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मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

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मुगलकालीन इतिहास के स्रोत - www.bharatkaitihas.com
मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत फारसी, तुर्की और अरबी भाषा में हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की ऐतिहासिक रचनाओं से भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। पुर्तगाली, अंग्रेजी और फ्रांसीसी आदि विदेशी व्यापारियों के पत्रों तथा उनकी कम्पनियों के अभिलेखों से भी मुगलकालीन सूचनाएँ मिलती हैं।

लिखित साहित्य के साथ-साथ मुगल शासकों के सिक्कों तथा स्मारकों से भी महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। लिखित साहित्य में आत्मकथाओं एवं यात्रा-वृत्तान्तों का विशेष महत्त्व है। मुगलकालीन ग्रंथों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ.) मंगोल बादशाहों एवं शाही परिवार के सदस्यों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(ब.) मंगोल अधिकारियों एवं स्वतंत्र फारसी लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(स.) हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(द.) विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गये ग्रंथ।

(अ.) मुगल बादशाहों एवं शाही परिवार द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1. बाबरनामा (तुजुक-ए-बाबरी)

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा के नाम से लिखी जिसे तुजुक-ए-बाबरी भी कहा जाता है। बाबर ने मध्य एशिया एवं दक्षिण एशिया में निरंतर युद्ध अभियान किये। भाग्य से वह अच्छा लेखक भी था तथा अनुभवों से समृद्ध था। इस कारण बाबरनामा विश्व के ऐतिहासिक ग्रंथों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह ग्रन्थ चगताई-तुर्की भाषा में लिखा गया। इसका सर्वप्रथम फारसी अनुवाद शेख जैन वफाई ख्वाफी ने किया, जो बाबर का मित्र था। इस ग्रंथ का फारसी भाषा में सबसे सुन्दर अनुवाद अकबर के आदेशानुसार अब्दुर्रहीम खानखाना ने किया।

फारसी से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद का कार्य बहुत से विद्वानों ने किया परन्तु विलियम अर्सकिन का अनुवाद और श्रीमती वैबरिज का अनुवाद अधिक प्रशंसनीय है। इस ग्रंथ से उस समय की राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जानकारी के साथ-साथ एशिया के विभिन्न देशों की सांस्कृतिक जानकारी भी उपलब्ध होती है।  

हिन्दुस्तान का विवरण देते हुए बाबर लिखता है, ‘हिन्दुस्तान पहली, दूसरी और तीसरी मौसमों में स्थित है। इसका कोई भी भाग चौथी मौसम में स्थित नहीं है। यह बहुत ही अच्छा देश है। इसकी पहाड़ियाँ और नदियाँ, जंगल और मैदान, पशु और पौधे, निवासी और भाषाएँ, हवाएँ और बरसातें, सब भिन्न प्रकार की हैं।’

इसके साथ ही बाबर यह भी लिखता है कि, ‘हिन्दुस्तान के प्रदेश और नगर अत्यन्त कुरूप हैं। यह एक ऐसा देश है जहाँ बहुत कम आमोद-प्रमोद है। लोग सुन्दर नहीं हैं। इन लोगों को ख्याल नहीं है कि मित्र-मण्डली में क्या आनन्द आता है और आजादी से मिलने-जुलने में या सम्पर्क रखने में क्या सुख है। इनमें कोई प्रतिभा नहीं है। इनके दिमाग में बुद्धि नहीं है। शिष्टाचार में कोमलता नहीं है। इनमें न दया है न मित्र भाव …..।

इनके पास अच्छे घोड़े नहीं हैं। न अच्छा माँस है और न अंगूर या खरबूजे या अच्छे फल हैं। यहाँ न बर्फ है, न ठण्डा पानी है। बाजारों में अच्छा खाना या रोटी नहीं मिलती। न यहाँ पर स्नानागार हैं। न विद्यालय हैं और न बत्तियाँ या मशालें हैं।

…………यह बहुत बड़ा देश है। यहाँ सोना-चाँदी का बाहुल्य है। वर्षा-ऋतु में यहाँ का मौसम सुहावना हो जाता है….। हिन्दुस्तान में दूसरा आराम यह है कि यहाँ प्रत्येक व्यवसाय और धन्धे के अगणित कारीगर मिलते हैं।’

बाबरनामा में विपुल ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध है। इससे सुल्तान इब्राहीम लोदी एवं उसके अमीरों के राज्य का भी विवरण प्राप्त होता है। बाबर ने अपने समकालीन शासकों में अफगानों के अतिरिक्त गुजरात, दक्षिण भारत, मालवा, बंगाल, विजयनगर एवं राणा सांगा के राज्यों की भी चर्चा की है।

उसने तुर्कों एवं अफगानों की सैन्य-व्यवस्था का भी वर्णन किया है। बाबर जिन प्रदेशों से होकर गुजरा, जिन राज्यों से वह टकराया और जिन राज्यों के बारे में उसे जानकारी मिली, उन समस्त राज्यों एवं प्रदेशों का वर्णन किया गया है। उसने ग्वालियर, धौलपुर, सीकरी, मेवाड़़ आदि राज्यों का भी विस्तृत विवरण दिया है।

बाबरनामा से बाबर के व्यक्तित्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ में बाबर ने अपने परिवार और अपने विरोधियों का अद्भुत चित्रण किया है। वह एक अच्छा मित्र भी था। उसने बाबरनामा में लिखा है कि अपने एक घनिष्ठ मित्र की मृत्यु होने पर उसने दस दिन तक आँसू बहाये।

यद्यपि वह कट्टर मुसलमान था, तथापि मदिरापान करता था। उसने अपनी आत्मकथा में मदिरापान एवं साहित्यिक गोष्ठियों का सुन्दर वर्णन किया है। बाबरनामा से बाबर के चरित्र का दूसरा पहलू भी दिखाई देता है। बाबर अपने शत्रुओं के प्रति बड़ा निर्दयी था। वह अपने शत्रुओं की खाल खिंचवाता, आँखे फुड़वाता और उनके कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाता था।

बाबर ने अपने निर्दयी कृत्यों का वर्णन भी बड़े गर्व के साथ किया है। युद्धों के वर्णन से उसकी उच्चकोटि की साहित्यिक क्षमता का पता चलता है। पानीपत और खानवा के युद्धों का वर्णन अत्यन्त प्रभावशाली एवं रोमांचकारी है।

तात्कालिक इतिहास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ग्रंथ होते हुए भी बाबरनामा में अनेक दोष हैं। इस ग्रंथ में उस समय की नागरिक शासन-प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार का वर्णन नहीं हैं। जबकि अब्बास खाँ की ‘तारीखे शेरशाही’ में इसका विवरण दिया गया है। युद्धों के वर्णन में भी बाबर का दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण है।

पानीपत के युद्ध में उसने अपनी सेना की संख्या कम तथा इब्राहीम लोदी की सेना की संख्या अतिरंजित करके बताई है, जो अविश्वसनीय है। इब्राहीम लोदी अफगान सरदारों की गद्दारी के कारण पराजित हुआ था, किंतु बाबर ने इस तथ्य का उल्लेख तक नहीं किया। इसी प्रकार, राणा सांगा द्वारा बाबर को निमन्त्रित करना मनगढ़न्त प्रतीत होता है। खानवा के युद्ध के समय सलहदी तंवर द्वारा किया गया विश्वासघात भी बाबर की विजय में सहायक सिद्ध हुआ था, किन्तु बाबर इस सम्बन्ध में भी मौन है।

इस ग्रन्थ में लम्बे-लम्बे समयान्तराल छोड़ दिये गये हैं जिनमें किसी घटना का उल्लेख नहीं किया- (1) 14 फरवरी, 1483 से जून, 1494 ई. तक, (2) 1503 ई. से 1504 ई. तक, (3) 1508 ई. से 1519 ई. तक, (4) 25 जनवरी 1520 से 16 नवम्बर 1525 ई. तक, (5) 3 अप्रैल 1528 से 17 सितम्बर 1528 तक और इसके बाद के दिनों का तो बहुत ही कम विवरण है।

उपरोक्त कमजोरियों के उपरांत भी बाबरनामा की अधिकांश घटनाएँ विश्वसनीय हैं। इसलिए इस ग्रंथ के ऐतिहासिक महत्त्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। डेनीसन रास ने लिखा है- ‘बाबर के आत्मचरित्र की गणना विश्व के युगयुगीन साहित्य में एक आकर्षक एवं रोमांचकारी रचनाओं में करनी चाहिए।’ श्रीमती बेवरीज ने इस ग्रन्थ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने लिखा है- ‘उसकी आत्मकथा उन अमूल्य रचनाओं में हैं जो समस्त युगों के लिए उपयोगी है और उसकी तुलना सेण्ट आगस्टाइन, रूसो, गिबन और न्यूटन के आत्मचरित्रों से की जानी चाहिये। एशिया में तो वह अपना एकमात्र उदाहरण है।’

2. तारीखे-रशीदी

इस ग्रन्थ का लेखक बाबर का चचेरा भाई मिर्जा हैदर था। उसने कामरान और हुमायूँ के अधीन महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया तथा हुमायूँ के अधीन अनेक युद्धों में सक्रिय भाग लिया था। बाबरनामा के अनेक पृष्ठ नष्ट हो गये हैं और उनमें कई अन्तराल भी हैं। उन वर्षों की घटनाओं के लिये तारीखे-रशीदी ही एकमात्र प्रामाणिक ग्रन्थ है।

मिर्जा हैदर ने बाबर के पूर्वजों एवं बाबर से सम्बन्धित अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया है। यह ग्रन्थ दो भागों में विभाजित है-

(1) पहले भाग में मुगलिस्तान एवं काश्गर के मंगोल शासकों- तुगलुक एवं तिमूर से अर्ब्दुरशीद के समय तक का इतिहास लिखा गया है।

(2) दूसरे भाग में उन घटनाओं का विवरण दिया गया है जो मिर्जा हैदर के जीवन काल (1541 ई.) तक घटित हुईं।

शैबानी खाँ के हाथों पराजित होने के बाद बाबर ने लिखा है कि, ‘इस समय मेरी बहिन खानजादा बेगम शैबाक खान के हाथों में पड़ गई।’

बाबर ने अपनी कमजोरी छिपाने का प्रयास किया। जबकि मिर्जा ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि बाबर ने अपने प्राणों की रक्षा हेतु अपनी बहिन खानजादा बेगम का विवाह शैबानी खाँ के साथ कर दिया।’ हुमायूँ के कन्नौज युद्ध और उसके भाइयों के सम्बन्ध के इतिहास और कश्मीर तथा तिब्बत के वृत्तान्त ने इस ग्रन्थ की उपयोगिता को और भी बढ़ा दिया है। उसने अन्य घटनाओं जैसे कामरान द्वारा कन्धार पर अधिकार, हुमायूँ का पलायन तथा लाहौर में सब भाइयों का एकत्र होना और कामरान द्वारा विरोध, मिर्जा हैदर द्वारा कश्मीर विजय आदि का भी वर्णन किया गया है।

3. हुमायूँनामा

इस ग्रन्थ की रचनाकार हुमायूँ की बहिन गुलबदन बेगम थी। उसने अकबर के अनुरोध पर उसने इस ग्रन्थ की रचना की। गुलबदन ने अपनी स्मरण शक्ति के आधार पर बाबर और हुमायूँ के शासनकाल की घटनाओं का वर्णन किया। वह अपने पिता तथा भाई की कमजोरियों के बारे में नहीं लिख सकती थी।

इस कारण उसका वर्णन न तो त्रुटि रहित है और न ही निष्पक्ष। फिर भी बाबर के सम्बन्ध में उसने जो कुछ लिखा है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है। हुमायूँ से सम्बन्धित घटनाओं की वह प्रत्यक्षदर्शी थी। रिजवी ने लिखा है कि स्त्री होने के नाते गुलबदन बेगम ने युद्धों का संक्षिप्त विवरण ही दिया है परन्तु उसने मंगोल हरम के जीवन तथा हुमायूँ के पलायन का रोचक विवरण दिया है। कुछ मामलों में गुलबदन ने हुमायूँ की कमजोरियों पर पर्दा डालने का प्रयास किया है तथा मालदेव के बारे में पक्षपात किया है। यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ है।

4. तुजुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा)

यह जहाँगीर की आत्मकथा है जिसकी अनेक प्रतिलिपियाँ विभिन्न नामों से भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिलती हैं। इस कारण इस ग्रन्थ को जहाँगीर के संस्मरण, वाकियाते-जहाँगीरी, इकबालनामा, जहाँगीरनामा तथा तुजुक-ए-जहाँगीरी आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।

बृजरत्न दास का मत है कि समग्र रूप से इन सब ग्रंथों का नाम ‘जहाँगीरनामा’ होना चाहिए। विद्वानों के अनुसार जहाँगीर के शासन के प्रारम्भिक बारह वर्षों के संस्मरण जहाँगीर ने स्वयं लिखे। उसके बाद अठारहवें वर्ष तक का विवरण मोतमिद खाँ की सहायता से लिखा और बाद का विवरण मोतमिद खाँ ने अन्य साधनों के आधार पर लिखा। इस ग्रन्थ में जहाँगीर के अभियानों का विस्तृत विवरण है।

अभियानों के लिए की गई तैयारियों, मुख्य सेनापतियों और अन्य उच्चाधिकारियों की नियुक्तियों, सेनाओं का पलायन, अभियानों की घटनाओं एवं कठिनाइयों तथा शत्रु पक्ष की गतिविधियों का विवरण दिया गया है। जहाँगीर के शासनकाल में उठने वाले विद्रोहों तथा उनके दमन का विवरण भी दिया गया है।

इस ग्रन्थ में दरबार में मनाये जाने वाले उत्सवों, भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य, पेड़-पौधों, फलों, सब्जियों, पशु-पक्षियों, आखेट, नगरों एवं दुर्गों, हिन्दुस्तान की अनेक प्रजातियों के खान-पान, रहन-सहन, आदतों आदि का भी रोचक वर्णन किया गया है। जहाँगीर ने अपने संस्मरणों में शहजादा खुसरो, परवेज तथा शहरयार आदि के विवादों का उल्लेख किया है। साथ ही नूरजहाँ की बुद्धिमता की काफी प्रशंसा की है।

डॉ. बेनीप्रसाद सक्सेना के अनुसार यह ग्रन्थ साहित्य और इतिहास दोनों दृष्टियों से मूल्यवान है। वे इसे अकबरनामा से भी अधिक आकर्षक मानते हैं परन्तु अन्य विद्वानों के अनुसार जहाँगीर ने अनेक स्थलों पर स्वयं को अकबर से श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास किया है। ऐसे स्थानों पर वह कभी-कभी उपहास का पात्र बन जाता है।

जहाँगीर ने कई स्थानों पर मदिरापान तथा दूसरों पर गये अत्याचारों को स्वीकारा है किन्तु फिर भी उसने बहुत-से निजी दोषों पर प्रकाश नहीं डाला है। इन दोषों के उपरान्त भी यह ग्रन्थ जहाँगीर के काल की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को जानने का महत्त्वपूर्ण एवं विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज है।

(ब.) मुगल अधिकारियों एवं स्वतंत्र फारसी लेखकों के ग्रंथ

1. तजकिरतुल वाकेआत

हुमायूँ के निजी सेवक जौहर आफताबची ने अकबर के शासनकाल में अपनी स्मृतियों के आधार पर इस ग्रन्थ की रचना की। डॉ. कानूनगो, हुमायूँ के शासनकाल के लिए इस ग्रन्थ को, गुलबदन के हुमायूँनामा से भी अधिक प्रामाणिक मानते हैं। इलियट और डाउसन ने भी लिखा है- ‘जौहर द्वारा दिए गए ये संस्मरण सच्चाई और ईमानदारी के साथ लिखे हुए प्रतीत होते हैं परन्तु इन्हें  हुमायूँ की मृत्यु के तीस वर्ष बाद लिखना आरम्भ किया गया था। इसलिए यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इसमें ग्रंथ में जिन घटनाओं का वर्णन है वे तद्वत और पूर्णतः सही हैं।’ इस ग्रन्थ में हुमायूँ के राज्यारोहण से लेकर ईरान से उसकी वापसी तथा राज्य-प्राप्ति तक का विस्तृत विवरण दिया गया है।

2. कानूने हुमायूँनी

इस ग्रन्थ का लेखक गयासुद्दीन मुहम्मद ख्वान्दमीर, बाबर और हुमायूँँ के दरबार का प्रतिष्ठित अमीर था। उसने हुमायूँ के आदेश से इस ग्रन्थ की रचना की। इसमें हुमायूँ के अधिनियमों, आविष्कारों और भवनों के निर्माण का वर्णन है। तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झाँकी भी उपलब्ध है।

3. तारीखे-शेरशाही

इसका लेखक अब्बास खाँ सरवानी, अकबर की सेवा में था। उसने अकबर के आदेश से इस ग्रन्थ की रचना की। अफगानों के सम्बन्ध में जितने भी ग्रन्थ लिखे गये उनमें ‘तारीखे शेरशाही’ सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसमें शेरशाह और इस्लामशाह के समय का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस ग्रन्थ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि लेखक ने घटनाओं की तिथियां नहीं दी हैं। इसलिये इसके घटनाक्रम को समझने के लिये अन्य ग्रन्थों का सहारा लेना पड़ता है। इस ग्रंथ में एक ही जैसे शब्दों का बाहुल्य है जिससे थकान उत्पन्न होती है। इन कमियों के उपरान्त भी सरवानी के इस ग्रन्थ की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

4. अकबरनामा

अकबर के प्रमुख दरबारी अबुल फजल ने अकबरनामा की रचना की। अबुल फजल का पिता शेख मुबारक और बड़ा भाई अबुल फैज भी उसी के समान विद्वान थे। इस विशाल ग्रन्थ को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) प्रथम भाग

प्रथम भाग को भी दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- (अ) अकबर का जन्म, तैमूरों की वंशावली, बाबर तथा हुमायूँ के राज्य का विस्तृत विवरण और (ब) अकबर के तख्त पर बैठने से लेकर 17वें वर्ष के मध्य तक का विवरण। यह भाग 1596 ई. तक पूरा हो पाया था।

(2) द्वितीय भाग

अकबरनामा के दूसरे भाग में अकबर के शासनकाल के 17 वें वर्ष के मध्य से लेकर 46वें वर्ष तक का उल्लेख है। अबुल फजल के बाद प्रथम भाग के दोनों हिस्सों को अलग-अलग करके नकल किया जाने लगा और उन्हें अकबरनामा भाग 1 और 2 के नाम से पुकारा जाने लगा। दूसरे भाग को भाग तीन कहा जाने लगा। इस प्रकार, अकबरनामा तीन भागों में विभाजित हो गया।

अबुल फजल, अकबर का घनिष्ठ मित्र, सलाहकार तथा प्रमुख दरबारी था। वह तुर्की, अरबी, हिन्दी और संस्कृत का ज्ञाता था। वह दर्शन, साहित्य तथा इतिहास ज्ञाता था। उसकी भाषा जटिल और आडम्बरपूर्ण है। अकबरनामा के ऐतिहासिक महत्त्व पर विद्वानों ने अलग-अलग मत व्यक्त किये हैं। स्मिथ के अनुसार- ‘इसमें ऐतिहासिक सामग्री उबा देने वाली आलंकारिक भाषा के बोझ में दफनाई गई है और ग्रन्थकार, जो अपने नायक का एक लज्जाजनक चाटुकार है, कभी-कभी सत्य को छुपा देता है, यहाँ तक कि जानबूझ कर विकृत भी कर देता है।

फिर भी अकबरनामा को अकबर के शासन के इतिहास की आधारशिला माना जाना चाहिए।’ मोरले आदि इतिहासकारों ने भी अबुल फजल की चाटुकारिता के कारण अकबरनामा की प्रामाणिकता में सन्देह व्यक्त किया है। इसके विपरीत ब्लोचमैन का मानना है कि इस प्रकार के दोषारोपण निर्मूल हैं। वस्तुतः यदि अकबरनामा के शब्दाडम्बर को दूर कर दिया जाय तो इसके

ऐतिहासिक महत्त्व के बारे में कोई सन्देह नहीं रह जाता। इतिहास के साथ-साथ ‘अकबरनामा’ से समकालीन राजनीति पर भी प्रकाश पड़ता है। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटना के साथ, छोटी-छोटी प्रस्तावनाएँ दी गई हैं। इस ग्रन्थ से अकबर के धार्मिक विचारों और नीति का पर्याप्त ज्ञान होता है। अबुल फजल ने विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करके इस ग्रन्थ की रचना की थी। इस कारण यह प्रामाणिक ग्रन्थ बन गया।

5. आइने-अकबरी

इस ग्रंथ की रचना भी अबुल फजल ने की। यह ग्रन्थ अकबरनामा के ही अन्तिम तथा निर्णायक अध्यायों के रूप में है, फिर भी उसमें कई नवीन एवं विशिष्ट बातें हैं जो अकबरनामा में नहीं हैं। इसे हम अकबरनामा का परिशिष्ट कह सकते हैं। इस ग्रन्थ के भी तीन भाग हैं। अकबर की शासन-प्रणाली की जानकारी की दृष्टि से यह एक मूल्यवान रचना है।

इसके महत्त्व की चर्चा करते हुए डॉ. परमात्माशरण ने लिखा है- ‘उस समय की राजनीतिक संस्थाओं के सम्बन्ध में आइने-अकबरी आज भी हमारा अप्रतिम स्रोत है। आईने अकबरी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में विवरणों और आँकड़ों की खान है परन्तु उसमें प्रशासन प्रणाली के वास्तविक कार्य-संचालन पर पर्याप्त प्रकाश नही डाला गया है। न उसमें शासन के विभिन्न विभागों और शाखाओं के सम्बन्ध में पर्याप्त सूचनाएँ दी गई हैं।’

आईने अकबरी के तीसरे भाग में हिन्दू सभ्यता और हिन्दू दर्शन का वर्णन है। इसके साथ अकबर की कुछ सूक्तियाँ भी हैं और अबुल फजल के वंश का वर्णन भी जोड़ दिया गया है। संक्षेप में, आईने-अकबरी अकबर के शासन के विभिन्न अंगों का विस्तृत विवरण है।

6. मुन्तखाब-उत-तवारीख

इसका लेखक अकबर का दरबारी अब्दुल कादिर बदायूनी था। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं। पहले भाग में बाबर और हुमायूँ के शासनकाल का वर्णन है। दूसरे भाग में 1595 ई. तक अकबर के शासनकाल का वर्णन है। तीसरे भाग में मुसलमानों और सन्तों का विवरण दिया गया है।

बदायूँनी ने अकबर के आदेश पर महाभारत (रज्मनामा) और रामायण का फारसी में अनुवाद भी किया। उसने कुछ अन्य रचनाएँ भी लिखीं। बदायूँनी कट्टर रूढ़िवादी सुन्नी मुसलमान था। वह धर्मान्धता तथा संकीर्णता से ग्रस्त था। उसे अकबर की प्रगतिशील, सहिष्णु तथा समन्वयवादी नीतियाँ पसन्द नहीं थीं। इसलिये उसने अकबर के शासन की अतिशयोक्ति पूर्ण शब्दों से निन्दा की।

उसने ग्रन्थ की रचना गुप्त रूप से की। इस कारण मुन्तखाब-उत-तवारीख की जानकारी अकबर के शासनकाल में किसी को नहीं हो पाई। बदायूँनी ने इस ग्रन्थ को राजनीतिक इतिहास के रूप में लिखा है। इसमें अकबर के समय की घटनाओं, युद्धों, विद्रोहों, अकालों तथा प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत विवरण दिया गया है।

अकबर की धार्मिक नीति से सम्बन्धित प्रत्येक घटना तथा इबादतखाना में हुए वाद-विवादों का विवरण भी दिया गया है। बदायूँनी ने अकबर पर आरोप लगाया है कि वह व्यक्तिगत रूप से इस्लाम धर्म की जड़ें खोद रहा है। इस ग्रन्थ में कई तिथियाँ गलत दी गई हैं। अतः इसका घटनाक्रम दोषपूर्ण हो जाता है। इन दोषों के उपरान्त भी ऐतिहासिक दृष्टि से यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है।

7. तबकाते-अकबरी

इस ग्रन्थ का लेखक ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद था। वह विद्वान् होने के साथ-साथ पराक्रमी योद्धा भी था। उसने अकबर के विभिन्न अभियानों में महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। तबकाते-अकबरी में 987-88 ई. से लेकर 1593-94 ई. तक का भारत का इतिहास उपलब्ध हैं। इसमें न केवल बाबर, हुमायूँ और अकबर का विवरण हैं अपितु देश के प्रान्तीय मुस्लिम राज्यों का वर्णन भी है।

डॉ. रिजवी ने लिखा हैं कि निजामुद्दीन ने अपने ग्रन्थ की रचना के लिये अकबरनामा सहित 28 ग्रन्थों का सहारा लिया और सामग्री की काफी खोजबीन तथा जाँच-पड़ताल के बाद लिखा। निजामुद्दीन ने धार्मिक कट्टरपन तथा पक्षपात का सहारा नहीं लिया। इस दृष्टि से उसकी रचना अबुल फजल तथा बदायूँनी से अधिक निष्पक्ष कही जा सकती हैं। डॉ. आशीर्वादीलाल ने लेखक पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि इस ग्रन्थ में निजी मत ठीक से व्यक्त नहीं किये गये हैं।

स्मिथ ने लिखा है कि यह ग्रन्थ बाह्य घटनाओं का रूखा एवं नीरस वृत्तान्त है। यह अकबर की धार्मिक उच्छृंखलताओं की सर्वथा उपेक्षा कर देता है और अनेक महत्त्वपूर्ण बातों का किंचित्मात्र भी उल्लेख नहीं करता। इतना होने पर भी यह ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है।

8. मआसीर-ए-जहाँगीरी

इस ग्रन्थ का लेखक कामगार खाँ था। इस ग्रंथ की काफी सामग्री ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ से ली गई है। डॉ. बेनीप्रसाद सक्सेना ने लिखा है कि यद्यपि यह ग्रन्थ गम्भीर दोषों का शिकार है तथापि शाहजहाँ के विद्रोह तथा उसके राज्याभिषेक के तुरन्त पूर्व के घटनाक्रम आदि का विवरण देकर ऐसे अन्तराल को भरता है जो इस ग्रंथ के बिना रिक्त ही रह जाता।

9. बादशाहनामा (पादशाहनामा)

इस ग्रंथ में शाहजहाँ के शासनकाल का इतिहास है। इस ग्रंथ की रचना तीन लेखकों ने की। प्रत्येक लेखक ने अलग-अलग वर्षों का विवरण लिखा-

(अ) मुहम्मद अमीन कजवीनीकृत बादशाहनामा

इस ग्रंथ में शाहजहाँ के जन्म से लेकर उसके शासनकाल के दसवें वर्ष तक का विवरण दिया गया है। कजवीनी शाहजहाँ का प्रथम राजकीय इतिहासकार था। शाहजहाँ ने अपने शासन के आठवें वर्ष में अपने राज्य का इतिहास लिखने का आदेश दिया।

जब कजवीनी शासन के दस वर्षों का इतिहास लिख चुका तो उसे अचानक पद से हटा दिया गया। कजवीनी की भाषा शैली सरल और आकर्षक है परन्तु उसकी निष्पक्षता में संदेह है। वह अपने आश्रयदाता शाहजहाँ के प्रति पक्षपातपूर्ण है। फिर भी शाहजहाँ के शासन के प्रारम्भिक दस वर्षों की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

(ब) लाहौरीकृत बादशाहनामा

इस ग्रंथ में तैमूर से लेकर शाहजहाँ के पूर्वजों का संक्षिप्त वर्णन तथा शाहजहाँ के शासनकाल के प्रारम्भ होने से लेकर उसके बीस वर्षों तक के शासन का विवरण दिया गया है। कजवीनी के पश्चात् लाहौरी को राजकीय इतिहासकार नियुक्त करके बादशाहनामा लिखने का आदेश दिया गया।

वह सम्भवतः 1648 ई. तक यह कार्य करता रहा। बाद में वृद्धावस्था के कारण उसे काम बन्द करना पड़ा। लाहौरी का ग्रन्थ बहुत बड़ा है। इस ग्रंथ में राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ शाहजहाँ के मनसबदारों, उसके समय के प्रसिद्ध शेखों, विद्वानों, हकीमों और कवियों की नामावली भी दी गई है। इस ग्रंथ के आरम्भ में अबुल फजल की शैली की नकल देखने को मिलती है परन्तु बाद में कजवीनी की नकल देखने को मिलती है। शाहजहाँ के राज्य के लिए इसे एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

(स) वारिसकृत बादशाहनामा

अब्दुल हमीद लाहौरी के अधूरे काम को उसके शिष्य मुहम्मद वारिस ने पूरा किया। उसने शाहजहाँ के शासन के अन्तिम दौर का इतिहास लिखा। यह इतिहास शाहजहाँ के शासनकाल के 21वें वर्ष में आरम्भ होकर 30वें वर्ष तक जारी रहता है। इस ग्रन्थ को शाहजहाँनामा भी कहते हैं।

10. शाहजहाँनामा

इस नाम से दो ग्रंथ मिलते हैं। वारिसकृत बादशानामा को भी शाहजहाँनामा कहते हैं। एक अन्य लेखक मुहम्मद ताहिर इनायतखाँ की कृति भी शाहजहाँनामा के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें 1657-1658 ई. का इतिहास दिया गया है।

11. आलमगीरनामा

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद काजिम बादशाहनामा के लेखक कजवीनी का पुत्र था। इस ग्रन्थ की रचना 1688 ई. में हुई। उसकी स्तुतिपूर्ण शैली औरंगजेब को बहुत पसंद आई और उसे बादशाह से सम्बन्धित असाधारण घटनाओं तथा विजय-अभियानों को ग्रन्थ रूप में लिपिबद्ध करने का आदेश दिया गया।

इस ग्रन्थ की रचना के लिए औरंगजेब ने लेखक को समस्त प्रकार के साधन उपलब्ध कराये। मुहम्मद काजिम ने इस ग्रन्थ में औरंगजेब (आलमगीर) के शासन के प्रथम दस वर्षों का इतिहास लिखा है। उसने अपने आश्रयदाता की खूब प्रशंसा की और उसके भाग्यहीन भाइयों की कटु निन्दा करते हुए उनके लिए निम्न एवं अपशब्दों का प्रयोग किया।

उसने दाराशिकोह के लिए वेशिकोह (अप्रतिष्ठित) और शुजा के लिए नाथुजा (कायर) शब्दों का प्रयोग किया। जब यह ग्रन्थ औरंगजेब को भेंट किया गया तो उसे पसन्द नहीं आया और उसने आगे का वृत्तान्त नहीं लिखने का आदेश दिया। एकपक्षीय रचना होने के कारण इसे प्रामाणिक इतिहास नहीं माना जाता।

12. मआसिर-ए-आलमगीरी

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद साफी मुस्तइद्द खाँ, मंगोल साम्राज्य के वजीर इनायतुल्लाखाँ का मुंशी था। इस ग्रंथ में औरंगजेब के शासन का इतिहास है। इस ग्रन्थ की रचना किसी के आदेश से न होकर स्वप्रेरणा से हुई। 1710 ई. में ग्रन्थ की रचना पूरी हो गई। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं। साथ में एक परिशिष्ट भी है।

पहला भाग काजिम के आलमगीरनामा का संक्षिप्तिकरण मात्र है। दूसरे भाग में औरंगजेब के शासन के अन्तिम 40 वर्षों तथा उसकी मृत्यु का हाल दिया गया है। परिशिष्ट में बादशाह से सम्बन्धित कहानियों तथा शाही परिवार का पूरा वृत्तान्त दिया गया है।

मुआसिर-ए-आलमगीरी के ऐतिहासिक मूल्यांकन के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह घटनाओं एवं तथ्यों का खजाना है तो अन्य विद्वानों के अनुसार लेखक ने अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं को छोड़ दिया है। उसने अपने ग्रन्थ में अनेक ऐसी तुच्छ घटनाओं का उल्लेख किया जिनको इतिहास में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए। फिर भी, औरंगजेब के दक्षिण प्रवास के समय की घटनाओं को जानने के लिए यह ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है।

13. मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ)

इस ग्रन्थ का लेखक मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ था। औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु खाफी खाँ ने गुप्त रूप से इस ग्रन्थ की रचना की। यह एक विशाल ग्रन्थ है जो 1519 ई. में बाबर के आक्रमण से आरम्भ होकर मुहम्मदशाह के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ पूरा होता है।

ग्रन्थ का महत्व 1605 ई. से 1733 ई. तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (1658 ई.) से लेकर 1733 ई. के लिए अधिक है। लेखक ने मंगोल बादशाहों के राज्य में कई पदों पर कार्य किया। अनेक अमीरों के साथ उसके अच्छे सम्बन्ध थे। इसलिये उसकी सामग्री का क्षेत्र बहुत विशाल था।

विभिन्न सूत्रों से प्राप्त विवरणों को अच्छी प्रकार से जाँच-पड़ताल करने के बाद उसे जो सत्य लगा, उसने लिखा। इस ग्रंथ में सैनिक अभियानों और शाही उपलब्धियों का विस्तृत विवरण है। वह स्वयं एक दक्ष राजस्व अधिकारी था और उसने अपने समय की राजस्व व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर व्यापक प्रकाश डाला।

उसने मनसबदारी व्यवस्था के पुनर्निर्माण के सम्बन्ध में किये गये प्रयासों, मंगोल दरबार की दलबन्दी, सैय्यदों और निजामुल्मुल्क की प्रतिद्विन्द्विता आदि घटनाओं का उल्लेख किया है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है। उसने मंगोल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया है। उसके ग्रन्थ से तत्कालीन साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। उसने भारत में व्यापार के लिए बसने वाले यूरोपियन लोगों की गतिविधियों का विवरण विस्तार से दिया है। इस ग्रन्थ का इतिहास में बड़ा सम्मान एवं महत्त्व है।

14. इबरतनामा

इस ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद कासिम था। इस ग्रंथ में औरंगजेब की मृत्यु से लेकर कुतुबुलमुल्क सैय्यद अब्दुल्ला की मृत्यु तक का इतिहास है। औरंगजेब की मृत्यु के बाद होने वाले उत्तराधिकार संघर्षों की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इस ग्रन्थ से तत्कालीन अस्थिर राजनीतिक स्थिति तथा मंगोल अमीरों की दलबन्दी के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

(स.) हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1. नुश्खा-ए-दिलकुशा

इस ग्रंथ का लेखक भीमसेन था। उसने फारसी भाषा में औरंगजेब के राज्यकाल का इतिहास लिखा। उसने कई मंगोल सेनानायकों, महाराजा जसवन्तसिंह तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गये उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा।

भीमसेन नेे औरंगजेब के शासनकाल की घटनाओं, परिस्थितियों, उनके वास्तविक कारणों एवं परिणामों का उल्लेख किया है। सर यदुनाथ सरकार ने इस ग्रन्थ को अद्वितीय तथा बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी देने वाला बताया है। भीमसेन ने यह ग्रन्थ किसी बादशाह की कृपा प्राप्त करने के लिए नहीं लिखा था, अतः उसने घटनाओं को छिपाने अथवा छोड़ देने का लोभ नहीं किया और निष्पक्ष रूप से लिखा।

राजनीतिक घटनाओं और युद्धों के साथ-साथ उसने खाद्य-वस्तुओं की कीमतें, सड़क मार्गों की वास्तविक स्थिति, उच्चवर्ग के लोगों का सामाजिक जीवन, आमोद-प्रमोद आदि के बारे में भी सविस्तार लिखा है। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का भी वर्णन किया है। इस प्रकार यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है।

2. फुतूहाते आलमगीरी

इस ग्रंथ का लेखक पाटन निवासी ईश्वरदास नागर था। उसने औरंगजेब के शासन काल के प्रारम्भ से लेकर 34वें वर्ष तक का इतिहास लिखा। इस ग्रंथ में राजपूतों के सम्बन्ध में दिया गया विवरण अधिक महत्त्वपूर्ण है।

3. खुलासत-उल-तवारीख

इस ग्रन्थ का लेखक पटियाला निवासी सुजानराय खत्री था। इस ग्रन्थ में महाभारतकाल से लेकर औरंगजेब के शासनकाल तक का विवरण है। सुजानराय ने अपने ग्रन्थ की रचना के लिए लगभग 27 पूर्ववर्ती ग्रन्थों की सहायता ली। यह भारत का सामान्य इतिहास है फिर भी, मध्यकालीन भारतीय इतिहास की अनेक घटनाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देता है।

4. तजकिरात-उस-सलातीन चगता

इसका लेखक कामवर खाँ मूलतः हिन्दू था। बाद में वह मुसलमान बन गया। 1723 ई. में उसने यह ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया। इस ग्रंथ के पहले भाग में चंगेज खाँ से लेकर जहाँगीर के शासनकाल तक की घटनाओं का उल्लेख है। दूसरे भाग में शाहजहाँ से लेकर 1724 ई. तक की घटनाओं का उल्लेख है। यद्यपि इस ग्रन्थ में बहुत-सी कमियाँ हैं, तथापि यह ग्रन्थ 18वीं सदी के आरम्भिक वर्षों के इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।

(द.) विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गये ग्रंथ

1.  ट्रेवल्स इन दी मंगोल एम्पायर

इस ग्रंथ का लेखक फेंक्वीएस बर्नियर शाहजहाँ के समय भारत आया था। वह फ्रांस का रहने वाला था। उसका जन्म 1630 ई. में हुआ था। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। दर्शन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र तथा अन्य विभिन्न विषयों पर उसका पूर्ण अधिकार था। भारत की यात्रा पर आने के पूर्व वह कई यूरोपीय देशों तथा फिलिस्तीन, सीरिया और मिò आदि का भ्रमण कर चुका था।

1658 ई. में वह भारत आया और लगभग 12 वर्ष तक भारत में रहा। इस अवधि में उसने भारत के अनेक भागों को देखा। 1669 ई. में वह स्वदेश पहुँच गया और एक वर्ष बाद उसने अपने यात्रा-वृत्तान्त को एक ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित किया जो ट्रेवल्स इन दी मंगोल एम्पायर कहलाया।

बर्नियर ने शाहजहाँ की मृत्यु, दारा के गुणों, दुःखों और यातनाओं का, शुजा की दयनीय स्थिति, मंगोलशाही हरम, मंगोल प्रान्तपतियों के अत्याचारों, जहाँआरा का चरित्र-चित्रण, मंगोलों की सामरिक व्यवस्था, दिल्ली, आगरा, कश्मीर आदि नगरों का वर्णन किया है। बर्नियर ने तत्कालीन भारत की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का भी वर्णन किया है।

बर्नियर ने अधिकांश सूचनाएँ विभिन्न सूत्रों से प्राप्त की। उसकी सूचनाओं के सूत्र कितने सही तथा निष्पक्ष थे, यह विवाद का विषय है। उसने जहाँआरा के चरित्र और शाहजहाँ के साथ औरंगजेब के विनम्र व्यवहार जैसी कई मिथ्या बातें लिखी हैं।

