वारंगल, द्वारसमुद्र तथा कोरोमण्डल तट के समस्त प्रदेश को दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र कर लिया। अंत में दक्षिण भारत में केवल देवगिरि तथा गुजरात, दिल्ली सल्तनत के अधिकार में रह गये। मुहम्मद बिना तुगलक के काल में सुनम तथा समाना के जाटों, भट्टी-राजपूतों एवं पहाड़ी सामंतों ने मुस्लिम सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किये। मुहम्मद बिन तुगलक ने इन विद्रोहों में कड़ा रुख अपनाया तथा विद्रोहियों के नेताओं को पकड़ कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया। शताधिकारी विदेशी अमीरों को कहते थे। ये लोग प्रायः एक शत सैनिकों के नायक हुआ करते थे और प्रायः एक शत गाँवों में शान्ति रखने तथा कर वसूलने का उत्तरदायित्व निभाते थे। सुल्तान के प्रति इनकी कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी और वे सदैव अपनी स्वार्थ सिद्धि में संलग्न रहते थे।जब मुहम्मद बिन तुगलक ने उन्हें अनुशासित बनाने का प्रयत्न किया, तब उन लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने, मुहम्मद बिन तुगलक को स्वयं दक्षिण जाना पड़ा। उसने विद्रोहियों को परास्त कर उन्हें तितर-बितर कर दिया। हसन नाम का एक अमीर कुछ विद्रोहियों के साथ गुलबर्गा भाग गया और उसने वहाँ पर ई.1347 में बहमनी राज्य की नींव डाली।

इस समय मुहम्मद बिन तुगलक को गुजरात में तगी के विद्रोह की सूचना मिली। सुल्तान ने गुजरात के लिए प्रस्थान किया। तगी सिन्ध की ओर भाग गया। मुहम्मद बिन तुगलक उसका पीछा करते हुए थट्टा पहुँचा। 

20 मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई। बदायूनी ने लिखा है- सुल्तान को उसकी प्रजा से तथा प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।

अगली कड़ी में देखिए- मुल्ला-मौलवियों के हस्तक्षेप को पसंद नहीं करता था सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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