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शाहजहाँ की बीमारी (10)

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शाहजहाँ की बीमारी

शाहजहाँ (Shahjahan) की बीमारी के समाचार लाल किले (Red Fort) की दीवारों से बाहर निकलकर पूरी सल्तनत में तेजी से फैलते जा रहे थे। ये खबरें मुगलियां शहजादों को तख्त पर कब्जा करने के लिए उकसाने वाली थीं।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने न केवल पूरे हिन्दुस्तान पर मजबूती से नियंत्रण कर रखा था अपितु मारवाड़ (Marwar or Jodhpur), आम्बेर (Amber or Amer), बूंदी (Bundi) तथा किशनगढ़ (Kishangarh) के राजाओं के बल पर लगभग आधे मध्य एशिया पर भी नियंत्रण कर लिया था। फिर भी शाहजहाँ  अपने हरम को और अपने पुत्रों पर नियंत्रण नहीं रख सका था। जिस प्रकार वह अपनी उद्दाम वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सका था, उसी प्रकार वह अपने शहजादों में बढ़ती दुश्मनी और शहजादियों में बढ़ती सत्ता की हवस पर भी नियंत्रण नहीं रख सका था।

शाहजहाँ (Shahjahan) की बीमारी की खबरें लाल किले (Red Fort) से बाहर निकलकर रियाया में फैल जाने से परिस्थितियां पूरी तरह शाहजहाँ के नियंत्रण से बाहर थीं और समय इतना आगे निकल गया था कि उसके किए कुछ भी ठीक होने वाला नहीं था। जाने क्यों उसे ऐसा लगता था कि अब वह घड़ी आने ही वाली है जब उसके शहजाद नंगी तलवारें लेकर एक दूसरे का खून बहाने के लिए निकल पड़ेंगे और उन सबकी लाशें धरती पर पड़ी होंगी।

बूढ़े शाहजहाँ की आंखों में रह-रह कर अपने भाइयों और चाचाओं के शव घूम जाते थे जिन्हें खुद शाहजहाँ ने मौत के मुंह में पहुंचाया था। ऐसी ही जाने कितनी ही भयावह बातें सोच-सोच कर बूढ़ा शाहजहाँ बार-बार बीमार पड़ जाता था। आगरा आकर वह फिर से बीमार पड़ गया। भरपूर इलाज के बावजूद उसकी बीमारी में दिन पर दिन वृद्धि होती जा रही थी।

पिछली बार के अनुभव के कारण इस बार शाहजहां (Shahjahan) ने झरोखा दर्शन देना बंद नहीं किया। चाहे बहुत थोड़ी देर के लिए ही सही बादशाह लाल किले (Red Fort) के झरोखे से रियाया के सामने जलवा अफरोज जरूर होता था।

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शाहजहाँ की बीमारी बढ़ती जा रही थी और एक दिन बादशाह के लिए शैय्या से उठकर खड़ा होना भी कठिन हो गया। उस दिन से उसने झरोखा दर्शन देना भी बंद कर दिया।

एक दिन उसने राजधानी में मौजूद अपने तमाम अमीरों, उमरावों, सूबेदारों, अहलकारों और हिन्दू सरदारों को बुलाकर कहा- ‘हमने पिछले पच्चीस साल से शहजादे दारा शुकोह (Dara Shikoh or Dara Shukoh) को वली-ए-अहद घोषित कर रखा है। हमारी तबियत नासाज रहती है तथा सल्तनत के बहुत से फैसले तुरंत लेने होते हैं। अतः आप सब आज से वली-ए-अहद शहजादे दारा को मुगलिया तख्त का अगला वारिस समझें तथा केवल उसके आदेश ही स्वीकार करें। सल्तनत का काम वैसे ही चलता रहे, जैसे आज तक चलता आया है।’

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दारा शिकोह को सल्तनत के सारे अधिकार दिए जाने की खबर आनन-फानन में न केवल लाल किले (Red Fort) में और राजधानी आगरा में अपितु पंख लगाकर पूरी सल्तन में फैल गई। जैसे ही बादशाह ने शहजादे दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, उसके शेष तीनों शहजादों (Shah Shuja, Aurangzeb, Murad Bakhsh) और उनके पक्ष की शहजादियों (Jahanara Begum, Roshanara Begum, Gauharara Begum, Hoshmand Banu Begum, and Nithar Begum) के सब्र का बांध टूट गया और वे दारा शिकोह तथा जहाँआरा के खून के प्यासे हो उठे। आगरा के विशाल लाल किले (Red Fort) में अकेली जहाँआरा (Jahanara) ही ऐसी थी जिसे इस खबर को पाकर प्रसन्नता हुई थी। जिस प्रकार दारा शिकोह अपने पिता शाहजहाँ से थोड़ा-बहुत प्रेम करता था, उसी प्रकार शहजादी जहाँआरा भी अपने पिता शाहजहाँ (Shahjahan) से सहानुभूति रखती थी और केवल वही थी जो अपने पिता की मुश्किलों को समझती थी तथा उन्हें सुलझाने में अपने भाई दारा शिकोह की मदद करती थी। दारा शिकोह अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु था। दारा की लाख कमजोरियों को जानने के बावजूद शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। राजधानी में रहने के कारण दारा, सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। रियाया भी दारा शिकोह को चाहती थी।

यद्यपि उस काल में मुगल सल्तनत (Mughal Sultanate) में 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत मुसलमान थे तथापि रियाया से आशय केवल मुस्लिम जनसंख्या से होता था। यह बात मुस्लिम अमीरों को बहुत अखरती थी कि दारा शिकोह, मुस्लिम रियाया के साथ-साथ हिन्दुओं में भी बहुत लोकप्रिय था।

राजधानी में रहने के कारण दारा सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था। दारा के तीनों छोटे भाई एक दूसरे के खून के प्यासे होने के बाद भी दारा शिकोह को अपना पहला शत्रु मानते थे। क्योंकि तीनों शहजादों को उसी से सर्वाधिक खतरा था। वह बरसों से राजधानी दिल्ली में जमा हुआ था तथा उसने अमीरों के दिलों में भी जगह बना ली थी।

इसलिए लाल किले (Red Fort) में रहने वाला दारा शिकोह बाकी के तीनों शहजादों का सम्मलित शत्रु था। उनमें से प्रत्येक शहजादा यह चाहता था कि किसी तरह दारा शिकोह मर जाए शेष दो भाइयों से तो वह आसानी से निबट लेगा। ऐसा नहीं था कि दारा को अपने छोटे भाइयों और बहिनों के रवैये की जानकारी नहीं थी।

दारा कभी-कभी दबी जुबान से अपने पिता से उनकी शिकायत भी करता था किंतु शाहजहाँ की बीमारी शाहजहाँ (Shahjahan) को सही निर्णय नहीं लेने देती थी और पिता की इच्छा के बिना दारा किसी के भी खिलाफ कोई भी कार्यवाही करने में असमर्थ था। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब का भय (11)

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औरंगजेब का भय

औरंगजेब का भय (Auranzeb Fear) न केवल लाल किले (Red Fort) की दीवारों के भीतर अपितु सम्पूर्ण मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) में समाता जा रहा है। हर कोई भयभीत था। यहाँ तक कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) भी, जहानआरा (Jahanara) भी और स्वयं शाहजहाँ (Shahjahan)भी!

