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अहमदशाह अब्दाली का कहर

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अहमदशाह अब्दाली का कहर

उत्तर भारत के लोगों पर अहमदशाह अब्दाली का कहर ठीक वैसा ही था जैसा उसके पूर्ववर्ती आक्रांताओं मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, तैमूर लंग, बाबर और नादिरशाह आदि रक्त-पिपासुओं ने ढाया था। अहमदशाह अब्दाली ने निर्दोष हिन्दुओं के सिर काटकर उनकी मीनारें बनवाईं।

जब महाराजा सूरजमल ने अहमदशाह अब्दाली के आदेश को मानने से मना कर दिया तो फरवरी 1757 में अब्दाली ने महाराजा सूरजमल के राज्य पर आक्रमण के लिये दिल्ली से प्रस्थान किया। महाराजा सूरजमल ने अपने पुत्र जवाहरसिंह को मथुरा की रक्षा के लिए नियुक्त किया।

एक दिन राजकुमार जवाहरसिंह ने अचानक ही अब्दाली की सेना पर आक्रमण किया और उसके बहुत से सैनिकों को मारकर बल्लभगढ़ में जा बैठा। इस पर अब्दाली ने बल्लभगढ़ का रुख किया। अब्दाली ने बल्लभगढ़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। बल्लभगढ़ के दुर्ग में अब्दाली को केवल 12 हजार रुपये, सोने-चांदी के कुछ बर्तन, 14 घोड़े, 11 ऊँट और कुछ अनाज हाथ लगा। इसके साथ ही ब्रज क्षेत्र पर अहमदशाह अब्दाली का कहर आरम्भ हो गया।

राजकुमार जवाहरसिंह अपने आदमियों के साथ रात के अंधेरे का लाभ उठाकर बल्लभगढ़ से जीवित ही निकल गया। इससे चिढ़कर अब्दाली ने बल्लभगढ़ के समस्त नर-नारियों को मार डाला। इन मनुष्यों के सिर काटकर गठरियों में बांध कर घोड़ों पर रख दिये गये। कुछ लोगों को पकड़कर घोड़ों के पीछे बांध दिया गया ताकि वे भी कटे हुए सिरों को उठा सकें। यह अहमदशाह अब्दाली का कहर था।

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प्रातःकाल होने पर लोगों ने देखा कि प्रत्येक घुड़सवार एक घोड़े पर चढ़ा हुआ था। उसने उस घोड़े की पूंछ के साथ दस से बीस घोड़ों की पूंछों को बांध रखा था। समस्त घोड़ों पर लूट का सामान लदा हुआ था तथा बल्लभगढ़ से पकड़े गये स्त्री-पुरुष बंधे हुए थे। प्रत्येक आदमी के सिर पर कटे हुए सिरों की गठरियां रखी हुई थीं। अहमदशाह के सामने कटे हुए सिरों की मीनारें बनायी गईं। जो लोग इन सिरों को अपने सिरों पर रख कर लाये थे, उनसे पहले तो चक्की पिसवाई गयी तथा उसके बाद उनके भी सिर काटकर मीनार में चिन दिये गये।

जब अहमदशाह अब्दाली बल्लभगढ़ पर आक्रमण करने गया तब उसने नजीबुद्दौला तथा जहान खाँ को 20 हजार सिपाही देकर निर्देश दिये- ‘उस अभागे जाट के राज्य में घुस जाओ। उसके हर शहर और हर जिले को लूटकर उजाड़ दो। मथुरा नगर हिन्दुओं का तीर्थ है। मैंने सुना है कि सूरजमल वहीं है। इस पूरे शहर को तलवार के घाट उतार दो। जहाँ तक बस चले, उसके राज्य में और आगरा तक कुछ मत रहने दो। कोई चीज खड़ी न रहने पाये। उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि मथुरा में एक भी आदमी जीवित न रहे तथा जो मुसलमान किसी विधर्मी का सिर काटकर लाये उसे पाँच रुपया प्रति सिर के हिसाब से ईनाम दिया जाये।’

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इसके बाद अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया। मथुरा से आठ मील पहले चौमुहा में राजकुमार जवाहरसिंह ने दस हजार जाट सैनिकों को लेकर अब्दाली का मार्ग रोका। नौ घण्टे तक दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई जिसमें जाट सैनिक परास्त हो गये। जाटों को भारी क्षति उठानी पड़ी। इसके बाद अब्दाली की सेना ने मथुरा में प्रवेश किया। 1 मार्च 1757 को अब्दाली मथुरा में घुसा, उस दिन होली के त्यौहार को बीते हुए दो ही दिन हुए थे।

अहमदशाह के सिपाहियों ने माताओं की छाती से दूध पीते बच्चों को छीनकर मार डाला। हिन्दू सन्यासियों के गले काटकर उनके साथ गौओं के कटे हुए गले बांध दिये। मथुरा के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को नंगा किया गया। जो पुरुष मुसलमान निकले उन्हें छोड़ दिया गया, शेष को मार दिया गया। जो औरतें मुसलमान थीं उनकी इज्जत लूट कर उन्हें जीवित छोड़ दिया गया तथा हिन्दू औरतों को इज्जत लूटकर मार दिया गया। मथुरा में विध्वंस मचाकर 6 मार्च 1757 को अहमदशाह अब्दाली ने वृंदावन की ओर रुख किया। वहाँ भी वही सब दोहराया गया जो बल्लभगढ़ और मथुरा में किया गया था। चारों ओर मनुष्यों के शवों के ढेर लग गये।

यह एक आश्चर्य की बात लग सकती है कि जिस समय अहमदशाह बल्लभगढ़, मथुरा और वृंदावन में कत्लेआम मचा रहा था, उस समय महाराजा सूरजमल डीग में बैठा था किंतु इसमें सूरजमल की सोची-समझी रणनीति काम कर रही थी। वह जानता था कि किले से बाहर निकलकर, वह अफगानिस्तान से आई सेना का मुकाबला नहीं कर सकेगा किंतु यदि अफगानिस्तान की सेना डीग, कुम्हेर अथवा भरतपुर पर आक्रमण करती है तो उसे इन तीन दुर्गों के मकड़जाल में फांसकर मारा जा सकता है।

सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि जो मराठे हिन्दू पदपादशाही स्थापित करने का स्वप्न देखते न थकते थे, उन्होंने इस विपत्ति में स्वयं को उत्तर भारत से दूर रखा। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और लीला स्थली बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट की गईं किंतु नाना साहब पेशवा के मराठा योद्धाओं की धर्म के प्रति निष्ठा नहीं जाग सकी। पेशवा बालाजी बाजीराव को भारत के इतिहास में नाना साहब के नाम से भी जाना जाता है।

मथुरा और वृंदावन में हिन्दुओं का इतना रक्त बहा कि यमुना का पानी लाल हो गया। यमुना के तट पर शिविर गाढ़कर पड़ी हुई अब्दाली की सेना को वही रक्त-रंजित पानी पीना पड़ा। इससे अब्दाली की फौज में हैजा फैल गया और सौ-डेढ़ सौ आदमी प्रतिदिन मरने लगे। अनाज की कमी के कारण अब्दाली की सेना घोड़ों का मांस खाने लगी। इससे घोड़ों की कमी होने लगी।

अफगानिस्तान से आए हाड़-मांस से बने इंसानों को तो भारत में रह रहे इंसानों पर दया नहीं आई किंतु हिन्दुओं की पूज्य यमुना नदी इस काल में हिन्दुओं की रक्षा करने के लिए आगे आई। यमुना के रक्त रंजित जल को पीकर अब्दाली की सेना में हैजे का प्रकोप दिन पर दिन उग्र होने लगा किंतु अब्दाली ने इस बात की परवाह किये बिना, 21 मार्च 1757 को आगरा पर आक्रमण कर दिया।

अब्दाली को ज्ञात हुआ था कि दिल्ली से बहुत से व्यापारी तथा अमीर, अपना धन लेकर आगरा भाग आये हैं। इसलिये अब्दाली जितनी जल्दी हो सके आगरा को लूटना चाहता था। उसके पंद्रह हजार घुड़सवार आगरा में घुसकर लूट मचाने लगे। ठीक इसी समय अब्दाली की सेना में हैजे का प्रकोप इतना उग्र हो गया कि अब्दाली के जीवित बचे सैनिकों ने भारत में रहकर लड़ने से मना कर दिया और वे अपने घरों को लौटने के लिये विद्रोह करने पर उतारू हो गये।

इस पर अब्दाली ने अपना अभियान समाप्त कर दिया और दिल्ली के बादशाह आलमगीर (द्वितीय) को संदेश भिजवाया कि हम अपना अभियान समाप्त करके दिल्ली लौट रहे हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा सूरजमल

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महाराजा सूरजमल

अहमदशाह अब्दाली भरतपुर के महाराजा सूरजमल तथा बंगाल के नवाब शुजाउद्दौला के खजाने लूटने की नीयत से भारत आया था किंतु दिल्ली आकर वह समझ गया कि बंगाल तक पहुंचना असंभव है। अतः उसने भरतपुर राज्य पर अपनी आंख गढ़ाई। इस पर महाराजा सूरजमल ने अहमदशाह अब्दाली को भरतपुर पर हमला करने की चुनौती दी!

जब अहमदशाह अब्दाली ने आगरा से दिल्ली होते हुए अफगानिस्तान लौट जाने का निर्णय किया तो उसने भरतपुर राज्य के महाराजा सूरजमल को एक चिट्ठी भिजवाई कि यदि वह कर नहीं देगा तो उसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे। महाराजा ने इस पत्र का जवाब तक नहीं दिया।

इस पर अहमदशाह अब्दाली ने एक और पत्र महाराजा सूरजमल को लिखकर धमकाया कि यदि वह रुपये नहीं देगा तो भरतपुर, डीग तथा कुम्हेर के किले धरती में मिला दिये जायेंगे। इस पर सूरजमल ने अहमदशाह अब्दाली को अपना उत्तर भिजवाया-

‘हिन्दुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्त्वपूर्ण स्थिति नहीं है। मैं रेगिस्तान में रहने वाला एक जमींदार हूँ और मेरी कोई कीमत नहीं है, इसलिये इस काल के किसी भी बादशाह ने मेरे मामलों में दखल देना अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं समझा।

अब हुजूर जैसे एक शक्तिशाली बादशाह ने युद्ध के मैदान में मुझसे मिलने और मुकाबला करने का दृढ़ निश्चय किया है और इस नगण्य से व्यक्ति के विरुद्ध अपनी सेनाएं ला खड़ी की हैं। खाली यह कार्यवाही ही बादशाह की शान और बड़प्पन के लिये शर्मनाक होगी। . . . .

