अलाउद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारी उमर खिलजी, मुबारक खिलजी, तथा नासिरूद्दीन खुसरो शाह अयोग्य निकले। इस कारण इन शासकों के काल में खिलजी वंश का पतन हो गया।
अलाउद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारी
1316 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु हो गई। इस समय उसकी बेगम मलिका-ए-जहाँ तथा पुत्र खिज्र खाँ कारागृह में बन्द थे। सेना पर मलिक काफूर का नियंन्त्रण था। इसलिये वही उत्तराधिकार का निर्णय कर सकता था। उसने अमीरों को एकत्रित किया और उन्हें सुल्तान की एक वसीयत दिखलायी जिसमें सुल्तान ने अपने सबसे छोटे पुत्र उमर को अपना उत्तराधिकारी और मलिक काफूर को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया था।
उस समय उमर केवल पांच साल का था। स्वार्थी अमीरों ने इस वसीयत को स्वीकार कर लिया। उमर सुल्तान घोषित कर दिया गया और मलिक काफूर उसका संरक्षक बन गया। इस प्रकार राज्य की सारी शक्ति मलिक काफूर के हाथों में चली गई और वह सल्तनत का वास्तविक शासक बन गया।
राज्य की बागडोर हाथ में आते ही काफूर ने खिलजी वंश के समर्थकों पर अत्याचार करने आरम्भ किये। खिलजी वंश के समस्त समर्थकों को उसने पदच्युत कर दिया। खिज्र खाँ तथा सुल्तान के दूसरे पुत्र शादी खाँ की आँखें निकलवा ली गईं। सुल्तान के तीसरे पुत्र मुबारक की भी आँखें निकलवाने का प्रयास किया गया परन्तु इस कार्य में सफलता न मिली।
मलिक काफूर ने अलाउद्दीन की बेगम मलिका-ए-जहाँ से विवाह कर लिया तथा उसकी सारीे सम्पत्ति छीन कर उसे कारागार में डाल दिया। मुबारक खाँ भी जेल में बन्द कर दिया गया। इस प्रकार मलिक काफूर ने सल्तनत पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाया परन्तु उसके ये समस्त प्रयत्न उस समय निष्फल सिद्ध हुए जब ग्वालियर के किले में बन्द मुबारक खाँ कर्मचारियों को घूस देकर दुर्ग से निकल भागा और दिल्ली आ पहुँचा। उसने कुछ अमीरों को अपनी ओर मिलाकर मलिक काफूर के विरुद्ध संगठन खड़ा किया तथा केवल 35 दिन के क्रूर शासन के उपरान्त मलिक काफूर की हत्या कर दी गई।
अब मुबारक खाँ, सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर का संरक्षक बन गया परन्तु छः दिन बाद ही मुबारक ने पांच वर्षीय सुल्तान उमर की आँखें निकलवा लीं और कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के नाम से तख्त पर बैठ गया।
मुबारक खिलजी
मुबारक खाँ अनुभव-शून्य नवयुवक था। तख्त पर बैठने के समय उसकी आयु 17-18 वर्ष थी। दिल्ली के तख्त पर बैठने के उपरान्त उसने अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिये सेना को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया। उसने सैनिकों को छः महीने का वेतन पेशगी दे दिया तथा अपने पिता के समय के बनाये हुए समस्त कठोर नियमों को हटा दिया।
इससे लोगों ने राहत की सांस ली तथा चारों ओर अच्छा वातावरण बना किंतु मुबारक खिलजी पुराने नियमों एवं व्यवस्थाओं के स्थान पर नये नियम अथवा नई व्यवस्थाएँ नहीं बना सका इससे लोगों में उच्छृखंलता आ गई और उनका नैतिक स्तर बहुत गिर गया। साम्राज्य के विभिन्न भागों में उपद्रव तथा विद्रोह होने लगे।
गुजरात का विद्रोह
मुबारक खाँ को सबसे पहले गुजरात में हुए विद्रोह का सामना करना पड़ा। अल्प खाँ की हत्या के बाद गुजरात में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी थी। गुजरात ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। मुबारक खिलजी ने एक विशाल सेना भेज कर इस विद्रोह को शान्त किया और गुजरात में फिर से दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्थापित की।
देवगिरि का विद्रोह
इन दिनों देवगिरि में यादव राजा हरपाल देव शासन कर रहा था। दिल्ली की गड़बड़ी से लाभ उठा कर उसने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस पर मुबारक खाँ ने एक सेना भेजकर देवगिरि पर अभियान किया। इस युद्ध में हरपाल देव परास्त हो गया। उसकी जिन्दा खाल खिंचवा ली गई और देवगिरि में एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया।
असदुद्दीन का विद्रोह
जब सुल्तान मुबारक खाँ देवगिरि से दिल्ली लौट रहा था तब उसे असदुद्दीन के षड़यंत्र का सामना करना पड़ा जो अलाउद्दीन का भतीजा था। असदुद्दीन ने मुबारक खाँ की हत्या करके तख्त हासिल करने का षड्यन्त्र रचा। मुबारक खाँ को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने असदुद्दीन तथा उसके साथियों की सम्बन्धियों सहित हत्या करवा दी।
खिज्र खाँ की हत्या
अब मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ की ओर ध्यान दिया। खिज्र खाँ जिसे पहले ही अन्धा कर दिया गया था, इन दिनों अपनी स्त्री देवल देवी के साथ ग्वालियर के किले में बंद था। मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ को आदेश भिजवाया कि वह देवल देवी को दिल्ली भेज दे। खिज्र खाँ ने इस आज्ञा का पालन नहीं किया। इसलिये उसकी भी हत्या करवा दी गई।
मुबारक खाँ का अंत
मुबारक खाँ के पतन का कारण उसकी क्रूरता तथा विलासिता की प्रवृत्ति तो थी ही, साथ ही गुजरात का रहने वाला खुसरो नाम का एक अमीर भी उसक पतन के लिये जिम्मेदार था। खुसरो गुजरात का रहने वाला था उसने किसी समय इस्लाम स्वीकार कर लिया था। वह मुबारक खाँ का विश्वस्त था। उसने मुबारक खाँ को नष्ट करने और सल्तनत पर कब्जा करने के लिये मुबारक खाँ को दुर्गुणों में फंसाना आरम्भ किया।
मुबारक खाँ की क्रूरता और विलासिता बढ़ती ही चली गई। वह शराब के नशे में डूबा रहता और विलासिता में चूर होकर औरत के कपड़े पहनकर दरबार में आने लगा। उसने भांडों तथा वेश्याओं को दरबार में पुराने तथा अनुभवरी अमीरों का अभद्र संकेतों तथा अशिष्ट भाषा द्वारा अभिवादन करने की आज्ञा दे दी। बरनी लिखता है कि कभी-कभी सुल्तान नंगा होकर अपने दरबारियों के बीच दौड़ा करता था। उसने खलीफा की उपाधि भी धारण कर ली।
खुसरो ने सुल्तान की आज्ञा से 40 हजार अश्वारोहियों की एक सेना तैयार कर ली जिसके बल पर वह सुल्तान को मारने की योजना बनाने लगा। अन्त में एक दिन खुसरो अपने साथियों के साथ रात्रि के समय सुल्तान के महल में घुस गया। सुल्तान ने खुसरो से पूछा कि यह शोरगुल क्यों है?
