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यूरोपीय जातियों का आगमन

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यूरोपीय जातियों का आगमन

जिस समय भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन हुआ उस समय देश में मुगलों का शासन था। इस कारण यूरोपीय जातियों को न केवल स्थानीय शासकों से अपितु मुगलों से भी कृपा प्राप्त करनी आवश्यक थी।

भारत में यूरोपीय जातियाँ ईस पूर्व की शताब्दियों से आ रही थीं। सिकंदर के भारत में आने (523 ई.पू.) से भी बहुत पहले, रोम के एक शासक ने कहा था- ‘भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।’

यह कथन इस बात का प्रमाण है कि यूरोप तथा भारत के बीच ईसा के जन्म के सैंकड़ों साल पहले भी भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापार के लिए आती थीं तथा व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था।

भारतवासी ईसा से भी कई हजार साल पहले अर्थात् सैंधव सभ्यता के समय से ही स्वर्ण धातु के गुणों तथा उसके उपयोग से परिचित थे। दक्षिण भारत में भी ईसा से लगभग 1000 साल पहले स्वर्ण उत्पादन होता था किंतु भारत में स्वर्ण बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध था। इस कारण भारतवासी विदेशी व्यापार में मुद्रा के रूप में केवल सोना-चांदी ही स्वीकार करते थे। यही कारण है कि भारत के मसालों, सुगंधित काष्ठों, अनाज तथा कपड़ों को प्राप्त करने के लिये विश्व भर के देशों ने भारतीय व्यापारियों के समक्ष सोने-चांदी के ढेर लगा दिये।

स्विस लेखक लैण्डर्स्टोन ने लिखा है– ‘समुद्र में जाने के अनेक रास्ते एवं माध्यम हैं पर उद्देश्य केवल एक ही था- चमत्कारिक देश भारत पहुँचना, जो देश धन से लबालब भरा है।’

अँग्रेजी लेखक शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) ने भारत भूमि को विश्व के लिये महान अवसरों की चरम सीमा कहा है। अँग्रेजी कवि मिल्टन (1608-1674 ई.) ने विभिन्न देशों की विशेषता बताते हुए भारत के धन की चर्चा की है। जर्मन दार्शनिक हेगेल (1770-1831 ई.) ने भारत को मनोकामना की भूमि बताया है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक भारत में यूरोपीय जातियाँ आने के लिये सदैव लालायित रहती थीं।

यूरोपियन जातियों के आगमन के उद्देश्य

कतिपय ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश का कारण भारत के लोगों को सभ्य बनाना था। जबकि वास्तव में भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के दो उद्देश्य जान पड़ते हैं- (1.) भारत में व्यापार करके धन अर्जित करना तथा (2.) भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना।

इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यूरोपीय जातियों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आवश्यकता हुई। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापारिक उद्देश्यों को लेकर प्रविष्ट हुईं किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी।

पुर्तगालियों का भारत में प्रवेश

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप में सुदूर देशों की ओर के समुद्री मार्गों का पता लगाने का जो अभियान चला, उसमें यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। 1497 ई. में वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक अपने साथियों सहित सामान और हथियारों से भरा जहाजी बेड़ा लेकर पूर्वी द्वीपों की खोज में निकल पड़ा।

अगस्त 1498 में वह भारत के विख्यात बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। उसने कालीकट के राजा जमेरिन से कालीकट में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस समय तक समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था किंतु कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने अरब व्यापारियों पर विजय प्राप्त करके समस्त व्यापार पर एवं भारत तथा यूरोप के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर नियंत्रण कर लिया।

पुर्तगालियों ने कालीकट के राजा जमेरिन को उसके शत्रु राज्यों, मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सैनिक सहायता दी और भारत की राजनीति में प्रवेश किया। अल्मीडा (1505-1509 ई.) भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया।

अल्मीडा का उत्तराधिकारी अल्बुकर्क (1509-1515 ई.) अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था जिसके नेतृत्व में भारत में पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने 1510 ई. में गोआ पर अधिकार किया। धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर ड्यू, सालसेट, बसीन, चौल तथा पूर्वी तट पर (बंगाल में) हुगली और दक्षिण में मद्रास तट पर सानथोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गये।

पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसालों के द्वीप तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने के लिये वे अन्य यूरोपीय जातियों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे।

उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- ‘पुर्तगालियों ने अपनी सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।’

पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिये पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने में असमर्थ रहा। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया।

इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। 1580 ई. में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया। 1588 ई. में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिये उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिये प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया।

अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। 1629 ई. में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया। 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालसेट और बसीन छीन लिये। 1661 ई. में पुर्तगालियों ने अपनी राजकुमारी का विवाह अँग्रेजों के राजा चार्ल्स (द्वितीय) के साथ किया तथा मुम्बई अँग्रेजों को दहेज में दे दिया।

डचों का भारत में प्रवेश

नीदरलैण्ड के निवासियों को डच कहा जाता है। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिये परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई।

1595 ई. में चार डच जहाज उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत के लिये रवाना हुए। 1602 ई. में डचों ने भारत से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया। 1604 ई. में डच जहाजी बेड़ा कालीकट पहुँचा। डचों के पास पर्याप्त नाविक शक्ति थी। उन्होंने मछलीपट्टम, पेटापोली, पुलीकट आदि स्थानों से व्यापार करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वी द्वीपों से पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया।

डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों- इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा एवं अन्य मसाला द्वीपों पर व्यापारिक आधिपत्य स्थापित करना था। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र था। अतः भारत में उन्होंने अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उन्होंने भारतीय व्यापार को पूरी तरह नहीं छोड़ा।

उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भड़ौंच, कैम्बे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, तमिलनाडु के नागपत्तम्, आंध्र प्रदेश के मच्छलीपत्तम्, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा में अपने व्यापारिक गोदाम बनाये। उन्होंने 1658 ई. में लंका को पुर्तगालियों से जीत लिया।

डच व्यापारी, भारत से नील, रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा और अफीम खरीदते थे। पुर्तगालियों की तरह वे भी भारतीय उत्पादकों एवं भारतीय नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार करते थे तथा उनका भयानक शोषण करते थे।

स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, नीदरलैण्ड एवं इंग्लैण्ड के व्यापारी, शताब्दियों से अफ्रीका के लोगों को पकड़कर उन्हें विश्व के बाजारों में गुलाम के रूप में बेचने तथा खानों एवं बागानों में बलपूर्वक काम लेने के लिये उन पर भयानक अत्याचार करने के अभ्यस्त थे। इसलिये उन्हें भारत के स्थानीय लोगों का शोषण करने एवं उन पर अत्याचार करने में कोई हिचक नहीं होती थी।

1718 ई. में अँग्रेजों ने डचों को हुगली तथा नागपत्तम् आदि स्थानों से खदेड़ दिया। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भी अँग्रेजों ने डचों को पछाड़ दिया। 1759 ई. में अँग्रेजों और डचों के मध्य बेदरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें डच परास्त हो गये और उन्हें अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने, नई सैनिक भर्ती नहीं करने और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। इस प्रकार भारत में डचों का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

अँग्रेजों का भारत में आगमन

पुर्तगालियों की सफलता ने अँग्रेज व्यापारियों को भारत आने के लिये उत्तेजित किया। पुर्तगालियों द्वारा यूरोप के बाजारों में भारतीय मसालों, कालीमिर्च, रेशमी कपड़ों, सूती कपड़ों तथा विभिन्न औषधियों को बेचकर कमाये जा रहे मुनाफे को देखकर ब्रिटिश वासियों के खून में उबाल आता था। वे इस लाभप्रद व्यापार में हिस्सा लेने के लिये अधीर हो उठे किंतु सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वे पुर्तगाल तथा स्पेन की नौसैनिक शक्ति को टक्कर देने में समर्थ नहीं थे।

उन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक इंग्लैण्ड से भारत के बीच वैकल्पिक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास किये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बीच उन्होंने समुद्री शक्ति जुटा ली। 1579 ई. में ड्रेक ने समुद्र के मार्ग से विश्व की परिक्रमा की। 1588 ई. में उन्होंने स्पेनिश आर्मेडा को परास्त करके पूरब की ओर जाने का समुद्री मार्ग खोल लिया।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

 1599 ई. में मर्चेण्ट एडवेंचर्स नामक सौदागरों के एक समूह के तत्त्वावधान में पूरब के साथ व्यापार करने के लिये एक ब्रिटिश संस्था की स्थापना की गई। 31 दिसम्बर 1600 को इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) ने लन्दन के इन व्यापारियों को पूरब के साथ व्यापार करने का अधिकार-पत्र प्रदान किया। इसी अधिकार-पत्र द्वारा इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित हुई। महारानी स्वयं इस कम्पनी की हिस्सेदार बन गई। 1601 ई. में इस कम्पनी के पहले जहाज ने इण्डोनेशिया के लिये व्यापारिक यात्रा आरम्भ की।

हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

24 अगस्त 1608 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला जहाज हैक्टर सूरत के मामूली से बन्दरगाह पर आकर लगा। इस जहाज का कप्तान विलियम हॉकिन्स नाविक कम, लुटेरा अधिक था। हॉकिन्स, मुगल बादशाह जहाँगीर से भेंट करने आगरा पहुँचा। मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव था। उन्होंने हॉकिन्स का प्रबल विरोध किया।

इस कारण हॉकिन्स मुगल दरबार से विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में असफल रहा किंतु जहाँगीर यूरोप के विभिन्न देशों से आ रहे गोरे व्यापारियों को भारत में बने रहने देना चाहता था ताकि भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें। इसलिये जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब तथा एक जागीर प्रदान की।

बाद में पुर्तगाली षड़यंत्र के कारण हॉकिन्स को आगरा से निकाल दिया गया। हॉकिन्स की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी।

पुर्तगालियों से झगड़ा

1612 ई. में पाल केनिंग, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ परन्तु उसे भी पुर्तगालियों के विरोध के कारण मुगल दरबार में सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने पुर्तगालियों से निबटने का निश्चय किया। उन्होंने पहले 1612 ई. में और बाद में 1614 ई. में पुर्तगालियों को युद्ध में परास्त किया तथा सूरत के समुद्री क्षेत्र से पुर्तगाली जहाजों को मार भगाया।

इससे बादशाह जहाँगीर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौ-सैनिक शक्ति का अनुमान हो गया। जहाँगीर स्वयं भी पुर्तगालियों पर अंकुश रखने के लिये एक मजबूत नौसेना का गठन करना चाहता था। जहाँगीर को लगा कि आवश्यकता हुई तो निकट भविष्य में अँग्रेजी नौसेना को मुगलों की सहायता के लिये काम में लिया जा सकेगा। इसलिये जब 1615 ई. के प्रारम्भ में विलियम एडवर्ड, राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ तो जहाँगीर ने अन्य विदेशी व्यापारियों की भाँति ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी भारत में बस्तियाँ बसाने तथा व्यापार करने की अनुमति दे दी।

सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में

यद्यपि जहांगीर से प्राप्त अनुमति, अँग्रेजों की बड़ी सफलता थी किंतु अँग्रेज इस अनुमति से संतुष्ट नहीं थे। वे अपने लिये दूसरे विदेशियों की तुलना में अधिक रियायतें एवं विशेषाधिकार चाहते थे। 1615 ई. में सर टॉमस रो ने अजमेर में जहाँगीर के समक्ष उपस्थित होकर भारत में व्यापार करने के लिये विशेषाधिकार मांगे। वह तीन वर्ष तक मुगल दरबार में उपस्थित होता रहा। फिर भी, उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली।

इस पर अँग्रेजों ने लाल सागर एवं मक्का जाने वाले भारतीय जहाजों को तंग करना आरम्भ किया। अँग्रेजों की समुद्री शक्ति का अनुमान लगाते हुए जहाँगीर ने अँग्रेजों को सम्पूर्ण मुगल राज्य में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। विशेषाधिकारों के सम्बन्ध में जहाँगीर ने टॉमस रो को केवल इतना ही आश्वासन दिया कि जितने विशेषाधिकार और किसी विदेशी को मिलेंगे उतने अँग्रेजों को भी दिये जायेंगे। शीघ्र ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दो जहाज प्रति माह भारत आने लगे। वे जो माल इंग्लैण्ड ले जाते थे वह अत्यधिक ऊंचे दामों पर बिकता था।

व्यापार, न कि भूमि

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत में आने के बाद लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे। यह सही है कि इस काल में उन्होंने व्यापार, न कि भूमि की नीति अपनाई किंतु यह बात सही नहीं है कि इस काल में वे नितांत व्यापारी बने रहे। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार की छाया में बढ़ा रही थी ताकि आवश्यकता होने पर वे देशी शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर अपना व्यापार निरापद रूप से चला सकें।

1619 ई. में सर टॉमस रो ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सलाह दी- ‘मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इन लोगों (अर्थात् भारतीयों) के साथ सबसे अच्छा व्यवहार तभी किया जा सकता है जब एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में संवादवाहक की छड़ी हो।’

पूरे 150 साल तक अँग्रेज शक्ति इस सलाह पर अमल करती रही।

कारखानों एवं बस्तियों की स्थापना

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक केन्द्रों को फैक्ट्री अथवा कारखाना कहा जाता था किंतु इन कारखानों में किसी प्रकार की मशीनें नहीं लगाई गई थीं और न ही इन स्थानों पर किसी प्रकार का उत्पादन होता था। ये कारखाने केवल व्यापारिक गोदाम का काम करते थे।

देश के अलग-अलग भागों में कम्पनी ने छोटी-छोटी बस्तियाँ स्थापित कीं जहाँ विदेशों से लाये गये सामान तथा यूरोप को ले जाये जाने वाले सामान का भण्डारण किया जाता था। इन्हीं बस्तियों में अँग्रेज अधिकारी और भारतीय नौकर रहते थे। जैसे-जैसे कम्पनी का व्यापार बढ़ा, अँग्रेजी बस्तियों का आकार भी बढ़ता गया। इन बस्तियों की रक्षा कम्पनी स्वयं करती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का संगठन प्रारम्भ हुआ।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत में अपनी बस्ती स्थापित की। 1631 ई. में मछलीपत्तम् में पहली कोठी स्थापित की गई। पूर्वी भारत में कम्पनी ने अपने पहले कारखाने 1633 ई. में उड़ीसा में खोले। उन्होंने एक कोठी बालासोर में तथा दूसरी कोठी हरिपूर में, जो कटक से 25 मील दक्षिण-पश्चिम में है, खोली।

1640 ई. में कम्पनी ने चन्द्रगिरी के राजा से मद्रास के निकट का क्षेत्र खरीदकर वहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट का निर्माण करवाया। 1651 ई. में बंगाल में हुगली नामक स्थान पर एक अँग्रेजी कारखाना खोला गया। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स (द्वितीय) ने पुर्तगाल की राजकुमारी (बेग्रांजा की कैथरीन) के साथ विवाह किया। इस अवसर पर पुर्तगाल के राजा ने बम्बई का पुर्तगाली क्षेत्र, चार्ल्स को दहेज में दे दिया। चार्ल्स ने यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी को किराये पर दे दिया।

बंगाल में व्यापार करने की विशेष आज्ञा

1652 ई. में बंगाल के सूबेदार शहजादा शुजा ने अँग्रेजों को एक निशान (विशेष आदेश) लिखकर दिया जिसके अनुसार सब तरह की चुंगी और अन्य करों के बदले अँग्रेजों द्वारा प्रतिवर्ष तीन हजार रुपये देते रहने पर अँग्रेजों को बंगाल में व्यापार करने दिया जाये। उन दिनों यूरोप से आने वाले समस्त जहाजों का माल बालसोर में उतारा जाता था।

फ्रांसीसियों का आगमन

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन सबसे पीछे हुआ। 1604 से 1619 ई. के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने 1644 ई. में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की।

इस कम्पनी को व्यापार के साथ-साथ भारत में उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम भी सौंपा गया। इस कम्पनी ने 1668 ई. में सबसे पहले सूरत में अपना पहला व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया। कम्पनी ने 1669 ई. में मछलीपत्तम् में और 1674 ई. में पाण्डिेचेरी में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापति कीं।

इसी समय कलकत्ता से 16 मील दूर चन्द्रनगर में भी फ्रांसीसी बस्ती स्थापित की गई जहाँ से सूती और रेशमी वस्त्र खरीदकर यूरोपीय देशों को भेजे जाते थे। 1672 से 1678 ई. के मध्य, यूरोप में फ्रांस और नीदरलैण्ड के बीच युद्ध चला। 1693 ई. में भारत में डचों ने पॉण्डिचेरी को जीत लिया किन्तु यूरोप में शान्ति हो जाने के बाद डचों ने पॉण्डिचेरी फिर से फ्रैंच कम्पनी को लौटा दिया।

फ्रांस का शासक लुई चौदहवाँ आजीवन युद्धों में व्यस्त रहा जिसके कारण फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अन्य कम्पनियों के समक्ष खड़ी नहीं रह सकी। इस कारण 1720 ई. में नई फ्रेंच कम्पनी स्थापित करके उसे पर्याप्त आर्थिक सहायता दी गई।

इस फ्रेंच कम्पनी ने भारत में प्रगति की। उसका व्यापार बढ़ने लगा इस कारण कम्पनी ने कुछ दूसरे स्थानों पर भी अपने व्यापारिक केन्द्र खोले। 1721 ई. में कारोमण्डल तट पर स्थित मॉरीशस द्वीप पर तथा 1725 ई. में मलाबार तट पर स्थित माही पर अधिकार हो जाने से फ्रांसीसियों की समुद्री शक्ति सुदृढ़ हो गई।

पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी

यूरोप से पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी जातियाँ भारत आयीं। भारत में यूरोपीय जातियाँ उसी प्रकार एक संघर्ष करती थी जिस प्रकार ये चारों जातियाँ यूरोप में एक दूसरे के रक्त की प्यासी थीं और एक दूसरे को नष्ट करने पर तुली हुई थीं। पूर्वी मसाला द्वीपों और भारत में व्यापारिक एकधिकार स्थापित करने के लिये भी इन देशों ने समुद्र से लेकर भारत की भूमि पर रक्त रंजित संघर्ष किया।

