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शेरशाह के उत्तराधिकारी

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शेरशाह के उत्तराधिकारी

शेरशाह के उत्तराधिकारी शेरशाह की तरह प्रतिभावान नहीं थे। उन्हें शेरशाह से जो साम्राज्य प्राप्त हुआ, वह लगातार कम होता हुआ नष्ट हो गया।

इस्लामशाह

शेरशाह ने अपने जीवन काल में ही अपने बड़े पुत्र आदिल खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया परन्तु शेरशाह की मृत्यु के उपरान्त अमीरों ने शेरशाह के छोटे पुत्र जलाल खाँ को सुल्तान बनाया जो 25 मई 1545 को इस्लामशाह के नाम से तख्त पर बैठा।

उसने सबसे पहले अपने भाई आदिल खाँ से छुटकारा पाने के लिये उसे बंदी बनाने का प्रयत्न किया। आदिल खाँ भयभीत होकर अपने पिता के विश्वस्त सेनापति खवास खाँ के पास चला गया और आँखों में आँसू लेकर अपने भाई की नीचता का वर्णन किया।

खवास खाँ को शहजादे पर दया आ गई और उसने सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसकी देखा-देखी अन्य अमीरों ने भी विद्रोह किया परन्तु इस्लामशाह ने समस्त विद्रोहों का दमन कर दिया। कुछ समय बाद पंजाब के शासक हैबत खाँ ने भी विद्रोह किया। इस विद्रोह को शान्त करने में इस्लामशाह को पाँच वर्ष लग गये। इसी समय हुमायूँ भी फारस से वापस लौट आया। इस्लामशाह ने हुमायूं की सेना को परास्त कर दिया किंतु इसी बीच इस्लामशाह बीमार पड़ा और सितम्बर 1553 में उसकी मृत्यु हो गई।

महमूदशाह आदिल

इस्लामशाह की मृत्यु के बाद अमीरों ने उसके बारह वर्ष के पुत्र फीरोजशाह को ग्वालियर के तख्त पर बिठाया परन्तु तीन दिन बाद उसके चाचा मुबारिजखाँ ने फीरोजशाह का वध कर दिया जो कि उसका मामा भी लगता था। मुबारिजखाँ महमूदशाह आदिल के नाम से तख्त पर बैठा। वह अत्यंत दुष्ट व्यक्ति था। उसने अफगान अमीरों को अप्रसन्न कर दिया जिससे सारे राज्य में विद्रोह की आग भड़क उठी। बिहार में ताज खाँ ने विद्रोह कर दिया।

इब्राहीम खाँ सूरी

जब मुहम्मदशाह ताजखाँ का दमन करने के लिए बिहार गया, तब अवसर पाकर उनका चचेरा भाई इब्राहीम खाँ दिल्ली के तख्त पर बैठ गया और आगरा की ओर बढ़ा। इसकी सूचना पाने पर महमूदशाह चुनार की ओर चला गया। इस प्रकार साम्राज्य के पूर्वी भाग में महमूदशाह और पश्चिमी भाग में इब्राहीमखाँ शासन करने लगा।

सिकंदरशाह सूरी

इसी समय पंजाब में शेरशाह के भतीजे अहमद खाँ ने विद्रोह कर दिया। उसने सिकन्दरशाह की उपाधि धारण की और अपनी सेना के साथ आगरा के लिए प्रस्थान किया। इब्राहीम खाँ ने उसका सामना किया परन्तु परास्त होकर सम्भल की ओर भाग गया। सिकन्दरशाह ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया। थोड़े ही दिनों बाद हुमायूँ ने उसे सरहिन्द के मैदान में परास्त कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार भारत में पुनः मुगल साम्राज्य की स्थापना हो गई और सूरी साम्राज्य का अवसान हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी के कार्यों का मूल्यांकन

शेरशाह के उत्तराधिकारी

सूरी साम्राज्य का पतन

सूरी साम्राज्य का पतन

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सूरी साम्राज्य का पतन

सूरी साम्राज्य का पतन होने के कई कारण थे। उस काल में उत्तर-पश्चिमी भारत में मुगल एवं अफगान तो सक्रिय थे ही, राजपूत राजाओं के वंशज भी अपनी खोई हुई स्वतंत्रता को पाने के लिए उद्यत थे।

सूरी साम्राज्य का पतन होने के कारण

(1.) शेरशाह की अकाल मृत्यु

शेरशाह की अकाल-मृत्यु से सूरी साम्राज्य को बड़ा धक्का लगा। यदि वह अधिक दिनों तक जीवित रहा होता तो सूरी साम्राज्य इतनी जल्दी नहीं बिखरता। उसने ऐसी व्यवस्था कर दी होती जिससे भारत में मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना असम्भव अथवा अत्यंत कठिन हो गई होती।

(2.) स्वेच्छाचारी तथा केन्द्रीभूत शासन व्यवस्था

शेरशाह ने जिस शासन की स्थापना की थी वह स्वेच्छाचारी तथा केन्द्रीभूत शासन व्यवस्था थी। राज्य की सारी शक्तियाँ सुल्तान के हाथ में थीं। इस प्रकार का शासन तभी तक चलता है जब तक शासन सूत्र योग्य तथा प्रतिभावान व्यक्ति के हाथ में रहे। जैसे ही शासन सूत्र अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी के हाथ में आता है, वैसे ही उसका विनाश हो जाता है। सूरी साम्राज्य के साथ भी यही हुआ।

(3.) निर्बल उत्तराधिकारी

शेरशाह की मृत्यु के उपरांत इस्लामशाह को छोड़कर और कोई शासक ऐसा नहीं था जो साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचा सकता था। इसलिये इस्लामशाह की मृत्यु के उपरान्त सूरी साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया।

(4.) उत्तराधिकारियों का आत्मघाती संघर्ष

इस्लामशाह की मृत्यु के उपरान्त महमूदशाह, इब्राहीम खाँ तथा सिकन्दरशाह में जो संघर्ष हुआ वह साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। सूर साम्राज्य को इन तीनों शासकों ने बाँट कर छिन्न-भिन्न कर दिया जिससे उसमें विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करने की क्षमता न रह गई।

(5.) अमीरों से संघर्ष

अफगानियों में कबीलाई भावना इतनी अधिक थी कि वे किसी दूसरे कबीले का उत्कर्ष होते हुए नहीं देख सकते थे। जैसे ही किसी एक कबीले का अफगान अमीर, अपने उत्कर्ष का प्रयास करता था, दूसरे कबीलों के अफगान अमीर उसके सर्वनाश पर तुल जाते थे। इस कारण शेरशाह के उत्तराधिकारियों से अमीर नाराज हो गये। उत्तराधिकारियों में इन अमीरों को दबाने तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करके उन्हें अपने समर्थन में करने की शक्ति नहीं थी इसलिये शासन का आधार खिसक गया।

(6.) हुमायूँ का प्राबल्य

सूर-साम्राज्य के विनाश का अन्तिम कारण यह था कि फारस से लौटने के बाद हुमायूँ की शक्ति काफी प्रबल हो चुकी थी। वह अपने भाइयों पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा था। हुमायूँ के पास फिर से एक प्रबल सेना हो गई थी। अतः उसने सरलता से अफगानों को परास्त करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसी के साथ सूरी साम्राज्य का पतन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – द्वितीय अफगान साम्राज्य

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी के कार्यों का मूल्यांकन

शेरशाह के उत्तराधिकारी

सूरी साम्राज्य का पतन

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

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अकबर के बाल्यकाल की एक दुर्लभ पेंटिंग

जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने ई. 1556 से1605 तक शासन किया। अकबर का प्रारम्भिक जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। उसे अपने ही परिवार के षड़यंत्रों का शिकार होना पड़ा।

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

अकबर का जन्म

अकबर का पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। उसके पिता का नाम हुमायूँ और माता का नाम हमीदा बानू बेगम था। जिस समय हुमायूँ शेरशाह से परास्त होकर अपने भाई हिन्दाल के साथ सिन्ध में निवास कर रहा था उसी समय हुमायूँ ने  21 अगस्त 1541 को हिन्दाल के शिक्षक की पुत्री हमीदा बानू बेगम से विवाह किया।

हिन्दाल इस विवाह से सहमत नहीं था इसलिये वह हुमायूँ का साथ छोड़कर कन्दहार चला गया। हुमायूं हमीदा बानू बेगम के साथ 22 अगस्त 1542 को अमरकोट पहुँचा। यहीं पर राणा वीरसाल के राजप्रासाद में 15 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानू बेगम के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ।

हुमायूँ को पुत्र के पैदा होने की सूचना मिलने पर बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु उस समय हुमायूँ के पास अपने मित्रों को भेंट देने के लिए कुछ नहीं था। हुमायूँ ने एक कस्तूरी को तोड़ कर अपने मित्रों में बांट दिया और अल्लाह से प्रार्थना की कि कस्तूरी की सुगन्ध की तरह उसके पुत्र का यश भी चारों दिशाओं में फैल जाये।

अकबर का बचपन

जब हुमायूँ ने फारस के शाह के यहाँ जाने का निश्चय किया तब उसने अकबर को अपने कुछ शुभचिन्तकों के संरक्षण में कन्दहार में छोड़ दिया और स्वयं हमीदा बानू बेगम के साथ फारस चला गया। इस समय अकबर केवल एक वर्ष का था। इस प्रकार अकबर शैशवकाल में माता के वात्सल्य से वंचित हो गया।

इस समय मिर्जा अस्करी कन्दहार में था। वह अकबर को अपने महल ले गया। उसकी पत्नी सुल्ताना बेगम के कोई सन्तान नहीं थी। इसलिये उसने बड़े स्नेह से अकबर को पाला। 1545 ई. की शीत ऋतु में अकबर कन्दहार से काबुल भेज दिया गया जहाँ कामरान शासन कर रहा था। उन दिनों बाबर की बहिन खानजादा बेगम काबुल में थी।

उसने बड़े लाड़-प्यार के साथ अकबर का पालन किया। इस प्रकार माता-पिता के बिना ही अकबर के जीवन के प्रथम तीन वर्ष व्यतीत हुए। नवम्बर 1545 में हुमायूँ ने काबुल पर अधिकार किया तब अकबर को अपने माता-पिता को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मार्च 1546 में अकबर का खतना किया गया तथा तथा उसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा गया।

1546 ई. की वसन्त ऋतु में हुमायूं ने बदख्शाँ के लिए प्रस्थान किया। इस बीच, कामरान ने फिर से काबुल पर अधिकार कर लिया। अकबर एक बार फिर अपने निर्दयी चाचा के हाथ लग गया। जब हुमायूं बदख्शाँ से वापस लौटा और उसने काबुल के दुर्ग का घेरा डालकर उस पर गोले बरसाना आरम्भ किया तब कामरान ने हुमायूँ तथा उसके आदमियों की स्त्रियों तथा बच्चों पर बड़ा अत्याचार किया।

उसने बच्चों को दुर्ग की दीवारों से लटकाकर तोप के गोलों से उड़ाने के आदेश दिये। इन्हीं बच्चों में अकबर भी था। उसे भी दीवार से लटका दिया गया। सौभाग्य से हुमायूं के आदमियों ने अकबर को पहचान लिया और ऐन वक्त पर तोपों का मुँह फेरकर अकबर की जान बचाई। यह घटना अप्रेल 1547 की है। इसके बाद अकबर सदैव अपने पिता हुमायूँ के साथ रहा।

अकबर का विवाह तथा पिता के संरक्षण में युद्ध

1551 ई. में हिन्दाल की मृत्यु होने पर अकबर को गजनी का सूबेदार बनाया गया तथा हिन्दाल की पुत्री रजिया सुल्ताना से अकबर का विवाह कर दिया गया। जब हुमायूँ ने भारत की पुनर्विजय आरम्भ की तब अकबर उसके साथ था।

1555 ई. में जब हुमायूं ने लाहौर पर अधिकार किया तब उसने 22 जनवरी 1555 को सरहिंद नामक स्थान पर अकबर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। इसी वर्ष हुमायूँ ने दिल्ली विजय के बाद अकबर को पंजाब का गवर्नर बनाया और बैरमखाँ को उसका संरक्षक नियुक्त किया। उस समय अकबर की आयु 13 वर्ष थी।

अकबर का राज्यारोहण

सरहिन्द के युद्ध में अकबर ने अपने पिता हुमायूँ के साथ अफगानों से युद्ध किया। सरहिन्द की विजय के उपरान्त जब सिकन्दर लोदी शिवालिक की पहाड़ियों की ओर भाग गया तब हुमायूँ ने अकबर तथा बैरमखाँ को उसका दमन करने के लिए पंजाब भेजा और स्वयं दिल्ली चला गया परन्तु 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की अकाल मृत्यु हो गई।

बादशाह की मृत्यु की सूचना तुरन्त अकबर तथा बैरमखाँ को भेजी गई। अकबर इस समय पंजाब के गुरदासपुर जिले में कालानूर नामक स्थान पर था। बैरमखाँ ने उसी दिन 14 फरवरी 1556 को वहीं पर ईंटों के एक चबूतरे को तख्त बनाकर अकबर को बादशाह घोषित कर दिया और वहाँ पर उपस्थित अधिकारियों तथा अमीरों से उसका अभिनन्दन कराया। चूँकि उस समय अकबर की आयु तेरह वर्ष चार माह थी, इसलिये बैरमखाँ अकबर की तरफ से शासन चलाने लगा।

अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

अकबर की प्रारंभिक कठिनाइयां भयानक थीं। उसे एक ऐसा राज्य मिला था जिसकी पुनर्स्थापना अभी ढंग से नहीं हुई थी और राज्य का संस्थापक चल बसा था। स्मिथ ने लिखा है- ‘जब कालानूर में समारोह किया गया तब यह नहीं कहा जा सकता था कि अकबर के पास कोई साम्राज्य था।’

बैरमखाँ के सेनापतित्त्व में जो छोटी सी सेना थी उसका पंजाब के कुछ जिलों पर अधिकार था। उस सेना पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता था। आगरा तथा दिल्ली भी मुगल प्रांतपतियों के अधिकार में थे। अकबर की प्रारंभिक कठिनाइयां इस प्रकार से थीं-

(1.) अल्पायु की समस्या

इस समय अकबर केवल 13 साल 4 महीने का था। उसे किसी भी प्रकार का सैनिक तथा प्रशासकीय अनुभव नहीं था। न वह स्वयं अपने प्रबल शत्रुओं से लोहा ले सकता था और न अपने राज्य में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित कर सकता था। उसे एक विश्वस्त मार्ग दर्शक एवं संरक्षक की आवश्यकता थी जो इन कठिन परिस्थितियों में मुगलों की हिचकोले लेती नाव को मजबूती के साथ खे सके। सौभाग्य से अकबर को बैरमखाँ की सेवाएँ प्राप्त हो गईं।

(2.) मुगल अमीरों को नियंत्रण में रखने की समस्या

बैरम खाँ मूलतः फारस का शिया मुसलमान था। मुगल दरबार के बहुत से अमीर अकबर तथा उसके संरक्षक बैरमखाँ से अधिक वयोवृद्ध थे, जो सुन्नी सम्प्रदाय से थे और अपने को शुद्ध तुर्की रक्त का मानते थे। इन सुन्नी वयोवृद्ध अमीरों को नियन्त्रण में रखना अकबर तथा बैरमखाँ के लिए सरल काम नहीं था।

(3.) शाह अबुल माअली की समस्या

शाह अबुल माअली रूपवान् तथा गुणवान् नवयुवक था। वह सैयद वंश में उत्पन्न हुआ था तथा हुमायूँ का बड़ा प्रिय था। मुगल दरबार में उसका बड़ा सम्मान तथा प्रभाव था। शिया लोगों से उसे घोर घृणा थी और बैरमखाँ का उत्थान उसकी आँखों में खटक रहा था। अबुल माअली अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए विद्रोह का बिगुल बजा सकता था।

(4.) साधनों का अभाव

यद्यपि कालानूर में अकबर का राज्याभिषेक कर दिया गया था परन्तु वास्तव में न तो उसके पास कोई तख्त था और न साम्राज्य। अकबर के पास एक छोटी सी सेना थी जिसके बल पर मुगलों का तख्त प्राप्त करना कठिन था। अकबर के पास कोई खजाना भी नहीं था। इन दिनों दिल्ली तथा आगरा में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। चूँकि पश्चिमोत्तर प्रदेश पर अकबर का अधिकार नहीं था, इसलिये उस ओर से भी सैनिकों का मिलना कठिन था।

(5.) सरदारों में मतभेद

राज्य की पुनर्प्राप्ति की रणनीति के सम्बन्ध में अकबर के सरदारों में बड़ा मतभेद था। कुछ सरदारों की राय थी कि पहले अकबर को काबुल ले जाया जाये और वहाँ पर एक सेना का संगठन करके तब अफगानों का सामना किया जाये। अन्य सरदारों की राय थी कि सीधे दिल्ली की ओर प्रस्थान किया जाये और अफगानों का सामना किया जाये।

(6.) काबुल की समस्या

अकबर को तख्त पर बैठे तीन-चार दिन ही हुए थे कि उसे सूचना मिली कि बदख्शाँ के शासक सुलेमान मिर्जा ने एक बड़ी सेना के साथ काबुल का घेरा डाल दिया है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक था कि काबुल की रक्षा के लिए एक सेना तुरन्त भेजी जाये, अन्यथा उसका हाथ से निकल जाना निश्चित था परन्तु मुगल सेना इतनी बड़ी नहीं थी कि उसका कुछ भी भाग काबुल की रक्षा के लिए भेजा जाता, क्योंकि ऐसा करने से भारत का जो भाग अकबर के अधिकार में था, वह भी खतरे में पड़ जाता।