शाहजहां के बड़े पुत्र और मुगलिया सल्तनत के वली ए अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपने तीनों छोटे भाइयों की बौद्धिक और सामरिक क्षमताओं की अच्छी जानकारी थी। इसलिए वह उनकी हर चाल पर पूरी दृष्टि रखता था। तीनों भाइयों से उसे अलग-अलग तरह के खतरे थे।

शाहजहाँ (Shahjahan) का दूसरे नम्बर का पुत्र शाहशुजा (Shah Shuja) इस समय बंगाल का सूबेदार था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी और अयोग्य होने के कारण उसमें इतनी विशाल मुगलिया सल्तनत को सँभालने की योग्यता नहीं थी। इस कारण राज्य के मुल्ला-मौलवी, अमीर तथा हिन्दू राजा उसके पक्ष में नहीं थे। इसलिए दारा उसकी तरफ से कम आशंकित रहता था।

शाहजहाँ (Shahjahan) का चौथे नम्बर का पुत्र मुराद (Murad Bakhsh), गुजरात और मालवा का सूबेदार था। वह भावुक तथा जल्दबाज युवक था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की इच्छा अत्यधिक थी। दिल्ली के अमीर-उमराव उसे बिगड़ैल शहजादा समझ कर उसके प्रति उदासीन रहा करते थे। इसलिए दारा भी उसकी ओर से अधिक चिंतित नहीं रहता था।

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शाहजहाँ (Shahjahan) का तीसरा पुत्र औरंगजेब (Aurangzeb), कट्टर सुन्नी मुसलमान (Sunni Musalman) था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे सल्तनत के कट्टर मुसलमानों, अमीरों, उलेमाओं और मौलवियों का भारी समर्थन प्राप्त था जिनकी संख्या, सहिष्णु मुसलमानों से बहुत अधिक थी। उसने कुरान का गहन अध्ययन किया था तथा वह टोपी सिलकर अपना खर्चा चलाता था। इस कारण पूरी सल्तनत में उसकी विद्वता और सादगी के किस्से विख्यात थे। इस कारण मुसलमान रियाया में उसे लोकप्रियता प्राप्त थी।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने कई बार कट्टर मुल्ला-मौलवियों, अमीर-उमरावों तथा सूबेदारों को दण्डित किया था इसलिए वे दारा शिकोह से दुश्मनी रखते थे और औरंगजेब के प्रति जबर्दस्त समर्थन रखते थे। दारा और औरंगजेब दोनों ही उन मुल्ला-मौलवियों, अमीर-उमरावों तथा सूबेदारों के रुख के बारे में अच्छी तरह जानते थे।

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राजधानी से दूर रहने तथा हर समय युद्ध में व्यस्त रहने के कारण औरंगजेब (Auranzeb) को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। क्रूरता और मक्कारी उसकी शक्ल से ही टपकती थी। जब वह किसी को देखने के लिए आँखें उठाता था तो सामने वाले को लगता था जैसे उसने दो जलते हुए अंगारे देख लिए हों। इस कारण हर कोई औरंगजेब को देखते ही भयभीत हो जाता था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण औरंगज़ेब अपनी बड़ी से बड़ी पराजय को विजय में बदलना जानता था किंतु दारा शिकोह (Dara Shikoh) के राजधानी में रहने तथा शाहजहाँ (Shahjahan) का चहेता होने के कारण औरंगजेब, दारा के सामने स्वयं को असहाय अनुभव करता था। दारा शिकोह यद्यपि अपने तीनों भाइयों तथा उनके पक्ष की शहजादियों की ओर से सतर्क रहता था तथापि औरंगजेब के नापाक इरादों से सर्वाधिक भयभीत रहता था। इसलिए दारा, औरंगज़ेब को किसी एक स्थान अथवा किसी एक मोर्चे पर टिके नहीं रहने देता था। वह औरंगज़ेब को कभी अफगानिस्तान के मोर्चे पर, कभी दक्षिण के मोर्चे पर तो कभी बंगाल के मोर्चे पर भेज देता था। औरंगजेब (Aurangzeb) का भय इतना अधिक था कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) किसी भी अभियान के लिए औरंगजेब को पर्याप्त सेना और पर्याप्त धन नहीं देता था ताकि औरंगजेब को सैनिक सफलताएं न मिल सकें और न ही कभी औरंगजेब उन सेनाओं को लेकर राजधानी में घुस सके।

औरंगजेब (Aurangzeb) के साथ जो हिन्दू सेना होती थी, उसका आकार अपेक्षाकृत बड़ा रखा जाता था ताकि बगावत की स्थिति में औरंगजेब पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके। दारा ने एक व्यवस्था और की थी, उसने औरंगजेब के साथ नियुक्त रहने वाले हिन्दू राजाओं को आदेश दे रखे थे कि औरंगजेब की सेनाएं दुश्मन के मुल्कों से कितना धन लूटती हैं, उस धन की सूची नियमित रूप से राजधानी में भिजवाएं।

औरंगजेब (Aurangzeb) का भय व्यर्थ नहीं था किंतु इन विषम परिस्थितियों में औरंगजेब के लिए सबसे अधिक तसल्ली देने योग्य बात यह थी कि आम्बेर का मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) औरंगजेब से मित्रता मानता था। इसलिए औरंगज़ेब चाहता था कि मिर्जा राजा जयसिंह की नियुक्ति हर समय औरंगज़ेब के साथ की जाए किंतु दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपनी तरफ से प्रयास करके मिर्जा राजा जयसिंह की बजाय, मारवाड़ के राठौड़ राजा जसवंतसिंह की नियुक्ति औरंगज़ेब के साथ करता था। महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) के सामने औरंगज़ेब की एक नहीं चलती थी और दोनों ही एक दूसरे को नापसंद करते थे।

जिस तरह औरंगजेब (Aurangzeb) चाहता था कि आम्बेर के राजा उसके साथ रहें, उसी तरह आम्बेर (Amber) का मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) भी चाहता था कि उसकी नियुक्ति औरंगजेब के साथ रहे क्योंकि आम्बेर के राजा को मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की जितनी अधिक समझ थी, उतनी अन्य हिन्दू राजाओं को नहीं थी।

मिर्जा राजा जयसिंह अच्छी तरह समझता था कि दारा भले ही कितने मंसूबे क्यों न बांध ले, दारा शिकोह-औरंगजेब संघर्ष (Dara Shikoh Aurangzeb conflict) में औरंगजेब जीतेगा और एक न एक दिन मुगलों के तख्त पर जरूर बैठेगा। यही कारण था कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) कभी भी मिर्जा राजा जयसिंह और औरंगजेब के गठजोड़ को पक्का नहीं होने देना चाहता था। इन सब परिस्थितियों के कारण मुगलिया राजनीति (Mughal Politics पर से शाहजहाँ (Shahjahan) की पकड़ ढीली पड़ती जा रही थी।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राठौड़ राजा (12)

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राठौड़ राजा

शाहजहाँ (Shahjahan) के काल मेंं तीन राठौड़ राजा (Rathore Raja) बहुत प्रबल थे। ये तीनों ही औरंगजेब (Aurangzeb) की अमानवीय नीतियों एवं मजहबी कट्टरता से परिचित थे। इस कारण राठौड़ राजाओं को औरंगजेब बिल्कुल पसंद नहीं था!

इन तीनों राठौड़ राजा (Rathore Raja) किसी न किसी मोर्चे पर औरंगजेब के साथ रहे थे और इन तीनों ने ही राजाओं ने कभी कोई युद्ध नहीं हारा था किंतु कभी भी किसी भी युद्ध की जीत का सेहरा अपने सिर पर नहीं लिया था। फिर भी औरंगजेब (Aurangzeb) इन तीनों राठौड़ राजाओं को पसंद नहीं करता था।

दूसरी ओर औरंगजेब के घमण्डी स्वभाव के कारण महाराजा जसवंतसिंह राठौड़ (Maharaja Jaswant singh Rathore), महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) तथा महाराजा कर्णसिंह राठौड़ (Maharaja Karnsingh Rathore) भी औरंगज़ेब को पसंद नहीं करते थे तथा वे तीनों ही सल्तनत के अगले बादशाह के रूप में दारा शिकोह (Dara Shikoh) को देखा करते थे।

यदि ये तीनों राठौड़ राजा (Rathore Raja) समय रहते ही औरंगजेब के विरुद्ध कोई मोर्चा बना लिए होते तो भारत का इतिहास पूरी तरह बदल सकता था।

औरंगजेब इन तीनों हिन्दू राजाओं की राजनीति को अच्छी तरह समझता था तथा दारा शिकोह (Dara Shikoh) से उनके सम्बन्धों के कारण मन ही मन भयभीत भी रहता था। इसलिए वह ऊपर से तो इन हिन्दू राजाओं से अपने सम्बन्ध खराब नहीं करता था किंतु मन ही मन यह इच्छा अवश्य रखता था कि मौका मिलते ही इन तीनों को निबटा दे।