भारत में यूरोपीय जातियाँ व्यापारकि प्रतिस्पर्धा में टिकी रहें इसके लिए यह आवश्यक हो गया कि वे सशस्त्र संघर्ष करके अपने-अपने क्षेत्रों का विस्तार करें। इस खूनी संघर्ष में अँग्रेजों ने पुर्तगालियों और डचों को पछाड़कर अपनी स्थित सुदृढ़ कर ली। फ्रांसीसियों के भारत आगमन के बाद अँग्रेजों एवं फ्रांसीसियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई।

18वीं शताब्दी के मध्य से यह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदलने लगी। इस कारण भारत में यूरोपीय जातियाँ एक-दूसरे से खूनी संघर्ष में उलझ गईं। भारत की अस्थिर राजनीतिक स्थिति तथा केन्द्रीय सत्ता की अवनति ने अँग्रेजों एवं फ्रांसिसियों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को जागृत कर दिया और उन्होंने भारत के देशी राज्यों के पारस्परिक संघर्षों तथा राज्यों में सत्ता के लिए होने वाले उत्तराधिकार के झगड़ों में भाग लेना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वे भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगे।

दक्षिण भारत की राजनीतिक अराजकता का लाभ उठाने के लिये अँग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन युद्ध लड़े गये जो कर्नाटक के युद्ध कहलाते हैं। इनका विवरण आगे के अध्यायों में दिया गया है। तृतीय कर्नाटक युद्ध में अँग्रेजों को निर्णायक सफलता मिली। इसके बाद अँग्रेजों ने भारत में उपस्थित अन्य विदेशी शक्तियों को परास्त किया और अंत में देशी शक्तियों को परास्त करके भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो गये।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों का भारत आगमन

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अँग्रेजों का भारत आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन ई.1608 में हुआ। वे भारत में समुद्री मार्ग से आये तथा उनका उद्देश्य भारत से मसाला व्यापार करना था।

अँग्रेज भारत में समुद्री मार्ग से 1608 ई. में आये। उस समय भारत में मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। मुगलों की केन्द्रीय सत्ता अत्यंत प्रबल थी। दक्षिण भारत के राज्य मुगलों की सीमा पर स्थित थे। अँग्रेजों के आगमन से बहुत पहले अर्थात् 1498 ई. से पुर्तगाली भारत में व्यापार कर रहे थे।

डचों को भारत में आये हुए केवल चार साल हुए थे। इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अँग्रेजों ने विनम्र प्राथी बनकर भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरम्भ कीं जिनका विवरण पिछले अध्याय में दिया जा चुका है। सत्रहवीं सदी के अन्त तक बम्बई, कलकत्ता और मद्रास आदि समुद्री तट, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियों के मुख्य केन्द्र बन चुके थे। साथ ही देश के आन्तरिक भागों में पटना, अहमदाबाद, आगरा, बुरहानपुर आदि नगरों में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये थे।

कम्पनी द्वारा भारत में साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न

बहुत से इतिहासकारों का कथन है कि 1608 से 1740 ई. तक ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में व्यापारिक कम्पनी की तरह काम करती रही। यह कथन बिल्कुल गलत है। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार के बल पर बढ़ाती रही।

औरंगजेब के जीवन काल में ही कम्पनी ने भारत में विनम्र प्रार्थी की भूमिका त्यागने का भरसक प्रयास किया। वह भारतीयों से बलपूर्वक सस्ता माल खरीदकर भारतीयों को महंगा माल बेचती थी। जो निर्धन भारतीय उत्पादक एवं भारतीय नौकर, ऐसा नहीं करते थे, उन्हें कम्पनी के आदमी कोड़ों से पीटते थे।

1680 के दशक में बम्बई के गवर्नर जेराल्ड आन्जियर ने कम्पनी के लन्दन स्थित निदेशकों को लिखा- ‘समय की मांग है कि आप अपने वाणिज्य का प्रबन्ध अपने हाथों में तलवार लेकर करें।’

1687 ई. में कम्पनी के निदेशकों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी- ‘आप नागरिक और सैनिक सत्ता की ऐसी नीति स्थापित करें और राजस्व की इतनी बड़ी राशि का सृजन कर उसे प्राप्त करें कि दोनों को सदा के लिये भारत पर एक विशाल सुदृढ़ सुरक्षित आधिपत्य के आधार के रूप में बनाए रखा जा सके।’

मुगलों से सशस्त्र संघर्ष

औरंगजेब के जीवन काल में ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की उग्र नीतियों के कारण कम्पनी के अधिकारियों और मुगल अधिकारियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ जो सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। 1686 ई. में कम्पनी ने हुगली को लूट लिया तथा मुगल बादशाह के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

औरंगजेब ने अँग्रेजों के विरुद्ध सख्त कदम उठाये। उसकी सेनाओं ने अँग्रेजों को बंगाल के कारखानों से निकालकर बाहर कर दिया। अँग्रेज भागकर गंगा के मुहाने पर स्थित एक ज्वर-ग्रस्त टापू पर चले गये। सूरत, मच्छलीपट्टम् और विशाखापट्टम् स्थित कारखानों पर भी मुगलों ने अधिकार कर लिया।

बम्बई के किले को मुगल सेनाओं ने घेर लिया। मुगल सेना की ऐसी शक्ति देखकर अँग्रेज पुनः विनम्र प्रार्थी की भूमिका में आ गये। उन्होंने औरंगजेब से निवेदन किया कि कम्पनी ने बिना सोचे-समझे जो भी अपराध किये हैं, उन्हें क्षमा कर दिया जाये। उन्होंने भारतीय शासकों के संरक्षण में व्यापार करने की इच्छा व्यक्त की। वे एक बार पुनः चापलूसी और विनम्र याचनाओं पर उतर आये।

औरंगजेब ने डेढ़ लाख रुपया क्षतिपूर्ति लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों को क्षमा कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि कम्पनी द्वारा चलाए जा रहे विदेशी व्यापार से भारतीय दस्तकारों और सौदागरों को लाभ होता है तथा इससे राज्य का खजाना समृद्ध होता है। इस प्रकार अँग्रेजों को पहले की भाँति भारत में व्यापार करने की अनुमति मिल गई।

कम्पनी एक ओर तो मुगल बादशाह से क्षमा याचना की नीति अपना रही थी किंतु दूसरी ओर वह अपने उग्र तरीकों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी।

1689 ई. में कम्पनी ने घोषणा की- ‘अपने राजस्व की वृद्धि हमारी चिंता का उतना ही विषय है जितना हमारा व्यापार। जब बीस दुर्घटनाएं हमारे व्यापार में बाधा डाल सकती हैं, तब यही है जो हमारी ताकत को बनाए रखेगी। यही है जो हमें भारत में एक राष्ट्र बनाएगी…….।’

औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी

1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों की शक्ति पतनोन्मुख हो गई। यद्यपि मुगलों का अन्तिम बादशाह बहादुरशाह जफर 1858 ई. तक दिल्ली के तख्त का स्वामी बना रहा तथापि मुगलों की वास्तविक सत्ता 1800 ई. से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी।

शक्तिशाली सार्वभौम सत्ता के अभाव में विभिन प्रान्तों के सूबेदार केन्द्रीय सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करने लगे। मुगलों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं होने से मुगल शहजादे परस्पर युद्ध के माध्यम से ही उत्तराधिकार का निर्णय करते थे। इस कारण मुगल सल्तनत में बिखराव की गति बहुत तीव्र रही।

औरंगजेब के बड़े पुत्र मुहम्मद मुअज्जम ने अपने भाइयों को युद्ध में मारकर बहादुरशाह (प्रथम) (1707-12 ई.) के नाम से तख्त पर अधिकार किया। उसने राजपूतों, सिक्खों और मराठों को दबाने का असफल प्रयास किया। फिर भी, उसके समय में मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रही।

बहादुरशाह की मृत्यु के बाद, ईरानी अमीर दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से जहाँदारशाह अपने भाइयों को परास्त करके 1713 ई. में तख्त पर बैठा। वह 10 माह में ही सैयद बंधुओं द्वारा तख्त से हटा दिया गया। इस प्रकार 1713 ई. में अमीरों द्वारा बादशाह की हत्या करके अपनी पसंद के शहजादों को मुगल तख्त पर बैठाने का जो सिलसिला आरम्भ किया, वह 1806 ई. में अकबर (द्वितीय) के तख्त पर बैठने के बाद ही समाप्त हुआ।

जहाँदारशाह के बाद उसके मृत भाई अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रूखसियर (1713-19 ई.) को बादशाह बनाया गया। अब फर्रूखसियर और सैयद भाइयों में सत्ता के लिये खुलकर संघर्ष हुआ। फर्रूखसियर ने सैयद भाइयों से मुक्त होने का प्रयास किया परन्तु सैयद भाइयों ने मराठों तथा राजपूतों के सहयोग से उसे मार डाला। इसके बाद सैयदों ने 1719 ई. में, एक ही वर्ष में एक-एक करके रफी-उद्-दरजात, रफीउद्दौला और मुहम्मदशाह रंगीला को तख्त पर बैठाया।

नादिरशाह का आक्रमण

मुहम्मदशाह 1748 ई. तक राज्य करता रहा। उसके समय में 1739 ई. में नादिरशाह का आक्रमण हुआ। नादिरशाह भारत से लगभग 70 करोड़ रुपये की सम्पदा लूटकर ले गया जिसमें कोहिनूर हीरा तथा शाहजहाँ का तख्ते-ताउस भी सम्मिलित था।

नादिरशाह के आक्रमण से मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा और स्थायित्व को गहरा धक्का लगा। मुहम्मदशाह के पश्चात् अहमदशाह ने 1748 से 1754 ई. तक तथा आलमगीर (द्वितीय) ने 1754 से 1759 ई. तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु दोनों में से किसी में भी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि साम्राज्य के पतन को रोक सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

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क्षेत्रीय राज्यों का उदय

जब अठारहवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में मुगलों की सत्ता कमजोर पड़ने लगी तो भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में क्षेत्रीय राज्यों का उदय होने लगा। उसी काल में भारत में यूरोपियन जातियों का आगमन हुआ।

मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए राजपूतों, सिक्खों, मराठों तथा मुगल अमीरों ने अपने-अपने राज्यों की स्थापना करने एवं उन्हें मजबूत बनाने का प्रयत्न किया। अनेक महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं सूबेदारों ने स्वतंत्र तथा अर्द्ध-स्वंतत्र राज्यों की स्थापना की। ये लोग दिल्ली के बादशाह के प्रति नाममात्र की निष्ठा रखते थे।

यह सिलसिला 1712 ई. में बहादुरशाह (प्रथम) की मृत्यु के बाद ही आरम्भ हो गया था। इसके परिणाम स्वरूप उत्तर एवं दक्षिण भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से कुछ राज्यों के शासक, मुगल सल्तनत से पृथक् राज्य स्थापित करने के बाद भी मुगल सल्तनत के अन्तर्गत बने रहने की घोषणा करते रहे।

हैदराबाद

दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना औरंगजेब के मनसबदार चिनकुलीच खाँ ने की। औरंगजेब की मृत्यु के समय वह बीजापुर में था। बहादुरशाह (प्रथम) ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद चिनकुलीच खाँ ने जहाँदारशाह के विरुद्ध फर्रूखसियर की सहायता की।

अतः फर्रूखसियर ने बादशाह बनने पर चिनकुलीच खाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधियाँ प्रदान कीं। 1715 ई. में उसे पुनः दिल्ली बुलाया गया। उसे पहले मुरादाबाद की और फिर मालवा की सूबेदारी दी गई।

चिनकुलीच खाँ (निजाम-उल-मुल्क) ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया जिससे सैयद भाई उससे ईर्ष्या करने लगे। सैयद भाइयों ने बादशाह फर्रूखसियर पर दबाव डालकर दिलावर खाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त करवा दिया। निजाम-उल-मुल्क ने इसका विरोध किया और उसने एक युद्ध में दिलावर खाँ को मार डाला।

निजाम-उल-मुल्क ने बुरहानपुर और असीरगढ़ के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार वह दक्षिण-पथ का स्वामी बन गया। फर्रूखसियर के बाद मुहम्मदशाह को बादशाह बनाया गया। मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को समाप्त कर दिया और निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया।

निजाम-उल-मुल्क दिल्ली आकर सल्तनत का काम करने लगा। वह सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह को शीघ्र ही कुछ लोगों ने निजाम-उल-मुल्क के विरुद्ध भड़का दिया। इस कारण मुहम्मदशाह, निजाम-उल-मुल्क को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- ‘देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।’

इस कारण निजाम-उल-मुल्क नाराज होकर पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया किंतु निजाम-उल-मुल्क ने मराठों की सहायता से मुबारिजखाँ को परास्त कर दिया। इस पर मुहम्मदशाह की आंखें खुलीं। उसने निजाम को अपने पक्ष में करने के लिये दक्षिण के 6 सूबे प्रदान किये।

निजाम ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र रूप से शासन व्यवस्था स्थापित कर ली। इस प्रकार लगभग 1720 ई. के लगभग हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं।

निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

बंगाल, बिहार और उड़ीसा

मुर्शीदकुली खाँ

1707 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ बंगाल का नायब नाजिम तथा उड़ीसा का नाजिम था। 1713 ई. में फर्रूखसियर के शासनकाल में उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसके समय में बंगाल में शांति रही और व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

शुजाउद्दीन मुहम्मद

1727 ई. में मुर्शीदकुलीखाँ की मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बना। मुहम्मदशाह रंगीला ने 1733 ई. में उसे बिहार का सूबा भी दे दिया। इस प्रकार, बंगाल, उड़ीसा और बिहार तीनों सूबे उसके शासन के अन्तर्गत चले गये तथा केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव नाममात्र का रह गया। उसके शासनकाल में भी इन सूबों में शान्ति बनी रही।

सरफराज खाँ

शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद 1739 ई. में उसका पुत्र सरफराज खाँ सूबेदार बना। वह अत्यधिक विलासी प्रवृत्ति का था। इस कारण शासन व्यवस्था बिगड़ गई। ऐसी स्थिति में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दीखाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सरफराजखाँ परास्त हुआ और मारा गया।

अलीवर्दी खाँ

अलीवर्दी खाँ ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के तीनों सूबों पर अधिकार कर लिया। मुहम्मदशाह ने भी उसे सूबेदार स्वीकार कर लिया। अलीवर्दी खाँ ने 1740 से 1756 ई. तक शासन किया। उसे मराठों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। नागपुर का रघुजी भोंसले, जो पेशवा का प्रतिद्वन्द्वी था, ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर धावे मारने आरम्भ कर दिये।

रघुजी के प्रतिनिधि भास्कर पन्त ने अलीवर्दीखाँ की सेना को कई बार परास्त किया। अलीवर्दीखाँ ने षड्यन्त्र रचकर भास्कर पन्त सहित कई मराठा सरदारों को मरवा दिया। इस पर क्रोधित होकर रघुजी भौंसले ने तीनों सूबों को बुरी तरह से रौंदा। अंत में अलीवर्दीखाँ को रघुजी से समझौता करना पड़ा तथा उड़ीसा का सूबा मराठों को सौंपना पड़ा।

साथ ही बंगाल तथा बिहार की चौथ के बदले में रघुजी को 12 लाख रुपये वार्षिक देने का वचन देना पड़ा। अलीवर्दी खाँ को बंगाल का नवाब बनाने में हिन्दू व्यापारियों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। अतः अलीवर्दी खाँ ने भी अपने शासन में रायदुर्लभ, जगत सेठ, मेहताबराय, स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा मानिकचन्द्र आदि हिन्दुओं को उच्च पद दिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रभाव का मुख्य कारण बंगाल के व्यापार पर उनका एकाधिकार होना था।

सिराजुद्दौला

अलीवर्दी खाँ ने अपने जीवनकाल में ही अपनी छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। अतः 1756 ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने से रोका। इस कारण सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच प्लासी का युद्ध हुआ।

अवध

सआदत खाँ

अवध राज्य की स्थापना मीर मोहम्मद अमीन सआदत  बुरहान-उल-मुल्क ने की जिसे सआदतखाँ भी कहते हैं। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था। वह निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वन्द्वी था। मीर मोहम्मद ने सैयद बन्धुओं के पतन में योगदान दिया था। इसके बदले में उसे सआदत खाँ की उपाधि तथा आगरा की सूबेदारी मिली।

1722 ई. में उसे अवध की सूबेदारी मिली। इसी समय से अवध राज्य का स्वतंत्र इतिहास प्रारंभ होता है। सआदत खाँ ने दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भाग लिया। 1732 ई. में उसने उत्तरी भारत में मराठों के प्रसार को रोकने के सम्बन्ध में बादशाह मुहम्मदशाह के समक्ष कुछ प्रस्ताव रखे परन्तु अन्य अमीरों के विरोध के कारण उसे सफलता नहीं मिली।

बादशाह ने उसे पेशवा बाजीराव के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये। सआदत खाँ ने मार्च 1737 में मराठों की एक छोटी सी सेना को परास्त किया तथा बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को झूठी सूचना भिजवा दी कि उसने पेशवा बाजीराव को चम्बल के उस पार खदेड़ दिया है।

जब बाजीराव को इस बात की जानकारी हुई तो उसने क्रोधित होकर दिल्ली पर धावा बोल दिया तथा सआदत खाँ की पोल खोल दी। इस घटना से मुगल दरबार में सआदतखाँ की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। इसका बदला सआदतखाँ ने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण हेतु उकसाकर तथा उसके हाथों मुहम्मदशाह का अपमान करवा कर लिया। 1739 ई. में सआदतखाँ की मृत्यु हो गई।

सफदरजंग

सआदत खाँ के बाद उसका भतीजा एवं दामाद सफदरजंग अवध का सूबेदार बना। 1748 ई. में मुगल बादशाह अहमदशाह ने उसे सल्तनत का वजीर नियुक्त किया। कुछ समय बाद उसे इलाहबाद का सूबा भी दे दिया। सफदरगंज ने अवध की सीमा पर स्थित रूहेलखण्ड में बसे हुए रूहेलों और फर्रूखाबाद के पठानों को दबाने का प्रयास किया।

