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आर्य समाज

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आर्य समाज

महर्षि दयानंद ने हिन्दू धर्म, सभ्यता और भाषा के प्रचार के लिए 10 अप्रेल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखा।

स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

यद्यपि ब्रह्म समाज ने धर्म एवं समाज सुधार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया तथापि ब्रह्म समाज ने पाश्चात्य सभ्यता और ईसाई धर्म से प्रभावित होकर हिन्दू धर्म और समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। उसने ईसाई धर्म को समान स्थान प्रदान किया तथा हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित नहीं की।

इसलिये बहुत से हिन्दू ब्रह्म समाज के प्रति आकर्षित नहीं हो सके। हिन्दू धर्म एवं समाज को एक ऐसे उग्र आन्दोलन की आवश्यकता थी जो हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास रखे। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने इस आवश्यकता की पूर्ति की। आर्य समाज आन्दोलन कई प्रकार से, ब्रह्म समाज से कई अर्थों में भिन्न था।

दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के टंकारा परगने के शिवपुर ग्राम में सम्पन्न एवं रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। जब वे 14 वर्ष के थे, तब एक बार शिवरात्रि के पर्व पर अपने पिता के साथ शिव मन्दिर गये। वहाँ उन्होंने एक चूहे को शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खाते देखा तो उनका मूर्तिपूजा से विश्वास उठ गया।

जब वे 21 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने उनके विवाह का प्रबन्ध किया। इस पर 1845 ई. में वे आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, घर छोड़कर चल दिये। 15 वर्षों तक वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहे तथा अध्ययन करते रहे। 1860 ई. में वे मथुरा पहुँचे जहाँ उन्होंने दण्डी स्वामी विरजानन्द के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया।

स्वामी विरजानन्द वैदिक ज्ञान, भाषा एवं दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने दयानन्द को वेदों में निहित ज्ञान की व्याख्या समझाई। इस अध्ययन से दयानन्द को विश्वास हो गया कि वेद ही समस्त ज्ञान के स्त्रोत हैं। स्वामी विरजानन्द ने उन्हें पौराणिक हिन्दू धर्म की कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन कर देश में वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनः स्थापना करने का आदेश दिया। स्वामी दयानन्द जीवन भर यह कार्य करते रहे।

वे पाश्चात्य सभ्यता व ईसाई धर्म से अप्रभावित थे। उनका उद्देश्य हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करना तथा हिन्दू धर्म की बुराइयों को दूर करना था। वे अपने उपदेशों में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। केशवचन्द्र सेन के परामर्श से उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से जन-साधारण को उपदेश देना प्रारम्भ किया।

उन्होंने 1863 ई. में आगरा से धर्म-प्रचार का कार्य आरम्भ किया। 1874 ई. में उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। वाराणसी में कर्मकाण्डी पण्डितों से हुए शास्त्रार्थ में उन्होंने प्रमाणित किया कि वेद ही समस्त ज्ञान के आधार हैं तथा मूर्तिपूजा वेदों की शिक्षा के प्रतिकूल है।

 आर्य समाज की स्थापना

महर्षि दयानंद ने हिन्दू धर्म, सभ्यता और भाषा के प्रचार के लिए 10 अप्रेल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उसके बाद स्वामीजी दिल्ली गये जहाँ उन्होंने ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलाई। दो दिन के विचार-विमर्श के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली से स्वामीजी पंजाब गये।

यहाँ जन-साधारण में उनके प्रति बड़ा उत्साह जागृत हुआ। जून 1877 में लाहौर में आर्य समाज की एक शाखा खोली गई तथा इस आन्दोलन का प्रमुख कार्यालय लाहौर ही बन गया। इसके पश्चात् स्वामीजी भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने विचारों का प्रचार करते रहे तथा आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित करते रहे।

स्वामीजी द्वारा लिखित ग्रंथ

अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्वामीजी ने तीन ग्रन्थ लिखे-

(1.) ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका

इस ग्रन्थ में स्वामीजी ने वेदों के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।

(2.) वेदभाष्य

इस ग्रन्थ में उन्होंने यजुर्वेद और ऋग्वेद की टीकाएं लिखीं।

(3.) सत्यार्थ प्रकाश

स्वामीजी का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने समस्त धर्मों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह प्रमाणित किया कि वैदिक धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने इस ग्रन्थ में पौराणिक हिन्दू धर्म की कुरीतियों का खण्डन जिस निर्भयता से किया, उसी ढंग से इस्लाम तथा ईसाइयत के ढोंग, आडम्बर तथा अन्धविश्वासों की तीव्र आलोचना की।

इससे हिन्दू जनता को यह जानकर सन्तोष हुआ कि पौराणिकता के मामले में ईसाइयत और इस्लाम भी हिन्दुत्व से अच्छे नहीं हैं। इस कारण हिन्दुओं का ध्यान अपने धर्म के मूल स्वरूप की ओर आकृष्ट हुआ और वे अपनी प्राचीन परम्परा के लिए गौरव का अनुभव करने लगे।

ईसाइयत की श्रेष्ठता की जो भावना बल पकड़ रही थी, स्वामीजी ने उस पर रोक लगा दी। स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में अवतारवाद, तीर्थ-यात्रा, श्राद्ध, व्रत, अनुष्ठान आदि पौराणिक बातों का युक्ति पूर्वक खण्डन किया। उन्होंने प्रत्येक आर्य के लिए, वेदों में निर्दिष्ट यज्ञ तथा संध्या करना आश्वश्यक बताया तथा छुआछूत को अवैदिक बताया।

स्वामीजी ने सहस्रों अन्त्यजों को यज्ञोपवीत देकर उन्हें आर्य समाज में आदर दिलवाया। स्वामीजी ने बाल-विवाह, बहु विवाह तथा पर्दा-प्रथा का खण्डन किया, स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया तथा अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन किया।

दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष राजपूताने में व्यतीत हुए। अनेक राजाओं  तथा जागीदारों ने उनकी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने राज्यों एवं जागीरों में उनके उपदेश करवाये। उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह ने उनसे मनुस्मृति, राजनीति तथा राजधर्म की शिक्षा ग्रहण की।

1881 ई. में उदयपुर राज्य की बनेड़ा जागीर के जागीदार राजा गोविन्दसिंह के निमन्त्रण पर स्वामीजी बनेड़ा गये जहाँ वे सोलह दिन रहे। इस दौरान स्वामीजी ने राजा गोविन्दसिंह के दोनो पुत्रों- अक्षयसिंह और रामसिंह को सस्वर वेद पाठ करना सिखाया। इसके बाद स्वामीजी चितौड़गढ़ चले गये।

अक्टूबर 1883 में स्वामीजी जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह के निमंत्रण पर जोधपुर पहुंचे। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह ने स्वामीजी का भव्य स्वागत किया। जोधपुर राज्य में स्वामीजी के भाषणों की धूम मच गई। राजा जसवंतसिंह ने राईकाबाग महल में बैठकर स्वामीजी के उपदेश सुने।

उनके उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की वास्तविक उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये और राज्य की अदालतों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी काम में लाई जाने लगी।

स्वामी दयानंद सरस्वती का निधन

राजा जसवंतसिंह ने स्वामीजी को दुर्ग में पधारने का निमंत्रण दिया तथा उन्हें अपने महल में लाने के लिये रत्न जड़ित पालकी भेजी। स्वामीजी ने पालकी लौटा दी और एक दिन बिना कोई सूचना दिये पैदल ही दुर्ग पहुंचे। स्वामीजी दुर्ग पहुंचे तो विचित्र दृश्य देखकर आश्चर्य से खड़े रह गये।

उन्होंने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और राज्य की प्रसिद्ध वेश्या नन्ही बाई की पालकी को कन्धे पर उठाये महल से बाहर आ रहा है। जब राजा की दृष्टि स्वामीजी की आंखों से टकराई तो स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये।

स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही बाई के हाथ लग गया। उसने 29 सितम्बर 1883 को स्वामीजी के दूध में पिसा हुआ काँच एवं विष मिला दिया। स्वामीजी को तुरंत अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को दीपावली के दिन उनका निधन हो गया।

स्वामीजी की मृत्यु पर रूस निवासी मैडम ब्लेवटास्की ने लिखा- ‘यह बिल्कुल सही बात है कि शंकराचार्य के बाद भारत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जो स्वामीजी से बड़ा संस्कृतज्ञ, उनसे बड़ा दार्शनिक, उनसे अधिक तेजस्वी व्यक्ति तथा कुरीतियों पर टूट पड़ने में उनसे अधिक निर्भीक रहा हो।’

स्वामीजी की मृत्यु के बाद थियोसोफिस्ट अखबार ने उनकी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए लिखा- ‘उन्होंने जर्जर हिन्दुत्व के गतिहीन जनसमूह पर भारी प्रहार किया और अपने भाषणों से लोगों के हृदय में ऋषियों और वेदों के लिए अपरिमित उत्साह की आग जला दी। सारे भारतवर्ष में उनके समान हिन्दी और संस्कृत का वक्ता दूसरा कोई और नहीं था।’

आर्य समाज के नियम

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के मौलिक सिद्धान्तों का परिचय उनके महान् ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में मिलता है। इस ग्रन्थ के आधार पर आर्य समाज के निम्नलिखित दस नियम हैं-

(1.) ईश्वर एक है तथा निराकार है। वह सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर, अमर, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। अतः उसकी उपासना करने योग्य है।

(2.) वेद ही सच्चे ज्ञान के स्त्रोत हैं। अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना समस्त आर्यों का परम धर्म है।

(3.) प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिये।

(4.) समस्त कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये।

(5.) संसार का उपकार करना, अर्थात् सबकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना मानव समाज का मुख्य कर्त्तव्य है।

(6.) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये। अपितु सब लोगों की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

(7.) समस्त ज्ञान का निमित्त कारण और उसके माध्यम से समस्त बोध ईश्वर है।

(8.) प्रत्येक व्यक्ति को अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

(9.) समस्त लोगों से धर्मानुसार, प्रीतिपूर्वक एवं यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।

(10.) व्यक्तिगत हितकारी विषयों में प्रत्येक व्यक्ति को आचरण की स्वतन्त्रता है परन्तु सामाजिक भलाई से सम्बन्धित विषयों में सब मतभेदों को भुला देना चाहिए।

आर्य समाज के सामाजिक सुधार

(1.) जाति प्रथा का विरोध

भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था से प्रसूत जाति प्रथा, शताब्दियों से प्रचलित थी। इस प्रथा ने सदियों तक हिन्दू धर्म की रक्षा की किंतु मुसलमानों के आने के बाद इसने जो संकुचित स्वरूप ग्रहण किया उससे हिन्दू समाज संकीर्ण होता चला गया। इस कारण हिन्दुओं की सामाजिक एकता भंग हो गई।

स्वामी दयानन्द ने जाति प्रथा की कटु आलोचना की। उनके अनुसार समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर उच्च स्थान पर पहुंचने से वंचित नहीं किया जाना चाहिये। उन्होंने छुआछूत तथा समुद्र-यात्रा-निषेध के विरुद्ध आवाज उठाई तथा प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को उचित ठहराते हुए जाति-प्रथा का विरोध किया।

(2.) स्त्रियों की दशा में सुधार

बहु-विवाह, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा, सती प्रथा तथा कन्या-वध जैसी कुरीतियों के कारण हिन्दू समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। आर्य समाज ने स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान दिलाने तथा स्त्री-शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया। आर्य समाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया तथा विधवा-विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया।

ऋषि दयानंद ने 16 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह बन्द करने का आह्वान किया, सती-प्रथा को पाप बताया और स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया। स्वामी दयानन्द ने कहा कि स्त्रियों को वेदों का अध्ययन करने तथा यज्ञोपवीत धारण का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को।

(3.) शुद्धि आंदोलन

आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन को जन्म दिया। हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई एवं मुसलमान हो चुके लोगों को शुद्धि संस्कार के द्वारा पुनः हिन्दू धर्म में स्वीकार किया जाने लगा। आर्य समाज के प्रयत्नों से लाखों हिन्दुओं को जो मुसलमान और ईसाई बन गये थे, शुद्ध करके पुनः हिन्दू धर्म में बुला लिया गया। वे आज भी हिन्दू समाज में सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। आर्य समाज ने हिन्दू समाज के सुप्त आत्म गौरव, संगठन की भावना एवं शुद्ध धार्मिक संस्कारों को फिर से जगाया।

आर्य समाज के धार्मिक सुधार

(1.) अंधविश्वासों का विरोध

स्वामी दयानन्द ने पौराणिक रूढ़ियों एवं मान्यताओं की निन्दा की। उन्होंने मूर्ति-पूजा, कर्मकाण्ड, अनेकेश्वरवाद, अवतारवाद, बलि-प्रथा, स्वर्ग और नरक तथा भाग्य के सर्वोपरि होने में विश्वास रखने का विरोध किया।

(2.) श्राद्ध एवं पाखण्ड का विरोध

आर्य समाज ने मृतकों के श्राद्ध का विरोध किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों अथवा अन्य लोगों को भोजन खिलाकर अथवा दान देकर मृतक व्यक्तियों को परलोक में सब कुछ पहुँचाने की कल्पना मूर्खतापूर्ण है। स्वामी दयानन्द किसी धर्म से घृणा नहीं करते थे किन्तु पाखण्ड, ढोंग, असत्य, दम्भ और आडम्बर का जमकर विरोध करते थे।

(3.) वेदों के महत्त्व की पुनर्स्थापना

दयानंद ने वेदों की व्याख्या इस प्रकार की जिससे वेद वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सिद्धान्तों के स्रोत माने जा सकें। आर्य समाज का दृढ़ विश्वास था कि कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है, जो वेदों से नहीं लिया जा सकता। हमें इस्लाम, ईसाई धर्म तथा पाश्चात्य सभ्यता की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। वेदोें की श्रेष्ठता के आधार पर आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को इस्लाम और ईसाई धर्म के आक्रमणों से बचाने में सफलता प्राप्त की।

(4.) वैदिक कर्मों का प्रचार

आर्य समाज ने वेदों के आधार पर यज्ञ-हवन, मन्त्रोच्चारण, कर्म आदि पर बल दिया। उनका मानना था कि ईश्वर निराकार है, अतः मूर्ति-पूजा निरर्थक है। उन्होंने हिन्दुओं की मोक्ष सम्बन्धी अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि ईश्वर की उपासना, अच्छे कर्म और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

आर्य समाज के साहित्यिक एवं शैक्षणिक सुधार

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज ने साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थ हिन्दी में लिखकर राष्ट्र-भाषा के विकास में योगदान दिया। उन्होंने संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसके अध्ययन और अध्यापन पर बल दिया।

आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता को दूर करके ज्ञान का प्रसार करना था। अतः उसने प्राचीन आश्रम व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उसने शिक्षा की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को प्रचलित किया, जहाँ विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विद्या-अध्ययन कर सकें। सर्वप्रथम आर्य समाज ने ही भारतीयों को मैकाले की शिक्षा पद्धति के दोषों से अवगत कराया। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देकर उन्होंने सही अर्थों में देश के शैक्षिक विकास की नींव रखी।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्य समाजियों में कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण 1892 ई. में इसमें दो दल बन गये। यह मतभेद इस मौलिक सिद्धान्त को लेकर आरम्भ हुआ कि क्या एक आर्य समाजी के लिए केवल दस नियमों का पालन करना ही आवश्यक है।

आर्य समाज के इन दो दलों में एक दल के नेता लाला हंसराज थे जो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयत्नों से स्थान-स्थान पर डी.ए.वी. स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गए। ये शिक्षण-संस्थाएँ सरकारी पद्धति से सम्बद्ध थीं। दूसरे दल के नेता महात्मा मुन्शीराम थे जो भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति को पुनः प्रचलित करना चाहते थे।

अतः दूसरे दल ने गुरुकुल संस्थाएँ स्थापित कीं। ये शिक्षण संस्थाएँ हिन्दू धर्म और संस्कृति तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों के प्रचार में सहायक सिद्ध हुईं। भारतीय ज्ञान के विस्तार में इनका बहुत बड़ा योगदान है। शैक्षणिक क्षेत्र में आर्य समाज के योगदान का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब एवं संयुक्त प्रदेश (अब उत्तर प्रदेश) में सरकार के अतिरिक्त अन्य किसी भी संस्था ने शिक्षा के लिए वैसे प्रयत्न नहीं किये जैसे आर्य समाज ने किये।

आर्य समाज के राष्ट्रीय सुधार

भारत में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने में आर्य समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। आर्य समाज द्वारा किये गये सामाजिक और धार्मिक सुधारों से भारतीयों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का विकास हुआ। आर्य समाज ने भारत के प्राचीन गौरव की चर्चा करते हुए स्वावलम्बन के विकास को प्रोत्साहन दिया। इससे स्वराष्ट्र प्रेम की भावना को बल मिला।

स्वामी दयानन्द के जीवनी लेखक ने लिखा है- ‘दयानन्द का एक मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतन्त्रता था। वास्तव में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।’

स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि अच्छे-से-अच्छा विदेशी राज्य, स्वदेश की तुलना नहीं कर सकता। दयानन्द ने वेद कालीन भारत को इसलिए गौरवमय बताया क्योंकि उस समय भारत में स्वराज्य था। बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, गोपालकृष्ण गोखले आदि जिन नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया, वे आर्य समाज से प्रभावित थे। काँग्रेस में उग्रवाद की भावना का विकास होने का कारण हिन्दू धर्म की भावना थी। आर्य समाज ने इस भावना के निर्माण में योगदान दिया।

डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘आर्य समाज प्रारम्भ से ही उग्रवादी सम्प्रदाय था।’

आर्य समाज ने भारतीयों के समक्ष प्राचीन भारत के बारे में एक निश्चित विचारधारा प्रस्तुत की। आर्य समाज ने ही परस्पर अभिवादन करने हेतु विख्यात नमस्ते शब्द का प्रचलन किया, जो आज न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय है। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहित करके अँग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया। 

कुछ आधुनिक विद्वानों की धारणा है कि आर्य समाज का कार्य हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना तक सीमित था। इसलिये इसने राष्ट्रीयता का विकास नहीं किया। इन विद्वानों का आरोप है कि आर्य समाज ने हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान करके साम्प्रदायिक भावना को पुष्ट किया। कुछ अँग्रेज लेखकों, अधिकारियों एवं ईसाई धर्म-प्रचारकों ने आर्य समाज के सम्बन्ध में इसी प्रकार के उल्टे-सीधे प्रचार किये।

वेलेण्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘आर्य समाज का उद्देश्य समाज सुधार की अपेक्षा हिन्दू धर्म को विदेशी प्रभाव से मुक्त करना था।

शिरोल के इन आरोपों का प्रत्युत्तर लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ द आर्य समाज में बड़े प्रभावशाली ढंग से दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्य समाज के चिंतन का आधार हजारों साल पुराने वेद हैं जिनसे प्रेरणा प्राप्त करना भारतीय समाज की मुख्य धारा को फिर से जीवित करना है इसलिये आर्य समाज को साम्प्रदायिक आन्दोलन की संज्ञा किसी भी प्रकार नहीं दी जा सकती।

अपितु जो लोग आर्य समाज पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं, वस्तुतः वे स्वयं साम्प्रदायिक सोच रखते हैं तथा भारत की मूल सांस्कृतिक धारा के प्रवाह को निरुद्ध करना चाहते हैं।

आर्य समाज वास्तव में एक ऐसा शक्तिशाली आन्दोलन था, जिसके फलस्वरूप हिन्दू समाज में नव-चेतना एवं आत्म-सम्मान के भाव जागृत हुए तथा हिन्दू यह अनुभव करने लगे कि हिन्दू धर्म और संस्कृति, विश्व के अन्य समस्त धर्मों एवं संस्कृतियों से श्रेष्ठ है। आर्य समाज ने भारतीयों में स्वाभिमान और राष्ट्र प्रेम की एक अद्भुत लहर उत्पन्न की तथा धर्म, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में महान् योगदान दिया।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद इस आन्दोलन को कुछ धक्का अवश्य लगा, क्योंकि कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण 1892 ई. में आर्य समाजियों के दो दल हो गये किन्तु प्रत्येक दल ने अपनी पद्धति एवं विचारधारा के आधार पर इस आन्दोलन को शक्तिशाली बनाया। लाला हसंराज के नेतृत्व में वैदिक सिद्धान्तों के साथ पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार किया गया।

महात्मा मुन्शीराम ने हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। यह देश का पहला विश्वविद्यालय था जहाँ राष्ट्र भाषा हिन्दी के माध्यम से उच्च शिक्षा दी गई। महात्मा मुन्शीराम ही आगे चलकर स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए और उन्होंने आर्य समाज के शुद्धि आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने का अथक प्रयास किया।

इसीलिए एक मुस्लिम हत्यारे ने उनकी हत्या कर दी। आर्य समाज के अथक प्रयासों से भारत में कई स्थानों पर अनाथालयों, विधवा-आश्रमों तथा गौ-शालाओं आदि की स्थापना हुई। इस प्रकार धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनैतिक क्षेत्र में आर्य समाज ने जो कार्य किये उनकी तुलना किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन से नहीं की जा सकती।

आर्य समाज का हिन्दू धर्म को योगदान

आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को दृढ़ता प्रदान करने के लिये महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों तथा कुरीतियों के खण्डन और वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार में लगाया। दयानन्द ने वेदों के एकेश्वरवाद के सिद्धांत को प्रमुख माना तथा वेदों में वर्णित यज्ञों और संस्कारों की नयी व्याख्या की।