2. स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया)

इस ग्रन्थ का लेखक निकोलोआ मनूची था। उसका जन्म इटली के वेनिस नगर में 1637 ई. में हुआ था। चौदह वर्ष की अल्पायु में ही वह विश्व भ्रमण के लिए निकल पड़ा। 1650 ई. में वह सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया।

मनूची ने दारा की तरफ से उत्तराधिकार युद्ध में भाग लिया। जब दारा सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो वह भी उसके साथ गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया।

उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किये गये अभियान में भाग लिया। वहाँ से वह गोआ होता हुआ लाहौर पहुँचा जहाँ उसने सात वर्ष बिताये। कुछ समय के लिए उसने शाहआलम की सेवा में भी काम किया। उसके अन्तिम वर्ष मद्रास में बीते। 1717 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

मनूची ने अपने ग्रन्थ की रचना सम्भवतः 1699 से 1705 ई. के मध्य की। ग्रन्थ का प्रारम्भिक भाग इटालियन भाषा में लिखा। कुछ पृष्ठ पुर्तगाली भाषा में लिखे और शेष भाग फ्रांसीसी भाषा में लिखा। यह एक विशाल ग्रन्थ है। प्रथम बीस अध्यायों में उसकी वेनिस से दिल्ली तक की यात्रा का वृत्तान्त है।

दूसरे भाग में तैमूर से शाहजहाँ तक का संक्षिप्त इतिहास है। तीसरे भाग में मंगोल दरबार, उनकी शासन-व्यवस्था, राजस्व-व्यवस्था, हिन्दू राज्यों की शासन-व्यवस्था, हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों तथा पर्व-समारोहों, सड़कों एवं यात्रियों की सुरक्षा इत्यादि का उल्लेख है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में उसने जगह-जगह अपने संस्मरण लिखे हैं।

मनूची ने जिन सूत्रों के आधार पर इतिहास पर लिखा है, वे ज्यादा सही नहीं लगते क्योंकि उसकी तिथियाँ सहीं नहीं हैं। तैमूर से शाहजहाँ तक की वंशावली में भी अनेक त्रुटियाँ हैं। क्रमबद्धता की भी कमी है। उसने सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हुए शाहजहाँ के व्यक्तिगत चरित्र पर कई लांछन लगाये जो सही नहीं हैं।

औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता तथा उसके दक्षिणी अभियानों, अमीरों एवं अपने सम्बन्धियों के साथ उसके व्यवहार का उल्लेख सत्य के निकट है। भारत के विभिन्न नगरों तथा शाही महल की गतिविधियों का भी रोचक वर्णन है। उसने राजस्व सम्बन्धी जो आंकड़े दिये हैं तथा विदेशी व्यापार से होने वाली आय का जो विस्तृत विवरण दिया है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है।

उसने तत्कालीन भारत के सामाजिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला है परन्तु इस सम्बन्ध में उसका विवरण ज्यादा सही नहीं है। उसने लिखा है कि हिन्दू लोग अस्वच्छ हैं। वस्तुतः वह हिन्दुओं की प्रथाओं को ठीक से समझ नहीं पाया। इन कमियों के उपरान्त भी शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाल की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त संस्कृत तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक ऐतिहासिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। लिखित साहित्य के अतिरिक्त शिलालेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से भी मंगोलकालीन शासन के इतिहास की जानकारी मिलती है।

मुगलकालीन लिखित स्रोतों की समीक्षा

मुगल बादशाहों के इतिहास की जानकारी के लिए स्वयं मुगल बादशाहों, शाही परिवार के सदस्यों तथा राजकीय अधिकारियों के साथ-साथ स्वतंत्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। मंगोल शासकों द्वारा लिखित आत्मकथाएँ तथा अन्य लेखकों द्वारा लिखित उनकी जीवनियाँ भी उस काल के इतिहास को जानने का प्रमुख स्रोत हैं। ये स्रोत अधिकांशतः उन लोगों के माध्यम से प्राप्त हुए हैं जो या तो स्वयं घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे अथवा उन्होेंने प्रत्यक्षदर्शियों से सुनकर अपनी रचनाएँ लिखी थीं।

मुगलकालीन फारसी लेखकों की कमजोरियाँ

मुगलकालीन फारसी लेखकों के विवरण को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

(1.) अधिकांश लेखकों ने राज्याश्रय के अन्तर्गत अथवा सुल्तान या सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे। अतः वे अपने शासक के पक्ष को ही प्रतिपदित करते रहे और उसके दोषों को उजागर करने का साहस नहीं कर सके।

(2.) फारसी लेखक अपनी संकीर्ण तथा धार्मिक कट्टरता से ऊपर नही उठ सके। परिणामस्वरूप वे एक इतिहासकार की निष्पक्षता को भुला बैठे।

(3. फारसी लेखकों ने घटनाओं की तिथियाँ बहुत कम दी हैं। कई लेखकों ने गलत तिथियों लिखी हैं। इस कारण इतिहास का निर्माण करने में कठिनाई उत्पन्न हो जाती है।

(4.) फारसी लेखकों ने शासकीय वर्ग एवं अमीर वर्ग के रहन-सहन, खान-पान, आमोद-प्रमोद पर ही अधिक ध्यान दिया। उनकी रचनाओं में सर्वसाधारण की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर पर्याप्त प्रकाश नहीं डाला गया।

(5.) अधिकांश लेखकों ने घटनाओं के कारणों और सन्दर्भों में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास नहीं किया।

विदेशी लेखकों की कमजोरियाँ

विदेशी लेखकों के विवरण भी अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। इसके कई कारण हैं-

(1.) विदेशी लेखक यात्री के रूप में इस देश में आये थे इस कारण वे बहुसंख्य हिन्दू जनता तथा अल्पसंख्य मुस्लिम शासकों की सोच के अंतर को ढंग से नहीं समझ सके।

(2.) विदेशी लेखकों ने भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को समझने में भारी भूल की।

(3. विदेशी लेखक पश्चिम की श्रेष्ठता के पूर्वाग्रह से पीड़ित थे।

(4.) विदेशी लेखकों को भारत के मूल इतिहास की जानकारी नहीं होने के कारण उन्होंने राजनीतिक घटनाओं का विवरण लिखने में अनेक त्रुटियाँ कीं।

(5.) विदेशी लेखक अपने वर्णन को चटपटा बनाने के लिये घटनाओं, नगरों तथा गाँवों का रोचक चित्र तो प्रस्तुत करते हैं किंतु उनकी पृष्ठभूमि को समझाने में असफल रहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – मध्यकालीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत

दिल्ली सल्तनत कालीन इतिहास के स्रोत

मुगलकालीन इतिहास के स्रोत

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

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गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक - www.bharatkaitihas.com

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक बचपन में ही गुलाम के रूप में बेच दिया गया था। इसलिये उसकी सामाजिक हैसियत अच्छी नहीं थी किंतु मुहम्मद गौरी को प्रसन्न करके उसने अमीर का पद प्राप्त कर लिया।

गुलाम वंश की स्थापना

गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. से 1194 ई. तक भारत पर कई आक्रमण किये तथा पंजाब से लेकर दिल्ली, अजमेर तथा कन्नौज तक विस्तृत अनेक राज्यों को जीतकर विशाल भूभाग को अपने अधीन किया। मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने सर्वाधिक योग्य गुलाम तथा सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को 1194 ई. में भारतीय क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक 12 साल तक दिल्ली पर गजनी के गवर्नर के रूप में शासन करता रहा। 1206 ई. में जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई तो अलाउद्दीन उसका उत्तराधिकारी हुआ किंतु उसे शीघ्र ही महमूद बिन गियासुद्दीन ने अपदस्थ करके गजनी पर अधिकार कर लिया। गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सुल्तान बना दिया।

इस प्रकार 1206 ई. से लेकर 1210 ई. में अपनी मृत्यु होने तक कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन करता रहा। ऐबक ने भारत में मुस्लिम राजवंश की स्थापना की जिसे गुलाम-वंश अथवा दास-वंश कहते है। इसे गुलाम-वंश कहे जाने का कारण यह है कि इस वंश के समस्त शासक अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में गुलाम रह चुके थे।

इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी का गुलाम था। इस वंश का दूसरा शासक इल्तुतमिश, कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था। इस वंश का तीसरा शासक बलबन, इल्तुतमिश का गुलाम था। अतः यह वंश, गुलाम वंश कहलाता है। गुलाम वंश के समस्त शासक तुर्क थे।

कुछ इतिहासकार गुलाम वंश नामकरण उचित नहीं मानते। उनके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में ‘कुतुबी’, इल्तुतमिश ने ‘शम्मी’ तथा बलबन ने ‘बलबनी’ राजवंश की स्थापना की। इस प्रकार इस समय में दिल्ली में एक वंश ने नहीं, अपितु तीन राजवंशों ने शासन किया। इन इतिहासकारों के अनुसार इस काल को दिल्ली सल्तनत का काल कहना चाहिये।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

प्रारम्भिक जीवन

कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में दिल्ली सल्तनत का संस्थापक, गुलाम वंश का संस्थापक तथा कुतुबी वंश का संस्थापक था। वह दिल्ली का पहला मुसलमान सुल्तान था। उसका जन्म तुर्किस्तान के कुलीन तुर्क परिवार में हुआ था किंतु वह बचपन में अपने परिवार से बिछुड़ गया तथा गुलाम के रूप में बाजार में बेच दिया गया।

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक कुरूप किंतु प्रतिभावान बालक था। एक व्यापारी उसे दास के रूप में बेचने के लिए गजनी ले गया। सबसे पहले अब्दुल अजीज कूकी नामक काजी ने कुतुबुद्दीन को खरीदा। यहाँ पर उसने काजी के बच्चों के साथ घुड़सवारी तथा थोड़ी-बहुत शिक्षा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात् मुहम्मद गौरी ने उसकी कुरूपता पर विचार न करके उसे मोल ले लिया।

कुतुबुद्दीन ने अपने गुणों से मुहम्मद गौरी को मुग्ध कर लिया और उसका अत्यन्त प्रिय तथा विश्वासपात्र दास बन गया। वह अपनी योग्यता के बल पर धीरे-धीरे एक पद से दूसरे पद पर पहुँचता गया और ‘अमीर आखूर’ (घुड़साल रक्षक) के पद पर पहुँच गया।

वह मुहम्मद गौरी का इतना प्रिय बन गया कि गौरी ने उसे ऐबक अर्थात् चन्द्रमुखी के नाम से पुकारना आरम्भ किया। जब मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण करना आरम्भ किया तब ऐबक भी भारत आया और अपने सैनिक-गुणों का परिचय दिया। मुहम्मद गौरी को अपनी भारतीय विजय में ऐबक से बड़ा सहयोग मिला।

वाइसराय के रूप में ऐबक की सफलताएँ

1194 ई. में मुहम्मद गौरी कन्नौज विजय के उपरान्त गजनी लौटा, तब उसने भारत के विजित भागों का प्रबन्ध ऐबक के हाथों में दे दिया। इस प्रकार ऐबक मुहम्मद गौरी के भारतीय राज्य का वाइसराय बन गया। वाइसराय के रूप में उसकी सफलताएँ इस प्रकार से हैं-

सामरिक उपलब्धियाँ: कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के विजय अभियान को जारी रखा। 1195 ई. में उसने कोयल (अलीगढ़) जीता। इसके बाद उसने अन्हिलवाड़ा को नष्ट किया। 1196 ई. में उसने मेड़ों को परास्त किया जो चौहानों की सहायता कर रहे थे। 1197-98 ई. में उसने बदायूँ, चन्दावर और कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

1202-03 ई. में उसने चंदेलों को परास्त कर बुंदेलखण्ड तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गौरी की मृत्यु से पूर्व ऐबक ने लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इस विशाल मुस्लिम साम्राज्य को परास्त करके पुनः दिल्ली तथा उत्तर भारत के राज्यों पर अधिकार करना हिन्दू राजकुलों के वश की बात नहीं रही।

कूटनीतिक उपलब्धियाँ

सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक बचपन में ही गुलाम के रूप में बेच दिया गया था। इसलिये उसकी सामाजिक हैसियत अच्छी नहीं थी किंतु मुहम्मद गौरी को प्रसन्न करके उसने अमीर का पद प्राप्त कर लिया। अपनी हैसियत बढ़ाने के लिये उसने सदैव मुहम्मद गौरी के प्रति स्वामिभक्ति का प्रदर्शन किया।

अमीरों के बीच अपनी निजी हैसियत बढ़ाने के लिये भी उसने कूटनीति का सहारा लिया तथा अपने आप को एवं अपने परिवार को वैवाहिक सम्बन्धों से मजबूत बनाया। सुल्तान बनने से पूर्व ही उसने वैवाहिक सम्बन्धों द्वारा अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया। ऐबक ने गजनी के शासक यल्दूज की पुत्री के साथ विवाह किया।

ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह सिन्ध तथा मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ किया तथा दूसरी पुत्री का विवाह प्रतिभाशाली तथा होनहार गुलाम इल्तुतमिश के साथ किया। ऐबक 12 वर्ष तक दिल्ली में वाइसराय की हैसियत से शासन करता रहा तथा धीरे-धीरे सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार जमा लिया।

उसने कभी भी मुहम्मद गौरी से विद्रोह करके स्वतंत्र शासक बनने की चेष्टा नहीं की। मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद भी उसने तब तक सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की जब तक कि गजनी के शासक महमूद बिन गियासुद्दीन ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं कर लिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्यारोहण

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली में था। जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु का समाचार गजनी से लाहौर पहुँचा तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन को लाहौर का शासन अपने हाथों में लेने का निमंत्रण भिजवाया। यह निमंत्रण पाकर कुतुबुद्दीन तुरन्त दिल्ली से लाहौर के लिए चल पड़ा और वहाँ पहुँच कर लाहौर का शासन अपने हाथ में ले लिया।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के तीन मास उपरान्त 24 जून 1206 ई. को कुतुबुद्दीन का राज्यारोहण हुआ। तख्त पर बैठने के बाद भी ऐबक ने सुल्तान की उपाधि का प्रयोग नहीं करके मालिक तथा सिपहसालार की उपाधियों का ही प्रयोग किया। उसने अपने नाम की मुद्रायें भी नही चलवाईं और न अपने नाम से खुतबा ही पढ़वाया।

संभवतः वह मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारी से वैमनस्य उत्पन्न किये बिना, भारत में एक स्वतन्त्र तुर्की शासन की स्थापना करना चाहता था। उसने अपने एक दूत के माध्यम से एक प्रस्ताव गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन के पास भेजा कि गियासुद्दीन, कुतुबुद्दीन को भारत का स्वतन्त्र सुल्तान बना दे तो वह ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध उसकी सहायता करेगा।

उसका यह प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। 1208 ई. में गियासुद्दीन ने ऐबक को राजछत्र, ध्वजा, सिंहासन, दुंदुभि आदि राज्यसूचक वस्तुएँ भेजीं तथा उसे सुल्तान की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

दिल्ली का स्वतन्त्र सुल्तान बनने के उपरान्त ऐबक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) प्रतिद्वन्द्वियों की समस्या

सर्वप्रथम ऐबक को अपने प्रतिद्वन्द्वियों का सामना करना था जिनमें इख्तियारूद्दीन, यल्दूज तथा कुबाचा प्रमुख थे। इनके अधिकार में बहुत बड़े राज्य थे और वे अपने को ऐबक का समकक्षी समझते थे। यल्दूज गजनी में और कुबाचा मुल्तान में शासन करता था।

(2) हिन्दू सरदारों की समस्या

ऐबक की दूसरी कठिनाई यह थी कि प्रमुख हिन्दू सरदार, खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे थे। 1026 ई. में चंदेल राजपूतों ने अपनी राजधानी कालिंजर पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया। गहड़वाल राजपूतों ने हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में फर्रूखाबाद तथा बदायूँ में धाक जमा ली।

गवालियर फिर से प्रतिहार राजपूतों के हाथों में चला गया। अन्तर्वेद में भी कई छोटे-छोटे राज्यों ने कर देना बन्द कर दिया और तुर्कों को बाहर निकाल दिया। सेन-वंशी शासक पश्चिमी बंगाल से पूर्व की ओर चले गये थे परन्तु अपने राज्य को प्राप्त कने के लिए सचेष्ट थे। बंगाल तथा बिहार में भी इख्तियारूद्दीन के मर जाने के बाद विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी।

(3) मध्य एशिया से आक्रमण की आशंका

ऐबक को सर्वाधिक भय मध्य एशिया से आक्रमण का था। ख्वारिज्म के शाह की दृष्टि गजनी तथा दिल्ली पर लगी हुई थी।

कठिनाइयों का निवारण

ऐबक में कठिनाइयों एवं बाधाओं को दूर करने की पूर्ण क्षमता थी उसने साहस और धैर्य से कठिनाइयों एवं बाधाओं को दूर किया।

(1) प्रतिद्वन्द्वियों पर विजय

भारत में ऐबक के तीन प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी थे- इख्तियारूद्दीन, कुबाचा तथायल्दूज।

इख्तियारूद्दीन

इख्तियारूद्दीन ने सदैव ऐबक का आदर किया और उसी की अधीनता में शासन किया।

कुबाचा

कुबाचा ऐबक का दामाद था। अतः कुबाचा ने उसका विरोध नहीं किया और न उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाया।

यल्दूज

यल्दूज ऐबक का श्वसुर था परन्तु यल्दूज ने ऐबक का विरोध किया। 1208 ई. में यल्दूज ने गजनी में एक सेना तैयार की और मुल्तान पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया परन्तु ऐबक ने शीघ्र ही उसे वहाँ से मार भगाया तथा गजनी पर अधिकार कर लिया।

गजनी के तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार ऐबक अपनी विजय से मदांध होकर मद्यपान में व्यस्त हो गया। ऐबक की सेना ने गजनी के लोगों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। इससे तंग आकर गजनी के अमीरों ने यल्दूज को गजनी आने के लिए आमन्त्रित किया। जबकि वास्तविकता यह थी कि गजनी के लोग यह सहन नहीं कर सकते थे कि दिल्ली का सुल्तान गजनी पर शासन करे और गजनी उसके साम्राज्य का एक प्रान्त बन कर रहे।

यह गजनी तथा उनके निवासियों, दोनों के लिये अपमानजनक बात थी। यल्दूज ने इस अवसर को हाथ से नहीं जाने दिया। उसने फिर से गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया। ऐबक को विवश होकर दिल्ली लौट जाना पड़ा परन्तु उसने यल्दूज के भारतीय साम्राज्य पर प्रभुत्व स्थापित करने के समस्त प्रयत्नों को विफल कर दिया।

(2) मध्य एशिया की राजनीति से अलग

कुतुबुद्दीन ऐबक ने बुद्धिमानी दिखाते हुए स्वयं को मध्य-एशिया की राजनीति से अलग रखा। अतः वह उस ओर से आने वाली सम्भाव्य आपत्तियों से सर्वथा विमुक्त रहा।

(3) बंगाल की समस्या

इख्तियारूद्दीन की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध-विच्छेद करने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच कर ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। अलीमर्दा खाँ बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। उसने ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और दिल्ली को वार्षिक कर देने के लिए उद्यत हो गया।

(4) राजपूतों का दबाव

ऐबक उत्तर-पश्चिम की राजनीति तथा बंगाल के झगड़े में इतना व्यस्त रहा कि उसे राजपूतों की शक्ति को दबाने का अवसर नहीं मिला। उसने पूर्वी तथा पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा की व्यवस्था करके अन्तर्वेद के राजाओं पर दबाव डाला परन्तु यल्दूज से आतंकित होने के कारण वह अपनी पूरी शक्ति के साथ राजपूतों से लोहा नहीं ले सका।

इसका परिणाम यह हुआ कि यद्यपि उसने बदायूं पर अपना आधिपत्य स्थापित करके अपने दास इल्तुतमिश को वहाँ का शासक नियुक्त कर दिया और अन्य छोटे-छोटे राजाओं से कर वसूल किया परन्तु उसने कालिंजर तथा ग्वालियर को फिर से अधिकार में करने का प्रयास नहीं किया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु

ऐबक ने केवल चार वर्ष शासन किया। 1210 ई. में जब ऐबक लाहौर में चौगान अथवा पोलो खेल रहा था तब वह घोड़े से गिर पड़ा। काठी का उभड़ा हुआ भाग उसके पेट में घुस गया और तुरन्त उसकी मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में दफना दिया गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक का शासन

दिल्ली पर ऐबक का शासन 12 साल तक मुहम्मद गौरी के वाइसराय के रूप में तथा 4 साल तक स्वतंत्र शासक के रूप में रहा। मुहम्मद गौरी के जीवित रहते, ऐबक उत्तर भारत को विजित करने में लगा रहा। स्वतंत्र शासक के रूप में उसका काल अत्यन्त संक्षिप्त था। इस कारण शासक के रूप में उसकी उपलब्धियाँ विशेष नहीं थीं फिर भी अपने चार वर्ष के कार्यकाल में उसने भारत में दिल्ली सल्तनत तथा गुलाम वंश की जड़ें मजबूत कर दीं। उसकी उपलब्धियाँ इस प्रकार से रहीं-

(1.) उदार शासक

मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के न्याय तथा उदारता की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है और लिखा है कि उसके शासन में भेड़ तथा भेड़िया एक ही घाट पर पानी पीते थे। उसने अपनी प्रजा को शांति प्रदान की जिसकी उन दिनों बड़ी आवश्यकता थी। सड़कों पर डाकुओं का भय नहीं रहता था और शाँति तथा सुव्यवस्था स्थापित थी किंतु भारत के मुस्लिम इतिहासकारों का यह वर्णन गजनी के इतिहासकारों के वर्णन से मेल नहीं खाता।

गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ऐबक गजनी पर अधिकार करके मद्यपान में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने गजनी वासियों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया जिससे दुखी होकर जनता ने यल्दूज को गजनी पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया। गजनी के इतिहासकारो के वर्णन के आधार पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब ऐबक ने गजनी में इतना खराब प्रदर्शन किया तब वह भारत में आदर्श शासन कैसे कर सकता था ?

(2.) हिन्दुओं के साथ व्यवहार

युद्ध के समय ऐबक ने सहस्रों हिन्दुओं की हत्या करवाई और सहस्रों हिन्दुओं को गुलाम बनाया। इस पर भी मुस्लिम इतिहासकारों ने उसकी यह कहकर प्रशंसा की है कि शांतिकाल में उसने हिन्दुओं के साथ उदारता का व्यवहार किया। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्य मुसलमान शासकों की भाँति उसने हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। उसने हिन्दुओं के मन्दिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसके शासन में हिन्दू दूसरे दर्जे के नागरिक थे। उन्हें शासन में उच्च पद नहीं दिये गये।

(3.) भवनों का निर्माण

अपने संक्षिप्त शासन काल में कुतुबुद्दीन ऐबक को भवन बनवाने का अधिक समय नहीं मिला। उसने दिल्ली तथा अजमेर के प्रसिद्ध हिन्दू भवनों को तोड़कर उनमें मस्जिदें बनवाईं। उसने दिल्ली के निकट महरौली गांव में कुव्वत-उल-इस्लाम नामक मस्जिद का निर्माण करवाया।

इस मस्जिद को उसने दिल्ली पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में बनवाया। इस मस्जिद की बाहरी शैली हिन्दू स्थापत्य की है। इसका निर्माण हिन्दुओं के नष्ट-भ्रष्ट किये गये मन्दिरों के सामान से किया गया। इसके इबादतखाने में बड़ी सुन्दर खुदाइयाँ मौजूद हैं। ऐबक की बनवाई हुई दूसरी प्रसिद्ध इमारत कुतुबमीनार है।

ऐबक ने इस मीनार को ख्वाजा कुतुबुद्दीन की स्मृति में बनवाया। यद्यपि इस मीनार को ऐबक ने आरम्भ करवाया था परन्तु इसे इल्तुतमिश ने पूरा करवाया। 1200 ई. में कुतुबुद्दीन ने अजमेर की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला को तोड़कर उसके परिसर में मस्जिद बनवाईं बाद में इस परिसर में पंजाबशाह की स्मृति में अढ़ाई दिन का उर्स भरने लगा। तब इसे ढाई दिन का झौंपड़ा कहने लगे।

(4.) सैन्य प्रबन्धन

ऐबक का शासन सैनिक बल पर अवलम्बित था। राजधानी में एक प्रबल सेना तो थी ही, राज्य के अन्य भागों में भी महत्वपूर्ण स्थानों में सेना रखी जाती थी।

(5.) नागरिक शासन

राजधानी दिल्ली तथा प्रान्तीय नगरों का शासन मुसलमान अधिकारियों के हाथ में था। उनकी इच्छा ही कानून थी। स्थानीय शासन हिन्दुओं के हाथ में था और लगान-सम्बन्धी पुराने नियम ही चालू रखे गये थे।

(6.) न्याय व्यवस्था

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक कोई व्यवस्थित न्याय विधान स्थापित नहीं कर सका। इस कारण न्याय की व्यवस्था असन्तोषजनक थी। काजियों की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून थी।

ऐबक का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

सल्तनतकालीन इतिहासकार ऐबक की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं क्योंकि उसने भारत में मुस्लिम शासन की नींव रखी। हमें भी ऐबक के चरित्र तथा कार्यों का मूल्यांकन करने के लिये उन्हीं के विवरण पर निर्भर रहना पड़ता है। हमें यह समझ लेना चाहिये कि एक आक्रांता के रूप में उसकी समस्त अच्छाइयाँ मुस्लिम प्रजा के लिये थीं जिसकी खुशहाली पर उसके शासन की मजबूती निर्भर करती थी। शासन की दृष्टि में हिन्दू प्रजा काफिर थी जिसे मुस्लिम प्रजा के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं थे।

(1) सेनानायक के रूप में

ऐबक एक विजयी सेनानायक था। अपनी सैनिक प्रतिभा के बल से ही वह अन्धकार से प्रकाश में आया था। दास के निम्न पद से सुल्तान के श्लाघनीय पद पर पहुँच पाया था। उसमें अपार साहस था। उसकी स्वामिभक्ति ने उसे मुहम्मद गौरी की नजर में चढ़ा दिया। कुतुबुद्दीन की सहायता के कारण ही गौरी को भारत में सैनिक सफलता मिली थी।

ऐबक ने अनेक नगरों तथा राज्यों पर अपने स्वामी के लिए विजय प्राप्त की परन्तु तख्त पर बैठने के बाद वह फिर नयी विजय नहीं कर सका। यल्दूज ने उसे गजनी से मार भगाया। अपने चार वर्ष के संक्षिप्त शासनकाल में अपनी स्थिति को संभालने में ही लगा रहा। डॉ. हबीबुल्ला ने ऐबक के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ‘वह महान् शक्ति तथा महान् योग्यता का सैनिक नेता था। उसमें एक तुर्क की वीरता के साथ-साथ पारसीक की सुरुचि तथा उदारता विद्यमान् थी।’

(2) प्रशासक के रूप में

ऐबक युद्ध में तलवार चलाना तो जानता था किंतु उसमें रचनात्मक प्रतिभा नहीं थी। उसने भारत में हिन्दू शासन को तो नष्ट किया किंतु अपनी ओर से कोई सुदृढ़़, संगठित एवं व्यवस्थित शासन व्यवस्था स्थापित नहीं कर सका। न ही उसने कोई शासन सम्बन्धी सुधार किये। उसने हिन्दू प्रजा पर उन काजियों को थोप दिया जो इस्लाम के अनुसार अनुसार काफिर प्रजा का न्याय करते थे।

ऐबक की उदारता तथा दानशीलता मुसलमानों तक ही सीमित थी। हिन्दुओं के साथ वह सहिष्णुता की नीति का अनुसरण नहीं कर सका। उसने हजारों हिन्दुओं की हत्या करवाई सैंकड़ों मन्दिरों का विध्वंस करके काफिर हिन्दुओं को दण्डित किया तथा मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

(3) कला-प्रेमी के रूप में

मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार ऐबक को साहित्य तथा कला से भी प्रेम था। हसन निजामी तथा फखरे मुदीर आदि विद्वानों को उसका आश्रय प्राप्त था। जिन हिन्दू-मन्दिरों को उसने तुड़वाया, उनसे प्राप्त सामग्री से उसने दो मस्जिदें बनवाई- एक दिल्ली में जिसेे कुव्वत-उल-इस्लाम नाम दिया गया तथा दूसरी अजमेर में जिसे ढाई दिन का झोंपड़ा नाम दिया गया। दिल्ली की कुतुबमीनार का निर्माण भी उसी ने आरम्भ करवाया था। इसके काल में संगीत कला, चित्र कला, नृत्य कला, स्थापत्य कला, शिल्प कला, मूर्ति कला आदि कलाओं का कोई विकास नहीं हुआ।

आरामशाह

1210 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद, लाहौर के तुर्क सरदारों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया किंतु दिल्ली के अमीर नहीं चाहते थे कि लाहौर, तुर्की सुल्तानों की राजधानी बने क्योंकि इससे साम्राज्य में अधिकांश उच्च पद तथा सम्मानित स्थान लाहौर के अमीरों को ही प्राप्त होने थे।

अतः दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह को गद्दी पर से हटाने का प्रयत्न आरम्भ किया। उन्होंने ऐबक के दामाद और बदायूं के गवर्नर इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए आमन्त्रित किया। इल्तुतमिश ने अपनी सेना के साथ बदायूँ से दिल्ली की ओर कूच कर दिया।

आरामशाह भी लाहौर से दिल्ली की ओर चला परन्तु दिल्ली के अमीरों ने उसका स्वागत नहीं किया। नगर के बाहर आरामशाह तथा इल्तुतमिश की सेनाओं में मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में आरामशाह पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया। अमीरों ने इल्तुतमिश को सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार वह 1211 ई. में दिल्ली का सुल्तान बन गया। ऐबक वंश का अन्त हो गया और उसके स्थान पर इल्बरी तुर्कों के शम्मी वंश का राज्य स्थापित हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – गुलाम वंश

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

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सुल्तान इल्तुतमिश - www.bharatkaitihas.com
सुल्तान इल्तुतमिश की मुद्रा

कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी अवश्य थी किंतु भारत में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक सुल्तान इल्तुतमिश ही था।

इल्तुतमिश का प्रारम्भिक जीवन

इल्तुतमिश का पिता आलम खाँ तुर्कों के इल्बरी कबीले का एक प्रधान व्यक्ति था। इल्तुतमिश बाल्यकाल से प्रतिभाशाली तथा रूपवान था इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था। इससे भाइयों तथा सम्बन्धियों को उससे ईर्ष्या हो गई। वे लोग उसे घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के सौदागर के हाथ बेच दिया।

घोड़ों के सौदागर ने उसे बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नामक एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया। गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक नौकर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने के से इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। कुछ दिनों के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया।

1205 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे।

इसके बाद ऐबक इल्तुतमिश के साथ सौम्य व्यवहार करने लगा तथा सदैव अपने साथ रखने लगा। ऐबक ने उसे ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया और बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया। कुतुबुद्दीन ने अपनी एक पुत्री का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया तथा उसे बदायूँ का गवर्नर नियुक्त किया।

इल्तुतमिश का दिल्ली पर अधिकार

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमंत्रित किया।

इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया। इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व प्रतिभा से परिचित थे। सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई।

इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह का मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।

इल्तुतमिश की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उसके समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ थीं-

(1.) आरामशाह की समस्या

आरामशाह, कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था जबकि इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम तथा जामाता था। इसलिये इल्तुतमिश  की अपेक्षा आरामशाह, ऐबक की सल्तनत का प्रबल दावेदार था। इसलिये दिल्ली पर अधिकार करने से पहले इल्तुतमिश को आरामशाह से निबटना था किंतु इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं कुछ अमीरों का समर्थन मिल जाने से यह काम बड़ी सरलता से सम्पन्न हो गया। इल्तुतमिश ने आरामशाह को बंदी बना लिया। इसके बाद आरामशाह का कुछ पता न चला। सम्भवतः उसका वध कर दिया गया।

(2.) उत्तराधिकार की समस्या

यद्यपि दिल्ली के काजी अली इस्माइल की सहायता से इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था परन्तु उसने इस पद को उत्तराधिकार के नियम से नहीं प्र्राप्त किया था। यह पद उसने अपने गुणों एवं कुछ अमीरों के सहयोग से प्राप्त किया था। चूूँकि वह एक गुलाम का गुलाम था, अतः बहुत से कुतुबी तथा मुइज्जी अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया। स्वतन्त्र तुर्क सरदार गुलाम के गुलाम को अपना स्वामी स्वीकार करने में अपना अपमान समझते थे। वे उसे राज्य का अपहर्ता मानते थे। इल्तुतमिश ने धैर्य के साथ इन विरोधियों का दमन किया।

(3.) समकक्ष तुर्क सरदारों की समस्या

सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश एक छोटे से प्रान्त का गवर्नर था। अधिकांश तुर्क-सरदार उसके समकक्ष थे और कुछ तुर्क-सरदार कुबाचा तथा अलीमर्दा तो कुतुबुद्दीन ऐबक के ही काल से पद तथा प्रतिष्ठा में उससे कहीं अधिक ऊँचे थे। उन्हें इल्तुतमिश का उत्कर्ष सह्य नहीं था। उन्हें अपने वश में करने के लिए साहस, बुद्धि तथा धैर्य की आवश्यकता थी। इल्तुतमिश में ये समस्त गुण विद्यमान थे, अतः वह सफलतापूर्वक अपने समकक्ष विरोधियों का सामना कर सका।

(4.) सैनिक विद्रोह की आशंका

तुर्कों में यह परम्परा थी कि कोई वंश-विशेष सदैव के लिए राज्य का अधिकारी नहीं होता था। सुल्तान, तुर्क अमीरों के निर्वाचन द्वारा नियुक्त किया जा सकता था। फलतः समस्त योग्य तथा महत्वाकांक्षी सेनापति राजपद प्राप्त करने की चेष्टा तथा प्रयास करते थे। ऐसी स्थिति में राज्य में सैनिक विद्रोह होने की सदैव सम्भावना बनी रहती थी।

(5.) खिलजी मलिक की समस्या

खिलजी मलिक बंगाल तथा बिहार में अपनी शक्ति बढ़ा रहा था और अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित कर चुका था।

(6.) अलीमर्दा खाँ की समस्या

बंगाल में अलीमर्दा खाँ बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन कर रहा था और अलाउद्दीन का विरुद धारण करके अपने को स्वतन्त्र शासक घोषित कर चुका था।

(7.) कुबाचा की समस्या

कुबाचा भी ऐबक की तरह मुहम्मद गौरी का गुलाम था। उसने भी गौरी की वैसी ही सेवा की थी जैसी ऐबक ने की थी। गौरी ने उसे उच्च का गर्वनर नियुक्त किया था। मुहम्मद गौरी के मरने के बाद उसने स्वयं को मुल्तान तथा सिन्ध का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।

वह लाहौर तथा उत्तरी पंजाब पर भी अधिकार स्थापित करना चाहता था। इसलिये उसने पंजाब का बहुत सा भाग दबा लिया और लाहौर, भटिन्डा, सरसुती, कुहराम आदि दुर्गों पर अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं। अब उसकी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी।

(8.) यल्दूज की समस्या

ताजुद्दीन यल्दूज, कुतुबुद्दीन ऐबक का श्वसुर था। उसने गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया था इसलिये वह स्वयं को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझता था और उस सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग को अपने साम्राज्य के अंतर्गत मानता था जो मुहम्मद गौरी ने जीता था।

वह इल्तुतमिश को अपना प्रान्तपति समझता था। इसलिये यल्दूज ने राजकीय चिह्न इल्तुतमिश के पास भेज कर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन भी किया। संकटपूर्ण परिस्थितियों में इल्तुतमिश ने उन वस्तुओं को स्वीकार कर लिया परन्तु उसने इस अपमान को स्मरण रखा तथा समय आने पर भरपूर बदला लिया।

(9.) भारतीय मुसलमानों की समस्या

इन दिनों दिल्ली की राजनीति में भारतीय मुसलमानों का एक प्रबल दल खड़ा हो गया था। उनमें तथा विदेशी मुसलमानों में बड़ा वैमनस्य था। इस कारण राज्य में आंतरिक संघर्ष की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। ये लोग विद्रोह करने तथा अपना प्राबल्य स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहते थे। इन विद्रोही-दलों पर नियन्त्रण रखना नितान्त आवश्यक था।

 (10.) राजपूतों की समस्या

मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने जिन राजपूतों से उनके राज्य छीन लिये थे, वे ऐबक के मरते ही अपने खोये हुए राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। जालौर तथा रणथम्भौर के शासक फिर से स्वतन्त्र हो गये। अजमेर, ग्वालियर तथा दोआब में भी तुर्की सत्ता समाप्त हो गई। इल्तुतमिश के बदायूँ छोड़ते ही गहड़वालों की प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो गई और उनके आक्रमणों का वेग बढ़ गया। कालिंजर तथा ग्वालियर तो ऐबक के शासन काल में ही स्वतन्त्र हो गये थे।

(11.) पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समस्या

पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा की समुचित व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक था क्योंकि मध्य-एशिया में स्थित तुर्क तथा मंगोल राज्यों में इस समय बड़ी खलबली मची हुई थी। अनेक मंगोल सरदारों को अपना देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा था। मंगोल सरदार, नये राज्य स्थापित करने की कामना से प्रेरित होकर अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे थे।

(12.) खोखरों की समस्या

पश्चिमोत्तर की समस्या के जटिल हो जाने का एक यह भी कारण था कि पंजाब में निवास करने वाले खोखर बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे जो प्रायः शान्ति भंग कर देते थे।

कठिनाइयों पर विजय

इल्तुतमिश ने विपत्तियों से घबराने के स्थान पर, निर्भीकता के साथ उनका सामाना किया तथा एक-एक करके समस्त बाधााओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

(1) राजधानी के विद्रोहों का दमन

इल्तुतमिश के दिल्ली का सुल्तान बनते ही कुतुबुद्दीन ऐबक के तुर्की अंग-रक्षकों का सरदार तथा कुतुबी एवं मुइज्जी सरदार दिल्ली के आस-पास अपनी सेनाएँ एकत्रित करने लगे। इल्तुतमिश ने उन पर अचानक आक्रमण करके उन्हें बुरी तरह परास्त किया। उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतार कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और अपनी राजधानी को पूर्ण रूप से सुरक्षित बना लिया।

(2) दोआब का दमन

इल्तुतमिश की कठिनाइयों से लाभ उठा कर दोआब के कई शासक भी स्वतन्त्र हो गये। इल्तुतमिश ने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़़ करके दोआब के विद्रोही हिन्दुओं की ओर ध्यान दिया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के शासकों का दमन किया।