ये लोग अवध के क्षेत्रों में लूटमार करते रहते थे। सफदरगंज ने इस कार्य में जयप्पा सिन्धिया, मल्हारराव होलकर तथा जाट राजा सूरजमल का सहयोग लिया। 22 अप्रैल 1752 को सफदरगंज ने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों से समझौता किया परन्तु बादशाह ने उस समझौते को रद्द करके पंजाब, अब्दाली को सौंप दिया।

इस पर बादशाह और वजीर में अघोषित युद्ध छिड़ गया जिसमें वजीर परास्त हो गया तथा अपना पद त्यागकर अपने सूबे अवध को चला गया। अक्टूबर 1754 में उसकी मृत्यु हो गई।

शुजाउद्दौला

सफदरजंग की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना। उसके समय में अवध की राजनीति में गम्भीर परिवर्तन हुए। उसने मुगल शाहजादे अलीगौहार को अवध में शरण दी तथा पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के विरुद्ध अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया।

अलीगौहर ने बादशाह बनने के बाद 1762 ई. में शुजाउद्दौला को वजीर के पद पर नियुक्त किया। शुजाउद्दौला ने बंगाल के नवाब मीर कासिम को अपने राज्य में शरण दी और अंग्रेजों के विरुद्ध बक्सर तथा कड़ा के युद्ध लड़े। इन युद्धों में शुजाउद्दौला की पराजय हुई। तब से अवध अँग्रेजों के प्रभाव में चला गया।

बड़ौदा

गुजरात मुगल सल्तनत के समृद्ध सूबों में से था किन्तु केन्द्रीय शक्ति के ह्रास के कारण गुजरात पर नियंत्रण बनाये रखना कठिन हो गया। जब मराठों को गुजरात से चौथ वसूली का अधिकार दिया गया तो मराठों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।

गुजरात के तत्कालीन सूबेदार महाराजा अभयसिंह ने मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने का प्रयास किया किंतु महाराजा को 1733 ई. के युद्ध में बुरी तरह परास्त होना पड़ा और वह गुजरात का शासन अपने अधिकारियों को सौंपकर जोधपुर चला गया। 1735 ई. तक मराठे गुजरात के वास्तविक शासक बन गये। आगे चलकर गुजरात में बड़ौदा राज्य स्थापित हुआ जिस पर गायकवाड़ परिवार ने शासन किया।

मालवा

मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण दिल्ली दरबार का कोई भी अमीर मालवा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं कर पाया। 1724 ई. के बाद पेशवा के तीन सेनानायकों- होलकर, सिन्धिया और पंवार ने क्रमशः इन्दौर, ग्वालियर और धार में मराठा शक्ति का विस्तार किया। आगे चलकर तीनों, स्वतंत्र मराठा राज्यों में बदल गये।

पंजाब

पंजाब के सूबेदार जकारियाखाँ ने लम्बे समय तक पंजाब में शान्ति बनाये रखी परन्तु 1737 से 1739 ई. तक नादिरशाह और 1752 से 1761 ई. तक अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से पंजाब की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। दिल्ली दरबार की दलबन्दी और मुहम्मदशाह रंगीला की निर्बलता के कारण पंजाब में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी।

राजपूताना

बाबर के समय से ही मेवाड़ राज्य, मुगलों से पर्याप्त दूरी बनाये हुए था। औरंगजेब की धूर्त्तता और मक्कारी पूर्ण गतिविधियों के चलते जोधपुर, बीकानेर, आम्बेर तथा बूंदी आदि राजपूत राज्य, मुगलों से लगातार दूर होते जा रहे थे। फिर भी वे मुगल राजनीति में भाग लेते रहे।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा मारवाड़ नरेश अभयसिंह, मुगलों की सूबेदारी स्वीकार करते रहे तथा मराठों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करते रहे परन्तु मराठे निरंतर आगे बढ़ते रहे जिसके कारण केन्द्रीय राजनीति में राजपूत राज्यों की भूमिका गौण हो गई तथा राजपूताना राज्यों के शासक अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने लगे।

मैसूर

1565 ई. में तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर राज्य का विघटन हो गया तथा मैसूर का हिन्दू राज्य अस्तित्त्व में आया था। 1704 ई. में मैसूर को औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। 1750 ई. के आसपास मैसूर पर चिकाकृष्णराज का शासन था। वह नाममात्र का शासक था।

शासन की समस्त शक्तियाँ देवराज और नन्दराज  नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज, राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। उस समय हैदरअली, नन्दराज की सेना में नायक के पद पर काम करता था। हैदरअली अनपढ़ होते हुए भी चतुर व्यक्ति था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर नन्दराज ने उसे डिण्डुगल दुर्ग का फौजदार नियुक्त किया।

1761 ई. में हैदरअली ने मैसूर के दीवान खाण्डेराव तथा राजमाता से मिलकर नन्दराज को परास्त कर दिया। नन्दराज के पराभव के बाद हैदरअली ने शासन, राजमाता को सौंपने के स्थान पर स्वयं अपने हाथ में ले लिया। हैदरअली ने दीवान खाण्डेराव को बंदीगृह में डाल दिया तथा स्वयं राजा के नाम पर शासन करने लगा।

जब हैदराबाद के निजाम नासिरजंग की हत्या हुई, तब हैदरअली अपने सैनिकों सहित हैदराबाद में ही था। नासिरजंग की हत्या के बाद विद्रोही, उसका कोष लूटकर भागने लगे।

हैदरअली ने उन्हें परास्त करके लूट का सारा माल हथिया लिया। इस प्रकार, वह अपार धन-सम्पदा का स्वामी बन गया। 1776 ई. में मैसूर के राजा की मृत्यु के बाद हैदरअली ने स्वयं को मैसूर का सुल्तान घोषित कर दिया। उसने दक्षिण में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर अपने राज्य का बहुत विस्तार किया।

अँग्रेजों को हैदरअली का उत्कर्ष खटकने लगा। उन्होंने मैसूर राज्य को समाप्त करने के लिये 1766 से 1799 ई. की अवधि में हैदरअली तथा उसके पुत्र टीपू सुल्तान से चार युद्ध लड़े। इन्हें मैसूर का प्रथम युद्ध (1766-1769 ई.), मैसूर का द्वितीय युद्ध (1780-1784 ई.), मैसूर का तृतीय युद्ध (1790-1792 ई.) एवं चतुर्थ युद्ध (1799 ई.) कहा जाता है। मैसूर के द्वितीय युद्ध में हैदरअली तथा मैसूर के चतुर्थ एवं अंतिम युद्ध में हैदरअली का पुत्र टीपू सुल्तान मारा गया और मैसूर राज्य पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

मराठा शक्ति

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मराठा शक्ति

अँग्रेजों के आगमन के समय मुगल सत्ता अंतिम सांसें ले रही थी तथा भारत की राजनीतिक स्थिति में मराठा शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी।

मराठा शासक (छत्रपति)

मराठा शक्ति की स्थापना छत्रपति शिवाजी ने की थी जिनका इतिहास हम मध्यकालीन भारत का इतिहास में पढ़ चुके हैं। शिवाजी के काल में भी अंग्रेज और फ्रांसीसी कम्पनियाँ भारतीय शक्तियों से संघर्ष करने लगी थीं किंतु शिवाजी ने उन्हें अपने क्षेत्र में पूरी तरह दबाकर रखा था। शिवाजी के बाद मराठा शक्ति का तेजी से क्षरण हुआ जिसके कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया।

शम्भाजी

1680 ई. में छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र शम्भाजी गद्दी पर बैठा किंतु औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा को हस्तगत करने के बाद अपनी सम्पूर्ण शक्ति मराठों के विरुद्ध लगा दी। शम्भाजी को कैद करके दिल्ली ले जाया गया जहाँ उसके टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिया गया।

राजाराम

मराठों ने शम्भाजी के भाई राजाराम के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। मुगलों ने रायगढ़ दुर्ग पर आक्रमण करके राजाराम को घेर लिया। शम्भाजी की विधवा रानी येशुबाई की सलाह पर राजाराम सुदूर दक्षिण की ओर चला गया किन्तु विश्वासघात के कारण शम्भाजी की विधवा रानी येशुबाई और उसका पुत्र शाहू मुगलों द्वारा कैद कर लिये गये।

ताराबाई

1700 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद राजाराम की विधवा रानी ताराबाई ने अपने तीन वर्षीय पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को छत्रपति की गद्दी पर बैठा दिया और मराठों का नेतृत्व ग्रहण कर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

शाहू

फरवरी 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों- मुअज्जम और आजम के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ। इस समय आजम दक्षिण में था, अतः उत्तर की तरफ जाते समय वह अपने साथ शाहू और उसके परिवार को, जो मुगलों की कैद में थे, भी ले गया। मार्ग में मुगल सेनानायक जुल्फिकार खाँ की सलाह पर आजम ने शाहू को मुक्त कर दिया किंतु शाहू के परिवार को अपने साथ दिल्ली ले गया।

औरंगजेब की कैद से मुक्त होकर शाहू महाराष्ट्र के लिये रवाना हुआ। महाराष्ट्र पहुँचते-पहुँचते उसके पास एक बड़ी सेना हो गई। ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को छत्रपति बनाये रखने के लिये, शाहू का विरोध किया। अतः शाहू और ताराबाई की सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें ताराबाई परास्त हो गई। शाहू ने सतारा को अपनी राजधानी बनाया और जनवरी 1708 में छत्रपति के रूप में अपना राज्याभिषेक करवाया।

पेशवा का उदय

जब छत्रपति मराठों का नेतृत्व करने में असक्षम हो गया तब मराठा शक्ति ने पेशवा के नेतृत्व में फिर से स्वयं को संगठित किया। पेशवा के नेतृत्व में मराठों ने अंग्रेजों से लम्बे समय तक युद्ध किया किंतु मराठा शक्ति अंततः अंग्रेजों से परास्त हो गई।

बालाजी विश्वनाथ

शाहू के राज्यारोहण के समय मराठा राज्य अस्त-व्यस्त था। शाहू विलासी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसके लिये महाराष्ट्र की अव्यवस्था को व्यवस्थित करना संभव नहीं था। अतः 16 नवम्बर 1713 को उसने बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा नियुक्त किया।

बालाजी विश्वनाथ ने ताराबाई की सत्ता को समाप्त करके तथा विद्रोही मराठा सरदारों की शक्ति का दमन करके, उन पर शाहू के प्रभुत्व की स्थापना की। पेशवा द्वारा मराठा राज्य को दी गई महत्त्वपूर्ण सेवाओं के कारण शाहू के शासनकाल में पेशवाओं का उत्कर्ष हुआ।

उन्हीं दिनों दिल्ली में सैयद भाइयों के सहयोग से फर्रूखसियर, मुगल बादशाह बना किन्तु कुछ समय बाद ही उसकी सैयद भाइयों से अनबन हो गई और सैयद बंधुओं ने फर्रूखसियर को समाप्त करने के लिये मराठों से सहायता माँगी। 1719 ई. में सैयद बंधुओं ने मराठों से एक सन्धि की, जिसमें शाहू को दक्षिण के 6 सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार देने तथा शाहू के परिवार को मुगलों की कैद से मुक्त करने का वचन दिया।

इस संधि के बाद बालाजी विश्वनाथ मराठों की सेना लेकर सैयद भाइयों की सहायता के लिये दिल्ली गया, जहाँ मारवाड़ नरेश अजीतसिंह की सहायता से फर्रूखसियर को गद्दी से उतारकर मार डाला गया और रफी-उद्-दरजात को बादशाह बनाया गया। नये बादशाह ने 1719 ई. की सन्धि को स्वीकार कर लिया।

इस घटना से मराठों को मुगलों की पतनोन्मुखी स्थिति का ज्ञान हो गया। अतः दिल्ली से स्वदेश लौटने के बाद बालाजी विश्वनाथ ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति के प्रसार की योजना बनाई किन्तु योजना को कार्यान्वित करने के पूर्व ही 1720 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।

बाजीराव (प्रथम) (1720-40 ई.)

बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उसका बीस वर्षीय पुत्र बाजीराव (प्रथम) पेशवा बना। उसने हैदराबाद के सूबेदार निजाम-उल-मुल्क को दो बार परास्त किया, पुर्तगालियों से बसीन व सालसेट छीन लिये तथा मराठों के प्रभाव को गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड तक पहुँचा दिया। इस प्रकार बाजीराव ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में मराठा शक्ति के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। 28 अप्रैल 1740 को बाजीराव की मृत्यु हो गई।

बालाजी बाजीराव (1740-61 ई.)

बाजीराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद शाहू ने बाजीराव के 19 वर्षीय पुत्र बालाजी बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया। बालाजी बाजीराव के समय में मराठा साम्राज्य चरम पर पहुँच गया। छत्रपति की समस्त शक्तियाँ पेशवा के हाथों में चली गईं और सतारा के स्थान पर पूना मराठा राज्य का केन्द्र बन गया।

25 दिसम्बर 1749 को शाहू की मृत्यु हो गई। उसके बाद छत्रपति का नाम इतिहास में लुप्त प्रायः हो गया तथा पेशवा मराठा राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। 18वीं सदी के मध्य में जब मराठे उत्तर भारत में अपना प्रभाव जमाने के लिये प्रयासरत थे, उसी समय उत्तर भारत पर अफगानों के भी आक्रमण होने लगे। इससे उत्तर भारत की राजनीति में परिवर्तन आ गया।

अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण

1748 ई. में अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने पहली बार पजांब पर आक्रमण किया किन्तु वह परास्त होकर लौट गया। 1752 ई. में उसने दुबारा आक्रमण किया। इस बार वह मुल्तान और लाहौर को जीतने में सफल रहा। उसने दोनों स्थानों पर अपने अधिकारी नियुक्त किये तथा वापस अफगानिस्तान लौट गया। 

उस समय दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह अहमदशाह का अधिकार था। उसने एक ओर तो अब्दाली के भय से मुल्तान और लाहौर, अब्दाली को दे दिये किंतु दूसरी ओर मराठों से सन्धि की जिसमें तय किया गया कि मराठे, देशी और विदेशी शत्रुओं के विरुद्ध, मुगल बादशाह की सहायता करेंगे जिसके बदले में मराठों को पंजाब, सिन्ध और दो-आब से चौथ वसूल करने का अधिकार होगा।

इस प्रकार मराठा, मुगल सल्तनत के संरक्षक बन गये। इसके कुछ समय बाद ही बादशाह अहमदशाह और उसके वजीर सफदरजंग के बीच मतभेद बढ़े तथा दिल्ली दरबार में दो परस्पर-विरोधी दल खड़े हो गये। दोनों पक्षों ने मराठों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। मराठों ने बादशाह का साथ दिया तथा मुगल वजीर को कई बार परास्त किया। बार-बार परास्त होकर वजीर अपने सूबे अवध को चला गया।

13 मई 1754 को बादशाह ने इन्तिजामउद्दौला को अपना नया वजीर बनाया किन्तु निजाम-उल-मुल्क के बड़े पुत्र गाजीउद्दीन ने बादशाह अहमदशाह को पदच्युत करके आलमगीर (द्वितीय) को बादशाह बनाया और खुद वजीर बन गया। नया वजीर स्वार्थ-सिद्धि हेतु कभी मराठों से, कभी रोहिल्ला सरदार नजीबखाँ से और कभी अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से साँठ-गाँठ करता रहा।

नवम्बर 1753 में पंजाब के सूबेदार मीर मन्नू की मृत्यु के बाद उसकी विधवा मुगलानी बेगम अपने शिशु पुत्र के नाम पर शासन करने लगी। गाजिउद्दीन ने औरत के शासन को हटाने के लिये पंजाब पर आक्रमण किया तथा मुगलानी बेगम को बंदी बनाकर दिल्ली ले आया। वह मुगलानी बेगम की सम्पत्ति भी दिल्ली ले आया।

गाजीउद्दीन ने शाही हरम की बेगमों को भी परेशान किया। बेगमों ने रोहिल्ला सरदार नजीबखाँ से सहायता माँगी। नजीबखाँ का मानना था कि वजीर, मराठों की शक्ति के बल पर ऐसा कर रहा है। अतः नजीबखाँ ने मराठों को कुचलने के लिये अहमदशाह अब्दाली को आमन्त्रित किया।

उधर मुगलानी बेगम ने भी अब्दाली को भारत आने का निमन्त्रण भेजा। 1757 ई. के आरम्भ में अब्दाली एक बार फिर सेना लेकर भारत पहुँचा और उसने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने दिल्ली में प्रवेश करके दिल्ली के समृद्ध नागरिकों एवं अमीरों को लूटा।

अब्दाली ने मथुरा के आसपास के क्षेत्रों में भंयकर लूटमार मचाई। संयोगवश अब्दाली की सेना में महामारी फैल गई जिसके कारण वह वापिस अपने देश को लौट गया। लौटते समय उसने नजीबखाँ को मुगल सल्तनत का मीर-बख्शी बनाया तथा अपने पुत्र तैमूरशाह को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया।

जिस समय अहमदशाह अब्दाली, दिल्ली तथा मथुरा में लूट मचाये हुए था,  उस समय मराठा सरदार, राजपूताना के राज्यों से चौथ वसूल करने में व्यस्त थे। जब अब्दाली वापिस लौट गया, तब मराठा सेनापति रघुनाथराव और मल्हारराव होलकर सेनाएँ लेकर आगरा पहुँचे।

रघुनाथराव ने नजीब खाँ को बन्दी बना लिया परन्तु होलकर के अनुरोध पर पुनः मुक्त कर दिया। इसके बाद मराठों ने लाहौर पर आक्रमण करके तैमूरशाह को खदेड़ दिया। मराठों ने अटक तक धावे मारे तथा अदीना बेग को लाहौर का सूबेदार और अहमदशाह बंगश को मीर-बख्शी नियुक्त किया। अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को पंजाब से निकाल बाहर करने से अब्दाली ने क्रुद्ध होकर फिर से भारत पर चढ़ाई की।

उधर पेशवा ने उत्तर भारत की व्यवस्था करने का दायित्व सिन्धिया परिवार को सौंपा और होलकर को सिन्धिया की सहायता करने को कहा किन्तु होलकर ने पेशवा के आदेश का पालन नहीं किया। दत्ताजी सिन्धिया ने दिल्ली पहुँचकर नजीब खाँ को पकड़ने का प्रयास किया। नजीब खाँ ने अब्दाली से सहायता माँगी।