हवन का मुख्य उद्देश्य वायुमण्डल को शुद्ध करना बताया। उन्होंने बताया कि हिन्दू धर्म सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से उदार रहा है। स्वयं वेद भी अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं करते। इसलिए हिन्दू धर्म ने समस्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता का व्यवहार किया, जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म क्रमशः कुरान और बाइबिल को ही एकमात्र सत्य ग्रन्थ मानते हैं और उसी धर्म का पालन करना स्वर्ग जाने का मार्ग बताते हैं।

हिन्दू धर्म की उदारता, उसकी निर्बलता सिद्ध हुई क्योंकि वह इस्लाम और ईसाई धर्म की कट्टरता का मुकाबला करने में असमर्थ रही। स्वामीजी ने हिन्दू धर्म को कट्टरता प्रदान की। इसीलिए आर्य समाज सैनिक हिन्दुत्व कहलाया। आर्य समाज ने वेदों के आधार पर हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न किया, इसीलिए इसे पुनरुत्थानवादी आन्दोलन कहा जाता है।

आर्य समाज आन्दोलन बाहरी तत्त्वों से प्रेरित न होकर अपने ही मूल सिद्धान्तों से प्रेरित था। स्वामीजी ने समस्त वर्णों के लोगों को वेदों के अध्ययन तथा उसकी व्याख्या करने के अधिकार का समर्थन किया।

धार्मिक क्रांति का आरम्भ: स्वामी दयानन्द ने देश में एक व्यापक धार्मिक क्रान्ति का सूत्रपात किया जिसने हिन्दुओं के चिंतन को झकझोरा। महर्षि अरविन्द ने स्वामी दयानंद के योगदान का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘राजा राममोहन राय उपनिषदों पर ही ठहर गये किन्तु दयानन्द ने उपनिषदों से भी आगे देखा और यह जान लिया कि हमारी संस्कृति का वास्तविक मूल वेद ही हैं।’

स्वामी दयानन्द ने अपने उपदेश केवल वेदों तक ही सीमित रखे तथा उपनिषदों एवं गीता के प्रमाणों को स्वीकार नहीं किया। इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने उपनिषदों तथा गीता के महत्त्व का उचित मूल्यांकन नहीं किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

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थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

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थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापक श्रीमती एनीबेसेंट

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी में भारत में थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य बहुत व्यापक नहीं थे किंतु इन्होंने भारतीय धर्म की महत्ता को पुनर्स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

थियोसॉफिकल सोसायटी

थियोसॉफिकल सोसायटी भारत का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आन्दोलन था जिसने देश के धार्मिक तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। थियोसॉफी का अर्थ होता है- ईश्वर का ज्ञान। संस्कृत में इसे ब्रह्म विद्या कहते हैं।

थियोसॉफी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तीसरी शताब्दी में एलेक्जेण्ड्रिया के ग्रीक विद्वान इम्बीकस ने किया था। आधुनिक काल में इस शब्द का प्रयोग थियोसॉफिकल सोसायटी ने किया। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था थी जिसकी स्थापना कर्नल एच. एम. आलकाट और सुश्री एच. पी. ब्लेवटास्की ने 7 सितम्बर 1876 को अमरीका के न्यूयार्क शहर में की। इस संस्था के उद्देश्य इस प्रकार से थे-

(1.) प्रकृति के नियमों की खोज करना तथा मनुष्य की दैवी शक्तियों का विकास करना।

(2.) किसी भी धर्म की कट्टरता को प्रश्रय न देकर समस्त धर्मों में समन्वय स्थापित करना।

(3.) प्राचीन धर्म, दर्शन और विज्ञान जो संसार में कहीं भी पाया जा सकता है, उसके अध्ययन में सहयोग देना।

(4.) विश्व बन्धुत्व अथवा विश्व मान्यता का विकास करना।

(5.) पूर्वी देशों के धर्मों तथा दर्शन का अध्ययन तथा प्रसार करना।

थियोसॉफिकल सोसायटी का भारत में आगमन

आलकाट व ब्लेवटास्की 1879 ई. में स्वामी दयानन्द के निमन्त्रण पर भारत आए। उन्होंने हिन्दू धर्म के गुणों पर प्रकाश डालते हुए भारतीयों को उपदेश दिया कि यह सब धर्मों से श्रेष्ठ है तथा इसमें सम्पूर्ण सत्य निहित है। थियोसॉफिकल सोसायटी का लक्ष्य भारतीयों को उनके प्राचीन गौरव और महानता की याद दिलाना है ताकि भारत अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर सके।

सात साल तक आलकाट व ब्लेवटास्की आर्य समाज के साथ मिलकर ईसाई धर्म के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न करते रहे। स्वामी दयानन्द वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे, जो थियोसॉफिस्ट्स विचारकों को स्वीकार्य नहीं था। अतः 1886 ई. में उन्होंने मद्रास के उपनगर आडियार में थियोसॉफिकल सोसायटी का केन्द्र स्थापित किया। अब इस संस्था का कार्यक्षेत्र भारत हो गया तथा यहीं से अन्य देशों में इसके विचारों का प्रचार होने लगा।

श्रीमती एनीबीसेण्ट का भारत में आगमन

 श्रीमती एनीबीसेण्ट उच्च शिक्षा प्राप्त, कुलीनवंशी, आयरिश महिला थीं। 16 नवम्बर 1873 को 46 वर्ष की आयु में वह भारत आईं और भारत के सांस्कृतिक आन्दोलन में सक्रिय हो गईं। उन्होंने थियोसॉफिकल सोसायटी के कार्य को फैलाने में बड़ा योगदान दिया। वे जन्म से आयरिश थीं किन्तु उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि मान लिया।

उन्हें भारतीयता, हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज से अगाध प्रेम था। उनकी मान्यता थी कि भारत का भविष्य हिन्दू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अनेक विद्वान् और नेता, उनके महान् व्यक्तित्व से प्रभावित होकर थियोसॉफिकल सोसायटी में सम्मिलित हो गये। एनीबीसेण्ट की मान्यता थी कि वे पूर्व जन्म में हिन्दू थीं।

इसलिए उन्होंने भारत आते ही स्वयं को पूर्ण रूप से हिन्दुत्व के रंग में रंग लिया तथा भारतीय वेश-भूषा और खानपान को अपना लिया। वे हिन्दू तीर्थों में घूमती रहती थीं। उन्होंने अपना अधिकांश समय काशी में व्यतीत किया जहाँ उन्होंने सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की जो आगे चल कर हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। बनारस में रहते हुए उन्होंने रामायण और महाभारत की कथाएँ लिखीं और गीता का अनुवाद किया। उन्होंने हिन्दू धर्म और संस्कृति के पक्ष में ओजस्वी भाषण दिये।

श्रीमती एनीबीसेण्ट द्वारा हिन्दू धर्म की सेवा

श्रीमती एनीबीसेण्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हिन्दू धर्म की सेवा था। राजा राममोहन राय एवं स्वामी दयानन्द ने निराकार ईश्वर की उपासना पर बल दिया तथा मूर्तिपूजा, अवतारवाद, तीर्थ, व्रत-अनुष्ठान एवं पौराणिक बातों का खण्डन किया किंतु एनीबीसेण्ट ने वेद और उपनिषदों के महत्त्व को मान्यता देते हुए मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, योग, पुनर्जन्म, कर्मवाद, तीर्थ, व्रत, गीता, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र और महाकाव्य आदि के द्वारा हिन्दुत्व के समग्र रूप का तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया।

श्रीमती एनीबीसेण्ट अपने भाषणों में प्रायः यह बात कहती थीं-

‘हिन्दुत्व ही भारत का प्राण है, हिन्दुत्व वह मिट्टी है जिसमें भारत का मूल गड़ा हुआ है। यदि वह मिट्टी हटा ली गई तो भारत रूपी वृक्ष सूख जायेगा। हिन्दुत्व के बिना भारत के सामने कोई भविष्य नहीं है

…….. हिन्दुत्व की रक्षा भारतवासी और हिन्दू ही कर सकते हैं। भारत में प्रश्रय पाने वाले अनेक धर्म हैं, अनेक जातियाँ हैं किन्तु इनमें किसी की भी शिरा भारत के अतीत तक नहीं पहुँची है। इनमें से किसी में भी यह दम नहीं कि भारत को एक राष्ट्र के रूप में जीवित रख सके। इनमें से प्रत्येक भारत से लोप हो जाये तब भी भारत, भारत ही रहेगा किन्तु यदि हिन्दुत्व लोप हो गया तो शेष कुछ भी नहीं बचेगा

…….. हिन्दुत्व के जागरण से ही विश्व का कल्याण हो सकता है।’

1914 ई. में एक भाषण में उन्होंने कहा था-

‘चालीस वर्ष के गम्भीर चिन्तन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि विश्व के समस्त धर्मों में मुझे हिन्दुत्व के समान कोई धर्म इतना पूर्ण, वैज्ञानिक, दर्शनयुक्त एवं आध्यात्मिकता से परिपूर्ण दिखाई नहीं देता। जितना अधिक तुमको इसका भान होगा, उतना ही अधिक तुम इससे प्रेम रखोगे।’

थियोसॉफिकल सोसायटी के धार्मिक सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी ने हिन्दू धर्म की अनेक रहस्यमयी तथा आस्थापूर्ण बातों का वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया। जिस समय एनीबीसेण्ट भारत आईं, उस समय अँग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का, हिन्दू धर्म तथा संस्कृति से विश्वास उठने लगा था। ऐसे समय में एनीबीसेण्ट ने भारतीय आदर्शों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया।

एनीबीसेण्ट ने स्वयं हिन्दू तीर्थों की यात्रा की। उन्होंने नंगे पैर अमरनाथ की यात्रा की और वहाँ शीतल जल से स्नान करके मन्दिर में प्रवेश किया। एक अँग्रेजी महिला को ऐसा करते देखकर हिन्दुओं के मस्तिष्क में यह बात बैठ गई कि उनका धर्म अन्य धर्मों से हीन नहीं अपितु श्रेष्ठ है। एनीबीसेण्ट ने काशी में रहकर गीता का अनुवाद किया, रामायण तथा महाभारत पर संक्षिप्त भाष्य लिखे।

यूरोप और अमरीका के लोगों के सामने हिन्दू धर्म तथा संस्कृति की महत्ता और गौरवगान किया। जब भारत के अँग्रेजी पढ़े लिखे लोगों ने एक अँग्रेज महिला के मुँह से हिन्दू धर्म और संस्कृति का गौरवगान सुना तो उन्हें अपने धर्म में पुनः आस्था जागृत होने लगी। एनीबीसेण्ट के भाषणों से भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना उत्पन्न हुई।

वेलेन्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘जब अतिश्रेष्ठ बौद्धिक शक्तियों तथा अद्भुत वक्तृत्व शक्ति से सुसज्जित यूरोपियन, भारत जाकर भारतीयों से यह कहे कि उच्चतम ज्ञान की कुँजी यूरोप वालों के पास नहीं, तुम्हारे पास है तथा तुम्हारे देवता, तुम्हारे दर्शन तथा तुम्हारी नैतिकता की छाया भी यूरोप वाले नहीं छू सकते, तब यदि भारतवासी हमारी सभ्यता से मुँह मोड़ लें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है!’

थियोसॉफिकल सोसायटी एकेश्वरवाद में विश्वास रखती है। इसके अनुसार- ‘मानव जाति के विकास का आधार, विकास की ईश्वरीय योजना है, और समस्त धर्म इसी योजना के विभिन्न रूप हैं। इसलिए उनमें परस्पर विरोध नहीं हो सकता। धर्म और विज्ञान में काई विरोध नहीं है।’

इस संस्था के अनुयायी कर्मफल और पुनर्जन्म को मानते हैं। उसके अनुसार मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार जीव का पुनर्जन्म होता है और वह अपने पूर्व-कर्मों का फल भोगता है। उनका उद्देश्य विश्व के समस्त वर्गों में भ्रातृत्व का विकास करना है।

थियोसॉफिकल सोसायटी द्वारा राष्ट्रीय सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी तथा इसके संस्थापकों ने अपनी श्रेष्ठता के बारे में प्रचार किया किंतु सदस्यों के सम्बन्ध में अनेक झूठी-सच्ची बातें जनता के सामने प्रकट हुईं तो लोगों को इस सोसायटी के प्रति श्रद्धा कम होने लगी। इससे एनीबीसेण्ट को अत्यन्त दुःख हुआ और 1914 ई. में उन्होंने अपना क्षेत्र धर्म से बदलकर राजनीति कर लिया।

वे लोकमान्य तिलक द्वारा चलाये गये होमरूल आन्दोलन में सम्मिलित हो गईं। 1917 ई. में मद्रास सरकार ने एनीबीसेण्ट को नजरबन्द कर दिया किन्तु प्रबल जन-आन्दोलन के कारण सरकार ने उन्हें तत्काल मुक्त कर दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सभापति पद पर चुन ली गईं। काँग्रेस की सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में राजनीतिक चेतना जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

थियोसॉफिकल सोसायटी ने अनेक स्थानों पर स्कूल, कॉलेज और छात्रावास स्थापित किये। इस संस्था ने बाल विवाह, कन्या-वर-विक्रय, छुआछूत आदि कुरीतियों का विरोध कर समाज सुधार के कार्य किये। सोसायटी के कार्यों से न केवल धर्म एवं समाज सुधार आन्दोलन को बल प्राप्त हुआ, अपितु राष्ट्रीय आन्दोलन में भी नई जान आई। श्रीमती एनीबीसेण्ट ने हिन्दू जागरण के लिए जितना कार्य किया, किसी हिन्दू ने भी उतना काम नहीं किया।

गाँधीजी ने उनके बारे में लिखा है- ‘जब तक भारत वर्ष जीवित है, एनीबीसेण्ट की सेवाएं भी जीवित रहेंगी। उन्होंने भारत को अपनी जन्मभूमि मान लिया था। उनके पास देने योग्य जो कुछ भी था, उन्होंने भारत के चरणों में अर्पित कर दिया। इसलिए भारतवासियों की दृष्टि में वे इतनी प्यारी और श्रद्धेय हो गई हैं।’

इस प्रकार हम देखते हैं कि थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य सामाजिक क्षेत्र के साथ-साथ भारत के अध्यात्मिक गौरव को पुनर्स्थापित करने में भी बहुत महत्वपूर्ण थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

युवा बंगाल आन्दोलन

आर्य समाज

थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

रामकृष्ण मिशन

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

सुधार आंदोलनों के परिणाम

रामकृष्ण मिशन

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रामकृष्ण मिशन

रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1 मई 1897 को स्वामी विवेकानन्द ने की। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय कलकत्ता के निकट बेलुर में है।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य

रामकृष्ण मिशन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में धर्म के नाम से चलाए जा रहे पाखण्ड को नष्ट करके वेदान्त दर्शन का प्रचार-प्रसार करना था। रामकृष्ण मिशन मनुष्य मात्र की सेवा करने एवं परोपकार के कार्यों को बढ़ावा देने को मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य मानता है। रामकृष्ण मिशन का ध्येयवाक्य है कि मनुष्य जो भी कार्य करे, वह अपने लिए और जगत् के कल्याण के लिए करे- आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च।

स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण मिशन

रामकृष्ण परमहंस (1836-1886 ई.) ने भारतीयों के समक्ष धर्म के सच्चे स्वरूप को प्रदर्शित किया। रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। उनका जन्म 1836 ई. में बंगाल के हुगली जिले में निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्हें बचपन से ही शिक्षा के प्रति कोई रुचि नहीं थी। वे हर समय धार्मिक चिंतन में मग्न रहते थे।

जब वे 17 वर्ष के थे, उनके पिता का देहान्त हो गया। इस पर गदाधर अपने बड़े भाई के साथ कलकत्ता आ गये। अपने भाई की मृत्यु के बाद 21 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता के पास दक्षिणेश्वर में कालीदेवी के मन्दिर में पुजारी बन गये। पुजारी के रूप में कार्य करते हुए उनके मन में काली माँ के प्रति अगाध भक्ति एवं श्रद्धा उत्पन्न हो गयी।

वे देवी को माँ कहकर पुकारते थे और उसके समक्ष शिशु की तरह व्यवहार करते थे। 24 वर्ष की आयु में उनका विवाह शारदामणि नामक 5 वर्ष की कन्या के साथ कर दिया गया। विवाह के पश्चात् रामकृष्ण पुनः दक्षिणेश्वर मन्दिर आ गये।

दक्षिणेश्वर मंदिर में उन्होंने 12 वर्ष तक विभिन्न प्रकार की साधनाएँ कीं। उन्होंने भैरवी नामक एक ब्राह्मण सन्यासिन से दो वर्ष तक तान्त्रिक साधना सीखी। उसके बाद उन्होंने वैष्णव धर्म की साधना की। वैष्णव धर्म की साधना करते हुए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन किये। तोतापुरी नामक एक महान् वेदान्तिक साधु ने उन्हें वेदान्त-साधना सिखाई।

उसके पश्चात् रामकृष्ण ने सूफी धर्म तथा ईसाई धर्म का ज्ञान प्राप्त किया। 1876 ई. के बाद रामकृष्ण की आत्मा को सन्तोष प्राप्त हुआ। उन्होंने अपनी साधना द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि धर्म तथा ज्ञान, विद्या का विषय नहीं है, अपितु अनुभूति का विषय है।

शारदामणि जीवनपर्यन्त दक्षिणेश्वर में अपने पति के साथ रहीं किन्तु रामकृष्ण ने उन्हें कभी पत्नी के रूप में नहीं देखा। वे शारदामणि को माँ कहते थे। साधना के द्वारा रामकृष्ण ने अपने शरीर एवं मन को इतना शुद्ध कर लिया कि वह ईश्वरत्व का निर्मल यन्त्र हो गया था। उनकी संवेदना का स्तर इतना गहरा था कि एक बार उन्होंने गाय की पीठ पर लाठी पड़ती हुई देख ली, इस लाठी का चिह्न उनकी पीठ पर भी उभर आया।

वे राजा राममोहन राय तथा स्वामी दयानन्द के समान बहुपठित विद्वान नहीं थे, अपितु उच्चकोटि के साधक एवं सन्त थे। दूर-दूर से लोग उनके दर्शनों को आते थे। अनेक शिक्षित नवयुवक भी उनकी तरफ आकर्षित हुए। रामकृष्ण, अपने दर्शनों के लिये आने वाले व्यक्तियों को अध्यात्मिक उपदेश देते रहते थे। उनके आध्यात्मिक जीवन को देखकर भारतीयों को मालूम हुआ कि धर्म वास्तव में कैसा होता है।

ब्रह्म समाजी आचार्य पी. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘रामकृष्ण के दर्शन होने से पूर्व यह कोई नहीं जानता था कि धर्म कैसा होता है। सब आडम्बर ही था। धार्मिक जीवन कैसा होता है, यह बात रामकृष्ण की संगति का लाभ होने पर जान पड़ी।’

16 अगस्त 1886 को क्षय रोग से रामकृष्ण का निधन हुआ।

रामकृष्ण ने कोई सम्प्रदाय स्थापित नहीं किया। उन्होंने कोई आश्रम भी स्थापित किया। वे भारत की परम्परागत संत पद्धति से उपदेश देते थे। धर्म के गहन से गहन तत्त्वों को वे सीधे वाक्यों में उदाहरण देते हुए समझाते थे। वे धर्म की साकार प्रतिमा थे। रामकृष्ण को कुछ विद्वानों ने धर्म का जीता-जागता स्वरूप बताया है।

स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म के बौद्धिक अंग की श्रेष्ठता को सिद्ध किया था। रामकृष्ण उस  हिन्दू धर्म के वास्तविक प्रतिनिधि थे। वे ईश्वर के निराकार तथा साकार दोनों रूपों को मानते थे। वे मूर्तिपूजा के विरोधी नहीं थे। वे एकेश्वरवाद और अनेकेश्वरवाद में भेद नहीं मानते थे। उनकी दृष्टि में वेद, उपनिषद् पुराण, रामायण और महाभारत समस्त पवित्र आध्यात्मिक ग्रन्थ थे।

रामकृष्ण की शिक्षाएँ

उच्च कोटि के विद्वान् न होते हुए भी रामकृष्ण ने वेदान्त के सत्यों की बड़े ही सुन्दर ढंग से व्याख्या की। उनकी शिक्षाओं का सार इस प्रकार से है-

(1.) मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर से साक्षात्कार करना है। हम अपने उच्च आध्यात्मिक जीवन का विकास करके ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं।

(2.) उन्होंने गृहस्थ जीवन को ईश्वर की प्राप्ति में बाधक नहीं माना। उनका कहना था कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए हमें विषय-वासनाओं को त्यागना होगा तथा मन को कंचन और कामिनी से हटाकर ईश्वर की ओर लगाना होगा। इससे गृहस्थ में रहते हुए भी आध्यात्मिक विकास कर सकते हैं।

(3.) शरीर और आत्मा, दो भिन्न वस्तुएँ हैं। इस सिद्धान्त को समझाते हुए उन्होंने कहा- ‘कामिनी-कंचन की आसक्ति यदि पूर्ण रूप से नष्ट हो जाए तो शरीर अलग है और आत्मा अलग है, यह स्पष्ट दिखाई देने लगता है। नारियल का पानी सूख जाने पर जैसे खोपरा और नरेटी दोनों अलग-अलग दिखाई देने लगते हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा के बारे में जानना चाहिए।’

