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अंग्रेजों का महलवाड़ी बंदोबस्त

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अंग्रेजों का महलवाड़ी बंदोबस्त

राजस्व निर्धारण एवं संग्रहण के क्षेत्र में अनेक प्रयोगों के अनुभव के पश्चात, उत्तर भारत के राज्यों द्वारा कम्पनी को हस्तान्तरित और अँग्रेजों द्वारा विजित आगरा तथा अवध इत्यादि ब्रिटिश क्षेत्रों में अंग्रेजों का महलवाड़ी बंदोबस्त लागू किया गया। इस बन्दोबस्त में भूमि-कर की इकाई किसान का खेत नहीं अपितु ग्राम या महाल होती थी।

गाँव की समस्त भूमि सम्मिलित रूप से समस्त ग्राम सभा की होती थी जिसे भागीदारों का समूह करते थे। भूमिकर देने के लिए यही समूह उत्तरदायी होता था। दूसरे शब्दों में सरकार के द्वारा कुछ गाँवों को महाल में एकत्र करके उस महाल का लगान निश्चित कर दिया जाता और फिर उस लगान को गाँव में विभाजित किया जाता था।

यद्यपि कई स्थानों पर व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी माना गया किन्तु सामान्यतः महलवाड़ी बन्दोबस्त, सामूहिक रूप से गाँव या महाल के आधार पर लागू किया गया। प्रत्येक गाँव भू-राजस्व की माँग के सम्बन्ध में अपना पक्ष रख सकता था किंतु महाल पर लगाये गये भू-राजस्व में अन्तर नहीं किया जाता था।

प्रत्येक किसान अपने खेत जोतता था तथा अपने हिस्से का भू-राजस्व देता था, साथ ही अपने साथी-किसानों के भू-राजस्व के लिए भी उत्तरदायी होता था। इस प्रकार महलवाड़ी बन्दोबस्त में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के साथ-साथ संयुक्त उत्तरदायित्व भी होता था। यदि कोई किसान अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज उस भूमि को ग्रहण कर लेता था। ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि का स्वामी होता था।

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में पहले जमींदारी व्यवस्था स्थायी रूप से लागू करने का निश्चय किया गया था। इसमें भारतीय राज्यों द्वारा हस्तान्तरित और अँग्रेजों द्वारा विजित क्षेत्र सम्मिलित थे। हस्तान्तरित क्षेत्र वह था जिसे अवध के नवाब ने 1801 ई. में कम्पनी को सौंपा था। इसमें सात जिले थे- इटावा, मुरादाबाद, फर्रूखाबाद, इलाहाबाद, कानपुर, गोरखपुर और बरेली।

सुर्जीअर्जन गाँव की सन्धि के बाद सिन्धिया से जो क्षेत्र प्राप्त हुए उन्हें विजित क्षेत्र कहा गया। इसमें पानीपत, सहारनपुर, अलीगढ़ और आगरा जिले सम्मिलित थे। हस्तान्तरित और विजित क्षेत्रों में राजस्व मण्डल द्वारा एक से पाँच वर्ष की अवधि के लिए (1803 से 1807 ई. के बीच) प्रारम्भिक समझौते किये गये। शेष लगान सम्बन्धी समझौते बोर्ड ऑर्फ कमिश्नर्स द्वारा किये गये।

विजित क्षेत्रों में स्थायी बन्दोबस्त लागू करने के प्रश्न पर बंगाल सरकार और कम्पनी के संचालक मण्डल के बीच गहरे मतभेद थे। किन्तु धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार की नीति में परिवर्तन आ रहा था। कम्पनी के बढ़ते हुए साम्राज्य के खर्च और अपने देश के औद्योगिकीकरण की माँग को पूरा करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता थी, जिसकी पूर्ति स्थायी बन्दोबस्त द्वारा की जानी संभव नहीं थी।

उधर इंग्लैण्ड में रिकार्डो, माल्थस आदि के शास्त्रीय अर्थशास्त्र और भूमि-किराया आदि के सिद्धान्त लोकप्रिय हो रहे थे तथा प्रशासनिक नीति को प्रभावित कर रहे थे। इन परिस्थितियों में महलवाड़ी व्यवस्था ने 1819 से 1822 ई. के बीच निश्चित रूप ग्रहण किया।

1819 ई. में बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स के सचिव होल्ट मेकेन्जी ने अपने एक पत्र में उत्तरी भारत के ग्रामीण समाजों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कुछ सुझाव दिये-

(1.) भूमि का सर्वेक्षण किया जाये।

(2.) भूमि से सम्बन्धित व्यक्तियों के अधिकारों का लेखा तैयार किया जाये।

(3.) प्रत्येक गाँव या महाल से कितना कर लेना है, तय किया जाए।

(4.) प्रत्येक ग्राम से भूमिकर प्रधान या लंबरदार द्वारा संग्रह करने की व्यवस्था की जाए।

1822 ई. के रेग्यूलेशन-7 द्वारा इस सुझाव को कानूनी रूप दे दिया गया। जहाँ जमींदार लगान एकत्र करते थे, वहाँ लगान भूमि-किराये का 30 प्रतिशत रखा गया किन्तु उन क्षेत्रों में जहाँ भूमि ग्राम समाज के सम्मिलित अधिकार में थी, वहाँ कुल उपज का 80 प्रतिशत, लगान के रूप में तय किया गया। यह लगान बहुत अधिक था और इसे कठोरता लागू किया किया गया।

तीस वर्षीय बन्दोबस्त

महलवाड़ी बन्दोबस्त को लागू करने में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। भूमि की उत्पादन शक्ति, उसका मूल्य तथा उसका किराया तय करना और भूमि का वर्गीकरण करना सरल कार्य नहीं था। अधिकांश अधिकारियों ने इन कार्यों को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त की।

भूमि के बारे में अभिलेखों से पूर्ण जानकारी प्राप्त करना सम्भव नहीं था, क्योंकि ब्रिटिश शासन के अधीन भूमि के स्वामित्व में निरन्तर परिवर्तन आ रहे थे। इसके अतिारिक्त इस व्यवस्था में लगान एक निश्चित अवधि के लिए निर्धारित किया गया किन्तु सरकार की माँग अत्यधिक होने के कारण तथा कर-वसूली में कठोरता अपनाने के कारण यह व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने लगी।

इसलिए लॉर्ड विलियम बैंटिक के प्रयत्नों से 1833 ई. के रेग्यूलेशन-9 द्वारा इस व्यवस्था के सिद्धान्तों में कुछ परिवर्तन किये गये। इसके द्वारा भूमि की उपज एवं भूमि किराये का अनुमान लगाने की पद्धति सरल बना दी गई। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि के लिए अलग-अलग औसत किराये निश्चित किये गये।

लगान निश्चित करने के लिए पहली बार मानचित्रों और पंजिकाओं का प्रयोग किया गया। नई भूमि योजना मार्टिन बोर्ड के निर्देशन में तैयार की गई। इस योजना के अनुसार एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था जिसमें खेतों की वास्तविक स्थिति देखी जाती थी। बंजर भूमि तथा उपजाऊ भूमि को स्पष्ट रूप से पंजीकृत किया गया।

इसके बाद समस्त माँग और फिर समस्त गाँव की भूमि का अध्ययन कर भूमि-कर निर्धारित किया गया। प्रत्येक गाँव या महाल के अधिकारियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल समायोजित करने का अधिकार दिया गया। भूमि-किराये का 66 प्रतिशत राज्य सरकार का हिस्सा तय किया गया और यह व्यवस्था 30 वर्ष की अवधि के लिए लागू कर दी गई। 1855 ई. में सरकार ने लगान को कुल पैदावार का पचास प्रतिशत कर दिया किन्तु आधा भाग निर्धारित करते समय भविष्य में होने वाली वृद्धि का भी ध्यान रखा गया।

ग्राम व्यवस्था

पंजाब में संशोधित महलवाड़ी व्यवस्था लागू की गई जिसे ग्राम व्यवस्था भी कहा गया।

अंग्रेजों का महलवाड़ी बंदोबस्त का कृषकों पर प्रभाव

इस बन्दोबस्त से किसानों को कोई लाभ नहीं पहुँचा। बंगाल में ब्रिटिश सरकार ने भूमि नीति में, सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों को महत्त्व दिया था किन्तु उस प्रकार की नीति नये बन्दोबस्त में नहीं अपनाई गई। फिर भी, सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार प्राप्त करने के लिए यहाँ होड़-सी मच गई और जमींदारी व्यवस्था के समस्त लक्षण प्रकट होने लगे।

अतः यह व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था का ही संशोधित रूप कही जा सकती है। यहाँ लगान सम्बन्धी निर्णय जल्दबाजी और लापरवाही से किये गये। अधिकांश समझौतों में लगान दर, गलत अभिलेखों या अपूर्ण अध्ययन के आधार पर तय की गई तथा इन निर्णयों को कठोरता से लागू किया गया।

इस प्रकार केवल कानपुर क्षेत्र में ही प्रथम तीन वर्ष की अवधि में 238 जमींदारों को भूमि अधिकार से वंचित होना पड़ा। भूमि का स्वामित्व बदलते रहने से किसानों पर घातक प्रभाव पड़ा। इस व्यवस्था में भूमि-कर बहुत अधिक तय किया गया जिससे किसानों को अत्यधिक कठिनाई उठानी पड़ी और अन्ततः इन क्षेत्रों में भी भूमि, व्यापारियों एवं साहूकारों के हाथों में चली गई।

चूँकि यह व्यवस्था जमींदारी प्रथा का ही संशोधित रूप थी, अतः इसमें जमींदारी प्रथा के समस्त दोष उत्पन्न हो गये। करों का भारी बोझ होने के कारण किसानों की स्थिति दयनीय हो गयी। यह व्यवस्था बोर्ड द्वारा बहुत ही कठोरता से तैयार की गई थी जिसमें पुराने जमींदारों या तालुकेदारों के अधिकारों की अवहेलना की गई थी। अतः इस पद्धति की कठोरता ने ही 1857 ई. में तालुकेदारों को विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया।

निष्कर्ष

 उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ब्रिटिश भू-राजस्व नीति, निरन्तर प्रयोगों के परिणाम स्वरूप विकसित हुई थी। इसकी तीन प्रमुख पद्धतियाँ थीं-

(1.) बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस खण्ड और उत्तरी कर्नाटक में जमींदारी अथवा स्थायी भूमि बन्दोबस्त: यह व्यवस्था भारत की 19 प्रतिशत भूमि पर लागू की गई।

(2.) बम्बई और मद्रास क्षेत्र के अधिकांश भागों, असम और अन्य भागों में रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त: यह व्यवस्था भारत की 51 प्रतिशत भूमि पर लागू हुई।

(3.) उत्तर-पश्चिमी प्रांत, मध्य प्रांत तथा पंजाब में महलवाड़ी बन्दोबस्त: यह व्यवस्था भारत की 30 प्रतिशत भूमि पर आरम्भ की गई।

ये तीनों ही पद्धतियां भारतीय परम्परागत प्रथाओं के विरुद्ध थीं। जमींदारी प्रथा इंग्लैण्ड में प्रचलित सामंतवादी प्रथा का प्रतिरूप थी। रैयतवाड़ी प्रथा फ्रांस में प्रचलित कृषक स्वामित्व का प्रतिरूप थी और महलवाड़ी प्रथा भारतीय आर्थिक समुदाय का प्रतिरूप थी।

इन तीनों पद्धतियों में लगान की दर 66 प्रशित से लेकर 80 प्रतिशत तक थी जिसने किसानों पर आर्थिक बोझ अत्यधिक बढ़ा दिया। इनके लागू होने से भारत की ग्राम्य प्रधान अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। अँग्रेजों ने भू-व्यवस्था के सम्बन्ध में जो प्रयोग किये, वे सामन्ती व्यवस्था को बनाये रखने के प्रयास थे जिनमें साधारण किसानों के हितों की पूर्णतः अवहेलना की गई।

इससे देश में भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ने लगी। चूँकि भारतीय पूंजीपतियों के लिये औद्योगिक स्पर्धा में ब्रिटिश पूँजीपतियों के समक्ष टिके रहना संभव नहीं था इसलिये भारत के पूँजीपति वर्ग ने, खेती में अपनी पूँजी लगाई तथा पूँजीपतियों ने गाँवों में पुराने जमींदारों का स्थान ले लिया।

इन नये जमींदारों को किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी क्योंकि उनका उद्देश्य अपने पूँजी निवेश पर अधिक से आधिक लाभ प्राप्त करना था। इसलिए नये जमींदार भी किसानों का शोषण करने में जुट गये। सरकार ने किसानों को कोई संरक्षण नहीं दिया और न ही कृषि में सुधार करने का प्रयत्न किया। इन कारणों से भारत में स्थान-स्थान पर किसान आन्दोलन उठ खड़े हुए।

इतनी भयावह परिस्थितियों में भी भारतीय किसान पूरे जीवट के साथ जीवित था जिसने अब भी विश्व के अन्य देशों के किसानों की तुलना में खेती के शानदार ढंग को बनाये रखा था।

ब्रिटिश सरकार को आर्थिक और भारतीय पैदावार के सम्बन्ध में सलाह देने वाले अधिकारी जॉर्ज बॉट ने 1894 ई. में सरकार को सलाह देते हुए कहा- ‘यदि केवल अविकसित साधनों के मूल्य और विस्तार को देखा जाये तो संसार के बहुत कम देशों में खेती का इतने शानदार ढंग से विकास करने की क्षमता है, जैसी भारत में है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

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कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत में कृषि का वाणिज्यीकरण हुआ। परम्परागत रूप से भारत में कृषि निजी उपभोग के उद्देश्य से होती थी। कृषि उत्पादों को बाजार में नहीं बेचा जाता था अपितु भूराजस्व के रूप में फसल चुकाने तथा निजी उपयोग हेतु घर में रखने के बाद बची हुई फसल का उपयोग वस्तु विनिमय के आधार पर वस्तुएं एवं सेवाएं प्राप्त करने में होता था।

ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व कर नीति ने भारत में, न केवल जमींदार एवं भूमिहीन किसान जैसे नये सामाजिक-आर्थिक वर्गों को जन्म दिया, अपितु देश की आर्थिक स्थिति को भी पूँजीवादी हितों के अनुरूप ढाल दिया। इस नीति ने कृषि-उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाला। अँग्रेजों के आने के पहले किसानों का शोषण तो होता था किंतु कृषि-उत्पादन में आत्म-निर्भरता थी। अँग्रेजों के आने के बाद कृषि-उत्पादन में भारी गिरावट आई। इस गिरावट के लिये अँग्रेजों की कृषि नीति उत्तरदायी थी।

कृषि पर बढ़ता बोझ

1813 ई. तक ब्रिटिश कम्पनी ने व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रखा। इस कारण शिल्पी, दस्तकार एवं कारीगर बड़ी संख्या में बे-रोजगार होकर शहरों से गाँवों की ओर जाने को विवश हुए, जहाँ उन्होंने कृषि को जीविकोपार्जन का साधन बनाया। इस प्रकार कृषि पर निर्भर रहने वालों की संख्या बढ़ गई जिससे भूमि का विभाजन और उपविभाजन आरम्भ हुआ। भूमि के विभाजन से भूमि की उपलब्धता, कृषि-उत्पादन और कृषि में लगे हुए लोगों की संख्या के बीच असन्तुलन पैदा हो गया।

कृषि उत्पादन में गिरावट

भूमि पर आश्रित लोगों की संख्या बढ़ने से कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, क्योंकि भूमि सीमित थी। अंग्र्रेजों ने, इस गिरावट के लिए भारतीय कृषि भूमि की अनुर्वरता और कृषक की अकुशलता को उत्तरदायी ठहराया किन्तु वास्तव में कृषि-उत्पादन की कमी का कारण भूमि की अनुर्वरता अथवा कृषक की अकुशलता न होकर, कृषि पर बढ़ता हुआ कामगरों का बोझ, कृषि हेतु सिंचाई के साधनों का अभाव तथा किसान के पास पूँजी का अभाव होना था।

ज्यों-ज्यों ब्रिटिश सत्ता का विस्तार होता गया, सरकार का खर्च बढ़ता गया और लगान में वृद्धि की जाती रही। लगान चुकाने में असमर्थ रहने पर बहुत से किसान खेती के कार्य से अलग हो जाते थे।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त होने से पहले बंगाल के नवाब मीर जाफर द्वारा 1764-65 ई. में 8.18 लाख पौंड का लगान वसूल किया गया था किंतु कम्पनी को दीवानी का अधिकार प्राप्त होने के बाद 1765-66 ई. में 14.70 लाख पौंड लगान के रूप में एकत्र किये गये। एक बार लगान-वृद्धि का जो क्रम चालू हुआ, वह चलता ही रहा। 1826 ई. तक लगान की राशि 24.20 लाख पौंड और 1857 ई. में 36 लाख पौंड तक पहुँच गई।

ब्रिटिश सरकार ने लगान की दर काफी ऊँची रखी। उदारहण के तौर पर स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत यह दर 80 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त के अन्तर्गत आरम्भ में यह दर 66 प्रतिशत रखी गई किन्तु उत्पादन में कमी होने के कारण 45 प्रतिशत कर दी गई। लगान की इस अमानवीय व्यवस्था ने उत्पादन को महंगा बना दिया। इस कारण खेती पिछड़ गई और देश की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई। किसानों की आर्थिक दुरावस्था गोरी सरकार के लिये राजनीतिक खतरा बन गई।

लगान की अधिकता तथा कृषि उत्पादन के महँगेपन ने किसान को ऋण के भारी बोझ तले दबा दिया, जिससे वह कभी नहीं उबर सका। उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ऋण का सहारा लिया। लगान की बढ़ती हुई दर तथा किसान की सामाजिक आवश्यकताओं के कारण किसानों की ऋण-ग्रस्त्ता बढ़ती ही गई।

ब्रिटिश सरकार ने किसानों की ऋण-ग्रस्त्ता का कारण, लगान की अधिकता नहीं बताकर, किसानों की फिजूलखर्ची व सामाजिक तथा पारिवारिक उत्सवों में धन फूंकने की आदत बताया, जो कि सत्य नहीं था। भारी लगान व साहूकार की मनमानी के कारण किसान ऋणों के बोझ से दबता ही चला गया।

निरन्तर बढ़ती ऋण-ग्रस्त्ता के कारण किसानों की जमीन उसके हाथों से निकलती चली गई। साहूकार किसानों के ऋण के बदले में उनकी जमीनें हड़पने लगे। सरकार की ओर से इस प्रकार के हस्तान्तरण को रोकने के लिये कुछ कानून बनाये गये, जैसे- बंगाल काश्तकारी अधिनियम-1859, मद्रास काश्तकारी अधिनियम-1889, दक्कन कृषि सहायता अधिनियम, जो आगे चलकर बम्बई प्रेसीडेन्सी पर भी लागू किया गया, मध्य प्रदेश काश्तकारी अधिनियम-1898; आदि। ये कानून अधिक प्रभावी सिद्ध नहीं हुए और किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

कृषि का वाणिज्यीकरण

कृषि और कृषक की दशा बिगाड़ने के लिये ब्रिटिश सरकार की कृषि नीति ही नहीं अपितु औद्योगिक नीति भी जिम्मेदार थी। 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके मुक्त व्यापार नीति अपनाई गई।

अब भारत केवल एक पूँजीवादी व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला देश ही नहीं था अपितु ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिये एक मण्डी भी बन गया; जिसके कारण स्थानीय कुटीर उद्योग नष्ट हो गये। चूँकि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति उफान पर थी, अतः इंग्लैण्ड को अपने उद्योगों के लिये सस्ते माल की आवश्यकता थी, इस कारण भारत कच्चे माल का उत्पादन करने वाला देश बनकर रह गया।

अब भारत को ब्रिटेन में बने माल की खपत करने वाले बाजार और कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले उपनिवेश की दोहरी भूमिका निभानी थी। भारत को अब केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करना था, जिनकी इंग्लैण्ड के मिलों को एवं इंग्लैण्ड-वासियों को आवश्यकता थी।

इसके अतिरिक्त भारत में पँूजीवादी व्यवस्था के बढ़ने के साथ-साथ नई लगान नीति के कारण किसान को अब नकद राशि की आवश्यकता थी। इसलिये अब किसान भी उन फसलों को उगाने के लिये विवश हुए जिनका बाजार में क्रय-विक्रय हो सके। जबकि इससे पहले किसान केवल उन्हीं फसलों को उगाता था जिनकी खपत स्थानीय स्तर पर होती थी। इस प्रकार उत्पादन के स्वरूप और प्रकृति में मूलभूत परिवर्तन हुए तथा भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण हो गया।

नगदी फसलों की अवधारणा का विकास

भारत में ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने से पूर्व, उन जिन्सों का उत्पादन होता था जो कृषक परिवारों के दैनिक उपयोग के लिये आवश्यक थीं तथा जिनका प्रयोग विनिमय के लिये हो सकता था। ब्रिटिश पूंजीवाद के हस्तक्षेप से भारत का किसान केवल वे जिन्सें पैदा करने लगा जिनका देशी और विदेशी बाजार में अधिक मूल्य मिल सके।

इस प्रकार कृषि के मूलभूत स्वरूप में परिवर्तन हो गया तथा अनेक स्थानों पर कुछ निश्चित फसलें उगाई जाने लगीं, जैसे- बंगाल में केवल जूट की खेती पर और पंजाब में केवल गेहूं और कपास की खेती पर अधिक बल दिया गया। बनारस, बिहार, बंगाल, मध्य भारत तथा मालवा में अफीम के व्यापार के लिये पोस्त की खेती को बढ़ावा मिला।

बर्मा में चावल की खेती बढ़ी। सरकार द्वारा इन कृषि उत्पादों को बढ़ाने के लिये किसानों को अग्रिम राशि भी दी जाती थी। 1853 ई. के बाद भारत में ब्रिटिश पूँजीपतियों द्वारा किये गये पूँजी निवेश के कारण नील, चाय, कॉफी, रबर आदि की खेती पर अधिक जोर दिया जाने लगा। भारत में यूरोपीय और ब्रिटिश पूँजीवाद की पहली पसन्द चाय, कॉफी, रबर और नील की खेती थी। इन फसलों के लिये उन्हें यूरोपीय बाजारों में अत्यधिक कीमत प्राप्त होती थी।

(1.) नील की खेती

नील बागानों का कार्य निर्धन श्रमिकों से करवाया जाता था। उन्हें नील के बागानों में काम करने के लिये बलपूर्वक अग्रिम राशि दी जाती थी और फिर उन्हें बंधुआ श्रमिक बनाकर बागानों में काम करवाया जाता था। 1860 ई. में नील आयोग की रिपोर्ट आई जिसमें में कहा गया- ‘रैयत ने पेशगी राशि चाहे अपनी इच्छा के विरुद्ध ली या खुशी से, वह कभी भी इसके बाद स्वतंत्र व्यक्ति नहीं रहा।’

आयोग ने उन दिनों भारतीय गाँवों में प्रचलित इस कहावत का भी उल्लेख किया– ‘अगर कोई नील के समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह सात पीढ़ियों तक स्वतंत्र नहीं हो सकता।’  बिहार, आसाम और उत्तर प्रदेश के नील बागानों में श्रमिकों की स्थिति गुलामों जैसी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के परिणाम स्वरूप और बढ़ते हुए राष्ट्रवाद के कारण नील के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों को मुक्ति प्राप्त हुई।

(2.) चाय-कॉफी के बागान

चाय और कॉफी के बागानों ने भी भारत में ब्रिटिश पूँजी निवेश को आकर्षित किया। इन बागानों में किसी प्रकार के श्रमिक कानून लागू नहीं थे। बागान मालिक, इन बागानों में काम करने वाले श्रमिकों का जी-भरकर शोषण करते थे। 1887 ई. में चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या लगभग 5 लाख थी।

चाय-बागानों में काम करने हेतु श्रमिकों को लाने के लिये अत्यधिक छल-कपट किया जाता था तथा उनसे लुभावने वायदे किये जाते थे किन्तु जब वे एक बार बागानों में पहुँच जाते थे तो उन्हें बंदियों की तरह रखा जाता था। रायल कमीशन ऑन लेबर ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है।

इन श्रमिकों को निर्जन जंगलों में रखा जाता था जहाँ खाद्य पदार्थ नहीं मिलते थे और जो मिलते भी थे तो वे बहुत महँगे होते थे। इस कारण श्रमिक और उनके परिवार के लोग कुपोषण एवं घातक बीमारियों के शिकार होकर मर जाते थे परन्तु चाय बागानों के मालिकों को अपने लाभ के अतिरिक्त और किसी बात से मतलब नहीं था।

(3.) जूट की खेती

यूरोप के कारखानों को जूट की बहुत बड़ी मात्रा में आवश्यकता थी इसलिये यूरोपीय और ब्रिटिश व्यापारियों ने जूट उद्योग में काफी पूँजी का निवेश किया। अतः यूरापनियनों की व्यापारिक एवं औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति के लिेय पटसन की खेती पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि यूरोपीय मिलों को सस्ता रेशा मिल सके और यूरोपीय व्यापारियों एवं उद्योगपतियों को भारी लाभ हो सके। यूरोपीय व्यापारी एवं उद्योगपति पटसन और जूट से भारी लाभ अर्जित करते थे किंतु कच्चा माल देने वाले किसानों को उनके उत्पादन की बहुत ही कम कीमत देते थे।

कृषि का वाणिज्यीकरण के प्रभाव

कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण होने के परिणामस्वरूप भारतीय किसानों एवं गांवों की तस्वीर तेजी से बदलने लगी। पूंजी का प्रवाह भारत से ब्रिटेन की तरफ हो गया तथा भारत के गांव तेजी से निर्धन होने लगे। किसान का पूरा परिवार दिन-रात परिश्रम करने के उपरांत भी ऋण लेकर लगान चुकाता था जिससे किसान बड़ी संख्या में सूदखोरों एवं साहूकारों के चंगुल में फंस गया तथा चारों ओर निर्धनता एवं भुखमरी का बोलबाला हो गया। कृषि वाणिज्यीकरण के कुछ प्रमुख प्रभाव इस प्रकार से हैं-

(1.) गांवों में पूंजी की आवश्यकता

कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण भारतीय गांवों की वस्तु विनिमय क्षमता और आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई तथा गांवों में भी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पूंजी की अनिवार्यता हो गई। पूंजी आधारित अर्थव्यस्था का निर्माण होने से गांवों में उत्पादित प्रत्येक वस्तु शहरों की ओर जाने लगी।