खुसरो ने उत्तर दिया कि कुछ घोड़े छूट गये हैं ओर ये लोग उन्हें पकड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। खुसरो यह कह ही रहा था कि खुसरो के आदमी सुल्तान मुबारक खाँ के कक्ष में घुस गये। सुल्तान आतंकित होकर उछल पड़ा और रनिवास की ओर भागा किंतु खुसरो ने उसके बाल पकड़ लिये।
जहीरा नामक आदमी ने भालों से छेदकर सुल्तान को मार डाला। मुबारक का सिर धड़ से अलग करके नीचे चौक में फैंक दिया गया। दूसरे दिन खुसरो ने सुल्तान की मृत्यु का घोषणा कर दी और स्वयं नासिरूद्दीन खुसरो शाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार खिलजी वंश का अन्त हो गया।
नासिरूद्दीन खुसरोशाह
नासिरूद्दीन खुसरोशाह गुजरात का रहने वाला चालाक तथा दुष्टमति व्यक्ति था। उसने किसी समय इस्लाम स्वीकार कर लिया था। वह मुबारक खाँ के सम्पर्क में था। जब मुबारक खाँ दिल्ली का सुल्तान बन गया तब उसके भाग्य का भी उत्कर्ष हो गया। मुबारक खाँ ने खुसरो को तेलंगाना के राय का विद्रोह दबाने के लिए भेजा।
खुसरो को इस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। वह दक्षिण में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना चाहता था परन्तु मुबारक खाँ ने उसे दिल्ली बुलवा लिया। अब खुसरो ने दिल्ली में अपनी महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देना आरम्भ किया। उसने मुबारक खाँ को विलासिता की ओर धकेला तथा उसकी हत्या करके 15 अप्रेल 1320 को स्वयं दिल्ली के तख्त पर बैठ गया।
खुसरो की अलोकप्रियता
खुसरो ने अपने साथियों को राज्य में ऊँचे पद देकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसने पुराने अमीरों को उनके पदों पर रहने देकर और उन्हें नई पदवियां देकर प्रसन्न करने का प्रयास किया। उसे शेख निजामुद्दीन औलिया का नैतिक समर्थन प्राप्त हो गया परन्तु तुर्की अमीर उसे पसंद नहीं करते थे। इसके कई कारण थे-
(1.) खुसरो मूलतः हिन्दू धर्म से था तथा बाद में मुसलमान बना था। इसलिये तुर्की अमीरों को वह सुल्तान के रूप में स्वीकार नहीं था।
(2.) खुसरो हिन्दुओं में भी निम्न समझे जाने वाले वर्ग से था। इसलिये स्वयं को उच्च रक्त वंश का समझने वाले तुर्क अमीर उसे सुल्तान स्वीकार करने में अपनी तौहीन समझते थे।
(3.) खुसरो अपनी क्रूरता एवं कृतघ्नता के कारण पर्याप्त अलोप्रिय हो चुका था क्योंकि उसने सुल्तान को पतन के गर्त में धकेल कर सुल्तान की तथा उसके पूरे परिवार की नृशंसतापूर्वक हत्या करवाई थी।
(4.) खुसरो हिन्दुओं के साथ विशेष सहानुभूति दिखाता था और अपने सम्बन्धियों को ऊँचे पद देता था।
(5.) खुसरो ने कई अमीरों को अपमानित किया था। इससे वे भी उसके प्रबल विरोधी थे।
(6.) अमीरों ने खुसरो पर आरोप लगाया कि वह आधा हिन्दू है तथा शाही महलों में मूर्तिपूजा को प्रोत्साहन देता है। वस्तुतः खुसरो के बहुत से सम्बन्धी अब भी हिन्दू थे और वे महलों में रहकर मूर्ति पूजा करते थे।
खुसरो का अंत
खुसरो की अलोकप्रियता तथा उसके क्रूर कामों से उसके विरोधियों की संख्या बढ़ती ही गई। दिपालपुर के हाकिम गाजी मलिक ने खुसरो के विरुद्ध मोर्चा खोला। उसने अन्य हाकिमों को भड़काकर उन्हें संगठित किया। अन्त में दिल्ली के निकट गाजी मलिक तथा खुसरो की सेनाओं में भीषण लड़ाई हुई जिसमें गाजी मलिक की जीत हुई और 5 सितम्बर 1320 को वह खुसरो को मारकर दिल्ली का सुल्तान बन गया। इस प्रकार एक नये राजवंश का प्रादुर्भाव हुआ।
खिलजी वंश के पतन के कारण
अलाउद्दीन खिलजी के शासन में खिलजी वंश का शासन चरमोत्कर्ष को पहुँच गया था परन्तु उसके जीवन के अन्तिम भाग में ही खिलजी वंश की नींव हिलने लगी थी। उसकी मृत्यु होते ही खलजी वंश का पतन हो गया। खलजी वंश के पतन के कई कारण थे-
(1.) मलिक काफूर पर अत्यधिक भरोसा
खिलजी वंश के पतन का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व अलाउद्दीन खिलजी पर था। उसने अपने पुत्रों पर विश्वास करने के स्थान पर मलिक काफूर पर भरोसा किया। उसने मलिक काफूर को इतना शक्तिशाली बना दिया कि सल्तनत की सम्पूर्ण सेना पर मलिक काफूर का नियंत्रण हो गया। मलिक काफूर ने सुल्तान तथा उसके वंशजों को नष्ट करने के लिये सुल्तान को उसके पुत्रों के विरुद्ध भड़काकर शहजादों को बंदी बना लिया।
(2.) कमजोर उत्तराधिकारी की नियुक्ति
अलाउद्दीन खिलजी ने अपने जीवन काल में अपने बड़े पुत्रों को जेल में डलवाकर अपने छः वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी। उन दिनों में जब हर अमीर भेड़िये की तरह सुल्तान के तख्त का शिकार करने की फिराक में रहता था अलाउद्दीन ने जवान और अनुभवी पुत्रों के जीवित रहते हुए अपने छः वर्ष के पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इससे मलिक काफूर को सुल्तान का संरक्षक बनकर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने का अवसर मिल गया।
(3.) खिज्र खाँ को अंधा करके कैद में डाल दिया जाना
अलाउद्दीन खिलजी का बड़ा पुत्र खिज्र खाँ अंधा करके उसकी स्त्री सहित ग्वालियर के दुर्ग में बंद कर दिया गया था। अलाउद्दीन के दूसरे पुत्र मुबारक खाँ को भी ग्वालियर दुर्ग में बंद कर दिया गया था। इस कारण वे मलिक काफूर के विरुद्ध कुछ नहीं कर सके।
(4.) उत्तराधिकारियों की अयोग्यता
सुल्तान के कई पुत्र थे। उसकी मृत्यु के समय खिज्र खाँ, मुबारक खाँ तथा शादी खाँ युवा थे। उमर शिहाबुद्दीन केवल छः साल का बालक था। सुल्तान ने अपने पुत्रों की शिक्षा का प्रबंध नहीं किया तथा उन्हें योग्य बनाने का भी कोई प्रयास नहीं किया। इसलिये उनमें मलिक काफूर जैसे दुर्दांत अमीर से स्वयं को बचाने तथा तख्त पर अधिकार करने की योग्यता भी नहीं थी।
(5.) सैनिक शासन की स्वाभाविक दुर्बलता
अलाउद्दीन ने सेना के बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी जिसे चलाने के लिये उसे विशाल स्थायी सेना की आवश्यकता रहती थी। अतः सेना के हित के लिए उसने अन्य समस्त हितों को त्याग दिया था। सैनिक शासन कभी स्थायी नहीं हो पाता क्योंकि शक्ति की कुछ सीमाएं होती है। अलाउद्दीन की शक्ति सीमा का उल्लंघन कर गई थी, अतः वही उसके पतन का कारण सिद्ध हुई।
(6.) योग्य परामर्शदाताओं का अभाव
खिलजी वंश के पतन का एक यह भी कारण था कि अलाउद्दीन के जीवन के अन्तिम भाग में सुल्तान का कोई अच्छा पारामर्शदाता न रहा। अलाउद्दीन ने अपने वीर तथा बुद्धिमान् परामर्शदाताओं की सहायता से विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी परन्तु उसके शासन काल के अन्तिम भाग में ये समस्त परामर्शदाता काल कवलित हो गये थे और सुल्तान असहाय तथा किंकर्त्तव्यमूढ़ हो गया था।
(7.) नीच लोगों को प्रात्साहन
खिलजी वंश के सुल्तानों ने नीच व्यक्तियों को अपना प्रिय बनाया। अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को और मुबारक ने खुसरो को अपना प्रिय तथा विश्वासपात्र बनाया। इन्हीं दोनों के कारण खिलजी वंश का पतन हुआ। काफूर ने अलाउद्दीन को बहकाकर राजवंश में कलह का बीज बो दिया जिससे खिलजी वंश की जड़ें हिल गईं। खुसरो ने मुबारक को दुर्व्यसनों मे फंसा कर उसका सत्यानाश कर दिया।
तैमूरलंग का भारत आक्रमण भारत के मध्यकालीन इतिहास की सबसे घृणित घटनाओं में से एक है। इस आक्रमण में लाखों निर्दोष हिन्दुओं को अपने प्राण गंवाने पड़े।
तैमूरलंग
प्रारंभिक जीवन
तैमूरलंग का जन्म 1336 ई. में समरकंद से 50 मील दूर मावरा उन्नहर के कैच नामक नामक नगर में हुआ था। उसके पिता का नाम अमीर तुर्क अथवा अमीर तुर्गे था जो तुर्कों के बरलस कबीले की गुरकन शाखा का नायक था। अमीर तुर्गे ने तैमूर की शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था की।
तैमूर ने कुरान के अध्ययन के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा युद्धकला में महारथ हासिल कर ली। अल्प आयु में ही वह एक छोटे भूभाग का शासक बना दिया गया। तैमूर ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि बारह या चौदह वर्ष की अवस्था से ही स्वतंत्रता की भावना से उसका हृदय ओत-प्रोत हो गया था। एक सामन्त का पुत्र होने के कारण तैमूर पहले चगताई वंश के शासन के अधीन था।