(4.) तर्क से वे बहुत घबराते थे। उनका कहना था कि शास्त्रार्थ को मैं नापसन्द करता हूँ। ईश्वर शास्त्रार्थ की शक्ति से परे है, मुझे तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि जो कुछ है वह ईश्वरमय है, फिर तर्कों से क्या लाभ।

(5.) मूर्ति-पूजा का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे वकील को देखते ही अदालत याद आती है, उसी तरह प्रतिमा पर ध्यान जाते ही ईश्वर की याद आती है।

(6.) रामकृष्ण अनुभूति को तर्क, वाद-विवाद, प्रवचन और भाषण से अधिक महत्त्व देते थे। उनका कहना था कि अनुभूति से ही परमतत्त्व का दर्शन सम्भव है। इस दर्शन के बाद मनुष्य की अभिलाषाएं समाप्त हो जाती हैं।

(7.) रामकृष्ण मनुष्यों में कोई भेद नहीं मानते थे। उनका कहना था कि मनुष्य, तकिये के गिलाफ के समान है। गिलाफ जैसे भिन्न-भिन्न रंग और आकार के होते हैं वैसे ही मनुष्य भी कोई सुन्दर, कोई कुरूप, कोई साधु और कोई दुष्ट होता है, बस इतना ही अंतर है। पर जैसे समस्त गिलाफों में एक ही पदार्थ- कपास भरा रहता है, उसी के अनुसार समस्त मनुष्यों में वही एक सच्चिदानन्द भरा हुआ है।

(8.) विद्वता और पांडित्य के साथ वे मनुष्य में शील और सदाचार चाहते थे। उनका कहना था कि विद्वान् कभी भी अहंकार नहीं दिखाता। जिस प्रकार आलू सिक जाने पर नर्म हो जाता है, उसी प्रकार विद्वता के साथ अंहकार समाप्त हो जाता है।

(9.) रामकृष्ण की मान्यता थी कि समस्त धर्म एक ही ईश्वर तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं। एक बार एक व्यक्ति ने पूछा कि जब सत्य एक है तो फिर धर्म अनेक क्यों हैं? रामकृष्ण ने उत्तर दिया- ‘ईश्वर एक है किन्तु उसके विभिन्न स्वरूप हैं, जैसे-एक घर का मालिक, एक के लिए पिता, दूसरे के लिए भाई और तीसरे के लिए पति है और वह विभिन्न व्यक्तियों के द्वारा विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, उसी प्रकार ईश्वर भी विभिन्न कालों व देशों में भिन्न-भिन्न नामों एवं भावों से पूजा जाता है। इसलिए धर्मों की अनेकता देखने को मिलती है।’

रामकृष्ण परमंहस की देन

विश्व के लिये रामकृष्ण की तीन देन सबसे बड़ी कही जा सकती हैं-

(1.) उनकी सबसे बड़ी देन अध्यात्मवाद है। सरल उपदेशों और जीवंत उदाहरणों से उन्होंने वेदों और उपनिषदों के जटिल ज्ञान को साधारण व्यक्तियों के निकट कर दिया। रामकृष्ण ने अपनी शिक्षाओं द्वारा हिन्दू धर्म के ग्रन्थों को सरल बनाया तथा हिन्दुओं में अपने प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी उत्पन्न किया। वे हिन्दू धर्म के अध्यात्मवाद के जीवित स्वरूप थे।

(2.) रामकृष्ण की दूसरी महत्त्वपूर्ण देन समस्त धर्मों की एकता में विश्वास उत्पन्न करना है। उन्होंने अपने उपदेशों तथा अपने जीवन में विभिन्न धर्मों की साधना करके यह स्पष्ट कर दिया कि समस्त धर्म ईश्वर-प्राप्ति के विभिन्न मार्ग हैं।

(3.) उनकी तीसरी महत्त्वपूर्ण देन यह है कि उन्होंने मानव मात्र की सेवा और भलाई को धर्म बताया। उनका कहना था कि प्रत्येक प्राणी भगवान् का रूप है; अतः उसकी सेवा करना भगवान् की सेवा करना है। उनके शिष्य विवेकानन्द ने इसी भाव को ग्रहण कर दरिद्रनारायण की सेवा करने में स्वयं को समर्पित कर दिया।

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म का प्रतिपादन ब्रह्म समाज और आर्य समाज की अपेक्षा अधिक मनोबल एवं सम्मान से किया। राजा राममोहन राय हिन्दू धर्म के लिये क्षमायाचक से अधिक नहीं थे। भारतीय हिन्दू धर्म को उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखा। स्वामी दयानन्द ने वेदों में निहित ज्ञान को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया तथा ईसाई मिशनरियों के आरोपों का प्रत्युत्तर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने समस्त वेदान्त की सैद्धान्तिक व्याख्या करके हिन्दू धर्म को पाश्चात्य धर्म में उपलब्ध ज्ञान से उच्चतर बताया। 

स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के दत्त परिवार में हुआ। बचपन में उनका नाम नरेन्द्र दत्त था। उन्होंने एक अँग्रेजी कॉलेज से बी. ए. की डिग्री प्राप्त की। उन पर यूरोप के बुद्धिवाद और उदारवाद का भारी प्रभाव था।

उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल, हर्बर्ट, स्पेन्सर, रूसो जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों का गहन अध्ययन किया। उनमें उच्चकोटि की बौद्धिकता के साथ-साथ जिज्ञासा भाव भी प्रबल था। आरम्भ में वे ब्रह्म समाज की ओर आकर्षित हुए किन्तु ब्रह्म समाज के उपदेशक, उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा शान्त नहीं कर सके। किसी सम्बन्धी के कहने पर 1881 ई. में उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर जाकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भेंट की।

रामकृष्ण से भेंट: रामकृष्ण परमहंस परम्पारगत हिन्दू धर्म के प्रतीक थे, जबकि नरेन्द्र दत्त पश्चिमी शिक्षा, तर्क, विचार और बुद्धिवाद में विश्वास करने वाले थे। रामकृष्ण के सम्पर्क से नरेन्द्र के जीवन की दिशा ही बदल गई। पहली ही भेंट में नरेन्द्र दत्त ने स्वामी रामकृष्ण से प्रश्न किया- ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’

रामकृष्ण ने कहा- ‘हाँ, मैं ईश्वर को वैसे ही देखता हूँ जैसे मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम भी चाहो तो उसे देख सकते हो।’

रामकृष्ण ने फिर कहा- ‘इस संसार में कोई अपने बाप के लिए, कोई माँ के लिये तथा कोई पत्नी के लिये रोता है परन्तु मैंने आज तक ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो इसलिए रो रहा हो कि उसे ईश्वर नहीं मिला।’

इस कथन से नरेन्द्र दत्त अत्यन्त ही प्रभावित हुए। जब दूसरी बार वे रामकृष्ण से मिले तो रामकृष्ण ने अपना दायाँ पांव नरेन्द्र के शरीर पर रखा। इस स्पर्श से नरेन्द्र को जो अनुभूति हुई, उसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है- ‘आँखें खुली होने पर भी मैंने दीवारों सहित सारे कमरे को शून्य में विलीन होते देखा। मेरे व्यक्तित्व सहित सारा ब्रह्माण्ड ही एक सर्वव्यापक रहस्यमय शून्य में लुप्त होते दिखाई पड़ा।’

इस प्रकार नरेन्द्र दत्त ने स्वामी रामकृष्ण की आध्यात्मिक शक्ति से अभिभूत होकर उन्हें अपना गुरु मान लिया। गुरु के निरीक्षण में नरेन्द्र दत्त का आध्यात्मिक विकास होने लगा। रामकृष्ण ने नरेन्द्र को मानव मात्र में ईश्वर के दर्शन करने की प्रेरणा दी और कहा कि मनुष्य ईश्वर का रूप है, उसकी सेवा ही सर्वोच्च धार्मिक साधना है।

नरेन्द्र ने अपना समस्त जीवन इसी साधना में लगा दिया। जब स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु का समय निकट आया तो उन्होंने नरेन्द्र दत्त को, अपने विचारों को फैलाने तथा अपने शिष्यों की देखभाल करने का उत्तरदायित्व सौंपा।

स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनके बहुत से शिष्य अपने-अपने घरों को चले गये किन्तु नरेन्द्र दत्त ने अपने तीन-चार साथियों के साथ काशीपुर के निकट  बारा-नगर में एक टूटे हुए मकान में रहना आरम्भ किया। 1887 ई. में प्रथम बार इस मठ को, धार्मिक रूप में स्थापित किया गया। उस समय मठ के 12 सदस्यों ने वैदिक क्रियाओं के अनुसार सन्यास ग्रहण किया और अपने नाम भी बदल लिये। उसी समय नरेन्द्र दत्त का नाम स्वामी विवेकानन्द रखा गया।

शिकागो सर्व-धर्म-सम्मेलन

सन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने भारत भ्रमण किया। जब वे कन्याकुमारी पहुँचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि अमेरिका के शिकागो नगर में विश्व के समस्त धर्मों की एक सभा हो रही है। 1893 ई. में बड़ी कठिनाई से स्वयं के प्रयत्नों से वे अमेरिका पहुंचे।

इस सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने हिन्दुत्व के उज्वल पक्ष को इतने प्रभावशाली ढंग से विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण विश्व में हिन्दू धर्म की धूम मच गई। विश्व स्तर पर इस तरह का कार्य इससे पहले कभी नहीं हुआ था। स्वामी विवेकानंद की इस विदेश यात्रा के तीन मुख्य उद्देश्य थे-

(1.) स्वमी विवेकानंद इस यात्रा के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश देना चाहते थे कि विश्व के समस्त धर्म, एक ही धर्म के विभिन्न अंग हैं। सम्पूर्ण विश्व में एक प्रकार की धार्मिक एकता का भाव जागृत होना चाहिए।

(2.) विवेकानंद अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों के समक्ष यह उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे कि यदि भारतवासी स्वयं को ऊँचा उठायें तो पश्चिम के सुशिक्षित एवं सुसम्पन्न लोग भी भारतीयों का आदर करने के लिये विवश होंगे।

(3.) विवेकानंद भारतीयों के इस भय को दूर करना चाहते थे कि समुद्र-यात्रा करने तथा विदेशियों के हाथ का अन्न-जल ग्रहण करने से धर्म और जाति नष्ट हो जाते हैं। 

शिकागो नगर के सर्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामीजी ने हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। उन्होंने सम्मेलन में जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाक्शक्ति का परिचय दिया, उससे विश्व भर से आये लोग विस्मित रह गये। उनके भाषणों ने श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध किया।

जब उन्होंने अपने प्रथम भाषण में अमेरिका वासियों को ‘भाइयो और बहिनो!’ कहकर सम्बोधित किया तो विश्व के आश्चर्य का पार न रहा कि एक मानव संसार के समस्त मनुष्यों का भाई हो सकता है। उनके देश में सार्वजनिक आयोजनों में माई फैलो सिटीजन्स अथवा माई फैलो कन्ट्रीमैन कहने की परम्परा थी।

इस सम्बोधन से एक मानव का दूसरे मानव से कोई आत्मिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता था। इसलिये स्वामीजी द्वारा कहे गये- ‘ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स!’ सम्बोधन का बड़ी देर तक भारी करतल-ध्वनि से स्वागत हुआ।

इस सम्मेलन की सभाएँ प्रतिदिन होती थीं। स्वामीजी ने अपने भाषण सभा के अन्त में ही दिये, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने के लिए अन्त तक बैठी रहती थी। उन्होंने हिन्दू धर्म की उदारता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दुत्व के शब्दकोष में असहिष्णु शब्द ही नहीं है।

हिन्दू धर्म का आधार शोषण, रक्तपात या हिंसा नहीं है, वरन् प्रेम है। स्वामीजी ने वेदान्त के सत्य पर भी प्रकाश डाला। जब तक सम्मेलन समाप्त हुआ, तब तक स्वामीजी अपना तथा भारत का प्रभाव अमेरिका में अच्छी तरह स्थापित कर चुके थे।

स्वामीजी के भाषणों की प्रशंसा में अमेरिका के समाचार पत्र द न्यूयार्क हेराल्ड ने लिखा- ‘सर्व-धर्म-सम्मेलन में सबसे महान् व्यक्ति विवेकानन्द हैं। उनका भाषण सुन लेने पर अनायास ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसे ज्ञानी, देश को सुधारने के लिए धर्म-प्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण है!’

इस सम्मेलन के बाद विवेकानंद ने अमेरिका के अनेक नगरों की यात्राएँ कीं जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। वे अमेरिका से पेरिस गये तथा उन्होंने यूरोप के कई नगरों में हिन्दुत्व तथा वेदान्त दर्शन पर भाषण किये। वे लगभग तीन वर्ष तक विदेशों में घूमते रहे। इस अल्पावधि में उनके भाषणों, वार्तालापों, लेखों और वक्तव्यों के द्वारा यूरोप व अमेरिका में हिन्दू धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा स्थापित हुई।

सितम्बर 1895 में वे लंदन गये और वहाँ भी धर्म-प्रचार किया। वे पुनः अमेरिका गये तथा फरवरी 1896 में न्यूयार्क में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की जिसका लक्ष्य वेदान्त का प्रचार करना था। अमेरिका में उनके अनेक अनुयायी हो गये जो चाहते थे कि कुछ भारतीय धर्म-प्रचारक, अमेरिका में भारतीय दर्शन तथा वेदान्त का प्रचार करें और उनके अमेरिकी शिष्य भारत जाकर विज्ञान और संगठन का महत्त्व सिखायें।

विवेकानंद ने भारत लौटकर मई 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा 1 जनवरी 1899 को वेलूर में मिशन का मुख्यालय स्थापित किया। जून 1899 में वे दूसरी बार अमेरिका गये तथा लासॅ एंजिल्स, सैनफ्रांसिस्को, केलिफोर्निया आदि विभिन्न नगरों में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की।

यहाँ से वे एक धार्मिक सम्मेलन में भाग लेने पेरिस गये जहाँ उन्होंने हिन्दू धर्म पर भाषण दिया। अपने विदेश प्रवास में स्वामीजी ने हिन्दू धर्म का व्यापक प्रचार किया। प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से ईसाई धर्म प्रचारक विश्व में हिन्दुत्व की आलोचना कर निन्दा फैला रहे थे। उन आलोचनाओं और निंदाओं पर विवेकानंद ने रोक लगा दी। जब भारतवासियों को ज्ञात हुआ कि समस्त पश्चिमी जगत् स्वामीजी के मुख से हिन्दुत्व का आख्यान सुनकर गद्गद् हो रहा है, तब हिन्दू भी अपने धर्म और संस्कृति के गौरव का अनुभव करने लगे।

1900 ई. में स्वामीजी सम्पूर्ण यूरोप का दौरा कर पुनः भारत लौटे। अब उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। इसी कारण वे बनारस गये। वहाँ से कलकत्ता वापिस आने पर उनका स्वास्थ्य फिर खराब हो गया और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे जिस कार्य के लिये आये थे, वह पूरा हो चुका था।

स्वामी विवेकानंद द्वारा हिन्दू धर्म के लिये की गई सेवाओं की प्रश्ंसा करते हुए राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है- ‘हिन्दुत्व को लीलने के लिए अँग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म ओर यूरोपीय बुद्धिवाद के पेट से जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानन्द के हिमालय जैसे विशाल वृक्ष से टकराकर लौट गया। हिन्दू जाति का धर्म है कि वह जब तक जीवित रहे, विवेकानन्द की याद उसी श्रद्धा से करती जाये, जिस श्रद्धा से वह व्यास और वाल्मीकि की याद करती है।’

स्वामी विवेकानंद के धार्मिक सुधार

स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म सम्मेलन में विश्व के समस्त धर्मों की सत्यता में विश्वास व्यक्त किया। उन्हें जितनी आस्था वेदों में थी, उतनी ही आस्था उपनिषदों, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में भी थी। उन्हें ईश्वर के निराकार रूप की उपासना में जितनी रुचि थी, उतनी ही साकार रूप में थी। उन्होंने धार्मिक उदारता, समानता और सहयोग पर बल दिया। उन्होंने धार्मिक झगड़ों का मूल कारण बाहरी चीजों पर अधिक बल देना बताया। उनके अनुसार सिद्धान्त, धार्मिक क्रियाएँ, पुस्तकें, मस्जिद तथा गिरजाघर, ईश्वरीय उपासन के साधन मात्र हैं। इस कारण इन पर अधिक बल नहीं देना चाहिये।

विवेकानंद ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा- ‘धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है; धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धान्तों में। यह केवल अनुभूति में निवास करता है……. मनुष्य सर्वत्र अन्न ही खाता है किन्तु हर देश में अन्न से भोजन तैयार करने की विधियाँ अनेक हैं। इसी प्रकार धर्म मनुष्य की आत्मा का भोजन है और देश-देश में उसके भी अनेक रूप हैं।

……इससे यह स्पष्ट है कि समस्त धर्मों में मूलभूत एकता है, यद्यपि उसके स्वरूप भिन्न हैं। उन्होंने अन्य धर्म-प्रचारकों को बताया कि भारत ही ऐसा देश है जहाँ कभी धार्मिक भेदभाव नहीं हुआ। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म-परिवर्तन से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि प्रत्येक धर्म का लक्ष्य समान है। उन्होंने ईसाई धर्म के अनुयायियों को स्पष्ट किया कि भारत में ईसाई धर्म के प्रचार से उतना लाभ नहीं हो सकता जितना पश्चिमी औद्योगिक तकनीकी तथा आर्थिक ज्ञान से हो सकता है। भारत पर विजय राजनीतिक हो सकती है, सांस्कृतिक नहीं।’

स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू समाज को सन्देश दिया कि हिन्दू राष्ट्र, विश्व का शिक्षक रहा है और भविष्य में भी रहेगा। प्रत्येक हिन्दू को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये और साथ ही पाश्चात्य शिक्षा को भी अपनाना चाहिये अन्यथा हमारा उत्थान सम्भव नहीं है। उन्होंने दर्शन के सत्य की सुन्दर ढंग से व्याख्या की और बताया कि वेदान्त की आध्यात्मिकता के बल पर भारत सारे विश्व को जीत सकता है।

विवेकानन्द वेदान्त की परम्परागत व्याख्या से सहमत नहीं थे। भारतीय संत, सांसारिक जीवन से विमुख होकर ध्यान-समाधि द्वारा ब्रह्म से साक्षात्कार का उपदेश देते थे किन्तु विवेकानन्द ने कहा कि ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए सांसारिक जीवन से विमुख होना अनुचित है।

सच्ची ईश्वरोपासना यह है कि हम अपने मानव बन्धुओं की सेवा में अपने आपको लगा दें। उन्होंने दीन-दुखी तथा दरिद्र मानव को ईश्वर का रूप बताया और उसके लिए दरिद्रनारायण शब्द का प्रयोग किया। जब पड़ौसी भूखा हो तब मन्दिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं, अपितु पाप है।

स्वामीजी की इन घोषणाओं ने धार्मिक क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। जो लोग पश्चिम की भौतिकता तथा बुद्धिवाद से प्रभावित होकर ईसाइयत अथवा नास्तिकता की ओर दौड़ रहे थे, वे फिर से हिन्दू धर्म में विश्वास करने लगे।

स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि- ‘तुम समस्त व्यक्तियों की विचारधारा को एक नहीं कर सकते, यह सत्य है और मैं इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ। विचारों की भिन्नता और संघर्ष से ही नवीन विचार जन्म लेते हैं।’

स्वामी विवेकानंद के समाज सेवा कार्य

(1.) मानवमात्र की सेवा को प्राथमिकता: स्वामी विवेकानंद ने अपने उपदेशों में मानव मात्र की सेवा को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया। वे शिक्षा, स्त्री-पुनरुद्धार तथा आर्थिक प्रगति के पक्षधर थे। उन्होंने रूढ़िवाद, अन्धविश्वास और अशिक्षा की आलोचना की तथा कहा– ‘जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ, जो उन्हीं के खर्च पर शिक्षा प्राप्त करता है किन्तु उनकी परवाह बिल्कुल नहीं करता।’

उन्होंने हिन्दू सन्यासियों को संकीर्णता से निकलकर सेवा कार्य करने को कहा। उनकी मान्यता थी कि सन्यासी में मानव मात्र के प्रति सेवा-भाव का लक्ष्य होना चाहिये।

(2.) देशवासियों के उत्थान हेतु नर्क में रहना स्वीकार: स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि देश की गरीबी को दूर करना आवश्यक है। वेे कहते थे कि देशवासियों के उद्धार के पुनीत कार्य के लिये उन्हें मोक्ष छोड़कर नरक में भी जाना स्वीकार है।

(3.) अस्पर्श्यता का विरोध: स्वामीजी छुआछूत के घोर विरोधी थे तथा जन्म पर आधारित वर्ण-भेद को नहीं मानते थे। उन्होंने अन्ध-विश्वासी और छुआछूत में विश्वास करने वाले सन्यासियों और ब्राह्मणों की तीव्र आलोचना की। वे थियोसॉफिकल सोसायटी से भिन्न विचार रखते थे, क्योंकि थियोसॉफिकल सोसायटी अन्ध-विश्वासों और तन्त्र-विद्या को प्रोत्साहन दे रही थी।

(4.) आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण: स्वामी विवेकानंद सामाजिक सुधारों में विश्वास नहीं करते थे। उनका कहना था कि आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण होता है जिससे देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति सम्भव है। आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से वे मनुष्य को मनुष्य बनाना चाहते थे और उसी को प्रगति मानते थे।

