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मराठा शक्ति

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मराठा शक्ति

अँग्रेजों के आगमन के समय मुगल सत्ता अंतिम सांसें ले रही थी तथा भारत की राजनीतिक स्थिति में मराठा शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी।

मराठा शासक (छत्रपति)

मराठा शक्ति की स्थापना छत्रपति शिवाजी ने की थी जिनका इतिहास हम मध्यकालीन भारत का इतिहास में पढ़ चुके हैं। शिवाजी के काल में भी अंग्रेज और फ्रांसीसी कम्पनियाँ भारतीय शक्तियों से संघर्ष करने लगी थीं किंतु शिवाजी ने उन्हें अपने क्षेत्र में पूरी तरह दबाकर रखा था। शिवाजी के बाद मराठा शक्ति का तेजी से क्षरण हुआ जिसके कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया।

शम्भाजी

1680 ई. में छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र शम्भाजी गद्दी पर बैठा किंतु औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा को हस्तगत करने के बाद अपनी सम्पूर्ण शक्ति मराठों के विरुद्ध लगा दी। शम्भाजी को कैद करके दिल्ली ले जाया गया जहाँ उसके टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिया गया।

राजाराम

मराठों ने शम्भाजी के भाई राजाराम के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। मुगलों ने रायगढ़ दुर्ग पर आक्रमण करके राजाराम को घेर लिया। शम्भाजी की विधवा रानी येशुबाई की सलाह पर राजाराम सुदूर दक्षिण की ओर चला गया किन्तु विश्वासघात के कारण शम्भाजी की विधवा रानी येशुबाई और उसका पुत्र शाहू मुगलों द्वारा कैद कर लिये गये।

ताराबाई

1700 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद राजाराम की विधवा रानी ताराबाई ने अपने तीन वर्षीय पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को छत्रपति की गद्दी पर बैठा दिया और मराठों का नेतृत्व ग्रहण कर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

शाहू

फरवरी 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों- मुअज्जम और आजम के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ। इस समय आजम दक्षिण में था, अतः उत्तर की तरफ जाते समय वह अपने साथ शाहू और उसके परिवार को, जो मुगलों की कैद में थे, भी ले गया। मार्ग में मुगल सेनानायक जुल्फिकार खाँ की सलाह पर आजम ने शाहू को मुक्त कर दिया किंतु शाहू के परिवार को अपने साथ दिल्ली ले गया।

औरंगजेब की कैद से मुक्त होकर शाहू महाराष्ट्र के लिये रवाना हुआ। महाराष्ट्र पहुँचते-पहुँचते उसके पास एक बड़ी सेना हो गई। ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को छत्रपति बनाये रखने के लिये, शाहू का विरोध किया। अतः शाहू और ताराबाई की सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें ताराबाई परास्त हो गई। शाहू ने सतारा को अपनी राजधानी बनाया और जनवरी 1708 में छत्रपति के रूप में अपना राज्याभिषेक करवाया।

पेशवा का उदय

जब छत्रपति मराठों का नेतृत्व करने में असक्षम हो गया तब मराठा शक्ति ने पेशवा के नेतृत्व में फिर से स्वयं को संगठित किया। पेशवा के नेतृत्व में मराठों ने अंग्रेजों से लम्बे समय तक युद्ध किया किंतु मराठा शक्ति अंततः अंग्रेजों से परास्त हो गई।

बालाजी विश्वनाथ

शाहू के राज्यारोहण के समय मराठा राज्य अस्त-व्यस्त था। शाहू विलासी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसके लिये महाराष्ट्र की अव्यवस्था को व्यवस्थित करना संभव नहीं था। अतः 16 नवम्बर 1713 को उसने बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा नियुक्त किया।

बालाजी विश्वनाथ ने ताराबाई की सत्ता को समाप्त करके तथा विद्रोही मराठा सरदारों की शक्ति का दमन करके, उन पर शाहू के प्रभुत्व की स्थापना की। पेशवा द्वारा मराठा राज्य को दी गई महत्त्वपूर्ण सेवाओं के कारण शाहू के शासनकाल में पेशवाओं का उत्कर्ष हुआ।

उन्हीं दिनों दिल्ली में सैयद भाइयों के सहयोग से फर्रूखसियर, मुगल बादशाह बना किन्तु कुछ समय बाद ही उसकी सैयद भाइयों से अनबन हो गई और सैयद बंधुओं ने फर्रूखसियर को समाप्त करने के लिये मराठों से सहायता माँगी। 1719 ई. में सैयद बंधुओं ने मराठों से एक सन्धि की, जिसमें शाहू को दक्षिण के 6 सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार देने तथा शाहू के परिवार को मुगलों की कैद से मुक्त करने का वचन दिया।

इस संधि के बाद बालाजी विश्वनाथ मराठों की सेना लेकर सैयद भाइयों की सहायता के लिये दिल्ली गया, जहाँ मारवाड़ नरेश अजीतसिंह की सहायता से फर्रूखसियर को गद्दी से उतारकर मार डाला गया और रफी-उद्-दरजात को बादशाह बनाया गया। नये बादशाह ने 1719 ई. की सन्धि को स्वीकार कर लिया।

इस घटना से मराठों को मुगलों की पतनोन्मुखी स्थिति का ज्ञान हो गया। अतः दिल्ली से स्वदेश लौटने के बाद बालाजी विश्वनाथ ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति के प्रसार की योजना बनाई किन्तु योजना को कार्यान्वित करने के पूर्व ही 1720 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।

बाजीराव (प्रथम) (1720-40 ई.)

बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उसका बीस वर्षीय पुत्र बाजीराव (प्रथम) पेशवा बना। उसने हैदराबाद के सूबेदार निजाम-उल-मुल्क को दो बार परास्त किया, पुर्तगालियों से बसीन व सालसेट छीन लिये तथा मराठों के प्रभाव को गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड तक पहुँचा दिया। इस प्रकार बाजीराव ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में मराठा शक्ति के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। 28 अप्रैल 1740 को बाजीराव की मृत्यु हो गई।

बालाजी बाजीराव (1740-61 ई.)

बाजीराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद शाहू ने बाजीराव के 19 वर्षीय पुत्र बालाजी बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया। बालाजी बाजीराव के समय में मराठा साम्राज्य चरम पर पहुँच गया। छत्रपति की समस्त शक्तियाँ पेशवा के हाथों में चली गईं और सतारा के स्थान पर पूना मराठा राज्य का केन्द्र बन गया।

25 दिसम्बर 1749 को शाहू की मृत्यु हो गई। उसके बाद छत्रपति का नाम इतिहास में लुप्त प्रायः हो गया तथा पेशवा मराठा राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। 18वीं सदी के मध्य में जब मराठे उत्तर भारत में अपना प्रभाव जमाने के लिये प्रयासरत थे, उसी समय उत्तर भारत पर अफगानों के भी आक्रमण होने लगे। इससे उत्तर भारत की राजनीति में परिवर्तन आ गया।

अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण

1748 ई. में अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने पहली बार पजांब पर आक्रमण किया किन्तु वह परास्त होकर लौट गया। 1752 ई. में उसने दुबारा आक्रमण किया। इस बार वह मुल्तान और लाहौर को जीतने में सफल रहा। उसने दोनों स्थानों पर अपने अधिकारी नियुक्त किये तथा वापस अफगानिस्तान लौट गया। 

उस समय दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह अहमदशाह का अधिकार था। उसने एक ओर तो अब्दाली के भय से मुल्तान और लाहौर, अब्दाली को दे दिये किंतु दूसरी ओर मराठों से सन्धि की जिसमें तय किया गया कि मराठे, देशी और विदेशी शत्रुओं के विरुद्ध, मुगल बादशाह की सहायता करेंगे जिसके बदले में मराठों को पंजाब, सिन्ध और दो-आब से चौथ वसूल करने का अधिकार होगा।

इस प्रकार मराठा, मुगल सल्तनत के संरक्षक बन गये। इसके कुछ समय बाद ही बादशाह अहमदशाह और उसके वजीर सफदरजंग के बीच मतभेद बढ़े तथा दिल्ली दरबार में दो परस्पर-विरोधी दल खड़े हो गये। दोनों पक्षों ने मराठों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। मराठों ने बादशाह का साथ दिया तथा मुगल वजीर को कई बार परास्त किया। बार-बार परास्त होकर वजीर अपने सूबे अवध को चला गया।

13 मई 1754 को बादशाह ने इन्तिजामउद्दौला को अपना नया वजीर बनाया किन्तु निजाम-उल-मुल्क के बड़े पुत्र गाजीउद्दीन ने बादशाह अहमदशाह को पदच्युत करके आलमगीर (द्वितीय) को बादशाह बनाया और खुद वजीर बन गया। नया वजीर स्वार्थ-सिद्धि हेतु कभी मराठों से, कभी रोहिल्ला सरदार नजीबखाँ से और कभी अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से साँठ-गाँठ करता रहा।

नवम्बर 1753 में पंजाब के सूबेदार मीर मन्नू की मृत्यु के बाद उसकी विधवा मुगलानी बेगम अपने शिशु पुत्र के नाम पर शासन करने लगी। गाजिउद्दीन ने औरत के शासन को हटाने के लिये पंजाब पर आक्रमण किया तथा मुगलानी बेगम को बंदी बनाकर दिल्ली ले आया। वह मुगलानी बेगम की सम्पत्ति भी दिल्ली ले आया।

गाजीउद्दीन ने शाही हरम की बेगमों को भी परेशान किया। बेगमों ने रोहिल्ला सरदार नजीबखाँ से सहायता माँगी। नजीबखाँ का मानना था कि वजीर, मराठों की शक्ति के बल पर ऐसा कर रहा है। अतः नजीबखाँ ने मराठों को कुचलने के लिये अहमदशाह अब्दाली को आमन्त्रित किया।

उधर मुगलानी बेगम ने भी अब्दाली को भारत आने का निमन्त्रण भेजा। 1757 ई. के आरम्भ में अब्दाली एक बार फिर सेना लेकर भारत पहुँचा और उसने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने दिल्ली में प्रवेश करके दिल्ली के समृद्ध नागरिकों एवं अमीरों को लूटा।

अब्दाली ने मथुरा के आसपास के क्षेत्रों में भंयकर लूटमार मचाई। संयोगवश अब्दाली की सेना में महामारी फैल गई जिसके कारण वह वापिस अपने देश को लौट गया। लौटते समय उसने नजीबखाँ को मुगल सल्तनत का मीर-बख्शी बनाया तथा अपने पुत्र तैमूरशाह को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया।

जिस समय अहमदशाह अब्दाली, दिल्ली तथा मथुरा में लूट मचाये हुए था,  उस समय मराठा सरदार, राजपूताना के राज्यों से चौथ वसूल करने में व्यस्त थे। जब अब्दाली वापिस लौट गया, तब मराठा सेनापति रघुनाथराव और मल्हारराव होलकर सेनाएँ लेकर आगरा पहुँचे।

रघुनाथराव ने नजीब खाँ को बन्दी बना लिया परन्तु होलकर के अनुरोध पर पुनः मुक्त कर दिया। इसके बाद मराठों ने लाहौर पर आक्रमण करके तैमूरशाह को खदेड़ दिया। मराठों ने अटक तक धावे मारे तथा अदीना बेग को लाहौर का सूबेदार और अहमदशाह बंगश को मीर-बख्शी नियुक्त किया। अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को पंजाब से निकाल बाहर करने से अब्दाली ने क्रुद्ध होकर फिर से भारत पर चढ़ाई की।

उधर पेशवा ने उत्तर भारत की व्यवस्था करने का दायित्व सिन्धिया परिवार को सौंपा और होलकर को सिन्धिया की सहायता करने को कहा किन्तु होलकर ने पेशवा के आदेश का पालन नहीं किया। दत्ताजी सिन्धिया ने दिल्ली पहुँचकर नजीब खाँ को पकड़ने का प्रयास किया। नजीब खाँ ने अब्दाली से सहायता माँगी।

इस समय अब्दाली पेशावर में था। उसने जहानखाँ को लाहौर पर अधिकार करने भेजा किन्तु साबाजी सिन्धिया ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। इस पर अब्दाली स्वयं दिल्ली की ओर बढ़ा। नजीब खाँ भी सेना लेकर अब्दाली से जा मिला।

जनवरी 1760 में बरारी घाट का युद्ध हुआ जिसमें दत्ताजी सिन्धिया परास्त होकर मारा गया। अब्दाली ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दत्ताजी की मृत्यु के बाद होलकर दिल्ली की तरफ आया किन्तु अफगानों से परास्त होकर राजपूताने की ओर भाग गया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

पानीपत का तीसरा युद्ध

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पानीपत का तीसरा युद्ध

पानीपत का तीसरा युद्ध अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली एवं पेशवा बालाजी बाजीराव की सेनाओं के बीच हुआ। इस युद्ध में मराठा शक्ति प्रमुख भूमिका में थी किंतु रणनीतिक कमजोरियों के कारण मराठे युद्ध हार गए।

अहमदशाह अब्दाली द्वारा मराठों की दुर्दशा किये जाने से पेशवा बालाजी बाजीराव को अत्यधिक दुःख हुआ। उसने अपने चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ को एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर भेजा। इस अभियान का औपचारिक नेतृत्व पेशवा के बड़े पुत्र विश्वासराव को सौंपा गया। सदाशिवराव भाऊ पराक्रमी सेनापति था।

अहमदशाह अब्दाली की घोषणा

अहमदशाह अब्दाली ने भारतीय मुस्लिम सेनापतियों का समर्थन प्राप्त करने के लिये घोषित किया कि वह दिल्ली के मुस्लिम राज्य को मराठों की लूटमार से बचाने के लिए भारत आया है। इस घोषणा के बाद, भारत के अधिकांश मुस्लिम शासक अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये।

सदाशिवराव भाऊ की घोषणा

इस पर सदाशिवराव भाऊ ने घोषित किया कि वह विधर्मी विदेशियों को भारत से खदेड़ना चाहता है; इसलिये समस्त भारतीय शक्तियाँ इस कार्य में सहयोग दें किंतु मराठों की लूटमार से संत्रस्त उत्तर भारत की किसी भी शक्ति ने मराठों का साथ नहीं दिया। राजा सूरजमल को छोड़कर भारत की समस्त शक्तियों की सहानुभूति अब्दाली के साथ थी।

कहने को मराठे, मुगल बादशाह आलमगीर की तरफ से अहमदशाह अब्दाली से युद्ध लड़ रहे थे किंतु इस समय तक मुगल साम्राज्य की इतनी दुर्दशा हो चुकी थी कि बादशाह आलमगीर, अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध छोटी-मोटी सेना भी नहीं भेज सका। 7 मार्च 1760 को सदाशिवराव भाऊ दक्षिण से चला।

मराठों का पानीपत के लिए प्रस्थान

मराठे अपनी जीत के प्रति आवश्यकता से अधिक आश्वस्त थे। वे अपनी पराजय के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वे युद्ध के मैदान में अपनी पत्नियों, रखैलों और दासियों को लेकर पहुँचे। युद्ध क्षेत्र में उतरने से पहले उन्होंने पुष्कर और प्रयाग में डुबकियां लगाईं और काशी में विश्वनाथ के दर्शन किये। वे बड़ी ही लापरवाही से दिल्ली की ओर बढ़े।

अगस्त 1760 में सदाशिवराव ने अब्दाली के आदमियों से दिल्ली छीन ली तथा दिल्ली के निकट अफगानों के प्रमुख केन्द्र कुंजपुरा पर भी अधिकार कर लिया।

अब्दाली को यह समाचार मिला तो उसने यमुना पार करके मराठों पर पीछे से आक्रमण करने की योजना बनाई और पानीपत तक चला आया। सदाशिवराव भी अपनी सेना सहित पानीपत जा पहुँचा। नवम्बर 1760 में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हो गईं।

पानीपत का तीसरा युद्ध

14 जनवरी 1761 को दोनों सेनाओं के बीच अन्तिम निर्णायक युद्ध लड़ा गया। मदमत्त मराठों ने युद्ध के सामान्य नियमों का पालन भी नहीं किया। न ही शत्रु की गतिविधियों पर दृष्टि रखी। वे सीधे ही युद्ध के मैदान में धंस गये जबकि अब्दाली ने उस मैदान के तीन तरफ अपनी सेनाएं छिपा रखी थीं। पाँच घण्टे के भीषण युद्ध के बाद ही पेशवा का पुत्र विश्वासराव, शत्रु की गोली से मारा गया। 

यह सुनते ही सदाशिवराव भाऊ अपना संयम खो बैठा और अन्धाधुन्ध लड़ते हुए वह भी मारा गया। मल्हारराव होलकर आरम्भ से ही दोहरी नीति अपनाये हुए था। वह युद्ध के मैदान तक तो पहुंचा किंतु उसने युद्ध में विशेष भाग नहीं लिया और स्थिति के प्रतिकूल होते ही सेना सहित युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ।

अहमदशाह अब्दाली, हाथ आये हुए शत्रु को इस तरह बच कर नहीं जाने दे सकता था। उसकी सेना ने भागते हुए मराठों का पीछा किया तथा एक लाख मराठे काट डाले। मराठों के अनेक प्रसिद्ध सेनापति इस युद्ध में मारे गये। भागते हुए हजारों मराठों को बन्दी बना लिया गया। बचे हुए मराठे जान हथेली पर रखकर राजपूताना होते हुए महाराष्ट्र की तरफ भागे।

मार्ग में लोगों ने उन्हें लूटना और मारना आरम्भ किया। मराठा सैनिकों की ऐसी दुर्दशा देखकर भरतपुर के जाटों की राजमाता किशोरी देवी ने घोषणा की कि मराठा सैनिक मेरे बच्चे हैं। राजमाता ने समस्त भारतीयों और भारतीय राजाओं का आह्वान किया कि वे मराठा सैनिकों के प्राणों की रक्षा करें और उन्हें शरण प्रदान करें।

युद्ध के परिणाम

(1.) मराठा सैन्य शक्ति का पराभव

एक लाख मराठा सैनिकों के मारे जाने के कारण मराठों की सैन्य शक्ति का बहुत ह्रास हुआ। यदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘इस भयंकर संघर्ष में मराठों को बुरी तरह मार खानी पड़ी। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में शायद ही कोई ऐसा सैनिक परिवार बचा हो, जिसने पानीपत के इस पवित्र संघर्ष में अपना एक सदस्य न खोया हो।’

(2.) मराठा सरदारों में बिखराव

एक लाख मराठा सैनिकों को काट डाले जाने के बाद पूरा महाराष्ट्र विधवा मराठनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा। मराठों की इस भारी पराजय से पेशवा बालाजी बाजीराव का हृदय टूट गया। 23 जून 1761 को वह हृदयाघात से मर गया। उसका पुत्र विश्वासराव पहले ही मारा जा चुका था, ऐसी स्थिति में मराठा सरदारों पर नियंत्रण रखने वाला कोई नहीं रहा। वे अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।

(3.) मुगल सत्ता का पराभव

मुगलों की सत्ता अपने पतन के चरम पर थी किंतु पानीपत का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद मुगल सत्ता का नैतिक पतन भी हो गया। विजय मद में चूर अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया। उसने आलमगीर को एक साधारण कोठरी में बंद कर दिया।

अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह आलमगीर तथा उसके अमीरों की औरतों और बेटियों को लाल किले में निर्वस्त्र करके दौड़ाया और उन पर दिन-दहाड़े बलात्कार किये। निकम्मा आलमगीर, अब्दाली के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका। जब अहमदशाह अब्दाली, लाल किले का पूरा गर्व धूल में मिलाकर अफगानिस्तान लौट गया तब मुगल शाहजादियाँ पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में फिरने लगीं।

अब्दाली के जाते ही उसके वजीर इमाद ने बादशाह की हत्या करवाकर शव नदी तट पर फिंकवा दिया तथा यह प्रचारित कर दिया कि बादशाह पैर फिसलने से मर गया। इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मुगल सल्तनत का लगभग अन्त हो गया। मुगलों, मराठों तथा अफगानों के पराभव ने अँग्रेजों के लिये मैदान साफ कर दिया।

मराठों का पुनरुत्थान

मराठा इतिहासकार सरदेसाई का मत है- ‘यह सोचना कि पानीपत के युद्ध ने मराठों की उठती हुई शक्ति को कुचल दिया, ठीक नहीं होगा। क्योंकि नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में हुई क्षति की पूर्ति करने के लिये उठ खड़े हुए।’

मराठों ने बहुत कम समय में अपनी क्षति को पूरा कर लिया। 1769 ई. में उन्होंने पुनः नर्मदा को पार किया और राजपूतों, रोहिल्लों, जाटों आदि से कर वसूल किया। बाद में सिन्धिया कुछ समय के लिये मुगल बादशाह का संरक्षक भी रहा परन्तु फिर भी, मराठे भारत की राजनीति में दुबारा से स्थायी प्रभाव जमाने में सफल नहीं हुए।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय लगभग पूरे देश में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। चारों ओर लूटमार का वातावरण था। औरंगजेब की नीतियों के कारण केन्द्रीय सत्ता कमजोर चुकी थी तथा उसकी मृत्यु के बाद देश में विभिन्न अर्द्धस्वतंत्र एवं स्वायत्तशासी राज्यों का उदय हो चुका था।

मुगलों के पतन से उत्पन्न हुई राजनीतिक शून्यता को भरने के लिये मराठे सामने आये। इसी दौरान हुए अफगानी आक्रमणों ने तथा मराठों की आपसी फूट ने मराठा शक्ति को कमजोर कर दिया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

पानीपत का तीसरा युद्ध

मराठा शक्ति

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

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अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

अंग्रेज और फ्रांसीसी भारत में व्यापार करने के लिए आए थे किंतु शीघ्र ही व्यापार पर एकाधिकार को लेकर अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई।

ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत में व्यापारिक गतिविधियों के संचालन के साथ-साथ स्थानीय राज्यों की आंतरिक राजनीति में किसी न किसी पक्ष की सहायता करके अपने प्रभाव को बढ़ाने में प्रयासरत थीं। इस समय मद्रास और पाण्डिेचेरी, कर्नाटक राज्य में थे।

अँग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही, कर्नाटक में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई। 1742 ई. में फ्रांसिसी अधिकारी डूप्ले, पाण्डिचेरी का गवर्नर बनकर आया। उसने भारत में आते ही अँग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसिसियों के बीच की व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में बदल गई।

जिस समय डूप्ले भात आया, उस समय भारत के पूर्वी तट पर पांडिचेरी फ्रांसीसियों के अधिकार में था तथा मद्रास अँग्रेजों के। ये बस्तियां किलेबंद नगर थे और कर्नाटक के नवाब के राज्य में थे जिसकी राजधानी अर्काट थी। उन दिनों यूरोप में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के बीच भयानक प्रतिद्वंद्विता चल रही थी जिसका प्रभाव अमरीका तथा एशिया में स्थित दोनों देशों की कम्पनियों पर पड़ता था। इस कारण अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा रक्तरंजित संघर्ष में बदल गई।

वाल्टेयर ने लिखा है- ‘हमारे देश में तोप का पहला गोला छूटने के साथ ही अमरीका और एशिया की तोपों में भी आग लग जाती थी।’

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48 ई.)

भारत में फ्रैंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उपनिवेश की स्थापना के उद्देश्य से डूप्ले के नेतृत्व में 1746 ई. में पहली बार एक भारतीय फ्रैंच सेना बनाई गई। इस फ्रैंच सेना ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से तीन युद्ध किये जिन्हें कर्नाटक के युद्ध कहते हैं। प्रथम कर्नाटक युद्ध के तीन प्रमुख कारण थे-

(1.) यूरोप में ऑस्ट्रिया नामक एक देश है। अँग्रेज और फ्रांसिसी दोनों ही अपने-अपने प्रभाव के व्यक्ति को ऑस्ट्रिया का शासक बनाना चाहते थे।

(2.) अँग्रेजों और फ्रांसीसियों में अमरीका में औपनिवेशिक विस्तार के लिये संघर्ष चल रहा था।

(3.) दोनों ही कम्पनियाँ भारत में व्यापारिक स्वामित्व प्राप्त करना चाहती थीं।

इन तीन कारणों के रहते यह संभव नहीं था कि भारत में अँग्रेजी कम्पनी तथा फ्रैंच कम्पनी के बीच युद्ध न हो। इसलिये अँग्रेजों और फ्रांसिसियों ने अपने-अपने देशों की सरकारों से अनुमति लेकर एक दूसरे के विरुद्ध भारत में भी युद्ध छेड़ दिया। अँग्रेज सेनापति बारनैट ने कुछ फ्रांसिसी जहाजों को पकड़ लिया।

इस पर डूप्ले ने मॉरिशस में फ्रांसिसी गवर्नर ला-बूर्डोने से सहायता मांगी। ला-बूर्डाने तीन हजार सैनिक लेकर भारत आया। उसने अँग्रेजी सेना को हराकर 21 सितम्बर 1746 को मद्रास पर अधिकार कर लिया। क्लाइव भी पकड़ा गया। ला-बूर्डाने को मद्रास पर अधिकार बनाये रखने में कोई रुचि नहीं थी।

इसलिये वह अँग्रेजों से बड़ी धन राशि लेकर मॉरीशस लौट गया जबकि डूप्ले चाहता था कि मद्रास पर अँग्रेजों का ही अधिकार रहे। इसलिये डूप्ले ने मद्रास पर पुनः आक्रमण किया तथा मद्रास पर पुनः अधिकार कर लिया। उधर अँग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर आक्रमण करके उस पर अधिकार करने का असफल प्रयास किया।

उन्हीं दिनों कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन ने अपनी बस्तियों की सुरक्षा के लिये अँग्रेजों से सहायता मांगी तथा फ्रांस के विरुद्ध सेना भेजी जिसमें लगभग 10 हजार सैनिक थे। फ्रांस की ओर से कैप्टेन पेराडाइज ने नवाब की सेना का सामना किया। पेराडाइज के पास केवल 230 फ्रांसिसी सैनिक और यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित 700 भारतीय सैनिक थे।

यह लड़ाई सेंट टोमे की लड़ाई कहलाती है जो अडयार नदी के किनारे स्थित है। इस युद्ध में नवाब की सेना परास्त हो गई। फ्रांसीसियों द्वारा किसी मुगल प्रांतपति के विरुद्ध भारत में लड़ी गई यह पहली लड़ाई थी। इस लड़ाई ने मुगलों तथा उनके सूबेदारों के अजेय होने का मिथक तोड़ दिया।

1748 ई. में यूरोप में फ्रांस तथा इंग्लैण्ड के बीच संधि हो जाने पर भारत में भी दोनों कम्पनियों के बीच युद्ध समाप्त हो गया। दोनों ने एक दूसरे के प्रदेश और बंदी लौटा दिये। मद्रास फिर से अँग्रेजों को मिल गया। इस युद्ध के बाद फ्रांसिसी कम्पनी दक्षिण में दूसरी बड़ी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आई।

कनार्टक का दूसरा युद्ध (1749-54 ई.)

