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हड़प्पा सभ्यता (अध्याय 4)

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हड़प्पा सभ्यता - www.bharatkaitihas.com
हड़प्पा सभ्यता

इस अध्याय में हड़प्पा सभ्यता की शुरुआत, उसकी प्रमुख विशेषताएं, नगर नियोजन तथा पतन आदि का इतिहास लिखा गया है। हड़प्पा सभ्यता को सिंधुघाटी सभ्यता भी कहा जाता है।

सिन्धु-घाटी

सिन्धु नदी हिमालय पर्वत से निकलकर पंजाब तथा सिन्धु प्रदेश (अब पाकिस्तान में) से होती हुई अरब सागर में जाकर मिलती है। इस नदी के दोनों ओर के क्षेत्र को सिंधु घाटी कहते हैं। इस घाटी से एक अत्यंत विकसित सभ्यता का पता लगा है। इसे सर्वप्रथम 1921 ई. में पश्चिमी पंजाब प्रांत के हड़प्पा नामक स्थान पर खोजा गया था।

हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा संस्कृति ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों से पुरानी थी फिर भी ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक विकसित थी। इस संस्कृति का उदय भारतीय उप-महाखंड के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ। इस बात का अभी ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है कि इस सभ्यता को जन्म देने वाले कौन लोग थे। इसलिये इस सभ्यता को किसी जाति-विशेष की सभ्यता अथवा काल विशेष की सभ्यता न कहकर, सिन्धु-घाटी की सभ्यता के नाम से पुकारा गया है।

कुछ विद्वान इसे प्रमुख नगरों हड़प्पा तथा मोहेन-जोदड़ो के नाम पर हड़प्पा तथा मोहेन-जोदड़ो की सभ्यता भी कहते हैं। इस सभ्यता के बारे में सर्वप्रथम जानकारी हड़प्पा नगर से प्राप्त हुई थी। इसलिये इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। हड़प्पा पश्चिमी पंजाब के मान्टगोमरी जिले और मोहेनजोदड़ो सिन्धु के लरकाना जिले में स्थित है। वर्तमान में ये दोनों नगर पाकिस्तान में हैं।

हड़प्पा सभ्यता का भौगोलिक विस्तार

हड़प्पा संस्कृति का विस्तार हरियाणा, पंजाब, सिन्ध, राजस्थान, गुजरात तथा बिलोचिस्तान के हिस्सों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती भाग तक था। इसका प्रसार उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने तक और पश्चिम में बिलोचिस्तान के मकरान समुद्रतट से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक था।

यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यह क्षेत्र आज के पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, साथ ही प्राचीन मिश्र और मेसीपोटामिया से भी बड़ा है। 3000 ई.पू. एवं 2000 ई.पू. में संसार का कोई भी अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।

हड़प्पा सभ्यता में सिंधु नदी का योगदान

सिंधु सभ्यता के नगरों की रक्षा के लिए खड़ी की गई पक्की ईटों की दीवारों से प्रकट होता है कि सिंधु नदी में हर साल बाढ़ आती थी। इस बाढ़ के साथ लाखों टन उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी बहकर आती थी। सिन्धु नदी, मिस्र की नील नदी की अपेक्षा कहीं अधिक जलोढ़ मिटटी ढोती थी और इसे बाढ़ के मैदानों में छोड़ती थी। नील ने जिस प्रकारमिस्र का निर्माण किया और वहाँ के लोगों का भरण-पोषण किया, उसी प्रकार सिन्धु नदी ने सिन्ध क्षेत्र का निर्माण किया और वहाँ के लोगों का भरण-पोषण किया।

हड़प्पा सभ्यता में सरस्वती नदी का योगदान

इतिहासकारों ने हड़प्पा सभ्यता को सिंधु सभ्यता कहकर पुकारा है जबकि इस सभ्यता के अब तक प्राप्त 1400 स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में मिले हैं। इस सभ्यता की दो प्रमुख राजधानियों में से हड़प्पा रावी के किनारे तथा मोहेनजोदड़ो सिंधु के किनारे स्थित है। इस बात की भी पर्याप्त संभावना है कि इस सभ्यता का उदय सिंधु नदी की घाटी में हुआ और बाद में इसका विस्तार सरस्वती नदी की घाटी में हुआ।

हड़प्पा सभ्यता की खोज

हड़प्पा टीले का सर्वप्रथम उल्लेख चार्ल्स मैसन ने किया था। इसके बाद डॉ. दयाराम साहनी ने 1821 ई. में हड़प्पा सभ्यता की खोज की। उसके बाद 1822 ई. में राखलदास बनर्जी की अध्यक्षता में इन दोनों स्थानों में खुदाइयाँ हुईं। आगे इसी स्थान पर जान मार्शल के नेतृत्व में हुई खुदाइयों में जो वस्तुएँ मिलीं, उनके अध्ययन से भारत की एक ऐसी सभ्यता का पता लगा है जो ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पहिले की है अर्थात् वैदिक कालीन सभ्यता से भी कहीं अधिक पुरानी।

सिन्धु नदी घाटी के प्रदेश में तथा कुछ अन्य स्थानों में भी खुदाइयाँ हुई हैं जहाँ से वही वस्तुएँ मिली हैं जो हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो से मिली थीं। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु-घाटी के सम्पूर्ण प्रदेश की सभ्यता एक-सी थी।

हड़प्पा सभ्यता के निर्माता

हड़प्पा सभ्यता के निर्माता कौन थे, इस विषय में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। विद्वानों की धारणा है कि सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही आर्य थे जिन्होंने वैदिक सभ्यता का निर्माण किया था परन्तु यह मत ठीक नही लगता क्योंकि सिन्धु-सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में इतना बड़ा अन्तर है कि एक ही जाति के लोग इन दोनों के निर्माता नहीं हो सकते।

कुछ विद्वानों के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता सुमेरियन जाति के थे। एक विद्वान के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही असुर थे जिसका वर्णन वेदों में मिलता है। प्रो. रामलखन बनर्जी के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता द्रविड़ थे।

चूँकि दक्षिण भारत के द्रविड़ों के मिट्टी और पत्थर तथा उनके आभूषण सिन्धु-घाटी के लोगों के बर्तन तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं, अतः यह मत अधिक ठीक प्रतीत होता है। परन्तु खुदाई में जो हड्डियाँ मिली हैं वे किसी एक जाति की नहीं होकर विभिन्न जातियों की हैं। इसलिये कुछ विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सिन्धु-घाटी के निर्माता मिश्रित जाति के थे। यही मत सर्वाधिक ठीक लगता है।

हड़प्पा सभ्यता का कालक्रम

सिन्धु-घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने इसे ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 4,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 3,000 वर्ष पूर्व और कुछ ने केवल 2,500 वर्ष पूर्व की बतलाया है परन्तु प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर इस सभ्यता को ईसा से 3,200 वर्ष पूर्व का सिद्ध किया गया है ।

डा. राधकुमुद मुकर्जी ने इसे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए लिखा है- सिन्धु-घाटी की सभ्यता का न तो मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है और न वह उसकी ऋणी है। अब यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि सिन्धु-सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यता है। डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर इसका समय 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. तक बताया है।

हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर

हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर पाये गये हैं-

(1.) प्रारंभिक काल (3500 ई.पू. से 2800 ई.पू.),

(2.) मध्यकाल या चरमोत्कर्ष काल (2800 ई.पू. से 2200 ई.पू.) तथा

(3.) अवनति काल (2200 ई.पू. से 1500 ई.पू.)

कांस्य कालीन सभ्यता

यह सभ्यता प्रधानतः कांस्य कालीन सभ्यता थी तथा उस काल के तृतीय चरण की सभ्यता है। इसका गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करने पर इसमें कांस्य-काल की चरमोन्नति दिखाई देती है। कांस्य कालीन सभ्यता कालक्रम के अनुसार ताम्र कालीन सभ्यता के बाद की तथा लौह कालीन सभ्यता के पूर्व की ठहरती है।

समकालीन सभ्यताओं से सम्पर्क

हड़प्पा सभ्यता का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा। ये लोग पहिये वाली बैलगाड़ियों एवं जल-नौकाओं का उपयोग करते थे। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का भी उपयोग करते थे। इस कारण अन्य स्थानों के लिये इनका आवागमन एवं परिवहन पहले की सभ्यताओं की तुलना में अधिक सुगम था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती होंगी और उन देशों से हड़प्पावासियों के व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। सोना, चांदी, ताम्बा आदि सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलता था।

इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते होंगे। हड़प्पावासी ताम्बा राजस्थान से, सीपी और शंख काठियावाड़ से तथा देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते होंगे।

अनुमान है कि हड़प्पा संस्कृति के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान की मानव बस्तियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं।

अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पावासियों ने अपनाया था। लगभग 2350 ई.पू. से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुह्द के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

हड़प्पा संस्कृति के प्रमुख स्थल

हड़प्पा संस्कृति के 1400 से भी अधिक स्थलों का उद्घाटन हो चुका है। इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में थे। अब तक ज्ञात स्थलों में से केवल छः स्थलों को ही नगर माना जाता है। इन नगरों में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थे- पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहेनजोदड़ो।

इन दोनों स्थलों के बीच 483 किलोमीटर की दूरी है और सिन्धु नदी इन्हें एक दूसरे से जोड़ती है। तीसरा नगर सिन्ध प्रांत में चहुन्दड़ो है जो मोहेनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में है। चौथा नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थान पर है।

पांचवा नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर तथा छठा नगर हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली नामक स्थल पर है। कालीबंगा की तरह यहाँ भी दो सांस्कृतिक अवस्थाओं- हड़प्पा पूर्व सभ्यता और हड़प्पा-कालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। बिना पकी ईटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा-पूर्व युग के हैं।

इन समस्त स्थलों पर उन्नत और समृद्ध हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुत्कांगडोर और सुरकोटड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति के उन्नत रूप के दर्शन होते हैं जहाँ नगर दुर्ग स्थित हैं। गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी, कच्छ क्षेत्र में धौलावीरा, नामक स्थलों पर इस संस्कृति की उत्तरावस्था के दर्शन होते हैं। हरियाणा में राखीगढ़ी तथा कुणाल एवं उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर में भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

हड़प्पा

इस नगर के अवशेष रावी नदी के बायें तट पर मोंटमोगरी जिले से 25 किलोमीटर दूर प्राप्त हुए हैं। ये अवशेष 5 किलोमीटर के घेरे में उपलब्ध हुए हैं। यहाँ पर दो प्रमुख टीले मिले हैं। पश्चिम में दुर्ग टीला तथा पूर्व में नगर टीला स्थित है। हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा प्राचीर से घिरा हुआ था।

हड़प्पा के दुर्ग के बाहर 6 मीटर ऊँचे टीले को एफ नाम दिया गया है जहाँ पर अन्नागार, अनाज कूटने के वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं। हड़प्पा से प्राप्त विशिष्ट अवशेषों में मृद्भाण्ड, ताम्बे और कांसे के उपकरण, पकाई हुई ईंटों की आकृतियां तथा अलग-अलग आकार की मुहरें प्राप्त हुई हैं। यहाँ से ताम्बे की बनी एक इक्कागाड़ी मिली है। हड़़प्पा में मोहेनजोदड़े के विपरीत, पुरुष मूर्तियां, नारी मूर्तियों की तुलना में अधिक हैं।

मोहेनजोदड़ो

मोहनजोदड़ो शब्द, सिंधी भाषा के ‘मुएन जो दड़ो’ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है- मृतकांे का टीला। इसकी खोज 1922 ई. में राखालदास बनर्जी ने की थी। यह पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है।

यहाँ पर भी दो टीले मिले हैं- दुर्ग टीला तथा नगर टीला। दुर्ग टीले में अनेक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्मारक एवं भवन स्थित थे, जैसे- विशाल स्नानागार, अन्नागार, सभाभवन। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण भवन विशाल स्नानागार है। नगर भाग में योजनबद्ध विधि से बने हुए भवन मिलते हैं। यहाँ से कांसे की नग्न नृत्यांगना की प्रतिमा प्राप्त हुई है। मोहेनजोदड़ो से प्राप्त नगर-निर्माण योजना, भवन, मृदभाण्ड, मोहरें तथा अन्य कलाकृतियां अत्यंत विकसित सभ्यता की सूचक हैं।

कालीबंगा

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे पर स्थित कालीबंगा सिंधु सभ्यता का प्रमुख स्थल है। इसकी खोज 1951 ई. में अमलानंद घोष ने की थी। कालीबंगा से प्राक् सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।इस स्थल से जुते हुए खेत का प्रमाण भी मिला है जो और कहीं से प्राप्त नहीं किया जा सका है।

कालीबंगा से लघुपाषाण उपकरण, माणिक एवं मनके, छः विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिले हैं। कालीबंगा से प्राप्त एक मृद्भाण्ड के टुकड़़े पर लिखे लेख के चिह्नों से यह ज्ञात होता है कि हड़प्पा लिपि दायें से बायीं ओर लिखी जाती थी। यहाँ से बड़ी संख्या में मिट्टी से निर्मित एवं आग में पकाई हुई चूड़ियों के टुकड़़े मिले हैं। इन्हीं चूड़ियों के कारण इस स्थान के नाम में बंगा शब्द लगा हुआ है।

लोथल

लोथल, सिंधु सभ्यता का महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था। इसकी खोज 1954 ई. में एस. आर. राव ने की थी। यह स्थल गुजरात प्रांत के अहमदाबाद नगर से 80 किलोमीटर दक्षिण में भोगवा नदी के तट पर स्थित है। लोथल का टीला 3.25 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

इस स्थल से सिंधु सभ्यता के विशिष्ट मृद्भाण्ड, उपकरण, मोहरें, बाट तथा माप भी प्राप्त हुए हैं। लोथल के पूर्वी भाग में पकाई हुई ईंटों से बना हुआ एक निर्माण क्षेत्र है जिसका आधार 214 मीटर गुणा 36 मीटर गुणा 3.3 मीटर है। इसकी पहचान पुरतत्वविदों ने बंदरगाह के हिस्से ‘गोदी’ अर्थात् डॉकयार्ड के रूप में की है।

हड़प्पा संस्कृति की विशेषताएँ

नगर योजना

हड़प्पा संस्कृति की प्रमुख विशेषता इसकी नगर-योजना थी। हड़प्पा और मोहेनजोदड़ो, दोनों नगरों के अपने दुर्ग थे जहाँ सम्भवतः शासक-वर्ग के सदस्य रहते थे। खुदाइयों से पता लगाा है कि हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो दोनों ही विशाल नगर थे। इन नगरों का निर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार किया गया था।

नगरों की सड़कें उत्तर से दक्षिण को अथवा पूर्व से पश्चिम को, एक दूसरे को सीधे समकोण पर काटती हुई जाती थीं। इस प्रकार इन सड़कों द्वारा नगर कई वर्गाकार अथवा आयताकार भागों में विभक्त हो जाता था। सड़कें बड़ी चौड़ी होती थीं। नगर की प्रमुख सड़कें 33 फीट तक चौड़ी पाई गई हैं जिससे स्पष्ट है कि सड़कों पर एक साथ कई गाड़ियाँ आ-जा सकती थीं।

बड़ी-बड़ी सड़कों को मिलाने वाली गलियाँ भी काफी चौड़ी होती थीं। जो गलियाँ कम-से-कम चौड़ी होती थीं उनकी भी चौड़ाई चार फीट की पाई गयी है। आश्चर्य की बात है कि ये सड़कें कच्ची हैं। प्रत्येक नगर में दुर्ग के बाहर निचले स्तर पर ईटों के भवनों वाला नगर बसा था, जहाँ सामान्य लोग रहते थे। नगरों के इन भवनों के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह बसाए गए थे। यह बात सिंधु बस्तियों के समस्त स्थलों पर लागू होती है, चाहे वे बड़े स्थल हों अथवा छोटे।

भवन निर्माण

सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। ईटें लकड़ी से पकाई जाती थीं। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग होना एक अदभुत बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में मुख्यतः धूप में सुखाई गई ईटों का उपयोग होता था।

समकालीन मैसोपोटामिया में भी सीमित मात्रा में पकाई हुई ईटों का उपयोग होता था किन्तु हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर हुआ है। अधिकांश भवन दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे।

नीचे की मंजिल से ऊपर की मंजिल में जाने के लिये सीढ़ियाँ बनी होती थीं। अधिकांश सीढ़ियाँ संकीर्ण हैं परन्तु कुछ काफी चौड़ी तथा सुविधाजनक भी हैं। बड़े मकानों के दरवाजे बड़े तथा चौडे़ होते थे। कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े थे कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ-जा सकती थीं।

कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कमरों में खूंटियाँ भी लगी होती थीं। भवन में खिड़कियों तथा दरवाजों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा तथा प्रकाश की कमी न हो। दरवाजे तथा खिड़कियां भीतर की दीवारों में बने होते थे।

जो दीवारें सार्वजनिक सड़कों की ओर होती थीं, उनमें दरवाजे तथा खिड़कियाँ नही होती थीं। घर के बीच में एक आंगन होता था जिसके एक कोने में रसोईघर बना होता था। रसोईघर के चूल्हे ईटों के बने होते थे।

धान्य संग्रहण

मोहेनजोदड़ो का सबसे बड़ा भवन यहाँ का धान्य-कोठार है जो 45.71 मीटर लंबा और 15.23 मीटर चौड़ा है। हड़प्पा के दुर्ग में छः धान्य-कोठारों के लिए ईटों के चबूतरे बनाए गए थे। प्रत्येक धान्य-कोठार 15.23 मीटर लंबा और 6.09 मीटर चौड़ा है। ये नदी तट से चंद मीटरों की दूरी पर थे।

इन बारह इकाइयों का समूचा तलक्षेत्र लगभग 838.1025 वर्गमीटर होता है। यह लगभग उतना ही क्षेत्र है जितना कि मोहेनजोदड़ो के विशाल धान्य-कोठार का। हड़प्पा के धान्य कोठारों के दक्षिण में खुला फर्श है और इस पर दो कतारों में ईटों के वृत्ताकार चबूतरे बने हुए हैं। इनका उपयोग फसल दाबने के लिए होता होगा।

इन चूबतरों के फर्श की दरारों में गेहूँ और जौ के दाने मिले हैं। हड़प्पा में दो कमरों वाले बैरक भी बनाए गए थे, जो सम्भवतः मजदूरों के रहने के लिए थे। कालीबंगा में भी नगर के दक्षिणी भाग में ईटों के चबूतरे मिले हैं। इनका सम्बन्ध भी धान्य-कोठारों से रहा होगा। अतः अनुमान होता है कि धान्य-कोठार हड़प्पा संस्कृति के नगरों के महत्त्वपूर्ण अंग थे।

कुओं का प्रबन्ध

घरों एवं मानव बस्तियों में सुगमता से जल प्राप्त करने के लिए सिन्धु-घाटी के लोगों ने कुओं का प्रबन्ध किया था। खुदाई में ऐसे कुएँ मिले हैं जिनकी चौड़ाई दो फीट से सात फीट तक है। सार्वजनिक कुओं के साथ-साथ लोग अपने घरों में व्यक्तिगत उपयोग के लिए भी कुएँ बनवाते थे। कालीबंगा के अनेक घरों में कुएं खुदे हुए थे।

सार्वजनिक जलाशय तथा स्नानागार

मोहेनजोदड़ो के दुर्ग की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय मिला है। ईंटों के स्थापत्य का यह एक सुंदर नमूना है। यह स्नानागार 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें बड़ी मजबूत हैं। जलाशय के चारों और एक बारामदा है जिसकी चौड़ाई 5 मीटर है।

जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इन स्नानागारों के ऊपर कमरे बने हुए थे जिनमें सम्भवतः पुजारी रहते थे। जलाशय के निकट एक कुआं भी मिला है। सम्भवतः इसी कुएँ के पानी से जलाशय को भरा जाता था। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे।

जलाशय के दोनों सिरों पर स्नानागार की सतह तक सीढ़ियां बनी हुई हैं। अनुमान है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था। आज भी भारत के धार्मिक कृत्यों में ऐसे स्नान का बड़ा महत्त्व है।

जल निकास प्रणाली

मोहेनजोदड़ो की जल-निकास प्रणाली बड़ी प्रभावशाली थी। घरों का पानी बाहर सड़कों तक आता था जहाँ इनके नीचे मोरियां बनी हुई थीं। कम चौड़ी नालियाँ ईटों से और अधिक चौड़ी नालियाँ पत्थर के टुकड़ों से ढँकी जाती थी। ईटों को जोड़ने के लिए मिट्टी मिले चूने का प्रयोग किया जाता था।

ऊपर की मंजिल का गन्दा पानी नीचे लाने के लिए मिट्टी के पाइपों का प्रयोग किया जाता था। सड़कों की इन नालियों में नरमोखे (मेन होल) भी बनाए गए थे। सड़कों और नालियों के अवशेष बनवाली में भी मिले हैं। यह निकास-प्रणाली, भवनों में स्नानकक्षों और मोरियों की व्यवस्था अनोखी है। हड़प्पा की निकास-प्रणाली तो और भी विलक्षण है।

सफाई व्यवस्था

हड़प्पा सभ्यता की सफाई व्यवस्था बहुत प्रभावशाली थी। प्रत्येक घर में एक स्नानागार होता था। इन स्नानागारों में मिट्टी के बर्तनों में पानी रखा रहता था। स्नानागारों का फर्श, पक्की ईटों का बना होता था और उसकी सफाई का बड़ा ध्यान रखा जाता था। बहुत से स्नानागारों के समीप शौचालय भी मिले हैं। सम्भवतः किसी भी दूसरी सभ्यता ने स्वास्थ्य और सफाई को इतना महत्त्व नहीं दिया जितना कि हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने दिया था।

नगर की सुरक्षा का प्रबन्ध

हड़प्पा सभ्यता के लोग अपने नगरों को शत्रुओं से सुरक्षित रहने के लिए नगर के चारों और खाई तथा दीवार का भी प्रबन्ध करते थे। यह चहारदीवारी सम्भवतः दुर्ग का भी काम देती थी।

सामाजिक जीवन

हड़प्पा सभ्यता सामाजिक तथा आर्थिक साम्य-प्रधान सभ्यता थी। इस सभ्यता में लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली होने के संकेत मिलते हैं। इस कारण इस सभ्यता में समानता का आभास मिलता है। इस सभ्यता के लोगों में बहुत बड़ा सामाजिक तथा धार्मिक वैषम्य नहीं होना अनुमानित किया जाता है। हड़प्पा, मोहेनजोदड़ो, अमरी, चन्हूदड़ो तथा झूकरदड़ो आदि स्थानों में उत्खनन के फलस्वरूप प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन से हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक जीवन पर विस्तार से प्रकाश पड़ता है-

(1) नगर तथा व्यापार-प्रधान सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता नगरीय तथा व्यापार-प्रधान सभ्यता थी जिसमें बड़े-बड़े नगरों की स्थापना की गयी थी और अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किया गया था।

(2) समाज का सगंठन

मोहेनजोदड़ो के उत्खनन से ज्ञात होता है कि सिन्धु-घाटी के लोगों का समाज चार वर्गों में विभक्त था। पहला वर्ग विद्वानों का था जिसमें पुजारी, वैद्य, ज्योतिषी आते थे। दूसरे वर्ग में योद्धा थे जिनका कर्त्तव्य समाज की रक्षा करना होता था। तीसरे वर्ग में व्यवसायी थे। ये लोग विभिन्न प्रकार के उद्योग-धन्धे करते थे। चौथे वर्ग में घरेलू नौकर तथा मजदूर थे।

(3) भोजन

खुदाई में गेहूँ, जौ, चावल तथा खजूर आदि के बीज मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि यही वस्तुएँ सिन्धु-घाटी के लोग खाते रहे होंगे। खुदाई में कुछ अधजली हड्डियाँ तथा छिलके भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये लोग मछली, मांस, अंडे आदि का प्रयोग करते थे। साथ ही फल, दूध तथा तरकारी का भी प्रयोग करते थे।

(4) केश विन्यास

सिन्धु-घाटी के निवासी छोटी दाढ़ी तथा मूँछें रखते थे परन्तु कुछ लोग मूँछें मुंडवाते भी थे। कुछ लोगों के बाल छोटे होते थे और कुछ लोगों के लम्बे। जिन लोगों के बाल लम्बे होते थे वे चोटी बांधते थे। ये लोग बालों में कंघी करते थे और पीछे की ओर फेरे रहते थे।

(5) वेश-भूषा

सिन्धु-घाटी के लोग ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। उनके वस्त्र साधारण हुआ करते थे। खुदाई में एक पुरुष की मूर्ति मिली है जिसमें वह एक शॉल ओढ़े हुए है। शॉल बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी कांख के नीचे जाता है। विद्वानों का अनुमान है कि इनके दो मुख्य वस्त्र रहे होंगे।

एक शरीर के नीचे के भाग को ढँकने के लिए और दूसरा ऊपर के भाग के लिए। हड़प्पा की खुदाई में मिली सामग्री से अनुमान होता है कि स्त्रियाँ सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहिनती थीं जो सिर के पीछे की ओर पंखे की तरह उठा रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों तथा पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं होता था।

(6) आभूषण एवं सौंदर्य प्रसाधन

सिन्धु-घाटी के लोग विभिन्न प्रकार के आभूषणों का प्रयोग करते थे। स्त्री-पुरुष दानों ही हार, भुज-बन्द, कंगन तथा अंगूठी पहिनते थे। स्त्रियाँ करधनी, नथुनी, बाली तथा पायजेब पहिनती थीं। धनी लोगों के आभूषण सोने, चांदी तथा जवाहरात के बने होते थे परन्तु गरीबों के आभूषण ताम्बे, हड्डी तथा पकी हुई मिट्टी से बनते थे। पीतल के दर्पण तथा हाथी दाँत की कंघियाँ भी खुदाई में मिली हैं। ओष्ठ पर लगाने के लिए लेपन-पदार्थ भी होता था।

(7) आमोद-प्रमोद के साधन

इन लोगों के आमोद-प्रमोद का प्रधान साधन शिकार था। ये लोग धनुष-बाण से जंगली बकरों तथा हिरनों का शिकार करते थे। चिड़ियों को पाला तथा उड़ाया जाता था। बच्चे मिट्टी की वस्तुएँ बना कर खेलते थे। हड़प्पा सभ्यता में शतरंज तथा जुआ भी खेला जाता था। मुर्गों तथा बैलों को लड़ाया जाता था। इन लोगों को नाचने गाने का भी शौक था।

(8) खिलौने

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में विभिन्न प्रकार के खिलौने मिले हैं। बच्चों को मिट्टी की छोटी-छोटी गाड़ियों से खेलने का बड़ा शौक था। मनुष्य तथा पशुओं के आकार के विभिन्न प्रकार के खिलौने बच्चों के खेलने के लिए बनाये जाते थे। चिड़ियों के भी खिलौने होते थे। बच्चों के बजाने के लिए भोंपू भी बनाये जाते थे।

(9) यातायात के साधन

सिन्धु-घाटी के लोग कच्ची सड़कें बनाते थे। खुदाइयों से पता लगता है कि बैलगाड़ी मुख्य सवारी होती थी। हड़प्पा में एक ताम्बे का वाहन मिला है जो इक्के के आकार का है। नौकाएं भी यातायात एवं परिवहन का साधन थीं।

(10) स्त्रियों की दशा

हड़प्पा सभ्यता का मानव मातृ देवी की पूजा करता था। इससे अनुमान होता है कि हड़प्पा समाज में स्त्रियाँ बड़े आदर की दृष्टि से देखी जाती थीं और माता के रूप में स्त्री का ऊँचा स्थान था। शिशु-पालन तथा घर का प्रबन्ध करना स्त्री का प्रधान कार्य होता था। इस युग में सम्भवतः पर्दे की प्रथा नहीं थी। धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग मिòवासियों की तरह मातृसत्तात्मक थे या नहीं, इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

(11) औषधि

रोगों से मुक्ति पाने के लिए सिंधुवासी विभिन्न प्रकार की औषधियों का प्रयोग करते थे। आंख, कान आदि के रोगों में वे लोग मछली की हड्डियों का प्रयोग करते थे। हिरन के सींग, मूंगा तथा नीम की पत्ती का भी औषधि के रूप में प्रयोग होता था।

(12) शव-विसर्जन

मोहेनजोदड़ो की खुदाई से सर जॉन मार्शल ने शव-विसर्जन की तीन विधियों का पता लगाया। पहली विधि के अनुसार सम्पूर्ण मृतक शरीर को जमीन में गाड़ दिया जाता था। दूसरी विधि के अनुसार पशु-पक्षियों के खा लेने के उपरान्त जो हाड़-मांस बचता था वह जमीन में गाड़ दिया जाता था। तीसरी विधि यह थी कि मृत्यु के उपरान्त मृतक शरीर को जला दिया जाता था। प्रायः तीसरी ही विधि का अनुसरण किया जाता था।

आर्थिक जीवन

सिन्धु घाटी में वर्तमान में लगभग 15 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। इसलिए यह प्रदेश अधिक उपजाऊ नहीं है किंतु सिंधु सभ्यता के उत्खनन स्थलों को देखने से अनुमान होता है कि उस काल में यह प्रदेश अधिक उपजाऊ था। ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकंदर का एक समकालीन इतिहासकार जानकारी देता है कि सिन्ध क्षेत्र उपजाऊ प्रदेश था।

इससे भी पहले के काल में सिन्धु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति अधिक थी और इस कारण यहाँ वर्षा भी अधिक होती थी। इस कारण पूरे प्रदेश में घने जंगल थे जिनसे व्यापक स्तर पर जलाऊ लकड़ी प्राप्त की जाती थी। इस लकड़ी का उपयोग ईंटें पकाने, कृषि उपकरण बनाने, युद्ध के औजार बनाने तथा भवन बनाने में होता था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो जैसे विशाल तथा वैभवपूर्ण नगर जिस संस्कृति में विद्यमान थे वह निश्चय ही बड़ा सम्पन्न रहा होगा। चूंकि यह सभ्यता कृषि-प्रधान न थी इसलिये यहाँ के निवासियों का आर्थिक जीवन प्रमुखतः व्यापार तथा उद्योग-धन्धों पर आधारित था। व्यापार तथा उद्योग उन्नत दशा में था।

सिन्धु-वासियों का आर्थक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण तथा स्थानीकरण पर आधारित था। उनमें श्रम-विभाजन तथा संगठन की कल्पना की भी जा सकती है। एक प्रकार का व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे। यदि इस सभ्यता को औद्योगिक सभ्यता कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हड़प्पा सभ्यता में निम्नलिखित व्यवसाय तथा उद्योग-धन्धे होते थे-

(1) कृषि

सिन्धु सभ्यता के लोग सिंधु नदी में बाढ़ के उतर जाने पर नवंबर के महीने में बाढ़ के मैदानों में गेंहूू और जौ के बीज बो देते थे और आगामी बाढ़ आने से पहले, अप्रेल के महिने में गेंहूू और जौ की फसल काट लेते थे। इस क्षेत्र से कोई फावड़ा या फाल नहीं मिला है, परन्तु कालीबंगा में हड़प्पा-पूर्व अवस्था के जिन कूँडों की खोज हुई है, उनसे पता चलता है कि हड़प्पा-काल में राजस्थान के खेतों में हल जोते जाते थे।

हड़प्पा संस्कृति के लोग सम्भवतः लकड़ी के हल का उपयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे या बैल, इस बात का पता नहीं चलता। फसल काटने के लिए पत्थर के हँसियों का उपयोग होता होगा। गबरबंदों अथवा नालों को बांधों से घेरकर जलाशय बनाने की बिलोचिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में प्रथा रही है, परन्तु अनुमान होता है कि सिन्धु सभ्यता में नहरों से सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी।

हड़प्पा संस्कृति के गांव, जो प्रायः बाढ़ के मैदानों के समीप बसे होते थे, न केवल अपनी आवश्यकता के लिए अपितु नगरों में रहने वाले कारीगरों, व्यापारियों और दूसरे नागरिकों के लिए भी पर्याप्त अनाज पैदा करते थे।

सिन्धु सभ्यता के किसान गेहूँ, जौ, राई, मटर, आदि पैदा करते थे। वेे दो किस्मों का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनवाली से बढ़िया किस्म का जौ मिला है। वे तिल और सरसों भी पैदा करते थे। हड़प्पा-कालीन लोथल के लोग 1800 ई.पू. में भी चावल का उपयोग करते थे। लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं।