(2.) कृषकों की निर्धनता में वृद्धि

कृषि के वाणिज्यीकरण से व्यापारी वर्ग तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बहुत लाभ होने लगा परन्तु किसानों की निर्धनता में वृद्धि हुई। इसका मुख्य कारण व्यापारियों की छल-कपटपूर्ण नीति थी। वे खेत में खड़ी फसलों को सस्ते दामों पर खरीद लेते थे। किसान अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये, फसल मंडी में न ले जाकर, खेत में ही बेच देता था। ऐसे सौदे में व्यापारी फसल की बहुत कम कीमत तय करता था। इस कारण किसानों की निर्धनता बढ़ती चली गई।

(3.) अकालों की भयावहता में वृद्धि

कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण फसलें औद्योगिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उगाई जाती थीं। जूट एवं कपास की खेती में वृद्धि होने से खाद्यान्नों की भारी कमी हो गई और अकाल पड़ने लगे। कम्पनी का शासन होने से पूर्व भी भारत में अकाल पड़ते थे किन्तु उनका कारण धान का अभाव न होकर यातायात के साधनों का अभाव था।

ब्रिटिश शासन में पड़ने वाले अकाल व सूखों का प्रत्यक्ष कारण कम्पनी की दोषपूर्ण औद्योगिक एवं कृषि नीतियां थीं। इन नीतियों ने भारतीय किसानों को अत्यधिक निर्धन बना दिया। अकाल के समय खाद्यान्नों के दाम इतने अधिक बढ़ जाते थे कि लोगों के लिये अन्न खरीदना असम्भव हो जाता था।

इस कारण प्रत्येक अकाल के समय हजारों लोग भूख से तड़प कर मर जाते थे। प्रायः शवों को उठाने का कोई प्रबन्ध नहीं होता था। इस कारण पूरा का पूरा क्षेत्र महामारी की चपेट में आ जाता था और हजारों लोग महामारी से ग्रस्त होकर मर जाते थे। कम्पनी के शासन में 1770 ई. के बंगाल के अकाल में बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या मर गई।

1860-61 ई. में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल पड़ा जिसमें दो लाख लोग मरे। 1865-66 ई. में उड़ीसा, बंगाल, बिहार एवं मद्रास में पड़े अकाल में बीस लाख लोग मरे। केवल उड़ीसा में ही 10 लाख लोग मारे गये। 1866-70 ई. के अकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बम्बई में 14 लाख से अधिक लोग मारे गये।

इन क्षेत्रों की एक चौथाई जनसंख्या समाप्त हो गई। 1876-78 ई. में मद्रास, मैसूर, हैदराबाद, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में भीषण अकाल पड़ा। इस अकाल में पंजाब में 8 लाख और मद्रास में 35 लाख लोग मरे। मैसूर की 20 प्रतिशत जनसंख्या मर गई। उत्तर प्रदेश में 12 लाख से अधिक लोग मरे।

1899 ई. के अकाल को छपनिया काल कहा जाता है, इसमें राजस्थान के 25 प्रतिशत लोग मर गये। विलियम डिग्बी के अनुसार 1854 से 1901 ई. के अकालों में देश में 2,88,25,000 लोग मौत के मुंह में समा गये। 1943 ई. में बंगाल के भीषण अकाल में 30 लाख लोग मरे।

(4.) कृषकों के विद्रोह

नगदी फसलों की खेती के कारण किसानों का शहरों में आना-जान बढ़ गया। इससे किसानों में राजनीतिक चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। इस चेतना ने किसानों को शोषणकारियों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये उकसाया। जैसे-जैसे पूँजीवादी व्यवस्था कठोर होती चली गई, कृषक विद्रोह भी बढ़ने लगे।

1857 ई. में दक्कन में मराठा किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध बगावत की। किसानों में असंतोष को कम करने के लिये 1879 ई. में दक्कन काश्तकारी सहायता अधिनियम पारित किया गया। 1870 ई. में बंगाल के बंटाईदारों का आर्थिक संकट बढ़ने पर उन्होंने लगान देने से मना कर दिया। इसी समय संथालों ने भी विद्रोह किया। इस कारण 1885 ई. में बंगाल काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया।

(5.) नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों का उदय

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सामन्ती व्यवस्था को समाप्त करके जमींदार, छोटे काश्तकार, खेतिहर मजदूर आदि नवीन आर्थिक-सामाजिक वर्गों को जन्म दिया। नई लगान व्यवस्था ने भी भारतीय ग्रामीण सामाजिक सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव डाला।

परम्परागत रूप से भारतीय ग्रामीण समुदाय के सदस्यों में परस्पर सम्बन्धों का निर्धारण जातिगत सम्बन्धों, धार्मिक आधार, परम्परा या रीति-रिवाजों पर आधारित था। ब्रिटिश कानूनों तथा आर्थिक नीतियों ने परम्परागत सामाजिक व जातीय सम्बन्धों को शिथिल कर दिया। ब्रिटिश आर्थिक नीति के फलस्वरूप जो सामाजिक-आर्थिक वर्ग अस्तित्त्व में आये उनमें सबसे नीची सीढ़ी पर निम्न वर्ग था।

(6.) भूमिहीन एवं श्रमिक वर्ग का उदय

ब्रिटिश कृषि नीति, आर्थिक नीति व लगान प्रणाली के परिणाम स्वरूप छोटे किसानों की जमीन उनके अधिकार से निकलकर साहूकारों के पास पहुंचने लगी जिससे भारतीय किसान भूमिहीन होकर खेतिहर श्रमिक में परिणत होने लगा। खेतिहर श्रमिकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ने से, समस्त खेतिहर जनसंख्या के लगभग आधे लोग इसी वर्ग में आ गये। 1875 ई. में देश में भूमिहीन कृषकों की संख्या 80 लाख थी जो 1901 ई. में बढ़कर 350 लाख तथा 1921 ई. में 390 लाख हो गई।

(7.) यातायात एवं संचार साधनों में सुधार

कृषि के वाणिज्यीकरण के कारण कृषि जिन्सों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक तेज गति से पहुंचाने के लिये रेल, सड़क एवं जहाजरानी परिवहन साधनों का विकास हुआ। जिन्सों की बिक्री, सौदे एवं भाव आदि सूचनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिये डाक-तार व टेलीफोन आदि संचार-व्यवस्थाओं का विकास हुआ।

कम्पनी ने भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अच्छी सड़कों का निर्माण किया ताकि बन्दरगाहों तक कच्चा माल पहुँचाने में सुविधा हो सके। यूरोपियन लेखकों ने लिखा है कि यह सब भारतीयों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने व विकसित करने के लिये किया गया जबकि वास्तविकता यह थी कि ये समस्त कार्य इसलिये किये गये ताकि वे भारतीय कच्चा माल लंकाशायर और मैनचेस्टर की मिलों तक सुगमता से पहुँचा सकें तथा वहाँ उत्पादित माल को भारत के दूरस्थ गाँवों तक पहुँचा सकें।

(8.) विश्वव्यापी मंदी की मार

भारत का किसान कृषि के वाणिज्यीकरण से पहले, विश्वव्यापी मंदियों के दौर से बेअसर रहता था किंतु अब उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व भर के किसानों से थी इसलिये उसका भी मंदी की चपेट में आ जाना स्वाभाविक था। भारत में वर्ष 1928-29 की मंदी के दौर से पहले 10 अरब 34 करोड़ रुपये मूल्य की पैदावार होती थी जो 1933 ई. में घटकर केवल 4 अरब 73 करोड़ रुपये मूल्य की रह गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – ब्रिटिश शासन काल में किसान आंदोलन

उन्नीसवीं सदी के किसान आन्दोलन

बीसवीं सदी के किसान आंदोलन

किसान आन्दोलनों के कारण

भारत से धन का निष्कासन

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भारत से धन का निष्कासन

भारत से धन का निष्कासन लगभग एक हजार साल तक होता रहा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम पहला आक्रांता था जो भारत से धन लूटकर अफगानिस्तान ले गया। अंग्रेज जाति अंतिम शक्ति थी जो भारत से बड़ी मात्रा में धन का निष्कासन करने में सफल रही।

भारत पर पाश्चात्य देशों के आक्रमण तो सिकंदर से पूर्व भी होते रहे किंतु उनके प्रभाव सीमित होने के कारण उनमें भारत से धन का विशेष निष्कासन नहीं हुआ। सिकंदर एवं उसके बाद के पाश्चात्य आक्रमणों में भी धन निष्कासन अत्यंत सीमित मात्रा में संभव हो सका।

शक, कुषाण तथा हूण आदि आक्रांताओं ने भारत में ही अपने शासन स्थापित किये इसलिये वे भारत से धन निकालकर बाहर नहीं ले गये। 712 ई. में भारत पर मुस्लिम आक्रमणों का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह 1761 ई. में अहमदशाह अब्दाली के अंतिम आक्रमण तक जारी रहा।

एक हजार वर्ष से भी अधिक लम्बे समय तक चले इस दौर में उत्तर भारत एवं पश्चिमी भारत से अपार धन सम्पदा लूटी गई फिर भी इन आक्रमणों से धन का निष्कासन उतना अधिक नहीं हुआ जितना 1757 ई. में प्लासी के युद्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के आरम्भ से लेकर 1947 ई. में ब्रिटिश ताज के राज्य की समाप्ति तक हुआ।

मार्कोपोलो ने भारत को एशिया का मुख्य बाजार कहा है। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांसिसी यात्री बर्नियर ने भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते हुए लिखा है- ‘यह भारत एक अथाह गड्ढा है, जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चांदी चारों तरफ से अनेक रास्तों से आकर जमा होता है……. यह मिस्र से भी अधिक धनी देश है।’

बीसवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक दशा के बारे में एक इतिहासकार ने लिखा है- ’20वीं सदी के आरम्भ में लगभग दस करोड़ व्यक्ति ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं जिन्हें किसी समय भी पेट भर अन्न नहीं मिलता।’

 स्पष्ट है कि इस अवधि में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश ताज, भारत को पूरी तरह चूस कर खोखला कर चुके थे।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश ताज द्वारा मचाई गई लूट

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1765 ई. में बंगाल की दीवानी के अधिकार प्राप्त किये तथा उसने तेजी से आगे बढ़कर उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो दशकों तक शेष देश को अपने चंगुल में ले लिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शिकंजा कसे जाने से पूर्व, भारत में उद्योग, कृषि एवं निर्यात की दशा संतोषजनक थी। ढाका की मलमल पूरे विश्व में विख्यात थी। हीरे-जवाहरात, गर्म मसाले, शृंगार प्रसाधन, हाथी दांत की कलात्मक वस्तुएं, सुगंधित तेल, इत्र, सूती एवं रेशम का कपड़ा विदेशों को निर्यात किये जाते थे। कम्पनी द्वारा देश पर शिकंजा कस लिये जाने के बाद भारत के ग्रामीण दस्तकारों, किसानों तथा व्यापारियों की स्थिति खराब होने लगी। वे कम्पनी की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगे। कम्पनी द्वारा बनाये गये कानूनों के कारण भारत से तैयार उत्पाद के स्थान पर कच्चा माल लंका शायर एवं मैनचेस्टर की मिलों को जाने लगा। व्यापार में कमाये गये लाभ एवं बंगाल की दीवानी से अर्जित राजस्व, तेजी से देश के बाहर जाने लगा। 1767 ई. में ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को निर्देश दिये कि वह प्रति वर्ष रानी की सरकार को 4 लाख पौण्ड दे।

जॉन सुलिवन ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति एवं उसके प्रभाव को दर्शाते हुए लिखा है- ‘हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु ले लेती है और टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।’

भारत से धन का निष्कासन अथवा धन के बहिर्गमन का सिद्धांत

भारत से धन के निष्कासन का सिद्धांत सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 2 मई 1867 को लंदन में ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन की बैठक में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा ब्रिटेन अपने शासन की कीमत पर भारत की सम्पदा को छीन रहा है। भारत में वसूल किये गये राजस्व का एक चौथाई भाग भारत से बाहर चला जाता है। भारत का रक्त निरंतर निचोड़ा जा रहा है। महादेव गोविंद रानाडे ने भी 1872 ई. में अपने एक भाषण में कहा- ‘भारत की राष्ट्रीय आय के एक तिहाई हिस्से से अधिक, ब्रिटिश सरकार द्वारा किसी ने किसी रूप में लिया जाता है।’ रमेशचंद्र दत्त ने इकॉनोमिक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में लिखा है- ‘भारत में हो रही धन की निकासी का उदाहरण आज तक विश्व के किसी भी देश में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा।’

दादाभाई नौरोजी ने पॉवर्टी एण्ड ब्रिटिश रूल इन इण्डिया नामक शोध ग्रंथ में भारत से धन के बहिर्गमन के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत की मुख्य बातें इस प्रकार से हैं-

(1.) धन के बर्हिगमन की राष्ट्रवादी परिभाषा का तात्पर्य भारत से धन-सम्पत्ति एवं माल का इंग्लैण्ड में हस्तान्तरण था जिसके बदले में भारत को इसके समतुल्य कोई भी आर्थिक, वाणिज्यिक या भौतिक प्रतिलाभ प्राप्त नहीं होता था।

(2.) धन बर्हिगमन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम, ब्रिटिश प्रशासनिक, सैनिक और रेलवे अधिकारियों के वेतन देना, आय व बचत के एक भाग को इंग्लैण्ड भेजना और अँग्रेज अधिकारियों की पेंशन एवं अवकाश भत्तों को इंग्लैण्ड में भुगतान करना था।

(3.) धन का बहिर्गमन भारत की निर्धनता का मुख्य कारण है।

भारत से धन का निष्कासन की मात्रा एवं स्वरूप

ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत से निकाले गये धन की मात्रा का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है। विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग आंकड़े दिये हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) बंगाल प्रांत में प्राप्त होने वाले राजस्व एवं व्यय विवरण के अनुसार कम्पनी ने प्रथम छः वर्षों (1765-1771 ई.) में 1,30,66,991 पौण्ड शुद्ध राजस्व अर्जित किया जिसमें से 90,27,609 पौण्ड खर्च कर दिया। शेष बचे 40,39,152 पौण्ड का सामान इंग्लैण्ड भेज दिया गया।

(2.) विलियम डिग्बी के अनुसार 1757 ई. से 1815 ई. तक भारत से 50 से 100 करोड़ पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

(3.) 1828 ई. में मार्टिन मोंटमुगरी ने इस निर्गम का अनुमान 30 हजार मिलियन पौण्ड (3 करोड़ पौण्ड) प्रतिवर्ष की दर से लगाया।

(4.) जॉर्ज विन्सेट द्वारा 1859 ई. में लगाये गये अनुमान के अनुसार 1834 ई. से 1851 ई. तक भारत से 42,21,611 पौण्ड धन का निष्कासन प्रतिवर्ष हुआ। 

(5.) भारत को कम्पनी के माध्यम से ब्रिटिश ताज को सत्ता हस्तांतरण से सम्बन्धित व्यय, चीन के साथ हुए युद्धों के व्यय, लंदन में इण्डिया ऑफिस के व्यय, भारतीय सेना की रेजीमेण्टों के प्रशिक्षण व्यय, चीन और फारस में इंग्लैण्ड के राजनयिक मिशनों के व्यय, इंग्लैण्ड से भारत तक टेलिग्राफ लाइनों के सम्पूर्ण व्यय आद विविध व्यय चुकाने पड़ते थे। इस कारण भारत पर वर्ष 1850-51 में 5.50 करोड़ रुपये का ऋण चढ़ गया।

(6.) कम्पनी के अनुसार 1857 ई. के विद्रोह को दबाने में 47 करोड़ रुपये व्यय हुए। कम्पनी ने इस राशि को भारत पर कर्ज माना।

(7.) दादा भाई नौरोजी तथा आर. सी. दत्त आदि राष्ट्रवादियों ने 1883 ई. से 1892 ई. तक के दस वर्षों में भारत से इंग्लैण्ड भेजी गई राशि 359 करोड़ पौण्ड बताई है।

(8.) विभिन्न स्थलों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने पर अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 1834 से 1924 ई. तक के 90 वर्ष की अवधि में भारत से 394 से 591 मिलियन पौण्ड राशि इंग्लैण्ड भेजी गई।

भारत से धन का निष्कासन के परिणाम

1765 ई. से 1947 ई. तक भारत से भारी परिमाण में किये गये धन निष्कासन के अत्यन्त बुरे परिणाम हुए।

(1.) 1939-40 ई. में भारत सरकार पर ब्रिटिश सरकार का 1200 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। आश्चर्य है कि 1850-51 ई. में यह कर्ज केवल 5.50 करोड़ रुपये था।

(2.) कर्ज बढ़ने से भारतीयों पर करों का बोझ बढ़ गया। भारत का यह कर प्रति व्यक्ति आय का 14 प्रतिशत से अधिक था। इससे भारतीयों का जीवन स्तर निरंतर गिरता चला गया।

(3.) देश में दरिद्रता बढ़ने से बार-बार अकाल पड़ने लगे जिनमें हजारों लोग मरने लगे। एक अनुमान के अनुसार इन अकालों में 2.85 करोड़ लोग मरे। 

(4.) भारत की अर्थव्यवस्था, औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदल गई जिससे देश में गहरा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।

(5.) आम भारतीय के मन में अँग्रेजों के शासन से घृणा उत्पन्न हो गई जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों को बल मिला।

धन निष्कासन के सम्बन्ध में राष्ट्रवादी नेताओं के विचार

दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को समस्त बुराइयों की बुराई (ईविल ऑफ ऑल ईविल्स) बताया है। 1905 ई. में उन्होंने कहा- ‘धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण।’

धन निष्कासन के सम्बन्ध में आर. सी. दत्त ने कहा- ‘भारतीय राजाओं द्वारा कर लेना तो सूर्य द्वारा भूमि से पानी लेने के समान था जो पुनः वर्षा के रूप में भूमि पर उर्वरता देने के लिये वापस आता था, पर अँग्रेजों द्वारा लिया गया कर फिर भारत में वर्षा न करके इंग्लैण्ड में ही वर्षा करता था।’

धन निष्कासन के सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों के विचार

लॉर्ड क्लाइव बंगाल को एडन का बगीचा एवं सोने का खजाना कहता था। उसने एडन के इस बगीचे को इंग्लैण्ड-वासियों की तरफ से लूटने का काम आरम्भ किया जिसे देखकर स्वयं अँग्रेज अधिकारियों के दिल दहल उठे। असम के चीफ कमिश्नर चार्ल्स इलियन ने व्यथित होकर लिखा- ‘मैं यह कहने में नहीं हिचकूंगा कि आधे किसान साल भर में कभी यह भी नहीं जानते कि पूरा भोजन किस चिड़िया का नाम है। यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं है कि भारत में 10 करोड़ मनुष्यों की प्रति व्यक्ति आय 5 डॉलर वार्षिक से अधिक नहीं है।’

मैकडॉनल्ड ने लिखा है- ‘भारत में तीन करोड़ से लेकर पांच करोड़ तक ऐसे परिवार हैं जिनकी आय साढ़े तीन पैन्स प्रतिदिन से अधिक नहीं है।’

विलियम हण्टर ने 1883 ई. में वायसरॉय की कौंसिल में कहा था- ‘सरकार का लगान किसानों एवं उनके परिवारों के लिये पूरा अन्न भी नहीं छोड़ता। ब्रिटिश साम्राज्य में भारत के किसान के समान हृदय द्रवित करने वाला और कोई मनुष्य नहीं है।’

राष्ट्रीय आय के विशेषज्ञ कोलीन क्लार्क ने विवरण सहित लिखा है- ‘1924-25 ई. के समय संसार में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय, भारतीय की आय से पांच गुना अधिक थी।’

इस प्रकार 20वीं सदी के अंत में स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का ज्ञान होने पर भी एक भारतीय की औसत आयु 32 वर्ष थी जबकि पश्चिमी यूरोप के एक व्यक्ति की औसत आयु 60 वर्ष थी। पौष्टिक आहार के अभाव में भारतीय शीघ्र बीमार हो जाते थे और उपचार के अभाव में 32 वर्ष की औसत आयु में ही मर जाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुटीर उद्योगों का पतन

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कुटीर उद्योगों का पतन

ब्रिटिश शासन में भारतीय कुटीर उद्योगों का पतन बड़ी तेजी से हुआ। इस कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा धक्का लगा और ग्रामीण जनसंख्या रोजगार पाने के लिए बड़ी तेजी से नगरों की ओर अग्रसर हुई।

अँग्रेजों के आगमन के समय भारतीय कुटीर उद्योग

अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारतीय कुटीर उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ की गुणवत्ता विश्वभर में प्रसिद्ध थी। भारत में सूत कातना और बुनना, प्राचीन काल से ही एक घरेलू व्यवसाय था। भारत शताब्दियों से सुन्दर और महीन सूती कपड़ों के लिये सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध था। कपड़ा देश के निर्यात की सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु थी। इसके उत्पादन के मुख्य केन्द सम्पूर्ण भारत में फैले हुए थे। ढाका की मलमल पूरे विश्व में मंगवाई जाती थी।

ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि जिस समय आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के जन्म स्थान पश्चिमी यूरोप में असभ्य जातियां निवास करती थीं, उस समय भारत अपने शासकों के वैभव और शिल्पकारों की उच्च कोटि की कलात्मक कारीगरी के लिये विख्यात था।

काफी समय बाद भी जब पश्चिम के साहसी सौदागर पहली बार भारत पहुंचे, तब भी इस देश का आद्यौगिक विकास किसी भी कीमत पर विकसित यूरोप के देशों से कम नहीं था।

1616 ई. से 1619 ई. के समय का वर्णन करते हुए टेरी ने लिखा है- ‘रंग और छापे का काम भी भारत में इस समय श्रेष्ठ था। पक्के रंगों का प्रयोग किया जाता था और सुन्दर चित्र और बेल-बूटे बनाये जाते थे। यद्यपि सूती कपड़े की तुलना में रेशमी कपड़े की बुनाई का काम कम होता था। फिर भी यह एक महत्त्वपूर्ण हस्तकला उद्योग था।’

मुगल काल में कालीन एवं शॉल उद्योग, काष्ठ उद्योग, चमड़ा उद्योग, स्वर्ण उद्योग, चीनी उद्योग, हाथी-दाँत उद्योग भी विश्व भर में प्रसिद्ध हो गये थे। इस प्रकार, अँग्रेजों के आने से पहले 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत; विश्व का एक प्रमुख औद्योगिक केन्द्र था।

17वीं शताब्दी के मध्य में बर्नियर नामक फ्रांसीसी यात्री ने लिखा- ‘भारतवर्ष को छोड़कर कोई भी देश ऐसा नहीं था जहाँ इतनी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हों।’

बर्नियर एक बहुत बड़े कमरे (हॉल) का विवरण देता है जिसे वह कारखाने के नाम से पुकारता है। वह लिखता है- ‘एक बड़े कमरे में निपुण कार्यकर्त्ता के निरीक्षण में कढ़ाई करने वाले व्यस्त हैं, दूसरे में सुनार, तीसरे में चित्रकार, चौथे में लैकर (वार्निश करने वाले), पाँचवे में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा मोची, छठे में रेशम, जरी और बारीक मलमल के उत्पादक। शिल्पी प्रतिदिन प्रातःकाल कारखाने में काम के लिये आते हैं, दिन भर व्यस्त रहते हैं और शाम को घर लौट जाते हैं।’

विदेशी यात्रियों के यात्रा-वर्णन से एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की पुष्टि होती है कि 18वीं सदी तक भारत के कुटीर उद्योग उन्नत अवस्था में थे और भारत की आर्थिक स्थिति अन्य देशों की तुलना में अच्छी थी।

भारतीय उद्योगों का वर्गीकरण

डॉ. राधाकमल मुखर्जी ने अँग्रेजों के भारत में आने से पहले के भारतीय उद्योगों को इस प्रकार वर्गीकृत किया है-

(1.) घरेलू आवश्यकता पूर्ति हेतु ग्रामीण उद्योग

ये उद्योग खेती के अवकाश काल में चलते थे तथा घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। इनमें स्थानीय सामग्री यथा- सरकंडे, घास, बाँस, मिट्टी, ऊन, सूत आदि का प्रयोग होता था।

(2.) कृषि उपकरण आधारित ग्रामीण उद्योग

ये उद्योग कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाली सामग्री बनाते थे। गाँव के आत्मनिर्भर समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लुहार, बढ़ई, कुम्हार आदि बराबर काम में लगे रहते थे।

(3.) कलात्मक ग्रामीण उद्योग

गाँव के कलात्मक उद्योग जो कि उच्च कोटि की ग्रामीण कला के प्रतीक थे और जिनकी समुद्र पार के देशों में भी माँग थी।

(4.) नगरीय उद्योग

इनका संगठन अत्यंत उच्चकोटि का था। इनमें से कुछ उद्योग आज के औद्योगिक विश्व में भी जीवित हैं, जैसे- कश्मीरी शॉल उद्योग, उत्तरी भारत का फलकारी उद्योग आदि।

ग्रामीण उद्योगों की विशेषताएँ

(1.) कच्चे माल की उपलब्धता

ग्रामीण उद्योगों की विशेषता यह थी कि ग्रामीण कारीगर, गाँव से ही अपने शिल्प के लिये आवश्यक कच्चे माल (जैसे लकड़ी, मिट्टी, चमड़ा, कपड़ा आदि) का प्रबन्ध कर लेता था। जंगलों से लकड़ी मिल जाती थी, मृत पशुओं पर से मोची अपने काम के लिये चमड़ा प्राप्त करता था। देश के प्रायः प्रत्येक भाग में कपास की खेती होती थी। लोहा तथा अन्य धातुएं ही ऐसी होती थीं जो नगरीय बाजारों से क्रय करनी पड़ती थीं। इस प्रकार उद्योग के लिये आवश्यक कच्चे माल के लिये गाँव लगभग आत्म-निर्भर थे।

(2.) तैयार माल की खपत

गाँव में जो चीजें बनती थीं उनमें से अधिकांश की खपत गाँव में ही हो जाती थी। इसका कारण यह था कि हस्तशिल्पी पूरे गाँव का या कुछ विशेष परिवारों का सेवक होता था। इसलिये उसे अपना माल बेचने के लिये अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी जो माल बच जाता था, वह विभिन्न गाँवों में लगने वाले साप्ताहिक मेलों में बेचा जाता था।

(3.) मूलभूत आवश्यकताओं की सामग्री का निर्माण

ग्रामीण उद्योग केवल मनुष्य की मूल आवश्यकताओं तक सीमित थे। गाँव में विलासिता की वस्तुएँ उत्पादन करने वाला उद्योग नहीं के बराबर था।