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इससे मेरी स्थिति ऊँची होगी तथा मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के लिये यह अभिमान की वस्तु होगी। दुनिया कहेगी कि ईरान और तूरान के शाह ने बहुत ही ज्यादा डरकर, अपनी सेनाएं लेकर एक कंगाल बंजारे पर चढ़ाई कर दी। केवल ये शब्द ही राजमुकुट प्रदान करने वाले हुजूर के लिये कितनी शर्म की चीज होगी। फिर अंतिम परिणाम भी अनिश्चितता से पूरी तरह रहित नहीं है। यदि इतनी शक्ति और साज-सामान लेकर आप मुझ जैसे कमजोर को बरबाद कर देने में सफल भी हो जाएँ तो उससे आपको क्या यश मिलेगा? मेरे बारे में लोग केवल यही कहेंगे, उस बेचारे की ताकत और हैसियत ही कितनी सी थी! परंतु भगवान की इच्छा से, जो किसी को भी मालूम नहीं है, मामला कहीं उलट गया तो उसका परिणाम क्या होगा? यह सारी शक्ति और प्रभुत्व, जो हुजूर के बहादुर सिपाहियों ने ग्यारह बरसों में जुटाया है, पल भर में गायब हो जायेगा।

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यह अचरज की बात है कि इतने बड़े दिलवाले हुजूर ने इस छोटी सी बात पर विचार नहीं किया और इतनी सारी भीड़भाड़ और इतने बड़े लाव-लश्कर के साथ इस सीधे-सादे तुच्छ से अभियान पर स्वयं आने का कष्ट उठाया। जहाँ तक मुझे और मेरे देश को कत्ल करने और बरबाद कर देने की धमकी भरा प्रचण्ड आदेश देने का प्रश्न है, वीरों को इस बात को कोई भय नहीं हुआ करता। सब को ज्ञात है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस क्षण-भंगुर जीवन पर तनिक भी भरोसा नहीं करता। रही मेरी बात, मैं जीवन के पचास सोपानों को पहले ही पार कर चुका हूँ और अभी कितने बाकी हैं, यह मुझे कुछ पता नहीं। मेरे लिए इससे बढ़कर वरदान और कुछ नहीं हो सकता कि मैं बलिदान के अमृत का पान करूँ। यह देर-सबेर योद्धाओं के अखाड़े में और युद्ध के मैदान में वीर सैनिकों के साथ करना ही पड़ेगा। और काल-ग्रन्थ के पृष्ठों पर अपना और अपने पूर्वजों का नाम छोड़ जाऊँ, जिससे लोग याद करें कि एक बेजोर किसान ने एक ऐसे महान् और शक्तिशाली बादशाह से बराबरी का दम भरा, जिसने बड़े-बड़े राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया था और वह किसान लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त हुआ।

ऐसा ही शुभ संकल्प मेरे निष्ठावान अनुयायियों और साथियों के हृदय में भी विद्यमान है। यदि मैं चाहूँ भी कि आपके दैवी दरबार की देहरी पर उपस्थित होऊँ, तो भी मेरे मित्रों की प्रतिष्ठा मुझे ऐसा करने नहीं देगी। ऐसी दशा में यदि न्याय के निर्झर हुजूर, मुझे, जो कि तिनके सा कमजोर है, क्षमा करें और अपना ध्यान किन्हीं और महत्त्वपूर्ण अभियानों पर लगायें तो उससे आपकी प्रतिष्ठा या कीर्ति को कोई हानि नहीं पहुंचेगी।

मेरे इन तीन किलों (भरतपुर, डीग और कुम्हेर) के बारे में जिन पर हुजूर को रोष है और जिन्हें हुजूर के सरदारों ने मकड़ी के जाले सा कमजोर बताया है, सचाई की परख असली लड़ाई के बाद ही हो पायेगी। भगवान ने चाहा तो वे सिकन्दर के गढ़ जैसे ही अजेय रहेंगे।’

कुदरतुल्लाह नामक एक तत्कालीन लेखक ने अपने ग्रंथ जाम-ए-जहान-नामा में यह प्रसंग लिखा है जिसमें अहमदशाह अब्दाली के साथ महाराजा सूरजमल से चली समझौता वार्त्ता की चर्चा संक्षेप में की गई है। वह लिखता है कि-

‘धन से भरपूर राजकोष, सुदृढ़ दुर्गों, बहुत बड़ी सेना और प्रचुर मात्रा में युद्ध सामग्री के कारण सूरजमल ने अपना स्थान नहीं छोड़ा और वह युद्ध की तैयारी करता रहा। उसने अहमदशाह के दूतों से कहा- अभी तक आप लोग भारत को नहीं जीत पाये हैं। यदि आपने एक अनुभव शून्य बालक इमादुलमुल्क गाजीउद्दीन को जिसका कि दिल्ली पर अधिकार था, अपने अधीन कर लिया, तो इसमें घमण्ड की क्या बात है !

यदि आपमें सचमुच कुछ दम है, तो मुझ पर चढ़ाई करने में इतनी देर किस लिये? शाह जितना समझौते का प्रयास करता गया, उतना ही उस जाट का अभिमान और धृष्टता बढ़ती गई। उसने कहा, मैंने इन किलों पर बड़ा रुपया लगाया है।

यदि शाह मुझसे लड़े तो यह उसकी मुझ पर कृपा होगी क्योंकि तब दुनिया भविष्य में यह याद रख सकेगी कि एक बादशाह बाहर से आया था और उसने दिल्ली जीत ली थी, पर वह एक मामूली से जमींदार के मुकाबले में लाचार हो गया। जाटों के किलों की मजबूती से डरकर शाह वापस चला गया।’

जब अहमदशाह आगरा से दिल्ली को लौट रहा था, तब पूरे मार्ग के दौरान सूरजमल के आदमी उसे समझौता वार्त्ता में उलझाये रहे। अंत में महाराजा सूरजमल की ओर से अहमदशाह अब्दाली को दस लाख रुपये देने का आश्वासन दिया गया।

जब अहमदशाह दिल्ली पहुंच गया तब सूरजमल को विश्वास हो गया कि अब यह अफगानिस्तान लौट जायेगा, इसलिये समस्त प्रकार की वार्त्ता बंद कर दी गई तथा अब्दाली को एक भी रुपया नहीं दिया गया। इस प्रकार अहमदशाह अब्दाली को भरतपुर, डीग और कुम्हेर को लूटे बिना ही तथा भरतपुर से कोई रुपया लिये बिना ही, दिल्ली लौट जाना पड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाही महिलाओं का शीलहरण

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शाही महिलाओं का शीलहरण

अहमदशाह अब्दाली के सैनिकों ने लाल किले की महिलाओं को निर्वस्त्र करके दौड़ाया तथा उनके साथ बलात्कार किए।यह पहला अवसर नहीं था जब लाल किले में शाही महिलाओं का शीलहरण किया गया था!

जब अहमदशाह अब्दाली आगरा का अभियान बीच में रोक कर दिल्ली लौटा और महाराजा सूरजमल ने उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दी तो अहमदशाह अब्दाली के गुस्से का पार नहीं रहा। उसका सारा गुस्सा दिल्ली वालों पर कहर बन कर टूटा। उसे हर समय धरती पर बहते हुए लाल इंसानी खून, सुंदर स्त्रियों और पीले चमचमाते हुए सोने की हवस बनी रहती थी। इस काल की निर्धन दिल्ली अब्दाली की हवस पूरी नहीं कर सकती थी किंतु अब्दाली अपनी हवस पूरी करना अच्छी तरह जानता था।

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जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक ‘फॉल ऑफ मुगल एम्पायर’ में लिखा है कि अब्दाली के दिल्ली आने से कुछ माह पहले जब मराठों ने इमादुलमुल्क से युद्ध-क्षति-पूर्ति के चालीस लाख रुपए मांगे थे तो इमादुलमुल्क ने मरहूम बादशाह अहमदशाह बहादुर की माँ ऊधमबाई के भाई-बहिनों और शाही परिवार के अन्य सदस्यों की विपुल सम्पत्ति जब्त कर ली थी और गड़े हुए धन का पता लगाने के लिए स्त्रियों पर बड़े अत्याचार किए थे। जिनके कारण शाही परिवार के सदस्यों का धन लुट चुका था। पूरी तरह कंगाल हो चुका बादशाह आलमगीर (द्वितीय) भी अहमदशाह अब्दाली को एक करोड़ रुपए दे चुका था।

जब अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली में प्रवेश किया तो इस बार भी पहले की ही तरह बाजारों को पूरी तरह बंद कर दिया गया। बाजारों एवं सड़कों पर दोनों तरफ अब्दाली के सिपाही पंक्ति बनाकर खड़े हो गए। सड़कें और गलियां सूनी हो गईं। लोगों को खिड़कियों से भी झांकने की मनाही थी। बादशाह आलमगीर ने पुनः लाल किले के दरवाजे पर खड़े होकर अब्दाली का स्वागत किया।

जदुनाथ सरकार ने फॉल ऑफ दी मुगल एम्पायर में लिखा है कि आलमगीर ने अपनी दुर्दशा देखकर शाही तख्त छोड़ दिया और शाही रंगमहल तथा ख्वाबगाह छोड़कर शाहबुर्ज में चला गया। दो दिन बाद बेचारे को यहाँ से भी निकाल कर एक साधारण स्थान में डाल दिया। आलमगीर तथा उसकी बेगमों ने शाही महल खाली कर दिए तथा उनमें अहमदशाह और उसकी बेगमें रहने लगीं।

दूसरे दिन दीवाने आम हुआ जिसमें दोनों बादशाह पास-पास बैठे। अहमदशाह अब्दाली ने इस बार वजीर इंतिजाम खाँ से दो करोड़ रुपयों की मांग की। यह सुनकर वजीर के होश उड़ गए तथा उसने कहा कि मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है, दो करोड़ रुपए कहां से लाऊँ! इस पर अब्दाली ने आदेश दिए के वजीर को काठ में रखा जाए।

अपमान और मृत्यु के भय से कांपते हुए वजीर ने अपने जान बचाने के लिए कह दिया कि मेरी माता शोलापुरी बेगम को मेरे पिता के गड़े हुए धन का पता है। यह सुनते ही अहमदशाह ने बुढ़िया शोलापुरी बेगम को पकड़वाकर वहीं बुलवा लिया।

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जब बुढ़िया घसीटती हुई दरबार में लाई गई तो उसके शोक का पार नहीं था। वह चीख रही थी और सहायता के लिए करुण पुकार कर रही थी। उसका ससुर इसी लाल किले में वजीर रहा था। उसका पति भी इसी लाल किले में वजीर रहा था और अब उसका बेटा भी इसी लाल किले का वजीर था किंतु आज उसे इस तरह घसीटा जा रहा था!