(7.) मुहम्मद शाह आदिल की समस्या

काबुल की समस्या के समाधान पर विचार चल ही रहा था कि दिल्ली के गवर्नर तार्दी बेग से सूचना प्राप्त हुई कि मुहम्मदशाह आदिल के सेनापति हेमू ने आगरा पर अधिकार कर लिया है और दिल्ली की ओर बढ़ता चला आ रहा है। यदि समय रहते पर्याप्त सेना दिल्ली नहीं पहुँच सकी तो दिल्ली का हाथ से निकलना निश्चित है।

(8.) सिकंदरशाह सूरी की समस्या

सिकन्दरशाह सूरी अकबर की गतिविधियों पर ताक लगाये हुए था। यह निश्चित था कि यदि अकबर अपनी सेना के प्रधान अंग को दिल्ली या काबुल भेज दे तो सिकन्दरशाह सूरी शिवालिक की पहाड़ियों से निकल कर पंजाब को रौंदना आरम्भ कर देगा।

(9.) साम्राज्य विस्तार की समस्या

इस समय सिंध, मुल्तान, कश्मीर, बंगाल, बिहार, गुजरात, मालवा, राजपूताना तथा समूचा दक्षिण भारत मुगल साम्राज्य से बाहर थे। इन क्षेत्रों को अधिकार में लिये बिना साम्राज्य का निर्माण संभव नहीं था।

(10.) संरक्षक से संघर्ष

राज्य को एक दिशा देने के लिये एक ही व्यक्ति का निर्देशन चल सकता था। अकबर तथा बैरमखाँ दोनों ही प्रतिभाशाली थे। दोनों में राज्य को दिशा देने की क्षमता थी। अतः जैसे ही अकबर वयस्क हुआ, उसके लिये बैरमखाँ का स्वतंत्र व्यवहार बहुत बड़ी समस्या बन गया। ऐसी स्थिति में अकबर तथा बैरामखाँ के बीच संघर्ष अनिवार्य हो गया।

अकबर की कठिनाइयों का निवारण

अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ भयानक थीं। राज्य विशृंखलित था, चारों ओर से विद्रोह फूट पड़े थे किंतु नियति ने अकबर को इन कठिनाइयों से बाहर निकालने के साधन जुटा दिये।

बैरम खाँ की सेवाएँ

अकबर के सौभाग्य से उसे योग्य तथा अनुभवी सेनापति बैरम खाँ की सेवाएँ प्राप्त हो गईं। वह 16 वर्ष की आयु से हुमायूँ की सेवा में था। संकट के समय वह हुमायूँ के साथ छाया की तरह रहा। उसमें कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता थी। उसमें अपने पद के उपयुक्त योग्यताएँ भी विद्यमान थीं। वह अनुभवी तथा कुशल सेनानायक था। उसे शासन करने का व्यापक अनुभव था।

वह विद्वान, व्यवहार कुशल तथा नीति निपुण था। अल्पायु के कारण अकबर में अनुभव का जो अभाव था, उसकी पूर्ति बैरमखाँ ने कर दी। अकबर ने अपने राज्यारोहण के बाद बैरमखाँ को खान-ए-खाना की उपाधि दी तथा उसे राज्य का वकील-ए-सल्तनत नियुक्त किया। उसने प्रारम्भ से ही सावधानी के साथ काम करना आरम्भ किया तथा सबसे पहले अपने प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करने का निश्चय किया।

शाही शिविर में अनुशासन की स्थापना

बैरमखाँ को राज्य एवं अमीरों पर नियंत्रण स्थापित करने में सबसे बड़ा खतरा शाह अबुल माअली की ओर से था। बैरमखाँ जानता था कि यह व्यक्ति बादशाह तथा तख्त दोनों के लिये खतरनाक सिद्ध हो सकता है। इसलिये उसने माअली को समाप्त करने का निश्चय किया।

एक दिन अकबर के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में एक प्रीतिभोज दिया गया। वहीं पर बैरमखाँ ने माअली को कैद करके उसे लाहौर भेज दिया। इससे अमीरों में बैरमखाँ का भय व्याप्त हो गया तथा शाही शिविर में बादशाह तथा उसके संरक्षक के विरुद्ध विद्रोह की संभावना कम हो गई।

काबुल की समस्या का समाधान

हुमायूँ की मृत्यु के बाद सुलेमान मिर्जा ने काबुल पर आक्रमण किया था। वह कई महीने तक काबुल का घेरा डाले रहा परन्तु उसे ले न सका। इसी बीच में उसे सूचना मिली कि उजबेग लोग मध्य-एशिया से चल पड़े हैं और मुगल सेनाएँ दिल्ली से काबुल की रक्षा के लिए आ रही हैं। इसलिये सुलेमान मिर्जा ने काबुल का घेरा उठा लिया और बदख्शाँ चला गया। इस प्रकार काबुल मुगलों के पास ही बना रहा परन्तु कन्दहार अकबर के हाथ से निकल गया। उस पर फारस के शाह ने अधिकार कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

पानीपत का दूसरा युद्ध

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पानीपत का दूसरा युद्ध

ऐतिहासिक दृष्टि से पानीपत का दूसरा युद्ध मुगल बादशाह अकबर तथा दिल्ली के शासक हेमचंद्र विक्रमादित्य के बीच हुआ किंतु वस्तुतः यह युद्ध बैरम खाँ तथा हेमचंद्र विक्रमादित्य के बीच लड़ा गया।

पानीपत का दूसरा युद्ध

हेमू का उत्कर्ष

हेमू का असली नाम हेमराज था। वह धूसर जाति का बनिया था। कुछ इतिहासकार उसे गौड़ ब्राह्मणों की एक शाखा से मानते हैं। उनके अनुसार हेमू रेवाड़ी में शोरे का व्यापार करता था। इसलिये कुछ इतिहासकारों ने उसे बनिया कहा है। हेमू प्रतिभावान् व्यक्ति था। उसने सुल्तान इस्लामशाह का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया।

इस्लामशाह ने उसे दिल्ली के बाजारों का निरीक्षक नियुक्त किया। हेमू उन्नति करता हुआ शाही रसोई का निरीक्षक बन गया। वह सैनिकों को भी रसद देता था। कुछ दिनों बाद वह लगान का कनिष्ठ अधिकारी बन गया। बाद में अफगान सेना में उसे कनिष्ठ पद मिल गया।

इस्लामशाह की मृत्यु के उपरान्त हेमू ने सुल्तान आदिल शाह को प्रसनन कर लिया और वह उसका प्रधानमन्त्री तथा प्रधान सेनापति बन गया। हिन्दू होते हुए भी वह सुल्तान आदिल शाह का इतना विश्वासपात्र बन गया। अफगान सरदार उसे आदर की दृष्टि से देखते थे और प्राण-पण से उसकी अध्यक्षता में लड़ने के लिए तैयार रहते थे।

हेमू का आक्रमण

जब हेमू ने सुना कि हुमायूँ मर गया तो वह विशाल सेना लेकर तेजी से दिल्ली की ओर बढ़ा। इस कारण दिल्ली का गवर्नर तार्दी बेग अत्यंत भयभीत हो गया। बैरमखाँ ने अपने सर्वाधिक योग्य सेनापति पीर मुहम्मद शर्वानी को कुछ अन्य लोगों के साथ तार्दी बेग को ढाढ़स देने के लिए दिल्ली भेजा।

इस बीच तार्दी बेग ने आगरा के प्रान्तीय गवर्नर को भी दिल्ली बुला लिया। हेमू भी अपनी सेना के साथ दिल्ली के समीप आ डटा। मुगल तथा अफगान सेनाओं में भीषण संग्राम युद्ध हुआ। प्रारंभ में मुगलों को अच्छी सफलता मिली परन्तु बाद में वे हारने लगे। पीर मुहम्मद लड़ाई के मैदान से भाग खड़ा हुआ। हेमू ने दिल्ली, आगरा तथा संभल पर अधिकार कर लिया।

बैरम खाँ द्वारा तार्दी बेग की हत्या

बैरम खाँ ने तार्दी बेग को उसकी कायरता का दण्ड देने के लिये अपने खेमे में बुलवाया और उसका वध कर दिया। वृद्ध तुर्की अमीर की हत्या से तुर्की अमीरों में सनसनी फैल गई और वे बैरमखाँ को संदेह की दृष्टि से देखने लगे परन्तु इस संकट काल में समस्त अमीर संगठित रहे और यह निश्चित किया गया कि किसी योग्य व्यक्ति को सिकन्दरशाह पर कड़ी निगाह रखने के लिए छोड़ दिया जाय और शाही सेना दिल्ली के लिए प्रस्थान करे।

अली कुली खाँ द्वारा हेमू के तोपखाने पर अधिकार

शाही सेना तेजी से दिल्ली की ओर बढ़ी। अनुभवी तथा दक्ष सेनापति अली कुली खाँ को दस हजार अश्वारोहियों के साथ आगे भेजा गया। संयोगवश अली कुली खाँ हेमू के तोपखाने के पास पहॅुंच गया और उसने हेमू के तोपखाने पर अधिकार कर लिया। यह हेमू की बहुत बड़ी गलती थी कि उसने अपने तोपखाने की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था किये बिना ही आगे भेज दिया था परन्तु इस दुर्घटना से हेमू का साहस भंग नहीं हुआ। वह अपनी सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा।

बैरम खाँ द्वारा हेमू की हत्या

5 नवम्बर 1556 को हेमू की सेना का मुगल सेना के साथ भीषण संग्राम आरम्भ हुआ। हेमू की सेना में बड़ा उत्साह था और वह बड़ी वीरता से लड़ रही थी। धीरे-धीरे हेमू की सेना को सफलता मिलने लगी और मुगलों के पैर उखड़ने लगे। युद्ध का निर्णय हेमू के पक्ष में जाता हुआ दिखाई देने लगा किंतु दुर्भाग्यवश हेमू की आँख में एक तीर लगा और वह बेहोश होकर हाथी के हौदे में गिर पड़ा।

तत्काल ही यह सूचना चारों ओर फैल गई कि हेमू मर गया। फलतः उसकी सेना में भगदड़ मच गई। हेमू के हाथी के महावत ने हेमू को रणक्षेत्र से दूर ले जाने का प्रयास किया किंतु शाहकुली खाँ नामक एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। बेहोश हेमू को अकबर के सामने ले जाया गया।

बैरमखाँ ने बादशाह से कहा कि वह अपनी तलवार से हेमू का सिर उड़ा दे। अकबर ने बेहोश  आदमी पर तलवार उठाना उचित नहीं समझा। इसलिये उसने अपनी तलवार से हेमू का गला स्पर्श किया। उसी समय बैरमखाँ ने अपनी तलवार से हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया।

हेमू की पराजय के कारण

हेमू एक अनुभवी सेनापति था। उसने अपने स्वामी के लिए चुनार से दिल्ली तक बाईस युद्ध किये थे। वह किसी में भी युद्ध में परास्त नहीं हुआ था परन्तु पानीपत की दूसरी लड़ाई में भाग्यलक्ष्मी ने उसका साथ नहीं दिया जिससे वह परास्त हो गया।

उसकी पराजय के दो बड़े कारण कारण थे। पहला कारण अनायास ही उसके तोपखाने का हाथ से निकल जाना और दूसरा कारण उसकी आँख में अचानक तीर लग जाना था। इस प्रकार दुर्याेगवश हेमू को पराजय और संयोगवश अकबर को विजय प्राप्त हुई।

डॉ. आर. पी. त्रिपाठी ने लिखा है- ‘हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी और अकबर की विजय दैवीय संयोग था।’

पानीपत की दूसरी लड़ाई के परिणाम

पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू की पराजय का भारतीय इतिहास पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। इस युद्ध के बाद मुगलों की सत्ता दिल्ली तथा आगरा पर दृढ़तापूर्वक स्थापित हो गई और शेष भारत की विजय का मार्ग साफ हो गया।

दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार

6 नवम्बर 1556 को अकबर ने विजयी सेना के साथ दिल्ली में प्रवेश किया। इसके बाद अकबर की सेना ने आगरा पर भी अधिकार कर लिया।

आदिलशाह की हत्या

हेमू की पराजय के बाद बंगाल के शासक खिज्र खाँ ने आदिलशाह पर आक्रमण करके उसकी हत्या कर दी। आदिलशाह की मृत्यु से मुगल सेना का रास्ता साफ हो गया, जो अली कुली की अध्यक्षता में आगे बढ़ी।

सिकन्दर सूरी के साथ संघर्ष

दिल्ली तथा आगरा पर दृढ़तापूर्वक अधिकार स्थापित कर लेने के बाद बैरमखाँ ने सिकन्दर सूरी का सामना करने के लिए पंजाब की ओर प्रस्थान किया। सिकन्दर सूरी बैरमखाँ को पानीपत की दूसरी लड़ाई में व्यस्त जानकर शिवालिक की पहाड़ियों से निकलकर पंजाब में लगान वसूल कर रहा था।

जब उसे शाही सेना के आने की सूचना मिली तब वह मानकोट के दुर्ग में बन्द होकर बैठ गया। मुगलों ने मानकोट दुर्ग का घेरा डाल दिया जो छः महीने तक चलता रहा। अन्त में सिकन्दर सूरी निराश होकर सन्धि के लिये तैयार हो गया। उसने बैरमखाँ के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि बिहार में उसे कोई जागीर दे दी जाये तो सिकन्दर सूरी आत्म समर्पण कर देगा।

सिकंदर सूरी की यह शर्त स्वीकार कर ली गई। इसके बाद सिकंदर सूरी ने 24 मई 1557 को मानकोट दुर्ग मुगलों को समर्पित कर दिया और स्वयं बिहार चला गया, जहाँ कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई।

इब्राहीम सूर की मृत्यु

खान-ए-जमान ने इब्राहीम सूर पर आक्रमण करके उसे जौनपुर से बाहर निकाल दिया। वह उड़ीसा की ओर भाग गया। वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई। इसके साथ ही 1559 ई. तक दिल्ली के तख्त पर दावा करने वाले सूर वंश का पूरी तरह सफाया हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

बैरम खाँ का विद्रोह

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बैरम खाँ का विद्रोह

हुमायूँ ने बैरम खाँ को अल्पवय अकबर का संरक्षक नियुक्त किया था। बैरम खाँ ने ही अकबर को उसके पिता का खोया हुआ राज्य फिर से दिलवाया था किंतु जैसे ही अकबर वयस्क हुआ, उसने बैरम खाँ से छुटकारा पाने का प्रयास किया। बैरम खाँ का विद्रोह मूलतः इसी कारण हुआ था।

बैरम खाँ से संघर्ष

बैरम खाँ ने अपने चार वर्षों के शासन काल में अकबर को न केवल उसकी समस्त प्रारम्भिक कठिनाइयों से मुक्त करके उसकी स्थिति को अत्यन्त सुदृढ़ बना दिया था अपितु उसके राज्य का विस्तार करके उसे काबुल से जौनपुर तथा कश्मीर से अजमेर तक बढ़ा दिया था। ग्वालियर जीत लिया गया था और रणथम्भौर तथा मालवा को नत-मस्तक करने का पूरा प्रयत्न किया गया था। इस प्रकार बैरमखाँ ने संकट-काल में बादशाह की बड़ी श्लाघनीय सेवाएँ की थीं।

बैरम खाँ से संघर्ष के कारण

अकबर और बैरम खाँ के बीच संघर्ष के कई कारण थे-

(1.) अकबर की महत्वाकांक्षा

अल्पवयस्क होने के कारण अकबर अब तक बैरम खाँ के निर्देशन में ही कार्य करता आया था किंतु जब वह साढ़े सत्रह वर्ष का हुआ तो उसमें स्वतंत्र रूप से राज्य-कार्य करने की इच्छा बलवती होने लगी।

(2.) बैरम खाँ की स्वतंत्र प्रकृति

बैरम खाँ स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति था। वह अपने निर्णय स्वयं लेता था तथा उन्हें लागू करता था। अकबर इसे सहन नहीं कर पाता था।

(3.) बैरम खाँ की सफलताएँ

लगातार मिलती जा रही सफलताओं के कारण शासन की वास्तविक शक्ति बैरमखाँ में केन्द्रित होकर रह गई थी। यह बात अकबर से सहन नहीं होती थी।

(4.) अमीरों की महत्वाकांक्षाएँ

बैरम खाँ की स्वतंत्र प्रवृत्ति से तुर्की अमीर, असंतुष्ट एवं भयभीत रहते थे। वे शासन में हिस्सेदारी चाहते थे। बैरमखाँ उनके मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट था इसलिये वे बैरमखाँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे।

(5.) हरम की महत्वाकांक्षाएँ

बैरम खाँ की स्वतंत्र प्रवृत्ति से बादशाह की धायतें और हरम की बेगमें अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं कर पाती थीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि प्रधानमन्त्री बैरम खाँ उनकी उपेक्षा करता था और उन्हें खर्च के लिए पर्याप्त धन नहीं देता था।

(6.) शिया होने का आरोप

बैरम खाँ के विरुद्ध आरोप था कि वह शिया होने के कारण शिया मुसलमानों को राज्य में ऊँचे-ऊँचे पद देता था। इससे सुन्नी अमीर असन्तुष्ट थे।