कनार्टक का दूसरा युद्ध के दो मुख्य कारण थे-

(1.) हैदराबाद तथा कर्नाटक की गद्दी के उत्तराधिकार का प्रश्न और

(2.) अँग्रेजों तथा फ्रांसिसियों की बढ़ती हुई राजनीतिक अभिलाषाएँ।

21 मई 1748 को हैदराबाद के निजाम आसफजाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र नासिरजंग उसका उत्तराधिकारी बना परंतु नासिरजंग के भतीजे मुजफ्फरजंग ने विद्रोह कर दिया। इसी तरह कर्नाटक में चांदा साहब ने नवाब अनवरूद्दीन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा। चांदा साहब कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन का बहनोई था।

डूप्ले ने हैदराबाद में मुजफ्फरजंग से और कर्नाटक में चांदा साहब से गुप्त संधि कर ली। अँग्रेज भी नासिरजंग और मुहम्मद अली के साथ मिलकर षड़यंत्र करते आ रहे थे। फ्रांसीसियों ने चांदा साहब को कर्नाटक का नवाब बना दिया परन्तु अँग्रेज मुहम्मद अली को नवाब बनाना चाहते थे।

इसलिये उन्होंने क्लाइव को एक छोटी सेना देकर अर्काट भेजा जहाँ दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में फ्रांसीसी सेना परास्त हो गई। डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया और गोडेहू को फ्रैंच इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा गया। मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया।

इस प्रकार कर्नाटक में अँग्रेजों का दबदबा स्थापित हो गया किन्तु हैदराबाद के निजाम ने फ्रांसीसियों को राजस्व वसूली के अधिकार दे दिये। इस धन से फ्रांसीसी अपनी सेना को बनाये रख सके और हैदराबाद में उनका दबदबा बना रहा। कर्नाटक के द्वितीय युद्ध में मिली असफलता के लिये फ्रांस की सरकार ने मॉरीशस के गवर्नर ला-बूर्डोने को जिम्मेदार ठहराया तथा उसे जेल में डाल दिया।

कर्नाटक का तीसरा युद्ध (1756-63 ई.)

1756 ई. में यूरोप में पुनः युद्ध छिड़ जाने से भारत में भी अँग्रेजों और फ्रांसीसियों में युद्ध आरम्भ हो गया। फ्रांस सरकार ने 1758 ई. में काउंट लाली को भारत भेजा। इस बीच अँग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल पर अधिकार कर लिया। काउंट लाली ने 1758 ई. में फोर्ट सेंट डेविड को जीत लिया और तंजौर पर आक्रमण कर दिया। इसमें लाली को सफलता नहीं मिली।

लाली ने मद्रास को जीतने का प्रयास किया किंतु उसमें भी सफलता नहीं मिली। उसने हैदराबाद से बुस्सी को बुलाया। ब्रिटिश अधिकारी पोकॉक के नेतृत्व में फ्रांस की सेना को कई स्थानों पर हराया गया। कर्नाटक में भी फ्रांसीसियों की हार हो गई। अँग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम से मछलीपट्टम् और उत्तरी सरकार के जिले छीन लिये।

जनवरी 1760 में ब्रिटिश सेनापति आयरकूट ने वैण्डिवाश नामक स्थान पर फ्रांसीसी सेना को परास्त करके बुस्सी को बंदी बना लिया। जनवरी 1760 में फ्रैंच सेनाएं पाण्डिचेरी लौट गईं। अँग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर भी घेरा डाला तथा आठ माह बाद उस पर अधिकार कर लिया। फ्रांसीसियों के माही क्षेत्र पर भी अँग्रेजों का प्रभुत्व हो गया।

इस प्रकार लगभग समस्त भारतीय फ्रैंच उपनिवेश फ्रांसीसियों के हाथ से निकल कर अँग्रेजों के पास चले गये। 1763 ई. में यूरोप में अँग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच सप्तवर्षीय युद्ध समाप्त होने पर यद्यपि फ्रांसीसियों को उनके उपनिवेश तो वापस मिल गये किन्तु उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ समाप्त हो गईं।

इसी बीच बंगाल में प्लासी और बक्सर के युद्धों के बाद अँग्रेजों ने बंगाल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उधर कर्नाटक में फ्रांसीसियों की पराजय से फ्रांसीसियों की शक्ति समाप्त हो गई तथा अँग्रेजों के लिये भारत में सत्ता स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय लगभग पूरे देश में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। चारों ओर लूटमार का वातावरण था। औरंगजेब की नीतियों के कारण केन्द्रीय सत्ता कमजोर चुकी थी तथा उसकी मृत्यु के बाद देश में विभिन्न अर्द्धस्वतंत्र एवं स्वायत्तशासी राज्यों का उदय हो चुका था।

मुगलों के पतन से उत्पन्न हुई राजनीतिक शून्यता को भरने के लिये मराठे सामने आये। इसी दौरान हुए अफगानी आक्रमणों ने तथा मराठों की आपसी फूट ने मराठा शक्ति को कमजोर कर दिया। यूरोपीय देशों से आई हुई कम्पनियां इस राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने तथा एक दूसरे को उन्मूलित करने के लिये जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता कर रही थीं।

अंत में अँग्रेज न केवल डचों और फ्रांसीसियों को भारत से उन्मूलित करने में सफल रहे अपितु उन्होंने मराठों तथा हैदराबाद, मैसूर एवं बंगाल आदि राज्यों के स्थानीय शासकों को परास्त करके भारत में राजीनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित होने में सफलता प्राप्त कर ली।

यूरोपीय देशों से आई हुई कम्पनियां भारत की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने तथा एक दूसरे को उन्मूलित करने के लिये जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता कर रही थीं। अंत में अँग्रेज न केवल डचों और फ्रांसीसियों को भारत से उन्मूलित करने में सफल रहे अपितु उन्होंने मराठों तथा हैदराबाद, मैसूर एवं बंगाल आदि राज्यों के स्थानीय शासकों को परास्त करके भारत में राजीनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित होने में सफलता प्राप्त कर ली।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

भारत की आर्थिक स्थिति

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भारत की आर्थिक स्थिति

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति अधिक अच्छी नहीं थी। औरंगजेब की कट्टर मजहबी नीतियों के कारण भारत में हर समय युद्ध चलते रहने से खेतियां और उद्योग धंधे उजड़ गए।

मुगल सेनाएं देश के जिस हिस्से में जाती थीं, किसानों की फसलें लूट लेती थीं या उनमें आग लगा देती थीं। उसके बाद मराठों ने भी देश की खेती को बहुत नुक्सान पहुंचाया। नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली भी भारत की सम्पदा को लूटकर ले जा चुके थे। इन सब कारणों से भारत की जनता गहरी निर्धनता में जी रही थी। फिर भी जिन क्षेत्रों में खेती नहीं उजड़ी थी और उद्योग धंधे चौपट नहीं हुए थे, वहाँ के लोग सुख से जीवन जी रहे थे।

जहाँ एक ओर यूरोपीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यूरोपीय जातियों ने भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये भारत में प्रवेश किया वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी और अँग्रेजों की शोषणकारी नीतियों ने भारत की आर्थिक स्थिति को पतन के गर्त में पहुँचा दिया।

ये दोनों ही बातें सही नहीं हैं। अँग्रेजों के आगमन के समय अर्थात् सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में भारत की आर्थिक स्थिति की चर्चा करते समय निम्नलिखित तथ्य ध्यान में रखे जाने चाहिये-

(1.) विगत 9 शताब्दियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा लगातार किये जा रहे आक्रमणों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो चुकी थी। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, चंगेजखाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली आदि आक्रांताओं द्वारा उत्तरी एवं पश्चिमी भारत में भयानक लूटमार मचाने, कत्ले आम मचाने तथा कामगारों को पकड़कर अपने देशों में ले जाने के कारण भारत के उद्योग-धंधों को गहरे घाव पहुँचे थे।

(2.) दिल्ली सल्तनत तथा मुगलिया सल्तनत के अधिकांश मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू किसानों, हिन्दू व्यापारियों एवं हिन्दू तीर्थ-यात्रियों पर अधिक से अधिक कर लगाये जाने तथा मुस्लिम व्यापारियों एवं किसानों को विभिन्न प्रकार के करों में छूट दिये जाने के कारण बहुसंख्य हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।

(3.) बाबर से लेकर अकबर तक के लगभग 80 साल के शासनकाल में तथा औरंगजेब के 50 साल के शासन काल में अनवरत युद्ध चलते रहे। इन युद्धों के चलते, देश में समृद्धि कैसे बची रह सकती थी! जहाँ-जहाँ मुगल सेनाओं का पड़ाव रहा अथवा जिन राज्यों पर उनके आक्रमण हुए, वहाँ-वहाँ की खेतियां उजड़ गईं, उद्योग धंधे ठप्प हो गये तथा लोग अपने घरों को छोड़कर दर-दर भटकने पर विवश हो गये। इन कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी।

(4.) किसानों तथा उनके परिवारों के द्वारा हाड़-तोड़ मेहनत करके जो अनाज उगाया जाता था, उसे बादशाहों, नवाबों, राजाओं तथा जागीरदारों के आदमियों द्वारा कर के रूप में लूट लिया जाता था। भू-राजस्व एवं कर चुकाने के बाद किसानों तथा उनके परिवारों के पास पेट भरने के लिये पर्याप्त अनाज नहीं बचता था।

(5.) केन्द्रीय मुगल शासन की अराजकता, प्रांतीय मुस्लिम शासकों की कट्टरता, लगातार हो रहे अफगानी आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट, व्यापारिक चुंगी, स्थानीय करों की अधिकता तथा हिन्दुओं के साथ धार्मिक भेदभाव के उपरांत भी खेती तथा कुटीर धंधे केवल इसलिये चल रहे थे और लोग इसलिये जीवित थे कि जन साधारण में पूरा परिवार, साल प्रत्येक दिन और दिन के अधिकांश समय में किसी न किसी काम में लगा रहता था।

(4.) चारों ओर मची हुई लूट-मार के कारण बादशाहों, सूबेदारों, राजाओं एवं जागीरदारों के पास धन की आवक लगी रहती थी तथा जन साधारण दिन पर दिन निर्धन होता जा रहा था।

भारत की आर्थिक स्थिति

भू-स्वामित्व

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में सिद्धान्ततः शासक समस्त भूमि का स्वामी था परन्तु व्यावहारिक रूप में भूमि पर काश्त करने वाले जब तक भूमि कर (लगान) देते रहते थे, तब तक वे भूमि के मालिक बने रहते थे। सामान्य रूप से किसान न तो भूमि को बेच सकते थे और न उससे अलग हो सकते थे।

डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी का मत है कि किसानों को जमीन बेचने और बन्धक रखने जैसे अधिकार नहीं थे। फिर भी किसानों का एक वर्ग जिसे मौरूसी कहा जाता था, इस प्रकार के अधिकारों का दावा करता था, जिन्हें दखलदारी का अधिकार (ओक्यूपेंसी राइट्स) कहा जा सकता है।

सामान्यतः किसानों को बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों का उनके खेतों पर उत्तराधिकार होता था। कुछ ऐसे किसान भी थे जो जमींदारों की अनुमति से खेत जोतते थे। उन्हें जमींदार अपनी इच्छा से कभी भी बेदखल कर सकता था। वस्तुतः कृषकों का वर्गीकरण कई स्तरों एवं श्रेणियों में हो सकता था।

भूमि की श्रेणियाँ और किस्म

कृषि भूमि को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था- (1.) खालसा भूमि और (2.) गैर-खालसा भूमि (जागीर, सासण आदि)। मुगलों के शासनकाल में जागीरदार अर्द्ध-स्वतंत्र शासक थे। बादशाह उनके आन्तरिक शासन में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता था। खालसा भूमि बादशाह के नियंत्रण में होती थी।

मालगुजारी निश्चित करने के लिये भूमि को पोलज, परती, चाचर एवं बंजर में बाँटा गया था। यह वर्गीकरण भूमि को जोतने पर आधारित था। पोलज वह भूमि थी जिसे प्रत्येक वर्ष जोता जाता था। परती भूमि को कुछ समय के लिये बिना जोते ही छोड़ दिया जाता था। चाचर भूमि तीन-चार साल के लिए बिना जोते हुए छोड़ दी जाती थी।

बंजर भूमि वह थी जिस पर पाँच साल से भी अधिक समय तक कोई उपज नहीं होती थी। प्रथम दो प्रकार की भूमियों (पोलज तथा परती) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया- अच्छी, मध्यम और खराब। इन तीनों श्रेणियों की प्रति बीघा औसत उपज को पोलज तथा परती के प्रति बीघा की सामान्य उपज मान लिया गया था।

इन दोनों श्रेणियों की भूमि में विशेष अन्तर नहीं था; क्योंकि जिस वर्ष भी परती भूमि पर खेती की जाती थी, उसकी उपज पोलज के समान ही हुआ करती थी। चाचर भूमि में जब पहले साल खेती होती थी तो निश्चित दर का 2/5 भाग लिया जाता था और पाँच साल खेती होने के पश्चात् उस पर सामान्य दर से मालगुजारी ली जाती थी। बंजर भूमि पर भी पाँच साल के बाद पूरी दर से मालगुजारी ली जाती थी।

कृषि का तरीका और फसलें

अँग्रेजों के भारत में आने के समय पुराने ढंग से खेती की जाती थी। कृषि कार्यों में हल, खुरपी, पटेला, हंसिया तथा बैलों की जोड़ी काम में लाये जाते थे। अधिकांशतः खेती वर्षा पर निर्भर थी। सिंचाई के लिये बहुत कम नहरें उपलब्ध थीं। वर्षा के अभाव में प्रजा संतप्त हो जाती थी।

किसानों का जीवन कष्टमय तथा मंथर गति से चलने वाला था। ग्रामवासियों की आवश्यकताएँ गाँव में ही पूर्ण होती थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना नियत कार्य करता था। किसान खेत जोतता, बोता तथा काटता था। उस समय की मुख्य फसलों में गेहूं, बाजरा, मक्का, चावल, कपास, मटर, तिलहन, गन्ना आदि थे।

फलों में आम, अँगूर, अनार, केले, खरबूजा, अंजीर, नींबू, खिरनी, जामुन आदि होते थे। औषधीय फसलों में जड़ी-बूटियाँ, मसाले और सुगन्धित काष्ठ उत्पन्न होते थे। अनाज-भण्डारण का सामान्य तरीका गड्ढों या खत्तियों में रखने का था जिससे अनाज लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।

किसानों की स्थिति

अँग्रेजों के आगमन के समय भारत में किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी। राजनीतिक अस्थिरता, मराठों द्वारा की जाने वाली लूटपाट तथा केन्द्रीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण स्थानीय शासक किसानों से बलपूर्वक कर वसूल करते थे। जिन क्षेत्रों पर मराठों के आक्रमण अधिक होते थे, वहाँ किसानों की स्थिति अधिक खराब थी।

जब किसान स्थानीय शासक को कर चुका देते थे तो मराठे चौथ वसूली के लिये आ धमकते थे और यदि मराठे पहले लूट लेते थे तो बाद में स्थानीय शासक कर मांगता था। इस कारण बहुत से स्थानों पर खेती उजड़ गई थी। अठारहवीं शताब्दी में किसान का जीवन दरिद्र, घिनौना, दयनीय तथा अनिश्चित था। बहुत से किसान बर्बाद होकर डाकू बन जाते थे जो बड़े-बड़े दल बनाकर, प्रजा को लूटते फिरते थे।

शिल्प तथा उद्योग

भारत के गाँवों, कस्बों तथा शहरों में काम करने वाले शिल्पी तथा उद्यमी अपने पुराने जातिगत एवं परम्परागत कार्य करते थे। उनके औजार भी बहुत पुराने ढंग के थे। देश में बड़े पैमाने पर किसी उद्योग का विकास नहीं हुआ था। अधिकांश उद्योग स्थानीय रूप में थे जो पिता से पुत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किये जाते थे।

देश के कई शहर और क्षेत्र अपने विशिष्ट और श्रेष्ठ उत्पादों के लिये प्रसिद्ध हो गये थे। कई शाही कारखाने भी थे जो फारस देश के ढंग के अनुसार मुस्लिम शासकों द्वारा स्थापित किये गये थे। इन कारखानों में शाही तथा दरबारी लोगों की आवश्यकता की चीजें बनाई जाती थी।

इनमें सुनार, किमखाब या रेशम तैयार करने वाले, कसीदाकारी करने वाले, चित्रकार, दर्जी, मलमल तथा पगड़ी बनाने वाले इत्यादि अनेक प्रकार के कारीगर होते थे, जो साथ मिलकर तथा अलग-अलग काम करते थे। प्रान्तों में भी स्थानीय माँग के अनुसार विभिन्ना प्रकार की वस्तुएं बनाने के कारखाने थे। इनमें बनने वाली वस्तुएं उच्च अधिकारियों को भेंट की जाती थीं।

व्यापार एवं वाणिज्य

भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय व्यापार एवं वाणिज्य के विषय में बहुत ही कम जानकारी मिलती है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार अँग्रेजों के आगमन के समय भारत का आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नति पर था। देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के पश्चात् जो सामग्री शेष बचती, उसका निर्यात किया जाता था।

यातायात एवं परिवहन की समस्या व्यापारियों तथा सामान ले जाने वाले साधनों के द्वारा पूर्ण हो जाती थी। देश में व्यापार के लिये अनेक मार्ग थे जो स्थानीय शासक द्वारा कर लेकर सुरक्षित रखे जाते थे।

आन्तरिक व्यापार

अँग्रेजों के आगमन के समय राजनीतिक अस्थिरता होने के उपरांत भी, भारत का आन्तरिक व्यापार काफी विस्तृत था। इस समय भी वैश्य वर्ग प्रमुख व्यापारी था। उत्तर भारत में व्यापार गुजरातियों एवं मारवाड़ियों द्वारा तथा दक्षिण में चेतियों द्वारा होता था। प्रत्येक गाँव में छोटा बाजार होता था, जहाँ छोटी-छोटी वस्तुओं का व्यापार होता था।

कुछ दुकानें चलती-फिरती होती थीं, जो घोड़े की पीठ पर लगाई जाती थीं। महत्त्वपूर्ण वस्तुओं का व्यापार शहर की मण्डियों में होता था। विभिन्न स्थानों पर साल भर में कुछ निश्चित मेले लगते थे जिनमें दूर-दूर से व्यापारी आते थे और खूब व्यापार होता था। फेरी लगाकर माल बेचने वाले तथा इस प्रकार के अन्य व्यापारी भी उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करते थे।

बन्जारों के काफिले बैलों पर अनाज, चीनी, नमक आदि लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते थे। कई बार ये काफिले 20 से 30 हजार बैलों के होते थे। व्यापारी भी काफिलों में इधर-उधर जाते थे। भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारी गुजराती, मारवाड़ी और मुल्तानी थे। विदेशी मुसलमान व्यापारियों को खुरासानी कहा जाता था। वे मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली जैसे बड़े नगरों के बाजारों में माल की आपूर्ति करते थे।

माल परिवहन के साधन

उस काल में परिवहन के साधन बहुत कम थे। व्यापारिक माल प्रायः कच्ची एवं धूलभरी सड़कों से ले जाया जाता था। शासकों द्वारा मार्ग के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये जाते थे। यात्रियों एवं व्यापारियों की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर सरायें बनाई जाती थीं। इन स्थानों पर पशुओं के लिये चारा एवं पेयजल भी उपलब्ध रहता था।

यात्रियों एवं व्यापारियों को मार्ग दिखाने के लिये छोटी-छोटी अटारी अथवा मीनार बने हुए थे। राजपूताने के भाट एवं चारण, खतरनाक सड़कों पर काफिलों का मार्ग-दर्शन तथा सुरक्षा करते थे। नदियां भी माल के परिवहन के लिये सस्ता साधन थीं। काश्मीर, बंगाल, सिन्ध तथा पंजाब में अधिकांश सामान नदी मार्ग से परिवहन किया जाता था।

बंगाल में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियां, नेपाल की तराई में गण्डक, बिहार में कोसी, पंजाब में रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास, मध्य भारत में नर्मदा तथा चम्बल, दक्षिण में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि विभिन्न नदियों के माध्यम से बड़ी मात्रा में व्यापारिक माल का परिवहन होता था।

बंगाल में नावों के बड़े बेड़े होते थे। यमुना में चौरस पेंदी की कुछ नावें 100 टन तक भारी होती थीं। गंगा में 400-500 टन भारी नावें चलती थीं। थट्टा से लाहौर तक जाने में 6-7 सप्ताह का समय लगता था, जबकि वापसी यात्रा में केवल 18 दिन लगते थे।

सड़कों पर सुरक्षा

केन्द्रीय, प्रान्तीय एवं स्थानीय शासक अपने-अपने क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने में रुचि लेते थे ताकि उनके क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आ सके तथा सरकार को अधिक आय हो सके। इस कारण सड़कों को सुरक्षित बनाने के प्रयत्न किये जाते थे परन्तु फिर भी लुटेरों का भय बना रहता था। इसलिये व्यापारी अपने काफिलों के साथ सशस्त्र सुरक्षा प्रहरी रखते थे तथा स्थानीय शासकों को शुल्क देकर उनसे सुरक्षा प्राप्त करते थे।

चुंगी

आंतरिक एवं बाह्य व्यापार हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाने एवं बाजार में विक्रय करने पर स्थान-स्थान पर चुंगी ली जाती थी। चुंगी के अतिरिक्त समस्त बड़े बाजारों तथा बन्दरगाहों पर अन्य शुल्क भी देने पड़ते थे। औरंगजेब ने इसकी मात्रा हिन्दू व्यापारियों के लिये पहले की अपेक्षा दो गुनी कर दी तथा मुसलमान व्यापारियों के लिये बिल्कुल हटा दी। इस कारण हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था।

व्यापार का स्वरूप

अँग्रेजों के आगमन के समय देश के विभिन्न भागों के बीच व्यापार की स्थिति अच्छी थी। एक स्थान पर उत्पन्न होने वाली सामग्री को देश के विभिन्न भागों एवं देश से बाहर भेजा जाता था। बंगाल, से खाद्य वस्तुएँ, चावल, चीनी तथा मक्खन का समुद्री व्यापार होता था।

ये वस्तुएँ कोरोमंडल, केपकामरिन के क्षेत्र से होती हुई कराची तक जाती थीं। बंगाल से चीनी गुजरात को तथा गेहूं दक्षिण भारत को जाते थे। पटना को चावल और सिल्क के बदले में गेहूं, चीनी तथा अफीम प्राप्त होती थी। केरल अफीम का आयात करता था। सत्रहवीं सदी में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिये आगरा अत्यंत प्रसिद्ध केन्द्र था।

यह बंगाल और बिहार से कच्ची सिल्क, चीनी, चावल, गेहूं तथा मक्खन आदि वस्तुओं का व्यापार करता था। आगरा, देश तथा विदेशों में उत्तम प्रकार के नीले रंग के लिये बहुत प्रसिद्ध था। इसके समीपवर्ती क्षेत्रों जैसे- हिन्दुआन, बयाना, पंचूना, बिसौर तथा खनवा में गेहॅूँ पैदा होता था। यहाँ से गेहूं भारत के विभिन्न बन्दरगाहों तथा विदशों को भेजा जाता था।

व्यापार के अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र लाहौर तथा मुल्तान थे। वास्तव में काबुल, कन्धार तथा फारस से होने वाला समस्त स्थल व्यापार इन नगरों से होकर होता था। लाहौर अपनी दरियों के लिये प्रसिद्ध था जबकि मुल्तान चीनी, अफीम, सूती माल तथा गन्धक के लिये प्रसिद्ध था। मुल्तान में सर्वोत्तम ऊँट उपलब्ध होते थे।

गुजरात प्राचीनकाल से वाणिज्य का बड़ा और महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा उद्योगों ने इसे बंगाल की तरह धनी प्रांत बना दिया था। यह कपड़े की बुनाई का केन्द्र था। यहाँ के कपड़े गुजरात के मुख्य बंदरगाह कैम्बे द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के दूसरे भागों को भेजे जाते थे।

नील, शोरा तथा वस्त्रों के बदले विदेशी व्यापारी पश्चिम से विविध प्रकार की प्रसाधन सामग्री लाते थे जिन्हें गुजरात, दिल्ली, आगरा, राजस्थान तथा मालवा के हुजूर में भेजा जाता था। केरल काली मिर्चों का निर्यात तथा अफीम का आयात करता था। केरल में गुजरात, मालवा और अजमेर से गेहूं तथा दक्षिण व मलाबार से चावल मँगाया जाता था।

पुलीकट का छपा हुआ कपड़ा बहुत बढ़िया होता था जो गुजरात तथा मलाबार तट को भेजा जाता था। सिन्ध से भारत के विभिन्न भागों में गेहॅूँ, जौ, सूती कपड़े तथा घोड़े भेजे जाते थे और बदले में चावल, चीनी, इमारती लकड़ी तथा मसाले मँगाये जाते थे।