संयोग से उसमें तथा उसके स्वामी में अनबन हो गई। फलतः उसे कई तरह की यातनाएं सहन करनी पड़ी और सुरक्षति स्थान की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। एक बार जब शत्रु उसका पीछा कर रहे थे, तब उसकी टांग टूट गई और वह लंगड़ा हो गया, तभी से वह तैमूर लंग कहलाने लगा।
समरकंद के तख्त की प्राप्ति
1369 ई. में 33 वर्ष की अवस्था में उसे अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो गई। 1370 ई. में उसने तुर्क सरदारों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें तुर्क सरदारों ने उसे अपना सरदार चुन लिया। 1370 ई. में उसने समरकंद पर अधिकार कर लिया और वहाँ का शासक बन गया।
साम्राज्य विस्तार
समरकंद हाथ में आते ही तैमूर ने अपने राज्य को विशाल साम्राज्य में बदलने का निर्णय लिया। कुछ ही समय में उसने ख्वारिज्म, फारस, मेसोपोटामिया आदि देशों पर विजय प्राप्त कर ली और उसका साम्राज्य चंगेज खाँ के साम्राज्य जितना विस्तृत हो गया। इसके बाद तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया।
तैमूरलंग का भारत आक्रमण : कारण
जफरनामा में तैमूरलंग का भारत आक्रमण करने के कारणों का उल्लेख किया गया है। उसके द्वारा भारत पर आक्रमण किये जाने के निम्नलिखित कारण थे-
(1.) तैमूर ने कुरान का अच्छा अध्ययन किया था। वह इस्लाम को भारत में फैलाने के लिये भारत पर आक्रमण करने की योजनाएं बनाने लगा।
(2.) तैमूर अफगानिस्तान के भारत आक्रांताओं की तरह भारत पर विजय प्राप्त करके काफिरों का नाश करना और इस्लामी जगत में अपना नाम कमाना चाहता था।
(3.) उन दिनों भारत में तुगलक शासन अत्यन्त दुर्बल हो रहा था जिसके कारण कुव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप था। तैमूर भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था।
(4.) तैमूर भारत की समृद्धि से अवगत था और वह इसकी अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था।
(5.) तैमूर मूर्ति पूजकों पर विजय प्राप्त करके गाजी की उपाधि प्राप्त करना चाहता था।
(6.) उन दिनों मुल्तान के शासक सारंग खाँ तथा तैमूर के पोते पीर मोहम्मद में संघर्ष चल रहा था। पीर मोहम्मद काबुल का गर्वनर था। उसने सारंग खाँ से कर मांगा और जब उसने कर देने से इन्कार कर दिया तब पीर मोहम्मद ने मुल्तान पर आक्रमण कर दिया। उसने सिन्ध नदी को पार करके छः माह में उच्च तथा मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इस संघर्ष ने भी तैमूर को भारत पर आक्रमण करने के लिये प्रेरित किया।
तैमूरलंग का भारत आक्रमण
तैमूर ने अप्रैल 1398 में 92,000 घुड़सवार सेना के साथ समरकन्द से प्रस्थान किया और कुछ ही समय में सिंधु नदी को पार कर लिया। उसके पोते पीर मोहम्मद ने तब तक सिंध के पश्चिमी भाग को रौंद कर मुल्तान पर अधिकार कर रखा था।
पंजाब का पतन
तैमूर लाहौर की ओर बढ़ा और उसने लाहौर के गर्वनर मुबारक खाँ को परास्त कर दिया। तैमूर की सेनाएं चिनाब नदी के पास पीर मोहम्मद की सेनाओं से मिल गईं। वहाँ से तैमूर की सेनाएं तुलम्बा की ओर बढ़ीं और वहाँ के शासक जसरथ को परास्त किया जो खोखरों का सरदार था। इसके बाद तैमूर लंग पाक-पतन, भटनेर, सरस्वती, फतेहाबाद तथा कैथल को लूटता हुआ पानीपत के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ा। वह दिल्ली से थोड़ी दूर रुक कर दिल्ली पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा।
एक लाख हिन्दू बंदियों की हत्या
उस समय तक उसने एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिये उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि एक लाख हिन्दू बंदियों का कत्ल कर दिया जाये। तैमूर की सेना ने यह काम सफलता पूर्वक सम्पादित कर लिया।
दिल्ली में प्रवेश
दिल्ली का सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तथा उसका प्रधान मन्त्री मल्लू इकबाल खाँ अपनी विशाल सेना लेकर तैमूर का सामना करने के लिए दिल्ली से निकले परन्तु जब उन्होंने सुना कि तैमूर ने एक लाख हिन्दू बंदियों का कत्ल करवा दिया, तो दिल्ली की सेना बुरी तरह घबरा गई और युद्ध के मैदान से भाग खड़ी हुई। मल्लू इकबाल बरान की ओर तथा नासिरुद्दीन महमूद गुजरात की ओर भाग गया। 7 सितम्बर 1398 को तैमूर ने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने फीरोजशाह तुगलक की कब्र के पास अल्लाह को धन्यवाद दिया।
दिल्ली में कत्लेआम
तैमूर पंद्रह दिन तक दिल्ली में रहा। यद्यपि उसने दिल्ली वालों को यह आश्वासन दिया था कि वह दिल्ली में कत्लेआम नहीं मचायेगा किंतु दिल्ली में प्रवेश करते ही उसने अपनी सेना को कत्ले आम करने का आदेश दिया। यह कत्ले आम पूरे तीन दिन तक चलता रहा। उसने असंख्य स्त्रियों तथा पुरुषों को गुलाम बनाया।
कई हजार शिल्पकार और यंत्रकार शहर से बाहर लाये गये और युद्ध में सहायता देने वाले राजाओं, अमीरों और अफगानों में बांटे गये। जफरनामा के अनुसार शहरपनाह तथा सिरी के महल नष्ट कर दिये गये। हिन्दुओं के सिर काट कर उनके ऊँचे ढेर लगा दिये गये और उनके धड़ हिंसक पशु-पक्षियों के लिये छोड़ दिये गये…….
जो निवासी किसी तरह बच गये वे बंदी बना लिये गये। लेनपूल ने लिखा है- इस लूट के पश्चात् तैमूर का प्रत्येक सिपाही धनवान हो गया तथा उन्हें बीस से दो सौ तक गुलाम अपने देश ले जाने को मिले। तैमूर लिखता है- ‘काबू के बाहर हो मेरी सेना पूरे शहर में बिखर गई और उसने लूटमार तथा कैद के अतिरिक्त और कुछ परवाह न की। यह सब कुछ अल्लाह की मर्जी से हुआ है। मैं नहीं चाहता था कि नगरवासियों को किसी भी प्रकार की तकलीफ हो, पर यह अल्लाह का आदेश था कि नगर नष्ट कर दिया जाये।’
उत्तर भारत में भारी तबाही
दिल्ली को नष्ट-भ्रष्ट कर तैमूर मेरठ और हरिद्वार की ओर बढ़ा। स्थान-स्थान पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों में भीषण संग्राम हुआ। इसमें लाखों हिन्दू मारे गये। स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बनाया गया। हरिद्वार में उसने प्रत्येक घाट पर गाय का वध करवाया। लेनपूल लिखता है कि कत्लेआम के यथार्थ उत्सव के उपरांत धर्म के सैनिक तैमूर ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और समझा कि उसका भारत आने का उद्देश्य पूरा हुआ।
तैमूर ने शिवालिक की पहाड़ियों पर विजय प्राप्त कर ली और वहाँ से लूट का माल लेकर वह जम्मू की ओर बढ़ा। तैमूर ने जम्मू के राजा को पराजित कर उसे मुसलमान बनने के लिये बाध्य किया। तैमूर ने खिज्र खाँ सैयद को सुल्तान, लाहौर तथा दिपालपुर का शासक बनाया। 19 मार्च 1399 को तैमूर ने फिर से सिंधु नदी पार की तथा समरकन्द चला गया।
तैमूर के भारत आक्रमण के प्रभाव
तैमूरलंग का भारत आक्रमण मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। वह उस तेज तूफान की तरह आया जो अपने मार्ग में पड़ने वाली हर वस्तु को उजाड़कर चला गया। लाखों हिन्दू मर गये। लाखों गुलाम बनाकर ले जाये गये। लाखों गायें काट कर खाई गईं। तीर्थों की पवित्रता भंग की गई। स्त्रियों के सतीत्व लूटे गये।
खेतों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया तथा लाखों हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर विवश किया गया। इस आक्रमण से भारत में इतने बड़े परिवर्तन हुए कि हम इसे नये युग का आरम्भ करने वाला कह सकते हैं। इस आक्रमण का न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से वरन् सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्व है।
राजनीतिक प्रभाव
तैमूरलंग का भारत आक्रमण से तैमूर के वंशज भारत के घनिष्ट सम्पर्क में आ गये। तैमूर ने पंजाब अपने राज्य में मिला लिया और खिज्र खाँ को उस प्रान्त का शासन चलाने के लिए गर्वनर नियुक्त कर दिया। जब तक खिज्र खाँ जीवित रहा तब तक वह समरकन्द की अधीनता में कार्य करता रहा।