मोहेनजोदड़ो, हड़प्पा और सम्भवतः कालीबंगा में भी विशाल धान्य कोठारों में अनाज जमा किया जाता था। किसानों से सम्भवतः करों के रूप में यह अनाज प्राप्त किया जाता था और पारिश्रमिक के रूप में धान्य-कोठारों से इसका वितरण होता था।

यह बात हम मेसोपोटामिया के नगरों के सादृश्य के आधार पर कह सकते हैं जहाँ पारिश्रमिक का भुगतान जौ के रूप में होता था। सिन्धु सभ्यता के लोग कपास पैदा करने वाले सबसे पुराने लोगों में से थे। इसीलिए यूनानियों ने कपास को सिंडोन नाम दिया जिसकी व्युत्पत्ति सिन्ध शब्द से हुई है।

(2) शिकार

सिन्धु-घाटी के लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी थे। वे मांस, मछली तथा अंडे आदि का प्रयोग करते थे। मांस प्राप्त करने के लिये वे पशुओं का शिकार करते थे। पशुओं के बाल, खाल तथा हड्डी से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(3) पशुपालन

सिन्धु सभ्यता के लोग खेती करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पशु पालते थे। खुदाई से प्राप्त मुहरों पर पशुओं के चित्र मिले हैं उनसे ज्ञात होता है कि गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, कुत्ता और सूअर उनके पालतू पशु थे। सिन्धुवासियों को बड़े कूबड़ वाला सांड विशेष रूप से पसंद था। आरम्भ से ही कुत्ते दुलारे पशु थे।

बिल्ल्यिों को भी पालतू बना लिया गया था। कुत्ता और बिल्ली, दोनों के पैरांे के निशान मिले हैं। बैलों और गधों का उपयोग भारवहन के लिए होता था। आश्चर्य की बात है कि खुदाई में ऊँट की हड्डियाँ नही मिली हैं। घोड़े के अस्तित्त्व के बारे में भी केवल तीन प्रमाण मिले हैं।

मोहेनजोदड़ो की एक ऊपरी सतह से और लोथल से एक-एक संदिग्ध लघु मूण्मूर्ति मिली है जिसे घोड़े की मूर्ति कहा जा सकता है। घोड़े के अवशेष, जो 2000 ई.पू. के आसपास के हैं, गुजरात के सुरकोटड़ा नामक स्थान से मिले हैं। अनुमान होता है कि हड़प्पा-काल में ऊँट तथा घोड़े का उपयोग आम तौर पर नहीं होता था।

हड़प्पा संस्कृति के लोग हाथी तथा गेंडे से भली-भांति परिचित थे। मेसोपोटामिया के समकालीन सुमेर सभ्यता के नगरों के लोग भी प्रायः सिन्धु प्रदेश जैसे ही अनाज पैदा करते थे और उनके पालतू पशु भी प्रायः वही थे जो हड़प्पा संस्कृति वालों के थे परन्तु गुजरात में बसे हुए हड़प्पा संस्कृति के लोग चावल पैदा करते थे और पालतू हाथी भी रखते थे। मेसोपोटामिया के नगरवासियों के लिए ये दोनों बातें सम्भव नहीं थी।

(4) शिल्प तथा व्यवसाय

हड़प्पा संस्कृति कांस्य-युग की है। हड़प्पा सभ्यता का मानव कुशल शिल्पी तथा व्यसायी था। हड़प्पावासी पत्थर के अनेक प्रकार के औजारों का उपयोग करते थे। वे कांस्य के निर्माण और उपयोग से भी भली-भांति परिचित थे। धातुकर्मी तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे।

चूँकि हड़प्पावासियों के लिए ये दोनों धातुएं सुलभ नहीं थीं। इसलिए हड़प्पा में कांस्य-वस्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं हुआ। खनिजों के मिश्रणों से पता चलता है कि तांबा राजस्थान में खेतड़ी कीे खानों से प्राप्त किया जाता था। यद्यपि यह बिलोचिस्तान से भी मंगाया जा सकता था।

टिन बड़ी कठिनाई से सम्भवतः अफगानिस्तान से प्राप्त किया जाता था। टिन की कुछ पुरानी खदानें बिहार के हजारी बाग में पाई गई हैं। हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से कांसे के जो औजार और हथियार मिले हैं उनमें टिन का अनुपात कम है। फिर भी इस सभ्यता से बहुत सारी कांस्य वस्तुएँ मिली हैं, जिनसे स्पष्ट है कि हड़प्पा समाज के कारीगरों में कसेरों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने मूर्तियां और बर्तन ही नहीं, विविध प्रकार के औजार और कुल्हाड़ियां, आरियां, छुरे और भाले जैसे हथियार भी बनाए।

हड़प्पा संस्कृति के नगरों में दूसरे कई शिल्पों का विकास हुआ। मोहेनजोदड़ो से बुने हुए सूती कपड़़े का एक टुकड़़ा मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़़े के छापे देखने को मिले हैं। कताई के लिए तकलियों का उपयोग होता था। बुनकर सूती और ऊनी कपड़़ा बुनते थे।

ईटों की विशाल ईमारतों से ज्ञात होता है कि राजगीरी एक महत्त्वपूर्ण कौशल था। इनसे राजगीरों के एक वर्ग के अस्तित्त्व की भी सूचना मिलती है। हड़प्पा संस्कृति के लोग नौकाएं बनाना जानते थे। मुहरें और मृण्मूर्तियां बनाना महत्त्वपूर्ण शिल्प-व्यवसाय थे। सुनार, चांदी, सोना और कीमती पत्थरों के आभूषण बनाते थे।

चांदी और सोना अफगानिस्तान से आता होगा और कीमती पत्थर दक्षिणी भारत से। हड़प्पा संस्कृति के कारीगर मणियों के निर्माण में भी निपुण थे। कुम्हार के चाक का खूब उपयोग होता था। उनके मिट्टी के बर्तनों की अपनी विशेषता थी। बर्तनों को चिकना और चमकीला बनाया जाता था। उन पर चित्रकारी की जाती थी।  हाथी-दाँत की भी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(5) व्यापार

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। अतः यह अनुमान लगाया गया है कि ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती थीं और इन लोगों का विदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। सोना, चांदी, ताम्बा आदि सिन्धु-प्रदेश में नही मिलता था। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते थे। यहाँ के निवासी सम्भवतः ताम्बा राजपूताना से, सीपी, शंख आदि काठियावाड़ से और देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते थे।

हड़प्पा संस्कृति का मानव धातु की मुद्राओं का उपयोग नहीं करता था। बहुत सम्भव है कि व्यापार वस्तु-विनियम से चलता था। निर्मित वस्तुओं और सम्भवतः अनाज के बदले में वह पड़ोसी प्रदेशों से धातुएं प्राप्त करता था और उन्हें नौकाओं तथा बैलगाड़ियों से ढोकर लाता था।

अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। वह पहिए का उपयोग जानता था। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का उपयोग करते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पा वासियों ने अपनाया था।

लगभग 2350 ई.पू. से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुद्दह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

(6) नाप तथा तौल

खुदाई में बाट बहुत बड़ी संख्या में मिले हैं। कुछ बाट तो इतने बड़े हैं कि वे रस्सी से उठाये जाते रहे होगे और कुछ इतने छोटे हैं कि उनका प्रयोग जौहरी करते होंगे। अधिकांश बाट घनाकार हुआ करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि लम्बाई नापने के लिये फुट होता था। क्योंकि मोहेनजोदड़ो की खुदाई में सीपी का बना हुआ एक फुट के बराबर माप का टुकड़ा मिला है। हड़प्पा में कांसे की बनी एक शलाका मिली है जिस पर छोटे-छोटे भाग अंकित हैं। यह भी फुट ही प्रतीत होता है। तौलने के लिए तराजू का प्रयोग किया जाता था।

धार्मिक जीवन

खुदाई में जो मुहरें, ताम्र-पत्र तथा पत्थर, मिट्टी एवं धातु की मूर्तियाँ मिली हैं उनसे सिन्धु-घाटी के निवासियों के धार्मिक जीवन की काफी जानकारी हो जाती है। इन साक्ष्यों से इन लोगों के धार्मिक जीवन पर निम्नलिखित प्रकाश पड़ता है-

(1) द्विदेववाद

सिन्धु-घाटी के लोग दो परम शक्तियों में विश्वास करते थे। एक शक्ति परम-पुरुष की थी और दूसरी परम-नारी की। यही दोनों शक्तियाँ सृष्टि की रचना तथा उनका पालन करती थीं। इस प्रकार हिन्दू-धर्म के पार्वती-परमेश्वर का दर्शन हमें सिन्धु-घाटी में होता है।

(2) शिव की उपासना

हड़प्पा में एक ऐसी मुहर मिली है जिनमें एक ऐसे देवता की मूर्ति अंकित है जिसके तीन मुख और बड़े-बड़े सींग हैं। यह मूर्ति एक सिंहासन पर स्थित है और योग-मुद्रा में लीन है। देवता का एक पैर दूसरे पैर पर रखा हुआ है। यह देवता एक हाथी, एक बाघ और एक गैंडे से घिरा हुआ है और इसके सिंहासन के नीचे एक भैंस है। पैरों के नीचे दो हरिण हैं।

इस मुहर को देखने से हमारे मस्तिष्क में पशुपति-महादेव का परम्परागत चित्र उभरता है। देवता को घेरे हुए पशु, पृथ्वी की चार दिशाओं की ओर देख रहे हैं। ये पशु, उस देवता के वाहन रहे होंगे, क्योंकि बाद के हिन्दू धर्म में प्रत्येक देवता का एक विशिष्ट वाहन कल्पित किया गया है। सर जॉन मार्शल के विचार में यह शिव की मूर्ति है।

(3) महादेवी की उपासना

हड़प्पा की खुदाई में ऐसी मुहरें तथा लघु मृण्मूर्तियाँ मिली है जिसमें खड़ी हुई नारी का चित्र अंकित है। सर जॉन मार्शल के विचार में यह महादेवी का चित्र है जिसकी उपासना हड़प्पा सभ्यता के लोग किया करते थे। यही महादेवी आगे चल कर शक्ति हो गई जिसकी पूजा आज-भी हिन्दू लोग करते है।

(4) प्रजनन-शक्ति की उपासना

सिन्धु-घाटी के लोग प्रजनन-शक्ति की पूजा किया करते थे। खुदाई में पत्थर के ऐसे टुकड़े मिले है जो योनि तथा शिश्न प्रतीत होते है। सम्भवतः इनकी पूजा होती थी। कालान्तर में लिंग पूजा, शिव पूजा का अटूट अंग बन गई। ऋग्वेद में ऐसे आर्येतर लोगों के विषय में सूचना मिलती है जो लिंग पूजक (शिश्नदेवाः) थे। हड़प्पा युग में आरम्भ हुई यह लिंग-पूजा, हिन्दू समाज में एक सामान्य पूजा-विधि हो गई। विद्वानों की धारणा है सिन्धु-घाटी के लोग मूर्ति-पूजा में विश्वास रखते थे।

(5) धरती की पूजा

सिंधु सभ्यता से प्राप्त एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है। यह सम्भवतः धरती-देवी की मूर्ति है। पौधों की उत्पत्ति एवं विकास से इसका गहरा सम्बन्ध समझा जाता होगा। अनुमान होता है कि हड़प्पावासी धरती को उर्वरता की देवी समझकर उसकी पूजा करते थे जिस प्रकार मिò के लोग नील नदी की देवी आइसिस की पूजा करते थे।

(6) सूर्य, अग्नि तथा जल की पूजा

सिन्धु-घाटी के लोग विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक पदार्थो की भी पूजा किया करते थे। ये लोग सूर्य तथा अग्नि की पूजा किया करते थे। इन लोगों में जल-पूजा भी प्रचलित थी।

(7) वृक्ष पूजा

ये लोग कुछ वक्षों को भी पवित्र मानते थे तथा उनकी पूजा  करते थे। एक मुहर पर पीपल की टहनियों के बीच में किसी देवता की प्रतिमा उकेरी गई है। पीपल तथा तुलसी की पूजा आज भी हिन्दुओं में प्रचलित है।

(8) पशु पूजा

हड़प्पा सभ्यता के स्थलों की खुदाई में पशु-मूर्तियाँ भी मिली हैं। अनेक पशुओं को मुहरों पर अंकित किया गया है। इनमें सबसे प्रमुख है डिल्ले वाला या कूबड़ वाला सांड। आज भी ऐसा कोई सांड जब बाजार की सड़कों से गुजरता है तो श्रद्धालु भारतीय उसके लिए रास्ता छोड़ देते हैं। इसी प्रकार, सिन्धु मुहर पर अंकित पशुपति-महादेव को घेरे हुए पशुओं की भी पूजा होती होगी। हिन्दू धर्म में आज भी गाय को पवित्र एवं पूज्य माना जाता है।

(9) मंदिरों का अभाव

हड़प्पा सम्भ्यता का मानव वृक्ष, पशु और मानव रूप में देवताओं की पूजा करता था परन्तु वह देवताओं के लिए मंदिर नहीं बनाता था। जबकि हड़प्पा की समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया सभ्यताओं में मंदिर बनाये जाते थे।

(10) भूत-प्रेत में विश्वास

सैंधव स्थलों से बड़ी संख्या में ताबीज मिले हैं। हड़प्पावासी सम्भवतः भूत-प्रेत में विश्वास रखते थे और इनसे भय खाते थे, इसलिए रक्षात्मक ताबीज पहनते थे। अथर्ववेद में, जिसे आर्येतरों की कृति समझा जाता है, अनेक तंत्र-मंत्र दिए गए हैं, और इसमें रोगों और भूत-प्रेतों के निवारण के लिए ताबीज धारण करने का भी सुझाव दिया गया है।

(11) धार्मिक विश्वासों की जानकारी का अभाव

यद्यपि मुहरों, मूर्तियों और लिंगों के आधार पर हड़प्पा वासियों के धार्मिक विश्वासों के बारे में कई महत्त्वपूर्ण अनुमान लगा लिये गये हैं तथापि जब तक सिन्धु लिपि पढ़ी नहीं जाती, तब तक हड़प्पावासियों के धार्मिक विश्वासों के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल सकती।

(12) हिन्दू धर्म पर प्रभाव

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वर्तमान हिन्दू-धर्म पर हड़प्पा वासियों का काफी प्रभाव है। उनके द्वारा अपनाई गई बहुत सी परम्परायें आज भी प्रचलन में हैं तथा उस काल के देवताओं का पूजन आज भी हो रहा है।

कलाओं का विकास

सिन्धु-घाटी के लोगों ने विभिन्न प्रकार की कलाओें में भी बड़ी कुशलता प्राप्त कर ली थी। जिन कलाओं का इन लोगों ने विकास किया, वे निम्नलिखित थीं-

(1) लेखन-कला

यद्यपि इस कला का कोई लिखित पत्र, पत्थर अथवा मिट्टी का बर्तन नहीं मिला है परन्तु लगभग 550 ऐसी मुहरें मिली हैं जिन पर कुछ लिखा हुआ है। माना जाता है कि प्राचीन मेसोपोटामिया वासियों की तरह हड़प्पा वासियों ने भी लेखन-कला का आविष्कार किया था।

(अ.) लिपि

यद्यपि 1853 ईस्वी में ही प्राचीन सिन्धु लिपि के नमूने देखने को मिले थे और 1923 ईस्वी में इस लिपि के बारे में पूरी जानकारी मिल चुकी थी, फिर भी अभी तक इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है। इस लिपि में कुल 250 से 400 लिपि संकेत पहचाने गए हैं। प्रत्येक चित्र संकेत किसी ध्वनि, वस्तु अथवा विचार का द्योतक है। सिन्धु लिपि वर्णमालात्मक नहीं, अपितु भावचित्रात्मक है।

(ब.) भाषा

कुछ विद्वानों का मत है कि सिंधु लिपि में प्राक्द्रविड़ भाषा छिपी है। अन्य विद्वानों का मत है कि इसमें संस्कृत भाषा है और कुछ विद्वानों का  मत है कि इन लेखों की भाषा सुमेरी है। ये समस्त प्रयास अधूरे सिद्ध हुए हैं। मेसोपोटामिया और मिò आदि पश्चिम एशियाई सम्यताओं की समकालीन लिपियों के साथ सिंधु लिपि का मेल बिठाने के भी प्रयत्न हुए किंतु उसमें भी सफलता नहीं मिली। इससे सिद्ध होता है कि यह सिंधु प्रदेश की अपनी लिपि है जिसका स्वतंत्र रूप से विकास हुआ था।

(स.) लम्बे लेखों का अभाव

मिस्र अथवा मेसोपोटामिया में लम्बे अभिलेख मिले हैं किंतु हड़प्पा सभ्यता से लंबे अभिलेख नहीं मिले हैं। अधिकांश अभिलेख मुहरों पर उत्कीर्ण हैं और प्रत्येक लेख में चंद लिपि-संकेत हैं। अनुमान लगाया जाता है कि धनी लोग अपनी निजी सम्पत्ति पर पहचान के लिए इन मुहरों के छापे लगाते होंगे। चूँकि अभी तक सिन्धु लिपि को पढ़ पाने में सफलता नहीं मिली है, इसलिए हड़प्पा संस्कृति के साहित्य और उनके विचारों एवं विश्वासों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

(2) नृत्य तथा संगीत कला

सिन्धु-घाटी के लोग नाचनेे-गाने में बड़े कुशल थे। खुदाई में एक नर्तकी की मूर्ति मिली है। नर्तकी का शरीर नग्न है परन्तु उस पर बहुत से आभूषण बनाये गये हैं। इस मूर्ति के सिर के बालों को बड़ी उत्तमता से संवारा गया है। खुदाई में जो छोटे-छोटे बाजे मिले हैं उनसे भी यह ज्ञात होता है कि इस संस्कृृति के लोग संगीत-कला में रुचि रखते थे। तबले तथा ढोल के भी चिह्न कुछ स्थानों में मिले हैं।

(3) चित्रकारी

सिन्धु-घाटी के लोग चित्र-कला में बड़े कुशल थे। मुहरों की सबसे अच्छी चित्रकारी सांड तथा भैंसों की है। सांडों के चित्र अत्यन्त सजीव तथा सुन्दर हैं।

(4) मूर्ति-निर्माण-कला

सिन्धु-घाटी के लोग मूर्तियाँ बनाने में बड़े सिद्धहस्त थे। मूर्तियाँ मुलायम पत्थर तथा चट्टानों को काट कर बनाई जाती थीं। इन मूर्तियों की प्रमुख विशेषताएँ ये हैं कि इनके गालों की हड्डियाँ स्पष्ट रहती हैं। इनकी गर्दन छोटी, मोटी तथा मजबूत होती है और आंखें पतली तथा तिरछी होती हैं।

(5) पात्र-निर्माण-कला

सिन्धु-घाटी के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने की कला में निपुण थे। ये बर्तन चाक पर बनाये जाते थे और बड़े सादे होते थे। मिट्टी के विभिन्न प्रकार के खिलौने भी बनाये जाते थे।

(6) कताई तथा रंगाई कला

अनेक स्थलों की खुदाई में टेकुए तथा टेकुओं की मेखलाएँ मिली हैं, जिससे स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी के लोग सूत तथा ऊन कातने की कला में प्रवीण थे। वे कपड़़ों की रंगाई में बड़े कुशल होते थे।

(7) मुहर-निर्माण-कला

अनेक स्थलों की खुदाई में बहुत-सी मुहरें मिली हैं। ये मुहरें भिन्न-भिन्न प्रकार के पत्थरों, धातुओं, हाथी-दाँत तथा मिट्टी की बनी होती थीं। अधिकांश मुहरें वर्गाकार हैं जिन पर पशुओं के चित्र बने हैं और दूसरी ओर लेख लिखे हुए हैं।

(8) ताम्र-पत्र निर्माण कला

अनेक स्थलों की खुदाई में बहुत से ताम्र-पत्र मिले हैं। ये ताम्र-पत्र वर्गाकार एवं आयताकार हैं। इनमें एक ओर मनुष्य अथवा पशुओं के चित्र बने हैं और दूसरी ओर लेख लिखे हैं।

(9) धातु-कला

सिंधुवासी विभिन्न प्रकार की धातुओं से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं के बनाने में बड़े कुशल थे। मूल्यवान रत्नों को काट-छांट कर यह लोग आभूषण बनाते थे। सोने, चांदी, ताम्बे आदि के भी आभूषण बनाये जाते थे। शंख तथा सीप से भी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

राजनीतिक जीवन

खुदाई में जो वस्तुएँ मिली हैं उनसे हड़प्पा सभ्यता के लोगों के राजनीतिक जीवन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है परन्तु उनके राजनीतिक संगठन का अनुमान लगाना असंभव नहीं है।

(1) व्यापक राजनीतिक संगठन

ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्ध, पंजाब, पूर्वी-बिलोचिस्तान तथा काठियावाड़ तक विस्तृत सिन्धु-सभ्यता के क्षेत्र में एक संगठन, एक व्यवस्था तथा एक ही प्रकार का शासन था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र में एक ही प्रकार की नाप तथा तौल प्रचलित थी, एक ही प्रकार के भवनों का निर्माण होता था, एक ही प्रकार की मूर्तियाँ बनाई जाती थी तथा एक ही प्रकार की लिपि का प्रचार था।

(2) दो राजधानियाँ

इस विशाल सिंधु साम्राज्य की सम्भवतः दो राजधानियाँ थी, एक हड़प्पा में और दूसरी मोहेनजोदड़ो में। इन्हीं दोनों केन्द्रों से उत्तर तथा दक्षिण का शासन चलता था। हड़प्पा उत्तरी साम्राज्य की और मोहेनजोदड़ो दक्षिणी साम्राज्य की राजधानी थी।

(3) शान्ति-प्रधान सभ्यता

खुदाई में कवच, शिरस्त्राण, ढाल, तलवार आदि के स्थान पर अधिकतर भाला, कुल्हाड़ी, धनुष-बाण आदि मिले है जो उनकी सामरिक प्रवृत्ति के द्योतक न होकर उनके आखेटीय जीवन की ओर संकेत करते हैं। इसलिये हम यह कह सकते हैं कि यह सभ्यता शान्ति-प्रधान सभ्यता थी और यहाँ के निवासी शान्ति का जीवन व्यतीत करते थे। उपर्युक्त शस्त्रास्त्रों का प्रयोग सम्भवतः वे केवल आखेट तथा आत्म-रक्षा के लिए करते थे।

(4) लोकतन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था

खुदाई में विशाल सभा-भवनों तथा स्नानागारों के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि इस सभ्यता में राजाओं तथा उनके राज-प्रसादों का कोई अस्तित्त्व न था। सिन्धु-सभ्यता की प्राप्त सामग्रियाँ उनके सामूहिक जीवन की द्योतक हैं। इस प्रकार यह सभ्यता लोकतन्त्रात्मक भावना को प्रकट करती है किन्तु लोकतन्त्रात्मक होने पर भी यह सभ्यता सशक्त केन्द्रीयभूत शासन की द्योतक है जो दो प्रधान केन्द्रों में विभक्त थी। उत्तरी क्षेत्र का शासन हड़प्पा से तथा दक्षिणी क्षेत्र का शासन मोहेनजोदड़ो से संचालित होता था।

सिन्धु-सभ्यता का विनाश

विद्वानों की धारणा है कि ईसा से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व इस सभ्यता का विनाश हो गया। यद्यपि इस सभ्यता के विनाश के कारणों का निश्चित रूप से पता नहीं लगता है परन्तु विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि सिन्धु-नदी में बाढ़ आ जाने, अकाल पड़ जाने, भूकम्प आ जाने, जलवायु के परिवर्तन होने, विदेशी आक्रमण होने अथवा राजनीतिक एवं आर्थिक विघटन होने के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ होगा।

इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली लकड़ी का, मिट्टी की ईंटें पकाने और भवन बनाने में बड़े स्तर पर उपयोग होता था। लंबे समय तक कृषि का विस्तार, बड़े पैमाने पर चराई और ईंधन के लिए लकड़ी का उपयोग होते रहने के कारण यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति नष्ट हो गई होगी जिससे बाढ़ एवं अकाल का खतरा लगातार बढ़ता चला गया होगा। विभिन्न विद्वानों ने सिंधु सभ्यता के विनाश के अलग-अलग कारण बताये हैं-

(1) जलप्लावन एवं भूकम्प

मार्शल, एम. आर. साहनी तथा रेइक्स आदि विद्वानोें के अनुसार सिंधु सभ्यता का विनाश, जलप्लावन अथवा शक्तिशाली भूकम्प के कारण हुआ होगा किंतु यह विचार उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि जल प्लावन अथवा भूकम्प से एक या कुछ नगर प्रभावित हो सकते हैं न कि पंजाब से लेकर सिंध, गुजरात, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश तक का विशाल क्षेत्र।

(2) जलवायु परिवर्तन

आरेल स्टीन एवं अमलानंद घोष आदि विद्वानों का मत है कि जलवायु परिवर्तन एवं अनावृष्टि के कारण सिंधु सभ्यता का विनाश हुआ। इस कारण को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इस मत को स्वीकार करने का अर्थ यह बात स्वीकार करना है कि जलवायु परिवर्तन एवं अनावृष्टि के कारण सिंधु सभ्यता के पूरे क्षेत्र के मानव अपनी बस्तियों को खाली करके चले गये जिससे दीर्घ काल के लिये यह क्षेत्र निर्जन हो गया। जबकि हम जानते हैं कि इसी क्षेत्र एवं उसके आसपास के क्षेत्र में उस काल में आर्य बस्तियां अस्तित्व में थीं।

(3) बाह्य आक्रमण

1934 ई. में गार्डन चाइल्स ने एक संभावना व्यक्त की थी कि हड़प्पा सभ्यता के पतन के लिये आर्यों का आक्रमण उत्तरदायी है। इस मत को स्वीकार करने वाले विद्धान अपने मत के समर्थन में सैंधव नगरों के उत्खननों में विशाल संख्या में प्राप्त कंकालों का उल्लेख करते हैं जिन पर कुछ पैने हथियारों द्वारा बने हुए घावों के निशान हैं।

चूंकि हड़प्पा सभ्यता शांति प्रिय सभ्यता थी जहाँ से अधिक संख्या में हथियार नहीं मिले हैं, इसलिये यह संभावना व्यक्त की गई है कि हड़प्पा सभ्यता के विस्तृत साम्राज्य पर किसी बड़ी शक्ति ने योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण किया होगा जिसके कारण सैंधव लोगों को अपनी बस्तियां खाली करके अन्य स्थानों को जाना पड़ा होगा।

इस मत को पूर्णतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि किसी बाह्य शक्ति अथवा पड़ौसी के आक्रमण करने से इतनी बड़ी सभ्यता नष्ट होनी संभव नहीं है जिसका क्षेत्रफल आज के पश्चिमी यूरोप अथवा आज के पाकिस्तान से भी बड़ा हो।

(4.) सिंधु तथा सरस्वती द्वारा मार्ग परिवर्तन

हड़प्पा सभ्यता के अब तक लगभग 1400 स्थल खोजे गये हैं, इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी के किनारे मिले हैं। सरस्वती नदी ने विगत कुछ हजार वर्षों में कई बार अपना मार्ग बदला। सिंधु ने भी अपना मार्ग कई बार बदला है। इसलिये संभव है कि सिंधु तथा सरस्वती के मार्ग में बड़ा परिवर्तन आने के कारण ही हड़प्पा सभ्यता के लोग अपनी बस्तियां खाली करके अन्य स्थानांे को चले गये हों। यही कारण अधिक उचित लगता है।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विशेषताओं से स्पष्ट है कि आज से लगभग पाँच सहस्र वर्ष पूर्व सिन्धु-सरस्वती की घाटी में एक ऐसी समुन्नत सभ्यता अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित तथा फलान्वित हुई जिसकी उत्कृष्टता का अवलोकन कर विश्व के देश आज भी आश्चर्य-चकित हो जाते हैं। हड़प्पा सभ्यता ने हिन्दू धर्म को बहुत कुछ दिया जिसका प्रभाव आज भी देखने को मिलता है।

हड़प्पा सभ्यता लगभग दो हजार साल तक फली फूली किंतु किसी कारण से काल के गर्त में समा गई। जब तक इस सभ्यता की लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता, तब तक इस सभ्यता की बहुत सी बातों पर रहस्य का पर्दा पड़ा ही रहेगा। एक संभावना यह भी है कि चूंकि इस क्षेत्र से केवल बर्तनों एवं उपकरणों पर छोटे-छोटे लेख ही प्राप्त हुए हैं।

इसलिये संभवतः सिंधु लिपि को पढ़ लिये जाने के बाद भी इस सभ्यता के बहुत से रहस्य हमेशा के लिये रहस्य ही बने रहेंगे। कम से कम इस रहस्य को खोल पाना अत्यंत दुष्कर होगा कि इस सभ्यता का अंत क्यों हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में लौह युगीन संस्कृति (अध्याय 5)

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भारत में लौह युगीन संस्कृति

भारत में लौह युगीन संस्कृति ताम्र-कांस्य काल की संस्कृति के काफी बाद प्रकट हुई। चूंकि धातु के रूप में सबसे पहले ताम्बा खोजा गया और उसके बाद कांस्य की खोज हुई एवं अंत में लोहे की खोज हुई इसलिए धरती भर पर लौह युगीन संस्कृतियां काफी समय बाद ही प्रकट हो सकीं। कुछ बस्तियां पाषाण काल के बाद सीधे ही लौह संस्कृति में प्रवेश कर गईं क्योंकि वे ताम्र एवं कांस्य से परिचित नहीं थी किंतु अन्य बस्तियों के लोग जब लौह संस्कृति में प्रवेश कर चुके थे, तब वे आक्रांताओं अथवा घुमक्कड़ों के रूप में अपने साथ लोहा लेकर आ गए।

भारत में ताम्र-कांस्य काल के बाद भारत में लौह युगीन संस्कृति आरम्भ हुआ। हुई। इसे लौह-काल भी कहा जाता है। विद्वानों के अनुसार लौह-काल का आरम्भ उत्तर तथा दक्षिण भारत में एक साथ नही हुआ। दक्षिण भारत में पाषाण-काल के बाद ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया था, परन्तु उत्तर भारत में ताम्र-काल के बाद इसका प्रयोग हुआ।

लोहे की खोज

विश्व में सर्वप्रथम हित्ती नामक जाति ने लोहे का उपयोग करना आरम्भ किया जो एशिया माइनर में 1800 ई.पू.-1200 ई.पू. के लगभग निवास करती थी। 1200 ई.पू. के लगभग इस शक्तिशाली साम्राज्य का विघटन हुआ और उसके बाद ही भारत में लोहे का प्रयोग आरंभ हुआ।

भारत में लौह युगीन संस्कृति के जन्म-दाता

विद्वानों की धारणा है कि लौह-काल के लोग पामीर पठार की ओर से आये थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र में फैल गये। कालान्तर में मध्य प्रदेश के वनों को पार कर ये लोेग बंगाल की ओर फैल गये।

मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन

लौह-काल में मनुष्य के जीवन का वैज्ञानिक विकास आरम्भ हो गया और उसके जीवन में बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन होने लगे। मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसकी सभ्यता तथा संस्कृति की उन्नति में अन्य किसी धातु से उतनी सहायता नहीं मिली जितनी लोहे से मिली है। लोहे के उपकरण कांस्य उपकरणों की अपेक्षा अधिक मजबूत सिद्ध हुए। प्रारंभिक लौह युगीन बस्तियों के अवशेष भी अपेक्षाकृत अधिक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

भारत में लौह युगीन संस्कृति का काल निर्धारण

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कुछ विद्वानों के अनुसार भारत में लोहे का प्रयोग हिमालय पर्वत के पामीर पठार क्षेत्र से आने वाले लोगों ने आरम्भ किया। यह घटना ई.पू. 1000 से लेकर ई.पू. 800 के बीच कभी हुई होगी। अन्य विद्वानों की धारणा है कि उत्तर भारत में लौह धातु का प्रारम्भ ईसा से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ होगा। जबकि दक्षिण भारत में लोहे का प्रयोग ई.पू. 800 से प्रचुर मात्रा में किया जाने लगा। लौह उत्पादन की प्रक्रिया का ज्ञान भारत में बाहर से नहीं आया। कतिपय विद्वानों के अनुसार लौह उद्योग का प्रारंभ मालवा एवं बनास संस्कृतियों से हुआ। कर्नाटक के धारवार जिले से ई.पू. 1000 के लोहे के अवशेष मिले हैं। लगभग इसी समय गांधार (अब पाकिस्तान में) क्षेत्र में लोहे का उपयोग होने लगा। यहाँ से मृतकों के साथ शवाधानों में गाढ़े गये लौह उपकरण भारी मात्रा में प्राप्त हुए हैं। ऐसे औजार बिलोचिस्तान में मिले हैं। लगभग इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी लोहे का प्रयोग हुआ। खुदाई में तीर के नोंक, बरछे के फल आदि मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि लगभग ई.पू.800 से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लौहास्त्रों का प्रयोग आमतौर पर होने लगा था। लोहे का उपयोग पहले युद्ध में और बाद में कृषि में हुआ।