औरंगजेब की दृष्टि में ये तीनों राठौड़ राजा (Rathore Raja) दारा के साथ मिलकर बादशाह का दिमार्ग तीनों छोटे शहजादों की ओर से फेरते थे। इसलिए औरंगजेब न केवल दारा शिकोह तथा इन तीनों राठौड़ राजाओं से अपितु स्वयं शाहजहाँ से भी बेइंतहा नफरत करता था।

औरंगजेब के सौभाग्य से ये तीनों राठौड़ राजा (Rathore Raja) आपस में एक नहीं थे। यद्यपि वे एक ही कुल में उत्पन्न हुए थे, उनका पूर्वज जोधा उन तीनों के लिए ही श्रद्धा का पात्र था और तीनों राठौड़ राजा धर्म की लीक पर चलने वाले थे।

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जिस समय शाहजहाँ (Shahjahan) आगरा पहुंचकर दुबारा बीमार पड़ा, औरंगजेब, आगरा से लगभग ढाई हजार किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण का सूबेदार था। न केवल लाल किले (Erd Fort) की दीवारों से अपितु एक दूसरे से भी हजारों किलोमीटर दूर बैठे शाहशुजा (Shahshuja), औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुराद बक्श पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। इन पत्रों के माध्यम से ही उनमें सल्तनत के विभाजन के लिए समझौता हो गया।

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हालांकि तीनों ही जानते थे कि इस समझौते का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि हर हाल में केवल एक ही शहजादा पूरी सल्तनत (Mughal Sultanate) पर कब्जा करेगा और बाकी के तीनों शहजादों को या तो अंधे होकर किसी किले में पड़े रहना होगा या किसी युद्ध के मैदान में किसी तलवार के नीचे अपने प्राण छोड़ने होंगे। फिर भी इस समय तीनों का लक्ष्य एक ही था- दारा शिकोह (Dara Shikoh) । इसलिए इन तीनों शाहजादों ने सबसे पहले दारा की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया। जब औरंगज़ेब ने सुना कि बादशाह ने अमीरों और अहलकारों को आदेश दिया है कि वे केवल दारा शिकोह के आदेश स्वीकार करें तो वह समझ गया कि शाहजहाँ (Shahjahan) के इस कदम से लाल किला (Red Fort) औरंगजेब (Aurangzeb) की पहुँच से बहुत दूर हो गया है। बहिन रौशनआरा (Roshanara) द्वारा भेजी गई इस सूचना से औरंगजेब परेशान तो हुआ किंतु वह जल्दी से हार मानने वाला नहीं था। औरंगज़ेब न केवल हिन्दुस्तान की किस्मत का मालिक बनना चाहता था अपितु बड़े भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) के कारण मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) जिस गलत दिशा में चल पड़ी थी, उस दिशा का मुँह भी मोड़ देना चाहता था।

औरंगजेब (Aurangzeb) की दृष्टि में उसका बड़ा भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) एक काफिर (Kafir or Non-believer) था जो इस्लाम (Islam) के काम को आगे बढ़ाने की बजाय काफिर हिन्दुओं को बढ़ावा देता था तथा हिन्दू ग्रंथों का अरबी एवं फारसी में अनुवाद करवाता था। इस नाते वह इस्लाम का अपराधी था। तीनों राठौड़ राजा (Rathore Raja) इसी कारण औरंगजेब की बजाय दारा शिकोह को पसंद करते थे।

औरंगजेब (Aurangzeb) इस समय लाल किले से ढाई हजार किलोमीटर दूर दक्षिण के भयानक मोर्चों पर शिया मुसलमानों से जूझ रहा था। यहाँ भी औरंगज़ेब के इरादे दारा शिकोह से मेल नहीं खाते थे। दारा शिकोह (Dara Shikoh) केवल यह चाहता था कि दक्षिण के शिया राज्य मुगलों की अधीनता स्वीकार करके प्रतिवर्ष निर्धारित कर दिया करें किंतु औरंगज़ेब इन शिया राज्यों का उच्छेदन करके उन्हें पूर्णतः नष्ट करना चाहता था। उसकी दृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।

शियाओं के प्रति दारा शिकोह (Dara Shikoh) की नीतियों को लेकर औरंगजेब (Aurangzeb) अपने दोस्तों के सामने यह कहने में नहीं हिचकिचाता था कि कि लाल किले का असली वारिस केवल एक सुन्नी (Sunni Musalman) ही हो सकता है और वह केवल औरंगजेब ही है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन हिन्दुस्तान पर भी फारस की तरह शियाओं (Shiya Musalman) का राज्य हो जाएगा। ऐसा कहते हुए औरंगजेब (Aurangzeb) एक पल के लिए भी नहीं सोचता था कि उसकी अपनी बेगम दिलरास बानू (Dil-Ras-Banu or Rabia-ud-Daurani) भी एक शिया अमीर की बेटी है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहशुजा (13)

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शाहशुजा

दूसरे शहजादों की तरह शाहशुजा (Shah Shuja) भी लाल किले (Red Forts)और तख्ते ताउस (Takht-e-Taus) पर कब्जा करने का स्वप्न देखा करता था। उसने स्वयं को बादशाह घोषित करके आगरा कूच कर दिया!

ई.1657 में शाहजहाँ (Shahjahan) के दुबारा बीमार पड़ने की सूचना मिलते ही दक्षिण में नियुक्त औरंगजेब (Aurangzeb) और मालवा में नियुक्त मुरादबक्श ने अपने-अपने मौलवियों से बड़े भाई दारा के विरुद्ध अलग-अलग फतवे जारी करवाए जिनमें दारा शिकोह (Dara Shikoh) को काफ़ि़र घोषित किया गया।

औरंगजेब (Aurangzeb) और मुरादबक्श के इस कदम से मुगलिया सल्तनत की राजनीति (Mughal Politics) में सक्रिय सुन्नी अमीरों का ध्यान बरबस ही इन दोनों शहजादों की ओर गया। इन अमीरों को मुगलों के अगले वारिस के रूप में दारा के स्थान पर मुरादबक्श तथा औरंगजेब, अधिक अच्छे लगते थे किंतु अब इन दोनों शहजादों ने अपने इरादे शीशे की तरह साफ कर दिए थे कि वे दाराशिकोह को कड़ी चुनौती देंगे।

औरंगजेब (Aurangzeb) और मुरादबक्श द्वारा दारा शिकोह (Dara Shikoh) को काफिर घोषित करते ही शाहजहाँ के दूसरे नम्बर के शहजादे शाहशुजा (Shah Shuja) ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया जो इन दिनों बंगाल का सूबेदार था। औरंगज़ेब पहले से ही उसे अपनी चिट्ठियों में हिन्दुस्तान का भावी बादशाह कहकर सम्बोधित करता रहा था। इस कारण शाहशुजा (Shah Shuja) के हौंसले बुलंद थे। उसे लगता था कि औरंगज़ेब और मुराद, दारा शिकोह की जगह शाहशुजा को बादशाह के तख्त पर बैठे हुए देखना चाहते हैं।

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स्वयं को बादशाह घोषित करने के बाद शाहशुजा (Shah Shuja) ने अपनी सेना के साथ आगरा के लिए कूच कर दिया और अपने दोनों छोटे भाइयों को परवाने भेज कर आदेश दिए कि वे भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ बिना किसी विलम्ब के आगरा की ओर कूच करें। शुजा ने अपनी सेना में प्रचारित किया कि दुष्ट दारा शिकोह ने बादशाह सलामत को जहर देकर आगरा पर कब्जा कर लिया है इसलिए मैं दारा को दण्ड देने जा रहा हूँ।

जब दारा शिकोह (Dara Shikoh) को शाहशुजा के आगरा की तरफ कूच करने की सूचना मिली तो उसने बादशाह के दस्तखतों एवं मुहर से शाहशुजा को शाही फरमान भिजवाया कि वह फौरन अपनी सेनाओं के साथ बंगाल की ओर लौट जाए किंतु शाहशुजा ने शाही फरमान की तनिक भी परवाह नहीं की और वह आगरा की ओर बढ़ता रहा।