शोलापुरी बेगम से कहा गया कि यदि वह अपने पति के गुप्त धन का पता नहीं बताएगी तो उसके हाथों में लोहे की खूंटियां ठोकी जाएंगी। यह सुनते ही बुढ़िया बेहोश हो गई। उसे फिर से होश में लाया गया और फिर से वही सब दोहराया गया। इस पर बुढ़िया ने धरती में गढ़े हुए धन का पता बता दिया। अहमदशाह अब्दाली ने अपने एक सौ सिपाहियों को धन खोदने के काम पर लगाया। बहुत खुदाई करने के बाद सोलह लाख रुपयों के चांदी के सिक्के तथा बहुत कीमती हीरे-मोती बरामद किए गए।

इसके बाद बुढ़िया को और मारा-पीटा गया किंतु अब बुढ़िया के पास बताने के लिए कुछ नहीं था। इसी प्रकार बहुत सी प्रतिष्ठित एवं शाही हरम की महिलाओं को नंगी करके मारा-पीटा गया। उनके घरों की तलाशी ली गई और उनके महलों की दीवारों एवं छतों को खोद डाला गया तथा जहाँ से भी रुपया मिल सकता था, छीन लिया गया। कितने ही पुरुषों की हत्या हुई और कितनी ही स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ। सैंकड़ों स्त्रियां स्वयं ही छुरे भौंककर या पानी में डूब कर मर गईं।

अहमदशाह के सिपाहियों ने दिल्ली के बाजारों को लूटकर उनमें आग लगानी शुरू कर दी। इससे दिल्ली में हा-हाकार मच गया। जहाँ कहीं सुंदर हिन्दू युवती के होने का पता चलता था, अहमदशाह अब्दाली उसी को अपने यहाँ पकड़वा कर मंगवाता था।

हमने मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की शहजादी हजरत बेगम का विवाह अब्दाली से किए जाने की चर्चा की थी। इस शहजादी के बारे में इस स्थान पर हम थोड़ा सा विस्तार से बताना चाहेंगे। शहजादी हजरत बेगम इस समय केवल सोलह साल की थी और बहुत सुंदर दिखती थी।

बादशाह आलमगीर (द्वितीय) स्वयं भी इस शहजादी से विवाह करना चाहता था किंतु शहजादी आलमगीर से विवाह के लिए तैयार नहीं थी। इस कारण आलमगीर ने हजरत बेगम को बहुत यातनाएं दी थीं। जब अहमदशाह अब्दाली को हजरत बेगम के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने हजरत बेगम को पकड़ मंगवाया।

जब इस शहजादी को अब्दाली की काम वासना पर बलिदान होना पड़ा तो शहजादी घृणा और क्रोध से चीखती-चिल्लाती रही किंतु वह कुछ नहीं कर सकती थी। इसके बाद समस्त शाही महिलाओं का शीलहरण किया गया।

शहजादी हजरत बेगम बहुत कम आयु की थी जबकि अहमदशाह पैंतालीस साल का प्रौढ़ था। पु़स्तक ‘तारीख-ए-आलमगीर सानी’ में लिखा है कि अहमदशाह अब्दाली के दोनों कान सड़े हुए थे और उसकी नाक से कोढ़ टपकता था। कर्नल टॉड ने भी इस बात को दोहराया है।

शाही महिलाओं का शीलहरण करने के बाद अब्दाली ने शाही परिवार की समस्त युवतियों एवं शाही महल की चार सौ दासियों को भी अपने साथ ले लिया जिनमें मरहूम मुहम्मशाह रंगीला की भी कई बेगमें शामिल थीं। अब्दाली ने अब तक नौ करोड़ रुपए नगद तथा अपरिमित सोना-चांदी एवं हीरे-मोती एकत्रित कर लिए थे।

यह सारी सामग्री 28 हजार ऊँटों, 20 हजार घोड़ों, हजारों खच्चरों और बैलों तथा सैंकड़ों हाथियों पर लाद दिया गया। 200 ऊँट उस सामान से लदे थे जो दिल्ली के मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की विधवा बेगमों की सम्पत्ति थी।

पैदल सिपाहियों के साथ भी लूट का माल था। अब्दाली के घुड़सवार पैदल चल रहे थे क्योंकि घोड़ों पर लूट का माल लदा हुआ था। जिस-जिस रास्ते से यह कारवां गुजरता था, उस रास्ते पर एक भी घोड़ा, हाथी, गधा, खच्चर तथा बैल आदि पशु नहीं बचता था, समस्त भारवाहक पशु अब्दाली के आदमियों द्वारा छीन लिये जाते थे और उन पर लूट का माल लाद दिया जाता था।

दिल्ली से लाहौर के मार्ग में स्थित बहावलपुर के नवाब बहावल खाँ (द्वितीय) तथा कलात के नवाब नासिर खाँ ने अहमदशाह को वचन दिया कि वे सिक्खों का दमन करने में अब्दाली के पुत्र तिमूरशाह की सहायता करेंगे। अहमदशाह अब्दाली ने जमजमा तोप लाहौर के दुर्ग में स्थापित करवा दी, जहाँ उसका पुत्र तिमूरशाह सूबेदार था। कुछ दिन लाहौर में रुककर अब्दाली फिर से अफगानिस्तान लौट गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मराठा सेनापति रघुनाथ राव

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मराठा सेनापति रघुनाथ राव

मराठा सेनापति रघुनाथ राव भट्ट नाना साहब पेशवा के आदेश पर मराठा सरदारों की सेना लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हुआ ताकि अहमदशाह अब्दाली से दिल्ली को मुक्त करवाया जा सके किंतु जब तक वह दिल्ली पहुंच पाता, तब तक अब्दाली स्वयं ही दिल्ली छोड़कर जा चुका था।

अहमदशाह अब्दाली अपने साथ बड़ी संख्या में तोपें खींचकर लाया था। जब वह अफगानिस्तान लौटने लगा तो उसने बड़ी संख्या में तोपों को दिल्ली तथा उसके आसपास ही छोड़ दिया क्योंकि उन्हें खींचने वाले पशुओं पर अब लूट का माल लदा हुआ था। जब अब्दाली दिल्ली से निकल गया तो भरतपुर का महाराजा सूरजमल उन तोपों को दिल्ली से खींचकर अपने किलों में ले आया। जदुनाथ सरकार ने फॉल ऑफ दी मुगल एम्पायर में लिखा है कि दिल्ली में किसी के पास एक तलवार तक न रही।

अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली से निकलते ही नए मीर बख्शी नजीब खाँ रूहेला ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसके सिपाही दिल्ली की गलियों में घूमने लगे और लाल किले पर पहरा देने लगे। लाल किला फिर से सिपाहियों के पहरे में बंद हो गया। बाहर से देखने पर ऐसा लगता था जैसे भीतर सब-कुछ सामान्य हो गया है किंतु भीतर कुछ भी सामान्य नहीं था। किले के भीतर मनुष्य नहीं, चलती-फिरती लाशें रहती थीं।

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एक ओर तो मुगल बादशाह आलमगीर का मीरबख्शी इमादुलमुल्क बादशाह आलमगीर से नाराज होकर मराठों की शरण में भाग गया था और उसने मराठों से प्रार्थना की थी कि वे दिल्ली पर आक्रमण करके बादशाह आलमगीर को दण्डित करें। जबकि दूसरी ओर बादशाह आलमगीर ने मराठों से अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध सहायता की पुकार लगाई थी और तीसरी ओर मराठों के पेशवा नाना साहब अर्थात् बालाजी बाजी राव ने दिल्ली को अपना संरक्षित राज्य जानकर संकट की घड़ी में अपने चचेरे भाई रघुनाथ राव तथा मराठा सरदार मल्हारराव होलकर को आदेश दिए थे कि वे अहमदशाह अब्दाली का मार्ग रोकने के लिए दिल्ली पहुंचें।

इन सब कारणों से मराठा सेनापति रघुनाथ राव भट्ट, मल्हारराव होलकर, सखाराम बापू आदि मराठा सरदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे। इमादुलमुल्क भी अपनी सेना लेकर उनके साथ था किंतु जब तक ये लोग दिल्ली पहुंच पाते, तब तक अहमदशाह अब्दाली दिल्ली, मथुरा, आगरा, बल्लभगढ़ आदि को लूटकर पुनः अफगानिस्तान के लिए लौट चुका था।

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मराठों को मार्ग में हुई देरी का कारण बहुत स्पष्ट था। मराठों को राजपूताना राज्यों एवं गंगा-यमुना के दो-आब से चौथ वसूली करने में काफी समय लग गया। मराठों की विवशता यह थी कि विशाल सेनाओं का व्यय उठाने के कारण पेशवा नाना साहब स्वयं कर्ज में डूबा हुआ था और उसने रघुनाथ राव को उसकी सेना के खर्च के लिए कोई राशि नहीं दी थी। रघुनाथ राव को दिल्ली पर आक्रमण करने से पहले राजपूताना राज्यों एवं गंगा-यमुना के दोआब से ही चौथ वसूली करनी थी।

मराठा सेनापति रघुनाथ राव सबसे पहले मेवाड़ रियासत पहुंचा तथा उसने महाराणा से रुपयों की मांग की। कर्ज में डूबी हुई मेवाड़ रियासत के महाराणा राजसिंह (द्वितीय) ने रघुनाथ राव को एक लाख रुपए दिए जिसे लेकर रघुनाथ राव जयपुर की तरफ बढ़ा। इस काल में प्राचीन आम्बेर राज्य को जयपुर राज्य कहा जाने लगा था। जयपुर की सेनाओं ने मराठों को बहुत समय तक रोके रखा। यहाँ तक कि रघुरनाथ राव की सेना भूखी मरने लगी और उसे अपना पेट भरने के लिए प्रतिदिन किसी न किसी गांव पर आक्रमण करके वहाँ से राशन-पानी लूटना होता था।

इस दौरान मराठा सेनापति रघुनाथ राव ने पेशवा नाना साहब को पत्र लिखकर धन भिजवाने की मांग की। उसने पेशवा नाना साहब को सूचित किया कि मैं अपना पेट गांवों को लूटकर भर रहा हूँ। यह देश किलों एवं परकोटों में बंद है तथा अनाज का एक दाना भी लड़ाई किए हुए बिना एकत्रित करना संभव नहीं है। मेरे पास एक भी पैसा नहीं है तथा मुझे कहीं से भी ऋण नहीं मिल सकता है। मेरे सैनिकों को लगातार एक या दो दिन तक व्रत रखना पड़ रहा है।

रघुनाथराव ने जयपुर राज्य के अधीन बरवाड़ा को घेर लिया तथा जयपुर नरेश माधोसिंह (प्रथम) से 50 लाख रुपयों तथा 14 लाख रुपए वार्षिक आय वाली जागीर की मांग की। जयपुर राज्य का मंत्री कनीराम मराठों को 11 लाख रुपए देना चाहता था। इस दौरान बरवाड़ा के शेखावतों ने मराठों का डटकर सामना किया और उन्हें बरवाड़ा से आगे नहीं बढ़ने दिया।

इस पर 12 जुलाई 1757 को रघुनाथ राव ने पेशवा नाना साहब को दुबारा पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरे पास बिल्कुल भी धन नहीं है। यहाँ मुझे कोई ऋण देने को तैयार नहीं है तथा मेरे सैनिकों पर भी कर्जा चढ़ गया है। यहाँ पर हर वस्तु का भाव बहुत ज्यादा है। मैं प्रतिदिन किसी न किसी गांव को लूटकर खाना जुटा रहा हूँ।

अंत में जयपुर के राजा माधोसिंह ने रघुनाथ राव को ग्यारह लाख रुपए देना स्वीकार किया जिसमें से 6 लाख रुपए उसी समय चुका दिए और शेष राशि बाद में देने का भरोसा दिया।