(7.) पीर मुहम्मद का निर्वासन

इसी समय बैरम खाँ ने पीर मुहम्मद खाँ शर्वानी को पदच्युत करके उसे निर्वासित कर दिया और उसके स्थान पर एक ईरानी को नियुक्त कर दिया। इससे तुर्की सुन्नी अमीरों में खलबली मच गई और उन्होंने बादशाह के कान भरे। अकबर ने बैरम खाँ के इस कार्य पर असन्तोष प्रकट किया। क्योंकि किसी अमीर को पदच्युत करने तथा नियुक्त करने का अधिकार बादशाह के पास ही था। इस कारण अकबर ने बैरम खाँ को पदच्युत करने का निश्चय कर लिया।

(8.) अकबर तथा असंतुष्ट अमीरों में गठबंधन

अकबर तथा तुर्की अमीरों में बैरम खाँ की सत्ता को समाप्त करने केे लिए गठबन्धन हो गया।

18 मार्च 1560 को अकबर ने आखेट के बहाने आगरा से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। 27 मार्च को वह दिल्ली पहुँचा। अकबर ने दिल्ली से एक फर्मान निकाल कर बैरमखाँ को पदच्युत कर दिया और शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। जब बैरम खाँ को इसकी सूचना मिली तो वह आश्चर्य चकित रह गया।

बैरम खाँ का विद्रोह

बैरम खाँ ने अकबर से मिलने का प्रयास किया परन्तु अकबर ने मिलने से मना कर दिया। विवश होकर बैरम खाँ ने विद्रोह कर दिया। वह आगरा से बीकानेर चला गया जहाँ से वह पंजाब गया। पंजाब में उसका शाही सेना से संघर्ष हुआ जिसमें बैरम खाँ परास्त होकर शिवालिक की पहाड़ियों में भाग गया। अकबर ने स्वयं उसका पीछा किया। निराश होकर अक्टूबर 1560 में बैरमखाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया।

बैरम खाँ को क्षमादान

बैरम खाँ ने अकबर तथा उसके परिवार की जो सेवाएँ की थीं वे अकबर के हृदय पटल पर अंकित थीं। इसलिये जब मुनीम खाँ, बैरमखाँ को पकड़कर अकबर के सामने लाया तो अकबर ने बड़े सम्मान के साथ अपने संरक्षक का आलिंगन किया तथा उसे अपने दाहिनी ओर बैठाकर उसे अपने राजसी वस्त्र से पुरस्कृत किया। बादशाह के इस सद्व्यवहार से बैरमखाँ के नेत्रों से आँसू बहने लगे।

फरिश्ता के अनुसर अकबर ने बैरम खाँ के समक्ष तीन प्रस्ताव रखे- (1.) बैरमखाँ कालपी तथा चन्देरी की सूबेदारी स्वीकार कर ले। (2.) बैरमखाँ बादशाह के दरबार में सम्मानपूर्वक रहे। (3.) बैरमखाँ मक्का की यात्रा पर चला जाये जिसके लिए धन तथा संरक्षकों से उसकी सहायता की जायेगी।

मक्का जाने का निश्चय

बैरम खाँ साम्राज्य का प्रधानमंत्री, खान-ए-खानान तथा सर्वेसर्वा रह चुका था इसलिये उसे प्रथम दो प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुए, उसने बादशाह के तीसरे प्रस्ताव को स्वीकार करके मक्का जाने का निश्चय किया।

बैरम खाँ की हत्या

अकबर ने बैरम खाँ की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कर दी परन्तु बैरम खाँ के भाग्य में मक्का पहुँचना नहीं लिखा था। जब वह गुजरात में पाटन नामक स्थान पर पहुँचा तब 31 जनवरी 1569 को मुबारक खाँ लोहानी नामक एक अफगान ने, जिसके पिता की हत्या बैरम खाँ ने की थी, अपने कुछ साथियों के साथ बैरम खाँ पर आक्रमण कर दिया।

मुबारक ने छल से बैरम खाँ को छुरा भोंक दिया और उसके एक साथी ने बैरम खाँ के सिर को धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार बैरम खाँ की जीवन लीला समाप्त हो गई और अकबर का स्वतन्त्र शासन आरम्भ हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

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अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

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अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

भारतीय इतिहासकारों ने अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इन इतिहासकारों के अनुसार अकबर ने अपने शासन के कुछ निश्चित उद्देश्य निर्धारित किए तथा इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने जीवन भर प्रयास किए।

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

शासन की बागडोर हाथ में लेने के उपरान्त अकबर ने अपने शासन के उद्देश्यों को निर्धारित किया और तदनुकूल नीति का अनुसरण कर उन उद्देश्यों को प्राप्त करने का सतत प्रयास आरम्भ किया। अकबर के प्रधान उद्देश्य इस प्रकार से थे-

(1.) राज्य में शान्ति तथा व्यवस्था की स्थापना

अकबर का सर्वप्रथम उद्देश्य राज्य में शांति तथा व्यवस्था की स्थापना करना था। इस उद्देश्य को प्राप्त किये बिना अन्य उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती थी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने विद्रोहों का दमन करने की नीति अपनाई। उसने क्रूरता के स्थान पर क्षमादान का सहारा लिया। यदि कोई विद्रोही नत-मस्तक होकर क्षमादान के लिये  प्रार्थना करता तो अकबर उसे क्षमा कर देता था।

(2.) प्रजा में एकता की स्थापना

अकबर का दूसरा लक्ष्य राज्य में निवास करने वाली विभिन्न जातियों, धर्म और सम्प्रदायों को मानने वाली प्रजा में एकता की स्थापना करना था। अकबर जानता था कि इससे साम्राज्य की नींव मजबूत होगी और स्थायित्व प्राप्त होगा। वह यह भी जानता था कि मुगल भारत में बड़े आलोकप्रिय हैं।

भारतीय जनता उन्हें बर्बर तथा विदेशी समझती है। मुगलों ने दो बार अफगानों से भारत का राज्य छीना था और राजपूतों को खनवा तथा अन्य युद्धों में परास्त किया था। इसलिये अफगान तथा राजपूत, दोनों ही मुगलों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। इस घृणा को दूर करके समस्त प्रजा में एकता स्थापित करना आवश्यक था। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने उदारता, धार्मिक सहिष्णुता तथा ‘सुलहकुल’ (सबके साथ मेल) की नीति को अपनाया।

(3.) जनता की सर्वतोमुखी उन्नति

अकबर ने जनता की सर्वतोमुखी उन्नति को अपना प्रधान लक्ष्य बना लिया। उसने प्रजा की भौतिक उन्नति के लिए अनेक प्रकार के प्रशासनिक तथा सामाजिक सुधार किए। उसने भूमि सम्बन्धी भी अनेेक सुधार किये और वाणिज्य तथा व्यापार को प्रोत्साहित किया।

प्रजा की बौद्धिक उन्नति के लिए अकबर ने हिन्दी तथा संस्कृत को प्रश्रय दिया और फारसी के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। प्रजा की सांस्कृतिक उन्नति के लिए उसने साहित्यकारों तथा कलाकारों को प्रश्रय तथा प्रोत्साहन दिया। प्रजा की आध्यात्मिक उन्नति के लिए अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण कर पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता दे दी ताकि समस्त प्रजा अपने-अपने ढंग से धार्मिक चिन्तन तथा सत्य की खोज करे।

(4.) धार्मिक तत्त्वों का अन्वेषण

अकबर का विश्वास था कि समस्त धर्मों के अन्तःस्तल में कुछ मौलिक सिद्धान्त छिपे हैं, क्योंकि समस्त धर्म अपनी दैवी उत्पत्ति को मानते हैं और पैगम्बरों द्वारा प्रचारित किये जाते हैं। इसलिये अकबर ने इन मौलिक सिद्धान्तों का अन्वेषण करना अपना लक्ष्य बनाया।

इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए अकबर ने इबादतखाना अथवा ‘पूजा गृहों’ की स्थापना की, जहाँ पर समस्त धर्मों के आचार्य एकत्रित होकर अपने धार्मिक विचारों को व्यक्त करते थे। आत्म-चिन्तन तथा विभिन्न धर्मों के आचार्यों से विचार-विनिमय करने के उपरान्त अकबर ने समस्त धर्मों के मूल तत्त्वों को एकत्रित करके ‘दीन इलाही’ नामक नये धर्म का प्रचार करने का प्रयत्न किया, जिसमें समस्त धर्मों की अच्छी-अच्छी बातें विद्यमान थीं।

(5.) विश्व साम्राज्य की स्थापना

अकबर सम्पूर्ण विश्व को एक राजसूत्र में बांध देना चाहता था। विश्व साम्राज्य की स्थापना की प्रेरणा उसे चंगेज खाँ से प्राप्त हुई थी और यह इस्लाम धर्म के अनुकूल थी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और एक विशाल सेना का संगठन किया।

उसने सम्पूर्ण भारत में अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से उत्तर तथा दक्षिण भारत में विजय यात्राएँ कीं। भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधने के उपरान्त अकबर मध्य-पूर्व तथा पश्चिम एशिया को भी अपने साम्राज्य में सम्मिलित करना चाहता था।

(6.) सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था

भारत को सबसे बड़ा खतरा उत्तर-पश्चिम की ओर से लगा रहता था। इसलिये अकबर ने पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उसने पश्चिमोत्तर प्रदेश के राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण तथा कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये और योग्य सेनापतियों की अध्यक्षता में प्रबल सेनाएँ रखकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया।

(7.) यूरोपीय व्यापारियों का उन्मूलन

अकबर यूरोपीय व्यापारियों की शक्ति का संवर्द्धन, भविष्य के लिये संकट कारक मानता था। इसलिये अकबर ने उन्हें भारत भूमि से निष्कासित करना अपना लक्ष्य बना लिया। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसने निश्चय किया कि एक प्रबल जहाजी बेड़ा बनाकर भारत के समुद्र तट पर अधिकार स्थापित किया जाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

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अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

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अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

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अकबर का साम्राज्य विस्तार

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अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर का साम्राज्य विस्तार अकबर की राजधानी फतहपुर सीकरी के चारों ओर दूर-दूर तक हुआ। इतने बड़े देश पर अधिकार करने के लिए अकबर को इतना व्यापक विस्तार अभियान चलाना पड़ा।

अकबर का साम्राज्य विस्तार और नीति-वैषम्य

हुमायूँ द्वारा जीते गये भू-भाग तथा बैरम खाँ द्वारा विजित क्षेत्रों से आगे बढ़कर  साम्राज्य विस्तार करने के लिये, अकबर को अफगानों तथा राजपूतों से लोहा लेना था। इसके लिये अकबर ने अलग-अलग नीतियों का निर्माण किया।

राजपूतों तथा अफगान राज्यों के साथ अलग-अलग नीतिइन दो शक्तियों के साथ संघर्ष करने में अकबर ने दो अलग प्रकार की नीतियों  का अनुसरण किया। उसने जिन अफगान राज्यों पर आक्रमण किया उन्हें जीत कर अपने राज्य में मिला लिया और वहाँ पर अपना प्रत्यक्ष शासन स्थापित कर लिया।

जिन राजपूत राज्यों ने उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया, उनको उसने अभयदान देकर उनका राज्य उन्हीं को लौटा दिया और उनको अपना मित्र तथा सहयोगी बना लिया। इन नीति-वैषम्य के तीन प्रधान कारण बताये जाते हैं-

(1.) राजपूत अपने वचन के पक्के होते थे और संधि होने के बाद विश्वासघात नहीं करते थे परन्तु अफगान लोग संधि होने के बाद भी विश्वासघात करने में लेशमात्र संकोच नहीं करते थे।

(2.) राजपूत अपने राज्य का विस्तार नहीं करना चाहते थे। वे केवल इतना चाहते थे कि उन्हें उनके राज्य पर शासन करने दिया जाये। जबकि अफगान लोग, तृतीय अफगान साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख सकते थे।

(3.) मुगल साम्राज्य की स्थापना अफगान साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर की गई थी। इसलिये मुगल साम्राज्य को अफगानों की ओर से अधिक खतरा था और उनका अस्तित्त्व मुगल साम्राज्य के लिये कभी भी घातक सिद्ध हो सकता था। इसलिये अकबर ने अफगान राज्यों के अस्तित्त्व को समाप्त करने तथा राजपूतों को मित्र बनाने की नीति अपनाने का निर्णय लिया।

अकबर का साम्राज्य विस्तार

मालवा विजय

अकबर ने आधमखाँ तथा पीर मुहम्मद की अध्यक्षता में एक सेना मालवा विजय के लिए भेज दी। मालवा का शासक बाजबहादुर मुगल सेना का सामना नहीं कर सका और परास्त होकर बुरहानपुर की और भाग गया। आधम खाँ ने मालवा में युद्ध बंदियों के साथ बड़ा अत्याचार किया।

आधम खाँ ने स्त्रियों तथा बच्चों पर भी अत्याचार किया तथा लूट का माल एवं बाजबहादुर की स्त्रियों को अपने पास रखकर बादशाह को भी अप्रसन्न कर दिया। उसने बादशाह के पास थोड़े से हाथी भेज दिये। इसलिये अकबर ने उसे दण्डित करने का निर्णय लिया।

अकबर ने 27 अप्रैल 1561 को आखेट के बहाने मालवा के लिए प्रस्थान किया। आधम खाँ अत्यन्त भयभीत हो गया। उसने लूट का सारा माल और बाजबहादुर के हरम की स्त्रियों को बादशाह के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। अकबर सन्तुष्ट होकर आगरा लौट आया। आगरा लौटने के बाद अकबर ने आधमखाँ को वापस बुला लिया और मालवा विजय का कार्य पीर मुहम्मद को सौंप दिया।

पीर मुहम्मद ने बुरहानपुर तथा बीजागढ़ पर आक्रमण किया परन्तु उसके पास पर्याप्त सेना नहीं थी। इसलिये वह बाजबहादुर तथा खानदेश के शासक की संयुक्त सेनाओं के समक्ष नहीं ठहर सका और उसे पीछे हटना पड़ा। जब पीर मुहम्मद नर्मदा नदी पार करने का प्रयत्न कर रहा था तब वह अपने घोड़े से गिर पड़ा और पानी में डूबकर मर गया। बाजबहादुर ने मालवा पर अधिकार कर लिया। अकबर ने अब्दुल्लाखाँ उजबेग को मालवा विजय के लिये भेजा। उसने बाजबहादुर को पुनः मालवा से मार भगाया। बाजबहादुर ने भागकर मेवाड़ की पहाड़ियों में शरण ली।

बिहार विजय

बैरम खाँ के मरने के बाद बिहार के अफगानों ने एक बार पुनः अपने भाग्य की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने आदिलशाह के पुत्र शेर खाँ को अपना शासक घोषित करके एक विशाल सेना के साथ जौनपुर पर आक्रमण कर दिया। खानेजमाँ ने अफगानों पर पीछे से आक्रमण करके उन्हें मार भगाया।

खाने जमाँ ने भी आधमखाँ की भाँति लूट का सारा माल अपने पास रख लिया। यह भी खबर फैल गई कि वह बिहार में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने की योजना बना रहा है। जब अकबर को इसकी जानकारी मिली तब 17 जुलाई 1561 को उसने मुनीमखाँ के साथ पूर्व के लिये प्रस्थान किया।

खाने जमाँ अपने भाई बहादुरखाँ के साथ कड़ा पहुँचा। उसने बहुत से हाथियों तथा मूल्यवान् उपहारों के साथ अकबर का अभिनन्दन किया। अकबर ने  उन दोनों भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार किया और 21 अगस्त 1561 को आगरा लौट आया किंतु खानेजमाँ तथा बहादुरखाँ शान्त नहीं बैठे। वे अवसर पाते ही विद्रोह करते रहे। अकबर ने दृढ़तापूर्वक उनके विद्रोहों का दमन किया और मुनीमखाँ को बिहार का शासक नियुक्त कर दिया।

बंगाल विजय

बंगाल के शासक सुलेमान ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी परन्तु 1572 ई. में उसका निधन हो गया और उसका पुत्र दाऊद बंगाल का शासक बना। वह स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा। जब अकबर को इसकी सूचना मिली तब उसने मुनीमखाँ को बंगाल पर आक्रमण करने का आदेश दिया।

मुनीम खाँ ने पहले तो समझौते की बातचीत की परन्तु इसमें सफल नहीं रहने पर पटना पर आक्रमण कर दिया। दाऊद एक दुर्ग में बंद हो गया। बहुत प्रयास करने पर भी मुनीमखाँ दुर्ग को नहीं ले सका। तब उसने अकबर से निवेदन किया कि वह स्वयं आकर समस्या को सुलझाये।

20 जून 1578 को अकबर ने आगरा से पटना के लिये प्रस्थान किया और 8 अगस्त को वहाँ पहुँच गया। दाऊद भयभीत होकर रात्रि में दुर्ग से भाग खड़ा हुआ। पटना पर अकबर का अधिकार हो गया। अकबर ने अफगानों का पीछा किया। अकबर की सेनाएँ बंगाल की राजधानी गौड़ तक पहुँच गईं।

दाऊद भयभीत होकर उड़ीसा की तरफ भागा परन्तु राजा टोडरमल तथा मुनीमखाँ ने वहाँ भी उसका पीछा किया। अन्त में दाऊद ने परास्त होकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे वार्षिक कर देने का वचन दिया। कुछ दिन बाद दाउद ने संधि तोड़ दी। मुगलों ने फिर से उस पर आक्रमण किया और उसका सिर काट डाला। इस प्रकार बंगाल मुगल साम्राज्य का अंग बन गया। कुछ दिन बाद उड़ीसा भी मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