(4.) वस्तु-विनिमय आधारित विपणन

गाँव में उत्पादित वस्तुओं का विनिमय गाँव की प्रजा तक सीमित था। आवश्यकता पड़ने पर किसान दस्तकार से सामान या सेवा लेता था किन्तु वह दस्तकार को हर बार भुगतान नहीं करता था। दस्तकार का भुगतान समस्त गांव की सम्मिलित जिम्मेदारी होती थी। कारीगर को गांव की ओर से गाँव की जमीन का कुछ अंश स्थायी तौर पर जोतने के लिये मिला रहता था या फसल कटने पर उसे अनाज की निश्चित मात्रा दी जाती थी।

नगरीय उद्योगों की विशेषताएँ

ग्रामीण उद्योग के साथ-साथ नगरीय उद्योग भी विद्यमान थे। ग्रामीण उद्योगों द्वारा जहाँ गाँव की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी, वहीं नगरीय उद्योग, कुलीन सामंत वर्ग एवं धनी व्यापारी वर्ग के उपयोग तथा विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करते थे। नगरीय उद्योगों को मूलतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1.) नगरों के समस्त उद्योगों का बहुत बड़ा हिस्सा भारत और विदेशों के कुलीन और सम्पन्न लोगों के लिये विलासिता एवं अर्द्ध-विलासिता की सामग्री का उत्पादन करता था।

(2.) वे उद्योग जो राज्य या सार्वजनिक संस्थाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

(3.) वे उद्योग जिनमें लोहा गलाने, कलमी शोरा तैयार करने या चूड़ी बनाने जैसे काम किये जाते थे।

नगरीय उद्योगों का बाजार अत्यंत सीमित था क्योंकि इन उद्योगों में केवल सामंत, कुलीन एवं धनी व्यक्तियों तथा निर्यात के लिये जाने वाली वस्तुओं का निर्माण होता था। नगरीय उद्योग में काम करने वाले दो प्रकार के व्यक्ति थे-

(1.) स्वतंत्र रूप से काम करने वाले।

(2.) राज्य या व्यापारिक प्रतिष्ठान के कारखानों में नौकरी करने वाले।

बड़े नगरों में प्रत्येक उद्योग एक संघ (श्रेणी) में संगठित था। प्रत्येक उद्योग का एक मुखिया होता था। वह श्रम तथा उत्पादन का मूल्य निर्धारित करता था तथा विवादों का निपटारा करता था। अनुभवी शिल्पकार नये शिल्पकारों को प्रशिक्षण देते थे। उद्योग एक वंशानुगत व्यवसाय था और शिल्पकार एक विशेष जाति का सदस्य होता था। इसलिये शिल्प-संघ जातीय सत्ता से नियंत्रित होते थे।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कठिनाइयाँ

ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक व्यापारिक संस्था थी जिसका मूल उद्देश्य भारत के माल और उत्पादनों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करके लाभ अर्जित करना था। कम्पनी को भारतीय उद्योगों के साथ काम करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा-

(1.) कम्पनी भारत में तैयार माल के बदले में सोने-चांदी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकती थी क्योंकि ब्रिटेन में ऐसा कुछ भी नहीं बनता था या पैदा होता था जिसे भारतीय सामग्री के बदले में दिया जा सके।

(2.) भारतीय कपड़े को इंग्लैण्ड में ले जाकर बेचने से कम्पनी को तो बड़ा लाभ हुआ किंतु इंग्लैण्ड के कपड़ा उद्योग के लिये संकट उत्पन्न हो गया।

रॉबिन्सन क्रूसो नामक उपन्यास के लेखक डैफी ने लिखा है- ‘भारतीय कपड़ा हमारे घरों, अलमारियों और सोने के कमरों में घुस गया है। परदे, गद्दे, कुर्सियों और बिस्तर के रूप में और कुछ नहीं, अपितु केलिको या भारतीय सामान है।’

(3.) 1688 ई. में जब इंग्लैण्ड में फ्रांस से होने वाले आयात पर रोक लगा दी गई तो कम्पनी द्वारा भारत से किये जाने वाले आयात में भारतीय सूती कपड़े का स्थान सबसे ऊपर हो गया। सूती कपड़े के आयात में वृद्धि होने से इंग्लैण्ड में कम्पनी के विरुद्ध विरोध भड़क उठा।

यह विरोध दो कारणों से हुआ-

(अ.) भारत से किये जाने वाले व्यापार के कारण इंग्लैण्ड का सोना-चांदी भारत जा रहे थे।

(ब.) इंग्लैण्ड के नवोदित रेशमी वस्त्र उद्योग के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया था।

इस कारण 1700 ई. में एक कानून बनाया गया कि फ्रांस, चीन या ईस्टइंडीज में बने रेशम, बंगाल के रेशम या रेशमी कपड़े अथवा उक्त देशों में छपे या रंगे गये कपड़े ब्रिटिश शासन के क्षेत्र में न तो पहने जा सकेंगे और न किसी अन्य प्रकार से काम में लाये जायेंगे।

इस प्रतिबंध के उपरांत भी इंग्लैण्ड में भारत के सूती कपड़े का आयात बन्द नहीं हो सका। 1702 ई. में सादे सूती कपडे़ पर भारी आयात शुल्क लगाया गया। इसके उपरांत भी इंग्लैण्ड में भारतीय सूती कपड़े का आयात बढ़ता ही गया। भारतीय कपड़े की श्रेष्ठता के कारण 1750 ई. के बाद भी भारत से उल्लेखनीय मात्रा में सूती कपड़ा मंगाया गया।

यह इस तथ्य के बावजूद था कि भारतीय कपड़ा प्रयुक्त करने वालों पर इंग्लैण्ड में जुर्माना लगाया जाता था। 1760 ई. में एक अँग्रेजी महिला पर 200 पौण्ड का जुर्माना केवल इसलिये लगाया गया कि उसके पास एक विदेशी रूमाल था।

भारतीय कुटीर उद्योगों का पतन होने के कारण

(1.) मुगल सत्ता के विघटन से उत्पन्न स्थिति

औरंगजेब के जीवनकाल में ही मुगलों की केन्द्रीय सत्ता शिथिल होने लगी तथा 1707 ई. में उसकी मृत्यु के बाद तेजी से पतन की ओर अग्रसर हो गई। विभिन्न प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। दक्षिण की मराठा शक्ति, उत्तरी भारत में भी आ धमकी और मुगलों की संरक्षक बन गई।

नादिरशाह (1739 ई.) और अहमदशाह अब्दाली (1761 ई.) के आक्रमणों ने देश की स्थिति को अत्यधिक शोचनीय बना दिया। अशान्ति और अराजकता की इस स्थिति में कुटीर-उद्योगों का ह्रास हुआ। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उन पर चोट की तो वे भरभरा कर गिरने लगे।

(2.) देशी राज्यों का विनाश

भारतीय रियासतों के शासक परम्परागत भारतीय कुटीर-उद्योगों के संरक्षक थे। वे कुशल शिल्पियों एवं कारीगरों को निरन्तर सहायता एवं संरक्षण देकर प्रोत्साहित करते थे। उनके महलों एवं दरबारों की साज-सज्जा के लिये श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं की माँग बनी रहती थी।

भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद देशी राज्यों का अन्त होने लगा और कम्पनी की शासन व्यवस्था स्थापित होने लगी। देशी राज्यों की समाप्ति से नगरीय परम्परागत हस्तकलाओं एवं उउद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा। राज्यों के समाप्त हो जाने से हास्तकला सामग्री की माँग घट गई जिससे श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं का उत्पादन कम हो गया तथा बड़ी संख्या में शिल्पी बेरोजगार हो गये।

(3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी की दमनकारी नीतियाँ

अँग्रेजों ने भारत से आयात-निर्यात के व्यापार में अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए न्यूनतम मूल्य पर अधिक-से-अधिक माल खरीदने और इस कार्य में सैनिक बल का प्रयोग करने की नीति बनाई। कम्पनी के अधिकारी तथा उनके प्रतिनिधि भारतीय जुलाहों को एक निश्चित समय में निश्चित प्रकार का कपड़ा तैयार करने के लिये विवश करते थे और फिर अपनी इच्छानुसार काफी कम मूल्य चुकाते थे।

आना-कानी करने वाले जुलाहों के अँगूठे काट दिये जाते थे। इस कारण वस्त्र उद्योग में लगे हुए हजारों परिवार बंगाल छोड़कर भाग गये। यही स्थिति अन्य उद्योगों के कारीगरों तथा श्रमिकों की हुई।

1762 ई. में बंगाल के नवाब ने कम्पनी के अधिकारियों से कम्पनी के एजेन्टों की शिकायत की- ‘कम्पनी के एजेंट रैयतों, किसानों, व्यापारियों, आदि से जबरदस्ती एक चौथाई कीमत देकर उनके माल और उत्पादन हड़प रहे हैं और किसानों आदि को मार-पीटकर तथा उनका दमन करके अपनी एक रुपये की चीज पाँच रुपये में बेच रहे है।’

ऐसी परिस्थितियों में भारतीय कारीगरों के लिये काम करना असम्भव हो गया। भारतीय माल खरीदने और भारत में कम्पनी की पूँजी लगाने का तरीका ऐसा रखा गया कि हर बार गरीब बुनकर या कारीगर के साथ धोखा होता था।

सर विलियम बोल्ट्स ने लिखा है- ‘आमतौर पर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती क्योंकि कम्पनी की ओर से नियुक्त गुमाश्ते उनसे जो चाहते हैं, हस्ताक्षर करा लेते हैं। जितने रुपये उन्हें दिये जाते हैं उतने लेने से इन्कार करने पर वे रुपये उनकी कमरबन्द में बाँध दिये जाते हैं और कोड़ों से मार-पीटकर उन्हें भगा दिया जाता है।’

कम्पनी और उसके कर्मचारियों द्वारा अपनाये गये तौर-तरीकों का भारतीय कुटीर उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ना अनिवार्य था।

(4.) इंग्लैण्ड के अन्य व्यापारियों का भारत में प्रवेश

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इंग्लैण्ड का युवा वर्ग भारत में मची लूट में अपनी हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिये मचल उठा। इसलिये 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की छूट दे दी गई।

इससे इंग्लैण्ड के बहुत से व्यापारिक संस्थान अपना-अपना माल लेकर भारत आ गये। उनके आने से भारत में आर्थिक शोषण का नया दौर आरम्भ हुआ। 1813 ई. के पूर्व भारत का महत्त्व लूटपाट तथा कर एवं नजराने प्राप्त करने के साधन के रूप में था जबकि 1813 ई. के बाद भारत का महत्त्व, इस दृष्टि से हो गया कि इंग्लैण्ड की मशीनों द्वारा तैयार किया गया माल भारत में किस प्रकार खपाया जाये और इंग्लैण्ड की मशीनों के लिये कच्चा माल भारत से इंग्लैण्ड किस तरह लाया जाये।

(5.) औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव

1769 ई. में जेम्स वाट ने भाप की शक्ति का आविष्कार किया। उसके बाद इंग्लैण्ड में मशीनीकरण एवं औद्योगिकीकरण का काम हुआ।  18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत की लूट से जो कुछ अर्जित किया गया, उसी से आधुनिक इंग्लैण्ड का निर्माण हुआ तथा इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति सम्पन्न हुई।

भारत से लूटे गये कच्चे माल से इंग्लैण्ड की मशीनों पर बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा। अँग्रेजी कारखानों में बने हुए माल के लिये बाजार ढूंढने का काम आरम्भ हुआ। इन उत्पादों ने भारतीय माल को पहले तो विदेशी बाजारों से और फिर भारतीय बाजारों से खदेड़ना आरम्भ कर दिया।

भारत के परम्परागत कुटीर-उद्योग, इंग्लैण्ड की मशीनों पर उत्पादित अच्छे माल से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके, विशेषकर उस स्थिति में जब उनसे राज्याश्रय छिन गया था। भारत में पुराने इजारेदारों की जगह स्वतंत्र बाजार का निर्माण किया गया। भारत जो सूती कपड़े का निर्यातक देश था, सूती कपड़े का आयातक बन गया।

(6.) भारतीय माल पर निषेधात्मक शुल्क

इंग्लैण्ड में मशीनों से सूती कपड़ा बनने पर भी वह भारतीय कपड़े की तुलना में महँगा था। इसलिये ब्रिटिश सरकार ने एक ओर तो भारतीय माल के आयात पर इतना अधिक शुल्क लगा दिया कि उसका आयात ही न हो सके और दूसरी ओर अपने माल पर किसी तरह का शुल्क चुकाये बिना, भारत पर अपना माल लाद दिया। साथ ही उत्पीड़न और अन्याय के द्वारा भारतीय मंडियों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

(7.) कठोर कानूनों के द्वारा कच्चे माल की लूट

1814 ई. के बाद ब्रिटिश सरकार ने ऐसे कानूनों का निर्माण किया जिनके सहारे भारत से कच्चे माल का सुगमता पूर्वक निर्यात किया जा सके और तैयार माल को भारत में बेचा जा सके। लगातार पड़ रहे अकालों के कारण लाखों भारतीय भूखे मर रहे थे किंतु भारत का अनाज बाहर भेजा जा रहा था।

देश के भीतर चुंगी और सीमा-शुल्क बढ़ा दिये गये ताकि भारतीय व्यापारी व्यापार न कर सकें। 1835 ई. में भारतीय रुई पर 15 प्रतिशत चुंगी तथा सूती कपड़े पर 25 प्रतिशत चुंगी निर्धारित की गई ताकि भारतीय उत्पादक, कपड़े के स्थान पर रुई का ही निर्यात करें।

ब्रिटिश अधिकारी ट्रेवेलियन ने लिखा है- ‘व्यक्तिगत और घरेलू उपयोग की 235 से भी अधिक वस्तुओं पर अन्तर्देशीय कर लगाये गये थे।’

(8.) पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव

भारत के कुटीर-उद्योगों के पतन में पाश्चात्य सभ्यता और शिक्षा ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पश्चिमी शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में लगे भारतीय, विदेशी वस्तुओं के प्रति आकर्षित हुए। घरों में सजावट के लिये स्वदेशी कलात्मक वस्तुओं के स्थान पर पाश्चात्य सामग्री का उपयोग होने लगा।

विदेशी वस्तुओं का उपयोग समाज में गौरव और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। शासक, सामन्त, सरकारी कर्मचारी, नवयुवा वर्ग, विदेशी वस्तुओं के उपयोग में एक-दूसरे से होड़ करने लगे थे। ऐसी स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं- विशेषकर साज-सज्जा की कलात्मक वस्तुओं एवं सूती वस्त्रों की माँग में कमी आने लगी और कुटीर-उद्योगों का पतन होने लगा।

(9.) भारतीय कागज पर रोक

भारतीय नगरों के बाहर प्रायः एक छोटा उपनगर होता था जहाँ कागज बनता था। ब्रिटिश शासकों ने भारतीय कार्यालयों में ब्रिटेन में बने कागज का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया। इससे भारत के कागज उद्योग को भारी क्षति पहुँची। आज भी भारत के बहुत से नगरों में कागज मौहल्ला के नाम से स्थान मिलते हैं।

(10.) भारतीय जहाजरानी के प्रयोग पर रोक

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इंग्लैण्ड एवं भारत के बीच होने वाले व्यापार के लिये केवल ब्रिटिश जहाजों का उपयोग किया। इससे भारतीय नौ-परिवहन उद्योग पर संकट खड़ा हो गया।

(11.) अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण पर रोक

भारत के उत्तर-पश्चिम में कच्छ, सिन्ध और पंजाब प्रांतों में ढाल, तलवार और अन्य हथियारों का खूबसूरत काम होता था किन्तु ब्रिटिश शासन ने इस काम को पूरी तरह समाप्त कर दिया। अँग्रेजी शासन ने हथियारों से लैस रहने और उनके उपयोग की आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया और उन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस कारण ये उद्योग भी नष्ट हो गये।

(12.) रेल का निर्माण

ब्रिटिश सरकार ने भारत में रेलों का निर्माण इस उद्देश्य से किया कि वह ब्रिटेन के उद्योगों को कच्चे माल और बाजार सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। 19वीं शताब्दी में भारत में रेलों का जाल बिछ गया। इससे ग्रामीण हस्तशिल्प वैश्विक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो गया।

साथ ही भारतीय हस्त-शिल्पियों का पारम्परिक ग्रामीण समुदाय के साथ सम्बन्ध शिथिल होने लगा। क्योंकि अब सात समंदर पार से आने वाली सस्ती मशीनी चीजें गाँव में भी उपलब्ध होने लगीं। यातायात के सुगम साधनों से गाँव के लोग शहर जाने लगे जिससे ग्रामीण समुदाय टूटने लगे। सस्ते यूरोपीय सूती कपड़े और बर्तनों के अत्यधिक आयात से ग्रामीण हस्तकला उद्योग नष्ट हो गये।

(13.) अकालों का दुष्प्रभाव

ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद बार-बार पड़ने वाले अकालों ने भी कुटीर-उद्योगों के पतन में योगदान दिया। अकालों के परिणामस्वरूप लाखों लोग मारे गये जिनमें कारीगर और शिल्पी भी थे। इसके अलावा जो लोग बच गये थे, उनकी स्थिति भी शोचनीय हो गई थी। जुलाहे, धोबी, कुम्हार, लुहार, बढ़ई आदि शिल्पकार बेकारी और भुखमरी से पीड़ित हो गये और उनके व्यवसाय चौपट हो गये।

(14.) गिल्ड पद्धति का नाश

जब तक भारतीय शहरी उद्योगों में गिल्ड पद्धति बनी रही, कुटीर-उद्योगों में अनुशासन बना रहा। गिल्ड पद्धति के नष्ट होने से कारीगरों एवं उनके द्वारा निर्मित्त वस्तुओं पर निगरानी रखने वाला कोई संगठन न रहा। इससे कुटीर-उद्योगों को भारी धक्का लगा।

(15.) प्रशिक्षण का अभाव

भारतीय कारीगरों को औद्योगिक कौशल देने के लिये जिस प्रशिक्षण की आवश्यकता थी, उसका नितांत अभाव रहा। प्रशिक्षण के अभाव में वे उत्तम कोटि की वस्तुएँ बनाने में असफल रहे जिससे उनके उत्पादों की माँग घट गई और परम्परागत उद्योग बन्द हो गये। इस प्रकार, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक भारत के कुटीर-उद्योग धीरे-धीरे समाप्त प्रायः हो गये किन्तु वे पूर्णतः विनष्ट नहीं हो सके, उनमें से कुछ तो आज भी जीवित हैं।

भारतीय कुटीर उद्योगों का पतन का प्रभाव

(1.) अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार

कुटीर-उद्योग भारतीय आर्थिक समृद्धि के आधार थे। उनके पतन से भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई और भारत की प्रगति एवं समृद्धि का मार्ग अवरुद्ध हो गया। मध्य-युग में भारत की गणना समृद्ध देशों में की जाती थी परन्तु ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत निर्धन देश बन गया।

(2.) शिल्पियों की बेरोजगारी

रेशमी कपड़ा, ऊनी कपड़ा, लोहा, बर्तन, कागज व अन्य विविध प्रकर के हस्त शिल्प उद्योगों के बर्बाद हो जाने से बड़ी संख्या में हस्त-शिल्पी बेरोजगार हो गये। उनमें से बहुतों ने शहरों से गांवों की ओर पलायन करके खेती करना आरम्भ कर दिया। जिन शिल्पियों के पास थोड़ा-बहुत पैसा था, वे भूमि खरीदकर स्वतंत्र किसान बन गये। कुछ शिल्पियों ने नव विकसित उद्योगों में रोजगार ढूँढने का प्रयास किया।

(3.) व्यापार संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव

 अँग्रेजों के आगमन से पहले, भारत का विदेशी व्यापार भारत के अनुकूल था। भारतीय कुटीर-उद्योगों के उत्पादों का भारी मात्रा में निर्यात होता था और आयात काफी कम होता था जिससे भारत में समृद्धि बढ़ती रही। ब्रिटिश शासनकाल में कुटीर-उद्योगों के विनाश से भारतीय निर्यात को भारी धक्का लगा।

निर्यात की अपेक्षा आयात की मात्रा अधिक हो गई। व्यापार संतुलन के प्रतिकूल होने से भारत से पूंजी का निकास होने लगा तथा भारत, औद्योगिक देश से खेतिहर देश बन गया। भारत की अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई।

(4.) खेती पर निर्भरता में वृद्धि

कुटीर उद्योगों के पतन के कारण बहुत-से कारीगर और शिल्पी बेकार हो गये। उनमें से अधिकांश ने कृषि को जीविकोपार्जन का साधन बनाया। इस कारण कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या बढ़ गई तथा भूमि का विभाजन और उपविभाजन आरम्भ हुआ। इससे भूमि की उत्पादन क्षमता और खेती में लगे लोगों की बीच संतुलन बिगड़ गया और उत्पादन में भारी गिरावट आ गई।

(5.) कला-कौशल को क्षति

भारत के शिल्पकार कलात्मक वस्तुएँ बनाने में निपुण थे और उनके द्वारा निर्मित कलाकृतियों का विश्व के अनेक देशों को भारी मात्रा में निर्यात होता था परन्तु कुटीर-उद्योगों के पतन के कारण भारत के कला-कौशल को अपूर्णनीय क्षति पहुँची। कलात्मक वस्तुओं की माँग घट गई और कलात्मक वस्तुएँ बनाने वाले शिल्पकारों को जीविकोपार्जन के लिये दूसरे साधन तलाश करने पड़े।

निष्कर्ष

इस प्रकार, कुटीर-उद्योगों के विनाश से देश की अर्थ-व्यवस्था को गहरा धक्का लगा। भारतीय अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई और वह ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर आश्रित हो गई। ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के पहले भारत एक औद्योगिक देश था, वह खेतिहर देश बन गया।

कुटीर-उद्योगों के पतन से देश में बेरोजगारी और भूखमरी बढ़ी। लोगों की क्रय शक्ति घट गई और वे अपने परम्परागत व्यवसायों से हाथ धो बैठे। अब वे शिल्पकार से श्रमिक या भूमिहीन कृषक बन गये।

आधुनिक उद्योगों का विकास

19वीं सदी के अंतिम वर्षों में कुछ राष्ट्रवादी भारतीयों ने भारतीय उद्योगों को आधुनिक बनाने का प्रयास किया। कपड़ा, जूट, लोहा, कागज, चमड़ा, आदि उद्योग संगठित किये गये। भारत में प्रथम कपड़ा मिल 1853 ई. में कावसजी नाना भाई ने बम्बई में आरम्भ की। प्रथम जूट मिल 1855 ई. में रिसरा (बंगाल) में स्थापित हुई।

1879 ई. में भारत में  सूती कपड़े के 56 कारखाने थे जिनमें 43 हजार लोग काम करते थे। 1822 ई. में बंगाल एवं अन्य स्थानों पर 20 जूट मिलें थीं जिनमें 20 हजार लोग काम करते थे। 1905 ई. तक देश में 206 सूती मिलें हो गईं जिनमें 96 हजार लोग काम करते थे।

1901 ई. में देश में 36 जूट मिलें थीं जिनमें 1,15,000 लोग काम करते थे। 1845 ई. में कोयला खानों में काम आरम्भ हुआ। इस उद्योग में 1906 ई. में एक लाख लोगों को काम मिला हुआ था। सूती कपड़े की मिलें बम्बई, नागपुर, अहमदाबाद एवं शोलापुर में थीं। 1914 ई. में देश में कपड़े की 246 मिलें और जूट की 64 मिलें थीं।

भारत में इस्पात का पहला कारखाना 1913 ई. में टाटानगर में लगा। 19वीं सदी में नील, चाय, कॉफी बागानों का विस्तार हुआ और इन पर आधारित उद्योग लगे। नील का प्रयोग सूती कपड़ा रंगने में होता था। बंगाल, बिहार तथा (संयुक्त प्रदेश) उत्तर प्रदेश में इस उद्योग का विकास हुआ।

इस उद्योग पर अँग्रेज अधिकारियों का एकाधिकार था जिन्हें निलहे कहा जाता था। इन्होंने भारतीय किसानों पर अनेक अत्याचार किये। बंगला लेखक दीनबंधु मित्र ने अपने नाटक नील-दर्पण में इन अत्याचारों का सजीव वर्णन किया है। 1850 ई. के बाद असम, बंगाल, दक्षिण भारत और हिमाचल के पहाड़ी भागों पर चाय उद्योग विकसित हुआ।

इन पर विदेशी स्वामित्व होने से भारतीयों को कोई लाभ नहीं हुआ। इनके अधिकांश उत्पादन विदेशों में बिकते थे तथा विक्रय से प्राप्त मुद्रा इंग्लैण्ड में काम आती थी। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में चीनी एवं सीमेंट के उद्योग लगने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार

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ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार

ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार का वास्तविक कार्य ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के काल में आरम्भ हुआ। कानून का शासन तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता इस प्रणाली की विशेषताएँ थीं।

मुगल कालीन न्याय व्यवस्था का ह्रास

मुगल कालीन न्याय व्यवस्था कुरान के सिद्धांतों पर अवलम्बित थी किंतु उसका दण्ड विधान हिन्दुओं पर भी लागू किया गया था। अकबर के काल में काजी न्याय करते थे तथा मीर अदल का सम्बन्ध ऐसे मामलों से होता था जो दोनों समुदायों की धार्मिक विधि में सम्मिलित नहीं थे।

मुगल प्रशासन के उत्तरार्द्ध में भूमि सुपुर्दगी प्रथा से समृद्ध भू-स्वामियों की शक्ति बढ़ने लगी। इससे न्याय व्यवस्था भी कई तरह से प्रभावित हुई। नई स्थिति में न्याय-प्रशासन केवल बड़े शहरों तक ही सीमित रह गया, जहाँ गवर्नरों की शक्ति अधिक थी।

अन्य क्षेत्रों में न्याय से सम्बन्धित अधिकारियों के स्थान जमींदारों, धनी किसानों और लगान अधिकारियों ने प्राप्त कर लिये। दीवानी और फौजदारी अदालतों पर जमींदारों का अधिकार स्थापित हो गया। इस प्रकार 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के पहले ही न्याय प्रबन्ध बिगड़ता जा रहा था, जो कम्पनी के शासन के आरम्भिक वर्षों में और अधिक बिगड़ गया।

बंगाल में द्वैध शासन के अंतर्गत न्याय व्यवस्था

बक्सर के युद्ध के बाद 1765 ई. में कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी के अधिकार प्राप्त हुए। दीवानी का तात्पर्य था कि कम्पनी बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लगान वसूल करे और दीवानी मुकदमों का फैसला करे। निजामत (सैनिक शक्ति और फौजदारी मुकदमों का अधिकार) नवाब ने पहले ही कम्पनी को दे दिया था।