इस समय अब्दाली पेशावर में था। उसने जहानखाँ को लाहौर पर अधिकार करने भेजा किन्तु साबाजी सिन्धिया ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। इस पर अब्दाली स्वयं दिल्ली की ओर बढ़ा। नजीब खाँ भी सेना लेकर अब्दाली से जा मिला।

जनवरी 1760 में बरारी घाट का युद्ध हुआ जिसमें दत्ताजी सिन्धिया परास्त होकर मारा गया। अब्दाली ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दत्ताजी की मृत्यु के बाद होलकर दिल्ली की तरफ आया किन्तु अफगानों से परास्त होकर राजपूताने की ओर भाग गया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

पानीपत का तीसरा युद्ध

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पानीपत का तीसरा युद्ध

पानीपत का तीसरा युद्ध अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली एवं पेशवा बालाजी बाजीराव की सेनाओं के बीच हुआ। इस युद्ध में मराठा शक्ति प्रमुख भूमिका में थी किंतु रणनीतिक कमजोरियों के कारण मराठे युद्ध हार गए।

अहमदशाह अब्दाली द्वारा मराठों की दुर्दशा किये जाने से पेशवा बालाजी बाजीराव को अत्यधिक दुःख हुआ। उसने अपने चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ को एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर भेजा। इस अभियान का औपचारिक नेतृत्व पेशवा के बड़े पुत्र विश्वासराव को सौंपा गया। सदाशिवराव भाऊ पराक्रमी सेनापति था।

अहमदशाह अब्दाली की घोषणा

अहमदशाह अब्दाली ने भारतीय मुस्लिम सेनापतियों का समर्थन प्राप्त करने के लिये घोषित किया कि वह दिल्ली के मुस्लिम राज्य को मराठों की लूटमार से बचाने के लिए भारत आया है। इस घोषणा के बाद, भारत के अधिकांश मुस्लिम शासक अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये।

सदाशिवराव भाऊ की घोषणा

इस पर सदाशिवराव भाऊ ने घोषित किया कि वह विधर्मी विदेशियों को भारत से खदेड़ना चाहता है; इसलिये समस्त भारतीय शक्तियाँ इस कार्य में सहयोग दें किंतु मराठों की लूटमार से संत्रस्त उत्तर भारत की किसी भी शक्ति ने मराठों का साथ नहीं दिया। राजा सूरजमल को छोड़कर भारत की समस्त शक्तियों की सहानुभूति अब्दाली के साथ थी।

कहने को मराठे, मुगल बादशाह आलमगीर की तरफ से अहमदशाह अब्दाली से युद्ध लड़ रहे थे किंतु इस समय तक मुगल साम्राज्य की इतनी दुर्दशा हो चुकी थी कि बादशाह आलमगीर, अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध छोटी-मोटी सेना भी नहीं भेज सका। 7 मार्च 1760 को सदाशिवराव भाऊ दक्षिण से चला।

मराठों का पानीपत के लिए प्रस्थान

मराठे अपनी जीत के प्रति आवश्यकता से अधिक आश्वस्त थे। वे अपनी पराजय के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वे युद्ध के मैदान में अपनी पत्नियों, रखैलों और दासियों को लेकर पहुँचे। युद्ध क्षेत्र में उतरने से पहले उन्होंने पुष्कर और प्रयाग में डुबकियां लगाईं और काशी में विश्वनाथ के दर्शन किये। वे बड़ी ही लापरवाही से दिल्ली की ओर बढ़े।

अगस्त 1760 में सदाशिवराव ने अब्दाली के आदमियों से दिल्ली छीन ली तथा दिल्ली के निकट अफगानों के प्रमुख केन्द्र कुंजपुरा पर भी अधिकार कर लिया।

अब्दाली को यह समाचार मिला तो उसने यमुना पार करके मराठों पर पीछे से आक्रमण करने की योजना बनाई और पानीपत तक चला आया। सदाशिवराव भी अपनी सेना सहित पानीपत जा पहुँचा। नवम्बर 1760 में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हो गईं।

पानीपत का तीसरा युद्ध

14 जनवरी 1761 को दोनों सेनाओं के बीच अन्तिम निर्णायक युद्ध लड़ा गया। मदमत्त मराठों ने युद्ध के सामान्य नियमों का पालन भी नहीं किया। न ही शत्रु की गतिविधियों पर दृष्टि रखी। वे सीधे ही युद्ध के मैदान में धंस गये जबकि अब्दाली ने उस मैदान के तीन तरफ अपनी सेनाएं छिपा रखी थीं। पाँच घण्टे के भीषण युद्ध के बाद ही पेशवा का पुत्र विश्वासराव, शत्रु की गोली से मारा गया। 

यह सुनते ही सदाशिवराव भाऊ अपना संयम खो बैठा और अन्धाधुन्ध लड़ते हुए वह भी मारा गया। मल्हारराव होलकर आरम्भ से ही दोहरी नीति अपनाये हुए था। वह युद्ध के मैदान तक तो पहुंचा किंतु उसने युद्ध में विशेष भाग नहीं लिया और स्थिति के प्रतिकूल होते ही सेना सहित युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ।

अहमदशाह अब्दाली, हाथ आये हुए शत्रु को इस तरह बच कर नहीं जाने दे सकता था। उसकी सेना ने भागते हुए मराठों का पीछा किया तथा एक लाख मराठे काट डाले। मराठों के अनेक प्रसिद्ध सेनापति इस युद्ध में मारे गये। भागते हुए हजारों मराठों को बन्दी बना लिया गया। बचे हुए मराठे जान हथेली पर रखकर राजपूताना होते हुए महाराष्ट्र की तरफ भागे।

मार्ग में लोगों ने उन्हें लूटना और मारना आरम्भ किया। मराठा सैनिकों की ऐसी दुर्दशा देखकर भरतपुर के जाटों की राजमाता किशोरी देवी ने घोषणा की कि मराठा सैनिक मेरे बच्चे हैं। राजमाता ने समस्त भारतीयों और भारतीय राजाओं का आह्वान किया कि वे मराठा सैनिकों के प्राणों की रक्षा करें और उन्हें शरण प्रदान करें।

युद्ध के परिणाम

(1.) मराठा सैन्य शक्ति का पराभव

एक लाख मराठा सैनिकों के मारे जाने के कारण मराठों की सैन्य शक्ति का बहुत ह्रास हुआ। यदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘इस भयंकर संघर्ष में मराठों को बुरी तरह मार खानी पड़ी। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में शायद ही कोई ऐसा सैनिक परिवार बचा हो, जिसने पानीपत के इस पवित्र संघर्ष में अपना एक सदस्य न खोया हो।’

(2.) मराठा सरदारों में बिखराव

एक लाख मराठा सैनिकों को काट डाले जाने के बाद पूरा महाराष्ट्र विधवा मराठनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा। मराठों की इस भारी पराजय से पेशवा बालाजी बाजीराव का हृदय टूट गया। 23 जून 1761 को वह हृदयाघात से मर गया। उसका पुत्र विश्वासराव पहले ही मारा जा चुका था, ऐसी स्थिति में मराठा सरदारों पर नियंत्रण रखने वाला कोई नहीं रहा। वे अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।

(3.) मुगल सत्ता का पराभव

मुगलों की सत्ता अपने पतन के चरम पर थी किंतु पानीपत का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद मुगल सत्ता का नैतिक पतन भी हो गया। विजय मद में चूर अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया। उसने आलमगीर को एक साधारण कोठरी में बंद कर दिया।

अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह आलमगीर तथा उसके अमीरों की औरतों और बेटियों को लाल किले में निर्वस्त्र करके दौड़ाया और उन पर दिन-दहाड़े बलात्कार किये। निकम्मा आलमगीर, अब्दाली के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका। जब अहमदशाह अब्दाली, लाल किले का पूरा गर्व धूल में मिलाकर अफगानिस्तान लौट गया तब मुगल शाहजादियाँ पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में फिरने लगीं।

अब्दाली के जाते ही उसके वजीर इमाद ने बादशाह की हत्या करवाकर शव नदी तट पर फिंकवा दिया तथा यह प्रचारित कर दिया कि बादशाह पैर फिसलने से मर गया। इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मुगल सल्तनत का लगभग अन्त हो गया। मुगलों, मराठों तथा अफगानों के पराभव ने अँग्रेजों के लिये मैदान साफ कर दिया।

मराठों का पुनरुत्थान

मराठा इतिहासकार सरदेसाई का मत है- ‘यह सोचना कि पानीपत के युद्ध ने मराठों की उठती हुई शक्ति को कुचल दिया, ठीक नहीं होगा। क्योंकि नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में हुई क्षति की पूर्ति करने के लिये उठ खड़े हुए।’

मराठों ने बहुत कम समय में अपनी क्षति को पूरा कर लिया। 1769 ई. में उन्होंने पुनः नर्मदा को पार किया और राजपूतों, रोहिल्लों, जाटों आदि से कर वसूल किया। बाद में सिन्धिया कुछ समय के लिये मुगल बादशाह का संरक्षक भी रहा परन्तु फिर भी, मराठे भारत की राजनीति में दुबारा से स्थायी प्रभाव जमाने में सफल नहीं हुए।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय लगभग पूरे देश में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। चारों ओर लूटमार का वातावरण था। औरंगजेब की नीतियों के कारण केन्द्रीय सत्ता कमजोर चुकी थी तथा उसकी मृत्यु के बाद देश में विभिन्न अर्द्धस्वतंत्र एवं स्वायत्तशासी राज्यों का उदय हो चुका था।

मुगलों के पतन से उत्पन्न हुई राजनीतिक शून्यता को भरने के लिये मराठे सामने आये। इसी दौरान हुए अफगानी आक्रमणों ने तथा मराठों की आपसी फूट ने मराठा शक्ति को कमजोर कर दिया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

पानीपत का तीसरा युद्ध

मराठा शक्ति

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

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अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

अंग्रेज और फ्रांसीसी भारत में व्यापार करने के लिए आए थे किंतु शीघ्र ही व्यापार पर एकाधिकार को लेकर अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई।

ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत में व्यापारिक गतिविधियों के संचालन के साथ-साथ स्थानीय राज्यों की आंतरिक राजनीति में किसी न किसी पक्ष की सहायता करके अपने प्रभाव को बढ़ाने में प्रयासरत थीं। इस समय मद्रास और पाण्डिेचेरी, कर्नाटक राज्य में थे।

अँग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही, कर्नाटक में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई। 1742 ई. में फ्रांसिसी अधिकारी डूप्ले, पाण्डिचेरी का गवर्नर बनकर आया। उसने भारत में आते ही अँग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसिसियों के बीच की व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में बदल गई।

जिस समय डूप्ले भात आया, उस समय भारत के पूर्वी तट पर पांडिचेरी फ्रांसीसियों के अधिकार में था तथा मद्रास अँग्रेजों के। ये बस्तियां किलेबंद नगर थे और कर्नाटक के नवाब के राज्य में थे जिसकी राजधानी अर्काट थी। उन दिनों यूरोप में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के बीच भयानक प्रतिद्वंद्विता चल रही थी जिसका प्रभाव अमरीका तथा एशिया में स्थित दोनों देशों की कम्पनियों पर पड़ता था। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा रक्तरंजित संघर्ष में बदल गई।

वाल्टेयर ने लिखा है- ‘हमारे देश में तोप का पहला गोला छूटने के साथ ही अमरीका और एशिया की तोपों में भी आग लग जाती थी।’

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48 ई.)

भारत में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उपनिवेश की स्थापना के उद्देश्य से डूप्ले के नेतृत्व में 1746 ई. में पहली बार एक भारतीय फ्रैंच सेना बनाई गई। इस फ्रैंच सेना ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से तीन युद्ध किये जिन्हें कर्नाटक के युद्ध कहते हैं। प्रथम कर्नाटक युद्ध के तीन प्रमुख कारण थे-

(1.) यूरोप में ऑस्ट्रिया नामक एक देश है। अँग्रेज और फ्रांसिसी दोनों ही अपने-अपने प्रभाव के व्यक्ति को ऑस्ट्रिया का शासक बनाना चाहते थे।

(2.) अँग्रेजों और फ्रांसीसियों में अमरीका में औपनिवेशिक विस्तार के लिये संघर्ष चल रहा था।

(3.) दोनों ही कम्पनियाँ भारत में व्यापारिक स्वामित्व प्राप्त करना चाहती थीं।

इन तीन कारणों के रहते यह संभव नहीं था कि भारत में अँग्रेजी कम्पनी तथा फ्रैंच कम्पनी के बीच युद्ध न हो। इसलिये अँग्रेजों और फ्रांसिसियों ने अपने-अपने देशों की सरकारों से अनुमति लेकर एक दूसरे के विरुद्ध भारत में भी युद्ध छेड़ दिया। अँग्रेज सेनापति बारनैट ने कुछ फ्रांसिसी जहाजों को पकड़ लिया।

इस पर डूप्ले ने मॉरिशस में फ्रांसिसी गवर्नर ला-बूर्डोने से सहायता मांगी। ला-बूर्डाने तीन हजार सैनिक लेकर भारत आया। उसने अँग्रेजी सेना को हराकर 21 सितम्बर 1746 को मद्रास पर अधिकार कर लिया। क्लाइव भी पकड़ा गया। ला-बूर्डाने को मद्रास पर अधिकार बनाये रखने में कोई रुचि नहीं थी।

इसलिये वह अँग्रेजों से बड़ी धन राशि लेकर मॉरीशस लौट गया जबकि डूप्ले चाहता था कि मद्रास पर अँग्रेजों का ही अधिकार रहे। इसलिये डूप्ले ने मद्रास पर पुनः आक्रमण किया तथा मद्रास पर पुनः अधिकार कर लिया। उधर अँग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर आक्रमण करके उस पर अधिकार करने का असफल प्रयास किया।

उन्हीं दिनों कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन ने अपनी बस्तियों की सुरक्षा के लिये अँग्रेजों से सहायता मांगी तथा फ्रांस के विरुद्ध सेना भेजी जिसमें लगभग 10 हजार सैनिक थे। फ्रांस की ओर से कैप्टेन पेराडाइज ने नवाब की सेना का सामना किया। पेराडाइज के पास केवल 230 फ्रांसिसी सैनिक और यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित 700 भारतीय सैनिक थे।

यह लड़ाई सेंट टोमे की लड़ाई कहलाती है जो अडयार नदी के किनारे स्थित है। इस युद्ध में नवाब की सेना परास्त हो गई। फ्रांसीसियों द्वारा किसी मुगल प्रांतपति के विरुद्ध भारत में लड़ी गई यह पहली लड़ाई थी। इस लड़ाई ने मुगलों तथा उनके सूबेदारों के अजेय होने का मिथक तोड़ दिया।

1748 ई. में यूरोप में फ्रांस तथा इंग्लैण्ड के बीच संधि हो जाने पर भारत में भी दोनों कम्पनियों के बीच युद्ध समाप्त हो गया। दोनों ने एक दूसरे के प्रदेश और बंदी लौटा दिये। मद्रास फिर से अँग्रेजों को मिल गया। इस युद्ध के बाद फ्रांसिसी कम्पनी दक्षिण में दूसरी बड़ी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आई।

कनार्टक का दूसरा युद्ध (1749-54 ई.)

कनार्टक का दूसरा युद्ध के दो मुख्य कारण थे-

(1.) हैदराबाद तथा कर्नाटक की गद्दी के उत्तराधिकार का प्रश्न और

(2.) अँग्रेजों तथा फ्रांसिसियों की बढ़ती हुई राजनीतिक अभिलाषाएँ।

21 मई 1748 को हैदराबाद के निजाम आसफजाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र नासिरजंग उसका उत्तराधिकारी बना परंतु नासिरजंग के भतीजे मुजफ्फरजंग ने विद्रोह कर दिया। इसी तरह कर्नाटक में चांदा साहब ने नवाब अनवरूद्दीन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा। चांदा साहब कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन का बहनोई था।

डूप्ले ने हैदराबाद में मुजफ्फरजंग से और कर्नाटक में चांदा साहब से गुप्त संधि कर ली। अँग्रेज भी नासिरजंग और मुहम्मद अली के साथ मिलकर षड़यंत्र करते आ रहे थे। फ्रांसीसियों ने चांदा साहब को कर्नाटक का नवाब बना दिया परन्तु अँग्रेज मुहम्मद अली को नवाब बनाना चाहते थे।

इसलिये उन्होंने क्लाइव को एक छोटी सेना देकर अर्काट भेजा जहाँ दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में फ्रांसीसी सेना परास्त हो गई। डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया और गोडेहू को फ्रैंच इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा गया। मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया।

इस प्रकार कर्नाटक में अँग्रेजों का दबदबा स्थापित हो गया किन्तु हैदराबाद के निजाम ने फ्रांसीसियों को राजस्व वसूली के अधिकार दे दिये। इस धन से फ्रांसीसी अपनी सेना को बनाये रख सके और हैदराबाद में उनका दबदबा बना रहा। कर्नाटक के द्वितीय युद्ध में मिली असफलता के लिये फ्रांस की सरकार ने मॉरीशस के गवर्नर ला-बूर्डोने को जिम्मेदार ठहराया तथा उसे जेल में डाल दिया।

कर्नाटक का तीसरा युद्ध (1756-63 ई.)