गुजरात विजय

बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा को जीतने के बाद अकबर ने अफगानों के अन्तिम केन्द्र गुजरात पर आक्रमण करने का निश्चय किया। अकबर गुजरात को अपनी पैतृक सम्पत्ति समझता था क्योंकि उसके पिता हुमायूँ ने एक बार गुजरात को जीता था। गुजरात विद्रोही मिर्जाओं की भी शरणस्थली बन गया था।

इन दिनों गुजरात की दशा बड़ी शोचनीय थी क्योंकि बहादुरशाह के बाद उसके समस्त उत्तराधिकारी अयोग्य निकले। उनके शासन में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। गुजरात के अमीर एतमाद खाँ ने अकबर के पास निमन्त्रण भेजा कि वह गुजरात की प्रजा को इस संकट से मुक्त करे।

अकबर ने गुजरात जाने का निश्चय किया और 4 जनवरी 1572 को सेना के साथ गुजरात के लिये प्रस्थान कर दिया। 20 नवम्बर को अकबर अहमदाबाद पहुँच गया। दक्षिण गुजरात में विद्रोही मिर्जा विद्यमान थे। इसलिये अकबर खम्भात होता हुआ सूरत पहुँचा तथा दुर्ग का घेरा डाल दिया।

दुर्ग का घेरा लगभग डेढ़ महीने तक चलता रहा। इसी बीच अहमदाबाद के गवर्नर अजीज कोका ने मिर्जाओं को बुरी तरह परास्त किया। 26 फरवरी 1573 को सूरत के दुर्ग पर भी अकबर का अधिकार हो गया। गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह (तृतीय) कैद कर लिया गया तथा गुजरात मुगल साम्राज्य का प्रान्त बन गया। अकबर ने अजीज कोका को गुजरात का गवर्नर बना दिया। मिर्जाओं ने उपद्रव करने का प्रयत्न किया परन्तु उन्हें नष्ट कर दिया गया।

अकबर द्वारा सीमान्त प्रदेशों की विजय

भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा पर स्थित पर्वतीय मार्गों से विदेशी आक्रमण होते रहे थे। इस कारण अकबर के लिये यह आवश्यक था कि वह अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये गजनी, काबुल, कन्दहार, बिलोचिस्तान तथा सिंध आदि सीमांत प्रदेशों पर अपना प्रभाव स्थापित करे और वहाँ सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण करके उनमें मजबूत सैन्य बल रखे।

काबुल पर अधिकार

हुमायूं के मरने के बाद उसके भारतीय साम्राज्य का शासन उसके बड़े पुत्र अकबर को और काबुल का प्रबन्ध हुमायूँ के छोटे पुत्र मिर्जा हकीम को मिला था। तख्त पर बैठते समय दोनों ही अल्प वयस्क बालक थे। इसलिये अकबर ने बैरम खाँ के संरक्षण में और हकीम ने मुनीमखाँ के संरक्षण में शासन करना आरम्भ किया था। 

जिस समय बैरम खाँ ने अकबर से विद्रोह किया उस समय भी मुनीम खाँ काबुल का शासन संभाल रहा था। बैरम खाँ के विद्रोह की सूचना पाकर मुनीमखाँ ने काबुल का शासन अपने पुत्र गनीखाँ को सौंप दिया और वह स्वयं अकबर की सहायता करने के लिए पंजाब चला आया।

मुनीम खाँ की अनुपस्थिति में हकीम की माँ चूचक बेगम ने सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली और गनी खाँ को दुर्ग में घुसने देने से मना कर दिया। अब वह काबुल में अकबर के प्रभुत्व को समाप्त कर देने की योजनाएँ बनाने लगी। जब अकबर को इसकी सूचना मिली तब उसने मुनीम खाँ को काबुल पर अधिकार करने के लिए भेजा परन्तु वह परास्त होकर लौट आया। साम्राज्य की अन्य समस्याओं में व्यस्त होने के कारण अकबर काबुल की ओर ध्यान नहीं दे सका। हकीम स्वतन्त्रता पूर्वक काबुल पर शासन करने लगा।

हकीम की माँ चूचक बेगम ने अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर अपने पुत्र को हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने की योजना बनाई। उसे उजबेग सरदारों से भी प्रोत्साहन मिला। इसलिये हकीम ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया। उजबेगों ने भी उसका साथ दिया और विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया।

जब अकबर को इसकी सूचना मिली तब उसने स्वयं एक सेना लेकर पंजाब के लिए प्रस्थान किया। हकीम भयभीत होकर काबुल भाग गया। अकबर ने उसका पीछा नहीं किया और उजबेगों के विद्रोह को दबाने में लग गया। इसके बाद 1580 ई. तक हकीम चुप रहा।

1581 ई. में अमीरों के उकसाने पर उसने फिर पंजाब पर आक्रमण किया। इस बार अकबर ने उसका पीछा किया और उसे काबुल से भी निकाल बाहर किया। हकीम ने अकबर से क्षमा याचना की। इस पर अकबर ने उसे फिर से काबुल का शासक बना दिया। इसके बाद फिर कभी हकीम ने विद्रोह नहीं किया। 1585 ई. में हकीम की मृत्यु हो गई और काबुल पर अकबर का प्रत्यक्ष अधिकार स्थापित हो गया।

कबाइली क्षेत्रों पर अधिकार

अफगानिस्तान तथा भारत की पश्चिमोत्तर सीमा के मध्य स्थित पहाड़ी प्रदेश कबाइली क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में उजबेग, रोशनियाँ, युसुफजाई आदि कबीले निवास करते थे जो बड़े ही विद्रोही प्रकृति के थे। काबुल की रक्षा के लिए इन कबीलों पर नियंत्रण रखना आवश्यक था। इसलिये अकबर ने इन कबीलों को परास्त करके उन्हें अपने नियंत्रण में लाने का निश्चय किया।

अकबर ने सबसे पहले उजबेगों का दमन आरम्भ किया क्योंकि उजबेगों तथा मुगलों की पुश्तैनी शत्रुता थी और उन्हीं से अकबर को सबसे बड़ा खतरा था। उजबेगों की शक्ति छिन्न-भिन्न करने के बाद अकबर ने रोशनिया कबीले का दमन किया। इसके बाद अकबर ने बीरबल तथा जैनीखाँ को यूसुफजाइयों का दमन करने के लिए भेजा। ये दोनों सेनापति सहयोग से काम नहीं कर सके। बीरबल को यूसुफजाइयों ने मार डाला।

बीरबल की मृत्यु से अकबर बहुत दुखी हुआ। उसने दो दिन तक कुछ नहीं खाया-पिया। अंत में अकबर ने राजा टोडरमल तथा शाहजादा मुराद की अध्यक्षता में एक सेना भेजी। इस सेना ने यूसुफजाइयों को परास्त करके उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार पश्चिमोत्तर प्रदेश के कबाइली क्षेत्रों पर अकबर का पूर्ण नियंत्रण हो गया।

काश्मीर विजय

अकबर ने 1586 ई. में राजा भगवानदास तथा कासिमखाँ की अध्यक्षता में एक सेना काश्मीर पर आक्रमण करने के लिये भेजी। पर्वतीय प्रदेश होने के कारण काश्मीर में मुगल सेना को भयानक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परन्तु अन्त में वह काश्मीर के शासक यूसुफखाँ तथा उसके पुत्र याकूत को परास्त करने में सफल हुई। पिता-पुत्र को बन्दी बनाकर बिहार भेज दिया गया और मानसिंह को काश्मीर का शासक बना दिया गया। इस प्रकार काश्मीर मुगल साम्राज्य का अंग बन गया।

सिन्ध विजय

पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा के लिए सिन्ध पर अधिकार करना आवश्यक था। उत्तरी सिन्ध पहले से ही मुगल साम्राज्य के अधीन था। केवल दक्षिण सिन्ध को जीतना था, जहाँ पर मिर्जा जानी थट्टा को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्रता पूर्वक शासन कर रहा था।

1590 ई. में अकबर ने मुल्तान के हाकिम अब्दुर्रहीम खानखाना को थट्टा पर अधिकार करने के लिये भेजा। मिर्जा जानी मुगलों की विशाल सेना का सामना नहीं कर सका और उसने थट्टा तथा सिंहवान के दुर्ग मुगलों को समर्पित कर दिये। अकबर ने मिर्जा जानी के साथ उदारता का व्यवहार किया और उसे अपना जागीरदार बना लिया।

बिलोचिस्तान विजय

सिन्ध विजय के उपरान्त अकबर ने बिलोचिस्तान पर अधिकार करने का निश्चय किया। इन दिनों बिलोचिस्तान अफगानों के अधिकार में था। 1595 ई. में अकबर ने मासूम खाँ की अध्यक्षता में एक सेना बिलोचिस्तान पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने सम्पूर्ण बिलोचिस्तान को जीत लिया। इस प्रकार यह क्षेत्र भी अकबर के अधीन हो गया।

कन्दहार विजय

कन्दहार सामरिक तथा व्यापारिक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण नगर था। इसे भारत का फाटक कहा जाता था। इससे होकर ही विदेशी सेनाएँ भारत में प्रवेश कर सकती थीं। फारस के शाह तथा दिल्ली के बादशाह दोनों की दृष्टि कन्दहार पर लगी रहती थी। इन दिनों कन्दहार पर फारस के शाह का अधिकार था।

उसने मुजफ्फर हुसैन मिर्जा को वहाँ का प्रांतपति बना रखा था। किसी कारण से फारस का शाह, मुजफ्फर हुसैन मिर्जा से नाराज हो गया। उजबेग लोग भी कन्दहार पर आक्रमण करके उसे तंग कर रहे थे। इस स्थिति में मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने कन्दहार का दुर्ग अकबर को समर्पित कर दिया। इस प्रकार बिना युद्ध किये ही कन्दहार अकबर के अधिकार में आ गया।

अकबर द्वारा दक्षिण भारत पर विजय

विंध्याचल की पहाड़ियाँ भारत को उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में विभक्त करती हैं। उत्तर भारत के कई शासक दक्षिण भारत पर आक्रमण करके उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित करते आये थे। जब अकबर ने मालवा, गुजरात तथा उड़ीसा पर अधिकार कर लिया तब उसका राज्य दक्षिण भारत की सीमा से जा लगा। अकबर ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का निश्चय किया।

दक्षिण भारत पर विजय

इस निश्चय के कई कारण थे-

(1.) अकबर की साम्राज्यवादी नीति

अकबर महत्त्वाकंाक्षी बादशाह था। वह सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।

(2.) उदासीनता असम्भव

चूँकि मालवा, गुजरात तथा उड़ीसा मुगल साम्राज्य के अंग बन गये थे और ये तीनों ही राज्य दक्षिण भारत के राज्यों के समीपवर्ती थे, इसलिये मुगल साम्राज्य के सूबेदारों का दक्षिण के राज्यों के अधिकारियों से सीमा, व्यापार, क्षेत्र तथा धर्म सम्बन्धी झगड़े हो जाना स्वाभाविक था। ये शिकायतें लगातार अकबर तक पहुँचती रहती थीं। इसलिये अकबर का दक्षिण भारत के राज्यों की ओर से उदासीन रहना असंभव हो गया।

(3.) दक्षिण की अव्यवस्था

इन दिनों दक्षिण भारत की दशा अत्यंत शोचनीय थी। बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पाँच स्वतन्त्र राज्यों- अहमद नगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर तथा बरार में विभक्त हो गया था। जब तक विजय नगर का हिन्दू राज्य जीवित था तब तक ये पाँचों राज्य संगठित होकर उससे मोर्चा लेते रहे परन्तु जब 1565 ई. में विजयनगर की पराजय तथा उसका उन्मूलन हो गया तब दक्षिण के मुसलमान राज्य सर्वोच्चता के लिए परस्पर संघर्ष करने लगे। अकबर ने दक्षिण की इस राजनीतिक कुव्यवस्था से लाभ उठाने का निश्चय किया।

(4.) मुसलमानों में धार्मिक संघर्ष

दक्षिण के राज्यों में इन दिनों शिया, सुन्नी तथा महदवी लोग एक-दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयास कर रहे थे। दक्षिण भारत के मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता अंततः इस्लाम का ही नुक्सान कर रही थी इसलिये अकबर को दक्षिण भारत पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन करना ही बेहतर लगा।

(5.) पुर्तगालियों के दमन का निश्चय

इन दिनों अरब सागर के तट पर पुर्तगालियों की शक्ति तेजी से बढ़ रही थी। ये लोग अपनी राजनीतिक तथा व्यापारिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ अपने धर्म का प्रचार भी कर रहे थे। ये लोग धार्मिक उन्माद के कारण भारतीयों पर बड़े अत्याचार करते थे। इसलिये अकबर ने उनकी उपस्थिति से आश्ंाकित होकर उन्हें अरब सागर के तट से उन्मूलित करने का निश्चय किया।

पुर्तगालियों को उन्मूलित करने के दो उपाय थे- या तो अकबर स्वयं एक विशाल जहाजी बेड़े का निर्माण करके पुर्तगालियों पर आक्रमण करता या फिर वह दक्षिण भारत के राज्यों पर अधिकार करके उनके साधनों से पुर्तगालियों पर आक्रमण करता। अनेक कारणों से जहाजी बेड़े का निर्माण संभव नहीं था। इसलिये अकबर ने दक्षिण के राज्यों को मुगल साम्राज्य के अधीन लाने का निर्णय किया।

(6.) सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति

साम्राज्य विस्तार के लिये अकबर ने विशाल सेना का निर्माण कर लिया था। इस सेना को राजधानी के निकट रखना अत्यंत खतरनाक था। वह किसी भी समय विद्रोह कर सकती थी। सेना की विभिन्न टुकड़ियों में संघर्ष न हो इसके लिये उसे निरन्तर युद्धों में संलग्न रखना आवश्यक था। इस सेना का वेतन चुकाने के लिये धन की आवश्यकता रहती थी। सेना की इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति दक्षिण भारत पर आक्रमण करके की जा सकती थी।

(7.) शान्तिपूर्ण प्रयासों की विफलता

प्रारम्भ में अकबर ने दक्षिण के राज्यों के साथ शान्ति पूर्वक समझौता करने का प्रयत्न किया। 1591 ई. में उसने दक्षिण के चार प्रधान राज्यों- अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा तथा खानदेश के पास प्रस्ताव भेजा कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर लें। खानदेश के शासक ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया किंतु शेष तीनों राज्यों ने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसलिये अकबर को दक्षिण के राज्यों पर आक्रमण करने का निश्चय करना पड़ा।

अहमदनगर पर आक्रमण

अकबर ने सबसे पहले अहमदनगर पर आक्रमण किया। इन दिनों अहमदनगर की दशा अत्यंत शोचनीय थी। वहाँ का सुल्तान मर गया था और राज्य में उत्तराधिकार के लिये झगड़ा चल रहा था। दरबार में दो दल हो गये थे। एक दल ने बाजी अपने हाथ से निकलती देखकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और उससे सहायता की प्रार्थना की।

दूसरे दल ने चाँद बीबी के नेतृत्व में मुगलों से युद्ध करने का निश्चय किया। अकबर ने अहमदनगर के गृह युद्ध से लाभ उठाया। उसने 1599 ई. में शाहजादा मुराद तथा अब्दुर्रहीम खानखाना की अध्यक्षता में एक सेना अहमदनगर पर आक्रमण करने भेजी। चाँद बीबी ने दृढ़ता से मुगलों का सामना किया और उन्हें पीछे धकेल दिया।

मुगलों की प्रबल सेना तथा उसके प्रचुर साधनांे के समक्ष अहमदनगर की सेना बहुत दिनों तक नहीं टिक सकी। इसलिये चाँद बीबी ने मुगलों से सन्धि कर ली और बरार का प्रान्त उन्हें दे दिया। अहमदनगर के अमीरों ने इस सन्धि का विरोध किया क्योंकि इसमें उन्होंने अपनी मान हानि समझी और एक विशाल सेना लेकर बरार पर आक्रमण कर दिया। प्रारम्भ में उन्हें कुछ सफलता मिली परन्तु अन्त में वे परास्त हो गये। अहमदनगर पर मुगलों का अधिकार हो गया।

असीरगढ़ विजय

अभेद्य माना जाने वाला असीरगढ़ दुर्ग खानदेश में स्थित था। यह दुर्ग दक्षिण भारत के मार्ग में स्थित होने से दक्षिण का फाटक कहलाता था। दक्षिण विजय के लिए इस दुर्ग पर अधिकार करना आवश्यक था। यद्यपि खानदेश के सुल्तान रजा अली खाँ ने अकबर के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था परन्तु उसके मर जाने के बाद उसके पुत्र मीरन बहादुर खाँ ने स्वतन्त्र शासक की तरह शासन करना आरम्भ कर दिया था।

अकबर की एक सेना ने खानदेश की राजधानी बुरहानपुर पर तथा दूसरी सेना ने असीरगढ़ दुर्ग पर घेरा डाला। मुगल सेना ने बड़ी सरलता से बुरहानपुर पर अधिकार कर लिया किंतु असीरगढ़ का घेरा 6 महिने तक चलता रहा। जब सफलता की मिलती दिखाई नहीं दी तब अकबर ने मीरन बहादुर को संधि के बहाने से अपने शिविर में बुलाकर कैद कर लिया।

फिर भी दुर्ग रक्षकों ने दुर्ग के फाटक नहीं खोले। इस पर अकबर ने दुर्ग रक्षकों को रिश्वत देकर दुर्ग का द्वार खुलवा लिया और उस पर अधिकार कर लिया। अहमदनगर तथा असीरगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो जाने से मुगलों के लिये दक्षिण के अन्य राज्यों पर विजय का काम आसान हो गया।