कछार के प्रान्त पर भी उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इसके बाद उसने बहराइच को जीत कर वहाँ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद उसने अवध पर आक्रमण किया, परन्तु सम्भवतः तिरहुत को उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया। इल्तुतमिश ने बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त किया और उन्हें अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

(3) यल्दूज का दमन

इल्तुतमिश के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ख्वारिज्म के शाह ने गजनी पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। यल्दूज गजनी से भागकर लाहौर आ गया। लाहौर से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इल्तुतमिश पहले से ही इस विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार था। उसने अपनी सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से प्रस्थान कर दिया और 1215 ई. में तराइन के मैदान में यल्दूज को बुरी तरह परास्त किया। यल्दूज बंदी बनाकर बदायूँ के दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार इल्तुतमिश के एक बड़े प्रतिद्वंद्वी का नाश हो गया।

(4) कुबाचा का अंत

यल्दूज की पराजय के कुछ समय उपरान्त कुबाचा ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने एक सेना लाहौर भेजी। इस सेना ने कुबाचा को परास्त कर दिया। उसने इल्तुतमिश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इसी समय ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर पंजाब में शरण ली।

उसने कुबाचा के राज्य को लूटकर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे कुबाचा की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। थोड़े ही दिनों बाद, मंगोल सेना ने भी मुल्तान पर आक्रमण किया तथा कुबाचा को बड़ी क्षति पहुँचाई। खिलजी तुर्क भी इन दिनों सीमान्त प्रदेशों में बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इस प्रकार कुबाचा की स्थिति बड़ी संकटापन्न हो गई।

इस स्थिति से लाभ उठा कर 1227 ई. में इल्तुतमिश ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया तथा लाहौर पर फिर से अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद इल्तुतमिश ने उच्च की ओर प्रस्थान किया। इस पर कुबाचा ने अपनी सेना तथा कोष के साथ भक्कर के दुर्ग में शरण ली।

तीन महीने के घेरे के बाद उच्च पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया। इससे कुबाचा इतना आंतकित हो गया  कि अपने प्राणों की रक्षा के लिए उसने सिन्ध नदी से उस पार भाग जाने का निश्चय किया। जब वह एक नाव में बैठ कर सिन्ध नदी को पार कर रहा था तब नाव उलट गई और कुबाचा नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार इल्तुतमिश के दूसरे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का भी नाश हो गया।

(5) मंगोल आक्रमण

1221 ई. में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ तूफान की भाँति मध्य एशिया से चला था। जब उसने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया, तब वहाँ के शाह का पुत्र जलालुद्दीन भारत की ओर भाग आया परन्तु मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत तक आ पहुँचे।

जलालुद्दीन ने सिन्ध नदी के तट पर अपना खेमा डाल दिया तथा इल्तुतमिश से शरण मांगी।  इल्तुतमिश जानता था कि दिल्ली में जलालुद्दीन की उपस्थिति इल्तुतमिश के तुर्की अमीरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी। इसलिये उसने जलालुद्दीन के पास कहला भेजा कि दिल्ली की जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगी और उसके दूत को मरवा डाला।

निराश होकर जलालुद्दीन सिन्ध की ओर बढ़ा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करता हुआ फारस की ओर चल दिया परन्तु मार्ग में ही उसकी हत्या कर दी गई। जलालुद्दीन का अंत हुआ देखकर मंगोल भी लौट गये। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से जलालुद्दीन तथा मंगोलों से भी अपने राज्य की रक्षा कर ली।

(6) पंजाब पर विजय

पंजाब में इल्तुतमिश को अपने दो शत्रुओं का दमन करना था। एक थे विद्रोही खोखर जाति के लोग और दूसरा था खोखरों का मित्र सैफुद्दीन करलुग जो ख्वारिज्म के शाह की ओर से पश्चिमी पंजाब में नियुक्त था। इल्तुतमिश ने पहले खोखरों पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया और उनके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार जमा लिया।

लाहौर तो इल्तुतमिश के अधिकार में पहले से ही था। पंजाब के अन्य प्रमुख नगर- स्यालकोट, जालन्धर, नन्दना आदि भी उसके अधिकार में आ गये। जिन स्थानों पर खोखरों के उपद्रव का भय था, वहाँ पर इल्तुतमिश ने सैनिक चौकियाँ स्थापित कर दीं तथा खोखरों के गांव तुर्क अमीरों को जागीर में दे दिये। इससे उसके राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

(7) बंगाल का दमन

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के उपरान्त बंगाल स्वतन्त्र हो गया था। इन दिनों हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने निर्विरोध इल्तुतमिश के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया।

इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट आया, परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने 1226 ई. में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया।

नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया किंतु 1229 ई. में नासिरुद्दीन के हटते ही बंगाल में फिर से विद्रोह की चिन्गारी फूट पड़ी। इल्तुतमिश ने 1230 ई. में पुनः बंगाल पर अधिकार कर लिया और अलाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया।

(8) राजपूतों का दमन

ऐबक के मरते ही राजपूतों ने अपने खोये हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के प्रयास किये। अनेक राजपूत राजाओं ने स्व्यं को स्वतन्त्र कर दिया। मंगोल आक्रमणों से मुक्ति पाते ही इल्तुतमिश ने राजपूतों को दण्डित करने का निर्णय लिया। 1226 ई. में उसने रणथम्भौर का घेरा डाला। 

रणथम्भौर पर तुर्कों का अधिकार हो गया और उसकी सुरक्षा के लिए वहाँ मुस्लिम सेना नियुक्त की गई। इसके उपरान्त इल्तुतमिश ने परिहार राजपूतों की राजधानी मन्डोर की ओर प्रस्थान किया और उस पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। 1228 ई. में इल्तुतमिश ने जालौर का घेरा डाला जहाँ चौहान शासक उदयसिंह शासन कर रहा था।

उदयसिंह ने इल्तुतमिश का सामना किया किंतु उदयसिंह परास्त हो गया। उसने इल्तुतमिश को कर देने का वचन दिया अतः उसका राज्य उसे लौटा दिया गया। इसके बाद इल्तुतमिश ने बयाना तथा थानागिरि पर अधिकार कर लिया। अजमेर, साम्भर तथा अन्य निकटवर्ती राज्यों को भी जीत लिया।

इसके बाद इल्तुतमिश ने नागौर पर अधिकार कर लिया। 1232 ई. में इल्तुतमिश ने ग्वालियर के राजा मलय वर्मा तथा कालिंजर के राजा त्रिलोक्य वर्मा को भी परास्त किया परन्तु वहाँ पर तुर्कों के पैर अधिक दिनों तक नहीं टिक सके और विवश होकर उन्हें कालिंजर छोड़ना पड़ा।

इल्तुतमिश ने स्वयं सेना लेकर नागदा पर आक्रमण किया किंतु इल्तुतमिश को सफलता नहीं मिली। इल्तुतमिश ने गुजरात के चालुक्यों पर भी आक्रमण किया, परन्तु वहाँ भी उसे सफलता नहीं मिली। 1234 ई. में उसने मालवा पर आक्रमण किया और भिलसा तथा माण्डू के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। उसने भिलसा के 300 वर्ष पुराने देवालय को नष्ट किया तथा उज्जैन पहुँच कर महाकाल के मंदिर को नष्ट कर दिया।

इल्तुतमिश की शासन व्यवस्था

इल्तुतमिश की शासन-व्यवस्था निम्न लिखित प्रकार से थी-

(1.) चालीस तुर्की अमीरों के दल का संगठन

इल्तुतमिश ने अनुभव किया कि राज्याधिकारियों में पूर्ण स्वामि-भक्ति संचारित करने का एक मात्र उपाय यही है कि राज्य के समस्त उच्च पदों पर उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाये जो अपनी उन्नति के लिए पूर्णतः सुल्तान की कृपा-दृष्टि पर निर्भर हों। इस उद्देश्य से उसने चालीस तुर्की अमीरों अथवा गुलामों के दल को संगठित किया। इसे चरगान अथवा तुर्कान ए चिहालगानी (चालीस दास अमीरों का दल) कहते थे। इस दल में बड़े ही योग्य तथा प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। ये लोग अपनी राजभक्ति के लिए प्रसिद्ध थे और इनका उत्थान तथा पतन सुल्तान की इच्छा पर निर्भर रहता था। 

(2.) योग्य व्यक्तियों का चयन

शासन को सुदृढ़़ बनाने के लिये इल्तुतमिश ने योग्य व्यक्तियों का चयन किया। उसने विदेशी मुसलमानों तथा भारतीय मुसलमानों को भी शासन व्यवस्था में स्थान दिया। उसने मिनहाजुस्सिराज को प्रधान काजी तथा सद्रेजहाँ के पद पर और मखरुल्मुल्क इमामी को वजीर के पद पर नियुक्त किया। मिनहाजुस्सिराज बहुत विद्वान था और इमामी तीस वर्ष तक खलीफा का वजीर रह चुका था।

(3.) विद्रोही प्रदेशों में तुर्कों को जागीरें

जिन पर्वतीय क्षेत्रों, दोआब क्षेत्र तथा खोखर प्रदेश सहित अन्य प्रदेशों में बार-बार विद्रोह होते थे, उन प्रदेशों में इल्तुतमिश ने तुर्क सरदारों को जागीरें देकर वहाँ तुर्कों की बस्तियाँ बसाईं।

(4.) न्याय की समुचित व्यवस्था

प्रजा के विवादों एवं झगड़ों का निबटारा करने के लिये इल्तुतमिश ने दिल्ली में अनेक काजी नियुक्त किये। दिल्ली के साथ-साथ राज्य के बड़े नगरों में अमीर दादा नियुक्त किये गये थे। उनके कार्यों का निरीक्षण करने तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का भार प्रधान काजी तथा सुल्तान पर रहता था।

इब्नबतूता लिखता है कि दिन के समय पीड़ित व्यक्ति को एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहन कर अपने को सताया हुआ सूचित करना होता था। रात्रि काल के लिये अलग तरह की व्यवस्था थी। सुल्तान के राजप्रसाद के सामने संगमरमर के दो सिंह बने हुए थे जिनके गलों में घण्टियाँ लटकी रहती थीं। जब रात्रिकाल में कोई पीड़ित व्यक्ति इन घण्टियों को बजाता था तब उसकी फरियाद सुनी जाती थी तथा उसके साथ न्याय करने का प्रयत्न किया जाता था।

(5.) मुद्रा में सुधार

इल्तुतमिश ने मुद्रा में भी सुधार किया। उसके पहले की मुद्राओं में एक ओर सांड और दूसरी ओर अश्व अंकित रहता था। सुल्तान का नाम नागरी तथा अरबी दोनों लिपियों में अंकित रहता था। इल्तुतमिश ने शुद्ध अरबी मुद्राओं का प्रचार किया जो 175 ग्रेन तौल की होती थी। चाँदी के टंक का प्रयोग इल्तुतमिश ने ही प्रारम्भ किया था।

(6.) साहित्य तथा कला के कार्य

यद्यपि इल्तुतमिश के समय में साहित्य तथा विभिन्न कलाओं के सम्बन्ध में उल्लेखनीय उपलब्धियांें की जानकारी नहीं मिलती है तथापि मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे कला-प्रेमी सुल्तान बताया है जिसने साहित्यकारों को आश्रय दिया तथा कुतुबमीनार का निर्माण पूरा करवाया। उसने एक मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।

(7.) खलीफा द्वारा सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि

1229 ई. में बगदाद के खलीफा ने इल्तुतमिश को सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि दी और उसके लिए एक खिलवत भिजवाई। उस खिलवत के उपरान्त इल्तुतमिश को मुस्लिम सुल्तान कहलाने का नैतिक आधार प्राप्त हो गया। इस कारण इल्तुतमिश अपनी मुद्राओं के एक ओर अपना तथा दूसरी ओर खलीफा का नाम अंकित कराने लगा।

(8.) धार्मिक नीति

अधिकांश भारतीय मुसलमान तथा तुर्क, सुन्नी मत को मानने वाले थे इस कारण सुल्तान ने सुन्नियों के साथ ही अपना समर्थन दिखाया। इससे उसकी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने उलेमाओं की सम्पत्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि वे शियाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा अत्याचार करने लगे। इससे इल्तुतमिश नेे शिया सम्प्रदाय की सहानुभूति खो दी और वे विद्रोह करने लगे। इल्तुतमिश ने उनके विद्रोहों का कठोरता के साथ दमन किया।

इल्तुतमिश के अंतिम दिन

इल्तिुतमिश ने कठोरता और दृढ़़ता से दिल्ली पर शासन किया। लगभग पूरे उत्तर भारत को अपने साम्राज्य में मिलाया। अपने अंतिम दिनों में वह बीमार पड़ा और 1236 ई. में उसका निधन हो गया।

इल्तुतमिश का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

इल्तुतमिश में प्रशासकीय योग्यता थी या नहीं, इस प्रश्न पर इतिहासकारों में विपरीत राय है। डॉ. निजामी ने लिखा है कि उसने दिल्ली सल्तनत को इक्ता की शासन व्यवस्था और सुल्तान की सेना के निर्माण का विचार प्रदान किया तथा उसने मुद्रा में सुधार किया।

जबकि डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इल्तुतमिश ने शासन संस्थाओं का निर्माण नहीं किया। वह रचनात्मक प्रतिभा सम्पन्न राजनीतिज्ञ नहीं था। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के विवरण ही इल्तुतमिश के बारे में जानकारी प्राप्त करने के स्रोत हैं जिनसे उसके चरित्र के कई पहलू सामने आते हैं।

(1.) व्यक्ति के रूप में

इल्तुतमिश असहायों तथा दीन-दुखियों के प्रति इतनी दया एवं सहानुभूति रखता था कि उसकी उदारता के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। इल्तुतमिश अत्यन्त धार्मिक विचारों का सुल्तान था। वह नियम से दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था। वह साधु-महात्माओं को आश्रय देता था और रमजान के महीने में रोजा रखता था। अपनी इस धर्मनिष्ठा से उसने राजसत्ता को दैवी बल प्रदान किया।

(2.) राज्य-संस्थापक के रूप में

इल्तुतमिश को ही गुलाम वंश के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। ऐबक ने जिस राज्य की स्थापना की थी, वह आरामशाह के निर्बल शासन में कमजोर पड़ गया तथा बहुत से स्थानीय शासक स्वतंत्र हो गये थे। इल्तुतमिश ने उन्हें परास्त करके फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। यदि इल्तुतमिश दिल्ली पर अधिकार नहीं करता तो निर्बल आरामशाह के शासन काल में दिल्ली सल्तनत पूरी तरह बिखर जाती।

(3.) विजेता के रूप में

इल्तुतमिश वीर, साहसी तथा सतर्क सैनिक था। वह कुशल तथा सफल सेनापति था। उसमें उच्च-कोटि की सैनिक प्रतिभा थी। उसकी योग्यता के कारण ही दिल्ली के अमीरों ने उसे सुल्तान बनाया था। अपने बाहुबल से उसने प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त किया, विद्रोहियों का दमन किया, राजपूतों को अपने अधीन किया, दोआब में फिर से अपनी राजसत्ता स्थापित की, मंगोलों के आक्रमण से अपने राज्य की रक्षा की और सम्पूर्ण राज्य में शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित की।

पंजाब और बंगाल पर दुबारा अधिकार स्थापित किया। अवध, बहराइच तथा बनारस के राजाओं का दमन किया। जालोर, मण्डोर तथा मालवा के हिन्दू शासकों को परास्त किया। उसने न केवल मुहम्मद गौरी द्वारा जीते हुए प्रदेशों पर फिर से तुर्कों की सत्ता स्थापित की, वरन् ऐबक के भी अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करके राज्य का विस्तार किया।

(4.) शासक के रूप में

इल्तुतमिश दृढ़़ एवं कठोर शासक था। उसने शासन जमाने के लिये 40 तुर्की गुलामों का संगठन तैयार किया जो आगे चलकर तुर्की साम्राज्य के प्रबल स्तम्भ बन गए। कुतुबुद्दीन ऐबक के विशृंखलित राज्य को संगठित करने का श्रेय भी इल्तुतमिश को है। खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करने वाला वह भारत का पहला मुसलमान सुल्तान था।

वह पहला तुर्क सुल्तान था जिसने भारत में शुद्ध अरबी-मुद्राओं को प्रचलित किया। अपनी प्रजा को न्याय देने के लिये उसने काजियों तथा अमीर दादाओं की नियुक्ति की तथा रात्रिकाल में भी पीड़ित व्यक्ति की गुहार सुनने की व्यवस्था की। इल्तुतमिश में वैसी ही धार्मिक असहिष्णुता थी जिस प्रकार तत्कालीन अन्य मुसलमान शासकों में थी।

हिन्दुओं की तो बात ही क्या, वह शिया मुसलमानों के साथ भी उदारता तथा सहिष्णुता का व्यवहार न कर सका। उसकी इस धार्मिक कट्टरता के कारण ही दिल्ली के इस्माइली शिया मुसलमानों ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया और उसकी हत्या करने का षड्यन्त्र रचा। हिन्दुओं के साथ उसका व्यवहार और अधिक कठोर था। इल्तुतमिश उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और वे ही उसके धार्मिक अत्याचार के साधन थे।

(5.) शरण-दाता के रूप में

मंगोलों के आक्रमणों और अत्याचारों से भयभीत होकर बहुत से प्रसिद्ध मलिक, अमीर तथा वजीर भाग कर इल्तुतमिश के दरबार में आए। इल्तुतमिश ने उन्हें शरण प्रदान की। उसने बगदाद के वजीर फखरूल्मुल्क इसामी को भी शरण प्रदान की किंतु जब ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने चंगेज खाँ से भयभीत होकर दिल्ली में शरण मांगी तो इल्तुतमिश ने उसे यह कहकर शरण देने से मना कर दिया कि दिल्ली का जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगा तथा उसके दूत की हत्या करवा दी। इससे स्पष्ट है कि उसने उन्हीं विदेशियों को शरण दी जो उसके काम के थे तथा जिनसे उसे कोई भय नहीं था।

(6.) साहित्य तथा कला के प्रेमी के रूप में

इल्तुतमिश को मुस्लिम साहित्य तथा मुस्लिम कला से प्रेम था। इस कारण मध्य एशिया के बहुत से विद्वान्, इतिहासकार, कवि तथा दार्शनिक उसकी ओर आकृष्ट हुए। इल्तुतमिश ने उन्हें आश्रय प्रदान किया। फलतः दिल्ली नगर मुस्लिम सभ्यता तथा संस्कृति का केन्द्र बन गया। दिल्ली की कुतुबमीनार को पूरा बनवाने के अलावा उसने दिल्ली में कई मस्जिदें भी  बनवाईं।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत के इतिहास में इल्तुतमिश अत्यंत महत्व रखता है। तेरहवीं शताब्दी के मुस्लिम साम्राज्य निर्माताओं में वह विशिष्ट स्थान रखता है। भारत में तुर्की सल्तनत को स्थायित्व प्रदान करने में उसने बड़ा योग दिया। वह अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति जितना उदार था, उतना उदार हिन्दू प्रजा के प्रति नहीं था। उसने दिल्ली को मुस्लिम संस्कृति का केन्द्र बना दिया तथा हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करके मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन ?

प्रायः यह प्रश्न किया जाता है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन था? विभिन्न इतिहासकार मुहम्मद बिन कासिम से लेकर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय देते हैं किंतु अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश था।

मुहम्मद बिन कासिम

मुहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान सेनापति था। उसने अरब से सिंध के रास्ते भारत में प्रवेश किया था और सिन्ध में अपनी राज-संस्था स्थापित कर ली थी परन्तु उस राजसत्ता का शीघ्र ही उल्मूलन हो गया।  इसलिये मुहम्मद बिन कासिम को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। लेनपूल ने लिखा है कि सिंध में अरबों की विजय इस्लाम के इतिहास में एक घटना मात्र थी और इसका परिणाम शून्य था।

महमूद गजनवी

मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी दूसरा प्रबल मुस्लिम आक्रांता था जिसने नए मार्ग से भारत पर आक्रमण किये और उनमें बड़ी सफलताएं अर्जित कीं। यदि वह चाहता तो भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना कर सकता था परन्तु उसका ध्येय भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना तथा हिन्दू काफिरों को दण्डित करके खलीफा को प्रसन्न करना था। वह भारत में अपना स्थायी राज्य स्थापित करना नहीं चाहता था। इसलिये महमूद गजनवी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

मुहम्मद गौरी

भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने आक्रमण किया। वह सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतने में सफल भी हुआ परन्तु उसने भारत में अपनी कोई अलग राजसंस्था स्थापित नहीं की और न भारत में वह स्थायी रूप से रहा, वरन् उसने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने गवर्नर के रूप में नियुक्त किया तथा स्वयं गजनी चला गया। इसलिये उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

कुतुबुद्दीन ऐबक

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक उसके भारतीय साम्राज्य का स्वामी बना। उसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और एक बड़े साम्राज्य का निर्माण किया। उसने प्रथम बार दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना की। उसने इस सल्तनत का गजनी से सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा।

उसमें स्वतन्त्र सुल्तान बनने के गुण विद्यमान थे। उसने भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग पर स्वतन्त्र सुल्तान के रूप से शासन भी किया परन्तु उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मानने में कई आपत्तियाँ है-

(1.) ऐबक को खलीफा से स्वतन्त्र राज-सत्ता का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हुआ इसलिये कुछ इतिहासकार उसे भारतीय प्रांतों का प्रान्तपति ही मानते हैं।

(2.) अब तक ऐसी एक भी मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है जिसमें ऐबक का नाम अंकित  हो।

(3.) इतिहासकारों को इस बात पर भी सन्देह है कि उसके नाम का कोई खुतबा पढ़ा गया था या उसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी।

(4.) गयासुद्दीन गौरी ने उसे दिल्ली का सुल्तान स्वीकार किया था परन्तु उसे किसी को भी सुल्तान की उपाधि देने का अधिकार नहीं था। यह उपाधि तो केवल खलीफा ही दे सकता था।

(5.) यल्दूज ने उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। इससे अनुमान होता है कि ऐबक द्वारा स्थापित राज्य, असम्बद्ध तथा अव्यवस्थित संघ जैसा था।

(6.) ऐबक की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य विश्ंृखलित हो गया और उसका अस्तित्त्व लगभग समाप्त हो गया।

उपरोक्त कारणों से कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक नहीं माना जा सकता।

आरामशाह

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह लाहौर में शासक बना। वह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था। उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएं चलवाईं। इतना होने पर भी उसे भारत में मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। उसमें सुल्तान बनने के गुण नहीं थे। उसमें उच्चकोटि की युद्ध प्रतिभा भी नहीं थी।

उसने किसी भू-भाग पर विजय प्राप्त नहीं की थी। वह सेना का प्रिय नहीं था। उसे शासन करने का अनुभव नहीं था। उसे दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही इल्तुतमिश ने परास्त कर दिया था। ऐसी दशा में केवल उसके नाम में खुतबा पढ़े जाने तथा मुद्राओं के चलाने से उसे दिल्ली का सुल्तान मान लेना ठीक नहीं है।

उसे खलीफा ने सुल्तान स्वीकार नहीं किया। ऐबक के मरते ही उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। इसलिये आरामशाह को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक नहीं माना जा सकता।

इल्तुतमिश

अधिकांश इतिहासकार इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1.) दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह के स्थान पर इल्तुतमिश को दिल्ली का सुल्तान निर्वाचित कर लिया परन्तु दिल्ली की सल्तनत उस समय लगभग समाप्त हो चुकी थी। अतः इल्तुतमिश को फिर से सल्तनत का निर्माण करना पड़ा। यदि आरामशाह ही शासक बना रहा होता तो दिल्ली सल्तनत का अस्तित्त्व पूरी तरह समाप्त हो गया होता।

(2.) इल्तुतमिश ने अपने सैनिक गुणों के बल से दिल्ली के पश्चिम तथा पूर्व में विद्रोहों का दमन करके, नये हिन्दू राज्यों को जीत कर तथा यल्दूज और कुबाचा जैसे प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करके नये सिरे से दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया तथा उसे स्थायित्व प्रदान किया।

(3.) इल्तुतमिश ने मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की रक्षा की।

(4.) इल्तुतमिश ने बंगाल तथा बिहार फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिये और दोआब के विद्रोहियों का दमन करके राजधानी दिल्ली को सुरक्षित बनाया।

(5.) उसने न केवल राजपूतों को दिल्ली की सत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जिन्हें मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने परास्त किया था और जो ऐबक की मृत्यु के उपरान्त स्वतन्त्र हो गये थे, वरन् उसने अन्य राजपूतों को भी परास्त कर साम्राज्य की सीमा में वृद्धि की।

(6.) इल्तुतमिश ने दिल्ली पर न केवल राजनीतिक सत्ता की स्थापना की अपितु खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करके दिल्ली सल्तनत को इस्मालिक जगत में नैतिक आधार दिलवाया।

(7.) इल्तुतमिश ने मनुष्य की चारित्रिक कमजोरियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इस कारण शासन निरंतर मजबूत होता चला गया।

(8.) इल्तुतमिश को अपने 25 साल के दीर्घ शासनकाल में अपने साम्राज्य को संगठित तथा सुरक्षित बनाने का अवसर प्राप्त हो गया। उसने एक सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित राज्य स्थापित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की।

(9.) इल्तुतमिश ने जिस दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया, वह स्थायी सिद्ध हुई। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद इस सल्तनत पर लगभग 300 वर्षों तक विभिन्न वंशजों द्वारा शासन किया गया।

(10.) इल्तुतमिश ने उत्तराधिकार की समस्या को सुलझा कर उत्तराधिकार की निरन्तरता स्थापित की।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा आरामशाह में से किसी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक होने का श्रेय नहीं दिया जा सकता। यह श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह सुल्तान इल्तुतमिश ही हो सकता है।

वास्तविकता यह है कि मुहम्मद बिन कासिम तथा महमूद गजनवी ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के लिये उर्वर भूमि तैयार की। मुहम्मद गौरी ने उसमें बीजारोपण किया, ऐबक ने उसे सींच कर प्रस्फुटित किया तथा इल्तुतमिश ने उसे खाद-पानी देकर मजबूत पौधा बना दिया। यह पौधा आगे चलकर खिलजी सल्तनत के समय विशाल वृक्ष बन गया जिसकी जड़ें हिलाना हिन्दुओं के वश की बात नहीं रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

इल्तुतमिश के वंशज

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इल्तुतमिश की वंशज रजिया सुल्ताना

इल्तुतमिश के वंशज इतने योग्य नहीं निकले कि वे अपने पिता के द्वारा खड़े किए एक विशाल मुस्लिम राज्य को संभाल सकें। वे आपस में ही एक दूसरे को समाप्त करने लगे।

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह

तुर्क शासकों में उत्तराधिकार के नियम निश्चित नहीं थे। सुल्तान के मरते ही सल्तनत के ताकतवर अमीरों में संघर्ष होता था और विजयी अमीर सल्तनत पर अधिकार कर लेता था।

इल्तुतमिश के वंशज नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही हो गई। वह इल्तुतमिश का सबसे बड़ा पुत्र था। इल्तुतमिश के वंशज इल्तुतमिश के अन्य पुत्र थे जिनमें से रुकुनुद्दीन दूसरा पुत्र था और वह निकम्मा तथा अयोग्य था इल्तुतमिश के वंशज अन्य पुत्र थे जो अवयस्क थे। इसलिये इल्तुतमिश को अपने उत्तराधिकारी की चिंता रहती थी। वह अपनी पुत्री रजिया से बड़ा प्रेम करता था तथा उसकी योग्यता को कई बार परख चुका था।

रजिया कई बार इल्तुतमिश की अनुपस्थिति में राज्यकार्य करती थी। इन सब बातों को देखते हुए इल्तुतमिश ने अपने अमीरों से रजिया को उत्तराधिकारी नियुक्त करने की सहमति प्राप्त की तथा रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इसके बाद रजिया का नाम चांदी के टंका पर खुदवाया जाने लगा।

जब इल्तुतमिश की मृत्यु हुई तो तुर्की अमीर, एक औरत को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। भारत में मुस्लिम सुल्तान अरब के खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में शासन करते थे। अरब वालों के रिवाजों के अनुसार औरत, मर्दों के द्वारा भोगे जाने के लिये बनाई थी न कि शासन करने के लिये।

इस कारण मर्द अमीरों को, औरत सुल्तान का अनुशासन मानना बड़े शर्म की बात थी। अतः दिल्ली के तुर्की अमीरों ने रजिया को अस्वीकार करके इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त पर बैठा दिया।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार रुकुनुद्दीन रूपवान, दयालु तथा दानी सुल्तान था परन्तु उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। वह प्रायः मद्यपान करके हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर स्वर्ण-मुद्राएँ बाँटा करता था। वह अपने पिता इल्तुतमिश के जीवन काल में बदायूँ तथा लाहौर का गवर्नर रह चुका था परन्तु उसने सुल्तान बनने के बाद मिले अवसर से कोई लाभ नही उठाया।

मद्यपान में धुत्त रहने के कारण रुकुनुद्दीन राज्य कार्यों की उपेक्षा करता था। इसलिये उसकी माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान का जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले वंश में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी और अब रुकुनुद्दीन जैसे निकम्मे सुल्तान की राजमाता बन गई थी।

शासन की बागडोर हाथ में आते ही उसने मदांध होकर इल्तुतमिश की अन्य उच्च-वंशीय बेगमों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। तुर्कान ने कुछ बेगमों तथा इल्तुतमिश के एक पुत्र कुतुबुद्दीन की हत्या करवा दी। उसने कुछ अमीरों की भी हत्या करवा दी। इस कारण दरबार में सुल्तान रुकुनुद्दीन तथा बेगम तुर्कान के विरुद्ध असंतोष भड़क गया।

उन्हीं दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण आरम्भ हो गए। दिल्ली की सेनाओं ने इन आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया परन्तु सल्तनत में आन्तरिक अंशाति बढ़ती चली गई। चारों ओर विरोध की अग्नि भड़क उठी।

रुकुनुद्दीन तथा उसकी माँ शाह तुर्कान इस विरोध को शांत करने में असमर्थ रहे। रुकुनुद्दीन का भाई गियासुद्दीन जो अवध का सूबेदार था, खुले रूप में विद्रोह करने पर उतर आया। उसने बंगाल से दिल्ली जाने वाले राजकोष को छीन लिया तथा भारत के कई बड़े नगरों को लूट लिया। मुल्तान, हांसी, लाहौर तथा बदायूं के प्रांतीय शासकों ने परस्पर समझौता करके रुकुनुद्दीन को गद्दी से उतारने के लिये दिल्ली की ओर चल पड़े।

लोग रजिया को सुल्तान बनाने की चर्चा करने लगे। इस पर शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या कराने का प्रयत्न किया। शहजादी रजिया की हत्या का षड़यंत्र असफल रहने पर स्थिति अत्यन्त गंभीर हो गई। रजिया ने शाह तुर्कान का सामना करने का निश्चय किया।

एक शुक्रवार को जब मुसलमान, मध्याह्न की नमाज के लिए एकत्रित हो रहे थे, रजिया सहसा लाल वस्त्र धारण करके उनके समक्ष उपस्थित हो गई और शाह तुर्कान के विरुद्ध अभियोग लगाते हुए अपने लिये न्याय की प्रार्थना करने लगी। मुस्लिम नौजवानों ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। शाह तुर्कान को बंदी बना लिया गया और 9 नवम्बर 1236 को रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या कर दी गई। शाह तुर्कान को भी मार डाला गया।

रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.)

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या हो जाने के बाद रजिया दिल्ली की सुल्तान बन गई। जिन अमीरों ने आरम्भ में रजिया के उत्तराधिकार का विरोध किया था, उन्हीं अमीरों ने उसे अब सुल्तान स्वीकार कर लिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

(1.) रुकुनुद्दीन की अयोग्यता

रुकुनुद्दीन अयोग्य सुल्तान था। वह शराब पीने के बाद हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां बांटता फिरता था। शासन के काम में रुचि नहीं लेने के कारण शासन व्यवस्था बिगड़ रही थी।

(2.) शाह तुर्कान का निम्न वंश में जन्म

सुल्तान रुकुनुद्दीन की अयोग्यता के कारण शासन का काम उसकी माता शाह तुर्कान के हाथों में था। तुर्कान निम्न समझे जाने वाले वंश में जन्मी थी जिसके अनुशासन में काम करना तुर्की अमीरों को सहन नहीं था।

(3.) बेगमों तथा अमीरों की हत्या

शाह तुर्कान ने हरम की कई बेगमों तथा अमीरों की हत्या करवाकर चारों ओर असंतोष का वातावरण तैयार दिया था। उसने शहजादे कुतुबुद्दीन को भी आँखें फुड़वाकर मरवा दिया।

(4.) रजिया की हत्या का प्रयास

शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या का प्रयत्न किया। रजिया इल्तुतमिश की प्रिय पुत्री थी। उसमें कई गुण थे जिनके कारण इल्तुतमिश के स्वामिभक्त अमीर रजिया को बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे। शाह तुर्कान की निकृष्ट चेष्टा से अमीरों की सहानुभूति रजिया के साथ हो गई।

(5.) विकल्प का अभाव

शाह तुर्कान को बन्दी बना लेने के उपरान्त अमीरों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था कि वे रुकुनुद्दीन को तख्त से उतारकर रजिया को तख्त पर बैठा दें। अन्यथा रुकुनुद्दीन उन्हें मरवा डालता।

(6) इल्तुतमिश की इच्छा पूर्ति

शहजादी रजिया को तख्त पर बैठाकर तुर्की अमीर, मुसलमान रियाया के समक्ष यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि ऐसा करके सुल्तान इल्तुतमिश की इच्छा पूरी की जा रही है। क्योंकि सुल्तान इल्तुतमिश ने रजिया को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।

(7) कमालुद्दीन जुनैदी से ईर्ष्या

बहुत से तुर्की अमीर, वजीर कमालुद्दीन जुनैदी से ईर्ष्या करते थे जो स्वयं को सर्व-शक्ति-सम्पन्न बनाने का प्रयत्न कर रहा था। तुर्की अमीरों को भय था कि यदि रजिया को सुल्तान नहीं बनाया गया तो जुनैदी दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लेगा। अतः अमीरों ने जुनैदी से निबटने के लिये रजिया को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।

रजिया की कठिनाइयाँ

यद्यपि रजिया को तख्त प्राप्त हो गया था परन्तु आगे का मार्ग अत्यन्त कठिन था। उसकी प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं-

(1) आंशिक समर्थन

रजिया की पहली कठिनाई यह थी कि उसे केवल कुछ युवा तुर्कों और दिल्ली के सामान्य नागरिकों का सहयोग प्राप्त था। सल्तनत का प्रधान वजीर जुनैदी तथा वे तुर्क सरदार जो फीरोजशाह को तख्त से हटा कर अपनी इच्छानुसार सुल्तान चुनना चाहते थे, रजिया का विरोध करने के लिए उद्यत हो गये। अन्य प्रान्तीय हाकिम भी उन्हें देखकर विद्रोह करने पर उतर आये।

(2) प्रतिद्वन्द्विता की सम्भावना

इल्तुतमिश के कुछ पुत्र अभी जीवित थे जिनके अनेक समर्थक अमीर भी मौजूद थे। उनके द्वारा रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह किये जाने की पूरी संभावना थी।

(3) राजपूतों के विद्रोह की आशंका

दिल्ली के शासन में आंतरिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होते ही राजपूतों ने फिर से अपने राज्य प्राप्त करने का प्रयास आरम्भ किया तथा रणथम्भौर का घेरा डाल दिया।

(4) रजिया का स्त्री होना

तुर्की अमीर, कट्टर सुन्नी थे। उन्हें एक औरत के अधीन रहकर काम करना सहन नहीं था। इसलिये वे रजिया को राजपद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त समझते थे। इब्नबतूता, एसामी, फरिश्ता, निजामुद्दीन, बदायूनीं आदि मुस्लिम इतिहासकारों ने भी रजिया के स्त्री होने के कारण उसके आचरण को निंदनीय ठहराया है।

उपरोक्त कठिनाइयों का निस्तारण किये बिना रजिया दिल्ली पर शासन नहीं कर सकती थी। वह योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न सुल्तान थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी थी।

रजिया के कार्य

(1.) विद्रोहियों का दमन

सबसे पहले रुकुनुद्दीन के मुख्य वजीर मुहम्मद जुनैदी ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया और बदायूं, मुल्तान, झांसी तथा लाहौर के गर्वनरों से जा मिला। ये लोग अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिल्ली की ओर चल पड़े। इनका लक्ष्य रजिया के स्थान पर इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहराम को सुल्तान बनाना था।

इन विद्रोहियों ने रजिया को उसकी राजधानी में घेर लिया। इस गम्भीर परिस्थिति में रजिया ने कूटनीति से काम लिया। उसने अपने विरोधियों में फूट पैदा कर दी। इससे वे विभिन्न दिशाओं में भाग खड़े हुए। रजिया ने उनका पीछा किया और उनका पूर्ण रूप से दमन किया। इस प्रकार पंजाब में उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। बंगाल तथा सिंध के गवर्नरों ने भी उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया।

(2.) राजपूतों से संघर्ष

इल्तुतमिश के मरने के बाद से ही रणथम्भौर के हिन्दुओं ने मुसलमान सेना को घेर रखा था। रजिया ने शीघ्र ही एक सेना भेज कर हिन्दुओं को मार भगाया।

(3.) राजपक्ष का सुदृढ़़ीकरण

रजिया ने राजपक्ष को सुदृढ़ बनाने के लिये उच्च पदों का पुनः वितरण किया। उसने ख्वाजा मुहाजबुद्दीन को अपना वजीर बनाया तथा प्रांतीय सूबेदारो के पदों पर भी नये अधिकारी नियुक्त किये गये। इस प्रकार लखनौती से देवल तक के भारत ने रजिया की अधीनता स्वीकार कर ली।

(4.) तुर्की अमीरों के वर्चस्व को समाप्त करने के प्रयास

रजिया ने सुल्तान की प्रतिष्ठा का उन्नयन करने के लिए तुर्कों के स्थान पर अन्य मुसलमानों को ऊँचे पद देने आरम्भ किये जिससे तुर्कों का अहंकार तथा एकाधिकार नष्ट हो जाये और वे राज्य पर अपना प्रभुत्व न जता सकें। उसने जमालुद्दीन याकूत नामक एक हब्शी को ‘अमीर आखूर’ के पद पर नियुक्त किया और मलिक हसन गौरी को सेनापति का पद प्रदान किया।

(5.) पर्दे का परित्याग

सुल्तान बनने के बाद रजिया ने पर्दे का परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के वस्त्र धारण करने लगी। वह राजसभा तथा कैम्प में राज्य के कार्यों को स्वयं देखने लगी। वह स्वयं सेना का संचालन करने लगी और युद्ध में भाग लेने लगी। उसने अपनी योग्यता तथा शासन क्षमता से समस्त अमीरों एवं जनता को प्रभावित किया।