भारत में लौह युगीन संस्कृति के साहित्यिक प्रमाण

भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिये हमें साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाण मिलते हैं। यूनानी साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भारतीयों को सिकंदर के भारत आने से पहले से ही लोहे का ज्ञान था। भारत के कारीगर लोहे के उपकरण बनाने में निष्णात थे। उत्तर वैदिक काल के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं। साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ई.पू. आठवीं शताब्दी में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

भारत में लौह युगीन संस्कृति के पुरातात्विक प्रमाण

लोहे की प्राचीनता के सम्बन्ध में साहित्यिक उल्लेखों की पुष्टि पुरातात्विक प्रमाणों से होती है। अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थलों के उत्खननों में लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस काल का मानव एक विशेष प्रकार के मृद्भाण्डों का प्रयोग करता था जिन्हें चित्रित धूसर भाण्ड कहा गया है।

इन स्थानों से लोहे के औजार तथा उपकरण यथा तीर, भाला, खुरपी, चाकू, कटार, बसुली आदि मिलते हैं। अतरंजीखेड़ा की खुदाई से धातु शोधन करने वाली भट्टियों के अवशेष मिले हैं। इस संस्कृति का काल 1000 ई.पू. माना गया है। पूर्वी भारत में सोनपूर, चिरांद आदि स्थानों पर की गई खुदाई में लोहे की बर्छियां, छैनी तथा कीलें आदि मिली हैं जिनका समय 800 ई.पू. से 700 ई.पू. माना गया है।

भारत में लौह युगीन संस्कृति की प्रारंभिक बस्तियां

1. सिन्धु-गंगा विभाजक तथा ऊपरी गंगा घाटी क्षेत्र

चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति इस क्षेत्र की विशेषता है। अहिच्छत्र, आलमगीरपुर, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोह, काम्पिल्य, जखेड़ा आदि से इस संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चित्रित धूसर भाण्ड एक महीन चूर्ण से बने हुए हैं। ये चाक निर्मित हैं। इनमें अधिकांश प्याले और तश्तरियां हैं।

मृद्भाण्डों का पृष्ठ भाग चिकना है तथा रंग धूसर से लेकर राख के रंग के बीच का है। इनके बाहरी तथा भीतरी तल काले और गहरे चॉकलेटी रंग से रंगे गये हैं। खेती के उपकरणों में जखेड़ा में लोहे की बनी कुदाली तथा हंसिया प्राप्त हुई हैं। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अन्य सभी क्षेत्रों में लोहे की वस्तुएं मिली हैं।

अतरंजीखेड़ा से लोहे की 135 वस्तुएं प्राप्त की गई हैं। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा में उगाई जाने वाली फसलों के प्रमाण मिले हैं। हस्तिनापुर में केवल चावल और अजरंजीखेड़ा में गेहूँ और जौ के अवशेष मिले हैं। हस्तिनापुर से प्राप्त पशुओं की हड्डियों में घोड़े की हड्डियां भी हैं।

2. मध्य भारत

मध्य भारत में नागदा तथा एरण इस सभ्यता के प्रमुख स्थल हैं। इस युग में इस क्षेत्र में काले भाण्ड प्रचलित थे। पुराने ताम्रपाषाण युगीन तत्व इस काल में भी प्रचलित रहे। इस स्तर से 112 प्रकार के सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुछ नये मृद्भाण्डों का भी इस युग में प्रचलन रहा। घर कच्ची ईंटों से बनते थे।

ताम्बे का प्रयोग छोटी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित था। नागदा से प्राप्त लोहे की वस्तुओं में दुधारी, छुरी, कुल्हाड़ी का खोल, चम्मच, चौड़े फलक वाली कुल्हाड़ी, अंगूठी, कील, तीर का सिरा, भाले का सिरा, चाकू, दरांती इत्यादि सम्मिलित हैं। एरण में लौहयुक्त स्तर की रेडियो कार्बन तिथियां निर्धारित की गई हैं जो 100 ई.पू. से 800 ई.पू. के बीच की हैं।

3. मध्य निम्न गंगा क्षेत्र

इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल पाण्डु राजार ढिबि, महिषदल, चिरण्ड, सोनपुर आदि हैं। यह अवस्था पिछली ताम्र-पाषाण-कालीन अवस्था के क्रम में आती है, जिसमें काले-लाल मृद्भाण्ड देखने को मिलते हैं। लोहे का प्रयोग नई उपलब्धि है। महिषदल में लौहयुक्त स्तर पर सूक्ष्म पाषाण उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। यहाँ से धातु मल के रूप में लोहे की स्थानीय ढलाई का प्रमाण मिलता है। महिषदल में लोहे की तिथि 750 ई.पू. के लगभग की है।

4. दक्षिण भारत

दक्षिण भारत में प्रारंभिक कृषक समुदायों की बस्तियां 3000 ई.पू. में दिखाई देती हैं। यहाँ मानव के आखेट संग्रहण अर्थव्यवस्था से, खाद्योत्पादक अर्थव्यवस्था की ओर क्रमबद्ध विकास के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त साक्ष्य संकेत देते हैं कि उस काल में गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा, पेनेरू तथा कावेरी नदियों के निकट मानव की बसावट हो चुकी थी।

ये क्षेत्र शुष्क खेती तथा पशुचारण के लिये उपयुक्त थे। इस युग में पत्थरों की कुल्हाड़ियों को घिसकर तथा चमकाकर तैयार किया गया था। इस युग का उद्योग, पत्थरों की कुल्हाड़ियों का उद्योग कहा जा सकता है। इन बस्तियों के लोग ज्वार-बाजरा की खेती करते थे।

इन बस्तियों में सभ्यता के तीन चरण मिले हैं- प्रथम चरण (2500 ई.पू. से 1800 ई.पू.) में पत्थर की कुल्हाड़ियां मिलती हैं। द्वितीय चरण (1800 ई.पू. से 1500 ई.पू.) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (1500 ई.पू. से 1100 ई.पू.) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है।

दक्षिण भारत में नव-पाषाण-कालीन बस्तियां तथा ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्व बनाये रहीं। महाराष्ट्र में भी ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्व बनाये रहीं। ब्रह्मगिरि, पिक्लीहल, संगनाकल्लू, मास्की, हल्लूर, पोयमपल्ली आदि में भी ऐसी ही स्थिति थी।

दक्षिणी भारत में लौह युग का प्राचीनतम चरण पिक्लीहल तथा हल्लूर की खुदाई एवं ब्रह्मगिरि के शवाधानों के आधार पर निश्चित किया गया है। इन शवाधानों के गड्ढों में पहली बार लोहे की वस्तुएं, काले एवं लाल मृद्भाण्ड तथा फीके रंग के भूरे तथा लाल भाण्ड प्राप्त हुए हैं। ये मृदभाण्ड जोरवे के मृद्भाण्डों जैसे हैं। टेकवाड़ा (महाराष्ट्र) से भी ऐसे ही पाषाण प्राप्त हुए हैं। कुछ बस्तियों में पत्थरों की कुल्हाड़ियों एवं फलकों का प्रयोग, लौहकाल में भी होता रहा।

भारत में लौह युगीन संस्कृति का प्रारंभ दक्षिण भारत में हुआ

कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम प्रयोग दक्षिण भारत में हुआ। लौह-काल के लोग पामीर पठार की ओर से आये थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र में फैल गये। कालान्तर में मध्य प्रदेश के वनों को पार कर ये लोेग बंगाल की ओर फैल गये।

दक्षिण में ताम्रकांस्य काल पर भ्रांति

प्रारंभिक खोजों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि दक्षिण भारत में लौह संस्कृति का प्रारम्भ, पाषाण काल के बाद ही हो गया। दक्षिण में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया। हमारी राय में यह कहना उचित नहीं है कि दक्षिण भारत में पाषाण काल के बाद सीधा ही लौह काल आ गया, वहां ताम्र-कांस्य काल नहीं आया।

हम देखते हैं कि दक्षिण भारत की कृषक बस्तियों के दूसरे चरण (1800 ई.पू. से 1500 ई.पू.) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (1500 ई.पू. से 1100 ई.पू.) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद के काल में लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। अतः यह कैसे कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया ?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महा-पाषाण संस्कृति (अध्याय 6)

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महा-पाषाण संस्कृति

भारत के विभिन्न स्थानों से महा-पाषाण संस्कृति के महापाषाणीय शवाधान (मेगालिथस्) प्राप्त हुए हैं। महा-पाषाण संस्कृति के लोग अपने मृतकों को समाधियों में गाड़ते थे तथा उनकी सुरक्षा के लिये बड़े-बड़े पाषाणों का प्रयोग करते थे। इस कारण इन्हें वृहत्पाषाण अथवा महापाषाण कहा गया है। इन शवाधानों की खुदाइयों में लोहे के औजार, हथियार तथा उपकरण प्रचुरता से मिलते हैं।

महापाषाण संस्कृति का काल निर्धारण

महा-पाषाण संस्कृति का उदय ई.पू. 1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्व में रही। बाद में महा-पाषाण संस्कृति का प्रसाद उत्तर भारत में भी हुआ। माना जाता है कि दक्षिण भारत में लौह युग आरंभ होने के साथ ही महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण की परम्परा आरंभ हुई।

ब्रह्मगिरि से प्राप्त महापाषाणीय शवाधानों का काल ईसा पूर्व तीसरी सदी से ईसा पूर्व पहली सदी के बीच किया गया है। इस प्रकार महा-पाषाण संस्कृति का काल निर्धारण अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है।

महापाषाण संस्कृति के प्रमुख क्षेत्र

दक्षिण भारत

इस तरह के शवाधान महाराष्ट्र में नागपुर के पास, कर्नाटक में मास्की, आंध्र प्रदेश में नागार्जुन कोंडा तथा तमिलनाडु में अदिचलाल्लूर तथा केरल में पाई गई है। महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के तरीकों ने बस्तियों की योजनाओं को भी प्रभावित किया किंतु खेती और पशुचारण के काम परम्परागत रूप से होते रहे।

मद्रास के तिन्नेवेली जिले के आदिचल्लूर नामक स्थान से कुछ पात्र मिले हैं। इन पात्रों में हथियार, औजार, आभूषण और अन्य सामग्री रख दी जाती थी। इस प्रकार के पात्रों का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है। ब्रह्मगिरि, कोयम्बटूर जिले के सुलर, पाण्डिचेरी के अरिकमेडु से भी महापाषाणीय शवाधान मिले हैं।

उत्तर भारत

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महा-पाषाण संस्कृति के महा-पाषाणीय शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में भी देखने को मिलते हैं। उत्तरी गुजरात के दारापुट में एक महापाषाणिक रचना मिली है जो एक प्राचीन चैत्य भी हो सकती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में कराची जिले के कलक्टर कैप्टेन प्रीडी ने कहा था कि सम्पूर्ण पर्वतीय जिले में बड़ी संख्या में प्रस्तर की कब्रें मौजूद हैं जो हमारी पश्चिमी सीमा तक बढ़ आई हैं। इन कब्रों में द्वार का अभाव है अन्यथा ये शेष बातों में दक्षिण भारत की कब्रों के समान ही हैं। 1871 से 1873 ईस्वी की अवधि में कार्लाइल ने पूर्वी राजथान का दो बार भ्रमण किया। उन्होंने फतहपुर सीकरी के पास अनेक संगोरा शवाधानों की उपस्थिति का उल्लेख किया परन्तु वे महापाषाणिक शवाधान नहीं हैं। वे प्रस्तरों के आयताकार ढेर हैं जिनमें प्रस्तरों के ही छोटे शवाधान कक्ष बने हुए हैं। इन शवाधानों की छतें भी प्रस्तरों की हैं। इन संगोरों में अधिकतर राख एवं निस्तप्त हड्डियां भरी हुई हैं। कार्लाइल ने देवसा में भी महापाषाण समूहों को देखा था। कश्मीर के बुर्झामा नामक स्थान पर भी महापाषाणिक पांच विशालाकाय पत्थर मिले हैं। अनुमान है कि इन्हें 400 ई.पू. से 300 ई.पू. के काल में रखा गया होगा। बहुत से शवाधान खेती एवं मानव बस्तियों का प्रसार होने के कारण काल के गाल में समा गए हैं।

महापाषाण शवाधानों का निर्माण

महा-पाषाण संस्कृति के महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के कई तरीके देखने में आते हैं। कभी-कभी मृतकों की हड्डियां बड़े कलशों में जमा करके गड्ढे में गाड़ी जाती थीं। इस गड्ढे को ऊपर से पत्थरों अथवा केवल पत्थर से ढंक दिया जाता था। कभी-कभी दोनों ही तरीके अपनाए जाते थे। कलश तथा गड्ढों में कुछ वस्तुएं रखी जाती थीं।

कुछ शवों को पकाई हुई मिट्टी की शव पेटिकाओं में भी रखा जाता था। कुछ मामलों में मृतक के शवाधान पत्थरों से बनाये गये हैं। ग्रेनाइट पत्थरों की पट्टिकाओं से बने ताबूतनुमा शवाधानों में भी शवों को दफनाया गया है। भारत में चार प्रकार के महापाषाण-युगीन शवाधानों के अवशेष मिले हैं-

1. संगौरा वृत्त

इस प्रकार के शवाधान अनेक गोलाकार पत्थरों को सम्मिलित कर बनाये गये हैं। इन संगौरा वृत्तों को देखकर लगता है कि उस समय शव को लोहे के औजारों, मृत्तिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की अस्थियों के साथ दफना दिया जाता था। उसके बाद समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगौरा वृत्त नयाकुण्ड बोरगांव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।

2. ताबूत

यह भी अंत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में मिलते हैं।

3.  मैनहरि

इस प्रकार के शवाधानों में शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था जो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इन स्तम्भाकार पत्थरों की लम्बई 1.5 मीटर से 5.5 मीटर तक पाई जाती है। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के मास्की और गुलबर्गा क्षेत्रों से मिली हैं।

4. महापाषाण तुम्ब

इस प्रकार के शवाधानों के निर्माण में सर्वप्रथम पत्ािर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी रखी जाती थी। उपरोक्त बनावट किसी मेज का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तुम्ब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के ब्रह्मगिरि एवं तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थानों पर प्रायः देखी गई हैं।

5. अन्य समाधियां

महा-पाषाण संस्कृति स्थलों से उपरोक्त चार प्रकार की समाधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के शवाधान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाये गये हैं। डॉ. विमलचंद्र पाण्डेय ने आठ प्रकार के महापाषाणीय शवाधानों का वर्णन किया है- (1) सिस्ट समाधि, (2) पिट सर्किल, (3) कैर्न सर्किल, (4) डोल्पेन, (5) अम्बेला स्टोन, (6) हुड स्टोन, (7) कन्दराएं और (8) मोहिर।

शवाधानों से प्राप्त सामग्री

इन शवाधानों से जो सामग्री मिली है उसका प्रयोग तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत तथा दक्षिण भारत में किया जाता था। कुछ विशेष प्रकार के बर्तन भी पाये गये हैं। इन शवाधानों से प्राप्त, ‘पायों वाले प्याले’ ठीक वैसे ही हैं जैसे कि उन दिनों की तथा उनसे भी पुरानी भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र तथा ईरान की कब्रों से मिले हैं।

घोड़ों की हड्डियां और घोड़ों से सम्बन्धित सामग्री का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि घुड़सवारी वाले लोग इस क्षेत्र में पहुंच गये थे। घोड़ों को दफनाने के उदाहरण नागपुर के निकट जूनापानी से प्राप्त होते हैं। ये महापाषाणीय उदाहरण विशेष रूप से मृतकों के अंतिम संस्कार के तरीके तथा देशी एवं विदेशी परम्पराओं का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।

महापाषाण सभ्यता की लौह सामग्री

महा-पाषाण संस्कृति के स्थलों, विदर्भ में नागपुर के निकट जूनापानी से लेकर दक्षिण में आदिचनल्लूर तक लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में लोहे की वस्तुएं समान रूप से पाई गई हैं। लोहे की विभिन्न प्रकार की वस्तुएं, जैसे चपटी लोहे की कुल्हाड़ियां, जिसमें पकड़ने के लिये लोहे का दस्ता होता था, फावड़े, बेल्चे, खुरपी, कुदालें, हंसिये, फरसे, फाल, सब्बल, बरछे, छुरे, छैनी, तिपाइयां, स्टैण्ड, तश्तरियां, लैम्प, कटारें, तलवारें, तीर के फल तथा बरछे के फल, त्रिशूल आदि प्राप्त हुए हैं।

इन औजारों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। जैसे- घोड़े के सामान जिनमें लगाम का लोहे का वह हिस्सा जो घोड़े के मुंह में होता है, फंदे के आकार वाली नाक तथा मुंह पर लगाने वाली छड़ें आदि। धातु की अन्य वस्तुओं में सबसे अधिक संख्या में पशुओं की गर्दन में बांधी जाने वाली ताम्र व कांस्य की घंटियां प्राप्त हुई हैं। इस संस्कृति के लोग काले व लाल रंग के बर्तनों का उपयोग करते थे।

दक्षिण भारत की महापाषाण सभ्यता से चित्रित धूसर भाण्ड परम्परा के साथ लोहे के जो उपकरण मिले हैं, उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि महा-पाषाण संस्कृति के मानव द्वारा लौह उपकरणों का उपयोग सीमित कार्य के लिये ही किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वैदिक सभ्यता का प्रसार (अध्याय 7)

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वैदिक सभ्यता का प्रसार

इस अध्याय में वैदिक राजन्य तथा उनकी अर्थव्यवस्था के विशेष संदर्भ में वैदिक सभ्यता का प्रसार विषय पर पाठ्य-सामग्री प्रस्तुत की गई है। वैदिक सभ्यता का प्रसार आर्य जाति के द्वारा किया गया। यह सभ्यता बहुत विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी। वैदिक सभ्यता का प्रसार भारत के पश्चिम में वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में विंध्याचल तक विस्तृत था।

आर्य जाति

‘आर्य’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- श्रेष्ठ अथवा अच्छे कुल में उत्पन्न। व्यापक अर्थ में आर्य एक जाति का नाम है जिसके रूप, रंग, आकृति तथा शरीर का गठन विशेष प्रकार का होता है। आर्य लम्बे डील-डौल के, हष्ट-पुष्ट, गोरे-रंग के, लम्बी नाक वाले वीर तथा साहसी होते थे।

भारत, ईरान तथा यूरोप के विभिन्न देशों के निवासी आर्यों के वंशज माने जाते हैं। आर्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वेदों में हुआ है। आर्यों ने स्वयं को आर्य और अपने विरोधियों को दस्यु अथवा दास कहना आरम्भ किया क्योंकि आर्य स्वयं को, अनार्यों से अधिक श्रेष्ठ तथा कुलीन समझते थे।

आर्य लोग शीतोष्ण कटिबन्ध के निवासी थे और दूध, मांस तथा गेहूँ इनके मुख्य खाद्य-पदार्थ थे। ठंडी जलवायु में रहने तथा पौष्टिक पदार्थ खाने के कारण ये बलिष्ठ, वीर तथा साहसी होते थे। ये लोग सभ्यता के आरम्भिक काल में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमा करते थे।

आर्य जाति के लोग विभिन्न प्रकार के पशुओं को पालते थे और कृषि करना भी जानते थे। आर्य बड़ेे युद्ध-प्रिय होते थे और अपने हथियारों को बड़ी चतुरता से चला सकते थे। आर्यों को प्रकृति से बड़ा प्रेम था। ये लोग नवीन विचारों तथा भावों को ग्रहण करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

आर्यों का आदि देश

आर्यों का मूल निवास स्थान कहाँ था, यह एक अत्यन्त विवाद-ग्रस्त प्रश्न है। वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘आर्यों के मूल स्थान या निवास स्थान की विवेचना जान-बूझकर नहीं की गई है, क्योंकि इस विषय पर कोई भी धारणा स्थापित नहीं हो सकी है।’

इनके आदि देश के अन्वेषण करने में विद्वानों ने भाषा-विज्ञान, पुरातत्त्व तथा जातीय विशेषताओं का सहारा लिया है। चूंकि इन विद्वानों ने विभिन्न साधनों का सहारा लिया है और विभिन्न दृष्टिकोणों से इस समस्या पर विचार किया है इसलिये ये विद्धान विभिन्न निष्कर्षों पर पहुंचे हैं।

विद्वानों ने आर्यों के आदि देश के सम्बन्ध में चार सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है- (1) यूरोपीय सिद्धान्त, (2) मध्य एशिया सिद्धान्त, (3) आर्कटिक प्रदेश का सिद्धान्त तथा (4) भारतीय सिद्धान्त।

(1) यूरोपीय सिद्धान्त

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भाषा तथा संस्कृति की समानता के आधार पर कुछ विद्वानों ने यूरोप को आर्यों का आदि-देश बतलाया है। आर्य लोग सर्वाधिक संख्या में भारतवर्ष, ईरान तथा यूरोप के विभिन्न देशों में पाये जाते हैं। इनकी भाषा में बड़ी समानता पायी जाती है। पितृ, पिदर, पेटर तथा फादर और मातृ, मादर, मेटर तथा मदर शब्द एक ही अर्थ में संस्कृत, फारसी, लैटिन तथा अंग्रेजी भाषाओं में प्रयोग किये जाते हैं। इन भाषाओं को हिन्द-यूरोपीय परिवार की भाषाएं कहते हैं। अपने परिवर्तित रूपों में ये भाषाएं आज भी समस्त यूरोप, ईरान और भारतीय उप-महाखंड के अधिकतर हिस्सों में बोली जाती हैं। अज, श्वान तथा अश्व जैसे पशुवाचक शब्द और भूर्ज, पीतदारू तथा द्विफल जैसे वृक्षों के नाम समस्त हिंद-यूरोपीय भाषाओं में एक समान पाए जाते हैं। ये समान शब्द यूरेशिया की वनस्पति और पशुओं के सूचक हैं। इनसे ज्ञात होता है कि आर्य लोग नदियों और जंगलों से परिचित थे। एक रोचक बात यह है कि आर्यों ने अनेक पर्वतों को पार किया फिर भी पहाड़ों के लिए समान शब्द कुछ ही आर्य-भाषाओं में मिलते हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इन भाषाओं के बोलने वाले मानवों के पूर्वज कभी एक स्थान पर रहते रहे होंगे।

डॉ. पी. गाइल्स के विचार में आस्ट्रिया-हंगेरी का मैदान आर्यों का आदि-देश था क्योंकि यह मैदान समशीतोष्ण कटिबन्ध में स्थित है और वे समस्त पशु अर्थात् गाय, बैल, घोड़ा, कुत्ता तथा वनस्पति अर्थात् गेहूँ, जौ आदि इस मैदान में पाये जाते हैं, जिनसे प्राचीन आर्य परिचित थे।

पेन्का ने जर्मनी प्रदेश को और नेहरिंग ने दक्षिणी रूस के घास के मैदान को आर्यों का आदि-प्रदेश बताया है। कुछ विद्वानों के अनुसार आर्यों का मूल निवास आलप्स पर्वत के पूर्वी क्षेत्र में यूरेशिया में कहीं पर था। जिन विद्वानों ने यूरोप को आर्यों का आदि देश बताया है उनका तर्क है कि यह मैदान उन स्थानों के निकट है जहाँ यूरोप के आर्यों की भिन्न-भिन्न शाखाएँ निवास कर रही हैं।

चूंकि यूरोप में आर्यों की संख्या एशिया के आर्यों से अधिक है, इसलिये यह सम्भव है कि आर्य लोग पश्चिम से पूर्व की ओर गये हों। इस क्षेत्र में ऐसे सघन वन, मरूभूमि अथवा पर्वतमालाएँ नही हैं जिन्हें पार नहीं किया जा सकता। अतः पश्चिम की ओर से पूर्व को जाना अत्यन्त सरल है। यूरोपीय सिद्धान्त के समर्थकों का कहना है कि प्रव्रजन प्रायः पश्चिम से पूर्व को हुआ है, पूर्व से पश्चिम को नहीं।

(2) मध्य एशिया का सिद्धान्त

जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने मध्य-एशिया को आर्योंं का आदि-देश बताया है। उनके अनुसार आर्य जाति तथा उसकी सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान हमें वेदों तथा अवेस्ता से प्राप्त होता है जो क्रमशः भारतीय तथा ईरानी आर्यों के धर्म ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों के अध्ययन से अनुमान होता है कि भारतीय तथा ईरानी आर्य बहुत दिनों तक साथ निवास करते होंगे।

इनका आदि-देश भारत तथा ईरान के सन्निकट कहीं रहा होगा। वहीं से एक शाखा ईरान को, दूसरी भारतवर्ष को और तीसरी यूरोप को गई होगी। वेदों तथा अवेस्ता से ज्ञात होता है कि प्राचीन आर्य पशु पालते थे तथा कृषि करते थे। इसलिये ये एक लम्बे मैदान में रहते रहे होंगे।

ये लोग अपने वर्ष की गणना हिम से करते थे, जिससे यह स्पष्ट है कि वह प्रदेश शीत-प्रधान रहा होगा। कालान्तर में ये लोग अपने वर्ष की गणना शरद से करने लगे जिसका यह तात्पर्य है कि ये लोग बाद में दक्षिण की ओर चले गये जहाँ कम सर्दी पड़ती थी और सुन्दर वसन्त ऋतु रहती थी।

ये लोग घोड़े रखते थे जिन्हें वे सवारी के काम में लाते थे और रथों में जोतते थे। आर्य-ग्रन्थों में गेहूँ तथा जौ का भी उल्लेख मिलता है। इन तथ्यों के आधार पर मैक्समूलर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मध्य एशिया ही आर्यों का आदि-देश था क्योंकि ये समस्त वस्तुएँ वहाँ पर पाई जाती हैं।

मध्य एशिया से ईरान, यूरोप तथा भारतवर्ष, तीनों जगह जाना सम्भव तथा सरल भी है। यह सम्भव है कि जन-संख्या की वृद्धि, भोजन तथा चारे के अभाव अथवा प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण ये लोग अपनी जन्म-भूमि त्यागने के लिए विवश हो गये हों।

मध्य एशिया में जल का न होना, भूमि का अनुपजाऊ होना तथा आर्यों का वहाँ से चले जाना आदि इस मत के स्वीकार करने में कठिनाई उत्पन्न करते हैं क्योंकि आर्यों के आदि देश में जल की कमी न थी। वह बड़ा ही उपजाऊ तथा सम्पन्न प्रदेश था।

(3) आर्कटिक प्रदेश का सिद्धान्त

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचार में उत्तर ध्रुव-प्रदेश आर्यों का आदि देश था। अपने मत के समर्थन में तिलक ने वेदों तथा अवेस्ता का सहारा लिया है। ऋग्वेद में छः महीने की रात तथा छः महीने के दिन का वर्णन है। वेदों में उषा की स्तुति की गई है जो बड़ी लम्बी होती थी। ये सब बातें केवल उत्तरी ध्रुव प्रदेश में पायी जाती हैं।

अवेस्ता में लिखा है कि उनके देवता अहुरमज्द ने जिस देश का निर्माण किया था उसमें दस महीने सर्दी और केवल दो महीने गर्मी पड़ती थी। इससे अनुमान होता है कि आर्यों का मूल प्रदेश उत्तरी ध्रुव-प्रदेश के निकट रहा होगा। अवेस्ता में यह भी लिखा है कि उस प्रदेश में एक बहुत बड़ा तुषारापात हुआ जिससे उन लोगों को अपनी जन्म-भूमि त्याग देनी पड़ी।

बाल गंगाधर तिलक का कहना है कि जिस समय आर्य लोग उत्तरी-धु्रव प्रदेश में रहते थे, उन दिनों वहाँ पर बर्फ न थी और वहाँ पर सुहावना बसन्त रहता था। कालान्तर में वहाँ पर बड़े जोरों की बर्फ गिरी और सम्भवतः इसी का उल्लेख अवेस्ता में किया गया है। इस तुषारापात के कारण आर्यों ने अपनी जन्म-भूमि को त्याग दिया और उनकी एक शाखा ईरान को और दूसरी भारतवर्ष को चली गई। यहाँ से चले जाने पर भी वे लोग अपनी मातृ-भूमि का विस्मरण न कर सके और इसी से इन्होंने इसका गुणगान अपने धर्म-ग्रन्थों में किया है। बहुत कम इतिहासकार तिलक के मत का समर्थन करते हैं।

(4) भारतीय सिद्धान्त

कुछ विद्वानों के विचार में भारत आर्यों का आदि देश था और वे कहीं बाहर से नही आये थे। डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी ने लिखा है- ‘अब आर्यों के आक्रमण और भारत के मूल निवासियों के साथ उनके संघर्ष की प्राक्कल्पना को धीरे-धीरे त्याग दिया जा रहा है।’ अविनाश चन्द्र दास के विचार में सप्त-सिन्धु ही आर्यों का आदि देश था।

कुछ अन्य विद्वानों के विचार में काश्मीर तथा गंगा का मैदान आर्र्यों का आदि-देश था। भारतीय सिद्धान्त के समर्थकों का कहना है कि आर्य-ग्रन्थों में आर्यों के कहीं बाहर से आने की चर्चा नहीं है और न अनुश्रुतियों में कहीं बाहर से आने के संकेत मिलते हैं। इन विद्वानों का यह भी कहना है कि वैदिक-साहित्य आर्यों का आदि साहित्य है।

यदि आर्य सप्त-सिन्धु में कहीं बाहर से आये तो इनका साहित्य अन्यत्र क्यों नही मिलता। ऋग्वेद की भौगोलिक स्थिति से भी यही प्रकट होता है कि ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना करने वालों का मूल स्थान पंजाब तथा उसके समीप का देश ही था। आर्य-साहित्य से हमें ज्ञात होता है गेहूँ तथा जौ प्राचीन आर्यों के प्रमुख खाद्यान्न थे।

यह ध्यान देने की बात है पंजाब में इन दोनों अन्नों का ही बाहुल्य है। अतः यही आर्यों का आदि-देश रहा होगा। इस मत को स्वीकार करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि ऐतिहासिक युग में बाहर से भारत में विभिन्न जातियों के आने के प्रमाण मिलते हैं परन्तु एक भी जाति के भारत से बाहर जाने का प्रमाण नही मिलता।

दूसरी कठिनाई यह है कि हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की सभ्यता, आर्य-सभ्यता से भिन्न तथा अधिक प्राचीन है। जब सिन्धु-प्रदेश की प्राचीनतम सभ्यता अनार्य थी तब सप्त-सिन्धु कैसे आर्यों का आदि-देश हो सकता है!