जयपुर से रुपए मिलने के बाद रघुनाथ राव दिल्ली की ओर बढ़ा किंतु जब तक वह दिल्ली पहुंचता, तब तक अहमदशाह अब्दाली दिल्ली, बल्लभगढ़, मथुरा और आगरा को लूटकर लाहौर के लिए प्रस्थान कर चुका था। कहने को तो अहमदशाह अब्दाली लौट गया था किंतु अब रूहेलों का सरदार नजीब खाँ मुगलिया सल्तनत का मीर बख्शी था तथा अहमदशाह अब्दली का प्रतिनिधि होने के कारण समस्त अधिकारों का स्वामी भी। लाल किला अब नजीब खाँ के नियंत्रण में था और बादशाह उसके भीतर मूक कठपुतली की तरह बैठा हुआ था।

मराठों की शरण में रह रहे, दिल्ली के पुराने मीर बख्शी इमादुलमुल्क ने मराठा सरदार रघुनाथ राव से प्रार्थना की कि वह दिल्ली पर अधिकार करके नजीब खाँ रूहेला को नष्ट कर दे। इस पर खिज्राबाद की ओर से रघुनाथ राव, गंगा-यमुना के दोआब की ओर से सखाराम बापू एवं रेवाड़ी की ओर से शमशेर बहादुर खाँ दिल्ली की ओर बढ़े।

नए मीर बख्शी नजीब खाँ ने खिज्राबाद की तरफ खाइयां खुदवा कर उनके निकट अपनी तोपें खड़ी करवा दीं। ताकि मराठ सेनाएं दिल्ली में न घुस सकें। फिर भी सखाराम बापू ने दिल्ली में घुसकर पटपड़गंज पर अधिकार कर लिया। मराठों ने दिल्ली को चारों ओर से घेरकर अनाज की आपूर्ति रोक दी।

इसके बाद मराठों ने दो तरफ से दिल्ली पर धावा बोला। नजीब खाँ के रूहेला सैनिकों ने दिल्ली में स्थित इमादुलमुल्क का घर लूट लिया। रूहेलों ने इमादुलमुल्क के हरम की औरतों को पकड़कर उन्हें बेइज्जत किया। इस पर मराठे तेजी से आगे बढ़ते हुए लाल किले के निकट जा पहुंचे और उन्होंने लाल किले को चारों ओर से घेर लिया। इस घेराबंदी के कारण लाल किले में अनाज की आवक बंद हो गई।

मल्हारराव होलकर

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मल्हारराव होलकर

नाना साहब पेशवा ने अपने चचेरे भाई रघुनाथ राव भट्ट के साथ मल्हारराव होलकर को भी भेजा था ताकि दिल्ली को अहमदशाह अब्दाली से मुक्त करवाया जा सके। इस अभियान का सेनापति रघुनाथ राव था किंतु मल्हारराव होलकर अपनी स्वतंत्र नीति पर काम करने लगा।

जब मराठा सेनापति रघुनाथराव भट्ट तथा मल्हारराव होलकर की सेनाओं ने दिल्ली में घुसकर लाल किले के चारों अेर तोपें तैनात कर दीं तो रूहेला अमीर नजीब खाँ ने भी लाल किले की दीवारों पर तोपें चढ़वा दीं और मराठों पर गोले बरसाने लगा।

इस समय बादशाह आलमगीर (द्वितीय) की क्या स्थिति थी, इस सम्बन्ध में इतिहासकारों ने अलग-अलग तथ्य लिखे हैं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि आलगमीर ने नए मीर-बख्शी नजीब खाँ के विरुद्ध मराठों से सहायता मांगी। यह बात इसलिए उचित नहीं जान पड़ती कि बादशाह आलमगीर ने तो स्वयं ही पुराने मीर बख्शी इमादुलमुल्क के विरुद्ध कार्यवाही आरम्भ की थी और इमादुलमुल्क मराठों को दिल्ली पर चढ़ाकर लाया था। इसलिए यह संभव नहीं लगता कि बादशाह आलमगीर नए मीरबख्शी नजीब खाँ से छुटकारा पाने के लिए पुराने मीरबख्शी इमादुलमुल्क के पक्ष में हो जाता।

यह बात सही है कि रूहेला सरदार नजीब खाँ बादशाह आलमगीर की मर्जी से मीर-बख्शी नहीं बना था, उसे तो अहमदशाह अब्दाली ने अपने प्रतिनिधि के रूप में मुगलिया सल्तनत का मीर-बख्शी नियुक्त किया था। इसलिए यह तो संभव है कि बादशाह इस युद्ध के दौरान दोनों पक्षों से उदासीन रहा हो किंतु यह संभव नहीं है कि वह मराठों को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करे।

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जब लाल किला चारों ओर से घेर लिया गया तथा नजीब खाँ ने आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया तब मल्हारराव होलकर तथा विट्ठल शिवदेव ने कश्मीरी गेट के उत्तरी तरफ से हमला बोला। अदपस्थ मीर बख्शी इमादुलमुल्क की सेनाएं भी इन लोगों के साथ रहीं। मानाजी पायगुढ़े ने उत्तर-पश्चिम में काबुल गेट की तरफ से लाल किले पर आक्रमण किया।

25 अगस्त 1757 को बहादुर खाँ तथा राजा नागरमल ने लाल किले पर जबर्दस्त धावा बोला और रूहेला सैनिकों को पीछे धकेल दिया। इस पर नजीब खाँ की दूर तक मार करने वाली तोपों ने आग उगलनी आरम्भ कर दी जिससे बहादुर खाँ तथा राजा नागरमल के कई सौ सिपाही मारे गए। लाल किले की दीवारों पर चढ़ी तोपों के गोलों की मार से बचने के लिए मराठा सेनाएं कुछ समय के लिए लाल किले से दूर चली गईं। नजीब खाँ ने एक बार फिर से अपने दूत रघुनाथराव तथा इमादुलमुल्क के पास भेजकर शांति का प्रस्ताव रखा। इस समय नजीब खाँ के पास लाल किले के भीतर केवल 2000 सैनिक ही बचे थे।

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रघुनाथ राव ने नजीब खाँ के समक्ष शर्त रखी कि वह मीर बख्शी के पद से त्यागपत्र दे, लाल किला खाली करके अपनी जागीर रूहेलखण्ड को लौट जाए तथा युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में मराठों को 60 लाख रुपया प्रदान करे। उस समय लाल किले में इतना रुपया था ही नहीं। इसलिए नजीब खाँ को लगा कि इन शर्तों को मानने से तो अच्छा है कि मराठों से लड़ते हुए मृत्यु को गले लगा लिया जाए। इसलिए अब वह दुगने जोश से शत्रु का सामना करने को तैयार हो गया। 29 अगस्त 1757 की रात में रघुनाथ राव ने दिल्ली गेट की तरफ से तथा इमादुलमुल्क ने लाहौर गेट की तरफ से लाल किले पर हमला बोला।

मराठों की गोलाबारी से लाल किले के दिल्ली गेट की तरफ वाली दो बुर्जें ध्वस्त हो गईं। 31 अगस्त की रात्रि तक दोनों तरफ से तोपों के गोले छूटते रहे। नजीब खाँ के तोपचियों ने लाहौर गेट तथा तुर्कमानगेट की तरफ लड़ रहे इमादुलमुल्क तथा अहमद खाँ बंगश के सैनिकों को भारी क्षति पहुंचाई। नजीब खाँ द्वारा किए जा रहे जबर्दस्त प्रतिरोध के कारण ऐसा लगने लगा कि मराठों तथा इमादुलमुल्क को आसानी से लाल किले पर जीत हासिल नहीं होगी किंतु कुछ दिनों बाद लाल किले का राशन समाप्त होने लगा और भूख से बचने के लिए कुछ सैनिक गुप्त रास्तों से लाल किला छोड़कर भागने लगे।

इस पर नजीब खाँ ने मल्हारराव होलकर के पास अपने दूत भेजकर शांति की प्रार्थना की। मल्हारराव होलकर ने रघुनाथ राव और इमादुलमुल्क को संधि के लिए तैयार किया। 3 सितम्बर 1757 को कुतुब शाह एवं नजीब खाँ लाल किले से निकलकर मल्हारराव होलकर के शिविर में गए। जिस नजीब खाँ को अब्दाली अपने प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली में छोड़ गया था, उसने मल्हारराव होलकर को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लिये तथा उसके समक्ष समर्पण करने को तैयार हो गया। मल्हार राव ने शरण में आए हुए शत्रु को क्षमा कर दिया तथा उसके साथ संधि की शर्तें तय कर लीं।

रघुनाथ राव नहीं चाहता था कि यह संधि हो क्योंकि पेशवा ने रघुनाथ राव को ही इस अभियान का कमाण्डर नियुक्त किया था जबकि शांति वार्ता मल्हारराव कर रहा था। फिर भी मल्हार राव होलकर के दबाव से दोनों पक्षों में संधि हो गई तथा 6 सितम्बर 1757 को नजीब खाँ ने लाल किला खाली कर दिया।

नजीब खाँ अपने रोहिला सैनिकों एवं अपनी निजी सम्पत्ति को लेकर दिल्ली के बाहर स्थित वजीराबाद के किले में चला गया। इस किले का निर्माण ई.1755 में नजीब खाँ ने ही करवाया था तथा इसे पत्थरगढ़ कहते थे। इसी दौरान बादशाह तथा उसका परिवार महाराजा सूरजमल की शरण में भाग गया।

रघुनाथ राव ने अब तक बंदी बनाए गए समस्त रूहेला बंदियों को मुक्त कर दिया तथा निकटवर्ती क्षेत्रों से अनाज मंगवाकर लाल किले में भूखे मर रहे नागरिकों एवं सैनिकों में बंटवाया। रघुनाथ राव ने अहमदशाह अब्दाली तथा मुगल बादशाह के बीच हुई संधि रद्द कर दी।

लाल किले में मराठों का पहरा लग गया। इमादुलमुल्क फिर से मीर बख्शी बन गया और उसने नजीब खाँ द्वारा नियुक्त रूहेला अधिकारियों को हटाकर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिए। इस बार अहमद खाँ बंगश को बादशाह का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। मराठों ने इस दौरान दिल्ली तथा उसके आसपास की कुछ मस्जिदों को भी नष्ट किया।

कुछ ही समय बाद महाराजा सूरजमल की सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया। यह सेना अपने साथ बादशाह आलमगीर (द्वितीय) तथा उसके परिवार को लेकर आई थी। जाटों की सेना द्वारा मराठों पर दबाव बनाकर आलगमीर तथा उसके परिवार को फिर से लाल किले में प्रवेश दिलवा दिया गया। इसके बाद जाटों की सेना दिल्ली तथा उसके आसपास के क्षेत्रों को लूटती हुई डीग लौट गई।

रघुनाथ राव ने इस बार का दशहरा लाल किले में ही मनाया तथा उसके बाद 22 अक्टूबर 1757 को लाल किले से निकलकर गढ़-मुक्तेश्वर में गंगा-स्नान के लिए चला गया और मल्हारराव होलकर नजीब खाँ की जागीर को लूटने के लिए सहारनपुर की तरफ चला गया।

गंगा-स्नान के बाद रघुनाथराव ने पंजाब पर चढ़ाई की तथा अप्रेल 1758 में अहमदशाह अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को वहाँ से मार भगाया और अटक तथा पेशावर तक अपने थाने लगा दिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले की कंगाली

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लाल किले की कंगाली

लाल किले की कंगाली मुगलों के इतिहास की एक काली सच्चाई है जो शायद ही कभी इतिहास के पाठकों के समक्ष लाई गई है। इस कंगाली को देखकर लाल किले के साथ-साथ भारत माता भी आंसू बहा रही थी!