रजिया का पतन

रजिया भारत की प्रथम स्त्री सुल्तान थी। तुर्की अमीर उसे सहन नहीं कर सके। इस कारण थोड़े ही समय में चारों ओर विद्रोह के झण्डे बुलंद हो गये और रजिया का पतन आरम्भ हो गया।

(1.) इस्माइलिया मुसलमानों का विद्रोह

दिल्ली में बहुत से इस्माइलिया मुसलमान बस गये थे जिन्होंने शक्ति प्राप्त करने के लिये सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र किया। उनके विद्रोह का दमन कर दिया गया और उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिये गये।

(2.) जियाउद्दीन का वध

जियाउद्दीन जुनैदी, ग्वालियर का हाकिम था। उसके द्वारा विद्रोह किये जाने की तैयारियां करने की आशंका से 1238 ई. में उसे दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली में आने के बाद जुनैदी लापता हो गया। लोगों को यह आशंका होने लगी कि सुल्तान ने विश्वासघात करके उसका वध करवाया है। इससे तुर्की अमीरों में रजिया के विरुद्ध घृणा तथा संदेह का वातावरण बढ़ने लगा। वे रजिया की ओर से शंकित होकर गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारियां करने लगे।

(3.) शम्सी तुर्क सरदारों का षड्यन्त्र

कुछ प्रान्तीय शासकों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि रजिया शम्सी तुर्क सरदारों की शक्ति का उन्मूलन करना चाहती है। अतः वे आत्मरक्षा के लिए षड्यन्त्र रचने लगे और विद्रोह की तैयारियां करने लगे। सबसे पहले पंजाब के गर्वनर कबीर खाँ अयाज ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया।

रजिया एक सेना लेकर आगे बढ़ी। अयाज ने बिना युद्ध किए ही रजिया के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया। रजिया ने उससे लाहौर छीन लिया परन्तु मुल्तान उसके अधिकार में रहा। इस कारण षड्यंन्त्र तथा विद्रोह की अग्नि शांत नहीं हुई। अब तुर्क सरदारों ने संगठित होकर रजिया का विरोध करने की योजना बनाई। इन विद्रोही तुर्क अमीरों का नेता इख्तियारूद्दीन एतिगीन था। विद्रोहियों ने बड़ी सावधानी तथा सतर्कता के साथ कार्य करना आरम्भ किया।

(4.) राज्य का पतन

भटिण्डा के गर्वनर मलिक अल्तूनिया ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। रजिया विद्रोहियों को दबाने के लिए एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़ी। जब वह भटिण्डा पहंुची तब उसके विश्वस्त गुलाम याकूत का वध कर दिया गया और रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई। विद्रोहियों ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहरामशाह को तख्त पर बैठा दिया। मिनहाज उस सिराज के अनुसार रजिया ने 3 वर्ष, 6 माह, 6 दिन राज्य किया।

(5.) रजिया की हत्या

रजिया ने अल्तूनिया के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। अल्तूनिया इस प्रस्ताव से सहमत हो गया और उसने रजिया को कारागार से मुक्त करके उसके साथ विवाह कर लिया। अब अल्तूनिया और रजिया एक सेना लेकर दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए दिल्ली की ओर चल दिये। मलिक इज्जुद्दीन सालारी तथा मलिक कराकश आदि कुछ अमीर भी उनसे आ मिले परन्तु नये सुल्तान बहरामशाह की सेना ने अल्तूनिया को परास्त कर दिया। रजिया और अल्तूनिया युद्ध के मैदान से भाग निकले किंतु कैथल के निकट कुछ लुटेरों ने अल्तूनिया तथा रजिया की हत्या कर दी।

रजिया की असफलता के कारण

यद्यपि रजिया इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य तथा राजपद के सर्वाधिक उपयुक्त थी परन्तु दूषित राजनीतिक वातावरण में वह शासन चलाने में असफल रही तथा लगभग तीन साल बाद ही उसका पतन हो गया। उसकी असफलता के कई कारण थे-

(1.) रजिया का स्त्री होना

मध्यकालीन इतिहासकारों ने रजिया की विफलता का प्रधान कारण उसका स्त्री होना बताया है। तलवार को ही योग्यता का एकमात्र आधार मानने वाले तुर्की अमीर, एक औरत के अधीन रहकर काम करने को तैयार नहीं हुए। पर्दे का त्याग करके, औरतों के कपड़ों का त्याग करके तथा पुरुषों के कपड़े धारण करके उसने तुर्की अमीरों के अहंकार को गहरी चोट पहुँचाई। यदि वह पुरूष होती तो निश्चय ही अधिक सफल हुई होती क्योंकि तब याकूत के प्रेम का अपवाद नहीं फैला होता और इस आधार पर जुनैदी आदि तुर्की अमीरों ने उसका विरोध करने का दुस्साहस नहीं किया होता। 

(2.) तुर्की अमीरों का स्वार्थ

रजिया की असफलता का दूसरा कारण तुर्की अमीरों का स्वार्थ तथा उनका शक्तिशाली होना बताया है। दिल्ली सल्तनत में तुर्की अमीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि सुल्तान के लिये उनसे विरोध करके शासन करना अत्यन्त दुष्कर कार्य था। रजिया ने तुर्कों की शक्ति को एक सीमा तक घटा दिया। रजिया ने बड़ी सतर्कता के साथ अमीरों के प्रतिद्वन्द्वी दलों को संगठित किया परन्तु इसके लिये समय की आवश्यकता थी जो दुर्भाग्यवश उसे नहीं मिल सका।

(3.) रजिया की स्वेच्छाचारिता

रजिया ने अपने विपक्षियों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुश शासन स्थापित करने का प्रयत्न किया। तुर्की अमीरों ने ऐबक के शासन काल से ही राज्य की सारी शक्ति अपने हाथ में कर ली थी। वे एक स्त्री सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन को सहन नहीं कर सके। उन्होंने रजिया के स्वेच्छाचारी शासन को समाप्त करके ही दम लिया।

(4.) याकूत के प्रति अनुराग

रजिया की सेवा में एक अबीसीनियाई हब्शी गुलाम जमालुद्दीन याकूत रहता था। सुल्तान बनते ही रजिया ने उसे अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया। रजिया इस गुलाम को घुड़सवारी करते समय अपने साथ ले जाती। उस गुलाम को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार दिया गया। इस कारण लोगों में रजिया सुल्तान और याकूत के प्रेम का अपवाद प्रचलित हो गया। यह बात स्वयं को उच्च रक्तवंशी मानने वाले तुर्की अमीरों को पसन्द नहीं आयी। इससे रजिया का विरोध बड़ी तेज गति से बढ़ने लगा। अन्त में अमीरों तथा सरदारों ने उसके शासन को समाप्त कर दिया।

(5.) जनता के सहयोग का अभाव

रजिया की विफलता का एक कारण यह भी था कि मुसलमान प्रजा कट्टर इस्लामी प्रथाओं में विश्वास करने के कारण उसे सहयोग न दे सकी। हिन्दू प्रजा का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करना वैसे भी असम्भव था क्योंकि तुर्की शासक, विधर्मी तथा विदेशी थे।

(6.) इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना

इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना रजिया के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। उनसे षड्यन्त्रकारियों को सम्बल तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। षड्यन्त्रकारी इन शहजादों की आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे। अंत में इन्हीं शहजादों में से एक बहरामशाह ने राज्य पर अधिकार कर लिया।

(7.) केन्द्रीय सरकार की दुर्बलता

रजिया की विफलता का एक कारण यह बताया जाता है कि अभी तक भारत में तुर्की साम्राज्य का शैशव काल था। इस कारण केन्द्रीय सरकार स्थानीय हाकिमों को अपने पूर्ण नियंन्त्रण में नहीं कर पाई थी। स्थानीय हिन्दू सरदारों के निरन्तर विद्रोह होते रहने के कारण सुल्तानों को अपने स्थानीय हाकिमों को पर्याप्त मात्रा में सैनिक एवं प्रशासकीय अधिकार देने पड़ते थे। अतः विरोधियों द्वारा इन हाकिमों से सांठ-गांठ कर लेने पर केन्द्रीय सरकार उन्हें ध्वस्त नहीं कर पाती थी।

रजिया के चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

(1) प्रथम स्त्री सुल्तान

रजिया भारत की प्रथम तथा अन्तिम स्त्री सुल्तान थी। यद्यपि विदेशों में रजिया के पूर्व भी स्त्रियां तख्त पर बैठ चुकी थीं परन्तु भारत में तख्त पर बैठने का सौभाग्य तथा गौरव रजिया को ही प्राप्त हुआ।

(2) सुल्तानोचित गुण-सम्पन्नता

रजिया योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न स्त्री थी। अपने पिता के जीवन काल में ही वह अपनी योग्यता का परिचय दे चुकी थी। इसी से उसके पिता ने अपने पुत्रों की उपेक्षा करके उसी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। रजिया में सुल्तानोचित गुण विद्यमान थे।

अनुकूल परिस्थितियों में वह सफल शासक सिद्ध हुई होती, परन्तु तत्कालीन वातावरण उसके विपरीत था। जिन संकटों और षड़यंत्रों में वह तख्त पर बैठी थी, उनमें किसी भी शासक का नष्ट हो जाना संभव था। रजिया ने धैर्य तथा साहस के साथ उनका सामना किया और समस्त विपक्षियों पर विजय प्राप्त करके अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा।

(3) उच्च-कोटि की सैनिक योग्यता

रजिया में उच्च कोटि की सैनिक योग्यता तथा संगठन की अद्भुत क्षमता थी। इसी से वह रण क्षेत्र में अपने विपक्षियों के विरुद्ध सफलता प्राप्त कर पाती थी। अपने शासन के प्रारंभिक काल में वह समस्त विद्रोहियों का दमन करने में सफल रही।

(4) कूटनीतिज्ञ

रजिया न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ वरन् बहुत बड़ी कूटनीतिज्ञ भी थी। जहाँ शक्ति तथा बल से कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती थी, वहाँ वह कूटनीति से काम लेती थी। अपनी कूटनीति के बल पर ही वह अपने विपक्षियों के संघ को भंग कर सकी थी और उन पर विजय प्राप्त कर सकी थी।

(5) स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश

रजिया ने सुल्तान की शक्ति को बढ़ाया तथा उसे स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश बनाया। वह दिल्ली की प्रथम सुल्तान थी जिसने अमीरों तथा मलिकों को शासन की इच्छानुसार कार्य करने के लिए विवश किया। उसने तुर्की अमीरों को सुल्तान के अधीन होने का अहसास करवाया। उसने तुर्की अमीरों के वर्चस्व को तोड़ने के लिये याकूत जैसे अबीसीनियाई हब्शी को उच्च पद दिया।

(6) दुर्बलताएं

रजिया का पतन उसकी दुर्बलताओं के कारण नहीं वरन् कट्टर मुसलमानों की असहिष्णुता के कारण हुआ था। फिर भी इतिहासकारों ने उस पर यह आरोप लगाया है कि उसमें स्त्री-सुलभ दुर्बलताएं थीं। याकूत से उसका अनुराग उत्पन्न होना तथा अल्तूनिया से विवाह कर लेना उसकी दुर्बलताओं के प्रमाण हैं। रजिया की विफलता ने इस तथ्य को सिद्ध कर दिया कि उस युग की राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान न था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों।

मुइजुद्दीन बहरामशाह (1240-42 ई.)

रजिया के बाद इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र मुइजुद्दीन बहरामशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ। वह दुस्साहसी तथा क्रूर व्यक्ति था। उसे इस शर्त पर बादशाह बनाया गया था कि शासन का पूरा अधिकार विद्रोहियों के नेता एतिगीन के हाथ में रहेगा। एतिगीन ने सुल्तान के कई विशेषाधिकार हड़प लिये।

वह अपने फाटक पर नौबत बजवाता तथा अपने यहाँ हाथी रखता था। उसने बहराम की एक बहिन से विवाह भी कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया। इस कारण कुछ ही दिनों में बहरामशाह तथा एतिगीन में ठन गई और बहरामशाह ने एतिगीन की उसके ही कार्यालय में हत्या करवा दी।

बहरामशाह ने वजीर निजामुलमुल्क की भी हत्या करवाने का प्रयास किया किंतु वजीर बच गया। सुल्तान प्रकट रूप से उसके साथ मित्रता का प्रदर्शन करता रहा। एतिगीन की हत्या के बाद मलिक बदरुद्दीन सुंकर को अमीर ए हाजिब नियुक्त किया गया। सुंकर ने वजीर तथा सुल्तान, दोनों की उपेक्षा करके शासन पर कब्जा जमाने का प्रयास किया।

उसने बहरामशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस पर सुंकर को बदायूं का सूबेदार नियुक्त करके बदायूं भेज दिया गया। चार माह बाद सुंकर सुल्तान की अनुमति लिये बिना दिल्ली लौट आया। इस पर सुल्तान बहरामशाह ने सुंकर तथा उसके सहयोगी ताजुद्दीन अली को मरवा दिया। सुल्तान ने काजी जलालुद्दीन की भी हत्या करवा दी।

इन हत्याओं से चारों ओर सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। आन्तरिक कलह तथा षड्यन्त्र के साथ-साथ सुल्तान बहरामशाह को मंगोलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। 1241 ई. में मंगोलों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। 1242 ई. में बहरामशाह ने वजीर मुहाजबुद्दीन को एक सेना देकर लाहौर के लिये रवाना किया।

वजीर मुहाजबुद्दीन सेना को लाहौर ले जाने के स्थान पर उसे भड़काकर मार्ग में से ही पुनः दिल्ली ले आया। जब विद्रोहियों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो दिल्ली के नागरिकों ने सुल्तान को बचाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी किंतु अंततः विद्रोहियों ने बहरामशाह को बंदी बना लिया तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहरामशाह बन्दी बना लिया गया और कुछ दिन बाद उसकी हत्या कर दी गई।

अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-46 ई.)

बहरामशाह की हत्या के बाद दिल्ली का तख्त रिक्त हो गया। इसके पहले कि अमीर नये सुल्तान का निर्वाचन करते, इज्जूद्दीन किशलू खाँ ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। वह किसी राजवंश में उत्पन्न नहीं हुआ था परन्तु चूंकि उसने इल्तुतमिश की एक पुत्री से विवाह कर लिया था, इसलिये वह स्वयं को राजपद का अधिकारी समझता था।

अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया और रुकुनुद्दीन फीरोज के पुत्र अलाउद्दीन मसूद को तख्त पर बैठा दिया। उसे इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया कि वह केवल सुल्तान की उपाधि का उपयोग करेगा, सल्तनत के सारे अधिकार चालीस अमीरों के मण्डल के पास रहेंगे।

इन अमीरों ने अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए इल्तुतमिश के जीवित बचे दो शहजादों नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन को कारागार में डाल दिया और प्रायः समस्त उच्च-पद आपस में बांट लिये। ताकि सुल्तान को स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होने का अवसर न प्राप्त हो। कुछ समय बाद ही अमीरों में फूट पड़ गई।

सुल्तान अलाउद्दीन मसूदशाह ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया। उसने अपने चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज की और नासिरुद्दीन को बहराइच की जागीर देकर लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु वह सल्तनत को पतनोन्मुख होने से नहीं रोक सका। उसके समय में सुदूरस्थ प्रांतों के हाकिमों ने पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त कर ली।

खोखर लोग भी सक्रिय हो गये। कटेहर तथा बिहार में राजपूतों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। 1243 ई. में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिससे वहाँ पर बड़ी गड़बड़ी फैल गई। 1245 ई. में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन मसूदशाह ने उन्हें भारत से मार भगाया।

इस विजय के बाद मसूदशाह में बड़ा परिवर्तन आ गया। वह विजयी, विलासी तथा क्रूर हो गया। उसने षड़यंत्रकारी अमीरों की हत्या करानी आरम्भ कर दी। इससे अमीरों तथा मलिकों में बड़ा असंतोष फैला और उन्होंने सुल्तान के चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनने के लिये आमन्त्रित किया। नासिरुद्दीन ने इस निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। वह औरत का वेश धरकर दिल्ली में प्रविष्ट हुआ। मसूद को पदच्युत करके उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार नासिरुद्दीन दिल्ली का सुल्तान बन गया।

नासिरुद्दीन महमूद (1246-66 ई.)

नासिरुद्दीन महमूद का जन्म 1228 ई. में हुआ था। वह इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। मसूदशाह के तख्त पर बैठने के उपरान्त वह कारागार से मुक्त कर दिया गया और बहराइच का शासक बना दिया गया। जब दिल्ली के अमीरों ने मसूदशाह से असन्तुष्ट होकर उसे सुल्तान बनने के लिए आमन्त्रित किया तो उसने औरत का वेश धरकर नगर में प्रवेश किया और 10 जून 1246 को मसूदशाह की हत्या के बाद, स्वयं सुल्तान बन गया।

जनवरी 1247 ई. में प्रजा ने भी उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया। इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन के चरित्र की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है। वह बड़ा ही उदार तथा सरल स्वभाव का व्यक्ति था। वह अत्यन्त सादा जीवन व्यतीत करता था। कहा जाता है कि वह कुरान की आयतों को लिखकर अपनी जीविका चलाया करता था। उसके एक ही पत्नी थी और कोई दासी नहीं थी। यह कथन असत्य प्रतीत होता है।

नासिरुद्दीन की समस्याएँ

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद नासिरुद्दीन को तीन प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) तुर्की अमीरों की समस्या

इल्तुतमिश की मृत्यु के उपरान्त राज्य में तुर्की अमीरों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था। वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और पारस्परिक ईर्ष्या से ग्रस्त रहते थे। फलतः वे कई दलों में विभक्त हो गये। प्रत्येक दल राजनीति में अपना प्राबल्य स्थापित कर राज्य के महत्वपूर्ण पदों पर अपने दल वालों को नियुक्त करना चाहता था। इन्हीं अमीरों तथा सरदारों के षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों के कारण एक के बाद एक करके सुल्तान मारे जा रहे थे। अतः नासिरुद्दीन के लिये यह आवश्यक था कि वह इन अमीरों पर नियन्त्रण रखे और उनमें सुल्तान के प्रति स्वामिभक्ति एवं भय उत्पन्न करे, अन्यथा उसका अपना जीवन भी संकट में पड़ सकता था।

(2) मंगोलों की समस्या

इन दिनों दिल्ली सल्तनत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश पर मंगोलों के आक्रमण बढ़ गये थे। सल्तनत की रक्षा के लिए इन आक्रमणों का रोकना नितान्त आवश्यक था। अनेक तुर्क सरदार मंगोलों की शरण में चले गये जिससे दिल्ली सल्तनत की चिन्ता बढ़ती ही चली गई।

(3) राजपूतों की समस्या

जैसे ही केन्द्रीय शक्ति क्षीण होती दिखाई देती थी, राजपूत शासक विद्रोह का झण्डा खड़ा करके दिल्ली की सल्तनत को कर देना बन्द कर देते थे। इस काल में विद्रोही राजपूतों की शक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि वे प्रायः राजधानी में प्रवेश करके लूट-मार किया करते थे। सल्तनत की सुरक्षा के लिए राजपूतों को दबाना आवश्यक था। नासिरुद्दीन इन समस्त समस्याओं को सुलझाने में सफल हुआ।

समस्याओं का निवारण

नासिरुद्दीन की समस्याएँ अत्यन्त विकराल थीं जिनसे राज्य के नष्ट हो जाने तथा सुल्तान के मारे जाने का पूरा भय था परन्तु नासिरुद्दीन में उन समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी थी। उसने इस कार्य को दृढ़़तापूर्वक सम्पन्न किया।

(1) तुर्की अमीरों पर नियंत्रण

नासिरुद्दीन ने सुल्तान बनने के बाद पुराने अमीरों को उनके पद पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। बाद में बलबन को चालीसा मण्डल (तुर्कान ए चिहालगानी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को नायब के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया नायब अयोग्य निकला तो उसने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया। अमीरों के काम में हस्तक्षेप नहीं करने के कारण अमीर उससे संतुष्ट रहे।

(2) बंगाल में विद्रोहों का प्रकोप

नासिरुद्दीन के पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। लखनौती में दिल्ली का प्रभुत्व उसी समय स्थापित हो पाता था जब वहाँ के शासक अपने पड़ौसियों से झगड़ा मोल ले लेते थे। नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी रूप से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

(3) पंजाब पर सत्ता की पुनः स्थापना

12 नवम्बर 1246 को सुल्तान नासिरुद्दीन ने पंजाब पर अपनी सत्ता की पुर्नस्थापना करने के उद्देश्य से बलबन के साथ पंजाब की ओर प्रस्थान किया। मार्च 1247 में उसने रावी नदी को पार किया। इसके बाद उसने बलबन को नमक की पहाड़ियों में भेज दिया जहाँ बलबन ने खोखरों तथा अन्य हिन्दू-कबाइलियों से दण्ड वसूल किया। इसके बाद वह सिन्ध के किनारे पहुँचा जहाँ उसने नमक की पहाड़ी के राजा जयपाल को परास्त किया। 9 नवम्बर 1247 को सुल्तान नासिरुद्दीन, बलबन के साथ दिल्ली लौट आया।

(4) जलालुद्दीन का विद्रोह

सुल्तान नासिरुद्दीन का भाई जलालुद्दीन सम्भल तथा बदायूँ का सूबेदार था। वह बलबन की बढ़ती हुई शक्ति से सशंकित होकर बदायूँ से मुल्तान की ओर भाग गया और मंगोलों से जा मिला तथा दिल्ली की गद्दी पाने की चेष्टा करने लगा। अंत में वह निराश होकर 1255 ई. में भारत लौट आया। नासिरुद्दीन ने उसे लाहौर का शासक बनाकर अपनी उदारता का परिचय दिया और उसके विरोध का अन्त कर दिया।

(5) किशलू खाँ का विद्रोह

नागौर के सरदार किशलू खाँ ने बागी होकर मुल्तान तथा उच्च पर अधिकार कर लिया। सुल्तान नासिरुद्दीन स्वयं सेना लेकर वहाँ गया और किशलू खाँ के विद्रोह का दमन किया।

(6) अन्य विद्रोह

बलबन की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। इन लोगों ने बलबन के विरुद्ध सुल्तान के कान भरने आरम्भ किये। सुल्तान ने बलबन को राजधानी दिल्ली से निष्कासित कर दिया। बलबन ने सुल्तान की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया। बलबन की अनुपस्थिति में राज्य का काम बिगड़ने लगा। फलतः सुल्तान ने उसे फिर से दिल्ली बुला लिया। इससे बलबन के विरोधियों को बड़ी निराशा हुई और वे फिर से बलबन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे। इन विद्रोहियों में रहैन, कुतुलुग खाँ, किशलू खाँ तथा जलालुद्दीन प्रमुख थे। सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन की सहायता से इन समस्त विद्रोहियों का दमन कर दिया।

(7) मंगोलों के आक्रमण

मंगोलों ने भारतीय सीमा के निकट अपने राज्य को अत्यन्त सुदृढ़़ बना लिया था। अतः अब उनका ध्यान दिल्ली सल्तनत की ओर अधिक आकृष्ट होने लगा। इन परिस्थितियों में दिल्ली सल्तनत की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करना अनिवार्य था। 1246-47 ई. में खोखरों के विद्रोह को शान्त करने के लिए बलबन पंजाब गया। इन्हीं दिनों एक मंगोल सेना सिन्ध के पार पड़ी हुई थी। बलबन की अध्यक्षता में सुल्तान की विशाल सेना के आगमन का समाचार पाते ही मंगोल सेना भयभीत होकर खुरासान की ओर पलायन कर गई।

(8) हिन्दुओं के विद्रोह का दमन

नासिरुद्दीन ने हिन्दुओं के विद्रोह का सामना धैर्य पूर्वक किया। बंगाल पर हिन्दुओं का निरन्तर आक्रमण होता रहा। इन्हीं दिनों बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड पर चन्देल राजपूतों ने अधिकार कर लिया। 1248 ई. में बलबन ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया। इससे चन्देलों की उत्तर की प्रगति रुक गई।

बघेलों तथा अवध के शासकों में भी कई बार संघर्ष हुआ, परन्तु इससे बघेलों की शक्ति किसी भी प्रकार क्षीण नहीं हुई। मालवा के राजपूतों ने भी अपनी शक्ति में वृद्धि कर ली। 1251-52 ई. में बलबन ने मालवा पर आक्रमण कर दिया और लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। मालवा पूर्ववत् स्वतन्त्र बना रहा।

राजपूताना के चौहान तथा अन्य राजा भी अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। बलबन ने कई बार रणथम्भौर पर आक्रमण किया और बूँदी तथा चितौड़ तक धावा मारा परन्तु इन आक्रमणों से कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा और राजपूत राजा पूर्ववत् स्वतन्त्र बने रहे। मेवातियों के उपद्रव का भी सुल्तान को सामना करना पड़ा।

बलबन ने कई बार मेवातियों पर आक्रमण किया तथा उनके गांवों तथा नगरों को भस्म करवा दिया और उन जंगलों को कटवा दिया जिनमें मेवाती लोग भाग कर शरण लेते थे परन्तु मेवातियों का प्रकोप कम नहीं हुआ। दोआब तथा कटेहर में भी विद्रोह फैल गया। यद्यपि बलबन ने इन विद्रोहों की बड़ी क्रूरता से दमन किया परन्तु वह स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सका और विद्रोह अनवरत जारी रहे।

नासिरुद्दीन की मृत्यु

1265 ई. में नासिरुद्दीन रोगग्रस्त हो गया और 18 फरवरी 1266 को उसकी मृत्यु हो गई। कुछ लोगों की मान्यता है कि बलबन ने उसे विष दिलवा दिया था परन्तु यह कल्पना निराधार प्रतीत होती है। नासिरुद्दीन के कोई औलाद नहीं थी। इस कारण  नासिरुद्दीन ने अपने जीवन काल में ही बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। अतः सुल्तान की मृत्यु के उपरांत बलबन दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस प्रकार इल्तुतमिश के वंशज दिल्ली सल्तनत पर से अपना अधिकार खो बैठे।

दिल्ली का वास्तविक शासक कौन

सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बीस वर्ष तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु इस अवधि में वास्तविक सत्ता किसके हाथ में रही, इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उसके प्रधानमंत्री बलबन को ही राज्य का वास्तविक शासक मानते हैं।

इसामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद, तुर्क अमीरों की पूर्व आज्ञा के बिना कोई राय व्यक्त नहीं करता था और उनके आदेश के बिना हाथ-पैर तक नहीं हिलाता था। डॉ. निजामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद ने पूर्ण रूप से अमीरों के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया था।

चालीसा मण्डल का प्रधान बलबन, सुल्तान को कठपुतली बनाकर उसके समस्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए शासन करता रहा। डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार 1255 ई. तक नासिरुद्दीन महमूद शासन तंत्र पर प्रभावी रहा। सुल्तान बनने के बाद उसने पुराने अमीरों को उनके पद पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की।

तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। बाद में बलबन को चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को नायब के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया नायब अयोग्य निकला तो उसने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया।

इन घटनाओं से सिद्ध हो जाता है कि वह कठपुतली शासक नहीं था। फिर भी यह सत्य है कि वास्तविक सत्ता बलबन के हाथों में रही। 1249 ई. में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन महमूद के साथ कर दिया। इससे बलबन की प्रतिष्ठा बढ़ गई। सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलूग खाँ की उपाधि दी तथा नायब-ए-मुमालिक का पद प्रदान किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

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सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का मकबरा

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन गुलाम वंश का सबसे शक्तिशाली सुल्तान था। उसने अपना जीवन तुच्छ गुलाम के रूप में आरम्भ किया था किंतु अपनी योग्यता के बल पर सुल्तान के महत्वपूर्ण पद तक जा पहुंचा था।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का प्रारंभिक जीवन

गयासुद्दीन बलबन का जन्म भी इल्तुतमिश की भांति तुर्कों के इल्बरी कबीले में हुआ था। बलबन का पिता दस हजार कुटुम्बों का खान था। बाल्यावस्था में बलबन को मंगोलों ने पकड़ लिया तथा उसे ख्वाजा जमालुद्दीन को बेच दिया। ख्वाजा बलबन की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुआ और उसे शिक्षा दिलवाकर सुयोग्य तथा सभ्य व्यक्ति बना दिया। ख्वाजा उसे दिल्ली ले आया। 1232 ई. में इल्तुतमिश ने उसे मोल ले लिया।

बलबन का उत्कर्ष

इल्तुतमिश ने बलबन की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे ‘खास सरदार’ बना दिया जिससे वह चालीस गुलामों के दल का सदस्य हो गया। रुकुनुद्दीन फीरोजशाह  के काल में सुल्तान का विरोध करने के कारण बलबन को कारागार में डाल दिया गया परन्तु रजिया के काल में वह फिर से अपने पुराने पद पर बहाल हो गया।

थोड़े ही दिन बाद वह ‘अमीरे शिकार’ बना दिया गया। रजिया को पदच्युत करने में बलबन ने विद्रोहियों का साथ दिया था। बहरामशाह के काल में बलबन ‘अमीरे आखूर’ के पद पर नियुक्त कर दिया गया और उसे हांसी तथा रेवाड़ी की जागीरें भी मिल गईं। 1245 ई. में मंगोलों ने सिंध पर आक्रमण किया। बलबन ने उनके विरुद्ध सैनिक अभियान का नेतृत्व किया तथा उन्हें भगा दिया। इससे प्रसन्न होकर सुल्तान मसूदशाह ने उसे ‘अमीरे हाजिब’ के पद पर नियुक्त कर दिया।

प्रधानमंत्री पर पर नियुक्ति

1246 ई. में बलबन ने मसूदशाह के स्थान पर नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाने के अभियान में प्रमुखता से भाग लिया। नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना प्रधान परामर्शदाता तथा ‘नायब-ए-मुमालिक’ अर्थात् सल्तनत का प्रधानमंत्री बनाया। प्रधानमंत्री पद पर पहुँच जाना बलबन के लिये बड़ी उपलब्धि थी। नासिरुद्दीन ने जब उसे प्रधानमंत्री बनाया तो उससे कहा कि मैंने शासन तंत्र तुम्हारे हाथ में सौंप दिया है इसलिये कभी ऐसा काम मत करना जिससे तुम्हें और मुझे अल्लाह के सामने लज्जित होना पड़े।

नासिरुद्दीन शांत स्वभाव का सुल्तान था इसलिये बलबन सदैव उसके प्रति स्वामिभक्त रहा। 1249 ई. में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नासिरुद्दीन के साथ कर दिया। इससे सल्तनत में बलबन का रुतबा और भी बढ़ गया। 1249 ई. में बलबन को उलूग खान की उपाधि दी गई। इस प्रकार वह मलिक से खान बना दिया गया। इसके साथ ही वह अमीरों का प्रधान तथा साम्राज्य का नायब सुल्तान बना दिया गया। नासिरुद्दीन की धार्मिकता तथा उदारता के कारण बलबन को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। उसने मंत्री के कर्त्तव्यों को बड़ी योग्यता के साथ पूरा किया।

बलबन को पदच्युत किया जाना

बलबन की बढ़ती हुई शक्ति के कारण बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। बलबन भी निरंकुश ढंग से काम करता था। इसलिये सुल्तान भी उसके कई कामों से असंतुष्ट हो जाता था। 1252-53 ई. में जब बलबन दिल्ली से बाहर गया हुआ था तब इन अमीरों ने सुल्तान के कान भरे और बलबन को अपदस्थ करवा दिया। सुल्तान ने बलबन को हांसी की जागीर में चले जाने की आज्ञा दी। बलबन सुल्तान की आज्ञा मानकर हांसी की जागीर पर चला गया।

बलबन की पुनः नियुक्ति

बलबन को हटाकर सुल्तान ने नये सिरे से अमीरों की नियुक्तियां कीं। बहुत से पुराने अमीरों को उनके पदों से हटा दिया गया। काजी मिनहाज-सिराज को भी उसके पद से हटा दिया गया। शीघ्र ही बलबन को पदच्युत करने के दुष्परिणाम सामने आने लगे और सल्तनत का काम बिगड़ने लगा। अतः विवश होकर 1254 ई. में सुल्तान ने बलबन को फिर से दिल्ली बुला लिया। अब बलबन राज्य का सर्वेसर्वा हो गया और सुल्तान की मृत्यु तक राज्य का वास्तविक शासक बना रहा।

प्रधानमंत्री के रूप में बलबन की उपलब्धियाँ

प्रधानमंत्री के रूप में बलबन की उपलब्धियाँ उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक  शासक होने का गौरव प्रदान करती हैं।

1. विद्रोही हिन्दुओं का दमन

बलबन एक कट्टर मुसलमान था। उसे मुस्लिम इतिहासकार पैगम्बर मानते थे जिसे अल्लाह ने भारत में इस्लाम के प्रसार हेतु भेजा था। अतः स्वाभाविक ही था कि बलबन विद्रोही राजपूत राजाओं का कठोरता से दमन करता। उसने रणथंभौर, ग्वालियर तथा चंदेरी के राजाओं का दमन करके इन राज्यों को दिल्ली के अधीन बनाया। दोआब के विद्रोहियों का दृढ़़ता से दमन किया। उसने दोआब के अधिकतर पुरुषों का वध कर दिया तथा उनकी स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर गुलाम बना लिया।

2. खोखरों का दमन

नासिरुद्दीन के सुल्तान बनने से पूर्व राज्य में अराजकता व्याप्त थी। चारों ओर अशांति छाई हुई थी। उत्तर में खोखर जाति उत्पात मचा रही थी तथा भारत पर आक्रमण करने वाले मंगोलों को सहायता दे रही थी। प्रधानमंत्री बनते ही 1246 ई. में बलबन ने खोखरों के विरुद्ध अभियान करके दृढ़़ता से उनका दमन किया।

3. मेवातियों का दमन

मेवाती बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे। उन्होंने दिल्ली के चारों ओर लूटमार मचा रखी थी। इस कारण व्यापारियांे का दिल्ली से बाहर निकलना असंभव सा हो गया था। बलबन ने मेवातियों को दबाने के लिये एक विशाल सेना भेजी। इस सेना ने मेवातियों का निर्दयता से दमन किया तथा दिल्ली के चारों ओर के मार्ग निरापद कर दिये।

4. विद्रोही सूबेदारों का दमन

1255 ई. में अवध के सूबेदार कुतुबखां और सिन्ध के सूबेदार किशलूखां ने विद्रोह किया। दिल्ली के कई अमीर उनके साथ हो गये। बलबन ने पूरी ताकत लगाकर इन सूबेदारों और अमीरों का दमन किया। उसने शम्सी अमीरों का भी दमन किया जो स्वयं को दूसरों से अधिक अभिजात्य मानते थे। बलबन ने कई सरदारों से उनकी जागीरें छीन लीं। जब बलबन की कार्यवाहियां जारी रहीं तो कोतवाल फखरुद्दीन ने बलबन से कहा कि वह इन अमीरों के विरुद्ध और कठोर कार्यवाही नहीं करे। इस पर बलबन ने अमीरों तथा सूबेदारों का पीछा छोड़ा।

5. बंगाल के विद्रोह का दमन

बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण कर दिया। इस पर जाजनगर के राजा ने तुगरिल खाँ का सामना किया तथा तुगरिल खाँ को परास्त कर दिया। तुगरिल खाँ ने बलबन से सहायता मांगी। इस पर बलबन को बंगाल में कार्यवाही करने का अवसर मिल गया। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा। इस पर तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया।

6. मंगोलों से राज्य की सुरक्षा

इस समय तक मंगोल गजनी तथा ट्रांसऑक्सियाना पर अधिकार कर चुके थे तथा बगदाद के खलीफा को मौत के घाट उतार चुके थे। मंगोल, सिंध और पंजाब पर बार-बार आक्रमण करके वहाँ निरंतर लूटमार मचा रहे थे। उनके आक्रमणों को रोकने के लिये बलबन ने पश्चिमोत्तर सीमा के लिये अलग सेना का गठन किया तथा उस सेना को स्थाई रूप से पश्चिमोत्तर सीमा पर तैनात कर दिया। बलबन ने वहाँ कई दुर्ग भी बनवाये जिनमें सेना को रखा जा सके।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि 1246 ई. में प्रधानमंत्री बनने के बाद बलबन राज्य के हर अंग पर छाया रहा। उसने राज्य को स्थायित्व दिया, दरबार में शांति तथा अनुशासन को बनाये रखा जिससे सुल्तान नासिरुद्दीन 20 वर्ष तक दिल्ली पर शासन कर सका। वास्तव में इल्तुतमिश के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन ही इतनी दीर्घ अवधि तक शासन कर सका था। इसका सम्पूर्ण श्रेय बलबन को जाता है। प्रधानमंत्री के रूप में बलबन ने इस्लाम के प्रसार के लिये कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का राज्यारोहण

18 फरवरी 1266 को सुल्तान नासिरुद्दीन की मृत्यु हो गई। उसके कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने जीवन काल में अपने श्वसुर गयासुद्दीन बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। इसलिये सुल्तान की मृत्यु के बाद बलबन बिना किसी विरोध के दिल्ली का सुल्तान हो गया। इब्नबतूता तथा इसामी आदि परवर्ती लेखकों ने उसे राज्य हड़पने वाला बताया है किंतु आधुनिक इतिहासकारों ने इस धारणा को निराधार बताया है।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की समस्याएँ

यद्यपि बलबन निर्विरोध दिल्ली के तख्त पर बैठा था परन्तु उसे अनेक कठिनाइयों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) सल्तनत को सुदृढ़़ बनाने की समस्या

यद्यपि भारत में तुर्की साम्राज्य को स्थापित हुए लगभग 60 वर्ष हो चुके थे परन्तु चारों दिशाओं से दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण होते रहे थे। इस कारण सल्तनत में तुर्की संस्थाएं संगठित तथा सुव्यस्थित नहीं हो पाई थीं। केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के संगठन में कोई उन्नति नहीं की गई थी और न विजेता तथा विजित में सम्पर्क बनाने का प्रयत्न किया गया था।

विजेता अब भी विदेशी समझे जाते थे। भारत की जनता उन्हें घृणा की दृष्टि से देखती थी और उनका आधिपत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। साधारण सुरक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। अमीरों की भक्ति सदैव संदिग्ध रहती थी और वे षड़यंत्र तथा कुचक्र रचने में संलग्न रहते थे।

(2) आर्थिक समस्या

सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह होते रहने के कारण राजकोष का बहुत बड़ा अंश सेना पर व्यय करना पड़ता था। मंगोलों के आक्रमणों को रोकने तथा विद्रोहियों का दमन करने में काफी धन व्यय करना पड़ता था। अनेक सरदार समय-समय पर कर देना बन्द करके उपद्रव करने लगते थे। इसका राज्य की आय पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। राज्य की आर्थिक दशा को सुधारे बिना अन्य समस्याओं को सुलझना असम्भव था।