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि आर्यों के आदि-देश के सम्बन्ध में जितने सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं वे समस्त संदिग्ध हैं, क्योंकि किसी भी सिद्धान्त के समर्थन में अकाट्य तर्क उपस्थित नहीं किये जा सके हैं फिर भी वर्तमान में जो इतिहास स्थिर किया गया है, उसमें पश्चिमी इतिहासकारों ने माना है कि आर्य भारत में बाहर से आये। कुछ भारतीय इतिहासकार इसी मत का समर्थन करते हैं जबकि बहुत कम इतिहासकार भारत को आर्यों का मूल देश मानते हैं।

आर्यों का मूल स्थान से पलायन

जब आर्यों ने अपने मूल स्थानों को त्यागा, तब वे तीन प्रमुख शाखाओं में विभक्त हो गये। उनकी एक शाखा पश्चिम की ओर बढ़ी और धीरे-धीरे यूनान में पहुंच गई। ईराक से प्राप्त 1600 ई.पू. के कस्सी अभिलेखों में और ईसा पूर्व चौदहवीं सदी के मितन्नी अभिलेखों में जिन आर्य नामों का उल्लेख मिलता है उनसे सूचित होता है कि आर्यों की एक ईरानी शाखा पश्चिम की ओर चली गई थी। कालान्तर में ये लोग यूनानी आर्य कहलाने लगे और यहीं से वे यूरोप के अन्य देशों में फैल गये।

आर्यों की दूसरी शाखा एशिया की ओर बढ़ी। घोड़े की तेज गति के कारण आर्यों को आगे बढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई। लगभग 2000 ई.पू. के बाद आर्यों ने पश्चिमी एशिया में प्रवेश किया। एशिया में आर्य लोग सबसे पहले ईरान पहुंचे जिसे फारस भी कहते हैं। ये लोग ईरानी आर्य कहलाये। यहाँ हिन्दू-ईरानी आर्य लंबे समय तक रहे।

आर्यों की तीसरी शाखा, दूसरी अर्थात् ईरानी शाखा में से अलग होकर भारत की ओर बढ़ी। भारत में आने वाले आर्य मुख्यतः पशुपालक थे। कृषि उनका गौण पेशा था। उनका जीवन स्थायी नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने पीछे कोई ठोस भौतिक अवशेष नहीं छोडे़। आर्यों ने यद्यपि अनेक पशुओं को पालतू बनाया तथापि उनके जीवन में घोड़े का महत्त्व सर्वाधिक था।

भारत में आगमन

पश्चिमी विद्वानों के अनुसार भारत में आर्यों का आगमन 1500 ई.पू. के कुछ पहले हुआ किंतु हमें उनके आगमन के बारे में स्पष्ट एवं ठोस पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं मिलते। पश्चिमोत्तर भारत से मिले हथियारों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में आने वाले आर्य कोटरवाली कुल्हाड़ियाँ, कांसे की कटारें और खड्ग का उपयोग करते थे।

आरंभिक आर्यों का निवास पूर्वी अफगानिस्तान, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती भूभाग में था। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की कुभा तथा अन्य नदियों के उल्लेख मिलते हैं। भारत में आर्यों की अनेक लहरें आईं। प्राचीनतम लहर उन ऋग्वैदिक लोगों की थी जो 1500 ई.पू. के आसपास इस उपमहाखंड में पहुंचे थे।

ईरानी तथा भारतीय आर्यों में समानता

ईरानी तथा भारतीय आर्यों में बड़ी समानता है जिससे अनुमान लगाया गया है कि आर्यों की ये दोनों शाखाएँ कभी एक ही स्थान पर निवास करती रही होंगी। हिन्दू-यूरोपीय  भाषा की सबसे प्राचीन कृति ऋग्वेद से हमें भारतीय आर्यों के बारे में जानकारी मिलती है।

ऋग्वेद में ऋषियों के विभिन्न परिवारों द्वारा अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण आदि देवताओं की स्तुति में रची गई प्रार्थनाओं का संकलन है। ऋग्वेद में दस मंडल हैं जिनमें से दो से सात तक के मंडल प्राचीन हैं। पहला और दसवां मंडल सम्भवतः बाद में जोड़ा गया। ईरानी भाषा के सबसे प्राचीन ग्रंथ अवेस्ता और आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में अनेक समानताएं हैं।

दोनों में न केवल अनेक देवताओं के अपितु सामाजिक वर्गों के नाम भी समान हैं। इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि जो भारतीय आर्यों के देवता हैं, ईरानी आर्यों के भी देवता थे। ईरानी आर्यों के धर्म-ग्रन्थ ‘अवेस्ता’ के प्रधान देवता अहुरमज्द हैं।

विद्वानों की धारणा है कि अहुर शब्द का रूपान्तर असुर है जिसका उल्लेख ऋग्वेद में बार-बार किया गया है। सम्भवतः देवासुर-संग्राम, जिसका वर्णन भारतीय आर्यों के साहित्य में मिलता है, ईरानी तथा भारतीय आर्यों का ही संघर्ष था। इस प्रकार भारतीय आर्य ‘देव’ और ईरानी आर्य ‘असुर’ कहलाये।

आर्यों का विस्तार

यद्यपि आर्यों के मूल निवास-स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं लग सका है परन्तु इतना निश्चित है कि जनसंख्या में वृद्धि हो जाने तथा आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण उन्हें अपना आदि-देश त्याग देना पड़ा। वे अपनी जन्मभूमि को छोड़कर उपजाऊ भूमि की ओर बढ़े। आर्यों को उस उपजाऊ प्रदेश के मूल निवासियों से संघर्ष करना पड़ा। आर्यों ने उस प्रदेश के मूल निवासियों को अनार्य दास तथा दस्यु कहा क्योंकि वे डील-डौल, रूप-रंग, रहन-सहन आदि में आर्यों से भिन्न थे।

दस्युओं अथवा आर्यपूर्वों से संघर्ष

इंद्र ने आर्यों के शत्रुओं को अनेक बार हराया। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ होता है दुर्गों को तोड़ने वाला परंतु आर्यपूर्वों के इन दुर्गों को पहचान पाना सम्भव नहीं है। आर्यों के शत्रुओं के हथियारों के बारे में भी बहुत थोड़ी जानकारी मिलती है। इनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति के लोगों की बस्तियां हो सकती हैं परन्तु आर्यों की सफलता के बारे में संदेह नहीं है।

इस सफलता का मुख्य कारण वे रथ थे जिनमें घोड़े जोते जाते थे। आर्यों के साथ ही पश्चिमी एशिया और भारत में घोड़ों का आगमन हुआ। आर्य सैनिक सम्भवतः कवच (वर्म) पहनते थे और उनके हथियार श्रेष्ठ थे। ऋग्वेद से जानकारी मिलती है कि दिवोदास ने, जो भरत कुल का था, शंबर को हराया था। यहाँ दिवोदास के नाम के साथ दास शब्द जुड़ा हुआ है।

ऋग्वेद के दस्यु सम्भवतः इस देश के मूल निवासी थे, और इन्हें हराने वाला सदस्य एक आर्य-मुखिया था। यह आर्य-मुखिया दासों से तो सहानुभुति रखता था, किन्तु दस्युओं का कट्टर शत्रु था। ऋग्वेद में दस्युहंता शब्द का बार-बार उल्लेख आया है दस्यु सम्भवतः लिंग-पूजक थे और दूध-दही, घी आदि के लिए गाय, भैंस नहीं पालते थे।

(1) सप्त सिन्धु में निवास

भारतीय आर्य चाहे भारत के मूल-निवासी रहे हों और चाहे विदेशों से भारत में आये हों परन्तु इतना निश्चित है कि प्रारम्भ में वे सप्त-सिन्धु नामक प्रदेश में निवास करते थे और यहीं से वे शेष भारत में फैले। सप्त-सिन्धु वही प्रदेश था जिसे वर्तमान में पंजाब कहा जाता है। पंजाब, पन्चाम्बु शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- पंच + अम्बु अर्थात् पाँच जलों अथवा नदियों का देश।

सप्त-सिन्धु का भी अर्थ है, सात नदियों का देश। उन दिनों इस प्रदेश में सात नदियाँ पाई जाती थीं। उनमें से पाँच-शतुद्रि (सतलज), विपासा (व्यास), परुष्णी (रावी), चिनाब (असिक्नी) तथा झेलम (वितस्ता) तो अब भी विद्यमान हैं और दो नदियाँ- सरस्वती तथा दृशद्वती, विलुप्त हो गई हैं। प्राचीन आर्यों ने अपने ग्रन्थों में इसी सप्त-सिन्धु का गुणगान किया है। इसी जगह उन्होंने वेदों की रचना की और यहीं पर उनकी सभ्यता तथा संस्कृति का सृजन हुआ। यहीं से भारतीय आर्य शेष भारत में फैले।

(2) ब्रह्मावर्त में प्रवेश

सप्त सिन्धु से आर्य पूर्व की ओर बढ़े। सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने के इनके दो प्रधान कारण हो सकते हैं। प्रथम कारण यह हो सकता है कि इनकी जन-संख्या में वृद्धि हो गई, जिससे इन्हें नये स्थान को खोजने की आवश्यकता पड़ी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार करने के लिए ये लोग आगे बढ़े।

सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने का जो भी कारण रहा हो, इतना तो निश्चित है कि वे बड़ी मन्द-गति से आगे बढ़े क्योंकि अनार्यों के साथ उन्हें भीषण संघर्ष करना पड़ा। अनार्यों से अधिक बलिष्ठ, वीर, साहसी तथा रण-कुशल होने के कारण आर्यों ने उन पर विजय प्राप्त कर ली और उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मावर्त के नाम से पुकारा।

(3) ब्रह्मर्षि-देश में प्रवेश

शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद आर्यों ने अपनी युद्ध-यात्रा जारी रखी। अब उन्होंने आगे बढ़कर पूर्वी राजस्थान, गंगा तथा यमुना के दो-आब और उसके निकटवर्ती प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस सम्पूर्ण प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मर्षि-देश कहा।

(4) मध्य-देश में प्रवेश

ब्रह्मर्षि-देश पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद आर्य और आगे बढ़े तथा हिमालय एवं विन्ध्य-पर्वत के मध्य की भूमि पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने इस प्रदेश का नाम मध्य-देश रखा।

(5) सुदूर-पूर्व में प्रवेश

बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व का भाग आर्यों के प्रभाव से बहुत दिनों तक मुक्त रहा, परन्तु अन्त में उन्होंने इस भू-भाग पर भी प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा।

(6) दक्षिणा-पथ में प्रवेश

विन्ध्य पर्वत तथा घने वनों के कारण दक्षिण भारत में बहुत दिनों तक आर्यों का प्रवेश न हो सका। इन गहन वनों तथा पर्वतमालाओं को पार करने का साहस सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने किया। सबसे पहले अगस्त्य ऋषि दक्षिण-भारत में गये। इस प्रकार आर्यों की दक्षिण विजय केवल सांस्कृतिक विजय थी। वह राजनीतिक विजय नहीं थी। धीरे-धीरे आर्य सम्पूर्ण दक्षिण भारत में पहुँच गये और उसके कोने-कोने में आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया। आर्यों ने दक्षिण-भारत को ‘दक्षिणा-पथ’ नाम दिया।

आर्यों के परस्पर युद्ध

पंचजनों का युद्ध

प्राचीन आर्यों का कोई संगठित राज्य नहीं था। आर्य छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त थे जिनमें परस्पर वैमनस्य था। फलतः आर्यों को न केवल अनार्यों से युद्ध करना पड़ा वरन् उनमें आपस में भी युद्ध होता था। इस प्रकार आर्य दोहरे संघर्ष में फंसे हुए थे। आर्यों के भीतर के संघर्ष के कारण उनके जीवन में लंबे समय तक उथल-पुथल मची रही।

पांच प्रमुख कबीलों अथवा पंचजनों की आपस में लड़ाइयां हुईं और इसके लिए उन्होंने आर्येतरों की भी सहायता ली। ‘भरत’ और ‘तत्सु’ आर्य-कुल के शासक थे। वसिष्ठ उनके समर्थक थे। भरत नाम का उल्लेख पहली बार ऋग्वेद में आया है। इसी के आधार पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

दाशराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध

ऋग्वैदिक उल्लेख के अनुसार सरस्वती नदी के किनारे भारत नाम का एक राज्य था, जिस पर सुदास नामक राजा शासन करता था। विश्वामित्र, राजा सुदास के पुरोहित थे। राजा तथा पुरोहित में अनबन हो जाने के कारण राजा सुदास ने विश्वामित्र के स्थान पर वसिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया। इससे विश्वामित्र बड़े अप्रसन्न हुए। उन्होंने दस राजाओं को संगठित करके, राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

दस राजाओं के इस समूह में पांच आर्य-राजा थे और पांच अनार्य-राजा थे। भरतों और दस राजाओं का जो युद्ध हुआ उसे दाशराज्ञ युद्ध कहते हैं। यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ। इसमें भरत कुल के राजा सुदास की विजय हुई और भरतों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। जिन कबीलों की हार हुई उनमें पुरुओं का कबीला सबसे महत्त्वपूर्ण था।

कुरुओं का उदय

कालांतर में भरतों और पुरुओं का मेल हुआ और परिणामतः कुरुओं का एक नया शासक कबीला अस्तित्त्व में आया। कुरु बाद में पांचालों के साथ मिल गए और उन्होंने उत्तरी गंगा की द्रोणी में अपना शासन स्थापित किया। उत्तर वैदिक काल में उन्होंने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यों में परस्पर अन्य युद्ध भी हुए। जिनमें कौरवों एवं पाण्डवों के बीच हुआ महाभारत का युद्ध प्रमुख है।

आर्यों का साहित्य

वैदिक ग्रन्थ

भारतीय आर्यों द्वारा वैदिक ग्रन्थों की रचना 2,500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक के काल में होना अनुमानित है। इनमें से ऋग्वेद की रचना 2500 से 1000 ई.पू. के काल में तथा उत्तर वैदिक ग्रंथों की रचना 1000 से 600 ई.पू. में होना अनुमानित है।

वैदिक ग्रन्थों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) संहिता अथवा वेद, (2) ब्राह्मण तथा (3) सूत्र। प्रथम दो अर्थात् संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुति भी कहा गया है। श्रुति का अर्थ है जो सुना गया हो। प्राचीन आर्यों का विश्वास था कि संहिता और ब्राह्मण किसी मनुष्य की कृति न थे। उनमें दिये गये उपदेशों को ऋषियों तथा मुनियों ने ब्रह्मा के मुख से सुना था। इसी से इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है।

इन ग्रन्थों में दिये गये उपदेश ब्रह्म-वाक्य हैं इसलिये वे सर्वथा सत्य हैं। उन पर संदेह नहीं किया जा सकता। इनका विरोध करने का दुस्साहस किसी को नहीं होता था। संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में जो उपदेश दिये गये हैं वे बहुत लम्बे हैं। अतः आर्य-विद्वानों ने जन-साधारण के लिए उपदेशों को संक्षेप में छोटे-छोेटे वाक्यों में लिख दिया। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहते हैं। सूत्र का अर्थ होता है संक्षेप में कहना। चूंकि इन ग्रन्थों में बड़ी-बड़ी बातें संक्षेप में लिखी गई हैं इसलिये इन्हें सूत्र कहा गया।

(1) संहिता अथवा वेद

संहिता का अर्थ होता है संग्रह। चूंकि इन ग्रन्थों में मन्त्रों का संग्रह है, इसलिये इन्हें संहिता कहा गया। संहिता को वेद भी कहते हैं। वेद संस्कृत की विद् धातु से निकला है जिसका अर्थ है- जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। वेद उन ग्रन्थों को कहते हैं जो ज्ञान की प्राप्ति के एकमात्र साधन समझे जाते थे।

वेद-वाक्य ब्रह्म-वाक्य होने के कारण चिरन्तन सत्य थे और उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने से इहलोक तथा परलोक दोनों ही सुधरता था। अर्थात् इस संसार में सुख की प्राप्ति होती थी और मृत्यु हो जाने पर मोक्ष मिलता था। संहिता अर्थात् वेदों का भारतीयों के जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है।

वेदों को संस्कृत-साहित्य की जननी कहा जाता है। यद्यपि सिन्धु-घाटी की सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी परन्तु उस सभ्यता के वसुन्धरा में अन्तर्भूत हो जाने के उपरान्त भारतीय सभ्यता का पुनः शिलान्यास संहिता द्वारा ही किया गया था।

संहिता को हम भारतीय समाज का प्राण कह सकते हैं जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता था। वेदों के उपरान्त जितने साहित्य लिखे गये उन सब का आधार संहिता ही है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। पहले इनमें से केवल प्रथम तीन वेदों की रचना की गई। इसलिये ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद को सम्मिलित रूप से त्रयी कहा गया। सबसे अन्त में अथर्ववेद की रचना हुई।

ऋग्वेद

यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ऋक् तथा वेद। ऋक् का अर्थ होता है स्तुति-मन्त्र। स्तुति-मन्त्र को ऋचा भी कहते हैं। जिस वेद में स्तुति मन्त्रों अर्थात् ऋचाओं का संग्रह किया गया है उसे ऋग्वेद कहते हैं। सूर्य, वायु, अग्नि आदि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। इसलिये ये ऋचाएँ इन्हीं देवताओं की स्तुति में लिखी गयीं।

ऋचाओं का संग्रह किसी एक ऋषि ने नहीं किया। वरन् वे विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न समय में संकलित की गईं। ऋग्वेद दस मण्डलों अथवा भागों में विभक्त है। प्रत्येक मण्डल कई अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक् का अर्थ होता है जो बाद में कहा गया है।

चूंकि इनका स्थान मण्डल के बाद है, इसलिये इन्हें अनुवाक् कहा गया है। प्रत्येक अनुवाक् कई सूक्तों में विभक्त है। सूक्त का अर्थ होता है अच्छी उक्ति अर्थात् जो अच्छी प्रकार कहा गया हो। ऋग्वेद में कुल 1008 सूक्त हैं। प्रत्येक सूक्त कई ऋचाओं अर्थात् स्तुति-मन्त्रों में विभक्त है, ऋचाओं की कुल संख्या 10,580 है।

ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी रचना सम्भवतः 2,500 ई.पू. से 1,000 ई.पू. तक के काल में हुई थी। यद्यपि ऋग्वेद स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है जिनका प्रधानतः धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व है परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्त्व है क्योंकि इस काल का इतिहास जानने के लिए यही ग्रन्थ एकमात्र साधन है।

कुछ मन्त्रों से आर्यों के पारस्परिक तथा अनार्यों से किये गये युद्धों का पता लगता है। यह भारत ही नही, वरन् विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इसकी प्राचीनता के कारण ही भारत का मस्तक ऊँचा है। इसकी रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई।

मैक्समूलर ने लिखा है- ‘विश्व के इतिहास में वेद उस रिक्त स्थान की पूर्ति करता है जिसे किसी भी भाषा का कोई भी साहित्यिक ग्रन्थ नहीं भर सकता। यह हमें अतीत के उस काल में पहुँचा देता है जिसका कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता और उस पीढ़ी के लोगों के वास्तविक शब्दों से परिचित करा देता है जिसका हम इसके अभाव में केवल धुधंला ही मूल्यांकन कर सकते थे।’

यजुर्वेद

यह दो शब्दों से मिलकर बना है- यजुः तथा वेद। यज् शब्द का अर्थ होता है यजन करना। यजुः उन मन्त्रों को कहते थे जिसके द्वारा यजन अथवा पूजन किया जाता था अर्थात् यज्ञ किये जाते थे। इसलिये यजुर्वेद उस वेद को कहते हैं जिसमें यज्ञों का विधान है। मूलतः यह कर्म-काण्ड प्रधान ग्रन्थ है।

इस ग्रन्थ में बलि की प्रथा, उसकी महत्ता तथा विधियों का वर्णन है। यजुर्वेद में सूक्तों के साथ-साथ अनुष्ठान भी हैं जिन्हें सस्वर पाठ करते जाने का विधान है। ये अनुष्ठान अपने समय की उन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के परिचायक हैं जिनमें इनका उद्गम हुआ था। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग शुक्ल यजुर्वेद कहलाता है जो स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है और दूसरा भाग कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है जिसमें पूर्व साहित्य का संकलन है।

यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में हुए थी। इस वेद की ऐतिहासिक उपयोगिता भी है। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन की झांकी मिलती है। इस वेद से ज्ञात होता है कि अब आर्य, सप्त-सिन्धु से कुरुक्षेत्र में चले आये थे। इस ग्रन्थ से यह भी ज्ञात होता है कि अब प्रकृति पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और जाति-प्रथा का प्रादुर्भाव हो गया था।

सामवेद

साम के दो अर्थ होते हैं- शान्ति तथा गीत। यहाँ पर साम का अर्थ है गीत। इसलिये सामवेद का अर्थ हुआ वह वेद जिसके पद गेय हैं और जो संगीतमय हैं। सामवेद में केवल 66 मन्त्र नये हैं। शेष मंत्र ऋग्वेद से लिये गये हैं। सामवेद के मन्त्र गेय होने के कारण मन को बड़ी शान्ति देते हैं। यज्ञादि अवसरों पर इन मन्त्रों का पाठ किया जाता है।

अथर्ववेद

अथ का अर्थ होता है मंगल अथवा कल्याण, अथर्व का अर्थ होता है अग्नि और अथर्वन् का अर्थ होता है पुजारी। इसलिये अथर्ववेद उस वेद को कहते है जिसमें पुजारी मन्त्रों तथा अग्नि की सहायता से भूत-पिशाचों से रक्षा कर मनुष्य का मंगल अथवा कल्याण करते हैं। इस ग्रन्थ में बहुत से प्रेतों तथा पिशाचों का उल्लेख है जिनसे बचने के लिए मन्त्र दिये गये हैं।

विपत्तियों और व्याधियों के निवारण के लिए अथर्ववेद में मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। ये मन्त्र जादू-टोने की सहायता से मनुष्य की रक्षा करतेे हैं। इस ग्रन्थ में कुछ मन्त्र ऋग्वेद के हैं और कुछ सामवेद के। इस वेद में आर्येतरों के विश्वासों तथा उनकी प्रथाओं के बारे में जानकारी मिलती है। यह ग्रन्थ आर्यों के पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी प्रकाश डालता है। इसकी रचना प्रथम तीन वेदों की रचना के बहुत बाद में हुई थी।

(2) ब्राह्मण

ब्रह्मण, ब्रह्म शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है वेद। इसलिये ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते है जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गई है। इनमें यज्ञों के स्वरूप तथा उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। चूंकि यज्ञ करने तथा कराने का कार्य पुरोहित करते थे जो ब्राह्मण होते थे, इसलिये केवल ब्राह्मणों से संबंधित होने के कारण इन ग्रन्थों का नाम ब्राह्मण रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना ब्रह्मर्षि देश में हुई थी।

यद्यपि ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना याज्ञिकों के पथ-प्रदर्शन के लिए की गई परन्तु इनसे आर्यों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना प्रधानतः गद्य में की गई है परन्तु कहीं-कहीं पद्य भी विरल रूप से मिलते हैं। ऐतरेय, कौषीतकी, तैतिरीय, शतपथ आदि मुख्य ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं। आरण्यक तथा उपनिषद् भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं।

(3) आरण्यक

अरण्य शब्द का अर्थ होता है- जंगल। आरण्यक उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनकी-रचना जंगलों के अत्यन्त शान्तिमय वातावरण में हुई और जिनका अध्ययन तथा चिन्तन भी जंगलों में एकान्तवास द्वारा शान्तिमय वातावरण में किया जाना चाहिये। ये ग्रन्थ वानप्रस्थाश्रमियों के लिए होते थे। वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर लोग जंगलों में चले जाते थे और वहीं पर चिन्तन तथा मनन किया करते थे। अध्यात्म-चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता है। इसमें आत्मा तथा ब्रह्म के सम्बन्ध में उच्च कोटि का चिंतन किया गया है।

(4) उपनिषद्

यह तीन शब्दों से मिलकर बना है- उप+नि+षद्। उप का अर्थ होता है समीप, नि का अर्थ होता है नीचे और षद् का अर्थ होता है बैठना। इसलिये उपनिषद् उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनका अध्ययन गुरु के समीप नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिये। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भाग में आते हैं। ये ज्ञान प्रधान ग्रन्थ हैं। इनमें उच्च कोटि का दार्शनिक विवेचन मिलता है।

उपनिषदों की तुलना में संसार में कोई अन्य श्रेष्ठ दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है। उपनिषदों से हमें ज्ञात होता है कि इस युग में वर्ण तथा वर्णाश्रम व्यवस्था दृढ़ रूप से स्थापित हो गये थे तथा मानव की सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया था। उपलब्ध उपनिषद ग्रन्थों की संख्या लगभग दो सौ है किन्तु उनमें से केवल बारह का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके नाम हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषितकी और श्वेताश्वतर।

(5) सूत्र

सूत्र का शाब्दिक अर्थ होता है धागा। इसलिये सूत्र उन ग्रन्थों को कहते हैं जो इस प्रकार लिखे जाते थे मानो कोई चीज धागे में पिरो दी गई हो। और उनमें एक क्रम स्थापित हो गया हो। जब वैदिक साहित्य का रूप अत्यन्त विशाल हो गया तो उसे कंठस्थ करना बहुत कठिन हो गया। इसलिये एक ऐसी रचना-शैली का विकास किया गया जिसमें वाक्य तो छोटे-छोटे हों परन्तु उनमें बड़े-बड़े भावों तथा विचारों का समावेश हो। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहा गया।

महर्षि पाणिनि ने सूत्रों की तीन विशेषताएँ बताई हैं- वे कम अक्षरों में लिखे जाते हैं, वे असंदिग्ध होते हैं और वे सारगर्भित होते हैं। इन सूत्रों में कल्प-सूत्र सर्वाधिक महत्त्व का है। सूत्रों की रचना करने वालों में पाण्निि प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों की रचना 700 ई.पू. से 200 ई.पू. तक के काल में हुई थी। सूत्रों में आर्यों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का पर्याप्त परिचय मिलता है।

अन्य ग्रन्थ

आर्यों ने अन्य ग्रन्थों की भी रचना की, जिनका उनके जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।

दर्शन शास्त्र

कई मुनियों ने दर्शन-शास्त्रों का निर्माण किया, जिनकी संख्या 6 है- (1) कपिल मुनि का सांख्य-दर्शन, (2) पतन्जलि का योग-दर्शन, (3)  कण्व का वैशेषिक दर्शन, (4) गौतम का न्याय-दर्शन, (5) जैमिनि का पूर्व मीमांसा तथा (6) बादरायण का उत्तर-मीमांसा दर्शन। हिन्दू धर्म के अध्यात्मवाद का भवन इन्हीं दर्शन शास्त्रों के स्तम्भों पर खड़ा है।

महाकाव्य

आर्यों के दो प्रमुख महाकाव्य हैं- (1) रामायण- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मिीकि ने की। (2) महाभारत- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। महाभारत का एक अंश गीता कहलाता है जिसमें निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया गया है। इस ग्रन्थ का और इससे भी अधिक रामायण का हिन्दू-समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है।

धर्मशास्त्र तथा पुराण

धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी भारतीय समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। पुराणों की संख्या 18 है जिनमें विष्णु पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण तथा भागवत पुराण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। महाकाव्यों तथा पुराणों में वैदिक आदर्शों का प्रतिपादन किया गया है। अन्तर यह है कि महाकाव्यों में इसे मनुष्य के मुख से और पुराणों मे देवताओं के मुख से प्रतिपादित बताया गया है। आर्यों ने स्मृतियों की भी रचना की। स्मृतियों में नारद स्मृति, मनु स्मृति तथा याज्ञवलक्य स्मृति प्रमुख हैं।

वैदिक साहित्य का महत्त्व

(1) विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान

वैदिक ग्रन्थों का, विशेषतः ऋग्वेद का विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना भारत की पवित्र भूमि में हुई, इसलिये इन ग्रन्थों के कारण भारत का मस्तक ऊँचा है। ये ग्रन्थ सिद्ध करते हैं कि भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति, विश्व में सर्वाधिक प्राचीन है। पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति से आलोक प्राप्त हुआ।

(2) उत्कृष्ट जाति के इतिहास की झांकी

वैदिक साहित्य से हमें उत्कृष्ट आर्य जाति की झांकी प्राप्त होती है। आर्यों का विश्व की विभिन्न जातियों में बड़ा ऊँचा स्थान है। यह जाति शारीरिक बल, मानसिक प्रतिभा तथा आध्यात्मिक चिन्तन में अन्य जातियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ रही है इसलिये जिन ग्रन्थों में इन आर्यों के जीवन की झांकी मिलती है वे निश्चय ही बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

(3) प्रारम्भिक आर्यों का इतिहास जानने का एकमात्र साधन

आर्यों के मूल-स्थान तथा उनके प्रारम्भिक जीवन का परिचय प्राप्त करने का एकमात्र साधन वैदिक ग्रन्थ हैं। यदि ये ग्रन्थ उपलब्ध न होते तो भारतीय आर्यों का सम्पूर्ण प्रारम्भिक इतिहास अन्धकारमय होता और उसका कुछ भी ज्ञान हमें प्राप्त नहीं हो सकता था।

(4) हमारे पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब

यदि हम वैदिक ग्रन्थों को अपने पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब कहें तो कुछ अनुचित न होगा। वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन कर लेने पर हमें पूर्वजों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन का परिचय मिलता है। यदि वैदिक ग्रन्थ न होते तो हमें भी किसी बर्बर तथा असभ्य जाति की सन्तान कहा जा सकता था परन्तु इन ग्रन्थों ने हमें अत्यन्त सभ्य तथा सुसंस्कृत जाति की सन्तान होने का गौरव प्रदान किया है।

(5) हमारी सभ्यता का मूलाधार

वैदिक ग्रन्थ ही हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के मूलाधार तथा प्रबल स्तम्भ हैं। जिन आदर्शों तथा सिद्धान्तों का इन ग्रन्थों में निरूपण किया गया है वे आदर्श तथा सिद्धांत भारतीयों के जीवन के पथ-प्रदर्शक बन गये। इन ग्रन्थों ने हमारे जीवन को सुंदर सांचे में ढाल दिया। यद्यपि भारत पर अनेक बर्बर जातियों के आक्रमण हुए जिन्होंने इसको बदलने का प्रयत्न किया परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। अनेक शताब्दियों के बीत जाने पर भी हमारे जीवन के आदर्श तथा सिद्धान्त वही हैं जिन्हें वैदिक ऋषियों तथा मुनियों ने निर्धारित किया था।

(6) हिन्दू धर्म का प्राण

यदि हम वैदिक ग्रन्थों को हिन्दू-धर्म का प्राण कहंे तो अनुचित न होगा। हिन्धू धर्म के मूल सिद्धान्तों का दर्शन हमें वैदिक ग्रन्थों में ही होता है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य वास्तव में धर्ममय है। इसका कारण यह है कि ऋषियों ने भौतिक जीवन की अपेक्षा आध्यात्मिक जीवन को अधिक महत्त्व दिया था। वे इस जगत को नाशवान तथा निस्सार समझते थे। इसी से उन्होंने जीवन के प्रत्येक अंग पर धर्म की छाप डाल दी। हमारे ऋषियों ने समाज को धर्म की एक ऐसे लकुटी प्रदान की जिसके सहारे यह समाज आज तक सुरक्षित चला आ रहा है।

(7) आध्यात्मिक विवेचन के कोष

हमारे वैदिक ग्रन्थ आध्यात्मिक विवेचन के विशाल कोष हैं। विश्व की किसी भी जाति के इतिहास में इतने विस्तृत तथा गहन रूप से आघ्यात्मिक विवेचन नहीं हुआ जितना वैदिक ग्रन्थों में हुआ है।

(8) हिन्दू समाज के स्तम्भ

वैदिक ग्रन्थों को हम हिन्दू समाज का स्तम्भ कह सकते हैं। वैदिक ऋषियों ने हमारे समाज को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए दो व्यवस्थाएँ की थीं। इनमें से एक थी वर्ण-व्यवस्था और दूसरी थी वर्णाश्रम धर्म। इन्हीं दोनों स्तम्भों पर भारतीय समाज को खड़ा किया गया था और इन्हीं का अनुसरण कर समाज का चूड़ान्त विकास किया जाना था।

(9) भारतीय भाषाओं की जननी

वैदिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। संस्कृत से ही भारत की अधिकांश भाषाएँ निकली हैं। भारत की समस्त भाषाओं पर संस्कृत का थोड़ा-बहुत प्रभाव अवश्य पड़ा है। वास्तव में आर्य-परिवार की समस्त भाषाएँ इसकी पुत्रियां हैं तथा संस्कृत उनकी जननी है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति

वैदिक सभ्यता का प्रसार 

ऋग्वैदिक सभ्यता 

उत्तर-वैदिक सभ्यता 

ऋग्वैदिक सभ्यता (अध्याय 8)

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चतुर्मुखी ब्रह्मा जो प्रत्येक मुख से वेदों का उच्चारण करते हैं।

वैदिक सभ्यता उस काल की सभ्यता को कहते हैं जिसमें आर्यों ने वैदिक ग्रंथों की रचना की। ऋग्वैदिक सभ्यता उस सभ्यता को कहते हैं जिसमें आर्यों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की। इस काल में आर्य प्राकृतिक शक्तियों से अत्यंत प्रभावित थे और प्रत्येक प्राकृतिक शक्ति में मानवीय गुणों का अधिरोपण करके उनकी स्तुतियां करते थे।

वेद चार हैं तथा चारों वेद एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमिक विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना की गई। वेदों की रचना के बाद उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना की गई।

वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों की संख्या जब इतनी अधिक हो गई और उनका स्वरूप जब इतना विशाल हो गया कि उन्हें कंठस्थ करना कठिन हो गया तो उन्हें संक्षिप्त स्वरूप देने के लिए सूत्रों की रचना की गई। इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना में सहस्रों वर्ष लगे। विद्वानों की मान्यता है कि वैदिक साहित्य की रचना 2,500 से 600 ई.पू. के बीच हुई। इसलिये इस काल को वैदिक काल कहा जाता है तथा इस काल में आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है।