(5.) संगठित प्रयत्नों पर बल: स्वामी विवेकानंद ने जन-कल्याण के लिये संगठित प्रयत्नों पर बल दिया तथा इस कार्य के लिये रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जहाँ दीन-दुखियों की सहायतार्थ विभिन्न जातियाँ, वर्ग और धर्म मिल सकते थे। उनका कहना था कि गरीबोें की सहायता करना ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में एक यज्ञ होगा। विवेकानन्द की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने सन्यासियों के समक्ष व्यक्ति-निष्ठ मोक्ष की अपेक्षा समाज सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया।

(6.) भारतीयों में आत्म सम्मान की उत्पत्ति: स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों में हिन्दुओं की आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा करके हिन्दुओं की हीन भावना को समाप्त करने का प्रयास किया। भारतीयों में आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान की भावना उत्पन्न करना स्वामीजी की महान् देन है।

स्वामी विवेकानंद द्वारा राष्ट्रीयता का निर्माण

स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रीयता के निर्माण में विपुल योगदान दिया। उन्होंने हिन्दू धर्म और आध्यात्मवाद की श्रेष्ठता को स्थापित करके हिन्दुओं में आत्मगौरव और देश-प्रेम उत्पन्न किया। उन्होंने वेदान्त की व्याख्याओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में ईश्वर की ज्योति देख सकता है।

जिस प्रकार ईश्वर सदा स्वतन्त्र है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति भी सदा स्वतन्त्र है। पश्चिमी राजनीति तथा अन्य संस्थाओं के पीछे जो भारतीय दौड़ रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिये कि पश्चिमी देशों में व्यापक असन्तोष है, जबकि उनके यहाँ वे संस्थाएँ कई पीढ़ियों से चल रही है।

स्वामी विवेकानन्द ने देश में सांस्कृतिक चेतना की जो धारा प्रवाहित की, उस पर भारतीय राष्ट्रीयता का भव्य भवन खड़ा किया जा सका। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता के बल से विश्व पर सांस्कृतिक विजय प्राप्त की जा सकती है किन्तु जब तक भारत दासता की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है, वह इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को नहीं निभा सकता। उनकी मान्यता थी कि भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता विश्व मानवता के उद्धार के लिये अनिवार्य है।

उन्होंने भारतीयों में राजनीतिक स्वाधीनता की भावना जागृत की। स्वामीजी ने भगवद्गीता के कर्मयोगी श्रीकृष्ण को भारतीय राष्ट्र का आदर्श बताया। वास्तव में विवेकानंद ने देशभक्ति और समाज सेवा के जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उनसे भारत में देश-प्रेम की भावना नये सिरे से विकसित हुई।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- ‘यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकाननद को पढ़ना चाहिए।’ महर्षि अरविन्द ने लिखा है- ‘पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली, वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को जागृत नहीं हुआ है, एक बार इस हिन्दू सन्यासी को देख लेने के पश्चात् उसे और उसके संदेश को भुला देना कठिन है।’

विवेकानंद की मृत्यु के बाद उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने उनके महान् कार्यों को आगे बढ़ाया। इस संस्था के द्वारा अँग्रेजी भाषा का मासिक प्रबुद्ध भारत तथा बंगाली भाषा का पाक्षिक उद्बोधन प्रकाशित जाते रहे। कई ग्रन्थों में स्वामी विवेकानन्द के भाषणों का प्रकाशन हुआ। रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ भारत के विभिन्न नगरों में विद्यमान हैं तथा विविध प्रकार के कल्याणकारी कार्य यथा- चिकित्सालय, अनाथालय, विद्यालय, वाचनालय आदि का संचालन कर रही हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

युवा बंगाल आन्दोलन

आर्य समाज

थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

रामकृष्ण मिशन

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

सुधार आंदोलनों के परिणाम

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

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सर सैयद अहमद खाँ

जिस समय भारत में हिन्दू धर्म के भीतर सुधार आंदोलन आरम्भ हुए, उस समय मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन चलाए जाने की आवश्यकता अनुभव हुई।

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी में भारत के मुसलमानों में भी सुधार आन्दोलन आरम्भ हुए। मुस्लिम समाज इस देश में आने से पहले ही दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था- पहला, उच्च अभिजात्य वर्ग जिसमें बादशाह, अमीर तथा उनके परिवार के लोग थे और दूसरा, जन-साधारण जिसमें सैनिक, श्रमिक, सेवक तथा छोटे कार्य करने वाले मुसलमान थे।

दूसरे वर्ग में वे मुसलमान भी थे जो मूलतः हिन्दू थे तथा अनेकानेक कारणों से मुसलमान बन गये थे। धर्म-परिवर्तन के बाद भी उनके सामाजिक स्तर में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। उच्च मुस्लिम अभिजात्य वर्ग 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में राजनीतिक प्रभुत्व खो चुका था किंतु हाथ से काम करने का अभ्यस्त नहीं होने के कारण तेजी से पिछड़ता जा रहा था।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यह वर्ग दिखावे के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का प्रयास करता रहा जिससे इस वर्ग का खोखलापन और अधिक बढ़ता चला गया। 1857 ई. की सशस्त्र क्रांति की विफलता के बाद इस वर्ग की रही-सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो गयी, क्योंकि अँग्रेजों ने इस विप्लव के लिये उच्च वर्ग के मुसलमानों को उत्तरदायी माना था।

उच्च वर्ग के मुसलमान परिवर्तित परिस्थितियों से तारतम्य बैठाने को तैयार नहीं थे। इस कारण लागातार पिछड़ते जा रहे थे। अतः मुस्लिम समाज सुधार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य इस वर्ग को परिवर्तित परिस्थितियों से परिचित कराना तथा पाश्चात्य शिक्षा की ओर ध्यान दिलाना था।

इस कारण मुसलमानों का समाज सुधार आन्दोलन हिन्दुओं के समाज सुधार आन्दोलन से कई अर्थों में भिन्न था। मुसलमानों का सामाजिक और धार्मिक जीवन कुरान पर आधारित था।

अतः प्राचीन सामाजिक और धार्मिक जीवन पद्धति में परिवर्तन करने के लिए यह आवश्यक था कि कुरान की सामयिक व्याख्या की जाये अथवा यह बताया जाये कि प्रचलित सामाजिक एवं धार्मिक पद्धति, कुरान या हदीस के अनुसार नहीं है। कुछ मुस्लिम सुधारकों ने यह भी बताने का प्रयत्न किया कि सामाजिक जीवन कुरान पर आधारित नहीं होना चाहिए।

ऐसे सुधारकों का प्रभाव बहुत ही कम पड़ा, क्योंकि कुरान पर आधारित जीवन पद्धति मुस्लिम समाज में गहराई तक प्रवेश कर चुकी थी जिसे त्यागने के लिए कोई मुसलमान तैयार नहीं था।

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन – वहाबी आंदोलन

पाश्चात्य प्रभावों के प्रति मुसलमानों की पहली प्रतिक्रिया वहाबी आंदोलन अथवा वलीउल्लाह आंदोलन के रूप में हुई। शाह वलीउल्लाह (1703-63 ई.) मुसलमानों के प्रथम नेता थे जिन्होंने इस्लाम की उदारतापूर्ण व्याख्या करने तथा मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने की बात कही।

उन्होंने इस्लाम की तर्कसंगत व्याख्या करने और उसे समकालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने का समर्थन किया। वलीउल्लाह ने मुस्लिम समुदाय में व्याप्त भेदभवों को समाप्त करने के लिये सुधार आन्दोलन चलाया। वलीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अजीज, उनके भतीजे मोहम्मद इस्माइल और उनके शिष्य अहमद बल्लवी ने वलीउल्लाह के विचारों को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ इस आंदोलन को राजनीतिक रंग भी दिया।

सैयद अहमद बरेलवी के नेतृत्व में वहाबी आंदोलन ने पूर्णतः राजनीतिक स्वरूप धारण कर लिया। उनका कहना था कि अनुकूल राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से ही इस्लाम फल-फूल सकता है। उन्होंने घोषणा की कि भारत एक दार-उल हर्ब (काफिरों का देश) है और इसे दार-उल-इस्लाम (मुसलमानों का देश) बनाने हेतु समस्त गैर इस्लामी शासकों का तख्ता पलटना आवश्यक है।

प्रारंभ में यह अभियान पंजाब में सिक्खों के विरुद्ध था किंतु 1849 ई. में अँग्रेजों द्वारा पंजाब का विलय कर लिये जाने के बाद, इस आंदोलन ने अँग्रेजों के विरुद्ध जेहाद खोल दिया। यह आंदोलन 1870 ई. तक सीमांत प्रदेशों, पंजाब तथा बंगाल के कई हिस्सों में जारी रहा किंतु अँग्रेज सरकार ने इसे सैनिक बल की सहायता से कुचल दिया।

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन -अलीगढ़ आन्दोलन

सर सैयद अहमद खाँ (1817-98 ई.) ने मुसलमानों में आत्मनिर्भर बनने, अपनी सहायता आप करने तथा अँग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर आधुनिक बनने की भावना उत्पन्न की। उनके द्वारा चलाया गया अलीगढ़ आन्दोलन उनके कार्यक्षेत्र का केन्द्र बिन्दु रहा।

सर सैयद अहमद खाँ का जन्म 1817 ई. में दिल्ली में हुआ था। 20 वर्ष की आयु में वे सरकारी सेवा में चले गये। 1857 ई. के सैनिक विप्लव के समय उन्होंने अँग्रेजों की विशेष सेवा की जिससे उन्होंने अँग्रेजों की सद्भावना प्राप्त कर ली। इस सद्भावना का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हित में किया।

उस समय तक भारतीय मुसलमानों ने स्वयं को अँग्रेजी शिक्षा और सभ्यता से दूर बनाये रखा था। अँग्रेजों से उनके सम्बन्ध भी अच्छे नहीं थे और यही उनकी अवनति का मुख्य कारण था। सर सैयद अहमद खाँ ने अपने जीवन के दो प्रमुख उद्देश्य बनाये-

(1.) अँग्रेजों और मुसलमानों के सम्बन्ध ठीक करना।

(2.) मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना।

अपने पहले उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर सैयद अहमदखाँ ने मुसलमानों को समझाया कि सरकार के प्रति वफादार रहने से उनके हितों की पूर्ति हो सकती है। उन्होंने अँग्रेजों को समझाया कि मुसलमान उनके शासन के विरुद्ध नहीं हैं, अँग्रेजों द्वारा दिखाई गई थोड़ी-सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे।

अँग्रेजों ने भी मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने के लिये मुसलमानों के प्रति सद्भावना प्रकट करना उचित समझा। ऐसा करके वे हिन्दुओं में बढ़ती हुए राष्ट्रीयता के विरुद्ध मुस्लिम साम्प्रदायिकता का प्रयोग कर सकते थे। इस कारण सैयद अहमदखाँ को सरलता से अपने उद्देश्य में सफलता मिल गयी।

अपने दूसरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर सैयद अहमदखाँ ने 1864 ई. में गाजीपुर में एक अँग्रेजी शिक्षा का स्कूल स्थापित किया। एक वर्ष बाद अँग्रेजी पुस्तकों का उर्दू अनुवाद करने के लिए विज्ञान समाज की स्थापना की। तत्पश्चात् वे लन्दन चले गये और 1869 ई. में लन्दन यात्रा के बाद मुसलमानों की सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए एक आन्दोलन आरम्भ किया।

दिसम्बर 1870 में उन्होंने तहजीब-उल-अखलाक नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ कर मुसलमानों को बदलती हुई परिस्थितियों से अवगत कराया। सर सैयद अहमदखाँ मुसलमानों के प्राचीन सामाजिक मूल्यों तथा रहन-सहन के तरीकों को समय के अनुकूल नहीं मानते थे। चूँकि मुसलमान अपने सामाजिक जीवन को कुरान तथा हदीस पर आधारित समझते थे, इसलिए सर सैयद अहमदखाँ को धर्म सम्बन्धी विवाद आरम्भ करना पड़ा।

सर सैयद अहमद खाँ ने कुरान का अर्थ समझाने के लिए उसकी नई व्याख्या की जिसका मुख्य आधार यह था कि समस्त सृष्टि का निर्माता अल्लाह है और वही कुरान का रचियता है। अतः कुरान वास्तविक स्थिति से भिन्न नहीं हो सकती। हदीस भी न तो कुरान के विरुद्ध हो सकती है और न वास्तविकता से भिन्न हो सकती है।

कुरान की नई व्याख्या करने के लिए उन्होंने तफसील-उल-कुरान लिखना आरम्भ किया जो पूरी नहीं हो सकी। सर सैयद अहमदखाँ ने अपने समाचार पत्र तहजीब-उल-अलखाक का उद्देश्य मुसलमानों को सभ्य बनाना बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज तब तक सभ्य नहीं बन सकता, जब तक वह प्राचीन परम्पराओं को छोड़कर नई परम्पराओं को न अपना ले।

उनकी मान्यता थी कि प्रत्येक परम्परा समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनाई जानी चाहिए क्योंकि बदलती हुई परिस्थितियों में परम्पराएँ भी अनुपयोगी सिद्ध हो जाती हैं। उन्होंने हज करने, जकात बाँटने, मस्जिद बनवाने आदि कार्यों की कटु आलोचना की तथा मुसलमानों को पश्चिमी सभ्यता एवं पद्धति अपनाने की सलाह दी।

अलीगढ़ आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में पश्चिमी शिक्षा को लोकप्रिय बनाना था जबकि मुसलमान अरबी, फारसी तथा धार्मिक शिक्षा को आवश्यक मानते थे तथा अँग्रेजी पढ़ना अच्छा नहीं समझते थे। अतः जिस किसी संस्था का सम्बन्ध अँग्रेजी राज्य से जुड़ा हुआ था, उससे वे अपने आपको अलग रखते थे।

कुछ मुल्ला-मौलवी भी अरबी, फारसी व धार्मिक शिक्षा को ही आवश्यक मानते थे। सर सैयद अहमदखाँ ने अँग्रेजी शिक्षा प्रणाली के दोषों को मुसलमानों की अरुचि का कारण बताया।

1882 ई. में उन्होंने हण्टर कमीशन के समक्ष गवाही देते हुए कहा- ‘मुसलमान ऐसी शिक्षण संस्थाओं में नहीं जाना चाहते, जहाँ अन्य सम्प्रदाय के लोग भी पढ़ते हों, क्योंकि मुसलमान उन्हें अपने से निम्न-स्तर का मानते हैं।’

मुसलमानों की मान्यता थी कि पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने से अधर्म बढ़ता है तथा अँग्रेजी पढ़ना ईसाई धर्म स्वीकार करने के समान है। इस कारण अँग्रेजी शिक्षा ग्रहण करके वे काफिर कहलाये जा सकते हैं।

सर सैयद अहमदखाँ ने 1875 ई. में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना की, जिसका आरम्भिक रूप एक प्राइमरी स्कूल था। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का विधिवत् उद्घाटन किया तथा उत्तर प्रदेश के गवर्नर विलियम म्यूर ने इस कॉलेज के लिए भूमि प्रदान की।

इस प्रकार आरम्भ से ही इस संस्था पर अँग्रेजों की कृपा दृष्टि रही। यही कॉलेज आगे चलकर अलीगढ़ विश्वविद्यालय बना। इसमें आधुनिक विचारधारा के मुसलमानों ने शिक्षा प्राप्त की और यह अलीगढ़ आन्दोलन का केन्द्र बन गया। सर सैयद अहमदखाँ ने मोहम्मडन एजूकेशनल कांफ्रेंस की स्थापना करके ऐसे अनेक मुसलमानों को अपने साथ जोड़ लिया जो मुसलमानों को पाश्चात्य सभ्यता के सम्पर्क में लाने के उत्सुक थे।

अलीगढ़ मोहम्मडन कॉलेज मुसलमानों की शिक्षण संस्था होने के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक स्थिति सुधारने का केन्द्र भी बन गया। सर सैयद अहमदखाँ की मान्यता थी कि यहाँ से अध्ययन करके निकले हुए विद्यार्थी समाज में परिवर्तन लायेंगे। इस कॉलेज में विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर अधिक बल दिया जाता था।

वाद-विवाद प्रतियोगिता, खेलकूद, छात्रावास में अनिवार्य रूप से निवास तथा अँग्रेज अध्यापकों व अधिकारियों से मेल-जोल बढ़ाना, कॉलेज शिक्षा के अंग थे। सर सैयद अहमदखाँ ने अँग्रेजी शिक्षा पर अधिक बल दिया, क्योंकि सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक था।

उनकी मान्यता थी कि किसी समुदाय में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा इसी आधार पर आँकी जा सकती है कि राजकीय सेवा में उसे क्या स्थान प्राप्त है। वे प्रारम्भिक शिक्षा की अपेक्षा उच्च शिक्षा पर अधिक बल देते थे। अलीगढ़ मोहम्मडन कॉलेज के विद्यार्थी मुस्लिम सम्प्रदाय के हितों के लिए अधिक प्रयत्नशील रहते थे।

19वीं शताब्दी में मुसलमानों में समाज सुधार का मुख्य कार्य पुरुषों की अँग्रेजी शिक्षा तक सीमित था। सर सैयद अहमद खाँ मुस्लिम स्त्रियों के लिए शिक्षा को अनावश्यक तथा पर्दा-प्रथा को अनिवार्य मानते थे। वे बहु-विवाह को तर्क-संगत मानते थे। वे स्त्रियों को कुशल माताएँ व गृहणियाँ बनाने के पक्षधर थे न कि नौकरी करने वाली औरत। अतः अलीगढ़ आन्दोलन स्त्रियों के लिए परम्परागत शिक्षा तथा जीवन पद्धति को बदलने के पक्ष में नहीं था।

अलीगढ़ आन्दोलन एक ओर तो मुसलमानों में पश्चिमी सभ्यता के प्रति नया दृष्टिकोण लाने में सफल रहा किन्तु दूसरी ओर इसने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बहुत बढ़ावा दिया। अलीगढ़ कालेज के प्रथम प्रिंसिपल थियोडोर बेक की प्रेरणा से 1893 ई. में मुसलमानों का एक संगठन बना जिसका लक्ष्य भारतीय मुसलमानों को राजनीति से पृथक् रखना था।

बेक के बाद जब मौरिसन, कॉलेज का प्रिन्सिपल बना तो उसने राष्ट्रीय काँग्रेस का विरोध करने के लिए मुसलमानों को संगठित करना आरम्भ किया। स्वयं सर सैयद अहमदखाँ भी काँग्रेस के कट्टर विरोधी हो गये। अधिकांश अवसरों पर उन्होंने साम्प्रदायिक कट्टरता से ओत-प्रोत विचार प्रकट किये।

अलीगढ़ कॉलेज के प्रिन्सिपल आर्किबॉल्ड तथा अलीगढ़ कॉलेज के मन्त्री नवाब मोशी-उल-मुल्क की प्रेरणा से 1906 ई. में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। अलीगढ़ आन्दोलन भारतीय राष्ट्रीयता और राजनीति का विरोधी रहा। इस विरोध के कई कारण थे-

(1.) सर सैयद अहमद खाँ तथा उनका अलीगढ़ आन्दोलन प्रारम्भ से ही अँग्रेजों की सहानुभूति पर निर्भर थे। अतः यह आवश्यक था कि वे प्रगतिशील एवं राष्ट्रीय हिन्दुओं के विरुद्ध ब्रिटिश कूटनीति का समर्थन करें।

(2.) सर सैयद अहमद खाँ पश्चिमी सभ्यता से अत्यधिक प्रभावित थे इसलिए वे अँग्रेजों के बहुत बड़े समर्थक थे।

(3.) सर सैयद अहमद खाँ को भय था कि अल्पसंख्यक मुसलमान, बहुसंख्यक हिन्दुओं का मुकाबला नहीं कर सकेंगे। अतः अँग्रेजों का समर्थन करना तथा उनकी सहायता पर निर्भर रहना मुसलमानों के हितों के लिए आवश्यक था।

सर सैयद अहमद खाँ द्वारा प्रकट किये गये विचारों के अनुसार अलीगढ़ आन्दोलन के मुख्य रूप से चार आधार थे-

(1.) हिन्दु और मुसलमान दो अलग-अलग राजनीतिक इकाइयाँ हैं जिनके हितों और दृष्टिकोणों में काफी अन्तर है।

(2.) भारत में जनतन्त्र के आधार पर प्रतिनिधि सभाओं की स्थापना करने तथा असैनिक सेवाओं की परीक्षा भारत में करने से मुसलमानों के हितों की सुरक्षा सम्भव नहीं हो सकेगी, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक मुसलमान, बहुसंख्यक हिन्दू सत्ता के अधीन हो जायेंगे, जो अँग्रेजी शासन से भी बुरा होगा।

(3.) मुसलमानों को अँग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत ही अपने हितों को सुरक्षित समझना चाहिये। अतः मुसलमानों को अँग्रेजों के विरुद्ध किसी भी राजनैतिक आन्दोलन में भाग नहीं लेना चाहिये।

(4.) चूँकि मुसलमानों के हित अँग्रेजों के हाथों में सुरक्षित हैं, अतः उन्हें राजनीति से पृथक् रह कर अपने सांस्कृतिक विकास का प्रयत्न करना चाहिये। राजनीति से पृथक् रहकर वे हिन्दुओं के राजनीतिक आन्दोलन को दुर्बल कर सकेंगे।