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की राजपूत नीति तथा अकबर की राजपूतों पर विजय के बारे में हम अकबर की राजपूत नीति तथा अकबर की राजपूतों पर विजय के बारे में हम अलग अध्यायों में विस्तार से चर्चा करेंगे।

अकबर का साम्राज्य विस्तार कभी रुका नहीं, अकबर की अंतिम सांस तक अकबर के साम्राज्य का विस्तार चलता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर की राजपूत नीति

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अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूत नीति मध्यकालीन भारतीय इतिहास मे युगांतरकारी परिवर्तन लाने में सक्षम सिद्ध हुई। अकबर ने राजपूतों के साथ सुलह एवं मैत्री का मार्ग अपनाया।

अकबर अशिक्षित था किंतु संघर्षों ने उसे चतुर राजनीतिज्ञ बना दिया था। कामरान की निर्दयता, बैरमखाँ की संगति, हरम के कुचक्रों तथा मिर्जाओं के षड़यंत्रों ने अकबर को अपनी तथा अपने साम्राज्य की रक्षा के लिये विशेष रूप से सतर्क कर दिया था। इसलिये अकबर ने अफगानों के साथ विजय तथा उन्मूलन की नीति का अनुसरण किया परन्तु राजपूतों के साथ उसने क्षमा, मित्रता तथा सहयोग की नीति को अपनाया।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में- ‘बिना राजपूतों के सहयोग के भारतीय साम्राज्य सम्भव नहीं था और बिना उनके विवेकपूर्ण तथा सक्रिय सहयोग के सामाजिक तथा राजनीतिक एकता स्थापित नहीं हो सकती थी। नई राज-संस्था हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को मिलाकर बनानी थी और दानों ही का कल्याण करना था।’

अकबर की राजपूत नीति के प्रमुख कारण

अकबर द्वारा अपनाई गई राजपूत नीति के कई कारण कारण थे-

(1.) मुस्लिम अमीरों पर नियन्त्रण रखने में सुविधा

अकबर को मुगल, तुर्क, अफगान तथा चगताई अमीरों और मिर्जाओं पर विश्वास नहीं था, क्योंकि वे प्रायः विद्रोह करके तख्त हड़पने का प्रयास करते थे। वे लोग प्रायः विद्रोही अमीरों एवं बादशाह के शत्रुओं से मिल जाते थे और उनकी शक्ति को प्रबल बना देते थे।

ऐसी स्थिति में अकबर को ऐसे नये अमीरों की आवश्यकता थी, जो अकबर के प्रतिद्वंद्वी न हों, जिनकी स्वामिभक्ति अटल हो और जिनकी सहायता से अकबर विश्वासघाती तथा विद्रोही मुस्लिम अमीरों पर नियंत्रण रख सके। अकबर की इस आवश्यकता की पूर्ति राजपूतों की वीर, विश्वसनीय तथा स्वाभिमानी जाति ही कर सकती थी। इसलिये अकबर ने राजपूत अमीरों का एक प्रबल दल बनाने का निश्चय किया।

(2.) अलोकप्रियता का निवारण

मुगल भारत में बर्बर तथा विदेशी समझे जाते थे। बाबर अपनी अकाल मृत्यु के कारण और हुमायूँ अपने संघर्षमय जीवन के कारण इस अलोकप्रियता को दूर नहीं कर सका था। अकबर चाहता था कि भारतीय प्रजा उसे भयवश नहीं वरन् प्रेम तथा श्रद्धा से अपना शासक स्वीकार करे।

चूँकि मुगलों ने अफगानों से राज्य छीना था, इसलिये अफगानों के हृदय पर इतनी जल्दी विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं था जबकि राजपूतों की स्वतंत्र सत्ता को समाप्त हुए समय हो चुका था इसलिये उन्हें अधिक सरलता से अपनी तरफ किया जा सकता था।

(3.) राजपूतों के प्रति कृतज्ञता

अकबर का जन्म एक राजपूत राजा के संरक्षण में तथा उसके महल में हुआ था जबकि अकबर के अपने चाचा ने अकबर के प्राण लेने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी। इसलिये अकबर राजपूतों की उदारता का जवाब उनके साथ उदारता व्यवहार करके देना चाहता था। अपने हिन्दू शिक्षकों के उदार स्वभाव तथा उनके प्रभाव के कारण भी अकबर ने हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों के साथ उदारता का व्यवहार किया।

(4.) राजपूतों के गुणों का उपयोग

अकबर राजपूतों के विलक्षण गुणों के कारण भी उन्हें अपना मित्र बनाने के लिए उत्सुक था। वह राजपूतों की वीरता तथा साहस से प्रभावित था। वह जानता था कि राजपूत अपने वचन के पक्के होते हैं और कभी विश्वासघात नहीं करते। अकबर को इस वीर जाति की सहायता की बड़ी आवश्यकता थी। इसलिये उसने राजपूतों से मैत्री करने का निश्चय कर लिया।

(5.) सैनिक आवश्यकता की पूर्ति

अकबर को अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए एक विशाल सेना की आवश्यकता थी। उसे अपने पूर्वजों के प्रदेश से सैनिक सहायता प्राप्त होने की आशा नहीं थी वरन् उस ओर से संकट की ही संभावना बनी रहती थी। उसे भारत में योग्य तथा कुशल सैनिक राजपूताने से ही प्राप्त हो सकते थे जिन्हें अपनी सेना में भर्ती करके अकबर अपनी शक्ति में वृद्धि कर सकता था।

(6.) राजपूताने का भौगोलिक महत्त्व

राजपूताना दिल्ली तथा आगरा के अत्यन्त निकट स्थित था। इसलिये राजपूत मुगल साम्राज्य तथा उसकी राजधानी के लिए कभी भी खतरनाक अथवा उपयोगी सिद्ध हो सकते थे। ऐसी स्थिति में अकबर के पास दो मार्ग थे- या तो वह राजपूतों को अपना मित्र बना ले या उनसे युद्ध करके उन्हें समाप्त कर दे।

अकबर जानता था कि राजपूतों को समाप्त करना सम्भव नहीं था। यदि वह उनके साथ उलझ जाता तो उसकी दक्षिण विजय तथा अन्य योजनाएँ सफल नहीं हो पातीं। इसलिये उसने राजपूतों को अपना सहायक बनाकर उनकी सहायता से अपने उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयत्न किया।

(7.) साम्राज्य की सुरक्षा तथा स्थायित्व में सहयोग

अकबर समझ गया था कि बहुसंख्यक हिन्दुओं, विशेषकर स्थानीय राजपूत शासकों की सहायता के बिना उसका साम्राज्य सुरक्षित नहीं रहेगा और न उसे स्थायित्व प्राप्त होगा। साम्राज्य को आमूलचूल सुदृढ़ बनाने के लिए स्थानीय शासन का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक था।

चूँकि राजपूत लोग ही हिन्दू जाति के नेता थे, इसलिये उनका समर्थन प्राप्त करने का तात्पर्य सम्पूर्ण हिन्दू जाति का समर्थन तथा सहयोग प्राप्त करना था। अतः अकबर ने राजपूतों के साथ उदारता का व्यवहार करके उनके हृदय पर विजय प्राप्त करने तथा साम्राज्य निर्माण में उनकी सहायता प्राप्त करने का निर्णय लिया।

(8.) साम्राज्य विस्तार में सहायता

साम्राज्य विस्तार के कार्य में भी राजपूत सहायक सिद्ध हो सकते थे। अकबर न केवल मुसलमान राज्यों अपितु स्वतंत्रता प्रेमी राजपूत राज्यों का विध्वंस करने में मित्र राजपूत राज्यों की सहायता ले सकता था। राजपूतों को राजपूतों की ही तलवार से नष्ट करने में अधिक आसानी रहने की संभावना थी।

(9.) सुलह-कुल की भावना

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अकबर सुलह-कुल की भावना से प्रेरित था। इसलिये वह उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करके समस्त प्रजा को प्रसन्न रखना चाहता था। इस प्रकार न केवल उपयोगिता की दृष्टि से अपितु सुलह-कुल की नीति के कारण भी अकबर ने राजपूतों को अपना मित्र बनाने का निश्चय किया था।

अकबर की राजपूत नीति का क्रियात्मक स्वरूप

अकबर की राजपूत नीति का क्रियात्मक स्वरूप इस प्रकार से था-

(1.) राजपूतों की सैनिक क्षमता का उपयोग

अकबर ने राजपूत सैनिकों को अपनी सेना में भरती किया और राजपूत राजाओं को मुगल सेना में उच्च पद दिये। इससे अकबर को अपने साम्राज्य का विस्तार करने में बड़ी सहायता मिली। उसने राजपूतों को न केवल शत्रु मुस्लिम राज्यों के विरुद्ध अपितु शत्रु राजपूत राज्यों के विरुद्ध भी प्रयोग किया।

(2.) राजपूतों की शासन क्षमता का उपयोग

अकबर ने शासकीय विभाग में भी राजपूतों को उच्च पद दिये। उसने राजपूत राजाओं को बड़े-बड़े प्रान्तों का शासक बनाया और केन्द्रीय सरकार में उच्च पद दिये। इस प्रकार उसने राजपूतों की शासकीय प्रतिभा का लाभ उठाकर अपने साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ बनाया।

(3.) राजपूतों की स्वामिभक्ति का उपयोग

अकबर ने राजपूत राजाओं एवं राजकुमारों को अपने दरबार में उच्च पद दिये और राजपूत मनसबदारों का एक प्रबल दल खड़ा कर लिया। स्वामिभक्त मनसबदारों का यह दल विद्रोही अमीरों के विरुद्ध बादशाह की ढाल बनकर खड़ा हो गया। जब भी कोई तुर्की, चगताई, अफगान अथवा मंगोल अमीर बादशाह के विरुद्ध विद्रोह करता था, अकबर राजपूत मनसबदारों को उसके विरुद्ध झौंक देता था।

(4.) राजपूतों की प्रतिष्ठा का दमन

राजपूत राजाओं तथा राजुकमारों ने मुगल सेना में भर्ती होकर, शासकीय पदों पर काम करके तथा मुगल दरबार में मनसबदारी स्वीकार करके मुगल साम्राज्य की जितनी सेवा की, वैसा उदाहरण विश्व इतिहास में अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इस मुगल भक्ति के कारण जनता की दृष्टि में राजपूतों की प्रतिष्ठा तथा गौरव पहले जैसा नहीं रहा।

प्रजा अब उन्हें राष्ट्र का रक्षक न मानकर मुगलों का चाकर मानने लगी। मुगल दरबार में उन्हें चाहे जो सम्मान मिला हो परन्तु देशवासियों की दृष्टि में वे गिर गये और उनका जातीय अभिमान कमजोर पड़ गया। केवल राणा प्रताप जैसे कुछ राजपूत शासक ही मुगलों के विरुद्ध टिके रहकर अपनी गौरव पताका को गिरने से बचा सके थे।

(5.) राजपूतों की राज्य लक्ष्मी का हरण

मुगलों के भारत में आने से पहले राजपूतों ने मुसलमान शासकों की अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार नहीं की थी। वे लगातार लड़ते रहे और अपनी खोई हुई राज्यसत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करते रहे। अकबर ने सुलह-कुल की नीति के तहत उन्हें मित्रता के बहाने से अधीन बनाया।

वही राजपूत अपनी रियासत पर शासन कर सकता था जो बादशाह की चाकरी स्वीकार करे। यदि कोई राजपूत शासक अथवा राजकुमार ऐसा नहीं करता था तो उसका राज्य उसके किसी भाई को दे दिया जाता था। इस प्रकार राजपूत अपनी रियासत के वास्तविक स्वामी नहीं रहकर मुगलों के प्रतिनिधि बन गये।

(6.) राजपूतों की कुलीय उच्चता पर प्रहार

अकबर ने मुगल राजकुमारों से राजपूत राजकन्याओं के विवाह करवाकर राजपूतों की कुलीय उच्चता एवं मर्यादा को नष्ट करने का प्रयास किया। उसने राजपूत कन्याओं के विवाह तो मुसलमान शहजादों के साथ करवाये परन्तु किसी मुगल शहजादी का हाथ किसी हिन्दू राजा के हाथ में नहीं दिया।

यहाँ तक कि मुगलों ने शहजादियों के विवाह की परम्परा ही समाप्त कर दी ताकि भारत में कोई भी राजवंश, मुगलों की बराबरी अथवा उच्चता का दावा न कर सके। जब कोई मुगल शहजादा, बादशाह के विरुद्ध विद्रोह करता था तो उसे पकड़कर लाने वाले राजपूत सेनापति अथवा मनसबदार को यह अधिकार नहीं होता था कि वह विद्रोही मुगल शहजादे को अपमानित करे, उसका अंग-भंग करे, उसे मृत्यु दण्ड दे अथवा उसे किसी भी तरह नीचा दिखाये। राजपूत राजाओं को युद्ध क्षेत्र में लाल रंग के तम्बू लगाकर रहने की अनुमति नहीं थी। ऐसा करने पर उन्हें दण्डित किया जाता था।

(7.) राजपूतों की सामरिक क्षमताओं का दमन

अकबर ने राजपूतों की सामरिक शक्ति को यथा सम्भव निर्बल बनाने का प्रयत्न किया। जिन राजपूत राजाओं अथवा राजकुमारों ने अकबर का विरोध किया उन्हें नष्ट कर दिया गया। जिन राजपूतों ने उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया, उन्हें भी यथासम्भव निर्बल बनाकर रियासत दी गई।

राजपूतों के अत्यन्त प्रबल तथा महत्त्वपूर्ण दुर्ग उनसे छीन लिये गये और उन्हें किसी अन्य स्थान पर जागीर दे दी गई। बड़ी रियासतों में से छोटी-छोटी रियासतें बनाकर उसी वंश के राजकुमारों में बांट दी गईं। राजपूत राजा, अकबर की अनुमति के बिना अपने दुर्ग में जीर्णोद्धार अथवा नवीन निर्माण नहीं करवा सकते थे।

(8.) राजपूतों का अपनी प्रजा से अलगाव

अकबर राजपूत राजाओं एवं राजकुमारों को गुजरात, दक्षिण भारत अथवा काबुल आदि देशों में नियुक्त करके लम्बे समय के लिये उनकी रियासत से दूर भेज देता था जिससे रियासत में उसका प्रभाव तथा महत्त्व कम हो जाये और प्रजा से उनका सीधा सम्पर्क कट जाये। राजा के रियासत से दूर होने के कारण सरकारी कारिंदे अपनी मनमानी करते थे तथा उनकी शिकायतों को सुनने वाला भी कोई उपलब्ध नहीं होता था।

(9.) राजपूत राजाओं तथा उनके सामंतों के बीच अलगाव

अकबर ने राजपूत शासकों की शक्ति के स्रोत पर चोट की। उसने राजपूत शासकों एवं उनके सामंतों के बीच अलगाव उत्पन्न करने के लिये राजपूत राज्यों के सामन्तों को भी सीधे अपने अधीन करके उन्हें मनसब दिये। इससे बड़े-बड़े राजपूत राजाओं की प्रतिष्ठा तथा उनका प्रभाव कम हो गया। अनेक शक्तिशाली सामंत अब राजा के सेवक न रहकर उनके प्रतिद्वंद्वी बन गये। इस प्रकार अकबर ने एक कुशल राजनीतिज्ञ की भाँति राजपूतों की शक्ति को जड़ से काट दिया।

(10.) राजपूत राजाओं का परस्पर अलगाव

अकबर ने प्रयास किया कि राजपूत राजा बिना उसकी अनुमति के एक दूसरे से नहीं मिलें, ताकि राजपूत राजा एवं राजकुमार अपना कोई संगठन खड़ा नहीं कर सकें।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम व्यापक तथा दूरगामी थे। इस नीति के भारत के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवेश पर गहरे प्रभाव हुए-

(1.) मुगलों की सैनिक शक्ति में वृद्धि

राजपूत सैनिक युद्ध क्षेत्र में तब तक लड़ते रहते थे जब तक कि या तो विजय प्राप्त हो जाये या प्राण चले जायें। वे अंतिम समय तक शत्रु सेना का संहार करते थे। ऐसे समर्पित योद्धाओं के मुगल सेना में भर्ती हो जाने तथा उच्च पदों पर पहुँच जाने से मुगल साम्राज्य की सैनिक शक्ति में बड़ी वृद्धि हुई।

(2.) मुगल साम्राज्य को स्थायित्व

राजपूत केवल बादशाह के प्रति स्वामिभक्त थे। उन्हें मुस्लिम अमीरों के कुचक्रों से कोई लेना-देना नहीं था। इन स्वामिभक्त राजपूतों की मुगल दरबार में उपस्थिति हो जाने से बादशाह की स्थिति बहुत मजबूत हो गई तथा मुगल साम्राज्य को दृढ़ता तथा स्थायित्व प्राप्त हो गया।

(3.) मुगल साम्राज्य में शांति एवं सुव्यवस्था की स्थापना

प्रांतीय एवं स्थानीय शासन में हिन्दू शासकों की सहायता उपलब्ध हो जाने से अकबर को अपने साम्राज्य में आन्तरिक विद्रोहों का दमन करने तथा दूरस्थ प्रांतों में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित करने में सफलता मिल गई।

(4.) मुगल साम्राज्य के विस्तार में तेजी

अकबर का सैनिक बल बढ़ जाने से मुगल साम्राज्य के विस्तार का कार्य सरल हो गया। इससे सम्पूर्ण उत्तर भारत और दक्षिण का बहुत बड़ा भाग मुगल साम्राज्य के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष नियंत्रण में हो गया। राजपूतों तथा मुगलों की संयुक्त सेनाओं ने न केवल अफगानों अपितु स्वतन्त्र राजपूत राज्यों की शक्ति को नष्ट प्रायः कर दिया।