काश्मीर में गुजरात, रावलपिंडी तथा लद्दाख से नमक, बुरहानपुर से अच्छा चावल तथा देश के विभिन्न भागों से चौड़े वस्त्र, गेहूं, दवाएँ, चीनी, तांबा, लोहा, तांबा, पीतल के बर्तन, शीशे का सामान, सोना, चाँदी और विलास की सामग्री मंगाई जाती थी। काश्मीर से आगरा तथा अन्य स्थानों को शॉल, ऊन तथा शोरा निर्यात होता था। इस प्रकार भारत के लगभग समस्त नगरों एवं विभिन्न राज्यों की राजधानियों के बीच उपयोगी वस्तुओं का व्यापार प्रचुर मात्रा में होता था।

विदेशी व्यापार

भारत का विदेशी व्यापार अत्यंत प्राचीन काल से विश्व भर के देशों से होता आया था। अँग्रेजों के भारत आगमन के समय भी लंका, बर्मा, चीन, जापान, पूर्वी द्वीप समूह, नेपाल, फारस, मध्य एशिया, अरब और लालसागर के बन्दरगाहों तथा पूर्वी अफ्रीका से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था।

कैम्बे, सूरत, भड़ौंच, गोआ, कालीकट, कोचीन, मछलीपट्टम, सतगाँव, सोनारगाँव तथा चटगाँव उस युग के प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। लाहौर, मुल्तान, लाहरी बन्दर (सिन्ध), कैम्बे, पटना, अहमदाबाद तथा आगरा में बड़े-बड़े बाजार थे जहाँ विदेशों से वस्तुएँ आती थीं और फिर देश के विभिन्न भागों को भेजी जाती थीं। भारतीय वाणिज्य पूरी दुनिया की आंखों में चौंध पैदा करता था।

इसी से प्रेरित होकर रूस के शासक पीटर महान (1682-1725 ई.) ने एक बार कहा था- ‘याद रखो कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और …….. जो उस पर पूरा अधिकार कर सकेगा, वही यूरोप का अधिनायक होगा।’

समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार

भारत को पश्चिमी देशों से मिलाने वाले दो मुख्य समुद्री मार्ग थे- (1.) फारस की खाड़ी से होकर तथा (2.) लालसागर से होकर। लालसागर वाला मार्ग थोड़ा दुष्कर था, अतः नाविक तथा सौदागर फारस की खाड़ी वाले मार्ग को पसन्द करते थे। यह मार्ग ईराक में बगदाद से आरम्भ होकर चीन में केन्टन तक जाता था।

मनूची (1653-1708 ई.) ने लिखा है- ‘अरब तथा फारस के जहाज खजूर, फल, घोड़े, समुद्री मोती तथा रत्न भारत में लाते थे, बदले में गुड़, चीनी, मक्खन, जैतून के फल तथा नारियल ले जाते थे।’

 भारत से कपड़ों का निर्यात प्रमुख रूप से होता था जबकि बहुमूल्य धातुएं, विभिन्न प्रकार के बर्तन एवं विविध उपयोगी सामग्री में प्रयुक्त होने वाली धातुएं, सौन्दर्य एवं प्रसाधन सामग्री बड़े स्तर पर आयात की जाती थी। भारतीय माल कोरोमण्डल समुद्री तट के रास्ते से फारस ले जाया जाता था।

भारत में अँग्रेजों के आगमन के समय भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपास से निर्मित कपड़ा एवं अन्य वस्तुएँ, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लंवग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें विशेषकर गेंडे तथा चीते की खाल, चन्दन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थी। विदेशों में भारतीय कपड़ों की अच्छी माँग थी। फारस तथा मिस्र आदि अरब देशों को उत्तम प्रकार की मलमल निर्यात होती थी।

मोरलैण्ड के अनुसार 17वीं शताब्दी में रुई के सामान का वार्षिक निर्यात लगभग 8000 गाँठें था जिनमें से 4,700 गाँठें यूरोपीय देशों को जाती थीं। इसी शताब्दी के अन्त में भारतीय ताफता (सिल्क) तथा बूटेदार कपड़ा इंग्लैण्ड को निर्यात होने लगा था।

लाख (गोंद) बंगाल तथा उड़ीसा में कई स्थानों पर बनाई जाती थी जिसका निर्यात डचों द्वारा फारस को किया जाता था। बर्मा, जावा, चीन, मलाया तथा अरब को समुद्री मार्ग से भारतीय अफीम एवं काली मिर्च का निर्यात होता था। फारस एवं उसके आगे के देशों को स्थल मार्ग से अफीम एवं वस्त्र आदि वस्तुओं का निर्यात होता था। भारत से दुनिया भर के देशों को चीनी, शोरा, लोहा, इस्पात, हींग, आँवला, दवाएँ, बहुमूल्य पत्थर तथा संगमरमर भी निर्यात किया जाता था।

भारत में बहुमूल्य धातुओं का आयात किया जाता था। वान् ट्विस्ट (1638 ई.) ने लिखा है कि भारत में सोने तथा चाँदी की खानें नहीं थीं, इसलिये विदेशों से ये दोनों धातुएँ आयात की जाती थीं तथा उनके निर्यात पर रोक थी।

एक अँग्रेज यात्री विलियम हार्किज (1608-13 ई.) ने लिखा है- ‘भारत में चाँदी प्रचुर मात्रा में है क्योंकि यहाँ समस्त देश सिक्के लाते हैं और उनके बदले में वाणिज्यिक वस्तुएँ ले जाते हैं। ये सिक्के भारत में ही रखे जाते हैं, बाहर नहीं जाते हैं।’

चीन, जापान, मलक्का तथा अन्य समीपवर्ती देशों से सोना मंगवाया जाता था। पेगू (बर्मा) से मूँगा तथा मोती एवं फारस तथा अरब देशों से विभिन्न प्रकार के रत्न मंगवाये जाते थे। लिस्बन से पारा आयात किया जाता था।

स्थल मार्ग द्वारा व्यापार

भारत में मध्य एशिया और अफगानिस्तान से सूखे मेवे तथा ताजे फल, अम्बर हींग, खुरखुरे लाल पत्थर आदि का आयात होता था। नेपाल से पशु तथा सींग, कस्तूरी, सोहागा, चिरैता (औषधि की जड़ी-बूटी), मजीह (रंग), इलायची, चौरीस (तिब्बती गाय की पूंछ), महीन रोंये, बाज पक्षी तथा बालचर (एक सुगन्धित घास) मंगवाया जाता था।

भूटान से कस्तूरी तथा तिब्बती गाय की पूंछ का आयात होता था। पुर्तगाली डाकुओं की गतिविधियों के कारण बर्मा के साथ व्यापार में कमी आ गई थी। घोड़े आयात की महत्त्वपूर्ण वस्तु थे। तुर्किस्तान में रहने वाले अजाक लोग भारत में बेचने के लिये बड़े स्तर पर घोड़े पालते थे। ये घोड़े 6,000 अथवा इससे बड़े झुण्ड में भारत को भेजे जाते थे।

व्यापार संतुलन

व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में था। समस्त देशों के व्यापारी, भारतीय बन्दरगाहों पर आते थे तथा विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं- छींट के कपड़े,  मसाले, काली मिर्च, गेहूँ, घी, जड़ी-बूटियाँ और गोंद आदि के बदले में सोना, चांदी तथा रेशम देते थे।

इसलिये भारत को बहुमूल्य धातुओं का कुण्ड कहा जाता था। व्यापार संतुलन को भारत की बजाय, यूरोप के पक्ष में करने के लिये ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी निर्यात सूची को बढ़ाने का आदेश दिया। इंग्लैण्ड में भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे की इतनी अधिक माँग थी कि उससे इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी।

इसलिये ब्रिटिश संसद ने विशेष कानून बनाकर 29 सितम्बर 1701 से फारस, चीन तथा पूर्वी हिन्द द्वीप समूह के चित्रित, छपे हुए एवं रंगे हुए लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा दी।

वास्कोडिगामा के भारत आगमन के बाद लगभग एक शताब्दी (1500-1600 ई.) तक भारतीय विदेशी व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। पुलीकट, कासिम बाजार, पटना, बालोसर, नागपट्टम तथा कोचीन में पुर्तगालियों की मुख्य फैक्ट्रियाँ थीं। अरब देशों के व्यापारी जो भारत में आने वाले प्रमुख विदेशी व्यापारी थे, लगभग पूरी तरह हटा दिये गये।

हॉलैण्ड वाले भी 1603 ई. में भाग लेने लगे थे। इससे यूरोपीय देशों के साथ भारतीय व्यापार में वृद्धि हुई। अंग्रजों ने 1608 ई. में पहली बार भारत के लिये व्यापारिक यात्रा की। वे अपने साथ पांच जहाजों में कपड़े, टीन, शीशे, चामू-कैंची की वस्तुएँ, पारा, शीशा तथा चमड़ा लेकर आये।

उन्होंने भारत में अलग-अलग स्थानों पर गोदाम स्थापित किये जिन्हें अँग्रेज व्यापारी फैक्ट्रियाँ कहते थे तथा भारतीय व्यापारी कारखाना कहकर पुकारते थे। फ्रांस ने भी भारत में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं। इन फैक्ट्रियों से मांग के अनुसार माल की आपूर्ति नहीं हो सकी इसलिये यूरोपीय व्यापारियों द्वारा भारत के मुख्य वाणिज्यिक केन्द्रों पर एजेन्ट नियुक्त किये गये। उनके माध्यम से देश के विभिन्न भागोंसे व्यापार किया जाने लगा।

उद्योगों की स्थिति

भारत में अँग्रेजी शासन की स्थापना के पहले भारतीय कुटीर एवं लघु उद्योग उन्नत अवस्था में थे। सत्रहवीं और अठारवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देश स्वदेशी उद्योगों के लिये बाहर के देशों में भी विख्यात था। भारतीय माल की विदेशों में बड़ी माँग थी। देश में दो तरह के उद्योग विकसित थे- ग्रामीण उद्योग तथा शहरी उद्योग।

ग्रामीण उद्योग आम आदमी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शहरी उद्योगों द्वारा कला-कौशलपूर्ण वस्तुओं का निर्माण होता था। ये उद्योग विलासिता का सामान बनाने में अग्रणी थे। देश के कपास उत्पादक क्षेत्रों, दूरस्थ गाँवों और शहरों में कपड़ा तैयार किया जाता था।

गांव-गांव और शहर-शहर में हाथकरघा पर मोटा कपड़ा यथा गाढ़ा एवं रेजी तैयार किये जाते थे। विभिन्न शिल्पों में लगे कारीगरों में से लगभग दो-तिहाई बुनकर थे। ग्रामीण उद्योगों की तुलना में नगरीय उद्योग अधिक संगठित थे और गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक अच्छा माल तैयार करते थे।

कपड़ा उद्योग

भारतीय बुनकर नरम से नरम, महीन से महीन और मोटे से मोटा कपड़ा तैयार करने के लिये प्रसिद्ध थे। महीन कपड़े में मलमल सबसे विख्यात थी। इसके उत्पादन का मुख्य केन्द्र ढाका था। ढाका की मलमल विश्व भर में प्रसिद्ध थी। बीस गज लम्बे और एक गज चौड़े मलमल को एक अँगूठी में से निकाला जा सकता था।

इस प्रकार की मलमल का थान तैयार करने में 6 माह लगते थे। आम उपयोग का कपड़ा गाँव-गाँव और शहर-शहर में बनाया जाता था परन्तु विशेष प्रकार का कपड़ा कुछ स्थानों पर ही तैयार होता था।

इस प्रकार के केन्द्रों में ढाका, जहानाबाद (पटना के पास), बुलन्दशहर, सिकन्दराबाद, लखनऊ, बनारस, रायबरेली में जायस, फैजाबाद में पांडा, रामपुर, मुरादाबाद, कानपुर, प्रतापगढ़, शाहपुर, अलीपुर, मेरठ, आगरा, दिल्ली, रोहतक, ग्वालियर, चंदेरी, इन्दौर और दक्षिण भारत में आर्नी, हैदराबाद, रायचूर, सेलभ, तंजौर तथा मदुरा विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।

इन केन्द्रों पर विभिन्न डिजाइनों और किस्मों का अच्छा कपड़ा तैयार होता था। देश में कताई-बुनाई रंगाई, छपाई, सोना एवं चाँदी के धागों का निर्माण भी बड़े स्तर पर होता था।

रेशम वस्त्र उद्योग

भारत में बहुत कम रेशम पैदा होता था इसलिये रेशम का बाहर से आयात किया जाता था किंतु भारत में बना रेशम का कपड़ा पुनः बड़ी मात्रा में निर्यात किया जाता था। बनारस, आगरा, लाहौर, पाटियाला, अमृतसर, राजशाही, मुर्शीदाबाद, वीरभूमि, बर्दवान, बांकुड़ा और मिदनापुर रेशमी वस्त्र निर्माण के प्रसिद्ध केन्द्र थे।

बनारस और आगरा वस्त्रों पर कढ़ाई के लिये तथा सबसे बढ़िया रेशमी वस्त्र के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध थे। ऊनी वस्त्र उद्योग भी उन्नत अवस्था में था। पंजाब और राजस्थान में मोटे ऊनी कम्बल, गलीचे, रस्से आदि बनते थे। लाहौर, लुधियाना और अमृतसर में अनेक प्रकार की ऊनी वस्तुएँ- कम्बल, शॉल, कोट, मोजे, दस्ताने और सर्दियों में काम आने वाले अन्य कपड़े बनते थे। जयपुर, बीकानेर और जोधपुर के ऊनी कपड़े प्रसिद्ध थे।

लौह उद्योग

भारत का लौह उद्योग काफी उन्नत था। भारत के लुहार लोहे की गलाई और ढलाई के कार्य में निपुण थे। स्थान-स्थान पर शस्त्र निर्माण, तोप निर्माण, जहाज निर्माण एवं कृषि उपकरण निर्माण के उद्योग थे। भारत में लोहे से बनी सामग्री लंदन तक जाती थी। महाराष्ट्र, आंध्र और बंगाल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित हुआ। यूरोपीय कम्पनियाँ अपने उपयोग के लिये भारत में बने जहाज खरीदती थी।

एक अंग्रेजी पर्यवेक्षक ने लिखा है- ‘जहाज निर्माण में भारतीयों ने अँग्रेजों से जितना सीखा, उससे अधिक उन्हें पढ़ाया।’

मिट्टी के बर्तन एवं मूर्तियाँ

भारत में मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और खिलौने बनाने का उद्योग भी विकसित था। बंगाल में खुलना, दिनाजपुर, रानीगंज; उत्तर प्रदेश में लखनऊ, रामपुर और अलीगढ़, दक्षिण में मद्रास, मदुरा और सेलम के कुम्हार विशेष किस्म के कलात्मक और मिट्टी के पक्के बर्तन बनाने में दक्ष थे।

विविध उद्योग

लगभग पूरे देश में भवन-निर्माण, पत्थर और लकड़ी की नक्काशी, ईंट और चूना बनाने, कागज बनाने, सोना-चाँदी तथा जवाहरात के आभूषण बनाने, चीनी, नमक एवं नील बनाने, तांबा, पीतल, काँसा आदि की वस्तुएँ एवं बर्तन बनाने के उद्योग विकसित अवस्था में थे। विभिन्न प्रकार के बीजों से तेल निकालने का काम बड़े स्तर पर होता था। बाँस और चमड़ा उद्योग भी लोकप्रिय था। बाँस से विभिन्न वस्तुएँ बनाने का काम कुछ जातियों का वंशानुगत व्यवसाय था।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अँग्रेजों के भारत आगमन के समय, नौ सौ साल से चल ही विदेशी आक्रांताओं की लूट के उपरांत भी, बादशाहों, अमीरों, राजाओं तथा जागीरदारों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी तथा उनके महलों में विलासिता के समस्त साधन उपलब्ध थे।

देश में नहरों, कुओं तथा तालाबों की कमी के बावजूद वर्षा की मात्रा अच्छी होने से देश के अधिकांश भागों में खेती की जाती थी। घर-घर में कुटीर उद्योग विकसित थे जिनमें विपुल मात्रा में विविध प्रकार की सामग्री तैयार की जाती थी। विदेशी व्यापार उन्नत होने से शासकों को कर के रूप में अच्छी आय होती थी। आंतरिक एवं विदेशी व्यापार बहुत होता था।

विदेशी व्यापार भारत के पक्ष में था। भारत के कुटीर उद्योग देश-वासियों की आवश्यकताओं को पूरी करने के साथ-साथ विदेशों को निर्यात किये जाने के लिये भी माल तैयार करते थे। सूती, ऊनी, रेशमी वस्त्र, शाल-दुशालें, चन्दन की वस्तुएँ, कागज, जूते, बक्से, चमड़ा, चीनी, नील, रंग, लकड़ी की वस्तुएँ, सोना-चाँदी के आभूषण, विलासिता की वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं।

इतना होने पर भी देश में जन साधारण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। किसान हाड़तोड़ परिश्रम करके खेती करते थे। छोटे कारीगर हाथ से सामग्री का उत्पादन करते थे। इस उत्पादन के लाभ का अधिक हिस्सा कर के रूप में शासक और मुनाफे के रूप में बड़े व्यापारी लूट लेते थे।

भू-राजस्व कर के साथ-साथ चुंगी एवं स्थानीय करों की अधिकता थी। इस कारण बादशाह, सूबेदार, राजा एवं जागीरदारों के पास काफी धन एकत्र हो जाता था किंतु जन साधारण अभावों एवं कष्टों से बिलबिला रहा था। पूरा परिवार हर समय किसी न किसी काम में लगा रहता था फिर भी दो समय की रोटी का प्रबंध करना कठिन था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – यूरोपियन जातियों के आगमन के समय भारत की स्थिति

यूरोपीय जातियों का आगमन

अँग्रेजों का भारत आगमन

क्षेत्रीय राज्यों का उदय

मराठा शक्ति

पानीपत का तीसरा युद्ध

अँग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिस्पर्धा

भारत की आर्थिक स्थिति

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

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मध्यकालीन भारत का इतिहास - अनुक्रमणिका

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक की अनुक्रमणिका दी गई है। नीचे दिए गए अध्यायों पर क्लिक करके उन उध्यायों तक सीधे ही पहुंचा जा सकता है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित यह पुस्तक अमेजन पर ईबुक तथ प्रिण्टेड बुक के रूप में भी उपलब्ध है। मध्यकालीन भारत का इतिहास संघर्ष का इतिहास है। इस काल में भारत के लोग इस्लाम के आक्रमण से स्वयं को बचाने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं। इस काल के भारतीय राजवंशों का इतिहास भी इस्लाम प्रतिरोध का इतिहास है।

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

मध्यकालीन भारत का इतिहास – अनुक्रमणिका

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास

मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

गुलाम वंश

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

खिलजी वंश का उत्थान और पतन

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

तैमूरलंग का भारत आक्रमण एवं उसके प्रभाव

तुगलक वंश का उत्थान और पतन

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ

मुहम्मद तुगलक का शासन एवं विफलताएँ

मुहम्मद तुगलक का चरित्र

मुहम्मद तुगलक पालक था?

सुल्तान फीरोजशाह तुगलक

फीरोजशाह तुगलक की धार्मिक नीति

फीरोजशाह तुगलक का शासन प्रबंध

फीरोजशाह तुगलक का चरित्र

फीरोजशाह का मूल्यांकन

तुगलक राज्य का पतन

सैयद वंश एवं लोदी वंश

सैयद वंश का शासन

लोदी वंश का शासन

दिल्ली सल्तनत का पतन

दिल्ली सल्तनत का पतन और उसके कारण

प्रान्तीय राज्यों का उद्भव

बहमनी राज्य

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास

विजयनगर राज्य

विजयनगर की सामाजिक दशा

विजयनगर राज्य का पतन

मध्यकालीन कला एवं साहित्य

मध्यकालीन कला एवं स्थापत्य

मध्यकालीन साहित्य

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन

भारत में सूफी सम्प्रदाय

मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

द्वितीय अफगान साम्राज्य

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी के कार्यों का मूल्यांकन

शेरशाह के उत्तराधिकारी

सूरी साम्राज्य का पतन

मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

मुख्य आलेख – शाहजहाँ

शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों की मनसबदारी प्रथा

मुगलों की जागीरदारी प्रथा

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुख्य आलेख – मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

मुख्य आलेख – मुगल कालीन कलाएँ

मुगलकालीन स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य का स्वर्ण काल अर्थात् शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

पतनोन्मुख मुगल स्थापत्य कला

मुगलकालीन साहित्य

मुगल कालीन चित्रकला एवं मूर्तिकला

राजपूत राज्यों का प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों का प्रशासन

राजपूतों का राजस्व प्रशासन

राजपूतों की न्यायिक व्यवस्था

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

राजपूत राज्यों में समाज

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास

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भूमिका - मध्यकालीन भारत का इतिहास

भूमिका – मध्यकालीन भारत का इतिहास पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक मध्यकालीन भारत का इतिहास की विषय-वस्तु स्पष्ट की गई है।

अध्ययन की सुविधा के लिए भारत के इतिहास को दो भागों में विभक्त किया जाता है- (1.) पुरा ऐतिहासिक काल, (2.) ऐतिहासिक काल। पुरा ऐतिहासिक काल में पाषाणीय मानव बस्तियों के आरम्भ होने से लेकर वैदिक आर्यसभ्यता के आरम्भ होने से पहले का कालखण्ड सम्मिलित किया जाता है।

इस काल खण्ड में लिखित सामग्री का प्रायः अभाव है। अतः पत्थरों के औजारों, जीवाश्मों, मृदभाण्डों आदि पुरावशेषों के आधार पर इतिहास का लेखन किया जाता है तथा पुरावशेषों के कालखण्ड का निर्धारण करने के लिए कार्बन डेटिंग पद्धति का सहारा लिया जाता है। 

इस काल में केवल सिंधु सभ्यता ही एकमात्र ऐसी सभ्यता है जिसकी मुद्राओं एवं बर्तनों पर संक्षिप्त लेख हैं किंतु इस काल की लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जा सकता है अतः इस सभ्यता के इतिहास का काल-निर्धारण भी कार्बन डेटिंग पद्धति के आधार पर किया जाता है।

भारत के ऐतिहासिक कालखण्ड को पुनः तीन भागों में विभक्त किया जाता है- (1.) प्राचीन भारत का इतिहास, (2.) मध्यकालीन भारत का इतिहास एवं (3.) आधुनिक भारत का इतिहास

प्राचीन भारत का इतिहास भारत में प्राचीन आर्य राजाओं की राजन्य व्यवस्था के उदय से लेकर आर्य  राजवंशों की समाप्ति तक का इतिहास सम्मिलित किया जाता है जिन्हें प्राचीन भारतीय क्षत्रिय कहा जाता है। इसकी अवधि लगभग ईसा पूर्व 3000 से लेकर ईस्वी 1206 तक निर्धारित की जाती है। अर्थात् इस कालखण्ड की समाप्ति भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना के साथ होती है।

मध्यकालीन भारत का इतिहास ई.1206 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना से लेकर ई.1761 में पानीपत के युद्ध तक चलता है। इस पूरे काल में भारत में लगभग 300 वर्ष तक तुर्क तथा लगभग 250 वर्ष तक मुगल शासक राज्य करते हैं किंतु ई.1761 तक वे इतने कमजोर हो जाते हैं कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में मुगलों की तरफ से मराठों ने अहमदशाह अब्दाली से लड़ाई की। मराठों की करारी हार के बाद मुगलों का राज्य पूरी तरह अस्ताचल को चला जाता है और अंग्रेजों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिलता है।

ई.1765 में हुई इलाहाबाद की संधि में मुगल बादशाह को पेंशन स्वीकृत कर दी जाती है और अंग्रेज भारत के वास्तविक शासक बन जाते हैं। इस प्रकार ई.1761 से लेकर ई.1947 तक के काल को आधुनिक भारत का इतिहास कहा जाता है। इस ग्रंथ में मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखा गया है जिसमें भारत में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना से लेकर मुगलिया सल्तनत की समाप्ति तक का अर्थात् 1200 ईस्वी से लेकर 1760 ईस्वी तक का इतिहास लिखा गया है।

मध्यकालीन भारत के इतिहास पर पहले से ही बाजार में अनेक पुस्तकें हैं। प्रायः इतिहास की अच्छी पुस्तकें भी विषय वस्तु के संयोजन की कमी एवं सूचनाओं को ठूंस-ठूंस कर भर देने की प्रवृत्ति के कारण उबाऊ हो जाती हैं जिनके कारण विद्यार्थी का मन उन पुस्तकों में नहीं लगता। इस कारण इस पुस्तक को लिखते समय परीक्षा के पाठ्यक्रम की मांग तथा विद्यार्थियों की सुविधा का ध्यान रखा गया है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इतिहास के क्षेत्र में भी नित्य नई शोध सामने आ रही हैं। उन नई जानकारियों को भी इस पुस्तक में समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है। अब इतिहास कुछ घिसी पिटी सूचनाओं का संग्रह नहीं रह गया है, प्राप्त तथ्यों को न केवल तार्किकता के साथ अपनाया जा रहा है अपितु उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधानों की कसौटी पर भी कसा जा रहा है।

इस पुस्तक की भाषा को स्नातक उपाधि स्तर के विद्यार्थियों की मांग के अनुरुप सरल रखा गया है। छोटे-छोटे वाक्य लिखे गये हैं ताकि सूचनाओं को मस्तिष्क में अच्छी तरह संजोया जा सके। ऐतिहासिक तथ्यों को क्रमबद्ध लिखा गया है तथा असंगत एवं विरोधाभासी तथ्यों से बचने का प्रयास किया गया है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इतिहास के क्षेत्र में भी नित्य नई जानकारियां मिल रही हैं। नई जानकारियों को भी इस पुस्तक में समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक का प्रथम मुद्रित संस्करण वर्ष 2013 में तथा द्वितीय संस्करण वर्ष 2016 में प्रकाशित हुआ था। वर्ष 2018 में पुस्तक का ई-बुक संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। आशा है इस पुस्तक का ई-संस्करण विश्व भर के पाठकों की आवश्यकता को पूरी कर सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