तैमूर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और खिज्र खाँ के उत्तराधिकारी स्वतंत्रता पूर्वक पंजाब में शासन करने लगे। तैमूर के वंशज कभी इस बात को नहीं भूले कि पंजाब उनके साम्राज्य का एक अंग था। इसलिये अब उनकी दृष्टि सदैव पंजाब पर लगी रहती थी। आगे चलकर जब बाबर ने पंजाब पर आक्रमण किया तब उसने दावा किया कि पंजाब पर उसके पूर्वज तैमूर का अधिकार था।
तैमूर के आक्रमण से तुगलक साम्राज्य के प्रान्तपति दिल्ली से स्वतंत्र हो गये। ख्वाजा जहाँ ने जौनपुर में, दिलावर खाँ ने मालावा में तथा मुजफ्फर ने गुजरात में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। तैमूर के आक्रमण ने तुगलकवंश पर ऐसा घातक प्रहार किया कि थोड़े ही दिनों के बाद उसका अन्त हो गया और दिल्ली में एक नये राजवंश की स्थापना हुई।
सांस्कृतिक प्रभाव
तैमूर के आक्रमण का भारत पर सांस्कृतिक प्रभाव भी हुआ। भारत के विभिन्न प्रांत छोटे-छोटे राज्यों में बंटकर दिल्ली की छाया से मुक्त हो गये और स्वतंत्रता पूर्वक अपनी संस्कृति का सृजन तथा संवर्धन करने लगे। इस प्रकार मालवा, गुजरात, बंगाल, जोनपुर तथा बहमनी राज्यों में शिल्पकला की वृद्धि हुई।
साहित्यिक क्षेत्र में जौनपुर की विशेष रूप से उन्नति हुई। जौनपुर साहित्यकारों तथा धर्माचार्यों का केन्द्र बन गया। गुजरात तथा बहमनी राज्यों में भी जौनपुर की भांति साहित्य की विपुल उन्नति हुई। तैमूर भारत की भव्य शिल्प-कला से अत्यधिक प्रभावित हुआ था और उसने भारतीय कारीगरों को अपने साथ ले जाकर समरकन्द में कई मस्जिदें एवं भवन बनवाये।
इससे भारतीय भवन निर्माण कला को नया क्षेत्र तथा नया वायुमण्डल प्राप्त हुआ। भारतीय भवन निर्माण कला ने मध्य एशिया को स्थापत्य कला के सम्मिश्रण से नया स्वरूप प्रदान किया और लगभग सवा-सौ वर्षों के उपरान्त पुनः विदेश से अपनी मातृ-भूमि में इसका प्रत्यागमन हुआ। भारत में इसका अपने नये स्वरूप में मुगल बादशाहों के आश्रय में विकास हुआ जो अपने चरम को पहुँच गया।
आर्थिक प्रभाव
तैमूर के आक्रमण का भारत पर आर्थिक प्रभाव भी पड़ा। इस आक्रमण ने भारत की आर्थिक व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट कर दी। तैमूर के मार्ग में जितने समृद्ध नगर तथा गांव पड़े, सब नष्ट हो गये क्योंकि आक्रमणकारी जिधर से निकलते, गांवों को लूटते, उजाड़ते, जलाते तथा लोगों की हत्या करते जाते थे।
लाखों लोगों के शव खुले में पड़े हुए सड़ते रहे जिससे उत्तर भारत में भांति-भांति के रोग फैल गये। जनता की पीड़ा का कहीं अन्त न था। कृषि तथा व्यापार नष्ट-भ्रष्ट हो गया और अकाल पड़ गया। इससे मानवों एवं पशुओं की मृत्यु हुई। आक्रमणकारी भारत की अपार सम्पत्ति लूट कर अपने देश को ले गये और जनता में ऐसा भय और आंतक फैल गया कि लम्बे समय तक उत्तर भारत में हा-हाकार मचा रहा।
सामाजिक प्रभाव
तैमूर के आक्रमण और तबाही से उत्तरी भारत में भारतीय समाज का ताना-बाना हिल गया। लोगों का मनोबल टूट कर बिखर गया। वे स्वयं को परास्त और निस्तेज अनुभव करने लगे। उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपनी बहिन बेटियों की इज्जत लुटते देखी। अपने पुत्रों और भाइयों के कटे हुए सिरों के ढेर देखे।
अपनी गायों को शत्रुओं द्वारा खाये जाते हुए देखा। उन्होंने अपने खेतों और घरों को जले हुए देखा। वे एक दूसरे से आँख मिलाने लायक नहीं रहे। चारों तरफ ऐसी भयानक बर्बादी मची कि लोग उस बर्बादी से फिर कभी उबर ही नहीं सके। वे हमेशा के लिये निर्धन और पराजित हो गये। वे भविष्य में न कोई युद्ध लड़ सके न किसी आक्रांता का सामना कर सके।
मुसलमानों पर प्रभाव
भारत में जो मुसलमान मुहम्मद गौरी के समय से रह रहे थे, उनमें विजेता होने का भाव था और वे हिन्दू प्रजा को अपने से नीचे के स्तर का समझते थे किंतु तैमूर की सेना ने भारत में रह रहे मुसलमानों को भी नहीं बख्शा तथा उनका भी कत्ले आम मचाया। इससे भारत के हिन्दू तथा मुसलमान एक ही धरातल पर खड़े हुए दिखाई दिये। के. एस. लाल ने लिखा है कि इस आक्रमण से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता की भावना उत्पन्न हुई।
दिल्ली सल्तनत पर प्रभाव
तैमूर की वापसी के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद, अपने वजीर मल्लू इकबाल के भय से कन्नौज की तरफ भाग गया तथा दिल्ली पर वजीर का शासन कायम हो गया। कुछ दिन बाद मल्लू ने पंजाब के प्रांतपति खिज्र खाँ के विरुद्ध अभियान किया जिसे तैमूर ने नियुक्त किया था। खिज्र खाँ ने मल्लू को मार दिया।
इससे दिल्ली का तख्त खाली हो गया और एक अफगान सरदार दौलत खाँ लोदी ने दिल्ली को अपने अधिकार में ले लिया। 1412 ई. में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूदशाह की मृत्यु हो गई तथा 1414 ई. में खिज्र खाँ ने दिल्ली पर अधिकार करके सैयद वंश के शासन की स्थापना की।
तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली सल्तनत से खिलजियों का शासन समाप्त करने में सफल रहा उसका वास्तविक नाम गाजी तुगलक था।
तुगलक कौन थे?
तुगलकों के सम्बन्ध में प्रारंभिक जानकारी फरिश्ता तथा इब्नबतूता के विवरणों से मिलती है। उन दोनों के अनुसार तुगलक, तुर्क थे। फरिश्ता के अनुसार तुगलक भारत में बलबन के समय आये थे और इब्नबतूता के अनुसार तुगलक भारत में अलाउद्दीन खिलजी के समय सिंध से आये थे। भारत आने से पहले तुगलक, सिन्ध तथा तुर्किस्तान के बीच में निवास करते थे।
‘तारीखे रशीदी’ के रचियता मिर्जा हैदर के कथनानुसार तुगलक मंगोल थे परन्तु उसकी बात सही नहीं है क्योंकि-
(1.) भारत में तुगलक वंश की स्थापना करने वाले
गाजी मलिक को 29 बार मंगोलों से युद्ध करना पड़ा। यदि वह मंगोल होता तो मंगोलों से इतने युद्ध नहीं करता।
(2.) गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, बलबन का गुलाम था। उस समय तक मंगोल, तुर्कों के गुलाम नहीं होते थे।
(3.) तुगलकों की आकृति तुर्कों से मिलती थी न कि मंगोलों से।
(4.) तुर्की अमीरों के रहते यह संभव नहीं था कि गाजी तुगलक मंगोल होते हुए भी, तुर्क सुल्तान की हत्या करके स्वयं सुल्तान बन जाता।
(5.) यदि तुगलक मंगोल होते तो बलबन और अलाउद्दीन खिलजी उन्हें अपनी सेवा में नहीं रखते क्योंकि वे दोनों मंगोलों के बड़े शत्रु थे।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह माना जाना ही उचित है कि तुगलक तुर्क थे।
गयासुद्दीन का प्रारम्भिक जीवन
गयासुद्दीन का बचपन का नाम गाजी तुगलक था। इब्नबतूता के कथनानुसार गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, सुल्तान बलबन का गुलाम था और उसकी माता एक जाट स्त्री थी परन्तु अन्य इतिहासकारों का कहना है कि गाजी तुगलक अपने दो भाइयों रजब तुगलक तथा अबूबकर तुगलक के साथ खुरासान से भारत आया।
उसने अलाउद्दीन खिलजी के यहाँ नौकरी कर ली। वह युद्ध में कुशल सैनिक था। धीरे-धीरे वह सुल्तान का कृपापात्र बन गया और दिपालपुर का गवर्नर बना दिया गया। अलाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिनों में गाजी तुगलक की गिनती दिल्ली के प्रमुख अमीरों में होती थी।
सुल्तान मुबारक खिलजी की हत्या होने के बाद खुसरोशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा। खुसरोशाह के अत्याचारों से तंग आकर गाजी तुगलक ने विद्रोह का झंडा उठाया। दिल्ली के कई तुर्की अमीर उसके साथ हो गये। गाजी तुगलक अपनी सेना लेकर दिल्ली आया। दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ में उसने खुसरोशाह को परास्त करके उसका वध कर दिया।
इसके बाद दिल्ली के अमीरों ने एक स्वर से गाजी तुगलक को अपना सुल्तान निर्वाचित किया। इस प्रकार सितम्बर 1320 में वह दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने गयासुद्दीन तुगलक शाह गाजी की उपाधि धारण की। इस प्रकार उसने दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के नाम से एक नये शासक वंश की स्थापना की।
गयासुद्दीन की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ
तुगलक वंश का संस्थापक जिस समय दिल्ली के तख्त पर बैठा, उस समया सल्तनत की दशा बड़ी शोचनीय थी। इस कारण नये सुल्तान के समक्ष कई कठिनाइयां मुँह बाये खड़ी थीं। उसकी दो प्रमुख कठिनाइयां थीं-
(1.) साम्राज्य की विशृंखलता