लॉर्ड क्लाईव इतनी सारी जिम्मेदारी कम्पनी पर नहीं डालना चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि कम्पनी इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पायेगी। इसीलिए क्लाइव ने वैदेशिक सम्बन्ध, सैनिक शक्ति तथा राजस्व प्राप्त करने के अधिकार कम्पनी के पास रखे किन्तु न्याय व्यवस्था भारतीयों के जिम्में छोड़ दी।

इस कार्य के लिए बंगाल और बिहार में दो नायब दीवान नियुक्त किये गये। इस प्रकार कम्पनी इन क्षेत्रों में शासक तो थी, किन्तु अपने शासन के लिए उत्तरदायी नहीं थी। यह व्यवस्था वारेन हेस्टिंग्ज की नियुक्ति तक चलती रही। वारेन हेस्टिंग्ज के पहले न्याय-प्रबन्ध में जो भी परिवर्तन किये गये वे केवल लगान बढ़ाने के उद्देश्य से प्रेरित थे।

1769 ई. में कम्पनी की सलेक्ट कमेटी ने यूरोपीय पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जिनका कार्य न्याय प्रणाली पर नियंत्रण रखना था, क्योंकि लगान अधिकारियों और जमींदारों द्वारा न्यायिक अधिकारों का मनमाने ढंग से प्रयोग किया जा रहा था और न्याय अधिकारियों के पद वंशानुगत हो जाने से लोगों को न्याय मिलने की संभावना कम होती जा रही थी।

दूसरी ओर राजस्व के मामलों में न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से कम्पनी ने दो राजस्व नियंत्रक कौंसिलें, मुर्शिदाबाद और पटना में स्थापित कीं। ये अपील के मुकदमों में उच्च न्यायालय के समान थीं किन्तु उनके कार्य करने का ढंग वैसा ही मनमाना और अनियमित था जैसा कि लगान अधिकारियों और जमींदारों का था।

एक ओर मुगल न्याय व्यवस्था बिगड़ रही थी और दूसरी ओर कम्पनी की न्याय व्यवस्था विकसित नहीं हो पा रही थी। कम्पनी की सलेक्ट कमेटी और प्रेसीडेन्ट एवं कौंसिल के बीच लगातार होने वाले झगड़ों, मराठा और मैसूर के युद्धों और बंगाल के भयंकर अकालों के कारण कम्पनी सरकार न्याय-प्रबन्ध की ओर ध्यान नहीं दे सकी।

ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार

वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा किये गये उपाय

न्याय-व्यवस्था में सुधार लाने की दृष्टि से वारेन हेस्टिंग्ज का काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। भारत में ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार की शुरुआत इसी काल में हुई। कानून का शासन तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता इस प्रणाली की विशेषताएँ थीं। कानून के शासन से अभिप्राय था- निरंकुश शक्ति के स्थान पर नियंत्रित और निश्चित विधि की सर्वोच्चता एवं प्रधानता तथा कानून के समक्ष समस्त व्यक्तियों और वर्गों की बराबरी।

स्वतंत्र न्याय व्यवस्था का अर्थ था- न्याय व्यवस्था में कार्यपालिका का हस्तक्षेप न होना तथा न्यायाधीशों की सुरक्षा। ये विचार इंग्लैण्ड में 18वीं शताब्दी में संविधान का अंग बन चुके थे। भारत में ये सिद्धान्त लागू होते ही न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अनेक विवाद उठ खड़े हुए। सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना से ये झगड़े और अधिक बढ़ गये।

इन्हें रोकने के लिए विशेष कानून बनाये गये। भारत में उठने वाले विवाद विदेशी शासन के परिणाम थे। ये विवाद मुख्यतः अँग्रेज वकीलों एवं न्यायाधीशों, प्रशासकों और व्यापारियों के बीच थे, जिनमें भारतीयों की भूमिका मूक दर्शक की थी। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए हेस्टिंग्ज ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारने का भरसक प्रयत्न किया।

दीवानी अदालतों की स्थापना

क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त कर कम्पनी ने दीवानी का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण कर लिया, जिसमें दीवानी न्याय व्यवस्था भी सम्मिलित थी। उसने मुगल व्यवस्था पर आधारित न्याय प्रणाली को अपनाने का प्रयत्न किया। सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था को पुनर्गठित किया गया तथा प्रत्येक अदालत का कार्यक्षेत्र निर्धारित किया गया।

सिविल और फौजदारी मामलों के लिये अलग अदालतें थीं। दस रुपये तक के मामलों में प्रधान या मुखिया निर्णय ले सकता था। प्रत्येक जिले में दीवानी अदालत स्थापित की गई जिसकी अध्यक्षता यूरोपीय कलेक्टर करता था। इनमें 500 रुपयों तक के मामलों पर निर्णय किया जाता था।

इस दीवानी अदालत में अलग-अलग प्रकार के मामले आते थे, यथा- सम्पत्ति के विवाद, वंशानुगत अधिकार, विवाह, जाति, कर्ज, हिसाब, किराए, साझेदारी, संविदा आदि से सम्बद्ध झगड़े। दीवानी अदालत के ऊपर कलकत्ता में सदर दीवानी अदालत स्थापित की गई।

इन सुधारों के साथ ही हेस्टिंग्ज ने मुर्शिदाबाद और पटना की राजस्व कौंसिलें समाप्त कर दीं। इसके बाद भी न्याय प्रणाली पर लगान विभाग का प्रभाव बना रहा। 1774 ई. के बाद यह प्रभाव और अधिक बढ़ गया। जब कलेक्टरों को वापिस बुलाने के बाद छः प्रान्तीय कौंसिलें बनाई गईं तो न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ गया।

फौजदारी अदालतों की स्थापना

कम्पनी फौजदारी मामलों में हस्तक्षेप करना नहीं चाहती थीं, क्योंकि इस क्षेत्र में उत्तरदायित्व अधिक था और आय नहीं थी। इसलिए यह क्षेत्र भारतीय अधिकारियों- मुहम्मद रजा खाँ और सिताबराय पर छोड़ दिया गया। इस क्षेत्र में हस्तक्षेप केवल अराजकता रोकने और कानून व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से किया जाता था।

फौजदारी क्षेत्र में केवल इस्लामी कानून लागू किये गये थे तथा दण्ड भी उन्हीं के आधार पर दिया जाता था। इस व्यवस्था की विरुद्ध अँग्रेज पर्यवेक्षकों को अनेक प्रकार की शिकायतें थीं। अतः हेस्टिंग्ज ने फौजदारी विभाग को सुधारने के उद्देश्य से 1772 ई. में एक नई योजना बनाई।

उसने प्रत्येक जिले में फौजदारी अदालत स्थापित की जिसमें काजी, मुफ्ती तथा मौलवी नियुक्त किये गये। सबसे ऊपर सदर निजामत अदालत बनाई गई जिसका संचालन दरोगा-ए-अदालत, प्रधान काजी, प्रधान मुफ्ती तथा तीन मौलवी करते थे। जिला स्तर पर न्याय व्यवस्था, यूरोपीय कलेक्टर द्वारा नियंत्रित थी किन्तु वह स्वयं न्यायालय का सदस्य नहीं था।

सदर निजामत अदालत कुछ समय के लिए मुर्शिदाबाद से कलकत्ता लाई गई जिससे उस पर कम्पनी का अधिक नियंत्रण रखा जा सके किन्तु हेस्टिंग्ज ने मुहम्मद रजा खाँ को पुनः नायब नियुक्त किया, जिसने गवर्नर जनरल की अनुमति से फौजदारी अदालतों का पुनर्गठन किया। कुल मिलाकर 23 जिला फौजदारी अदालतें बनाई गईं।

बड़े जिलों के प्रमुख नगरों में फौजदारी थाने स्थापित किये गये। फौजदारी अदालतों और थानों के साथ जेलें भी बनाई गईं किन्तु हेस्टिंग्ज का यह प्रयोग भी सफल नहीं माना जा सकता, क्योंकि अदालतों को अपना निर्णय लागू करने के लिए न तो पर्याप्त अधिकार दिये गये और न साधन।

कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना

वारेन हेस्टिंग्ज के काल में रेगुलेटिंग एक्ट द्वारा कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया। इसका कार्यक्षेत्र कलकत्ता नगर के नागरिकों तक सीमित था। इस न्यायालय में बाहर के मामलों की सुनवाई तभी हो सकती थी, जब दोनों पक्ष इसके लिए तैयार हों।

कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय में ब्रिटिश कानून लागू होते थे जबकि सदर दीवानी और सदर निजामत में मुस्लिम या हिन्दू कानून लागू होते थे। सदर दीवानी और सदर निजामत न्यायालयों के कार्यक्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय से टकराते थे जिसे सुलझाने के लिए हेस्टिंग्ज ने इम्पे को सदर दीवानी अदालत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जो सर्वोच्च न्यायालय का भी प्रधान न्यायाधीश था।

कम्पनी के संचालकों द्वारा आपत्ति करने के कारण 1782 ई. में इम्पे ने त्याग-पत्र दे दिया। इस प्रकार न्याय व्यवस्था में भी द्वैधता चलती रही। हेस्टिंग्ज ने अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में न्याय व्यवस्था में सुधार का एक और प्रयत्न किया। उसने एक न्यायिक योजना प्रस्तुत की तथा उसके द्वारा न्याय और भू-राजस्व के कार्यों को पृथक् करने का प्रयत्न किया किन्तु यह प्रयोग बहुत ही कम समय तक चला।

इस काल में हिन्दू विधि संहिता तथा मुस्लिम विधि का अँग्रेजी भाषा में अनुवाद किया गया। 1781 ई. की संहिता द्वारा न्याय व्यवस्था का केन्द्रीयकरण किया गया। इससे पुरानी न्याय प्रणाली की सरलता समाप्त हो गई और पाश्चात्य सिद्धान्तों के प्रभाव से जटिलता बढ़ गई। अब न्याय एवं कानून एक ऐसी विशेष व्यवस्था बन गया जिसका संचालन केवल वकील ही कर सकते थे।

कार्नवालिस के न्यायिक सुधार

सितम्बर 1786 में लॉर्ड कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने कानूनी विशेषज्ञ सर जॉन विलियम की सहायता से न्यायिक सुधार किये। कार्नवालिस से पहले, दीवानी न्यायाधीश केवल न्यायिक कार्य करते थे, उनका लगान वसूली से कोई सम्बन्ध नहीं था। 1786 ई. मेेें संचालक मण्डल ने आदेश दिया कि मजिस्ट्रेट, कलेक्टर और जज के कार्य एक ही व्यक्ति द्वारा किये जायें। अतः जून 1787 में कार्नवालिस ने इन तीनों पदों को एक साथ मिला दिया।

राजस्व न्यायालयों की समाप्ति

1793 ई. में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसके साथ ही भू-राजस्व वसूल करने के काम को पुनः न्याय से अलग कर दिया गया। कार्नवालिस की 1793 ई. की योजना द्वारा समस्त राजस्व न्यायालय समाप्त कर दिये गये। कलेक्टरों से न्यायिक अधिकार छीन लिए गये तथा सम्पूर्ण दीवानी न्यायालयों का श्रेणीकरण कर दिया गया।

मुंसिफ अदालतें

नए न्याय प्रबन्ध में 50 रुपये तक के मामलों को मुंसिफ अदालतों में निबटाया जाने लगा। इसके ऊपर रजिस्ट्रार अदालतें थीं जिन्हें 200 रुपये तक के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार था। इनमें यूरोपीय न्यायाधीश नियुक्त किये जाते थे।

जिला अदालतें

रजिस्ट्रार अदालतों में दिये गये निर्णयों के विरुद्ध अपील नगर या जिला अदालतों में होती थी जहाँ यूरोपीय न्यायाधीश, भारतीय अधिकारियों की सहायता से मुकदमों की सुनवाई करते थे।

प्रान्तीय अदालतें

जिला अदालतों के ऊपर कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका और पटना में चार प्रान्तीय अदालतें बनाई गईं। कुछ मामलों में ये न्यायालय प्रथम अधिकार क्षेत्र का कार्य भी करते थे। यहाँ यूरोपीय न्यायाधीश की अध्यक्षता में 1000 रुपये तक के मामले सुने जाते थे।

सदर दीवानी अदालत

प्रान्तीय अदालतों के ऊपर कलकत्ता में सदर दीवानी अदालत थी जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल के सदस्य निर्णय लेते थे। पाँच हजार रुपये से अधिक के मामलों की अपील किंग-इन-कांउसिल के समक्ष की जा सकती थी।

फौजदारी न्यायालायों में सुधार

कार्नवालिस द्वारा फौजदारी न्यायालायों में भी कई सुधार किये गये। हेस्टिंग्ज मुगल न्याय प्रणाली को हटाने के पक्ष में नहीं था, वह मुगल प्रणाली के दोषों को ही दूर करना चाहता था। दूसरी ओर कार्नवालिस व्यापक सुधार लाने के पक्ष में था। फौजदारी अदालतों में सुधार लाने के उद्देश्य से 3 दिसम्बर 1790 को एक विस्तृत मसौदा तैयार किया गया।

इसमें मुसलमान न्यायाधिकारियों के मार्ग-दर्शन के लिए एक नियम बनाया गया जिसके अनुसार हत्या के मामलों में हत्या के अस्त्र या ढंग की बजाय हत्यारे की मंशा पर अधिक बल दिया गया। मृतक के अभिभावकों की इच्छा से क्षमा करना अथवा रक्त का मूल्य निर्धारित करना बन्द कर दिया गया।

यह निश्चय किया गया कि साक्षी के धर्म का, वाद पर कोई प्रभाव नहीं होगा। इस्लामी कानून में मुसलमानों की हत्या के मामलों में अन्य धर्म वाले साक्षी नहीं माने जाते थे।

सदर निजामत की पुनः स्थापना

कार्नवालिस ने न्याय संगठन में भी कई सुधार किये। मुहम्मद रजा खाँ के पद को समाप्त करके कलकत्ता में पुनः सदर निजामत अदालत स्थापित की गई।

सर्किट अदालतें

गवर्नर जनरल और कौंसिल के अधीन जिला फौजदारी अदालतें समाप्त करके चार चलती-फिरती अदालतें (सर्किट अदालतें) स्थापित की गईं। इनके लिए साल में दो बार आन्तरिक प्रदेशों का दौरा करना आवश्यक था। केवल यूरोपियन व्यक्ति ही इनकी अध्यक्षता कर सकते थे। इन्हें मृत्यु दण्ड देने का अधिकार था परन्तु उसकी पुष्टि सदर निजामत अदालत से होनी आवश्यक थी। गवर्नर जनरल को क्षमादान का अधिकार था। 

कार्नवालिस कोड

कार्नवालिस ने जो सुधार किये उन्हें कार्यान्वित करने के लिए एक संहिता भी तैयार करवाई गई जिसे कार्नवालिस कोड कहा जाता है। कार्नवालिस कोड की दो मुख्य विशेषताएँ थीं- (1.) निजामत अदालतों में अँग्रेज न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा (2.) न्याय व्यवस्था को प्रशासन से अलग करना।

कार्नवालिस के आने के पूर्व जिले में कलेक्टर, राजस्व प्रशासन का मुख्य अधिकारी था तथा जिले का प्रधान न्यायाधीश भी। एक ओर वह राजस्व का निर्धारण करता था और उसे वसूल करता था, वहीं दूसरी ओर उसी के राजस्व निर्धारण व वसूली के निर्णय के विरुद्ध न्यायाधीश के रूप में मुकदमों की सुनवाई भी करता था।

कार्नवालिस कोड द्वारा कलेक्टर को केवल राजस्व निर्धारण व उसकी वसूली का कार्य सौंपा गया और न्यायिक कार्य दूसरे अधिकारी को सौंप दिये गये। कार्नवालिस कोड लागू होने से पहले, फौजदारी मामलों में मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं की गवाही को स्वीकार नहीं किया जाता था किन्तु कार्नवालिस कोड में यह स्पष्ट नियम बना दिया कि गवाही देने के लिये धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति पर प्रतिबन्ध नहीं होगा।

कार्नवालिस कोड में अंग-भंग, सूली पर चढ़ाना आदि अमानुषिक दण्ड समाप्त कर दिये गये तथा कठोर कारावास की सजा देने की व्यवस्था की गई। वकीलों को लाईसेन्स देने की व्यवस्था की गई। लाइसेंस प्राप्त वकील ही वकालत कर सकता था। वकीलों की फीस भी निश्चित कर दी गई।

यदि कोई वकील निर्धारित से अधिक फीस लेता था तो उसे वकालत के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता था। कार्नवालिस कोड में व्यवस्था की गई कि यदि कम्पनी के अधिकारी गैर-कानूनी कार्य करें तो उन पर भी मुकदमा चलाया जाये। ऐसे मामलों में केवल ऐसे अँग्रेज जज ही जाँच कर सकते थे, जो सरकार से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में आर्थिक लाभ प्राप्त न करते हों।

कार्नवालिस की न्याय-प्रणाली पश्चिमी न्यायिक धारणाओं पर आधारित थी। इसमें राजाओं के निजी कानूनों तथा धार्मिक कानूनों का स्थान धर्म-निरपेक्ष कानून ने ले लिया। विधि की सर्वोच्चता स्थापित की गई। कार्नवालिस कोड के तात्कालिक परिणाम लाभदायक सिद्ध नहीं हुए। नये कानून इतने जटिल थे कि साधारण लोग इन्हें समझ नहीं पाते थे।

इस प्रणाली में न्याय प्राप्त करने में इतना समय लगता था और यह इतना महँगा पड़ता था कि यह निर्धन लोगों के योग्य नहीं था। वकीलों की चालबाजियों के कारण मुकदमेबाजी बहुत बढ़ गई। झूठे गवाह बनाये जाने लगे, न्यायालय का काम बढ़ने से निर्णय सुनाने में बहुत समय लगने लगा।

स्वयं कार्नवालिस ने स्वीकार किया कि उसके काल में 60,000 से अधिक मुकदमे न्यायालयों में फँसे पड़े थे। इस प्रणाली में, परम्परागत न्याय प्रणाली के पंचायत, जमींदार, काजी, फौजदार तथा निजामत आदि व्यवस्थाओं एवं अधिकारियों का स्थान यूरोपीय न्यायाधीशों ने ले लिया जिन्हें भारतीय रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं की जानकारी नहीं थी।

भारतीय न्यायाधीशों के स्थान पर अँग्रेज न्यायधीशों की नियुक्ति करना इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष था। कार्नवालिस का एकमात्र उद्देश्य यह था कि भारतीयों के स्थान पर अँग्रेज न्यायाधीशों की नियुक्ति करके कम्पनी की सर्वोच्चता स्पष्ट कर दी जाये। इतिहासकार मिल ने स्वीकार किया है कि अँग्रेजी न्यायालयों से अपराधों की संख्या बढ़ी तथा लोगों में भय व आंतक फैल गया।

कार्नवालिस कोड के दोषों को दूर करने के लिए कम्पनी सरकार ने 1793 ई. से 1813 ई. के बीच अनेक कदम उठाये। छोटे मुकदमों को शीघ्र निपटाने के आदेश दिये गये। न्यायिक अधिकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके वेतन बढ़ाये गये। इन अधिकारियों को हेलीबरी कॉलेज में प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई तथा उन्हें भारतीय भाषाओं, न्याय और सरकारी कानूनों की जानकारी दी गई। साथ ही न्याय प्रणाली में केन्द्रीयकरण करने के लिए विभिन्न योजनाएँ बनाई जाने लगीं।

कार्नवालिस कोड का विरोध

मद्रास प्रेसीडेन्सी में जब कार्नवालिस कोड लागू करने का प्रश्न उठा तो टॉमस मुनरो ने इसका विरोध किया। उसके विचार में कार्नवालिस प्रणाली कृत्रिम और विदेशी थी जिसने परम्परागत संस्थाओं को हटा दिया था। मुनरो, ग्राम पंचायतों एवं सरपंचों को दीवानी और फौजदारी के छोटे मामलों में सुनवाई के अधिकार देकर उन्हें प्रोत्साहित करता रहा।

जिला प्रशासन में भी परम्परागत ढंग से कार्यपालिका को शक्तिशाली बनाया गया। कलेक्टर को मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारों के साथ किराये और सीमा सम्बन्धी झगड़ों को निपटाने का अधिकार दिया गया। दिल्ली के रेजीडेन्ट मेटकॉफ ने भी इसी व्यवस्था को अपनाया। इसमें परम्परागत मुगल संस्थाओं को बनाये रखा गया तथा राज्य शक्तियों में केन्द्रीयकरण लाया गया।

कार्नवालिस के जाने के बाद यह प्रयत्न किया गया कि लोगों को उपलब्ध न्याय की सुविधा में कमी कर दी जाये। इसलिए 1795 ई. में मुकदमा दायर करते समय धन जमा कराने की पुरानी प्रणाली पुनः आरम्भ की गई तथा स्टाम्प पेपर का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया। 1797 ई. में अपील की सुविधाएँ भी कम कर दी गईं।

यद्यपि न्याय को दुर्लभ एवं अधिक महँगा बना दिया गया फिर भी मुकदमों की संख्या बढ़ती ही गई। लोगों की जान-माल की सुरक्षा का भय ज्यों-का-त्यों बना रहा। अतः जान-माल की सुरक्षा के लिए 1807 ई. में जमींदारों को पुनः दायित्व सौंपना पड़ा।

लॉर्ड हेस्टिंग्ज के न्यायिक सुधार

1813 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्ज गवर्नर जनरल बनकर भारत आया जिसने प्रचलित व्यवस्था में संशोधन किया। 1814 ई. में प्रत्येक थाने में एक मुंसिफ की नियुक्ति की गई जो 64 रुपये तक के मामले निपटा सकता था। प्रत्येक जिले में एक सदर अमीन की नियुक्ति की गई जो 150 रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकता था।

सदर अमीन के निर्णय के विरुद्ध अपील दीवानी अदालत में तथा यहाँ से अपील प्रान्तीय न्यायालय में की जा सकती थी। जो मुकदमे सीधे दीवानी अदालत में दायर होते थे, उनकी अपील सदर दीवानी अदालत में की जा सकती थी। कार्य का बोझ कम करने तथा कार्य प्रणाली को सरल बनाने की दृष्टि से कुछ मामलों में अपील करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और कुछ मामलों में केवल एक बार अपील करने की सुविधा दी गई।

1821 ई. में मुंसिफ को 150 रुपये तक के मामले तथा सदर अमीन को 500 रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार दिया गया। दीवानी अदालतों के रजिस्ट्रार को 50 रुपये तक के मामले तथा विशेष परिस्थिति में दीवानी अदालतों द्वारा प्रेषित 500 रुपये तक के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार दिया गया।

यहाँ से अपील सीधे ही प्रान्तीय न्यायालय में की जा सकती थी। 500 रुपये से ऊपर के मामले जिला दीवानी अदालतों में तथा 5,000 रुपये से ऊपर के मामले सीधे प्रान्तीय न्यायालय में दायर किये जा सकते थे। सदर दीवानी अदालत, कोई मुकदमा जिला दीवानी अदालत से प्रान्तीय अपील न्यायालय में स्थानान्तरित कर सकती थी।

लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने कलेक्टर और मजिस्ट्रेट के पद को पुनः मिला दिया जिसे कार्नवालिस ने स्थायी बन्दोबस्त के बाद पृथक् कर दिया था। कार्नवालिस कोड में भी महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गये। मद्रास व बम्बई में भारतीय जजों के वेतन में वृद्धि की गई ताकि वे ईमानदारी से कार्य करें। यद्यपि बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल ने भारत में पुनः प्राचीन संस्थाओं को स्थापित करने तथा पंचायतों को पुनर्जीवित करने की अनुशंसा की थी, किन्तु इन अनुशंसाओं को कार्यान्वित नहीं किया गया।

लॉर्ड विलियम बैंटिक के न्यायिक सुधार

बैंटिक के आने के समय तक भी न्याय व्यवस्था में अनेक दोष थे। कम्पनी ने अब तक भारत में विशाल क्षेत्र प्राप्त कर लिया था तथा न्याय प्रशासन का मुख्यालय कलकत्ता में था। विभिन्न भागोंसे कलकत्ता की दूरी अधिक होने के कारण न्याय प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा था।

अपील एवं भ्रमण की चार अदालतें अधिक खर्चीली थीं और इनका कोई विशेष लाभ भी नहीं था। इन पर मकदमों का बोझ भी अधिक था, जिससे शीघ्र न्याय प्रदान करना संभव नहीं था। डिवीजनल न्यायालयों व प्रान्तीय अपील न्यायालयों में अकुशलता एवं अनियमितताएँ व्याप्त थीं जिनके कारण न्यायालयों में मुकदमों के ढेर लगे हुए थे।

इन मुकदमों के अभियुक्त महीनों तक जेल में पड़े रहते थे। कार्नवालिस ने भारतीयों को न्यायालय के उच्च पदों व उत्तरदायित्वों से अलग रखा था जिससे भारतीयों में रोष था। न्यायालय की भाषा फारसी थी तथा मुकदमा दर्ज करने वाले को अपनी भाषा में बात कहने का अधिकार नहीं था। बैंटिक ने इन दोषों को दूर करने का प्रयास किया।

ऐसा करने का एक कारण यह भी था कि ब्रिटिश सरकार, चार्टर एक्ट-1833 ई. पर विचार करने जा रही थी जिस पर कम्पनी का भविष्य निर्भर करता था। इसलिए कम्पनी के प्रशासनिक दोषों को दूर करना आवश्यक था, ताकि संसद को शिकायत करने का अवसर न मिल सके। न्यायिक सुधार, व्यापक सुधारों का केवल एक भाग था।

बैंटिक ने न्यायिक सुधारों के द्वारा अपील एवं भ्रमण की चार अदालतें समाप्त कर दीं। साथ ही दंड विधान की कठोरता को कम कर दिया। अपराधियों को कोड़े लगवाने की प्रथा समाप्त कर दी। यह सुधार बैंथम की उस अवधारणा पर आधारित था कि अपराधी को सजा, सुधारने के लिए दी जानी चाहिए, बदले के लिये नहीं।

उसने कमिशनरों के फौजदारी अधिकार जिला न्यायाधीश को सौंप दिये और जिला न्यायाधीश ने अपने मजिस्ट्रेट के अधिकार कलेक्टर के लिए छोड़ दिये। मजिस्ट्रेट को दो वर्ष की सश्रम कारावास की सजा देने का अधिकार दिया गया। इसके विरुद्ध सिविल न्यायालय में अपील की जा सकती थी।

कलेक्टरों को लगान सम्बन्धी मामले निपटाने के अधिकार दिये गये। इसकी अपील सिविल न्यायालयों में की जा सकती थी। अपील का मुकदमा स्वयं कलेक्टर के विरुद्ध होता था। 1831 ई. में बैंटिक ने जिला एवं सत्र न्यायालय स्थापित किया। 1831 ई. में ही भारतीयों को सदर अमीन के पद पर नियुक्त किया गया जो जिला व शहरी न्यायालय के विरुद्ध अपीलें सुन सकते थे।