इस प्रकार अलीगढ़ आन्दोलन मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। यह सदैव भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के विरोध में रहा। पाकिस्तान के निर्माण में उसका बड़ा योगदान रहा। साथ ही यह भी सच है कि अलीगढ़ आन्दोलन ने भारतीय मुसलमानों को अँग्रेजी शिक्षा से जोड़कर निराशा से बचाया तथा उन्हें मध्य युग से आधुनिक युग में लाने में सहायता दी।

देवबंद शाखा

1867 ई. में मौलाना मुहम्मद कासिम के नेतृत्व में उलमा के एक दल ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद कस्बे में एक मदरसे की स्थापना की। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य कुरान तथा हदीस की शुद्ध शिक्षा का प्रसार करना था। अलीगढ़ आंदोलन पश्चिमी शिक्षा तथा अँग्रेजी सरकार का समर्थन करता था, उसके विपरीत देवबंद आंदोलन परम्परागत शैली में इस्लाम के प्रचार का काम करता था।

इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार का जमकर विरोध किया। जहाँ सर सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध करते हुए आम मुसलमान को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी, वहीं देवबंद शाखा ने कांग्रेस का स्वागत करते हुए मुसलमानों का आह्वान किया कि वे आम राजनीतिक आंदोलन में भाग लें।

अबुल कलाम आजाद देवबंद से जुड़े हुए थे, उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुखता से हिस्सा लिया। देवबंद आंदोलन ने गांधीजी द्वारा आरम्भ किये गये असहयोग आंदोलन को समर्थन दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

युवा बंगाल आन्दोलन

आर्य समाज

थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

रामकृष्ण मिशन

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

सुधार आंदोलनों के परिणाम

सोने का दिल लोहे के हाथ ! (117)

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सोने का दिल लोहे के हाथ

सरदार पटेल भारतीय इतिहास के ऐसे अप्रतिम महापुरुष हुए हैं जिन्हें सोने का दिल लोहे के हाथ वाला मनुष्य कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिस समय भारत को आजादी मिली, उस समय सांसारिक क्षुद्रताओं को जीत पाने वाले अकेले राजनेता था। उनके सामने गांधी और नेहरू सहित समस्म कांग्रेसी नेता बहुत बौने दिखाई देते हैं।

चाणक्य और समुद्रगुप्त की तरह थे सरदार पटेल

संसार में ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं जो संसार की सेवा करने के लिए अपने हाथों को लोहे का और दिल को सोने का बना लेते हैं। सरदार पटेल ऐसे ही विरले महापुरुष थे।

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गुजरात के प्लेग रोगियों की सेवा करने के लिए उन्होंने अपना जीवन खतरे में डाल दिया और रोगियों की सेवा करते-करते, स्वयं प्लेग ग्रस्त होकर गांव से बाहर एक मंदिर में जाकर रहने लगे। उन्होंने अपनी कमाई भाइयों पर लुटा दी और प्रधानमंत्री की कुर्सी गांधीजी की इच्छा के लिए कुर्बान कर दी। वे चाहते थे तो प्रधानमंत्री बन सकते थे किंतु उन्होंने देश की स्वतंत्रता के रथ को तेजी से आगे बढ़ने देने के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी को वैसे ही त्याग दिया जैसे सुभाषचंद्र बोस ने गांधीजी की इच्छापूर्ति के लिए कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी त्याग दी थी। सरदार पटेल का निजी जीवन सरलता और सादगी से गहगह महकता था। पहली पत्नी की मृत्यु के उपरांत उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया। गरीबी का दंश झेलकर भी उन्होंने लंदन जाकर बैररिस्ट्री की पढ़ाई की। जब सम्पन्नता जीवन में आने लगी तो वकालात त्यागकर, वे स्वातंत्र्य समर में कूद पड़े। अंग्रेजी वेशभूषा त्यागकर उन्होंने देशी कुर्ता और धोती को अपना लिया। अपने पुत्र के विवाह के आयोजन पर उन्होंने केवल 12 रुपये व्यय किये। उनकी पुत्री मणिबेन आजीवन उनके साथ छाया की तरह रहीं किंतु वे भी साधारण खादी  की मोटी सफेद साड़ी पहनती थीं। सरदार पटेल का त्यागमय जीवन भारतीय ऋषियों की परम्परा का जीता-जागता प्रमाण था।

सोने का दिल लोहे के हाथ वाले इस भारतीय ऋषि को हमारा शत-शत प्रणाम है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब द्वारा ध्वस्त भवन

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औरंगजेब एक क्रूर, धर्मान्ध और हत्यारा शासक ही नहीं था, अपितु वह कला और संस्कृति का भी बहुत बड़ा शत्रु था। औरंगजेब द्वारा ध्वस्त भवन अब हमें देखने को नहीं मिल सकते किंतु उनकी सूची बहुत लम्बी है।

औरंगजेब के काल में मंदिरों का विध्वंस

औरंगजेब का मानना था कि मुसलमानों के लिए यह उचित नहीं है कि उनकी दृष्टि किसी बुतखाने अर्थात् मंदिर पर पड़े। इसलिए बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा-स्थलों को गिरवाना तथा देव-मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था।

चिंतामणि मंदिर का ध्वंस

औरंगजेब जब गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर मस्जिद बनवा दी।

कटक तथा मेदिनीपुर के मंदिरों का ध्वंस

तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिए कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने भी हिन्दू मन्दिर हैं उन्हें गिरवा दिया जाए। इनमें तिलकुटी का नवनिर्मित भव्य मंदिर भी सम्मिलित था।

सोमनाथ मंदिर का ध्वंस

सोमनाथ का तीसरी बार निर्मित मन्दिर भी औरंगजेब के आदेश से ध्वस्त कर दिया गया।  ई.1665 में उसने आदेश दिए कि गुजरात का जो मंदिर तोड़ा गया था, उसे हिन्दुओं ने फिर से बनवा लिया है, उसे पुनः तोड़ा जाए।

केशवराय मंदिर की रेलिंग का ध्वंस

ई.1666 में औरंगजेब ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर स्थित केशवराय मंदिर के पत्थर के उस कटरे (रेलिंग) को तुड़वाया जिसे दारा शिकोह ने बनवाया था। 

दिल्ली का कालकाजी मंदिर का विध्वंस

28 अगस्त 1667 को आम्बेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु हो जाने के 6 दिन बाद 3 सितम्बर 1667 को औरंगजेब ने सीदी फौलाद खाँ को 100 बेलदार लगाकर 2,000 वर्ष पुराने (ईसा पूर्व तीसरी शती में निर्मित) दिल्ली के कालकाजी शक्तिपीठ तथा उसके क्षेत्र में आने वाले समस्त हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने के आदेश दिए। 12 सितम्बर को सीदी ने औरंगजेब को सूचना दी कि आदेशों की पूर्णतः पालना हो गई है। मंदिर तोड़ने के दौरान एक ब्राह्मण ने सीदी पर तलवार से वार किए जिससे सीदी के शरीर पर तीन घाव लगे। सीदी ने उस ब्राह्मण का सिर पकड़ लिया। ब्राह्मण को वहीं मार दिया गया तथा सीदी बच गया।

समस्त हिन्दू मंदिरों एवं पाठशालाओं को तोड़ने के आदेश

9 अप्रेल 1669 को औरंगजेब ने सम्पूर्ण मुगल सल्तनत में हिन्दुओं के मंदिरों एवं विद्यालयों को पूर्णतः नष्ट करने के आदेश जारी किए। मंदिरों को तोड़ने का औरंगजेब का आदेश प्रत्येक मुगल परगने में भेजा गया। ढाका जिले के धामारी गांव के यशोमाधव मंदिर से इस आदेश की एक प्रति प्राप्त हुई है।

मलारना के शिव मंदिर का विनाश

मई 1669 में सालेह बहादुर को राजपूताना में मोरेल नदी के तट पर स्थित मलारना गांव के शिव मंदिर को तोड़ने भेजा गया।

काशी विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस

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ई.1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। ई.1632 में शाहजहाँ ने इस भव्य मंदिर को तोड़ने के लिए सेना भेजी। हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण शाहजहाँ की सेना विश्वनाथ मंदिर को तो नहीं तोड़ सकी किंतु काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खाँ द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है।

सितम्बर 1669 में औरंगजेब की सेना ने 3,000 वर्ष पुराने काशी (बनारस) में स्थित विश्वनाथ मन्दिर को गिरवाकर विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया, जो आज भी विद्यमान है। इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण सहित कई प्राचीन पुराणों में मिलता है। इसे ई.1194 में कुतुबुद्दीन एबक ने तोड़ा। इल्तुतमिश (ई.1211-1266) के शासनकाल में गुजरात के एक व्यापारी ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

हुसैन शाह शर्की (ई.1447-58) अथवा सिकंदर लोदी (ई.1489-1517) ने इस मंदिर को तोड़ दिया। अकबर के शासनकाल में राजा मानसिंह ने इस मंदिर को फिर से बनवाने की चेष्टा की किंतु हिन्दुओं ने मानसिंह के मंदिर को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह मुसलमान बादशाह अकबर का सम्बन्धी थी।

ई.1585 में राजा टोडरमल ने अकबर से धन लेकर इस मंदिर का निर्माण करवाया। औरंगजेब के काल में इस मंदिर को तोड़ा गया। ई.1780 में मराठा रानी अहिल्या बाई होलकर ने मस्जिद के पास एक शिव मंदिर बनवाया जिसे अब काशी विश्वनाथ कहा जाता है। औरंगजेब ने काशी का नाम मुहम्मदाबाद रख दिया।

औरंगजेब द्वारा ध्वस्त भवन केवल मिट्टी में ही नहीं मिल जाते थे अपितु उनके स्थान पर मस्जिद खड़ी की जाती थी। औरंगजेब के आदेश पर बनारस में बनवाई गई मस्जिद को ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ कहा गया। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।

औरंगजेब द्वारा ध्वस्त भवन की सामग्री उसी स्थान पर बनाई जाने वाली मस्जिद के निर्माण में प्रयुक्त होती थी। कई बार तो मस्जिद के भीतर की संरचना ज्यों की त्यों रख ली जाती थी और उसका बाह्य रूप मस्जिद जैसा बना दिया जाता था।

काशी विश्वनाथ का मंदिर महाभारत और उपनिषद काल में भी था। हिन्दुओं की मान्यता है कि ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। बाद में विक्रमादित्य नामक किसी चक्रवर्ती राजा ने भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर को ई.1194 में मुहम्मद गौरी ने तोड़ दिया। हिन्दुओं ने इस स्थान पर पुनः एक मंदिर का निर्माण किया जिसे ई.1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया।

ई.1752 से ई.1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर की मुक्ति के प्रयास किए। 7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने बादशाह शाहआलम से, मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने तथा मंदिर का नवीनीकरण करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया।

बाद में ई.1777-80 की अवधि में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहाँ विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।

ई.1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मंडप का क्षेत्र था। 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा किंतु इस आदेश की पालना नहीं की गई।

ब्रजभूमि के मंदिरों का विनाश

ई.1669 में जैसे ही औरंगजेब ने समस्त हिन्दू मंदिरों को गिराने के आदेश दिए, वैसे ही मथुरा, वृंदावन तथा ब्रज क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों के पुजारी एवं सेवादार अपने आराध्य देवों के विग्रहों को मंदिरों से निकालकर अन्य स्थानों को ले जाने लगे। बहुत से पुजारियों ने अपने आराध्य देवों की प्रतिमाओं को लेकर राजपूत रियासतों की ओर पलायन किया।

महाप्रभु वल्लभाचार्यजी के वंशज गिरधर गुसाईंजी, बूंदी नरेश भावसिंह के सरंक्षण में भगवान मथुराधीश की विख्यात प्रतिमा को ब्रज से निकालकर बूंदी ले आए जहाँ से यह प्रतिमा राजा दुर्जनशाल द्वारा कोटा ले जाई गई तथा उसके लिए कोटा में मथुरेशजी का विख्यात मंदिर बनवाया गया।

इस विग्रह का प्राकट्य गोकुल के निकट कर्णावल गांव में हुआ था तथा इस विग्रह को महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अपने शिष्य पद्मनाथजी के पुत्र विट्ठलनाथ जी को दिया था। उन्होंने यह प्रतिमा अपने पुत्र गिरधरजी को दी थी। कोटा के मथुरेशजी मंदिर को अब वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ माना जाता है।

इसी प्रकार ई.1669 में वृंदावन के विशाल गोविंददेव मंदिर के विग्रह को भी वृंदावन से निकालकर जयपुर पहुंचा दिया गया। इस विग्रह का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने अपनी माता के मुख से सुने भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप के आधार पर करवाया था। इस विग्रह को चैतन्य महाप्रभु के आदेश से उनके शिष्य रूप गोस्वामी ने गोमा टीले के नीचे से खोद कर प्राप्त किया था।

ई.1590 में अकबर की अनुमति से राजा मानसिंह ने वृंदावन में इस विग्रह हेतु एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया। यह देवालय पूर्व-पश्चिम में 117 फुट लम्बा और उत्तर-दक्षिण में 105 फुट चैड़ा था। मुगलकाल में इससे अधिक भव्य मंदिर नहीं बना था। अकबर ने इस मंदिर की गायों के चारागाह के लिए 135 बीघा भूमि प्रदान की थी। इसकी सातवीं मंजिल पर जलते हुए दीपों का प्रकाश आगरा तक दिखाई देता था।

जब मंदिर तोड़ने के आदेश हुए तो औरंगजेब के भय से मंदिर के सेवादार श्रीशिवराम गोस्वामी, भगवान श्रीगोविंददेव और राधारानी के विग्रहों को लेकर जंगलों में जा छिपे और बाद में जयपुर नरेश सवाई जयसिंह के पुत्र रामसिंह के संरक्षण में वृंदावन से जयपुर ले आए जहाँ यह प्रतिमा आज भी विराजमान है।

जयपुर के शासक गोविंददेव को राज्य का स्वामी तथा स्वयं को राज्य का दीवान मानते थे। ई.1670 में औरंगजेब के आदेश से वृंदावन में स्थित गोविंददेव का भव्य मंदिर तोड़ा गया। औरंगजेब ने वृंदावन के गोविंददेव मंदिर की तीन मंजिलों को तुड़वा दिया तथा अकबर द्वारा गौशाला के लिए दी गई 135 बीघा भूमि का पट्टा निरस्त कर दिया।

29 सितम्बर 1669 को मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत पर स्थित गिरिराज मंदिर के गुंसाई दामोदरजी, अपने चाचा गोविन्दजी एवं अन्य पुजारियों को साथ लेकर गोवर्द्धन से राजपूताने की ओर रवाना हो गए। वे आगरा, बूंदी, कोटा एवं पुष्कर होते हुए किशनगढ़ पहुंचे। किशनगढ़ के महाराजा मानसिंह ने ‘पीताम्बर की गाल’ में भगवान को पूर्ण भक्ति सहित विराजमान करवाया और विविधत् उनकी पूजा की किंतु भगवान को किशनगढ़ में रखने से असर्थता व्यक्त की।

इसलिए यहाँ से श्रीनाथजी जोधपुर राज्य के चैपासनी गांव पहुंचे। उस समय महाराजा जसवंतसिंह जमरूद के मोर्चे पर थे इसलिए राज्याधिकारियों ने आशंका व्यक्त की कि हम श्रीनाथजी के विग्रह की रक्षा नहीं कर पाएंगे। इस पर मेवाड़ नरेश राजसिंह ने गुसाइयों को वचन दिया कि मेवाड़ राज्य में एक लाख हिन्दुओं के सिर काटे बिना औरंगजेब श्रीनाथजी के विग्रह को स्पर्श नहीं कर पाएगा। इसलिए वे श्रीनाथजी को मेवाड़ में ले आएं। राजसिंह के निमंत्रण पर ई.1672 में श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे तथा उन्हें सिहाड़ गांव में विराजित किया गया जो अब नाथद्वारा कहलाता है। 

मदनमोहनजी के मंदिर का ध्वंस

वृंदावन में वैष्णव संप्रदाय का मदन मोहनजी का विख्यात मंदिर स्थित था। इसका निर्माण ई.1590 से ई.1627 के बीच मुल्तान निवासी रामदास खत्री या कपूरी द्वारा करवाया गया। समस्त हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के औरंगजेब के आदेश के बाद मदनमोहनजी की प्रतिमा को जयपुर ले जाया गया जहाँ से करौली का राजा उन्हें करौली ले गया। मदनमोहनजी के वृंदावन वाले मंदिर को औरंगजेब के सैनिकों ने तोड़ डाला ई.1819 में नंदलाल वासु ने इसे पुनः बनवाया। प्राचीन निर्माण की तुलना में नया मंदिर छोटा है। इसे लाल पत्थर से बनाया गया है तथा पत्थर पर सुंदर नक्काशी की गई है। मंदिर ऊँचा किंतु संकरा दिखाई देता है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर का ध्वंस

ई.1670 में औरंगजेब के आदेश से मथुरा के केशवराय मन्दिर को तोड़कर उसके पत्थरों से उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई गई तथा मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया गया। इस मंदिर से कई मूल्यवान प्रतिमाएं प्राप्त हुईं जिनमें हीरे-जवाहर लगे हुए थे।

औरंगजेब ने इन प्रतिमाओं को बेगम साहिब की मस्जिद के रास्ते की सीढ़ियों में लगवाया ताकि उन्हें पैरों से ठोकर मारी जा सके। औरंगजेब चाहता था कि मंदिरों, विद्यालयों, पुस्तकों आदि को नष्ट करके, हिन्दुओं के मेलों, त्यौहारों को बंद करके, हिन्दू न्याय एवं विधि को समाप्त करके तथा तीर्थों के वास्तविक नामों को बदलकर हिन्दुओं के मन से हिन्दू धर्म के गौरव को पूर्णतः मिटा दिया जाए।

उज्जैन के मंदिरों का ध्वंस

मथुरा एवं वृंदावन के मंदिर को तोड़ने के बाद औरंगजेब ने गदाबेग को 400 सिपाहियों के साथ उज्जैन के मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। मालवा के सूबेदार वजीर खाँ को भी उज्जैन पहुंचने के आदेश दिए गए। जब मुस्लिम सेना उज्जैन के सुप्रसिद्ध महाकाल मंदिर पर हमला करने पहुंची तो उज्जैन के रावत ने मुस्लिम सेना का प्रबल विरोध किया। उसने गदाबेग तथा उसके 121 सिपाहियों का वध कर दिया। रावत की बहादुरी को आज भी लोकगीतों में स्मरण किया जाता है।

अयोध्या के मंदिरों का विध्वंस

औरंगजेब के सेनापतियों ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ को नष्ट कर दिया जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया था। अयोध्या का ‘स्वर्गद्वारम्’ नामक मंदिर भी तोड़ दिया गया जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया।

कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि अयोध्या का ‘जन्मस्थानम्’ नामक मंदिर भी औरंगजेब के शासकाल में तोड़ा गया था जहाँ भगवान ने लौकिक देह में जन्म लिया था जबकि अधिकतर इतिहासकारों की मान्यता है कि जन्मस्थानम् मंदिर को बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में ध्वस्त किया था।

शेखावटी के मंदिरों का विध्वंस

ई.1679 में औरंगजेब ने मीर आतिश दाराब खाँ को शेखावाटी क्षेत्र के खण्डेला गांव में स्थित मोहनजी का विशाल मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। 8 मार्च 1679 को आतिश दाराब खाँ ने मंदिर पर हमला किया तो 300 हिन्दू, मंदिर की रक्षा के लिए आगे आए। आतिश खाँ ने उन सभी की हत्या कर दी। इनमें मारवाड़ से विवाह करके लौटा सुजानसिंह नामक एक राजपूत भी था। उसकी प्रशंसा में आज भी शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाए जाते हैं।

मुगल सेना ने खण्डेला स्थित मोहनजी का मंदिर, खाटू श्यामजी स्थित सांवलजी का मंदिर एवं निकटवर्ती अन्य मंदिर तोड़ दिए। खण्डेला का राजा बहादुरसिंह अपनी प्रजा एवं सैनिकों के साथ कोट सकराय के पहाड़ी दुर्ग में चला गया तथा मुगलों से भारी मोर्चा लिया।

मारवाड़ राज्य के मंदिरों का विध्वंस

मारवाड़ के राठौड़ राजा वैष्णव धर्म के अनुयाई थे। इसलिए मारवाड़ में विष्णु एवं उनके अवतारों के हजारों मंदिर बने। 25 मई 1679 को खानजहाँ बहादुर मारवाड़ राज्य के मंदिरों को ढहाकर दिल्ली लौटा। वह अपने साथ जोधपुर, फलोदी, मेड़ता, सिवाना, पोकरण, सांचोर, जालोर, भीनमाल तथा मारोठ आदि कस्बों में स्थित प्रसिद्ध मंदिरों की कीमती मूर्तियों की कई बैलगाड़ियां भर कर लाया था। इन मूर्तियों में बहुत सी मूर्तियों पर हीरे-जवाहर लगे हुए थे। बहुत सी मूर्तियों पर सोने चांदी के आभूषण एवं मुकुट आदि थे। औरंगजेब ने इन देव-विग्रहों को जिलाउखाना तथा जामा मस्जिद के रास्ते में लगवा दिया ताकि मुस्लिम इन्हें रोज ठोकरों से मार सकें।

खानजहाँ ने अपनी इस विध्वंस यात्रा में मण्डोर के 8वीं शताब्दी ईस्वी के प्राचीन मंदिर सहित ओसियां के हरिहर मंदिर, महिषसुर मर्दिनी मंदिर, त्रिविक्रम मंदिर सहित अनेक प्राचीन मंदिरों का विनाश किया जिनके ध्वंसावशेष आज भी खड़े हैं। अनेक प्रतिमाओं के चेहरे विकृत कर दिए गए।