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शुजा ने राजमहल नामक स्थान पर अपनी ताजपोशी की रस्म करवाई और अपनी विशाल सेनाओं को लेकर बड़ी तेजी से गंगा के किनारे-किनारे आगे बढ़ा। मार्ग में उसे किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा और जनवरी 1658 में वह बनारस तक आ पहुँचा। विद्रोही शाहशुजा (Shah Shuja) का मार्ग रोकने के लिए वली-ए-अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने अपने पुत्र सुलेमान शिकोह की अध्यक्षता में एक सेना बनारस की तरफ भेजी। आम्बेर के मिर्जा राजा जयसिंह तथा दिलेर खाँ रूहेला को भी सुलेमान शिकोह की सहायता के लिए भेजा गया। मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) को सुलेमान शिकोह का ‘अतालीक और कारगुजार’ घोषित किया गया। मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) भी उस समय आगरा में थे। इसलिए उन्हें भी शाहशुजा को रोकने के लिए अलग से रवाना किया गया। दारा शिकोह द्वारा भेजी गई सारी सेनाएं बनारस में जाकर रुक र्गईं। दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह ने एक बार फिर बादशाही फरमान अपने चाचा शाहशुजा को भिजवाया कि वह तुरंत बंगाल की तरफ लौट जाए तथा फिर किसी मुबारक समय में बादशाह के कदमों में गिरकर अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे किंतु शाहशुजा ने इस बार भी शाही फरमान को हवा में उड़ा दिया।

आखिर शाहशुजा की तरफ से पूरी तरह निराश होकर सुलेमान शिकोह ने शाही सेनाओं को आदेश दिए कि वे शाहशुजा की सेनाओं को खत्म कर दें तथा बगावत पर उतारू शहजादे को हर हाल में बंदी बना कर हमारे हुजूर में पेश करें। बनारस के निकट बहादुरपुर नामक स्थान पर दोनों ओर की सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। जब शाहशुजा की सेना परास्त होने लगी तो उसने सुलेमान शिकोह के सामने सन्धि का प्रस्ताव रखा।

हालांकि आगरा में बैठा दारा शिकोह (Dara Shikoh) चाहता था कि सुलेमान, शाहशुजा से सख्ती से निबटे किंतु दारा यह भी जान चुका था कि शहजादा मुराद गुजरात से और शहजादा औरंगज़ेब दक्षिण से अपनी-अपनी सेनाएं लेकर राजधानी आगरा की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए दारा ने शाहजहाँ से बात की तथा शाहशुजा द्वारा भेजे गए संधि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। शाहशुजा को बंगाल चले जाने की अनुमति दे दी गई तथा सुलेमान शिकोह एवं मिर्जा राजा जयसिंह को आगरा बुला लिया गया।

इस सन्धि के अनुसार शाहशुजा (Shah Shuja) को उड़ीसा, बंगाल तथा पूर्वी बिहार के प्रान्त दिए गए। इसके बदले में शाहशुजा ने भविष्य में फिर कभी बगावत नहीं करने तथा मुंगेर के पास स्थित राजमहल को अपनी राजधानी बनाकर वहीं तक सीमित रहने का वचन दिया।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) समझ रहा था कि इस संधि के बाद शाहशुजा शांत होकर चला जाएगा किंतु शाहशुजा तो मुराद और औरंगजेब (Aurangzeb) के आगरा पहुंचने तक का समय चाहता था।

इसी दौरान शाहशुजा (Shah Shuja) ने सुना कि शहजादे मुराद ने भी स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया है। इस पर शाहशुजा निराश हो गया तथा सुलेमान शिकोह से हुई संधि की शर्तों के अनुसार बंगाल के लिए रवाना हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुरादबक्श (14)

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मुरादबक्श

मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को अपने भाइयों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं था, उसे लगता था कि औरंगजेब (Aurangzeb) किसी भी समय स्वयं को बादशाह घोषित कर सकता है। इसलिए मुरादबक्श ने स्वयं को बादशाह घोषित करके आगरा कूच कर दिया!

उधर शाहशुजा भी औरंगजेब (Aurangzeb) पर विश्वास नहीं कर पा रहा था इसलिए वह अभियान पूरा किए बिना ही बंगाल के लिए रवाना हो गया। जब औरंगज़ेब को ज्ञात हुआ कि शाहशुजा अपनी सेनाएं लेकर बंगाल के लिए लौट रहा है, तब वह बहुत झल्लाया। औरंगजेब चाहता था कि शाहशुजा शाही सेना के साथ-साथ महाराजा जयसिंह तथा जसवंतसिंह की सेनाओं को बनारस में ही उलझाए रखे ताकि औरंगजेब आसानी से आगरा तक पहुँच जाए किंतु शाहशुजा ने औरंगज़ेब की योजना पर पानी फेर दिया था।

हालांकि औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुरादबक्श दोनों ने शाहशुजा को लिखे पत्रों में शाहशुजा को हिन्दुस्तान का अगला बादशाह कहकर सम्बोधित किया था किंतु जिस समय शाहशुजा की सेनाएं बनारस में शाही सेनाओं से युद्ध कर रही थीं, तब कुछ ऐसे समाचार मिले कि शाहशुजा आसानी से दारा को परास्त कर देगा। अतः मुरादबक्श चिंता में पड़ गया।

मुरादबक्श (Murad Bakhsh) ने अपनी पहले से तय नीति छोड़ दी तथा अपने वजीर अलीनकी का कत्ल करके स्वयं को गुजरात का बादशाह घोषित कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाए। वजीर अलीनकी, बादशाह शाहजहाँ तथा वली-ए-अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) का विश्वसनीय था। मुगलिया सल्तनत से वफादारी करने की कीमत उसे अपनी गर्दन देकर चुकानी पड़ी थी।

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मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को भरोसा था कि उसका मंझला भाई औरंगजेब (Aurangzeb) एक फकीर तथा औलिया की जिंदगी बिताना चाहता है इसलिए उसे मुगलों के ताज और तख्त से कोई लेना-देना नहीं है। वह अवश्य ही मुराद बख्श को बादशाह स्वीकार कर लेगा। इसलिए मुराद एक ओर तो दक्षिण की तरफ से आ रही औरंगजेब की सेनाओं की टोह लेता रहा और दूसरी ओर स्वयं भी मंथर गति से आगे बढ़ता रहा। अंत में मुराद दिपालपुर में जाकर रुक गया।

यहीं पर औरंगजेब (Aurangzeb) की सेनाएँ, मुरादबक्श (Murad Bakhsh) की सेनाओं से आकर मिल गईं। दोनों भाई बगल में छुरियां लेकर बगलगीर हुए। औरंगजेब ने मुराद की बड़ी हौंसला अफजाई की तथा इस बात के लिए उसकी पीठ ठोकी कि उसने खुद को बादशाह घोषित कर दिया है। औरंगजेब ने मुराद को समझाया कि शाहशुजा तो वैसे भी काफिर दारा से हारकर बंगाल भाग गया है और हारा हुआ शहजादा बादशाह कैसे बन सकता है! इसलिए अब बादशाह बनने के लिए केवल मुराद बख्श ही सबसे प्रबल दावेदार है।