न्यायिक क्षेत्र में किसी भारतीय को दिया जाने वाला सदर अमीन का पद सर्वोच्च था किन्तु यूरोपियन अथवा अमेरिकन से सम्बन्धित मुकदमे, मुन्सिफ या सदर अमीन की अदालत में नहीं सुने जा सकते थे। 

कम्पनी राज्य का विस्तार धीरे-धीरे पश्चिम की ओर होता जा रहा था। इसलिए आगरा प्रान्त बनाया गया जो कलकत्ता से काफी दूर था। न्याय पाने के लिए कलकत्ता जाने में समय और धन बर्बाद होते थे। इसलिए आगरा में ही अपील अदालत की स्थापना की गई।

इसी उद्देश्य से इलाहाबाद में सदर दीवानी और सदर निजामत अदालतें स्थापित की गईं, जिससे दिल्ली और उत्तर पश्चिमी प्रान्त में आसानी से न्याय प्रशासन चल सके। अदालतों में फारसी भाषा के स्थान पर प्रान्तीय भाषाओं का प्रयोग होने लगा। बंगाल में जूरी प्रणाली आरम्भ की गई, ताकि यूरोपियन जजों को भारतीयों की सहायता उपलब्ध हो सके।

1832 ई. के नियम में यह भी कहा गया कि यूरोपियन जज किसी मामले को प्रतिष्ठित भारतीयों की पंचायत के पास भेज सकेंगे और पंचायत मामले की जाँच कर अपनी रिपोर्ट जजों के पास भेजेगी। जज अपने लिये भारतीय सहायक नियुक्त कर सकते थे, जो प्रत्येक मामले में अपनी अलग राय दे सकते थे।

न्याय क्षेत्र में सुधार कार्यक्रम को लागू करने में लॉर्ड मैकाले का महत्त्वपूर्ण योगदान था। 1833 ई. के चार्टर एक्ट में स्पष्ट कहा गया था कि विधि-प्रणाली के दोष समाप्त किये जाने चाहिए। सुधार लाना इसलिए भी आवश्यक हो गया था कि इस एक्ट द्वारा ब्रिटिश नागरिकों को भारत में सम्पत्ति खरीदने-बेचने के पूर्ण अधिकार दे दिये गये थे जिसकी भारत में कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी।

इस समस्या का मैकाले के पास एक ही समाधान था- विधि का संहिताकरण। संहिताकरण के कार्य में मैकाले को प्रिंसेप सहित अनेक प्रशासकों के विरोध का सामना करना पड़ा। बहुमत मिलेट के विधि संग्रह के पक्ष में था किन्तु मैकाले ने बड़ी चतुराई से इस विवाद को विधि आयोग के लिए छोड़ दिया। बैंटिक ने विधि आयोग का अध्यक्ष मैकाले को ही बनाया। संहिताकरण कार्य में उसने व्यवहारिकता और आवश्यकता को प्राथमिकता दी। मैकाले की सबसे बड़ी सफलता उसकी नई दंड संहिता थी।

विलियम बैंण्टिक के बाद न्यायिक सुधार

लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में 1853 ई. के चार्टर एक्ट के समय विधि-संहिता का प्रश्न पुनः उठाया गया और दूसरा विधि आयोग बनाया गया। इसके परिणाम स्वरूप 1859 से 1861 ई. के बीच दण्डविधि, सिविल कार्य विधि तथा दण्ड प्रक्रिया पारित की गई। इन सुधारों ने सम्पूर्ण भारत के लिये एक विधि प्रणाली प्रदान की।

विभिन्न क्षेत्रों में थोड़ा-बहुत अन्तर बना रहा। दूसरी ओर यूरोपीय अधिकारियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये न्याय संगठन में परिवर्तन करने की बात भी उठाई गई जिससे भारतीय न्याय प्रणाली, ब्रिटिश न्याय प्रणाली के अनुकूल होती गई। 1861 ई. में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम द्वारा पुराने सर्वोच्च न्यायालय और सदर अदालतों को समाप्त कर कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना

1866 ई. में एक और उच्च न्यायालय आगरा में स्थापित किया गया जिसे 1875 ई. में इलाहाबाद स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में लाहौर और पटना में भी ऐसे ही उच्च न्यायालय स्थापित किये गये।

संघीय न्यायालय की स्थापना

इस न्याय प्रणाली में अन्तिम महत्त्वपूर्ण सुधार 1935 ई. में किया गया जब संघीय न्यायालय की स्थापना की गई। इसने उच्चतम न्यायालय का स्थान ग्रहण कर लिया। कहने को यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय था किंतु वास्तविक अर्थों में यह सर्वोच्च न्यायालय नहीं था क्योंकि अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय के विरुद्ध लन्दन स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

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भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास पुर्तगाली मिशनरियों द्वारा सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में आरम्भ हुए। बाद में नीदरलैण्ड, डेनमार्क, फ्रांस एवं इंग्लैण्ड से आए मिशनरी लोगों ने इस कार्य को आगे बढ़ाया।

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति

प्रचीन भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास आध्यात्मिक आवश्यकताओं के कारण हुआ था। इस कारण शिक्षा का स्वरूप व्यावसायिक नहीं था। शिक्षा का विकास ऋषियों और मुनियों के आश्रमों में हुआ था इस कारण जन-साधारण की शिक्षा का दायित्व राज्य पर नहीं था। शिक्षा का उद्देश्य परम तत्त्व की प्राप्ति अर्थात् सत्य की खोज था।

इस कारण भारतीय शिक्षा का मूल आधार आस्था, विश्वास, विनय एवं अभ्यास के चार पायों पर खड़ा था। छात्र को अपने पिता का घर छोड़कर गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। उन्हें वेद, वेदांग, उपनिषद, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिल्पवेद एवं योग आदि की शिक्षा दी जाती थी।

छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। गुरुकुल में रहने वाले ब्राह्मण परिवारों एवं उनके शिष्यों का निर्वहन राजाओं, सामंतों तथा श्रेष्ठि परिवारों द्वारा दी गई सहायता से होता था। शिक्षा पूर्णतः स्वतंत्र थी। राजा भी गुरुकुल की व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करता था। शिक्षा का माध्यम देवभाषा संस्कृत था जिसमें सम्पूर्ण धार्मिक एवं सांसारिक ज्ञान उपलब्ध था।

ब्राह्मण कन्याएं अपने पिता के आश्रम में ज्ञान प्राप्त करती थीं। राजपुत्रियां राजप्रासादों में शिक्षा प्राप्त करती थीं, उन्हें घुड़सवारी, रथ संचालन, धनुष विद्या तथा तलवार चलाना सिखाया जाता था। बड़े श्रेष्ठियों की पुत्रियां घर पर रहकर विभिन्न कलाओं का ज्ञान प्राप्त करती थीं। उन्हें नारी जीवन को सुखमय बनाने का ज्ञान दिया जाता था। अन्य वर्गों की लड़कियों की औपचारिक शिक्षा का प्रबंध नहीं था।

मध्यकाल में शिक्षा

मुसलमानों के भारत आगमन के पश्चात्, परम्परागत हिन्दू शिक्षण पद्धति में बड़ा परिवर्तन आया। दूरस्थ गुरुकुलों का स्थान स्थानीय पोसालों एवं चटशालाओं ने ले लिया जिनमें विद्यार्थी अपने गुरु को निर्धारित शुल्क देते थे। लड़कियों के लिये घरों से निकलना और अधिक प्रतिबंधित हो गया।

जनसामान्य के लिए गांवों और कस्बों में पण्डितों द्वारा छोटे-छोटे विद्यालय खोले गये जिनमें बच्चों को भारतीय भाषाओं में पढ़ना, लिखना और प्रारम्भिक गणित करना सिखाया जाता था। साथ में धर्मिक शिक्षा भी दी जाती थी। इन विद्यालयों से प्रायः व्यापारी-पुत्र लाभ उठाते थे। ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के बच्चे भी इन विद्यालयों में पढ़ते थे।

मुसलमानों ने अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंध मस्जिदों में किया जहाँ मौलवी, मुस्लिम बच्चों की बहुत थोड़ी संख्या को दीनी इल्म देते थे। आगे चलकर मदरसों की व्यवस्था आरम्भ हुई जिनमें मुख्यतः मुस्लिम बच्चे पढ़ते थे। हिन्दू बच्चे भी फारसी सीखने के लिये मदरसों में जाते थे क्योंकि राज्य-कार्य की भाषा फारसी थी।

उच्च हिन्दू शिक्षा, विद्यालयों, आश्रमों, चतुष्पाठी आदि संस्थाओं में दी जाती थी, जिसमें ब्राह्मण शिक्षक, अत्यंन्त सादा जीवन व्यतीत करते हुए अध्यात्म, दर्शन, कर्मकाण्ड, संहिताओं एवं स्मृतियों का अध्ययन-अध्यापन करते थे। अन्य जातियों के लिए धर्मिक आधार पर उच्च शिक्षा निषिद्ध थी।

इस प्रकार अँग्रेजों के आने के पहले हिन्दुओं में शिक्षा समाज के अत्यंत सीमित वर्ग को ही उपलब्ध थी। उच्च शिक्षा पर केवल ब्राह्मणों का अधिकार था। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा हिन्दू संस्कृति के मूल सिद्धांतों पर अवलम्बित थी, जो आश्रम व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था में विश्वास करना, वेदों की महानता में विश्वास करना और वेदों की व्याख्या करने वाले ब्राह्मणों की क्षमता में विश्वास करना सिखाती थी।

इस शिक्षा के माध्यम से बच्चों को अपने माता-पिता, गुरुजन, अतिथि एवं राजा के प्रति सम्मान की भावना दी जाती थी। यह शिक्षा व्यक्ति को समाज की संरचना के अनुकूल बनाने का साधन थी तथा भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण परम्परा थी। इसमें यह दोष अवश्य था कि सामान्यतः स्त्रियां, श्रमिक जातियाँ और किसान शिक्षा से वंचित थे।

मुस्लिम शिक्षा, हिन्दू शिक्षा से अलग थी। मुस्लिम जनता में शिक्षा पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं था फिर भी बहुत कम मुस्लिम बालक मदरसों में पढ़ते थे जहाँ उन्हें कुरान एवं उसके सिद्धांतों की जानकारी दी जाती थी। उच्च शिक्षा का माध्यम अरबी भाषा थी, क्योंकि कुरान की रचना इसी भाषा में हुई थी।

फिर भी कुछ मदरसों में कुरान के साथ-साथ फारसी और अन्य विषयों की शिक्षा भी दी जाती थी। दोनों समुदायों की शिक्षा में एक भारी अन्तर यह था कि हिन्दू विद्यालय समाज के विशिष्ट वर्ग के लिए थे, जबकि मुस्लिम मदरसे सबके लिए खुले थे, जो एक पैगम्बर में विश्वास करते थे।

देश में राजनीतिक एवं प्रशासनिक अराजकता अपने चरम पर थी, इस कारण हिन्दुओं एवं मुसलमानों, दोनों वर्गों में शिक्षा पतनोन्मुख थी। देश में मुद्रित पुस्तकों का अभाव था। स्वेदशी विद्यालय, चाहे वे ब्राह्मणों द्वारा चलाये जाते हों या फिर मौलवियों द्वारा, बच्चों की बड़ी संख्या को शिक्षित करने में असफल थे। लड़कियों के लिए तो शिक्षा का प्रावधान ही नहीं था।

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

पुर्तगाली मिशनरियों के प्रयास

यूरोप से भारत आने वाली जातियों में सर्वप्रथम पुर्तगाली थे। पुर्तगाली मुख्य रूप से दो उद्देश्य लेकर भारत आये थे- (1.) धर्म-प्रचार और (2.) व्यापार। धर्म-प्रचार के लिए जनता को बाइबिल का ज्ञान कराना आवश्यक था। इसलिये 1542 ई. में पुर्तगाली पादरी सेण्ट फ्रांसिस जेवियर भारत आया।

वह लोगों को बाइबिल के उपदेश देता था तथा ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता था। उसने अनेक स्कूल भी खोले। 1575 से 1580 ई. के बीच उसने बम्बई के पास बान्द्रा, गोआ के पास चौल तथा कुछ अन्य स्थानों पर कॉलेज खोले जिनमें बाइबिल, लेटिन भाषा, पुर्तगाली व्याकरण, तर्कशास्त्र तथा पुर्तगाली संगीत की शिक्षा दी जाती थी।

भारत आने वाला दूसरा प्रमुख पादरी रॉबर्ट डे नोबिल था। इन दोनों पादरियों ने पश्चिमी भारत में ईसाई धर्म तथा शिक्षा का प्रसार किया। पुर्तगाली पादरियों ने ही भारत में छापाखाने स्थापित किये। सर्वप्रथम उन्होंने ही बाइबिल का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करके उसे पुस्तकों के रूप में छापकर साधारण जनता के बीच वितरित किया। इसीलिए पुर्तगालियों को भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली का जन्मदाता माना जाना चाहिए।

नीदरलैण्ड वासियों के प्रयास

यूरोप से भारत आने दूसरे यूरोपीय, नीदरलैण्ड-वासी डच थे। उन्होंने अपनी कम्पनी के कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत में कई पाठशालाएं खोलीं जिनमें कुछ भारतीय बच्चों को भी प्रवेश दिया गया। उनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था किंतु अग्रजों से प्रतिद्वंद्विता के कारण उन्हें शीघ्र ही भारत छोड़ देना पड़ा। उनके जाते ही उनकी शिक्षा व्यवस्था भी समाप्त हो गई।

फ्रांस वासियों के प्रयास

सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपनी व्यापारिक कोठियाँ चन्द्रनगर, माही, यनाम, कारोकल और पाण्डीचेरी के निकट स्थापित कीं। इन कोठियों में काम करने वाले फ्रैंच अधिकारियों के बच्चों के लिये उन्होंने फ्रैंच स्कूलों की स्थापना की।

पुर्तगालियों की भांति उन्होंने भी अपने स्कूलों में स्थानीय भाषाओं की शिक्षा की व्यवस्था की। इन पाठशालाओं में भारतीय अध्यापकों को नियुक्त किया जाता था तथा भारतीय छात्रों को भी प्रवेश दिया जाता था जिन्हें भोजन, कपड़े और पुस्तकें निःशुल्क देकर स्कूल में आने के लिये प्रोत्साहित किया जाता था।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अँग्रेजों से परास्त होकर भारत छोड़ना पड़ा तथा फ्रैंच बस्तियों पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया और फ्रांसिसी स्कूल भी उनके अधिकार में चले गये।

डेनमार्क वासियों के प्रयास

अन्य यूरोपियनों की तरह डेनमार्क के व्यापारियों ने भी दक्षिण भारत में तंजोर के समीप तथा बंगाल में कलकत्ता के समीप सेरामपुर में अपनी कोठियां बनाईं। यद्यपि व्यापारिक या राजनैतिक दृष्टि से इन दोनों स्थानों का कोई महत्त्व नहीं है किन्तु कालान्तर में ये दोनों स्थान मिशनरी शिक्षा के प्रमुख केन्द्र बन गये।

इस दिशा में डेनमार्क वासियों का कार्य काफी सफल रहा। इन दोनों स्थानों पर दो जर्मन मिशनरियों ने शिक्षण कार्य किया। उन्होंने बाइबिल का तमिल भाषा में अनुवाद किया। तमिल भाषा का व्याकरण और कोष बनाये तथा एक छापाखाना स्थापित किया। उन्होंने अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए ट्रेनिंग स्कूल खोले। डेनमार्क वासियों का अन्य केन्द्र बंगाल का सेरामपुर (श्रीरामपुर) बेप्टिस्ट मिशनरियों का प्रमुख कार्य क्षेत्र बन गया।

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में ईसाई शिक्षा के प्रयास

दिसम्बर 1600 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई। अन्य यूरोपीय कम्पनियों की भांति इसने भी भारत में अपनी कोठियां बनाईं जहाँ काफी संख्या में अँग्रेज व्यापारी तथा कम्पनी के कर्मचारी बस गये। उनकी धार्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कम्पनी ने इंग्लैण्ड से कुछ पादरी भारत भेजे।

इन पादरियों ने कम्पनी के अँग्रेज कर्मचारियों की धार्मिक क्रियाओं सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करने के साथ-साथ कम्पनी के भारतीय कर्मचारियों को ईसाई बनाना प्रारम्भ किया। नये बनाये गये ईसाइयों तथा कम्पनी के अँग्रेज कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा के लिए कम्पनी ने कई स्कूल खोले।

1698 ई. में इंग्लैण्ड की संसद ने कम्पनी को निर्देशित किया कि कम्पनी अपने प्रत्येक कारखाने पर एक पादरी तथा 500 टन या इससे अधिक वजनी जहाज पर एक चैपलेन (धर्मगुरु) नियुक्त करे। कम्पनी सैनिक स्थानों तथा कारखानों के पास स्कूल खोले।

इस आदेश से कम्पनी को धर्म-प्रचार करने तथा स्कूल खोलने के अधिकार मिल गये। इसके बाद कम्पनी ने 1715 ई. में मद्रास, 1718 ई. में बम्बई और 1731 ई. में कलकत्ता में स्कूल स्थापित किये।

बक्सर विजय के बाद 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मालगुजारी वसूल करने के दीवानी अधिकार प्राप्त हुए। इससे कम्पनी एक राजनैतिक शक्ति बन गई।

अब तक कम्पनी ने अँग्रेज और एंग्लो-इण्डियन कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा की ओर ही ध्यान दिया था किन्तु 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज के गवर्नर जनरल बनने के बाद कम्पनी ने भारतीय बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया। 1781 ई. में कलकत्ता में एक मदरसा स्थापित किया गया जिसमें अरबी तथा फारसी के अध्ययन की व्यवस्था की गई। इस मदरसे को खोलने का उद्देश्य मुस्लिम भद्र समाज के युवकों को कम्पनी में नौकरी करने योग्य बनाना था।

 1791 ई. में हिन्दू कुलीनों के पुत्रों को पढ़ाने के लिये बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई। इसमें संस्कृत भाषा के साथ-साथ हिन्दू विधि, साहित्य एवं धर्म का अध्यापन किया जाता था। ईसाई मिशनरी भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्कूल खोलकर भारतीय बच्चों को शिक्षा दे रहे थे।

उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में पश्चिमी दर्शन, अध्यात्म, नैतिकता, तर्कशास्त्र तथा अँग्रेजी भाषा सम्मिलित थी। 1784 ई. में सर विलियम जॉन ने बंगाल एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। जॉन ओवन ने बंगाल में स्कूल स्थापित किया जिसमें अँग्रेजी पढ़ाने का प्रावधान किया गया। 1800 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित किया। इसमें कम्पनी के अधिकारियों को भारतीय भाषाओं एवं रीति-रिवाजों का प्रशिक्षण दिया जाता था।

ईसाई धर्म और पश्चिमी शिक्षा का जुड़ाव

 1792 ई. में चार्ल्स ग्रांट  ने इंग्लैण्ड में प्रकाशित अपनी पुस्तक ऑब्जर्वेशन्स ऑन दी स्टेट ऑफ सोसाइटी एमोंग दी एशियाटिक सबजेक्ट्स में इस बात पर बल दिया कि भारत में ईसाई धर्म और पश्चिमी ज्ञान के प्रसार के लिए स्कूल स्थापित किये जायें।

1793 ई. में जिस समय इंग्लैण्ड की संसद में कम्पनी के अनुज्ञा-पत्र के नवीनीकरण पर विचार चल रहा था, उस समय बिशप विल्बर फोर्स ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स सदन में प्रस्ताव रखा कि कम्पनी के डायरेक्टरों को भारत में ईसाई धर्म-प्रचार के लिए मिशनरी भेजने का अधिकार दिया जाये।

इस प्रस्ताव का संसद में घोर विरोध हुआ और यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका किन्तु इंग्लैण्ड में यह विचार जोर पकड़ने लगा कि कम्पनी को भारतीयों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ब्रिटिश संसद ने इस बात को स्वीकार कर लिया तथा 1813 ई. के चार्टर एक्ट में भारतीयों की शिक्षा के लिए एक लाख रुपये वार्षिक व्यय का प्रावधान रखा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

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भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण ईस्वी 1813 से 1853 तक चला। ईस्वी 1813 का चार्टर एक्ट भारत में पाश्चात्य शिक्षा के इतिहास निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

1813 ई. का चार्टर एक्ट भारतीय शिक्षा के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ है। क्योंकि अब कम्पनी ने भारतीयों की शिक्षा को अपने कर्त्तव्यों में सम्मिलित कर लिया था। इसके बाद ईसाई मिशनरी अधिक-से अधिक संख्या में स्कूल खोलने के लिए भारत आने लगे। 1813 ई. के चार्टर एक्ट से भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र विवाद उठ खड़े हुए क्योंकि एक्ट में बहुत ही अस्पष्ट भाषा का प्रयोग किया गया था। एक्ट द्वारा निर्धारित धनराशि किस प्रकार खर्च की जायेगी इसे स्पष्ट नहीं किया गया था। एक्ट में केवल शिक्षा नीति के उद्देश्यों का उल्लेख था। ये उद्देश्य इस प्रकार थे-

(1.) साहित्य का पुनरुद्धार और उन्नति।

(2.) भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन।

(3.) ब्रिटिश भारत की जनता में विज्ञान की स्थापना तथा वृद्धि।

इस एक्ट को लेकर जो प्रश्न उठ खड़े हुए वे थे, वे इस प्रकार थे-

(1.) शिक्षा नीति के उद्देश्यों की भावना क्या है?

(2.) शिक्षा का माध्यम क्या होगा?

(3.) शिक्षा संस्थाओं की व्यवस्था करने वाली एजेन्सियां कौनसी होंगी?

(4.) सर्व-साधारण में शिक्षा के प्रचार के तरीके क्या होंगे?

इन चारों प्रश्नों पर कम्पनी के उच्चाधिकारियों में तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गये। सबसे तीव्र मतभेद शिक्षा के माध्यम को लेकर था। इस प्रश्न पर तीन विचारधाराएं सामने आईं-

(1.) कम्पनी के पुराने कर्मचारी संस्कृत और अरबी भाषाओं के अध्ययन पर बल देते थे। उनकी मान्यता थी कि पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का ज्ञान इन भाषाओं के माध्यम से दिया जा सकता है।

(2.) मुनरो और एलफिंस्टन, आधुनिक भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा देने के पक्ष में थे। उनकी मान्यता थी कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के माध्यम से पश्चिमी ज्ञान जनता तक पहुँचाया जा सकता है।

(3.) चार्ल्स ग्रान्ट तथा उसके अनुयायी यह मानते थे कि पश्चिमी ज्ञान को सुचारू रूप देने के लिए अँग्रेजी ही सबसे प्रभावशाली माध्यम है। इस विचारधारा के समर्थक ईसाई मिशनरी और कम्पनी के नवयुवक कर्मचारी थे। लॉर्ड मैकाले के भारत में आने के बाद यह विचारधारा काफी मजबूत हो गई। अगले बीस वर्षों तक कम्पनी के उच्चाधिकारी इन्हीं विवादों में उलझे रहे।

1833 ई. का चार्टर एक्ट

1833 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में कम्पनी के व्यापार का एकाधिकार समाप्त करके भारत के दरवाजे निजी व्यापारियों के लिये खोल दिये गये। इसका लाभ ईसाई मिशनरियों ने भी उठाया। उन्होंने शिक्षा की आड़ में, ईसाई धर्म के प्रचार का काम तेजी से आगे बढ़ाया।

लॉर्ड मैकाले के विचार

फरवरी 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपना प्रसिद्ध विचार-पत्र लिखा जिसमें उसने भारतीय साहित्य दर्शन एवं ज्ञान के विरुद्ध तथा पश्चिमी ज्ञान एवं अँग्रेजी भाषा के पक्ष में अनोखे तर्क दिये। उसने विज्ञान की शिक्षा देने के लिए अँग्रेजी माध्यम का प्रबल समर्थन किया। उसकी दृष्टि में देशी भाषाओं में साहित्यिक तथा वैज्ञानिक शिक्षा देने की क्षमता नहीं थी। उसने संस्कृत और अरबी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने का विरोध किया। अँग्रेजी भाषा का गुणगान करते हुए उसने लिखा- ‘अँग्रेजी भाषा में जो साहित्य अब तक उपलब्घ है वह तीन सौ वर्ष के सम्पूर्ण विश्व की समस्त भाषाओं में उपलब्ध साहित्य से अधिक मूल्यवान है।’

मैकाले के अनुसार यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की अलमारी का एक खाना संस्कृत और अरबी के सम्पूर्ण देशी साहित्य के बराबर था। मैकाले ने भारतीय आयुर्विज्ञान, ज्योतिष, इतिहास और भूगोल पर करारा प्रहार करते हुए लिखा- ‘आयुर्विज्ञान के सिद्धान्त जो एक अँग्रेज नालबन्द का अपमान करेंगे, ज्योतिष शास्त्र जो एक अँग्रेजी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों में हँसी पैदा करेगा, इतिहास जिसमें तीस फुट ऊँचे बादशाह और तीस हजार वर्ष लम्बा शासन काल होगा, भूगोल जिसमें घी-दूध के समुद्र होंगे; इन सबको हम सरकारी खर्च पर प्रोत्साहन देंगे।’

गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-1835 ई.) ने मैकाले के विचारों से सहमति प्रकट की। 1834 ई. में बैंटिक ने मैकाले की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसकी कार्यवाही का विवरण 2 फरवरी 1835 को जारी हुआ। यह आधुनिक भारतीय शिक्षा का महत्त्वपूर्ण घोषणापत्र था। इसे भारतीय शिक्षा के मील के पत्थर के रूप में भी जाना जाता है। इस घोषणा पत्र से चार बातें प्रमुख रूप से उभर कर सामने आईं-

(1.) भारतीय भाषा, साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं ज्ञान हर तरह से बौना है।

(2.) पश्चिमी भाषा एवं ज्ञान की सर्वश्रेष्ठता निश्चित है।

(3.) भारत में शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी होना चाहिये।

(4.) भारत की विशाल जनसंख्या को सरकारी संसाधनों से शिक्षा नहीं दी जा सकती। इसलिये शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

विलियम बैंटिक ने 7 मार्च 1835 को एक आदेश जारी करके कहा कि ब्रिटिश सरकार का महान उद्देश्य भारतीयों में यूरोपीय साहित्य और विज्ञान को प्रोत्साहन देना है। शिक्षा पर व्यय की जाने वाली राशि केवल अँग्रेजी शिक्षा पर ही खर्च की जानी चाहिए। बैंटिक ने भारत में नियमित शिक्षण व्यवस्था के विकास में बहुत रुचि दिखाई।