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दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत समकालीन ग्रंथों, भवनों, मकबरों, शिलालेखों आदि के रूप में बहुतायत से मिलते हैं। बहुत से विदेशी यात्रियों ने भी दिल्ली सल्तनत कालीन ऐतिहासिक घटनाओं को लिखा है।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्रोत उस काल में रचे गये अरबी-फारसी एवं विभिन्न भाषाओं के ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों में दरबारी रचनाकारों के साथ-साथ सुल्तानों, बादशाहों एवं शहजादियों द्वारा लिखी गई जीवनियाँ भी प्रमुख स्थान रखती हैं।

ग्रंथों के साथ-साथ, उस काल के मुस्लिम एवं हिन्दू शासकों द्वारा जारी किये गये सिक्के, शाही फरमान, रुक्के, परवाने, रजवाड़ों में लिखी गई बहियाँ, उस काल में निर्मित भवन, भवनों पर उत्कीर्ण शिलालेख, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, आदि ऐसे विश्वसनीय स्रोत हैं जो उस काल के इतिहास का निर्माण करने में महत्वपूर्ण सूचनाएँ देते हैं।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोतों का अध्ययन सुगमता की दृष्टि से दो भागों में किया जाना उचित है-

(1) दिल्ली सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत तथा

(2) मंगोलकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

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कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर इब्राहीम लोदी तक का शासन काल (ई.1206 से ई. 1526) भारतीय इतिहास में दिल्ली सल्तनत का काल कहलाता है। 320 वर्षों की अवधि के दिल्ली सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत मुस्लिम लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा लिखित फारसी तथा अरबी भाषाओं के ग्रंथ हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की ऐतिहासिक रचनाओं से भी उस काल के इतिहास की जानकारी मिलती है। लिखित साहित्य के साथ-साथ तत्कालीन शिलालेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से भी महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। मुस्लिम इतिहासकार इस देश में आक्रमणकारी बादशाहों के दरबारियों के रूप में अथवा स्वतंत्र यात्रियों के रूप में आये। उनकी रचनाओं में यात्रा-वृत्तान्त तथा आत्मकथाएँ मुख्य हैं जिनमें मुस्लिम आक्रांताओं की सफलताओं तथा भारतीय शासकों की विफलताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘मुस्लिम इतिहासकारों की, भारत में इस्लाम की प्रगति तथा दरबारी मामलों में ही विशेष रुचि थी। वे वैज्ञानिक इतिहासकार नहीं थे, उनका ध्यान शासकों के कार्यों तक ही सीमित था, साधारण जनता के जीवन में उन्हें दिलचस्पी नहीं थी।’

डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है- ‘उन्होंने इस बात की विशेष चिन्ता नहीं की कि वे अपनी सामग्री को क्रमबद्ध और व्यवस्थित रूप से लिखें। उन्हें यह परवाह नहीं रही कि किस आवश्यक बात को लिखा जाए और क्या नहीं तथा जो सामग्री उपलब्ध है, उसका किस रूप में और कैसे उपयोग किया जाये। यही नहीं, उन्होंने अतिशयोक्तिपूर्ण आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया। फलस्वरूप अपने ऐतिहासिक विवरण में उन्होंने कई स्थलों पर अस्पष्टता और सन्देह के बीज छोड़ दिये।’

सल्तनतकालीन इतिहासकारों को सुल्तानों तथा तत्कालीन भारतीय शासकों के शासनकाल को देखने का प्रत्यक्ष अनुभव था। उन्होंने अपनी आँखों देखी घटनाओं का वर्णन करने के साथ पूर्व के लेखकों की रचनाओं का भी उपयोग किया है तथा कई लेखकों ने सुनी हुई बातों को भी प्रमुख स्थान दिया है।

अधिकांश लेखकों ने पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लिखा किंतु कुछ ऐसे मुस्लिम इतिहासकार भी हुए जिन्होंने बिना किसी पक्षपात और पूर्वाग्रह के इतिहास का लेखन किया। सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास के निर्माण में उनकी रचनाओं का सावधानी के साथ उपयोग किया जाना चाहिये।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ

1. तारीखे-सिन्ध

इस ग्रंथ का लेखक मीर मुहम्मद मासूम था। इस ग्रन्थ को तारीखे-मासूमी भी कहा जाता है। इसमें मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से लेकर अकबर के शासनकाल तक के सिन्ध क्षेत्र का इतिहास है। इस ग्रन्थ की रचना 1600 ई. के आसपास की गई थी।

2. तारीखे हिन्द (चचनामा)

जिस समय अरबों ने भारत पर पहला आक्रमण किया उस समय सिंध पर चच का पुत्र दाहिर शासन करता था। संभवतः उसी चच के नाम पर इस ग्रंथ का नाम चचनामा रखा गया। चचनामा को तारीखे-हिन्द एवं तारीखे-सिन्ध भी कहा जाता है। इसमें अरबों की सिन्ध विजय का इतिहास है। इसे मूलतः अरबी भाषा में लिखा गया। मुहम्मद अली कूफी ने इस ग्रंथ का फारसी भाषा में अनुवाद किया। इस ग्रंथ में मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से पहले तथा बाद के सिन्ध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है।

3. तारीखे-यामिनी

इस ग्रन्थ का लेखक अबु नस्त्र मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल-उतबी था। वह महमूद गजनवी का मंत्री था। इस ग्रंथ में सुबुक्तगीन के सम्पूर्ण शासनकाल और महमूद गजनवी के कुछ समय तक का वृत्तान्त है। ऐतिहासिक ग्रन्थ की अपेक्षा यह एक साहित्यिक कृति अधिक है। इस कारण यह ग्रन्थ अलंकारों तथा टेढ़ी-मेढ़ी शब्दावलियों से भरा पड़ा है। इसमें विस्तृत विवरण का अभाव है। तिथियाँ भी बहुत कम दी गई हैं। फिर भी, महमूद के प्रारम्भिक जीवन तथा कार्यों के सम्बन्ध में इससे प्रामाणिक जानकारी मिलती है।

4. तारीखे-मसूदी

इसका लेखक अबुल फजल मुहम्मद बिन हुसैन अल बहरी था। इसमें महमूद गजनवी तथा मसूद का इतिहास है। ग्रंथ में तत्कालीन दरबारी जीवन तथा अधिकारियों के कुचक्रों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

5. तारीखे-उल-हिन्द

इस ग्रंथ का लेखक अबूरिहान मुहम्मद बिन अहमद अलबरूनी था। वह अरबी और फारसी भाषाओं, गणित, चिकित्सा, हेतु विद्या, दर्शन एवं भारतीय धर्मशास्त्रों का जानकार था। उसका जन्म ख्वारिज्म में हुआ था। उसने भारत में रहकर हिन्दू धर्म, दर्शन तथा संस्कृत का अध्ययन किया तथा दो संस्कृत ग्रंथों का अरबी में और कुछ अरबी ग्रंथांे का फारसी में अनुवाद किया। ‘तारीखे-उल-हिन्द’ मूलतः अरबी भाषा में लिखा गया। बाद में इसका फारसी तथा अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। इस ग्रंथ में महमूद गजनवी के समय में भारत की स्थिति का वर्णन किया गया है। अलबरूनी की मृत्यु 1038-39 ई. में हुई।

6. ताज-उल-मासिर

इस ग्रंथ का लेखक सदरउद्दीन हसन निजामी था। वह मुहम्मद गौरी के साथ भारत आया। उसने अपनी पुस्तक में 1192 से 1238 ई. तक का विवरण दिया। इस ग्रंथ में मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत की स्थिति, ऐबक के कार्यों तथा इल्तुतमिश के प्रारम्भिक कार्यों की अच्छी जानकारी मिलती है। अजमेर नगर की समृद्धि तथा तत्कालीन स्थिति पर भी लेखक ने अच्छा प्रकाश डाला है। इस ग्रंथ की रचना उस समय हुई जिस समय मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम सत्ता की नींव रख रहा था। इसलिये इस ग्रंथ का महत्व अत्यधिक है। हसन निजामी ने अपना शेष जीवन भारत में ही बिताया।

7. तबकाते नासिरी

इस ग्रंथ का लेखक काजी मिनहाज-उस-सिराज अपने समय का प्रमुख विद्वान था। नासिरुद्दीन के शासन काल में वह दिल्ली का प्रमुख काजी था। उसने इस ग्रन्थ में प्राचीन काल से लेकर 1260 ई. तक का इतिहास लिखा है। इल्तुतमिश के राज्यकाल से लेकर सुल्तान नासिरुद्दीन के राज्यकाल के पन्द्रहवें वर्ष तक का विवरण उसने स्वयं अपनी जानकारी के आधार पर लिखा है।

मिनहाज को निष्पक्ष लेखक नहीं कहा जा सकता। मुहम्मद गौरी तथा इल्तुतमिश के वंश के सम्बन्ध में उसका दृष्टिकोण पक्षपात पूर्ण था। वह बलबन का बड़ा प्रशंसक था। इन दोषों के उपरान्त भी दिल्ली सल्तनत के प्रारम्भिक इतिहास को जानने के लिये इस ग्रन्थ को प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

मिनहाज ने घटनाओं का क्रमबद्ध वृत्तान्त दिया है और तिथियाँ तथा तथ्य सामान्यतः सत्य के निकट हैं। फरिश्ता और दूसरे लेखक भी तबकाते नासिरी को श्रेष्ठ एवं प्रामाणिक ग्रन्थ मानते हैं।

8. खजायँ-उल-फुतूह (तारीखे-अलाई)

खजायँ-उल-फुतूह को तारीखे- अलाई भी कहा जाता है। इसकी रचना 1311 ई. में अमीर खुसरो ने की। अमीर खुसरो भारत के फारसी कवियों में सर्वश्रेष्ठ था। वह जलालुद्दीन खलजी से मुहम्मद बिन तुगलक तक के दिल्ली के सुल्तानों का समकालीन था। 1290 ई. से 1325 ई. तक वह राजकवि रहा।

खजायँ-उल-फुतूह में अलाउद्दीन खलजी की विजयों के साथ-साथ उसके आर्थिक सुधारों और बाजार-भाव नियन्त्रण का भी उल्लेख किया गया है। खुसरो ने जलालुद्दीन खलजी की हत्या जैसी उन घटनाओं को नहीं लिखा जो उसके अलाउद्दीन के विरुद्ध थीं। खुसरो ने कहीं-कहीं पर अत्यधिक अलंकृत फारसी का प्रयोग किया है जिसके कारण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट नहीं हो पाते। उसने कई हिन्दी शब्दों का भी प्रयोग किया है। इस ग्रन्थ में तिथि क्रम की कमी खटकती है। फिर भी, यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है।

डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है- ‘खजायँ उल फुतूह’ दक्षिणी अभियानों का इतिहास है। यह तिथि एवं वृत्तान्त दोनों ही दृष्टियों से सही है। इससे हमें अलाउद्दीन के शासनकाल का उपयुक्त तिथिक्रम निश्चित करने में सहायता मिलती है। इसमें कतिपय प्रशासकीय सुधारों का भी संक्षिप्त वर्णन है। खुसरो कट्टर मुसलमान था। जिन लोगों को वह काफिर समझता था उनके विषय में विचार प्रकट करते हुए उसने अपनी धर्मान्धता का परिचय दिया।’

9. अमीर खुसरो के अन्य ग्रंथ

अमीर खुसरो ने ‘मिफताह-उल-फुतूह’, ‘तुगलकनामा’, ‘गुरात-उल-कमाल’, ‘देवलरानी’ आदि अनेक ग्रन्थों की भी रचना की। खुसरो की काव्य रचनाओं से भी कुछ ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। ‘तूहफतूह रिगार’ से बलबन के सम्बन्ध में, ‘वस्तुल हयात’ से निजामुद्दीन औलिया तथा मलिक छज्जू आदि के बारे में, ‘गुरात-उल-कमाल’ से निजामुद्दीन औलिया, कैकूबाद आदि के बारे में तथा ‘देवलरानी’ से खिज्रखाँ एवं देवलदेवी के बारे में जानकारी मिलती है।

10. तारीखे-फीरोजशाही

इस ग्रंथ का लेखक जियाउद्दीन बरनी था। वह ग्यासुद्दीन तुगलक, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोज तुगलक का समकालीन था। उसका ग्रंथ तारीखे-फीरोजशाही बलबन के राज्यारोहण (ई. 1265) से आरम्भ होकर फीरोज तुगलक के शासन के छठे वर्ष (ई. 1356) में समाप्त होता है।

उस समय के इतिहास की दृष्टि से यह एक प्रामाणिक ग्रंथ है। बरनी को अनेक महापुरुषों, विद्वानों और अमीर-उमरावों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला। अलाउद्दीन के शासन को उसने अपनी आँखों से देखा। मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में उसे 17 वर्षों तक रहने का अवसर मिला। उसने यह ग्रंथ सुल्तान फीरोज तुगलक को समर्पित किया। उसके अन्तिम दिन कष्ट और दरिद्रता में बीते।

बरनी ने लिखा है कि इतिहासकारों को तथ्यों को विकृत नहीं करना चािहए और इतिहास लिखते समय पक्षपात नहीं करना चाहिये परन्तु अनेक विद्वानों ने स्वयं बरनी की निष्पक्षता और ईमानदारी पर सन्देह प्रकट किया है।

इलियट एवं डाउसन ने लिखा है- ‘जियाउद्दीन बरनी अन्य अनेक इतिहासकारों की भाँति अपने समकालीन शासकों के आदेश से और उनके सामने लिखा करता था, इसलिए वह ईमानदार इतिहासकार नहीं है। उसने बहुत-सी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ बिल्कुल छोड़ दीं तथा कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं को साधारण मानकर उनका अत्यल्प उल्लेख किया है। अलाउद्दीन के शासनकाल में भारत पर मंगोलों के कई आक्रमण हुए परन्तु बरनी ने उनका उल्लेख तक नहीं किया। मुहम्मद बिन तुगलक ने हत्या और बेईमानी से राज्य प्राप्त किया था। बरनी ने उसका भी उल्लेख नहीं किया।’

फरिश्ता ने भी बरनी पर आरोप लगाया है कि उसने इस सत्य को छिपाया।

11. फतवा-ए-जहाँदारी

फतवा-ए-जहाँदारी की रचना जियाउद्दीन बरनी ने की। इस ग्रंथ में राज्य-व्यवस्था सम्बन्धी उपदेश दिये गये हैं तथा आदर्श शासक के सम्बन्ध में बरनी के विचार लिखे गये हैं। बरनी, आदर्श मुसलमान शासकों को काफिरों के विनाश का उपदेश देता है।

12. तारीखे-फीरोजशाही

जियाउद्दीन बरनी की भांति शम्स-ए-सिराज अफीफ ने भी तारीखे फीरोजशाही नामक ग्रंथ की रचना की। अफीफ, सुल्तान फीरोजशाह तुगलक का दरबारी इतिहासकार था। उसने इस ग्रंथ की सामग्री अपने पिता और अन्य तत्कालीन शाही अधिकारियों से प्राप्त की थी। इस ग्रंथ में फीरोज तुगलक के शासनकाल की राजनीतिक घटनाओं, प्रशासकीय सुधारों तथा सुल्तान के नेक कार्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

यद्यपि उसका वर्णन निष्पक्ष नहीं है तथापि फीरोज तुगलक के शासनकाल की जानकारी के लिए वह एक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘अफीफ में, बरनी जैसी न तो बौद्धिक उपलब्धि है और न इतिहासकार की योग्यता एवं सूझबूझ तथा दृष्टि। अफीफ एक-एक घटनाओं को तिथिक्रम से लिखने वाला सामान्य इतिहासकार है।’

13. फुतूहाते-फीरोजशाही

इस ग्रंथ का लेखक सुल्तान फीरोज तुगलक है। इस ग्रंथ में फीरोज ने अपने कार्यों, विचारों और आदेशों के सम्बन्ध में लिखा है। यह ग्रंथ फीरोज के अध्यादेशों का संग्रह मात्र है फिर भी इस ग्रंथ से तत्कालीन इतिहास को तैयार करने में महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है।

14. सीरत-ए-फीरोजशाही

इस ग्रंथ के लेखक का नाम अज्ञात है। इसमें फीरोज तुगलक के गुणों का विस्तार से वर्णन है तथा उसकी धार्मिक नीति और मूर्ति-पूजा का नाश करने के प्रयासों की प्रशंसा की गई है। फीरोज द्वारा निर्मित नहरों और उसके प्रशासकीय सुधारों का भी उल्लेख किया गया है। ग्रंथ की रचना 1370 ई. में की गई। सम्भवतः सुल्तान फीरोज तुगलक के आदेशानुसार इसकी रचना की गई।

15. फुतुह-उस-सलातीन

इस ग्रंथ का लेखक ख्वाजा अबू बक्र इसामी, मुहम्मद बिन तुगलक का समकालीन था। उसने 1349 ई. में इस ग्रंथ की रचना की थी। इस ग्रंथ में सुल्तान महमूद गजनवी से लेकर सुल्तान अलाउद्दीन बहमनशाह तक के राज्यकाल का विवरण दिया गया है। इसामी ने इस ग्रंथ को काफी छानबीन के बाद लिखा है।

इस कारण इस ग्रंथ को काफी महत्त्व दिया जाता है। कुछ विद्वान उस पर मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध अन्धाधुन्ध दोष लगाने का आरोप लगाते हैं परन्तु चूँकि इसामी ने सुल्तान के निष्ठुर कृत्यों को अपनी आँखों से देखा था और अन्य लोगों की भाँति उसे भी दौलताबाद जाने और यात्रा के कष्ट उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा था, सम्भवतः इसीलिए वह सुल्तान का कटु आलोचक बन गया।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसामी ने अपने युग की घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया दिया है। यह ग्रंथ तत्कालीन इतिहास को जानने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

16. किताब-उल-रहला (तुहूफल-उन-नुजार)

किताब-उल-रहला को तुहूफल-उन-नुजार भी कहते हैं। इसका लेखक इब्नबतूता, मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में मोरक्को से भारत आया था। यह ग्रंथ उसके यात्रा संस्मरणों का संकलन है। मोरक्को के सुल्तान ने इब्नबतूता को काफी प्रोत्साहन दिया। इब्नबतूता लगभग आठ वर्ष तक भारत में रहा।

उसने अपने यात्रा-वृत्तान्त में भारत की भौगोलिक स्थिति, तत्कालीन शासन-व्यवस्था, दरबार, डाक का प्रबन्ध, सुल्तान मुहम्मद के चरित्र के साथ-साथ समकालीन राजनीतिक घटनाओं का विस्तार से उल्लेख किया। धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का भी विशद् वर्णन किया। इब्नबतूता जिज्ञासु प्रवृत्ति का व्यक्ति था।

वह स्पष्ट-वक्ता था और किसी बात को छिपाने में विश्वास नहीं करता था। उसने स्वयं अपनी त्रुटियों का भी स्पष्ट उल्लेख किया। उसने अपनी यात्रा का विवरण ईमानदारी से दिया परन्तु पिछली घटनाओं के सम्बन्ध में उसे अपने सूत्रों से जो जानकारी मिल सकी उसका ज्यों का त्यों उपयोग किया।

17. तारीखे-मुबारकशाही

इसका लेखक याहयाबिन अहमद अब्दुल्लाह सहरिन्दी है। इस ग्रंथ में मुहम्मद गौरी से लेकर सैय्यद वंश के तीसरे सुल्तान मुहम्मद तक के शासनकाल का विवरण है। सैय्यद वंश के इतिहास की जानकारी के लिए यही एकमात्र समकालीन ग्रंथ है। परवर्ती इतिहासकारों- निजामुद्दीन अहमद, बदायूँनी आदि ने सैय्यद वंश के इतिहास के लिए इसी ग्रंथ का सहारा लिया है।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘याहया एक सजग इतिहासकार है जिसकी शैली अतिरंजना और विशेषणों से मुक्त है। उसने घटनाओं का बड़ी ईमानदारी के साथ वर्णन किया है और फीरोज की मृत्यु के उपरान्त होने वाले उपद्रवों की जानकारी प्राप्त करने के लिए उसका ग्रंथ अत्यन्त प्रमाणिक है। उसने उस समय में, देश की शान्ति-भंग करने वाले विद्रोहों का विस्तार से वर्णन किया है।’

18. वाकियते-मुश्ताकी

इस ग्रंथ का लेखक शेख रिजकुल्ला मुश्ताकी (1491-1581 ई.) था। उसने वाकियते-मुश्ताफी में बहलोल लोदी से लेकर अकबर तक के शासन काल की विभिन्न घटनाओं का विवरण दिया। इस ग्रंथ में अनेक कहानियाँ हैं जिनके माध्यम से समकालीन राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी भी मिलती है।

19. तारीखे-मुश्ताकी

इस ग्रंथ की रचना भी शेख रिजकुल्ला मुश्ताकी ने की। यह एक काव्य ग्रंथ है जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत की गई है। कुछ कहानियां भी दी गई हैं।

20. तारीखे सलातीन-ए-अफगानी

इस ग्रंथ को तारीखे-शाही भी कहा जाता है। इसका लेखक अहमद यादगार था। इसमें बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी, इब्राहीम लोदी, शेरशाह, इस्लामशाह, फीरोजशाह, आदिलशाह, इब्राहीम सूरी और सिकन्दरशाह का इतिहास है। अर्थात् यह ग्रंथ अफगान शासकों के इतिहास की जानकारी देता है। उनके साथ-साथ इस ग्रंथ में तत्कालीन मंगोल बादशाहों- बाबर, हुमायूँ और अकबर के बारे में भी जानकारी मिलती है।

21. मखजन-ए-अफगानी

इस ग्रंथ का लेखक नियामतउल्ला था। यह ग्रंथ दिल्ली सल्तनत नष्ट हो जाने के बाद लिखा गया था। इसकी रचना 1609 ई. के आसपास जहाँगीर के शासन काल में हुई। अतः यह तत्कालीन ग्रंथों की श्रेणी में नहीं आता। इसमें दिल्ली के अफगान सुल्तानों तथा अफगानी कबीलों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। इस ग्रन्थ में सुल्तान बहलोल लोदी से लेकर इब्राहीम लोदी तक के समय का वर्णन किया गया है।

22. तारीखे-दाऊदी

इस ग्रंथ का लेखक अब्दुल्ला जहाँगीर का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी (1451 ई.) से लेकर बंगाल के सुल्तान दाऊदशाह (1517 ई.) तक के समय का वर्णन है। इसमें अलौकिक कहानियों की भरमार है। तिथियों के मामले में बड़ी भूलें की गई हैं। अफगान शासकों की खूब प्रशंसा की गई है। इस ग्रंथ की प्रति पटना के खुदाबख्श पुस्तकालय में उपलब्ध है।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास ग्रंथों की समीक्षा

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में केवल फीरेज तुगलक ही ऐसा हुआ है जिसने स्वयं किसी ग्रंथ की रचना की। उसका लिखा ग्रंथ फुतूहाते-फीरोजशाही सुल्तान के कार्यों, विचारों और आदेशों के सम्बन्ध में है। फिर भी इससे उस काल के इतिहास के निर्माण में अत्यल्प सहायता मिलती है। यही कारण है कि दिल्ली के सुल्तानों के इतिहास की जानकारी के लिए राजकीय अधिकारियों तथा स्वतन्त्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य पर निर्भर रहना पड़ता है जो कि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास लेखकों की विशेषताएँ एवं कमजारियाँ

सल्तनतकालीन लेखकों की विशेषताएँ

सल्तनतकालीन लेखकों के पास इतिहास लेखन की पुरानी परम्परा थी। उनमें से अधिकांश लेखकों के पास इतिहास लेखन के लिये परिपक्व दृष्टि उपलब्ध थी। उनमें से अधिकांश लेखक बहुत सी घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी रहे। उन्होंने  प्रत्यक्षदर्शियों से सुने हुए विवरण के आधार पर भी इतिहास की रचना की तथा अपने से पूर्ववर्ती लेखकों द्वारा जुटाई गई जानकारी का भी उपयोग किया।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार गोथे ने लिखा है- ‘मैं एक ऐसे समय की अनुभूति करता हूँ, जब इतिहास आँखों देखी घटनाओं के आधार पर लिखा जायेगा।’ सल्तनतकालीन इतिहास इस कसौटी पर खरा उतरता है।

सल्तनतकालीन लेखकों की कमजोरियाँ

अधिकांश फारसी लेखकों ने राजकीय संरक्षण में सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे थे, फलस्वरूप ऐसे इतिहास को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता किंतु हमारे पास सल्तनकालीन इतिहास जानने के समसामयिक स्रोत इतने कम हैं कि हमें इन ग्रंथों की सहायता लेनी ही पड़ती है।

सल्तनतकालीन इतिहासकारों एवं ग्रंथकारों की भांति उस काल के विदेशी यात्री भी इस्लाम से लगाव रखने एवं काफिरों से शत्रु-भाव रखने के कारण पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे। उन्होंने भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को समझने में भारी भूलें कीं तथा विरोधाभासी वर्णन किये। फिर भी उन्होंने भारत की समृद्धि एवं सांस्कृतिक उन्नति से चमत्कृत होकर भारतीय नगरों एवं गाँवों के रोचक चित्र प्रस्तुत किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

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मुगलकालीन इतिहास के स्रोत - www.bharatkaitihas.com
मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत फारसी, तुर्की और अरबी भाषा में हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की ऐतिहासिक रचनाओं से भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। पुर्तगाली, अंग्रेजी और फ्रांसीसी आदि विदेशी व्यापारियों के पत्रों तथा उनकी कम्पनियों के अभिलेखों से भी मुगलकालीन सूचनाएँ मिलती हैं।