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राज्य के लालची मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को औरंगज़ेब की बातों से बड़ी तसल्ली पहुंची। मुराद को औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथ की तस्बीह और माथे पर रखी हुई नमाजी टोपी दिखाई देती थी किंतु औरंगज़ेब की आँखों में भरी हुई मक्कारी और दिल में भरे हुए नफरत के शोले नहीं दिखते थे। मुरादबख्श सपने में भी नहीं सोच सकता था कि विनम्रता का अवतार बना हुआ कपटी औरंगज़ेब पहले तो मुराद का उपयोग दारा शिकोह के विरुद्ध करेगा और उसके बाद मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को भी उसी जहन्नुम में पहुँचा देगा जहाँ वह आज तक अपने दुश्मनों को पहुँचाता आया था। जब राजधानी में बैठे दारा शिकोह ने सुना कि दोनों बागी शाहजादों की सेनाएँ दिपालपुर में आकर मिल गई हैं तो दारा ने बादशाह से फरमान जारी करवाया कि मारवाड़ नरेश जसवन्तसिंह अपनी सेनाएं लेकर बनारस से सीधे ही दिपालपुर की तरफ बढ़ें और उज्जैन में क्षिप्रा के उत्तरी तट पर रुककर औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद (Murad Bakhsh) की सेनाओं को आगे बढ़ने से रोकें। बादशाह का आदेश पाते ही महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने अपनी सेनाओं का मुँह उज्जैन की तरफ मोड़ दिया।

उधर महाराजा जसवंतसिंह ने उज्जैन की राह ली और इधर वली-ए-अहद दारा शिकोह ने शहजादे सुलेमान शिकोह तथा मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) को जल्द से जल्द आगरा पहुंचने के आदेश दुबारा भिजवाए। शाही फरमान मिलने के बाद शहजादा सुलेमान तथा मिर्जाराजा जयसिंह ताबड़-तोड़ चलते हुए आगरा की तरफ बढ़ने लगे।

इस बीच दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने आगरा में मौजूद शाही सेना का एक हिस्सा आगरा के समस्त बाहरी दरवाजों पर तैनात कर दिया तथा शेष सेना को कासिम खाँ की अगुआई में उज्जैन की तरफ रवाना किया ताकि वह महाराजा जसवंतसिंह की सहायता कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहजहाँ का भय (15)

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शाहजहाँ का भय

शाहजहाँ का भय भारत के मुगल कालीन इतिहास की एक विडम्बना है। उस काल में धरती भर के शासकों में सबसे शक्तिशाली बादशाह जिसके अधीन लाखों सैनिकों की फौज थी, अपने ही बच्चों से डर गया और शाहजहाँ (Shahjahan) ने स्वयं को अपने महल में बंद कर लिया!

जब बादशाह को ज्ञात हुआ कि वली-ए-अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने आगरा की हिफाजत करने के लिए अपनी सेनाओं को आगरा शहर के दरवाजों के बाहर तैनात कर दिया है तो शाहजहाँ, दारा की ओर से भी आशंकित हो गया!

शाहजहाँ (Shahjahan) ने रूपनगढ़ के राजा रूपसिंह राठौड़ (Raja Roopsingh Rathore) को बुलाकर आदेश दिए कि वह अपने सैनिकों को हर समय बादशाही महल के बाहर नियुक्त रखे। लाल किले के समस्त दरवाजों पर भी महाराजा रूपसिंह के सिपाहियों का पहरा रहे और शाही सेनाएं शहजादे दारा शिकोह (Dara Shikoh) के निर्देशन में आगरा शहर के बाहर तैनात रहें।

बादशाह ने आदेश दिए कि आगरा शहर के दो दरवाजों को छोड़कर शेष समस्त दरवाजे बंद कर दिए जाएं जिनके बाहर शाही सेनाएं रहें और भीतर की ओर राजा रूपसिंह राठौड़ (Raja Roopsingh Rathore) की टुकड़ियां रहें। महाराजा रूपसिंह के सिपाही इस बात का ध्यान रखें कि स्वयं वली-ए-अहद केवल दस सिपाहियों के साथ आगरा शहर में दाखिल हों। शहजादे दारा शिकोह को दिन के समय लाल किले में रहने की छूट रहेगी किंतु रात के समय शहजादे को लाल किले से बाहर जाना होगा।

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) शाहजहाँ (Shahjahan) के इन आदेशों को सुनकर सन्न रह गया। भयभीत बूढ़े बादशाह ने अपने शहजादों के डर से कुछ ऐसा कर दिया था जिसके कारण दारा की स्थिति सल्तनत में पहले जैसी नहीं रही। जब स्वयं दारा पर ही राजा रूपसिंह राठौड़ (Raja Roopsingh Rathore) का अंकुश लगा दिया गया था तो दारा किस मुंह से दूसरे अमीरों एवं राजाओं को औरंगजेब से लड़ने के लिए आदेश दे सकता था!

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने अपने आशंकित और बीमार पिता के सामने कुरान उठाकर कसम उठाई कि वह कभी भी बादशाह से दगा नहीं करेगा तथा बादशाह सलामत के समस्त आदेशों की अक्षरशः पालना करेगा फिर भी बादशाह को उस पर विश्वास नहीं हुआ। बादशाह ने महाराजा रूपसिंह को बुलकार और भी सख्त लहजे में पाबंद किया कि जब तब बादशाह स्वयं बुलाकर राजा रूपसिंह राठौड़ (Raja Roopsingh Rathore) को आदेश न दे तब तक महाराजा अपनी सेनओं की नियुक्ति कहीं अन्यत्र न करे और महाराजा स्वयं दिन में कम से कम दो बार बादशाह के हुजूर में हाजिर होकर बादशाह के हालचाल पूछे। बादशाह ने अपनी सबसे चहेती शहजादी जहाँआरा (Jahanara) को आदेश दिए कि वह केवल दिन के समय बादशाह के हुजूर में रहेगी, रात होते ही उसे भी ख्वाबगाह से बाहर जाना होगा। बादशाह के इस आदेश से जहाँआरा सकते में आ गई। वह आँखों में आँसू भरकर और हाथों में कुरान लेकर अपने पिता के समक्ष पेश हुई तथा अपने पिता के कदमों पर गिरकर बोली- ‘चाहे तो मेरी देह की खाल उधड़वाकर मेरे शरीर से अलग कर दें किंतु अब्बा हुजूर के मुकद्दस कदमों से मुझे एक लम्हे के लिए भी दूर न करें। मैं दीवारों से सिर टकराकर जान दे दूंगी किंतु अपने रहमदिल पिता को अपनी नजरों से एक लम्हे के लिए भी दूर नहीं करूंगी।’

बूढ़ा और बीमार शाहजहाँ (Shahjahan), अपनी प्यारी बेटी जहाँआरा (Jahanara) के आंसुओं को देखकर पिघल गया जिसने जीवन भर अपने बेरहम पिता की हर ख्चाहिश को पूरा किया था। बादशाह ने बेटी जहाँआरा को हर समय अपने हुजूर में पेश रहने की अनुमति दे दी। इससे शाहजहाँ का भय तो कम नहीं हुआ किंतु उसे दिलासा देने वाली बेटी उसके पास अवश्य आ गई थी।

जब रियाया ने देखा कि शाही सेना ने आगरा शहर को तथा राजा रूपसिंह राठौड़ (Raja Roopsingh Rathore) के राजपूतों ने लाल किले के चारों तरफ से घेर लिया है, तो लोगों की समझ में कुछ नहीं आया। शहर में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। बाजार बंद हो गए और लोगों को सौदा-सुल्फा लेने में भी कठिनाई होने लगी।

शहजादी रौशनआरा ने आगरा का सारा हाल और शाहजहाँ (Shahjahan) का भय अपने भाई औरंगज़ेब को लिख भेजा। बाकी शहजादियाँ भी कहाँ पीछे रहने वाली थीं। शहजादी गौहर आरा ने मुराद को और पुरहुनार बेगम ने शाहशुजा को बड़ी तफसील से खत लिखकर भिजवाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कासिम खाँ की नमकहरामी (16)

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कासिम खाँ की नमकहरामी
कासिम खाँ की नमकहरामी

दारा शिकोह (Dara Shikoh) को जिस कासिम खाँ पर पूरा विश्वास था, उसी कासिम खाँ की नमकहरामी ने महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) को पराजय और मृत्यु के कगार पर पहुंचा दिया। इससे दारा शिकोह की पराजय निश्चत हो गई।