ऋग्वैदिक सभ्यता का काल विभाजन

वैदिक काल को दो भागों में विभक्त किया गया है-

(1) ऋग्वैदिक सभ्यता (2,500 ई.पू. से 1000 ई.पू.): चारों वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसलिये ऋग्वेद की सभ्यता सर्वाधिक पुरानी है। ऋग्वेद काल में आर्य लोग सप्त-सिन्धु क्षेत्र में निवास करते थे। इस काल की सभ्यता को ऋग्वैदिक सभ्यता कहते हैं।

(2) उत्तर वैदिक सभ्यता (1000 ई.पू. से 600 ई.पू.): उत्तर-वैदिक काल में आर्य लोग सरस्वती तथा गंगा नदियों के मध्य की भूमि में पहुँच गये थे और उन्होंने वहाँ पर अपने राज्य स्थापित कर लिये थे। इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र था। उत्तर-वैदिक काल के आर्यों की सभ्यता का यहीं विकास हुआ। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना इसी क्षेत्र में हुई। उत्तर-वैदिक काल में ऋग्वैदिक सभ्यता का क्रमशः विकास होता गया और इसमें अनेक परिवर्तन होते चले गये।

ऋग्वैदिक सभ्यता

ऋग्वैदिक सभ्यता का उद्भव सप्त सिंधु क्षेत्र तथा सरस्वती नदी के निकट हुआ था। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव तथा सरस्वती का अनेक मंत्रों में गुण-गान किया गया है। यद्यपि अब सरस्वती नदी विद्यमान नहीं है, और उसे प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अद्दश्य रूप से प्रस्थापित कर दिया गया है, परन्तु उन दिनों वह सतजल तथा कुरुक्षेत्र के मध्य बहती थी।

राजनीतिक दशा

यद्यपि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रन्थ है तथा उसमें प्रधानतः स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है तथापि कुछ मंत्रों से तत्कालीन राजनीतिक दशा पर भी प्रकाश पड़ता है। इस काल की राजनीतिक दशा निम्नांकित थी-

(1) राजनीतिक विभाजन

ऋग्वैदिक सभ्यता में राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार कुटुम्ब था जो पैतृक होता था। कुटुम्ब को आधुनिक इतिहासकारों ने कबीला कहकर पुकारा है। कुटुम्ब का प्रधान, पिता अथवा अन्य कोई बड़ा-बूढ़ा पुरुष होता था जो कुटुम्ब के अन्य सदस्यों पर नियन्त्रण रखता था। कई कुटुम्बों को मिला कर एक ग्राम बनता था। ग्राम का प्रधान ‘ग्रामणी’ कहलाता था। कई ग्रामों को मिला कर ‘विस’ बनता था। विस का प्रधान ‘विसपति’ कहलाता था। कई विसों को मिला कर ‘जन’ बनता था। जन का रक्षक ‘गोप’ अथवा ‘राजन्य’ कहलाता था।

(2) राजनीतिक संगठन

ऋग्वैदिक सभ्यता में राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक था। ऋग्वेद में अनेक राजन्यों का उल्लेख मिलता है। राजन्य का पद आनुवंशिक था और वह उसे उत्तराधिकार के नियम से प्राप्त होता था। अर्थात् राजन्य के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था।

राजन्य का पद यद्यपि वंशानुगत होता था, तथापि हमें समिति अथवा सभा द्वारा किए जाने वाले चुनावों के बारे में भी सूचना मिलती है। राज्य में राजन्य का स्थान सर्वोच्च था। वह सुन्दर वस्त्र धारण करता था और भव्य राज-भवन में निवास करता था जिसमें राज्य के बड़े-बड़े पदाधिकारी, पण्डित, गायक तथा नौकर-चाकर उपस्थित रहते थे। चूँकि उन दिनों गमनागमन के साधनों का अभाव था इसलिये राज्य बहुत छोटे हुआ करते थे।

(3) राजन्य के कर्त्तव्य

राजन्य को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है। वह गोधन की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की आराधना करता था। प्रजा की रक्षा करना, शत्रुओं से युद्ध करना, राज्य में शान्ति स्थापित करना और शान्ति के समय यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, राजन्य के मुख्य कर्त्तव्य होते थे।

राजन्य अपनी प्रजा की न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखता था। वरन् वह उसकी आध्यात्मिक उन्नति का भी ध्यान रखता था। राजन्य अपनी प्रजा के आचरण की देखभाल के लिए गुप्तचर रखता था जो प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में राज्य की सूचना देते थे। राजन्य, आचरण-भ्रष्ट प्रजा को दण्डित करता था।

(4) राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

ऋग्वैदिक सभ्यता में राजन्य की सहायता के लिए बहुत से पदाधिकारी हाते थे जिनमें पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी प्रधान थे।

पुरोहित

समस्त पदाधिकारियों में पुरोहित का स्थान सबसे ऊँचा था। उसका पद प्रायः वंशानुगत होता था परन्तु कभी-कभी वह किसी अन्य कुटुम्ब से भी चुन लिया जाता था। पुरोहित को बहुत से कर्त्तव्य करने होते थे। वह राजन्य का धर्मगुरु तथा परामर्शदाता होता था। इसलिये राज्य में उसका बड़ा प्रभाव रहता था।

वह रण-क्षेत्र में भी राजन्य के साथ जाता था और अपनी प्रार्थनाओं तथा मन्त्रों द्वारा राजन्य की विजय का प्रयत्न करता था। ऋग्वैदिक काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र नामक दो प्रमुख पुरोहित हुए। उन्होंने राजाओं का पथ-प्रदर्शन किया, उनका गुणगान किया और बदले में गायों और दासियों के रूप में भरपूर दक्षिणाएं प्राप्त कीं।

सेनानी

राज्य का दूसरा प्रमुख अधिकारी सेनानी होता था। वह भाला, कुल्हाड़ी, कृपाण आदि का उपयोग करना जानता था। वह सेना का संचालन करता था। उसकी नियुक्ति सम्भवतः राजन्य स्वयं करता था। जिन युद्धों में राजन्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं समझी जाती थी, उनमें सेनानी ही सेना का प्रधान होता था जो रण-क्षेत्र में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था।

ग्रामणी

ग्रामणी तीसरा प्रधान पदाधिकारी होता था। वह गाँव के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी होता था। आरम्भ में ग्रामणी योद्धाओं के एक छोटे समूह का नेता होता था परन्तु जब गांव स्थायी रूप से बस गए तो ग्रामणी गांव का मुखिया हो गया और कालांतर में उसका पद व्राजपति के समकक्ष हो गया।

कुलप

परिवार अथवा कुल का मुखिया कुलप कहलाता था।

व्राजपति

गोचर-भूमि के अधिकारी को व्राजपति कहा गया है। वह युद्ध में कुलपों और ग्रामणियों का नेतृत्व करता था।

(5) युद्ध-विधि

भारत में ऋग्वैदिक आर्यों की सफलता के दो प्रमुख कारण थे- घोड़ों से चलने वाले रथ और लोहे से बनने वाले हथियार। युद्ध में समस्त लोगों को भाग लेना पड़ता था। साधारण लोग पैदल युद्ध करते थे परन्तु राजन्य तथा क्षत्रिय लोग रथों पर चढ़कर युद्ध करते थे।

युद्ध में आत्म-रक्षा के लिए कवच आदि का प्रयोग किया जाता था। आक्रमण करने का प्रधान शस्त्र धनुष-बाण था परन्तु आवश्यकतानुसार भालों, फरसों तथा तलवारों का भी प्रयोग किया जाता था। ध्वजा, पताका, दुन्दुभि आदि का भी प्रयोग किया जाता था। युद्ध प्रायः नदियों के तट पर हुआ करते थे।

(6) समिति तथा सभा

यद्यपि राजन्य राज्य का प्रधान होता था परन्तु वह स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश नहीं होता था। उसे परामर्श देने के लिए कुछ संस्थायें विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ और गण-जैसी अनेक कबीलाई परिषदों के उल्लेख मिलते हैं। इन परिषदों में जनता के हितों, सैनिक अभियानों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में विचार-विमर्श होता था।

ऋग्वैदिक काल में स्त्रियाँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं। राजतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व की परिषदें सम्भवतः सभा और समिति थीं। सम्भवतः समिति में सारी प्रजा, सदस्य होती थी परन्तु सभा में केवल उच्च-वंश के वयोवृद्धों को सदस्यता मिलती थी। ये दोनों परिषदें इतने महत्त्व की थीं कि राजन्य भी इनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करता था।

(7) न्याय व्यवस्था

राजन्य अपने सहायकों की सहायता से विवादों एवं झगड़ों का निर्णय करता था। न्यायिक कार्य में उसे पुरोहित से बड़ी सहायता मिलती थी। जिन अपराधों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, वे चोरी, डकैती, सेंध लगाना आदि हैं। पशुओं की बड़ी चोरी हुआ करती थी। अपराधियों को उस व्यक्ति की इच्छानुसार दण्ड मिलता था जिसे क्षति पहुँचती थी। जल तथा अग्नि-परीक्षा का भी इस युग में प्रचार था।

(8) गुप्तचर

उस काल में चोरियां भी होती थीं, विशेषतः गायों की। आपराधिक गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। कर वसूल करने वाले किसी अधिकारी के बारे में हमें जानकारी नहीं मिलती। सम्भवतः ये कर राजाओं को भेंट के रूप में, स्वेच्छा से दिए जाते थे। इस भेंट को बलि कहते थे।

(9) अन्य पदाधिकारी

राजन्य कोई नियमित सेना नहीं खड़ी करता था किंतु युद्ध के अवसर पर जो सेना एकत्र की जाती थी उसमें व्रात, गण, ग्राम और शर्ध नामक विभिन्न सैनिक समूह सम्मिलित होते थे। कुल मिलाकर यह एक कौटुम्बिक अथवा कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना का प्राधान्य था। नागरिक व्यवस्था अथवा प्रादेशिक व्यवस्था का अस्तित्त्व नहीं था। लोग अपने स्थान बदलते हुए निरन्तर फैलते जा रहे थे।

ऋग्वैदिक सभ्यता की सामाजिक दशा

ऋग्वेद के अध्ययन से तत्कालीन समाज का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है। सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ।

लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

(1) पारिवारिक जीवन

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ऋग्वेद में परिवार के लिये कुल शब्द का प्रयोग हुआ है किंतु इस शब्द का प्रयोग भी बहुत कम हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भांजे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था। रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था। कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता का बहुत बड़ा हाथ रहता था। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था। वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी।

अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कबीले अथवा कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

(2) सन्तान की स्थिति

विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे।

विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं। ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नही की गई है।

(3) विवाह की व्यवस्था

ऋग्वैदिक काल में विवाह संस्था की स्थापना हो चुकी थी। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी। यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था।

बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरूतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय।

यद्यपि विवाह पर पिता का नियंत्रण रहता था परन्तु वर-कन्या को भी काफी स्वतन्त्रता रहती थी। कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था।

विधवा विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता। दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता। अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे।

(4) स्त्रियों की दशा

इस युग में स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और वे समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति के साथ भाग लेती थीं। पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग ले सकती थीं।

स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी।

इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। स्पष्ट है कि सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

(5) वेश-भूषा

ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहिनते थे। एक नीचे का वस्त्र था जिसे नीवि कहते थे। इनका दूसरा वस्त्र काम और तीसरा वस्त्र अधिवास कहलाता था। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहिनते थे। कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहिनते थे।

स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे। यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे।

(6) खाद्य-पदार्थ

चावल, जौ, घी, दूध तथा मांस, ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। पशुओं की बलि दी जाती थी जिनका मांस खाया जाता था।

(7) पेय-पदार्थ

ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। सुरापान घृणित समझा जाता था। आर्य ग्रंथों में सुरापान को अपराध बताया गया है। ब्राह्मण इसे घोर घृणा की दृष्टि से देखते थे।

(8) मनोरंजन

रथ-संचालन, जुआ खेलना, नाच-गाना, बाजे बजाना, पशु-पक्षियों का शिकार करना, ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधन थे।

(9) शिक्षा

इस काल में शिक्षा मौखिक होती थी इसलिये स्मरण-शक्ति का बड़ा महत्त्व था। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठाग्र करने का प्रयत्न करते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था।

(10) औषधि

ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता माने जाते थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। चिकित्सा करना एक प्रकार का व्यवसाय बन गया था।

(11) आश्रम-व्यवस्था

इस काल में आश्रम-व्यवस्था स्थापित होनी आरंभ हो चुकी थी किंतु उसका स्वरूप स्पष्टतः निर्धारित नहीं हुआ था। आश्रम व्यवस्था की प्रारंभिक अवधारणा में तीन ही आश्रम थे- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम। आश्रम व्यवस्था ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के लिये ही थी।

(12) गृह की व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्यों के मकान बांस के बने होते थे। इनको बनाने में लकड़ी तथा सरपत का भी प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक घर में अग्निशाला का प्रबन्ध रहता था जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में एक बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कमरा होता था।

(13) शव विसर्जन

इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

सामाजिक वर्गीकरण

(1) आर्य-अनार्य का विभेद

ऋग्वेद में लगभग 1500-1000 ई.पू. के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। अनुमान होता है कि आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्याें की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था। आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा।

(2) आर्यों में विभेद

आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित लूट का अधिकांश धन परस्पर बांट लेते थे। युद्ध की लूट के असमान वितरण के कारण सामाजिक असमानताएं पैदा हुईं। परिणामतः सामान्य जनों की अपेक्षा मुखिया और पुरोहित अधिक ऊंचे उठे। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। इसलिये कबीले में सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। धीरे-धीरे कबीलाई समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

(3) व्यवसाय आधारित विभेद

आर्य अपने कार्यानुसार चार वर्णों में विभक्त हो गये। पढ़ने तथा यज्ञ का कार्य करने वाले ब्राह्मण, युद्ध तथा शासन करने वाले क्षत्रिय अथवा राजन्य, कृषि तथा व्यापार करने वाले वैश्य और सेवा का कार्य करने वाले शूद्र कहलाये। पुरुष सूक्त में लिखा है कि ब्राह्मण आदि-पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसकी जंघा से तथा शूद्र उसके चरणों से निकले हैं।

इस प्रकार चार वर्णों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है परन्तु यह व्यवस्था व्यवसाय पर आधारित थी और इसमें जटिलता नहीं थी। अन्तर्जातीय विवाह तथा सहभोज का प्रचलन था, छुआछूत का भेदभाव नहीं था। ऋग्वेदिक काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था।

ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- ‘मैं कवि हूूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं…।’

(4) दास व्यवस्था

ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्याें ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्याें में नहीं लगाया जाता था।

ऋग्वैदिक सभ्यता में आर्थिक-दशा

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन सरल था, उसमें जटिलता उत्पन्न नहीं हुई थी। प्रारंभिक ऋग्वैदिक आर्यों की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः पशुचारी थी, अन्न-उत्पादक नहीं थी, इसलिए लोगों से नियमित करों की उगाही बहुत कम होती थी। भूमि अथवा अनाज के दान के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता।

समाज में कबीलाई बंधन शक्तिशाली थे। करों की उगाही अथवा भू-संपत्ति के आधार पर सामाजिक वर्ग अभी अस्तित्त्व में नहीं आए थे। इस काल की आर्थिक दशा इस प्रकार से थी-

(1) गाँवों की व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में रहते थे। ऋग्वेद में नगरों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। गाँव पास-पास होते थे। वन्य पशुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा के लिए मिट्टी के घरों वाली बस्तियों की झाड़ियों अथवा अन्य कांटों आदि से किलेबंदी की जाती थी। अधिकांश घर बांस तथा लकड़ी के बने होते थे।

(2) कृषि

ऋग्वैदिक आर्यों का प्रधान व्यवसाय कृषि था। परिवार का अलग खेत होता था परन्तु चरागाह सबका एक होता था। खेती हल से की जाती थी। ऋग्वेद के आरंभिक भाग में फाल के उल्लेख मिलते हैं। उनके फाल सम्भवतः लकड़ी के बने होते थे। ऋग्वैदिक लोग बुवाई, कटाई और मंडाई से परिचित थे। उन्हें विभिन्न ऋतुओं की भी अच्छी जानकारी थी। ये लोग प्रधानतः गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे। इस काल के आर्य, फल तथा तरकारी भी पैदा करते थे।

(3) पशु-पालन

ऋग्वैदिक आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशु-पालन था। पशुओं में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयोगी होती थी। गाय को अध्न्या कहा गया है अर्थात् जो मारी न जाय। ऋग्वेद में गाय के बारे में आए बहुत सारे उल्लेखों से यही सिद्ध होता है कि आर्य पशुपालक थे।

अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने गायों के लिए लड़ी थीं। ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का उपयोग हुआ हैं। जिसका अर्थ ‘गायों की खोज’ होता है। गाय को सबसे बड़ी सम्पत्ति समझा जाता था। बैलों से हल जोतने तथा गाड़ी खींचने के काम लिया जाता था। घोड़ों का प्रयोग रथों में किया जाता था। आर्यों द्वारा पाले जाने वाले अन्य पशु, भेड़, बकरी तथा कुत्ते थे। कुत्ते घरों तथा बस्तियों की रखवाली करते थे।

(4) पशुओं का शिकार

ऋग्वैदिक आर्य मांस खाते थे। इसलिये वन्य पशुओं का शिकार भी उनकी जीविका का साधन था। ये लोग धनुष-बाण तथा लोहे के भालों द्वारा सूअर, हरिण तथा भैंसों का शिकार करते थे और पक्षियों को जाल में फंसा कर पकड़ते थे। शेरों को चारों ओर से घेर कर मारा जाता था।

(5) मृद्भाण्ड

हरियाणा के भगवानपुरा से और पंजाब के तीन स्थलों से चित्रित धूसर मृदभांड और बाद के काल के हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। भगवानपुरा में मिली वस्तुओं का तिथि निर्धारण 1600 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक किया गया है। लगभग यही काल ऋग्वेद का भी है। इन चारों स्थानों का भौगोलिक क्षेत्र वही है जो ऋग्वेद में दर्शाया गया है।

यद्यपि इन चारों स्थलों पर चित्रित धूसर पात्र मिले हैं फिर भी न तो लौह सामग्री और न ही अनाज यहाँ मिले हैं। अतः हम चित्रित धूसर मृद्भांड की एक लौह पूर्व अवस्था के बारे में सोच सकते हैं जो ऋग्वैदिक अवस्था के समकालिक हैं।

(6) दस्तकारी के कार्य

ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पकारों के उल्लेख मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि आर्य लोग इन शिल्पों से भली-भांति परिचित थे। तांबे अथवा कांसे के लिए प्रयुक्त अयस शब्द से ज्ञात होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। जब वे उप-महाखंड के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे तब वे सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते होंगे।

ऋग्वैदिक काल के बढ़ई रथ तथा गाड़ियाँ बनाते थे। ये लोग लकड़ी के प्याले भी बनाते थे और उन पर बहुत अच्छी नक्काशी करते थे। लोहार, लोहे, ताम्बे तथा पीतल के विभिन्न प्रकार के बर्तन, अन्य-शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। सुनार, सोने-चांदी के आभूषण बनाते थे। चर्मकार लोग चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे। सीना-पिरोना, चटाइयां बुनना, ऊनी तथा सूती कपड़े बनाना आदि भी जीविका के साधन थे। कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

(7) व्यापार

ऋग्वैदिक आर्यों की जीविका का एक साधन व्यापार भी था। ये लोग विदेशी तथा आन्तरिक दोनों प्रकार का व्यापार करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु-विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी से बनी मुद्राओं का प्रयोग होने लगा।

इस काल में निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा। कपड़े, चमड़े तथा चद्दरें व्यापार की मुख्य वस्तुएँ होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग होता था।

(8) ऋण की प्रथा

ऋग्वैदिक काल में ब्याज पर ऋण देने की प्रथा थी। वैश्य, साहूकार तथा महाजन यह कार्य करते थे और यह उनकी जीविका का प्रमुख साधन होता था। ऋण चुकाना एक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था और न चुकाने पर उसे निश्चित समय तक महाजन की सेवा करनी पड़ती थी।

ऋग्वैदिक सभ्यता में विभिन्न कलाओं का विकास

बौद्धिक परिपक्वता विकसित हो जाने से ऋग्वैदिक काल के लोगों की विभिन्न प्रकार की रचनात्मक कलाओं में रुचि थी।

(1) काव्य कला

ऋग्वैदिक आर्य, काव्य-कला में बड़े कुशल थे। ऋग्वेद पद्य शैली में लिखा गया है। ऋग्वेद का अधिंकाश काव्य धार्मिक गीति-काव्य है। इस काल की कविता में स्वाभाविकता तथा सौन्दर्य है। उषा की प्रशंसा में ऋषियों ने बड़ी भावुकता प्रकट की है।

(2) लेखन कला

यह निश्चित रूप में नहीं कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्य लेखन-कला से परिचित थे अथवा नहीं परन्तु कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे इस कला को जानते थे।

(3) अन्य कलाएँ

ऋग्वैदिक आर्य अन्य कई कलाओं में प्रवीण थे। गृह निर्माण-कला में वे इतने निपुण थे कि सहस्र-स्तम्भ तथा सहस्र-द्वार के मकान तक बनाते थे। ऋग्वैदिक आर्य कताई, बुनाई, रगांई, धातु-कला, संगीत कला, नृत्य कला एवं गायन कला में भी निपुण थे।

ऋग्वैदिक सभ्यता में धार्मिक जीवन

ऋग्वैदिक आर्यों का जीवन वास्तव में धर्ममय था। जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं था जिस पर धर्म की गहरी छाप न हो। इस काल का धर्म बड़ी उच्च-दशा में था। इस काल में प्राकृतिक शक्तियों एवं उनके नियामक देवताओं की पूजा होती थी।

(1) ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास

ऋग्वैदिक आर्यों का ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास था जो इस जगत् का निर्माण तथा पालन करने वाला है। अनेक देवतओं में विश्वास करते हुए भी ऋग्वैदिक आर्यों के धर्म का मूलाधार एकेश्वरवाद ही था और उनका एक ही ईश्वर था जिसे वे प्रजापति कहते थे जो सर्वव्यापी था।

(2) प्राकृतिक शक्तियों की उपासना

प्राकृतिक घटनायें यथा- वर्षारंभ, सूर्य एवं चंद्र का उदय, नदियों तथा पर्वतों आदि का अस्तित्त्व, आर्यों के लिए पहेली-जैसे थे। इसलिए उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। उनमें मानव अथवा पशु गुणों का आरोपण करके उन्हें जीवित शक्तियाँ माना।

ऋग्वेद में ऐसी अनेक दैवी शक्तियों का समावेश है जिनकी स्तुति में विभिन्न ऋषि-कुलों ने सूक्तों की रचना की। इस प्रकार ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आरंभ हुई। ऋग्वैदिक आर्यों का विश्वास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि में ईश्वर निवास करता है। इसलिये वे इन सबकी उपासना करते थे।

(3) देवताओं का वर्गीकरण

ऋग्वेद में 33 देवताओं की प्रार्थना की गई है। इन देवताओं को तीन भागों में बांटा गया है- (1) आकाश के देवता, (2) मध्य-स्थान के देवता तथा (3) पृथ्वी के देवता। प्रत्येक वर्ग में 11 देवता हैं, जिनमें से एक सर्वप्रधान है।

आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता सूर्य, मध्य-स्थान के वायु अथवा इन्द्र और पृथ्वी के प्रधान देवता अग्नि हैं। ऋग्वेद का सबसे प्रमुख देवता इन्द्र है। इन्द्र आर्यों का युद्ध नेता था जिसने असुरों के विरुद्ध युद्धों में आर्याें का नेतृत्व किया और उन्हें विजय दिलाई। उसे वर्षा का देवता भी माना गया है। ऋग्वेद में इंद्र की स्तुति में 250 सूक्त हैं।

दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता अग्नि है, जिसकी स्तुति में 200 सूक्त मिलते हैं। आदिम लोगों के जीवन में अग्नि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि खाना पकाने तथा जंगलों को जलाकर साफ करने में इसका उपयोग होता था। वैदिक काल में अग्नि ने देवताओं और मानवों के बीच एक प्रकार से मध्यस्थ की भूमिका निभाई। समझा जाता था कि अग्नि को दी जाने वाली आहुति धुंआ बनकर आकाश में जाती है, और इस प्रकार अंत में देवताओं के पास पहुंच जाती है।

तीसरा प्रमुख देवता वरुण था, जो जलनिधि का प्रतिनिधित्व करता था। वरुण को प्राकृतिक घटनाक्रम का संयोजक समझा जाता था। माना जाता था कि विश्व में सब कुछ वरुण की इच्छा से होता है। वरुण पहले सुर था किंतु बाद में असुरों का मित्र हो गया था। जब वरुण को वृत्रासुर ने बंदी बना लिया तब इंद्र ने वृत्रासुर को मारकर वरुण को मुक्त करवाया तथा तथा उसे पुनः देवत्व प्रदान किया।

सोम वनस्पति का देवता था। सोम नाम का एक मादक पेय भी था। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में वनस्पति से इस पेय के तैयार करने की विधि का वर्णन मिलता है परन्तु इस वनस्पति की सही पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। देवताओं के अनुरोध पर सोम चंद्रमा में समा गया जहाँ से वह जल एवं वनस्पतियों को प्राप्त हुआ। तूफान का प्रतिनिधित्व करने वाले मरुद्गण नामक अनेक देवताओं की जानकारी मिलती है।

(4) देवताओं की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक काल के देवताओं में कुछ निश्चित विशेषताएँ पाई जाती हैं- (1) समस्त देवता दयावान तथा शुभचिन्तक हैं। कोई भी देवता दुष्ट स्वभाव का नहीं है। (2) समस्त देवता अलग-अलग स्वभाव के हैं और इनके कार्य भी विभिन्न प्रकार के हैं। (3) समस्त देवता जन्म लेते हैं परन्तु फिर अमर हो जाते हैं। (4) समस्त देवता वायु में भ्रमण करते हैं जिनके रथों में घोड़े अथवा अन्य पशु अथवा पक्षी जुते रहते हैं। (5) इन्हें मानव-स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है तथा इन्हें मनुष्य के खाद्य-पदार्थ, यथा दूध, अन्न, मांस आदि की बलि दी जाती है।

(5) देवियों की तुलना में देवताओं को प्रमुखता

आर्यों ने उषा काल का प्रतिनिधित्व करने वाली उषस् और अदिति जैसी देवियों की भी पूजा की किंतु ऋग्वैदिक काल में इन देवियों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। पितृतंत्रात्मक समाज के वातावरण में देवियों की अपेक्षा इन्द्र एवं वरुण आदि देवताओं को अधिक महत्त्व मिलना स्वाभाविक था।

(6) धार्मिक कृत्य

देवताओं की आराधना मुख्यतः स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से की जाती थी। ऋग्वैदिक काल में स्तुति पाठ का बड़ा महत्त्व था। स्तुति पाठ अकेले और सामूहिक रूप में होते थे। आर्यों का विश्वास था कि प्रार्थना ईश्वर तक पहुंचती है और ईश्वर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होता है। गायत्री मन्त्र का बड़ा महत्त्व था और इसका पाठ दिन में तीन बार अर्थात् प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या समय किया जाता था।

आरम्भ में प्रत्येक कबीले अथवा कुल का अपना एक विशिष्ट देवता होता था। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण कबीले के सदस्य इस स्तुतिगान में भाग लेते थे। यज्ञाहुतियों के बारे में भी यही होता था। सम्पूर्ण जन अथवा कबीले द्वारा दी जाने वाली यज्ञबलि को ग्रहण करने के लिए अग्नि और इंद्र का आह्नान किया जाता था।

देवताओं को वनस्पति, जौ आदि की आहुति दी जाती थी परन्तु ऋग्वैदिक काल में यज्ञाहुति के अवसर पर कोई अनुष्ठान अथवा मंत्रपाठ नहीं होता था। उस समय शब्द की चमत्कारिक शक्ति को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था जितना कि उत्तर वैदिक काल में दिया जाने लगा था। ऋग्वैदिक काल में आर्य, आध्यात्मिक उन्नति अथवा मोक्ष के लिए देवताओं की आराधना नहीं करते थे। वे इन देवताओं से मुख्यतः संतति, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि मांगते थे।

(7) पितरों की पूजा

ऋग्वैदिक आर्यों में पितरों की पूजा प्रचलित थी। उनका मानना था कि पितरों की कृपा प्राप्त करने से कष्ट क्षीण होते हैं।

(8) सदाचार पर बल

ऋग्वैदिक आर्यों में सदाचार पर बहुत बल दिया जाता था। चोरी, डकैती, मिथ्या भाषण, निरपराधों एवं निःशक्तों की हत्या, पराये धन का हरण आदि कार्य निकृष्ट माने जाते थे।

(9) दान

ऋग्वैदिक आर्यों में दान देने की परम्परा थी। आर्य अपने पुरोहितों को गाय, रथ, घोड़े, दास-दासियां दान करते थे। पुरोहितों को दान देने के जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गायों और स्त्री दासों के रूप में दान देना बताया गया है, भूखंड के रूप में कभी नहीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति

वैदिक सभ्यता का प्रसार 

ऋग्वैदिक सभ्यता 

उत्तर-वैदिक सभ्यता 

उत्तर-वैदिक सभ्यता (अध्याय 9)

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उत्तर-वैदिक सभ्यता

ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रंथों एवं सूत्र ग्रन्थों की रचना हुई। ऋग्वेद के बाद में लिखे गये, इन ग्रन्थों के रचना काल को उत्तर-वैदिक काल कहते हैं। इस काल की सभ्यता उत्तर-वैदिक सभ्यता कहलाती है। उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथ, उत्तरी गंगा की घाटी में लगभग 1000-600 ई.पू. में रचे गए थे।

ऋग्वैदिक सभ्यता तथा उत्तर-वैदिक काल की सभ्यता एवं संस्कृति में पर्याप्त अन्तर है। उत्तर वैदिक स्थलों की पुरातात्त्विक खुदाइयों एवं अन्वेषण के परिणाम स्वरूप 500 बस्तियाँ के अवशेष मिले हैं। इन्हें चित्रित धूसर भाण्ड वाले स्थल कहते हैं क्योंकि इन स्थलों पर बसे हुए लोगों ने मिट्टी के चित्रित एवं भूरे कटोरों और थालियों का उपयोग किया।

वे लोहे के औजारों का भी उपयोग करते थे। बाद के वैदिक ग्रंथों और चित्रित धूसर भाण्डों के लौह अवस्था वाले पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर हम ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान के लोगों के जीवन के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

उत्तर-वैदिक सभ्यता की बस्तियाँ

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कृषि और विविध शिल्पों के कारण उत्तर वैदिक काल के लोग अब स्थायी जीवन बिताने लग गए थे। पुरातात्त्विक खुदाई तथा अन्वेषण से हमें उत्तर वैदिक काल की बस्तियों के बारे में कुछ जानकारी मिलती है। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थान न केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली (कुरु-पांचाल) में, अपितु पंजाब एवं हरियाणा के समीपवर्ती क्षेत्र मद्र और मत्स्य (राजस्थान) में भी मिले हैं। कुल मिलाकर ऐसे 500 स्थल मिले हैं जो प्रायः ऊपरी गंगा की घाटी में में स्थित हैं। इनमें से हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा और नोह जैसे चंद स्थलों की ही खुदाई हुई है। चूँकि यहाँ की बस्तियों के भौतिक अवशेष एक मीटर से तीन मीटर की ऊँचाई तक व्याप्त हैं, इसलिए अनुमान होता है कि यहाँ एक से तीन सदियों तक बसवाट रही। ये अधिकतर नई बस्तियाँ थीं। इनके पहले इन स्थानों पर बस्तियाँ नहीं थीं। लोग मिट्टी की ईटों के घरों में अथवा लकड़ी के खंभों पर आधारित टट्टर और लेप के घरों में रहते थे। यद्यपि उनकेे घर घटिया प्रकार के थे परन्तु चूल्हों और अनाजों (चावल) के अवशेषों से पता चलता है कि चित्रित धूसर भांडों का उपयोग करने वाले उत्तर वैदिक कालीन लोग खेती करते थे और स्थायी जीवन बिता रहे थे। वे लोग लकड़ी के फालों वाले हल से खेत जोतते थे, इसलिए किसान अधिक पैदा नहीं कर पाते थे। इस समय का किसान, नगरों के उत्थान में अधिक योगदान करने में समर्थ नहीं था।