पुष्कर के मंदिर का विध्वंस

पुष्कर का मंदिर जहाँगीर के शासनकाल में तोड़ा जा चुका था जिसे हिन्दुओं ने पुनः बना लिया था। अगस्त 1679 में औरंगजेब ने मुगल फौजदार तहव्वर खाँ को पुष्कर का वाराह मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। मेड़तिया राठौड़ों ने मंदिर की रक्षार्थ अपना बलिदान करने का निर्णय लिया और 19 अगस्त को पुष्कर पहुंचकर मुगल फौजदार पर आक्रमण किया। तीन दिनों तक दोनों पक्षों में लड़ाई चलती रही जब तक कि अंतिम हिन्दू सैनिक कटकर नहीं गिर गया।

मेवाड़ के मंदिरों का विध्वंस

फरवरी 1679 में औरंगजेब ने हसन अली खाँ को मेवाड़ क्षेत्र में सेना लेकर पहुंचने के आदेश दिए तथा औरंगजेब स्वयं भी 30 नवम्बर 1679 को अजमेर से मेवाड़ के लिए रवाना हुआ ताकि उदयपुर के मंदिरों को गिराया जा सके। महाराणा राजसिंह उदयपुर छोड़कर पहाड़ों में चला गया। 24 जनवरी 1680 को औरंगजेब उदयसागर झील के किनारे पहुंचा तथा वहाँ स्थित तीनों मंदिर ढहा दिए। वहीं पर औरंगजेब को सूचना मिली कि यहाँ से 5 कोस की दूरी पर एक और झील है जिसके किनारे भी मंदिर बने हुए हैं।

औरंगजेब ने यक्का ताज खाँ, हीरा, हसन अली खाँ तथा रोहिल्ला खाँ को उन्हें भी गिराने का आदेश दिया। उदयपुर नगर में स्थित विख्यात एवं भव्य जगदीश मंदिर पर भी आक्रमण किया गया। इस मंदिर को महाराजा जगतसिंह (ई.1628-52) ने कई लाख रुपयों की लागत से बनवाया था। इसे जगन्नाथराय का मंदिर भी कहते थे। इस मंदिर के सामने 20 माचातोड़ सैनिकों को सुलाया गया। जब मुगलों की सेना आई तो एक-एक करके माचातोड़ उठे तथा शत्रुओं के सिर काटते हुए स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हुए।

29 जनवरी 1680 को हसन अली खाँ ने औरंगजेब को सूचित किया कि अब तक उदयपुर में 172 मंदिरों को ढहाया जा चुका है। इनमें से उस काल के प्रसिद्ध अनेक मंदिर सदा के लिए नष्ट हो गए और हिन्दू उन्हें पूरी तरह भूल गए। केवल वही मंदिर याद रहे जिनका कुछ अंश टूट जाने से शेष रहा था। 22 फरवरी 1681 को औरंगजेब चित्तौड़ पहुंचा। उसने चित्तौड़ में स्थित 63 प्राचीन मंदिरों को ढहा दिया। इनमें आठवीं शताब्दी के कालिका माता मंदिर (वास्तव में सूर्य मंदिर) सहित आठवीं-दसवीं शताब्दी के अनेक मंदिर भी सम्मिलित थे जिन्हें बेरहमी से ढहाया गया।

इन मंदिरों के साथ ही शिल्प एवं स्थापत्य का एक सुंदर संसार सदा के लिए मानव सभ्यता की आंखों से ओझल हो गया। जून 1681 तक औरंगजेब की सेनाओं ने मेवाड़ राज्य में ताण्डव किया। दुर्ग के भीतर स्थित 63 मंदिरों के अतिरिक्त भी चित्तौड़ क्षेत्र के अन्य मंदिर तोड़े गए।

इनमें परिहारों द्वारा 10वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित कूकड़ेश्वर महादेव, समिद्धेश्वर महादेव, अन्न्पूर्णा एवं बाणमाता मंदिर भी सम्मिलित थे। 22 मार्च 1680 को औरंगजेब अजमेर लौट गया।

20 अप्रेल 1680 को मेरठ के दारोगा ने सूचित किया कि बादशाह के आदेश से मेरठ के मंदिरों के दरवाजों को तोड़ दिया गया है तथा अब वह चित्तौड़ के काफिरों को दण्ड देने जा रहा है।

आम्बेर के मंदिरों का ध्वंस

जून 1680 में अबू तुराब ने औरंगजेब को सूचित किया कि आम्बेर में 66 हिन्दू मन्दिरों को तोड़ दिया गया है। आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन-काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी।

2 अगस्त 1680 को मालवा का सुप्रसिद्ध सोमेश्वर मंदिर नष्ट कर दिया गया। 28 मार्च 1681 को असद खाँ ने आम्बेर के निकट गोनेर में स्थित जगदीश मंदिर को नष्ट किया। गजसिंह नामक एक राजपूत योद्धा ने अपने पाँच आदमियों सहित मंदिर में मुसलमानों के विरुद्ध मोर्चा जमाया, वे कई मुगल सैनिकों को मारकर वीरगति को प्राप्त हुए।

घोरबंद मंदिर का विनाश

उन्हीं दिनों औरंगजेब को सूचना मिली कि काबुल क्षेत्र में घोरबंद नामक थाने पर नियुक्त राजा मांधाता घोरबंद के दुर्ग में स्थित एक मंदिर में फूलों से मूर्तियों की पूजा करता है तथा आरती एवं भोग लगाता है। इस पर राजा मांधाता को घोरबंद से अन्यत्र भेजा गया तथा मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बनाई गई। उसी वर्ष हसन अली खाँ ने सूचित किया कि उसने इस्लामाबाद (मथुरा) में एक मंदिर को तोड़ा है तथा एक हिन्दू बस्ती को नष्ट करके वहाँ हसनपुर नामक गांव बसाया है।

जगन्नाथ मंदिर का विनाश

जून 1681 में शाइस्ता खाँ को आदेश भेजकर ब्रह्मपुराण में वर्णित पुरी के जगन्नाथ मंदिर को तुड़वाया गया। यह मंदिर पहले भी मुसलमानों द्वारा कई बार तोड़ा गया था एवं हिन्दुओं द्वारा पुनःपुनः बनाया गया। औरंगजेब द्वारा तोड़ा गया मंदिर ई.1085-91 की अवधि में बनाया गया था।

अजमेर से बुरहानपुर तक के मंदिरों का विनाश

21 सितम्बर 1681 को औरंगजेब ने बेलदारों के दारोगा जवाहर चंद को आदेश दिए कि वह बुरहानपुर जाए तथा अजमेर से बुरहानपुर तक के मार्ग में स्थित प्रत्येक मंदिर को तोड़ डाले। ई.1681 के अंतिम महीनों में दक्षिण के मोर्चे पर नियुक्त कोटा नरेश को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब अजमेर से कोटा, बूंदी एवं माण्डू होता हुआ बुरहानपुर जाएगा। इसलिए कोटा नरेश ने अपने राज्याधिकारियों को पत्र भेजकर सूचित किया कि वे श्रीनाथजी के सेवकों से कहें कि वे भगवान के विग्रह को लेकर बोराम्बा अथवा बिसलपुर चले जाएं तथा तब तक वहाँ रहें जब तक कि औरंगजेब यहाँ से वापस न लौट जाए।

13 नवम्बर 1681 को औरंगजेब बुरहानपुर पहुंचा तथा उसने बुरहानपुर के मंदिरों की रिपोर्ट मांगी। उसे बताया गया कि बुरहानपुर में काफी संख्या में मंदिर हैं जिनके पुजारी उन्हें बंद करके चले गए हैं। औरंगजेब उन मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाना चाहता था किंतु उसे बताया गया कि बुरहानपुर में इतने मुसलमान नहीं हैं जो इन मंदिरों को तोड़ सकें। चूंकि औरंगजेब को अपनी सेना अपने विद्रोही पुत्र अकबर तथा शिवाजी के पुत्र शंभाजी के विरुद्ध भेजनी थी इसलिए उसने उन मंदिरों के दरवाजे तुड़वाकर उन्हें ईंटों से बंद करवा दिया।

बनारस के नंद-माधव मंदिर का विनाश

ई.1682 में औरंगजेब के आदेशों से बनारस में स्थित सुप्रसिद्ध नंद-माधव (बिंदु-माधव) मंदिर को भी तोड़ डाला गया तथा उसके स्थान पर मस्जिद बनाई गई। इस विशाल मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल एवं राजा मानसिंह द्वारा अकबर की अनुमति से ई.1585 में करवाया गया था।

पेडगांव के शिवमंदिर का विनाश

13 सितम्बर 1682 को औरंगजेब ने शहजादे आजमशाह को आदेश दिए कि वह शंभाजी के राज्य में पेडगांव स्थित शिव मंदिर को तोड़ डाले। आजमशाह द्वारा इस मंदिर को तोड़ दिया गया तथा इस गांव का नाम बदलकर रहमतपुर कर दिया गया।

दक्षिण भारत के मंदिरों का विनाश

2 नवम्बर 1687 को अब्दुल खाँ को हैदराबाद के मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए गए। ई.1690 में औरंगजेब ने एलोरा, त्रयम्बकेश्वर, पंढरपुर जाजुरी तथा यवत के मंदिर तुड़वाए। इस दौरान औरंगजेब द्वारा दक्षिण में नियुक्त अनेक राजपूत राजाओं ने देव-प्रतिमाओं को बचाने के प्रयास भी किए। इनमें बीकानेर नरेश अनूपसिंह का नाम सबसे ऊपर है। उसने अष्टधातु की बहुत सी मूर्तियों की रक्षा की तथा उन्हें अपने बीकानेर स्थित दुर्ग में भिजवा दिया। इन मूर्तियों को तेतीस करोड़ देवताओं के मंदिर में रखा गया। ई.1689 में दक्षिण के मोर्चे पर ही महाराजा अनूपसिंह का निधन हुआ।

वडनगर के मंदिर का विनाश

ई.1693 में औरंगजेब ने गुजरात के वडनगर में स्थित हितेश्वर मंदिर को तोड़ने के आदेश दिए। मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

सोरों के सीता-राम मंदिर का विनाश

औरंगजेब केआदेशों से उत्तर प्रदेश में स्थित सोरों के सीता-राम मंदिर को भग्न किया गया। मंदिर के पुजारियों की मंदिर में ही हत्या की गई तथा गोंडा में देवी पाटन के नाम पर स्थित देव वन को नष्ट किया गया।

दिल्ली के जयसिंहपुरा का विनाश

जयपुर नरेश जयसिंह ने देश के कई नगरों में निजी सम्पत्तियां खरीदकर जयसिंहपुरा नामक स्थानों का निर्माण करवाया तथा उन्हें अपनी निजी सम्पत्ति बताकर ब्राह्मणों, साधुओं एवं बैरागियों को रहने के लिए दे दिया। ये लोग जयसिंहपुरा में रहकर अपने निजी मंदिर बनाते थे और उनमें देव-विग्रहों की स्थापना कर उनकी पूजा करते थे।

जब दिल्ली के एक जयसिंहपुरा में इस प्रकार की पूजा होने की सूचना मिली तो मुगलों ने उस जयसिंहपुरा को घेर लिया तथा वहाँ के बैरागियों को पकड़ लिया। मुगलों ने उनकी 13 मूर्तियों को जब्त करके दिल्ली के सूबेदार को भेज दिया। इस पर हिन्दुओं की भारी भीड़ इकट्ठी हो गई। उन्होंने बैरागियों को तो छुड़वा लिया किंतु मूर्तियों को नहीं छुड़वाया जा सका।

बीजापुर के मंदिरों का विनाश

ई.1698 में हमीदुद्दीन खाँ को बीजापुर के मंदिरों को तोड़ने भेजा गया। उसने वहाँ के मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दीं। बादशाह उसके काम से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने हमीदुद्दीन खाँ को गुसलखाने का दारोगा बना दिया ताकि वह प्रतिदिन हमीदुद्दीन खाँ को देख सके और उसकी प्रशंसा कर सके।

महाराष्ट्र में पंढरपुर मंदिर का ध्वंस

1 जनवरी 1705 को उसने मुहम्मद खलील और बेलदारों के दारोगा खिदमत राय को आदेश दिया कि महाराष्ट्र में पंढरपुर के मंदिर  को तोड़ डाला जाए तथा कसाइयों को बुलाकर वहाँ गाएं कटवाई जाएं। जैसे ही हिन्दुओं को इस आदेश की जानकारी मिली, उन्होंने विठोबा (भगवान कृष्ण) तथा रुक्मणि की प्रतिमाओं को मंदिर से हटा कर छिपा दिया। मुगल सैनिकों ने मंदिर में गायों को लाकर उनकी हत्या की तथा मंदिर को ढहा दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद हिन्दुओं ने इस मंदिर को पुनः बनाया जिसमें वही प्राचीन प्रतिमाएं पुनः स्थापित कीं।

मरते दम तक बनी रही मंदिर तोड़ने की लालसा

औरंगजेब के शासनकाल में उसके उन आदेशों की अक्षरशः पालना की गई जिनके अनुसार हिन्दू न तो अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार कर सकते थे और न नए मंदिर बना सकते थे। पूरे देश के प्रसिद्ध तीर्थों एवं मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवाया गया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से ठुकराई जाएं और उनका घोर अपमान हो।

हजारों देवमंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया। यहाँ तक कि छोटे-छोटे चबूतरों तथा पेड़ों के नीचे रखी देव-मूर्तियों एवं पत्थरों को भी तोड़ दिया गया। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया। उसकी यह प्रवृत्ति उसकी मृत्यु होने तक बनी रही।

औरंगजेब हिन्दू मंदिरों से कितनी घृणा करता था इसका अनुमान औरंगजेब द्वारा रूहिल्ला खाँ को लिखे गए एक पत्र से भली-भांति होता है जिसमें उसने लिखा कि-

‘महाराष्ट्र के बुतखाने (मंदिर) पत्थर एवं लोहे के बने हुए होते हैं जिन्हें हमारी सेनाएं, मेरे उस रास्ते से होकर निकलने से पहले, पूरी तरह नहीं तोड़ पाती हैं ताकि वे मुझे दिखाई न दें। इसलिए जब मैं वहाँ से होकर निकल जाऊँ तब मंदिर के ध्वंसावशेषों को और अधिक बेलदार लगाकर उन्हें फुर्सत से पूरी तरह तोड़ा जाए। इस कार्य में ऐसे दारोगा को लगाया जाए जो पूरी तरह से कट्टर हो और वह बुतखानों को तोड़ने के बाद उनकी नींवें भी उखाड़ फैंके।’

इस प्रकार हम देखते हैं कि औरंगजेब द्वारा ध्वस्त भवन बहुत बड़ी संख्या में थे। औरंगजेब ने इन भवनों को मिट्टी में मिलकार अपनी जेहादी मानसिकता का परिचय दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

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विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी के भारत में हिन्दू समाज तथा मुस्लिम समाज की तरह अन्य समुदायों में भी स्थानीय स्तर पर विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन चले।

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

भारत में ऐसे कई धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन हुए जिनके कार्य तथा उद्देश्य बहुत छोटे क्षेत्र तक सीमित थे। पारसियों ने अपने धर्म और समाज सुधार के लिए धार्मिक सुधार समुदाय की स्थापना की। दादा भाई नौरोजी पारसी पुरोहित परिवार से थे।

उन्होंने पारसी धर्म के सुधार हेतु महत्त्वपूर्ण कार्य किया। महादेव गोविन्द रानाडे ने सामाजिक सुधारों के साथ डंकन एजूकेशन सोसायटी स्थापित कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। हिन्दुओं के वैष्णव सम्प्रदाय में भी कुछ धार्मिक आन्दोलन हुए। माधव सम्प्रदाय ने अपनी धर्म सुधार सभा बनायी। शंकराचार्य के समर्थकों ने अपने मत का अलग प्रचार किया।

सत्य शोधक समाज

ज्योति बा फुले का जन्म 1828 ई. में एक माली परिवार में हुआ। उन्होंने शक्तिशाली गैर ब्राह्मण आंदोलन को जन्म दिया तथा हिन्दू धर्म में प्रचलित प्रथाओं का विरोध किया। 1854 ई. में उन्होंने अछूतों के लिये विद्यालय खोले तथा विधवाओं के लिये अनाथालयों की स्थापना की।

ज्योति बा फुले को ब्राह्मणों की पुरोहिताई से गहरी घृणा थी। दलित वर्गों के उत्थान के लिये उन्होंने 1873 ई. में सत्य शोधक समाज की स्थापना की। ब्राह्मण विरोधी गतिविधियों को संगठित रूप में प्रसारित करने हेतु उन्होंने दो पुस्तकों- सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक तथा गुलामगिरि की रचना की।

राधास्वामी सत्संग

1861 ई. में शिवदयाल (1818-1878 ई.) ने आगरा में राधास्वामी सत्संग की स्थापना की। राधास्वामी सत्संग के गुरु, ईश्वर के अवतार माने जाते थे। इसलिए इस संस्था में गुरु-भक्ति की प्रधानता थी। इस संस्था के अनुयायी जाति-पाँति के भेदभाव के बिना, ईश्वर की अराधना करते थे।

वे ईश्वर, जीवात्मा और जगत को सत्य मानते थे। कबीर, दादू, नानक आदि सन्तों की वाणियाँ इनके धार्मिक ग्रन्थ थे। ये समस्त धर्मों को समान मानते थे तथा प्रेम और भ्रातृत्व का प्रचार करते थे। राधास्वामी सत्संग भक्ति-मार्ग और योग-मार्ग का एक मिश्रण था। इस संस्था ने धार्मिक जागृति का काम किया। साथ ही जाति-प्रतिबन्धों का बहिष्कार किया, शिक्षा का प्रसार कर सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्र निर्माण के कार्य में बहुमूल्य योगदान दिया।

पारसी समाज में सुधार आंदोलन

दादा भाई नौरोजी तथा एस. एस. बंगाली ने पारसी धर्म और समाज में सुधार लाने के लिए बहुत कार्य किया। उन्होंने पारसियों की सामाजिक दशा सुधारने तथा पारसी धर्मिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से 1851 ई. में रहनुमाई मज्दयासना सभा की स्थापना की।

1910 ई. में पारसी धर्मगुरु ढोला के प्रोत्साहन से एक पारसी अधिवेशन का उद्घाटन हुआ जिसने पारसी वर्ग की बहुत सेवा की। पारसियों ने अपने सुधार के साथ-साथ देश के सामाजिक तथा राजनैतिक उत्थान में भी योगदान दिया।

देश की अनेक पारसी संस्थाएँ पारसी वर्ग की दानशीलता तथा धर्मपरायणता की द्योतक हैं। दादाभाई नौरोजी, सर फिरोजशाह मेहता, सर दीन शार्दूलजी आदि पारसी नेताओं ने भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रगति में बहुमूल्य योगदान दिया।

सिक्ख समाज में सुधार आंदोलन

उन्नीसवीं सदी में पंजाब में सिंह सभा तथा प्रधान खालसा दीवान नामक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने पंजाब में कई गुरुद्वारे तथा कॉलेज खोले। प्रगतिशील सिक्खों ने अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना की। सिक्खों ने अपने धार्मिक व सामाजिक जीवन को शुद्ध बनाने का प्रयास किया।

1921 ई. में सिक्खों ने अकालियों के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त कराना था। सरकार महंतों का समर्थन कर रही थी किंतु अंत में सरकार को झुकना पड़ा। इसके परिणाम स्वरूप 1922 ई. में सिक्ख गुरुद्वारा कानून बनाया गया तथा 1925 ई. में इसमें संशोधन किया गया।

ईसाई समाज में सुधार आंदोलन

इस काल में भारतीय ईसाइयों में भी नवजागरण का काम हुआ। उनमें अन्य धर्मों की अपेक्षा अन्धविश्वास तथा रूढ़िवादिता कम थी। अतः उनमें सुधार और परिवर्तन भी अपेक्षाकृत कम हुए। विवेकशील ईसाई पादरियों और दूरदर्शी धर्माधिकारियों ने भारतीय ईसाइयों में प्रचलित अनेक धार्मिक प्रथाओं, जो पश्चिमी प्रथाओं से भिन्न थीं, के अन्तर को दूर करके एक विशाल संगठन स्थापित करने की चेष्टा की।

ईसाई धर्म प्रचारकों ने शिक्षा प्रसार के लिए विद्यालय स्थापित किये तथा अदिवासियों व दलित वर्गों को ईसाई धर्म में सम्मिलित किया। इन नवीन ईसाइयों को शिक्षा की सुविधा देकर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया गया। अनाथलायों, औषधालयों, विद्यालयों आदि परोपकारी संस्थाओं के माध्यम से ईसाई धर्म प्रचारकों ने जन-साधारण का विश्वास अर्जित किया तथा मानव समाज की विपुल सेवा की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

युवा बंगाल आन्दोलन

आर्य समाज

थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

रामकृष्ण मिशन

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

सुधार आंदोलनों के परिणाम

सुधार आंदोलनों के परिणाम

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सुधार आंदोलनों के परिणाम

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी में चले सुधार आंदोलनों के परिणाम स्वरूप भारत की जनता में जागृति आई तथा उसे अपनी दुर्दशा का भान हुआ। इस कारण आजादी की लड़ाई में भी तेजी आ गई।

सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों के परिणाम

19वीं शताब्दी के सुधार आन्दोलनों के परिणाम स्वरूप भारत पश्चिम के आधुनिक ज्ञान-विज्ञान एवं विचारों के सम्पर्क में आया जिससे भारतीयों के दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस सम्पर्क के प्रति भारतीयों की बहुमुखी प्रतिक्रिया हुई जिनके दूरगामी परिणाम हुए। इन आन्दोलनों ने भारत के धार्मिक, सामाजिक, साहित्यिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों को प्रभावित किया और जीवन के समस्त अंगों में नवीन चेतना का संचार किया।

सुधार आन्दोलनों के सामाजिक परिणाम

समाज सुधार आन्दोलनों से जन-सामान्य में देशहित के कार्य करने की चेतना जागृत हुई। विलियम बैंटिक द्वारा 1829 ई. में सती-प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया। पं. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा-विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए आन्दोलन चलाया।

इसके परिणाम स्वरूप 1856 ई. में एक कानून स्वीकृत करके विधवा विवाह को वैध घोषित किया गया। ऐसी स्त्रियों से उत्पन्न सन्तान को भी वैध घोषित किया गया। शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों तथा अन्य संस्थाओं में शिक्षित विधवाओं को नौकरियाँ देकर उनके वैधव्य जीवन की कठिनाइयों को कम किया गया।

शिक्षित वर्ग ने भी विधवा स्त्रियों के विवाह करवाने में योगदान दिया। केशवचन्द्र सेन के प्रयत्नों से नेटिव मेरिज एक्ट स्वीकृत हुआ जिसके अन्तर्गत बहुविवाह को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया, बाल-विवाह का निषेध कर दिया तथा अन्तर्जातीय विवाह को स्वीकृति दी गई।

पारसी समाज सुधारक बी. एस. मलाबारी ने बाल-विवाह के विरोध में 1884 ई. से सक्रिय आन्दोलन आरम्भ किया। इसके परिणाम स्वरूप 1891 ई. में ऐज ऑफ कन्सेण्ट कानून स्वीकृत हुआ।

इसके अन्तर्गत लड़कियों के लिए विवाह योग्य आयु 12 वर्ष निर्धारित की गई। 1901 ई. में बड़ौदा की रियासती सरकार ने इनफेंट मेरिज प्रिवेन्शन एक्ट लागू किया जिसके अंतर्गत विवाह की आयु लड़की के लिये 12 वर्ष और लड़के के लिये 16 वर्ष की गई।

समाज सुधार आन्दोलनों के परिणाम स्वरूप भारत में स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा मिला। स्त्री शिक्षा के लिये अनेक विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित हुए। दक्षिण शिक्षा प्रगति समिति तथा पूना में श्रीमती रानाडे द्वारा स्थापित पूना सेवा सदन ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया।

ज्यों-ज्यों स्त्री-शिक्षा का प्रसार हुआ, स्त्रियों में राजनीतिक जागृति उत्पन्न हुई और स्त्रियाँ अनेक कौंसिलों, कारपोरेशनों और नगर पालिकाओं में सदस्य होने लगीं। स्त्री शिक्षा के फलस्वरूप पर्दा-प्रथा का उन्मूलन हुआ। शिक्षित हिन्दू महिलाओं ने पर्दा-प्रथा का बहिष्कार किया।

19वीं शताब्दी के समाज सुधार आन्दोलनों से जाति प्रथा के बन्धनों में शिथिलता आई तथा दलित जातियों में नवीन चेतना का संचार हुआ। ईसाई धर्म-प्रचारकों ने अस्पृश्य कही जानी वाली जाति के अनेक लोगों को ईसाई बना लिया था किन्तु आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन द्वारा उन्हें पुनः हिन्दू समाज में सम्मिलित करने का अभियान चलाया। इससे हिन्दू समाज में जातीय वैमनस्य एवं भेदभाव में उल्लेखनीय कमी आई।

सुधार आन्दोलनों के धार्मिक परिणाम

धार्मिक क्षेत्र के सुधार आन्दोलनों ने हिन्दू समाज में नवीन दृष्टि एवं चेतना विकसित की। स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द तथा श्रीमती एनीबीसेण्ट आदि धर्म सुधारकों ने हिन्दुओं को हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का आभास कराया जिससे वे ईसाई धर्म के व्यामोह से मुक्त होकर अपने ही धर्म की उन्नति के बारे में सोचने लगे।

भारतीयों को अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति गौरव का अनुभव हुआ। इन आन्दोलनों से मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, कर्मकाण्ड, अन्धविश्वासों तथा हिन्दू सम्प्रदायों की परस्पर कट्टरता में कमी आई। धार्मिक आडम्बरों की आलोचना होने लगी तथा हिन्दुओं की मनोवृत्ति पहले से भी अधिक उदार हो गई। स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दुत्व के सन्देश को अमेरिका तथा यूरोप तक पहुँचाया जिससे यूरोपवासियों को भी हिन्दू धर्म की महानता का ज्ञान हुआ।

सुधार आन्दोलनों के साहित्यिक क्षेत्र में परिणाम

धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों से साहित्य के क्षेत्र में भी व्यापक क्रान्ति उत्पन्न हुई। संस्कृत साहित्य का बड़ी मात्रा में अँग्रेजी भाषा में अनुवाद हुआ जिससे संसार को भारत के श्रेष्ठ साहित्य के बारे में ज्ञान हुआ। पाश्चात्य साहित्य के अध्ययन से देशी भाषाओं के साहित्य में आधुनिकता का समावेश होने लगा।

अँग्रेजी शिक्षा के प्रसार से भारत में बौद्धिक विकास का नया युग आरम्भ हुआ। छापाखानों के लगने से विभिन्न भाषाओं की पुस्तकों की संख्या और प्रसार बढ़ा तथा आम आदमी के ज्ञान में वृद्धि हुई। हिन्दी साहित्य में भी राष्ट्रीय चिंताएं उसी प्रकार प्रकट होने लगीं जिस प्रकार संस्कृत भाषा के साहित्य में होती आई थीं।

धर्म-प्रचारकों एवं समाज-सुधारकों ने लोक-भाषाओं को उन्नत करने में योगदान दिया। हिन्दी, उर्दू, बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू आदि भारतीय भाषाओं एवं साहित्य का अभूतपूर्व समन्वय हुआ। इस प्रकार सुधार आंदोलनों से भारत की श्रेष्ठ प्राचीन साहित्यिक परम्पराओं का पुनरुद्धार हुआ तथा पूर्व एवं पश्चिम की उच्चतम साहित्यिक प्रवृत्तियों का सुन्दर समन्वय हुआ।

सुधार आन्दोलनों के राजनीतिक क्षेत्र में परिणाम

सुधार आन्दोलनों का सबसे बड़ा प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र पर ही पड़ना था और ऐसा हुआ भी। भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव जागृत होने से उन्हें अपनी हीन अवस्था का बोध हुआ। उन्हें यह भी बोध हुआ कि इस दुरावस्था से बाहर निकला जा सकता है। किया।

वेलेन्टाइन शिरोल ने भारत के सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों में राष्ट्रीयता की उत्पत्ति के बीज देखे। स्वामी दयानन्द प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वराज शब्द का प्रयोग किया। वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना सिखाया। वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।

स्वामी दयानंद तथा विवेकानंद के उग्र विचारों के काण भारतीयों में उग्र राष्ट्रवाद का विकास हुआ। इन सन्यासियों ने सांस्कृतिक चेतना की जो धारा प्रवाहित की, उसी पर राष्ट्रीयता का भव्य भवन खड़ा हुआ।

विवेकानंद ने भारत की जनता को ललकार कर कहा- ‘विचार और कर्म की स्वतंत्रता जीवन, विकास तथा कल्याण की अकेली शर्त है। जहाँ यह न हो, वहाँ मनुष्य, जाति तथा राष्ट्र सभी पतन के शिकार होते हैं।’

उन्होंने भारतीयों को विश्व पर सांस्कृतिक विजय करने की प्रेरणा दी और यह भी कहा कि जब तक भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, तब तक यह कार्य सम्भव नहीं है। इस प्रकार सुधार आंदोलनों तथा उनके नेतृत्वकर्त्ताओं ने भारतीयों को राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करने के लिये प्रेरित किया।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 19वीं शताब्दी में भारत में चले विभिन्न धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलनों ने देशवासियों को जीवन के हर क्षेत्र में जागृत किया। इसी जागृति ने भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में कुछ आंदोलन ऐसे भी चले जिनके कारण भारत में साम्प्रदायिक कट्टरता का विकास हुआ तथा देश में द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा को बल मिला। इसका अंतिम परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया।

सुधार आंदोलनों के परिणाम राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

युवा बंगाल आन्दोलन

आर्य समाज

थियोसॉफिकल सोसायटी के सुधार कार्य

रामकृष्ण मिशन

मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

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अठारहवीं सदी में प्रेस एवं पत्रकारिता का विकास

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अठारहवीं सदी में प्रेस

अठारहवीं सदी में प्रेस एवं पत्रकारिता का विकास ब्रिटिश शासन काल की एक महत्वपूर्ण घटना थी। प्रेस एवं पत्रकारिता के माध्यम से भारत के लोगों को दुनिया भर में आ रहे परिवर्तनों की जानकारी मिलने लगी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मानव सभ्यता के विकास के साथ समाचार पत्रों के स्वरूप में भी परिवर्तन आता रहा है। अशोक (273 ई.पू.-232 ई.पू) के शासन काल में सम्राट के पास साम्राज्य के भिन्न-भिन्न प्रदेशों से समाचार एवं घटनाओं का वृत्तान्त निश्चित समय पर लिखकर भेजा जाता था। इसे समाचार पत्र का अत्यंत प्रारम्भिक रूप कहा जा सकता है।

चीन में पहला समाचार पत्र छठी शताब्दी ईस्वी में निकला जो लगभग 1500 वर्षों तक चला। इस प्रकार समाचार पत्र एक प्राचीन संस्था है जिसके द्वारा शासक को विभिन्न प्रदेशों में घटित होने वाली घटनाओं और जनता के विचारों से अवगत कराया जाता था। मुगलों के समय में स्पष्ट रूप से इसका अस्तित्त्व दिखाई देता है।

मुगल शासकों द्वारा विभिन्न प्रदेशों में वाकयानवीस नियुक्त किये जाते थे जो समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों से सूचनाएं लिखकर बादशाह को भिजवाते थे। बाद के काल में मुगल-सल्तनत के विभिन्न प्रदेशों में होने वाली घटनाओं के वृत्तान्त की नकल की हुई प्रतियाँ प्रमुख अधिकारियों के पास भेजी जाने लगीं।

मुगलों की नकल करके ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने समाचार प्रेषकों की नियुक्ति की। उपरोक्त समाचार पत्रों को आधुनिक पत्रकारिता का पूर्वज कहा जा सकता है किन्तु उनका उपयोग केवल शासक द्वारा अपने साम्राज्य की सूचनाएं प्राप्त करना तथा शासन के उच्चाधिकारी वर्ग को सुचारू रूप से नियंत्रित करने में होता था।

उनका उद्देश्य जनता को सूचनाएं पहुंचाना अथवा राजकीय नीतियों को जनता तक पहुँचाना नहीं था। इन समाचार पत्रों से शासक को जन-भावनाओं की सही जानकारी प्राप्त नहीं होती थी।

आधुनिक समाचार पत्रों का जन्म 16वीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप के जर्मनी, स्विट्जरलैण्ड तथा हॉलैण्ड आदि देशों में हुआ था। इंग्लैण्ड में 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जेम्स (प्रथम) के शासनकाल में, शेक्सपीयर की मृत्यु के बाद पहला समाचार पत्र निकला। 17वीं शताब्दी में स्टुअर्ट वंश इंग्लैण्ड में अलोकप्रिय हो गया था।

इस वंश के शासकों ने प्रेस को स्वतंत्रता नहीं दी। इंग्लैण्ड में जो समाचार पत्र निकलते थे उनमें विदेशों के समाचारों को छापने की तो स्वतन्त्रता थी किन्तु स्वदेशी समाचार छापने पर रोक थी। 17वीं शताब्दी के अन्त में हुई क्रान्ति के बाद इंग्लैण्ड में समाचार पत्रों की बाढ़ आ गई। 1702 ई. में पहला दैनिक समाचार पत्र डेली करैन्ट प्रकाशित हुआ।

भारत में छापाखाने का प्रारम्भ

भारत में प्रथम छापाखाना 1557 ई. में पुर्तगालियों द्वारा गोआ में स्थापित किया गया। उस समय तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में प्रवेश नहीं किया था। इस छापाखाने में सबसे पहले, मलयालम भाषा में ईसाई धर्म की पुस्तक प्रकाशित की गई। दूसरा छापाखाना तमिलनाडु के तिनेवली में स्थापित हुआ।

1762 ई. में काठियावाड़ के भीमजी पारिख ने हिन्दू धर्म ग्रन्थ प्रकाशित करने के लिए बम्बई में एक छापाखाना लगाया। इसके साथ ही भारत में अठारहवीं सदी में प्रेस का बीजारोपण हुआ। भारत में पहला अँग्रेजी छापाखाना 1674 ई. में बम्बई में स्थापित हुआ। लगभग 100 वर्ष बाद 1772 ई. में मद्रास में और 1779 ई. में कलकत्ता में सरकारी छापाखाना स्थापित हुआ।

बोल्ट्स के प्रयास

भारत में समाचार पत्र प्रकाशित करने का पहला प्रयत्न 1767 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी विलियम बोल्ट्स ने किया। कम्पनी के साथ बोल्ट्स के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। उसने पूर्व में दो पुस्तकें प्रकाशित की थीं जिनमें कम्पनी प्रशासन की आलोचना की गई थी। कम्पनी के अधिकारी आलोचना सहने को तैयार नहीं थे।

ऐसी स्थिति में बोल्ट्स को समाचार पत्र प्रकाशन की अनुमति नहीं दी गई। कम्पनी शासन के विरोध के कारण बोल्ट्स के प्रयत्न सफल नहीं हुए और उसे भारत छोड़कर इंग्लैण्ड लौट जाना पड़ा। बोल्ट्स के बाद लगभग 12 वर्ष तक इस दिशा में कोई प्रयत्न नहीं हुआ। इससे अठारहवीं सदी में प्रेस के स्वतंत्र विकास को बड़ा धक्का लगा।

अठारहवीं सदी में प्रेस एवं समाचार पत्रों का विकास

भारत में समाचार पत्र के प्रकाशन का कार्य सबसे पहले गैर-सरकारी अँग्रेज विद्वान जेम्स ऑगस्ट हिक्की ने किया। उसने कम्पनी के स्वेच्छाचारी शासन के विरुद्ध आवाज उठाई। हिक्की ने 29 जनवरी 1780 को बंगाल गजट एण्ड कलकत्ता एडवरटाइजर नाम से अँग्रेजी समाचार पत्र प्रकाशित किया। इस समाचार पत्र में केवल दो पृष्ठ थे तथा पृष्ठों का आकार छोटा था।

हिक्की ने अपने लक्ष्य की व्याख्या करते हुए लिखा- ‘मुझे अपने शरीर को बन्धन से बाँधने में सुख मिल रहा है, क्योंकि उसके द्वारा मैं अपनी आत्मा और मन की स्वतन्त्रता प्राप्त करने की आशा करता हूँ मेरे इस साप्ताहिक-पत्र में स्तम्भ यद्यपि समस्त राजनीतिक और व्यवसायिक वर्गों और मतमतान्तरों के लिए खुले रहेंगे तथापि वे किसी के भी प्रभाव और दबाव से मुक्त रहेंगे।’

हिक्की ने अपने समाचार पत्र में, कम्पनी के अधिकारियों की अनेक बुराइयों की तीव्र आलोचना प्रकाशित की। इस समय गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज की कौंसिल का सदस्य फिलिप फ्रांसिस, गवर्नर जनरल और कौंसिल के अन्य सदस्यों का कटु आलोचक था।

हिक्की के समाचार पत्र में फ्रांसिस को छोड़कर गवर्नर जनरल, मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे आदि समस्त अधिकारियों की कटु आलोचना हुई। इससे प्रतीत होता है कि फ्रांसिस और हिक्की में विशेष मित्रता थी अथवा हिक्की के प्रोत्साहन का स्रोत फ्रांसिस ही था।

कोई भी व्यक्ति विश्वास नहीं कर सकता था कि हिक्की बिना किसी समर्थन के अथवा कम्पनी के असन्तुष्ट अधिकारियों द्वारा सूचना न मिलने पर इस प्रकार की आलोचना छाप सके। इन आलोचनाओं से कम्पनी के अधिकारी क्षुब्ध हो उठे। प्रकाशन के एक वर्ष के भीतर ही हिक्की का कम्पनी के अधिकारियों से झगड़ा हो गया।

अठारहवीं सदी में प्रेस एवं समाचार पत्रों पर सरकारी प्रतिबन्ध

उस समय भारत में समाचार पत्रों के विषय में कोई नियम नहीं थे। पत्र निकालने के लिए भारत में लाइसेंस लेना अनिवार्य था। डाक से अखबार भेजने का अधिकार सरकार के हाथों सुरक्षित था। हिक्की के पत्र में कम्पनी प्रशासन की आलोचना के कारण वारेन हेस्टिंग्ज ने 14 नवम्बर 1780 को हिक्की के बंगाल गजट पर पहला प्रहार किया।

गवर्नर जनरल के आदेश से हिक्की के पत्र को डाक से भेजे जाने की सुविधा बंद कर दी गई। इसके बाद हिक्की ने आलोचना को और अधिक कटु कर दिया। हिक्की को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। फ्रांसिस के भारत से चले जाने के बाद हेस्टिंग्ज ने इस पत्र पर कुठाराघात किया। 1782 ई. में सरकार ने हिक्की का छापाखाना और समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली।

हिक्की के बंगाल गजट के बाद 1780 ई. में दूसरा समाचार पत्र इण्डिया गजट प्रकाशित हुआ जिसे समस्त प्रकार की सरकारी सुविधाएँ दी गईं। सम्भवतः यह वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा समर्थित अखबार था जिसे सरकारी विज्ञापन आदि अधिक सरलता से मिलते थे।

1784 ई. में कलकत्ता गजट तथा 1785 ई. में टामस जोन्स के प्रयत्नों से बंगाल जर्नल का प्रकाशन हुआ। इसका सम्पादक विलियम डुआनी था। डुआनी ने सरकार के विरुद्ध अभियान छेड़ा। उसकी स्पष्टवादिता और सरकारी कार्यों की आलोचना के कारण सरकारी अधिकारी उससे क्रुद्ध हो गये।

डुआनी को बलात् एक अँग्रेजी जहाज में बैठाकर भारत से बाहर भेज दिया गया। 1780 ई. से 1793 ई. के बीच कलकत्ता से छः समाचार पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इनमें एक समाचार पत्र हरकारू था। इसके सम्पादक चार्ल्स मैकलीन को सरकार से कड़ा संघर्ष करना पड़ा। इस प्रकार बंगाल से छः पत्र प्रकाशित हुए, उनमें से दो सरकार के कटु आलोचक थे। चार अखबार सरकारी कृपा पर निर्भर थे तथा सरकार की आलोचना करने से डरते थे।

मद्रास में सबसे पहले 1785 ई. में मद्रास कोरियर नामक समाचार पत्र निकला। मद्रास सरकार ने भी समाचार पत्रों के प्रति कड़ा रुख अपनाया और 1795 ई. में यह शर्त लगाई कि कोई भी सामग्री छापने से पहले उस पर सरकार की अनुमति प्राप्त की जानी आवश्यक है।

मद्रास कोरियर के संस्थापक रिचार्ड जॉन्सटन को अनेक सरकारी सुविधाएँ दी गईं। 1795 ई. में इसी तरह सरकारी प्रभाव के अन्तर्गत ही मद्रास गजट निकाला गया। इसी दशक में मद्रास में हंफ्रेंस द्वारा इण्डिया हेराल्ड का प्रकाशन किया गया। इसे आरम्भ करने के लिए हंफ्रेंस द्वारा किये गये आवेदन को मद्रास सरकार ने अस्वीकार कर दिया।

इस पर हंफ्रेंस ने बिना सरकारी अनुमति के ही इण्डिया हेराल्ड का प्रकाशन आरम्भ कर दिया। सरकारी अधिकारियों ने हंफ्रेंस पर आरोप लगाया कि उसने अपने पत्र में सरकारी नीति के विरुद्ध तथा प्रिन्स ऑफ वेल्स के सम्बन्ध में आपत्तिजनक बातें प्रकाशित की हैं। मद्रास सरकार ने हंफ्रेंस को भारत से निर्वासित कर दिया।

इस घटना के बाद मद्रास सरकार का समाचार पत्रों पर नियंत्रण और भी कठोर हो गया। कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास की सरकारें, समाचार पत्रों में छपने वाली आलोचनाओं से इसलिए भयभीत नहीं होती थीं कि उनका विपरीत प्रभाव भारतीय जनता पर पड़ेगा, अपितु इसलिए भयभीत होती थीं कि कहीं इंग्लैण्ड में जनमत कम्पनी शासन और गतिविधियों के विरुद्ध न हो जाय।

बम्बई प्रान्त में अखबार सबसे बाद में निकले। 1789 ई. में बम्बई में पहला साप्ताहिक समाचार पत्र बॉम्बे हेराल्ड निकला। 1790 ई. में दूसरा समाचार पत्र बॉम्बे कोरियर नाम से और 1791 ई. में तीसरा समाचार पत्र बॉम्बे गजट नाम से प्रकाशित हुआ। बॉम्बे कोरियर, आगे चलकर टाइम्स ऑफ इण्डिया के नाम से प्रकाशित होने लगा जो आज भी देश का प्रमुख अँग्रेजी समाचार पत्र है।