(3) चालीस गुलामों की समस्या

इल्तुतमिश ने सुल्तान की स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए चालीस गुलामों के मण्डल का गठन किया था परन्तु कालान्तर में यही गुलाम सुल्तान के लिए घातक हो गये। वे षड़यंत्रकारी एवं विघटनकारी शक्तियों का नेतृत्व करने लगे। अतः उनका दमन करना आवश्यक था। वे सुल्तान गयासुद्दीन बलबन से भी असंतुष्ट थे।

(4) हिन्दू सरदारों तथा भूमिपतियों की समस्या

हिन्दू सरदारों तथा भूमिपतियों को नियन्त्रित रखना किसी समस्या से कम नहीं था। यद्यपि सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के पूर्ववर्ती सुल्तानों ने उनके दमन का भरपूर प्रयास किया था परन्तु इस कार्य में स्थाई सफलता नहीं मिल सकी थी। अपने प्रधानमंत्री काल में बलबन भी इस कार्य को करता रहा था किंतु फिर भी दूरस्थ क्षेत्रों यथा- राजपूताना, बुन्देलखंड तथा बघेलखंड में राजपूतों के स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो गये थे। सल्तनत की सुरक्षा के लिए इन विद्रोही हिन्दू सरदारों का दमन करना नितान्त आवश्यक था।

(5) मंगोलों के आक्रमण की समस्या

मंगोल सरदारों ने सिन्धु नदी को पार करके सिन्ध तथा पश्चिमी पंजाब में अपने शासक नियुक्त कर रखे थे। बलबन अपने प्रधानमंत्री काल में पश्चिमोत्तर सीमा पर एक अलग सेना नियुक्त कर चुका था किंतु फिर भी मंगोल आक्रमणकारियों से दिल्ली सल्तनत को सदैव खतरा बना रहता था।

(6) सल्तनत को निश्चित स्वरूप प्रदान करने की समस्या

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ऐसे समय में तख्त पर बैठा था जब तुर्कों की सत्ता स्थायी रूप से भारत में स्थापित हो गई थी। अब राजनीतिक व्यवस्था एक निश्चित स्वरूप प्राप्त कर रही थी और बलबन का कार्य उसे निश्चित स्वरूप देने और उसे स्थायी बनाने का था।

(7) राजत्व के आदर्शों की समस्या

दिल्ली सल्तनत में अब तक राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद नहीं हो सका था। इल्तुतमिश के निर्बल उत्तराधिकारी जिनको सदैव अपनी जान के लाले पड़े रहते थे, इस कार्य को नहीं कर सके। न तो उन्हें इसका कोई अनुभव था और न उनमें इस कार्य के करने की योग्यता थी। बलबन अनुभवी, दूरदर्शी, विचारशील तथा दृढ़़ संकल्प का व्यक्ति था। अतः उसमें राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद करने की क्षमता थी किंतु इन्हें लागू करने के लिये धैर्य एवं लगन की भी आवश्यकता थी।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की समस्याओं का निवारण

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के लिये दिल्ली का ताज काँटों से भरा हुआ था परन्तु बलबन लम्बे समय से दिल्ली सल्तनत में विभिन्न प्रशासकीय कार्य कर चुका था तथा विगत 20 वर्षों से वह राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य कर रहा था इसलिये उसे इन समस्याओं से निबटने में विशेष कठिनाई नहीं होने वाली थी। बलबन ने अपने शासन को मजबूत करने के लिये निम्नलिखित कदम उठाये-

(1.) सुल्तान की प्रतिष्ठा की स्थापना

बलबन ने सुल्तान के पद को प्रतिष्ठित तथा गौरवान्वित करने के लिये कई कदम उठाये। सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का कहना था कि रसूल के अतिरिक्त अन्य कोई पद इतना गौरवपूर्ण तथा प्रतिष्ठित नहीं होता जितना सुल्तान का। सुल्तान इस पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतनिधि होता है और उसके कार्यों से सर्वशक्तिमान अल्लाह की मर्यादा दिखाई देनी चाहिये।

अल्लाह शासन का भार उच्च-वंशीय लोगों को ही प्रदान करता है। बलबन में उच्च-वंशीय भावना इतनी प्रबल थी कि वह निम्न-वंश के व्यक्तियों को राज्य में कोई उच्च पद प्रदान नहीं करता था और न उनकी भेंट अथवा उपहार स्वीकार करता था।

दिल्ली का जखरू नामक अत्यन्त समृद्धशाली व्यापारी लाखों टंक की भेंट के साथ सुल्तान के दर्शन करना चाहता था परन्तु सुल्तान उसे दर्शन देना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता था। फलतः सुल्तान ने उसकी प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। सुल्तान तथा उसके पद की मर्यादा को बढ़ाने के लिए बलबन ने अपने दरबार को ईरानी ढंग पर संगठित किया। उसके दरबार को विविध प्रकार से सजाया गया।

सुल्तान के अंगरक्षक प्रज्वलित अस्त्रों तथा आकर्षक वस्त्रों से अंलकृत होकर, पंक्तियाँ बनाकर सुल्तान के पीछे खड़े रहते थे। प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, दरबार में पूर्ण अनुशासन रखना पड़ता था। सुल्तान के समक्ष न कोई हँस सकता था और न मजाक कर सकता था। इस प्रकार बलबन ने सुल्तान के पद को अधिकाधिक प्रतिष्ठित तथा गौरवान्वित बनाने का प्रयत्न किया।

(2.) उलेमाओं को राजनीति से अलग करना

दिल्ली में उन दिनों उलेमाओं का बोलबाला था। शक्तिशाली होने के कारण उनका चारित्रिक पतन हो गया था। बरनी के अनुसार उलेमा न तो ईमानदार थे और न उनमें धार्मिकता रह गई थी। बलबन ने इन रूढ़िवादी तथा कर्त्तव्य-भ्रष्ट उलेमाओं को राजनीति में भाग लेने से वंचित कर दिया।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन उलेमाओं का आदर-सत्कार करता था और तब तक भोजन नहीं करता था जब तक कि कम से कम एक दर्जन उलेमा उसके पास नहीं बैठे हों परन्तु उसने उलेमाओं के दुर्गुणों के कारण उन्हें सल्तनत की राजनीति से अलग कर दिया। प्रोफेसर हबीबुल्लाह ने इसे बलबन की सबसे बड़ी भूल माना है। उन्होंने लिखा है कि बलबन का सबसे बड़ा दोष यह था कि उसने मुसलमानों के प्रभाव को राजनीति और शासन में स्वीकार नहीं किया।

(3.) चालीस गुलाम सरदारों के दल की समाप्ति

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने अनुभव किया कि सुल्तान की निरंकुशता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा तुर्की अमीर थे जिनका नेतृत्व चालीस के मण्डल के हाथों में था। प्रमुख तुर्की अमीरों के इस मण्डल ने सुल्तान को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया था। बलबन ने सुल्तान तथा उसके उत्तराधिकारियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिये चालीस सरदारों के इस मण्डल को नष्ट करने का निश्चय किया।

उसने अपने व्यक्तिगत सेवकों का नया दल बनाया और उन्हें ऊँचे पदों पर नियुक्त किया। उसने रक्त की शुद्धता तथा तुर्कों की श्रेष्ठता को आधार बनाकर उन लोगों को दरबार से निकाल बाहर किया जिन्होंने हिन्दू-धर्म का परित्याग करके और इस्लाम ग्रहण करके राज्य में ऊँचे पद प्राप्त कर लिये थे।

उसने ऐसे लोगों को भी हटा दिया जिनके वंश के विषय में किसी प्रकार का सन्देह था। उसने चालीस अमीरों में से जो दुर्बल तथा अयोग्य हो गये थे, उन्हें पेन्शन देकर घर बैठा दिया। अमीरों की विधवाओं तथा उनके बच्चों के लिए भी गुजारा निश्चित कर दिया।

उसने केवल युवकों को ही राज्य की सेवा में रखा और कार्य तथा योग्यता के अनुसार उनका वेतन निश्चित किया। चालीसा मण्डल की समाप्ति बलबन की सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है जिसके कारण वह लगभग 21 साल तक दिल्ली पर निर्विघ्न शासन कर सका।

(4.) प्रान्तपतियों पर नियन्त्रण

दरबारी अमीरों पर नियन्त्रण करने के उपरान्त बलबन ने प्रान्तपतियों की ओर ध्यान दिया। उसने विद्रोही प्रांतपतियों को नष्ट कर दिया। शम्सी सरदारों में उन दिनों सबसे अधिक प्रबल शेरखाँ सुन्कर था जो सीमान्त प्रदेश का शासक था। बलबन की शम्सी सरदार विरोधी नीति से वह अत्यन्त शंकित तथा आतंकित हो गया और सुल्तान से मिलने के लिए दिल्ली नहीं आया।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने उसे दरबार में उपस्थित होने के लिये आदेश भेजा। शेरखाँ चार वर्ष तक आनाकानी करता रहा। अन्त में बलबन ने उसे विष दिलवाकर उसकी हत्या करवा दी। इसके बाद बलबन ने शेर खाँ के स्थान पर सीमान्त प्रदेश में बंगाल के हाकिम तातार खाँ को और तातार खाँ के स्थान पर तुगरिल बेग को बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

सीमान्त प्रदेश के दुर्गों के शासकों में परस्पर विद्वेष था। बलबन ने उन्हें यह आरोप लगाकर बंदीगृह में डाल दिया कि उन्होंने अपने कार्य में असावधानी बरती है। अवध का इक्तादार अमीन खाँ बंगाल के आक्रमण में विफल होकर लौटा तो बलबन ने उसे मृत्यु दण्ड देकर उसका शव अयोध्या के फाटक पर लटकवा दिया।

इसी प्रकार अवध के इक्तादार हैबात खाँ को अपने एक गुलाम की हत्या कर देने के अपराध में 500 कोड़े लगावाये। बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक को जनसाधारण के सम्मुख कोड़ों से पीटा गया क्योंकि उसने एक गुलाम को कोड़ों से पीट-पीटकर मार डाला था।

(5.) मेवातियों का दमन

मेवाती लोग दिल्ली के आस-पास लूट-मार किया करते थे और अवसर पाते ही राजधानी दिल्ली में भी घुसकर लूटपाट करते थे। बलबन ने अनुभवी मलिकों तथा अपनी सेना की सहायता से मेवातियों का दमन आरम्भ किया। उसने उनके नगरों तथा गाँवों को भस्म करवा दिया और उन जंगलों को साफ करवा दिया जिनमें वे भाग कर शरण लिया करते थे।

(6.) दोआब के विद्रोह का दमन

दो आब का क्षेत्र लगातार विद्रोह का गढ़ बना हुआ था। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने इन विद्रोहों को कई बार दबाने का प्रयास किया था किंतु अवसर पाते ही विद्रोही सिर उठा लेते थे। इन दिनों भी दोआब में बड़ी अशान्ति फैली हुई थी। सड़कें अत्यन्त असुरक्षित थीं और डाकुओं की लूटमार के कारण व्यापार मन्द पड़ गया था। बलबन ने दोआब में उपद्रव करने वालों को बड़ी कठोरता से दण्ड दिया। उसने दोआब को कई खण्डों में विभक्त कर दिया तथा इन खण्डों में अफगान सैनिकों की छावनियाँ स्थापित कीं।

(7.) रूहेलखण्ड में विद्रोह का दमन

जिस समय बलबन दोआब में विद्रोहियों का दमन कर रहा था, उन्हीं दिनों कटेहर में उत्पात आरम्भ हो गया। बलबन स्वयं एक विशाल सेना लेकर कटेहर गया। उसने विद्रोहियों की बस्तियों में आग लगवा कर उन्हें नष्ट कर दिया। उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को बन्दी बना लिया और 9 वर्ष से अधिक अवस्था वाले लड़कों एवं पुरुषों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी। इस भीषण नरमेध के उपरान्त कटेहर का विद्रोह शान्त हो गया।

(8.) मंगोलों से संघर्ष

मंगोलों ने सिन्ध नदी के पश्चिमी प्रदेश पर अधिकार कर लिया था। पंजाब का अधिकांश भाग भी उन्हीं के अधीन चला गया था। बरनी लिखता है कि व्यास नदी ही अब दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा थी और उसके उस पार का सम्पूर्ण प्रदेश मंगोलों के अधिकार में था। बलबन के लिये यह संभव नहीं था कि वह पंजाब से मंगोलों को निष्कासित कर सके।

इसलिये उसने मंगोलों को व्यास-रावी के दोआब में रोके रखने की व्यवस्था की। उसने लाहौर के दुर्ग की मरम्मत करवा कर उसमें एक सुसज्जित सेना रख दी। 1271 ई. में बलबन स्वयं लाहौर गया और उसने उन किलों की मरम्मत करवाई जिन्हें मंगोलों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।

बलबन ने सीमान्त प्रदेश को तीन भागों में विभक्त कर दिया और प्रत्येक भाग में एक अधिकारी नियुक्त किया। एक क्षेत्र में तातार खाँ को, दूसरे में शाहजादा मुहम्मद को और तीसरे में बुगरा खाँ को नियुक्त किया। इन समस्त क्षेत्रों में चुने हुए सैनिक रखे गये। राजधानी में भी एक विशाल सेना सदैव विद्यमान रहती थी। मंगोलों ने कई बार व्यास को पार करके आगे बढ़ने का प्रयत्न किया किंतु बलबन के सेनापतियों ने उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिये।

(9.) बंगाल में विद्रोह का दमन

1279 ई. में बलबन बीमार पड़ा। इस समय वह काफी वृद्ध हो गया था। इन दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण भी बढ़ गये थे। बलबन के दोनों पुत्र इन आक्रमणों को रोकने में व्यस्त थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की।

उसने अपने नाम की मुद्रायें भी चलाई और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया। बलबन ने तुगरिल के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन दिल्ली का प्रबन्ध कोतवाल फखरूद्दीन को सौंपकर, अपने पुत्र बुगरा खाँ तथा एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया।

लगभग छः वर्ष के लगातार प्रयासों के बाद बलबन का लखनौती पर अधिकार हो सका। तुगरिल अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया।

सुल्तान ने तुगरिल के साथियों तथा सम्बन्धियों को बड़ा कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा। विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल की हुई थी।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते हैं कि दिल्ली सल्तनत के समक्ष कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से जो समस्याएँ चली आ रही थीं, वे बलबन के समय भी विद्यमान थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत क्षेत्र में खोखरों का उपद्रव, पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण, दिल्ली के निकट मेवातियों के उत्पात, गंगा-यमुना के दोआब में हिन्दुओं के विद्रोह, राजपूताना, बुंदेलखंड तथा बघेलखंड में हिन्दू सरदारों के विद्रोह, बंगाल के गवर्नरों के विद्रोह, अमीरों के षड़यंत्र आदि बहुत सी ऐसी समस्याएँ थीं जो पूरे गुलामवंश के शासन के दौरान बनी रहीं। बलबन इनमें से केवल षड़यंत्रकारी अमीरों की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ सका था।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त

बलबन ने अपने राज्य को स्थाई, सुल्तान को प्रभावशाली तथा शासन को मजबूत बनाने के लिये राजत्व के सिद्धांत का निर्माण किया। बलबन ने अपने राजत्व के सिद्धांतों की जानकारी अपने शाहजादा मुहम्मद को एक आदेश के रूप में दी। बलबन के राजत्व के सिद्धान्त इस प्रकार थे-

(1.) सुल्तान दैवी अधिकारों से सम्पन्न होता है

बलबन का विश्वास था कि सुल्तान को देवत्व प्राप्त होता है और उसमें दैवी अंश विद्यमान होता है। वह सुल्तान को इस पृथ्वी पर रसूल का प्रतिनिधि समझता था। वह राजपद को अत्यन्त पवित्र समझता था। उसका मानना था कि सुल्तान को रसूल की विशेष कृपा प्राप्त रहती है जिससे अन्य लोग वंचित रहते हैं।

(2.) सुल्तान स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होता है

बलबन सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन में विश्वास करता था। उसकी दृढ़़ धारणा थी कि स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक ही राज्य को सुसंगठित एवं सुरक्षित करके अपनी रियाया को अनुशासन में रख सकता है। बलबन ने अपने सम्पूर्ण शासन काल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और अमीरों तथा उलेमा लोगों की शक्ति तथा प्रभाव को नष्ट करके स्वयं असीमित सत्ता का केन्द्र बन गया।

(3.) राजपद गौरवपूर्ण होता है

बलबन की यह धारणा थी कि सुल्तान का पद अत्यन्त गौरवपूर्ण होता है। इसलिये प्रत्येक सुल्तान को अपना गौरव उन्नत बनाये रखना चाहिए। बलबन ने अपने जीवन काल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और स्वयं को गौरवान्वित बनाये रखा। उसने दरबार में मद्यपान करके आने तथा हँसी-मजाक करने पर रोक लगा दी। वह स्वयं भी अत्यन्त गम्भीर रहा करता था और साधारण लोगों से बात नहीं करता था। वह निम्न वर्ग के लोगों से भेंट लेना भी हेय समझता था।

(4.) सुल्तान को कर्त्तव्यपरायण होना चाहिए

बलबन की धारणा थी कि सुल्तान को कर्त्तव्य परायण होना चाहिए और सदैव प्रजा-पालन का चिन्तन करना चाहिए। सुल्तान को आलसी अथवा अकर्मण्य नहीं होना चाहिए। उसे सदैव सतर्क तथा चैतन्य रहना चाहिए।

(5.) सुल्तान को कठोरता से शासन करना चाहिए

बलबन अपने विरोधियों तथा विद्रोहियों का क्रूरता से दमन करने में विश्वास करता था। चोर-डकैतों, मेवातियों, षड़यंत्रकारी अमीरों तथा विद्रोही सामन्तों के कुचक्रों को उसने कठोरता से कुचला।

बलबन का शासन प्रबन्ध

बलबन की सैनिक उपलब्धियाँ उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी बड़ी शासकीय उपलब्धियाँ हैं। उसने दिल्ली सल्तनत को स्थायित्व प्रदान किया। विद्रोहियों का दमन किया तथा राज्य में व्यवस्था स्थापित की। उसके द्वारा किये गये कार्यों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है-

(1.) सल्तनत में शान्ति की स्थापना

इल्तुतमिश की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली सल्तनत में अंशाति तथा कलह बढ़ गया था। बरनी ने लिखा है- ‘सब लोगों के हृदय से राज का भय निकल गया था और देश की बड़ी दुर्दशा हो रही थी।’ बलबन ने बड़ी दृढ़़ता से अंशाति तथा कलह को दबाकर विद्रोहियों का दमन किया और सुल्तान की सत्ता तथा धाक को फिर से स्थापित किया। उसने अपराधियों, विरोधियों एवं षड़यंत्रकारियों को कठोर दण्ड देकर लोगों को राजाज्ञाओं का पालन करने के लिए विवश किया।

(2.) सुल्तान में केन्द्रीभूत शासन की स्थापना

इल्तुमिश की मृत्यु के बाद शासन में अमीरों का बोलबाला हो गया था जिसके कारण सुल्तान अपनी इच्छा से कार्य नहीं कर सकता था। बलबन ने अमीरों का दमन करके फिर से ऐसे स्वेच्छाचारी केन्द्रीभूत शासन की पुनर्स्थापना की जिसमें शासन की सारी शक्तियाँ सुल्तान में केन्द्रीभूत थीं। सुल्तान कोई भी महत्वपूर्ण कार्य अपने राज्याधिकारियों अथवा पुत्रों पर पूर्ण रूप से नहीं छोड़ देता था। इससे शासन के समस्त कार्यों में सुल्तान का परामर्श एवं आज्ञा प्राप्त करना आवश्यक हो गया।

(3.) सेना में स्फूर्ति का संचार

यद्यपि बलबन ने राज्य-विस्तार नहीं किया परन्तु राज्य को शत्रुओं एवं विद्रोहियों से सुरक्षित रखने के लिये उसने सुसंगठित तथा सेना की व्यवस्था की। उसने अपनी सेना को अनुभवी तथा राज-भक्त मलिकों के हाथों में सौंपा। सेना में हाथियों और घोड़ों की संख्या में वृद्धि की। सैनिकों को जागीर के स्थान पर नकद वेतन देने पर जोर दिया गया।

प्रान्तीय तथा स्थानीय हाकिम अपने सैनिकों को नकद वेतन न देकर भूमि ही दिया करते थे। बलबन ने सेना को इमादुलमुल्क के नियन्त्रण में रख दिया जो योग्य तथा कर्त्तव्य परायण अमीर था। उसे ‘दीवाने आरिज’ (सैन्य सचिव) बना दिया। इमादुल्मुल्क ने सेना का अच्छा प्रबन्ध किया और उसमें अनुशासन स्थापित किया।

बलबन ने सम्भवतः घोड़ों को दाग लगवाने की प्रथा आरम्भ की। सैनिकों को अनुशासित बनाने के लिये उनका वेतन बढ़ा दिया गया। अश्व सेना तथा पैदल सेना का समुचित संगठन किया गया। यद्यपि बलबन तथा इमादुल्मुल्क ने सेना में बड़ा परिवर्तन नहीं किया परन्तु अच्छे वेतन एवं कठोर अनुशासन से सेना में नई स्फूर्ति का संचार हुआ।

(4.) दुर्गों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार

बलबन के शासन काल में विद्रोहों के फूट पड़ने तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये बलबन ने पुराने दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया। सीमा प्रदेश में उन मार्गों पर नये दुर्गों का निर्माण करवाया जिन मार्गों से होकर मंगोल भारत पर आक्रमण करते थे।। इन दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में सशस्त्र सेनाएँ रखी गईं। सेनाओं को अच्छे शस्त्र उपलब्ध करवाये गये। इस प्रकार बाह्य आक्रमणों को रोकने एवं आंतरिक विद्रोहों का दमन करने के लिये बलबन ने समुचित व्यवस्था की।

(5.) निष्पक्ष न्याय व्यवस्था

बलबन के लिये सुल्तान तथा सल्तनत का हित सर्वोपरि था। इसलिये वह अपने सम्बन्धियों को दण्डित करने में भी संकोच नहीं करता था। वह किसी की भी मनमानी सहन नहीं करता था। बलबन ने बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक को और अवध के इक्तादार हैबात खाँ को अपने नौकरों के साथ दुर्व्यवहार के अपराध में कठोर दण्ड दिये। इससे लोगों में सुल्तान का भय बैठ गया।

अब वे अपने नौकरों तथा गुलामों के साथ भी दुर्व्यवहार करने का साहस नहीं करते थे। सल्तनत में अपराधों तथा अत्याचारों का पता लगाने के लिये बलबन ने एक मजबूत गुप्तचर विभाग का गठन किया। ये गुप्तचर सुल्तान को समस्त प्रकार के अत्याचारों तथा अन्यायों की सूचना देते थे। अपराध के सिद्ध हो जाने पर अपराधी को बिना किसी पक्षपात के दण्ड दिया जाता था।

(6.) योग्य एवं कुलीन लोगों को राजकीय नौकरियाँ

बलबन ने शासन व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिये योग्य तथा प्रतिभावान व्यक्तियों को राजकीय सेवा में नियुक्त किया। बड़ी नौकरियां देते समय वह व्यक्ति के उच्च कुलीन होने पर जोर देता था। वह हिन्दुओं तथा निम्न कुलीन वंश के मुसलमानों को राज्य में उच्च-स्थान नहीं देता था।

(7.) मजबूत गुप्तचर व्यवस्था

सुल्तान ने समस्त प्रान्तों तथा जिलों में गुप्तचर रखे। जिनके माध्यम से बलबन को राजधानी तथा अन्य प्रान्तों की महत्वपूर्ण घटनाओं, अमीरों के कुचक्रों, षड़यंत्रों एवं विद्राहों की सूचनाएँ मिलती थीं। गुप्तचरों को अच्छा वेतन मिलता था और उनकी निष्ठा का परीक्षण होता रहता था। कर्त्तव्य भ्रष्ट गुप्तचरांे को कठोर दण्ड दिया जाता था।

(8.) ऐश्वर्य एवं गौरव पूर्ण दरबार

बलबन का दरबार सम्पूर्ण एशिया में अपने ऐश्वर्य एवं गौरव के लिए प्रसिद्ध था। सुल्तान महंगे एवं सुन्दर वस्त्र पहन कर दरबार में आता था। अमीर, मलिक एवं अन्य दरबारी भी करीने से वस्त्र पहनकर दरबार में आ सकते थे। दरबार में हँसना, बातें करना तथा बिना अदब के खड़े होना मना था। सुल्तान स्वयं भी दरबार में नहीं हँसता था। इस कारण दूसरों को हँसने का साहस ही नहीं होता था।

(9.) उच्च नैतिक स्तर

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन उच्च नैतिक स्तर में विश्वास रखता था। उसे दुष्ट तथा अशिष्ट लोगों से घृणा थी। वह ऐसे लोगों की संगति कभी नहीं करता था। उसने स्वयं मद्यपान त्याग दिया था और राज्य में मदिरा का क्रय-विक्रय बंद कर दिया था। वह प्रजा के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाना चाहता था और अपराधी का दमन बड़ी कठोरता से करता था इस काम में प्रायः क्रूरता भी हो जाती थी।

(10.) कला तथा साहित्य को प्रोत्साहन

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन को फारसी कला तथा साहित्य से प्रेम था। वह फारसी साहित्य का आश्रयदाता था। कवि अमीर खुसरो को उसकी विशेष कृपा प्राप्त थी। मंगोलों के अत्याचारों से आतंकित होकर दिल्ली आने वाले फारसी कवियों को बलबन का आश्रय प्राप्त होता था।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की मृत्यु

1285 ई. में मंगोलों ने तैमूर खाँ के नेतृत्व में फिर भारत पर आक्रमण किया। शहजादे मुहम्मद ने मंगोलों का रास्ता रोका। मंगोल पराजित होकर भाग गये किंतु शाहजादा मुहम्मद मारा गया। शाहजादे की मृत्यु से सुल्तान गयासुद्दीन बलबन को करारा आघात लगा। लगभग 1287 ई. के मध्य में बलबन की भी मृत्यु हो गई।

बलबन का चरित्र और उसके कार्यों का मूल्यांकन

बलबन का उत्कर्ष उस युग की एक बड़ी घटना थी जिसने न केवल भारत अपितु मध्य एशिया तक के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया था।

(1) शारीरिक कुरूपता

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का शरीर मजबूत था किंतु उसकी कद काठी सुंदर नहीं थी। उसका कद छोटा और रंग काला था। उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। उसकी भद्दी सूरत के कारण इल्तुतमिश ने उसे खरीदने से मना कर दिया था। तब बलबन ने विनम्र भाव से कहा था कि जहाँपनाह जहाँ आपने इतने गुलाम अपने लिये खरीदे हैं, तो ईश्वर के लिये मुझे खरीद लीजिये। उसकी कुरूपता के कारण ही बलबन को भिश्ती का काम सौंपा गया था।

(2) भाग्य का प्राबल्य

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन को बचपन में परिवार के सदस्यों ने ईर्ष्यावश गुलाम बनाकर बेच दिया किंतु वह प्रबल भाग्य का धनी था। इस कारण उसे बुखारा, गजनी तथा दिल्ली जैसे शहरों में बेचा गया जहाँ भाग्य के उत्कर्ष के लिये अनेक मार्ग खुले हुए थे। यह बलबन के भाग्य का ही प्राबल्य था कि उसे ख्वाजा जमालुद्दीन तथा इल्तुतमिश जैसे मालिकों ने खरीदा। इससे उसके उत्कर्ष के मार्ग खुल गये। उसे शिक्षित होने तथा राजकृपा प्राप्त करने का अवसर मिला।

भाग्य के बल पर वह निरंतर आगे बढ़ता चला गया। उसने रजिया तथा मसूदशाह को तख्त से उतारने के अभियानों में भाग लिया। भाग्य से दोनों बार उसके पक्ष का शहजादा विजयी होकर तख्त पर बैठा। इससे बलबन का उत्कर्ष तेजी से हुआ। नासिरुद्दीन ने बलबन को राज्य का प्रधानमंत्री तथा अपना उत्तराधिकारी बनाया।

(3) अतुल्य स्वामिभक्ति

यद्यपि वह दो सुल्तानों के प्रति हुई बगावत में सक्रिय रहा था किंतु जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने उसे प्रधानमंत्री बना दिया तो वह सुल्तान के प्रति पूर्णतः स्वामिभक्त हो गया। सुल्तान नासिरुद्दीन ने जब नाराज होकर उसे दिल्ली से निकाल दिया तब भी बलबन ने धैर्य से काम लिया तथा सुल्तान के आदेश का पालन किया। इससे उसके प्रति सुल्तान का विश्वास बढ़ गया।

(4) अकाट्य कूटनीति

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन में कूटनीति से काम लेने की क्षमता थी। जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने उसे प्रधानमंत्री के पद से हटाकर हांसी भेज दिया तो उसने विद्रोह का मार्ग न अपनाकर चुपचाप सुल्तान का आदेश स्वीकार कर लिया तथा भाग्य को अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने लगा।

जब भाग्यवश उसे पुनः दिल्ली में बुलाकर पुराने पद पर बहाल किया गया तो उसने सुल्तान को पूरी तरह से अपने पक्ष में करने के लिये अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से कर दिया। इससे दरबार में अन्य कोई अमीर उसे चुनौती देने योग्य नहीं रहा।

(5) इस्लाम पर विश्वास

बलबन अपने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में इस्लाम के सिद्धांतों का पालन करता था। वह इस्माल के प्रचार, तुर्की रक्त की उच्चता, तथा सुल्तान की सर्वोच्चता में विश्वास करता था। उसने इस्लाम के सिद्धांतों के आधार पर अपने राज्य का गठन किया।

(6) संकीर्ण रूढ़िवाद

इस्लाम में विश्वास करने के कारण वह हिन्दुओं को राज्य में उच्च स्थान दिये जाने के विरुद्ध था। उसने उन हिन्दुओं को भी अमीरों के पद से हटा दिया जो राज्य पद प्राप्त करने के लिये इस्लाम अपना कर मुसलमान बन गये थे।

(7) उलेमाओं पर नकेल

इस्लाम में विश्वास करने के कारण वह उलेमाओं का बहुत आदर करता था तथा तब तक भोजन नहीं करता था जब तक कि एक दर्जन उलेमा उसके साथ बैठकर भोजन नहीं कर रहे हों। इस पर भी उसने उलेमाओं को शासन में हस्तक्षेप करने से रोक दिया। इस कारण दरबार में होने वाले षड़यंत्रों एवं कुचक्रों पर रोक लग गई।

(8) फारसी साहित्य से लगाव

बलबन में फारसी सहित्य के प्रति लगाव था। उसने मंगोलों के भय से भागकर दिल्ली आने वाले फारसी साहित्यकारों को अपने दरबार में प्रश्रय दिया। फारसी कवि अमीर खुसरो को उसने बहुत आदर दिया।

(9) राजत्व में विश्वास

बलबन का पिता दस हजार परिवारों का खान था। इसलिये बलबन ने बचपन से ऐश्वर्य तथा प्रभुत्व देखा था। ख्वाजा जलालुद्दीन तथा इल्तुतमिश जैसे मालिकों के सानिध्य में भी वह ऐश्वर्य तथा सत्ता के बीच पला। इस कारण वह स्वयं को श्रेष्ठ एवं दूसरों से उच्चतर समझता था।

यही कारण था कि वह राजत्व के सिद्धान्त का निरूपण कर सका। उसने सुल्तान को, सल्तनत के अन्य अमीरों की अपेक्षा इतना ऊँचा उठा दिया कि कोई अमीर सुल्तान की अवहेलना करने अथवा बराबरी करने की तो दूर, उसकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता था। इससे सल्तनत में सुल्तान की स्थिति अत्यंत प्रबल हो गई।

उसके द्वारा प्रतिपादित राजत्व के आदर्शों तथा सिद्धान्तों ने आगे चलकर अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे प्रबल तुर्क शासकों का पथ-पदर्शन किया।

(10) शासन में कठोरता का समावेश

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने अपने युग की विध्वंसकारी शक्तियों से निबटने के लिये शासन में कठोरता की नीति का समावेश किया। उसने विरोधियों तथा राज्यद्रोहियों को कठोर दण्ड दिये। उसका न्याय विधान बड़ा कठोर था। वह बिना किसी भेद-भाव के अपराधियों को कठोर दण्ड देता था।

(11) दूरदृष्टि

बलबन ने भविष्य में आने वाले संकटों का सामना करने के लिेय दूरदृष्टि से काम लिया। उसने सीमांत प्रदेशों की सुरक्षा के लिये नये दुर्ग बनवाये एवं पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाकर वहाँ सेनाएं नियुक्त कीं। उसने अयोग्य लोगों को सेवा से हटा दिया। बूढ़े अमीरों के स्थान पर उनके युवा पुत्रों को सेवा में रखा।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने अपने जीवन-काल में ही अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया परन्तु दुर्भाग्यवश उसकी युद्ध क्षेत्र में मृत्यु हो गई। इसके बाद बलबन ने बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उसके बंगाल चले जाने पर अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

बलबन के चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘बलबन का चालीस वर्षों का क्रियाशील जीवन मध्यकालीन भारत के इतिहास में अनूठा है। उसने राजपद के गौरव को बढ़ाया और लौह तथा रक्त की नीति का अनुसरण कर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की।’

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का इतिहास में स्थान

बलबन का मध्यकालीन भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। उसका एक साधारण व्यक्ति से शक्तिशाली शासक बन जाना इस बात का प्रमाण है कि वह असाधारण प्रतिभा का स्वामी था।

ईश्वरी प्रसाद का मत है- ‘बलबन जिने अपनी वीरता तथा दूरदर्शिता से मुस्लिम राज्य को विपत्ति काल में नष्ट होने से बचाया, मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में वह सदैव एक महान् व्यक्तित्व रहेगा।’

प्रो. हबीबुल्ला का मत है- ‘बलबन ने बड़ी सीमा तक खिलजी राज्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।’

अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार- ‘यदि हम बलबन के कार्य को एक शब्द में व्यक्त करना चाहें तो वह है-सुदृढ़ीकरण। यही उसकी नीति का मूल मंत्र था।’

डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव में लिखा है- ‘बलबन ने तुर्की सल्तनत की रक्षा का सुचारु प्रबन्ध किया और उसे नया जीवन प्रदान किया। यही उसका सबसे महान् कार्य था। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा का पुररुस्थान किया। यह उसकी दूसरी सफलता थी। राज्य में सर्वत्र पूर्ण शांति और व्यवस्था की स्थापना करना उसका महत्वपूर्ण कार्य था। उस युग में तुर्की सल्तनत को जिन कठिनाइयों और संकटों का सामना करना पड़ा, उनको देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि बलबन की सफलताएं साधारण कोटि की न थीं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

गुलाम वंश का पतन

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गुलाम वंश का पतन - www.bharatkaitihas.com
गुलाम वंश का अंतिम शक्तिशाली सुल्तान बलबन

बलबन की मृत्यु के साथ ही गुलाम वंश का पतन आरम्भ हो गया। बलबन के उत्तराधिकारियों में कोई भी योग्य शहजादा जीवित नहीं बचा था। बलबन का बड़ा पुत्र मर चुका था और दूसरा पुत्र अपने पिता के कठोर स्वभाव से आतंकित था।

बलबन के उत्तराधिकारी

कैकुबाद (1287-1290)

शहजादे मुहम्मद की मृत्यु के बाद बलबन ने अपने द्वितीय पुत्र बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना चाहा किंतु बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर चुपचाप लखनौती चला गया। इस पर बलबन ने शाहजादा मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने षड्यन्त्र रचकर बुगरा खाँ के पुत्र कैकुबाद को तख्त पर बैठा दिया। जिस समय कैकुबाद तख्त पर बैठा, उस समय उसकी अवस्था केवल सत्रह वर्ष थी। वह रूपवान तथा सरल प्रकृति का युवक था। उसका पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा बलबन ने अपने निरीक्षण में करवाई थी।

कैकुबाद ने कभी मद्य का सेवन नहीं किया था और न कभी रूपवती युवती पर उसकी दृष्टि पड़ी थी। उसका अध्ययन अत्यन्त विस्तृत था और उसे साहित्य से अनुराग था। उसे योग्य शिक्षकों द्वारा विभिन्न विषयों एवं कलाओं की शिक्षा दी गई थी। इस शिक्षा के प्रभाव से कैकुबाद कभी अनुचित कार्य नहीं करता था। उसके मुँह से कभी अपशब्द नहीं निकलते थे।

कैकुबाद के रूप में दिल्ली सल्तनत को अच्छा शासक मिलने की आशा थी किंतु तख्त पर बैठते ही उसे दुष्ट लोगों ने घेर लिया जिससे वह सब शिक्षाओं को भूलकर भोग-विलास में लिप्त हो गया। उसके दरबारियों ने उसका अनुसरण करना आरम्भ किया।

भोग-विलास में संलग्न रहने के कारण सुल्तान ने शासन की बागडोर कोतवाल फखरूद्दीन के भतीजे तथा दामाद मलिक निजामुद्दीन के हाथ में सौंप दी। निजामुद्दीन ने सुल्तान को हर तरह से कमजोर कर दिया। निजामुद्दीन ने शहजादे कैखुसरो को जहर देकर मार डाला तथा सल्तनत के प्रमुख वजीर खतीर की भी दुर्दशा कर दी।

जब कैकुबाद के पिता बुगरा खाँ को बंगाल में दिल्ली के समाचार मिले तो वह अपने पुत्र को बचाने के लिये एक सेना लेकर दिल्ली के लिये रवाना हुआ। इस पर मलिक निजामुद्दीन ने कैकुबाद को उकसाया कि वह भी सेना लेकर अपने पिता का मार्ग रोके क्योंकि उसकी नीयत ठीक नहीं है।

कैकुबाद उसकी बातों में आ गया तथा सेना लेकर अयोध्या पहुँच गया। इस पर बुगरा खाँ ने कैकुबाद को संदेश भिजवाया कि वह सुल्तान से मिलना चाहता है। इस पर मलिक निजामुद्दीन ने कैकुबाद से कहा कि वह बुगरा खाँ को संदेश भिजवाये कि बुगरा खाँ, सुल्तान के समक्ष वैसे ही जमींपोशी करे जैसे अन्य अमीर करते हैं।

मलिक निजामुद्दीन की योजना थी कि बुगरा खाँ इस शर्त को मानने से इन्कार कर देगा किंतु बुगरा खाँ अनुभवी व्यक्ति था। उसने अपने पुत्र की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। इस पर कैकुबाद के समक्ष और कोई उपाय नहीं रहा कि वह अपने पिता बुगरा खाँ से मिले।