लिखित साहित्य के साथ-साथ मुगल शासकों के सिक्कों तथा स्मारकों से भी महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। लिखित साहित्य में आत्मकथाओं एवं यात्रा-वृत्तान्तों का विशेष महत्त्व है। मुगलकालीन ग्रंथों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ.) मंगोल बादशाहों एवं शाही परिवार के सदस्यों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(ब.) मंगोल अधिकारियों एवं स्वतंत्र फारसी लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(स.) हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(द.) विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(अ.) मुगल बादशाहों एवं शाही परिवार द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1. बाबरनामा (तुजुक-ए-बाबरी)

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा के नाम से लिखी जिसे तुजुक-ए-बाबरी भी कहा जाता है। बाबर ने मध्य एशिया एवं दक्षिण एशिया में निरंतर युद्ध अभियान किये। भाग्य से वह अच्छा लेखक भी था तथा अनुभवों से समृद्ध था। इस कारण बाबरनामा विश्व के ऐतिहासिक ग्रंथों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह ग्रन्थ चगताई-तुर्की भाषा में लिखा गया। इसका सर्वप्रथम फारसी अनुवाद शेख जैन वफाई ख्वाफी ने किया, जो बाबर का मित्र था। इस ग्रंथ का फारसी भाषा में सबसे सुन्दर अनुवाद अकबर के आदेशानुसार अब्दुर्रहीम खानखाना ने किया।

फारसी से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद का कार्य बहुत से विद्वानों ने किया परन्तु विलियम अर्सकिन का अनुवाद और श्रीमती वैबरिज का अनुवाद अधिक प्रशंसनीय है। इस ग्रंथ से उस समय की राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जानकारी के साथ-साथ एशिया के विभिन्न देशों की सांस्कृतिक जानकारी भी उपलब्ध होती है।  

हिन्दुस्तान का विवरण देते हुए बाबर लिखता है, ‘हिन्दुस्तान पहली, दूसरी और तीसरी मौसमों में स्थित है। इसका कोई भी भाग चौथी मौसम में स्थित नहीं है। यह बहुत ही अच्छा देश है। इसकी पहाड़ियाँ और नदियाँ, जंगल और मैदान, पशु और पौधे, निवासी और भाषाएँ, हवाएँ और बरसातें, सब भिन्न प्रकार की हैं।’

इसके साथ ही बाबर यह भी लिखता है कि, ‘हिन्दुस्तान के प्रदेश और नगर अत्यन्त कुरूप हैं। यह एक ऐसा देश है जहाँ बहुत कम आमोद-प्रमोद है। लोग सुन्दर नहीं हैं। इन लोगों को ख्याल नहीं है कि मित्र-मण्डली में क्या आनन्द आता है और आजादी से मिलने-जुलने में या सम्पर्क रखने में क्या सुख है। इनमें कोई प्रतिभा नहीं है। इनके दिमाग में बुद्धि नहीं है। शिष्टाचार में कोमलता नहीं है। इनमें न दया है न मित्र भाव …..।

इनके पास अच्छे घोड़े नहीं हैं। न अच्छा माँस है और न अंगूर या खरबूजे या अच्छे फल हैं। यहाँ न बर्फ है, न ठण्डा पानी है। बाजारों में अच्छा खाना या रोटी नहीं मिलती। न यहाँ पर स्नानागार हैं। न विद्यालय हैं और न बत्तियाँ या मशालें हैं।

…………यह बहुत बड़ा देश है। यहाँ सोना-चाँदी का बाहुल्य है। वर्षा-ऋतु में यहाँ का मौसम सुहावना हो जाता है….। हिन्दुस्तान में दूसरा आराम यह है कि यहाँ प्रत्येक व्यवसाय और धन्धे के अगणित कारीगर मिलते हैं।’

बाबरनामा में विपुल ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध है। इससे सुल्तान इब्राहीम लोदी एवं उसके अमीरों के राज्य का भी विवरण प्राप्त होता है। बाबर ने अपने समकालीन शासकों में अफगानों के अतिरिक्त गुजरात, दक्षिण भारत, मालवा, बंगाल, विजयनगर एवं राणा सांगा के राज्यों की भी चर्चा की है।

उसने तुर्कों एवं अफगानों की सैन्य-व्यवस्था का भी वर्णन किया है। बाबर जिन प्रदेशों से होकर गुजरा, जिन राज्यों से वह टकराया और जिन राज्यों के बारे में उसे जानकारी मिली, उन समस्त राज्यों एवं प्रदेशों का वर्णन किया गया है। उसने ग्वालियर, धौलपुर, सीकरी, मेवाड़़ आदि राज्यों का भी विस्तृत विवरण दिया है।

बाबरनामा से बाबर के व्यक्तित्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ में बाबर ने अपने परिवार और अपने विरोधियों का अद्भुत चित्रण किया है। वह एक अच्छा मित्र भी था। उसने बाबरनामा में लिखा है कि अपने एक घनिष्ठ मित्र की मृत्यु होने पर उसने दस दिन तक आँसू बहाये।

यद्यपि वह कट्टर मुसलमान था, तथापि मदिरापान करता था। उसने अपनी आत्मकथा में मदिरापान एवं साहित्यिक गोष्ठियों का सुन्दर वर्णन किया है। बाबरनामा से बाबर के चरित्र का दूसरा पहलू भी दिखाई देता है। बाबर अपने शत्रुओं के प्रति बड़ा निर्दयी था। वह अपने शत्रुओं की खाल खिंचवाता, आँखे फुड़वाता और उनके कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाता था।

बाबर ने अपने निर्दयी कृत्यों का वर्णन भी बड़े गर्व के साथ किया है। युद्धों के वर्णन से उसकी उच्चकोटि की साहित्यिक क्षमता का पता चलता है। पानीपत और खानवा के युद्धों का वर्णन अत्यन्त प्रभावशाली एवं रोमांचकारी है।

तात्कालिक इतिहास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ग्रंथ होते हुए भी बाबरनामा में अनेक दोष हैं। इस ग्रंथ में उस समय की नागरिक शासन-प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार का वर्णन नहीं हैं। जबकि अब्बास खाँ की ‘तारीखे शेरशाही’ में इसका विवरण दिया गया है। युद्धों के वर्णन में भी बाबर का दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण है।

पानीपत के युद्ध में उसने अपनी सेना की संख्या कम तथा इब्राहीम लोदी की सेना की संख्या अतिरंजित करके बताई है, जो अविश्वसनीय है। इब्राहीम लोदी अफगान सरदारों की गद्दारी के कारण पराजित हुआ था, किंतु बाबर ने इस तथ्य का उल्लेख तक नहीं किया। इसी प्रकार, राणा सांगा द्वारा बाबर को निमन्त्रित करना मनगढ़न्त प्रतीत होता है। खानवा के युद्ध के समय सलहदी तंवर द्वारा किया गया विश्वासघात भी बाबर की विजय में सहायक सिद्ध हुआ था, किन्तु बाबर इस सम्बन्ध में भी मौन है।

इस ग्रन्थ में लम्बे-लम्बे समयान्तराल छोड़ दिये गये हैं जिनमें किसी घटना का उल्लेख नहीं किया- (1) 14 फरवरी, 1483 से जून, 1494 ई. तक, (2) 1503 ई. से 1504 ई. तक, (3) 1508 ई. से 1519 ई. तक, (4) 25 जनवरी 1520 से 16 नवम्बर 1525 ई. तक, (5) 3 अप्रैल 1528 से 17 सितम्बर 1528 तक और इसके बाद के दिनों का तो बहुत ही कम विवरण है।

उपरोक्त कमजोरियों के उपरांत भी बाबरनामा की अधिकांश घटनाएँ विश्वसनीय हैं। इसलिए इस ग्रंथ के ऐतिहासिक महत्त्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। डेनीसन रास ने लिखा है- ‘बाबर के आत्मचरित्र की गणना विश्व के युगयुगीन साहित्य में एक आकर्षक एवं रोमांचकारी रचनाओं में करनी चाहिए।’ श्रीमती बेवरीज ने इस ग्रन्थ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने लिखा है- ‘उसकी आत्मकथा उन अमूल्य रचनाओं में हैं जो समस्त युगों के लिए उपयोगी है और उसकी तुलना सेण्ट आगस्टाइन, रूसो, गिबन और न्यूटन के आत्मचरित्रों से की जानी चाहिये। एशिया में तो वह अपना एकमात्र उदाहरण है।’

2. तारीखे-रशीदी

इस ग्रन्थ का लेखक बाबर का चचेरा भाई मिर्जा हैदर था। उसने कामरान और हुमायूँ के अधीन महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया तथा हुमायूँ के अधीन अनेक युद्धों में सक्रिय भाग लिया था। बाबरनामा के अनेक पृष्ठ नष्ट हो गये हैं और उनमें कई अन्तराल भी हैं। उन वर्षों की घटनाओं के लिये तारीखे-रशीदी ही एकमात्र प्रामाणिक ग्रन्थ है।

मिर्जा हैदर ने बाबर के पूर्वजों एवं बाबर से सम्बन्धित अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया है। यह ग्रन्थ दो भागों में विभाजित है-

(1) पहले भाग में मुगलिस्तान एवं काश्गर के मंगोल शासकों- तुगलुक एवं तिमूर से अर्ब्दुरशीद के समय तक का इतिहास लिखा गया है।

(2) दूसरे भाग में उन घटनाओं का विवरण दिया गया है जो मिर्जा हैदर के जीवन काल (1541 ई.) तक घटित हुईं।

शैबानी खाँ के हाथों पराजित होने के बाद बाबर ने लिखा है कि, ‘इस समय मेरी बहिन खानजादा बेगम शैबाक खान के हाथों में पड़ गई।’

बाबर ने अपनी कमजोरी छिपाने का प्रयास किया। जबकि मिर्जा ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि बाबर ने अपने प्राणों की रक्षा हेतु अपनी बहिन खानजादा बेगम का विवाह शैबानी खाँ के साथ कर दिया।’ हुमायूँ के कन्नौज युद्ध और उसके भाइयों के सम्बन्ध के इतिहास और कश्मीर तथा तिब्बत के वृत्तान्त ने इस ग्रन्थ की उपयोगिता को और भी बढ़ा दिया है। उसने अन्य घटनाओं जैसे कामरान द्वारा कन्धार पर अधिकार, हुमायूँ का पलायन तथा लाहौर में सब भाइयों का एकत्र होना और कामरान द्वारा विरोध, मिर्जा हैदर द्वारा कश्मीर विजय आदि का भी वर्णन किया गया है।

3. हुमायूँनामा

इस ग्रन्थ की रचनाकार हुमायूँ की बहिन गुलबदन बेगम थी। उसने अकबर के अनुरोध पर उसने इस ग्रन्थ की रचना की। गुलबदन ने अपनी स्मरण शक्ति के आधार पर बाबर और हुमायूँ के शासनकाल की घटनाओं का वर्णन किया। वह अपने पिता तथा भाई की कमजोरियों के बारे में नहीं लिख सकती थी।

इस कारण उसका वर्णन न तो त्रुटि रहित है और न ही निष्पक्ष। फिर भी बाबर के सम्बन्ध में उसने जो कुछ लिखा है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है। हुमायूँ से सम्बन्धित घटनाओं की वह प्रत्यक्षदर्शी थी। रिजवी ने लिखा है कि स्त्री होने के नाते गुलबदन बेगम ने युद्धों का संक्षिप्त विवरण ही दिया है परन्तु उसने मंगोल हरम के जीवन तथा हुमायूँ के पलायन का रोचक विवरण दिया है। कुछ मामलों में गुलबदन ने हुमायूँ की कमजोरियों पर पर्दा डालने का प्रयास किया है तथा मालदेव के बारे में पक्षपात किया है। यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है।

4. तुजुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा)

यह जहाँगीर की आत्मकथा है जिसकी अनेक प्रतिलिपियाँ विभिन्न नामों से भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिलती हैं। इस कारण इस ग्रन्थ को जहाँगीर के संस्मरण, वाकियाते-जहाँगीरी, इकबालनामा, जहाँगीरनामा तथा तुजुक-ए-जहाँगीरी आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।

बृजरत्न दास का मत है कि समग्र रूप से इन सब ग्रंथों का नाम ‘जहाँगीरनामा’ होना चाहिए। विद्वानों के अनुसार जहाँगीर के शासन के प्रारम्भिक बारह वर्षों के संस्मरण जहाँगीर ने स्वयं लिखे। उसके बाद अठारहवें वर्ष तक का विवरण मोतमिद खाँ की सहायता से लिखा और बाद का विवरण मोतमिद खाँ ने अन्य साधनों के आधार पर लिखा। इस ग्रन्थ में जहाँगीर के अभियानों का विस्तृत विवरण है।

अभियानों के लिए की गई तैयारियों, मुख्य सेनापतियों और अन्य उच्चाधिकारियों की नियुक्तियों, सेनाओं का पलायन, अभियानों की घटनाओं एवं कठिनाइयों तथा शत्रु पक्ष की गतिविधियों का विवरण दिया गया है। जहाँगीर के शासनकाल में उठने वाले विद्रोहों तथा उनके दमन का विवरण भी दिया गया है।

इस ग्रन्थ में दरबार में मनाये जाने वाले उत्सवों, भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य, पेड़-पौधों, फलों, सब्जियों, पशु-पक्षियों, आखेट, नगरों एवं दुर्गों, हिन्दुस्तान की अनेक प्रजातियों के खान-पान, रहन-सहन, आदतों आदि का भी रोचक वर्णन किया गया है। जहाँगीर ने अपने संस्मरणों में शहजादा खुसरो, परवेज तथा शहरयार आदि के विवादों का उल्लेख किया है। साथ ही नूरजहाँ की बुद्धिमता की काफी प्रशंसा की है।

डॉ. बेनीप्रसाद सक्सेना के अनुसार यह ग्रन्थ साहित्य और इतिहास दोनों दृष्टियों से मूल्यवान है। वे इसे अकबरनामा से भी अधिक आकर्षक मानते हैं परन्तु अन्य विद्वानों के अनुसार जहाँगीर ने अनेक स्थलों पर स्वयं को अकबर से श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास किया है। ऐसे स्थानों पर वह कभी-कभी उपहास का पात्र बन जाता है।

जहाँगीर ने कई स्थानों पर मदिरापान तथा दूसरों पर गये अत्याचारों को स्वीकारा है किन्तु फिर भी उसने बहुत-से निजी दोषों पर प्रकाश नहीं डाला है। इन दोषों के उपरान्त भी यह ग्रन्थ जहाँगीर के काल की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को जानने का महत्त्वपूर्ण एवं विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज है।

(ब.) मुगल अधिकारियों एवं स्वतंत्र फारसी लेखकों के ग्रंथ

1. तजकिरतुल वाकेआत

हुमायूँ के निजी सेवक जौहर आफताबची ने अकबर के शासनकाल में अपनी स्मृतियों के आधार पर इस ग्रन्थ की रचना की। डॉ. कानूनगो, हुमायूँ के शासनकाल के लिए इस ग्रन्थ को, गुलबदन के हुमायूँनामा से भी अधिक प्रामाणिक मानते हैं। इलियट और डाउसन ने भी लिखा है- ‘जौहर द्वारा दिए गए ये संस्मरण सच्चाई और ईमानदारी के साथ लिखे हुए प्रतीत होते हैं परन्तु इन्हें  हुमायूँ की मृत्यु के तीस वर्ष बाद लिखना आरम्भ किया गया था। इसलिए यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इसमें ग्रंथ में जिन घटनाओं का वर्णन है वे तद्वत और पूर्णतः सही हैं।’ इस ग्रन्थ में हुमायूँ के राज्यारोहण से लेकर ईरान से उसकी वापसी तथा राज्य-प्राप्ति तक का विस्तृत विवरण दिया गया है।

2. कानूने हुमायूँनी

इस ग्रन्थ का लेखक गयासुद्दीन मुहम्मद ख्वान्दमीर, बाबर और हुमायूँँ के दरबार का प्रतिष्ठित अमीर था। उसने हुमायूँ के आदेश से इस ग्रन्थ की रचना की। इसमें हुमायूँ के अधिनियमों, आविष्कारों और भवनों के निर्माण का वर्णन है। तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी भी उपलब्ध है।

3. तारीखे-शेरशाही

इसका लेखक अब्बास खाँ सरवानी, अकबर की सेवा में था। उसने अकबर के आदेश से इस ग्रन्थ की रचना की। अफगानों के सम्बन्ध में जितने भी ग्रन्थ लिखे गये उनमें ‘तारीखे शेरशाही’ सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसमें शेरशाह और इस्लामशाह के समय का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस ग्रन्थ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि लेखक ने घटनाओं की तिथियां नहीं दी हैं। इसलिये इसके घटनाक्रम को समझने के लिये अन्य ग्रन्थों का सहारा लेना पड़ता है। इस ग्रंथ में एक ही जैसे शब्दों का बाहुल्य है जिससे थकान उत्पन्न होती है। इन कमियों के उपरान्त भी सरवानी के इस ग्रन्थ की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

4. अकबरनामा

अकबर के प्रमुख दरबारी अबुल फजल ने अकबरनामा की रचना की। अबुल फजल का पिता शेख मुबारक और बड़ा भाई अबुल फैज भी उसी के समान विद्वान थे। इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) प्रथम भाग

प्रथम भाग को भी दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- (अ) अकबर का जन्म, तैमूरों की वंशावली, बाबर तथा हुमायूँ के राज्य का विस्तृत विवरण और (ब) अकबर के तख्त पर बैठने से लेकर 17वें वर्ष के मध्य तक का विवरण। यह भाग 1596 ई. तक पूरा हो पाया था।

(2) द्वितीय भाग

अकबरनामा के दूसरे भाग में अकबर के शासनकाल के 17 वें वर्ष के मध्य से लेकर 46वें वर्ष तक का उल्लेख है। अबुल फजल के बाद प्रथम भाग के दोनों हिस्सों को अलग-अलग करके नकल किया जाने लगा और उन्हें अकबरनामा भाग 1 और 2 के नाम से पुकारा जाने लगा। दूसरे भाग को भाग तीन कहा जाने लगा। इस प्रकार, अकबरनामा तीन भागों में विभाजित हो गया।

अबुल फजल, अकबर का घनिष्ठ मित्र, सलाहकार तथा प्रमुख दरबारी था। वह तुर्की, अरबी, हिन्दी और संस्कृत का ज्ञाता था। वह दर्शन, साहित्य तथा इतिहास ज्ञाता था। उसकी भाषा जटिल और आडम्बरपूर्ण है। अकबरनामा के ऐतिहासिक महत्त्व पर विद्वानों ने अलग-अलग मत व्यक्त किये हैं। स्मिथ के अनुसार- ‘इसमें ऐतिहासिक सामग्री उबा देने वाली आलंकारिक भाषा के बोझ में दफनाई गई है और ग्रन्थकार, जो अपने नायक का एक लज्जाजनक चाटुकार है, कभी-कभी सत्य को छुपा देता है, यहाँ तक कि जानबूझ कर विकृत भी कर देता है।

फिर भी अकबरनामा को अकबर के शासन के इतिहास की आधारशिला माना जाना चाहिए।’ मोरले आदि इतिहासकारों ने भी अबुल फजल की चाटुकारिता के कारण अकबरनामा की प्रामाणिकता में सन्देह व्यक्त किया है। इसके विपरीत ब्लोचमैन का मानना है कि इस प्रकार के दोषारोपण निर्मूल हैं। वस्तुतः यदि अकबरनामा के शब्दाडम्बर को दूर कर दिया जाय तो इसके

ऐतिहासिक महत्त्व के बारे में कोई सन्देह नहीं रह जाता। इतिहास के साथ-साथ ‘अकबरनामा’ से समकालीन राजनीति पर भी प्रकाश पड़ता है। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटना के साथ, छोटी-छोटी प्रस्तावनाएँ दी गई हैं। इस ग्रन्थ से अकबर के धार्मिक विचारों और नीति का पर्याप्त ज्ञान होता है। अबुल फजल ने विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करके इस ग्रन्थ की रचना की थी। इस कारण यह प्रामाणिक ग्रन्थ बन गया।

5. आइने-अकबरी

इस ग्रंथ की रचना भी अबुल फजल ने की। यह ग्रन्थ अकबरनामा के ही अन्तिम तथा निर्णायक अध्यायों के रूप में है, फिर भी उसमें कई नवीन एवं विशिष्ट बातें हैं जो अकबरनामा में नहीं हैं। इसे हम अकबरनामा का परिशिष्ट कह सकते हैं। इस ग्रन्थ के भी तीन भाग हैं। अकबर की शासन-प्रणाली की जानकारी की दृष्टि से यह एक मूल्यवान रचना है।

इसके महत्त्व की चर्चा करते हुए डॉ. परमात्माशरण ने लिखा है- ‘उस समय की राजनीतिक संस्थाओं के सम्बन्ध में आइने-अकबरी आज भी हमारा अप्रतिम स्रोत है। आईने अकबरी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में विवरणों और आँकड़ों की खान है परन्तु उसमें प्रशासन प्रणाली के वास्तविक कार्य-संचालन पर पर्याप्त प्रकाश नही डाला गया है। न उसमें शासन के विभिन्न विभागों और शाखाओं के सम्बन्ध में पर्याप्त सूचनाएँ दी गई हैं।’

आईने अकबरी के तीसरे भाग में हिन्दू सभ्यता और हिन्दू दर्शन का वर्णन है। इसके साथ अकबर की कुछ सूक्तियाँ भी हैं और अबुल फजल के वंश का वर्णन भी जोड़ दिया गया है। संक्षेप में, आईने-अकबरी अकबर के शासन के विभिन्न अंगों का विस्तृत विवरण है।

6. मुन्तखाब-उत-तवारीख

इसका लेखक अकबर का दरबारी अब्दुल कादिर बदायूनी था। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं। पहले भाग में बाबर और हुमायूँ के शासनकाल का वर्णन है। दूसरे भाग में 1595 ई. तक अकबर के शासनकाल का वर्णन है। तीसरे भाग में मुसलमानों और सन्तों का विवरण दिया गया है।

बदायूँनी ने अकबर के आदेश पर महाभारत (रज्मनामा) और रामायण का फारसी में अनुवाद भी किया। उसने कुछ अन्य रचनाएँ भी लिखीं। बदायूँनी कट्टर रूढ़िवादी सुन्नी मुसलमान था। वह धर्मान्धता तथा संकीर्णता से ग्रस्त था। उसे अकबर की प्रगतिशील, सहिष्णु तथा समन्वयवादी नीतियाँ पसन्द नहीं थीं। इसलिये उसने अकबर के शासन की अतिशयोक्ति पूर्ण शब्दों से निन्दा की।

उसने ग्रन्थ की रचना गुप्त रूप से की। इस कारण मुन्तखाब-उत-तवारीख की जानकारी अकबर के शासनकाल में किसी को नहीं हो पाई। बदायूँनी ने इस ग्रन्थ को राजनीतिक इतिहास के रूप में लिखा है। इसमें अकबर के समय की घटनाओं, युद्धों, विद्रोहों, अकालों तथा प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत विवरण दिया गया है।

अकबर की धार्मिक नीति से सम्बन्धित प्रत्येक घटना तथा इबादतखाना में हुए वाद-विवादों का विवरण भी दिया गया है। बदायूँनी ने अकबर पर आरोप लगाया है कि वह व्यक्तिगत रूप से इस्लाम धर्म की जड़ें खोद रहा है। इस ग्रन्थ में कई तिथियाँ गलत दी गई हैं। अतः इसका घटनाक्रम दोषपूर्ण हो जाता है। इन दोषों के उपरान्त भी ऐतिहासिक दृष्टि से यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है।

7. तबकाते-अकबरी

इस ग्रन्थ का लेखक ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद था। वह विद्वान् होने के साथ-साथ पराक्रमी योद्धा भी था। उसने अकबर के विभिन्न अभियानों में महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। तबकाते-अकबरी में 987-88 ई. से लेकर 1593-94 ई. तक का भारत का इतिहास उपलब्ध हैं। इसमें न केवल बाबर, हुमायूँ और अकबर का विवरण हैं अपितु देश के प्रान्तीय मुस्लिम राज्यों का वर्णन भी है।

डॉ. रिजवी ने लिखा हैं कि निजामुद्दीन ने अपने ग्रन्थ की रचना के लिये अकबरनामा सहित 28 ग्रन्थों का सहारा लिया और सामग्री की काफी खोजबीन तथा जाँच-पड़ताल के बाद लिखा। निजामुद्दीन ने धार्मिक कट्टरपन तथा पक्षपात का सहारा नहीं लिया। इस दृष्टि से उसकी रचना अबुल फजल तथा बदायूँनी से अधिक निष्पक्ष कही जा सकती हैं। डॉ. आशीर्वादीलाल ने लेखक पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि इस ग्रन्थ में निजी मत ठीक से व्यक्त नहीं किये गये हैं।

स्मिथ ने लिखा है कि यह ग्रन्थ बाह्य घटनाओं का रूखा एवं नीरस वृत्तान्त है। यह अकबर की धार्मिक उच्छृंखलताओं की सर्वथा उपेक्षा कर देता है और अनेक महत्त्वपूर्ण बातों का किंचित्मात्र भी उल्लेख नहीं करता। इतना होने पर भी यह ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है।

8. मआसीर-ए-जहाँगीरी

इस ग्रन्थ का लेखक कामगार खाँ था। इस ग्रंथ की काफी सामग्री ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ से ली गई है। डॉ. बेनीप्रसाद सक्सेना ने लिखा है कि यद्यपि यह ग्रन्थ गम्भीर दोषों का शिकार है तथापि शाहजहाँ के विद्रोह तथा उसके राज्याभिषेक के तुरन्त पूर्व के घटनाक्रम आदि का विवरण देकर ऐसे अन्तराल को भरता है जो इस ग्रंथ के बिना रिक्त ही रह जाता।

9. बादशाहनामा (पादशाहनामा)