18वीं शताब्दी के अन्त तक बंगाल, मद्रास व बम्बई प्रान्तों से अनेक मासिक तथा साप्ताहिक समाचार पत्रों का प्रकाशन होने लगा। मद्रास एवं बम्बई के समाचार पत्र सरकार विरोधी नहीं थे। ये समस्त पत्र अँग्रेजी भाषा में प्रकाशित होते थे जिनके अधिकतर सम्पादक कम्पनी के सेवानिवृत्त अँग्रेज अधिकारी थे।

इन समाचार पत्रों की सदस्यता सरकारी कार्यालयों तथा विदशी व्यापारियों तक सीमित थी। इस समय पत्रकारिता सम्बन्धी कानून नहीं बने थे। सरकार की आलोचना करने पर सम्पादकों को यातनाएँ दी जाती थीं और अन्त में भारत छोड़ने पर बाध्य कर दिया जाता था। इन समाचार पत्रों का स्वरूप अराजनीतिक था।

इनकी सामग्री में विदेशी समाचार, सरकारी आदेश, सरकारी विज्ञापन, सम्पादक के नाम पत्र, व्यक्तिगत समाचार, फैशन सम्बन्धी समाचार तथा यूरोपीय समाज के बारे में चटपटी एवं रहस्यमयी बातें होती थीं।

इस प्रकार 18वीं शताब्दी के भारतीय समाचार पत्रों के इतिहास का पहला अध्याय इंग्लो-इण्डियन समाचार पत्रों का इतिहास है। इस अवधि में समाचार पत्रों पर कुछ प्रतिबन्ध लगाये गये, जैसे-प्रत्येक समाचार पत्र को, अपने सम्पादक एवं संचालक के नाम सरकार को लिखित में देने होंगे।

प्रत्येक अंक पर मुद्रक एवं सम्पादक के नाम अंकित करने होंगे। मुद्रित करने से पहले सामग्री का अवलोकन किसी सरकारी अधिकारी द्वारा किया जाना आवश्यक होगा। रविवार को कोई अंक प्रकाशित नहीं होगा आदि। सेना, युद्ध-सामग्री, जहाज, कम्पनी के देशी राज्यों से सम्बन्ध, सरकारी आय, सरकारी अधिकारियों के कार्यों तथा व्यक्तिगत मामलों से सम्बन्धित समाचार प्रकाशित नहीं किये जा सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- ब्रिटिश काल में पत्रकारिता

अठारहवीं सदी में प्रेस एवं पत्रकारिता का विकास

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता

1857 के बाद पत्रकारिता

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता

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उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता के इतिहास का दूसरा अध्याय अँग्रेजी समाचार पत्रों के साथ-साथ देशी भाषा में भी समाचार पत्रों का प्रकाशन से आरम्भ हुआ।

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता के भारतीय प्रयास

1818 ई. तक देशी भाषा में प्रकाशित होने वाले किसी भी समाचार पत्र का उल्लेख नहीं मिलता। इस काल से पहले केवल छुटपुट अंग्रेजी अखबार प्रकाशित करने के प्रयास किए जाते रहे। कम्पनी सरकार के अधिकारी भारत में स्वतंत्र प्रेस का विकास नहीं चाहते थे किंतु बौद्धिक जागरण का प्रभाव प्रत्रकारिता के क्षेत्र में पड़ा और भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

राजा राममोहन राय की प्रेरणा, समर्थन और निर्भीक नेतृत्व पाकर भारतीय पत्रकारिता का विकास हुआ। आत्मीय सभा के दो सदस्यों हरिशचन्द्र राय और गंगाकिशोर भट्टाचार्य के सहयोग से बंगाल में पहला भारतीय पत्र 15 मई 1818 को बंगाल गजट के नाम से प्रकाशित हुआ।

यह भारतीय समाचार पत्र, प्रगतिवादी हिन्दू धर्म की विचारधारा का प्रतिपादन करता था। इसी समय भारत में ईसाईयत का प्रचार करने वाली संस्थाओं ने भी पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1818 ई. में मार्शमेन के नेतृत्व में सीरामपुर के बैपटिस्ट मिशनरियों ने बंगाली भाषा में मासिक पत्र दिग्दर्शन तथा साप्ताहिक पत्र समाचार दर्पण प्रकाशित किये।

राजा राममोहन राय ने 1822 ई. में फारसी भाषा में मिरात-उल-अखबार और अँग्रेजी भाषा में ब्राह्मनिकल मैगजीन प्रकाशित किये। राजा राममोहन राय के प्रगतिशील विचारों के विरुद्ध सनातनी एवं रूढ़िवादी लोगों ने बंगला भाषा में चंद्रिका समाचार निकाला।

दो और फारसी भाषा के पत्र- जामे-ए-जहनुमा तथा शम-उल-अखबार भी प्रकाशित किये गये। 1822 ई. में ही बम्बई से गुजराती भाषा का मुम्बई समाचार प्रकाशित हुआ। उन्हीं दिनों ईसाई धर्म प्रचारकों ने फ्रेण्ड ऑफ इण्डिया नामक अँग्रेजी पत्र प्रकाशित किया।

कलकत्ता का पहला दैनिक समाचार पत्र- कलकत्ता जर्नल

जेम्स बंकिघम सिल्क एक जहाज का कप्तान था। एक बार उसने मेडागास्कर से खरीदे हुए कुछ गुलामों को ले जाने से इन्कार कर दिया और नौकरी छोड़ दी। इस कारण उसकी ख्याति एक सैद्धान्तिक व्यक्ति के रूप में हो गई। 2 अक्टूबर 1818 को उसने कलकत्ता से आठ पृष्ठ का कलकत्ता जर्नल प्रकाशित करना आरम्भ किया।

यह सप्ताह में दो बार छपता था। इस पत्र ने अपने निर्भीक तथा उदारवादी विचारों से भारतीय पत्रकारिता को नई दिशा दी। इस पत्र में सरकारी कार्यों की आलोचना के साथ-साथ एक नया स्तम्भ भी आरम्भ किया गया जिसमें जनता की शिकायतें और सुझाव छापे जाते थे।

बंकिघम सिल्क ने अपने समाचार पत्र में स्पष्ट कहा कि सम्पादक के कार्य सरकार को उसकी भूलें बताकर कर्त्तव्य की ओर प्रेरित करना है।  इस कारण कुछ अरुचिकर सत्य कहना अनिवार्य है। तीन वर्षों में ही यह समाचार पत्र प्रतिदिन छपने लगा। यह कलकत्ता का प्रथम दैनिक पत्र था। बंकिघम के पत्र ने उस समय के एंग्लो-इण्डियन पत्रों को निस्तेज कर दिया।

दो वर्षों में इसकी सदस्य संख्या एक हजार से अधिक हो गई। बंकिघम की ख्याति और उसकी लेखनी से ब्रिटिश नौकरशाही में ईर्ष्या जागृत हुई। कुछ अधिकारियों ने लॉर्ड हेस्टिंग्ज से आग्रह किया कि वह समाचार पत्रों पर सेंसर के नियम लागू करे किंतु लॉर्ड हेस्टिंग्ज की उदार नीति के कारण बंकिघम को कोई हानि नहीं हुई।

कलकत्ता जर्नल के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर कट्टरपंथी लोगों ने बुल इन द् ईस्ट नामक पत्र आरम्भ किया। यह पत्र जनता में लोकप्रिय नहीं हो सका, क्योंकि इसके पक्षपातपूर्ण समाचारों और सरकारी पक्ष के समर्थन के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। लॉर्ड हेस्टिंग्ज के भारत से चले जाने के बाद जॉन एडम कार्यवाहक गवर्नर जनरल बना। वह प्रेस की स्वतन्त्रता का विरोधी था।

1823 ई. में बंकिघम को देश से निकाल दिया गया। इस प्रकार एक बहुत ही साहसी, स्पष्ट वक्ता तथा भारतीय पत्रकारिता का मसीहा भारत से चला गया। यद्यपि बंकिघम भारत में नहीं रहा किन्तु उसने इंग्लैण्ड जाकर ओरियन्टल हेराल्ड नामक समाचार पत्र निकाला जिसमें वह भारतीय समस्याओं और कम्पनी के हाथों में भारत का शासन बनाये रखने के विरुद्ध लगातार लिखता रहा और इंग्लैण्ड में जनमत बनाने का प्रयत्न करता रहा।

राजा राममोहन राय का योगदान

राजा राममोहन को भारतीय पत्रकारिता का जनक कहा जाता है। उन्होंने सत्य का प्रचार करने तथा विविध विषयों पर तर्क करके जनमानस का निर्माण करने के उद्देश्य से संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार तथा ब्राह्मनिकल मैगजीन नामक तीन पत्रों की स्थापना की।

उस समय ईसाई पादरी अपने धर्म-प्रचार के लिए हिन्दू धर्म पर आक्षेप कर रहे थे। राजा राममोहन राय ने अपने तर्कों से ईसाई पादरियों के दुष्प्रचार को निष्प्रभावी कर दिया। बंकिघम ने खुले हृदय से राजा राममोहन राय की सराहना की। कार्यवाहक गवर्नर जनरल जॉन एडम, प्रेस की स्वतन्त्रता को कम्पनी शासन के लिए अत्यधिक हानिकारक समझता था।

मुनरो का कहना था कि विदेशी शासन और प्रेस की स्वतन्त्रता दोनों आपस में विरोधी हैं। ये अधिक समय तक साथ-साथ नहीं रह सकते। 1823 ई. में एडम ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की अनुमति से प्रेस पर प्रतिबन्धों की घोषणा की। इन प्रतिबन्धों का उद्देश्य भारतीय भाषाओं के पत्रों पर अंकुश लगाना था।

सरकार ने मिरात्-उल-अखबार पर कई आरोप लगाकर उस पर प्रतिबंध लगा दिये। राजा राममोहन राय ने अखबार का प्रकाशन बन्द कर दिया। 1825 ई. में एक और प्रेस कानून लागू किया गया जिसके अनुसार किसी सरकारी अधिकारी का सम्बन्ध किसी भी समाचार पत्र से नहीं हो सकता था।

एडम का प्रेस नियन्त्रण

जॉन एडम द्वारा पारित प्रेस सम्बन्धी कानूनों को 1878 ई. में लॉर्ड लिटन द्वारा पारित वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट का पूर्वगामी कहा जा सकता है। बंकिघम के चले जाने के बाद सरकार ने कलकत्ता जर्नल को जब्त कर लिया। यद्यपि एडम के कानूनों के अन्तर्गत कलकत्ता जर्नल तथा विलियम एडम द्वारा सम्पादित कलकत्ता क्रोनिकल, दो ही ऐसे समाचार पत्र थे जिनके अनुमति पत्र रद्द किये गये थे किन्तु लगभग 6 वर्षों तक किसी भी समाचार पत्र ने सरकार की आलोचना करने का साहस नहीं किया।

जॉन एडम द्वारा प्रेस पर लगाये गये प्रतिबन्धांे के साथ ही समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष का इतिहास भी प्रारम्भ हो जाता है। इस संघर्ष का नेतृत्व राजा राममोहन राय ने किया। उन्होंने पाँच व्यक्तियों के हस्ताक्षर कराके इन कानूनों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में वाद दायर किया किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला।

इस पर उन्होंने लंदन की प्रिवी कौंसिल के समक्ष वाद प्रस्तुत करवाया किन्तु वहाँ भी असफलता मिली। इन प्रयासों से यह स्पष्ट हो गया कि अँग्रेज सरकार किसी भी कीमत पर भारत में स्वतंत्र प्रेस नहीं पनपने देना चाहती थी। इस दृष्टि से राजा राममोहन राय को भारत में स्वतन्त्र पत्रकारिता का अग्रदूत कहना उचित होगा।

भारतीय समाचार पत्र एडम के कानूनों से भयभीत होकर सतर्कता की नीति पर चलने लगे। इस कारण भारत में अँग्रेजी भाषा के समाचार पत्रों का प्रकाशन बढ़ने लगा। हिन्दी भाषा का सबसे पहला समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड कलकत्ता से युगल किशोर शुक्ल ने सम्पादित किया जिसका पहला अंक 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ।

1829 ई. में राजा राममोहन राय ने अँग्रेजी भाषा में बंगाल हेराल्ड साप्ताहिक पत्र निकला। इसी समय नीलरत्न हालदार ने बंगदूत प्रकाशित किया। इस पत्र का प्रकाशन बंगला, हिन्दी और फारसी भाषा में होता था। इस अवधि में सरकार ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रकाशित पत्रों को आवश्यक सुविधाएँ दे रही थी किन्तु किन्तु अँग्रेजी पत्रों के प्रति सरकारी नीति भिन्न थी।

अँग्रेजी भाषा के पत्रों को चेतावनी अवश्य दी जाती थी, किन्तु उनकी बड़ी-बड़ी गलतियों को माफ कर दिया जाता था, जबकि भारतीय भाषा के समाचार पत्रों का अनुमति पत्र रद्द कर दिया जाता था। राजा राममोहन राय ने सरकार की इस नीति का प्रतिवाद किया तथा भारतीय पत्रकारिता को बढ़ावा देने के प्रयास किये।

राजा राम मोहन राय का प्रभाव टैगोर परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों पर था। इस परिवार ने राजा राममोहन राय के सहयोग से तत्कालीन पत्रकारिता की सहायता की। राजा राममोहन राय की प्रेरणा से द्वारिकानाथ टैगोर ने बंगाल से प्रकाशित होने वाले कुछ अँग्रेजो के समाचार पत्रों को खरीद लिया। इस कारण बंगाल हरकारू तथा कट्टरपन्थी यूरोपियनों का बुल इन द ईस्ट, टैगोर परिवार के पास आ गये। नये संचालकों द्वारा बुल इन द् ईस्ट को इंग्लिशमैन के नाम से प्रकाशित किया गया।

बैण्टिक के समय में पत्रकारिता

लॉर्ड विलियम बैण्टिक (1828-1833 ई.) के काल में भारतीय पत्रकारिता ने बहुत उन्नति की। उस समय देश में एडम के कानूनों के विरुद्ध वातावरण बन रहा था। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी के सदस्य चार्ल्स मैटकॉफ ने इस सम्बन्ध में विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि समाचार पत्रों को स्वतन्त्रता देने से सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी किन्तु स्वतन्त्रता से साम्राज्य का अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ जाये तो सरकार को उचित सुरक्षा के अधिकार होना चाहिए। वर्तमान में समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता से किसी भी विपत्ति के चिन्ह नहीं हैं।

1831 ई. में ईश्वरचन्द्र गुप्त का संवाद प्रभाकर प्रकाशित हुआ। 1836 ई. में यह दैनिक पत्र में परिवर्तित हो गया तथा बंगाल के प्रथम दैनिक होने का गौरव प्राप्त कर सका। 6 फरवरी 1835 को पत्रकारों का एक शिष्ट मण्डल, जिसमें 3 भारतीय व 8 विदेशी थे, गवर्नर जनरल से मिला। इन पत्रकारों ने एडम कानूनों को सरकार और समाचार पत्र दोनों की प्रतिष्ठा के लिए घातक बताया। बैण्टिक इस सम्बन्ध में कुछ कार्यवाही करता, उससे पूर्व ही उसका भारत से स्थानांतरण हो गया।

चार्ल्स मैटकाफ की उदार नीति

बैण्टिक के बाद सर चार्ल्स मेटकॉफ (1835-36 ई.) कार्यवाहक गवर्नर जनरल बना। उसने लॉर्ड मैकाले से एक कानून बनाने का आग्रह किया। मैकाले ने एडम कानूनों को अनावश्यक बताकर उन्हें रद्द करने की अनुशंसा की। उसके विचार में प्रेस को स्वतन्त्रता प्रदान की जानी चाहिये।

इसमें हस्तक्षेप तथा अंकुश केवल विशेष परिस्थितियों में किया जाना चाहिये। कम्पनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने मेटकॉफ के कानून का समर्थन नहीं किया, फिर भी मेटकॉफ ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की परवाह नहीं की और अपनी नीति पर दृढ़ रहा। इस प्रकार मेटकॉफ के समय से भारत में समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता का युग आरम्भ हुआ।

महाराष्ट्र की पत्रकारिता

बंगाल के साथ-साथ भारत के अन्य प्रदेशों में भी पत्रकारिता तेजी से आगे बढ़ रही थी। 1830 ई. में बम्बई प्रेसीडेन्सी से गुजराती भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित होते थे, इनमें से मुम्बई वर्तमान तथा जामे जमशेद का उल्लेख किया जा सकता है। उर्दू का सबसे पहला अखबार सैयद-उल-अखबार दिल्ली से 1837 ई. में निकला।

मराठी भाषा का पहला पत्र मुम्बई समाचार 1840 ई. में निकला जिसके सम्पादक सूर्याजी कृष्णाजी थे। 1849 ई. में कृष्णाजी, तिम्बकजी, रानाडे ने पूना से ज्ञान-प्रकाश निकाला। इस अवधि में समाचार पत्रों की संख्या तथा पाठकों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। कुछ पत्रों की बिक्री हजारों तक होने लगी।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पत्रकारिता के उद्देश्य

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में विभिन्न विषयों पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हुईं। भारत की पुरातन सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की जानकारी के लिए 1784 ई. में सर विलियम जॉन्स ने कलकत्ते में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। 1832 ई. में जेम्स प्रिंसेप के सम्पादकत्व में जर्नल ऑफ द् रायल सोसायटी ऑफ बंगाल प्रकाशित होने लगा।

इसमें वैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक विषयों से सम्बन्धित लेख छपा करते थे। मद्रास में भी एशियाटिक सोसायटी की शाखा मद्रास लिट्रेरी सोसायटी के अन्तर्गत जर्नल ऑफ लिटरेचर एण्ड साइन्स का प्रकाशन हुआ। इसी प्रकार 1843 ई. में देवेन्द्रनाथ टैगौर द्वारा प्रकाशित तत्त्वबोधिनी-पत्रिका आरम्भ हुई। यह पहली पत्रिका थी जिसमें भारतीय भाषा और देवनागरी लिपि में वैज्ञानिक तथा अन्य विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के समाचार पत्रों का उद्देश्य पढ़े-लिखे लोगों को नई बातों की जानकारी देना तथा जनहित के समाचार देना था। वे राजनीतिक जागृति अथवा जन-अधिकार की बातों दूर रहे। नयी चेतना के अग्रदूत राजा राममोहन राय ने भी अपने पत्र मिरात्-उल-अखबार में यह विचार प्रकट किया कि उनका उद्देश्य ऐसे लेखों को प्रकाशित करना है जिससे लोगों का अनुमान बढ़ सके तथा समाज सुधार किया जा सके।

शासक वर्ग के सामने ऐसी जानकारी रखी जा सके जिससे वे जनता को सरंक्षण तथा राहत दे सकें। भारतीय समाचार पत्रों ने आरम्भ से ही ऐसी भूमिका तैयार कर दी जिसके आधार पर भारतीयों की समस्याओं को समाचार पत्रों में प्रमुख स्थान मिलने लगा। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इन समस्याओं में राजनीतिक अधिकार और संवैधनिक सुधारों की मांगें भी सम्मिलित हो गईं।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारतीय पत्रकारिता में दो वर्ग थे- (1.) प्रबुद्ध भारतीयों द्वारा संचालित पत्र और (2.) एंग्लो-इण्डियन अथवा अँग्रेजों द्वारा चलाये जाने वाले समचार पत्र।

(1.) भारतीयों द्वारा संचालित पत्र

उस युग में प्रबुद्ध भारतीयों द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले समाचार पत्र शिक्षित जनता में आदर पाते रहे। उस समय साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम था तथा समाचार पत्रों के प्रकाशन में कई बाधाएं होती थीं। कुछ ही धनी भारतीय व्यक्तियों की रुचि समाचार पत्रों के प्रकाशनों की ओर थी। इस कारण बहुत कम संख्या में समाचार पत्र प्रकाशित होते थे। उनकी प्रतियाँ भी बहुत कम होती थीं। फिर भी, इन समाचार पत्रों ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया।

(2.) एंग्लो-इण्डियन अथवा अँग्रेजों द्वारा चलाये जाने वाले समचार पत्र

उस युग के अधिकांश समाचार पत्र अँग्रेजों द्वारा संचालित थे, वे सामान्यतः भारत-विरोधी विचारों के प्रतीक बने रहे। उनकी दृष्टि में भारतीयों को किसी प्रकार के अधिकार एवं सुविधा देना उचित नहीं था। इन पत्रों ने उन अँग्रेज शासकों की कटु आलोचना की जिन्होंने भारतीयों के न्याय सम्मत अधिकारों का समर्थन किया।

जब लॉर्ड विलियम बैटिंक ने सुझाव दिया कि भारतीयों को भी कम्पनी प्रशासन में उच्च पदांे पर नियुक्त किया जाना चाहिए तो इस वर्ग के समाचार पत्रों ने गवर्नर जनरल की कटु आलोचना की। अधिकांश अँग्रेज अधिकारी इस प्रकार के समाचार पत्रों में व्यक्त विचारों से प्रभावित होते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- ब्रिटिश काल में पत्रकारिता

अठारहवीं सदी में प्रेस एवं पत्रकारिता का विकास

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता

1857 के बाद पत्रकारिता

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