एक जमाने में कासिम खाँ बहुत छोटा सा सिपाही हुआ करता था किंतु शहजादे दारा की मेहरबानियों से तरक्की करता हुआ अच्छा खासा मनसब पा गया था। दारा ने अपना विश्वसनीय आदमी जानकर ही उसे शाही सेना देकर औरंगजेब (Aurangzeb) और मुरादबक्श (Murad Bakhsh) की संयुक्त सेनाओं का रास्ता रोकने में महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant singh) की सहायता करने भेजा था।

कुछ ही दिनों में कासिम खाँ, शाही सेना लेकर महाराजा जसवंतसिंह की सेनाओं से जा मिला। महाराजा को स्पष्ट आदेश दिया गया था कि उसे क्षिप्रा नदी के उत्तरी तट पर टिके रहना है, क्षिप्रा पार नहीं करती है तथा कासिम खाँ को आदेश दिया गया था कि उसे महाराजा जसवंतसिंह के कहने के मुताबिक रहकर लड़ाई लड़नी है, अपनी तरफ से कोई योजना नहीं बनानी है।

हालाांकि कासिम खाँ पर दारा के बहुत अहसान थे तथा उन अहसानों के बदले में यदि कासिम खाँ अपनी खाल उतरवाकर दारा के लिए जूतियां बनवाता तो भी कम था किंतु कासिम खाँ नमक हराम किस्म का आदमी था। भाग्य का साथ मिलने से तथा निरंतर तरक्की करते रहने से उसके हौंसले जरूरत से ज्यादा बुलंद हो गए थे। उसे शहजादे दारा का यह आदेश पसंद नहीं आया कि वह महाराजा जसवंतसिंह के मुताबिक रहकर लड़ाई लड़े।

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कासिम खाँ चाहता था कि जीत का सेहरा हर हाल में कासिम खाँ के सिर पर ही बंधे इसलिए महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant singh) को चाहिए था कि महाराजा, कासिम खाँ के नियंत्रण में रहकर लड़ाई लड़े लेकिन शाही आदेश जारी होने के कारण कासिम खाँ इन आदेशों में बदलाव नहीं कर सकता था। इसलिए कासिम खाँ ने महाराजा से झगड़ा करने की योजना बनाई ताकि असफलता का ठीकरा महाराजा जसवंतसिंह के सिर पर फोड़ा जा सके।

कासिम खाँ ने शाही सेना का असला-बारूद, क्षिप्रा के रेतीले तट पर अपने शिविर के पीछे की धरती में छिपा दिया तथा महाराजा को सुझाव दिया कि अभी औरंगजेब तथा मुरादबक्श की सेनाएं क्षिप्रा के उस पार नहीं आई हैं, इसलिए हम नदी पार करके वहाँ मोर्चा बांधते हैं। कासिम खाँ की योजना थी कि महाराजा को बहला-फुसला कर नदी के उस पार ले जाया जाए तथा ऐन वक्त पर पाला बदल कर औरंगजेब (Aurangzeb) से मेल कर लिया जाए। तब महाराजा को कैद करने में आसानी रहेगी।

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महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant singh) अनुशासन पसंद व्यक्ति थे। उन्होंने शाही आदेशों के खिलाफ जाने तथा कासिम खाँ के सुझाव को मानने से इन्कार कर दिया। इस पर दुष्ट कासिम खाँ ने मन ही मन एक योजना बनाई जिससे दारा शिकोह तथा महाराजा जसवंतसिंह दोनों से एक साथ पीछा छूट जाए। आखिर औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुरादबक्श की सेनाएं क्षिप्रा के उस तट पर आ पहुँचीं। महाराजा जसवंतसिंह तथा कासिम खाँ की सेनाओं को देखकर औरंगजेब को पसीने आ गए। औरंगजेब (Aurangzeb) ने महाराजा जसवंतसिंह को अपने पक्ष में आने का निमंत्रण भिजवाया। महाराजा किसी भी कीमत पर बादशाह से धोखा नहीं करना चाहता था। बादशाह शाहजहाँ तथा वली-ए-अहद दारा शिकोह ने जीवन भर महाराजा से मित्रता निभाई थी तथा सम्मानपूर्वक व्यवहार किया था जबकि धूर्त औरंगजेब का व्यवहार और उसके इरादे किसी भी तरह महाराजा से छिपे हुए नहीं थे। इसलिए महाराजा ने औरंगज़ेब के पक्ष में जाने से इन्कार कर दिया। तीसरी रात जब कासिम खाँ, अमावस्या के अंधेरे का लाभ उठाकर चुपचाप क्षिप्रा नदी पार करके औरंगजेब से मिला तो औरंगजेब की बांछें खिल गईं।

उसे उम्मीद था कि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant singh) औरंगजेब (Aurangzeb) का प्रस्ताव स्वीकार कर लेगा तथा दारा की रहमतों पर पला-बढ़ा कासिम खाँ कभी भी औरंगजेब के पक्ष में नहीं आएगा किंतु हुआ बिल्कुल उलटा ही था। महाराजा अपनी जगह पर अडिग था और नमक हराम कासिम खाँ, औरंगजेब के खेमे में था।

कासिम खाँ ने औरंगजेब (Aurangzeb) को बताया कि क्षिप्रा के उस तट पर महाराजा अपनी सेनाओं के साथ अकेला पड़ा है तथा शाही सेना का असला-बारूद रेत में दबा हुआ है। अतः जब इस ओर से तोपें छोड़ी जाएंगी तो वे रेत में दबे हुए असले बारूद को भी सुलगा कर दोगुना विध्वंस मचाएंगी।

औरंगजेब ने मुराद (Murad Bakhsh) को अपने खेमे में बुलाया और उससे बात करके मुगल सेना को उसी समय महाराजा जसवंतसिंह पर धावा बोलने का आदेश दे दिया।

कासिम खाँ की नमकहरामी मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) के लिए खूनी जाल बिछाने में सफल हो गई। होती हुई दिखाई देने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

धरमत का युद्ध (17)

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धरमत का युद्ध

धरमत का युद्ध (War of Dharmat) न केवल मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) का खतरनाक मोड़ सिद्ध हुआ अपितु महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) के जीवन की भी अग्नि परीक्षा सिद्ध हुआ। महाराजा जसवंतसिंह की सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गई और वह अकेला ही जीवित जोधपुर पहुंच सका! इस युद्ध ने औरंगजेब (Aurangzeb) को शाही तख्त के और अधिक निकट धकेल दिया।

अगली सुबह भगवान सूर्य के क्षितिज पर प्रकट होने से पहले ही औरंगज़ेब और मुरादबक्श की सेनाओं ने नावों में बैठकर क्षिप्रा नदी पार कर ली। चूंकि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के शिविर तथा क्षिप्रा के बीच में कासिम खाँ ने शिविर लगा रखा था और महाराजा जसवंतसिंह को उसकी गद्दारी के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई थी, इसलिए महाराजा की सेनाएं औरंगजेब की सेनाओं के आगमन के सम्बन्ध में जान नहीं सकीं।

महाराजा जसवंतसिंह ने जहाँ शिविर लगा रखा था, उसके ठीक पीछे धरमत गांव स्थित था। जब शाही सेना की कुछ टुकड़ियों ने धरमत गांव में घुसकर महाराजा की सेना की पीछे से घेराबंदी आरम्भ की तो भी महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के आदमियों को इस कार्यवाही का बिल्कुल भी पता नहीं चला।

इस प्रकार महाराजा और उसके राजपूत, मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की खूनी चौसर में ऐसे स्थान पर घेर लिए गए जहाँ से न तो महाराजा जसवंतसिंह के लिए और न उसके राजपूतों के लिए बचकर निकल पाना संभव था।

देखते ही देखते दोनों पक्षों में धरमत का युद्ध (War of Dharmat) आरम्भ हो गया। महाराजा जसवन्तसिंह (Maharaja Jaswantsingh) तथा उसके राजपूत बड़ी वीरता के साथ लड़े किंतु आगे से औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुराद की सेना ने और पीछे से दुष्ट कासिम खाँ की शाही सेना ने महाराजा की सेना को ऐसे पीस दिया जैसे दो पाटों के बीच अनाज पीसा जाता है।