ईस्वी 1757 में अहमदशाह अब्दाली के अफगानिस्तान लौट जाने के बाद बादशाह आलमगीर मराठों के भय से अपने परिवार के साथ लाल किले से बाहर निकलकर जाटों की शरण में डीग भाग गया था तथा महाराजा सूरजमल की सेना के संरक्षण में वह फिर से लाल किले में प्रवेश पा सका था।

 कहने को तो आलमगीर (द्वितीय) अब भी बादशाह था और दिल्ली के तख्त पर बैठा था किंतु सच्चाई यह थी कि दिल्ली तो दूर लाल किले पर भी उसका शासन नहीं चलता था।

आलमगीर (द्वितीय) के समय में लिखी गई पु़स्तक ‘तारीख-ए-आलमगीर सानी’ में बादशाह की दुर्दशा और कंगाली का भयावह चित्रण किया गया है। इसमें लिखा है कि बादशाह इतना निर्धन हो चुका था कि उसके पास जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए जाने हेतु कोई सवारी नहीं बची थी। रिसाले के घोड़े बिक चुके थे और तीन वर्ष से सैनिकों को वेतन नहीं मिला था।

लाल किले की कंगाली का हाल यह था कि महल के सब भण्डार खाली पड़े थे। पैदलों के शरीर पर कपड़े नहीं थे। बादशाह के खास हाथी और घोड़ों को भी दाना नहीं मिलता था। जब बादशाह बाहर जाता था तो उसके साथ कोई नहीं जाया करता था।

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जब आलमगीर ने अपना जन्मदिन मनाया तो उसकी विपन्न अवस्था का भयंकर चित्र लोगों के सामने उपस्थित हुआ। रत्न-जटिज मयूरासन के स्थान पर एक काष्ठ-निर्मित चौकी थी जिस पर हीरे-जवाहरात के चित्र बने हुए थे। लाल किले की कंगाली का इससे बुरा चित्रण और क्या हो सकता था!

दीवाने खास में इने-गुने नौकर थे। न कोई अमीर था और न कोई राजा। बादशाह स्वयं मुगलों के विलीन वैभव का एक वीभत्स खण्डहर प्रतीत होता था।लाल किले की कंगाली ने मुगल शहजादियों का बुरा हाल किया। एक बार कई दिन की निरंतर भूख से पीड़ित होकर शहजादियां परदा तोड़कर शहर में जाने लगीं जिन्हें बड़ी कठिनाई से रोका गया।

जब स्वयं बादशाह तथा उसके हरम की यह हालत थी तो जनता की दुर्दशा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता था। दिल्ली की जनता को पूरी तरह उसके दुर्भाग्य के हवाले कर दिया गया था। अफगान, रूहेला, जाट और मराठा सेनाएं मुगलों की परम्परागत शत्रु होने के कारण दिल्ली को लूट रही थीं, नष्ट कर रहे थीं और उसका बचा-खुचा जीवन धूल में मिला रही थीं।

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इस काल की दिल्ली संभवतः थी ही इस योग्य। जब किसी देश के शासक अपने शत्रुओं से लड़ना छोड़कर और अपनी प्रजा का हित-चिंतन करना त्यागकर अपनी स्वार्थपूर्ति में लग जाते हैं अथवा रंगरेलियों में डूब जाते हैं, तब उनकी राजधानी, उनकी प्रजा और उनके राज्य का यही हाल होता है जो इस समय दिल्ली का हो रहा था। इस समय की दिल्ली पाण्डवों वाली दिल्ली नहीं थी, यह दिल्ली तोमरों वाली दिल्ली नहीं थी, यह दिल्ली चौहानों वाली दिल्ली भी नहीं थी। यह दिल्ली खलीफाओं की सेनाओं द्वारा सैंकड़ों साल तक लूटी गई, नौंची गई और पददलित की गई दिल्ली थी जो मंगोलों, बलोचों, ईरानियों, अफगानियों एवं तुर्कों के रूप में भारत आती रही थीं।

यह दिल्ली चंगेज खाँ और तैमूर लंग के रक्त मिश्रण से उत्पन्न बाबर की दिल्ली थी जिसके वंशज विगत दो सालों से मुगल बादशाहों के रूप में भारत का खून चूस रहे थे। इस समय की दिल्ली वह दिल्ली थी जिसने तेरहवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर अठारहवीं शताब्दी ईस्वी तक के पांच सौ सालों में भारत की जनता का रक्त पीकर अपने खजाने को समृद्ध किया था। दिल्ली का दुर्भाग्य यह था कि वह इस खजाने को सहेज कर नहीं रख सकी थी।

लाल किलों का सारा खजाना नादिरशाह एवं अदमदशाह अब्दाली जैसे दुर्दांत लुटेरे ले जा चुके थे औद दिल्ली पूरी तरह श्रीहीन होकर, धूल में लोट रही थी।

जो दिल्ली पाण्डवों से लेकर तोमरों और चौहानों तक के काल में भारत के करोड़ों लोगों का पेट भरने के लिए विख्यात थी, आज उसी दिल्ली में मौत और भूख का नंगा नाच हो रहा था। इन दिनों प्रकृति भी जैसे दिल्ली से नाराज हो गई थी।

दिल्ली से कुछ ही दूरी पर ब्रज को हैजे से मुक्ति मिली ही थी कि दिल्ली में दिमागी बुखार की महामारी फैली। यह महामारी अभी थमी भी नहीं थी कि आंखों में संक्रमण का भयानक रोग फैल गया। एक के बाद एक करके आती महामारी से त्रस्त, भूखे-नंगे लोग अपने घरों में पड़े तड़पते रहे, उन्हें औषधि और अन्न का कण देना तो दूर, पानी की बूंद तक पिलाने वाला कोई नहीं था।

नवम्बर 1757 में दिल्ली में जोरों का भूकम्प आया जिसके कारण बहुत बड़ी संख्या में घर गिर गये और सैंकड़ों लोग मर गये। खाने की चीजें बहुत महंगी हो गईं और दवाइयां तो ढूंढने पर भी नहीं मिलती थीं। शहर में लुटेरों और चोरों के झुण्ड आ बसे जो राहगीरों को दिन दहाड़े लूटते थे।

लुटने और लूटने के लिए दिल्ली के लोगों के तन पर पहने हुए कपड़ों, दो-चार सेर अनाज और एकाध समय की रोटियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। सदियों से भारत की राजधानी रही दिल्ली, खण्डहरों और शवों की नगरी बनकर रह गई।

दिल्ली के चारों ओर खेत पसरे हुए थे किंतु किसानों की हिम्मत नहीं होती थी कि वे उनमें बीज डाल दें। बीज बो भी दिया और फसल पक भी गई तो किसानों के हाथ आने वाली नहीं थी। कौन जाने उसे मुगलों के सैनिक लूट कर ले जाएंगे, या रूहेलों के या फिर ईरान से आया हुआ नादिरशाह खा जाएगा अथवा अफगानिस्तान से आया हुआ अहमदशाह इस फसल को छीन लेगा, यह भी तो पता नहीं था। फसल बोएं भी तो किसके लिए!

फिर भी किसानों को जीना ही था, अपने बच्चों का पेट पालना ही था। इसलिए खेत इस काल में भी बोए जा रहे थे और देश के करोड़ों किसान केवल इस आशा पर जीवित थे कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। एक दिन परमपिता परमात्मा आएगा और सबके दुःख दूर कर देगा!

हिंदुकुश पर्वत के इस तरफ बह रहीं सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज, व्यास, गंगा तथा यमुना अब भी जल से भरी हुई थीं। भारत की गाएं अब भी दूध देती थीं, धरती अब भी धान देने को तैयार थी किंतु हिन्दूकुश पर्वत के उस पार से आए हिंसक लोगों ने भारत की नदियों, पशुओं और धरती माता की जो दुर्दशा की थी, उसी का यह परिणाम था कि इस काल की दिल्ली में किसी का पेट नहीं भरता था।

भारत की शस्य-श्यामला भूमि को भेड़िए और लक्कड़बग्घे रौंद रहे थे। लाचार भारत माता की आंखों से आंसुओं के स्थान पर रक्त के झरने बहते थे किंतु भारत माता की आंखें पौंछने वाला कोई नहीं था।

दिल्ली के दुखों का अंत अभी निकट नहीं था। अभी तो अहमदशाह अब्दाली को एक बार वापस आना था। जैसे-जैसे मराठे पंजाब में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे काबुल में बैठा हुआ अहमदशाह अब्दाली गुस्से से उबल रहा था। जब ईस्वी 1758 में मराठों द्वारा उसका पुत्र तिमूरशाह लाहौर से भगा दिया गया तो अहमदशाह अब्दाली के क्रोध का पार नहीं रहा किंतु इस समय उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वह तत्काल भारत जाकर मराठों का दमन कर सके।

उसकी सेना दिल्ली एवं मथुरा के अभियान से कुछ माह पहले ही लौटी थी तथा उसके बहुत से सैनिक हैजे से मारे गए थे इसलिए सेना का मनोबल बहुत गिरा हुआ था। जो सैनिक जीवित लौटकर आए थे उनके पास इतना धन हो गया था कि अब उन्हें जिंदगी में फिर कभी लड़ाई पर जाने की आवश्यकता ही नहीं रही थी।

अहमदशाह अब्दाली के सेनापति भी तुरंत फिर से भारत चल देने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए अब्दाली ने सही समय आने तक काबुल में ही रुकने का निर्णय लिया किंतु अब्दाली से पहले तो फिरंगियों के रूप में एक और बड़ी मुसीबत दिल्ली के लाल किले की ओर बढ़ी चली आ रही थी जो हमेशा-हमेशा के लिए दिल्ली का रंग और रूप बदल देने वाली थी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोपीय कम्पनियों का ताण्डव

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यूरोपीय कम्पनियों का ताण्डव

जब मुगल शासक कमजोर हो गए तथा मराठे पूरे उत्तर भारत को रौंदने लगे तो भारत को लूटने के लिए यूरोपीय लुटेरे आ धमके। ये विदेशी लुटेरे व्यापारिक कम्पनियों के रूप में भारत में घुसे। शीघ्र ही भारत में यूरोपीय कम्पनियों का ताण्डव आरम्भ हो गया।