जब बुगरा खाँ सुल्तान के समक्ष उपस्थित हुआ तो बुगरा खाँ ने अन्य अमीरों की तरह धरती पर माथा रगड़कर सुल्तान की जमींपोशी की तथा सुल्तान के पैर पकड़कर उसकी पैबोशी की। यह देखकर कैकुबाद ग्लानि से भर गया। वह तख्त से उतरकर अपने पिता के चरणों में गिर गया और रोने लगा।

बुगरा खाँ ने अपने पुत्र को भोग-विलास से दूर रहने के लिये कहा तथा भोग विलास के दुष्परिणामों के बारे में समझाया। बुगरा खाँ ने उसे यह सलाह भी दी कि वह मलिक निजामुद्दीन को उसके पद से हटा दे। कैकुबाद ने पिता की इन सारी सलाहों को मान लिया। इसके बाद बुगरा खाँ बंगाल चला गया। कैकुबाद दिल्ली आकर फिर से भोग-विलास में डूब गया। उसने मलिक निजामुद्दीन की हत्या करवाकर उससे मुक्ति पा ली। इसके बाद मलिक कच्छन और मलिक सुर्खा नामक तुर्की अमीरों ने शासन पर वर्चस्व स्थापित कर लिया।

इस पर सुल्तान ने मंगोलों के विरुद्ध लगातार युद्ध जीत रहे अपने सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली बुलवाकर उसे आरिज-ए-मुमालिक (सेना का निरीक्षक) नियुक्त किया तथा उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी। तुर्की अमीरों को सुल्तान का यह निर्णय अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे जलालुद्दीन खिलजी को तुर्क नहीं मानते थे।

इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद अत्यधिक शराब के सेवन से कैकुबाद को लकवा मार गया। इस पर तुर्की अमीरों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बैठा दिया। अब तुर्की अमीरों ने गैर-तुर्की सरदारों को जान से मार डालने की योजना बनाई। इस सूची में जलालुद्दीन खिलजी का नाम सबसे ऊपर था।

जलालुद्दीन खिलजी को तुर्की अमीरों के षड़यंत्र का पता चल गया। वह तुरंत दिल्ली से समीप, बहारपुर चला गया। तुर्की अमीरों ने उसे फिर से दिल्ली में लाने का षड़यंत्र किया। मलिक कच्छन, जलालुद्दीन खिलजी को बुलाने उसके शिविर में गया। खिलजियों ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी के पुत्र दिल्ली में घुस गये और महल में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा लाये। इस पर मलिक सुर्खा तथा अन्य तुर्की अमीरों ने उनका पीछा किया किंतु वे भी मार दिये गये।

इस घटना के कुछ दिन बाद खिलजी पुनः दिल्ली में घुसे। खलजी मलिक ने कीलूगढ़ी के महल में घुसकर लकवे से पीड़ित सुल्तान कैकूबाद को लातों से मार डाला। उसका शव एक चादर में लपेटकर यमुना नदी में फैंक दिया। इसके बाद जलालुद्दीन, शिशु सुल्तान क्यूमर्स का संरक्षक तथा वजीर बनकर शासन करने लगा।

क्यूमर्स

जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ दिनों तक परिस्थितियों का आकलन किया तथा परिस्थितियाँ अपने अनुकूल जानकर कुछ ही दिनों बाद क्यूमर्स को कारागार में पटक दिया और 13 जून 1290 को दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार भारत पर लगभग 90 वर्ष के दीर्घकालीन शासन के बाद अपमानपूर्ण ढंग से इल्बरी तुर्कों के शासन का अंत हुआ। जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ समय पश्चात् क्यूमर्स की हत्या कर दी। इसी के साथ दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का भी अंत हो गया।

गुलाम वंश का पतन : कारण

गुलाम वंश के पतन के कई कारण थे। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार से है-

(1) उत्तराधिकार के लिये संघर्ष

तुर्की शासकों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। अतः प्रत्येक सुल्तान की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिए संघर्ष आरम्भ हो जाता था। इस संघर्ष का राज्य की शक्ति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। इस संघर्ष से अमीर तथा मलिक अधिक ताकतवर बन जाते थे।

(2) स्वेच्छाचारी सैनिक शासन

गुलाम वंश के सुल्तानों के शासन का आधार स्वेच्छाचारी सैनिक शासन था जिसकी नींव सदैव निर्बल होती है। यह सैनिक अंशाति का युग था। कोई योग्य सेनापति ही साम्राज्य को सुरक्षित रख सकता था।

(3) अमीरों तथा मलिकों का कुचक्र

गुलाम वंश का शासन अमीरों के बल पर खड़ा था जो स्वयं सुल्तान बनने का अवसर ताकते रहते थे। वे बड़े ही स्वार्थी तथा महत्वाकांक्षी थे। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये षड्यन्त्र रचते रहते थे। उनकी नीयत एक सुल्तान को गद्दी से उतार कर दूसरे सुल्तान को गद्दी पर बैठाने की रहती थी जिससे सुल्तान उनके हाथों की कठपुतली बना रहे।

(4) हिन्दुुओं का विरोध

तुर्की शासन भारत में विदेशी था। हिन्दू राजवंश अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को भूले नहीं थे और उसे प्राप्त करने के लिए सदैव सचेष्ट रहते थे। वे प्रायः विद्रोह कर देते थे। फलतः हिन्दुओं की सहायता तथा असहयोग गुलाम वंश के सुल्तानों को नहीं मिल सका।

(5) मंगोलों का आक्रमण

पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। अतः उस दिशा में भी प्रान्तीय शासकों के नेतृत्व में विशाल सेनायें रखनी पड़ती थीं और उन्हें पर्याप्त स्वतन्त्रता देनी पड़ती थी। विद्रोही हाकिम इन सेनाओं का प्रयोग प्रायः सुल्तान के विरुद्ध करने लगते थे।

(6) बलबन का अयोग्य उत्तराधिकारी

बलबन ने एक केन्द्रीयभूत स्वेच्छाचारी निरंकुश शासन की स्थापना की थी। इस शासन व्यवस्था को अत्यधिक प्रतिभावान् सुल्तान ही चला सकता था। दुर्भाग्य से बलबन का उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य था। उसने तुर्की अमीरों का प्रभाव कम करने के लिये खिलजियों को दिल्ली बुलाकर भूल की। जब तुर्की सरदारों ने खिलजियों को नष्ट करने का षड़यंत्र रचा तो खिलजियों ने न केवल तुर्की अमीरों को मार डाला अपितु सुल्तान को भी मार डाला।

गुलाम वंश का सबसे बड़ा सुल्तान कौन ?

गुलाम वंश में कुल दस शासक हुए। इनमें से छः शासकों- आरामशाह, रजिया, बहरामशाह, किशलू खाँ, मसउद खाँ तथा कैकुबाद का शासन काल संक्षिप्त सिद्ध हुआ। इन समस्त सुल्तानों को निर्ममता से मारा गया। रजिया को छोड़कर शेष पाँच सुल्तान अयोग्य तथा निकम्मे थे और अमीरों के हाथों की कठपुतली बने रहे।

राज्य की वास्तविक शक्ति स्वार्थी तथा कुचक्री अमीरों के हाथ में रही। यद्यपि रजिया योग्य तथा प्रतिभाशाली सुल्तान थी परन्तु स्त्री होने के कारण वह तुर्की अमीरों की आँख की किरकरी बनी रही और अंत में उसे नष्ट कर दिया गया। उसका 3 वर्ष का शासन अशान्त तथा कलहपूर्ण ही रहा।

गुलाम वंश के शेष चार सुल्तानों- कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, नासिरुद्दीन तथा बलबन में से कुतुबुद्दीन का शासन काल केवल चार वर्ष का था। फिर भी योग्य तथा प्रतिभावान होने के कारण उसने दिल्ली सल्तनत की नींव रख दी। इस प्रकार केवल तीन शासकों- इल्तुतमिश, नासिरुद्दीन तथा बलबन के शासन काल दीर्घकालीन सिद्ध हुए।

इनमें से नासिरुद्दीन के शासन काल में अधिकांश समय शासन की वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री बलबन के हाथों में रहीं। इस प्रकार शेष दो सुल्तान इल्तुतमिश तथा बलबन ही ऐसे थे जिन्होंने न केवल दिल्ली सल्तनत पर दीर्घ काल तक शासन किया अपितु उनमें शासन करने की मौलिक प्रतिभा भी थी।

इस प्रकार हम पाते हैं कि इल्तुतमिश तथा बलबन गुलाम-वंश के अग्रण्य तथा शक्तिशाली सुल्तान थे। दोनों ही योग्य तथा प्रतिभावान व्यक्ति थे और अपने अलौकिक गुणों के कारण ही जेर खरीद गुलाम से सुल्तान के उच्च पद तक पहुँच सके थे। इन दोनों सुल्तानों में से किसका स्थान अधिक ऊँचा था, इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है।

कुछ इतिहासकार इल्तुतमिश को बलबन से उच्चतर स्थान प्रदान करते हैं और उसे गुलाम वंश का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान मानते हैं परन्तु अन्य इतिहासकार बलबन को उच्च स्थान प्रदान करते हैं और उसे गुलाम वंश के सुल्तानों में श्रेष्ठतम मानते हैं।

क्या इल्तुतमिश सबसे महान सुल्तान था ?

जो इतिहासकार इल्तुतमिश को बलबन से श्रेष्ठतर मानते हैं, वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1) इल्तुतमिश की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ बलबन की प्रारम्भिक कठिनाइयों से अधिक भंयकर थीं। इल्तुतमिश को आरामशाह के विफल हो जाने पर अमीरों द्वारा सुल्तान बनाया गया था। उसे जो साम्राज्य मिला था वह विश्ंृखलित हो गया था। अतः इल्तुतमिश को वास्तव में एक नये साम्राज्य का निर्माण करना पड़ा था जबकि बलबन नासिरुद्दीन के जीवन काल से ही दिल्ली का वास्तविक शासक बन गया था। तख्त पर बैठने के समय उसे सुदृढ़़, सुसंगठित तथा विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था।

(2) इल्तुतमिश तथा बलबन दोनों को बार-बार विद्रोहियों का सामना करना पड़ा था परन्तु इल्तुतमिश की मुसबीतें अधिक बड़ी थीं जबकि बलबन के साधन इल्तुतमिश के साधनों से कहीं अधिक प्रचुर थे।

(3) इल्तुतमिश में बलबन से कहीं अधिक सैनिक गुण थे। विजय के जिस कार्य को ऐबक ने आरम्भ किया था उसे इल्तुतमिश ने पूरा किया और लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत में तुर्कों की सत्ता को स्थापित कर दिया। इसके विपरीत बलबन विद्रोहों का दमन करने में ही संलग्न रहा।

(4) इल्तुतमिश ने चालीस अमीरों के दल को संगठित करके तुर्की राज्य को मजबूती दी परन्तु बलबन ने इस दल को ध्वस्त करके तुर्की राज्य की जड़ों को हिला दिया।

(5) इल्तुतमिश ने खलीफा से मान्यता प्राप्त करके भारत में मुस्लिम राज-संस्था को नैतिक बल दिलवाया परन्तु बलबन ने उसके विरुद्ध आचरण किया था।

(6) इल्तुतमिश द्वारा जमाया गया तुर्की शासन, उसकी मृत्यु के 54 वर्ष बाद तक चलता रहा जबकि बलबन के मरने के बाद यह शासन केवल 3 वर्ष ही चल पाया।

उपरोक्त तर्कांे के आधार पर इतिहासकारों ने इल्तुतमिश को बलबन की अपेक्षा ऊँचा स्थान दिया है और उसे गुलाम वंश का सबसे बड़ा सुल्तान माना है।

क्या बलबन इल्तुतमिश से अधिक महान था ?

जो इतिहासकार बलबन को उच्चतर स्थान प्रदान करते हैं वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1) यह ठीक है कि बलबन ने कोई नया क्षेत्र नहीं जीता और न ही उसने राज्य का विस्तार किया परन्तु उसने साम्राज्य के संगठन का महत्वपूर्ण कार्य किया जिसकी आवश्यकता नये राज्य जीतने से अधिक थी।

(2) बलबन ने चालीस गुलामों के दल को नष्ट करके साम्राज्य को निर्बल नहीं बनाया था क्योंकि उसने उस समय इनका दमन किया जब वे साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गये थे। उसने सुल्तान के प्रति वफादार अमीरों का संगठन बनाकर दिल्ली की सल्तनत को पतनोन्मुख होने से बचाया था।

(3) उलेमा लोग राजनीति में हस्तक्षेप करके दरबार में षड़यंत्रों को बढ़ावा देते थे। इल्तुतमिश उन्हें राजनीति से अलग करने का साहस नहीं कर सका। यह कार्य करने का साहस बलबन ने ही किया।

(4) इल्तुतमिश तथा बलबन दोनों के समय, मंगोलों के आक्रमण होते रहे। इल्तुतमिश ने उनका सामाना करने के लिये तात्कालिक उपाय किये तथा उन्हें भारत की सीमा से बाहर रखा। इसके विपरीत बलबन ने निश्चित सीमा-नीति का अनुसरण किया जिसे उसके बाद के सुल्तानों ने भी जारी रखा। उसने सीमान्त प्रदेश में दुर्ग बनवाये और उनमें योग्य सेनापतियों के नेतृत्व में सेनाएँ तैनात कीं।

(5) बलबन का राजनीतिक दृष्टिकोण इल्तुतमिश से कहीं अधिक ऊँचा था। बलबन उलेमा तथा अमीरों के प्रभाव में नहीं था। वह राजनीति को धर्म से अलग करना चाहता था। जबकि इल्तुतमिश न तो उलेमाओं तथा अमीरों के प्रभाव से ही अपने को मुक्त रख सका और न राजनीति को ही धर्म से अलग कर सका।

(6) इल्तुतमिश प्रधानतः एक विजेता था अतः उसके शासन काल में संस्कृति की वैसी उन्नति नहीं हुई जैसी बलबन के शासनकाल में हुई। बलबन का दरबार जितना शानदार और गौरवपूर्ण था, वैसा दरबार इल्तुतमिश का तो क्या, गुलाम वंश के किसी अन्य सुल्तान का नहीं था।

(7) यद्यपि दोनों ने विदेशियों को आश्रय प्रदान किया था परन्तु विदेशों में जो ख्याति बलबन ने प्राप्त की थी वह इल्तुतमिश ने नहीं की थी।

(8) इल्तुतमिश की मृत्यु के उपरान्त उसके वंशजों ने कई पीढ़ियों तक उसके साम्राज्य का उपभोग किया और बलबन के मरने के थोड़े ही दिनों बाद उसका राज्य अन्य वंश के अधिकार में चला गया परन्तु इस दुर्भाग्य का पूरा उत्तरदायित्व बलबन के अयोग्य उत्तराधिकारियों पर पड़ना चाहिये।

उपर्युक्त तर्कों द्वारा इतिहासकारों ने बलबन को इल्तुतमिश से उच्चतर स्थान प्रदान किया है और उसे गुलाम वंश का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान सिद्ध करने का प्रयास किया है।

निष्कर्ष

उपरोक्त दोनों ही मतों में सत्य का बहुत बड़ा अंश विद्यमान है और दोनों ही मत तर्कपूर्ण तथा सारगर्भित प्रतीत होते हैं। अतः इस समस्या का सामधान मध्यम मार्ग अपनाकर किया जा सकता है। वास्तव में इन दोनों सुल्तानों ने भिन्न-भिन्न कालों तथा परिस्थितियों में शासन किया था और दोनों में भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतिभा थी अतः दोनों के कार्य भी भिन्न-भिन्न प्रकार के थे।

दोनों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुकूल नीतियों का अनुसरण किया। दोनों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों तथा प्रतिभाओं के बल पर दीर्घकाल तक सफलतापूर्वक शासन किया। यदि कुछ क्षेत्रों में इल्तुतमिश ने बलबन से अधिक श्लाघनीय कार्य किये तो अन्य क्षेत्रों में बलबन के कार्य इल्तुतमिश से कहीं अधिक श्रेयस्कर थे।

सामान्यतः दोनों ही के कार्य प्रंशसनीय थे। दोनों ही इस्लाम के नियमों के अनुसार सदाचारी थे और प्रजा के समक्ष अपने आचरण की उच्चता का आदर्श प्रस्तुत कर सके थे। दोनों ही सुल्तान अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति न्याय-प्रिय थे इस कारण दोनों समान रूप से प्रशंसा के पात्र हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

सुल्तान इल्तुतमिश – दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

इल्तुतमिश के वंशज

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन

गुलाम वंश का पतन

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

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सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी - www.bharatkaitihas.com
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी - खिलजी वंश का संस्थापक

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी खिलजी वंश का संस्थापक था। उसने अपने पूर्ववर्ती शिशु सुल्तान क्यूमर्स की हत्या करके दिल्ली सल्तनत पर अधिकार किया।

खिलजी वंश

कैकूबाद के तुर्की अमीरों ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को मारने का षड़यंत्र इसलिये रचा था क्योंकि वह जलालुद्दीन खिलजी तुर्क नहीं था। तत्कालीन इतिहासकारों निजामुद्दीन अहमद, बदायूंनी तथा फरिश्ता ने खिलजियों के वंश की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग बातें लिखी हैं। तारीखे फखरुद्दीन मुबारकशाही के लेखक फखरुद्दीन ने 64 तुर्की कबीलों की एक सूची दी है जिसमें खिलजी कबीला भी सम्मिलित है।

विन्सेट स्मिथ के विचार में खिलजी लोग अफगान अथवा पठान थे परन्तु यह धारणा सर्वथा अमान्य हो गई है। सर हेग के विचार में खिलजी मूलतः तुर्क थे परन्तु बहुत दिनों से अफगानिस्तान के गर्मसीर प्रदेश में रहने के कारण उन्होंने अफगान रीति-रिवाजों को ग्रहण कर लिया था। इसी से भारतीय तुर्क उन्हें तुर्क मानने के लिए तैयार नहीं थे।

हिस्ट्री ऑफ खिलजीज के लेखक डॉ. के. एस. लाल ने इस्लामी इतिहासकारों की बातों का निष्कर्ष निकालते हुए यह मत प्रस्तुत किया है कि खिलजी भी तुर्की थे जो 10वीं शताब्दी के पहले, तुर्किस्तान से आकर अफगानिस्तान के खल्ज प्रदेश में बस गये थे। उन्होंने अफगानी रीति रिवाजों को अपना लिया था।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यही मानना उचित प्रतीत होता है कि खिलजी मूलतः तुर्क थे जो कालान्तर में तुर्किस्तान से चलकर अफगानिस्तान की हेलमन्द घाटी तथा लमगाम प्रदेश के गर्मसीर क्षेत्र में आकर बस गये थे। दो सौ साल तक अफगानिस्तान में रहने के कारण उनका रहन-सहन पठानों के जैसा हो गया। अफगानिस्तान में खल्ज नामक गाँव के नाम से से वे खिलजी कहलाये। अधिकांश भारतीय इतिहासकारों की भांति लगभग समस्त विदेशी इतिहासकारों ने भी खिलजियों को तुर्क माना है।

खिलजियों का भारत में प्रवेश

भारत में आने वाले अधिकांश खिलजी या तो तुर्क आक्रांताओं के साथ उनके सैनिकों के रूप में आये थे या फिर मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर उन्हें अफगानिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा था और उन्होंने तुर्की अमीरों तथा सुल्तानों की सेवा करना स्वीकार कर लिया था।

सुल्तान जलालुद्दीन फीरोज खिलजी

भारत में खिलजी राजवंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी 70 वर्ष की आयु में 1290 ई. में दिल्ली के तख्त पर बैठा। इससे पहले वह अनेक वर्षों तक बलबन तथा कैकुबाद के लिये कार्य करता रहा था। उसका राजगद्दी संभालना मामलुक राजवंश (गुलाम वंश) के अंत और तुर्क गुलाम अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व का द्योतक था।

जलालुद्दीन खिलजी एक कट्टर मुसलमान था जो मुजाहिद-ए-सबीलिल्लाह (अल्लाह की राह में संघर्षरत) के रूप में स्वीकारा जाना चाहता था। वह भारत में इस्लामिक नियम एवं कानून लागू करने में अपनी असमर्थता को लेकर दुखी रहता था।

जलालुद्दीन खिलजी को इस बात का दुख था कि- ‘हम सुल्तान महमूद से अपनी तुलना नहीं कर सकते…… हिन्दू…… हर दिन मेरे महल के नीचे से गुजरते हैं, अपने ढोल और तुरही बजाते हुए और यमुना नदी में जाकर मूर्ति पूजा करते हैं।’

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का प्रारम्भिक जीवन

जलालुद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम मलिक फीरोज खिलजी था। वह ‘खिलजी’ कबीले का तुर्क था। जलालुद्दीन का कुटुम्ब भारत चला आया और दिल्ली के सुल्तानों के यहाँ नौकरी करने लगा। जलालुद्दीन ने सर्वप्रथम नासिरूद्दीन महमूदशाह अथवा बलबन के शासन काल में सेना में प्रवेश किया था।

बलबन के जिन सेनापतियों को सीमा प्रदेश की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था उनमें से जलालुद्दीन भी एक था। कैकुबाद के शासनकाल में जलालुद्दीन शाही अंगरक्षकों के अध्यक्ष के उच्च पद पर पहुँच गया। बाद में वह समाना का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया। वह योग्य सेनापति था।

सीमान्त प्रदेश में कई बार उसने मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार उसने सैनिक तथा शासक दोनों रूपों में ख्याति प्राप्त कर ली थी। इसलिये कैकुबाद ने उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी। जब सेना-मंत्री मलिक तुजाकी की मृत्यु हो गई तो कैकुबाद ने उसे सेना-मंत्री के उच्च पद पर नियुक्त कर दिया।

दिल्ली दरबार में मंत्री होने के साथ-साथ वह समस्त भारत में बिखरे हुए विशाल खलजी कबीले का प्रमुख भी था। इस कबीले के लोग इख्तियारुद्दीन-बिन-बख्तियार खिलजी के समय बंगाल में शासन कर चुके थे। जब कैकुबाद को लकवा हो गया तब तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी की हत्या का षड़यंत्र रचा। इस पर जलालुद्दीन दिल्ली में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा ले गया।

जब तुर्की अमीरों ने उसका पीछा किया तो खिलजियों ने तुर्की अमीरों को मार डाला। कुछ दिन बाद जब खिलजियों ने कैकुबाद के महल में घुसकर उसे लातों से मार डाला तब जलालुद्दीन, क्यूमर्स को दिल्ली ले आया तथा उसका संरक्षक बनकर शासन करने लगा। कुछ ही दिन बाद जलालुद्दीन ने शिशु सुल्तान क्यूमर्स को कारागार में डाल दिया तथा स्वयं दिल्ली का स्वतंत्र सुल्तान बन गया।

सुल्तान जलालुद्दीन का राज्यारोहण

13 जून 1290 को जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी की उपाधि धारण करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उस समय उसकी आयु 70 वर्ष की थी। तुर्की अमीरों के उत्पात से बचने के लिये वह दिल्ली की बजाय कीलूगढ़ी अथवा किलोखरी में तख्त पर बैठा और उसी को अपनी राजधानी बनाया। यहाँ पर उसने कैकुबाद के अपूर्ण भवन को पूर्ण करवाया और उसी में रहने लगा।

सुल्तान जलालुद्दीन की गृह-नीति

सुल्तान बनने के बाद जलालुद्दीन ने दिल्ली के उन अमीरों का विश्वास जीतने का प्रयास किया जिन्होंने खिलजियों का विरोध नहीं किया था। इसलिये उसने शासकीय पदों पर खिलजियों के साथ-साथ अन्य मुसलमानों को भी नियुक्त किया। इससे वह बहुत से तुर्की अमीरों का प्रिय विश्वासपात्र बन गया।

दिल्ली के कोतवाल ने उसे किलोखरी से दिल्ली आने के लिए आमन्त्रित किया। सुल्तान ने उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया और दिल्ली आकर वहीं से शासन का संचालन आरम्भ किया। उसके समय दिल्ली में घटी प्रमुख घटनायें इस प्रकार से हैं-

(1) मलिक छज्जू का विद्रोह

मलिक छज्जू बलबन का भतीजा था। जलालुद्दीन ने उसे सन्तुष्ट करने के लिये कड़ा मानिकपुर का हाकिम बना दिया। मलिक छज्जू ने चुपचाप सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और राजभक्ति प्रदर्शित करने लगा किंतु असन्तुष्ट तुर्क सरदारों ने उसे विद्रोह करने के लिए उकसाया।

दूसरी ओर युवा खिलजी भी सुल्तान की इस नीति से अंसतुष्ट थे कि सुल्तान अन्य मुसलमानों को भी शासन में ऊँचे पद दे रहा था। इन परिस्थितियों में मलिक छज्जू ने विद्रोह का झंडा खड़ा करके स्वयं को स्वतन्त्र सुल्तान घोषित कर दिया। उसने अपना राज्याभिषेक करवाया, अपने नाम की मुद्रायें अंकित करवाईं।

उसने ‘मुगीसुद्दीन’ उपाधि धारण की तथा अपने नाम में खुतबा पढ़वाया। इसके बाद अपने पूर्वजों का सिहांसन प्राप्त करने के लिए एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर दिया। जब जलालुद्दीन खिलजी को मलिक छज्जू के विद्रोह की सूचना मिली तब उसने भी एक विशाल सेना के लेकर उसका सामना किया।

इस युद्ध में मलिक छज्जू परास्त हो गया। उसे तथा उसके साथियों को बन्दी बनाकर सुल्तान के समक्ष उपस्थित किया गया। जलालुद्दीन खिलजी ने विद्रोहियों को कठोर दण्ड देने के स्थान पर उसके साथ अतिथियों का सा व्यवहार किया। मलिक छज्जू तथा उसके साथियों को बन्धन-मुक्त करके उनके वस्त्र बदलवाये तथा उन्हें मदिरा-पान करवाया।

इसके बाद उन्हें भविष्य में विद्रोह न करने का उपदेश देकर सुल्तान ने उन्हें क्षमा कर दिया तथा उन्हें कोई सजा नहीं दी। सुल्तान के निर्देश पर मलिक छज्जू को नजरबन्द करके दिल्ली में ही रखा गया और उस पर कड़ा पहरा बैठा दिया गया जबकि अन्य प्रमुख विद्रोहियों को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया। कड़ा मानिकपुर का शासन किसी अन्य अमीर को सौंप दिया गया। सुल्तान की इस उदारता की तीव्र आलोचना की गई।

(2) डाकुओं तथा ठगों के साथ उदार व्यवहार

जलालुद्दीन ने डाकुओं तथा ठगों के साथ भी वही व्यवहार किया जो उसने विद्रोहियों के साथ किया था। जब हजारों डाकू पकड़कर सुल्तान के सामने उपस्थित किये गये तो सुल्तान ने उन्हें कठोर दण्ड देने के स्थान पर उन्हें चोरी की बुराइयों पर उपदेश दिया। सुल्तान ने उन्हें चेतावनी दी कि फिर कभी ऐसा निकृष्ट कार्य न करें और उन्हें नावों में बैठाकर बंगाल भेज दिया।

(3) सुल्तान की उदार नीति का विरोध

सुल्तान की उदार नीति की सर्वत्र आलोचना होने लगी। उसकी उदारता को उसकी दुुर्बलता समझा गया। तुर्की अमीर तो पहिले से ही उससे असंतुष्ट थे, अब खिलजी अमीर भी उससे अप्रसन्न हो गये।

(4) सीदी मौला का षड़यंत्र

सीदी मूलतः फारस से आया हुआ एक दरवेश था जो 1291 ई. में दिल्ली चला आया और दिल्ली में ही स्थायी रूप से निवास कर रहा था। सीदी के गुरु ने उसे राजनीति से दूर रहने का उपदेश दिया था परन्तु भारत आने पर उसकी रुचि दिल्ली की राजनीति में उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई।

सीदी के धार्मिक उपदेशों के कारण सहस्रों व्यक्ति उसके शिष्य बन गये। बड़े-बड़े अमीर भी उसके यहाँ आने लगे। कहा जाता है कि उसने एक खानकाह बनवाई थी जिसमें सहस्रों व्यक्तियों को प्रति दिन मुफ्त भोजन मिलता था। लोगों में सीदी के आय के साधनों के बारे में तरह-तरह की बातें होती थीं।

कुछ लोग उसे डाकुओं तथा लुटेरों का सरदार समझते थे। जब दिल्ली में उसके चाहने वालों की संख्या बढ़ गई तो सीदी ने राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के लिये षड्यन्त्र रचना आरम्भ किया। यह तय किया गया कि शुक्रवार की नमाज के बाद सुल्तान को खत्म कर दिया जाये तथा सीदी को खलीफा घोषित कर दिया जाये।

सुल्तान को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने सीदी को पकड़वा कर दरबार में बुलवाया। जब सीदी को सुल्तान के सामने लाया गया तब सीदी ने किसी भी षड़यंत्र में शामिल होने की बात से इन्कार कर दिया तथा सुल्तान से विवाद करना आरम्भ कर दिया। इस पर जलालुद्दीन को क्रोध आ गया और चिल्लाकर बोला- ‘यहाँ कोई नहीं है जो इस दुष्ट को ठीक कर दे।’

इतना सुनते ही एक व्यक्ति ने सीदी को छुरा भोंक दिया। छुरा लगने पर भी उसके प्राण नहीं निकले। इस पर अर्कली खाँ ने उसे हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया।

कहा जाता है कि जिस दिन सीदी को मारा गया, उस दिन दिल्ली में ऐसा भयानक तूफान आया कि दिन में ही रात्रि हो गई। उसके बाद आगामी ऋतु में वर्षा न होने से भयानक अकाल पड़ गया। कुछ समय उपरान्त सुल्तान की भी नृशंसता पूर्वक हत्या कर दी गई।

सुल्तान जलालुद्दीन के सैनिक अभियान

जलालुद्दीन खिलजी की युद्ध नीति भी उसकी गृहनीति की भाँति अत्यन्त दुर्बल थी। वह सैनिकों का रक्तपात नहीं करना चाहता था। वह मुसलमान सैनिकों का जीवन, हिन्दुओं के किलों से अधिक मूल्यवान समझता था। तख्त पर बैठने के बाद उसने एक-दो आक्रमण किये परन्तु उसे विशेष सफलता नहीं मिली। जलालुद्दीन के शासन काल में दिल्ली की सेनाओं ने निम्नलिखित अभियान किये-

(1) रणथम्भौर के विरुद्ध असफल अभियान

सुल्तान जलालुद्दीन का पहला आक्रमण 1291 ई. में रणथम्भौर पर हुआ। सुल्तान ने स्वयं इस युद्ध का संचालन किया। सबसे पहले उसने झाईं पर आक्रमण करके उस पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसके बाद उसने अपनी सेना के एक हिससे को मालवा की ओर भेजा जिसने लूटमार करके पर्याप्त धन प्राप्त कर लिया।

अब सुल्तान ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया। राजपूत अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़ सकंल्प थे। उन्होंने बड़ी वीरता से तुर्कों का सामना किया। राजपूतों की दृढ़़ता तथा दुर्ग की अभेद्यता से हताश होकर सुल्तान ने रणथम्भौर विजय का विचार त्याग दिया और दिल्ली लौट आया। इस असफलता से सुल्तान की प्रतिष्ठा को धक्का लगा परन्तु सुल्तान ने अपनी असफलता को यह कह कर टाल दिया कि उसके मुसलमानों के सिर का प्रत्येक बाल, रणथम्भौर जैसे सौ दुर्गों से अधिक मूल्यवान था।

(2) मण्डोर पर आक्रमण

सुल्तान का दूसरा आक्रमण मण्डोर पर हुआ। मण्डोर का राज्य पहले दिल्ली की सल्तनत के अधीन था परन्तु बाद में राजपूतों ने उस पर अपना अधिकार कर लिया। 1292 ई. में जलालुद्दीन ने उसे फिर अपने अधिकार में कर लिया।

(3) मंगोलों का दमन

1292 ई. में डेढ़ लाख मंगोलों ने हुलागू खाँ के पौत्र अब्दुल्ला के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। जलालुद्दीन ने भी एक विशाल सेना के साथ पश्चिमोत्तर सीमा की ओर प्रस्थान किया। मंगोल-सेना ने सिन्धु नदी के पश्चिमी तट पर पड़ाव डाल रखा था। सुल्तान की सेना नदी के पूर्वी तट पर आ डटी। मंगोलों की सेना ने नदी पार करके दिल्ली की सेना पर आक्रमण करने का प्रयास किया परन्तु सुल्तान जलालुद्दीन ने अत्यन्त दु्रतगति से उस पर आक्रमण करके उसे परास्त कर दिया। सहस्रों मंगोलों को बन्दी बना लिया गया।

मंगोलों को दिल्ली के निकट बसने की अनुमति

मंगोलांे का सरदार अब्दुल्ला अपने अधिकांश मंगोल सैनिकों के साथ अपने देश को लौट गया परन्तु चंगेज खाँ के पौत्र उलूग खाँ तथा कई अन्य मंगोल सरदारों ने जलालुद्दीन की नौकरी करना स्वीकार करके इस्लाम स्वीकार कर लिया तथा बहुत से मंगोल सैनिकों के साथ दिल्ली के निकट बस गये। यह स्थान मंगोलपुरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ये लोग नव-मुस्लिम कहलाने लगे।

सुल्तान ने अपनी कन्या का विवाह उलूग खाँ के साथ कर दिया। मंगोल सरदार के साथ अपनी कन्या का विवाह करके सुल्तान ने दिल्ली सल्तनत की प्रतिष्ठा को बहुत ठेस पहुँचाई। मंगोलों को राजधानी के निकट बसाना भी सल्तनत के लिये अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ क्योंकि मंगोलपुरा षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों का केन्द्र बन गया।

अलाउद्दीन को सैनिक अभियानों की कमान

1192 ई. में मंगोलो को परास्त करने के बाद जलालुद्दीन खिलजी ने किसी भी सैनिक अभियान का नेतृत्व नहीं किया। इसके बाद के सारे सैनिक अभियान उसके भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन के नेतृत्व में हुए।

(1) मालवा पर आक्रमण

1292 ई. में सुल्तान की आज्ञा से अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण किया। अलाउद्दीन ने भिलसा पर अधिकार कर लिया और वहाँ के मन्दिरों तथा सेठ-साहूकारों को लूटकर अपार धन एकत्रित कर लिया। इस धन को लेकर वह दिल्ली लौट आया और समस्त धन सुल्तान को भेंट कर दिया। सुल्तान ने प्रसन्न होकर कड़ा के साथ-साथ अवध की भी जागीर उसे दे दी और उसे आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त कर दिया।

(2) देवगिरी पर आक्रमण

मालवा में अलाउद्दीन को जो सफलता प्राप्त हुई, उससे उसका उत्साह बहुत बढ़ गया। भिलसा में ही उसने देवगिरी के यादव राज्य की अपार सम्पत्ति के विषय में सुना था। उसने इस राज्य की विशाल सम्पत्ति के लूटने का निश्चय किया परन्तु अपने ध्येय को किसी पर प्रकट नहीं होने दिया।

उसने सुल्तान से चन्देरी पर आक्रमण करने की आज्ञा तथा सैनिकों को भर्ती करने की अनुमति प्राप्त कर ली। उसका वास्तविक उद्देश्य देवगिरी पर ही आक्रमण करना था। 1294 ई. में एक विशाल सेना के साथ अलाउद्दीन ने दक्षिण के लिए प्रस्थान कर दिया। वह अत्यन्त दु्रतगति से चलता हुआ एलिचपुर पहुँचा तथा उस पर आक्रमण कर दिया।

इसके थोड़े ही दिन बाद उसने देवगिरी पर आक्रमण कर दिया। देवगिरि के राजा रामचन्द्र को अलाउद्दीन की गतिविधियों की कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिये उसने अपने राज्य की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। अलाउद्दीन ने जब देवगिरि पर आक्रमण किया तब यह भी झूठी खबर चारों ओर फैला दी कि सुल्तान भी 20,000 सैनिकों की सेना के साथ आ रहा है।

इससे रामचन्द्र और अधिक आतंकित हो उठा। उसने अपनी राजधानी से 12 मील दूर लसूरा नामक स्थान पर अलाउद्दीन का सामना किया। उसने स्वयं को लूूसरा के दुर्ग में बन्द कर लिया और अपने पुत्र शंकर देव, जो दक्षिण विजय अभियान पर था, के पास सूचना भेजी कि वह शीघ्रातिशीघ्र देवगिरि लौट आये।

इधर उसने अलाउद्दीन से सन्धि की भी बातचीत आरम्भ कर दी। अन्त में यह निश्चित हुआ कि रामचन्द्र एक निश्चित धनराशि देगा और अलाउद्दीन कैदियों को मुक्त करके दिल्ली लौट जायेगा। जिस समय आलाउद्दीन लूट का माल लेकर दिल्ली के लिए प्रस्थान कर रहा था कि शंकरदेव अपनी सेना के साथ दक्षिण से आ गया।

उसने अलाउद्दीन के पास कहला भेजा कि वह लूट का माल दे दे और दिल्ली लौट जाये। अलाउद्दीन ने शंकरदेव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। उसने नसरत खाँ को दुर्ग पर घेरा डालने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना लेकर शंकरदेव पर आक्रमण कर दिया। शंकरदेव परास्त हो गया।

अब दुर्ग का घेरा जोरों के साथ आरम्भ हुआ। जब रामचन्द्र को यह ज्ञात हुआ कि दुर्ग के जिन बोरों में वह अन्न भरा हुआ समझ रहा था उनमें तो नमक भरा है, तब रामचंद्र का साहस भंग हो गया और उसने अलाउद्दीन से सन्धि कर ली। इस बार उसे पहले से अधिक कठोर शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं।

फरिश्ता के अनुसार, अलाउद्दीन को छः सौ मन सोना, सात मन मोती, दो मन हीरा, पन्ना, लाल, पुखराज, एक हजार मन चाँदी, चार हजार रेशम के थान तथा अन्य असंख्य बहुमूल्य वस्तुऐं दी गईं। बरार में एलिचपुर का प्रान्त भी अलाउद्दीन को मिल गया। राजा ने वार्षिक कर भी अलाउद्दीन के पास भेजने का वचन दिया।

अलाउद्दीन खिलजी की गद्दारी

जब अलाउद्दीन, सुल्तान को बताये बिना देवगिरि का अभियान कर रहा था, उस समय सुल्तान ग्वालियर में था। उसे अलाउद्दीन के इस गुप्त अभियान की सूचना मिल गई। इस पर सुल्तान के अमीरों ने सुल्तान को सलाह दी कि वह अलाउद्दीन का मार्ग रोककर उससे लूट का माल छीन ले किंतु सुल्तान ने ऐसा करने से मना कर दिया और दिल्ली चला गया।

सुल्तान को आशा थी कि पहले की भाँति इस बार भी अलाउद्दीन लूट की सम्पूर्ण सम्पत्ति लेकर, सुल्तान की सेवा में उपस्थित होगा और उसे समर्पित कर देगा परन्तु इस बार अलाउद्दीन ने ऐसा न करके लूट की अपार सम्पत्ति लेकर कड़ा की ओर प्रस्थान किया। सुल्तान ने अमीरों की एक सभा की और उनसे परामर्श लिया।