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जब महाराजा के सिपाही आगे की ओर भागने का प्रयास करते थे तो औरंगजेब (Aurangzeb) की तोपों की मार में आ जाते थे, साथ ही धरती में दबा हुआ बारूद भी फट जाता था। इस पर भी जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) तथा उसके राठौड़ सरदार जी-जान लगाकर लड़ते रहे। अंत में जब महाराजा बुरी तरह घायल हो गया तथा किसी अनहोनी की आशंका होने लगी तब महाराजा के सामंत, अपने महाराजा को जबर्दस्ती युद्ध क्षेत्र से बाहर ले गए।

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युद्ध आरम्भ होने से पहले, महाराजा के साथ अठारह हजार राजपूत योद्धा थे जिनमें से अब केवल छः सौ जीवित बचे थे और उनमें से भी अधिकांश घायल तथा बीमार थे। औरंगजेब (Aurangzeb) चाहता था कि महाराजा को जीवित ही पकड़ लिया जाए किंतु महाराजा के राजपूत, महाराजा को लेकर मारवाड़ की तरफ भाग लिए। स्थान-स्थान पर राजपूत योद्धा, मुगलों से लड़कर गाजर-मूली की तरह कटते रहे। अंत में जब महाराजा अपनी राजधानी जोधपुर पहुँचा तो उसके साथ केवल पंद्रह राजपूत सिपाही जीवित बचे थे। जब आगरा में बैठे शाहजहाँ ने ये समाचार सुने तो वह दुःख और हताशा से बेहोश हो गया। होश आने पर उसने अपने बड़े बेटे दारा शिकोह को अपने पास बुलाया जो कहने को तो वली-ए-अहद था किंतु वास्तव में अपने साथ दस से ज्यादा आदमी लेकर राजधानी आगरा में नहीं घुस सकता था और एक रात भी लाल किले में नहीं गुजार सकता था! बादशाह ने दारा शिकोह पर लगीं समस्त पाबंदियां हटा दीं तथा महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) को अपनी सेवा में से हटाकर वली-ए-अहद का संरक्षक नियुक्त कर दिया। धरमत की पराजय के समाचारों से शाही दरबार में खलबली मच गई।

किसी को विश्वास नहीं होता था कि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) धरमत का युद्ध (war of Dharmat) हार चुका है। आगरा से बहुत से अमीर-उमराव भागकर औरंगजेब के खेमे में पहुंचने लगे। शहजादी जहाँआरा (Jahanara Begum) ने शाही प्रतिष्ठा बचाने के लिए मुराद तथा औरंगजेब (Aurangzeb) को बादशाह की तरफ से तथा स्वयं अपनी ओर से बहुत मधुर भाषा में चिट्ठियां भेजकर उनसे समझौता करने के प्रयास किए परन्तु दोनों ही शहजादों ने न तो बादशाह की चिट्ठियों के कोई जवाब दिए और न जहाँआरा की चिट्ठियों के।

धरमत का युद्ध (war of Dharmat) समाप्त होने के बाद औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद की विजयी सेनाएँ धरमत से आगे बढ़ीं तो बनारस से आगरा की तरफ बढ़ रहे शहजादे सुलेमान शिकोह ने अपनी गति और तेज कर दी।

बनारस से बंगाल की तरफ बढ़ते हुए शाहशुजा (Shah Shuja) को यह जानकर हैरानी हुई कि शहजादा सुलेमान शिकोह शाही सेना को लेकर ताबड़तोड़ आगरा की ओर भागा जा रहा था। शाहशुजा को लगा कि आगरा में कुछ अनहोनी हुई है। इसलिए शाहशुजा ने बंगाल की तरफ बढ़ना छोड़कर पटना में ही अपने डेरे लगा दिए।

इस पर सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) और मिर्जा राजा जयसिंह भी अपनी सेना के साथ मार्ग में ही ठहर गए, उन्हें आशंका हुई कि कहीं शाहशुजा (Shah Shuja) ने अपना इरादा तो नहीं बदल लिया और वह फिर से आगरा की तरफ बढ़ने की तो नहीं सोच रहा है। इधर दारा और शाहजहाँ (Shahjahan) की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और वह बार-बार सुलेमान शिकोह को तत्काल आगरा लौटने के फरमान दोहराने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दारा शिकोह की हताशा (18)

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दारा शिकोह की हताशा

औरंगजेब (Aurangzeb) दिन प्रति दिन आगरा के निकट पहुंचता जा रहा था और दारा शिकोह (Dara Shikoh) के समर्थकों की संख्या निरंतर घटती जा रही थी। यह देखकर दारा शिकोह की हताशा बढ़ती जा रही थी। दारा को चकमा देकर औरंगजेब आगरा के दरवाजे तक आ पहुँचा!

जब महाराजा जसवंतसिंह की सेना धरमत की लड़ाई में नष्ट हो गई और मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) की सेनाएं शाहशुजा (Shah Shuja) के कारण बनारस से अधिक आगे नहीं बढ़ सकीं तो दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने सल्तनत के तमाम विश्वसनीय दोस्तों से सम्पर्क किया और उनकी सेनाओं को आगरा से साठ मील दूर चम्बल नदी के किनारे एकत्रित होने के संदेश भिजवाए।

आगरा में घुसने के लिए औरंगजेब (Aurangzeb) को हर हाल में चम्बल नदी पार करनी ही थी तथा दारा की योजना थी कि उसे चम्बल पार नहीं करने दी जाए।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) के निमंत्रण पर विभिन्न हिन्दू राजाओं, जागीरदारों एवं मुगलिया तख्त के पुराने खैरख्वाहों के एक लाख घुड़सवार सैनिक, बीस हजार पैदल सैनिक तथा अस्सी तोपें चम्बल के किनारे एकत्रित हो गईं। दारा के खेमे में इस समय सबसे प्रमुख उपस्थिति महाराजा छत्रसाल की थी।

इस विशाल सैन्य समूह के सामने औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद के पास कुल मिलाकर चालीस हजार घुड़सवार ही थे जो धरमत का युद्ध करने और लगातार चलते रहने के कारण थक कर चूर हो रहे थे।

औरंगजेब की सेना का एक बड़ा हिस्सा महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) से हुई लड़ाई में नष्ट हो गया था। फिर भी नमकहराम कासिम के साथ भेजी गई शाही सेनाएं अब औरंगजेब (Aurangzeb) के नियंत्रण में थीं जिनके पास तोपें और बारूद भी पर्याप्त मात्रा में थे।

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सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) और मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh अब भी आगरा नहीं पहुँचे थे और दारा शिकोह की हताशा बढ़ती जा रही थी। दारा शिकोह (Dara Shikoh) को भय होने लगा कि कहीं सुलेमान तथा जयसिंह से पहले औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद चम्बल नदी तक न पहुंच जाएं। इसलिए वह हाथी पर बैठकर युद्ध क्षेत्र के लिए रवाना हो गया।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने उसे मशवरा दिया कि वह सुलेमान के लौट आने तक इंतजार करे किंतु दारा किसी तरह का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं था। उसे भय था कि जिस तरह नमक हराम कासिम खाँ, धोखा देकर औरंगजेब (Aurangzeb) की तरफ हो गया था, उसी तरह कुछ और मुस्लिम सरदार भी ऐसा न कर बैठें। इसलिए दारा सेनाओं के साथ मौजूद रहकर ही अपनी पकड़ को मजबूत बनाए रख सकता था।