जिस समय मराठों ने लाल किले पर अधिकार कर रखा था और बादशाह आलमगीर डीग में रह रहा था, उस समय बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने मराठों को लाल किले से बाहर निकालने के लिए फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांगी। बादशाह ने कम्पनी के सेनापति डी बुसी को लिखा कि वह 1000 मजबूत फ्रैंच सिपाही दिल्ली की रक्षा के लिए भिजवा दे। इस सहायता के बदले में बादशाह न केवल दिल्ली आने वाली फ्रैंच सेना का पूरा खर्चा वहन करेगा अपिुत कनार्टक युद्ध में भी फ्रांसीसियों की सहायता करेगा।

फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी उस समय स्वयं ही संकट में थी तथा बादशाह की सहायता करने की स्थिति में नहीं थी। इसका कारण यह था कि कुछ समय पहले ही अर्थात् ई.1756 में यूरोप में सप्त वर्षीय युद्ध आरम्भ हो चुका था। हालांकि इसे यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध कहा जाता है किंतु वास्तव में यह एक छोटा-मोटा विश्वयुद्ध था जिसमें विश्व के कई देशों ने भाग लिया था किंतु इतिहास में इसे विश्व युद्ध की मान्यता नहीं दी गई।

इस युद्ध में यूरोप की पांचों बड़ी शक्तियों अर्थात् इंग्लैण्ड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, रूस तथा जर्मनी सहित अमरीका, भारत, फिलीपन्स आदि देशों ने भाग लिया। इस युद्ध का नेतृत्व एक तरफ इंग्लैण्ड तथा दूसरी तरफ फ्रांस के हाथों में था जो विश्व-व्यापार पर अपना एकच्छत्र दबदबा स्थापित करने के लिए एक-दूसरे को निबटा देने के खतरनाक इरादों के साथ लड़ रहे थे।

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 इस कारण यह युद्ध इन दोनों देशों के उपनिवेशों की धरती पर लड़ा गया जिनमें आयरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटिश शासित अमरीका, प्रशा, होली रोमन एम्पायर अर्थात् रोम एवं जर्मनी, ऑस्ट्रिया, रशिया, स्पेन, पेरू, स्वीडन तथा भारत आदि देश शामिल थे। भारत में भी यूरोपीय कम्पनियों का ताण्डव मच गया।

इस युद्ध का वास्तविक स्वरूप यह था कि इंगलैण्ड की तरफ से युद्ध का मोर्चा ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेनाओं ने संभाला जबकि फ्रांस की तरफ से युद्ध का नेतृत्व फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा लड़ा गया। इस युद्ध के वैश्विक स्वरूप को दर्शाते हुए अंग्रेज इतिहासकार वॉल्टेयर ने लिखा है- ‘हमारे देश में तोप का पहला गोला छूटने के साथ ही अमरीका और एशिया की तोपों में भी आग लग जाती थी।’

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यह युद्ध ई.1756 से आरम्भ होकर ईस्वी 1763 तक चलता रहा। भारत के संदर्भ में इस युद्ध को तृतीय कर्नाटक युद्ध कहा जाता है। फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस युद्ध में बादशाह आलमगीर (द्वितीय) से सैन्य सहायता मांगी। कहाँ तो बादशाह आलमगीर चाहता था कि फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी मराठों के विरुद्ध बादशाह आलमगीर की सहायता करे किंतु हुआ यह कि जब मराठे दिल्ली से चले गए तब बादशाह आलमगीर को अपनी सेनाएं फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सहायता के लिए कर्नाटक भेजनी पड़ीं।

यह अलग बात थी कि बादशाह के पास न कोई सेना थी न कोई सेनापति! बादशाह की तरफ से यह सारा काम अहमदशाह अब्दाली द्वारा नियुक्त नजीब खाँ रूहेला और उसके आदमी किया करते थे। मुगलों द्वारा इस विषम समय में भी फ्रांसीसियों की सहायता के लिए सेना भेजने का सबसे बड़ा कारण यह था कि इस समय अंग्रेज बंगाल सूबे को दबाने में सफल हो गए थे और बादशाह आलमगीर को आशा थी कि यदि फ्रैंच कम्पनी अंग्रेजों को परास्त कर देगी तो बंगाल का सूबा अंग्रेजों की दाढ़ में से निकलकर पुनः मुगल बादशाह के अधीन किया जा सकेगा।

ऐसा नहीं था कि भारत में केवल ये दो फिरंगी कम्पनियां ही व्यापार कर रही थीं, पुर्तगाल से आए हुए पोर्चूगीज तथा हॉलैण्ड से आए हुए डच भी भारत में व्यापार कर रहे थे।

स्वीडन से आई हुई स्वीडिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी व्यापार कर रही थी किंतु फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी रूपी दो महादैत्यों के समक्ष शेष फिरंगी कम्पनियों की कोई शक्ति नहीं थी और ये धीरे-धीरे भारत के छोटे-छोटे क्षेत्रों तक सीमित होकर रह गई थीं। इतने सारे देशों की कम्पनियों की उपस्थिति के कारण भारत में यूरोपीय कम्पनियों का ताण्डव मचना स्वाभाविक था।

ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच यह भयानक एवं विश्वव्यापी खूनी युद्ध क्यों हुआ, इस पर किंचित् विचार किया जाना आवश्यक है। यह जानकर हैरानी हो सकती है कि विगत सात सौ सालों से मध्य एशिया के मुसलममान बादशाह सोने-चांदी और हीरे-मोतियों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण करते रहे थे जबकि यूरोपीय कम्पनियां गरम मसालों, कपास, नील, रेशम और चंदन के लिए भारतीय उपमहाद्वीप को रौंद रहीं थीं।

न केवल भारत अपितु हिन्द महासागर में दूर-दूर तक छितराए हुए भारतीय उपमहाद्वीप के द्वीपों में ये कम्पनियां एक दूसरे का खून बहा रही थीं। ये कम्पनियों भारत की मुख्य भूमि के साथ-साथ अण्डमान निकोबार, लक्षद्वीप, बर्मा अर्थात् म्यानमार, सिंहल द्वीप अर्थात् लंका, स्याम अर्थात् थाइलैण्ड, यवद्वीप अर्थात् जावा, स्वर्णद्वीप अर्थात् सुमात्रा, मलय द्वीप अर्थात् मलाया, काम्बोज अर्थात् कम्बोडिया, वाराहद्वीप अर्थात् मेडागास्कर, आंध्रालय अर्थात् ऑस्ट्रेलिया, बाली, बोर्नियो आदि द्वीपों में अपने उपनिवेश स्थापित कर चुकी थीं अथवा करने की प्रक्रिया में थीं।

ये समस्त द्वीप इस्लाम के उदय से पहले भारत का हिस्सा माने जाते थे तथा इन द्वीपों में भारतीय संस्कृति फलती-फूलती थी किंतु अब इनमें से कुछ द्वीपों को मध्य एशिया से आए मुस्लिम आक्रांताओं ने रौंद डाला था तो कुछ द्वीपों पर यूरोपीय कम्पनियों ने अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे। उस काल के यूरोप में इन द्वीपों को मसाला द्वीप कहा जाने लगा था।

फ्रांसीसी और अंग्रेजी कम्पनियों के बीच सात वर्ष तक चला युद्ध भारत की मुख्य भूमि के साथ-साथ इन मसाला द्वीपों पर भी व्यापारिक एवं राजनीतिक आधिपत्य को लेकर हुआ था। भारत भूमि से बाहर कुछ द्वीपों पर डच एवं पुर्तगाली कम्पनियां भी जी-जान से लड़ रही थीं।

सात साल तक चले इस युद्ध में यूरोप, एशिया और अमरीका के विभिन्न देशों में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेनाओं ने फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेनाओं को परास्त कर दिया। इस प्रकार सप्तवर्षीय युद्ध में फ्रांस हार गया और इंगलैण्ड जीत गया। भारत में भी ईस्वी 1763 में वाण्डीवाश के युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को करारी पराजय का स्वाद चखाया।

इस युद्ध के बाद यह लगभग निश्चित हो गया कि फ्रांसीसियों को भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर जाना होगा तथा भविष्य में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ही भारत में व्यापार करेगी।

भारतीय इतिहास के मध्यकाल का अवसान सन्निकट था। उस काल में एक तरफ तो बंगाल से अंग्रेज शक्ति पूर्व दिशा से उत्तरी भारत को दबाती हुई चली आ रही थी तथा दूसरी ओर अफगानिस्तान की ओर से विगत कई शताब्दियों से आ रही मुस्लिम आक्रमणों की आंधी अभी थमी नहीं थी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आलमगीर की हत्या

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आलमगीर की हत्या

बादशाह आलमगीर (द्वितीय) का वजीर इमादुलमुल्क लाल किले पर फहरा रहे अफगानी झण्डे को उतारना चाहता था किंतु भयभीत आलमगीर अफगानी झण्डे को हटाने के लिए तैयार नहीं था, इस पर इमादुलमुल्क ने आलमगीर की हत्या करवा दी।

ईस्वी 1757 में जब बंगाल के नवाब अली वर्दी खाँ की मृत्यु हो गई तो बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने उसके उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला के नाम फरमान जारी करके उसे बंगाल का नवाब नियुक्त किया। 23 जून 1757 को अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला पर आक्रमण कर दिया। कलकत्ता के पास प्लासी के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच यह युद्ध लड़ा गया।

नवाब की सेना में लगभग 50,000 सैनिक थे जबकि अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड क्लाइव के पास केवल 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे। नवाब ने अपनी सेना को चार सेनापतियों के अधीन नियुक्त किया किंतु चार में से तीन सेनापति युद्ध आरम्भ होते ही सिराजुद्दौला को छोड़कर लॉर्ड क्लाइव की ओर चले गए। इनका नेतृत्व मीर जाफर कर रहा था।

इस प्रकार बिना किसी युद्ध के ही क्लाइव ने प्लासी का युद्ध जीत लिया। नवाब जब पटना की ओर भाग रहा था, तब उसे बन्दी बना लिया गया। 28 जून 1757 को अँग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। 2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन ने नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कर दी। इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने लिखा है- ‘प्लासी एक ऐसा सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी लोगों और मीर जाफर ने नवाब को अँग्रेजों के हाथों बेच दिया।’

आलमगीर (द्वितीय) कम्पनी की इस कार्यवाही से नाराज था परंतु मीर बख्शी इमादुलमुल्क ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के इस कदम को उचित ठहराया। इस युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी बंगाल पर हावी हो गई और मुगल बादशाह का अब तक चला आ रहा नाम मात्र का नियंत्रण भी जाता रहा।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

मीर बख्शी इमादुलमुल्क ने बादशाह आलमगीर से कहा कि अब अहमदशाह अब्दाली वापस चला गया है इसलिए लाल किले पर लगा हुआ अफगानी झण्डा उतार दिया जाए किंतु बादशाह ने कहा कि अहमदशाह अब्दाली हमारा मित्र एवं सम्बन्धी है। हमने उसके साथ संधि की है इसलिए उसका झण्डा लाल किले से नहीं उतारा जाएगा। इस विषय पर बादशाह एवं मीर बख्शी की लड़ाई खुलकर सामने आ गई।