1756 ई. में यूरोप में पुनः युद्ध छिड़ जाने से भारत में भी अँग्रेजों और फ्रांसीसियों में युद्ध आरम्भ हो गया। फ्रांस सरकार ने 1758 ई. में काउंट लाली को भारत भेजा। इस बीच अँग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल पर अधिकार कर लिया। काउंट लाली ने 1758 ई. में फोर्ट सेंट डेविड को जीत लिया और तंजौर पर आक्रमण कर दिया। इसमें लाली को सफलता नहीं मिली।

लाली ने मद्रास को जीतने का प्रयास किया किंतु उसमें भी सफलता नहीं मिली। उसने हैदराबाद से बुस्सी को बुलाया। ब्रिटिश अधिकारी पोकॉक के नेतृत्व में फ्रांस की सेना को कई स्थानों पर हराया गया। कर्नाटक में भी फ्रांसीसियों की हार हो गई। अँग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम से मछलीपट्टम् और उत्तरी सरकार के जिले छीन लिये।

जनवरी 1760 में ब्रिटिश सेनापति आयरकूट ने वैण्डिवाश नामक स्थान पर फ्रांसीसी सेना को परास्त करके बुस्सी को बंदी बना लिया। जनवरी 1760 में फ्रैंच सेनाएं पाण्डिचेरी लौट गईं। अँग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर भी घेरा डाला तथा आठ माह बाद उस पर अधिकार कर लिया। फ्रांसीसियों के माही क्षेत्र पर भी अँग्रेजों का प्रभुत्व हो गया।

इस प्रकार लगभग समस्त भारतीय फ्रैंच उपनिवेश फ्रांसीसियों के हाथ से निकल कर अँग्रेजों के पास चले गये। 1763 ई. में यूरोप में अँग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच सप्तवर्षीय युद्ध समाप्त होने पर यद्यपि फ्रांसीसियों को उनके उपनिवेश तो वापस मिल गये किन्तु उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ समाप्त हो गईं।

इसी बीच बंगाल में प्लासी और बक्सर के युद्धों के बाद अँग्रेजों ने बंगाल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उधर कर्नाटक में फ्रांसीसियों की पराजय से फ्रांसीसियों की शक्ति समाप्त हो गई तथा अँग्रेजों के लिये भारत में सत्ता स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय लगभग पूरे देश में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। चारों ओर लूटमार का वातावरण था। औरंगजेब की नीतियों के कारण केन्द्रीय सत्ता कमजोर चुकी थी तथा उसकी मृत्यु के बाद देश में विभिन्न अर्द्धस्वतंत्र एवं स्वायत्तशासी राज्यों का उदय हो चुका था।

मुगलों के पतन से उत्पन्न हुई राजनीतिक शून्यता को भरने के लिये मराठे सामने आये। इसी दौरान हुए अफगानी आक्रमणों ने तथा मराठों की आपसी फूट ने मराठा शक्ति को कमजोर कर दिया। यूरोपीय देशों से आई हुई कम्पनियां इस राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने तथा एक दूसरे को उन्मूलित करने के लिये जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता कर रही थीं।

अंत में अँग्रेज न केवल डचों और फ्रांसीसियों को भारत से उन्मूलित करने में सफल रहे अपितु उन्होंने मराठों तथा हैदराबाद, मैसूर एवं बंगाल आदि राज्यों के स्थानीय शासकों को परास्त करके भारत में राजीनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित होने में सफलता प्राप्त कर ली।

यूरोपीय देशों से आई हुई कम्पनियां भारत की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने तथा एक दूसरे को उन्मूलित करने के लिये जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता कर रही थीं। अंत में अँग्रेज न केवल डचों और फ्रांसीसियों को भारत से उन्मूलित करने में सफल रहे अपितु उन्होंने मराठों तथा हैदराबाद, मैसूर एवं बंगाल आदि राज्यों के स्थानीय शासकों को परास्त करके भारत में राजीनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित होने में सफलता प्राप्त कर ली।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

भारत की आर्थिक स्थिति

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भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति अधिक अच्छी नहीं थी। औरंगजेब की कट्टर मजहबी नीतियों के कारण भारत में हर समय युद्ध चलते रहने से खेतियां और उद्योग धंधे उजड़ गए।

मुगल सेनाएं देश के जिस हिस्से में जाती थीं, किसानों की फसलें लूट लेती थीं या उनमें आग लगा देती थीं। उसके बाद मराठों ने भी देश की खेती को बहुत नुक्सान पहुंचाया। नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली भी भारत की सम्पदा को लूटकर ले जा चुके थे। इन सब कारणों से भारत की जनता गहरी निर्धनता में जी रही थी। फिर भी जिन क्षेत्रों में खेती नहीं उजड़ी थी और उद्योग धंधे चौपट नहीं हुए थे, वहाँ के लोग सुख से जीवन जी रहे थे।

जहाँ एक ओर यूरोपीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यूरोपीय जातियों ने भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये भारत में प्रवेश किया वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी और अँग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने भारत की आर्थिक स्थिति को पतन के गर्त में पहुँचा दिया।

ये दोनों ही बातें सही नहीं हैं। अँग्रेजों के आगमन के समय अर्थात् सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते समय निम्नलिखित तथ्य ध्यान में रखे जाने चाहिये-

(1.) विगत 9 शताब्दियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा लगातार किये जा रहे आक्रमणों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो चुकी थी। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, चंगेजखाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली आदि आक्रांताओं द्वारा उत्तरी एवं पश्चिमी भारत में भयानक लूटमार मचाने, कत्ले आम मचाने तथा कामगारों को पकड़कर अपने देशों में ले जाने के कारण भारत के उद्योग-धंधों को गहरे घाव पहुँचे थे।

(2.) दिल्ली सल्तनत तथा मुगलिया सल्तनत के अधिकांश मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू किसानों, हिन्दू व्यापारियों एवं हिन्दू तीर्थ-यात्रियों पर अधिक से अधिक कर लगाये जाने तथा मुस्लिम व्यापारियों एवं किसानों को विभिन्न प्रकार के करों में छूट दिये जाने के कारण बहुसंख्य हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।

(3.) बाबर से लेकर अकबर तक के लगभग 80 साल के शासनकाल में तथा औरंगजेब के 50 साल के शासन काल में अनवरत युद्ध चलते रहे। इन युद्धों के चलते, देश में समृद्धि कैसे बची रह सकती थी! जहाँ-जहाँ मुगल सेनाओं का पड़ाव रहा अथवा जिन राज्यों पर उनके आक्रमण हुए, वहाँ-वहाँ की खेतियां उजड़ गईं, उद्योग धंधे ठप्प हो गये तथा लोग अपने घरों को छोड़कर दर-दर भटकने पर विवश हो गये। इन कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी।

(4.) किसानों तथा उनके परिवारों के द्वारा हाड़-तोड़ मेहनत करके जो अनाज उगाया जाता था, उसे बादशाहों, नवाबों, राजाओं तथा जागीरदारों के आदमियों द्वारा कर के रूप में लूट लिया जाता था। भू-राजस्व एवं कर चुकाने के बाद किसानों तथा उनके परिवारों के पास पेट भरने के लिये पर्याप्त अनाज नहीं बचता था।

(5.) केन्द्रीय मुगल शासन की अराजकता, प्रांतीय मुस्लिम शासकों की कट्टरता, लगातार हो रहे अफगानी आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट, व्यापारिक चुंगी, स्थानीय करों की अधिकता तथा हिन्दुओं के साथ धार्मिक भेदभाव के उपरांत भी खेती तथा कुटीर धंधे केवल इसलिये चल रहे थे और लोग इसलिये जीवित थे कि जन साधारण में पूरा परिवार, साल प्रत्येक दिन और दिन के अधिकांश समय में किसी न किसी काम में लगा रहता था।

(4.) चारों ओर मची हुई लूट-मार के कारण बादशाहों, सूबेदारों, राजाओं एवं जागीरदारों के पास धन की आवक लगी रहती थी तथा जन साधारण दिन पर दिन निर्धन होता जा रहा था।

भारत की आर्थिक स्थिति

भू-स्वामित्व

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में सिद्धान्ततः शासक समस्त भूमि का स्वामी था परन्तु व्यावहारिक रूप में भूमि पर काश्त करने वाले जब तक भूमि कर (लगान) देते रहते थे, तब तक वे भूमि के मालिक बने रहते थे। सामान्य रूप से किसान न तो भूमि को बेच सकते थे और न उससे अलग हो सकते थे।

डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी का मत है कि किसानों को जमीन बेचने और बन्धक रखने जैसे अधिकार नहीं थे। फिर भी किसानों का एक वर्ग जिसे मौरूसी कहा जाता था, इस प्रकार के अधिकारों का दावा करता था, जिन्हें दखलदारी का अधिकार (ओक्यूपेंसी राइट्स) कहा जा सकता है।

सामान्यतः किसानों को बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों का उनके खेतों पर उत्तराधिकार होता था। कुछ ऐसे किसान भी थे जो जमींदारों की अनुमति से खेत जोतते थे। उन्हें जमींदार अपनी इच्छा से कभी भी बेदखल कर सकता था। वस्तुतः कृषकों का वर्गीकरण कई स्तरों एवं श्रेणियों में हो सकता था।

भूमि की श्रेणियाँ और किस्म

कृषि भूमि को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था- (1.) खालसा भूमि और (2.) गैर-खालसा भूमि (जागीर, सासण आदि)। मुगलों के शासनकाल में जागीरदार अर्द्ध-स्वतंत्र शासक थे। बादशाह उनके आन्तरिक शासन में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता था। खालसा भूमि बादशाह के नियंत्रण में होती थी।

मालगुजारी निश्चित करने के लिये भूमि को पोलज, परती, चाचर एवं बंजर में बाँटा गया था। यह वर्गीकरण भूमि को जोतने पर आधारित था। पोलज वह भूमि थी जिसे प्रत्येक वर्ष जोता जाता था। परती भूमि को कुछ समय के लिये बिना जोते ही छोड़ दिया जाता था। चाचर भूमि तीन-चार साल के लिए बिना जोते हुए छोड़ दी जाती थी।

बंजर भूमि वह थी जिस पर पाँच साल से भी अधिक समय तक कोई उपज नहीं होती थी। प्रथम दो प्रकार की भूमियों (पोलज तथा परती) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया- अच्छी, मध्यम और खराब। इन तीनों श्रेणियों की प्रति बीघा औसत उपज को पोलज तथा परती के प्रति बीघा की सामान्य उपज मान लिया गया था।

इन दोनों श्रेणियों की भूमि में विशेष अन्तर नहीं था; क्योंकि जिस वर्ष भी परती भूमि पर खेती की जाती थी, उसकी उपज पोलज के समान ही हुआ करती थी। चाचर भूमि में जब पहले साल खेती होती थी तो निश्चित दर का 2/5 भाग लिया जाता था और पाँच साल खेती होने के पश्चात् उस पर सामान्य दर से मालगुजारी ली जाती थी। बंजर भूमि पर भी पाँच साल के बाद पूरी दर से मालगुजारी ली जाती थी।

कृषि का तरीका और फसलें

अँग्रेजों के भारत में आने के समय पुराने ढंग से खेती की जाती थी। कृषि कार्यों में हल, खुरपी, पटेला, हंसिया तथा बैलों की जोड़ी काम में लाये जाते थे। अधिकांशतः खेती वर्षा पर निर्भर थी। सिंचाई के लिये बहुत कम नहरें उपलब्ध थीं। वर्षा के अभाव में प्रजा संतप्त हो जाती थी।

किसानों का जीवन कष्टमय तथा मंथर गति से चलने वाला था। ग्रामवासियों की आवश्यकताएँ गाँव में ही पूर्ण होती थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना नियत कार्य करता था। किसान खेत जोतता, बोता तथा काटता था। उस समय की मुख्य फसलों में गेहूं, बाजरा, मक्का, चावल, कपास, मटर, तिलहन, गन्ना आदि थे।

फलों में आम, अँगूर, अनार, केले, खरबूजा, अंजीर, नींबू, खिरनी, जामुन आदि होते थे। औषधीय फसलों में जड़ी-बूटियाँ, मसाले और सुगन्धित काष्ठ उत्पन्न होते थे। अनाज-भण्डारण का सामान्य तरीका गड्ढों या खत्तियों में रखने का था जिससे अनाज लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।

किसानों की स्थिति

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी। राजनीतिक अस्थिरता, मराठों द्वारा की जाने वाली लूटपाट तथा केन्द्रीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण स्थानीय शासक किसानों से बलपूर्वक कर वसूल करते थे। जिन क्षेत्रों पर मराठों के आक्रमण अधिक होते थे, वहाँ किसानों की स्थिति अधिक खराब थी।

जब किसान स्थानीय शासक को कर चुका देते थे तो मराठे चौथ वसूली के लिये आ धमकते थे और यदि मराठे पहले लूट लेते थे तो बाद में स्थानीय शासक कर मांगता था। इस कारण बहुत से स्थानों पर खेती उजड़ गई थी। अठारहवीं शताब्दी में किसान का जीवन दरिद्र, घिनौना, दयनीय तथा अनिश्चित था। बहुत से किसान बर्बाद होकर डाकू बन जाते थे जो बड़े-बड़े दल बनाकर, प्रजा को लूटते फिरते थे।

शिल्प तथा उद्योग

भारत के गाँवों, कस्बों तथा शहरों में काम करने वाले शिल्पी तथा उद्यमी अपने पुराने जातिगत एवं परम्परागत कार्य करते थे। उनके औजार भी बहुत पुराने ढंग के थे। देश में बड़े पैमाने पर किसी उद्योग का विकास नहीं हुआ था। अधिकांश उद्योग स्थानीय रूप में थे जो पिता से पुत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किये जाते थे।

देश के कई शहर और क्षेत्र अपने विशिष्ट और श्रेष्ठ उत्पादों के लिये प्रसिद्ध हो गये थे। कई शाही कारखाने भी थे जो फारस देश के ढंग के अनुसार मुस्लिम शासकों द्वारा स्थापित किये गये थे। इन कारखानों में शाही तथा दरबारी लोगों की आवश्यकता की चीजें बनाई जाती थी।

इनमें सुनार, किमखाब या रेशम तैयार करने वाले, कसीदाकारी करने वाले, चित्रकार, दर्जी, मलमल तथा पगड़ी बनाने वाले इत्यादि अनेक प्रकार के कारीगर होते थे, जो साथ मिलकर तथा अलग-अलग काम करते थे। प्रान्तों में भी स्थानीय माँग के अनुसार विभिन्ना प्रकार की वस्तुएं बनाने के कारखाने थे। इनमें बनने वाली वस्तुएं उच्च अधिकारियों को भेंट की जाती थीं।

व्यापार एवं वाणिज्य

भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय व्यापार एवं वाणिज्य के विषय में बहुत ही कम जानकारी मिलती है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार अँग्रेजों के आगमन के समय भारत का आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नति पर था। देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के पश्चात् जो सामग्री शेष बचती, उसका निर्यात किया जाता था।

यातायात एवं परिवहन की समस्या व्यापारियों तथा सामान ले जाने वाले साधनों के द्वारा पूर्ण हो जाती थी। देश में व्यापार के लिये अनेक मार्ग थे जो स्थानीय शासक द्वारा कर लेकर सुरक्षित रखे जाते थे।

आन्तरिक व्यापार

अँग्रेजों के आगमन के समय राजनीतिक अस्थिरता होने के उपरांत भी, भारत का आन्तरिक व्यापार काफी विस्तृत था। इस समय भी वैश्य वर्ग प्रमुख व्यापारी था। उत्तर भारत में व्यापार गुजरातियों एवं मारवाड़ियों द्वारा तथा दक्षिण में चेतियों द्वारा होता था। प्रत्येक गाँव में छोटा बाजार होता था, जहाँ छोटी-छोटी वस्तुओं का व्यापार होता था।

कुछ दुकानें चलती-फिरती होती थीं, जो घोड़े की पीठ पर लगाई जाती थीं। महत्त्वपूर्ण वस्तुओं का व्यापार शहर की मण्डियों में होता था। विभिन्न स्थानों पर साल भर में कुछ निश्चित मेले लगते थे जिनमें दूर-दूर से व्यापारी आते थे और खूब व्यापार होता था। फेरी लगाकर माल बेचने वाले तथा इस प्रकार के अन्य व्यापारी भी उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करते थे।

बन्जारों के काफिले बैलों पर अनाज, चीनी, नमक आदि लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते थे। कई बार ये काफिले 20 से 30 हजार बैलों के होते थे। व्यापारी भी काफिलों में इधर-उधर जाते थे। भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारी गुजराती, मारवाड़ी और मुल्तानी थे। विदेशी मुसलमान व्यापारियों को खुरासानी कहा जाता था। वे मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली जैसे बड़े नगरों के बाजारों में माल की आपूर्ति करते थे।

माल परिवहन के साधन

उस काल में परिवहन के साधन बहुत कम थे। व्यापारिक माल प्रायः कच्ची एवं धूलभरी सड़कों से ले जाया जाता था। शासकों द्वारा मार्ग के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये जाते थे। यात्रियों एवं व्यापारियों की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर सरायें बनाई जाती थीं। इन स्थानों पर पशुओं के लिये चारा एवं पेयजल भी उपलब्ध रहता था।

यात्रियों एवं व्यापारियों को मार्ग दिखाने के लिये छोटी-छोटी अटारी अथवा मीनार बने हुए थे। राजपूताने के भाट एवं चारण, खतरनाक सड़कों पर काफिलों का मार्ग-दर्शन तथा सुरक्षा करते थे। नदियां भी माल के परिवहन के लिये सस्ता साधन थीं। काश्मीर, बंगाल, सिन्ध तथा पंजाब में अधिकांश सामान नदी मार्ग से परिवहन किया जाता था।

बंगाल में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियां, नेपाल की तराई में गण्डक, बिहार में कोसी, पंजाब में रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास, मध्य भारत में नर्मदा तथा चम्बल, दक्षिण में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि विभिन्न नदियों के माध्यम से बड़ी मात्रा में व्यापारिक माल का परिवहन होता था।

बंगाल में नावों के बड़े बेड़े होते थे। यमुना में चौरस पेंदी की कुछ नावें 100 टन तक भारी होती थीं। गंगा में 400-500 टन भारी नावें चलती थीं। थट्टा से लाहौर तक जाने में 6-7 सप्ताह का समय लगता था, जबकि वापसी यात्रा में केवल 18 दिन लगते थे।

सड़कों पर सुरक्षा

केन्द्रीय, प्रान्तीय एवं स्थानीय शासक अपने-अपने क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने में रुचि लेते थे ताकि उनके क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आ सके तथा सरकार को अधिक आय हो सके। इस कारण सड़कों को सुरक्षित बनाने के प्रयत्न किये जाते थे परन्तु फिर भी लुटेरों का भय बना रहता था। इसलिये व्यापारी अपने काफिलों के साथ सशस्त्र सुरक्षा प्रहरी रखते थे तथा स्थानीय शासकों को शुल्क देकर उनसे सुरक्षा प्राप्त करते थे।