इस समय केन्द्रीय सरकार के शक्तिहीन हो जाने के कारण अलाउद्दीन का विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो रहा था। प्रांतीय गवर्नर तथा हिन्दू राजा स्वयं को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने का प्रयास कर रहे थे। पंजाब में जो नव-मुस्लिम बस गये थे, वे सदैव षड्यन्त्र रचा करते थे और विद्रोह करने के लिए उद्यत रहा करते थे।
पंजाब के खोखर लोग अब भी विद्रोह करते थे। सिन्ध में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। दक्षिण-सिन्ध लगभग स्वतन्त्र हो गया था। गुजरात में भी अशान्ति फैली थी और वहाँ के गवर्नर स्वतन्त्र होने का प्रयत्न कर रहे थे। बंगाल का प्रान्त दिल्ली से दूर होने के कारण स्वतंत्र होने का प्रयत्न करता रहता था। राजपूताना के वीर राजपूत भी अपने खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे। दक्षिण के राज्य भी धीरे-धीरे स्वतन्त्र हो रहे थे।
(2.) साम्राज्य की आर्थिक दुर्दशा
गयासुद्दीन की दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई सल्तनत की आर्थिक विपन्नता थी। मुबारक खिलजी तथा खुसरोशाह ने राजकोश का सारा धन सेना तथा अयोग्य व्यक्तियों को बाँट दिया था। इससे राजकोष बिल्कुल रिक्त हो गया था। अलाउद्दीन के कठोर नियमों के कारण बहुत से किसान खेत छोड़कर भाग गये थे इसलिये कृषि की दशा भी अच्छी नहीं थी।
गयासुद्दीन के सुधार
गयासुद्दीन ने अपना शासन जमाने के लिये कई कार्य किये तथा नई सुधार योजनाएं आरम्भ कीं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है-
(1.) आर्थिक सुधार
सबसे पहले गयासुद्दीन ने आर्थिक सुधारों की ओर ध्यान दिया। जिन लोगों ने राज्य का धन हड़प लिया था, विशेषकर जिन लोगों ने खुसरो से रिश्वत ली थी, उन्हें सारा धन राजकोष में वापस जमा करवाने के लिये बाध्य किया गया।
(2.) राजवंश की महिलाओं का उद्धार
जिन लोगों ने खिलजी राजवंश की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था, उन्हें दण्ड दिया गया। खिलजी राजवंश की महिलाओं में से जो विवाह के योग्य थीं, उनके लिए उचित वर ढूँढ़ कर उनका विवाह कर दिया गया। अन्य महिलाओं को पेंशन देने की व्यवस्था की गई।
(3.) पदों तथा पदवियों का वितरण
जिन लोगों ने खुसरो के विरुद्ध गयासुद्दीन की सहायता की थी, उन्हें पदों तथा जागीरों से पुरस्कृत किया गया। उसने अपने सम्बन्धियों को भी अनुग्रहीत किया। इस प्रकार गयासुद्दीन ने अमीरों तथा अपने सम्बन्धियों को सन्तुष्ट कर बड़ी सतर्कता के साथ शासन का कार्य आरम्भ किया।
(4.) कृषि का सुधार
राजधानी में व्यवस्था स्थापित करने के बाद गयासुद्दीन तुगलक ने कृषि सुधारों की ओर ध्यान दिया। उसने अलाउद्दीन की कठोर नीति को त्याग दिया और किसानों के साथ उदारता का व्यवहार किया। राज्य की ओर से भूमि का निरीक्षण करवा कर भूमि-कर निश्चित कर दिया। उपज का सातवाँ अथवा दसवाँ भाग राज्य द्वारा लेना तय किया गया।
किसानों को अनेक प्रकार की सुविधायें दी गईं। उन्हें हल-बीज के लिये राज्य की ओर से धन दिया गया और सिंचाई के लिए कुएँ तथा नहरें खुदवाई गईं। गयासुद्दीन तुगलक के आर्थिक सुधार दो सिद्धांतों पर अधारित थे- (1.) कोई अमीर अधिक अमीर न हो और (2.) कोई भी व्यक्ति इतना दरिद्र न हो कि उसका भरण पोषण भी कठिन हो जाये।
(5.) न्यायसम्बन्धी सुधार
गयासुद्दीन ने न्याय विभाग में भी सुधार किया। उसने प्राचीन निर्णयों तथा कुरान के सिद्धान्तों के आधार पर एक न्याय विधान बनवाया और तदनुसार न्याय करने की आज्ञा दी। इस प्रकार गयासुद्दीन तुगलक, दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने न्याय विधान बनवाया।
(6.) डाक की व्यवस्था
गयासुद्दीन ने सल्तनत के विभिन्न भागों में डाक पहुँचाने की सुन्दर व्यवस्था की। डाक वितरण के लिये घुड़सवार तथा पैदल सिपाही लगाये गये जो डाक लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते थे। प्रत्येक मार्ग पर निश्चित दूरी पर चौकियाँ बनाई गई। जहाँ पर पत्र-वाहक सदैव उपस्थित रहते थे।
ये पत्र-वाहक एक हाथ में थैला और दूसरे हाथ में लाठी लिए रहते थे। उनके सिरों पर घन्टियाँ लगी रहती थीं। पत्र-वाहक दौड़ता हुआ जाता था। घन्टी की आवाज से अगली चौकी के पत्र-वाहक को पता लग जाता था कि डाक आ रही है।
(7.) दान व्यवस्था
तुगलक वंश का संस्थापक उदार तथा दानशील शासक था। उसने परिश्रमशील तथा अध्यवसायी व्यक्तियों को प्रोत्साहन दिया। गरीबों के लिये उसने एक दानशाला की व्यवस्था की। जहाँ फकीरों, भिखारियों तथा जरूरतमंद विद्वानों की आर्थिक सहायता की जाती थी।
(8.) सैन्य सुधार
गयासुद्दीन ने सेना में भी कई सुधार किये। उसने सैनिकों के साथ उदारता का व्यवहार किया। सेना का वेतन वह अपने सामने बँटवाता था जिससे धन का अपव्यय न हो। उसने अपनी सेना में, योग्य सेनापतियों की अधीनता में हजारों नये घुड़सवारों को भर्ती किया। घोड़ों का अच्छी तरह निरीक्षण किया जाता था और उन्हें दागा जाता था।
(9.) शासन की सुव्यवस्था
गयासुद्दीन के समय की शासन व्यवस्था, न्याय तथा समानता के सिद्धान्त पर आधारित थी। वह प्रजा के हित का सदैव ध्यान रखता था। वह अपने कर्मचारियों को अच्छा वेतन देता था। परिश्रमी तथा ईमानदार व्यक्तियों को ऊँचे पदों पर नियुक्त करता था तथा योग्य व्यक्तियों को समुचित पुरस्कार देता था। उसने सूबेदारों से राजस्व वसूलने के अधिकार छीन लिये। पुलिस विभाग में भी उसने कुछ परिवर्तन किये।
(10) धार्मिकव्यवस्था
तुगलक वंश का संस्थापक तुगलक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार हिन्दुओं के प्रति उसका व्यवहार उदार नहीं था। अलाउद्दीन खिलजी ने हिन्दुओं पर जो कर लगाये थे वे ज्यों के त्यों जारी रहे। उसने हिन्दुओं के नाम यह फरमान जारी किया कि वे पूंजी का संग्रह न करें।
हिन्दुओं को लूटना, उनको जबरन मुसलमान बनाना तथा उनके देवालयों को धराशायी करना उसके शासन में भी पूर्ववत् बना रहा। युद्ध के समय में वह हिन्दुओं के मन्दिरों तथा मूर्तियों को विध्वंस करने में लेश-मात्र भी संकोच नहीं करता था। गयासुद्दीन ने मुसलमान जनता के नैतिक जीवन को ऊँचा उठाने के लिये भी कई प्रयास किये।
गयासुद्दीन के सैनिक अभियान
गयासुद्दीन ने अपने शासन काल में निम्नलिखित सैनिक अभियान किये-
(1.) वारंगल पर आक्रमण (1321 ई.)
इन दिनों तेलंगाना में काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन कर रहा था। वह अलाउद्दीन खिलजी के समय से दिल्ली को खिराज दे रहा था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली को खिराज देना बन्द कर दिया और स्वतन्त्र होने का प्रयास करने लगा।
गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जूना खाँ को एक विशाल सेना देकर वारंगल पर आक्रमण करने भेजा। जूना खाँ ने वारंगल पर घेरा डाल दिया। छः माह तक घेरा चलने पर भी दिल्ली की सेना को विजय प्राप्त नहीं हुई। इसी बीच शहजादे जूना खाँ को सुल्तान के मरने की आशंका हुई और वह घेरा उठाकर दिल्ली की ओर रवाना हो गया।
दिल्ली पहुँच कर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। वह सुल्तान से क्षमा याचना करके 1323 ई. में पुनः वारंगल के लिये रवाना हो गया। राजा प्रताप रुद्रदेव की पराजय हुई और वह सपरिवार बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। तेलंगाना का राज्य, दिल्ली में मिला लिया गया और वहाँ पर एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया। इस विजय से जूना खाँ ने सुल्तान का विश्वास अर्जित कर लिया।
(2.) जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण (1323 ई.)
जाजनगर के राजा भानुदेव (द्वितीय) ने प्रताप रुद्रदेव की सहायता की थी, अतः जूना खाँ ने वारंगल विजय के बाद जाजनगर पर आक्रमण कर दिया। इस अभियान में शाहजादे को सामरिक विजय के साथ-साथ लूट कर बहुत सा माल तथा 50 हाथी मिले। जूना खाँ लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। उड़ीसा को दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया गया।
(3.) मंगोल आक्रमण (1324 ई.)