(5.) हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच घृणा में कमी

अपने अपने धर्म में आस्था रखने के कारण हिन्दू तथा मुलसमान एक दूसरे से घृणा करते थे। अकबर की उदार राजपूत नीति के कारण हिन्दू तथा मुसलमान एक-दूसरे के निकट सम्पर्क में आ गये और उनमें विचार-विनिमय बढ़ गया। इससे परस्पर घृणा में कमी आ गई।

(6.) हिन्दुओं को धार्मिक अधिकार

राजपूतों का विश्वास जीतने के लिये अकबर को धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनानी पड़ी जिससे हिन्दुओं को भी धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई। मन्दिरों तथा मूर्तियों का तुड़वाया जाना बंद हो गया और नये मन्दिर बनवाने की स्वतंत्रता मिल गई। हिंदुओं को जजिया तथा अन्य प्रकार के करों से मुक्ति मिल गई।

(7.) हिन्दुओं को सरकारी नौकरियाँ

चूँकि सरकारी नौकरियों के द्वार हिन्दुओं के लिए भी खोल दिये गये इसलिये हिन्दुओं को भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने एवं आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त हो गये।

(8.) जन जीवन में आर्थिक सुधार

अकबर की राजपूत नीति का भारतीयों के आर्थिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। हिन्दुओं को जजिया तथा अन्य कई करों से मुक्ति मिल गई। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगा। राजा टोडरमल ने जो भूमि सुधार किये, उससे सरकारी कर्मचारियों की लूट में कमी आई तथा राजकीय कोष के साथ-साथ प्रजा को भी आर्थिक लाभ हुआ।

(9.) सांस्कृतिक परिवेश में सुधार

अकबर की राजपूत नीति का देश के सांस्कृतिक परिवेश पर भी बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। राजपूतों के मुगल दरबार में सभासद बन जाने से हिन्दू उत्सवों, उनके आचार विचार तथा रीति रिवाजों का मुगल दरबार में प्रवेश हो गया। अकबर ने हिन्दी तथा संस्कृत को प्रश्रय दिया और हिन्दू भी फारसी का अध्ययन करने लगे। उस काल के स्थापत्य पर हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली की छाप दिखाई देती है।

(10.) राजपूतों के गौरव में कमी

अकबर की राजपूत नीति से राजपूतों के प्राचीन गौरव को भीषण आघात लगा। उनकी राजनीतिक स्वतन्त्रता समाप्त हो गई और वे मुगल शहजादों के सेवक बन गये। उन्होंने अपनी बेहिन-बेटियों को मुगलों को देकर अपने कुल की प्रतिष्ठा तथा मान-मर्यादा को धूल में मिला दिया।

डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय ने इस नीति के दुष्परिणाम पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘इससे राजपूत लोग उत्साहहीन तथा असन्तुष्ट हो गये। मुगल दरबार के अन्य अमीरों की संगति ने उन्हें दुर्गुणों का आखेट बना दिया और वे अपने पुराने गुणों को खोकर विलासप्रिय बन गये और अवसर मिलने पर धोखा तथा विश्वासघात करने लगे और पूर्ण रूप से विश्वास योग्य न रहे गये।’

अब राजपूत राजकुमार भी मुगल शहजादों की तरह राज्य प्राप्ति के लिये पिता, भाई तथा अन्य सम्बन्धियों की हत्याएँ करने लगे।

राजपूत शासकों द्वारा अकबर के साथ मैत्री के कारण

मेवाड़ को छोड़कर शेष राजपूत राज्यों ने अकबर के साथ मैत्री क्यों की, इस विषय पर इतिहासकारों में विभिन्न राय है। इस सम्बन्ध में दिये जाने वाले तर्क इस प्रकार से हैं-

(1.) अकबर से राजपूत मैत्री के युग का आरम्भ राजा भारमल द्वारा अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ करने के बाद हुआ था। भारमल के लिये इस विवाह के परिणाम सुखद रहे। भारमल की पुत्री भारत की साम्राज्ञी बन गई। भारमल को छोटे-बड़े शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसका राज्य सुरक्षित हो गया। उसके पुत्र तथा पौत्र को मुगल सेना में उच्च पद मिल गये। अन्य राजपूतों ने भी भारमल के इस कदम का अनुकरण करना ही ठीक समझा।

(2.) अकबर ने अपने व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया कि वह मित्र राजपूत राज्यों को उन्मूलित नहीं करेगा। उसने समस्त विजित मुसलमान राज्यों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया किंतु एक भी बड़े राजपूत राज्य को मुगल साम्राज्य में नहीं मिलाया।

(3.) युद्ध में परास्त होकर अधीनता स्वीकार करने वाले राजपूत शासकों को भी अकबर ने उसके राज्य से हटाकर अन्य स्थान पर जागीर देकर उसके अस्तित्त्व को बनाये रखा।

(4.) अकबर ने राजपूतों को यह विश्वास दिला दिया कि अकबर केवल इतना ही चाहता था कि समस्त राजपूत राज्य उसकी अधीनता स्वीकार कर लें और मुगल साम्राज्य के निर्माण में सहयोग प्रदान करें। इसके बदले में उन्हें शांति, सुरक्षा, उच्च पद, वेतन एवं जागीरें मिलेंगी।

(5.) जिन राजपूत राज्यों ने अकबर से मित्रता की, अकबर ने उन राजपूत राज्यों के आन्तरिक शासन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया। उसने उन राज्यों की केवल विदेश नीति पर नियंत्रण स्थापित किया।

(6.) अकबर ने राजपूतों को विश्वास दिला दिया कि अकबर उनकी स्वतन्त्रता नहीं हड़पना चाहता है और न उनके सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा संास्कृतिक जीवन में किसी प्रकार का हस्तेक्षप करना चाहता है।

(7.) अकबर ने राजपूत राजाओं तथा राजकुमारों को मुगल साम्राज्य में उच्च पद प्रदान किये और उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा दरबार के अन्य मुसलमान अमीरों के साथ किया जाता था। वह राजपूत तथा मुसलमान अधिकारियों को समान दृष्टि से देखता था और जाति तथा धर्म के आधार पर उनसे भेदभाव नहीं करता था।

(8.) राजपूतों को मुगल साम्राज्य में अपनी सामरिक तथा प्रशासनिक प्रतिभा के प्रदर्शन का पूर्ण अवसर प्राप्त था, जिससे वे अपनी भुजाओं का जौहर दिखा सकते थे।

(9.) दिल्ली सल्तनत की स्थापना से बहुत पहले से राजपूत राजा, मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध करते आये थे जिससे उनकी शक्ति को बहुत हानि पहुँची थी। उनके लिये अकबर की विशाल सेनाओं तथा उसके प्रचुर साधनों के समक्ष ठहर पाना कठिन था।

(10.) राजपूत यह समझ गये थे कि अकबर से लोहा लेने का तात्पर्य था भीषण नर-संहार, अपार सम्पत्ति का विनाश और अन्त में असफलता।

(9.) निरन्तर युद्ध का क्षेत्र बन जाने से राजपूताना नष्ट होता जा रहा था। राजपूताने को बचाने तथा शांति स्थापित करने का कार्य अकबर से मैत्री स्थापित करके बड़ी सरलता से किया जा सकता था।

(11.) कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजपूतों में प्राचीन क्षत्रियों जैसा तेज नहीं रह गया था। इसलिये वे एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासक की छत्रछाया में अपने राज्यों को सुरक्षित बनाये रखना चाहते थे।

(12.) राजपूत शासकों में अहंकार की भावना इतनी अधिक थी कि उनमें परस्पर भाईचारा स्थापित होना संभव नहीं था। वे सदैव किसी न किसी बात पर अपने पड़ौसी राज्यों से लड़ते रहते थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने स्वजातीय राजपूत शासक से परास्त होकर अथवा उसकी अधीनता स्वीकार करके रहने की बजाय विदेशी शक्ति के सहायक होकर रहना अधिक पसंद किया।

(13.) असंतुष्ट राजपूत राजकुमारों के लिये अकबर का दरबार सबसे बड़ी शरण स्थली था जहाँ उसे जागीर, ऊँचा मनसब तथा ऊँचा वेतन पाने के अवसर थे। इसलिये जगमाल जैसे असंतुष्ट राजकुमारों ने मुगलों की चाकरी स्वीकार कर ली।

निष्कर्ष

अकबर ने राजपूतों के साथ जिस नीति का अनुसरण किया, उससे उसकी दूरदृष्टि तथा कूटनीति का परिचय मिलता है। उसने मुसलमानों तथा हिन्दुओं दोनों के विरुद्ध राजपूतों का सफल प्रयोग किया तथा अपने विरुद्ध अफगानों एवं राजपूतों का संयुक्त मोर्चा नहीं बनने दिया। यह उसकी बहुत बड़ी सफलता थी। अकबर की राजपूत नीति से देश के राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवेश पर गहरा प्रभाव पड़ा।

राजपूतों को शासन में भागीदारी देने से शासकों एवं जनता के बीच पहले जैसी दूरी नहीं रही। जब तक अकबर की राजपूत नीति का अनुसरण किया गया तब तक मुगल साम्राज्य सुदृढ़ बना रहा और उसकी उत्तरोत्तर उन्नति होती गई परन्तु जब औरंगजेब के शासनकाल में अकबर द्वारा स्थापित नीति को त्याग दिया गया तब मुगल साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि राजपूत राजा और राजकुमार लम्बे समये तक मुस्लिम सेनाओं के विरुद्ध लड़ते हुए यह समझ गये थे कि राजपूत नष्ट हो सकते हैं किंतु जीत नहीं सकते। इसलिये वे अकबर द्वारा अपनाई गई सुलह-कुल की नीति का शिकार हो गये। अहंकारी होने के कारण वे परस्पर लड़ते रहे और केन्द्रीय शक्ति की छत्रछाया में अपने राज्यों को सुरक्षित बनाने में सफल रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर की राजपूतों पर विजय

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अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की राजपूतों पर विजय अकबर की साम्राज्य विस्तार नीति का प्रमुख अंग थी। अकबर ने न केवल राजपूतों को अपने अधीन किया अपितु उनसे ही अपने राज्य का विस्तार करवाया।

आम्बेर के साथ मैत्री सम्बन्ध

राजपूताना में स्थित आम्बेर राज्य पर कच्छवाहा राजपूतों का शासन था। इन दिनों राजा भारमल वहाँ शासन कर रहा था जिसे बिहारीमल भी कहते हैं। भारमल का भतीजा सूजा, मेवात के गवर्नर मुहम्मद शरफुद्दीन हुसैन की सहायता से भारमल को आम्बेर से निकालकर स्वयं राजा बनने का प्रयास कर रहा था।

जनवरी 1562 में जब अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगााह के दर्शन करने के लिए अजमेर जा रहा था तब आम्बेर से थोड़ी दूरी पर भारमल उससे भेंट करने के लिये उपस्थित हुआ। उसने अकबर का अभिनन्दन किया और अपने शत्रुओं के विरुद्ध उससे सहायता की याचना की।

अकबर ने उसके साथ उदारता का व्यवहार किया और उसकी सहायता करने का वचन दिया। भारमल ने इस मैत्री सम्बन्ध को सुदृढ़ बनाने के लिए अपनी पुत्री हीराकंवर का विवाह अकबर के साथ कर दिया।  अकबर ने राजा भारमल के पुत्र भगवानदास (इसे भगवंतदास भी कहते हैं) तथा पौत्र मानसिंह को भी शाही सेवा में रख लिया। इस प्रकार राजपूतों के साथ अकबर के सम्बन्धों की शुरुआत हुई।

अकबर की राजपूतों पर विजय

गोंडवाना विजय

गोंडवाना का राजपूत राज्य आधुनिक मध्य प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित था। वह बड़ा ही सम्पन्न तथा सबल राजपूत राज्य था और बड़े आदर की दृष्टि से देखा जाता था। चौरागढ़ इस राज्य की राजधानी थी। इन दिनों गोंडवाना के सिंहासन पर वीर नारायण नामक एक अल्पवयस्क राजकुमार आसीन था और शासन का संचालन उसकी माता दुर्गावती के हाथों में था जो महोबा के चन्देल राजा की पुत्री थी।

दुगार्वती न केवल रूप-लावण्य में वरन् वीरता तथा साहस में भी अद्वितीय थी। वह युद्ध कला में प्रवीण थी तथा बन्दूक एवं बाण चलाने में दक्ष थी। उसके बारे में कहा जाता था कि यदि वह सुन लेती थी कि कोई शेर दिखाई दिया है तो उसका शिकार किये बिना पानी नहीं पीती थी। उसने अपने पड़ौसी राज्यों को कई बार परास्त किया।

अकबर के राज्य की सीमा, गोंडवाना राज्य की सीमा से मिल गई थी इसलिये गोंडवाना राज्य का मुगल साम्राज्य से संघर्ष होना अनिवार्य हो गया। कड़ा का मुगल सूबेदार आसफखाँ गोंडवाना की सम्पत्ति लूटने के लिये लालायित रहता था। उसने एक विशाल सेना के साथ गोंडवना पर आक्रमण किया। अफगानों ने भी राजपूतों का साथ दिया।

राजपूतों ने तीन बार मुगलों को पीछे धकेला परन्तु दुर्भाग्वश राजा वीर नारायण घायल हो गया और उसे रणक्षेत्र से हटाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। वीर नारायण को रणक्षेत्र में न देखकर उसकी सेना का साहस भंग हो गया और वह भाग खड़ी हुई परन्तु रानी दुर्गावती अपने कुछ सौ स्वामिभक्त सैनिकों के साथ मैदान में डटी रही और निर्भय होकर शत्रुओं का संहार करती रही।

सहसा रानी की दाहिनी कनपटी में एक तीर आकर लगा। रानी ने तीर को निकाल फेंका परन्तु उसकी नोक कनपटी में ही रह गयी। इतने में दूसरा तीर रानी के गले में घुस गया। उसने उसे भी बाहर निकला फेंका परन्तु रानी को मूर्छा आने लगी। रानी को शत्रु के हाथों में पड़ने से बचने की कोई आशा न रही।

इस पर रानी ने अपने मंत्री को अपना वध करने का आदेश दिया परन्तु राजपूत मंत्री को अपनी रानी पर तलवार चलाने का साहस नहीं हुआ। इस पर रानी दुर्गावती ने स्वयं अपनी कटार अपने सीने में भोंक ली। वीर नारायण फिर से रणक्षेत्र में आ डटा परन्तु वह भी मारा गया। राजपूतों ने ‘साका’ किया और हिन्दू ललनाओं ने जौहर का आयोजन किया। चौरागढ़ पर आसफ खाँ का अधिकार हो गया तथा रानी दुर्गावती का कोष भी आसफखाँ के हाथ लग गया। रानी दुगार्वती तथा उसकी शौर्यगाथा भारत के इतिहास में अमर हो गई।

मेवाड़ के विरुद्ध संघर्ष

मेवाड़ के शासकों के साथ मुगलों की शत्रुता मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के समय से चली आ रही थी। बाबर ने राणा सांगा को खनवा के मैदान में परास्त किया था। हुमायूँ ने मेवाड़ की राजमाता कर्णावती द्वारा राखी भिजवाये जाने पर भी उसे सहायता नहीं दी थी।

यद्यपि बहुत से राजपूत राज्यों ने अकबर के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था और मुगल दरबार में उच्च पद प्राप्त कर लिये थे परन्तु मेवाड़ के शासकों ने मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाने का निर्णय लिया। उनका यह निर्णय अकबर की साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध था। मेवाड़ राजपूत राज्यों के लगभग मध्य में स्थित था, इसलिये मेवाड़ के स्वतंत्र रहने से अन्य राजपूत राज्यों को भी स्वतन्त्र रहने के लिये प्रोत्साहन प्राप्त हो रहा था।

इस कारण अकबर को अन्य राजपूत राज्यों पर नियन्त्रण रखने में कठिनाई हो रही थी। अतः अकबर ने चित्तौड़ को परास्त कर अपने अधीन करने का निश्चय किया। 30 अगस्त 1567 को अकबर ने आगरा से मेवाड़ के लिये प्रस्थान किया। मुगल सेनाओं ने राजपूताने में प्रवेश करके शिवपुर, कोटा तथा मण्डलगढ़ के दुर्गों पर अधिकार कर लिया।

अब मुगल सेना चित्तौड़ की ओर बढ़ी और उसका घेरा डाल दिया। चित्तौड़ के सरदारों ने मेवाड़ के राणा उदयसिंह को किसी सुरक्षित स्थान में भेजने का निर्णय लिया। राणा उदयसिंह ने सरदारों के निर्णय को स्वीकार कर लिया और जयमल तथा पत्ता को दुर्ग की सुरक्षा का भार देकर स्वयं उदयगिरि की पहाड़ियों की ओर चला गया।

अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर भयानक प्रहार किया। राजपूतों ने भी उसी दृढ़ता से अकबर की तोपों तथा बंदूकों का जवाब दिया। राजपूतों की ओर से बहुत से अफगान भी दुर्ग की रक्षा करने में संलग्न थे, जो बन्दूक तथा तोप चलाने में दक्ष थे। दुर्ग को लेने में मुगलों के समस्त प्रयत्न निष्फल होते जा रहे थे।