लॉर्ड मैकाले की देन

भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में मैकाले की देन के विषय पर विद्वानों में भारी मतभेद है। कुछ उसे उन्नति के मार्ग का मशाल वाहक मानते हैं तो कुछ उसे अँग्रेजी शिक्षा के विस्तार के कारण भारत में उत्पन्न होने वाले असन्तोष और राजनीतिक अशान्ति के लिए उत्तरदायी मानते हैं।

कुछ विद्वान भारतीय भाषाओं, संस्कृति और धर्म के बारे में उसकी अज्ञानता की कटु आलोचना करते हुए उसे निन्दनीय मानते हैं तो कुछ उसे भारतीय भाषाओं की अवहेलना के लिए दोषी ठहराते हैं। मैकाले को उन्नति के मार्ग का मशाल-वाहक कहना, उसकी अतिश्योक्तिपूर्ण प्रशंसा करना है।

मैकाले द्वारा भारतीय साहित्य और धर्म की अनर्गल आलोचना करना तथा उसका मखौल उड़ाना वास्तव में निन्दनीय है। भारत में अँग्रेजी शासकों ने उसके इस सिद्धान्त का अक्षरंशः पालन किया कि- ‘यदि किसी देश को दास रखना है तो उसके साहित्य और संस्कृति का विनाश कर देना चाहिये।’

उपरोक्त दोषों के होते हुए यह भी सत्य है कि जिस पश्चिमी ज्ञान का मैकाले ने समर्थन किया उस पश्चिमी ज्ञान ने भारत को लाभ भी पहुँचाया। नये ज्ञान और शिक्षा ने भारत में एकता स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिमी देशों में होने वाले वैज्ञानिक अनुसन्धानों तथा उपलब्धियों से भारतीयों को परिचित करवाया और भारतीय भाषाओं के विकास में योगदान दिया जिसके फलस्वरूप इन भाषाओं में से कुछ को आगे चलकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा देने योग्य बनाया जा सका।

लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1835 ई. के निर्णय द्वारा भारत में शिक्षा के मूल उद्देश्य और माध्यम को लेकर चल रहे विवाद का समाधान करने का प्रयत्न किया, फिर भी यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अगले गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड ने नवम्बर 1839 में एक आदेश द्वारा इस विवाद को पूरी तरह से समाप्त किया।

उसने शिक्षा पर खर्च की जाने वाली धनराशि को बढ़ा दिया तथा यह आदेश भी दिया कि समाज के वरिष्ठ वर्ग को उच्च शिक्षा दी जाए ताकि यह वर्ग अपनी संस्कृति तथा ज्ञान को जन-साधारण तक पहुँचा सके। यह नीति ऊपर से नीचे की ओर शिक्षा-प्रसार के प्रसिद्ध सिद्धान्त पर आधारित थी।

1844 ई. में कम्पनी सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करके स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरियों में उन्हीं लोगों को  प्राथमिकता दी जायेगी जो पश्चिमी ज्ञान और अँग्रेजी भाषा जानते होंगे। 1813 ई. से 1853 ई. तक की अवधि में ब्रिटिश प्रान्तों तथा राजपूताना राज्यों में हुए शिक्षा विस्तार का विवरण इस प्रकार से है-

(1.) बंगाल

ब्रिटिश संसद द्वारा 1813 ई. का चार्टर एक्ट पारित किये जाने के बाद, 1817 ई. में कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी तथा कलकत्ता हिन्दू कॉलेज की स्थापना हुई। 1819 ई. में कलकत्ता स्कूल सोसाइटी स्थापित की गई। इन दोनों सोसाइटियों ने कलकत्ता तथा बंगाल के अन्य स्थानों पर सैकड़ों प्राथमिक स्कूल खोले, जिनके द्वारा शिक्षा का काफी प्रसार हुआ।

1823 ई. में गवर्नर जनरल के आदेश से जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन नाम से एक केन्द्रीय समिति स्थापित की गई। संस्कृत के महान् विद्वान विल्सन को इसका सचिव बनाया गया।

(2.) बम्बई

बम्बई में भी 1815 ई. में सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग दी एजुकेशन ऑफ द पूअर नामक समिति स्थापित की गई। आगे चलकर इस सोसाइटी का नाम बॉम्बे एज्यूकेशन सोसाइटी कर दिया गया। बॉम्बे नेटिव एज्यूकेशन सोसाइटी की भी स्थापना हुई। इन सोसाइटियों ने बम्बई, पूना आदि नगरों में अनेक स्कूल और कॉलेज खोलकर शिक्षा का प्रसार किया।

(3.) मद्रास

मद्रास में भी मद्रास स्कूल सोसाइटी तथा कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन नामक संस्थाएं स्थापित हुईं जिन्होंने मद्रास में शिक्षा प्रसार का सराहनीय कार्य किया। शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नॉर्मल स्कूलों की स्थापना करना, इन सोसाइटियों का महत्त्वपूर्ण कार्य था। इस प्रकार तीनों ब्रिटिश प्रेसीडेन्सियों में, शिक्षा प्रसार के लिए अनेक सोसाइटियों की स्थापना हुई।

(4.) उत्तर-पश्चिमी प्रान्त

उत्तर-पश्चिमी प्रान्त का लेफ्टिनेन्ट गवर्नर जेम्स थॉमसन शिक्षा प्रसार के कार्य में बड़ी रुचि लेता था। उसने निर्णय लिया कि शिक्षा अँग्रेजी माध्यम की बजाय, मातृभाषा में दी जाये। उसने शिक्षा-प्रसार की एक विशद् योजना बनाकर केन्द्र सरकार से स्वीकृत करवाई।

परम्परागत देशी शालाओं का सुधार और उनमें राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति की स्थापना, इस योजना की मुख्य विशेषता थी। यह योजना परीक्षण के तौर उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के आठ जिलों में लागू की गई। तत्पश्चात् प्रान्त के अन्य जिलों में भी प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई।

इन स्कूलों के संचालन के लिए शिक्षा विभाग की स्थापना की गई जिसके अंतर्गत प्रत्येक दो या अधिक तहसीली स्कूलों के निरीक्षण के लिए एक परगना विजिटर नियुक्त किया गया। उसके ऊपर प्रत्येक जिले के लिए एक जिला विजिटर और उसके ऊपर सम्पूर्ण प्रान्त के लिए विजिटर-जनरल नियुक्त किया गया।

ये पद ही आगे चलकर सर्किल इन्सपेक्टर, डिस्ट्रिक्ट इन्सपेक्टर और डायरेक्टर ऑफ पब्लिक एज्यूकेशन कहलाए। बाद में यह शिक्षा योजना, बंगाल एवं बिहार में भी लागू कर दी गई।

(5.) पंजाब

1849 ई. में पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय करने के बाद पंजाब के नये प्रान्त की स्थापना हुई थी। उस समय पंजाब में हिन्दू, सिक्ख और मुसलमानों द्वारा बहुत सी प्राथमिक स्कूलें चलाई जा रही थीं। ये स्कूल- मन्दिर, मस्जिद या गुरुद्वारों से सम्बद्ध होते थे। इनमें से कुछ में लड़कियों को भी शिक्षा जाती थी किन्तु बहुत ही कम लड़कियां शिक्षा प्राप्त करती थीं। 1849 ई. के बाद सरकार ने अमृतसर में एक स्कूल खोला जिसमें अन्य विषयों के साथ-साथ अँग्रेजी भी पढ़ाई जाती थी। इसके बाद 1853 ई. तक वहाँ कोई सरकारी स्कूल नहीं खोला गया।

(6.) राजपूताना

लॉर्ड हेस्टिंग्ज के समय 1818 ई. में राजपूताना की प्रायः समस्त रियासतों के साथ अँग्रेजों ने सहायक सन्धियां कीं। राजपूताना की सैनिक परम्पराओं के कारण लॉर्ड हेस्टिंग्ज का राजपूताना से विशेष लगाव था। उसने सेरामपुर (बंगाल) के प्रसिद्ध ईसाई पादरी विलियम कैरे के पुत्र जबेज कैरे को राजपूताने में शिक्षा-प्रसार के लिए भेजा और उसे शिक्षा अधीक्षक के पद पर नियुक्त किया।

1819 ई. में उसने अजमेर पहुँच कर एक स्कूल की स्थापना की। तत्पश्चात् उसने पुष्कर में भी एक स्कूल खोला। अगले तीन वर्षों में उसने भिनाय और केकड़ी में भी स्कूल खोले किन्तु जबेज इन स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देने लगा तो लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने उसे फटकारा। इन स्कूलों की विशेष प्रगति न देखकर 1827 ई. में इन्हें बन्द करके केवल अजमेर का स्कूल चालू रखा। 1831 ई. में उसे भी बन्द कर दिया गया।

इस प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने में शिक्षा प्रसार का प्रथम प्रयास लगभग असफल रहा। 1836 ई. में कम्पनी ने पुनः अजमेर में एक स्कूल खोला। उसे भी जनवरी 1843 में बन्द कर देना पड़ा। 1851 ई. में अजमेर में पुनः एक स्कूल खोला। तब से अजमेर में निरन्तर शिक्षा की प्रगति होती रही। राजस्थान की अन्य रियासतों में भी वहाँ के ब्रिटिश पोलीटिकल एजेन्टों के प्रयत्न से कुछ स्कूल खोले गये। 1842 ई. में अलवर तथा भरतपुर और 1844 ई. में जयपुर में प्रथम आधुनिक स्कूल खोला गया।

तकनीकी शिक्षा

1833 ई. से 1853 ई. की अवधि में भारत में स्त्रियों तथा मुसलमानों की शिक्षा के लिए कुछ प्रयत्न किये गये किन्तु उनका कोई ठोस परिणाम नहीं आया। इस अवधि में मेडिकल, इन्जीनीयरिंग तथा अन्य तकनीकी शिक्षा के लिए भी कुछ कदम उठाये गये। 1835 ई. में कलकत्ता और मद्रास में तथा 1845 ई. में बम्बई में मेडिकल कॉलेज खोले गये।

1846-47 ई. में अजमेर में भी मेडिकल स्कूल खोलने का प्रयास किया गया किन्तु यह प्रयास सफल नहीं हुआ। 1847 ई. में रुड़की में भारत का प्रथम इन्जीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया। 1850 ई. में मद्रास में एक औद्योगिक तथा व्यवसायिक स्कूल स्थापित किया गया।

शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयास

भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए ईसाई मिशनरियों तथा कम्पनी के अधिकारियों के साथ-साथ कुछ भारतीयों तथा अँग्रेजों द्वारा व्यक्तिगत रूप से भी प्रयास किये गये। ऐसे व्यक्तियों में राजा राममोहन राय, डेविड हेयर, मेथ्यून तथा बम्बई के प्रोफेसर पैट्टन, जगन्नाथ शंकर सेत और ज्योति बा फूले प्रमुख हैं।

(1.) राजा राममोहन राय (1774-1833 ई.)

राजा राममोहन राय की मान्यता थी कि अलगाव की प्रवृत्ति के कारण भारतीय मस्तिष्क क्षीण हो गया है, अतः पाश्चात्य ज्ञान और साहित्य का अध्ययन भारतीयों में स्फूर्ति और ताजगी पैदा कर सकता है। इसलिए उन्होंने भारतीय तथा पश्चिमी संस्कृतियों के समन्वय पर जोर दिया।

उनकी धारणा थी कि अँग्रेजी भाषा तथा पश्चिमी विज्ञान के अध्ययन से भारतीयों की निष्क्रियता और कूपमंडूकता दूर होगी। उन्होंने इंग्लैण्ड-वासियों के समक्ष प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य के उज्जवल पक्ष को रखकर, भारत तथा इंग्लैण्ड के मध्य सांस्कृतिक पुल बनाने का कार्य किया।

उन्होंने अँग्रेजी के अध्ययन के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर भी जोर दिया। उन्होंने स्वयं बंगला भाषा में व्याकरण, भूगोल, ज्योतिष, गणित आदि विषयों पर पुस्तकें लिखकर अन्य साहित्यिक लोगों के समक्ष एक आदर्श उपस्थित किया।

उन्होंने स्त्री शिक्षा पर बहुत जोर दिया और धर्मशास्त्रों के अध्ययन पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्राचीन समय में भारत में स्त्रियां शिक्षित होती थीं। इस प्रकार अँग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर देकर उन्होंने भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय शिक्षा के इतिहास में राजा राममोहन राय का विशिष्ट स्थान है।

(2.) डेविड हेयर (1775-1842 ई.)

डेविड हेयर पेशे से घड़ीसाज और जौहरी होते हुए भी शिक्षा में बड़ी रुचि रखता था। वह भारतीयों की दशा सुधारने के लिए पाश्चात्य साहित्य तथा विज्ञान का अध्ययन आवश्यक समझता था। वह अँग्रेजी साहित्य के अध्ययन पर तो जोर देता था किन्तु ईसाई पादरियों द्वारा दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा का विरोधी था।

उसका विचार था कि भारत को ऐसे असाम्प्रदायिक स्कूलों तथा कालेजों की आवश्यकता है जहाँ अँग्रेजी भाषा और साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ मातृभाषा की भी शिक्षा दी जाये। कलकत्ता का हिन्दू कॉलेज उसके विचारों का प्रतीक था जिसकी स्थापना तथा विकास में डेविड हेयर ने प्रचुर आर्थिक सहायता दी।

कलकत्ता में मेडिकल कॉलेज को लोकप्रिय बनाने में उसका बड़ा हाथ था। वह प्राथमिक शिक्षा तथा स्त्री शिक्षा में भी काफी रुचि रखता था। शिक्षा के क्षेत्र में हेयर की सबसे बड़ी देन यह थी कि वह शिक्षण संस्थाओं को धर्म प्रचार का साधन बनाने के विरुद्ध था।

(3.) बैथ्यून (1801-1851 ई.)

गवर्नर जनरल की कौंसिल का विधि सदस्य तथा शिक्षा समिति का अध्यक्ष बैथ्यून, स्त्री-शिक्षा का प्रबल समर्थक था किंतु 1849-50 ई. तक कम्पनी की नीति स्त्री-शिक्षा पर कुछ भी खर्च नहीं करने की थी। इसलिये बैथ्यून ने अपने धन से कलकत्ता में एक असाम्प्रदायिक कन्या पाठशाला की स्थापना की।

1851 ई. में मृत्यु के कुछ समय पूर्व, उसने अपनी सारी सम्पत्ति इस पाठशाला को अर्पित कर दी। यही कन्या पाठशाला आगे चलकर प्रसिद्ध बैथ्यून गर्ल्स कॉलेज में परिवर्तित हो गई। इस प्रकार स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में बैथ्यून का योगदान सराहनीय रहा।

(4.) प्रोफेसर पैट्टन

नारी शिक्षा को प्रोत्साहन देने वाले प्रोफेसर पैट्टन बम्बई के एलफिंस्टन कॉलेज में प्राध्यापक थे। उन्होंने कॉलेज में एक साहित्य तथा विज्ञान सोसाइटी बनायी तथा इसके माध्यम से साहित्यिक विषयों पर वाद-विवाद आयोजित कर शिक्षा के प्रति लोगों में रुचि पैदा की। उन्होंने मराठी तथा गुजराती भाषाओं के माध्यम से शिक्षा का बहुत प्रचार किया। उनकी सोसाइटी ने अनेक कन्या पाठशालाएं स्थापित कीं जिनमें से बहुत सी आज भी चल रही हैं।

(5.) जगन्नाथ शंकर सेत (1803-1865 ई.)

बम्बई के सम्पन्न परिवार के जगन्नाथ शंकर सेत की मान्यता थी कि ईसाई मिशनरियों द्वारा दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा से बचने के लिये भारतीयों को अपनी शिक्षा संस्थाएं स्थापित करनी चाहिए। वे अँग्रेजी भाषा तथा पाश्चात्य विज्ञान के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति के प्रबल समर्थक थे।

राजा राममोहनराय की तरह वे भी प्राच्य तथा पाश्चात्य संस्कृतियों के समन्वय के पक्ष में थे। उनकी धारणा थी कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देना अधिक सुलभ है। उन्होंने अपना धन लगाकर अनेक यूरोपीय ग्रन्थों का मराठी में अनुवाद करवाया। वे स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे।

(6.) ज्योति बा फूले (1828-90 ई.)

ज्योति बा फूले साधारण माली परिवार से थे। उन्हें स्वयं शिक्षा ग्रहण करने में जिन कठिनाईयों का सामना करना पड़ा उससे उन्हें अनुभव हो गया कि दलित और शोषित वर्ग को शिक्षा प्राप्त करने में क्या कठिनाईयां झेलनी पड़ती हैं। इसीलिए उन्होंने हरिजनों के लिए विद्यालय खोले।

इस कार्य से उन्हें उच्च-वर्ण हिन्दुओं का प्रबल विरोध झेलना पड़ा किन्तु वे हताश नहीं हुए और उच्च-वर्ण हिन्दुओं के विरोध के उपरांत भी ये पाठशालाएं चलती रहीं। उन्होंने अपनी पत्नी को भी पढ़ाया। कुछ समय बाद उन्होंने एक कन्या पाठशाला खोली जिसमें अपनी पत्नी को अध्यापन का कार्य सौंपा।

उच्च-सवर्ण हिन्दुओं ने उनकी पत्नी को स्कूल जाते समय पत्थरों से मारा किन्तु फूले दम्पत्ति विचलित नहीं हुए और उन्होंने दलित एवं शोषित कन्याओं की शिक्षा का कार्य जारी रखा। उन्होंने अनाथालय तथा विधवाश्रम जैसी संस्थाएं स्थापित कीं जहाँ समाज से ठुकराये हुए व्यक्तियों को आश्रय मिलता था।

इस प्रकार दलित, शोषित और सामाजिक अत्याचारों से पीड़ित व्यक्तियों के उद्धार एवं शिक्षा के लिए ज्योति बा फूले ने उल्लेखनीय एवं सराहनीय कार्य किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण (1854-1882 ई.)

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वुड घोषणा पत्र

वुड घोषणा पत्र ई.1854 में जारी हुआ जिसके पश्चात् अंग्रेज सरकार ने भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण आरम्भ किया। यह चरण ई.1854 से 882 तक चला।

1835 से 1853 ई. तक मैकाले द्वारा निर्धारित नीति पर भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास हुआ। 18 वर्ष के इस काल में मैकाले की नीति में कई कमियां अनुभव की गईं जिन्हें दूर करना आवश्यक था। इसलिये 1853 ई. में ब्रिटिश संसद ने भारतीय शिक्षा की प्रगति की जांच के लिए एक समिति नियुक्त की।

इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर कम्पनी ने 1854 ई. में शिक्षा घोषणा पत्र जारी किया। इसे कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के अध्यक्ष सर चार्ल्स वुड के नेतृत्व में तैयार किया गया था, इसलिए इसे वुड का घोषणा पत्र कहा जाता है। इसमें भारतीय शिक्षा के विविध पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गई थी। भारतीय शिक्षा के इतिहास में वुड के घोषणा-पत्र का अत्यधिक महत्त्व है।

वुड घोषणा पत्र

वुड घोषणा पत्र में शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न बिंदुओं के विषय में अनेक नई योजनाओं की अनुशंसा की गई-

(1.) शिक्षा का उत्तरदायित्च

वुड के घोषणा-पत्र में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय शिक्षा के प्रसार का पूर्ण उत्तरदायित्व स्वीकार करते हुए कहा कि भारतीयों का नैतिक, बौद्धिक एवं आर्थिक स्तर ऊँचा करने के लिए उपयोगी ज्ञान के प्रसार की आवश्यकता है।

(2.) भाषाओं का प्रश्न

भारतीयों को अँग्रेजी साहित्य तथा विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और अरबी के ज्ञान का भी महत्त्व है। अँग्रेजी माध्यम केवल उन्हीं व्यक्तियों के लिए होगा जो इस भाषा को भली-भाँति पढ़ सकते हों तथा इसके माध्यम से साधारण ज्ञान प्राप्त कर सकते हों। अन्य समस्त भारतीयों के लिए भारतीय भाषाएँ ही अधिक उपयुक्त होंगी। उच्च विद्यालयों में अँग्रेजी तथा देशी दोनों ही भाषाओं में अध्यापन की व्यवस्था होगी।

(3.) शिक्षा विभाग

शिक्षा के कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कम्पनी के अधीन पाँच प्रान्तों में शिक्षा विभाग की स्थापना की जाये जिसका सर्वोच्च अधिकारी लोक शिक्षा निदेशक हो और उसके अधीन शिक्षा निरीक्षक हों।

(4.) विश्वविद्यालय

भारतीयों को उच्च शिक्षा देने के लिए लन्दन विश्वविद्यालय के नमूने पर कलकत्ता और बम्बई में एक-एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये। आवश्यकता होने पर मद्रास या किसी अन्य स्थान पर ऐसा ही एक और विश्वविद्यालय स्थापित किया जाये। इन विश्वविद्यालयों का मुख्य काम परीक्षा लेकर डिग्री देना होगा।

(5.) श्रेणीबद्ध विद्यालयों की स्थापना

शिक्षा को व्यापक रूप देने के लिए सम्पूर्ण भारत में श्रेणीबद्ध विद्यालयों की स्थापना की जाए। विश्वविद्यालयों तथा उनसे सम्बद्ध महाविद्यालयों की स्थापना के बाद हाई स्कूलों तथा देशी स्कूलों को भी उनसे जोड़ा जाये। इस प्रकार शिक्षा के उच्चतम शिखर पर विश्वविद्यालय हों तथा निम्नतम स्तर पर देशी पाठशालाएँ हों। उनमें तारतम्य एवं सामंजस्य स्थापित करने के लिये हाई स्कूलों तथा मिडिल स्कूलों की शृंखला हो।

(6.) निजी शिक्षण संस्थाओं को प्रोत्साहन

उपरोक्त योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी जिसे व्यय करना कम्पनी की नीति में नहीं था। इसलिये वुड के घोषणा-पत्र में सुझाव दिया गया कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी शिक्षण-संस्थाओं का स्वागत किया जाये तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहन देने के लिए शिक्षा-सहायता की पद्धति चालू की जाए।

(7.) शिक्षक प्रशिक्षण

घोषणा-पत्र में कहा गया कि भारत के हर प्रान्त में शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना की जाये और प्रशिक्षण की अवधि में छात्राध्यापकों को छात्रवृत्तियाँ दी जायें। शिक्षा-कार्य की ओर योग्य व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए अध्यापकों के वेतन में वृद्धि की जाए।

(8.) शिक्षा और नौकरियाँ

घोषणा-पत्र में कहा गया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है अपितु शिक्षा प्राप्त करना अपने-आप में एक उपलब्धि है जो जीवन को लाभदायक तथा योग्य बनाने के लिए आवश्यक है। शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की अनुशंसा की गई।

(9.) स्त्री-शिक्षा

घोषणा-पत्र में स्त्री-शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया तथा कन्या पाठशालाओं को विभिन्न प्रकार से प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया गया। उन्हें सरकारी वित्तीय सहायता देकर सरकार के मैत्री एवं सहानुभूति-पूर्ण रवैये से परिचित कराने की बात भी कही गई।

(10.) जन शिक्षा

वुड्स घोषणा-पत्र में जन-शिक्षा पर जोर दिया गया जबकि अब तक समाज के उच्च वर्ग की शिक्षा पर ही जोर दिया जाता था

वुड घोषणा पत्र के बाद हुई प्रगति

(1.) विश्वविद्यालयी शिक्षा

वुड के घोषणा-पत्र के अनुसार 1857 ई. में तीनों ब्रिटिश प्रेसीडेन्सी नगरों- कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में लन्दन विश्वविद्यालय के अनुकरण पर एक-एक विश्वविद्यालय स्थापित किया गया जिनका मुख्य कार्य परीक्षा लेना और डिग्रीयाँ देना था। प्रत्येक विश्वविद्यालय का प्रबन्ध विश्वविद्यालय की सीनेट को सौंपा गया जिसके अधिकांश सदस्य या तो पदेन अधिकारी थे या सरकार द्वारा मनोनीत सरकारी अधिकारी। कुछ अध्यापकों को भी इसका सदस्य मनोनीत किया गया। दुर्भाग्य से अधिकांश सरकारी अधिकारी ऐसे व्यक्ति थे जिनकी शिक्षा के क्षेत्र में कोई रुचि एवं योग्यता नहीं थी। विश्वविद्यालयों में प्राच्य तथा देशी भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था भी नहीं की गई।

(2.) महाविद्यालयी शिक्षा

वुड के घोषणा-पत्र के अनुसार देश की विभिन्न भागों में सरकारी तथा निजी क्षेत्र में महाविद्यालय स्थापित हुए। कलकत्ता और मद्रास में प्रेसीडेन्सी कॉलेज, लाहौर का यूनिवर्सिटी कॉलेज, इलाहाबाद का सैन्ट्रल कॉलेज और अजमेर का गवर्नमेन्ट कॉलेज सरकार द्वारा स्थापित मुख्य कॉलेज थे।

निजी क्षेत्रों में कलकत्ता के विद्यासागर और सिटी कॉलेज, मद्रास प्रान्त के पच्चैयप्या, विशाखापट्टम और टिन्नेवल्ली कॉलेज, आगरा के आगरा और सेन्ट जॉन्स कॉलेज, लखनऊ का केनिंग कॉलेज, अलीगढ़ का मोहम्मडन एंग्लो-ओरियन्टल कॉलेज, दिल्ली का स्टीफेन्स कॉलेज और लाहौर का फोरमैन कॉलेज प्रमुख थे।

1873 ई. में जयपुर का महाराजा कॉलेज हाई स्कूल स्तर से कॉलेज में क्रमोन्नत किया गया। इसी अवधि में राजकुमारों की शिक्षा के लिए सरकार द्वारा राजकोट (राजकोट कॉलेज), अजमेर (मेयो कॉलेज), इन्दौर (डेली कॉलेज) और कुछ समय बाद लाहौर में (एचिसन कॉलेज) खोले गये।

(3.) माध्यमिक शिक्षा

वुड के घोषणा-पत्र के बाद नव-स्थापित शिक्षा विभागों ने अपने अपने प्रान्तों में माध्यमिक स्कूलों की स्थापना पर बल दिया तथा वित्तीय अनुदान देकर उनकी आर्थिक सहायता की। अनेक भारतीयों और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी इस क्षेत्र में काम करने के लिए आगे आये। उनके प्रयत्नों से बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में बड़ी संख्या में निजी क्षेत्र में हाई स्कूल खोले गये। कुछ समय बाद प्रायः समस्त स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी कर दिया गया।