मंगोल 1307 ई. के बाद से भारत से दूर थे। 1324 ई. में सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के शासन काल में मंगोलों ने एक बार फिर भारत की ओर रुख किया तथा समाना पर आक्रमण किया। इस समय शहजादा जूना खाँ वारंगल आक्रमण में व्यस्त था।
इसलिये गयासुद्दीन तुगलक ने समाना के हाकिम अलाउद्दीन की सहायता के लिए दिल्ली से एक सेना भेजी। इस सेना ने पहली बार शिवालिक पहाड़ी के पास तथा दूसरी बार व्यास नदी के किनारे मंगोलों को परास्त किया। प्रमुख मंगोल योद्धा बंदी बना लिये गये तथा शेष मंगोालों को दिल्ली सल्तनत की सीमा से बाहर निकाल दिया गया।
(4.) लखनौती पर आक्रमण (1324 ई.)
राजधानी दिल्ली से दूर होने के कारण बंगाल के प्रान्तपति अवसर पाते ही स्वतंत्र होने की चेष्टा करते थे। इन दिनों बंगाल में शमसुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा था। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई।
उसने अपने भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया। शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया तथा राजधानी दिल्ली का प्रबन्ध अपने पुत्र जूना खाँ को सौंप कर, स्वयं एक सेना लेकर बंगाल के लिए चल दिया।
बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया।
(5.) तिरहुत के शासक से संघर्ष (1324 ई.)
जब तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन लखनौती से दिल्ली को लौट रहा था तब उसने मार्ग में तिरहुत पर आक्रमण किया। इन दिनों राजा हरिसिंहदेव मिथिला पर शासन कर रहा था। हरिसिंह पराजित होकर जंगलों में भाग गया। तिरहुत दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया गया। अहमद खाँ को वहाँ का गवर्नर बनाया गया।
गयासुद्दीन की हत्या (1325 ई.)
तिरहुत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त सुल्तान ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान ने जूना खाँ के पास आज्ञा भेजी कि राजधानी से कुछ दूरी पर एक महल बनाया जाये जिससे सुल्तान उसमें रात्रि व्यतीत कर दूसरे दिन समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश कर सके। इस पर शाहजादे ने मीर-इमारत अहमद अयाज को लकड़ी का एक महल बनाने की आज्ञा दी।
जब सुल्तान वापस आया तब शाहजादे ने तुगलकाबाद में बड़े समारोह के साथ उसका स्वागत किया। तुगलकाबाद से तीन-चार मील दूर अफगानपुर में सुल्तान को प्रीतिभोज देने के लिए एक शामियाना लगवाया गया। जब भोजन समाप्त हो गया तब समस्त आमन्त्रित व्यक्ति शामियाने के बाहर निकल आये।
केवल सुल्तान तथा उसका एक छोटा पुत्र, जिसमें सुल्तान की विशेष अनुरक्ति थी, शामियाने के भीतर रह गये। इसी समय शाहजादे जूना खाँ ने सुल्तान से कहा कि जो हाथी बंगाल से लाये गये हैं, उनका संचालन हो। सुल्तान सहमत हो गया। जब हाथियों का संचालन हो रहा था तब अचानक शामियाना गिर पड़ा और सुल्तान तथा उसके अल्पवयस्क पुत्र महमूद खाँ की मृत्यु हो गई। उसी रात को सुल्तान का शरीर तुगलकाबाद के मकबरे में दफन कर दिया गया। इब्नबतूता ने सुल्तान की मृत्यु का सारा दोष जूना खाँ पर डाला है।
गयासुद्दीन का चरित्र
तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक अनुभवी सेनापति तथा सुलझा हुआ शासक था। उसने खिलजियों के शासनकाल में सीमा रक्षक के रूप में अच्छी ख्याति अर्जित की थी। वह परिस्थतियों को समझने तथा उनका लाभ उठाने की शक्ति रखता था। इसीलिये वह एक साधारण सैनिक से सुल्तान बन गया।
तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के बाद से दिल्ली सल्तनत में चल रही अराजकता की स्थिति को समाप्त करने में सफल रहा। सुल्तान के रूप में भी वह सफल रहा। उसने दिल्ली सल्तनत में शांति स्थापित की और कानून का राज्य स्थापित किया। उसने दक्षिण में वारंगल तथा पश्चिमोत्तर में मंगोलों से सफल युद्ध किये।
उसने किसानों की हालत सुधारने का प्रयास किया जिससे सल्तनत को मजबूती दी जा सके। वह न्याय प्रिय शासक था इसलिये दिन में दो बार दरबार लगाकर लोगों के झगड़े निबटाता था।
उसने दिल्ली सल्तनत के गौरव को बढ़ाया। उसके दुर्भाग्य से उसका पुत्र जूना खाँ अत्यंत महत्वाकांक्षी था जो जल्दी से जल्दी दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था इसलिये जूना खाँ ने छल से सुल्तान की हत्या कर दी।
मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि वह एक बुद्धिमान शासक था किंतु इन योजनाओं की विफलताओं के कारण उसे पागल सुल्तान कहा गया।
मुहम्मद बिन तुगलक
प्रारंभिक जीवन
मुहम्मद बिन तुगलक के बचपन का नाम फखरुद्दीन मुहम्मद जूना खाँ था। वह अपने चार भाइयों में सबसे बड़ा, सर्वाधिक महत्वाकांक्षी एवं सबसे प्रतिभावान था। उसका पालन-पोषण एक सैनिक की भांति हुआ था। पिता गाजी तुगलक ने उसकी शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध किया। सुल्तान खुसरोशाह ने उसे कुछ घोड़ों का अध्यक्ष नियुक्त किया।
खुसरोशाह के विरुद्ध जूना खाँ ने ही षड़यंत्र रचना आरम्भ किया था जिसमें उसका पिता गाजी तुगलक भी शामिल हो गया। जब यह षड़यंत्र सफल हो गया तो गाजी खाँ को सुल्तान बनाया गया तथा जूना खाँ को उसका उत्तराधिकारी घोषित किया गया। कुछ दिन बाद सुल्तान ने उसे उलूग खाँ की उपाधि दी। अपने पिता के अधीन काम करते हुए उसने वारंगल विजय करके तथा जाजनगर विजय करके अच्छी ख्याति अर्जित कर ली।
दिल्ली के तख्त की प्राप्ति
जूना खाँ प्रारम्भ से ही महत्वाकांक्षी था। खुसरोशाह के विरुद्ध किये गये विद्रोह के सफल रहने के बाद वह युवराज पद से संतुष्ट नहीं था। उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। इसलिये वह पिता की मृत्यु का संदेह होते ही वारंगल से घेरा उठाकर दिल्ली लौट आया था किंतु पिता को जीवित देखकर वह बड़ा निराश हुआ।
1325 ई.में जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बंगाल विजय के लिये गया तब जूना खाँ ने उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया तथा सुल्तान के दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही उसकी हत्या करवा दी। उसकी मृत्यु के तीन दिन बाद ही जूना खाँ, मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तथा चालीस दिन तक काले वस्त्र पहनकर अफगानपुरी में शोक मनाता रहा।
जब गयासुद्दीन के समस्त अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो गये तब उसने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। दिल्ली पहुँचने के बाद फरवरी अथवा मार्च 1325 में भव्य समारोह के साथ मुहम्मद बिन तुगलक का राज्याभिषेक हुआ।
सल्तनत की स्थिति
मुहम्मद बिन तुगलक को अपने पिता से अत्यन्त सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था। मेहदी हुसैन के अनुसार इतना विशाल साम्राज्य आज तक किसी तुर्क सुल्तान को अपने पिता से नहीं मिला था। उसके पिता का राजकोष भी धन तथा रत्नों से परिपूर्ण था। इब्नबतूता लिखता है कि गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद में एक प्रासाद बनवाया जिसकी ईंटें स्वर्ण से आवरित की गईं।
इस महल के भीतर उसने बहुमूल्य वस्तुओं को संग्रहीत किया और एक सरोवर बनवाया जिसमें स्वर्ण को पिघलाकर भरा गया था। अतः स्पष्ट है कि मुहम्मद बिन तुगलक को सुल्तान बनते समय किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं था। तख्त पर बैठते समय उसके तीन भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। इस प्रकार उसे न बाह्य आक्रमणों का भय था और न आन्तरिक विद्रोह का।
सुल्तान के पद को सुदृढ़ता प्रदान करने का कार्य
दिल्ली का सुल्तान बनते समय मुहम्मद बिन तुगलक के समक्ष केवल एक समस्या थी कि लोग उसे पितृहन्ता न समझें। इससे साम्राज्य में उसके विरुद्ध वातावरण बनता तथा सुल्तान को हटाने के षड़यंत्र आरम्भ हो जाते। इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक ने लोकप्रियता अर्जित करने तथा सुल्तान के पद को सुदृढ़ता प्रदान करने के उद्देश्य से कई उपाय किये-
(1) समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश
बरनी ने लिखा है कि मुहम्मद बिन तुगलक के नगर प्रवेश से पूर्व दिल्ली को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया। गुम्बजें निर्मित की गईं तथा मार्गों को सुंदर वस्त्रों से अलंकृत किया गया। सुल्तान बनने के उपलक्ष में राजधानी में ढोल बजाये गये। सुल्तान ने जनता में सोने चांदी की बिखेर की।’ इस समारोह का जन-साधारण पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। सुल्तान ने सड़कों पर स्वर्ण तथा रजत मुद्राओं की वर्षा करके जनता को मुग्ध कर लिया और लोग उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
(2) पदों तथा पदवियों का वितरण
अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए सुल्तान ने पदों तथा पदवियों का नये सिरे से वितरण किया। उसने विद्वानों, कवियों तथा दीन-दुखियों को वार्षिक पेन्शनें, जागीरें तथा इनाम दिये। इस प्रकार धन, पद तथा पदवियों का वितरण करके सुल्तान ने ऐसी लोकप्रियता अर्जित की कि लोगों को उसे पितृहन्ता कहने का साहस नहीं हुआ। इस प्रकार अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना कर उसने शासन का कार्य आरम्भ किया।
(3) निजामुद्दीन औलिया का आशीर्वाद
उन दिनों दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया का बड़ा प्रभाव था। मुहम्मद बिन तुगलक ने औलिया को उसी समय अपने पक्ष में कर लिया था जिस समय गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान पर था। औलिया को मुहम्मद बिन तुगलक के पक्ष में देखकर जनसामान्य ने भी नये सुल्तान का विरोध नहीं किया।
(4) खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति
भारत के प्रारंभिक तुर्की सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठने के बाद खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति प्राप्त करके मुस्लिम जगत में अपनी धाक जमाते थे। परवर्ती तुर्की शासकों ने इस परम्परा को तोड़ दिया था। मुहम्मद बिन तुगलक ने मिस्र के अब्बासी खलीफाओं से स्वयं को भारत के सुल्तान पद की स्वीकृति दिलवाई। उसने अपने सिक्कों एवं खुतबों पर खलीफाओं का नाम अंकित करवाया।
मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएँ
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं-
(1.) योजनाओं का काल- 1324 ई. से 1335 ई. तक के काल में सुल्तान ने कई योजनाएं बनाकर लागू कीं जिनमें सुल्तान को आंशिक सफलता तथा आंशिक विफलता प्राप्त हुई।
(2.) विद्रोहों का काल- 1335 ई. से 1351 ई. तक का काल जिसमें साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह हुए और सुल्तान का जीवन इन विद्रोहों का दमन करने में ही समाप्त हो गया।
(1.) राजस्व शासन में सुधार
तख्त पर बैठते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने राजस्व सुधार के लिये कई कानून बनाये। उसने सूबों की आय-व्यय का हिसाब रखने के लिये एक रजिस्टर तैयार करवाया। उसने समस्त सूबेदारों को अपने-अपने सूबों के हिसाब भेजने के आदेश दिये। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि सल्तनत के समस्त सूबों में समान लगान-व्यवस्था लागू की जाये और कोई भी गांव लगान देने से मुक्त न रहे।
(2.) कृषि की उन्नति का प्रयास
गयासुद्दीन तुगलक की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने भी कृषि की उन्नति के लिये प्रयास किये। उसने अलग से कृषि विभाग की स्थापना की। उस विभाग का नाम दीवाने कोही था। इस कार्य के लिये साठ वर्ग मील का एक भूभाग चुनकर उसमें विभिन्न फसलें बोई गई। तीन वर्ष में 70 लाख टका (रुपया) व्यय किया गया किंतु सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता तथा समय की कमी के कारण यह योजना असफल रही और बंद कर दी गई।
(3.) दोआब पर कर में वृद्धि
तख्त पर बैठने के थोड़े ही दिन बाद सुल्तान ने दोआब पर कर में वृद्धि की। बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस तथा बीस गुना था। किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त घरी, अर्थात गृहकर तथा चरही अर्थात् चरागाह कर भी लगाया गया।
प्रजा को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ। दुर्भाग्य से इन्हीं दिनों अकाल पड़ा और चारों ओर विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। शाही सेनाओं ने विद्रोहियों को कठोर दण्ड दिये। इस पर लोग जंगलों में भाग गये। शाही सेना ने जंगलों से लोगों को पकड़कर उन्हें यातनाएं दीं। यद्यपि सुल्तान ने बाद में प्रजा की सहायता के लिए कई व्यवस्थाएँ कीं परन्तु वे उस समय की गयीं जब प्रजा का सर्वनाश हो चुका था। इस कारण प्रजा सुल्तान की उदारता से कोई लाभ नहीं उठा सकी।
कर वृद्धि के कारण
इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा दो आब में की गई कर वृद्धि के अलग-अलग कारण बताये हैं-
(1.) बदायूनीं का कहना है कि यह अतिरिक्त कर दोआब की विद्रोही प्रजा को दण्ड देने तथा उस पर नियन्त्रण रखने के लिए लगाया गया था। सर हेग ने भी इस मत का अनुमोदन किया है।
(2.) कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सुल्तान ने अपने रिक्त कोष की पूर्ति के लिए दोआब पर अतिरिक्त कर लगाया था।
(3.) गार्डनर ब्राउन का कहना है कि दोआब साम्राज्य का सबसे अधिक धनी तथा समृद्धिशाली भाग था। इसलिये इस भाग से साधारण दर से अधिक कर वसूला जा सकता था।
(4.) अधिकांश विद्वानों का मानना है कि दोआब का कर, शासन-प्रबन्ध को सुधारने के विचार से बढ़ाया गया था।
कर नीति की असफलता: सुल्तान की यह योजना सफल नहीं हुई। इसके दो प्रमुख कारण थे- (1.) प्रजा बढ़े हुए कर को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि कोई भी अधिक कर देना पसन्द नहीं करता। (2.) इन्हीं दिनों दोआब में अकाल पड़ गया था, जनता बढ़े हुए कर को चुका नहीं सकती थी।
कर नीति की समीक्षा
बरनी ने मुहम्मद बिन तुगलक की कर नीति की कटु आलोचना की है। कुछ इतिहासकारों ने बरनी की आलोचना पर आक्षेप लगाये हैं कि बरनी की आलोचना में अतिरंजना है। बरनी की इस कटु आलोचना का कारण यह था कि बरनी उलेमा वर्ग का था जिसके साथ सुल्तान की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी।
इसलिये सुल्तान की निन्दा करना बरनी के लिए स्वाभाविक ही था। इसके अतिरिक्त बरनी बरान का रहने वाला था और बरान को भी दोआब के कर का शिकार बनना पड़ा था। इसलिये उसमें मात्भूमि के प्रेम का आवेश था परन्तु बरनी द्वारा की गई कटु आलोचना बिल्कुल निर्मूल भी नहीं कही जा सकती।
गार्डन ब्राउन ने सुल्तान को बिल्कुल निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न किया है और प्रजा की हालत खराब होने का सारा दोष अकाल पर डाला है परन्तु यदि ऐसा था तो सुल्तान को अकाल आरम्भ होते ही अतिरिक्त कर हटा देना चाहिए था और प्रजा की सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए थी। उसे शाही कर्मचारियों पर भी पूरा नियन्त्रण रखना चाहिए था। जबकि सुल्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया इसलिये सुल्तान को उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता।
(4.) राजधानी का परिवर्तन
सुल्तान की चौथी योजना राजधानी का स्थान परिवर्तन करने की थी। उसने दिल्ली के स्थान पर दक्षिण भारत में स्थित देवगिरि को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया और उसका नाम दौलताबाद रखा।
राजधानी परिवर्तन के कारण: सुल्तान द्वारा राजधानी परिवर्तन का निर्णय लेने के पीछे कई कारण बताये जाते हैं-
(1.) दिल्ली मुहम्मद बिन तुगलक की सल्तनत के उत्तरी भाग में स्थित थी जबकि देवगिरि साम्राज्य के केन्द्र में स्थित थी जहाँ से साम्राज्य के विभिन्न भागों पर यथोचित नियन्त्रण रखा जा सकता था।
(2.) यद्यपि दक्षिण भारत को दिल्ली के सुल्तानों ने विजय कर लिया था परन्तु वहाँ पर उनकी सत्ता स्थायी रूप से नहीं रह पाती थी। इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण में अपनी राजधानी बनाकर वहाँ भी अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना सकता था।
(3.) याहया का कहना है कि दोआब में कर-वृद्धि तथा अकाल के कारण दिल्ली में बड़ा असन्तोष तथा अशान्ति फैल गई। इसलिये यहाँ की हिन्दू जनता को दण्ड देने के लिए सुल्तान ने समस्त दिल्ली वासियों को देवगिरि जाने की आज्ञा दी।
(4.) इब्नबतूता के अनुसार कुछ लोग सुल्तान की नीति से असन्तुष्ट थे। ये लोग पत्रों में गालियाँ लिख कर और उन्हें तीरों में बाँध कर रात्रि के समय सुल्तान के महल में फेंका करते थे। चंूकि तीर फेंकने वालों का पता लगाना कठिन था इसलिये सम्पूर्ण दिल्ली निवासियों को उन्मूलित करने के लिए सुल्तान ने राजधानी के परिवर्तन करने की योजना बनाई।