एक दिन अकबर ने बन्दूकचियों के प्रधान इस्माइल खाँ को देख लिया और उस पर बन्दूक से निशाना साधा। गोली इस्माइल खाँ को लगी और वह धरती पर गिरकर मर गया। अकबर के दूसरे निशाने ने जयमल को घायल कर दिया। इस्माइल खाँ के मर जाने और जयमल के घायल हो जाने से राजपूतों का उत्साह भंग हो गया।

अकबर का दबाव बढ़ता ही गया। इस पर हिन्दू ललनाओं ने जौहर का आयोजन किया। राजपूतों ने ‘साका’ करने का निश्चय किया। वे केसरिया बाना धारण कर दुर्ग के द्वार खोलकर बाहर निकल आये। दोनों ओर से तुमुल युद्ध आरम्भ हो गया। जयमल तथा पत्ता ने अपने राजपूत वीरों के साथ शत्रुओं का संहार करना आरम्भ किया।

अंत में वे दोनों ही रणखेत रहे। पत्ता की माता तथा पत्नी ने भी हाथ में तलवार लेकर शत्रु से युद्ध किया और अपने प्राणों को स्वतन्त्रता देवी की वेदी पर अर्पित कर दिया। चित्तौड़ के दुर्ग पर अकबर का अधिकार हो गया और उसका प्रबन्ध आसफखाँ को सौंप दिया गया।

जब अकबर वापस आगरा लौटा तो उसने आगरा के दुर्ग के मुख्य द्वार के दोनों ओर पत्थर के हाथियों पर आसीन जयमल और पत्ता की मूर्तियाँ बनवाकर लगवाईं। चित्तौड़ दुर्ग अकबर के अधिकार में चला गया किंतु मेवाड़ ने अपनी स्वतंत्रता का त्याग नहीं किया। उदयसिंह ने पहाड़ों में उदयपुर नामक नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया और वहीं से मेवाड़ पर शासन करने लगा।

रणथम्भौर विजय

चित्तौड़ विजय के बाद अकबर ने रणथम्भौर के अभेद्य दुर्ग को जीतने का निश्चय किया जो एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित था। इन दिनों रणथम्भौर पर पृथ्वीराज चौहान के वंशज सुर्जन हाड़ा का अधिकार था। अकबर ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया और किले पर भारी गोलीबारी की। सुर्जन हाड़ा ने कई दिनों तक अकबर की विशाल सेना का सामना किया किंतु अंत में विवश होकर अकबर के साथ सम्मानजनक शर्तों पर संधि कर ली और रणथम्भौर का दुर्ग अकबर को समर्पित कर दिया। अकबर ने सुर्जन हाड़ा को गढ़कण्टक का दुर्गपति बना दिया और बनारस तथा चुनार के सूबे भी उसे दे दिए।

कालिंजर विजय

कालिंजर राजपूतों के प्रसिद्ध दुर्गों में से था। अकबर ने मजनूखाँ को इस दुर्ग पर आक्रमण करने भेजा। कालिंजर के दुर्गपति रामचन्द्र ने शत्रु का सामना किया परन्तु जब उसे चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के समर्पण की सूचना मिली तब उसका साहस भंग हो गया और उसने समर्पण कर दिया। अकबर ने रामचन्द्र से कालिंजर का दुर्ग लेकर उसे इलाहाबाद के निकट एक जागीर दे दी।

अन्य राजपूत राज्यों का समर्पण

चित्तौड़, रणथम्भौर तथा कालिंजर के प्रसिद्ध दुर्गों पर अधिकार करके अकबर ने अपनी शक्ति तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि कर ली। उसकी इन विजयों का अन्य राजपूत राज्यों के मनोबल पर बुरा प्रभाव पड़ा। जोधपुर के राजा चन्द्रसेन, बीकानेर के राजा कल्याणमल तथा जैसलमेर के महारावल ने युद्ध किये बिना ही अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने इन राजाओं के साथ अधीनस्थ मित्रता का व्यवहार किया और उन्हें उनके राज्यों में बने रहने दिया।

महाराणा प्रताप से संघर्ष

यद्यपि राणा उदयसिंह के समय में चित्तौड़ पर अकबर का अधिकार हो गया था परन्तु उदयसिंह ने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की थी। वह उदयगिरि की पहाड़ियों में उदयपुर नामक नगर की स्थापना करके स्वतन्त्रतापूर्वक शासन करता रहा। फरवरी 1572 में उदयसिंह का निधन हो गया।

वह अपने पुत्र जगमल को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर गया था किंतु मेवाड़ के सरदारों ने उदयसिंह के बड़े पुत्र प्रतापसिंह को मेवाड़ के सिंहासन पर बैठाया। जगमल असंतुष्ट होकर अकबर की शरण में चला गया। अकबर ने उसे अपनी चाकरी में रख लिया तथा उसे एक जागीर दे दी।

1573 ई. में अकबर ने आम्बेर के राजकुमार कुंवर मानसिंह को महाराणा प्रतापसिंह से समझौता करने के लिए मेवाड़ भेजा। महाराणा ने मानसिंह का स्वागत किया और मानसिंह ने महाराणा को अकबर की ओर से भेजे गये वस्त्र दिये। महाराणा ने उन्हें भी स्वीकार कर लिया किंतु महाराणा अकबर के दरबार में उपस्थित होने के लिये सहमत नहीं हुआ।

इससे मानसिंह विफल होकर लौट गया। सितम्बर 1573 में अकबर ने आम्बेर के राजा भगवानदास को उसी उद्देश्य से उदयपुर भेजा। महाराणा ने राजा भगवानदास का भी सम्मान पूर्वक स्वागत किया। महाराणा ने अपने पुत्र कुंवर अमरसिंह को राजा भगवानदास के साथ अकबर के दरबार में भेज दिया। नवम्बर 1573 में राजा भगवान दास अमरसिंह के साथ फतेहपुर पहुँच गया। थोड़े दिन बाद राजा टोडरमल भी महाराणा के राज्य से होकर गुजरा। उसके साथ भी महाराणा ने अच्छा व्यवहार किया।

यद्यपि राणा तथा अकबर दोनों ही मैत्री-भाव प्रकट कर रहे थे परन्तु अकबर इस बात पर जोर दे रहा था कि महाराणा स्वयं उसका अभिनन्दन करने के लिए उसके दरबार में आये किंतु महाराणा ऐसा करने के लिए तैयार नहीं था। महाराणा चाहता था कि अकबर मेवाड़ के विजित क्षेत्रों को फिर से लौटा दे परन्तु अकबर ऐसा करने के लिए तैयार नहीं था।

महाराणा ने ऐसे कई राजपूत राजाओं तथा अफगानों के साथ मैत्री कर ली जिनसे अकबर की शत्रुता थी इसलिये अकबर को महाराणा की सद्भावना पर अधिक विश्वास नहीं था। जब जोधपुर तथा बूँदी के राजाओं ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया तब अकबर को लगा कि महाराणा प्रताप उनको उपद्रव करने लिए उकसा रहा है। इसलिये उसने महाराणा से युद्ध करने का निश्चय किया।

1576 ई. में अकबर ने कुंवर मानसिंह को पाँच हजार घुड़सवारों के साथ महाराणा पर आक्रमण करने भेजा। मानसिंह मण्डलगढ़ के मार्ग से हल्दीघाटी के पर्वतीय मार्ग के पास आ गया। महाराणा प्रताप भी तीन हजार घुड़सवारों के साथ वहाँ आ डटा। कई अफगान मित्र भी राणा की सेना से आ मिले।

घमासान युद्ध आरम्भ हो गया। राजपूतों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिये। ऐसा लगने लगा कि विजयलक्ष्मी महाराणा प्रताप का आलिंगन करेगी। उसी समय यह सूचना फैला दी गई कि अकबर स्वयं विशाल सेना लेकर आ रहा है। तब राणा प्रताप ने अपनी सेना को पीछे हटा लिया और अरावली की पहाड़ियों में गोगुंदा की ओर चला गया। प्रताप ने पच्चीस वर्षों तक मेवाड़ पर शासन किया। 59 वर्ष की आयु में उसका निधन हो गया।

महाराणा प्रताप के शौर्य तथा त्याग की प्रशंसा करते हुए कर्नल टॉड ने लिखा है- ‘इस प्रकार उस राजपूत के जीवन का अन्त हुआ, जिसकी स्मृति की पूजा आज भी प्रत्येक सिसोदिया करता है और तब तक करता रहेगा जब तक नया अत्याचार देश प्रेम की भावना की अवशिष्ट चिनगारियों को बुझा न देगा। भगवान न करे कि ऐसा दिन आये परन्तु यदि उनके भाग्य में यही बदा है तो कम से कम ब्रिटेन अपने सैन्यबल से ऐसा न करे। अरावली की पहाड़ियों में कोई ऐसा पर्वतीय मार्ग नहीं है, जो प्रताप के किसी वीर कार्य, किसी महान् विजय अथवा विजय से भी अधिक श्लाघनीय पराजय से पवित्र न बना दिया गया हो। हल्दीघाटी मेवाड़ का थर्मापोली और देवेर का रणक्षेत्र उसका मराथान है।’

क्या राणा प्रताप तथा अकबर का संघर्ष दो जातियों का संघर्ष था!

राणा प्रताप तथा अकबर के बीच के भयानक संघर्ष को कुछ इतिहासकारों ने दो जातियों तथा दो धर्मों का संघर्ष बताया है। उनके विचार से महाराणा प्रताप हिन्दू जाति तथा हिन्दू धर्म के गौरव की रक्षा के लिए मुगलों के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे। जबकि कुछ इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते तथा महाराणा पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा की बजाय अपने राज्य की रक्षा के लिये युद्ध किया।

इन इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप अव्यवहारिक तथा अदूरदर्शी थे इसलिये उन्होंने संधि का मार्ग न अपनाकर युद्ध का मार्ग अपनाया। इस मत के समर्थन तथा विरोध में दिये जाने वाले तर्क इस प्रकार से हैं-

महाराणा के समर्थन में दिये जाने वाले तर्क

(1.) निश्चित रूप से महाराणा प्रताप हिन्दू धर्म तथा हिन्दू जाति की रक्षा के लिये लड़ रहे थे न कि अपने राज्य के लिये।

(2.) यदि महाराणा प्रताप चाहते तो वे भी कुंवर मानसिंह तथा राजा भगवानदास के बहकावे में आकर अकबर की अधीनता स्वीकार करके सरलता से चित्तौड़गढ़ का दुर्ग प्राप्त कर सकते थे तथा उदयपुर को अपनी राजधानी बनाये रख सकते थे किंतु हिन्दुआनी आन, बान और शान ने उन्हें झुकने नहीं दिया।

(3.) यदि महाराणा प्रताप अपने राज्य तथा सिसोदिया कुल की राज्य सत्ता की रक्षा के लिये ही लड़ रहे थे तो यह कार्य वे अकबर की अधीनता स्वीकार करके भी बड़ी सरलता से कर सकते थे।

(4.) यदि महाराणा प्रताप एकदम अव्यवहारिक, कल्पनाशील तथा वास्तविकता को नहीं समझने वाले थे तो उन्होंने अकबर द्वारा भेजे गये उपहार क्यों स्वीकार किये? उन्होंने अपने कुंवर को अकबर के दरबार में भेजकर सद्भावना का परिचय क्यों दिया? स्पष्ट है कि महाराणा प्रताप अपनी ओर से अकबर से सद्भावना बनाये रखना चाहते थे। वे अकारण युद्ध खड़ा नहीं करना चाहते थे।

(5.) यदि महाराणा प्रताप अव्यवहारिक व्यक्ति होते तो वे अवश्य ही तलवार के बल पर अपने पूर्वजों के दुर्ग चित्तौड़ को लेने का प्रयास करते किंतु उन्होंने परिस्थितियों की वास्तविकता को समझते हुए, ऐसा करने का कभी भी प्रयास नहीं किया।

(6.) महाराणा ने अकबर पर आक्रमण नहीं किया अपितु अकबर ने ही महाराणा पर आक्रमण करके महाराणा को युद्ध करने के लिये विवश किया।

(7.) यदि महाराणा को हिन्दू धर्म की आन, बान और शान की चिंता नहीं होती तो वे अपने अंतिम दिनों में इस बात को लेकर दुखी क्यों होते कि उनका पुत्र अमरसिंह हिन्दुओं के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा।

(8.) अकबर ने महाराणा पर निरंतर दबाव बनाया कि महाराणा, अकबर के दरबार में उपस्थित होकर उसे मुजरा करें किंतु महाराणा ने हिन्दू धर्म तथा हिन्दू जाति की मर्यादा तथा उसके गौरव की रक्षा के लिये अकबर के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

(9.) यदि महाराणा को हिन्दू धर्म के गौरव की चिंता नहीं होती तो पीथल के एक पत्र लिखने पर ही महाराणा ने अकबर से संधि करने का विचार नहीं त्यागा होता।

(10.) यदि महाराणा हिन्दू धर्म के गौरव की रक्षा के लिये नहीं लड़ रहे होते तो महाराणा के समकालीन तथा बाद के समय में हुए चारणों, भाटों एवं स्थानीय कवियों ने महाराणा प्रताप की युद्ध गाथा को हिन्दू जाति के गौरव की रक्षा से जोड़कर नहीं लिखा होता।

(11.) सिसोदियों का इतिहास बताता है कि वे मुगलों से बराबरी के स्तर पर तो मित्रता कर सकते थे किंतु उनकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। प्रताप से पहले रानी कर्णवती ने भी हुमायूँ को राखी भेजकर मुगलों की तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाया किंतु आम्बेर के राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर मुगलों की सहायता प्राप्त की।

(12.) वर्तमान राजनीतिक वातावरण में अधिकांश इतिहासकारों को हिन्दू धर्म के गौरव से अधिक चिंता स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दिखाने की है। इसलिये वे महाराणा के महान त्याग एवं संघर्ष को तुच्छ राज्य के लिये किया गया संघर्ष बताते हुए नहीं हिचकिचाते।

महाराणा के विरोध में दिये जाने वाले तर्क

(1.) यदि महाराणा प्रताप हिंदू जाति तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिये संघर्ष करते तो महाराणा प्रताप को अफगानों की सहायता प्राप्त नहीं हुई होती।

(2.) ऐसी स्थिति में महाराणा प्रताप अपनी सेना के एक अंग का संचालन हकीम खाँ सूरी को न सौंपते।

(3.) दूसरी तरफ अकबर भी अपनी सम्पूर्ण सेना का संचालन कुंवर मानसिंह को न सौंपता।

(4.) यदि यह हिन्दू जाति, हिन्दू धर्म तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा का युद्ध होता तो अन्य राजपूत राज्य महाराणा के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर अकबर से लड़े होते।

(5.) यह कहना कि समस्त राजपूत कायर हो गये थे और उनका इतना अधिक नैतिक पतन हो गया था कि वे अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए अपनी स्वतन्त्रता, अपने धर्म तथा मान-सम्मान को मुगलों के हाथ बेच देने के लिए उद्यत हो गये थे, किसी भी प्रकार स्वीकार्य नहीं है।

(6.) वास्तविकता तो यह थी कि राणा प्रताप मेवाड़ राज्य तथा सिसोदिया वंश की राज्य सत्ता की रक्षा के लिये लड़ रहे थे। इसी कारण इस युद्ध से अन्य राजपूत राज्यों को विशेष उत्तेजना नहीं मिली।

(7.) राजपूताना के राजपूत राज्यों को मेवाड़ की साम्राज्यवादी नीति का अनुभव हो चुका था और मेवाड़़ के प्रतापी राजाओं ने उनके साथ जो व्यवहार किया था उनमें मेवाड़ के प्रति पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था। अब वे मेवाड़ के नेतृत्व में संगठित होने के लिए तैयार नहीं थे।

(8.) अकबर भी जातीयता अथवा धार्मिक भावना से प्रेरित होकर महाराणा से युद्ध नहीं कर रहा था। मेवाड़ पर आक्रमण उसकी साम्राज्यवादी नीति का एक अंग था। यदि मेवाड़ गैर हिन्दू राज्य होता तो भी अकबर उस पर उसी प्रकार आक्रमण करता, जिस प्रकार उसने अन्य हिन्दू अथवा मुसलमान राज्यों पर किया था। अकबर ने विशुद्ध राजनीतिक उद्देशय से मेवाड़ पर आक्रमण किया था।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि महाराणा प्रताप एक आदर्शवादी राजा थे। वे प्राचीन क्षत्रियों के आदर्श पर चलते हुए हिन्दू जाति तथा धर्म के गौरव को बनाये रखने के लिये जीवन भर संघर्ष करते रहे तथा उन्होंने राज्य को पाने के लिये अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

उन्होंने अफगानों की सहायता केवल इसलिये स्वीकार की क्योंकि अफगान, मुगलों के सबसे बड़े शत्रु थे। यह भी स्पष्ट है कि महाराणा का हिन्दुत्व काल्पनिकता तथा कोरी भावुकता से प्रेरित नहीं था जिसमें हाकिम खाँ सूरी जैसे अफगान तोपचियों की सेवा लेने का भी साहस नहीं हो।

हिन्दू जाति तथा हिन्दू गौरव की रक्षा का अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि महाराणा के लिये अफगान मित्र भी अस्पर्श्य हो जाते। महाराणा पर थोथे आदर्श, काल्पनिकता तथा कोरी भावुकता का आरोप तभी लग सकता था जब वे मुगलों के साथ-साथ अफगानों को भी अपना शत्रु बना लेते।