इस पर बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने अपने पुत्र अली गौहर से कहा कि वह मीर बख्शी इमादुलमुल्क की हत्या कर दे। इमादुलमुल्क को इस बात की जानकारी हो गई। इमादुलमुल्क को यह भी ज्ञात हुआ कि बादशाह फिर से अहमदशाह अब्दाली को दिल्ली बुलवा रहा है ताकि इमादउलमुल्क को समाप्त किया जा सके।

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इस पर इमादुलमुल्क ने मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ को दिल्ली आने का न्योता दिया जो कि पेशवा नाना साहब का भतीजा था। जब सदाशिवराव भाऊ दिल्ली के निकट पहुंच गया तो इमादुलमुल्क ने उसके साथ मिलकर बादशाह आलगमीर (द्वितीय) तथा उसके परिवार की हत्या करने का षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के तहत 29 नवम्बर 1759 को आलमगीर (द्वितीय) को सूचना दी गई कि कोटला फतेहशाह में एक फकीर बादशाह से मिलना चाहता है। बादशाह उसी समय उस फकीर से मिलने के लिए लाल किले से बाहर निकलकर फतेहशाह कोटला चला गया। बादशाह के वहाँ पहुंचते ही इमादुलमुल्क द्वारा नियुक्त कुछ हत्यारों ने अपने खंजरों से बादशाह पर ताबड़तोड़ वार किए। बादशाह आलमगीर (द्वितीय) की वहीं पर मृत्यु हो गई।

इमादुलमुल्क ने बादशाह का शव यमुनाजी के तट पर फिंकवा दिया तथा यह प्रचारित कर दिया कि बादशाह पैर फिसलने से मर गया। बादशाह की हत्या कर देने के बाद इमादुल्मुल्क दिल्ली से भागकर महाराजा सूरजमल की शरण में चला गया जहाँ उसका परिवार पहले से ही रह रहा था।

फादर वैंदेल ने लिखा है- ‘इस प्रकार उसने महान मुगलों का वजीर होने का अपना गौरव जाटों को अर्पित कर दिया। उसे एक जमींदार जाट से, एक भिखारी की तरह हाथ जोड़कर दया की भीख मांगते और उसके प्रजाजनों में शरण लेते तनिक भी लाज न आई। जबकि इससे पहले वह उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये सारे हिन्दुस्तान को शस्त्र-सज्जित कर चुका था। इससे पहले मुगलों के गौरव को इतना बड़ा और इतना उचित आघात नहीं लगा था। इस अप्रत्याशित घटना ने उनके गौरव को घटा दिया और नष्ट कर दिया।’

आलमगीर की छः बेगमों तथा कई पुत्रों के नाम मिलते हैं जिनमें अली गौहर, मुहम्मद अली असगर, हारून हिदायत बख्श, ताली मुरादशाह, जमियत शाह, मुहम्मद हिम्मत शाह, अहसानउद्दीन मुहम्मद तथा मुबारक शाह आदि सम्मिलित हैं। आलमगीर (द्वितीय) की हत्या की सूचना मिलते ही बादशाह आलमगीर का बड़ा पुत्र अली गौहर लाल किले से भाग निकला और पटना चला गया। अलीगौहर को मुगलों के इतिहास में शाहआलम (द्वितीय) के नाम से जाना जाता है।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि आलमगीर की हत्या हो जाने पर पेशवा नाना साहब ने अपने पुत्र विश्वासराव को दिल्ली के तख्त पर बैठाने का प्रयास किया। सदाशिव राव ने इमादुलमुल्क को इस कार्य के पुरस्कार स्वरूप बड़ी रकम देने का लालच दिया किंतु इमादुलमुल्क कतई नहीं चाहता था कि भारत से मुगल वंश का शासन समाप्त करके दिल्ली का तख्त हिंदुओं को सौंप दिया जाए। अन्य मुस्लिम अमीरों ने भी मराठों का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

इस काल में दिल्ली के मुस्लिम अमीरों की राजनीति समझ में नहीं आने वाली चीज बन गई थी। एक ओर तो वे दिल्ली का शासन हिंदुओं के अधिकार में सौंपने को तैयार नहीं थे और दूसरी ओर वे किसी भी मुगल बादशाह को चैन के साथ शासन नहीं करने दे रहे थे। उनकी हत्याएं कर-करके उन्हें हुमायूँ के मकबरे और कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह में दफना रहे थे। हुमायूँ के मकबरे में इतने बादशाहों के शव दफनाए गए कि उसे मुगलों का कब्रिस्तान कहा जाने लगा।

यदि दिल्ली के मुस्लिम अमीरों ने उस समय दिल्ली का तख्त मराठों को सौंप दिया होता तो इससे भारत की राजनीति पूरी तरह बदल जाती। संभवतः आगे चलकर पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों को इतनी क्षति नहीं उठाने पड़ती और न कुछ ही वर्ष बाद शाह आलम (द्वितीय) को भारत की सत्ता अंग्रेजों के हाथों में सौंपनी पड़ती।

जब सदाशिव राव भाउ पेशवा के पुत्र विश्वासराव को दिल्ली के तख्त पर नहीं बैठा सका तो उसने इमादुलमुल्क के समक्ष शर्त रखी कि अगला बादशाह सदाशिव राव की पसंद से चुना जाएगा। इमादुलमुल्क ने मराठों की यह बात स्वीकार कर ली।

10 दिसम्बर 1759 को मुइन-उल-मिल्लत नामक एक मुगल शहजादे को नया बादशाह बनाया गया। उसे मुगलों के इतिहास में शाहजहाँ (तृतीय) के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर मुइन-उल-मिल्लत के बारे थोड़ी जानकारी देना समीचीन होगा।

पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र का नाम कामबख्श था जो औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह (प्रथम) द्वारा युद्ध के मैदान में मार दिया गया था। कामबख्श के बड़े पुत्र का नाम मुहि-उस-सुन्नत था। इसी मुहि-उस-सुन्नत का पुत्र मुइन-उल-मिल्लत था जो शाहजहाँ (तृतीय) के नाम से बादशाह हुआ। वह 10 महीने ही शासन कर सका।

10 अक्टूबर 1760 को मराठों ने शाहजहाँ (तृतीय) को गद्दी से उतार कर जेल में डाल दिया तथा उसके स्थान पर मरहूम बादशाह आलमगीर (द्वितीय) के बड़े बेटे अली गौहर को शाहआलम (द्वितीय) के नाम से बादशाह बना दिया जो इन दिनों पूर्वी भारत के शहरों में भटक रहा था। बादशाह शाहजहाँ (तृतीय) ई.1772 तक जेल में पड़ा सड़ता रहा और जेल में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सदाशिव राव भाऊ

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सदाशिव राव भाऊ

सदाशिव राव भाऊ मराठों का बड़ा सेनापति था। वह पेशवा नाना साहब प्रथम का चचेरा भाई था। अपने घमण्डी स्वभाव के कारण उसने मराठों की सेना को बड़े संकट में डाल दिया। जब अहमदशाह अब्दाली भारत के घावों से फिर से रक्त निकालने के लिए आया तो सदाशिव राव भाऊ नितांत अविवेकी सिद्ध हुआ।

हम चर्चा कर चुके हैं कि ई.1756 में अहमदशाह अब्दाली ने अपने पुत्र तिमूरशाह को लाहौर का सूबेदार बनाया था तथा मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने तिमूरशाह से अपनी पुत्री जौहरा बेगम का विवाह करके तिमूरशाह को लाहौर का सूबेदार स्वीकार कर लिया था किंतु ई.1758 में मराठों ने तिमूरशाह को लाहौर से मार भगाया तो अहमदशाह अब्दाली के लिए आवश्यक हो गया कि वह एक बार फिर भारत पर आक्रमण करे।

ईस्वी 1760 में अहमदशाह अब्दाली ने फिर से दिल्ली का रुख किया। इस बार वह पहले से भी अधिक विशाल सेना लेकर आया।

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इस बार उसके तीन लक्ष्य थे। उसका पहला लक्ष्य था मीर बख्शी इमादुलमुल्क जिसने अब्दाली द्वारा नियुक्त नजीब खाँ को मीर बख्शी के पद से हटा दिया था। अहमदशाह का दूसरा लक्ष्य था मराठा सरदार सदाशिव राव भाउ जिसने तिमूरशाह को लाहौर से मारकर भगा दिया था। अब्दाली का तीसरा लक्ष्य था महाराजा सूरजमल जाट जिसने पिछले अभियान में 10 लाख रुपए देने का वादा किया था किंतु उसने अब्दाली को फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी।

जिस समय अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान से रवाना हुआ, ठीक उसी समय दक्षिण भारत में स्थित मैसूर राज्य के शासक हैदर अली ने दक्षिण की ओर से मराठों पर आक्रमण किया। हैदरअली ने कुछ ही समय पहले मैसूर के हिन्दू शासक एवं उसकी माता को बंदी बनाकर मैसूर का राज्य हड़प लिया था। नए बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ने सोचा कि उत्तर की ओर से अहमदशाह अब्दाली तथा दक्षिण की ओर से हैदर अली मराठों को पीसकर नष्ट कर देंगे। इसलिए बादशाह ने मराठों की पसंद के वजीरों को हटाकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला को अपना मुख्य वजीर तथा रूहेला सरदार नजीबउद्दौला उर्फ नजीब खाँ को मुख्तार खास नियुक्त कर दिया।

जब मराठों को यह ज्ञात हुआ कि अहमदशाह अब्दाली फिर से दिल्ली की ओर आ रहा है तो पेशवा नानासाहब ने अब्दाली का मार्ग रोकने के लिये अपने भतीजे सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में एक विशाल सेना दिल्ली की ओर रवाना की। 7 मार्च 1760 को सदाशिव राव भाऊ दक्षिण से चला।

सदाशिव राव अब तक राजपूताना से लेकर दिल्ली, गंगा-यमुना के दोआब एवं पंजाब में लाहौर तथा मुल्तान तक कई लड़ाइयां जीत चुका था इसलिए वह अपनी जीत के प्रति आवश्यकता से अधिक आश्वस्त था। सदाशिवराव भाउ तथा अन्य मराठा सदार अपने साथ भारी-भरकम लवाजमा लेकर रवाना हुए। उन्होंने अपने परिवारों की स्त्रियों, नृत्यांगनाओं, रखैलों और दासियों को भी अपने साथ ले लिया। लगभग चालीस हजार मराठा स्त्री-पुरुष एवं बच्चे उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा के उद्देश्य से इस मराठा सेना के साथ हो लिए।

युद्ध क्षेत्र में पहुंचने से पहले मराठा सेनापतियों एवं उनके परिवारों ने पुष्कर, गढ़मुक्तेश्वर और प्रयागराज आदि तीर्थों में डुबकियां लगाईं और काशी में विश्वनाथ के दर्शन किये। वे बड़ी ही लापरवाही से दिल्ली की ओर बढ़े।