सुल्तान के शुभचिन्तकों ने उसे समझाया कि अलाउद्दीन बड़ा ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति है। उसकी दृष्टि तख्त पर लगी है। अतः कठोर नीति का अनुसरण करने की आवश्यकता है। उसे एक विशाल सेना लेकर अलाउद्दीन के विरुद्ध अभियान करना चाहिये तथा उससे सारी सम्पत्ति छीन लेनी चाहिये।

सुल्तान के चाटुकार अमीरों ने इसके विपरीत सलाह दी तथा सुल्तान को समझाया कि यदि उसने ऐसा किया तो अलाउद्दीन तथा उसके साथी आतंकित होकर इधर-उधर भाग जायेंगे जिससे सारा धन तितर-बितर हो जायेगा। सुल्तान को इन चाटुकारों की सलाह पसन्द आयी और उसने इसी को व्यवहार में लाने का निश्चय किया।

अलाउद्दीन, सुल्तान की दुर्बलताओं से भली-भांति परिचित था। उसने सुल्तान के पास एक पत्र भेजा जिसमें अपने अपराध को स्वीकार किया और प्रार्थना की कि यदि उसे अभयदान मिल जायगा तो लूट की सम्पत्ति के साथ वह सुल्तान की सेना में उपस्थित होगा। सुल्तान अपनी उदारता के वशीभूत था।

उसने अलाउद्दीन के पास क्षमादान भेज दिया। अलाउद्दीन ने सूचना वाहकों को वापस दिल्ली नहीं लौटने दिया। इस पर भी सुल्तान की आँखें नहीं खुलीं। अब अलाउद्दीन ने अपने भाई असलम बेग के पास एक पत्र भेजा जिसमें उसने लिखा कि वह इतना आतंकित हो गया है कि दरबार में जाकर सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का साहस नहीं हो रहा है।

उसका हृदय क्षोभ से इतना संतप्त है कि वह आत्महत्या करने के लिये उद्यत है। उसकी रक्षा का एकमात्र उपाय यही है कि सुल्तान स्वयं कड़ा आकर उसे क्षमा कर दे। जब असलम बेग ने सुल्तान को यह पत्र दिखाया तब सुल्तान ने उससे कहा कि वह तुरन्त कड़ा जाकर अलाउद्दीन को आश्वासन दे। सुल्तान ने स्वयं भी कड़ा जाने का निश्चय कर लिया।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या

जब अलाउद्दीन ने सुना कि सुल्तान सेना लेकर आ रहा है तो उसने लूट की सारी सम्पत्ति के साथ बंगाल भाग जाने की योजना बनाई परन्तु जब उसे यह ज्ञात हुआ कि सुल्तान केवल एक हजार सैनिकों के साथ आ रहा है तब उसने बंगाल जाने का विचार त्याग दिया। उसने गंगा नदी को पार किया और दूसरे तट पर अपनी सेना को एकत्रित कर लिया।

इसके बाद उसने असलम बेग को सुल्तान का स्वागत करने के लिए भेजा। असलम बेग ने सुल्तान को सरलता से अलाउद्दीन के जाल में फँसा लिया। उसके कहने से सुल्तान ने अपने सैनिकों को पीछे छोड़ दिया और केवल थोड़े से अमीरों के साथ अलाउद्दीन से मिलने के लिए आगे बढ़ा। सुल्तान अपने भतीजे के  स्नेह में अंधा हो गया।

उसने अलाउद्दीन को निःशंक बनाने के लिये अपने अमीरों के शस्त्र गंगा नदी में फिकवा दिये। अलाउद्दीन ने सुल्तान का स्वागत किया। सुल्तान ने उसे गले लगा लिया। जब सुल्तान जलालुद्दीन, अलाउद्दीन का आंलिगन करके अपनी नाव की ओर लौट रहा था, तब मुहम्मद सलीम नामक व्यक्ति ने सुल्तान को छुरा मार दिया। सुल्तान घायल होकर नाव की ओर भागा परन्तु एक दूसरे व्यक्ति ने उसे धरती पर गिराकर उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार जलालुद्दीन खिलजी की जीवन-लीला समाप्त हो गई।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का चरित्र एवं मूल्यांकन

जियाउद्दीन बरनी का ग्रंथ तारीखे-फीरोजशाही एकमात्र उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत है जिसके माध्यम से जलालुद्दीन खिलजी के शासनकाल की घटनाओं की जानकारी मिलती है। जियाउद्दीन बरनी, जलालुद्दीन खिलजी का घनघोर आलोचक था क्योंकि जलालुद्दीन खिलजी एक उदार शासक था। उसने उन्हीं घटनाओं को अपने ग्रंथ में लिखने का प्रयास किया जो जलालुद्दीन की नीतियों को असफल घोषित करने के लिये लिये पर्याप्त हैं।

जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने उदार निरकंुशवाद के आदर्श को अपनाया। वह सफल सेनानायक था और एक शक्तिशाली सेना उसके अधिकार में थी। फिर भी उसने सैनिकवादी नीति को त्याग दिया। इस पर भी उसने डेढ़ लाख मंगोलों की सेना को परास्त करके अपनी सामरिक क्षमता का परिचय दिया।

वह अपनी उदार नीति के माध्यम से दरबार तथा राज्य के समस्त वर्गों के लोगों को संतुष्ट रखना चाहता था। उसने बलबन तथा उसके वंशजों के अनुयायी तुर्क अमीरों को महत्वपूर्ण पदों पर बने रहने दिया। उसने पूर्ववर्ती सुल्तानों के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करते हुए बलबन के महल के चौक में घोड़े पर सवार होने से मना कर दिया।

उसने सुल्तान के पुराने सिंहासन पर बैठने से भी इसलिये मना कर दिया क्योंकि वह अनेक बार सेवक के रूप में इस सिंहासन के सम्मुख खड़ा हो चुका था। जलालुद्दीन खिलजी ने जब विद्रोही मलिक छज्जू को बेड़ियों में बंधे हुए देखा तो जलालुद्दीन खिलजी रो पड़ा।

मुसलमानों के प्रति वह अत्यंत उदार था किंतु हिन्दुओं के प्रति पूरी तरह अनुदार था। उसने झैन में मंदिरों को तोड़ा तथा अपवित्र किया और देव-मूर्तियों को नष्ट किया। जलालुद्दीन ने हिन्दू सामन्तों के विरुद्ध इसलिये कोई विशेष कार्यवाही नहीं की क्योंकि वह मुसलमान सैनिकों का रक्तपात होते हुए नहीं देखना चाहता था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

चार वर्ष के संक्षिप्त शासन काल में जलालुद्दीन खिलजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने जीर्ण हो चले इल्बरी तुर्कों के शासन को नष्ट करके दिल्ली सल्तनत में नये राजवंश की नींव रखी। उसकी दूसरी उपलब्धि यह कही जा सकती है कि उसने शासन में उदारवादी तत्वों का समावेश करके सबको राहत देने का प्रयास किया। उसकी तीसरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने मंगालों के एक बड़े समूह को इस्लाम का अनुयायी बनाकर उन्हें अपनी सेवा में रख लिया था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की भूलें

निःसंदेह जलालुद्दीन खिलजी विशाल साम्राज्य का संस्थापक था। उसने वृद्धावस्था में जिस अदम्य साहस का परिचय देकर खिलजी वंश की नींव रखी, वह उसकी सफलता का प्रमाण है किंतु विशाल साम्राज्य के शासक के रूप में उसने कई भलें कीं। उसकी सबसे बड़ी भूल यह थी कि वह उस विश्वासघाती युग में भी सबका विश्वास कर लेता था तथा समान धर्म के शत्रुओं के प्रति उदारता दिखाता था।

उसने मंगालों को दिल्ली के निकट बसने की अनुमति प्रदान की। कालांतर में ये मंगोल, दिल्ली सल्तनत में षड़यंत्रों एवं कुचक्रों का केन्द्र बन गये। जलालुद्दीन की दूसरी सबसे बड़ी भूल अलाउद्दीन के विरुद्ध समय रहते कार्यवाही नहीं करना तथा उस पर विश्वास करके बिना सेना लिये ही उससे मिलने के लिये चले जाना था। यही भूल उसके पतन का कारण बन गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अल्लाउदीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

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अलाउद्दीन खिलजी - खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

जब अलाउद्दीन खिलजी को सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के परिवार में फूट पड़ने के समाचार मिले तो अलाउद्दीन ने दिल्ली जाने का निर्णय किया। उसने मार्ग में नये सैनिकों की भी भर्ती की। जब वह दिल्ली पहुँचा तो उसके पास 56 हजार घुड़सवार तथा 70 हजार पैदल सिपाही थे।

अलाउद्दीन खिलजी का प्रारम्भिक जीवन

अलाउद्दीन खिलजी का पिता शिहाबुद्दीन मसउद खिलजी, सुल्तान जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी का भाई था। शिहाबुद्दीन के चार पुत्र थे जिनमें से अलाउद्दीन सबसे बड़ा था। अलाउद्दीन का जन्म 1266-67 ई. में हुआ था। जलालुद्दीन के तख्त पर बैठने से काफी पहले ही शिहाबुद्दीन की मृत्यु हो चुकी थी। इसलिये अलाउद्दीन का पालन पोषण जलालुद्दीन ने ही किया।

अलाउद्दीन को नियमित रूप से लिखने-पढ़ने की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। उसके वयस्क होने पर जलालुद्दीन ने अपनी पुत्री का विवाह अपने भतीजे अलाउद्दीन से कर दिया। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी, जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा तथा दामाद था। उसने घुड़सवारी, खेलकूद तथा युद्ध विद्या सीख ली। पढ़ाई-लिखाई में रुचि नहीं होने से वह नितांत निरक्षर बना रहा। जब जलालुद्दीन खिलजी सुल्तान बना तो उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन को अमीर-ए-तुजुक का पद दिया।

अलाउद्दीन खिलजी का वैवाहिक जीवन

अलाउद्दीन का वैवाहिक जीवन बहुत नीरस था। उसकी सास मलिका जहान तथा पत्नी, दोनों मिलकर उलाउद्दीन को बात-बात पर ताने देती थीं। इसलिये उसने महरू नामक एक प्रेमिका तलाश कर ली। अलाउद्दीन की पत्नी को इस बात का पता चल गया इसलिये उसने एक दिन अलाउद्दीन के सामने ही महरू की पिटाई कर दी। इससे अलाउद्दीन का मन दिल्ली से उखड़ गया।

कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी

अलाउद्दीन के सौभाग्य से 1291 ई. में कड़ा के गवर्नर मलिक छज्जू ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को दबाने में अलाउद्दीन ने भारी वीरता का परिचय दिया। सुल्तान के बड़े पुत्र अर्कली खाँ ने सुल्तान के समक्ष अलाउद्दीन की प्रशंसा की। इस पर सुल्तान ने अलाउद्दीन को कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अलाउद्दीन दिल्ली से कड़ा चला गया। उसकी पत्नी ने कड़ा चलने से मना कर दिया। इस पर अलाउद्दीन अपनी प्रेमिका महरू को अपने साथ कड़ा ले गया।

महत्वाकांक्षाओं का विस्तार

कड़ा का वातावरण अलाउद्दीन के अनुकूल था। सुल्तान और उसके परिवार की छत्रछाया से दूर अलाउद्दीन को स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर मिला। इससे उसकी महत्वाकांक्षाओं ने जन्म लिया और उसने दिल्ली के तख्त पर आँख गढ़ाई। तख्त प्राप्त करने के लिए उसने सैनिक संगठन, धन संग्रह तथा साथियों की परीक्षा करना आरम्भ किया।

1292 ई. में सुल्तान की आज्ञा से अलाउद्दीन ने भिलसा पर आक्रमण किया। भिलसा पर उसे बड़ी सरलता से विजय प्राप्त हो गई और उसने लूट का बहुत माल लेकर सुल्तान को समर्पित कर दिया। सुल्तान ने प्रसन्न होकर उसे आरिजे मुमालिक अर्थात सैन्य-मंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया और कड़ा के साथ-साथ अवध का भी गवर्नर नियुक्त कर दिया। 1294 ई. में अलाउद्दीन ने देवगिरी पर आक्रमण किया और वहाँ से लूट की अपार सम्पत्ति लेकर कड़ा वापस लौट आया।

जलालुद्दीन की हत्या

देवगिरि की अकूत सम्पदा प्राप्त करके अलाउद्दीन मदान्ध हो गया। अब उसने दिल्ली का तख्त प्राप्त करने का निश्चय कर लिया। उसने कई तरह के बहाने करके अपने श्वसुर तथा ताऊ सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को कड़ा बुलाया। सरल हृदय सुल्तान अपने भतीजे तथा दामाद पर भरोसा रखकर कड़ा आया जहाँ अलाउद्दीन ने 19 जुलाई 1296 को मानिकपुर के निकट सुल्तान के साथ विश्वासघात करके उसकी हत्या करवा दी और स्वयं दिल्ली का तख्त हथियाने का उपाय ढूंढने लगा।

अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली के तख्त की प्राप्ति

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की बेगम को जैसे ही सुल्तान की कड़ा में हत्या होने का समाचार मिला, उसने अपने छोटे पुत्र कद्र खाँ को रुकुनुद्दीन इब्राहीम के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया क्योंकि बड़ा पुत्र अर्कली खाँ मुल्तान का गवर्नर होने के कारण मुल्तान में था। जब अर्कली खाँ ने सुना कि माँ ने छोटे पुत्र कद्र खाँ को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया तो वह अपने परिवार से नाराज हो गया तथा उसने अपने परिवार की सहायता करने के लिये दिल्ली जाना उचित नहीं समझा।

जब अलाउद्दीन को सुल्तान के परिवार में फूट पड़ने के समाचार मिले तो अलाउद्दीन ने दिल्ली जाने का निर्णय किया। उसने मार्ग में नये सैनिकों की भी भर्ती की। जब वह दिल्ली पहुँचा तो उसके पास 56 हजार घुड़सवार तथा 70 हजार पैदल सिपाही थे। जब दिल्ली की सेना ने उसका मार्ग रोका तो अलाउद्दीन ने मुँह मांगा पैसा देकर अमीरों को अपनी ओर कर लिया।

अमीरों की गद्दारी देखकर मलिका-ए-जहाँ ने अपने बड़े पुत्र अर्कली खाँ को दिल्ली आने तथा परिवार की सहायता करने के लिये संदेश भिजवाये किंतु अर्कली खाँ ने उन संदेशों पर ध्यान नहीं दिया। इससे मलिका-ए-जहाँ दिल्ली में अकेली पड़ गई। जब सुल्तान कद्र खाँ ने अलाउद्दीन का सामना करने का विचार किया तो रहे-सहे अमीर भी अपने सैनिक लेकर अलाउद्दीन की तरफ जा मिले। इससे मलिका-ए-जहाँ अपने परिवार को लेकर अपने बड़े बेटे के पास मुल्तान भाग गई। इस प्रकार बिना लड़े ही अलाउद्दीन का दिल्ली के तख्त पर अधिकार हो गया।

अलाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ

अलाउद्दीन को दिल्ली के तख्त पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) अलोकप्रियता की समस्या

अलाउद्दीन राज्य का अपहर्ता तथा अपराधी समझा जाता था, क्योंकि उसने ऐसे व्यक्ति की हत्या करवाई थी जो उसका अत्यन्त निकट सम्बन्धी तथा बहुत बड़ा शुभचिन्तक था। जलालुद्दीन का अलाउद्दीन पर बहुत बड़ा स्नेह था और वह उस पर अत्यधिक विश्वास करता था। उसी ने अलाउद्दीन का पालन-पोषण किया था और उसे ऊँचे-ऊँचे पद दिये थे। अलाउद्दीन, सुल्तान जलालुद्दीन का दामाद तथा भतीजा दोनों था। अतः जलालुदद्ीन का वध बड़ा ही नृशंस तथा घृणित कार्य समझा गया।

(2) शासन में अराजकता की समस्या

केन्द्रीय शासन लम्बे समय से आंतरिक संघर्षों में फंसा हुआ था। इस कारण स्थानीय अधिकारी स्वेच्छाचारी हो गये थे। केन्द्र सरकार के प्रति उत्तरदाई अधिकारियों के अभाव में, स्थानीय तथा केन्द्रीय शासन में सम्पर्क बहुत कम रह गया था। स्थानीय अधिकारियों को केन्द्रीय सत्ता के अधीन करना तथा राज्य के प्रति विश्वस्त बनाना एक बड़ी समस्या थी।

(3) जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों की समस्या

यद्यपि दिल्ली का तख्त अलाउद्दीन को प्राप्त हो गया था परन्तु जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का विनाश अभी नहीं हुआ था। जलालुद्दनी की बेगम मलिका-ए-जहान, बड़ा पुत्र अर्कली खाँ, दूसरा पुत्र कद्र खाँ (रुकुनुद्दीन इब्राहीम) और जलालुद्दीन का मंगोल दामाद उलूग खाँ अभी जीवित थे। उनके झण्डे के नीचे अब भी विशाल सेनाएँ संगठित हो सकती थीं।

(4) जलाली अमीरों की समस्या

जलाली अमीर अपने आश्रयदाता की हत्या करने वाले को कभी क्षमा करने के लिए उद्यत नहीं थे। जलालुद्दीन के इन स्वामिभक्त सेवकों में अहमद चप का नाम प्रमुख है। वह बड़ा ही निर्भीक तथा साहसी तुर्की अमीर था और जलालुद्दीन तथा उसके उत्तराधिकारियों में उसकी अटल भक्ति थी। जलाली अमीरों से अलाउद्दीन को बड़ा भय था क्योंकि ये बड़े कुचक्री होते थे किंतु अहमद चप को मुल्तान में बंदी बनाकर हांसी में उसे अंधा करके जेल में डाल दिया गया। इससे अन्य जलाली अमीर भी सहम कर शांत हो गये।

(5) सीमा सुरक्षा की समस्या

मंगोल आक्रमणकारी प्रायः भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण करते थे। एक से अधिक अवसरों पर वे दिल्ली तक आ पहुँचे थे। उनकी गिद्ध-दृष्टि सदैव भारत पर ही लगी रहती थी। उनसे अपने राज्य को सुरक्षित करना, एक बड़ी समस्या थी। दिल्ली के निकट मंगोलपुरी बस जाने से मंगोलों को दिल्ली में आधार भी प्राप्त हो गया था।

(6) राज्य-विस्तार की समस्या

बलबन के कमजोर उत्तराधिकारियों एवं जलालुद्दीन खिलजी की उदार नीति के कारण अनेक हिन्दू-सामन्तों तथा राजाओं ने अपने राज्य वापस अपने अधिकार में कर लिये थे। अलाउद्दीन के तख्त पर बैठने के समय उत्तरी भारत का अधिकांश भाग तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत दिल्ली सल्तनत के बाहर था। इन खोये हुए प्रदेशों को अपने अधिकार में करना बड़ी समस्या थी।

अलाउद्दीन खिलजी की समस्याओं का निवारण

यद्यपि अलाउद्दीन की समस्याएँ बड़ी तथा जटिल थीं किंतु उसे चार योग्य अमीरों- उलूग खाँ, नसरत खाँ, जफर खाँ तथा अल्प खाँ की सेवाएँ प्राप्त हो गईं। यद्यपि सुल्तान निरक्षर तथा हठधर्मी था परन्तु उसे काजी अलाउल्मुल्क का सानिध्य प्राप्त हो गया। काजी अलाउल्मुल्क ने अपने परामर्श से सुल्तान अलाउद्दीन की बड़ी सेवा की और उसे कई बार अनुचित कार्य करने से रोका। अलाउद्दीन अपनी बौद्धिक सीमाओं को जानता था इसलिये अपने शुभचिन्तकों के परामर्श को मान लेता था। इस कारण वह अपनी समस्याओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

(1) अमीरों के विश्वास की प्राप्ति

सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने अमीरों का विश्वास अर्जित करने के लिये देवगिरी से लाई हुई सोने-चाँदी की मुद्राओं का मुक्त हस्त से वितरण किया। उसने सैनिकों को छः मास का वेतन पारितोषिक के रूप में दिलवाया। शेखों तथा आलिमों को दिल खोलकर धन एवं धरती से पुरस्कृत किया। उसने दीन-दुखियों में अन्न वितरित करवाया। इस कारण लोग सुल्तान के विश्वासघात तथा उसके घृणित कार्य को भूलकर उसकी उदारता की प्रशंसा करने लगे। प्रायः समस्त बड़े अमीर अलाउद्दीन के समर्थक बन गये।

(2) शासन पर पकड़ बनाने हेतु पदों का वितरण

अपनी स्थिति के सुदृढ़ीकरण के ध्येय से अलाउद्दीन खिलजी ने कुछ ऊँचे पदाधिकारियों को पूर्ववत् उनके पदों पर बने रहने दिया और शेष पदों पर अपने सहायकों तथा सेवकों को नियुक्त कर दिया। इससे अलाउद्दीन की स्थिति बड़ी दृढ़ हो गई। उसने शासन में कई महत्वपूर्ण सुधार किये।

(3) जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन

अलाउद्दीन ने राजधानी में स्थिति को सुदृढ़ कर लेने के उपरान्त जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन करना  आरम्भ किया। उसने अपने दो सेनानायकों उलूग खाँ और जफरखां को एक सेना देकर मुल्तान पर आक्रमण करने भेजा। अलाउद्दीन के सेनापतियों ने मलिका-ए-जहान, अर्कली खाँ, कद्र खाँ, अहमद चप और मंगोल उलूग खाँ को बंदी बनाकर दिल्ली रवाना कर दिया।

हांसी के निकट अर्कली खाँ, कद्र खां, अहमद चप और उलूग खाँ को अंधा करके परिवार के सदस्यों से अलग कर दिया गया। बाद में अर्कली खाँ तथा कद्र खाँ को उनके पुत्रों सहित मौत के घाट उतार दिया गया। मलिका-ए-जहान को दिल्ली लाकर नजरबंद कर दिया गया।

(4) जलाली अमीरों का दमन

जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन करने के बाद अलाउद्दीन ने जलाली अमीरों के दमन का कार्य नसरत खाँ को सौंपा। नसरत खाँ ने जलाली अमीरों की सम्पत्ति छीनकर राजकोष में जमा करवाई। कुछ अमीर अन्धे कर दिये गये तथा कुछ कारगार में डाल दिये गए। कुछ जलाली अमीरों को तलवार के घाट उतार दिया गया। उनकी भूमियां तथा जागीरें छीन ली गईं। जलाली अमीरों से शाही खजाने में लगभग एक करोड़ रुपया प्राप्त हुआ।

(5) सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था

अलाउद्दीन ने मंगोलों के आक्रमणों को रोकने एवं उनका सामना करने के लिये सीमान्त प्रदेश की नाकेबन्दी करके वहाँ पर सेनायें रखीं। मंगोलों ने अलाउद्दीन के समय में भारत पर चार-पांच बार आक्रमण किये परन्तु अलाउद्दीन ने धैर्य के साथ उनका सामना किया।

(6) साम्राज्य विस्तार का कार्य

अलाउद्दीन महत्वाकांक्षी तथा साम्राज्य विस्तारवादी सुल्तान था। वह सम्पूर्ण भारत का सुल्तान बनना चाहता था। इसलिये उसने एक विजय-योजना तैयार की और उत्तर तथा दक्षिण दोनों ही दिशाओं में विजय अभियान चलाये।

अलाउद्दीन खिलजी के उद्देश्य तथा उसकी महत्वाकांक्षाएँ

अलाउद्दीन को आरम्भ में ही बड़ी सफलतायें मिल गई थीं, इससे उसका उत्साह बढ़ता चला गया। सौभाग्य से उसके पास एक विशाल सेना तथा अपार कोष इकट्ठा हो गया। फलतः उसकी आकाक्षायें और बढ़ गईं। उसने अपने जीवन के दो लक्ष्य बनाये। उसका पहला उद्देश्य था एक नये धर्म की स्थापना करना और उसका दूसरा उद्देश्य था विश्व-विजय करना।

उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि जिस प्रकार हजरत मुहम्मद के चार साथी, अर्थात पहले चार खलीफा थे, उसी प्रकार उलूग खाँ, जफर खाँ, नसरत खाँ तथा अल्प खाँ उसके भी चार साथी हैं जो बड़े ही वीर तथा साहसी हैं। अतः पैगम्बर की भाँति वह भी नये धर्म की स्थापना करके और सिकन्दर महान् की भाँति विश्व विजय करके अपना नाम अमर कर सकता है।

काजी अलाउल्मुल्क का परामर्श

जब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने योजनाओं के सम्बन्ध में काजी अलाउल्मुल्क से परामर्श किया तब काजी ने उसे परामर्श दिया कि नबी बनना अथवा नया धर्म चलाना सुल्तानों का काम नहीं है। यह काम पैगम्बरों का होता है जो अल्लाह द्वारा भेजे जाते हैं। सुल्तान की विश्व-विजय की आकंाक्षा के सम्बन्ध में काजी ने सुल्तान से कहा कि यद्यपि विश्व-विजय की कामना करना सुल्तान का कर्त्तव्य है किंतु न तो विश्व में सिकन्दर कालीन परिस्थितियाँ विद्यमान हैं और न सुल्तान के पास अरस्तू के समान बुद्धिमान तथा दूरदर्शी गुरु उपलब्ध है।

काजी ने सुल्तान को परामर्श दिया कि दिल्ली सल्तनत की सीमाओं पर रणथम्भौर, चितौड़, मालवा, धार, उज्जैन आदि स्वतन्त्र राज्य हैं जिनके कारण सल्तनत पर चारों ओर से आक्रमणों के बादल मँडरा रहे हैं। अतः परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुल्तान के दो उद्देश्य होने चाहिये-

(1.) सम्पूर्ण भारत पर विजय प्राप्त करना तथा

(2.) मंगोलों के आक्रमणों को रोकना।

इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देश में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रखना नितान्त आवश्यक था। काजी ने सुल्तान को यह परामर्श भी दिया कि जब तक वह मदिरा पीना तथा आमोद-प्रमोद करना नहीं छोड़ेगा तब तक उसके उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकेगी। अलाउद्दीन को काजी का यह परामर्श बहुत पसन्द आया और उसने काजी के परामर्श को स्वीकार कर लिया।

अलाउद्दीन खिलजी के प्रधान लक्ष्य

अलाउद्दीन खिलजी ने काजी अलाउल्मुल्क से परामर्श करके अपने तीन प्रधान लक्ष्य निर्धारित किये-

1. बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना,

2. साम्राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करना तथा

3. साम्राज्य को विस्तृत करना।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

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अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

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अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

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अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

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अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन खिलजी: साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से मुस्लिम इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना है। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने साम्राज्य को केवल उत्तर भारत तक सीमित न रखकर दक्षिण भारत में भी बढ़ा लिया।

उत्तरी भारत की विजय (1299-1305 ई.)

लक्ष्य निश्चित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने साम्राज्य विस्तार का कार्य आरम्भ किया। सर्वप्रथम उसने उत्तरी भारत को जीतने की योजना बनाई।

(1.) गुजरात पर विजय

सर्वप्रथम अलाउद्दीन की दृष्टि गुजरात के अत्यन्त धन-सम्पन्न राज्य पर पड़ी। इन दिनों गुजरात में बघेला राजा कर्ण शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। अलाउद्दीन ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ को कर्ण बघेला पर आक्रमण करने भेजा।

इन सेनापतियों ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा को घेर लिया। कर्ण भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ। मुसलमानों ने गुजरात को खूब लूटा और लूट की अपार सम्पत्ति दिल्ली लाई गई। कर्ण बघेला ने अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरी के राजा रामचन्द्र के यहाँ शरण ली। कर्ण की रानी कमला देवी तथा मलिक काफूर नामक एक सुंदर युवक, दिल्ली की सेना के हाथ लगे।

उन दोनों को सुल्तान के पास दिल्ली भेज दिया गया। अलाउद्दीन ने कमला देवी को अपने हरम में डाल लिया तथा मलिक काफूर को अप्राकृतिक संसर्ग के लिये रख लिया। जब शाही सेना गुजरात से लूट का माल लेकर दिल्ली लौट रही थी तो कुछ नव-मुसलमानों ने इस खजाने को लूट लिया तथा तथा नुसरत खाँ के एक भाई और अलाउद्दीन के भतीजे को मारकर भाग गये।

विद्रोही मंगोलों ने रणथंभौर के दुर्ग में शरण ली। शाही सेना ने बर्बरता से विद्रोहियों का दमन किया। दिल्ली में रह रहे उनके परिवारों को भी नृशंसता पूर्वक मारा गया। उनकी स्त्रियों का सतीत्व लूट लिया गया तथा बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही टुकड़े करके फैंक दिया गया। बरनी ने अलाउद्दीन की इस क्रूरता की निंदा की है।

(2.) रणथम्भौर पर विजय

गुजरात पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इन दिनों रणथम्भौर में पृथ्वीराज चौहान का वंशज हम्मीर शासन कर रहा था। उसने जालोर से शाही खजाना लूटकर भागे नव-मुस्लिमों को अपने यहाँ शरण दी थी।

अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नसरत खाँ को रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। हम्मीर ने दुर्ग के अन्दर से रक्षात्मक युद्ध करने का निश्चय किया। अलाउद्दीन के सेनापतियों ने दुर्ग का घेरा डाल दिया। घेरे का निरीक्षण करते समय अचानक नसरत खाँ को एक पत्थर लगा और उसकी मृत्यु हो गई। राजपूतों ने बड़ी वीरता के साथ युद्ध करके तुर्कों के पीछे धकेल दिया।

जब सुल्तान को इसकी सूचना मिली तो उसने स्वयं रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया। वह लगभग एक वर्ष तक दुर्ग का घेरा डाले रहा। हम्मीर देव के दो मंत्रियों रणमल तथा रतनपाल ने हम्मीरदेव के साथ विश्वासघात किया जिसके काराण मुसलमान सैनिक किले की दीवारों पर चढ़ने में सफल हो गये और अभेद्य दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली। हम्मीरदेव वीरगति को प्राप्त हुआ तथा उसकी स्त्रियों ने जौहर किया। अलाउद्दीन खिलजी उलूग खाँ को रणथम्भौर सौंप कर दिल्ली लौट आया। थोड़े ही दिनों बाद उलूग खाँ बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।

(3.) मेवाड़ पर विजय

दिल्ली सल्तनत के किसी भी सुल्तान को अब तक मेवाड़ पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ था। इन दिनों रावल रत्नसिंह मेवाड़़ में शासन कर रहा था। 1303 ई. में अलाउद्दीन एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ पर आक्रमण करने चल दिया। अलाउद्दीन को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने में पांच माह लगे।

अगस्त 1303 में अलाउद्दीन का दुर्ग पर अधिकार हो गया। इसके बाद अलाउद्दीन ने दुर्ग में कत्ले आम का आदेश दिया। इस कत्ले आम में लगभग 30 हजार लोग मारे गये। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदल कर खिजा्रबाद कर दिया तथा उसे अपने पुत्र खिज्र खाँ को देकर स्वयं पुनः दिल्ली चला गया।

पद्मिनी की कथा: मलिक मुहम्मद जायसी के ग्रंथ पद्मावत में इस आक्रमण का काव्यात्मक विवरण दिया गया है। इस विवरण के अनुसार रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपने सौन्दर्य के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। अलाउद्दीन ने पद्मिनी का अपहरण करने और मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया।

चितौड़ का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था तथा अजेय समझा जाता था। अलाउद्दीन ने रत्नसिंह के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह दर्पण में रानी पद्मिनी की छवि दिखा दे तो अलाउद्दीन दिल्ली लौट जायेगा। रत्नसिंह अपने सैनिकों के रक्तपात को रोकने के लिये अलाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की छवि शीशे में दिखाने के लिये तैयार हो गया।

जब सुल्तान पद्मिनी को देखकर लौटने लगा तब राजा रत्नसिंह उसे पहुँचाने के लिये दुर्ग से बाहर आया। पहले से ही तैयार अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने राजा को कैद कर लिया। अब सुल्तान ने पद्मिनी के पास यह सूचना भेजी कि जब तक वह उसके निवास में नहीं आ जायेगी तब तक वह रत्नसिंह को मुक्त नहीं करेगा।

राजपूतों के लिये यह बड़े अपमान की बात थी परन्तु पद्मिनी ने बुद्धि से काम लिया और सुल्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह सात सौ डोलियों में वीर राजपूत सैनिकों को बैठाकर दिल्ली की ओर चल पड़ी। अवसर पाकर राजपूत सैनिकों ने रावल रत्नसिंह को मुक्त करा लिया। इस अवसर पर हुए युद्ध में गोरा मारा गया।

राजपूत सैनिक अपने राजा तथा रानी को लेकर चित्तौड़ आ गये। इसके बाद अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण हुआ। जब राजपूतों को अपनी पराजय निश्चित लगने लगी तो राजपूत स्त्रियों ने जौहर का आयोजन किया।

पद्मिनी, राजपूत स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर भस्म हो गई और राजपूत, शत्रु से लड़कर वीर गति को प्राप्त हुए। चितौड़ के दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा के. एस. लाल आदि कई इतिहासकार पद्मावत के विवरण को सही नहीं मानते। वे पद्मिनी की कथा को काल्पनिक मानते हैं। तत्कालीन इतिहासकारों इसामी, अमीर खुसरो, इब्नबतूता आदि ने इन घटनाओं का उल्लेख नहीं किया है जबकि परवर्ती फारसी इतिहासकारों अबुल फजल, हाजीउद्वीर तथा फरिश्ता ने इसे सत्य माना है।

(4.) मालवा पर विजय

चितौड़ पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त अलाउद्दीन ने 1305 ई. में ऐनुल्मुल्क मुल्तानी को मालवा अभियान का दायित्व सौंपा। इन दिनों मालवा में मलहकदेव शासन कर रहा था। राजपूतों ने बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया परन्तु अन्त में मलहकदेव परास्त हुआ तथा युद्ध क्षेत्र में मारा गया। मालवा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

(5.) उत्तरी भारत की अन्य विजयें

सुल्तान ने 1305 ई. में मालवा पर विजय प्राप्त की। इसके थोड़े ही दिन बाद उसने मांडू, उज्जैन, धारानगरी तथा चन्देरी आदि नगरों को जीत लिया। इस प्रकार 1305 ई. तक उत्तर भारत के अधिकांश राज्य अलाउद्दीन के अधीन हो चुके थे। केवल मारवाड़ अब तक अछूता था। 1306 ई. में अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत का विजय अभियान आरम्भ किया।

(6.) सिवाना पर विजय

अभी तक मारवाड़ प्रदेश के किसी भी शासक ने तुर्कों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। 1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सिवाना पर अभियान किया। सिवाना पर उन दिनों सातलदेव का शासन था जो जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव का भतीजा था तथा उसी की ओर से सिवाना दुर्ग पर नियुक्त था। अलाउद्दीन की सेना ने दो साल तक सिवाना दुर्ग पर घेरा डाले रखा। 1310 ई. में अलाउद्दीन स्वयं सिवाना आया। उसके द्वारा किये गये निर्णायक हमले में सातलदेव सम्मुख युद्ध में मारा गया। उसका राज्य दिल्ली के अमीरों में बाँट दिया गया।

(7.) जालौर पर विजय

जालौर पर चौहान शासक कान्हड़देव शासन कर रहा था। उसने अलाउद्दीन खिलजी की सेना को सोमनाथ आक्रमण के समय अपने राज्य से होकर गुजरने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिये अलाउद्दीन खिलजी ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में जालोर के विरुद्ध सेना भेजी। 1314 ई. में कान्हड़देव परास्त हो गया और जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। कुछ इतिहासकार 1311 ई. में अलाउद्दीन का जालोर पर अधिकार होना मानते हैं।

उत्तर भारत पर विजय के परिणाम

उत्तर भारत पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर अभियान आरम्भ किया परन्तु उत्तरी भारत की विजय स्थायी सिद्ध न हुई। उसके जीवन के अन्तिम भाग में राजपूताना में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और अनेक स्थानों में राजपूतों ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त कर लिया परन्तु राजपूत पूर्ववत् असंगठित ही बने रहे। वे तुर्की सल्तनत को उन्मूलित न कर सके।

दक्षिण की विजय (1306-1313 ई.)

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एक-छत्र प्रभुत्व स्थापित करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उत्तर भारत पर विजय के बाद, दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था। दक्षिण की विपुल सम्पत्ति भी अलाउद्दीन को आकृष्ट करती थी।

उत्तर भारत के अभियानों के कारण सेना तथा शासन का व्यय बहुत बढ़ गया था। उत्तर भारत को जीतने में हुए इस व्यय के मुकाबले उसे धन की प्राप्ति बहुत कम हुई थी। इसकी पूर्ति दक्षिण के धन से हो सकती थी। अलाउद्दीन यह भी चाहता था कि उसकी सेना किसी न किसी अभियान में संलग्न रहे ताकि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सके।

इन सब कारणों से उसने दक्षिण भारत के विरुद्ध अभियान आरम्भ किया। दक्षिण की भौगोलिक असुविधाओं तथा उत्तरी भारत से दूरी के कारण अब तक कोई अन्य सुल्तान दक्षिण भारत पर अभियान करने का साहस नहीं कर सका था। 1305 ई. तक मारवाड़ को छोड़कर लगभग शेष उत्तरी भारत के राज्यों को जीत लिया गया था।

इसलिये 1306 ई. में दक्षिण विजय का अभियान आरम्भ किया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण विजय का कार्य अपने गुलाम मलिक काफूर को सौंपा जिसे नसरत खाँ खम्भात से लाया था। अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को दक्षिण अभियान के लियेएक विशाल सेना प्रदान की।

इस समय दक्षिण भारत में चार प्रमुख हिन्दू राज्य थे- (1.) देवगिरी राज्य जिस पर यादवों का शासन था, इसकी राजधानी देवगिरि (दौलताबाद) थी। (2.) तेलंगाना राज्य जहाँ काकतीय वंश का शासन था, इसकी राजधानी वारंगल थी। (3.) होयसल राज्य जहाँ होयसल वंश का शासन था, इसकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। (4.) मदुरा का राज्य जहाँ पांड्य वंश का शासन था, इसकी राजधानी मदुरा थी।

(1.) वारंगल पर पहला आक्रमण (1302 ई.)