जब अकबर राजपूतों की तलवार से राजपूतों को मार सकता था तो महाराणा भी अफगानों की तोपों से मुगलों को मार सकते थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि अकबर मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिये लड़ रहा था तथा महाराणा प्रताप हिन्दू गौरव की रक्षा के लिये लड़ रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर की शासन व्यवस्था

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अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर की शासन व्यवस्था त्रिस्तरीय थी जिसमें सर्वोच्च स्तर पर केन्द्रीय शासन, मध्यम स्तर पर प्रांतीय शासन तथा निम्नतम स्तर पर स्थानीय शासन था।

अकबर की शासन व्यवस्था

केन्द्रीय शासन

अकबर का केन्द्रीय शासन पूर्ण रूप से स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश राजतंत्र पद्धति पर आधारित था। इस केन्द्रीय शासन का कार्य न केवल राजधानी में रहने वाली प्रजा पर नियंत्रण रखना था अपितु प्रांतों अथवा सूबों एवं उससे भी नीचे गांवों में रहने वाली प्रजा पर भी नियंत्रण रखने हेतु शासन तंत्र का निर्माण करना था।

केन्द्रीय शासन के अंग

(1.) बादशाह

बादशाह शासन का सर्वोच्च प्रधान था। उसकी सर्वोच्चता चुनौती रहित थी। राज्य की समस्त शक्तियाँ उसमें निहित थीं। वही नियमों का निर्माण करता था तथा उनका पालन करवाता था। वह नियम भंग करने वालों को दण्ड देता था। बादशाह ही समस्त सेनाओं का सर्वोच्च प्रधान था।

वह सेनापतियों को नियुक्त करता था तथा उन्हें युद्ध अभियानों पर भेजता था। वह समस्त अधिकारों तथा नियमों का स्रोत था। वह स्वयं को दैवी शक्ति से सम्पन्न समझता था और अपनी प्रजा के कल्याणार्थ प्रतिदिन झरोखे से दर्शन देता था। यद्यपि अकबर का शासन विशुद्ध स्वेच्छाचारी शासन था।

उस पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं था परन्तु लोक मंगलकारी होने के कारण उसे उदार एवं निरंकुश शासन कह सकते हैं। अकबर अपनी प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि समझता था और उसे सुखी बनाने का प्रयास करता था।

(2.) विभागीय व्यवस्था

अकबर का शासन पूर्णरूप से केन्द्रीभूत नौकरशाही पर आधारित था जिसका वह स्वयं प्रधान था। शासन की सुविधा के लिए उसने अलग-अलग विभागों की स्थापना की। राज्य के विभिन्न कार्यों को उसने विभिन्न विभागों में विभक्त किया और प्रत्येक विभाग के कार्य की देखभाल के लिए अलग-अलग योग्य अधिकारी नियुक्त किये। प्रत्येक विभाग का अलग अध्यक्ष था जो उसके कार्यों को ढंग से चलाने के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी था। समस्त उच्च अधिकारियों की नियुक्त बादशाह करता था और वे सीधे बादशाह के प्रति उत्तरदायी होते थे।

स्मिथ के शब्दों में- ‘उसके मंत्री उसके शिष्य थे, उसके गुरु नहीं थे।’

(3.) केन्द्रीय पदाधिकारी

अकबर के केन्द्रीय पदाधिकारी उसके शासन की रीढ़ थे। वे विभागीय व्यवस्था के भी अध्यक्ष थे जो अगल-अलग विभाग का कार्य देखते थे।

वकील

साम्राज्य में बादशाह के बाद सबसे ऊँचा पद वकील का होता था जो प्रधानमंत्री की तरह कार्य करता था। वकील किसी विभाग विशेष का प्रधान नहीं होता था किंतु वह शासन के प्रत्येक अंग में बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में काम करता था और समस्त विभागों के काम-काज की देखभाल करता था। प्रान्तीय सरकारें सीधे उसी के नियन्त्रण में काम करती थीं।

दीवान

वकील के नीचे दीवान होता था। वह राजकोष विभाग का अध्यक्ष होता था। वह साम्राज्य के आय-व्यय का हिसाब रखता था और राजकोष की सुदृढ़ता के लिये उत्तरदायी होता था।

खान-ए-समान

राजपरिवार के व्यय का हिसाब रखने के लिए नियुक्त अधिकारी ‘खान-ए-समान’ कहलाता था। वह शाही गोदाम का प्रबन्धक होता था और राजपरिवार की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था करता था।

बख्शी

सैन्य विभाग का अध्यक्ष बख्शी कहलाता था। बख्शी अरबी भाषा के ‘बख्शीदन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है बाँटना। चूँकि इस अधिकारी का प्रधान कार्य सैनिकों को वेतन बाँटना होता था इसलिये वह बख्शी कहलाता था। सैनिकों का वेतन निश्चित करना तथा उन्हें अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित करना भी उसका कर्त्तव्य था।

सद्र-ए-सुदूर

दान विभाग का अध्यक्ष सद्र-ए-सुदूर कहलाता था। सुदूर सद्र का बहुवचन है। जो पदाधिकारी सद्रों का प्रधान होता था वह सद्र-ए-सुदूर कहलाता था। बादशाह, शहजादे तथा राज-परिवार के अन्य लोग बहुत-सा धन तथा भूमि दान दिया करते थे। इन सबका प्रबन्ध ‘सद्र-ए-सुदूर’ करता था।

मुह्तसिब

मुहत्सिब उस पदाधिकारी को कहते थे जो प्रजा के आचरण तथा आचार व्यवहार का ध्यान रखता था। इस विभाग के माध्यम से अकबर ने प्रजा के नैतिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया।

मीर-आतिश

तोपेखाने के विभाग का अध्यक्ष मीर-आतिश होता था। मीर का अर्थ होता है प्रधान और आतिश का अर्थ होता है आग। चूँकि तोपों से आग की वर्षा की जाती थी इसलिये तोपखाने के अध्यक्ष को मीर-आतिश कहते थे। उसे तोपखाने की सम्पूर्ण व्यवस्था करनी पड़ती थी।

काजी-उल-कुजात

न्याय-विभाग का अध्यक्ष काजी-उल-कुजात कहलाता था जिसका अर्थ होता है काजियों का काजी। कुजात काजी का बहुवचन है जिसका अर्थ होता है न्यायाधीश। काजी-उल-कुजात का प्रधान कर्त्तव्य न्याय की समुचित व्यवस्था करना था। स्थानीय काजियों की नियुक्त भी वही करता था।

दारोगा-ए-डाक चौकी

डाक विभाग का अध्यक्ष दारोगा-ए-डाक चौकी कहलाता था। उसका प्रधान कार्य डाक भेजना तथा प्राप्त करना होता था। वह साम्राज्य के विभिन्न भागों में होने वाली घटनाओं की सूचना रखता था।

अन्य अधिकारी

राज्य की टकसालों तथा विभिन्न प्रकार के कारखानों की देखभाल के लिए भी अलग-अलग दारोगा होते थे।

प्रान्तीय शासन

केन्द्रीय राजधानी आगरा तथा फतहपुर सीकरी से अकबर के विशाल साम्राज्य का संचालन सम्भव नहीं था। इसलिये अकबर ने अपने साम्राज्य को 18 सूबों में विभक्त किया- (1.) काबुल, (2.) मुल्तान, (3.) लाहौर, (4.) दिल्ली, (5.) आगरा, (6.) इलाहाबाद, (7.) अवध, (8.) बिहार, (9.) बंगाल, (10.) अजमेर, (11.) मालवा, (12.) गुजरात, (13.) खानदेश, (14.) बरार, (15.) अहमदनगर, (16.) उड़ीसा, (17.) काश्मीर तथा (18.) सिन्ध। कुछ इतिहास लेखकों ने केवल 15 सूबों का उल्लेख किया है। प्रान्तीय शासन केन्द्रीय शासन का लघु प्रतिरूप था।

प्रांतीय शासन के अंग

(1.) सूबेदार

प्रान्तीय शासन का प्रधान सूबेदार या सिपहसालार कहलाता था। वह प्रान्त में बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में शासन करता था। उसकी नियुक्त बादशाह करता था और वही उसे हटाता अथवा बदलता भी था। सूबेदार को बादशाह के आदेशों के अनुसार काम करना पड़ता था। बादशाह प्रत्येक सूबेदार पर कड़ा नियन्त्रण रखता था।

सूबेदार सूबे में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी था। इसलिये सूबेदार प्रांतीय सेना का सेनापति होता था। सूबेदार किसी विदेशी राजा अथवा राजकुमार के साथ सन्धि अथवा विग्रह नहीं कर सकता था। वह प्रांतीय क्षेत्र में न्यायाधीश का कार्य करता था परन्तु वह किसी को प्राणदण्ड नहीं दे सकता था।

(2.) दीवान

प्रान्त का दूसरा प्रधान अधिकारी दीवान था। वह सूबेदार के समकक्ष होता था। उसकी भी नियुक्त भी बादशाह करता था। वह सूबेदार से बिल्कुल स्वतंत्र रहकर सीधे बादशाह के नियन्त्रण में काम करता था। वास्तव में सूबेदार तथा दीवान एक दूसरे के कामों पर दृष्टि रखते थे जिससे विद्रोह की सम्भावना कम रहती थी।

दीवान का प्रधान कार्य प्रान्त के आय-व्यय का हिसाब रखना और अर्थ सम्बन्धी समस्त विषयों का निरीक्षण करना एवं नियन्त्रण रखना था। भूमि तथा लगान सम्बन्धी विवादों का फैसला दीवान ही करता था। वह कृषि में वृद्धि का प्रयत्न करता था।

(3.) सुद्र

‘सुद्र’ की नियुक्त केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती थी। सुद्र का प्रधान कार्य दान विभाग का प्रबन्ध करना होता था। विद्वानों, सन्तों, फकीरों, दीन दुखियों, असहायों आदि की सहायता के लिए राज्य की ओर से भूमि तथा धन दान में दिया जाता था। इसकी व्यवस्था सुद्र करता था। इस पद पर उच्चकोटि के विद्वान तथा पवित्र आचरण के लोग नियुक्त किये जाते थे।

(4.) आमिल

आमिल का अर्थ होता है अमल में लाने वाला। उसका प्रधान कार्य मालगुजारी वसूल करना होता था। इसलिये उसे कारकून, मुकद्दम तथा पटवारी के कागजों का निरीक्षण करना पड़ता था। प्रान्त में शान्ति तथा सुव्यवस्था करने में भी उसे सहयोग देना पड़ता था। आमिल अन्य कई प्रकार के कार्य करता था।

(5.) वितिक्ची

वितिक्ची आमिल का समकक्षी था। हिसाब-किताब में निपुण तथा लेखन कला में प्रवीण व्यक्ति इस पद पर नियुक्त होते थे। वितिक्ची प्रत्येक ऋतु की लगान का हिसाब रखता था और केन्द्रीय सरकार को वार्षिक लगान का हिसाब भेजता था।

(6.) पोतदार

पोत का अर्थ होता है लगान और दार का अर्थ होता है वाला। अतः पोतदार उस अधिकारी को कहते थे जो किसानों से लगान प्राप्त करता और सरकारी कोष को सुरक्षित रखता था।

(7.) फौजदार

सूबेदार के नीचे प्रान्त का सबसे बड़ा सैनिक अफसर फौजदार कहलाता था। उसकी नियुक्त सूबेदार करता था। प्रत्येक प्र्रान्त में कई फौजदार होते थे। इनका मुख्य कार्य प्रान्त में शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखना होता था। फौजदार, सूबेदार को प्रत्येक कार्य में सहायता देता था।

(8.) कोतवाल

प्रान्तीय नगरों में कोतवाल लोग शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए नियुक्त किये जाते थे। कोतवाल नगर का सबसे बड़ा पुलिस अफसर होता था। चोरी तथा डाके को रोकना, अपराधों का पता लगाना और बाजार में नाप-तौल का निरीक्षण करना उसके मुख्य कार्य थे।

(9.) सूचना तंत्र

राजकीय सूचनाएँ लाने-ले जाने के लिए सूचना वाहक नियुक्त किये जाते थे। वे चार भागों में विभक्त थे- (1.) वाक-ए-नवीस, (2.) सवानह-निगार, (3.) खुफिया नवीस तथा (4.) हरकारह।

नवीस का अर्थ होता है लिखनेवाला। वाक-ए-नवीस प्रान्त की समस्त बातों की सूचना रखता था और उसे केन्द्रीय सरकार के पास भेज देता था। सवानह-निगार का अर्थ होता है वाकयात या घटनाएँ और निगार का अर्थ होता है लेखक। सवानह-निगार का कर्त्तव्य सच्ची बातों का पता लगाकर वाक-ए-नवीस के पास भेजना होता था।

खुफिया नवीस प्रान्त का गुप्तचर होता था और वह गुप्त रूप से बातों का पता लगाता था। हरकारह एक स्थान से दूसरे स्थान की सूचनाएँ ले जाता था। ये चारों प्रकार के सूचना वाहक एक दरोगा के नियन्त्रण में काम करते थे।

(10.) लगान वसूलने वाले कर्मचारी

लगान वसूल करने के लिए कई कर्मचारी होते थे। करोड़ी लगान वसूल करके पोतदार के पास भेजता था। अमीन लगान निश्चित करता था। अमीन का अर्थ होता है अमानत अर्थात् धरोहर रखने वाला। यह विश्वसनीय कर्मचारी होता था। कानूनगो परगना अफसर होता था। गो का अर्थ होता है कहने वाला। कानूनगो भूमि सम्बन्धी कानूनों तथा नियमों को जानता था। वह भूमि तथा लगान के ब्यौरे का रजिस्टर रखता था। गाँवों में पटवारी तथा मुकद्दम होते थे। मुकद्दम कदम शब्द से बना है जिसका अर्थ है आगे चलने वाला या मुखिया।

स्थानीय शासन

सबसे निचले अर्थात् तीसरे स्तर पर स्थानीय शासन होता था। इसमें जिला प्रशासन से लेकर परगना प्रशासन तथा ग्राम प्रशासन की इकाइयाँ होती थीं। इन तीनों इकाइयों के विभिन्न अंग होते थे-

(1.) सरकार या जिला

शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक सूबे को कई ‘सरकारों’ या जिलों में विभक्त किया गया था। सरकार का सबसे बड़ा हाकिम फौजदार होता था। कोतवाल, वितिक्ची तथा पोतदार जिले के अन्य पदाधिकारी होते थे।

(2.) महाल या परगना

प्रत्येक सरकार या जिला कई महाल या परगनों में विभक्त रहता था। परगने का प्रबन्ध शिकदार, आमिल तथा कानूनगो के हाथ में रहता था।

(3.) गाँव

प्रत्येक महाल या परगने में कई गाँव होते थे। गाँव, शासन की सबसे छोटी इकाई थे। गाँव का प्रधान अधिकारी मुकद्दम कहलाता था। यह गाँव का प्रधान या मुखिया होता था और लगान वसूल करने तथा शान्ति एवं सुव्यवस्था बनाये रखनें में सरकारी कर्मचारियों की सहायता करता था। गाँव का दूसरा मुख्य कर्मचारी पटवारी था जो भूमि एवं लगान आदि का रजिस्टर रखता था।

करों में कमी

अकबर ने प्रजा पर से अनेक करों को समाप्त कर दिया। उसने हिन्दू प्रजा पर से जजिया, जकात तथा तीर्थयात्रा करों को समाप्त कर दिया। आम प्रजा से वृक्ष-कर, बाजार-कर, गृह-कर तथा ऐसे ही अनेक अन्य करों को भी समाप्त कर दिया। बादशाह ने कोतवालों तथा अमल-गुजारों को आदेश दिया कि वे नियमों का ठीक से पालन करायें और भ्रष्ट कर्मचारियों को कठोर दण्ड दें।

अकाल अथवा अन्य दैवी प्रकोप होने पर किसानों के लगान में कमी की जाती थी। निर्धन किसानों की धन से भी सहायता की जाती थी जिससे वे बीज, पशु तथा औजार आदि खरीद कर सकेें। इन सुधारों से किसानों की दशा में सुधार हुआ।

मोरलैण्ड ने लिखा है- ‘यदि उस समय के स्तर से मूल्यांकन किया जाय तो आर्थिक दृष्टिकोण से अकबर का शासन श्लाघनीय था क्योंकि उसके कोष में सदैव वृद्धि होती गई और जब उसने पंचत्व प्र्राप्त किया तब वह संसार का सर्वाधिक समृद्ध शासक था।’

अकबर के न्याय सुधार

अकबर की न्याय व्यवस्था में बादशाह सबसे बड़ा न्यायाधीश था। मुकदमों की अन्तिम अपीलें उसी के पास जाती थीं। उसके नीचे काजी-उल-कुजात अर्थात् प्रधान काजी होता था। काजी-उल-कुजात के नीचे अनेक काजी होते थे। प्रत्येक न्यायालय में तीन पदाधिकारी होते थे- काजी, मुफ्ती तथा मीर अदल।

काजी मामले की जाँच करता था, मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था और मीर अदल फैसला सुनाता था। न्याया का कोई निश्चित विधान नहीं था। मुसलमानों के विवादों का निर्णय कुरान के नियमों के अनुसार होता था। हिन्दुओं के मामलों में उनके रीति-रिवाजों का ध्यान रखा जाता था। दण्ड-विधान बड़ा कठोर था। राजद्रोह तथा हत्या करने वालों को प्राण-दण्ड दिया जाता था। अंग-भंग करने का भी प्रावधान था। छोटे-छोटे अपराधों के लिये भी बड़े जुर्माने किये जाते थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अकबर की शासन व्यवस्था पर्याप्त सुदढ़ थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

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