इस ग्रंथ में शाहजहाँ के शासनकाल का इतिहास है। इस ग्रंथ की रचना तीन लेखकों ने की। प्रत्येक लेखक ने अलग-अलग वर्षों का विवरण लिखा-

(अ) मुहम्मद अमीन कजवीनीकृत बादशाहनामा

इस ग्रंथ में शाहजहाँ के जन्म से लेकर उसके शासनकाल के दसवें वर्ष तक का विवरण दिया गया है। कजवीनी शाहजहाँ का प्रथम राजकीय इतिहासकार था। शाहजहाँ ने अपने शासन के आठवें वर्ष में अपने राज्य का इतिहास लिखने का आदेश दिया।

जब कजवीनी शासन के दस वर्षों का इतिहास लिख चुका तो उसे अचानक पद से हटा दिया गया। कजवीनी की भाषा शैली सरल और आकर्षक है परन्तु उसकी निष्पक्षता में संदेह है। वह अपने आश्रयदाता शाहजहाँ के प्रति पक्षपातपूर्ण है। फिर भी शाहजहाँ के शासन के प्रारम्भिक दस वर्षों की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

(ब) लाहौरीकृत बादशाहनामा

इस ग्रंथ में तैमूर से लेकर शाहजहाँ के पूर्वजों का संक्षिप्त वर्णन तथा शाहजहाँ के शासनकाल के प्रारम्भ होने से लेकर उसके बीस वर्षों तक के शासन का विवरण दिया गया है। कजवीनी के पश्चात् लाहौरी को राजकीय इतिहासकार नियुक्त करके बादशाहनामा लिखने का आदेश दिया गया।

वह सम्भवतः 1648 ई. तक यह कार्य करता रहा। बाद में वृद्धावस्था के कारण उसे काम बन्द करना पड़ा। लाहौरी का ग्रन्थ बहुत बड़ा है। इस ग्रंथ में राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ शाहजहाँ के मनसबदारों, उसके समय के प्रसिद्ध शेखों, विद्वानों, हकीमों और कवियों की नामावली भी दी गई है। इस ग्रंथ के आरम्भ में अबुल फजल की शैली की नकल देखने को मिलती है परन्तु बाद में कजवीनी की नकल देखने को मिलती है। शाहजहाँ के राज्य के लिए इसे एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

(स) वारिसकृत बादशाहनामा

अब्दुल हमीद लाहौरी के अधूरे काम को उसके शिष्य मुहम्मद वारिस ने पूरा किया। उसने शाहजहाँ के शासन के अन्तिम दौर का इतिहास लिखा। यह इतिहास शाहजहाँ के शासनकाल के 21वें वर्ष में आरम्भ होकर 30वें वर्ष तक जारी रहता है। इस ग्रन्थ को शाहजहाँनामा भी कहते हैं।

10. शाहजहाँनामा

इस नाम से दो ग्रंथ मिलते हैं। वारिसकृत बादशानामा को भी शाहजहाँनामा कहते हैं। एक अन्य लेखक मुहम्मद ताहिर इनायतखाँ की कृति भी शाहजहाँनामा के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें 1657-1658 ई. का इतिहास दिया गया है।

11. आलमगीरनामा

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद काजिम बादशाहनामा के लेखक कजवीनी का पुत्र था। इस ग्रन्थ की रचना 1688 ई. में हुई। उसकी स्तुतिपूर्ण शैली औरंगजेब को बहुत पसंद आई और उसे बादशाह से सम्बन्धित असाधारण घटनाओं तथा विजय-अभियानों को ग्रन्थ रूप में लिपिबद्ध करने का आदेश दिया गया।

इस ग्रन्थ की रचना के लिए औरंगजेब ने लेखक को समस्त प्रकार के साधन उपलब्ध कराये। मुहम्मद काजिम ने इस ग्रन्थ में औरंगजेब (आलमगीर) के शासन के प्रथम दस वर्षों का इतिहास लिखा है। उसने अपने आश्रयदाता की खूब प्रशंसा की और उसके भाग्यहीन भाइयों की कटु निन्दा करते हुए उनके लिए निम्न एवं अपशब्दों का प्रयोग किया।

उसने दाराशिकोह के लिए वेशिकोह (अप्रतिष्ठित) और शुजा के लिए नाथुजा (कायर) शब्दों का प्रयोग किया। जब यह ग्रन्थ औरंगजेब को भेंट किया गया तो उसे पसन्द नहीं आया और उसने आगे का वृत्तान्त नहीं लिखने का आदेश दिया। एकपक्षीय रचना होने के कारण इसे प्रामाणिक इतिहास नहीं माना जाता।

12. मआसिर-ए-आलमगीरी

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद साफी मुस्तइद्द खाँ, मंगोल साम्राज्य के वजीर इनायतुल्लाखाँ का मुंशी था। इस ग्रंथ में औरंगजेब के शासन का इतिहास है। इस ग्रन्थ की रचना किसी के आदेश से न होकर स्वप्रेरणा से हुई। 1710 ई. में ग्रन्थ की रचना पूरी हो गई। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं। साथ में एक परिशिष्ट भी है।

पहला भाग काजिम के आलमगीरनामा का संक्षिप्तिकरण मात्र है। दूसरे भाग में औरंगजेब के शासन के अन्तिम 40 वर्षों तथा उसकी मृत्यु का हाल दिया गया है। परिशिष्ट में बादशाह से सम्बन्धित कहानियों तथा शाही परिवार का पूरा वृत्तान्त दिया गया है।

मुआसिर-ए-आलमगीरी के ऐतिहासिक मूल्यांकन के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह घटनाओं एवं तथ्यों का खजाना है तो अन्य विद्वानों के अनुसार लेखक ने अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं को छोड़ दिया है। उसने अपने ग्रन्थ में अनेक ऐसी तुच्छ घटनाओं का उल्लेख किया जिनको इतिहास में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए। फिर भी, औरंगजेब के दक्षिण प्रवास के समय की घटनाओं को जानने के लिए यह ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है।

13. मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ)

इस ग्रन्थ का लेखक मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ था। औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु खाफी खाँ ने गुप्त रूप से इस ग्रन्थ की रचना की। यह एक विशाल ग्रन्थ है जो 1519 ई. में बाबर के आक्रमण से आरम्भ होकर मुहम्मदशाह के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ पूरा होता है।

ग्रन्थ का महत्व 1605 ई. से 1733 ई. तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (1658 ई.) से लेकर 1733 ई. के लिए अधिक है। लेखक ने मंगोल बादशाहों के राज्य में कई पदों पर कार्य किया। अनेक अमीरों के साथ उसके अच्छे सम्बन्ध थे। इसलिये उसकी सामग्री का क्षेत्र बहुत विशाल था।

विभिन्न सूत्रों से प्राप्त विवरणों को अच्छी प्रकार से जाँच-पड़ताल करने के बाद उसे जो सत्य लगा, उसने लिखा। इस ग्रंथ में सैनिक अभियानों और शाही उपलब्धियों का विस्तृत विवरण है। वह स्वयं एक दक्ष राजस्व अधिकारी था और उसने अपने समय की राजस्व व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर व्यापक प्रकाश डाला।

उसने मनसबदारी व्यवस्था के पुनर्निर्माण के सम्बन्ध में किये गये प्रयासों, मंगोल दरबार की दलबन्दी, सैय्यदों और निजामुल्मुल्क की प्रतिद्विन्द्विता आदि घटनाओं का उल्लेख किया है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है। उसने मंगोल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया है। उसके ग्रन्थ से तत्कालीन साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। उसने भारत में व्यापार के लिए बसने वाले यूरोपियन लोगों की गतिविधियों का विवरण विस्तार से दिया है। इस ग्रन्थ का इतिहास में बड़ा सम्मान एवं महत्त्व है।

14. इबरतनामा

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद कासिम था। इस ग्रंथ में औरंगजेब की मृत्यु से लेकर कुतुबुलमुल्क सैय्यद अब्दुल्ला की मृत्यु तक का इतिहास है। औरंगजेब की मृत्यु के बाद होने वाले उत्तराधिकार संघर्षों की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इस ग्रन्थ से तत्कालीन अस्थिर राजनीतिक स्थिति तथा मंगोल अमीरों की दलबन्दी के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

(स.) हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1. नुश्खा-ए-दिलकुशा

इस ग्रंथ का लेखक भीमसेन था। उसने फारसी भाषा में औरंगजेब के राज्यकाल का इतिहास लिखा। उसने कई मंगोल सेनानायकों, महाराजा जसवन्तसिंह तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गये उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा।

भीमसेन नेे औरंगजेब के शासनकाल की घटनाओं, परिस्थितियों, उनके वास्तविक कारणों एवं परिणामों का उल्लेख किया है। सर यदुनाथ सरकार ने इस ग्रन्थ को अद्वितीय तथा बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी देने वाला बताया है। भीमसेन ने यह ग्रन्थ किसी बादशाह की कृपा प्राप्त करने के लिए नहीं लिखा था, अतः उसने घटनाओं को छिपाने अथवा छोड़ देने का लोभ नहीं किया और निष्पक्ष रूप से लिखा।

राजनीतिक घटनाओं और युद्धों के साथ-साथ उसने खाद्य-वस्तुओं की कीमतें, सड़क मार्गों की वास्तविक स्थिति, उच्चवर्ग के लोगों का सामाजिक जीवन, आमोद-प्रमोद आदि के बारे में भी सविस्तार लिखा है। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का भी वर्णन किया है। इस प्रकार यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है।

2. फुतूहाते आलमगीरी

इस ग्रंथ का लेखक पाटन निवासी ईश्वरदास नागर था। उसने औरंगजेब के शासन काल के प्रारम्भ से लेकर 34वें वर्ष तक का इतिहास लिखा। इस ग्रंथ में राजपूतों के सम्बन्ध में दिया गया विवरण अधिक महत्त्वपूर्ण है।

3. खुलासत-उल-तवारीख

इस ग्रन्थ का लेखक पटियाला निवासी सुजानराय खत्री था। इस ग्रन्थ में महाभारतकाल से लेकर औरंगजेब के शासनकाल तक का विवरण है। सुजानराय ने अपने ग्रन्थ की रचना के लिए लगभग 27 पूर्ववर्ती ग्रन्थों की सहायता ली। यह भारत का सामान्य इतिहास है फिर भी, मध्यकालीन भारतीय इतिहास की अनेक घटनाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देता है।

4. तजकिरात-उस-सलातीन चगता

इसका लेखक कामवर खाँ मूलतः हिन्दू था। बाद में वह मुसलमान बन गया। 1723 ई. में उसने यह ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया। इस ग्रंथ के पहले भाग में चंगेज खाँ से लेकर जहाँगीर के शासनकाल तक की घटनाओं का उल्लेख है। दूसरे भाग में शाहजहाँ से लेकर 1724 ई. तक की घटनाओं का उल्लेख है। यद्यपि इस ग्रन्थ में बहुत-सी कमियाँ हैं, तथापि यह ग्रन्थ 18वीं सदी के आरम्भिक वर्षों के इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।

(द.) विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1.  ट्रेवल्स इन दी मंगोल एम्पायर

इस ग्रंथ का लेखक फेंक्वीएस बर्नियर शाहजहाँ के समय भारत आया था। वह फ्रांस का रहने वाला था। उसका जन्म 1630 ई. में हुआ था। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। दर्शन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र तथा अन्य विभिन्न विषयों पर उसका पूर्ण अधिकार था। भारत की यात्रा पर आने के पूर्व वह कई यूरोपीय देशों तथा फिलिस्तीन, सीरिया और मिò आदि का भ्रमण कर चुका था।

1658 ई. में वह भारत आया और लगभग 12 वर्ष तक भारत में रहा। इस अवधि में उसने भारत के अनेक भागों को देखा। 1669 ई. में वह स्वदेश पहुँच गया और एक वर्ष बाद उसने अपने यात्रा-वृत्तान्त को एक ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित किया जो ट्रेवल्स इन दी मंगोल एम्पायर कहलाया।

बर्नियर ने शाहजहाँ की मृत्यु, दारा के गुणों, दुःखों और यातनाओं का, शुजा की दयनीय स्थिति, मंगोलशाही हरम, मंगोल प्रान्तपतियों के अत्याचारों, जहाँआरा का चरित्र-चित्रण, मंगोलों की सामरिक व्यवस्था, दिल्ली, आगरा, कश्मीर आदि नगरों का वर्णन किया है। बर्नियर ने तत्कालीन भारत की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का भी वर्णन किया है।

बर्नियर ने अधिकांश सूचनाएँ विभिन्न सूत्रों से प्राप्त की। उसकी सूचनाओं के सूत्र कितने सही तथा निष्पक्ष थे, यह विवाद का विषय है। उसने जहाँआरा के चरित्र और शाहजहाँ के साथ औरंगजेब के विनम्र व्यवहार जैसी कई मिथ्या बातें लिखी हैं।

2. स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया)

इस ग्रन्थ का लेखक निकोलोआ मनूची था। उसका जन्म इटली के वेनिस नगर में 1637 ई. में हुआ था। चौदह वर्ष की अल्पायु में ही वह विश्व भ्रमण के लिए निकल पड़ा। 1650 ई. में वह सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया।

मनूची ने दारा की तरफ से उत्तराधिकार युद्ध में भाग लिया। जब दारा सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो वह भी उसके साथ गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया।

उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किये गये अभियान में भाग लिया। वहाँ से वह गोआ होता हुआ लाहौर पहुँचा जहाँ उसने सात वर्ष बिताये। कुछ समय के लिए उसने शाहआलम की सेवा में भी काम किया। उसके अन्तिम वर्ष मद्रास में बीते। 1717 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

मनूची ने अपने ग्रन्थ की रचना सम्भवतः 1699 से 1705 ई. के मध्य की। ग्रन्थ का प्रारम्भिक भाग इटालियन भाषा में लिखा। कुछ पृष्ठ पुर्तगाली भाषा में लिखे और शेष भाग फ्रांसीसी भाषा में लिखा। यह एक विशाल ग्रन्थ है। प्रथम बीस अध्यायों में उसकी वेनिस से दिल्ली तक की यात्रा का वृत्तान्त है।

दूसरे भाग में तैमूर से शाहजहाँ तक का संक्षिप्त इतिहास है। तीसरे भाग में मंगोल दरबार, उनकी शासन-व्यवस्था, राजस्व-व्यवस्था, हिन्दू राज्यों की शासन-व्यवस्था, हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों तथा पर्व-समारोहों, सड़कों एवं यात्रियों की सुरक्षा इत्यादि का उल्लेख है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में उसने जगह-जगह अपने संस्मरण लिखे हैं।

मनूची ने जिन सूत्रों के आधार पर इतिहास पर लिखा है, वे ज्यादा सही नहीं लगते क्योंकि उसकी तिथियाँ सहीं नहीं हैं। तैमूर से शाहजहाँ तक की वंशावली में भी अनेक त्रुटियाँ हैं। क्रमबद्धता की भी कमी है। उसने सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हुए शाहजहाँ के व्यक्तिगत चरित्र पर कई लांछन लगाये जो सही नहीं हैं।

औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता तथा उसके दक्षिणी अभियानों, अमीरों एवं अपने सम्बन्धियों के साथ उसके व्यवहार का उल्लेख सत्य के निकट है। भारत के विभिन्न नगरों तथा शाही महल की गतिविधियों का भी रोचक वर्णन है। उसने राजस्व सम्बन्धी जो आंकड़े दिये हैं तथा विदेशी व्यापार से होने वाली आय का जो विस्तृत विवरण दिया है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है।

उसने तत्कालीन भारत के सामाजिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला है परन्तु इस सम्बन्ध में उसका विवरण ज्यादा सही नहीं है। उसने लिखा है कि हिन्दू लोग अस्वच्छ हैं। वस्तुतः वह हिन्दुओं की प्रथाओं को ठीक से समझ नहीं पाया। इन कमियों के उपरान्त भी शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाल की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त संस्कृत तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक ऐतिहासिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। लिखित साहित्य के अतिरिक्त शिलालेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से भी मंगोलकालीन शासन के इतिहास की जानकारी मिलती है।

मुगलकालीन लिखित स्रोतों की समीक्षा

मुगल बादशाहों के इतिहास की जानकारी के लिए स्वयं मुगल बादशाहों, शाही परिवार के सदस्यों तथा राजकीय अधिकारियों के साथ-साथ स्वतंत्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। मंगोल शासकों द्वारा लिखित आत्मकथाएँ तथा अन्य लेखकों द्वारा लिखित उनकी जीवनियाँ भी उस काल के इतिहास को जानने का प्रमुख स्रोत हैं। ये स्रोत अधिकांशतः उन लोगों के माध्यम से प्राप्त हुए हैं जो या तो स्वयं घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे अथवा उन्होेंने प्रत्यक्षदर्शियों से सुनकर अपनी रचनाएँ लिखी थीं।

मुगलकालीन फारसी लेखकों की कमजोरियाँ

मुगलकालीन फारसी लेखकों के विवरण को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

(1.) अधिकांश लेखकों ने राज्याश्रय के अन्तर्गत अथवा सुल्तान या सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे। अतः वे अपने शासक के पक्ष को ही प्रतिपदित करते रहे और उसके दोषों को उजागर करने का साहस नहीं कर सके।

(2.) फारसी लेखक अपनी संकीर्ण तथा धार्मिक कट्टरता से ऊपर नही उठ सके। परिणामस्वरूप वे एक इतिहासकार की निष्पक्षता को भुला बैठे।

(3. फारसी लेखकों ने घटनाओं की तिथियाँ बहुत कम दी हैं। कई लेखकों ने गलत तिथियों लिखी हैं। इस कारण इतिहास का निर्माण करने में कठिनाई उत्पन्न हो जाती है।

(4.) फारसी लेखकों ने शासकीय वर्ग एवं अमीर वर्ग के रहन-सहन, खान-पान, आमोद-प्रमोद पर ही अधिक ध्यान दिया। उनकी रचनाओं में सर्वसाधारण की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर पर्याप्त प्रकाश नहीं डाला गया।

(5.) अधिकांश लेखकों ने घटनाओं के कारणों और सन्दर्भों में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास नहीं किया।

विदेशी लेखकों की कमजोरियाँ

विदेशी लेखकों के विवरण भी अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। इसके कई कारण हैं-

(1.) विदेशी लेखक यात्री के रूप में इस देश में आये थे इस कारण वे बहुसंख्य हिन्दू जनता तथा अल्पसंख्य मुस्लिम शासकों की सोच के अंतर को ढंग से नहीं समझ सके।

(2.) विदेशी लेखकों ने भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को समझने में भारी भूल की।

(3. विदेशी लेखक पश्चिम की श्रेष्ठता के पूर्वाग्रह से पीड़ित थे।

(4.) विदेशी लेखकों को भारत के मूल इतिहास की जानकारी नहीं होने के कारण उन्होंने राजनीतिक घटनाओं का विवरण लिखने में अनेक त्रुटियाँ कीं।

(5.) विदेशी लेखक अपने वर्णन को चटपटा बनाने के लिये घटनाओं, नगरों तथा गाँवों का रोचक चित्र तो प्रस्तुत करते हैं किंतु उनकी पृष्ठभूमि को समझाने में असफल रहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

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गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक - www.bharatkaitihas.com

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक बचपन में ही गुलाम के रूप में बेच दिया गया था। इसलिये उसकी सामाजिक हैसियत अच्छी नहीं थी किंतु मुहम्मद गौरी को प्रसन्न करके उसने अमीर का पद प्राप्त कर लिया।

गुलाम वंश की स्थापना

गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. से 1194 ई. तक भारत पर कई आक्रमण किये तथा पंजाब से लेकर दिल्ली, अजमेर तथा कन्नौज तक विस्तृत अनेक राज्यों को जीतकर विशाल भूभाग को अपने अधीन किया। मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने सर्वाधिक योग्य गुलाम तथा सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को 1194 ई. में भारतीय क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक 12 साल तक दिल्ली पर गजनी के गवर्नर के रूप में शासन करता रहा। 1206 ई. में जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई तो अलाउद्दीन उसका उत्तराधिकारी हुआ किंतु उसे शीघ्र ही महमूद बिन गियासुद्दीन ने अपदस्थ करके गजनी पर अधिकार कर लिया। गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सुल्तान बना दिया।

इस प्रकार 1206 ई. से लेकर 1210 ई. में अपनी मृत्यु होने तक कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन करता रहा। ऐबक ने भारत में मुस्लिम राजवंश की स्थापना की जिसे गुलाम-वंश अथवा दास-वंश कहते है। इसे गुलाम-वंश कहे जाने का कारण यह है कि इस वंश के समस्त शासक अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में गुलाम रह चुके थे।

इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी का गुलाम था। इस वंश का दूसरा शासक इल्तुतमिश, कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था। इस वंश का तीसरा शासक बलबन, इल्तुतमिश का गुलाम था। अतः यह वंश, गुलाम वंश कहलाता है। गुलाम वंश के समस्त शासक तुर्क थे।

कुछ इतिहासकार गुलाम वंश नामकरण उचित नहीं मानते। उनके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में ‘कुतुबी’, इल्तुतमिश ने ‘शम्मी’ तथा बलबन ने ‘बलबनी’ राजवंश की स्थापना की। इस प्रकार इस समय में दिल्ली में एक वंश ने नहीं, अपितु तीन राजवंशों ने शासन किया। इन इतिहासकारों के अनुसार इस काल को दिल्ली सल्तनत का काल कहना चाहिये।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

प्रारम्भिक जीवन

कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में दिल्ली सल्तनत का संस्थापक, गुलाम वंश का संस्थापक तथा कुतुबी वंश का संस्थापक था। वह दिल्ली का पहला मुसलमान सुल्तान था। उसका जन्म तुर्किस्तान के कुलीन तुर्क परिवार में हुआ था किंतु वह बचपन में अपने परिवार से बिछुड़ गया तथा गुलाम के रूप में बाजार में बेच दिया गया।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक कुरूप किंतु प्रतिभावान बालक था। एक व्यापारी उसे दास के रूप में बेचने के लिए गजनी ले गया। सबसे पहले अब्दुल अजीज कूकी नामक काजी ने कुतुबुद्दीन को खरीदा। यहाँ पर उसने काजी के बच्चों के साथ घुड़सवारी तथा थोड़ी-बहुत शिक्षा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात् मुहम्मद गौरी ने उसकी कुरूपता पर विचार न करके उसे मोल ले लिया।

कुतुबुद्दीन ने अपने गुणों से मुहम्मद गौरी को मुग्ध कर लिया और उसका अत्यन्त प्रिय तथा विश्वासपात्र दास बन गया। वह अपनी योग्यता के बल पर धीरे-धीरे एक पद से दूसरे पद पर पहुँचता गया और ‘अमीर आखूर’ (घुड़साल रक्षक) के पद पर पहुँच गया।

वह मुहम्मद गौरी का इतना प्रिय बन गया कि गौरी ने उसे ऐबक अर्थात् चन्द्रमुखी के नाम से पुकारना आरम्भ किया। जब मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण करना आरम्भ किया तब ऐबक भी भारत आया और अपने सैनिक-गुणों का परिचय दिया। मुहम्मद गौरी को अपनी भारतीय विजय में ऐबक से बड़ा सहयोग मिला।

वाइसराय के रूप में ऐबक की सफलताएँ

1194 ई. में मुहम्मद गौरी कन्नौज विजय के उपरान्त गजनी लौटा, तब उसने भारत के विजित भागों का प्रबन्ध ऐबक के हाथों में दे दिया। इस प्रकार ऐबक मुहम्मद गौरी के भारतीय राज्य का वाइसराय बन गया। वाइसराय के रूप में उसकी सफलताएँ इस प्रकार से हैं-

सामरिक उपलब्धियाँ: कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के विजय अभियान को जारी रखा। 1195 ई. में उसने कोयल (अलीगढ़) जीता। इसके बाद उसने अन्हिलवाड़ा को नष्ट किया। 1196 ई. में उसने मेड़ों को परास्त किया जो चौहानों की सहायता कर रहे थे। 1197-98 ई. में उसने बदायूँ, चन्दावर और कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

1202-03 ई. में उसने चंदेलों को परास्त कर बुंदेलखण्ड तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गौरी की मृत्यु से पूर्व ऐबक ने लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इस विशाल मुस्लिम साम्राज्य को परास्त करके पुनः दिल्ली तथा उत्तर भारत के राज्यों पर अधिकार करना हिन्दू राजकुलों के वश की बात नहीं रही।

कूटनीतिक उपलब्धियाँ

सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक बचपन में ही गुलाम के रूप में बेच दिया गया था। इसलिये उसकी सामाजिक हैसियत अच्छी नहीं थी किंतु मुहम्मद गौरी को प्रसन्न करके उसने अमीर का पद प्राप्त कर लिया। अपनी हैसियत बढ़ाने के लिये उसने सदैव मुहम्मद गौरी के प्रति स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया।

अमीरों के बीच अपनी निजी हैसियत बढ़ाने के लिये भी उसने कूटनीति का सहारा लिया तथा अपने आप को एवं अपने परिवार को वैवाहिक सम्बन्धों से मजबूत बनाया। सुल्तान बनने से पूर्व ही उसने वैवाहिक सम्बन्धों द्वारा अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया। ऐबक ने गजनी के शासक यल्दूज की पुत्री के साथ विवाह किया।

ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह सिन्ध तथा मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ किया तथा दूसरी पुत्री का विवाह प्रतिभाशाली तथा होनहार गुलाम इल्तुतमिश के साथ किया। ऐबक 12 वर्ष तक दिल्ली में वाइसराय की हैसियत से शासन करता रहा तथा धीरे-धीरे सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार जमा लिया।

उसने कभी भी मुहम्मद गौरी से विद्रोह करके स्वतंत्र शासक बनने की चेष्टा नहीं की। मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद भी उसने तब तक सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की जब तक कि गजनी के शासक महमूद बिन गियासुद्दीन ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं कर लिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्यारोहण