चुंगी

आंतरिक एवं बाह्य व्यापार हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाने एवं बाजार में विक्रय करने पर स्थान-स्थान पर चुंगी ली जाती थी। चुंगी के अतिरिक्त समस्त बड़े बाजारों तथा बन्दरगाहों पर अन्य शुल्क भी देने पड़ते थे। औरंगजेब ने इसकी मात्रा हिन्दू व्यापारियों के लिये पहले की अपेक्षा दो गुनी कर दी तथा मुसलमान व्यापारियों के लिये बिल्कुल हटा दी। इस कारण हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था।

व्यापार का स्वरूप

अँग्रेजों के आगमन के समय देश के विभिन्न भागों के बीच व्यापार की स्थिति अच्छी थी। एक स्थान पर उत्पन्न होने वाली सामग्री को देश के विभिन्न भागों एवं देश से बाहर भेजा जाता था। बंगाल, से खाद्य वस्तुएँ, चावल, चीनी तथा मक्खन का समुद्री व्यापार होता था।

ये वस्तुएँ कोरोमंडल, केपकामरिन के क्षेत्र से होती हुई कराची तक जाती थीं। बंगाल से चीनी गुजरात को तथा गेहूं दक्षिण भारत को जाते थे। पटना को चावल और सिल्क के बदले में गेहूं, चीनी तथा अफीम प्राप्त होती थी। केरल अफीम का आयात करता था। सत्रहवीं सदी में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिये आगरा अत्यंत प्रसिद्ध केन्द्र था।

यह बंगाल और बिहार से कच्ची सिल्क, चीनी, चावल, गेहूं तथा मक्खन आदि वस्तुओं का व्यापार करता था। आगरा, देश तथा विदेशों में उत्तम प्रकार के नीले रंग के लिये बहुत प्रसिद्ध था। इसके समीपवर्ती क्षेत्रों जैसे- हिन्दुआन, बयाना, पंचूना, बिसौर तथा खनवा में गेहॅूँ पैदा होता था। यहाँ से गेहूं भारत के विभिन्न बन्दरगाहों तथा विदशों को भेजा जाता था।

व्यापार के अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र लाहौर तथा मुल्तान थे। वास्तव में काबुल, कन्धार तथा फारस से होने वाला समस्त स्थल व्यापार इन नगरों से होकर होता था। लाहौर अपनी दरियों के लिये प्रसिद्ध था जबकि मुल्तान चीनी, अफीम, सूती माल तथा गन्धक के लिये प्रसिद्ध था। मुल्तान में सर्वोत्तम ऊँट उपलब्ध होते थे।

गुजरात प्राचीनकाल से वाणिज्य का बड़ा और महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा उद्योगों ने इसे बंगाल की तरह धनी प्रांत बना दिया था। यह कपड़े की बुनाई का केन्द्र था। यहाँ के कपड़े गुजरात के मुख्य बंदरगाह कैम्बे द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के दूसरे भागों को भेजे जाते थे।

नील, शोरा तथा वस्त्रों के बदले विदेशी व्यापारी पश्चिम से विविध प्रकार की प्रसाधन सामग्री लाते थे जिन्हें गुजरात, दिल्ली, आगरा, राजस्थान तथा मालवा के हुजूर में भेजा जाता था। केरल काली मिर्चों का निर्यात तथा अफीम का आयात करता था। केरल में गुजरात, मालवा और अजमेर से गेहूं तथा दक्षिण व मलाबार से चावल मँगाया जाता था।

पुलीकट का छपा हुआ कपड़ा बहुत बढ़िया होता था जो गुजरात तथा मलाबार तट को भेजा जाता था। सिन्ध से भारत के विभिन्न भागों में गेहॅूँ, जौ, सूती कपड़े तथा घोड़े भेजे जाते थे और बदले में चावल, चीनी, इमारती लकड़ी तथा मसाले मँगाये जाते थे।

काश्मीर में गुजरात, रावलपिंडी तथा लद्दाख से नमक, बुरहानपुर से अच्छा चावल तथा देश के विभिन्न भागों से चौड़े वस्त्र, गेहूं, दवाएँ, चीनी, तांबा, लोहा, तांबा, पीतल के बर्तन, शीशे का सामान, सोना, चाँदी और विलास की सामग्री मंगाई जाती थी। काश्मीर से आगरा तथा अन्य स्थानों को शॉल, ऊन तथा शोरा निर्यात होता था। इस प्रकार भारत के लगभग समस्त नगरों एवं विभिन्न राज्यों की राजधानियों के बीच उपयोगी वस्तुओं का व्यापार प्रचुर मात्रा में होता था।

विदेशी व्यापार

भारत का विदेशी व्यापार अत्यंत प्राचीन काल से विश्व भर के देशों से होता आया था। अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भी लंका, बर्मा, चीन, जापान, पूर्वी द्वीप समूह, नेपाल, फारस, मध्य एशिया, अरब और लालसागर के बन्दरगाहों तथा पूर्वी अफ्रीका से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था।

कैम्बे, सूरत, भड़ौंच, गोआ, कालीकट, कोचीन, मछलीपट्टम, सतगाँव, सोनारगाँव तथा चटगाँव उस युग के प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। लाहौर, मुल्तान, लाहरी बन्दर (सिन्ध), कैम्बे, पटना, अहमदाबाद तथा आगरा में बड़े-बड़े बाजार थे जहाँ विदेशों से वस्तुएँ आती थीं और फिर देश के विभिन्न भागों को भेजी जाती थीं। भारतीय वाणिज्य पूरी दुनिया की आंखों में चौंध पैदा करता था।

इसी से प्रेरित होकर रूस के शासक पीटर महान (1682-1725 ई.) ने एक बार कहा था- ‘याद रखो कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और …….. जो उस पर पूरा अधिकार कर सकेगा, वही यूरोप का अधिनायक होगा।’

समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार

भारत को पश्चिमी देशों से मिलाने वाले दो मुख्य समुद्री मार्ग थे- (1.) फारस की खाड़ी से होकर तथा (2.) लालसागर से होकर। लालसागर वाला मार्ग थोड़ा दुष्कर था, अतः नाविक तथा सौदागर फारस की खाड़ी वाले मार्ग को पसन्द करते थे। यह मार्ग ईराक में बगदाद से आरम्भ होकर चीन में केन्टन तक जाता था।

मनूची (1653-1708 ई.) ने लिखा है- ‘अरब तथा फारस के जहाज खजूर, फल, घोड़े, समुद्री मोती तथा रत्न भारत में लाते थे, बदले में गुड़, चीनी, मक्खन, जैतून के फल तथा नारियल ले जाते थे।’

 भारत से कपड़ों का निर्यात प्रमुख रूप से होता था जबकि बहुमूल्य धातुएं, विभिन्न प्रकार के बर्तन एवं विविध उपयोगी सामग्री में प्रयुक्त होने वाली धातुएं, सौन्दर्य एवं प्रसाधन सामग्री बड़े स्तर पर आयात की जाती थी। भारतीय माल कोरोमण्डल समुद्री तट के रास्ते से फारस ले जाया जाता था।

भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपास से निर्मित कपड़ा एवं अन्य वस्तुएँ, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लंवग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें विशेषकर गेंडे तथा चीते की खाल, चन्दन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थी। विदेशों में भारतीय कपड़ों की अच्छी माँग थी। फारस तथा मिस्र आदि अरब देशों को उत्तम प्रकार की मलमल निर्यात होती थी।

मोरलैण्ड के अनुसार 17वीं शताब्दी में रुई के सामान का वार्षिक निर्यात लगभग 8000 गाँठें था जिनमें से 4,700 गाँठें यूरोपीय देशों को जाती थीं। इसी शताब्दी के अन्त में भारतीय ताफता (सिल्क) तथा बूटेदार कपड़ा इंग्लैण्ड को निर्यात होने लगा था।

लाख (गोंद) बंगाल तथा उड़ीसा में कई स्थानों पर बनाई जाती थी जिसका निर्यात डचों द्वारा फारस को किया जाता था। बर्मा, जावा, चीन, मलाया तथा अरब को समुद्री मार्ग से भारतीय अफीम एवं काली मिर्च का निर्यात होता था। फारस एवं उसके आगे के देशों को स्थल मार्ग से अफीम एवं वस्त्र आदि वस्तुओं का निर्यात होता था। भारत से दुनिया भर के देशों को चीनी, शोरा, लोहा, इस्पात, हींग, आँवला, दवाएँ, बहुमूल्य पत्थर तथा संगमरमर भी निर्यात किया जाता था।

भारत में बहुमूल्य धातुओं का आयात किया जाता था। वान् ट्विस्ट (1638 ई.) ने लिखा है कि भारत में सोने तथा चाँदी की खानें नहीं थीं, इसलिये विदेशों से ये दोनों धातुएँ आयात की जाती थीं तथा उनके निर्यात पर रोक थी।

एक अँग्रेज यात्री विलियम हार्किज (1608-13 ई.) ने लिखा है- ‘भारत में चाँदी प्रचुर मात्रा में है क्योंकि यहाँ समस्त देश सिक्के लाते हैं और उनके बदले में वाणिज्यिक वस्तुएँ ले जाते हैं। ये सिक्के भारत में ही रखे जाते हैं, बाहर नहीं जाते हैं।’

चीन, जापान, मलक्का तथा अन्य समीपवर्ती देशों से सोना मंगवाया जाता था। पेगू (बर्मा) से मूँगा तथा मोती एवं फारस तथा अरब देशों से विभिन्न प्रकार के रत्न मंगवाये जाते थे। लिस्बन से पारा आयात किया जाता था।

स्थल मार्ग द्वारा व्यापार

भारत में मध्य एशिया और अफगानिस्तान से सूखे मेवे तथा ताजे फल, अम्बर हींग, खुरखुरे लाल पत्थर आदि का आयात होता था। नेपाल से पशु तथा सींग, कस्तूरी, सोहागा, चिरैता (औषधि की जड़ी-बूटी), मजीह (रंग), इलायची, चौरीस (तिब्बती गाय की पूंछ), महीन रोंये, बाज पक्षी तथा बालचर (एक सुगन्धित घास) मंगवाया जाता था।

भूटान से कस्तूरी तथा तिब्बती गाय की पूंछ का आयात होता था। पुर्तगाली डाकुओं की गतिविधियों के कारण बर्मा के साथ व्यापार में कमी आ गई थी। घोड़े आयात की महत्त्वपूर्ण वस्तु थे। तुर्किस्तान में रहने वाले अजाक लोग भारत में बेचने के लिये बड़े स्तर पर घोड़े पालते थे। ये घोड़े 6,000 अथवा इससे बड़े झुण्ड में भारत को भेजे जाते थे।

व्यापार संतुलन

व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में था। समस्त देशों के व्यापारी, भारतीय बन्दरगाहों पर आते थे तथा विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं- छींट के कपड़े,  मसाले, काली मिर्च, गेहूँ, घी, जड़ी-बूटियाँ और गोंद आदि के बदले में सोना, चांदी तथा रेशम देते थे।

इसलिये भारत को बहुमूल्य धातुओं का कुण्ड कहा जाता था। व्यापार संतुलन को भारत की बजाय, यूरोप के पक्ष में करने के लिये ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी निर्यात सूची को बढ़ाने का आदेश दिया। इंग्लैण्ड में भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे की इतनी अधिक माँग थी कि उससे इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी।

इसलिये ब्रिटिश संसद ने विशेष कानून बनाकर 29 सितम्बर 1701 से फारस, चीन तथा पूर्वी हिन्द द्वीप समूह के चित्रित, छपे हुए एवं रंगे हुए लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा दी।

वास्कोडिगामा के भारत आगमन के बाद लगभग एक शताब्दी (1500-1600 ई.) तक भारतीय विदेशी व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। पुलीकट, कासिम बाजार, पटना, बालोसर, नागपट्टम तथा कोचीन में पुर्तगालियों की मुख्य फैक्ट्रियाँ थीं। अरब देशों के व्यापारी जो भारत में आने वाले प्रमुख विदेशी व्यापारी थे, लगभग पूरी तरह हटा दिये गये।

हॉलैण्ड वाले भी 1603 ई. में भाग लेने लगे थे। इससे यूरोपीय देशों के साथ भारतीय व्यापार में वृद्धि हुई। अंग्रजों ने 1608 ई. में पहली बार भारत के लिये व्यापारिक यात्रा की। वे अपने साथ पांच जहाजों में कपड़े, टीन, शीशे, चामू-कैंची की वस्तुएँ, पारा, शीशा तथा चमड़ा लेकर आये।

उन्होंने भारत में अलग-अलग स्थानों पर गोदाम स्थापित किये जिन्हें अँग्रेज व्यापारी फैक्ट्रियाँ कहते थे तथा भारतीय व्यापारी कारखाना कहकर पुकारते थे। फ्रांस ने भी भारत में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं। इन फैक्ट्रियों से मांग के अनुसार माल की आपूर्ति नहीं हो सकी इसलिये यूरोपीय व्यापारियों द्वारा भारत के मुख्य वाणिज्यिक केन्द्रों पर एजेन्ट नियुक्त किये गये। उनके माध्यम से देश के विभिन्न भागोंसे व्यापार किया जाने लगा।

उद्योगों की स्थिति

भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना के पहले भारतीय कुटीर एवं लघु उद्योग उन्नत अवस्था में थे। सत्रहवीं और अठारवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देश स्वदेशी उद्योगों के लिये बाहर के देशों में भी विख्यात था। भारतीय माल की विदेशों में बड़ी माँग थी। देश में दो तरह के उद्योग विकसित थे- ग्रामीण उद्योग तथा शहरी उद्योग।

ग्रामीण उद्योग आम आदमी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शहरी उद्योगों द्वारा कला-कौशलपूर्ण वस्तुओं का निर्माण होता था। ये उद्योग विलासिता का सामान बनाने में अग्रणी थे। देश के कपास उत्पादक क्षेत्रों, दूरस्थ गाँवों और शहरों में कपड़ा तैयार किया जाता था।

गांव-गांव और शहर-शहर में हाथकरघा पर मोटा कपड़ा यथा गाढ़ा एवं रेजी तैयार किये जाते थे। विभिन्न शिल्पों में लगे कारीगरों में से लगभग दो-तिहाई बुनकर थे। ग्रामीण उद्योगों की तुलना में नगरीय उद्योग अधिक संगठित थे और गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक अच्छा माल तैयार करते थे।

कपड़ा उद्योग

भारतीय बुनकर नरम से नरम, महीन से महीन और मोटे से मोटा कपड़ा तैयार करने के लिये प्रसिद्ध थे। महीन कपड़े में मलमल सबसे विख्यात थी। इसके उत्पादन का मुख्य केन्द्र ढाका था। ढाका की मलमल विश्व भर में प्रसिद्ध थी। बीस गज लम्बे और एक गज चौड़े मलमल को एक अँगूठी में से निकाला जा सकता था।

इस प्रकार की मलमल का थान तैयार करने में 6 माह लगते थे। आम उपयोग का कपड़ा गाँव-गाँव और शहर-शहर में बनाया जाता था परन्तु विशेष प्रकार का कपड़ा कुछ स्थानों पर ही तैयार होता था।

इस प्रकार के केन्द्रों में ढाका, जहानाबाद (पटना के पास), बुलन्दशहर, सिकन्दराबाद, लखनऊ, बनारस, रायबरेली में जायस, फैजाबाद में पांडा, रामपुर, मुरादाबाद, कानपुर, प्रतापगढ़, शाहपुर, अलीपुर, मेरठ, आगरा, दिल्ली, रोहतक, ग्वालियर, चंदेरी, इन्दौर और दक्षिण भारत में आर्नी, हैदराबाद, रायचूर, सेलभ, तंजौर तथा मदुरा विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।

इन केन्द्रों पर विभिन्न डिजाइनों और किस्मों का अच्छा कपड़ा तैयार होता था। देश में कताई-बुनाई रंगाई, छपाई, सोना एवं चाँदी के धागों का निर्माण भी बड़े स्तर पर होता था।

रेशम वस्त्र उद्योग

भारत में बहुत कम रेशम पैदा होता था इसलिये रेशम का बाहर से आयात किया जाता था किंतु भारत में बना रेशम का कपड़ा पुनः बड़ी मात्रा में निर्यात किया जाता था। बनारस, आगरा, लाहौर, पाटियाला, अमृतसर, राजशाही, मुर्शीदाबाद, वीरभूमि, बर्दवान, बांकुड़ा और मिदनापुर रेशमी वस्त्र निर्माण के प्रसिद्ध केन्द्र थे।

बनारस और आगरा वस्त्रों पर कढ़ाई के लिये तथा सबसे बढ़िया रेशमी वस्त्र के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध थे। ऊनी वस्त्र उद्योग भी उन्नत अवस्था में था। पंजाब और राजस्थान में मोटे ऊनी कम्बल, गलीचे, रस्से आदि बनते थे। लाहौर, लुधियाना और अमृतसर में अनेक प्रकार की ऊनी वस्तुएँ- कम्बल, शॉल, कोट, मोजे, दस्ताने और सर्दियों में काम आने वाले अन्य कपड़े बनते थे। जयपुर, बीकानेर और जोधपुर के ऊनी कपड़े प्रसिद्ध थे।

लौह उद्योग

भारत का लौह उद्योग काफी उन्नत था। भारत के लुहार लोहे की गलाई और ढलाई के कार्य में निपुण थे। स्थान-स्थान पर शस्त्र निर्माण, तोप निर्माण, जहाज निर्माण एवं कृषि उपकरण निर्माण के उद्योग थे। भारत में लोहे से बनी सामग्री लंदन तक जाती थी। महाराष्ट्र, आंध्र और बंगाल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित हुआ। यूरोपीय कम्पनियाँ अपने उपयोग के लिये भारत में बने जहाज खरीदती थी।

एक अंग्रेजी पर्यवेक्षक ने लिखा है- ‘जहाज निर्माण में भारतीयों ने अँग्रेजों से जितना सीखा, उससे अधिक उन्हें पढ़ाया।’