उत्तर-वैदिक सभ्यता में राजनीतिक दशा

उत्तर-वैदिक सभ्यता में आर्यों की राजनीतिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया था। इस काल में राजन्य ने शेष तीन वर्णों पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। ऐतरेय ब्राह्मण में राजन्य के सापेक्ष, ब्राह्मण को जीविका-खोजी और दान ग्रहण करने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसे हटाया जा सकता था। वैश्य को दान देने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसका इच्छापूर्वक दमन किया जा सकता था। सबसे कठोर बातें शूद्रों के बारे में पढ़ने को मिलती हैं। उसे दूसरों का सेवक, दूसरों के आदेश पर काम करने वाला और दूसरों द्वारा मनमर्जी से पीटने योग्य कहा गया है।

(1) शासन क्षेत्र में परिवर्तन

ऋग्वैदिक आर्यों की राज-सत्ता केवल सप्त-सिन्धु क्षेत्र तक सीमित थी, परन्तु उत्तर-वैदिक सभ्यता में वे पंजाब से लेकर गंगा-यमुना के दोआब में स्थित समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गए थे। भरत और पुरु नामक दो प्रमुख कबीले एकत्र हुए और इस प्रकार कुरु-जन कहलाए।

आरम्भ में ये लोग दोआब के सीमांत में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश में बसे हुए थे परन्तु कुरुओं ने शीघ्र ही दिल्ली और दोआब के उत्तरी भाग पर अधिकार जमा लिया। इस क्षेत्र को कुरुदेश कहते हैं। शनैःशनैः ये लोग पंचालों से मिलते गए। वर्तमान बरेली, बदायूं और फर्रूखाबाद जिलों में फैला हुआ, उस समय का पंचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण पुरोहितों के लिये प्रसिद्ध था।

कुरु-पंचालों का दिल्ली और उत्तरी तथा मध्य दोआब पर अधिकार स्थापित हो गया। मेरठ जिले के हस्तिनापुर स्थान पर उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की। महाभारत युद्ध की दृष्टि से कुरु कबीले के इतिहास का बड़ा महत्त्व है, और यही युद्ध महाभारत की प्रमुख घटना है।

समझा जाता है कि यह युद्ध 950 ई.पू. के आसपास कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया था। ये दोनों ही कुरु जन के सदस्य थे। परिणामतः लगभग सम्पूर्ण कुरु कबीला नष्ट हो गया। कालान्तर में आर्यों ने दक्षिण-भारत में भी अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार आरम्भ किया।

उत्तर-वैदिक सभ्यता के अंतिम चरण में, 600 ई. पू. के आसपास, वैदिक लोग दोआब से पूर्व की ओर कोशल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और विदेह (उत्तरी बिहार) में फैल चुके थे। यद्यपि कोसल का रामकथा से बड़ा सम्बन्ध है, पर वैदिक साहित्य में राम का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में इन वैदिक लोगों को ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों और काले व लाल रंग के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। ये लोग यहाँ लगभग 1800 ई.पू. में बसे हुए थे। आर्यों को इस क्षेत्र में सम्भवतः ऐसे लोगों की बस्तियां भी जहां-तहां मिलीं जो काले और लाल बर्तनों का उपयोग करते थे।

अनुमान होता है कि ये लोग एक मिश्रित संस्कृति वाले थे जिसे हड़प्पा कालीन संस्कृति नहीं कहा जा सकता। उत्तर वैदिक लोगों के शत्रु जो भी रहे हों, उनका प्रत्यक्षतः किसी बड़े और सुसम्बद्ध क्षेत्र पर अधिकार नहीं था और उनकी संख्या उत्तरी गंगा की घाटी में बहुत अधिक नहीं थी, विस्तार के दूसरे चरण में भी उत्तर वैदिक आर्यों की सफलता का कारण लोहे के औजारों और घोड़ों वाले रथों का उपयोग किया जाना था।

(2) राजन्य की शक्तियों में वृद्धि

ऋग्वैदिक काल में राज्य का आकार बहुत छोटा होता था परन्तु उत्तर-वैदिक सभ्यता में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना की गई और राजन्य अर्थात् राजा पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गये। अब वीर विजयी राजन्य स्वयं को र्साभौम, एकराट् आदि उपाधियों से विभूषित करने लगे।

राजन्य अपने प्रभाव में वृद्धि के लिये राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध आदि यज्ञ करने लगे। ये यज्ञ राजन्य की सार्वभौम सत्ता के सूचक होते थे। समझा जाता था कि राजसूय यज्ञों से राजाओं को दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। अश्वमेध यज्ञ में जितने क्षेत्र में राजा का घोड़ा निर्बाध विचरण करता था उतने क्षेत्र पर उस राजा का अधिकार हो जाता था।

वाजपेय यज्ञ में अपने सगोत्रीय बंधुओं के साथ रथों की दौड़ होती थी। इन सब आयोजनों और अनुष्ठानों से लोग प्रभावित होते थे। साथ ही राजा की शक्ति और प्रभाव भी बढ़ता था। अब राजन्य को देवता का स्वरूप समझा जाने लगा। राजन्य की आज्ञा का पालन करना आवश्यक था। यद्यपि राजन्य का पद अब भी वंशानुगत था परन्तु निर्वाचन-प्रणाली भी आरम्भ हो गई थी। निर्वाचन राजवंश तक ही सीमित था।

(3) जनपद एवं राष्ट्र की धारणा का उदय

राज्य के विस्तार के साथ राजन्य अथवा राजा की शक्ति बढ़ती गई। कबीलाई अधिकार प्रदेश-विशेष तक सीमित थे। राजन्य का शासन कई कबीलों पर होता था परन्तु आर्यों के प्रमुख कबीलों ने उन प्रदेशों पर भी अधिकार जमा लिया जहाँ दूसरे कबीले बसे हुए थे।

आरम्भ में प्रत्येक प्रदेश को वहाँ बसे हुए कबीले का नाम दिया गया था, पर अंत में जनपद नाम, प्रदेश नाम के रूप में रूढ़ हो गया। आरम्भ में पंचाल एक कबीले का नाम था परन्तु बाद में यह एक प्रदेश का नाम हो गया। राष्ट्र शब्द, जो प्रदेश का सूचक है, पहली बार इसी काल में प्रकट हुआ।

(4) सीमित राजतंत्र

यद्यपि उत्तर-वैदिक सभ्यता में राजन्य ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा अधिक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश हो गया था परन्तु राजन्य पर पुरोहित का नियन्त्रण होता था। पुरोहित सोम को अपना राजन्य मानता था और वह राजन्य की समस्त आज्ञाएँ मानने के लिए बाध्य न था। कभी-कभी पुरोहित, राजन्य के विरुद्ध विद्रोह भी कर देता था। राजन्य को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह पुरोहित के साथ कभी भी धोखा नहीं करेगा। राज्य के नियमों की पालना करना तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना राजन्य का परम धर्म होता था। राजन्य पर धर्म का भी बहुत बड़ा नियन्त्रण रहता था। अतः उसे धर्मानुकूल शासन करना होता था। 

(5) पदाधिकारियों की संख्या में वृद्धि

उत्तर-वैदिक सभ्यता में ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा पदाधिकारियों की संख्या तथा उनके अधिकारों में बड़ी वृद्धि हो गयी। ऋग्वैदिक काल में केवल तीन पदाधिकरी थे- पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी परन्तु अब स्थपति, निषाद-स्थपति, शतपति आदि नये पदाधिकारी भी उत्पन्न हो गये थे।

स्थपति सम्भवतः राज्य के एक भाग का शासक होता था और उसे शासन के साथ-साथ न्यायिक कार्य भी करने होतेे थे। निषाद-स्थपति सम्भवतः उस पदाधिकरी को कहते थे जो उन आदिवासियों पर शासन करता था, जिन पर आर्यों ने विजय प्राप्त कर ली थी।

शतपति नामक पदाधिकरी के अनुशासन में सम्भवतः सौ गाँव रहते थे। अब पुराने पदाधिकारियों के अधिकारों में भी वृद्धि हो गयी थी। राजन्य अपने सिंहासन से उतर कर पुरोहित को प्रणाम करता था। अब राजन्य रण-क्षेत्र में कम ही जाया करता था, इसलिये सेनानी रण-क्षेत्र में सेना का संचालन करता था। फलतः उसके प्रभाव में भी वृद्धि हो गयी थी।

उत्तर वैदिक काल में भी राजन्य की कोई स्थायी सेना नहीं होती थी। युद्ध के अवसर पर जन से सैनिक टुकड़ियां एकत्र की जाती थीं। युद्ध में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अनुष्ठान यह था कि राजन्य को अपनी प्रजा (विश्) के साथ एक पात्र में भोजन करना पड़ता था। ग्रामणी के अधिकार तथा प्रभाव में तो इतनी वृद्धि हो गयी थी कि उसे राजकृत अर्थात् राजन्य को बनाने वाला कहने लगे थे। राजकाज चलाने में राजमहिषी भी राजन्य की सहायता करती थी।

(6) सभा तथा समिति के अधिकारों में कमी

यद्यपि सभा तथा समिति का अस्तित्त्व उत्तर-वैदिक काल में भी बना रहा परन्तु अब उनके अधिकार तथा प्रभाव में बड़ी कमी हो गयी। समिति बड़ी संस्था थी और सभा छोटी। अब राज्य-विस्तार बढ़ जाने के कारण समिति का जल्दी-जल्दी बुलाया जाना सम्भव नहीं था। इसलिये राजन्य उसके परामर्श की उपेक्षा करने लगा और अधिकांश कार्य अपने निर्णय से करने लगा। सभा का महत्त्व भी घट गया।

(7) न्याय व्यवस्था में सुधार

उत्तर-वैदिक कालीन न्याय-व्यवस्था ऋग्वैदिक काल की न्याय-व्यवस्था की अपेक्षा अधिक सुदृढ़़ तथा व्यापक हो गई थी। अब राजन्य न्यायिक कार्य में पहले से अधिक रुचि लेने लगा परन्तु वह अपने न्यायिक अधिकारों को प्रायः अपने पदाधिकारियों को दे देता था।

गाँवों के झगड़ों का निर्णय ग्राम्यवादिन करता था जो गाँव का न्यायाधीश होता था। ब्राह्मण की हत्या बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। ब्राह्मण को प्राण-दण्ड नहीं दिया जाता था। सोने की चोरी तथा सुरापान भी बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। दीवानी मुकदमों का निर्णय प्रायः पंचों द्वारा किया जाता था।

(8) जनपद राज्यों का आरम्भ

उत्तर वैदिक काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जनपद राज्यों का आरम्भ हुआ। न केवल गोधन की प्राप्ति के लिए, अपितु भूमि पर अधिकार के लिए भी युद्ध होने लगे। कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया महाभारत युद्ध सम्भवतः इसी काल में हुआ।

(9) राजन्य को भेंट व्यवस्था

वैदिक काल का प्रधानतः पशुपालक समाज, अब कृषक बन गया। अब वह अपने राजन्य को प्रायः भेंट देने में समर्थ था। कृषकों के बल पर राजाओं की शक्ति बढ़ी और उन्होंने उन पुरोहितों को खूब दान-दक्षिणा दी जिन्होंने वैश्यों यानी सामान्य जनता के विरोध में अपने आश्रयदाताओं की सहायता की। शूद्रों के छोटे समुदाय का काम सेवा करना था।

(10) कर व्यवस्था

इस काल में करों की वसूली और दक्षिणा आम बात हो गई। इन्हें सम्भवतः संगृहित्री नामक अधिकारी के पास जमा किया जाता था।

उत्तर-वैदिक सभ्यता में सामाजिक दशा

यद्यपि उत्तर-वैदिक काल के आर्यों के गृह-निर्माण, वेश-भूषा, खान-पान, मनोरंजन आदि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था, परन्तु सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रों में बहुत बड़े परिवर्तन हुए।

(1) पिता की शक्तियों में वृद्धि

उत्तर वैदिक काल में, परिवार में पिता की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई थी। यहाँ तक कि पिता अपने पुत्र को भी उत्तराधिकार से वंचित रख सकता था। राज-परिवारों में ज्येष्ठाधिकार को अधिकाधिक महत्त्व दिया जाने लगा तथा पूर्व-पुरुषों की पूजा होने लगी।

(2) गोत्र व्यवस्था

उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था दृढ़ हुई। गोत्र शब्द का अर्थ है गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समस्त कुल के गोधन को एक साथ रखा जाता था परन्तु बाद में इस शब्द का अर्थ हो गया- एक मूल पुरुष के वंशज। गोत्रीय बहिर्विवाह की प्रथा आरम्भ हो गई। एक ही गोत्र अथवा पूर्व-पुरुष वाले समुदाय के सदस्यों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लग गया।

(3) नगरों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक आर्य केवल गाँवों में ही निवास करते थे। उन्होंने नागरिक जीवन को नहीं अपनाया था। ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है परन्तु जब उत्तर वैदिक आर्य गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदानों में आ गये तब उन्होंने बड़े-बड़े नगरों को बसाया तथा नगरों में निवास करना आरम्भ किया। अब यही नगर, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन के केन्द्र बन गये।

नगरों की वास्तविक शुरूआत का आभास उत्तर वैदिक काल के अंतिम दौर में मिलता है। हस्तिनापुर और कौशाम्बी को उत्तर वैदिक काल के अंतिम दौर के आदिम पद्धति के नगर माना जा सकता है। इन्हें प्राक्-नगरीय स्थल कहा जा सकता है।

(4) भोजन में परिवर्तन

उत्तर-वैदिक काल के आर्यों ने अपने भोजन में भी थोड़ा बहुत परिवर्तन कर लिया। अब मांस-भक्षण को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा और ब्राह्मणों के लिए इसका निषेध हो गया। अथर्ववेद के एक सूक्त में मांस-भक्षण तथा सुरापान को पाप बताया गया है। इससे स्पष्ट है कि इस काल में अंहिसा के विचार का बीजारोपण हो गया था। अब सोम के स्थान पर मासर, पूतिका, अर्जुनानी आदि अन्य पेय पदार्थों का प्रयोग होने लगा था।

(5) स्त्रियों की दशा में परिवर्तन

उत्तर-वैदिक काल में स्त्रियों की दशा पहले से बिगड़ गई। अब राजवंशों तथा सम्पन्न परिवारों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित हो गई थी। इसलिये घरों में स्त्रियों का जीवन कलहपूर्ण हो गया। अब कन्याओं को दुःख का कारण समझा जाने लगा। कन्या का जन्म होने पर लोग दुःखी होते थे परन्तु कन्याओं की शिक्षा पर अब भी ध्यान दिया जाता था।

इस काल में गार्गी तथा मैत्रेयी आदि विदुषी स्त्रियों के नाम मिलते हैं जो वैदिक वाद-विवादों में भाग लेती थीं। यद्यपि यज्ञादि धार्मिक अवसरों पर स्त्रियों को भाग लेने का अधिकार था परन्तु अब वे सार्वजनिक सभाओं आदि में नहीं आ-जा सकती थीं। बाल-विवाह की प्रथा आरम्भ हो गयी थी।

(6) वैवाहिक सम्बन्ध में जटिलता

उत्तर-वैदिक काल में विवाह सम्बन्धी नियम कठोर हो गये। अब सगोत्री विवाह अच्छा नही समझा जाता था। भिन्न गोत्र में विवाह करना अच्छा समझा जाता था। अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि विधवा-विवाह तथा बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन हो गया था। मनु की दस पत्नियाँ थीं। उच्च-वर्ण की कन्या का विवाह निम्न-वर्ण में नहीं होता था। यदा-कदा कन्याओं का विक्रय होता था और दहेज-प्रथा प्रचलित हो गई थी।

(7) वर्ण-व्यवस्था में जटिलता

उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथों में तीन उच्च वर्णों और शूद्रों के बीच में एक विभाजन रेखा देखने को मिलती हैं। तीनों उच्च वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों का उपनयन संस्कार होता था। चौथे वर्ण का उपनयन संस्कार नहीं हो सकता था। शूद्रों पर प्रतिबंध लगने आरम्भ हो गए। फिर भी राज्याभिषेक से सम्बन्धित ऐसे कई सार्वजनिक अनुष्ठान थे जिनमें शूद्र, सम्भवतः मूल कबीले के सदस्यों की हैसियत से भाग लेते थे।

कुछ विशेष वर्गों के शिल्पियों को, जैसे रथकारों को, समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त था, और उन्हें उपनयन संस्कार के अधिकारियों की सूची में सम्मिलित किया गया था। वर्ण-व्यवस्था जाति-प्रथा का रूप लेती जा रही थी। कार्य अथवा व्यवसाय के स्थान पर जन्म, जाति का आधार होने लगा था।

उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल की चार जातियों के अतिरिक्त दो और जातियाँ बन गयी थीं। इनमें से एक निषाद कहलाती थी और दूसरी व्रात्य। निषाद लोग अनार्य थे। सम्भवतः ये लोग भील जाति के थे। व्रात्य लोग सम्भवतः वे आर्य थे जो ब्राह्मण धर्म को नहीं मानते थे। विभिन्न व्यवसायों के अनुसार बढ़ई, लोहार, मोची आदि उपजातियाँ बनने लगी थीं और अन्तर्जातीय विवाह को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा था।

(8) आश्रम-व्यवस्था की दृढ़ता

वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था ठीक से स्थापित नहीं हुई थी। उत्तर वैदिक काल के ग्रंथों में केवल तीन आश्रमों की जानकारी मिलती है, अंतिम अथवा चौथे आश्रम की स्पष्ट रूप से स्थापना नहीं हुई थी। वैदिकोत्तर ग्रंथों में चार आश्रमों के बारे में जानकारी मिलती है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। उच्च वर्ण वालों को निश्चित रूप से आश्रम व्यवस्था का पालन करना पड़ता था।

(9) वंशानुगत उद्योग-धन्धे

अब व्यवसाय वंशानुगत हो गया था और एक परिवार के लोग एक ही व्यवसाय करने लगे थे। यही कारण था कि उपजातियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

(10) शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि

वैदिक यज्ञों में वृद्धि हो जाने के कारण शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि हो गई। यद्यपि शिक्षा का मुख्य विषय वेदों का अध्ययन ही था परन्तु वैदिक मन्त्रों के साथ-साथ विज्ञान, गणित, भाषा, युद्ध-विद्या आदि की भी शिक्षा दी जाने लगी। विद्यार्थी, गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करता था और ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करता था। शिक्षा समाप्त हो जाने पर वह गुरु को दक्षिणा देकर घर आता था और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।

उत्तर-वैदिक सभ्यता में आर्थिक दशा

उत्तर-वैदिक काले में आर्यों की आर्थिक दशा में क्रमशः परिवर्तन होता गया था तथा अब उसमें जटिलता आने लगी थी। अब वे गाँवों के अतिरिक्त नगरों में भी निवास करने लगे थे और उनका जीवन अधिक सम्पन्न हो गया था।

(1) धातु-ज्ञान में वृद्धि

आर्यों को ऋग्वैदिक काल में लौह, स्वर्ण तथा अयस् आदि धातुओं का ज्ञान प्राप्त था परन्तु उत्तर वैदिक काल में उन्हें रांगा, सीसा तथा चांदी का भी ज्ञान प्राप्त हो गया था। इस काल में लाल-अयस् तथा कृष्ण-अयस् का भी उल्लेख मिलता है। सम्भवतः लाल-अयस का तात्पर्य ताम्बे से और कृष्ण-अयस् का तात्पर्य लोहे से था।

(2) लोहे के उपयोग में वृद्धि

उत्तर वैदिक काल में लोहे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। पाकिस्तान के गांधार प्रदेश में 1000 ई.पू. के आसपास गाढ़े गये शवों के साथ लोहे के बहुत सारे औजार और उपकरण मिले हैं। इस प्रकार की लौह निर्मित वस्तुएं बिलोचिस्तान से भी मिली हैं। लगभग उसी समय से पूर्र्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी लोहे का उपयोग हो रहा था।

पुरातात्विक अन्वेषण से ज्ञात होता है कि 800 ई.पू. के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीरों के फलक और भालों के फलक जैसे लोहे के औजार बनने लग गये थे। लोहे के इन हथियारों से उत्तर वैदिक आर्यों ने उत्तरी दो आब में बसे अपने बचे-खुचे शत्रुओं को परास्त किया होगा।

उत्तरी गंगा की घाटियों के जंगलों को साफ करने के लिये लोहे की कुल्हाड़ी का उपयोग हुआ होगा। उस काल में वर्षामान 35 से 65 सेंटीमीटर तक होने से ये जंगल बहुत घने नहीं रहे होंगे। वैदिक काल के अंतिम चरण में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश और विदेह में फैल गया था। ई.पू. सातवीं सदी से इन प्रदेशों में लोहे के औजार मिलने लग जाते हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक हुआ। लोहे के हथियारों का उपयोग लगातार बढ़ते जाने के के कारण योद्धा-वर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा। नए कृषि औजारों और उपकरणों की सहायता से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे।

राजा, सैनिक और प्रशासकीय आवश्यकताओं के लिए, इस अतिरिक्त उपज को एकत्र कर सकता था। इस अतिरिक्त उपज को ईसा-पूर्व छठी सदी में स्थापित हुए नगरों के लिए भी जमा किया जा सकता था। इन भौतिक लाभों के कारण किसान का कृषि कार्य में लगातार लगे रहना स्वाभाविक था।

लोग अपनी पुरानी बस्तियों से बाहर निकलकर समीप के नए क्षेत्रों में फैलने लगे। इस प्रकार लोहे का उपयोग बढ़ते जाने से आर्यों का ग्राम्य प्रधान जीवन नगरीकरण की ओर बढ़ने लगा तथा छोटे-छोटे जन के स्थान पर बड़े-बड़े जनपद राज्यों की स्थापना का मार्ग खुल गया।

(3) भूमिपतियों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक काल में भूमिपतियों का कहीं नाम नहीं था परन्तु अब बड़े-बड़े भूमिपतियों का प्रादुर्भाव हो रहा था। बहुत से भूमिपति सम्पूर्ण गाँव के स्वामी होते थे। गाँव के लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव रहता था।

(4) वैश्यों के काम का निर्धारण

उत्तर वैदिक काल में वैश्य वर्ग के अंतर्गत सामान्य प्रजा का समावेश होता था। उन्हें कृषि और पशुपालन जैसे उत्पादक कार्य सौंपे गए थे। कुछ वैश्य शिल्पकार भी थे। वैदिक काल के अंत में वे व्यापार में जुट गए। उत्तर वैदिक काल में सम्भवतः केवल वैश्य ही भेंट अथवा उपहार देते थे।

क्षत्रिय, वैश्यों से प्राप्त भेंट पर अपनी जीविका चलाते थे। सामान्य कबीलाई प्रजा को भेंट देने वालों की स्थिति में पहुंचने में लंबा समय लगा। कई ऐसे अनुष्ठान थे जिनके माध्यम से विश् अथवा वैश्यों को राजन्य के अधीन बनाया जाता था।

(5) कृषि में आमूलचूल परिवर्तन

वैदिक काल के आर्य मुख्यतः पशुपालक थे किंतु उत्तर वैदिक काल मे कृषि में बड़ी उन्नति हो गयी थी। अब आर्य लोग गंगा-यमुना की अत्यन्त उपजाऊ भूमि में पहुँच गये थे। अब वे बड़े-बड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। कृषि सम्बन्धी लोहे के औजार बहुत थोड़े मिले हैं किंतु इसमें संदेह नहीं कि उत्तर वैदिक कालीन लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि ही था।

कुछ वैदिक ग्रंथों में छः आठ, बारह और चौबीस बैलों द्वारा जोते जाने वाले हलों के उल्लेख मिलते हैं। इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। हलों के फाल लकड़ी के होते थे। उत्तरी गंगा की नरम मिट्टी में इनसे संभवतः काम चल जाता था। यज्ञों में होने वाली पशु बलि के कारण पर्याप्त बैल उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इसलिये कृषि आदिम स्तर की थी परंतु इसमें संदेह नहीं कि यह व्यापक स्तर पर होती थी।

शतपथ ब्राह्मण में हल की जुताई से सम्बन्धित अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। प्राचीन आख्यानों के अनुसार सीता के पिता विदेहराज जनक भी स्वयं हल जोतते थे। उस जमाने में राजन्य और राजकुमार भी शारीरिक श्रम करने में संकोच नहीं करते थे। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर कहा जाता है। बाद में उच्च वर्णों के लोगों द्वारा हल जोतने पर निषेध लग गया।

इस काल के कृषक विभिन्न प्रकार की खादों का भी प्रयोग करने लगे थे। वैदिक लोग जौ पैदा करते रहे परंतु इस काल में उनकी मुख्य पैदावार धान और गेहूँ बन गया। कालांतर में गेहूँ का स्थान प्रमुख हो गया। आज भी उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोगों का मुख्य अनाज गेहूँ ही है। दोआब में पहुँचने पर वैदिक लोगों को चावल की भी जानकारी मिली।

वैदिक ग्रंथों में चावल को व्रीहि कहा गया है। हस्तिनापुर से चावल के जो अवशेष मिले हैं वे ईसा पूर्व आठवीं सदी के हैं। अनुष्ठानों में चावल के उपयोग के विधान मिलते हैं परन्तु अनुष्ठानों में गेहूँ का बहुत कम उपयोग होता था। उत्तर वैदिक काल में कई तरह की दालें भी उगाई जाती थीं।

(6) वाणिज्य तथा व्यापार में उन्नति

उत्तर-वैदिक काल में, ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा व्यापार तथा वाणिज्य में अधिक वृद्धि हो गयी थी। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अब वे एक विशाल मैदान के निवासी बन गये थे जो बड़ा ही उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न था। इस काल में व्यापारियों का एक अलग वर्ग बन गया था जिन्हें वणिक कहते थे। धनी व्यापारी श्रेष्ठिन् कहलाता था।

आर्य लोगों का आन्तरिक व्यापार पहाड़ियों में रहने वाले किरातों के साथ होता था, जिन्हें ये कपड़े देकर औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करते थे। अब ये लोग समुद्र से भी परिचित हो गये थे और बड़ी-बड़ी नावों द्वारा सामुद्रिक व्यापार भी करते थे। अब आर्य लोग निष्क, शतमान तथा कृष्णाल नाम की मुद्राओं का प्रयोग करने लगे थे जिससे व्यापार में बड़ी सुविधा होने लगी।

(7) अन्य व्यवसायों की उन्नति

ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा अब उद्योग धन्धों में भी अधिक वृद्धि हो गई थी और कार्य विभाजन का सिद्धान्त दृढ़ हो गया था। यजुर्वेद में उन सब व्यवसायों का उल्लेख है जिन्हें इस काल की आर्य प्रजा करती थी। इनमें शिकारी, मछुए, पशुपालक, हलवाह, जौहरी, चटाई बनाने वाले, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, कसाई, सुनार, बढ़ई आदि आते हैं।

उत्तर-वैदिक सभ्यता में कलाओं का विकास

उत्तर-वैदिक काल में कला के क्षेत्र में भी कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। काव्य-कला का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया था।

(1) गृह निर्माण कला

हस्तिनापुर में 900 ई.पू. से 500 ई.पू. के स्तरों के बीच की जो खुदाई हुई है, उसमें बस्ती के अस्तित्व और नगरीय जीवन के प्रारंभ होने के प्रमाण मिलते हैं परंतु पुरातत्व की यह जानकारी हस्तिनापुर के बारे में महाभारत से मिलने वाली जानकारी से मेल नहीं खाती।

क्योंकि इस महाकाव्य का संकलन बहुत बाद में, ईसा की चौथी सदी में, उस समय हुआ था जब भौतिक जीवन की काफी उन्नति हो चुकी थी। उत्तर वैदिक काल के लोग पकी हुई ईंटों का उपयोग करना नहीं जानते थे। हस्तिनापुर की खुदाई में मिट्टी के जो स्मारक मिले हैं वे भव्य और टिकाऊ नहीं रहे होंगे। हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया था इसलिये बचे-खुचे कुरु लोग प्रयाग के समीप कौशाम्बी में जाकर बस गये थे।

(2) धातु शिल्प कला

उत्तर वैदिक काल में अनेक कलाओं और शिल्पों का उदय हुआ। हमें लुहारों और धातुकारों के बारे में जानकारी मिलती है। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास निश्चय ही इनका सम्बन्ध लोहे के उत्पादन से रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से 1000 ई.पू. के पहले के तांबे के कई औजार मिले हैं उनसे वैदिक और अवैदिक दोनों ही समाजों में ताम्रकारों का अस्तित्त्व सूचित होता है।

वैदिक लोगों ने सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की तांबे की खानों का उपयोग किया था। वैदिक लोगों ने सर्वप्रथम ताम्र धातु का उपयोग किया था। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थलों से भी तांबे के औजार मिले हैं। इन ताम्र-वस्तुओं का उपयोग मुख्यतः युद्ध, आखेट और आभूषणों के लिए भी होता था।

(3) बर्तन निर्माण कला

उत्तर वैदिक काल के लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से परिचित थे- काले एवं लाल भांड, काले रंग के भांड, चित्रित धूसर भांड और लाल भांड। अंतिम किस्म के भांड उन्हें अधिक प्रिय थे। ये भांड प्रायः पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिले हैं परन्तु इस युग के विशिष्ठ भांड हैं- चित्रित धूसर भांड।

इनमें कटोरे और थालियां मिली हैं जिनका उपयोग उच्च वर्णों के लोगों द्वारा पूजा-पाठ अथवा भोजन अथवा दोनों कामों के लिए होता था। चित्रित धूसर भांडों के साथ कांच की वस्तुएं और कंकण मिले हैं। उनका उपयोग भी उच्च वर्ग के सदस्य ही करते होंगे।

(4) आभूषण निर्माण कला

पुरातात्त्विक खुदाई और वैदिक ग्रंथों से विशिष्ट शिल्पों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी मिलती है। उत्तर वैदिक काल के ग्रंथों में जौहरियों के भी उल्लेख मिलते हैं। ये सम्भवतः समाज के धनी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे।

(5) बुनाई कला

बुनाई का काम केवल स्त्रियाँ करती थीं, फिर भी यह काम बड़े पैमाने पर होता था।

(6) काव्य कला

ऋग्वेद में केवल स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है, परन्तु यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा सूत्रों की रचना के द्वारा काव्य-क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया गया। यजुर्वेद में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है। सामवेद गीति-काव्य है। संगीत-कला पर उसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।

अथर्ववेद में भूत-प्रेत से रक्षा तथा तन्त्र-मन्त्र का विधान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में उच्चकोटि की दार्शनिक विवेचना है। सूत्रों की रचना इसी काल में हुई। सूत्रों के प्रादुर्भाव से, सूचनाओं को संक्षेप में लिखने की कला की उन्नति हुई।

(7) खगोल विद्या

इस काल में खगोल विद्या भी बड़ी उन्नति कर गई। इस काल के आर्यों को नये-नये नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हो गया।

(8) अन्य कलायें

उत्तर वैदिक काल में चर्मकार, कुम्हार तथा बढ़ई आदि शिल्पों ने बहुत उन्नति की।

(9) औषधि विज्ञान

औषधि-विज्ञान अब भी अवनत दशा में था।

उत्तर-वैदिक सभ्यता में धार्मिक दशा

ऋग्वैदिक काल का धर्म, सरल तथा आडम्बरहीन था परन्तु उत्तर-वैदिक काल का धर्म जटिल तथा आडम्बरमय हो गया। इस काल में उत्तरी दोआब में ब्रह्माण धर्म के प्रभाव के अंतर्गत आर्य संस्कृति का विकास हुआ। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण उत्तर वैदिक साहित्य का संकलन कुरु-पांचाल प्रदेश में हुआ। यज्ञकर्म और इससे सम्बन्धित अनुष्ठान और विधियां इस संस्कृति की मेरूदंड थीं।

(1) ब्राह्मणों की प्रधानता

इस युग में ब्राह्मणों की प्रधानता तथा उनका महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना इसी काल में हुई। इन ग्रन्थों के रचयिता ब्राह्मण थे और इनका सम्बन्ध भी ब्राह्मणों से ही था। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के सच्चे ज्ञान का अधिकारी ब्राह्मणों को ही समझा जाता था। ब्राह्मण ही यज्ञ करता और कराता था, इसलिये उसका आदर-सम्मान भी अधिक था।

इस काल में ब्राह्मण का स्थान इतना ऊँचा हो गया था कि वह भू-सुर, भू-देव आदि नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। यज्ञों के प्रसार के कारण ब्राह्मणों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। आरम्भ में पुरोहितों के सोलह वर्गों में से ब्राह्मण एक वर्ग मात्र था, परन्तु शनैः शनैः इन्होंने दूसरे पुरोहित-वर्गोंं को पछाड़ दिया और ये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वर्ग बन गए।

ये अपने और अपने यजमानों के लिए पूजा-पाठ और यज्ञ करते थे। साथ ही, कृषि कर्म से सम्बन्धित समारोहों का आयोजन भी करते थे। ये अपने आश्रयदाता राजा के लिये युद्ध में सफलता की कामना करते थे और बदले में राजा की ओर से दान-दक्षिणा तथा सुरक्षा का वचन मिलता था।