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सदाशिव राव भाऊ पेशवा नाना साहब का भतीजा तथा चिम्माजी अप्पा का सिरफिरा और घमण्डी पुत्र था। उसे शत्रु और मित्र की पहचान नहीं थी। फिर भी उसे महाराजा सूरजमल के महत्व की जानकारी थी और उसने महाराजा तथा उसकी सेना को अब्दाली के विरुद्ध अपने साथ ले चलने की इच्छा व्यक्त की। भाऊ ने महाराजा सूरजमल को मराठों की तरफ से लड़ने का निमंत्रण भिजवाया।

महाराजा सूरजमल इस शर्त पर मराठों को अपने 10 हजार सैनिकों सहित सहायता देने को तैयार हो गया कि मराठे भरतपुर राज्य में उपद्रव नहीं करेंगे तथा चौथ वसूली के लिये तकाजे करके उसे तंग नहीं करेंगे।

मराठों ने सूरजमल की ये शर्तें स्वीकार कर लीं। 8 जून 1760 को सदाशिव राव भाऊ ने मराठा सैनिकों पर, जाटों को सताने या उनके क्षेत्र में लूटपाट करने पर रोक लगा दी। इसके बदले में सूरजमल ने मराठों को एक माह के उपयोग जितनी खाद्य सामग्री प्रदान की।

आगरा से 20 मील दूर बाणगंगा नदी के तट पर सदाशिव राव भाऊ ने डेरा लगाया। वहीं से उसने महाराजा सूरजमल को लिखा कि वह अपनी सेना को लेकर आ जाये। महाराजा को भाऊ पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मल्हारराव होल्कर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा के लिये शपथ-पूर्वक वचन दिया।

30 जून 1760 को सूरजमल अपने 10 हजार सैनिक लेकर भाऊ के शिविर में पहुंचा। भाऊ ने स्वयं दो मील आगे आकर सूरजमल का स्वागत किया। भाऊ ने यमुनाजी का जल हाथ में लेकर सूरजमल के प्रति अपनी मित्रता की प्रतिज्ञा दोहराई।
सदाशिव राव भाऊ ने महाराजा सूरजमल की सलाह पर मथुरा में एक युद्ध परिषद आहूत की जिसमें मीर बख्शी इमादुलमुल्क को भी बुलाया गया। इस युद्ध परिषद में सबसे सुझाव मांगे गये कि अहमदशाह अब्दाली का सामना किस प्रकार किया जाये।

महाराजा सूरजमल ने सदाशिव राव भाऊ को सलाह दी कि मराठा महिलाएं, अनावश्यक सामान और बड़ी तोपें जो इस लड़ाई में कुछ काम न देंगी, चम्बल के पार ग्वालियर तथा झांसी के किलों में भेज दी जायें और सदाशिवराव हल्के शस्त्रों से सुसज्जित रहकर अब्दाली का सामना करे। यदि मराठा सरदार अपनी महिलाओं को इतनी दूर न भेजना चाहें तो भरतपुर राज्य के किसी भी किले में भिजवा दें।

महाराजा सूरजमल ने भाऊ को यह भी सलाह दी कि अब्दाली से आमने-सामने की लड़ाई करने के स्थान पर छापामार युद्ध किया जाये तथा बरसात तक उसे अटकाये रखा जाये। जब बरसात आयेगी तो अब्दाली हिल भी नहीं पायेगा और संभवतः तंग आकर वह अफगानिस्तान लौट जाये।

सूरजमल को विश्वास था कि मराठों को सिक्खों तथा बनारस के हिन्दू राजा से भी सहायता प्राप्त होगी। क्योंकि अब्दाली ने सिक्खों का बहुत नुक्सान किया था। इसी प्रकार बनारस का राजा बलवंतसिंह अवध के नवाब शुजाउद्दौला का शत्रु था।
मल्हारराव होलकर ने महाराजा सूरजमल के बहुमूल्य सुझावों का समर्थन किया किंतु सदाशिव राव भाऊ अविवेकी व्यक्ति था, उसने सूरजमल के व्यावहारिक सुझावों को मानने से मना कर दिया।

वह न तो बरसात तक रुकने के पक्ष में था, न मराठा औरतों को युद्ध के मैदान से दूर रखने के पक्ष में था और न छापामार युद्ध करने के पक्ष में था। सदाशिव राव को अपने घमण्ड के कारण अब्दाली और उसकी सेना मच्छरों की भांति निर्बल लगती थी। इसलिए वह अब्दाली तथा उसकी सेना को तत्काल ही मसल कर नष्ट कर देना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जाट मराठा संघ

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जाट मराठा संघ

जब अहमदाशाह अब्दाली ने दिल्ली पर दूसरी बार आक्रमण किया तो मराठों के नेता सदाशिव राव भाऊ ने महाराजा सूरजमल से मिलकर जाट मराठा संघ बनाया ताकि अब्दाली को दिल्ली से दूर रखा जा सके।

मथुरा की युद्ध परिषद् के बाद मराठों और जाटों ने मथुरा से आगे बढ़कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मुगल बादशाह मूक दर्शक की भांति बैठे रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सका। दिल्ली हाथ में आते ही सदाशिव राव भाऊ तोते की तरह आंख बदलने लगा। महाराजा सूरजमल के लाख मना करने पर भी भाऊ ने लाल किले के दीवाने खास की छतों से चांदी के पतरे उतार लिये और नौ लाख रुपयों के सिक्के ढलवा लिये।

सदाशिव राव भाऊ के सैनिकों ने दिल्ली एवं आगरा के लाल किलों, शाही महलों, मस्जिदों ताजमहल तथा अन्य मकबरों में लगे हीरे-मोती उतारने शुरु कर दिए। दिल्ली की मोती मस्जिद में औरंगजेब ने बहुत कीमती रत्न लगवाए थे, मराठों ने इन रत्नों को उतार लिया जिसके कारण मोती मस्जिद बुरी तरह से विरूपित हो गई।

सूरजमल स्वयं दिल्ली का शासक बनना चाहता था। उसे यह बात बुरी लगी और उसने भाऊ को रोकने का प्रयत्न किया किंतु भाऊ नहीं माना। सूरजमल चाहता था कि इमादुलमुल्क को फिर से दिल्ली का वजीर बनाया जाये किंतु भाऊ ने घोषणा की कि वह नारोशंकर को दिल्ली का वजीर बनायेगा। इससे सूरजमल और इमादुलमुल्क का भाऊ से मोह भंग हो गया। इस कारण जाट मराठा संघ टूटने के कगार पर आ गया। फिर भी महाराजा सूरजमल ने शांति से काम लेने का निश्चय किया।

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महाराजा सूरजमल चाहता था कि दिल्ली के बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को मार डाला जाये क्योंकि उसने अहमदशाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया है किंतु बादशाह, भाऊ को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लेता था।

सदाशिव राव भाऊ का बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के प्रति अनुराग देखकर सूरजमल नाराज हो गया। सूरजमल चाहता था कि दिल्ली की सुरक्षा का भार सूरजमल पर छोड़ा जाये किंतु सदाशिव राव भाऊ ने दिल्ली के महलों पर अपनी सेना का पहरा बैठा दिया। इन सब बातों से महाराजा सूरजमल खिन्न हो गया।

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उसने भाऊ से कहा कि वह दीवाने आम की चांदी की छत फिर से बनवाये तथा इमादुलमुल्क को दिल्ली का वजीर बनाने की घोषणा करे, अन्यथा भाऊ को सूरजमल की सहायता नहीं मिल सकती।  इस पर भाऊ ने तैश में आकर जवाब दिया- ‘क्या मैं दक्खन से तुम्हारे भरोसे यहाँ आया हूँ। जो मेरी मर्जी होगी, करूंगा। तुम चाहो तो यहाँ रहो, या चाहो तो अपने घर लौट जाओ। अब्दाली से निबटने के बाद मैं तुमसे निपट लूंगा।’

मल्हारराव होलकर तथा दत्ताजी सिन्धिया ने महाराजा सूरजमल की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी किंतु वे समझ गये थे कि अब सूरजमल दिल्ली में सुरक्षित नहीं है। इसलिये उन्होंने सूरजमल के सलाहकार रूपराम कटारिया से कहा कि जैसे भी हो, सूरजमल को दिल्ली से निकल जाना चाहिये। रूपराम कटारिया ने यह बात सूरजमल को बताई। सूरजमल उसी दिन मराठों को त्यागकर बल्लभगढ़ के लिये रवाना हो गया। मल्हार राव होलकर और दत्ताजी सिन्धिया ने सूरजमल के निकल भागने की सूचना बहुत देर बाद भाऊ को दी। इस पर भाऊ, सूरजमल से बहुत नाराज हो गया। उसने सोचा नहीं था कि जाट मराठा संघ इतनी जल्दी बिखर जाएगा।

इमाद-उस-सादात का कथन है- ‘भाऊ ने सूरजमल से दो करोड़ रुपये मांगे और उसे संदेहजनक पहरे में रख दिया। संभवतः सूरजमल को इस पहरे में से निकलने के लिये विशेष प्रबंध करने पड़े।’

महाराजा सूरजमल द्वारा मराठों का त्याग करते ही मराठों पर विपत्तियां आनी आरम्भ हो गईं। अहमदशाह अब्दाली की सेनाओं को रूहेलों के राज्य से अनाज की आपूर्ति हो रही थी तथा मराठों को सूरजमल के राज्य से अनाज मिल रहा था किंतु सूरजमल के चले जाने से दिल्ली में अनाज की कमी होने लगी और अनाज के भाव अचानक बढ़ गये।

दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों में इतना अधिक रौंदा गया था कि वहाँ से अनाज प्राप्त करना सम्भव नहीं रह गया था। भाऊ के बुरे व्यवहार के उपरांत भी सूरजमल की सहानुभूति मराठों से बनी रही। उसने मराठों को किसी तरह की क्षति पहुंचाने का प्रयास नहीं किया।

अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल से समझौता करने का प्रयास किया। वह चाहता था कि सूरजमल, भावी युद्ध से तटस्थ रहने की घोषणा कर दे ताकि मराठों को पूरी तरह से अकेला बनाया जा सके किंतु महाराजा सूरजमल ने अब्दाली से किसी तरह का समझौता करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

जैसे-जैसे अब्दाली की सेनाएं दिल्ली के निकट आती गईं, वैसे-वैसे दिल्ली, आगरा और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने परिवारों को लेकर भरतपुर राज्य में शरण लेने के लिये आने लगे। महाराजा सूरजमल ने इन शरणार्थियों के लिये अपने राज्य के दरवाजे खोल दिये। यहाँ तक कि घायल मराठा सरदार जनकोजी सिंधिया और उसका परिवार भी कुम्हेर आ गया।

मुगल बादशाह के वजीर इमादुलमुल्क ने भी अपना परिवार सूरजमल के संरक्षण में भेज दिया। उदारमना महाराजा सूरजमल ने अपने प्रबल शत्रुओं और उनके परिवारों को दिल खोलकर शरण दी। जाट मराठा संघ बिखर जाने पर भी सूरजमल मराठों के प्रति उदार बना रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...