वारंगल, तेलंगाना की राजधानी थी जहाँ काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन करता था। मुसलमान इतिहासकारों ने उसे लदर देव के नाम से पुकारा है। अलाउद्दीन वारंगल को अपने राज्य में सम्मिलित नहीं करना चाहता था। उसका लक्ष्य केवल धन प्राप्त करना था।

वारंगल पर पहला आक्रमण अलाउद्दीन के आदेश से 1302 ई. में नुसरत खाँ के भतीजे छज्जू तथा फखरुद्दीन जूना (जो बाद में मुहम्मद तुगलक कहलाया) के नेतृत्व में किया गया। इस युद्ध में राजा प्रताप रुद्रदेव ने शाही सेना को परास्त कर दिया। मुस्लिम इतिहासकारों ने इस युद्ध का उल्लेख तक नहीं किया है।

(2.) देवगिरी पर पहला आक्रमण (1306 ई.)

कड़ा का गवर्नर रहते हुए अलाउद्दीन देवगिरि को जीतकर लूट चुका था। सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को फिर से देवगिरि के विरुद्ध अभियान पर भेजा। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि देवगिरि के राजा रामचन्द्र ने पूर्व में दिये गये अपने वचन के अनुसार दिल्ली को कर नहीं भेजा था और दूसरा यह कि रामचन्द्र ने गुजरात के राजा राय कर्ण तथा उसकी पुत्री देवलदेवी को अपने यहाँ शरण दी थी।

अलाउद्दीन खिलजी देवलदेवी को प्राप्त करना और देवगिरि पर फिर से अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। मलिक काफूर तथा अल्प खाँ की संयुक्त सेनाओं ने देवगिरि पर आक्रमण कर दिया। राय कर्ण दो महीने तक बड़ी वीरता के साथ मुसलमानों का सामना करता रहा परन्तु मुसलमानों की विशाल सेना के समक्ष उसके पैर उखड़ गये। देवलदेवी की रक्षा नहीं हो सकी।

वह अल्प खाँ के हाथ पड़ी और दिल्ली के रनिवास में भेज दी गई। कुछ दिन बाद शहजादे खिज्र खाँ से उसका विवाह कर दिया गया। मलिक काफूर ने सम्पूर्ण देश को उजाड़ दिया। विवश होकर राजा रामचन्द्र को सन्धि करनी पड़ी। काफूर ने रामचन्द्र को दिल्ली भेज दिया। सुल्तान ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उसे राय रय्यन की उपाधि दी। इस उदार व्यवहार के कारण रामचन्द्र ने फिर कभी अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।

(3.) वारंगल पर दूसरा आक्रमण (1310 ई.)

इसके बाद 1310 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को वारंगल पर आक्रमण करने भेजा। अलाउद्दीन ने काफूर को आदेश दिया कि यदि प्रताप रुद्रदेव सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले और अपना कोष, घोड़े तथा हाथी देने को कहे तो उससे सन्धि कर ली जाये और उसका राज्य न छीना जाये।

काफूर ने एक विशाल सेना के साथ दक्षिण के लिए प्रस्थान किया। सबसे पहले वह देवगिरि गया। राजा रामचन्द्र ने उसकी बड़ी सहायता की। देवगिरि से काफूर ने वारगंल के लिये प्रस्थान किया और वारगंल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह घेरा कई महीने तक चलता रहा। इस दौरान बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मारा गया तथा उनकी सम्पत्ति का विनाश किया गया।

जब प्रताप रुद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि तुर्क केवल धन प्राप्त करने के लिए ऐसा विध्वंस मचा रहे हैं तब वह उन्हें धन देकर शांति स्थापित करने के लिये तैयार हो गया। बरनी के कथनानुसार प्रताप रुद्रदेव ने तुर्कों को 100 हाथी, 700 घोड़े, बहुत सा सोना-चाँदी तथा अनेक अमूल्य रत्न दिये। सम्भवतः कोहीनूर हीरा भी काफूर को यहीं से मिला था। प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। काफूर 1310 ई. में देवगिरि तथा धारा होते हुए दिल्ली लौट गया।

(4.) द्वारसमुद्र पर आक्रमण (1311 ई.)

वारंगल विजय के बाद अलाउद्दीन ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों द्वारसमुद्र में होयसल राजा वीर वल्लभ (तृतीय) शासन कर रहा था उसे बल्लाल (तृतीय) भी कहते हैं। वह योग्य तथा प्रतापी शासक था। दुर्भाग्य से इन दिनों होयसल तथा यादव राजाओं में घातक प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी और दोनों एक दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयत्न कर रहे थे।

अलाउद्दीन ने इस स्थिति से लाभ उठाने के लिये 1311 ई. में मलिक काफूर को द्वारसमुद्र पर आक्रमण करने भेजा। बल्लाल, मलिक काफूर की विशाल सेना के समक्ष नहीं टिक सका तथा विवश होकर मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली। काफूर ने द्वारसमुद्र के मन्दिरों की अपार सम्पत्ति को जी भर कर लूटा। इस अपार सम्पत्ति के साथ मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

(5.) मदुरा पर आक्रमण (1311 ई.)

द्वारसमुद्र विजय के उपरान्त अलाउद्दीन ने मदुरा पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों मदुरा में पांड्य-वंश शासन कर रहा था। दुर्भाग्यवश इन दिनों सुन्दर पांड्य तथा वीर पांड्य भाइयों में घोर संघर्ष चल रहा था। वीर पांड्य ने सुन्दर पांड्य को मार भगाया और स्वयं मदुरा का शासक बन गया।

निराश होकर सुन्दर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान से सहायता मांगी। सुल्तान ऐसे अवसर की खोज में था। 1311 ई. में मलिक काफूर मदुरा पहुँच गया। काफूर ने आने की सूचना पाकर वीर पांड्य राजधानी छोड़कर भाग गया। काफूर ने मदुरा के मन्दिरों को खूब लूटा और मूर्तियों को तोड़ा। 1311 ई. में वह अपार सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया।

(6.) देवगिरि पर दूसरा आक्रमण (1312 ई.)

रामचन्द्र की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र शंकर देव देवगिरि का राजा हुआ। उसने दिल्ली के सुल्तान को कर देना बन्द कर दिया। शंकरदेव ने होयसल राजा के विरुद्ध भी मुसलमानों की सहायता करने से इन्कार कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने मलिक काफूर की अध्यक्षता में एक सेना शंकरदेव के विरुद्ध भेजी। युद्ध में शंकरदेव पराजित हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। 1315 ई. में हरपाल देव को देवगिरि का शासन सौंपकर मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

दक्षिण में अलाउद्दीन की सफलता के कारण

अलाउद्दीन की सेना मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्षिण भारत में विजय पताका फहराने में पूर्ण रूप से सफल रही। इस सफलता के कई कारण थे-

(1) दक्षिण के राज्यों का पारस्परिक संघर्ष

जिस समय मलिक काफूर ने दक्षिण अभियान आरम्भ किया, उस समय दक्षिण के राज्यों में परस्पर वैमनस्य अपने चरम पर था और वे एक दूसरे से संघर्ष करके शक्ति नष्ट कर रहे थे। वे संगठित होकर शत्रु का सामना करने के स्थान पर, अपने पड़ोसियों के विरुद्ध शत्रु की ही सहायता करने लगते थे।

(2) अलाउद्दीन की सेना की योग्यता

अलाउद्दीन के सैनिक सुधारों के कारण उसकी सेना में उत्साह था। सेना के पास पर्याप्त संसाधन थे तथा उसे अच्छा वेतन दिया जा रहा था।

(3) अलाउद्दीन के साम्राज्य विस्तृत नहीं करने की नीति

अलाउद्दीन विन्ध्य-पर्वत के दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार नहीं चाहता था। उसकी सेना धन लूटने तथा हिन्दुओं के धार्मिक स्थल नष्ट करने के उद्देश्य से दक्षिण अभियान कर रही थी।

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति

अलाउद्दीन ने उत्तरी भारत में जिस नीति का अनुसरण किया था, दक्षिण भारत में उससे भिन्न नीति का अनुसरण किया। उसकी दक्षिण नीति की प्रमुख बातें इस प्रकार थीं-

(1.) दक्षिण की सम्पत्ति लूटने की नीति

दक्षिण भारत में अलाउद्दीन का एक मात्र लक्ष्य दक्षिण की विपुल सम्पत्ति को लूटना था। ताकि वह अपनी विशाल सेना का व्यय चला सके और अपने शासन को सुव्यवस्थित रख सके।

(2.) आधिपत्य स्वीकार कराने की नीति

अलाउद्दीन यह जानता था कि सुदूर दक्षिण पर दिल्ली से शासन करना असंभव था। अतः उसने देवगिरि, तेलंगाना, द्वारसमुद्र तथा मदुरा पर विजय तो प्राप्त की परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया। जब पराजित राज्यों के शासक उसका आधिपत्य स्वीकार करने को तैयार हो जाते थे तो वह उनके राज्य लौटा देता था और पराजित राजा को अथवा पराजित राजा के वंश के अन्य व्यक्ति को राज्य दे देता था।

(3.) विजित राजाओं से उदारता की नीति

यद्यपि अलाउद्दीन स्वभाव से क्रूर तथा निर्दयी था और अपने शत्रुओं तथा विरोधियों के साथ बुरा व्यवहार करता था परन्तु दक्षिण के राजाओं के साथ उसने उदारता का व्यवहार किया। इसी कारण देवगिरि के राजा रामचन्द्र तथा होयलस के राजा बल्लाल (तृतीय) ने दक्षिण विजय में अलाउद्दीन की बड़ी सहायता की।

(4.) सेनापतियों के माध्यम से विजय की नीति

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से अनुपस्थित रहने के दुष्परिणामों से परिचित था। उसे अमीरों के विद्रोहों तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये उसने राजधानी को कभी असुरक्षित नहीं छोड़ा तथा दक्षिण-विजय का कार्य अपने सेनापतियों को दिया।

(5.) सेनापतियों पर नियंत्रण रखने की नीति

यद्यपि सुल्तान अलाउद्दीन, मलिक काफूर पर विश्वास करता था और उसी को प्रत्येक बार प्रधान सेनापति बना कर भेजा करता था परन्तु वह उस पर अपना पूरा नियन्त्रण रखने का प्रयास करता था। वह उसके साथ अल्प खाँ आदि अन्य सरदारों को भी भेजता था जिससे काफूर को विश्वासघात करने का अवसर न मिल सके। सुल्तान जब काफूर को दक्षिण भारत के अभियान पर भेजता था, तब वह उसे विस्तृत आदेश देता था। काफूर के लिये उन आदेशों की पालना करना अनिवार्य था।

अलाउद्दीन की दक्षिण नीति की समीक्षा

कुछ इतिहासकार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति को असफल मानते हैं। उनके अनुसार वह दक्षिण भारत को अपने अधीन बनाये रखने में विफल रहा। देवगिरि तथा होयसल राज्यों ने तो पराजय स्वीकार करके अलाउद्दीन से सहयोग किया किंतु तेलंगाना ने कभी सहयोग तो कभी विरोध किया। पाण्ड्य राज्य ने तो अधीनता ही स्वीकार नहीं की।

रामचंद्र देव के कारण शंकर देव का भी व्यवहार बदल गया और मलिक काफूर को पुनः दक्षिण राज्यों के विरुद्ध अभियान पर भेजना पड़ा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति सफल रही क्योंकि वह दक्षिण भारत को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं रखना चाहता था, वह उन राज्यों से धन लूटने तथा उन्हें करद राज्य बनाकर उनसे कर वसूलना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा।

अलाउद्दीन के साम्राज्य की सीमाएं

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करना था। उसे इस उदे्श्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। अपने सेनापतियों की सहायता से उसने उत्तरी तथा दक्षिणी भारत पर विजय प्राप्त करके लगभग सम्पूर्ण देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसका साम्राज्य उत्तर में मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली से लेकर दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा मदुरा तक, पूर्व में लखनौती तथा सौनार गाँव से लेकर पश्चिम में थट्टा तथा गुजरात तक विस्तृत हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

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खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

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अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ दिल्ली सल्तनत के इतिहास में विशेष महत्व रखती हैं। उसने अपने राज्य पर कड़ाई से नियंत्रण स्थापित करने के लिए ये सुधार किए।

अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान के विरुद्ध होने वाले विद्रोहों के कारण का अनुमान लगा लेने के उपरान्त उन कारणों को दूर करने का निश्चय किया।

अमीरों के आचरण में सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सल्तनत में विद्रोहों को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये-

(1.) गुप्तचर-विभाग का संगठन

विद्रोहियों का पता लगाने के लिए सुल्तान ने गुप्तचर-विभाग फिर से संगठित किया। गुप्तचरों को अमीरों तथा राज्याधिकारियों के घरों, कार्यालयों, नगरों तथा गाँवों में नियुक्त किया गया। इससे अमीरों के बारे में छोटी से छोटी सूचना सुल्तान तक पहुँचने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि अमीरों, राज्याधिकारियों तथा साधारण लोगों की गुप्त बातें समाप्त हो गईं।

(2.) अमीरों की सम्पत्ति का हरण

अलाउद्दीन खिलजी ने उन धनी अमीरों की सम्पत्ति को छीनना आरम्भ किया जो भूमि, लोगों को इनाम अथवा दान के रूप में प्राप्त थी, बहुत से लोगों की पेन्शन छीन ली गई। जिन्हें कर मुक्त भूमि मिली थी, उनकी भूमि पर फिर से कर लगा दिया गया। इससे सुल्तान को पर्याप्त धन प्राप्त हो गया और अमीरों की समृद्धि पर अंकुश लग गया।

(3.) मद्यपान-निषेध

अलाउद्दीन ने स्वयं मद्यपान त्याग दिया और अन्य लोगों को भी शराब पीने से रोक दिया। अलाउद्दीन ने शराब पीने के अपने बहुमूल्य बर्तन तुड़वा दिये और आज्ञा दी कि दिल्ली में जितनी शराब है वह सड़कों पर फैंक दी जाये। सुल्तान की आज्ञा का पालन किया गया और दिल्ली की सड़क शराब से भर गयी। सुल्तान ने यह भी आज्ञा दे दी कि यदि कोई व्यक्ति मद्यपान किये हुए मिले तो उसे दिल्ली के बाहर एक गड्ढे में फिंकवा दिया जाय। सुल्तान की आज्ञा का उल्लंघन करने वालों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था की गई।

(4.) अमीरों की सामाजिक गोष्ठियों तथा पारस्परिक विवाहों का निषेध

अलाउद्दीन खिलजी ने अमीरों की दावतें बन्द करवा दीं और उन्हें एक दूसरे के यहाँ आने जाने तथा गोष्ठी करने से मना कर दिया। बिना सुल्तान की आज्ञा के अमीर लोग परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध भी नहीं स्थापित कर सकते थे। इससे अमीरों का संगठन धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।

(5.) प्रान्तों पर कड़ा नियन्त्रण

अलाउद्दीन खिलजी ने प्रांतीय सेना पर अपना सीधा नियन्त्रण रख प्रांतपतियों की शक्ति को कम करने का प्रयत्न किया। उसने प्रान्तों में रहने वाली सेना की नियुक्त तथा सैनिकों का नियन्त्रण, स्थानान्तरण, पद वृद्धि आदि सारे कार्य अपने हाथ में ले लिये। सैनिकों को भूमि देने के स्थान पर नकद वेतन देना आरम्भ किया। उसने इस बात पर जोर दिया कि प्रान्तपति निर्धारित संख्या में सैनिक रखें तथा उन्हें पूरा वेतन दें।

(6.) जलाली अमीरों का दमन

अलाउद्दीन ने उन समस्त जलाली अमीरों को नष्ट कर दिया जिन्होंने धन अथवा पद के प्रलोभन से विरोधियों का साथ दिया था। उनकी सम्पत्ति छीन ली गई और बहुतों की आँखें निकलवा कर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। दूसरे अमीरों को उन्मूलित करने में भी सुल्तान ने संकोच नहीं किया। उसने कई अनेक उच्च पदाधिकारियों तथा उनके सम्बन्धियों को विष दिलवा कर मार डाला।

(7.) हिन्दुओं का कठोरता से दमन

अलाउद्दीन खिलजी ने हिन्दुओं को पूरी तरह निर्धन बनाने का प्रयत्न किया जिससे वे विद्रोह की कल्पना तक नहीं कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुल्तान ने कई कदम उठाये। दोआब बड़ा ही उपजाऊ प्रदेश था और वहाँ के हिन्दू प्रायः विद्रोह खड़ा कर देते थे।

अतः सुल्तान ने दो आब के क्षेत्र में उपज का 50 प्रतिशत मालगुजारी के रूप में वसूल करने की आज्ञा दी। जजिया, चुंगी तथा अन्य कर पूर्ववत् हिन्दुओं को देने पड़ते थे। चौधरी और मुकद्दम लोगों को घोड़ों पर चढ़ने, हथियार रखने, अच्छे वस्त्र पहनने, पान खाने से मनाही कर दी गई। इस प्रकार हिन्दुओं की समस्त सुविधाएँ छीन ली गईं और उनके साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार किया गया।

न्याय व्यवस्था में सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा के लिये न्याय की समुचित व्यवस्था की। हिन्दुओं के झगड़ों का न्याय भी मुस्लिम काजियों द्वारा किया जाता था किंतु हिन्दुओं के झगड़ों का निबटारा अलग प्रकर से किया जाता था। मुसलमान प्रजा की बजाय हिन्दुओं पर अधिक कड़े दण्ड लगाये जाते थे तथा अधिक कड़ी शारीरिक यातानाएं दी जाती थीं।

(1.) लोक आधारित न्याय व्यवस्था

अलाउद्दीन से पहले, दिल्ली सल्तनत की न्याय व्यवस्था, मुस्लिम धर्म ग्रन्थों पर आधारित थी परन्तु अलाउद्दीन ने उसे लौकिक स्वरूप प्रदान किया। उसने इस्लाम की उपेक्षा नहीं की परन्तु उसने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि परिस्थिति तथा लोक कल्याण के विचार से जो नियम उपयुक्त हों, वही राजनियम होने चाहिए।

(2.) उपयुक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति

सुल्तान ने न्याय करने वाले काजियों की संख्या में वृद्धि कर दी ताकि लोगों को न्याय के लिये अपने झगड़ों का निबटारा करवाने के लिये अधिक दिनों तक नहीं भटकना पड़े तथा अपराधियों को जल्दी से जल्दी सजा दी जा सके।

(3.) न्यायाधीशों की सहायतार्थ पुलिस तथा गुप्तचरों का प्रबन्ध

सुल्तान ने न्यायाधीशों की सहायता के लिए पुलिस की भी समुचित व्यवस्था की। प्रत्येक नगर में एक कोतवाल रहता था जो पुलिस का प्रधान होता था। उसका प्रधान कर्त्तव्य अपराधों का अन्वेषण करना होता था। न्यायाधीश की सहायता के लिए पुलिस के साथ-साथ गुप्तचरों का भी प्रबन्ध किया गया जो अपराधों एवं अपराधियों के अन्वेषण में सहायता करते थे।

(4.) कठोर दण्ड का विधान

अलाउद्दीन का दण्ड-विधान अत्यन्त कठोर था। अपराधी तथा उसके साथियों और सम्बन्धियों को बिना किसी प्रमाण के केवल सन्देह के कारण मृत्यु-दण्ड तक दे दिया जाता था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान से जनता में शासन के प्रति भय बैठ गया। लोग अपराध करने तथा विवाद में पड़ने से डरने लगे।

सेना में सुधार

अलाउद्दीन ने बाह्य आक्रमणों से साम्राज्य की रक्षा करने, साम्राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने तथा साम्राज्य का विस्तार करने के लिये मजबूत सेना का गठन किया तथा उसमें कई सुधार किये-

(1.) सैनिकों की भर्ती करने में सुधार

सुल्तान ने सेना को पूर्ण रूप से अपने नियंत्रण में रखने के लिए सेना के सम्बन्ध में निर्णय लेने का काम अपने तक सीमित कर लिया। उसने सैनिकों को भर्ती करने की व्यवस्था में परिवर्तन किया। सेना का संगठन करने के लिए उसने ‘आरिज-ए-मुमालिक’ की नियुक्ति की। सेना में वही लोग भर्ती किये जाते थे जो घोड़े पर चढ़ना, अस्त्र-शस्त्र चलाना तथा युद्ध करना जानते थे।

(2.) सैनिकों का प्रशिक्षण

उस काल में सेना के प्रशिक्षण एवं परेड आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। सैनिकों का प्रशिक्षण रण क्षेत्र में ही होता था तथा सेना को सक्रिय बनाने रखने के लिए उसे हर समय किसी न किसी युद्ध में नियोजित रखना पड़ता था। शांति काल में सेना को आखेट में व्यस्त रखा जाता था।

(3.) सैनिकों का वर्गीकरण तथा नकद वेतन की व्यवस्था

सुल्तान ने घुड़सवार सैनिकों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया और प्रत्येक श्रेणी के सैनिकों का वेतन निश्चित कर दिया। पहली श्रेणी का सैनिक दो से अधिक घोड़े रखता था, दूसरी श्रेणी का सैनिक केवल दो घोड़े और तीसरी श्रेणी का सैनिक केवल एक घोड़ा रखता था। प्रथम श्रेणी के सैनिक को 234 टंक, द्वितीय श्रेणी के सैनिक को 152 टंक और तृतीय श्रेणी के सैनिकों को 78 टंक वार्षिक वेतन मिलता था। सैनिकों को जागीर देने की प्रथा हटा दी गई और उन्हें नकद वेतन दिया जाने लगा।

(4.) उत्तम अश्वों की व्यवस्था

अलाउद्दीन खिलजी की सेना में घुड़सवार सैनिकों की प्रधानता थी। अतः सुल्तान ने अश्व-विभाग के सुधार पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उसने बाहर से अच्छी नस्ल के घोड़ों को मंगाने की व्यवस्था की। प्रायः मंगोलों के परास्त होने पर सुल्तान को लूट में अच्छे घोड़े प्राप्त हो जाते थे। दक्षिण भारत के राजाओं को परास्त करके सुल्तान ने कुछ अच्छे घोड़े प्राप्त किये थे। राज्य ने अच्छी नस्ल के घोड़े उत्पन्न करने की भी व्यवस्था की।

(5.) हुलिया की व्यवस्था

प्रायः लोग सैन्य-प्रदर्शन के समय अथवा रणक्षेत्र में घोड़े तथा सवार लाकर दिखा देते थे जबकि वे घोड़े तथा सवार वास्तव में युद्ध में भाग नहीं लेते थे। इस बेईमानी को रोकने के लिए सुल्तान ने सैनिकों की हुलिया लिखवाने की प्रथा चलाई। फलतः प्रत्येक सैनिक को एक रजिस्टर में अपनी हुलिया लिखवाना पड़ता था।

(6.) घोड़ों को दागने की व्यवस्था

सैनिक सदैव अच्छे घोड़े नहीं रखते थे। सुल्तान ने इसके लिए घोड़ों को दागने की प्रथा चलाई जिससे सैनिक झूठे घोड़े दिखला कर सुल्तान को धोखा न दें।

(7.) अच्छे शस्त्रों तथा सेनापतियों की व्यवस्था

सुल्तान द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था में सैनिकों को अच्छे से अच्छे घोड़ों तथा उत्तम हथियारों से सज्जित होकर राज्य की सेवा के लिये सदैव तैयार रहना पड़ता था। सुल्तान ने अपनी सेना के संचालन के लिये योग्य सेनापतियों को नियुक्त किया।

(8.) स्थायी सेना की व्यवस्था

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की। यह सेना राज्य की सेवा के लिये सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी। इस स्थायी सेना में चार लाख पचहत्तर हजार सैनिक होते थे।

(9.) दुर्गों की व्यवस्था

सुल्तान ने उन समस्त किलों की मरम्मत कराई जो मंगोलों के मार्गों में पड़ते थे। उसने बहुत से नये दुर्ग भी बनवाये। इन किलों में उसने योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों की अध्यक्षता में सुसज्जित सेनायें रखीं।

आर्थिक सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिये कई आर्थिक सुधार किये-

(1.) व्यक्तिगत सम्पत्ति का अपहरण

अलाउद्दीन खिलजी अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को आन्तरिक उपद्रवों का कारण समझता था। इसलिये उसने अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को उन्मूलित करके उस सम्पत्ति को राजकीय कोष में जमा कर लिया। इस कार्य के लिये उसने साधारण जनता से लेकर अमीरों तक पर अत्याचार किये तथा उनकी हत्याएं करवाईं।

(2.) दान की भूमि का अपहरण

मुसलमानों को मिल्क, इनाम, इशरत (पेंशन) तथा वक्फ (दान) के रूप में जो भूमि प्राप्त थी, उसका सुल्तान ने अपहरण कर लिया। इस प्रकार की कुछ भूमि फिर भी बची रह गई थी परन्तु अधिकांश भूमि छीन ली गई थी।

(3.) जागीरों का अपहरण

सुल्तान ने सैनिकों को जागीर देने की प्रथा बन्द करके नकद वेतन देने की व्यवस्था की। इससे राज्य की आय में वृद्धि हो गई।

(4.) सम्पूर्ण भूमि का खालसा भूमि में परिवर्तन

खालसा भूमि उस भूमि को कहते थे जो सीधे केन्द्र सरकार के अधिकार में होती थी। चूंकि अलाउद्दीन ने जागीरदारी की प्रथा हटा दी, इसलिये अब समस्त भूमि सीधे सरकार के नियन्त्रण में आ गई और खालसा भूमि बन गई।

(5.) भूमि की नाप तथा कर का निर्माण

सुल्तान ने सम्पूर्ण भूमि की नाप करवा कर सरकारी लगान निश्चित कर दिया। जितनी उपजाऊ भूमि होती थी, उसी के हिसाब से लगान देना पड़ता था। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करवाकर लगान वसूल करना आरम्भ किया। इसके लिये एक बिस्वा को एक इकाई माना गया। वह लगान को गलले में लेना पसंद करता था। लगान का निर्धारण तीन प्रकार से किया जाता था-

1. कनकूत- कनकूत से आशय यह था कि जब फसल खड़ी हो तभी लगान का अन्दाजा लगा लिया जाय।

2. बटाई- बटाई से यह तात्पर्य था कि अनाज तैयार हो जाने पर सरकार का हिस्सा निश्चित करके ले लिया जाय।

3. लंकबटाई- लंकबटाई से यह तात्पर्य था कि फसल तैयार हो जाने पर बिना पीटे ही सरकारी हिस्सा ले लिया जाय।

(6.) करों में वृद्धि

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि इतना अधिक कर केवल दोआब में लिया जाता था जहाँ की भूमि अधिक उपजाऊ थी और लोग अधिक विद्रोह करते थे।

(7.) हिन्दू राज्याधिकारियों के विशेषाधिकारों का समापन

यद्यपि सुल्तान ने लगान वसूली के लिए अपने सैनिक अफसर नियुक्त कर दिये थे तथापि पुरानी व्यवस्था को वह पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका था। लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों को नष्ट नहीं किया गया परन्तु उन पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गये और कभी भी राज्य के विरुद्ध सिर नहीं उठा सके।

(8.) दोआब में अनाज लेने की व्यवस्था

दोआब के किसानों से लगान के रूप में अनाज लिया जाता था। उस अनाज को जमा करने के लिए सरकारी बखार होते थे। इन बखारों में इतना अधिक अनाज जमा होता था कि अकाल के समय सेना  के लिये पर्याप्त होता था।

(9.) दीवान ए मुस्तखराज की स्थापना

अलाउद्दीन खिलजी ने बकाया कर वसूलने के लिये दीवान-ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की। उसने सम्पूर्ण साम्राज्य को कई भागों में विभक्त करके प्रत्येक भाग को एक सैन्य-अधिकारी के अनुशासन में रख दिया। यह सैन्य अधिकारी जनता से मालगुजारी वसूल करता था और जितनी सेना उसके सुपुर्द की जाती थी, उसका व्यय निकालने के उपरान्त शेष धन राजकोष में भेज देता था।

अलाउद्दीन द्वारा किये गये सुधारों के परिणाम

उपरोक्त सुधारों से राजकीय आय में भारी वृद्धि हो गई। जनता पर करों का बोझ बढ़ गया। करों का अधिकांश बोझ हिन्दुओं पर ही पड़ा जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि था और जिन्हें अन्य करों के अतिरिक्त जजिया भी देना पड़ता था।

अलाउद्दीन द्वारा बाजारों का प्रबन्धन

राज्य में घूसखोरी तथा अनैतिक तरीके से धन संग्रहण की प्रवृत्ति को रोकने के लिये अलाउद्दीन खिलजी ने बाजारों में मूल्य नियंत्रण के लिये कठोर उपाय किये।

(1.) वस्तुओं का सूचीकरण तथा उनका मूल्य निर्धारण

अलाउद्दीन ने उन वस्तुओं की सूचि तैयार करवाई जिनकी उसके सैनिकों को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती थी। यह सूचि ऐसी सावधानी से बनाई गई थी कि प्रतिदिन के प्रयोग की कोई वस्तु छूटी नहीं थी। इन सब वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिये गये। इन वस्तुओं को कोई भी दुकानदार निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य पर नहीं बेच सकता था। 

(2.) वस्तुओं की पूर्ति की व्यवस्था

सुल्तान ने बाजार में वस्तुओं की माँग तथा पूर्ति में संतुलन बनाने के लिये भी राज्य की ओर से व्यवस्था की। वस्तुओं की पूर्ति का उत्तरदायित्व राज्य ने अपने ऊपर ले लिया। जो वस्तुएँ राज्य स्वयं उत्पन्न कर सकता था, उनके उत्पन्न करने की व्यवस्था की गई; जो राज्य के सुदूर प्रान्तों से मँगवाई जाती थीं, वे वहाँ से मँगवाई जाने लगीं और जो वस्तुएँ देश में नहीं मिल सकती थीं, वे विदेशों से मँगवाई जाने लगीं।

(3.) वितरण की व्यवस्था

वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था के साथ-साथ उनके बाजारों में वितरण की भी समुचित व्यवस्था की गई। दिल्ली में तीन बाजारों की व्यवस्था की गई। एक बाजार सराय अदल कहलाती थी, दूसरी शहना-ए-मण्डी और तीसरे बाजार का नाम अब उपलब्ध नहीं है। तीनों बाजारों में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती थीं। प्रत्येक नियन्त्रित दूकान को उतनी ही मात्रा में वस्तुएँ दी जाती थीं जितनी उस दुकान के उपभोक्ताओं की मांग होती थी।

(4.) बाजार के कर्मचारी

अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार में कई श्रेणियों के अधिकारी नियुक्त किये और उन्हें आदेश दिये कि वे बाजारों पर कड़ा नियंत्रण रखें। इस व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी दीवाने रियासत कहलाता था। उसे तीनों बाजारों पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। दीवाने रियासत के नीचे प्रत्येक बाजार में तीन पदाधिकारी नियुक्त किये गये थे।

पहला पदाधिकारी शाहनाह (निरीक्षक), दूसरा बरीद-ए-मण्डी (लेखक) और तीसरा मुन्हीयान (गुप्तचर) कहलाता था। शाहनाह बाजार के सामान्य कार्यों को देखता था, बरीद घूम-घूम कर बाजार का नियन्त्रण करता था और मुन्हीयान गुप्त एजेन्ट अथवा कारदार होता था।

बरीद बाजार की पूरी सूचना शाहनाह के पास, शाहनाह इस सूचना को दीवाने रियासत के पास और दीवाने रियासत सुल्तान के पास भेज देता था। मुन्हीयान को सुल्तान स्वयम् नियुक्त करता था। वह बाजार की अपनी अलग रिपोर्ट तैयार करके सीधे ही सदर दफ्तर में भेजता था। यदि उसकी तथा अन्य पदाधिकारियों की रिपोर्ट में कुछ अन्तर पड़ता था तो गलत रिपोर्ट देने वाले को बड़ा कठोर दण्ड दिया जाता था।

(5.) कठोर दण्ड की व्यवस्था

सुल्तान उन लोगों को बड़े कठोर दण्ड देता था जो बईमानी करते थे और त्रुटियुक्त बाट रखते थे। कहा जाता है कि जो व्यापारी जितना कम तोलता था, उतना ही मांस उसके शरीर से काटने के निर्देश दिये गये थे परन्तु कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब इस नियम को कार्यान्वित किया गया हो।

(6.) कपड़े के क्रय-विक्रय की व्यवस्था

सुल्तान की ओर से कपड़ों का भी मूल्य निर्धारित किया परन्तु इस मूल्य पर कपड़ा बेचने में व्यापारियों को हानि होने की सम्भावना थी। इसलिये व्यापारियों में कपड़े की दूकानों का अनुज्ञापत्र लेने का साहस नहीं होता था। इसलिये सुल्तान ने कपड़े का व्यापार मुल्तानी व्यापारियों को सौंप दिया। इन व्यापारियों को कपड़ा खरीदने के लिए राजकोष से धन मिलता था और कपड़ा बिक जाने पर इन्हें निर्धारित कमीशन दिया जाता था।

(7.) पशुओं का मूल्य निर्धारण

सुल्तान ने पशुओं के क्रय-विक्रय पर भी राज्य का पूरा नियन्त्रण रखा और उनका मूल्य निर्धारित कर दिया। इस प्रकार प्रथम श्रेणी के घोड़ों का मूल्य 100 से 120 टंक, दूसरी श्रेणी के घोड़ों का 80 टंक और तीसरी श्रेणी के घोड़ों का 65 से 70 टंक निश्चित किया गया। टट्टुओं का मूल्य 10 से 25 टंक निश्चित किया गया। दूध देने वाली गाय का मूल्य तीन-चार टंक और बकरियों का मूल्य 10 से 14 जीतल निश्चित किया गया।

(8.) गुलामों तथा वेश्याओं का मूल्य निर्धारण

बाजार की अन्य वस्तुओं की तरह गुलामों तथा वेश्याओं का भी मूल्य निश्चित किया गया। गुलामों का मूल्य 5 से 12 टंक तथा वेश्या का मूल्य 20 से 40 टंक निश्चित किया गया। कुछ उत्तम गुलामों के दाम 100 से 200 टंक हुआ करते थे। बड़े सुन्दर गुलामों के लड़के 20 से 30 टंक में खरीदे जा सकते थे। गुलाम नौकरानियों का मूल्य 10 से 15 टंक हुआ करता था। घर में कामों के लिये गुलाम 7 से 8 टंक में खरीदे जा सकते थे।

(9.) दलालों का नाश

सुल्तान ने बाजार से दलालों को निकाल दिया तथा उनके नेताओं को कठोर दण्ड दिया।

बाजार प्रबंधन के परिणाम

बाजार के इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि आवश्यक वस्तुएं कम मूूल्य पर मिलने लगीं। सैनिकों के लिये यह संभव हो गया कि वे कम वेतन में भी सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें और अपने परिवार का ठीक से पालन कर सकें। दलालों को बाजार से हटा देने से समस्त चीजों के मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित मूल्य पर बने रहे तथा बाजार से काला बाजारी जैसे हरकतें समाप्त हो गईं।

डॉ. के. एस. लाल ने सिद्ध किया है कि बाजारों का यह नियंत्रण केवल राजधानी तथा उसके आसपास तक ही सीमित था। डॉ. लाल के अनुसार उसकी सफलता भावों को कम करनू में उतनी नहीं है जितनी कि एक लम्बे समय तक भावों को नियंत्रण में रखने में है। बरनी ने लिखा है कि सुल्तान की मृत्युपर्यंत वस्तुओं के भाव एक जैसे ही बने रहे।

सुधारों की सफलता

यह पहले बताया जा चुका है कि सुल्तान के तीन प्रधान लक्ष्य थे- पहला मंगोलों के आक्रमणों को रोकना, दूसरा अमीरों के षड्यन्त्रों तथा विद्रोहों को नष्ट कर आंतरिक शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित करना और तीसरा साम्राज्य का विस्तार करना। अलाउद्दीन ने जिन उद्देश्यों से सुधार आरम्भ किये थे उनमें उसे पूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

(1.) विशाल तथा सुसंगठित सेना की सहायता से उसने मंगोलों को भगाया और सम्पूर्ण भारत में अपनी राज-सत्ता स्थापित की।

(2.) अमीरों के षड्यन्त्रों तथा विद्रोहों के दबाने में भी उसे अपूर्व सफलता प्राप्त हुई। कड़े नियमों तथा कठोर दण्ड द्वारा अपने अपराधों में कमी कर दी। वस्तुओं का मूल्य गिर जाने से साधारण जनता का जीवन सुखी हो गया और लोग सुल्तान की निरंकुशता के समर्थक बन गये।

(3.) यद्यपि सुल्तान को अपनी आय का अधिकांश भाग युद्धों में ही व्यय करना पड़ता था परन्तु सार्वजनिक हित के भी बहुत से कार्य किये गये। उसने दिल्ली के पास एक सुन्दर महल बनवाया। इस्लामी विद्वानों तथा फकीरों को सुल्तान का आश्रय प्राप्त था।

(4.) सुधारों का सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि केन्द्रीय सरकार की शक्ति बहुत बढ़ गई और सुल्तान की सत्ता सर्व-व्यापी हो गई। सुदूरस्थ प्रान्तों के प्रान्तपति भी सुल्तान की आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करने लगे।

(5.) राज्य के समस्त पदाधिकारी बड़ी सतर्कता तथा ईमानदारी के साथ काम करते थे क्योंकि नियमानुसार कार्य न करने वालों को कठोर दण्ड दिये जाते थे।

सुधारों की विफलता

अलाउद्दीन खिलजी की राज्य व्यवस्था सैनिक शक्ति पर आधारित थी। उसके समस्त सुधार सुल्तान की सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिये किये गये थे। ऐसा शासन दीर्घकालीन नहीं हो सकता था। ज्यों-ज्यों सुल्तान की शारीरिक एवं मानसिक शक्ति क्षीण होने लगी, त्यों-त्यों उसकी नीतियों के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा।

बहुत से लोग सुल्तान की योजनाओं से असन्तुष्ट थे। अमीर अपनी जागीरें फिर से प्राप्त करने की ताक में थे। राजपूत जागीरदार एवं पुराने राजवंश अपने खोये हुए राज्यों एवं अधिकारों को फिर से प्राप्त करने के लिये प्रयासरत थे। व्यापारी वर्ग भी सुल्तान की नीतियों से असंतुष्ट था। वस्तुओं के भाव निश्चित कर देने से व्यापारी वर्ग लाभ से वंचित हो गया था। जो व्यापारी दिल्ली से बाहर जाते थे, उनके कुटुम्ब पर शासन द्वारा पूरा नियंत्रण रखा जाता था।

इससे उनके परिवारों की सुरक्षा पर हर समय खतरा बना रहता था। किसान और हिन्दू जनता, करों के बोझ से दब गई थी। गुप्तचर विभाग की मनमानी से भी लोगों में असंतोष बढ़ गया था। सुल्तान के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति को शासन के सम्बन्ध में निर्णय लेने और उसे लागू करने का अधिकार नहीं था। ऐसी व्यवस्था तब तक ही चल सकती थी जब तक कि सुल्तान में उसे चलाने की योग्यता रहे। इन सब कारणों से उसकी व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकी और अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ उसी के साथ समाप्त हो गईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अल्लाउदीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

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