मिट्टी के बर्तन एवं मूर्तियाँ

भारत में मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और खिलौने बनाने का उद्योग भी विकसित था। बंगाल में खुलना, दिनाजपुर, रानीगंज; उत्तर प्रदेश में लखनऊ, रामपुर और अलीगढ़, दक्षिण में मद्रास, मदुरा और सेलम के कुम्हार विशेष किस्म के कलात्मक और मिट्टी के पक्के बर्तन बनाने में दक्ष थे।

विविध उद्योग

लगभग पूरे देश में भवन-निर्माण, पत्थर और लकड़ी की नक्काशी, ईंट और चूना बनाने, कागज बनाने, सोना-चाँदी तथा जवाहरात के आभूषण बनाने, चीनी, नमक एवं नील बनाने, तांबा, पीतल, काँसा आदि की वस्तुएँ एवं बर्तन बनाने के उद्योग विकसित अवस्था में थे। विभिन्न प्रकार के बीजों से तेल निकालने का काम बड़े स्तर पर होता था। बाँस और चमड़ा उद्योग भी लोकप्रिय था। बाँस से विभिन्न वस्तुएँ बनाने का काम कुछ जातियों का वंशानुगत व्यवसाय था।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय, नौ सौ साल से चल ही विदेशी आक्रांताओं की लूट के उपरांत भी, बादशाहों, अमीरों, राजाओं तथा जागीरदारों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी तथा उनके महलों में विलासिता के समस्त साधन उपलब्ध थे।

देश में नहरों, कुओं तथा तालाबों की कमी के बावजूद वर्षा की मात्रा अच्छी होने से देश के अधिकांश भागों में खेती की जाती थी। घर-घर में कुटीर उद्योग विकसित थे जिनमें विपुल मात्रा में विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती थी। विदेशी व्यापार उन्नत होने से शासकों को कर के रूप में अच्छी आय होती थी। आंतरिक एवं विदेशी व्यापार बहुत होता था।

विदेशी व्यापार भारत के पक्ष में था। भारत के कुटीर उद्योग देश-वासियों की आवश्यकताओं को पूरी करने के साथ-साथ विदेशों को निर्यात किये जाने के लिये भी माल तैयार करते थे। सूती, ऊनी, रेशमी वस्त्र, शाल-दुशालें, चन्दन की वस्तुएँ, कागज, जूते, बक्से, चमड़ा, चीनी, नील, रंग, लकड़ी की वस्तुएँ, सोना-चाँदी के आभूषण, विलासिता की वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं।

इतना होने पर भी देश में जन साधारण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। किसान हाड़तोड़ परिश्रम करके खेती करते थे। छोटे कारीगर हाथ से सामग्री का उत्पादन करते थे। इस उत्पादन के लाभ का अधिक हिस्सा कर के रूप में शासक और मुनाफे के रूप में बड़े व्यापारी लूट लेते थे।

भू-राजस्व कर के साथ-साथ चुंगी एवं स्थानीय करों की अधिकता थी। इस कारण बादशाह, सूबेदार, राजा एवं जागीरदारों के पास काफी धन एकत्र हो जाता था किंतु जन साधारण अभावों एवं कष्टों से बिलबिला रहा था। पूरा परिवार हर समय किसी न किसी काम में लगा रहता था फिर भी दो समय की रोटी का प्रबंध करना कठिन था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

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मध्यकालीन भारत का इतिहास - अनुक्रमणिका

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक की अनुक्रमणिका दी गई है। नीचे दिए गए अध्यायों पर क्लिक करके उन उध्यायों तक सीधे ही पहुंचा जा सकता है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित यह पुस्तक अमेजन पर ईबुक तथ प्रिण्टेड बुक के रूप में भी उपलब्ध है। मध्यकालीन भारत का इतिहास संघर्ष का इतिहास है। इस काल में भारत के लोग इस्लाम के आक्रमण से स्वयं को बचाने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं। इस काल के भारतीय राजवंशों का इतिहास भी इस्लाम प्रतिरोध का इतिहास है।

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास

मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

गुलाम वंश

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

खिलजी वंश का उत्थान और पतन

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

तैमूरलंग का भारत आक्रमण एवं उसके प्रभाव

तुगलक वंश का उत्थान और पतन

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ

मुहम्मद तुगलक का शासन एवं विफलताएँ

मुहम्मद तुगलक का चरित्र

मुहम्मद तुगलक पालक था?

सुल्तान फीरोजशाह तुगलक

फीरोजशाह तुगलक की धार्मिक नीति

फीरोजशाह तुगलक का शासन प्रबंध

फीरोजशाह तुगलक का चरित्र

फीरोजशाह का मूल्यांकन

तुगलक राज्य का पतन

सैयद वंश एवं लोदी वंश

सैयद वंश का शासन

लोदी वंश का शासन

दिल्ली सल्तनत का पतन

दिल्ली सल्तनत का पतन और उसके कारण

प्रान्तीय राज्यों का उद्भव

बहमनी राज्य

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास

विजयनगर राज्य

विजयनगर की सामाजिक दशा

विजयनगर राज्य का पतन

मध्यकालीन कला एवं साहित्य

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

मध्यकालीन साहित्य

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन

भारत में सूफी सम्प्रदाय

मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

द्वितीय अफगान साम्राज्य

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी के कार्यों का मूल्यांकन

शेरशाह के उत्तराधिकारी

सूरी साम्राज्य का पतन

मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

मुख्य आलेख – शाहजहाँ

शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों की मनसबदारी प्रथा

मुगलों की जागीरदारी प्रथा

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुख्य आलेख – मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

मुख्य आलेख – मुगल कालीन कलाएँ

मुगलकालीन स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य का स्वर्ण काल अर्थात् शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

पतनोन्मुख मुगल स्थापत्य कला

मुगलकालीन साहित्य

मुगल कालीन चित्रकला एवं मूर्तिकला

राजपूत राज्यों का प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों का प्रशासन

राजपूतों का राजस्व प्रशासन

राजपूतों की न्यायिक व्यवस्था

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

राजपूत राज्यों में समाज

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास

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भूमिका - मध्यकालीन भारत का इतिहास

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक मध्यकालीन भारत का इतिहास की विषय-वस्तु स्पष्ट की गई है।

अध्ययन की सुविधा के लिए भारत के इतिहास को दो भागों में विभक्त किया जाता है- (1.) पुरा ऐतिहासिक काल, (2.) ऐतिहासिक काल। पुरा ऐतिहासिक काल में पाषाणीय मानव बस्तियों के आरम्भ होने से लेकर वैदिक आर्यसभ्यता के आरम्भ होने से पहले का कालखण्ड सम्मिलित किया जाता है।

इस काल खण्ड में लिखित सामग्री का प्रायः अभाव है। अतः पत्थरों के औजारों, जीवाश्मों, मृदभाण्डों आदि पुरावशेषों के आधार पर इतिहास का लेखन किया जाता है तथा पुरावशेषों के कालखण्ड का निर्धारण करने के लिए कार्बन डेटिंग पद्धति का सहारा लिया जाता है। 

इस काल में केवल सिंधु सभ्यता ही एकमात्र ऐसी सभ्यता है जिसकी मुद्राओं एवं बर्तनों पर संक्षिप्त लेख हैं किंतु इस काल की लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जा सकता है अतः इस सभ्यता के इतिहास का काल-निर्धारण भी कार्बन डेटिंग पद्धति के आधार पर किया जाता है।

भारत के ऐतिहासिक कालखण्ड को पुनः तीन भागों में विभक्त किया जाता है- (1.) प्राचीन भारत का इतिहास, (2.) मध्यकालीन भारत का इतिहास एवं (3.) आधुनिक भारत का इतिहास

प्राचीन भारत का इतिहास भारत में प्राचीन आर्य राजाओं की राजन्य व्यवस्था के उदय से लेकर आर्य  राजवंशों की समाप्ति तक का इतिहास सम्मिलित किया जाता है जिन्हें प्राचीन भारतीय क्षत्रिय कहा जाता है। इसकी अवधि लगभग ईसा पूर्व 3000 से लेकर ईस्वी 1206 तक निर्धारित की जाती है। अर्थात् इस कालखण्ड की समाप्ति भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना के साथ होती है।

मध्यकालीन भारत का इतिहास ई.1206 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना से लेकर ई.1761 में पानीपत के युद्ध तक चलता है। इस पूरे काल में भारत में लगभग 300 वर्ष तक तुर्क तथा लगभग 250 वर्ष तक मुगल शासक राज्य करते हैं किंतु ई.1761 तक वे इतने कमजोर हो जाते हैं कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में मुगलों की तरफ से मराठों ने अहमदशाह अब्दाली से लड़ाई की। मराठों की करारी हार के बाद मुगलों का राज्य पूरी तरह अस्ताचल को चला जाता है और अंग्रेजों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिलता है।

ई.1765 में हुई इलाहाबाद की संधि में मुगल बादशाह को पेंशन स्वीकृत कर दी जाती है और अंग्रेज भारत के वास्तविक शासक बन जाते हैं। इस प्रकार ई.1761 से लेकर ई.1947 तक के काल को आधुनिक भारत का इतिहास कहा जाता है। इस ग्रंथ में मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखा गया है जिसमें भारत में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना से लेकर मुगलिया सल्तनत की समाप्ति तक का अर्थात् 1200 ईस्वी से लेकर 1760 ईस्वी तक का इतिहास लिखा गया है।

मध्यकालीन भारत के इतिहास पर पहले से ही बाजार में अनेक पुस्तकें हैं। प्रायः इतिहास की अच्छी पुस्तकें भी विषय वस्तु के संयोजन की कमी एवं सूचनाओं को ठूंस-ठूंस कर भर देने की प्रवृत्ति के कारण उबाऊ हो जाती हैं जिनके कारण विद्यार्थी का मन उन पुस्तकों में नहीं लगता। इस कारण इस पुस्तक को लिखते समय परीक्षा के पाठ्यक्रम की मांग तथा विद्यार्थियों की सुविधा का ध्यान रखा गया है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इतिहास के क्षेत्र में भी नित्य नई शोध सामने आ रही हैं। उन नई जानकारियों को भी इस पुस्तक में समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है। अब इतिहास कुछ घिसी पिटी सूचनाओं का संग्रह नहीं रह गया है, प्राप्त तथ्यों को न केवल तार्किकता के साथ अपनाया जा रहा है अपितु उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधानों की कसौटी पर भी कसा जा रहा है।

इस पुस्तक की भाषा को स्नातक उपाधि स्तर के विद्यार्थियों की मांग के अनुरुप सरल रखा गया है। छोटे-छोटे वाक्य लिखे गये हैं ताकि सूचनाओं को मस्तिष्क में अच्छी तरह संजोया जा सके। ऐतिहासिक तथ्यों को क्रमबद्ध लिखा गया है तथा असंगत एवं विरोधाभासी तथ्यों से बचने का प्रयास किया गया है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इतिहास के क्षेत्र में भी नित्य नई जानकारियां मिल रही हैं। नई जानकारियों को भी इस पुस्तक में समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक का प्रथम मुद्रित संस्करण वर्ष 2013 में तथा द्वितीय संस्करण वर्ष 2016 में प्रकाशित हुआ था। वर्ष 2018 में पुस्तक का ई-बुक संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। आशा है इस पुस्तक का ई-संस्करण विश्व भर के पाठकों की आवश्यकता को पूरी कर सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

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दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत समकालीन ग्रंथों, भवनों, मकबरों, शिलालेखों आदि के रूप में बहुतायत से मिलते हैं। बहुत से विदेशी यात्रियों ने भी दिल्ली सल्तनत कालीन ऐतिहासिक घटनाओं को लिखा है।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्रोत उस काल में रचे गये अरबी-फारसी एवं विभिन्न भाषाओं के ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों में दरबारी रचनाकारों के साथ-साथ सुल्तानों, बादशाहों एवं शहजादियों द्वारा लिखी गई जीवनियाँ भी प्रमुख स्थान रखती हैं।

ग्रंथों के साथ-साथ, उस काल के मुस्लिम एवं हिन्दू शासकों द्वारा जारी किये गये सिक्के, शाही फरमान, रुक्के, परवाने, रजवाड़ों में लिखी गई बहियाँ, उस काल में निर्मित भवन, भवनों पर उत्कीर्ण शिलालेख, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, आदि ऐसे विश्वसनीय स्रोत हैं जो उस काल के इतिहास का निर्माण करने में महत्वपूर्ण सूचनाएँ देते हैं।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोतों का अध्ययन सुगमता की दृष्टि से दो भागों में किया जाना उचित है-

(1) दिल्ली सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत तथा

(2) मंगोलकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

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कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर इब्राहीम लोदी तक का शासन काल (ई.1206 से ई. 1526) भारतीय इतिहास में दिल्ली सल्तनत का काल कहलाता है। 320 वर्षों की अवधि के दिल्ली सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत मुस्लिम लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा लिखित फारसी तथा अरबी भाषाओं के ग्रंथ हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की ऐतिहासिक रचनाओं से भी उस काल के इतिहास की जानकारी मिलती है। लिखित साहित्य के साथ-साथ तत्कालीन शिलालेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से भी महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। मुस्लिम इतिहासकार इस देश में आक्रमणकारी बादशाहों के दरबारियों के रूप में अथवा स्वतंत्र यात्रियों के रूप में आये। उनकी रचनाओं में यात्रा-वृत्तान्त तथा आत्मकथाएँ मुख्य हैं जिनमें मुस्लिम आक्रांताओं की सफलताओं तथा भारतीय शासकों की विफलताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘मुस्लिम इतिहासकारों की, भारत में इस्लाम की प्रगति तथा दरबारी मामलों में ही विशेष रुचि थी। वे वैज्ञानिक इतिहासकार नहीं थे, उनका ध्यान शासकों के कार्यों तक ही सीमित था, साधारण जनता के जीवन में उन्हें दिलचस्पी नहीं थी।’

डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है- ‘उन्होंने इस बात की विशेष चिन्ता नहीं की कि वे अपनी सामग्री को क्रमबद्ध और व्यवस्थित रूप से लिखें। उन्हें यह परवाह नहीं रही कि किस आवश्यक बात को लिखा जाए और क्या नहीं तथा जो सामग्री उपलब्ध है, उसका किस रूप में और कैसे उपयोग किया जाये। यही नहीं, उन्होंने अतिशयोक्तिपूर्ण आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया। फलस्वरूप अपने ऐतिहासिक विवरण में उन्होंने कई स्थलों पर अस्पष्टता और सन्देह के बीज छोड़ दिये।’

सल्तनतकालीन इतिहासकारों को सुल्तानों तथा तत्कालीन भारतीय शासकों के शासनकाल को देखने का प्रत्यक्ष अनुभव था। उन्होंने अपनी आँखों देखी घटनाओं का वर्णन करने के साथ पूर्व के लेखकों की रचनाओं का भी उपयोग किया है तथा कई लेखकों ने सुनी हुई बातों को भी प्रमुख स्थान दिया है।

अधिकांश लेखकों ने पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लिखा किंतु कुछ ऐसे मुस्लिम इतिहासकार भी हुए जिन्होंने बिना किसी पक्षपात और पूर्वाग्रह के इतिहास का लेखन किया। सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास के निर्माण में उनकी रचनाओं का सावधानी के साथ उपयोग किया जाना चाहिये।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ

1. तारीखे-सिन्ध

इस ग्रंथ का लेखक मीर मुहम्मद मासूम था। इस ग्रन्थ को तारीखे-मासूमी भी कहा जाता है। इसमें मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से लेकर अकबर के शासनकाल तक के सिन्ध क्षेत्र का इतिहास है। इस ग्रन्थ की रचना 1600 ई. के आसपास की गई थी।

2. तारीखे हिन्द (चचनामा)

जिस समय अरबों ने भारत पर पहला आक्रमण किया उस समय सिंध पर चच का पुत्र दाहिर शासन करता था। संभवतः उसी चच के नाम पर इस ग्रंथ का नाम चचनामा रखा गया। चचनामा को तारीखे-हिन्द एवं तारीखे-सिन्ध भी कहा जाता है। इसमें अरबों की सिन्ध विजय का इतिहास है। इसे मूलतः अरबी भाषा में लिखा गया। मुहम्मद अली कूफी ने इस ग्रंथ का फारसी भाषा में अनुवाद किया। इस ग्रंथ में मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से पहले तथा बाद के सिन्ध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है।

3. तारीखे-यामिनी

इस ग्रन्थ का लेखक अबु नस्त्र मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल-उतबी था। वह महमूद गजनवी का मंत्री था। इस ग्रंथ में सुबुक्तगीन के सम्पूर्ण शासनकाल और महमूद गजनवी के कुछ समय तक का वृत्तान्त है। ऐतिहासिक ग्रन्थ की अपेक्षा यह एक साहित्यिक कृति अधिक है। इस कारण यह ग्रन्थ अलंकारों तथा टेढ़ी-मेढ़ी शब्दावलियों से भरा पड़ा है। इसमें विस्तृत विवरण का अभाव है। तिथियाँ भी बहुत कम दी गई हैं। फिर भी, महमूद के प्रारम्भिक जीवन तथा कार्यों के सम्बन्ध में इससे प्रामाणिक जानकारी मिलती है।

4. तारीखे-मसूदी

इसका लेखक अबुल फजल मुहम्मद बिन हुसैन अल बहरी था। इसमें महमूद गजनवी तथा मसूद का इतिहास है। ग्रंथ में तत्कालीन दरबारी जीवन तथा अधिकारियों के कुचक्रों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

5. तारीखे-उल-हिन्द

इस ग्रंथ का लेखक अबूरिहान मुहम्मद बिन अहमद अलबरूनी था। वह अरबी और फारसी भाषाओं, गणित, चिकित्सा, हेतु विद्या, दर्शन एवं भारतीय धर्मशास्त्रों का जानकार था। उसका जन्म ख्वारिज्म में हुआ था। उसने भारत में रहकर हिन्दू धर्म, दर्शन तथा संस्कृत का अध्ययन किया तथा दो संस्कृत ग्रंथों का अरबी में और कुछ अरबी ग्रंथांे का फारसी में अनुवाद किया। ‘तारीखे-उल-हिन्द’ मूलतः अरबी भाषा में लिखा गया। बाद में इसका फारसी तथा अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। इस ग्रंथ में महमूद गजनवी के समय में भारत की स्थिति का वर्णन किया गया है। अलबरूनी की मृत्यु 1038-39 ई. में हुई।