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली में था। जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु का समाचार गजनी से लाहौर पहुँचा तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन को लाहौर का शासन अपने हाथों में लेने का निमंत्रण भिजवाया। यह निमंत्रण पाकर कुतुबुद्दीन तुरन्त दिल्ली से लाहौर के लिए चल पड़ा और वहाँ पहुँच कर लाहौर का शासन अपने हाथ में ले लिया।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के तीन मास उपरान्त 24 जून 1206 ई. को कुतुबुद्दीन का राज्यारोहण हुआ। तख्त पर बैठने के बाद भी ऐबक ने सुल्तान की उपाधि का प्रयोग नहीं करके मालिक तथा सिपहसालार की उपाधियों का ही प्रयोग किया। उसने अपने नाम की मुद्रायें भी नही चलवाईं और न अपने नाम से खुतबा ही पढ़वाया।

संभवतः वह मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारी से वैमनस्य उत्पन्न किये बिना, भारत में एक स्वतन्त्र तुर्की शासन की स्थापना करना चाहता था। उसने अपने एक दूत के माध्यम से एक प्रस्ताव गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन के पास भेजा कि गियासुद्दीन, कुतुबुद्दीन को भारत का स्वतन्त्र सुल्तान बना दे तो वह ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध उसकी सहायता करेगा।

उसका यह प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। 1208 ई. में गियासुद्दीन ने ऐबक को राजछत्र, ध्वजा, सिंहासन, दुंदुभि आदि राज्यसूचक वस्तुएँ भेजीं तथा उसे सुल्तान की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

दिल्ली का स्वतन्त्र सुल्तान बनने के उपरान्त ऐबक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) प्रतिद्वन्द्वियों की समस्या

सर्वप्रथम ऐबक को अपने प्रतिद्वन्द्वियों का सामना करना था जिनमें इख्तियारूद्दीन, यल्दूज तथा कुबाचा प्रमुख थे। इनके अधिकार में बहुत बड़े राज्य थे और वे अपने को ऐबक का समकक्षी समझते थे। यल्दूज गजनी में और कुबाचा मुल्तान में शासन करता था।

(2) हिन्दू सरदारों की समस्या

ऐबक की दूसरी कठिनाई यह थी कि प्रमुख हिन्दू सरदार, खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे थे। 1026 ई. में चंदेल राजपूतों ने अपनी राजधानी कालिंजर पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया। गहड़वाल राजपूतों ने हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में फर्रूखाबाद तथा बदायूँ में धाक जमा ली।

गवालियर फिर से प्रतिहार राजपूतों के हाथों में चला गया। अन्तर्वेद में भी कई छोटे-छोटे राज्यों ने कर देना बन्द कर दिया और तुर्कों को बाहर निकाल दिया। सेन-वंशी शासक पश्चिमी बंगाल से पूर्व की ओर चले गये थे परन्तु अपने राज्य को प्राप्त कने के लिए सचेष्ट थे। बंगाल तथा बिहार में भी इख्तियारूद्दीन के मर जाने के बाद विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी।

(3) मध्य एशिया से आक्रमण की आशंका

ऐबक को सर्वाधिक भय मध्य एशिया से आक्रमण का था। ख्वारिज्म के शाह की दृष्टि गजनी तथा दिल्ली पर लगी हुई थी।

कठिनाइयों का निवारण

ऐबक में कठिनाइयों एवं बाधाओं को दूर करने की पूर्ण क्षमता थी उसने साहस और धैर्य से कठिनाइयों एवं बाधाओं को दूर किया।

(1) प्रतिद्वन्द्वियों पर विजय

भारत में ऐबक के तीन प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी थे- इख्तियारूद्दीन, कुबाचा तथायल्दूज।

इख्तियारूद्दीन

इख्तियारूद्दीन ने सदैव ऐबक का आदर किया और उसी की अधीनता में शासन किया।

कुबाचा

कुबाचा ऐबक का दामाद था। अतः कुबाचा ने उसका विरोध नहीं किया और न उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाया।

यल्दूज

यल्दूज ऐबक का श्वसुर था परन्तु यल्दूज ने ऐबक का विरोध किया। 1208 ई. में यल्दूज ने गजनी में एक सेना तैयार की और मुल्तान पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया परन्तु ऐबक ने शीघ्र ही उसे वहाँ से मार भगाया तथा गजनी पर अधिकार कर लिया।

गजनी के तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार ऐबक अपनी विजय से मदांध होकर मद्यपान में व्यस्त हो गया। ऐबक की सेना ने गजनी के लोगों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। इससे तंग आकर गजनी के अमीरों ने यल्दूज को गजनी आने के लिए आमन्त्रित किया। जबकि वास्तविकता यह थी कि गजनी के लोग यह सहन नहीं कर सकते थे कि दिल्ली का सुल्तान गजनी पर शासन करे और गजनी उसके साम्राज्य का एक प्रान्त बन कर रहे।

यह गजनी तथा उनके निवासियों, दोनों के लिये अपमानजनक बात थी। यल्दूज ने इस अवसर को हाथ से नहीं जाने दिया। उसने फिर से गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया। ऐबक को विवश होकर दिल्ली लौट जाना पड़ा परन्तु उसने यल्दूज के भारतीय साम्राज्य पर प्रभुत्व स्थापित करने के समस्त प्रयत्नों को विफल कर दिया।

(2) मध्य एशिया की राजनीति से अलग

कुतुबुद्दीन ऐबक ने बुद्धिमानी दिखाते हुए स्वयं को मध्य-एशिया की राजनीति से अलग रखा। अतः वह उस ओर से आने वाली सम्भाव्य आपत्तियों से सर्वथा विमुक्त रहा।

(3) बंगाल की समस्या

इख्तियारूद्दीन की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध-विच्छेद करने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच कर ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। अलीमर्दा खाँ बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। उसने ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और दिल्ली को वार्षिक कर देने के लिए उद्यत हो गया।

(4) राजपूतों का दबाव

ऐबक उत्तर-पश्चिम की राजनीति तथा बंगाल के झगड़े में इतना व्यस्त रहा कि उसे राजपूतों की शक्ति को दबाने का अवसर नहीं मिला। उसने पूर्वी तथा पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा की व्यवस्था करके अन्तर्वेद के राजाओं पर दबाव डाला परन्तु यल्दूज से आतंकित होने के कारण वह अपनी पूरी शक्ति के साथ राजपूतों से लोहा नहीं ले सका।

इसका परिणाम यह हुआ कि यद्यपि उसने बदायूं पर अपना आधिपत्य स्थापित करके अपने दास इल्तुतमिश को वहाँ का शासक नियुक्त कर दिया और अन्य छोटे-छोटे राजाओं से कर वसूल किया परन्तु उसने कालिंजर तथा ग्वालियर को फिर से अधिकार में करने का प्रयास नहीं किया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु

ऐबक ने केवल चार वर्ष शासन किया। 1210 ई. में जब ऐबक लाहौर में चौगान अथवा पोलो खेल रहा था तब वह घोड़े से गिर पड़ा। काठी का उभड़ा हुआ भाग उसके पेट में घुस गया और तुरन्त उसकी मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में दफना दिया गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक का शासन

दिल्ली पर ऐबक का शासन 12 साल तक मुहम्मद गौरी के वाइसराय के रूप में तथा 4 साल तक स्वतंत्र शासक के रूप में रहा। मुहम्मद गौरी के जीवित रहते, ऐबक उत्तर भारत को विजित करने में लगा रहा। स्वतंत्र शासक के रूप में उसका काल अत्यन्त संक्षिप्त था। इस कारण शासक के रूप में उसकी उपलब्धियाँ विशेष नहीं थीं फिर भी अपने चार वर्ष के कार्यकाल में उसने भारत में दिल्ली सल्तनत तथा गुलाम वंश की जड़ें मजबूत कर दीं। उसकी उपलब्धियाँ इस प्रकार से रहीं-

(1.) उदार शासक

मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के न्याय तथा उदारता की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है और लिखा है कि उसके शासन में भेड़ तथा भेड़िया एक ही घाट पर पानी पीते थे। उसने अपनी प्रजा को शांति प्रदान की जिसकी उन दिनों बड़ी आवश्यकता थी। सड़कों पर डाकुओं का भय नहीं रहता था और शाँति तथा सुव्यवस्था स्थापित थी किंतु भारत के मुस्लिम इतिहासकारों का यह वर्णन गजनी के इतिहासकारों के वर्णन से मेल नहीं खाता।

गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ऐबक गजनी पर अधिकार करके मद्यपान में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने गजनी वासियों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया जिससे दुखी होकर जनता ने यल्दूज को गजनी पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया। गजनी के इतिहासकारो के वर्णन के आधार पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब ऐबक ने गजनी में इतना खराब प्रदर्शन किया तब वह भारत में आदर्श शासन कैसे कर सकता था ?

(2.) हिन्दुओं के साथ व्यवहार

युद्ध के समय ऐबक ने सहस्रों हिन्दुओं की हत्या करवाई और सहस्रों हिन्दुओं को गुलाम बनाया। इस पर भी मुस्लिम इतिहासकारों ने उसकी यह कहकर प्रशंसा की है कि शांतिकाल में उसने हिन्दुओं के साथ उदारता का व्यवहार किया। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्य मुसलमान शासकों की भाँति उसने हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। उसने हिन्दुओं के मन्दिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसके शासन में हिन्दू दूसरे दर्जे के नागरिक थे। उन्हें शासन में उच्च पद नहीं दिये गये।

(3.) भवनों का निर्माण

अपने संक्षिप्त शासन काल में कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन बनवाने का अधिक समय नहीं मिला। उसने दिल्ली तथा अजमेर के प्रसिद्ध हिन्दू भवनों को तोड़कर उनमें मस्जिदें बनवाईं। उसने दिल्ली के निकट महरौली गांव में कुव्वत-उल-इस्लाम नामक मस्जिद का निर्माण करवाया।

इस मस्जिद को उसने दिल्ली पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में बनवाया। इस मस्जिद की बाहरी शैली हिन्दू स्थापत्य की है। इसका निर्माण हिन्दुओं के नष्ट-भ्रष्ट किये गये मन्दिरों के सामान से किया गया। इसके इबादतखाने में बड़ी सुन्दर खुदाइयाँ मौजूद हैं। ऐबक की बनवाई हुई दूसरी प्रसिद्ध इमारत कुतुबमीनार है।

ऐबक ने इस मीनार को ख्वाजा कुतुबुद्दीन की स्मृति में बनवाया। यद्यपि इस मीनार को ऐबक ने आरम्भ करवाया था परन्तु इसे इल्तुतमिश ने पूरा करवाया। 1200 ई. में कुतुबुद्दीन ने अजमेर की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला को तोड़कर उसके परिसर में मस्जिद बनवाईं बाद में इस परिसर में पंजाबशाह की स्मृति में अढ़ाई दिन का उर्स भरने लगा। तब इसे ढाई दिन का झौंपड़ा कहने लगे।

(4.) सैन्य प्रबन्धन

ऐबक का शासन सैनिक बल पर अवलम्बित था। राजधानी में एक प्रबल सेना तो थी ही, राज्य के अन्य भागों में भी महत्वपूर्ण स्थानों में सेना रखी जाती थी।

(5.) नागरिक शासन

राजधानी दिल्ली तथा प्रान्तीय नगरों का शासन मुसलमान अधिकारियों के हाथ में था। उनकी इच्छा ही कानून थी। स्थानीय शासन हिन्दुओं के हाथ में था और लगान-सम्बन्धी पुराने नियम ही चालू रखे गये थे।

(6.) न्याय व्यवस्था

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक कोई व्यवस्थित न्याय विधान स्थापित नहीं कर सका। इस कारण न्याय की व्यवस्था असन्तोषजनक थी। काजियों की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून थी।

ऐबक का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

सल्तनतकालीन इतिहासकार ऐबक की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं क्योंकि उसने भारत में मुस्लिम शासन की नींव रखी। हमें भी ऐबक के चरित्र तथा कार्यों का मूल्यांकन करने के लिये उन्हीं के विवरण पर निर्भर रहना पड़ता है। हमें यह समझ लेना चाहिये कि एक आक्रांता के रूप में उसकी समस्त अच्छाइयाँ मुस्लिम प्रजा के लिये थीं जिसकी खुशहाली पर उसके शासन की मजबूती निर्भर करती थी। शासन की दृष्टि में हिन्दू प्रजा काफिर थी जिसे मुस्लिम प्रजा के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं थे।

(1) सेनानायक के रूप में

ऐबक एक विजयी सेनानायक था। अपनी सैनिक प्रतिभा के बल से ही वह अन्धकार से प्रकाश में आया था। दास के निम्न पद से सुल्तान के श्लाघनीय पद पर पहुँच पाया था। उसमें अपार साहस था। उसकी स्वामिभक्ति ने उसे मुहम्मद गौरी की नजर में चढ़ा दिया। कुतुबुद्दीन की सहायता के कारण ही गौरी को भारत में सैनिक सफलता मिली थी।

ऐबक ने अनेक नगरों तथा राज्यों पर अपने स्वामी के लिए विजय प्राप्त की परन्तु तख्त पर बैठने के बाद वह फिर नयी विजय नहीं कर सका। यल्दूज ने उसे गजनी से मार भगाया। अपने चार वर्ष के संक्षिप्त शासनकाल में अपनी स्थिति को संभालने में ही लगा रहा। डॉ. हबीबुल्ला ने ऐबक के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ‘वह महान् शक्ति तथा महान् योग्यता का सैनिक नेता था। उसमें एक तुर्क की वीरता के साथ-साथ पारसीक की सुरुचि तथा उदारता विद्यमान् थी।’

(2) प्रशासक के रूप में

ऐबक युद्ध में तलवार चलाना तो जानता था किंतु उसमें रचनात्मक प्रतिभा नहीं थी। उसने भारत में हिन्दू शासन को तो नष्ट किया किंतु अपनी ओर से कोई सुदृढ़़, संगठित एवं व्यवस्थित शासन व्यवस्था स्थापित नहीं कर सका। न ही उसने कोई शासन सम्बन्धी सुधार किये। उसने हिन्दू प्रजा पर उन काजियों को थोप दिया जो इस्लाम के अनुसार अनुसार काफिर प्रजा का न्याय करते थे।

ऐबक की उदारता तथा दानशीलता मुसलमानों तक ही सीमित थी। हिन्दुओं के साथ वह सहिष्णुता की नीति का अनुसरण नहीं कर सका। उसने हजारों हिन्दुओं की हत्या करवाई सैंकड़ों मन्दिरों का विध्वंस करके काफिर हिन्दुओं को दण्डित किया तथा मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

(3) कला-प्रेमी के रूप में

मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार ऐबक को साहित्य तथा कला से भी प्रेम था। हसन निजामी तथा फखरे मुदीर आदि विद्वानों को उसका आश्रय प्राप्त था। जिन हिन्दू-मन्दिरों को उसने तुड़वाया, उनसे प्राप्त सामग्री से उसने दो मस्जिदें बनवाई- एक दिल्ली में जिसेे कुव्वत-उल-इस्लाम नाम दिया गया तथा दूसरी अजमेर में जिसे ढाई दिन का झोंपड़ा नाम दिया गया। दिल्ली की कुतुबमीनार का निर्माण भी उसी ने आरम्भ करवाया था। इसके काल में संगीत कला, चित्र कला, नृत्य कला, स्थापत्य कला, शिल्प कला, मूर्ति कला आदि कलाओं का कोई विकास नहीं हुआ।

आरामशाह

1210 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद, लाहौर के तुर्क सरदारों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया किंतु दिल्ली के अमीर नहीं चाहते थे कि लाहौर, तुर्की सुल्तानों की राजधानी बने क्योंकि इससे साम्राज्य में अधिकांश उच्च पद तथा सम्मानित स्थान लाहौर के अमीरों को ही प्राप्त होने थे।

अतः दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह को गद्दी पर से हटाने का प्रयत्न आरम्भ किया। उन्होंने ऐबक के दामाद और बदायूं के गवर्नर इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए आमन्त्रित किया। इल्तुतमिश ने अपनी सेना के साथ बदायूँ से दिल्ली की ओर कूच कर दिया।

आरामशाह भी लाहौर से दिल्ली की ओर चला परन्तु दिल्ली के अमीरों ने उसका स्वागत नहीं किया। नगर के बाहर आरामशाह तथा इल्तुतमिश की सेनाओं में मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में आरामशाह पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया। अमीरों ने इल्तुतमिश को सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार वह 1211 ई. में दिल्ली का सुल्तान बन गया। ऐबक वंश का अन्त हो गया और उसके स्थान पर इल्बरी तुर्कों के शम्मी वंश का राज्य स्थापित हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – गुलाम वंश

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

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सुल्तान इल्तुतमिश - www.bharatkaitihas.com
सुल्तान इल्तुतमिश की मुद्रा

कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी अवश्य थी किंतु भारत में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक सुल्तान इल्तुतमिश ही था।

इल्तुतमिश का प्रारम्भिक जीवन

इल्तुतमिश का पिता आलम खाँ तुर्कों के इल्बरी कबीले का एक प्रधान व्यक्ति था। इल्तुतमिश बाल्यकाल से प्रतिभाशाली तथा रूपवान था इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था। इससे भाइयों तथा सम्बन्धियों को उससे ईर्ष्या हो गई। वे लोग उसे घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के सौदागर के हाथ बेच दिया।

घोड़ों के सौदागर ने उसे बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नामक एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया। गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक नौकर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने के से इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। कुछ दिनों के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया।

1205 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे।

इसके बाद ऐबक इल्तुतमिश के साथ सौम्य व्यवहार करने लगा तथा सदैव अपने साथ रखने लगा। ऐबक ने उसे ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया और बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया। कुतुबुद्दीन ने अपनी एक पुत्री का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया तथा उसे बदायूँ का गवर्नर नियुक्त किया।

इल्तुतमिश का दिल्ली पर अधिकार

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमंत्रित किया।

इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया। इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व प्रतिभा से परिचित थे। सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई।

इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह का मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।

इल्तुतमिश की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उसके समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ थीं-

(1.) आरामशाह की समस्या

आरामशाह, कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था जबकि इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम तथा जामाता था। इसलिये इल्तुतमिश  की अपेक्षा आरामशाह, ऐबक की सल्तनत का प्रबल दावेदार था। इसलिये दिल्ली पर अधिकार करने से पहले इल्तुतमिश को आरामशाह से निबटना था किंतु इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं कुछ अमीरों का समर्थन मिल जाने से यह काम बड़ी सरलता से सम्पन्न हो गया। इल्तुतमिश ने आरामशाह को बंदी बना लिया। इसके बाद आरामशाह का कुछ पता न चला। सम्भवतः उसका वध कर दिया गया।

(2.) उत्तराधिकार की समस्या

यद्यपि दिल्ली के काजी अली इस्माइल की सहायता से इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था परन्तु उसने इस पद को उत्तराधिकार के नियम से नहीं प्र्राप्त किया था। यह पद उसने अपने गुणों एवं कुछ अमीरों के सहयोग से प्राप्त किया था। चूूँकि वह एक गुलाम का गुलाम था, अतः बहुत से कुतुबी तथा मुइज्जी अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया। स्वतन्त्र तुर्क सरदार गुलाम के गुलाम को अपना स्वामी स्वीकार करने में अपना अपमान समझते थे। वे उसे राज्य का अपहर्ता मानते थे। इल्तुतमिश ने धैर्य के साथ इन विरोधियों का दमन किया।

(3.) समकक्ष तुर्क सरदारों की समस्या

सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश एक छोटे से प्रान्त का गवर्नर था। अधिकांश तुर्क-सरदार उसके समकक्ष थे और कुछ तुर्क-सरदार कुबाचा तथा अलीमर्दा तो कुतुबुद्दीन ऐबक के ही काल से पद तथा प्रतिष्ठा में उससे कहीं अधिक ऊँचे थे। उन्हें इल्तुतमिश का उत्कर्ष सह्य नहीं था। उन्हें अपने वश में करने के लिए साहस, बुद्धि तथा धैर्य की आवश्यकता थी। इल्तुतमिश में ये समस्त गुण विद्यमान थे, अतः वह सफलतापूर्वक अपने समकक्ष विरोधियों का सामना कर सका।

(4.) सैनिक विद्रोह की आशंका

तुर्कों में यह परम्परा थी कि कोई वंश-विशेष सदैव के लिए राज्य का अधिकारी नहीं होता था। सुल्तान, तुर्क अमीरों के निर्वाचन द्वारा नियुक्त किया जा सकता था। फलतः समस्त योग्य तथा महत्वाकांक्षी सेनापति राजपद प्राप्त करने की चेष्टा तथा प्रयास करते थे। ऐसी स्थिति में राज्य में सैनिक विद्रोह होने की सदैव सम्भावना बनी रहती थी।

(5.) खिलजी मलिक की समस्या

खिलजी मलिक बंगाल तथा बिहार में अपनी शक्ति बढ़ा रहा था और अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित कर चुका था।

(6.) अलीमर्दा खाँ की समस्या

बंगाल में अलीमर्दा खाँ बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन कर रहा था और अलाउद्दीन का विरुद धारण करके अपने को स्वतन्त्र शासक घोषित कर चुका था।

(7.) कुबाचा की समस्या

कुबाचा भी ऐबक की तरह मुहम्मद गौरी का गुलाम था। उसने भी गौरी की वैसी ही सेवा की थी जैसी ऐबक ने की थी। गौरी ने उसे उच्च का गर्वनर नियुक्त किया था। मुहम्मद गौरी के मरने के बाद उसने स्वयं को मुल्तान तथा सिन्ध का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।

वह लाहौर तथा उत्तरी पंजाब पर भी अधिकार स्थापित करना चाहता था। इसलिये उसने पंजाब का बहुत सा भाग दबा लिया और लाहौर, भटिन्डा, सरसुती, कुहराम आदि दुर्गों पर अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं। अब उसकी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी।

(8.) यल्दूज की समस्या

ताजुद्दीन यल्दूज, कुतुबुद्दीन ऐबक का श्वसुर था। उसने गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया था इसलिये वह स्वयं को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझता था और उस सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग को अपने साम्राज्य के अंतर्गत मानता था जो मुहम्मद गौरी ने जीता था।

वह इल्तुतमिश को अपना प्रान्तपति समझता था। इसलिये यल्दूज ने राजकीय चिह्न इल्तुतमिश के पास भेज कर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन भी किया। संकटपूर्ण परिस्थितियों में इल्तुतमिश ने उन वस्तुओं को स्वीकार कर लिया परन्तु उसने इस अपमान को स्मरण रखा तथा समय आने पर भरपूर बदला लिया।

(9.) भारतीय मुसलमानों की समस्या

इन दिनों दिल्ली की राजनीति में भारतीय मुसलमानों का एक प्रबल दल खड़ा हो गया था। उनमें तथा विदेशी मुसलमानों में बड़ा वैमनस्य था। इस कारण राज्य में आंतरिक संघर्ष की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। ये लोग विद्रोह करने तथा अपना प्राबल्य स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहते थे। इन विद्रोही-दलों पर नियन्त्रण रखना नितान्त आवश्यक था।

 (10.) राजपूतों की समस्या

मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने जिन राजपूतों से उनके राज्य छीन लिये थे, वे ऐबक के मरते ही अपने खोये हुए राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। जालौर तथा रणथम्भौर के शासक फिर से स्वतन्त्र हो गये। अजमेर, ग्वालियर तथा दोआब में भी तुर्की सत्ता समाप्त हो गई। इल्तुतमिश के बदायूँ छोड़ते ही गहड़वालों की प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो गई और उनके आक्रमणों का वेग बढ़ गया। कालिंजर तथा ग्वालियर तो ऐबक के शासन काल में ही स्वतन्त्र हो गये थे।

(11.) पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समस्या

पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा की समुचित व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक था क्योंकि मध्य-एशिया में स्थित तुर्क तथा मंगोल राज्यों में इस समय बड़ी खलबली मची हुई थी। अनेक मंगोल सरदारों को अपना देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा था। मंगोल सरदार, नये राज्य स्थापित करने की कामना से प्रेरित होकर अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे थे।

(12.) खोखरों की समस्या

पश्चिमोत्तर की समस्या के जटिल हो जाने का एक यह भी कारण था कि पंजाब में निवास करने वाले खोखर बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे जो प्रायः शान्ति भंग कर देते थे।

कठिनाइयों पर विजय

इल्तुतमिश ने विपत्तियों से घबराने के स्थान पर, निर्भीकता के साथ उनका सामाना किया तथा एक-एक करके समस्त बाधााओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

(1) राजधानी के विद्रोहों का दमन

इल्तुतमिश के दिल्ली का सुल्तान बनते ही कुतुबुद्दीन ऐबक के तुर्की अंग-रक्षकों का सरदार तथा कुतुबी एवं मुइज्जी सरदार दिल्ली के आस-पास अपनी सेनाएँ एकत्रित करने लगे। इल्तुतमिश ने उन पर अचानक आक्रमण करके उन्हें बुरी तरह परास्त किया। उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतार कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और अपनी राजधानी को पूर्ण रूप से सुरक्षित बना लिया।

(2) दोआब का दमन

इल्तुतमिश की कठिनाइयों से लाभ उठा कर दोआब के कई शासक भी स्वतन्त्र हो गये। इल्तुतमिश ने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़़ करके दोआब के विद्रोही हिन्दुओं की ओर ध्यान दिया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के शासकों का दमन किया।

कछार के प्रान्त पर भी उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इसके बाद उसने बहराइच को जीत कर वहाँ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद उसने अवध पर आक्रमण किया, परन्तु सम्भवतः तिरहुत को उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया। इल्तुतमिश ने बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त किया और उन्हें अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