उच्चाधिकार के लिए ब्राह्मणों का कभी-कभी योद्धा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रियों से संघर्ष भी होता था परन्तु जब इन दो उच्च वर्णों का निम्न वर्णों से मुकाबला होता था तो ये आपसी मतभेदों को भुला देते थे। उत्तर वैदिक काल के अंत समय से इस बात पर बल दिया जाने लगा था कि इन दो उच्च वर्णों को परस्पर सहयोग करके शेष समाज पर शासन करना चाहिए।

(2) यज्ञ के महत्त्व में वृद्धि

इस युग में यज्ञों के महत्त्व में इतनी अधिक वृद्धि हो गई थी कि यदि इसे यज्ञों का युग कहा जाय तो कुछ अनुचित न होगा। इस काल में रचा जाने वाला यजुर्वेद, यज्ञ प्रधान ग्रन्थ है। उसमें यज्ञों के विधान की विस्तृत विवेचना की गई है। यज्ञों को करने में भी सरलता न रह गई थी।

गृहस्थ स्वयं यज्ञ नहीं कर सकता था वरन् उसे याज्ञिकों की आवश्यकता पड़ती थी। यज्ञ में समय भी अधिक लगता था। बहुत से यज्ञ वर्ष भर चलते थे और उनमें बहुत अधिक धन व्यय करना पड़ता था। राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ केवल राजा ही कर सकते थे। इस कारण सर्वसाधारण के लिये यज्ञ करवाना कठिन कार्य हो गया।

यज्ञों का आयोजन सामूहिक रूप से और निजी रूप से भी होता था। सामूहिक यज्ञों में राजन्य और उस जन-समुदाय के समस्त सदस्य भाग लेते थे। निजी यज्ञ अलग-अलग लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में आयोजित किए जाते थे, क्यांेकि इस काल में वैदिक लोग स्थायी जीवन बिताते थे और उनके अपने सुव्यवस्थित कुटुम्ब थे। अग्नि को व्यक्तिगत रूप से आहुति दी जाती थी और ऐसी प्रत्येक क्रिया एक अनुष्ठान अथवा यज्ञ का रूप धारण कर लेती थी।

(3) यज्ञों में बलि का चलन

ऋग्वेद काल में यज्ञ में केवल फल तथा दूध की बलि दी जाती थी परन्तु अब यज्ञ में पशु तथा सोम की बलि का महत्त्व हो गया। बड़ी-बड़ी बलियों और यज्ञों के अवसर पर राजाओं की ओर से प्रचुर मात्रा में भोजन सामग्री वितरित की जाती थी। समाज के समस्त वर्गों के लोगों को जिमाया जाता था।

(4) याज्ञिक वर्ग की उत्पति

यज्ञों की संख्या तथा महत्त्व में वृद्धि हो जाने तथा उनमें जटिलता आ जाने से ब्राह्मणों में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो गया जो यज्ञों का विशेषज्ञ होता था। इस वर्ग का एकमात्र व्यवसाय अपने यजमान के यहाँ यज्ञ कराना तथा उससे यज्ञ-शुल्क एवं दान प्राप्त करना हो गया। ब्राह्मण उन सोलह प्रकार के पुरोहितों में से एक थे जो यज्ञों का नियोजन करते थे।

समस्त पुरोहितों को उदारतापूर्वक दान-दक्षिणा दी जाती थी। यज्ञों के अवसर पर जो मंत्र पढ़े जाते थे, उनका यज्ञकर्ता को बड़ी सावधानी से उच्चारण करना होता था। यज्ञकर्ता को यजमान कहते थे। यज्ञ की सफलता यज्ञ के अवसर पर उच्चारित चमत्कारिक शक्ति वाले शब्दों पर निर्भर करती थी। वै

दिक आर्यों द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठान दूसरे हिन्द-यूरोपीय लोगों में भी देखने को मिलते हैं परन्तु अनेक अनुष्ठानों का विकास भारत भूमि में हुआ। यज्ञ विधियों का आविष्कार, संयोजन एवं विकास ब्राह्मण पुरोहितों ने किया। उन्होंने बहुत सारे अनुष्ठानों का आविष्कार किया, इनमें से अनेक अनुष्ठान आर्येतर प्रजाओं से लिए गए थे। उत्तरवैदिक साहित्य में मिलने वाले उल्लेखों के अनुसार राजसूय यज्ञ करने वाले प्रधान पुरोहित को 2,40,000 गायें दक्षिणा के रूप में दी जाती थीं।

पुरोहितों को यज्ञों में, गायों के साथ-साथ सोना, कपड़ा और घोड़े भी दिए जाते थे। यद्यपि पुरोहित दक्षिणा के रूप में कभी-कभी भूमि भी मांगते थे, तथापि यज्ञ की दक्षिणा के रूप भूमि-दान की प्रथा उत्तर वैदिक काल में भली-भाँति स्थापित नहीं हुई थी।

शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि अश्वमेध यज्ञ में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम इन समस्त दिशाओं का, पुरोहित को दान कर देना चाहिए। बड़े स्तर पर पुरोहितों को भूमि-दान किया जाना सम्भव नही था। एक उल्लेख ऐसा भी मिलता है कि पुरोहितों को दी जाने वाली भूमि ने अपना हस्तांतरण सम्भव नहीं होने दिया।

(4) उच्चकोटि का दार्शनिक विवेचन

600 ई.पू. के आसपास, उत्तर वैदिक काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा उपनिषदों की रचना हुई। इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया।

इस काल के याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा आत्मन् को पहचानने और आत्मन् तथा ब्रह्म के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया। ब्रह्मा सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया।

उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला। आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला।

इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। पुनर्जन्म के सिद्धान्त का अनुमोदन भी इसी युग में किया गया। इसके अनुसार मनुष्य का आगामी जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है।

इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया। मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया। षड्दर्शन अर्थात् सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा की रचना इसी काल में हुई।

(5) स्तुति पाठ

जिन भौतिक कारणों से लोग पूर्वकाल में देवताओं की आराधना करते थे, उन्हीं कारणों से अब भी करते थे परन्तु पूजा-पद्धति में काफी परिवर्तन हो गया था। स्तुति पाठ पहले की तरह ही होते थे, पर देवताओं को संतुष्ट करने की दृष्टि से अब उनका उतना महत्त्व नहीं रह गया था।

(6) देवताओं के महत्त्व में परिवर्तन

उत्तर-वैदिक सभ्यता में ऋग्वैदिक काल के देवताओं का महत्त्व घट रहा था और उनका स्थान अन्य नये देवता ग्रहण कर रहे थे। इन्द्र और अग्नि को, पहले जैसा महत्त्व नहीं था। इस युग में प्रजापति का महत्त्व देवताओं से अधिक हो गया। ऋग्वैदिक काल के दूसरे कई गौण देवताओं को भी उच्च स्थान प्रदान किए गए।

पशुओं के देवता रुद्र, उत्तर वैदिक काल में एक महत्त्वपूर्ण देवता बन गये। रुद्र को महादेव तथा पशुपति के नाम से पुकारा जाने लगा। रुद्र के साथ-साथ शिव का महत्त्व बढ़ने लगा। विष्णु अब उन लोगों के संरक्षक देवता समझे जाने लगे जो ऋग्वैदिक काल में अर्द्ध-घुमंतू जीवन बिताते थे और अब स्थायी जीवन बिताने लगे थे। विष्णु, वासुदेव कहलाने लगे।

भागवत सिद्धान्त का बीजारोपण भी इसी युग में हो गया था। जब समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया तो प्रत्येक वर्ण के पृथक देवता अस्तित्त्व में आ गए। पूषन जिसे गौरक्षक समझा जाता था, बाद में शूद्रों का देवता बन गया।

(7) आडम्बर तथा अन्ध विश्वासों में वृद्धि

उत्तर-वैदिक सभ्यता के आर्यों के उत्तरी मैदान में बस जाने के कारण वे मानसून पर अत्यधिक निर्भर रहने लगे। फलतः उन्हें अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि का सामना करना पड़ा। कृषि पर कीट-पतंगों एवं रोगों का आक्रमण होता था। अतः फसलों को नष्ट होने से बचाने के लिए मन्त्र-तन्त्र का प्रयोग होने लगा जिनका उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

ऋग्वैदिक काल का विशुद्ध धर्म अब धीरे-धीरे आडम्बरों तथा अन्ध-विश्वासों का जाल बनने लगा था। अब यह विश्वास हो गया था कि यज्ञों तथा मन्त्रों द्वारा न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है वरन् उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। अब भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा था।

अथर्ववेद में भूत-प्रेतों का वर्णन है और तन्त्र-मन्त्रों द्वारा इनसे रक्षा का उपाय भी बताया गया है। इसके साथ-साथ कुछ प्रतीक-वस्तुओं की भी पूजा होने लगी। उत्तर वैदिक काल में मूर्ति-पूजा भी आरम्भ हो गई।

वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनमें कई अन्तर दिखाई देते हैं। मुख्य अंतर इस प्रकार से हैं-

(1) काल सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता, वैदिक सभ्यता से अधिक प्राचीन है। माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता, वैदिक सभ्यता से लगभग दो हजार वर्ष अधिक पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता है जबकि वैदिक सभ्यता लौह युगीन सभ्यता है।

(2) नृवंशीय अंतर

द्रविड़ लोग छोटे, काले तथा चपटी नाक वाले होते थे परन्तु आर्य लोग लम्बे, गोरे तथा सुन्दर शरीर के होते थे।

(3) स्थान सम्बन्धी अंतर

सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में पनपी। इसकी बस्तियां पंजाब में हड़प्पा से लेकर सिंध में मोहनजोदड़ो, राजस्थान में कालीबंगा तथा गुजरात में सुत्कांगडोर तक मिली हैं जबकि आर्य सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में पनपी तथा इसका विस्तार गंगा-यमुना के दोआब, मध्य भारत तथा पूर्व में बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व तक पाया गया है।

(4) सभ्यताओं के स्वरूप में अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता नगरीय तथा व्यापार प्रधान थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण तथा कृषि प्रधान थी। सिन्धु-घाटी के लोगों को सामुद्रिक जीवन प्रिय था और वे सामुद्रिक व्यापार में कुशल थे परन्तु आर्यों को स्थलीय जीवन अधिक प्रिय था। सिंधु घाटी की सभ्यता एवं संस्कृति उतनी उन्नत तथा प्रौढ़ नहीं थी जितनी आर्यों की थी।

(5) सामाजिक व्यवस्था में अन्तर

द्रविड़ों का कुटुम्ब मातृक था अर्थात् माता कुटुम्ब की प्रधान होती थी, परन्तु आर्यों का कुटुम्ब पैतृक था जिसमें पिता अथवा कुटुुम्ब का अन्य कोई वयोवृद्ध पुरुष प्रधान होता था।

(6) विवाह पद्धति में अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों में चचेरे भाई-बहिन में विवाह हो सकता था, परन्तु आर्यों में इस प्रकार के विवाहों का निषेध था।

(7) उत्तराधिकार सम्बन्धी परम्पराओं में अंतर

सिन्धु-घाटी सभ्यता के निवासी, अपनी माता के भाई की सम्पति के उत्तराधिकारी होते थे। जबकि आर्य, अपने पिता की सम्पति के उत्तराधिकारी होते थे।

(8) जाति व्यवस्था में अन्तर

सिंधु घाटी के लोगों में जाति व्यवस्था नहीं थी जबकि आर्यों के समाज का मूलाधार जाति-व्यवस्था थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्य अलग-अलग निश्चित थे।

(9) आवास सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग नगरों में पक्की ईटों के मकान बनाकर रहते थे किंतु वैदिक आर्य गाँवों में बांस के पर्ण-कुटीर बनाकर रहते थे।

(10) धातुओं के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग पाषाण उपकरणों के साथ-साथ सोने-चांदी का प्रयोग करते थे तथा लोहे से अपरिचित थे परन्तु वैदिक काल के आर्य प्रारम्भ में सोने तथा ताम्बे का और बाद में चांदी, लोहे तथा कांसे का भी प्रयोग करने लगे थे।

(11) अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग युद्ध कला में प्रवीण नहीं थे। इसलिये उनके अस्त्र-शस्त्र साधारण कोटि के थे। वे युद्ध क्षेत्र में कवच (वर्म) तथा शिरस्त्राण आदि का उपयोग नहीं करते थे जबकि वैदिक आर्य युद्ध कला में अत्यंत प्रवीण थे तथा युद्ध क्षेत्र में आत्मरक्षा के लिए कवच और शिरस्त्राण आदि का प्रयोग करते थे।

(12) भोजन में अन्तर

सिन्धु सभ्यता के लोगों का प्रधान आहार मांस-मछली था। वैदिक आर्य भी प्रारम्भ में मांस-भक्षण करते थे, परन्तु उत्तर वैदिक काल में मांस भक्षण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा।

(13) पशुओं के ज्ञान तथा महत्त्व में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग बाघ तथा हाथी से भली-भांति परिचित थे किंतु ऊँट तथा घोड़े से अपरिचित थे। सिन्धु-घाटी के लोग साण्ड को गाय से अधिक महत्त्व देते थे। वैदिक आर्य बाघ तथा हाथी से अनभिज्ञ थे। हाथी का वेदों में बहुत कम उल्लेख मिलता है। वैदिक आर्य घोड़े पालते थे जिन्हे वे अपने रथों में जोतते थे तथा रणक्षेत्र में काम लेते थे। वैदिक काल के आर्य गाय को बड़ा पवित्र मानते थे और उसे पूजनीय समझते थे।

(14) धार्मिक धारणा में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोगों में मूर्ति-पूजा की प्रतिष्ठा थी। वे शिव तथा शक्ति की पूजा करते थे और देवी को देवता से अधिक ऊँचा स्थान प्रदान करते थे। वे लिंग-पूजक थे तथा अग्नि को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते थे। वैदिक आर्यों ने भी देवी-देवताओं में मानवीय गुणों का आरोपण किया था परन्तु वे मूर्ति-पूजक नहीं थे।

ऋग्वैदिक काल के आर्यों में शिव को कोई स्थान प्राप्त न था तथा वे लिंग-पूजा के विरोधी थे। आर्य लोग सर्वशक्तिमान दयालु ब्रह्म को मानते थे तथा अग्नि-पूजक थे। उनके प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी।

(15) कला के ज्ञान में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग लेखन-कला से परिचित थे और अन्य कलाओं में भी अधिक उन्नति कर गये थे, परन्तु वैदिक आर्य सम्भवतः लेखन-कला से परिचित न थे और अन्य कलाओं में भी उतने प्रवीण नहीं थे परन्तु काव्य-कला में वे सैंधवों से बढ़कर थे।

(16) लिपि एवं भाषागत अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों की लिपि अब तक नहीं पढ़ी जा सकी है किंतु अनुमान है कि वह एक प्रकार की चित्रलिपि थी। इस लिपि के अब तक नहीं पढ़े जाने के कारण सिन्धु-घाटी की भाषा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हो सकी है जबकि आर्यों की लिपि वर्णलिपि तथा भाषा संस्कृत थी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में पर्याप्त अन्तर था। दोनों सभ्यताओं का अलग-अलग कालों में और विभिन्न लोगों द्वारा विकास किया गया था परन्तु दोनों ही सभ्यताएँ, भारत की उच्च कोटि की सभ्यताएँ थीं। दोनों सभ्यताओं में इतना अन्तर होने पर शताब्दियों के सम्पर्क से दोनों ने एक दूसरे की संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया और उनमें साम्य हो गया। यह साम्य आज भी भारत की संस्कृति पर दिखाई पड़ता है।

सैंधव एवं आर्य सभ्यताओं के अनसुलझे प्रश्न

सिंधु सभ्यता एवं आर्य सभ्यता के सम्बन्ध में पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि-

1. हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम सिंधु सभ्यता है क्योंकि यह सभ्यता, सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में पनपी।

2. सैंधव सभ्यता, भारतीय आर्य सभ्यता से लगभग दो हजार साल पुरानी थी।

3. सिंधु सभ्यता नगरीय थी।

4. सिंधु सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे।

5. सिंधु सभ्यता के लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

6. सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया (ईराक) के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

7.  भारत में आने से पहले आर्य ईरान में रहते थे।

8. आर्यों ने सैंधव लोगों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियों को नष्ट कर दिया। आर्य ऐसा इसलिये कर पाये क्योंकि आर्यों के पास तेज गति की सवारी के लिये घोड़े तथा लड़ने के लिये लोहे के हथियार थे।

यदि पश्चिमी इतिहासकारों की उपरोक्त बातों को स्वीकार कर लिया जाये तो इतिहास में अनेक उलझनें पैदा हो जाती हैं। इनमें से कुछ विचारणीय बिंदु शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सहायता के लिये यहाँ दिये जा रहे हैं-

1. अब तक सैंधव सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज की गई है। इनमें से केवल 6 नगर हैं, शेष गांव हैं। ऐसी स्थिति में सैंधव सभ्यता को नगरीय सभ्यता कैसे कहा जा सकता है ?

2. सिंधु सभ्यता के स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाये गये हैं न कि सिंधु नदी की घाटी में। अतः इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता कैसे हो सकता है ?

3. यदि सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे तो सिंधु घाटी तथा मेसोपाटिमया का मार्ग, ईरान अथवा उसके आसपास से होकर जाने का रहा होगा जहाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियां थीं। ऐसी स्थिति में भी सैंधव लोग, घोड़े अथवा लोहे से परिचित क्यों नहीं हुए ?

4.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था, तो इस दौरान उनके घोड़े मरे भी होंगे। युद्ध के अतिरिक्त, बीमारी एवं स्वाभाविक मृत्यु से भी घोड़े मरे होंगे किंतु पूरी सैंधव सभ्यता के क्षेत्र से घोड़ों की केवल दो संदिग्ध मूर्तियां मिली हैं तथा एक घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि आर्यों के आने से पहले ही सैंधव सभ्यता नष्ट हो चुकी थी।

5. यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था तो उनके द्वारा प्रयुक्त लोहे के कुछ हथियार युद्ध के मैदानों अथवा सैंधव बस्तियों में गिरे होंगे अथवा छूट गये होंगे अथवा टूटने के कारण आर्य सैनिकों द्वारा फैंक दिये गये होंगे किंतु सैंधव बस्तियों से लोहे के हथियार नहीं मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण नहीं किया।

6. आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने साथ भारत में लोहा लेकर आये। यदि ऐसा था तो लौह बस्तियां सबसे पहले उत्तर भारत में स्थापित होनी चाहिये थीं किंतु आर्यों के आने के बाद उत्तर भारत में ताम्र-कांस्य कालीन बस्तियां बसीं जबकि उसी काल में दक्षिण भारत में लौह बस्तियां बस रही थीं। यह कैसे हुआ कि भारत में लोहे को लाने वाले आर्यों की बस्तियां उत्तर भारत में बस रही थीं जबकि लौह बस्तियां दक्षिण भारत में बस रही थीं ?

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि –

1. सैंधव सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता अथवा सरस्वती सभ्यता कहा जाना चाहिये।

2. सैंधव सभ्यता, आर्य सभ्यता से प्राचीन होने के कारण भले ही लोहे एवं घोड़े से अपिरिचित रही हो किंतु वह लोहे के हथियारों से सुसज्जित एवं घोड़ों पर बैठकर आने वाले आर्यों के आक्रमण में नष्ट नहीं हुई।

3. चूंकि यूरोपीय इतिहासकारों को यह सिद्धांत प्रतिपादित करना था कि ब्रिटेनवासियों की तरह आर्य भी भारत में बाहर से आये हैं, इसलिये उन्होंने सैंधव सभ्यता को आर्यों के आक्रमण में नष्ट होने का मिथक गढ़ा।

4. सुदूर संवेदी उपग्रहों द्वारा उपलब्ध कराये गये सिंधु तथा सरस्वती नदी के प्राचीन मार्गों के चित्र बताते हैं कि सरस्वती नदी द्वारा कई बार मार्ग बदला गया। इससे अनुमान होता है कि इसी कारण सिंधु सभ्यता की बस्तियां भी अपने प्राचीन स्थानों से हटकर दूसरे स्थानों को चली गई होंगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति

वैदिक सभ्यता का प्रसार 

ऋग्वैदिक सभ्यता 

उत्तर-वैदिक सभ्यता 

आधुनिक भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

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आधुनिक भारत का इतिहास

आधुनिक भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों के लिंक दिए गए हैं। पाठक इन अध्यायों के शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धित अध्याय तक पहुंच सकते हैं तथा उसका निःशुल्क अध्ययन कर सकते हैं। आधुनिक भारत का इतिहास प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है। इतिहास के इस कालखण्ड में भारत ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी एवं स्वतंत्रता प्राप्त करके स्वयं को सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र घोषित किया। आधुनिक भारत का इतिहास इस दृष्टि से अत्यत कष्टपूर्ण भी है कि इसी काल में भारत से बर्मा, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि देश अलग हुए।

आधुनिक भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

भारत पर अंग्रेज जाति का शासन

भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना

सहायक संधि प्रथा और वेलेजली

लॉर्ड हेस्टिंग्ज की हस्तक्षेप नीति

डॉक्टराइन ऑफ लैप्स

अंग्रेजों का जमींदारी बंदोबस्त

अंग्रेजों का रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त

अंग्रेजों का महलवाड़ी बंदोबस्त

कृषि का वाणिज्यीकरण और उसका प्रभाव

भारत से धन का निष्कासन

कुटीर उद्योगों का पतन

ब्रिटिश शासन में न्यायिक सुधार

भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

भारत में ईसाई शिक्षा के प्रारम्भिक प्रयास

भारत में पाश्चात्य शिक्षा के विकास का प्रथम चरण

वुड घोषणा पत्र तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का दूसरा चरण

हण्टर आयोग तथा पाश्चात्य शिक्षा के विकास का तीसरा चरण

बीसवीं सदी में पाश्चात्य शिक्षा का विकास

उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार आंदोलन

समाज सुधार आन्दोलन के कारण

ब्रह्म समाज

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मुस्लिम समाज सुधार आंदोलन

विभिन्न समाज सुधार आन्दोलन

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अठारहवीं सदी में प्रेस एवं पत्रकारिता का विकास

उन्नीसवीं सदी की पत्रकारिता

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ब्रिटिश शासन काल में किसान आंदोलन

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किसान आन्दोलनों के कारण

ब्रिटिश शासन काल में विद्रोह

अंग्रेजी शासन में विद्रोह

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अठारह सौ सत्तावन की क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

अठारह सौ सत्तावन क्रांति का दमन

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

ब्रिटिश काल में राजनीतिक संगठनों का उदय

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जूनागढ़ की समस्या

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कश्मीर समस्या

देशी रियासतों में प्रजातन्त्रीय व्यवस्था

परिशिष्ट

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-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोपीय जातियों का आगमन

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यूरोपीय जातियों का आगमन

जिस समय भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन हुआ उस समय देश में मुगलों का शासन था। इस कारण यूरोपीय जातियों को न केवल स्थानीय शासकों से अपितु मुगलों से भी कृपा प्राप्त करनी आवश्यक थी।

भारत में यूरोपीय जातियाँ ईस पूर्व की शताब्दियों से आ रही थीं। सिकंदर के भारत में आने (523 ई.पू.) से भी बहुत पहले, रोम के एक शासक ने कहा था- ‘भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।’

यह कथन इस बात का प्रमाण है कि यूरोप तथा भारत के बीच ईसा के जन्म के सैंकड़ों साल पहले भी भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापार के लिए आती थीं तथा व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था।

भारतवासी ईसा से भी कई हजार साल पहले अर्थात् सैंधव सभ्यता के समय से ही स्वर्ण धातु के गुणों तथा उसके उपयोग से परिचित थे। दक्षिण भारत में भी ईसा से लगभग 1000 साल पहले स्वर्ण उत्पादन होता था किंतु भारत में स्वर्ण बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध था। इस कारण भारतवासी विदेशी व्यापार में मुद्रा के रूप में केवल सोना-चांदी ही स्वीकार करते थे। यही कारण है कि भारत के मसालों, सुगंधित काष्ठों, अनाज तथा कपड़ों को प्राप्त करने के लिये विश्व भर के देशों ने भारतीय व्यापारियों के समक्ष सोने-चांदी के ढेर लगा दिये।

स्विस लेखक लैण्डर्स्टोन ने लिखा है– ‘समुद्र में जाने के अनेक रास्ते एवं माध्यम हैं पर उद्देश्य केवल एक ही था- चमत्कारिक देश भारत पहुँचना, जो देश धन से लबालब भरा है।’

अँग्रेजी लेखक शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) ने भारत भूमि को विश्व के लिये महान अवसरों की चरम सीमा कहा है। अँग्रेजी कवि मिल्टन (1608-1674 ई.) ने विभिन्न देशों की विशेषता बताते हुए भारत के धन की चर्चा की है। जर्मन दार्शनिक हेगेल (1770-1831 ई.) ने भारत को मनोकामना की भूमि बताया है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक भारत में यूरोपीय जातियाँ आने के लिये सदैव लालायित रहती थीं।

यूरोपियन जातियों के आगमन के उद्देश्य

कतिपय ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश का कारण भारत के लोगों को सभ्य बनाना था। जबकि वास्तव में भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के दो उद्देश्य जान पड़ते हैं- (1.) भारत में व्यापार करके धन अर्जित करना तथा (2.) भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना।

इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यूरोपीय जातियों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आवश्यकता हुई। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापारिक उद्देश्यों को लेकर प्रविष्ट हुईं किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी।

पुर्तगालियों का भारत में प्रवेश

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप में सुदूर देशों की ओर के समुद्री मार्गों का पता लगाने का जो अभियान चला, उसमें यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। 1497 ई. में वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक अपने साथियों सहित सामान और हथियारों से भरा जहाजी बेड़ा लेकर पूर्वी द्वीपों की खोज में निकल पड़ा।

अगस्त 1498 में वह भारत के विख्यात बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। उसने कालीकट के राजा जमेरिन से कालीकट में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस समय तक समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था किंतु कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने अरब व्यापारियों पर विजय प्राप्त करके समस्त व्यापार पर एवं भारत तथा यूरोप के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर नियंत्रण कर लिया।

पुर्तगालियों ने कालीकट के राजा जमेरिन को उसके शत्रु राज्यों, मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सैनिक सहायता दी और भारत की राजनीति में प्रवेश किया। अल्मीडा (1505-1509 ई.) भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया।

अल्मीडा का उत्तराधिकारी अल्बुकर्क (1509-1515 ई.) अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था जिसके नेतृत्व में भारत में पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने 1510 ई. में गोआ पर अधिकार किया। धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर ड्यू, सालसेट, बसीन, चौल तथा पूर्वी तट पर (बंगाल में) हुगली और दक्षिण में मद्रास तट पर सानथोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गये।

पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसालों के द्वीप तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने के लिये वे अन्य यूरोपीय जातियों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे।

उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- ‘पुर्तगालियों ने अपनी सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।’

पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिये पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने में असमर्थ रहा। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया।

इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। 1580 ई. में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया। 1588 ई. में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिये उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिये प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया।

अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। 1629 ई. में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया। 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालसेट और बसीन छीन लिये। 1661 ई. में पुर्तगालियों ने अपनी राजकुमारी का विवाह अँग्रेजों के राजा चार्ल्स (द्वितीय) के साथ किया तथा मुम्बई अँग्रेजों को दहेज में दे दिया।

डचों का भारत में प्रवेश

नीदरलैण्ड के निवासियों को डच कहा जाता है। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिये परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई।

1595 ई. में चार डच जहाज उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत के लिये रवाना हुए। 1602 ई. में डचों ने भारत से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया। 1604 ई. में डच जहाजी बेड़ा कालीकट पहुँचा। डचों के पास पर्याप्त नाविक शक्ति थी। उन्होंने मछलीपट्टम, पेटापोली, पुलीकट आदि स्थानों से व्यापार करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वी द्वीपों से पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया।

डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों- इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा एवं अन्य मसाला द्वीपों पर व्यापारिक आधिपत्य स्थापित करना था। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र था। अतः भारत में उन्होंने अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उन्होंने भारतीय व्यापार को पूरी तरह नहीं छोड़ा।

उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भड़ौंच, कैम्बे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, तमिलनाडु के नागपत्तम्, आंध्र प्रदेश के मच्छलीपत्तम्, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा में अपने व्यापारिक गोदाम बनाये। उन्होंने 1658 ई. में लंका को पुर्तगालियों से जीत लिया।

डच व्यापारी, भारत से नील, रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा और अफीम खरीदते थे। पुर्तगालियों की तरह वे भी भारतीय उत्पादकों एवं भारतीय नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार करते थे तथा उनका भयानक शोषण करते थे।

स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, नीदरलैण्ड एवं इंग्लैण्ड के व्यापारी, शताब्दियों से अफ्रीका के लोगों को पकड़कर उन्हें विश्व के बाजारों में गुलाम के रूप में बेचने तथा खानों एवं बागानों में बलपूर्वक काम लेने के लिये उन पर भयानक अत्याचार करने के अभ्यस्त थे। इसलिये उन्हें भारत के स्थानीय लोगों का शोषण करने एवं उन पर अत्याचार करने में कोई हिचक नहीं होती थी।

1718 ई. में अँग्रेजों ने डचों को हुगली तथा नागपत्तम् आदि स्थानों से खदेड़ दिया। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भी अँग्रेजों ने डचों को पछाड़ दिया। 1759 ई. में अँग्रेजों और डचों के मध्य बेदरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें डच परास्त हो गये और उन्हें अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने, नई सैनिक भर्ती नहीं करने और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। इस प्रकार भारत में डचों का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

अँग्रेजों का भारत में आगमन

पुर्तगालियों की सफलता ने अँग्रेज व्यापारियों को भारत आने के लिये उत्तेजित किया। पुर्तगालियों द्वारा यूरोप के बाजारों में भारतीय मसालों, कालीमिर्च, रेशमी कपड़ों, सूती कपड़ों तथा विभिन्न औषधियों को बेचकर कमाये जा रहे मुनाफे को देखकर ब्रिटिश वासियों के खून में उबाल आता था। वे इस लाभप्रद व्यापार में हिस्सा लेने के लिये अधीर हो उठे किंतु सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वे पुर्तगाल तथा स्पेन की नौसैनिक शक्ति को टक्कर देने में समर्थ नहीं थे।

उन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक इंग्लैण्ड से भारत के बीच वैकल्पिक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास किये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बीच उन्होंने समुद्री शक्ति जुटा ली। 1579 ई. में ड्रेक ने समुद्र के मार्ग से विश्व की परिक्रमा की। 1588 ई. में उन्होंने स्पेनिश आर्मेडा को परास्त करके पूरब की ओर जाने का समुद्री मार्ग खोल लिया।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

 1599 ई. में मर्चेण्ट एडवेंचर्स नामक सौदागरों के एक समूह के तत्त्वावधान में पूरब के साथ व्यापार करने के लिये एक ब्रिटिश संस्था की स्थापना की गई। 31 दिसम्बर 1600 को इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) ने लन्दन के इन व्यापारियों को पूरब के साथ व्यापार करने का अधिकार-पत्र प्रदान किया। इसी अधिकार-पत्र द्वारा इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित हुई। महारानी स्वयं इस कम्पनी की हिस्सेदार बन गई। 1601 ई. में इस कम्पनी के पहले जहाज ने इण्डोनेशिया के लिये व्यापारिक यात्रा आरम्भ की।

हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

24 अगस्त 1608 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला जहाज हैक्टर सूरत के मामूली से बन्दरगाह पर आकर लगा। इस जहाज का कप्तान विलियम हॉकिन्स नाविक कम, लुटेरा अधिक था। हॉकिन्स, मुगल बादशाह जहाँगीर से भेंट करने आगरा पहुँचा। मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव था। उन्होंने हॉकिन्स का प्रबल विरोध किया।

इस कारण हॉकिन्स मुगल दरबार से विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में असफल रहा किंतु जहाँगीर यूरोप के विभिन्न देशों से आ रहे गोरे व्यापारियों को भारत में बने रहने देना चाहता था ताकि भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें। इसलिये जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब तथा एक जागीर प्रदान की।

बाद में पुर्तगाली षड़यंत्र के कारण हॉकिन्स को आगरा से निकाल दिया गया। हॉकिन्स की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी।