6. ताज-उल-मासिर

इस ग्रंथ का लेखक सदरउद्दीन हसन निजामी था। वह मुहम्मद गौरी के साथ भारत आया। उसने अपनी पुस्तक में 1192 से 1238 ई. तक का विवरण दिया। इस ग्रंथ में मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत की स्थिति, ऐबक के कार्यों तथा इल्तुतमिश के प्रारम्भिक कार्यों की अच्छी जानकारी मिलती है। अजमेर नगर की समृद्धि तथा तत्कालीन स्थिति पर भी लेखक ने अच्छा प्रकाश डाला है। इस ग्रंथ की रचना उस समय हुई जिस समय मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम सत्ता की नींव रख रहा था। इसलिये इस ग्रंथ का महत्व अत्यधिक है। हसन निजामी ने अपना शेष जीवन भारत में ही बिताया।

7. तबकाते नासिरी

इस ग्रंथ का लेखक काजी मिनहाज-उस-सिराज अपने समय का प्रमुख विद्वान था। नासिरुद्दीन के शासन काल में वह दिल्ली का प्रमुख काजी था। उसने इस ग्रन्थ में प्राचीन काल से लेकर 1260 ई. तक का इतिहास लिखा है। इल्तुतमिश के राज्यकाल से लेकर सुल्तान नासिरुद्दीन के राज्यकाल के पन्द्रहवें वर्ष तक का विवरण उसने स्वयं अपनी जानकारी के आधार पर लिखा है।

मिनहाज को निष्पक्ष लेखक नहीं कहा जा सकता। मुहम्मद गौरी तथा इल्तुतमिश के वंश के सम्बन्ध में उसका दृष्टिकोण पक्षपात पूर्ण था। वह बलबन का बड़ा प्रशंसक था। इन दोषों के उपरान्त भी दिल्ली सल्तनत के प्रारम्भिक इतिहास को जानने के लिये इस ग्रन्थ को प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

मिनहाज ने घटनाओं का क्रमबद्ध वृत्तान्त दिया है और तिथियाँ तथा तथ्य सामान्यतः सत्य के निकट हैं। फरिश्ता और दूसरे लेखक भी तबकाते नासिरी को श्रेष्ठ एवं प्रामाणिक ग्रन्थ मानते हैं।

8. खजायँ-उल-फुतूह (तारीखे-अलाई)

खजायँ-उल-फुतूह को तारीखे- अलाई भी कहा जाता है। इसकी रचना 1311 ई. में अमीर खुसरो ने की। अमीर खुसरो भारत के फारसी कवियों में सर्वश्रेष्ठ था। वह जलालुद्दीन खलजी से मुहम्मद बिन तुगलक तक के दिल्ली के सुल्तानों का समकालीन था। 1290 ई. से 1325 ई. तक वह राजकवि रहा।

खजायँ-उल-फुतूह में अलाउद्दीन खलजी की विजयों के साथ-साथ उसके आर्थिक सुधारों और बाजार-भाव नियन्त्रण का भी उल्लेख किया गया है। खुसरो ने जलालुद्दीन खलजी की हत्या जैसी उन घटनाओं को नहीं लिखा जो उसके अलाउद्दीन के विरुद्ध थीं। खुसरो ने कहीं-कहीं पर अत्यधिक अलंकृत फारसी का प्रयोग किया है जिसके कारण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट नहीं हो पाते। उसने कई हिन्दी शब्दों का भी प्रयोग किया है। इस ग्रन्थ में तिथि क्रम की कमी खटकती है। फिर भी, यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है।

डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है- ‘खजायँ उल फुतूह’ दक्षिणी अभियानों का इतिहास है। यह तिथि एवं वृत्तान्त दोनों ही दृष्टियों से सही है। इससे हमें अलाउद्दीन के शासनकाल का उपयुक्त तिथिक्रम निश्चित करने में सहायता मिलती है। इसमें कतिपय प्रशासकीय सुधारों का भी संक्षिप्त वर्णन है। खुसरो कट्टर मुसलमान था। जिन लोगों को वह काफिर समझता था उनके विषय में विचार प्रकट करते हुए उसने अपनी धर्मान्धता का परिचय दिया।’

9. अमीर खुसरो के अन्य ग्रंथ

अमीर खुसरो ने ‘मिफताह-उल-फुतूह’, ‘तुगलकनामा’, ‘गुरात-उल-कमाल’, ‘देवलरानी’ आदि अनेक ग्रन्थों की भी रचना की। खुसरो की काव्य रचनाओं से भी कुछ ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। ‘तूहफतूह रिगार’ से बलबन के सम्बन्ध में, ‘वस्तुल हयात’ से निजामुद्दीन औलिया तथा मलिक छज्जू आदि के बारे में, ‘गुरात-उल-कमाल’ से निजामुद्दीन औलिया, कैकूबाद आदि के बारे में तथा ‘देवलरानी’ से खिज्रखाँ एवं देवलदेवी के बारे में जानकारी मिलती है।

10. तारीखे-फीरोजशाही

इस ग्रंथ का लेखक जियाउद्दीन बरनी था। वह ग्यासुद्दीन तुगलक, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोज तुगलक का समकालीन था। उसका ग्रंथ तारीखे-फीरोजशाही बलबन के राज्यारोहण (ई. 1265) से आरम्भ होकर फीरोज तुगलक के शासन के छठे वर्ष (ई. 1356) में समाप्त होता है।

उस समय के इतिहास की दृष्टि से यह एक प्रामाणिक ग्रंथ है। बरनी को अनेक महापुरुषों, विद्वानों और अमीर-उमरावों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला। अलाउद्दीन के शासन को उसने अपनी आँखों से देखा। मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में उसे 17 वर्षों तक रहने का अवसर मिला। उसने यह ग्रंथ सुल्तान फीरोज तुगलक को समर्पित किया। उसके अन्तिम दिन कष्ट और दरिद्रता में बीते।

बरनी ने लिखा है कि इतिहासकारों को तथ्यों को विकृत नहीं करना चािहए और इतिहास लिखते समय पक्षपात नहीं करना चाहिये परन्तु अनेक विद्वानों ने स्वयं बरनी की निष्पक्षता और ईमानदारी पर सन्देह प्रकट किया है।

इलियट एवं डाउसन ने लिखा है- ‘जियाउद्दीन बरनी अन्य अनेक इतिहासकारों की भाँति अपने समकालीन शासकों के आदेश से और उनके सामने लिखा करता था, इसलिए वह ईमानदार इतिहासकार नहीं है। उसने बहुत-सी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ बिल्कुल छोड़ दीं तथा कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं को साधारण मानकर उनका अत्यल्प उल्लेख किया है। अलाउद्दीन के शासनकाल में भारत पर मंगोलों के कई आक्रमण हुए परन्तु बरनी ने उनका उल्लेख तक नहीं किया। मुहम्मद बिन तुगलक ने हत्या और बेईमानी से राज्य प्राप्त किया था। बरनी ने उसका भी उल्लेख नहीं किया।’

फरिश्ता ने भी बरनी पर आरोप लगाया है कि उसने इस सत्य को छिपाया।

11. फतवा-ए-जहाँदारी

फतवा-ए-जहाँदारी की रचना जियाउद्दीन बरनी ने की। इस ग्रंथ में राज्य-व्यवस्था सम्बन्धी उपदेश दिये गये हैं तथा आदर्श शासक के सम्बन्ध में बरनी के विचार लिखे गये हैं। बरनी, आदर्श मुसलमान शासकों को काफिरों के विनाश का उपदेश देता है।

12. तारीखे-फीरोजशाही

जियाउद्दीन बरनी की भांति शम्स-ए-सिराज अफीफ ने भी तारीखे फीरोजशाही नामक ग्रंथ की रचना की। अफीफ, सुल्तान फीरोजशाह तुगलक का दरबारी इतिहासकार था। उसने इस ग्रंथ की सामग्री अपने पिता और अन्य तत्कालीन शाही अधिकारियों से प्राप्त की थी। इस ग्रंथ में फीरोज तुगलक के शासनकाल की राजनीतिक घटनाओं, प्रशासकीय सुधारों तथा सुल्तान के नेक कार्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

यद्यपि उसका वर्णन निष्पक्ष नहीं है तथापि फीरोज तुगलक के शासनकाल की जानकारी के लिए वह एक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘अफीफ में, बरनी जैसी न तो बौद्धिक उपलब्धि है और न इतिहासकार की योग्यता एवं सूझबूझ तथा दृष्टि। अफीफ एक-एक घटनाओं को तिथिक्रम से लिखने वाला सामान्य इतिहासकार है।’

13. फुतूहाते-फीरोजशाही

इस ग्रंथ का लेखक सुल्तान फीरोज तुगलक है। इस ग्रंथ में फीरोज ने अपने कार्यों, विचारों और आदेशों के सम्बन्ध में लिखा है। यह ग्रंथ फीरोज के अध्यादेशों का संग्रह मात्र है फिर भी इस ग्रंथ से तत्कालीन इतिहास को तैयार करने में महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है।

14. सीरत-ए-फीरोजशाही

इस ग्रंथ के लेखक का नाम अज्ञात है। इसमें फीरोज तुगलक के गुणों का विस्तार से वर्णन है तथा उसकी धार्मिक नीति और मूर्ति-पूजा का नाश करने के प्रयासों की प्रशंसा की गई है। फीरोज द्वारा निर्मित नहरों और उसके प्रशासकीय सुधारों का भी उल्लेख किया गया है। ग्रंथ की रचना 1370 ई. में की गई। सम्भवतः सुल्तान फीरोज तुगलक के आदेशानुसार इसकी रचना की गई।

15. फुतुह-उस-सलातीन

इस ग्रंथ का लेखक ख्वाजा अबू बक्र इसामी, मुहम्मद बिन तुगलक का समकालीन था। उसने 1349 ई. में इस ग्रंथ की रचना की थी। इस ग्रंथ में सुल्तान महमूद गजनवी से लेकर सुल्तान अलाउद्दीन बहमनशाह तक के राज्यकाल का विवरण दिया गया है। इसामी ने इस ग्रंथ को काफी छानबीन के बाद लिखा है।

इस कारण इस ग्रंथ को काफी महत्त्व दिया जाता है। कुछ विद्वान उस पर मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध अन्धाधुन्ध दोष लगाने का आरोप लगाते हैं परन्तु चूँकि इसामी ने सुल्तान के निष्ठुर कृत्यों को अपनी आँखों से देखा था और अन्य लोगों की भाँति उसे भी दौलताबाद जाने और यात्रा के कष्ट उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा था, सम्भवतः इसीलिए वह सुल्तान का कटु आलोचक बन गया।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसामी ने अपने युग की घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया दिया है। यह ग्रंथ तत्कालीन इतिहास को जानने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

16. किताब-उल-रहला (तुहूफल-उन-नुजार)

किताब-उल-रहला को तुहूफल-उन-नुजार भी कहते हैं। इसका लेखक इब्नबतूता, मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में मोरक्को से भारत आया था। यह ग्रंथ उसके यात्रा संस्मरणों का संकलन है। मोरक्को के सुल्तान ने इब्नबतूता को काफी प्रोत्साहन दिया। इब्नबतूता लगभग आठ वर्ष तक भारत में रहा।

उसने अपने यात्रा-वृत्तान्त में भारत की भौगोलिक स्थिति, तत्कालीन शासन-व्यवस्था, दरबार, डाक का प्रबन्ध, सुल्तान मुहम्मद के चरित्र के साथ-साथ समकालीन राजनीतिक घटनाओं का विस्तार से उल्लेख किया। धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का भी विशद् वर्णन किया। इब्नबतूता जिज्ञासु प्रवृत्ति का व्यक्ति था।

वह स्पष्ट-वक्ता था और किसी बात को छिपाने में विश्वास नहीं करता था। उसने स्वयं अपनी त्रुटियों का भी स्पष्ट उल्लेख किया। उसने अपनी यात्रा का विवरण ईमानदारी से दिया परन्तु पिछली घटनाओं के सम्बन्ध में उसे अपने सूत्रों से जो जानकारी मिल सकी उसका ज्यों का त्यों उपयोग किया।

17. तारीखे-मुबारकशाही

इसका लेखक याहयाबिन अहमद अब्दुल्लाह सहरिन्दी है। इस ग्रंथ में मुहम्मद गौरी से लेकर सैय्यद वंश के तीसरे सुल्तान मुहम्मद तक के शासनकाल का विवरण है। सैय्यद वंश के इतिहास की जानकारी के लिए यही एकमात्र समकालीन ग्रंथ है। परवर्ती इतिहासकारों- निजामुद्दीन अहमद, बदायूँनी आदि ने सैय्यद वंश के इतिहास के लिए इसी ग्रंथ का सहारा लिया है।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘याहया एक सजग इतिहासकार है जिसकी शैली अतिरंजना और विशेषणों से मुक्त है। उसने घटनाओं का बड़ी ईमानदारी के साथ वर्णन किया है और फीरोज की मृत्यु के उपरान्त होने वाले उपद्रवों की जानकारी प्राप्त करने के लिए उसका ग्रंथ अत्यन्त प्रमाणिक है। उसने उस समय में, देश की शान्ति-भंग करने वाले विद्रोहों का विस्तार से वर्णन किया है।’

18. वाकियते-मुश्ताकी

इस ग्रंथ का लेखक शेख रिजकुल्ला मुश्ताकी (1491-1581 ई.) था। उसने वाकियते-मुश्ताफी में बहलोल लोदी से लेकर अकबर तक के शासन काल की विभिन्न घटनाओं का विवरण दिया। इस ग्रंथ में अनेक कहानियाँ हैं जिनके माध्यम से समकालीन राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी भी मिलती है।

19. तारीखे-मुश्ताकी

इस ग्रंथ की रचना भी शेख रिजकुल्ला मुश्ताकी ने की। यह एक काव्य ग्रंथ है जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत की गई है। कुछ कहानियां भी दी गई हैं।

20. तारीखे सलातीन-ए-अफगानी

इस ग्रंथ को तारीखे-शाही भी कहा जाता है। इसका लेखक अहमद यादगार था। इसमें बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी, इब्राहीम लोदी, शेरशाह, इस्लामशाह, फीरोजशाह, आदिलशाह, इब्राहीम सूरी और सिकन्दरशाह का इतिहास है। अर्थात् यह ग्रंथ अफगान शासकों के इतिहास की जानकारी देता है। उनके साथ-साथ इस ग्रंथ में तत्कालीन मंगोल बादशाहों- बाबर, हुमायूँ और अकबर के बारे में भी जानकारी मिलती है।

21. मखजन-ए-अफगानी

इस ग्रंथ का लेखक नियामतउल्ला था। यह ग्रंथ दिल्ली सल्तनत नष्ट हो जाने के बाद लिखा गया था। इसकी रचना 1609 ई. के आसपास जहाँगीर के शासन काल में हुई। अतः यह तत्कालीन ग्रंथों की श्रेणी में नहीं आता। इसमें दिल्ली के अफगान सुल्तानों तथा अफगानी कबीलों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। इस ग्रन्थ में सुल्तान बहलोल लोदी से लेकर इब्राहीम लोदी तक के समय का वर्णन किया गया है।

22. तारीखे-दाऊदी

इस ग्रंथ का लेखक अब्दुल्ला जहाँगीर का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी (1451 ई.) से लेकर बंगाल के सुल्तान दाऊदशाह (1517 ई.) तक के समय का वर्णन है। इसमें अलौकिक कहानियों की भरमार है। तिथियों के मामले में बड़ी भूलें की गई हैं। अफगान शासकों की खूब प्रशंसा की गई है। इस ग्रंथ की प्रति पटना के खुदाबख्श पुस्तकालय में उपलब्ध है।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास ग्रंथों की समीक्षा

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में केवल फीरेज तुगलक ही ऐसा हुआ है जिसने स्वयं किसी ग्रंथ की रचना की। उसका लिखा ग्रंथ फुतूहाते-फीरोजशाही सुल्तान के कार्यों, विचारों और आदेशों के सम्बन्ध में है। फिर भी इससे उस काल के इतिहास के निर्माण में अत्यल्प सहायता मिलती है। यही कारण है कि दिल्ली के सुल्तानों के इतिहास की जानकारी के लिए राजकीय अधिकारियों तथा स्वतन्त्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य पर निर्भर रहना पड़ता है जो कि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास लेखकों की विशेषताएँ एवं कमजारियाँ

सल्तनतकालीन लेखकों की विशेषताएँ

सल्तनतकालीन लेखकों के पास इतिहास लेखन की पुरानी परम्परा थी। उनमें से अधिकांश लेखकों के पास इतिहास लेखन के लिये परिपक्व दृष्टि उपलब्ध थी। उनमें से अधिकांश लेखक बहुत सी घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी रहे। उन्होंने  प्रत्यक्षदर्शियों से सुने हुए विवरण के आधार पर भी इतिहास की रचना की तथा अपने से पूर्ववर्ती लेखकों द्वारा जुटाई गई जानकारी का भी उपयोग किया।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार गोथे ने लिखा है- ‘मैं एक ऐसे समय की अनुभूति करता हूँ, जब इतिहास आँखों देखी घटनाओं के आधार पर लिखा जायेगा।’ सल्तनतकालीन इतिहास इस कसौटी पर खरा उतरता है।

सल्तनतकालीन लेखकों की कमजोरियाँ

अधिकांश फारसी लेखकों ने राजकीय संरक्षण में सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे थे, फलस्वरूप ऐसे इतिहास को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता किंतु हमारे पास सल्तनकालीन इतिहास जानने के समसामयिक स्रोत इतने कम हैं कि हमें इन ग्रंथों की सहायता लेनी ही पड़ती है।

सल्तनतकालीन इतिहासकारों एवं ग्रंथकारों की भांति उस काल के विदेशी यात्री भी इस्लाम से लगाव रखने एवं काफिरों से शत्रु-भाव रखने के कारण पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे। उन्होंने भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को समझने में भारी भूलें कीं तथा विरोधाभासी वर्णन किये। फिर भी उन्होंने भारत की समृद्धि एवं सांस्कृतिक उन्नति से चमत्कृत होकर भारतीय नगरों एवं गाँवों के रोचक चित्र प्रस्तुत किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

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