(4.) प्राथमिक शिक्षा

1854 ई. में जितने सरकारी प्राथमिक स्कूल थे, उनसे दो-गुने मिशनरी स्कूल थे। अतः प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सरकार का एकाधिकार सम्भव नहीं था। घोषणा-पत्र मे अनुदान द्वारा निजी क्षेत्र की स्कूलों को प्रोत्साहन देने की बात कही गई थी तथा पहले से चले आ रहे देशी स्कूलों में सरकारी निरीक्षण द्वारा सुधार करने का सुझाव दिया गया था।

दुर्भाग्य से यह सुझाव कार्यान्वित नहीं हो सका क्योंकि अनुदान की धनराशि का अधिकांश भाग उच्च शिक्षा पर खर्च कर दिया गया। इसलिए प्राथमिक स्कूल खोलने के लिए नया शिक्षा-कर लगाने तथा इसके लिए जनता से धन एकत्रित करने के प्रस्तावों से जनता में असन्तोष बढ़ गया।

1858 ई. में भारत सचिव लॉर्ड स्टेनले ने प्राथमिक स्कूलों को दिये जाने वाले अनुदान को समाप्त कर स्थानीय शिक्षा-कर वसूल करने का आदेश दिया। इससे जनता में अत्यधिक रोष उत्पन्न हुआ। अतः प्रान्तों में प्राथमिक शिक्षा की अलग-अलग योजनाएँ बनाई गईं। 1871 ई. से 1882 ई. की अवधि में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई।

1870-71 ई. में ब्रिटिश भारत में 16,473 प्राथमिक स्कूल थे, 1881-82 ई. में इनकी संख्या 82,916 हो गई। फिर भी भारत प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। 1881-82 ई. में ब्रिटिश भारत में स्कूल जाने वाले बालक-बालिकाओं की कुल संख्या लगभग साढ़े 19 करोड़ में से केवल ढाई करोड़ थी।

(5.) स्त्री-शिक्षा

वुड के घोषणा-पत्र में स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन देने की बात कही गई थी किन्तु सरकार को स्त्री-शिक्षा का दायित्व ग्रहण करने का आदेश नहीं दिया गया था। इसलिए स्त्री-शिक्षा की प्रगति बहुत धीमी रही।

पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-शिक्षा के प्रति अभिभावकों की लापरवाही, पश्चिमी शिक्षा के प्रति लोगों में अविश्वास, मध्यम वर्ग की कमजोर आर्थिक स्थिति, स्त्री-शिक्षकों का सर्वथा अभाव, स्त्री-शिक्षा के लिए उचित पाठ्यक्रम का अभाव आदि कई कारण थे जिन्होंने स्त्री-शिक्षा की प्रगति को धीमा रखा।

फिर भी बंगाल, बम्बई, मद्रास और उत्तर-पश्चिम प्रान्त में स्त्री-शिक्षा के लिए कई स्कूल खुल गये। इस दिशा में ईसाई मिशनरियों का योगदान उल्लेखनीय रहा। बंगाल में ब्रह्म समाज और बम्बई में पारसी अन्जूमन स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहे। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने बंगाल में स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन दिया।

पूना में महाराष्ट्र स्त्री-शिक्षा सोसायटी ने भी इस दिशा में सराहनीय कार्य किया। इन सबके उपरांत, स्त्रियों के लिए विश्वविद्यालयी शिक्षा के द्वार बिल्कुल बन्द थे।

(6.) मुसलमानों की शिक्षा

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन में मुसलमानों में यह भावना तीव्र थी कि अँग्रेजी पढ़ने से उनका धर्म नष्ट हो जायेगा। मुल्ला और मौलवियों ने मुसलमानों को यह कहकर उकसाया कि परम्परागत मुस्लिम मकतब और मदरसों की शिक्षा ही लाभदायक है।

1857 ई. के विप्लव के बाद मुसलमानों ने यह अनुभव किया कि अँग्रेजी शिक्षा के अभाव में वे सरकारी नौकरियाँ प्राप्त करने में हिन्दू तथा अन्य जातियों से पिछड़ जायेंगे। अतः सर सैयद अहमदखाँ ने मुसलमानों को अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि मुस्लिम समाज को उन्नत करने के लिए पाश्चात्य साहित्य तथा विज्ञान का अध्ययन करना आवश्यक है। 1871-72 ई. में गवर्नर जनरल के आदेश पर भारत सरकार ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें मुसलमानों में अँग्रेजी शिक्षा के प्रसार के तरीकों पर प्रकाश डाला गया।

इस दिशा में सबसे ठोस कार्य सर सैयद अहमदखाँ ने 1875 ई. में अलीगढ़ में मोडम्मडन एंग्लो-ओरियन्टल कॉलेज की स्थापना करके किया। यही कॉलेज आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में परिवर्तित हो गया। इस संस्था ने मुसलमानों का शैक्षिक विकास किया तथा उनमें संगठन की भावना उत्पन्न की। इस कॉलेज की शिक्षा ने ही मुसलमानों में मुस्लिम राष्ट्रवाद को जन्म दिया।

(7.) विधि शिक्षा

19वीं शताब्दी के मध्य तक भारत में विधि शिक्षा के बहुत कम प्रयास किये गये। ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय न्यायालयों में इंग्लैण्ड की न्याय-पद्धति का ही प्रयोग होता था, जिसके अनुसार मुकदमों की पैरवी वकीलों द्वारा की जाती थी। इसके लिए कानून की शिक्षा अनिवार्य थी। इसलिए बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालयों में विधि-शिक्षा के लिए विधि के प्रोफेसर नियुक्त किये गये।

(8.) चिकित्सा शिक्षा

कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति की शिक्षा देने के लिए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की गई थी। इसी प्रकार 1860 ई. में पंजाब में भी एक मेडिकल कॉलेज स्थापित किया गया। जिन प्रान्तों में मेडिकल कॉलेज नहीं थे वहाँ के छात्रों को छात्रवृत्तियाँ देकर पड़ौस के प्रान्तों में मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने के लिए भेजा जाता था।

अन्य बहुत से प्रान्तों में मेडिकल स्कूल थे जहाँ चिकित्सा शास्त्र की साधारण शिक्षा दी जाती थी। राजपूताने में भी 1861 ई. में जयपुर नरेश सवाई रामसिंह ने अपनी राजधानी में एक मेडिकल कॉलेज  खोला किन्तु अँग्रेज अधिकारियों के पारस्परिक वैमनस्य तथा साधारण जनता में चीर-फाड़ के प्रति गहरी अरुचि के कारण 1868 ई. में उसे बन्द कर देना पड़ा।

 (9.) इन्जीनियरिंग शिक्षा

1847 ई. में रुड़की में थॉमसन इन्जीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया। तत्पश्चात् बंगाल में शिवपुर में तथा पूना व मद्रास में भी इन्जीनियरिंग कॉलेजों की स्थापना की गई। कुछ स्थानों पर इन्जीनियरिंग स्कूल भी खोले गये जिनमें शिक्षा प्राप्त कर भारतीय नवयुवक, सार्वजनिक निर्माण विभाग तथा नगरपालिकाओं की सेवाओं में प्रवेश पाने लगे।

(10.) कृषि शिक्षा

भारत में कृषि शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। मद्रास के सैदापेट में 1864 ई. में एक कृषि फार्म खोला गया जो आगे चलकर कॉलेज बन गया। इसी प्रकार पूना के कॉलेजों में कृषि-विभाग खोला गया।

(11.) पशु-चिकित्सा

भारत में अँग्रेजों के पास जो घुड़सवार सेना थी, उसके घोड़ों की चिकित्सा इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त वेटरिनरी-सर्जन करते थे। 1882 ई. तक भारत में पशु चिकित्सा शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई। केवल परम्परागत नाल-साज ही पशुओं की थोड़ी-बहुत चिकित्सा करते थे।

(12.) वानिकी शिक्षा

हिमालय की तलहटी, अरावली एवं सतपुड़ा की पहाड़ियों, पूर्वी तथा पश्चिमी घाट आदि स्थानों में सघन वन थे। 1878 ई. में देहरादून में एक फोरेस्ट स्कूल खोला गया जो कालान्तर में एशिया के सर्वश्रेष्ठ वन-स्कूलों में गिना जाने लगा। इसी प्रकार पूना में भी वानिकी शिक्षा की व्यवस्था की गई।

(13.) कला-शिक्षा

कलकत्ता का आर्ट स्कूल, कला शिक्षा का एक प्रमुख विद्यालय था। इसी नमूने पर बाद में बम्बई, मद्रास और लाहौर में भी आर्ट स्कूल खोले गये, जिनमें चित्रकला की शिक्षा दी जाती थी। जयपुुर में भी महाराजा सवाई रामसिंह के शासन काल में 1861 ई. में एक आर्ट स्कूल खोला गया जो उस समय भारत के आर्ट स्कूलों में प्रमुख माना जाता था।

(14.) लोक शिक्षा विभागों की स्थापना

वुड के घोषणा-पत्र की अनुशंसा के अनुसार प्रत्येक प्रान्त में एक-एक शिक्षा विभाग की स्थापना की गई जिसका सर्वोच्च अधिकारी लोक निदेशक होता था। उसके अधीन निरीक्षक, उप-निरीक्षक आदि अधिकारी रखे गये।

इस विभाग का मुख्य काम प्रान्तीय सरकार को शिक्षा सम्बन्धी मामलों पर परामर्श देना, प्रान्तीय तथा केन्द्रीय सरकारों द्वारा शिक्षा के लिए प्रदत्त धनराशि का प्रबन्ध करना, शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करना, निजी शिक्षण संस्थाओं का निरीक्षण करना और शिक्षा की प्रगति पर सरकार को वार्षिक रिपोर्ट भेजना था।

इन विभागों की स्थापना के काफी समय बाद तक इनमें उच्च पदों पर अँग्रेज अधिकारी ही नियुक्त किये जाते रहे। सेवा नियम तथा वेतन आदि अधिक लाभदायक न होने के कारण इंग्लैण्ड से बहुत ही कम शिक्षाविद् इन सेवाओं की ओर आकर्षित होते थे। स्कूलों की बढ़ती हुई संख्या के अनुपात में अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की जाती थी। इससे शिक्षा विभाग की कार्य कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ता था। फिर भी इन विभागों ने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय काम किया।

(14.) निजी शिक्षण संस्थाओं को अनुदान

सरकार द्वारा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये निजी शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देने की प्रथा से निजी शिक्षण संस्थाओं की वृद्धि हुई।

वुड घोषणा पत्र का महत्त्व

भारतीय शिक्षा के इतिहास में वुड के घोषणा पत्र का विशेष महत्त्व है। इसके द्वारा ब्रिटिश संसद ने भारतीयों की शिक्षा का उत्तरदायित्व पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया तथा उसे वैधानिक स्वरूप प्रदान किया। यह प्रथम अवसर था जब भारतीय शिक्षा के विभिन्न पहलुआंे पर इतने विस्तार से विचार किया गया।

इसी घोषणा-पत्र के अनुसार कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में विश्वविद्यालय स्थापित किये गये तथा प्रत्येक प्रान्त में अलग शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। शिक्षा विभाग ने माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया तथा निजी शिक्षण संस्थाओं को वित्तीय अनुदान देना प्रारम्भ किया। शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालय स्थापित कर शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया गया।

इस घोषणा-पत्र की बहुत-सी बातों को कार्यान्वित नहीं किया जा सका। भारतीय भाषाओं के विकास का सुझाव केवल कागजों तक ही सीमित रहा तथा इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। निजी शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देने से शिक्षा के निजी प्रयासों को प्रोत्साहन मिलने तथा सरकार के शिक्षा क्षेत्र से हट जाने की आशा थी किंतु ऐसा नहीं हुआ। सर्व-साधारण की शिक्षा योजना भी फाइलों में दबकर रह गई।

फिर भी भारतीय शिक्षा के इतिहास में वुड के घोषणा-पत्र का बड़ा महत्त्व है। इस घोषणा-पत्र से शिक्षा के क्षेत्र में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। ब्रिटिश विद्वानों ने इसे भारतीय शिक्षा का मेग्नाकार्टा कहा है किन्तु उनका यह कथन उचित नहीं है क्योंकि हिन्दू शासक कभी भी, समाज की शिक्षा प्राप्ति में अवरोधक नहीं थे। मुसलमानों के शासनकाल में अवश्य ही हिन्दुओं को धार्मिक शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण (1882-1901 ई.)

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हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण (1882-1901 ई.)

हण्टर आयोग का उद्देश्य यह जानना था कि 1854 ई. के घोषणा पत्र में उल्लिखित शिक्षा नीति का किस सीमा तक पालन किया गया है तथा इस नीति को सुचारू रूप से कार्यान्वित करने के लिए सरकार को कौनसे कदम उठाने चाहिए!

1854 ई. के वुड घोषणा पत्र तथा 1858 ई. की महारानी विक्टोरिया की घोषणा में कहा गया था कि सरकार धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा नहीं देगी। इस कारण भारत की मिशनरी संस्थाएँ, जिनमें धार्मिक शिक्षा दी जाती थी, सरकारी अनुदान प्राप्त करने से वंचित हो गईं। इस नीति के विरुद्ध इंग्लैण्ड में एक आन्दोलन चलाया गया। इस कारण सरकार को इस विषय पर ध्यान देना आवश्यक हो गया।

हण्टर आयोग की नियुक्ति

गवर्नर जनरल लॉर्ड रिपन ने फरवरी 1882 में सर विलियम हण्टर की अध्यक्षता में हण्टर आयोग नियुक्त किया। इसमें अध्यक्ष सहित 21 सदस्य थे जिनमें से 8 भारतीय थे। इस आयोग का उद्देश्य यह जानना था कि 1854 ई. के घोषणा पत्र में उल्लिखित नीति का किस सीमा तक पालन किया गया है।

आयोग को निर्देश दिया गया कि वह यह भी बताये कि उक्त नीति को सुचारू रूप से कार्यान्वित करने के लिए सरकार को कौनसे कदम उठाने चाहिए। आयोग यह भी सुझाव दे कि प्राथमिक शिक्षा के विकास और प्रगति के लिए सरकार को क्या विशेष प्रयत्न करने चाहिये।

आयोग बताये कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों को प्रोत्साहन देने के लिए आर्थिक अनुदान की प्रथा कहाँ तक सफल हुई है तथा सरकार के दृष्टिकोण को अधिक उदार बनाने के लिए इस प्रथा में क्या परिवर्तन किये जायें?

योग मूलतः प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए नियुक्त किया गया था किन्तु आयोग ने माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, मुसलमानों तथा अन्य पिछड़ी जातियों की शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, धार्मिक शिक्षा और शिक्षा विभाग में सुधार आदि विषयों के सम्बन्ध में भी महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। इस प्रकार 1882 ई. का वर्ष भारतीय शिक्षा के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा।

(1.) प्राथमिक शिक्षा

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा की नीति, प्रबन्ध, देशी शिक्षा को प्रोत्साहन, प्राथमिक शिक्षा का माध्यम आदि विषयों पर कई सुझाव दिये। प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित प्रमुख सुझाव इस प्रकार से थे-

(अ.) प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए।

(ब.) प्राथमिक शिक्षा में व्यापारिक गणित, हिसाब, जमीन की नाप-तौल, प्राकृतिक विज्ञान और कृषि, स्वास्थ्य और औद्योगिक कलाओं में उसका उपयोग आदि विषय सम्मिलित किये जाने चाहिये।

(स.) प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को अधिक कठोर नहीं बनाया जाना चाहिये।

(द.) प्रान्तों को स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए कि वे अपनी आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार पाठ्यक्रम का स्वरूप निर्धारित कर सकें।

(य.) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, विस्तार और सुधार के लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए।

(र.) स्थानीय निकायों के राजस्व से ही प्राथमिक शिक्षा का व्यय पूरा किया जाना चाहिये। 

(ल.) प्रान्तीय सरकारें अपने राजस्व में से प्राथमिक शिक्षा पर व्यय करें। प्राथमिक स्कूलों के निदेशन एवं निरीक्षण का सारा व्यय भी प्रान्तीय सरकारों को वहन करना चाहिए तथा प्रान्तीय सरकारों को प्रत्येक जिले में एक-एक नार्मल स्कूल खोलने का दायित्व अपने ऊपर लेना चाहिए।

आयोग ने भारतीयों द्वारा संचालित परम्परागत शिक्षण संस्थाओं की भी जाँच की तथा सुझाव दिया कि ये संस्थाएँ अत्यन्त लाभदायक हैं, अतः इनको संरक्षण दिया जाना चाहिये।

इन संस्थाओं को विकसित कर उन्हें सामयिक आवश्यकताओं के अनुकूल बनाया जा सकता है। आयोग ने इन संस्थाओं का प्रबन्ध स्थानीय स्वशासित संस्थाओं द्वारा किये जाने का सुझाव दिया तथा कहा कि परम्परागत देशी प्राथमिक शिक्षण संस्थाओं के विकास के लिए सरकार को उन्हें अधिक अनुदान देकर उनका अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। 

(2.) माध्यमिक शिक्षा

हण्टर आयोग ने माध्यमिक-शिक्षा के सम्बन्ध में भी कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये-

(अ.) योग्य एवं कुशल भारतीयों के हाथों में माध्यमिक-शिक्षा का भार सौंप कर सरकार उससे अपना हाथ खींच ले।

(ब.) जहाँ स्थानीय सहयोग पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो वहाँ सरकार अधिक से अधिक अनुदान देकर माध्यमिक-शिक्षा को प्रोत्साहित करे किन्तु जहाँ स्थानीय सहयोग पर्याप्त मात्रा में उलब्ध न हो, वहाँ सरकार स्वयं माध्यमिक स्कूल खोले। किन्तु अन्ततोगत्वा इन स्कूलों को भी सरकार स्थानीय संस्थाओं को सौंप दे, बशर्ते कि ऐसा करने से इन स्कूलों का शिक्षण स्तर नहीं गिरे और उनके स्थायित्व में भी किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचे।

(स.) जिस जिले में जनता समृद्ध न हो वहाँ सरकार एक-एक आदर्श हाई स्कूल स्थापित करे।

(द.) माध्यमिक-शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों को पर्याप्त प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा उदारतापूर्वक अनुदान राशि देने की अनुशंसा की गई।

(य.) माध्यमिक-शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों को पर्याप्त प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा उदारतापूर्वक अनुदान राशि देने की अनुशंसा की गई और सुझाव दिया गया कि ऐसी हाई स्कूलों में, सरकारी स्कूलों की अपेक्षा कम फीस ली जाये।

(र.) आयोग ने देशी भाषाओं की उपेक्षा करते हुए माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी रखने पर जोर दिया गया।

(ल.) माध्यमिक स्कूलों के लिए दो प्रकार के पाठ्यक्रम रखे जायें। क्योंकि आयोग ने अनुभव किया कि हाई स्कूल के विद्यार्थियों का लक्ष्य विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेना होता है, क्रियात्मक या व्यवसायिक शिक्षा की ओर उनका ध्यान कम ही होता है। फलस्वरूप उनकी शिक्षा केवल किताबी ज्ञान पर आधारित थी, जिसका जीवन की यथार्थता से कोई मेल नहीं था। इसलिए आयोग ने सुझाव दिया कि हाई स्कूल की उच्च कक्षाओं में दो प्रकार के पाठ्यक्रम रखे जायें ‘ए-कोर्स’ उन छात्रों के लिए जो विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में प्रवेश लेने के लिए प्रवेश-परीक्षा देना चाहते हों तथा ‘बी-कोर्स’ उन छात्रों के लिए हो जो हाई स्कूल के बाद व्यवसायिक, औद्योगिक या किसी अन्य असाहित्यिक प्रवृत्तियों की ओर जाना चाहते हों।

(3.) उच्च-शिक्षा

यद्यपि हण्टर आयोग का मुख्य कार्य प्राथमिक शिक्षा की जाँच कर उसके उन्यन के लिए सुझाव देना था, फिर भी आयोग ने कॉलेज शिक्षा के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये-

(अ.) सरकार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र से हट जाना चाहिए तथा उनका प्रबन्ध निजी संस्थाओं द्वारा होना चाहिए।

(ब.) निजी संस्थाओं के प्रोत्साहन हेतु महाविद्यालयों को दी जाने वाली धनराशि निर्धारित करते समय अध्यापकों की संख्या, संस्था के संचालन का व्यय, संस्था की क्षमता और उस क्षेत्र की शैक्षणिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

(स.) महाविद्यालयों में निःशुल्क पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी निश्चित की जानी चाहिए।

(द.) महाविद्यालयों के भवन के विस्तार, महाविद्यालयों हेतु फर्नीचर, पुस्तकालय, प्रयोगशाला तथा यन्त्र आदि खरीदने के लिए विशेष अनुदान दिया जाना चाहिए।

(य.) महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की रुचि के अनुसार विभिन्न पाठ्यक्रमों की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि शिक्षा पूर्ण करने पर उसे जीविकोपार्जन में कोई अड़चन नहीं आये।

(र.) केवल वे महाविद्यालय ही निजी व्यवस्थापकों को हस्तान्तरित किये जायें जिनके स्थायित्व और उत्तम प्रबन्धन के सम्बन्ध में पूर्ण आश्वासन प्राप्त हो जाये।

(ल.) महाविद्यालय में एक से अधिक वैकल्पिक विषयों की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि विभिन्न प्रकार की शिक्षा को प्रोत्साहन मिल सके।

(4.) शिक्षा-अनुदान

आयोग ने अनुभव किया कि सरकारी अनुदानों का अधिकांश भाग सरकारी शिक्षण संस्थाएँ ही प्राप्त कर रही हैं तथा निजी संस्थाओं को जो थोड़ा-बहुत अनुदान मिलता भी है, वह समय पर नहीं मिलता। राजकीय शिक्षण संस्थाओं से निकलने वाले विद्यार्थियों को, निजी शिक्षण संस्थाओं के विद्यार्थियों की तुलना में नौकरियों के अधिक अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

अतः आयोग ने सुझाव दिया कि दोनों प्रकार की संस्थाओं से निकलने वाले विद्यार्थियों को सेवा में समान अवसर मिलने चाहिए। साथ ही, प्रान्तीय सरकारें निजी शिक्षण संस्थाओं के प्रबन्धकों के परामर्श से अनुदान नियमों में संशोधन करें। परीक्षा परिणामों के आधार पर अनुदान देने की प्रथा को कॉलेजों में लागू न किया जाये।

इस प्रकार आयोग ने अनुदान नियमों को सरल बनाने, अनुदान की राशि में वृद्धि करने, निजी शिक्षण संस्थाओं के आन्तरिक प्रबन्ध में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाने तथा भारतीय निरीक्षकों की नियुक्ति करने के सुझाव देकर निजी संस्थाओं को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आने हेतु प्रोत्साहित किया।

(5.) स्त्री-शिक्षा

आयोग ने सुझाव दिया दिया कि सार्वजनिक कोष के उपयोग में लड़के और लड़कियों के स्कूलों में समान अनुपात होना चाहिए। कन्या पाठशालाओं के लिए अनुदान के नियम अधिक सरल और उदार होने चाहिए ताकि अधिक से अधिक कन्या पाठशालाएँ स्थापित हो सकें।

बालक और बालिकाओं के पाठ्यक्रम में भिन्नता होनी चाहिए ताकि कन्याओं को गृहस्थी में सहायक विषयों का ज्ञान हो सके। लड़कियों को शिक्षा की ओर आकर्षित करने के लिए उनको अधिक छात्रवृत्तियाँ दी जानी चाहिए। कन्या पाठशालाओं को दिया जाने वाला अनुदान शिक्षा शुल्क पर आधारित नहीं रखा जाना चाहिए।

छात्राओं के लिए छात्रावासों की स्थापना की जानी चाहिये ताकि वे अपने स्कूलों के निकट रह सकें। अधिकाधिक संख्या में महिला शिक्षिकाएँ नियुक्त की जानी चाहिये तथा कन्या पाठशालाओं के निरीक्षण के लिए महिला निरीक्षिकाओं की नियुक्ति की जानी चाहिए। भारतीय माता-पिता अपनी लड़कियों को घर से बाहर भेजना पसन्द नहीं करते थे, इसलिए आयोग ने सुझाव दिया कि लड़कियों को घरों पर जाकर पढ़ाने की प्रथा को प्रोत्साहन दिया जाये।

(6.) शिक्षक प्रशिक्षण

आयोग ने अनुशंसा की कि शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए शिक्षकों को शिक्षा के सिद्धान्त तथा पाठ-विधि से पूर्व-परिचित होना चाहिये। इसलिए शिक्षा के सिद्धान्त का पूर्ण ज्ञान रखने वाले तथा शिक्षण-विधि की परीक्षा में उत्तीर्ण शिक्षकों को ही माध्यमिक विद्यालयों में स्थायी नियुक्ति दी जानी चाहिये। स्त्री अध्यापिकाओं की कमी को ध्यान में रखते हुए आयोग ने सुझाव दिया कि जब तक उचित संख्या में प्रशिक्षित अध्यापिकाएँ उपलब्ध न हो जायें, तब तक पुरुष अध्यापकों की नियुक्ति की जा सकती है।

(7.) मुसलमानों व पिछड़ी जातियों की शिक्षा

आयोग ने मुसलमानों व पिछड़ी जातियों की शिक्षा पर भी अनुशंसाएं दीं तथा कहा कि इन जातियों की शिक्षा के विशेष प्रयास किये जायें। उन्हें विशेष छात्रवृत्तियाँ दी जायें। उनके लिए ऐसे स्कूल खोले जायें जिनमें उन्हें प्रवेश देने में प्राथमिकता मिले। सरकारी स्कूलों एवं कॉलेजों में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों में मुसलमान छात्रों की संख्या निश्चित कर दी जाये, मुस्लिम स्कूलों को उदारतापूर्वक अनुदान दिया जाये। मुसलमान शिक्षकों के प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था की जाये। मुसलमानों की प्राथमिक स्कूलों के निरीक्षण के लिए मुसलमान निरीक्षक नियुक्त किये जायें और वार्षिक शिक्षा रिपोर्टों में एक अध्याय मुसलमानों की शिक्षा पर जोड़ा जाये।

(8.) धार्मिक शिक्षा

आयोग ने सुझाव दिया कि सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा न दी जाये किन्तु गैर सरकारी स्कूलों के प्रबन्धक चाहें तो धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। ऐसे स्कूलों को वित्तीय सहायता देते समय उनकी शैक्षिक स्थिति का ध्यान रखा जाये।