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मई के महीने में जब उत्तर भारत में गर्मियां अपने चरम पर थीं, दारा शिकोह (Dara Shikoh) आगरा से निकला और तेजी से चलता हुआ कुछ ही दिनों में अपने दोस्तों की सेनाओं से जा मिला। औरंगजेब, दारा की हर गतिविधि पर दृष्टि रखे हुए था। उसने अपनी सेना का बहुत थोड़ा हिस्सा उस तरफ बढ़ाया जिस तरफ दारा की सेनाओं का शिविर था तथा स्वयं अपनी सेना के बड़े हिस्से को साथ लेकर राजा चम्पतराय की सहायता से बीहड़ जंगल में चम्बल के पार उतर कर तेजी से आगरा की तरफ बढ़ने लगा। इस समय गर्मियां इतनी तेज थीं कि औरंगज़ेब अपनी सेनाओं को लेकर नर्बदा, क्षिप्रा, चम्बल और यमुना नदियों का सहारा लेकर ही आगे बढ़ पाया था। इस बार भी जब उसने चम्बल का किनारा छोड़ा तो सीधा यमुना के किनारे जाकर दम लिया। जब दारा को औरंगजेब (Auranzeb) के इस छल के बारे में मालूम हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। फिर भी दारा ने अपने ऊंटों को औरंगज़ेब के पीछे दौड़ाया जिनकी पीठों पर छोटी तोपें बंधी थीं। दारा की पैदल सेना भी पंक्ति बांधकर हाथों में बंदूकें थामे, औरंगजेब (Aurangzeb) के शिविर की तरफ बढ़ने लगी। हाथियों की गति तो और भी मंथर थी। फिर भी महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) को उजबेकों (UZbeks) के साथ छापामारी का लम्बा युद्ध था, इसलिए कुछ देर की अव्यवस्था के बाद दारा शिकोह और महाराजा रूपसिंह की सेनाएं संभल गईं।

जब तक दारा की सेनाएं औरंगज़ेब के निकट पहुँचीं तब तक औरंगजेब शामूगढ़ तक पहुँच गया था। यहाँ से आगरा केवल आठ मील दूर रह गया था। एक ऊबड़-खाबड़ सी जगह देखकर औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपनी सेनाओं के डेरे गढ़वा दिए।

इस समय औरंगजेब (Auranzeb) की सेनाओं की स्थिति ऐसी थी कि औरंगजेब के सामने की तरफ आगरा था और औरंगजेब की पीठ की तरफ दारा की सेनाएं। इसलिए औरंगजेब की सेनाएं आगरा की तरफ पीठ करके बैठ गईं।

औरंगजेब की कुटिल चाल के आगे वली ए अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) की समस्त योजनाएं धरी रह गई थीं तथा अब उन्हें औरंगजेब की योजना के अनुसार ही लड़ाई करनी थी।

औरंगजेब (Aurangzeb) को महाराजा रूपसिंह का भय सता रहा था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रूपसिंह राठौड़ (19)

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रूपसिंह राठौड़

औरंगजेब (Aurangzeb) को राजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roop Singh Rathore)का भय सता रहा था! इस समय किशनगढ़ का राजा रूपसिंह ही शाहजहाँ और दारा शिकोह (Dara Shikoh) के चारों ओर एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा था।

औरंगजेब (Aurangzeb) द्वारा गुपचुप चम्बल पार करके आगरा तक आ पहुंचने के कारण रणक्षेत्र का नक्शा पूरी तरह अप्रत्याशित हो गया था। आगरा के दरवाजों के बाहर की तरफ दारा शिकोह को होना चाहिए था किंतु वहाँ औरंगजेब की सेनाएं खड़ी थीं और जहाँ औरंगजेब को होना चाहिए था, वहाँ दारा की सेनाएं खड़ी थीं।

इस समय यदि आगरा में सेना की एक अतिरिक्त टुकड़ी होती तो वह शहर के दरवाजे खोलकर पीछे से औरंगजेब पर हमला बोल सकती थी और सामने से दारा की सेनाएं औरंगजेब को कुचल सकती थीं किंतु दुर्भाग्य से दारा शिकोह (Dara Shikoh) के पास इस समय आगरा में कोई बड़ी सैनिक टुकड़ी नहीं थी। शहर के भीतर तो महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh Rathore) के मुट्ठी भर सैनिक ही थे जो बादशाह की सुरक्षा में नियुक्त थे।

बादशाह ने राजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roop Singh Rathore) को दारा शिकोह (Dara Shikoh) का सरंक्षक नियुक्त किया था। इसलिए सेना का संचालन मुख्य रूप से महाराजा रूपसिंह के ही हाथों में था। उसने दारा को सलाह दी कि दारा का सैन्य शिविर, औरंगजेब के शिविर के इतनी पास लगना चाहिए कि यदि औरंगजेब (Aurangzeb) चकमा देकर आगरा में घुसने का प्रयास करे तो हमारी सेनाएं बिना कोई समय गंवाए, उसका पीछा कर सकें। हालांकि ऐसा करने में कई खतरे थे किंतु दारा के पास महाराजा की सलाह मानने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।

औरंगजेब ने भी घनघोर आश्चर्य से देखा कि राजा रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) अपनी सेनाओं को औरंगजेबके सैन्य शिविर के इतनी निकट ले आया था कि जहाँ से वह तोप के गोलों की सीमा से कुछ ही दूर रह गया था। औरंगजेब (Aurangzeb) राठौड़ राजाओं से बहुत डरता था।

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हालांकि वह जोधपुर के राजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) की पूरी सेना को नष्ट करके युद्ध के मैदान से भगा चुका था फिर भी किशनगढ़ नरेश रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) का भय अब भी उसके मस्तिष्क में बना हुआ था। वह जानता था कि रूपसिंह राठौड़ तलवार का जादूगर है। जाने कब वह कौनसा चमत्कार कर बैठे! बलख और बदखशां की पहाड़ियों पर बिखरा हुआ उजबेकों का खून आज भी रूपसिंह राठौड़ के नाम को याद करके सिहर उठता था।

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30 मई 1658 को सूरज निकलते ही महाराजा रूपसिंह (Roop Singh Rathore) ने दारा (Dara Shikoh) के पक्ष की विशाल सेनाओं को योजनाबद्ध तरीके से सजाया। महाराजा रूपसिंह राठौड़ तथा महाराजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) के राजपूत सिपाही इस योजना का मुख्य आधार थे किंतु कठिनाई यह थी कि औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद के पास मुगलों का सधा हुआ तोपखाना था। जबकि राजपूत सिपाही अब भी हाथों में बर्छियां और तलवारें लेकर लड़ते थे तथा राजपूत घुड़सवार अब भी धनुषों पर तीर रखकर फैंकते थे। उनके पास मुगलों जैसी बंदूकें और तोपें नहीं थीं। इसलिए महाराजा ने योजना बनाई कि दारा का तोपाखाना और शाही सेना की बंदूकें आगे की ओर रहें तथा राजपूत सेनाएं युद्ध के मैदान में तब तक दुश्मन के सामने न पड़ें, जब तक कि औरंगजेब (Aurangzeb) की तोपों का बारूद खत्म न हो जाए। महाराजा ने सबसे आगे ऊंटों पर बंधी हुई तोपों वाली सेना को तैनात किया, जिन्हें सबसे पहले आगे बढ़कर धावा बोलना था। ऊँटों की तोप-सेना के ठीक पीछे दारा की शाही सेना नियुक्त की गई जिसका नेतृत्व स्वयं वली-ए-अहद दारा कर रहा था। दारा की पीठ पर स्वयं महाराजा रूपसिंह राठौड़ और छत्रसाल अपनी-अपनी सेनाएं लेकर सन्नद्ध हुए। राजपूतों की सेना के एक ओर खलीलुल्ला खाँ को तैनात किया गया जिसके अधीन तीन हजार घुड़सवार थे तथा बायीं ओर रुस्तम खाँ को उसकी विशाल सेना के साथ रखा गया।

इस समय दारा शिकोह (Dara Shikoh) का सबसे बड़ा सहयोगी महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) ही था। उसे बादशाह ने दारा शिकोह का संरक्षक नियुक्त किया था तो स्वयं दारा ने उसे अपनी सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त कर रखा था। इसलिए रणभूमि में जो कुछ भी हो रहा था, उसकी सारी योजना महाराजा रूपसिंह ने स्वयं तैयार की थी।

रूपसिंह नहीं चाहता था कि युद्ध के मैदान में दारा शिकोह पल भर के लिए भी महाराजा रूपसिंह की आँखों से ओझल हो। इसलिए वह अपने घोड़े पर सवार होकर दारा की हथिनी के ठीक पीछे तलवार सूंतकर खड़ा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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