पुर्तगालियों से झगड़ा

1612 ई. में पाल केनिंग, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ परन्तु उसे भी पुर्तगालियों के विरोध के कारण मुगल दरबार में सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने पुर्तगालियों से निबटने का निश्चय किया। उन्होंने पहले 1612 ई. में और बाद में 1614 ई. में पुर्तगालियों को युद्ध में परास्त किया तथा सूरत के समुद्री क्षेत्र से पुर्तगाली जहाजों को मार भगाया।

इससे बादशाह जहाँगीर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौ-सैनिक शक्ति का अनुमान हो गया। जहाँगीर स्वयं भी पुर्तगालियों पर अंकुश रखने के लिये एक मजबूत नौसेना का गठन करना चाहता था। जहाँगीर को लगा कि आवश्यकता हुई तो निकट भविष्य में अँग्रेजी नौसेना को मुगलों की सहायता के लिये काम में लिया जा सकेगा। इसलिये जब 1615 ई. के प्रारम्भ में विलियम एडवर्ड, राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ तो जहाँगीर ने अन्य विदेशी व्यापारियों की भाँति ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी भारत में बस्तियाँ बसाने तथा व्यापार करने की अनुमति दे दी।

सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में

यद्यपि जहांगीर से प्राप्त अनुमति, अँग्रेजों की बड़ी सफलता थी किंतु अँग्रेज इस अनुमति से संतुष्ट नहीं थे। वे अपने लिये दूसरे विदेशियों की तुलना में अधिक रियायतें एवं विशेषाधिकार चाहते थे। 1615 ई. में सर टॉमस रो ने अजमेर में जहाँगीर के समक्ष उपस्थित होकर भारत में व्यापार करने के लिये विशेषाधिकार मांगे। वह तीन वर्ष तक मुगल दरबार में उपस्थित होता रहा। फिर भी, उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली।

इस पर अँग्रेजों ने लाल सागर एवं मक्का जाने वाले भारतीय जहाजों को तंग करना आरम्भ किया। अँग्रेजों की समुद्री शक्ति का अनुमान लगाते हुए जहाँगीर ने अँग्रेजों को सम्पूर्ण मुगल राज्य में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। विशेषाधिकारों के सम्बन्ध में जहाँगीर ने टॉमस रो को केवल इतना ही आश्वासन दिया कि जितने विशेषाधिकार और किसी विदेशी को मिलेंगे उतने अँग्रेजों को भी दिये जायेंगे। शीघ्र ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दो जहाज प्रति माह भारत आने लगे। वे जो माल इंग्लैण्ड ले जाते थे वह अत्यधिक ऊंचे दामों पर बिकता था।

व्यापार, न कि भूमि

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत में आने के बाद लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे। यह सही है कि इस काल में उन्होंने व्यापार, न कि भूमि की नीति अपनाई किंतु यह बात सही नहीं है कि इस काल में वे नितांत व्यापारी बने रहे। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार की छाया में बढ़ा रही थी ताकि आवश्यकता होने पर वे देशी शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर अपना व्यापार निरापद रूप से चला सकें।

1619 ई. में सर टॉमस रो ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सलाह दी- ‘मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इन लोगों (अर्थात् भारतीयों) के साथ सबसे अच्छा व्यवहार तभी किया जा सकता है जब एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में संवादवाहक की छड़ी हो।’

पूरे 150 साल तक अँग्रेज शक्ति इस सलाह पर अमल करती रही।

कारखानों एवं बस्तियों की स्थापना

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक केन्द्रों को फैक्ट्री अथवा कारखाना कहा जाता था किंतु इन कारखानों में किसी प्रकार की मशीनें नहीं लगाई गई थीं और न ही इन स्थानों पर किसी प्रकार का उत्पादन होता था। ये कारखाने केवल व्यापारिक गोदाम का काम करते थे।

देश के अलग-अलग भागों में कम्पनी ने छोटी-छोटी बस्तियाँ स्थापित कीं जहाँ विदेशों से लाये गये सामान तथा यूरोप को ले जाये जाने वाले सामान का भण्डारण किया जाता था। इन्हीं बस्तियों में अँग्रेज अधिकारी और भारतीय नौकर रहते थे। जैसे-जैसे कम्पनी का व्यापार बढ़ा, अँग्रेजी बस्तियों का आकार भी बढ़ता गया। इन बस्तियों की रक्षा कम्पनी स्वयं करती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का संगठन प्रारम्भ हुआ।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत में अपनी बस्ती स्थापित की। 1631 ई. में मछलीपत्तम् में पहली कोठी स्थापित की गई। पूर्वी भारत में कम्पनी ने अपने पहले कारखाने 1633 ई. में उड़ीसा में खोले। उन्होंने एक कोठी बालासोर में तथा दूसरी कोठी हरिपूर में, जो कटक से 25 मील दक्षिण-पश्चिम में है, खोली।

1640 ई. में कम्पनी ने चन्द्रगिरी के राजा से मद्रास के निकट का क्षेत्र खरीदकर वहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट का निर्माण करवाया। 1651 ई. में बंगाल में हुगली नामक स्थान पर एक अँग्रेजी कारखाना खोला गया। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स (द्वितीय) ने पुर्तगाल की राजकुमारी (बेग्रांजा की कैथरीन) के साथ विवाह किया। इस अवसर पर पुर्तगाल के राजा ने बम्बई का पुर्तगाली क्षेत्र, चार्ल्स को दहेज में दे दिया। चार्ल्स ने यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी को किराये पर दे दिया।

बंगाल में व्यापार करने की विशेष आज्ञा

1652 ई. में बंगाल के सूबेदार शहजादा शुजा ने अँग्रेजों को एक निशान (विशेष आदेश) लिखकर दिया जिसके अनुसार सब तरह की चुंगी और अन्य करों के बदले अँग्रेजों द्वारा प्रतिवर्ष तीन हजार रुपये देते रहने पर अँग्रेजों को बंगाल में व्यापार करने दिया जाये। उन दिनों यूरोप से आने वाले समस्त जहाजों का माल बालसोर में उतारा जाता था।

फ्रांसीसियों का आगमन

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन सबसे पीछे हुआ। 1604 से 1619 ई. के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने 1644 ई. में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की।

इस कम्पनी को व्यापार के साथ-साथ भारत में उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम भी सौंपा गया। इस कम्पनी ने 1668 ई. में सबसे पहले सूरत में अपना पहला व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया। कम्पनी ने 1669 ई. में मछलीपत्तम् में और 1674 ई. में पाण्डिेचेरी में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापति कीं।

इसी समय कलकत्ता से 16 मील दूर चन्द्रनगर में भी फ्रांसीसी बस्ती स्थापित की गई जहाँ से सूती और रेशमी वस्त्र खरीदकर यूरोपीय देशों को भेजे जाते थे। 1672 से 1678 ई. के मध्य, यूरोप में फ्रांस और नीदरलैण्ड के बीच युद्ध चला। 1693 ई. में भारत में डचों ने पॉण्डिचेरी को जीत लिया किन्तु यूरोप में शान्ति हो जाने के बाद डचों ने पॉण्डिचेरी फिर से फ्रैंच कम्पनी को लौटा दिया।

फ्रांस का शासक लुई चौदहवाँ आजीवन युद्धों में व्यस्त रहा जिसके कारण फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अन्य कम्पनियों के समक्ष खड़ी नहीं रह सकी। इस कारण 1720 ई. में नई फ्रेंच कम्पनी स्थापित करके उसे पर्याप्त आर्थिक सहायता दी गई।

इस फ्रेंच कम्पनी ने भारत में प्रगति की। उसका व्यापार बढ़ने लगा इस कारण कम्पनी ने कुछ दूसरे स्थानों पर भी अपने व्यापारिक केन्द्र खोले। 1721 ई. में कारोमण्डल तट पर स्थित मॉरीशस द्वीप पर तथा 1725 ई. में मलाबार तट पर स्थित माही पर अधिकार हो जाने से फ्रांसीसियों की समुद्री शक्ति सुदृढ़ हो गई।

पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी

यूरोप से पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी जातियाँ भारत आयीं। भारत में यूरोपीय जातियाँ उसी प्रकार एक संघर्ष करती थी जिस प्रकार ये चारों जातियाँ यूरोप में एक दूसरे के रक्त की प्यासी थीं और एक दूसरे को नष्ट करने पर तुली हुई थीं। पूर्वी मसाला द्वीपों और भारत में व्यापारिक एकधिकार स्थापित करने के लिये भी इन देशों ने समुद्र से लेकर भारत की भूमि पर रक्त रंजित संघर्ष किया।

भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापारकि प्रतिस्पर्धा में टिकी रहें इसके लिए यह आवश्यक हो गया कि वे सशस्त्र संघर्ष करके अपने-अपने क्षेत्रों का विस्तार करें। इस खूनी संघर्ष में अँग्रेजों ने पुर्तगालियों और डचों को पछाड़कर अपनी स्थित सुदृढ़ कर ली। फ्रांसीसियों के भारत आगमन के बाद अँग्रेजों एवं फ्रांसीसियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई।

18वीं शताब्दी के मध्य से यह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदलने लगी। इस कारण भारत में यूरोपीय जातियाँ एक-दूसरे से खूनी संघर्ष में उलझ गईं। भारत की अस्थिर राजनीतिक स्थिति तथा केन्द्रीय सत्ता की अवनति ने अँग्रेजों एवं फ्रांसिसियों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को जागृत कर दिया और उन्होंने भारत के देशी राज्यों के पारस्परिक संघर्षों तथा राज्यों में सत्ता के लिए होने वाले उत्तराधिकार के झगड़ों में भाग लेना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वे भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगे।

दक्षिण भारत की राजनीतिक अराजकता का लाभ उठाने के लिये अँग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन युद्ध लड़े गये जो कर्नाटक के युद्ध कहलाते हैं। इनका विवरण आगे के अध्यायों में दिया गया है। तृतीय कर्नाटक युद्ध में अँग्रेजों को निर्णायक सफलता मिली। इसके बाद अँग्रेजों ने भारत में उपस्थित अन्य विदेशी शक्तियों को परास्त किया और अंत में देशी शक्तियों को परास्त करके भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो गये।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों का भारत आगमन

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अँग्रेजों का भारत आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन ई.1608 में हुआ। वे भारत में समुद्री मार्ग से आये तथा उनका उद्देश्य भारत से मसाला व्यापार करना था।

अँग्रेज भारत में समुद्री मार्ग से 1608 ई. में आये। उस समय भारत में मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। मुगलों की केन्द्रीय सत्ता अत्यंत प्रबल थी। दक्षिण भारत के राज्य मुगलों की सीमा पर स्थित थे। अँग्रेजों के आगमन से बहुत पहले अर्थात् 1498 ई. से पुर्तगाली भारत में व्यापार कर रहे थे।

डचों को भारत में आये हुए केवल चार साल हुए थे। इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अँग्रेजों ने विनम्र प्राथी बनकर भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरम्भ कीं जिनका विवरण पिछले अध्याय में दिया जा चुका है। सत्रहवीं सदी के अन्त तक बम्बई, कलकत्ता और मद्रास आदि समुद्री तट, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियों के मुख्य केन्द्र बन चुके थे। साथ ही देश के आन्तरिक भागों में पटना, अहमदाबाद, आगरा, बुरहानपुर आदि नगरों में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये थे।

कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न

बहुत से इतिहासकारों का कथन है कि 1608 से 1740 ई. तक ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में व्यापारिक कम्पनी की तरह काम करती रही। यह कथन बिल्कुल गलत है। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार के बल पर बढ़ाती रही।

औरंगजेब के जीवन काल में ही कम्पनी ने भारत में विनम्र प्रार्थी की भूमिका त्यागने का भरसक प्रयास किया। वह भारतीयों से बलपूर्वक सस्ता माल खरीदकर भारतीयों को महंगा माल बेचती थी। जो निर्धन भारतीय उत्पादक एवं भारतीय नौकर, ऐसा नहीं करते थे, उन्हें कम्पनी के आदमी कोड़ों से पीटते थे।

1680 के दशक में बम्बई के गवर्नर जेराल्ड आन्जियर ने कम्पनी के लन्दन स्थित निदेशकों को लिखा- ‘समय की मांग है कि आप अपने वाणिज्य का प्रबन्ध अपने हाथों में तलवार लेकर करें।’

1687 ई. में कम्पनी के निदेशकों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी- ‘आप नागरिक और सैनिक सत्ता की ऐसी नीति स्थापित करें और राजस्व की इतनी बड़ी राशि का सृजन कर उसे प्राप्त करें कि दोनों को सदा के लिये भारत पर एक विशाल सुदृढ़ सुरक्षित आधिपत्य के आधार के रूप में बनाए रखा जा सके।’

मुगलों से सशस्त्र संघर्ष

औरंगजेब के जीवन काल में ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की उग्र नीतियों के कारण कम्पनी के अधिकारियों और मुगल अधिकारियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ जो सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। 1686 ई. में कम्पनी ने हुगली को लूट लिया तथा मुगल बादशाह के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

औरंगजेब ने अँग्रेजों के विरुद्ध सख्त कदम उठाये। उसकी सेनाओं ने अँग्रेजों को बंगाल के कारखानों से निकालकर बाहर कर दिया। अँग्रेज भागकर गंगा के मुहाने पर स्थित एक ज्वर-ग्रस्त टापू पर चले गये। सूरत, मच्छलीपट्टम् और विशाखापट्टम् स्थित कारखानों पर भी मुगलों ने अधिकार कर लिया।

बम्बई के किले को मुगल सेनाओं ने घेर लिया। मुगल सेना की ऐसी शक्ति देखकर अँग्रेज पुनः विनम्र प्रार्थी की भूमिका में आ गये। उन्होंने औरंगजेब से निवेदन किया कि कम्पनी ने बिना सोचे-समझे जो भी अपराध किये हैं, उन्हें क्षमा कर दिया जाये। उन्होंने भारतीय शासकों के संरक्षण में व्यापार करने की इच्छा व्यक्त की। वे एक बार पुनः चापलूसी और विनम्र याचनाओं पर उतर आये।

औरंगजेब ने डेढ़ लाख रुपया क्षतिपूर्ति लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों को क्षमा कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि कम्पनी द्वारा चलाए जा रहे विदेशी व्यापार से भारतीय दस्तकारों और सौदागरों को लाभ होता है तथा इससे राज्य का खजाना समृद्ध होता है। इस प्रकार अँग्रेजों को पहले की भाँति भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई।

कम्पनी एक ओर तो मुगल बादशाह से क्षमा याचना की नीति अपना रही थी किंतु दूसरी ओर वह अपने उग्र तरीकों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी।

1689 ई. में कम्पनी ने घोषणा की- ‘अपने राजस्व की वृद्धि हमारी चिंता का उतना ही विषय है जितना हमारा व्यापार। जब बीस दुर्घटनाएं हमारे व्यापार में बाधा डाल सकती हैं, तब यही है जो हमारी ताकत को बनाए रखेगी। यही है जो हमें भारत में एक राष्ट्र बनाएगी…….।’

औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी

1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों की शक्ति पतनोन्मुख हो गई। यद्यपि मुगलों का अन्तिम बादशाह बहादुरशाह जफर 1858 ई. तक दिल्ली के तख्त का स्वामी बना रहा तथापि मुगलों की वास्तविक सत्ता 1800 ई. से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी।

शक्तिशाली सार्वभौम सत्ता के अभाव में विभिन प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। मुगलों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं होने से मुगल शहजादे परस्पर युद्ध के माध्यम से ही उत्तराधिकार का निर्णय करते थे। इस कारण मुगल सल्तनत में बिखराव की गति बहुत तीव्र रही।

औरंगजेब के बड़े पुत्र मुहम्मद मुअज्जम ने अपने भाइयों को युद्ध में मारकर बहादुरशाह (प्रथम) (1707-12 ई.) के नाम से तख्त पर अधिकार किया। उसने राजपूतों, सिक्खों और मराठों को दबाने का असफल प्रयास किया। फिर भी, उसके समय में मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रही।

बहादुरशाह की मृत्यु के बाद, ईरानी अमीर दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से जहाँदारशाह अपने भाइयों को परास्त करके 1713 ई. में तख्त पर बैठा। वह 10 माह में ही सैयद बंधुओं द्वारा तख्त से हटा दिया गया। इस प्रकार 1713 ई. में अमीरों द्वारा बादशाह की हत्या करके अपनी पसंद के शहजादों को मुगल तख्त पर बैठाने का जो सिलसिला आरम्भ किया, वह 1806 ई. में अकबर (द्वितीय) के तख्त पर बैठने के बाद ही समाप्त हुआ।

जहाँदारशाह के बाद उसके मृत भाई अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रूखसियर (1713-19 ई.) को बादशाह बनाया गया। अब फर्रूखसियर और सैयद भाइयों में सत्ता के लिये खुलकर संघर्ष हुआ। फर्रूखसियर ने सैयद भाइयों से मुक्त होने का प्रयास किया परन्तु सैयद भाइयों ने मराठों तथा राजपूतों के सहयोग से उसे मार डाला। इसके बाद सैयदों ने 1719 ई. में, एक ही वर्ष में एक-एक करके रफी-उद्-दरजात, रफीउद्दौला और मुहम्मदशाह रंगीला को तख्त पर बैठाया।

नादिरशाह का आक्रमण

मुहम्मदशाह 1748 ई. तक राज्य करता रहा। उसके समय में 1739 ई. में नादिरशाह का आक्रमण हुआ। नादिरशाह भारत से लगभग 70 करोड़ रुपये की सम्पदा लूटकर ले गया जिसमें कोहिनूर हीरा तथा शाहजहाँ का तख्ते-ताउस भी सम्मिलित था।

नादिरशाह के आक्रमण से मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा और स्थायित्व को गहरा धक्का लगा। मुहम्मदशाह के पश्चात् अहमदशाह ने 1748 से 1754 ई. तक तथा आलमगीर (द्वितीय) ने 1754 से 1759 ई. तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु दोनों में से किसी में भी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि साम्राज्य के पतन को रोक सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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क्षेत्रीय राज्यों का उदय

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क्षेत्रीय राज्यों का उदय

जब अठारहवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में मुगलों की सत्ता कमजोर पड़ने लगी तो भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में क्षेत्रीय राज्यों का उदय होने लगा। उसी काल में भारत में यूरोपियन जातियों का आगमन हुआ।

मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए राजपूतों, सिक्खों, मराठों तथा मुगल अमीरों ने अपने-अपने राज्यों की स्थापना करने एवं उन्हें मजबूत बनाने का प्रयत्न किया। अनेक महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं सूबेदारों ने स्वतंत्र तथा अर्द्ध-स्वंतत्र राज्यों की स्थापना की। ये लोग दिल्ली के बादशाह के प्रति नाममात्र की निष्ठा रखते थे।

यह सिलसिला 1712 ई. में बहादुरशाह (प्रथम) की मृत्यु के बाद ही आरम्भ हो गया था। इसके परिणाम स्वरूप उत्तर एवं दक्षिण भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से कुछ राज्यों के शासक, मुगल सल्तनत से पृथक् राज्य स्थापित करने के बाद भी मुगल सल्तनत के अन्तर्गत बने रहने की घोषणा करते रहे।

हैदराबाद

दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना औरंगजेब के मनसबदार चिनकुलीच खाँ ने की। औरंगजेब की मृत्यु के समय वह बीजापुर में था। बहादुरशाह (प्रथम) ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद चिनकुलीच खाँ ने जहाँदारशाह के विरुद्ध फर्रूखसियर की सहायता की।

अतः फर्रूखसियर ने बादशाह बनने पर चिनकुलीच खाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधियाँ प्रदान कीं। 1715 ई. में उसे पुनः दिल्ली बुलाया गया। उसे पहले मुरादाबाद की और फिर मालवा की सूबेदारी दी गई।

चिनकुलीच खाँ (निजाम-उल-मुल्क) ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया जिससे सैयद भाई उससे ईर्ष्या करने लगे। सैयद भाइयों ने बादशाह फर्रूखसियर पर दबाव डालकर दिलावर खाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त करवा दिया। निजाम-उल-मुल्क ने इसका विरोध किया और उसने एक युद्ध में दिलावर खाँ को मार डाला।

निजाम-उल-मुल्क ने बुरहानपुर और असीरगढ़ के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार वह दक्षिण-पथ का स्वामी बन गया। फर्रूखसियर के बाद मुहम्मदशाह को बादशाह बनाया गया। मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को समाप्त कर दिया और निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया।

निजाम-उल-मुल्क दिल्ली आकर सल्तनत का काम करने लगा। वह सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह को शीघ्र ही कुछ लोगों ने निजाम-उल-मुल्क के विरुद्ध भड़का दिया। इस कारण मुहम्मदशाह, निजाम-उल-मुल्क को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- ‘देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।’

इस कारण निजाम-उल-मुल्क नाराज होकर पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया किंतु निजाम-उल-मुल्क ने मराठों की सहायता से मुबारिजखाँ को परास्त कर दिया। इस पर मुहम्मदशाह की आंखें खुलीं। उसने निजाम को अपने पक्ष में करने के लिये दक्षिण के 6 सूबे प्रदान किये।

निजाम ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र रूप से शासन व्यवस्था स्थापित कर ली। इस प्रकार लगभग 1720 ई. के लगभग हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं।

निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

बंगाल, बिहार और उड़ीसा

मुर्शीदकुली खाँ

1707 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ बंगाल का नायब नाजिम तथा उड़ीसा का नाजिम था। 1713 ई. में फर्रूखसियर के शासनकाल में उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसके समय में बंगाल में शांति रही और व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

शुजाउद्दीन मुहम्मद

1727 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ की मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बना। मुहम्मदशाह रंगीला ने 1733 ई. में उसे बिहार का सूबा भी दे दिया। इस प्रकार, बंगाल, उड़ीसा और बिहार तीनों सूबे उसके शासन के अन्तर्गत चले गये तथा केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव नाममात्र का रह गया। उसके शासनकाल में भी इन सूबों में शान्ति बनी रही।

सरफराज खाँ

शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद 1739 ई. में उसका पुत्र सरफराज खाँ सूबेदार बना। वह अत्यधिक विलासी प्रवृत्ति का था। इस कारण शासन व्यवस्था बिगड़ गई। ऐसी स्थिति में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दीखाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सरफराजखाँ परास्त हुआ और मारा गया।

अलीवर्दी खाँ

अलीवर्दी खाँ ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के तीनों सूबों पर अधिकार कर लिया। मुहम्मदशाह ने भी उसे सूबेदार स्वीकार कर लिया। अलीवर्दी खाँ ने 1740 से 1756 ई. तक शासन किया। उसे मराठों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। नागपुर का रघुजी भोंसले, जो पेशवा का प्रतिद्वन्द्वी था, ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर धावे मारने आरम्भ कर दिये।

रघुजी के प्रतिनिधि भास्कर पन्त ने अलीवर्दीखाँ की सेना को कई बार परास्त किया। अलीवर्दीखाँ ने षड्यन्त्र रचकर भास्कर पन्त सहित कई मराठा सरदारों को मरवा दिया। इस पर क्रोधित होकर रघुजी भौंसले ने तीनों सूबों को बुरी तरह से रौंदा। अंत में अलीवर्दीखाँ को रघुजी से समझौता करना पड़ा तथा उड़ीसा का सूबा मराठों को सौंपना पड़ा।

साथ ही बंगाल तथा बिहार की चौथ के बदले में रघुजी को 12 लाख रुपये वार्षिक देने का वचन देना पड़ा। अलीवर्दी खाँ को बंगाल का नवाब बनाने में हिन्दू व्यापारियों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। अतः अलीवर्दी खाँ ने भी अपने शासन में रायदुर्लभ, जगत सेठ, मेहताबराय, स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा मानिकचन्द्र आदि हिन्दुओं को उच्च पद दिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रभाव का मुख्य कारण बंगाल के व्यापार पर उनका एकाधिकार होना था।

सिराजुद्दौला

अलीवर्दी खाँ ने अपने जीवनकाल में ही अपनी छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। अतः 1756 ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने से रोका। इस कारण सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ।

अवध

सआदत खाँ

अवध राज्य की स्थापना मीर मोहम्मद अमीन सआदत  बुरहान-उल-मुल्क ने की जिसे सआदतखाँ भी कहते हैं। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था। वह निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वन्द्वी था। मीर मोहम्मद ने सैयद बन्धुओं के पतन में योगदान दिया था। इसके बदले में उसे सआदत खाँ की उपाधि तथा आगरा की सूबेदारी मिली।

1722 ई. में उसे अवध की सूबेदारी मिली। इसी समय से अवध राज्य का स्वतंत्र इतिहास प्रारंभ होता है। सआदत खाँ ने दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भाग लिया। 1732 ई. में उसने उत्तरी भारत में मराठों के प्रसार को रोकने के सम्बन्ध में बादशाह मुहम्मदशाह के समक्ष कुछ प्रस्ताव रखे परन्तु अन्य अमीरों के विरोध के कारण उसे सफलता नहीं मिली।

बादशाह ने उसे पेशवा बाजीराव के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये। सआदत खाँ ने मार्च 1737 में मराठों की एक छोटी सी सेना को परास्त किया तथा बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को झूठी सूचना भिजवा दी कि उसने पेशवा बाजीराव को चम्बल के उस पार खदेड़ दिया है।

जब बाजीराव को इस बात की जानकारी हुई तो उसने क्रोधित होकर दिल्ली पर धावा बोल दिया तथा सआदत खाँ की पोल खोल दी। इस घटना से मुगल दरबार में सआदतखाँ की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। इसका बदला सआदतखाँ ने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण हेतु उकसाकर तथा उसके हाथों मुहम्मदशाह का अपमान करवा कर लिया। 1739 ई. में सआदतखाँ की मृत्यु हो गई।

सफदरजंग

सआदत खाँ के बाद उसका भतीजा एवं दामाद सफदरजंग अवध का सूबेदार बना। 1748 ई. में मुगल बादशाह अहमदशाह ने उसे सल्तनत का वजीर नियुक्त किया। कुछ समय बाद उसे इलाहबाद का सूबा भी दे दिया। सफदरगंज ने अवध की सीमा पर स्थित रूहेलखण्ड में बसे हुए रूहेलों और फर्रूखाबाद के पठानों को दबाने का प्रयास किया।

ये लोग अवध के क्षेत्रों में लूटमार करते रहते थे। सफदरगंज ने इस कार्य में जयप्पा सिन्धिया, मल्हारराव होलकर तथा जाट राजा सूरजमल का सहयोग लिया। 22 अप्रैल 1752 को सफदरगंज ने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों से समझौता किया परन्तु बादशाह ने उस समझौते को रद्द करके पंजाब, अब्दाली को सौंप दिया।

इस पर बादशाह और वजीर में अघोषित युद्ध छिड़ गया जिसमें वजीर परास्त हो गया तथा अपना पद त्यागकर अपने सूबे अवध को चला गया। अक्टूबर 1754 में उसकी मृत्यु हो गई।

शुजाउद्दौला

सफदरजंग की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना। उसके समय में अवध की राजनीति में गम्भीर परिवर्तन हुए। उसने मुगल शाहजादे अलीगौहार को अवध में शरण दी तथा पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया।

अलीगौहर ने बादशाह बनने के बाद 1762 ई. में शुजाउद्दौला को वजीर के पद पर नियुक्त किया। शुजाउद्दौला ने बंगाल के नवाब मीर कासिम को अपने राज्य में शरण दी और अंग्रेजों के विरुद्ध बक्सर तथा कड़ा के युद्ध लड़े। इन युद्धों में शुजाउद्दौला की पराजय हुई। तब से अवध अँग्रेजों के प्रभाव में चला गया।

बड़ौदा

गुजरात मुगल सल्तनत के समृद्ध सूबों में से था किन्तु केन्द्रीय शक्ति के ह्रास के कारण गुजरात पर नियंत्रण बनाये रखना कठिन हो गया। जब मराठों को गुजरात से चौथ वसूली का अधिकार दिया गया तो मराठों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।

गुजरात के तत्कालीन सूबेदार महाराजा अभयसिंह ने मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने का प्रयास किया किंतु महाराजा को 1733 ई. के युद्ध में बुरी तरह परास्त होना पड़ा और वह गुजरात का शासन अपने अधिकारियों को सौंपकर जोधपुर चला गया। 1735 ई. तक मराठे गुजरात के वास्तविक शासक बन गये। आगे चलकर गुजरात में बड़ौदा राज्य स्थापित हुआ जिस पर गायकवाड़ परिवार ने शासन किया।

मालवा

मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण दिल्ली दरबार का कोई भी अमीर मालवा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं कर पाया। 1724 ई. के बाद पेशवा के तीन सेनानायकों- होलकर, सिन्धिया और पंवार ने क्रमशः इन्दौर, ग्वालियर और धार में मराठा शक्ति का विस्तार किया। आगे चलकर तीनों, स्वतंत्र मराठा राज्यों में बदल गये।

पंजाब

पंजाब के सूबेदार जकारियाखाँ ने लम्बे समय तक पंजाब में शान्ति बनाये रखी परन्तु 1737 से 1739 ई. तक नादिरशाह और 1752 से 1761 ई. तक अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से पंजाब की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। दिल्ली दरबार की दलबन्दी और मुहम्मदशाह रंगीला की निर्बलता के कारण पंजाब में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी।

राजपूताना

बाबर के समय से ही मेवाड़ राज्य, मुगलों से पर्याप्त दूरी बनाये हुए था। औरंगजेब की धूर्त्तता और मक्कारी पूर्ण गतिविधियों के चलते जोधपुर, बीकानेर, आम्बेर तथा बूंदी आदि राजपूत राज्य, मुगलों से लगातार दूर होते जा रहे थे। फिर भी वे मुगल राजनीति में भाग लेते रहे।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा मारवाड़ नरेश अभयसिंह, मुगलों की सूबेदारी स्वीकार करते रहे तथा मराठों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करते रहे परन्तु मराठे निरंतर आगे बढ़ते रहे जिसके कारण केन्द्रीय राजनीति में राजपूत राज्यों की भूमिका गौण हो गई तथा राजपूताना राज्यों के शासक अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने लगे।

मैसूर

1565 ई. में तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर राज्य का विघटन हो गया तथा मैसूर का हिन्दू राज्य अस्तित्त्व में आया था। 1704 ई. में मैसूर को औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। 1750 ई. के आसपास मैसूर पर चिकाकृष्णराज का शासन था। वह नाममात्र का शासक था।

शासन की समस्त शक्तियाँ देवराज और नन्दराज  नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज, राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। उस समय हैदरअली, नन्दराज की सेना में नायक के पद पर काम करता था। हैदरअली अनपढ़ होते हुए भी चतुर व्यक्ति था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर नन्दराज ने उसे डिण्डुगल दुर्ग का फौजदार नियुक्त किया।

1761 ई. में हैदरअली ने मैसूर के दीवान खाण्डेराव तथा राजमाता से मिलकर नन्दराज को परास्त कर दिया। नन्दराज के पराभव के बाद हैदरअली ने शासन, राजमाता को सौंपने के स्थान पर स्वयं अपने हाथ में ले लिया। हैदरअली ने दीवान खाण्डेराव को बंदीगृह में डाल दिया तथा स्वयं राजा के नाम पर शासन करने लगा।

जब हैदराबाद के निजाम नासिरजंग की हत्या हुई, तब हैदरअली अपने सैनिकों सहित हैदराबाद में ही था। नासिरजंग की हत्या के बाद विद्रोही, उसका कोष लूटकर भागने लगे।

हैदरअली ने उन्हें परास्त करके लूट का सारा माल हथिया लिया। इस प्रकार, वह अपार धन-सम्पदा का स्वामी बन गया। 1776 ई. में मैसूर के राजा की मृत्यु के बाद हैदरअली ने स्वयं को मैसूर का सुल्तान घोषित कर दिया। उसने दक्षिण में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर अपने राज्य का बहुत विस्तार किया।

अँग्रेजों को हैदरअली का उत्कर्ष खटकने लगा। उन्होंने मैसूर राज्य को समाप्त करने के लिये 1766 से 1799 ई. की अवधि में हैदरअली तथा उसके पुत्र टीपू सुल्तान से चार युद्ध लड़े। इन्हें मैसूर का प्रथम युद्ध (1766-1769 ई.), मैसूर का द्वितीय युद्ध (1780-1784 ई.), मैसूर का तृतीय युद्ध (1790-1792 ई.) एवं चतुर्थ युद्ध (1799 ई.) कहा जाता है। मैसूर के द्वितीय युद्ध में हैदरअली तथा मैसूर के चतुर्थ एवं अंतिम युद्ध में हैदरअली का पुत्र टीपू सुल्तान मारा गया और मैसूर राज्य पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...