(9.) शिक्षा विभाग में सुधार

शिक्षा विभाग के दोषों को दूर करने के लिए हण्टर आयोग ने सुझाव दिया कि विद्यालयों के निरीक्षण के लिए केन्द्रीय निरीक्षक नियुक्त न करके स्थानीय निरीक्षकों को नियुक्त किया जाये क्योंकि वे ही स्थानीय विद्यालयों की वास्तविक स्थिति का पता लगा सकते हैं। विद्यालयों की संख्या के अनुसार पर्याप्त संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति की जाये। निरीक्षकों के पद पर सामान्यतः भारतीयों की ही नियुक्ति की जाये।

हण्टर आयोग की रिपोर्ट के बाद भारत में शैक्षणिक प्रगति

लॉर्ड रिपन ने हण्टर आयोग की समस्त अनुशंसाएँ स्वीकार करके उन्हें तत्काल लागू कर दिया। इसके बाद बीस साल तक देश में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई। इस प्रगति का विवरण इस प्रकार से है-

(1.) प्राथमिक शिक्षा

हण्टर आयोग ने प्राथमिक शिक्षा का दायित्व स्थानीय निकायों को देने की अनुशंसा कर यह आशा व्यक्त की थी कि इससे प्राथमिक शिक्षा की काफी प्रगति होगी किन्तु स्थानीय संस्थाओं को पर्याप्त सरकारी सहायता नहीं मिली, जिससे प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए उन्हें अपने सीमित साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ा। फिर भी प्राथमिक विद्यालयों और उनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई। 1898 ई. तक अनेक गाँवों में प्राथमिक विद्यालय स्थापित हो गये। इस अवधि में, परम्परागत पद्धति पर चले रहे देशी विद्यालयों का ह्रास हुआ। 1854 ई. के वुड्स घोषणा-पत्र तथा 1882 ई. के हण्टर आयोग की अनुशंसा के बाद भी देशी विद्यालयों की दशा गिरती चली गई और 20वीं सदी के प्रारम्भ तक वे अदृश्य-प्रायः हो गये।

(2.) माध्यमिक शिक्षा

हण्टर आयोग की अनुशंसा के उपरांत भी प्रान्तीय सरकारों के शिक्षा विभागों ने माध्यमिक शिक्षा से अपने हाथ नहीं खींचे। अपितु सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रयत्न तेज कर दिये। इस अवधि में निजी प्रयासों में भी काफी वृद्धि हुई, क्योंकि देश में बढ़ती हुई राष्ट्रीय भावना ने जनता के शिक्षित वर्ग में शिक्षा के प्रति विशेष रुचि उत्पन्न कर दी तथा उन्हें माध्यमिक स्कूल खोलने के लिए प्रेरित किया। 1881-82 ई. में भारत में माध्यमिक स्कूलों की संख्या लगभग चार हजार थी जो 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सवा पाँच हजार हो गई। इसी प्रकार माध्यमिक स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या दो लाख चौदह हजार से बढ़कर पाँच लाख नब्बे हजार हो गई।

(3.) व्यावसायिक शिक्षा

हण्टर आयोग ने माध्यमिक स्कूलों में दो प्रकार के पाठ्यक्रम चालू करने की अनुशंसा की थी। पहला पाठ्यक्रम वह जिसे पढ़कर विद्यार्थी स्वयं को विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए तैयार कर सकें। दूसरा पाठ्यक्रम वह जो विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा दे सके। व्यावसायिक शिक्षा देने की अनुशंसा सफल नहीं हुई, क्योंकि अधिकांश विद्यार्थियों का उद्देश्य परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी प्राप्त करना होता था। यद्यपि कुछ प्रान्तों में व्यावसायिक विद्यालयों की स्थापना की गई किन्तु उनमें प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या अत्यल्प रही। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में देश में केवल दो हजार विद्यार्थी ही व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।

(4.) मातृ-भाषा की शिक्षा

वुड घोषणा-पत्र और हण्टर आयोग की रिपोर्ट, दोनों में मातृ-भाषा के अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया गया था किन्तु अगले बीस वर्षों में माध्यमिक स्कूलों में देशी भाषाओं के अध्यापन की पूर्ण उपेक्षा की गई तथा अँग्रेजी भाषा को ही शिक्षा का माध्यम बनाया गया जिससे अँग्रेजी भाषा का प्रसार हो गया। विद्यार्थियों का अधिकांश समय अँग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करने में व्यय होता था। इस कारण वे अन्य विषयों को बहुत कम समय दे पाते थे। अँग्रेजी भाषा के विस्तृत ज्ञान के लिए छात्रों को अपने मस्तिष्क पर अधिक बोझ डालना पड़ता था जिससे शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधा पहुँचती थी।

(5.) शिक्षक-प्रशिक्षण

वुड घोषणा-पत्र में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया था किन्तु 1854 से 1874 ई. तक की अवधि में शिक्षकों के प्रशिक्षण की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। 1882 ई. तक सम्पूर्ण भारत में केवल दो शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय स्थापित हो सके- एक मद्रास में और दूसरा लाहौर में। इन दोनों में माध्यमिक स्कूलों के बहुत ही कम शिक्षक, प्रशिक्षण प्राप्त कर सके। 1882 ई. के शिक्षा आयोग (हण्टर आयोग) ने ऐसे ठोस सुझाव नहीं दिये थे जिनकी क्रियान्विति अनिवार्य की जा सके। 1902 ई. तक सम्पूर्ण भारत में केवल छः शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय खोले गये। केवल कुछ प्रान्तों में ट्रेनिंग स्कूल खोले गये जिनमें माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता था।

(6.) विश्वविद्यालयी शिक्षा

माध्यमिक स्कूलों से निकले हुए अधिकांश छात्र कॉलेजों मे प्रवेश लेने का प्रयत्न करते थे, क्योंकि उस समय सरकारी नौकरी में उच्च पद प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री अनिवार्य थी। अतः इस अवधि में भारतीयों द्वारा अनेक कॉलेज खोले गये। ईसाई मिशनरियों ने भी प्रयत्न जारी रखे।

1902 ई. तक भारतीयों द्वारा संचालित कॉलेजों की संख्या 42 और मिशनरी कॉलेजों की संख्या 37 हो गई थी। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में 145 कला महाविद्यालय, 30 विधि महाविद्यालय, 4 मेडिकल कॉलेज व इन्जीनियरिंग कॉलेज, 5 शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय और 3 कृषि महाविद्यालय थे।

इन कॉलेजों की स्थापना में राष्ट्रीय विचारधारा और राजनीतिक चेतना का भी प्रभाव रहा। 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना और 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने भारतीयों में शिक्षा के प्रति विशेष रुचि उत्पन्न की। पाश्चात्य शिक्षा और राष्ट्रीय राजनीतिक विचारधारा ने भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना उत्पन्न की।

इस कारण भारतीयों ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महाविद्यालयों की स्थापना की। लाहौर का डी.ए.वी. कॉलेज, बनारस का सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज, पूना का फर्ग्यूसन कॉलेज और कलकत्ता का रिपन कॉलेज इसी भावना से खुले। कॉलेजों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए दो नये विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई- 1882 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय (लाहौर) और 1887 ई. में इलाहाबाद विश्वविद्यालय।

इस प्रकार 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में देश में पाँच विश्वविद्यालय- कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, पंजाब एवं इलाहबाद थे जो परीक्षाएँ लेकर डिग्रियाँ देने का काम करते थे। वे मौलिक चिन्तन और गहन अध्ययन के क्षेत्र उत्पन्न नहीं कर सके। यह कार्य महाविद्यालयों को सौंप दिया गया था जो आर्थिक कठिनाइयों, योग्य अध्यापकों के अभाव तथा उच्च अध्यापन सामग्री व वैज्ञानिक उपकरणों के अभाव के कारण पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके।

इन महाविद्यालयों द्वारा ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार हुआ जो पुस्तकों को रटने की कला में निपुण था किन्तु किसी व्यावहारिक या प्रायोगिक कार्य को करने में असमर्थ था। ऐसे शिक्षित लोगों का उद्देश्य किसी तरह परीक्षा उर्त्तीण करना था। इस स्थिति पर, 1902 ई. में लॉर्ड कर्जन द्वारा गठित भारतीय विश्वविद्यालय आयोग ने टिप्पणी की कि- ‘भारतीय विश्वविद्यालयों का सबसे बड़ा दोष यह है कि शिक्षण कार्य परीक्षा के अनुसार होता है, परीक्षा शिक्षण के अनुसार नहीं होती।’

(7.) स्त्री-शिक्षा

हण्टर आयोग की कड़ी अनुशंसा के उपरांत भी आगे के बीस वर्षों में भारत में स्त्री-शिक्षा में विशेष प्रगति नहीं हुई। स्कूल में लड़कों के साथ सह-शिक्षा से उत्पन्न आशंकाएं, बाल विवाह, पर्दा प्रथा आदि कारण स्त्री-शिक्षा में बाधक बने रहे। इस अवधि में कुछ कन्या विद्यालय स्थापित हुए किन्तु उनमें कन्याओं की संख्या काफी कम रही।

राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महादेव गोविन्द रानाडे, बैरामजी मलाबार, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आदि के प्रयासों से स्त्री शिक्षा का काम आगे बढ़ने लगा तथा भारत में स्त्रियों की शिक्षा के लिए सैकड़ों प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूल खुले।

1902 ई. तक भारत में कन्याओं के 5,628 प्राथमिक, 467 माध्यमिक और 12 महाविद्यालय थे। इन शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने वाली लड़कियों की कुल संख्या बहुत कम थी। फिर भी स्त्री-शिक्षा के प्रति लोगों का विरोध कम होता जा रहा था। 1882 ई. में देश में केवल 6 लड़कियाँ महाविद्यालयों में पढ़ती थीं जबकि 1901 ई. में इनकी संख्या बढ़कर 264 हो गई।

(8.) व्यावसायिक-शिक्षा

हण्टर आयोग ने व्यावसायिक-शिक्षा के प्रसार के लिये अनेक सुझाव दिये थे। सरकार ने इस सुझावों को कार्यान्वित करने के प्रयत्न किये। इस कारण देश में विधि-शिक्षा, चिकित्सा-शिक्षा, इन्जीनियरिंग तथा कृषि एवं पशु चिकित्सा के लिये अगले बीस वर्षों में कई महाविद्यालय खुले।

विधि-शिक्षा तीन प्रकार की संस्थाओं में दी जाती थी- (1.) कला और विज्ञान के कॉलेजों में चलाई जाने वाली विधि कक्षाएँ, (2.) विधि-कॉलेज, और (3.) विधि-स्कूल। बम्बई, मद्रास और पंजाब के कॉलेजों में कानून की शिक्षा दी जाती थी। तीनों ब्रिटिश प्रेसीडेन्सियों के मेडिकल कॉलेजों के अतिरिक्त लाहौर में भी एक मेडिकल कॉलेज था।

इनमें पाश्चात्य चिकित्सा-पद्धति की शिक्षा दी जाती थी। 1901-02 ई. में इन चारों मेडिकल कॉलेजों में 1,466 विद्यार्थी पढ़ते थे। मेडिकल कॉलेजों में शिक्षा ग्रहण करने वाली लड़कियों की संख्या 76 थी। 1901-02 ई. में देश में चार इन्जीनियरिंग कॉलेज- रुड़की, शिवपुर, पूना और मद्रास में थे।

कुछ इन्जीनियरिंग स्कूल भी थे जिनमें ओवरसियरी तथा ड्राफट्समैनशिप का प्रशिक्षण दिया जाता था। 1901 ई. में भारत में पाँच कृषि कॉलेज तथा तीन पशु चिकित्सा कॉलेज थे जिनमें क्रमशः 219 और 301 छात्र पढ़ते थे। वानिकी विज्ञान की शिक्षा के लिए दो स्कूल थे। सम्पूर्ण भारत में वाणिज्य की शिक्षा के लिए केवल एक संस्था थी जो बम्बई में स्थित थी। स्पष्ट है कि व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति बहुत धीमी रही।

(9.) अल्पसंख्यकों की शिक्षा

शिक्षा आयोग ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये थे। उन सुझावों को कार्यान्वित करने के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयासों के कारण मुसलमानों की शिक्षा में काफी प्रगति हुई। 1901 ई. में भारत में लगभग पौने सात लाख मुस्लिम छात्र पढ़ते थे। मुस्लिम जनसंख्या के अनुपात में छात्रों की संख्या कम थी किंतु अँग्रेजी शिक्षा के प्रति उनके विरोध को देखते हुए यह काफी अच्छी थी। मुसलमान भी अपने लड़कों को सरकारी या निजी स्कूलों में भेजने लगे थे किंतु कॉलेजों में मुसलमान छात्रों की संख्या काफी कम थी।

(10.) पिछड़ी जातियों की शिक्षा

हण्टर आयोग की रिपोर्ट के बाद सरकारी प्रयासों के साथ-साथ आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, ईसाई मिशनरियों तथा ज्योति बा फूले द्वारा स्थापित संस्थाओं के प्रयासों से पिछड़ी जातियों व हरिजनों ने भी शिक्षा का महत्त्व समझा। मिशनरी स्कूलों में प्रारम्भ से ही हरिजनों को प्रवेश दिया जाता था।

दक्षिण भारत के मद्रास, त्रावणकोर तथा बम्बई आदि प्रांतों के शिक्षा-विभागों ने हरिजन बालकों को स्कूलों में प्रवेश के लिये उदार नियम बनाये तथा हरिजन छात्रों को विशेष छात्रवृत्तियाँ दीं। 1901 ई. में मद्रास प्रान्त में 3,000 हरिजन विद्यालय थे जिनमें 45,000 हरिजन छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे।

बम्बई सरकार ने भी हरिजन छात्रों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। वहाँ हरिजन बालकों को सामान्य स्कूलों में प्रवेश देने पर जोर दिया गया। अन्य प्रान्तों में प्रांतीय सरकारों ने हरिजनों को शिक्षा के विशेष प्रयास नहीं किये किन्तु ईसाई मिशनरियों ने इस कमी को पूरा किया।

बिहार, उड़ीसा, पंजाब आदि प्रान्तों में मिशनरी स्कूलों ने हरिजनों की शिक्षा के लिए सराहनीय कार्य किया। इस अवधि में ईसाई मिशनरियों ने अपनी शिक्षा नीति में परिवर्तन करते हुए अपना ध्यान उच्च शिक्षा से हटाकर प्राथमिक शिक्षा पर केन्द्रित किया। फिर भी इस अवधि में कुछ अच्छे मिशनरी कॉलेजों की स्थापना हुई जिनमें क्रिश्चियन कॉलेज इन्दौर, मूरे कॉलेज स्यालकोट, क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर तथा गार्डन कॉलेज रावलपिण्डी प्रमुख थे।

हण्टर शिक्षा आयोग की अनुशंसाओं का मूल्यांकन

हण्टर आयोग ने शिक्षा के समस्त पक्षों पर विस्तार से जाँच करके महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। आयोग ने सरकार को शिक्षा के उत्तरदायित्व से मुक्त होने तथा भारतीयों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे आने के लिये प्रोत्साहित करने तथा प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा में, निजी एवं सरकारी प्रयासों में सामंजस्य स्थापित करने की अनुशंसा की।

आयोग की अनुशंसाओं ने भारतीयों में शिक्षा के प्रति रुचि और जागृति उत्पन्न की जिससे भारत में शिक्षा की उन्नति हुई। जन-साधारण में शिक्षा के प्रति चेतना बनाये रखने के लिए आयोग के सुझाव पर ही भारत सरकार ने भविष्य में प्रत्येक पाँच वर्ष बाद शिक्षा की प्रगति पर जाँच रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिये। ये पंचवर्षीय रिपोर्टें, शिक्षाविदों एवं राजकीय अधिकारियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुईं।

निष्कर्ष

वुड्स घोषणा पत्र तथा हण्टर की अध्यक्षता में गठित शिक्षा आयोग की रिपोर्ट के बाद 19वीं शताब्दी के अन्त तक भारतीय शिक्षा का तीसरा महत्त्वपूर्ण चरण पूरा हुआ। इस अवधि में भारतीय शिक्षा का दु्रतगति से पाश्चात्यकरण हुआ। भारत की परम्परागत देशी शिक्षा पद्धति तथा पाश्चात्य शिक्षा पद्धति में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा हुई जिसमें पाश्चात्य शिक्षा पद्धति प्रबल होकर उभरी और देशी शिक्षा-पद्धति का लोप होने लगा।

इसी अवधि में शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों का प्रार्दुभाव भी हुआ, जिसने आगे चलकर शिक्षा के क्षेत्र में बहुत योगदान दिया। शिक्षा के क्षेत्र में किये गये समस्त प्रयत्न पर्याप्त नहीं थे। 1901 ई. की जनगणना के अनुसार प्रति एक हजार व्यक्तियों में केवल 98 पुरुष और 7 महिलाएँ साक्षर थीं। 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 15 प्रतिशत ही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

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बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा

लॉर्ड कर्जन के समय में बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का चौथा चरण ई.1901 से आरम्भ हुआ जो कि ई.1919 तक चला। इस चरण में विश्वविद्यालय अधिनियम लागू हुआ तथा सैडलर आयोग की रिपोर्ट आई। इसके बाद ई.1919 से 1947 तक पांचवाँ चरण चला।

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा विकास का चतुर्थ चरण (1901-19 ई.)

कर्जन ने 1 सितम्बर 1901 को शिमला में समस्त प्रांतों के उच्च शिक्षा अधिकारियों एवं विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों का एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जिसमें कर्जन ने भारतीय शिक्षा की प्रगति पर असंतोष व्यक्त किया।

इस सम्मेलन में शिक्षा से जुड़े विविध मुद्दों के सम्बन्ध में लगभग 150 प्रस्ताव पारित किये गये जिन्हें यथा संभव शीघ्र लागू करने का संकल्प व्यक्त किया गया।

27 जनवरी 1902 को कर्जन ने अपनी कौंसिल के विधि सदस्य सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में एक शिक्षा आयोग का गठन किया। इस आयोग को विश्वविद्यालयों की दशा सुधारने के लिये योजना प्रस्तुत करने का काम सौंपा गया।

विश्वविद्यालय अधिनियम

रैले आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 पारित किया गया। इस अधिनियम में विश्वविद्यालयों के संचालन से सम्बन्धित निम्नलिखित प्रावधान रखे गये-

(1.) विश्वविद्यालयों की प्रबंध अथवा कार्यकारी संस्थाओं में सीनेट को महत्त्व दिया गया। सीनेट के सदस्यों की न्यूनतम संख्या 50 तथा अधिकतम संख्या 100 निश्चित कर दी गई। सीनेट में चुने हुए सदस्यों की संख्या 20 रखी गई। अधिकांश सदस्यों को सरकार द्वारा नामित करने का प्रावधान रखा गया। सीनेट के सदस्यों का अधिकतम कार्यकाल आजीवन से घटाकर 6 साल कर दिया गया ।

(2.) विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया। सीनेट द्वारा पारित प्रस्तावों को सरकार की सहमति के पश्चात् ही लागू करने का नियम बनाया गया। सरकार को सीनेट द्वारा बनाये गये नियमों को बदलने तथा नये नियम बनाने का अधिकार दिया गया।

(3.) विश्वविद्यालयों के कार्यों का विस्तार किया गया। उन्हें अध्यापन एवं शोध करवाने का कार्य सौंपा गया। साथ ही प्रोफेसर एवं व्याख्याता नियुक्त करने, प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय स्थापित करने के लिये अधिकृत किया गया।

(4.) महाविद्यालयों को स्नातक स्तर की शिक्षा सौंपी गई। निजी महाविद्यालयों पर विश्वविद्यालयों का नियंत्रण स्थापित किया गया।

(5.) विश्वविद्यालयों की सीनेटों को परीक्षा, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक आदि का उचित स्तर बनाने का दायित्व दिया गया।

(6.) विश्वविद्यालयों की सिण्टीकेट्स को वैधानिक मान्यता दी गई एवं उनमें अध्यापकों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया।

(7.) विश्वविद्यालयों का अधिकार-क्षेत्र एवं महाविद्यालायों की विश्वविद्यालयों के साथ मान्यता व सम्बद्धता तय करने की शक्ति गवर्नर जनरल इन कौंसिल को दी गई।

विश्वविद्यालय अधिनियम की आलोचना

1904 ई. के विश्वविद्यालय अधिनियम की भारतीय नेताओं द्वारा भर्त्सना की गई। यह आरोप लगाया गया कि कर्जन ने विश्वविद्यालयों को सरकारी विभाग बना दिया। विश्वविद्यालयों का सरकारीकरण करके महाविद्यालयी शिक्षा में प्रयत्नशील निजी क्षेत्र के भारतीय प्रयासों को हतोत्साहित करने का षड़यंत्र किया गया।

1913 ई. का प्रस्ताव

आधुनिक शिक्षा के विस्तार की दिशा में 1913 ई. का सरकारी प्रस्ताव महत्वपूर्ण विकास था। 21 फरवरी 1913 को एक प्रस्ताव द्वारा भारत सरकार ने अशिक्षा को समाप्त करने की नीति स्वीकृत की। इसमें प्रांतीय सरकारों से, अधिक निर्धन, दलित एवं पिछड़ों को निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने हेतु शीघ्र कदम उठाने के निर्देश दिये गये।

माध्यमिक शिक्षा के संदर्भ में इस प्रस्ताव में स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने पर जोर दिया गया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि प्रत्येक प्रांत में एक विश्वविद्यालय स्थापित किया करने; पटना, नागपुर एवं रंगून में सम्बद्धता विश्वविद्यालय तथा अलीगढ़, ढाका एवं बनारस में अध्यापन विश्वविद्यालय खोलने की अनुशंसा की गई।

सैडलर आयोग 1917

1917 ई. में भारत सरकार ने इंग्लैण्ड के लीड्स विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एम. ई. सैडलर की अध्यक्षता में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं के अध्ययन एवं निवारण हेतु सुझाव प्रस्तुत करने के लिये आयोग की स्थापना की। इसमें भारतीय सदस्य सर आशुतोष मुखर्जी एवं डॉ. जिआउद्दीन अहमद सम्मिलित किये गये।

सैडलर आयोग ने विद्यालयी शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा पर विचार किया। सैडलर आयोग ने माना कि विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार के लिये माध्यमिक शिक्षा में सुधार लाना आवश्यक है। इस आयोग के सुझाव समस्त विश्वविद्यालयों पर लागू करने योग्य थे।

सैडलर आयोग द्वारा दी गई प्रमुख अनुशंसाएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) इण्टरमीडियेट स्तर तक की शिक्षा, विद्यालयी शिक्षा का अंग हो तथा विश्वविद्यालयों में प्रवेश मैट्रिकुलेशन के स्थान पर इण्टरमीडियेट के पश्चात् मिले।

(2.) विश्वविद्यालयों को मैट्रिकुलेशन एवं इण्टरमीडियेट स्तर की परीक्षाओं के भार से मुक्त करके माध्यमिक एवं इण्टरमीडियेट शिक्षा बोर्ड गठित किया जाये।

(3.) इण्टरमीडियेट के पश्चात् स्नातक उपाधि का पाठ्यक्रम तीन वर्ष की अवधि का हो। मेधावी विद्यार्थियों के लिये पास-कोर्स से भिन्न ऑनर्स-कोर्स का प्रावधान किया जाये।

(4.) कलकत्ता विश्वविद्यालय को वास्तविक अध्यापन विश्वविद्यालय बनाने के लिये पूर्णकालिक प्रोफसरों एवं व्याख्याताओं की नियुक्ति की जाये।

(5.) विश्वविद्यालय स्तर पर स्त्री शिक्षा के विस्तार हेतु कलकत्ता विश्वविद्यालय में विशेष महिला शिक्षा बोर्ड स्थापित किया जाये।

(6.) कलकत्ता विश्वविद्यालय का नियंत्रण भारत सरकार के स्थान पर बंगाल सरकार को स्थानांतरित किया जाये।

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का पांचवा चरण (1919-47 ई.)

द्वैध शासन के अंतर्गत शिक्षा (1919-1937 ई.)

1919 के मोंटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार एक्ट के अंतर्गत प्रांतीय सरकारों को शिक्षा विभाग हस्तांतरित किये गये। केन्द्र में शिक्षा का नियंत्रण केन्द्र सरकार के पास था। इस प्रकार शिक्षा का विषय, प्रांतीय सरकार एवं केन्द्रीय सरकार दोनों के पास होने से शिक्षा नीति में द्वैधता उत्पन्न हो गई।

मोंटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार एक्ट लागू होने के बाद केन्द्र सरकार द्वारा प्रांतों को शिक्षा के लिये दिया जाने वाला अनुदान बंद कर दिया गया। इससे प्रांतीय सरकारों को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा। इस काल में स्वयं सेवी संस्थाओं ने प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा को आगे बढ़ाया।

1929 ई. में सरकार ने हार्टोंग समिति को शिक्षा पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये कहा। समिति ने अपने प्रतिवेदन में तीन प्रमुख बातें कहीं-

(1.) प्राथमिक शिक्षा पर जोर देना महत्त्वपूर्ण है किंतु इसके विस्तार में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिये। उसे अनिवार्य भी नहीं बनाया जाना चाहिये।

(2.) विश्वविद्यालयों में योग्य छात्रों को ही प्रवेश दिया जाये। इसलिये मिडिल के बाद अधिकांश छात्रों को रोजगारोन्मुख शिक्षा में भेजा जाना चाहिये।

(3.) विश्वविद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट का कारण विद्यार्थियों को बिना चयन प्रवेश देना है। विश्वविद्यालय में प्रवेश केवल योग्य छात्रों को दिया जाना चाहिये।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारतीय शिक्षा (1939-1945 ई.)

1939-1945 ई. तक द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। 1944 ई. में भारतीय असंतोष को शांत करने के उद्देश्य से सरकार ने अपने शैक्षणिक सलाहकार सर जॉन सरजेण्ट से एक शिक्षा योजना तैयार करवाई जिसे सरजेण्ट योजना के नाम से जाना जाता है।

इस योजना में 6 से 11 वर्ष के बच्चों को सार्वभौम, व्यापक, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान किया गया। इस योजना में दो तरह के हाई-स्कूलों का प्रावधान रखा गया प्रथम सैद्धांतिक एवं साहित्यिक तथा दूसरे तकनीकी अथवा रोजगार परक। विद्यालयों का संचालन सरकारी धन से किये जाने की व्यवस्था का अनुमोदन किया गया।

यह अनुमान लगाया गया कि इस कार्य पर प्रतिवर्ष लगभग 200 करोड़ रुपये व्यय होंगे एवं यह योजना 40 वर्षों में कार्यान्वित होगी। देश में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन के कारण यह योजना कार्यान्वित नहीं हो सकी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख- भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

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तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...