(3) यल्दूज का दमन

इल्तुतमिश के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ख्वारिज्म के शाह ने गजनी पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। यल्दूज गजनी से भागकर लाहौर आ गया। लाहौर से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इल्तुतमिश पहले से ही इस विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार था। उसने अपनी सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से प्रस्थान कर दिया और 1215 ई. में तराइन के मैदान में यल्दूज को बुरी तरह परास्त किया। यल्दूज बंदी बनाकर बदायूँ के दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार इल्तुतमिश के एक बड़े प्रतिद्वंद्वी का नाश हो गया।

(4) कुबाचा का अंत

यल्दूज की पराजय के कुछ समय उपरान्त कुबाचा ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने एक सेना लाहौर भेजी। इस सेना ने कुबाचा को परास्त कर दिया। उसने इल्तुतमिश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इसी समय ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर पंजाब में शरण ली।

उसने कुबाचा के राज्य को लूटकर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे कुबाचा की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। थोड़े ही दिनों बाद, मंगोल सेना ने भी मुल्तान पर आक्रमण किया तथा कुबाचा को बड़ी क्षति पहुँचाई। खिलजी तुर्क भी इन दिनों सीमान्त प्रदेशों में बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इस प्रकार कुबाचा की स्थिति बड़ी संकटापन्न हो गई।

इस स्थिति से लाभ उठा कर 1227 ई. में इल्तुतमिश ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया तथा लाहौर पर फिर से अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद इल्तुतमिश ने उच्च की ओर प्रस्थान किया। इस पर कुबाचा ने अपनी सेना तथा कोष के साथ भक्कर के दुर्ग में शरण ली।

तीन महीने के घेरे के बाद उच्च पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया। इससे कुबाचा इतना आंतकित हो गया  कि अपने प्राणों की रक्षा के लिए उसने सिन्ध नदी से उस पार भाग जाने का निश्चय किया। जब वह एक नाव में बैठ कर सिन्ध नदी को पार कर रहा था तब नाव उलट गई और कुबाचा नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार इल्तुतमिश के दूसरे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का भी नाश हो गया।

(5) मंगोल आक्रमण

1221 ई. में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ तूफान की भाँति मध्य एशिया से चला था। जब उसने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया, तब वहाँ के शाह का पुत्र जलालुद्दीन भारत की ओर भाग आया परन्तु मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत तक आ पहुँचे।

जलालुद्दीन ने सिन्ध नदी के तट पर अपना खेमा डाल दिया तथा इल्तुतमिश से शरण मांगी।  इल्तुतमिश जानता था कि दिल्ली में जलालुद्दीन की उपस्थिति इल्तुतमिश के तुर्की अमीरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी। इसलिये उसने जलालुद्दीन के पास कहला भेजा कि दिल्ली की जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगी और उसके दूत को मरवा डाला।

निराश होकर जलालुद्दीन सिन्ध की ओर बढ़ा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करता हुआ फारस की ओर चल दिया परन्तु मार्ग में ही उसकी हत्या कर दी गई। जलालुद्दीन का अंत हुआ देखकर मंगोल भी लौट गये। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से जलालुद्दीन तथा मंगोलों से भी अपने राज्य की रक्षा कर ली।

(6) पंजाब पर विजय

पंजाब में इल्तुतमिश को अपने दो शत्रुओं का दमन करना था। एक थे विद्रोही खोखर जाति के लोग और दूसरा था खोखरों का मित्र सैफुद्दीन करलुग जो ख्वारिज्म के शाह की ओर से पश्चिमी पंजाब में नियुक्त था। इल्तुतमिश ने पहले खोखरों पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया और उनके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार जमा लिया।

लाहौर तो इल्तुतमिश के अधिकार में पहले से ही था। पंजाब के अन्य प्रमुख नगर- स्यालकोट, जालन्धर, नन्दना आदि भी उसके अधिकार में आ गये। जिन स्थानों पर खोखरों के उपद्रव का भय था, वहाँ पर इल्तुतमिश ने सैनिक चौकियाँ स्थापित कर दीं तथा खोखरों के गांव तुर्क अमीरों को जागीर में दे दिये। इससे उसके राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

(7) बंगाल का दमन

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के उपरान्त बंगाल स्वतन्त्र हो गया था। इन दिनों हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने निर्विरोध इल्तुतमिश के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया।

इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट आया, परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने 1226 ई. में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया।

नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया किंतु 1229 ई. में नासिरुद्दीन के हटते ही बंगाल में फिर से विद्रोह की चिन्गारी फूट पड़ी। इल्तुतमिश ने 1230 ई. में पुनः बंगाल पर अधिकार कर लिया और अलाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया।

(8) राजपूतों का दमन

ऐबक के मरते ही राजपूतों ने अपने खोये हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के प्रयास किये। अनेक राजपूत राजाओं ने स्व्यं को स्वतन्त्र कर दिया। मंगोल आक्रमणों से मुक्ति पाते ही इल्तुतमिश ने राजपूतों को दण्डित करने का निर्णय लिया। 1226 ई. में उसने रणथम्भौर का घेरा डाला। 

रणथम्भौर पर तुर्कों का अधिकार हो गया और उसकी सुरक्षा के लिए वहाँ मुस्लिम सेना नियुक्त की गई। इसके उपरान्त इल्तुतमिश ने परिहार राजपूतों की राजधानी मन्डोर की ओर प्रस्थान किया और उस पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। 1228 ई. में इल्तुतमिश ने जालौर का घेरा डाला जहाँ चौहान शासक उदयसिंह शासन कर रहा था।

उदयसिंह ने इल्तुतमिश का सामना किया किंतु उदयसिंह परास्त हो गया। उसने इल्तुतमिश को कर देने का वचन दिया अतः उसका राज्य उसे लौटा दिया गया। इसके बाद इल्तुतमिश ने बयाना तथा थानागिरि पर अधिकार कर लिया। अजमेर, साम्भर तथा अन्य निकटवर्ती राज्यों को भी जीत लिया।

इसके बाद इल्तुतमिश ने नागौर पर अधिकार कर लिया। 1232 ई. में इल्तुतमिश ने ग्वालियर के राजा मलय वर्मा तथा कालिंजर के राजा त्रिलोक्य वर्मा को भी परास्त किया परन्तु वहाँ पर तुर्कों के पैर अधिक दिनों तक नहीं टिक सके और विवश होकर उन्हें कालिंजर छोड़ना पड़ा।

इल्तुतमिश ने स्वयं सेना लेकर नागदा पर आक्रमण किया किंतु इल्तुतमिश को सफलता नहीं मिली। इल्तुतमिश ने गुजरात के चालुक्यों पर भी आक्रमण किया, परन्तु वहाँ भी उसे सफलता नहीं मिली। 1234 ई. में उसने मालवा पर आक्रमण किया और भिलसा तथा माण्डू के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। उसने भिलसा के 300 वर्ष पुराने देवालय को नष्ट किया तथा उज्जैन पहुँच कर महाकाल के मंदिर को नष्ट कर दिया।

इल्तुतमिश की शासन व्यवस्था

इल्तुतमिश की शासन-व्यवस्था निम्न लिखित प्रकार से थी-

(1.) चालीस तुर्की अमीरों के दल का संगठन

इल्तुतमिश ने अनुभव किया कि राज्याधिकारियों में पूर्ण स्वामि-भक्ति संचारित करने का एक मात्र उपाय यही है कि राज्य के समस्त उच्च पदों पर उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाये जो अपनी उन्नति के लिए पूर्णतः सुल्तान की कृपा-दृष्टि पर निर्भर हों। इस उद्देश्य से उसने चालीस तुर्की अमीरों अथवा गुलामों के दल को संगठित किया। इसे चरगान अथवा तुर्कान ए चिहालगानी (चालीस दास अमीरों का दल) कहते थे। इस दल में बड़े ही योग्य तथा प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। ये लोग अपनी राजभक्ति के लिए प्रसिद्ध थे और इनका उत्थान तथा पतन सुल्तान की इच्छा पर निर्भर रहता था। 

(2.) योग्य व्यक्तियों का चयन

शासन को सुदृढ़़ बनाने के लिये इल्तुतमिश ने योग्य व्यक्तियों का चयन किया। उसने विदेशी मुसलमानों तथा भारतीय मुसलमानों को भी शासन व्यवस्था में स्थान दिया। उसने मिनहाजुस्सिराज को प्रधान काजी तथा सद्रेजहाँ के पद पर और मखरुल्मुल्क इमामी को वजीर के पद पर नियुक्त किया। मिनहाजुस्सिराज बहुत विद्वान था और इमामी तीस वर्ष तक खलीफा का वजीर रह चुका था।

(3.) विद्रोही प्रदेशों में तुर्कों को जागीरें

जिन पर्वतीय क्षेत्रों, दोआब क्षेत्र तथा खोखर प्रदेश सहित अन्य प्रदेशों में बार-बार विद्रोह होते थे, उन प्रदेशों में इल्तुतमिश ने तुर्क सरदारों को जागीरें देकर वहाँ तुर्कों की बस्तियाँ बसाईं।

(4.) न्याय की समुचित व्यवस्था

प्रजा के विवादों एवं झगड़ों का निबटारा करने के लिये इल्तुतमिश ने दिल्ली में अनेक काजी नियुक्त किये। दिल्ली के साथ-साथ राज्य के बड़े नगरों में अमीर दादा नियुक्त किये गये थे। उनके कार्यों का निरीक्षण करने तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का भार प्रधान काजी तथा सुल्तान पर रहता था।

इब्नबतूता लिखता है कि दिन के समय पीड़ित व्यक्ति को एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहन कर अपने को सताया हुआ सूचित करना होता था। रात्रि काल के लिये अलग तरह की व्यवस्था थी। सुल्तान के राजप्रसाद के सामने संगमरमर के दो सिंह बने हुए थे जिनके गलों में घण्टियाँ लटकी रहती थीं। जब रात्रिकाल में कोई पीड़ित व्यक्ति इन घण्टियों को बजाता था तब उसकी फरियाद सुनी जाती थी तथा उसके साथ न्याय करने का प्रयत्न किया जाता था।

(5.) मुद्रा में सुधार

इल्तुतमिश ने मुद्रा में भी सुधार किया। उसके पहले की मुद्राओं में एक ओर सांड और दूसरी ओर अश्व अंकित रहता था। सुल्तान का नाम नागरी तथा अरबी दोनों लिपियों में अंकित रहता था। इल्तुतमिश ने शुद्ध अरबी मुद्राओं का प्रचार किया जो 175 ग्रेन तौल की होती थी। चाँदी के टंक का प्रयोग इल्तुतमिश ने ही प्रारम्भ किया था।

(6.) साहित्य तथा कला के कार्य

यद्यपि इल्तुतमिश के समय में साहित्य तथा विभिन्न कलाओं के सम्बन्ध में उल्लेखनीय उपलब्धियांें की जानकारी नहीं मिलती है तथापि मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे कला-प्रेमी सुल्तान बताया है जिसने साहित्यकारों को आश्रय दिया तथा कुतुबमीनार का निर्माण पूरा करवाया। उसने एक मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।

(7.) खलीफा द्वारा सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि

1229 ई. में बगदाद के खलीफा ने इल्तुतमिश को सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि दी और उसके लिए एक खिलवत भिजवाई। उस खिलवत के उपरान्त इल्तुतमिश को मुस्लिम सुल्तान कहलाने का नैतिक आधार प्राप्त हो गया। इस कारण इल्तुतमिश अपनी मुद्राओं के एक ओर अपना तथा दूसरी ओर खलीफा का नाम अंकित कराने लगा।

(8.) धार्मिक नीति

अधिकांश भारतीय मुसलमान तथा तुर्क, सुन्नी मत को मानने वाले थे इस कारण सुल्तान ने सुन्नियों के साथ ही अपना समर्थन दिखाया। इससे उसकी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने उलेमाओं की सम्पत्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि वे शियाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा अत्याचार करने लगे। इससे इल्तुतमिश नेे शिया सम्प्रदाय की सहानुभूति खो दी और वे विद्रोह करने लगे। इल्तुतमिश ने उनके विद्रोहों का कठोरता के साथ दमन किया।

इल्तुतमिश के अंतिम दिन

इल्तिुतमिश ने कठोरता और दृढ़़ता से दिल्ली पर शासन किया। लगभग पूरे उत्तर भारत को अपने साम्राज्य में मिलाया। अपने अंतिम दिनों में वह बीमार पड़ा और 1236 ई. में उसका निधन हो गया।

इल्तुतमिश का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

इल्तुतमिश में प्रशासकीय योग्यता थी या नहीं, इस प्रश्न पर इतिहासकारों में विपरीत राय है। डॉ. निजामी ने लिखा है कि उसने दिल्ली सल्तनत को इक्ता की शासन व्यवस्था और सुल्तान की सेना के निर्माण का विचार प्रदान किया तथा उसने मुद्रा में सुधार किया।

जबकि डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इल्तुतमिश ने शासन संस्थाओं का निर्माण नहीं किया। वह रचनात्मक प्रतिभा सम्पन्न राजनीतिज्ञ नहीं था। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के विवरण ही इल्तुतमिश के बारे में जानकारी प्राप्त करने के स्रोत हैं जिनसे उसके चरित्र के कई पहलू सामने आते हैं।

(1.) व्यक्ति के रूप में

इल्तुतमिश असहायों तथा दीन-दुखियों के प्रति इतनी दया एवं सहानुभूति रखता था कि उसकी उदारता के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। इल्तुतमिश अत्यन्त धार्मिक विचारों का सुल्तान था। वह नियम से दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था। वह साधु-महात्माओं को आश्रय देता था और रमजान के महीने में रोजा रखता था। अपनी इस धर्मनिष्ठा से उसने राजसत्ता को दैवी बल प्रदान किया।

(2.) राज्य-संस्थापक के रूप में

इल्तुतमिश को ही गुलाम वंश के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। ऐबक ने जिस राज्य की स्थापना की थी, वह आरामशाह के निर्बल शासन में कमजोर पड़ गया तथा बहुत से स्थानीय शासक स्वतंत्र हो गये थे। इल्तुतमिश ने उन्हें परास्त करके फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। यदि इल्तुतमिश दिल्ली पर अधिकार नहीं करता तो निर्बल आरामशाह के शासन काल में दिल्ली सल्तनत पूरी तरह बिखर जाती।

(3.) विजेता के रूप में

इल्तुतमिश वीर, साहसी तथा सतर्क सैनिक था। वह कुशल तथा सफल सेनापति था। उसमें उच्च-कोटि की सैनिक प्रतिभा थी। उसकी योग्यता के कारण ही दिल्ली के अमीरों ने उसे सुल्तान बनाया था। अपने बाहुबल से उसने प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त किया, विद्रोहियों का दमन किया, राजपूतों को अपने अधीन किया, दोआब में फिर से अपनी राजसत्ता स्थापित की, मंगोलों के आक्रमण से अपने राज्य की रक्षा की और सम्पूर्ण राज्य में शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित की।

पंजाब और बंगाल पर दुबारा अधिकार स्थापित किया। अवध, बहराइच तथा बनारस के राजाओं का दमन किया। जालोर, मण्डोर तथा मालवा के हिन्दू शासकों को परास्त किया। उसने न केवल मुहम्मद गौरी द्वारा जीते हुए प्रदेशों पर फिर से तुर्कों की सत्ता स्थापित की, वरन् ऐबक के भी अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करके राज्य का विस्तार किया।

(4.) शासक के रूप में

इल्तुतमिश दृढ़़ एवं कठोर शासक था। उसने शासन जमाने के लिये 40 तुर्की गुलामों का संगठन तैयार किया जो आगे चलकर तुर्की साम्राज्य के प्रबल स्तम्भ बन गए। कुतुबुद्दीन ऐबक के विशृंखलित राज्य को संगठित करने का श्रेय भी इल्तुतमिश को है। खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करने वाला वह भारत का पहला मुसलमान सुल्तान था।

वह पहला तुर्क सुल्तान था जिसने भारत में शुद्ध अरबी-मुद्राओं को प्रचलित किया। अपनी प्रजा को न्याय देने के लिये उसने काजियों तथा अमीर दादाओं की नियुक्ति की तथा रात्रिकाल में भी पीड़ित व्यक्ति की गुहार सुनने की व्यवस्था की। इल्तुतमिश में वैसी ही धार्मिक असहिष्णुता थी जिस प्रकार तत्कालीन अन्य मुसलमान शासकों में थी।

हिन्दुओं की तो बात ही क्या, वह शिया मुसलमानों के साथ भी उदारता तथा सहिष्णुता का व्यवहार न कर सका। उसकी इस धार्मिक कट्टरता के कारण ही दिल्ली के इस्माइली शिया मुसलमानों ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया और उसकी हत्या करने का षड्यन्त्र रचा। हिन्दुओं के साथ उसका व्यवहार और अधिक कठोर था। इल्तुतमिश उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और वे ही उसके धार्मिक अत्याचार के साधन थे।

(5.) शरण-दाता के रूप में

मंगोलों के आक्रमणों और अत्याचारों से भयभीत होकर बहुत से प्रसिद्ध मलिक, अमीर तथा वजीर भाग कर इल्तुतमिश के दरबार में आए। इल्तुतमिश ने उन्हें शरण प्रदान की। उसने बगदाद के वजीर फखरूल्मुल्क इसामी को भी शरण प्रदान की किंतु जब ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने चंगेज खाँ से भयभीत होकर दिल्ली में शरण मांगी तो इल्तुतमिश ने उसे यह कहकर शरण देने से मना कर दिया कि दिल्ली का जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगा तथा उसके दूत की हत्या करवा दी। इससे स्पष्ट है कि उसने उन्हीं विदेशियों को शरण दी जो उसके काम के थे तथा जिनसे उसे कोई भय नहीं था।

(6.) साहित्य तथा कला के प्रेमी के रूप में

इल्तुतमिश को मुस्लिम साहित्य तथा मुस्लिम कला से प्रेम था। इस कारण मध्य एशिया के बहुत से विद्वान्, इतिहासकार, कवि तथा दार्शनिक उसकी ओर आकृष्ट हुए। इल्तुतमिश ने उन्हें आश्रय प्रदान किया। फलतः दिल्ली नगर मुस्लिम सभ्यता तथा संस्कृति का केन्द्र बन गया। दिल्ली की कुतुबमीनार को पूरा बनवाने के अलावा उसने दिल्ली में कई मस्जिदें भी  बनवाईं।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत के इतिहास में इल्तुतमिश अत्यंत महत्व रखता है। तेरहवीं शताब्दी के मुस्लिम साम्राज्य निर्माताओं में वह विशिष्ट स्थान रखता है। भारत में तुर्की सल्तनत को स्थायित्व प्रदान करने में उसने बड़ा योग दिया। वह अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति जितना उदार था, उतना उदार हिन्दू प्रजा के प्रति नहीं था। उसने दिल्ली को मुस्लिम संस्कृति का केन्द्र बना दिया तथा हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करके मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन ?

प्रायः यह प्रश्न किया जाता है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन था? विभिन्न इतिहासकार मुहम्मद बिन कासिम से लेकर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय देते हैं किंतु अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश था।

मुहम्मद बिन कासिम

मुहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान सेनापति था। उसने अरब से सिंध के रास्ते भारत में प्रवेश किया था और सिन्ध में अपनी राज-संस्था स्थापित कर ली थी परन्तु उस राजसत्ता का शीघ्र ही उल्मूलन हो गया।  इसलिये मुहम्मद बिन कासिम को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। लेनपूल ने लिखा है कि सिंध में अरबों की विजय इस्लाम के इतिहास में एक घटना मात्र थी और इसका परिणाम शून्य था।

महमूद गजनवी

मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी दूसरा प्रबल मुस्लिम आक्रांता था जिसने नए मार्ग से भारत पर आक्रमण किये और उनमें बड़ी सफलताएं अर्जित कीं। यदि वह चाहता तो भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना कर सकता था परन्तु उसका ध्येय भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना तथा हिन्दू काफिरों को दण्डित करके खलीफा को प्रसन्न करना था। वह भारत में अपना स्थायी राज्य स्थापित करना नहीं चाहता था। इसलिये महमूद गजनवी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

मुहम्मद गौरी

भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने आक्रमण किया। वह सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतने में सफल भी हुआ परन्तु उसने भारत में अपनी कोई अलग राजसंस्था स्थापित नहीं की और न भारत में वह स्थायी रूप से रहा, वरन् उसने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने गवर्नर के रूप में नियुक्त किया तथा स्वयं गजनी चला गया। इसलिये उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

कुतुबुद्दीन ऐबक

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक उसके भारतीय साम्राज्य का स्वामी बना। उसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और एक बड़े साम्राज्य का निर्माण किया। उसने प्रथम बार दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना की। उसने इस सल्तनत का गजनी से सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा।

उसमें स्वतन्त्र सुल्तान बनने के गुण विद्यमान थे। उसने भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग पर स्वतन्त्र सुल्तान के रूप से शासन भी किया परन्तु उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मानने में कई आपत्तियाँ है-

(1.) ऐबक को खलीफा से स्वतन्त्र राज-सत्ता का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हुआ इसलिये कुछ इतिहासकार उसे भारतीय प्रांतों का प्रान्तपति ही मानते हैं।

(2.) अब तक ऐसी एक भी मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है जिसमें ऐबक का नाम अंकित  हो।

(3.) इतिहासकारों को इस बात पर भी सन्देह है कि उसके नाम का कोई खुतबा पढ़ा गया था या उसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी।

(4.) गयासुद्दीन गौरी ने उसे दिल्ली का सुल्तान स्वीकार किया था परन्तु उसे किसी को भी सुल्तान की उपाधि देने का अधिकार नहीं था। यह उपाधि तो केवल खलीफा ही दे सकता था।

(5.) यल्दूज ने उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। इससे अनुमान होता है कि ऐबक द्वारा स्थापित राज्य, असम्बद्ध तथा अव्यवस्थित संघ जैसा था।

(6.) ऐबक की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य विश्ंृखलित हो गया और उसका अस्तित्त्व लगभग समाप्त हो गया।

उपरोक्त कारणों से कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक नहीं माना जा सकता।

आरामशाह

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह लाहौर में शासक बना। वह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था। उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएं चलवाईं। इतना होने पर भी उसे भारत में मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। उसमें सुल्तान बनने के गुण नहीं थे। उसमें उच्चकोटि की युद्ध प्रतिभा भी नहीं थी।

उसने किसी भू-भाग पर विजय प्राप्त नहीं की थी। वह सेना का प्रिय नहीं था। उसे शासन करने का अनुभव नहीं था। उसे दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही इल्तुतमिश ने परास्त कर दिया था। ऐसी दशा में केवल उसके नाम में खुतबा पढ़े जाने तथा मुद्राओं के चलाने से उसे दिल्ली का सुल्तान मान लेना ठीक नहीं है।

उसे खलीफा ने सुल्तान स्वीकार नहीं किया। ऐबक के मरते ही उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। इसलिये आरामशाह को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक नहीं माना जा सकता।

इल्तुतमिश

अधिकांश इतिहासकार इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1.) दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह के स्थान पर इल्तुतमिश को दिल्ली का सुल्तान निर्वाचित कर लिया परन्तु दिल्ली की सल्तनत उस समय लगभग समाप्त हो चुकी थी। अतः इल्तुतमिश को फिर से सल्तनत का निर्माण करना पड़ा। यदि आरामशाह ही शासक बना रहा होता तो दिल्ली सल्तनत का अस्तित्त्व पूरी तरह समाप्त हो गया होता।

(2.) इल्तुतमिश ने अपने सैनिक गुणों के बल से दिल्ली के पश्चिम तथा पूर्व में विद्रोहों का दमन करके, नये हिन्दू राज्यों को जीत कर तथा यल्दूज और कुबाचा जैसे प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करके नये सिरे से दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया तथा उसे स्थायित्व प्रदान किया।

(3.) इल्तुतमिश ने मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की रक्षा की।

(4.) इल्तुतमिश ने बंगाल तथा बिहार फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिये और दोआब के विद्रोहियों का दमन करके राजधानी दिल्ली को सुरक्षित बनाया।

(5.) उसने न केवल राजपूतों को दिल्ली की सत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जिन्हें मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने परास्त किया था और जो ऐबक की मृत्यु के उपरान्त स्वतन्त्र हो गये थे, वरन् उसने अन्य राजपूतों को भी परास्त कर साम्राज्य की सीमा में वृद्धि की।

(6.) इल्तुतमिश ने दिल्ली पर न केवल राजनीतिक सत्ता की स्थापना की अपितु खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करके दिल्ली सल्तनत को इस्मालिक जगत में नैतिक आधार दिलवाया।

(7.) इल्तुतमिश ने मनुष्य की चारित्रिक कमजोरियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इस कारण शासन निरंतर मजबूत होता चला गया।

(8.) इल्तुतमिश को अपने 25 साल के दीर्घ शासनकाल में अपने साम्राज्य को संगठित तथा सुरक्षित बनाने का अवसर प्राप्त हो गया। उसने एक सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित राज्य स्थापित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की।

(9.) इल्तुतमिश ने जिस दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया, वह स्थायी सिद्ध हुई। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद इस सल्तनत पर लगभग 300 वर्षों तक विभिन्न वंशजों द्वारा शासन किया गया।

(10.) इल्तुतमिश ने उत्तराधिकार की समस्या को सुलझा कर उत्तराधिकार की निरन्तरता स्थापित की।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा आरामशाह में से किसी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक होने का श्रेय नहीं दिया जा सकता। यह श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह सुल्तान इल्तुतमिश ही हो सकता है।

वास्तविकता यह है कि मुहम्मद बिन कासिम तथा महमूद गजनवी ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के लिये उर्वर भूमि तैयार की। मुहम्मद गौरी ने उसमें बीजारोपण किया, ऐबक ने उसे सींच कर प्रस्फुटित किया तथा इल्तुतमिश ने उसे खाद-पानी देकर मजबूत पौधा बना दिया। यह पौधा आगे चलकर खिलजी सल्तनत के समय विशाल वृक्ष बन गया जिसकी जड़ें हिलाना हिन्दुओं के वश की बात नहीं रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

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