(5.) बरनी के अनुसार सुल्तान ने मध्यम श्रेणी तथा उच्च-वर्ग के लोगों का विनाश करने के लिए राजधानी परिवर्तन की योजना तैयार की थी।
(6.) कुछ विद्वानों की धारणा है कि मंगोल आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित रखने के लिए सुल्तान ने देवगिरि को राजधानी बनाने की योजना बनाई।
विभिन्न इतिहासकारों द्वारा बताये गये उपरोक्त कारणों में से याहया, इब्नबतूता तथा बरनी द्वारा बताये गये मत निराधार हैं। मंगोलों के आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित बनाने के लिये उसे दूर ले जाने का तर्क भी अमान्य है क्योंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए ही अलाउद्दीन खिलजी तथा बलबन अपनी सीमा की सुरक्षा तथा समुचित व्यवस्था करने में सफल सिद्ध हुए थे। अतः निश्चित रूप से केवल इतना ही कहा जा सकता है कि शासन की सुविधा तथा दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ़ करने के लिए सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन की योजना बनाई थी।
राजधानी परिवर्तन का स्वरूप: इतिहासकारों का अनुमान है कि साम्राज्य की सुव्यवस्था के लिए सुल्तान ने दो राजधानियाँ रखने का निश्चय किया। उत्तरी साम्राज्य की राजधानी दिल्ली और दक्षिण की देवगिरि होनी थी। देवगिरि के महत्व को बढ़ाने के लिए सुल्तान ने राजवंश के लोगों, बड़े-बड़े अमीरों, विद्वानों, सन्त महात्माओं आदि को वहाँ पर बसाने का निश्चय किया।
इन लोगों के बसने पर ही देवगिरि मुस्लिम सभ्यता के प्रसार का केन्द्र बन सकती थी। दक्षिण में मुस्लिम जनसंख्या के बढ़ जाने पर ही दक्षिण पर पूर्ण सत्ता स्थापित रह सकती थी। अतः सुल्तान ने अपनी माता मखदूम-जहाँ को देवगिरि भेज दिया। उसके साथ दरबार के अमीरों, विद्वानों, घोड़ों, हाथियों, राजकीय भण्डारों आदि को भी भेजा।
इन लोगों की सुविधा के लिए सुल्तान ने अनेक प्रकार का प्रबन्ध किया। दिल्ली से दौलताबाद जाने वाली सड़क की मरम्मत कराई गई और उसके किनारे आवश्यक वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था की गई। लोगों के लिए सवारियों का भी प्रबन्ध किया गया। यात्रियों को कई प्रकार की सुविधायें दी गईं। दौलताबाद में भव्य भवनों का निर्माण कराया गया और समस्त प्रकार की सुविधाओं को देने का प्रयत्न किया गया।
राजधानी परिवर्तन के परिणाम
राजधानी परिवर्तन के निम्नलिखित परिणाम निकले-
(1.) जो लोग दिल्ली से दौलताबाद गये थे, वे इस परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं थे। उन्हें दिल्ली की स्मृतियाँ सम्भवतः वेदना पहुँचाया करती थीं। उन्हें यह स्थानान्तरण दण्ड के समान प्रतीत हुआ। इसलिये वे सुल्तान की निंदा करने लगे।
(2.) जब सुल्तान को लोगों के असन्तोष की जानकारी हुई तब उसने असन्तुष्ट लोगों को फिर दिल्ली लौटने की आज्ञा दे दी। बरनी के अनुसार दौलताबाद जाने वाले लोगों में से बहुत कम लोग वापस दिल्ली जीवित लौट सके।
(3.) इस योजना को कार्यान्वित करने में सुल्तान को बड़ा धन व्यय करना पड़ा। जिससे राजकोष को धक्का पहुँचा।
(4.) प्रजा में बड़ा असन्तोष फैला जिससे सुल्तान की लोकप्रियता को बहुत बड़ा धक्का लगा और उसे अपना पुराना गौरव नहीं मिल सका।
(5.) दिल्ली से दौलताबाद जाने तथा वापस दिल्ली आने में अनेक लोगों को अपने प्राण खो देने पड़े तथा सहस्रों परिवारों की समृद्धि समाप्त हो गई।
(6.) दक्षिण भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सुल्तान को बड़ी सुविधा हुई।
(7.) देवगिरि की गौरव-गरिमा में वृद्धि हो गई।
(8.) यद्यपि दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग तथा वहाँ के राजकोष के परिपूर्ण हो जाने से आरम्भ में दक्षिण के विद्रोहियों का दमन करने में बड़ी सुविधा हुई परन्तु अन्त में जब दक्षिण में विद्रोहों का विस्फोट हुआ तब दुर्ग तथा कोष का यही बल साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ क्योंकि इसका प्रयोग सुल्तान के विरुद्ध होने लगा।
राजधानी परिवर्तन के निर्णय की समीक्षा
मुहम्मद बिन तुगलक की इस योजना की विद्वानोें ने तीव्र आलोचना की है और सुल्तान को क्रूर, अदूरदर्शी तथा प्रजापीड़क बताया है। कुछ इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहा है परन्तु वास्तव में राजधानी का परिवर्तन कोई पागलपन भरी योजना नहीं थी। इसके पहले भी हिन्दू राजाओं ने अपनी राजधानियों का परिवर्तन किया था।
आधुनिक काल में भी राजधानियों का परिवर्तन होता रहता है। सुल्तान की यह आलोचना तर्क तथा उपयोगिता पर आधारित थी। फिर भी वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। इसका कारण यह था कि आयोजना के कार्यान्वित करने का ढंग ठीक नहीं था। उसे यह कार्य धीरे-धीरे करना चाहिए था। पहले केवल सरकारी कार्यालयों तथा सरकारी कर्मचारियों को ले जाना चाहिए था। फिर कुछ समय के प्रयोग तथा अभ्यास के उपरान्त अन्य लोगों को वहाँ भेजा जाना चाहिये था।
(5.) मंगोलों को धन देने की योजना
दोआब में कर बढ़ा देने तथा राजधानी के परिवर्तन से जो गड़बड़ी पैदा हो गई थी, उससे प्रोत्साहित होकर मंगोलों ने 1328 ई. में तरमाशिरीन के नेतृत्व मंें भारत पर आक्रमण कर दिया। मंगोल सिंध नदी को पार करके दिल्ली के निकट आ गये। मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें बहुत-सा धन देकर उनसे अपना पीछा छुड़ाया।
मंगोलों को धन देने की नीति की समीक्षा
मुहम्मद तुगलक की मंगोलों को धन देने की नीति की तीव्र आलोचना की गई है। इससे मंगोलों को सुल्तान की दुर्बलता का पता लग गया और उनका भारत पर आक्रमण करने का प्रलोभन बढ़ गया परन्तु वास्तविकता यह है कि सुल्तान उन दिनों ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि मंगोलों का सामना कर सके।
सुल्तान के पास सल्तनत को नष्ट-भ्रष्ट होने तथा पराजय से बचाने का कोई दूसरा उपाय ही न था। मुहम्मद बिन तुगलक से धन स्वीकार करने के बाद तरमाशिरीन ने दिल्ली के सुल्तान के साथ सदैव मैत्री-भाव रखा। यदि कायरता अथवा दुर्बलता के कारण सुल्तान ने धन दिया होता तो तरमाशिरीन उससे मैत्री-भाव रखने के स्थान पर उस पर पुनः आक्रमण करता।
(6.) संकेत मुद्रा चलाने की योजना
मुहम्मद बिन तुगलक ने मुद्रा प्रबन्ध को सुधारने के लिये अनेक योजनाएँ बनाईं। उसने भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ ढलवाईं जो कला की दृष्टि से बड़ी सुन्दर थीं। उसने दीनार नामक स्वर्ण मुद्रा चलाई तथा अदली नामक रजत-मुद्रा का पुनरुद्धार किया।
मुद्रा सुधार के सम्बन्ध में सुल्तान की सबसे बड़ी योजना संकेत मुद्रा चलाने की थी। यह योजना राजधानी परिवर्तन के विफल हो जाने के उपरान्त लागू की गई थी। सुल्तान ने सोने-चांदी की मुद्राओं के स्थान पर ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं।
संकेत मुद्रा चलाने के कई कारण थे-
(1.) संकेत-मुद्रा चलाने का प्रथम कारण राज्य में चाँदी का अभाव होना बताया जाता है। उन दिनों न केवल भारतवर्ष में, अपितु सम्पूर्ण विश्व में चाँदी की कमी अनुभव की जा रही थी।
(2.) चाँदी की मुद्रा के अभाव के कारण लोगों को व्यापार तथा लेन-देन में बड़ी असुविधा हो रही थी। इस असुविधा को दूर करने के लिए ही मुहम्मद तुगलक ने ताँबे की मुद्रा चलाने की योजना बनाई थी।
(3.) मुहम्मद तुगलक को नई योजनाएँ बनाने का व्यसन था। वह सदैव नई-नई योजनाओं की कल्पना किया करता था।
(3.) मुहम्मद तुगलक सांकेतिक मुद्रा चलाकर ख्याति प्राप्त करना चाहता था। वह अपने नवीन कृत्यों द्वारा अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देना चाहता था तथा वह इतिहास में अपना नाम अमर बनाना चाहता था।
(4.) मुहम्मद तुगलक ने अपने रिक्त कोष को भरने के लिये यह योजना बनाई। विद्रोहों को दबाने, अकाल-पीड़ितों की सहायता करने, नई योजनाओं को कार्यान्वित करने, नवीन भवनों का निर्माण कराने तथा मुक्त-हस्त से पुरस्कार देने से राजकोष रिक्त हो गया था और सुल्तान बड़े आर्थिक संकट में पड़ गया था। इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए ही सुल्तान ने संकेत मुद्रा के चलाने की योजना बनाई।
(5.) मुहम्मद तुगलक अस्थिर विचारों का व्यक्ति था। जब उसने देखा कि चीन, फारस आदि देशों में संकेत मुद्रा का प्रचलन है, तब उसने भी अपने राज्य में संकेत मुद्रा चलाने की आज्ञा दी।
(6.) मुहम्मद तुगलक विश्व-विजय की कामना से प्रेरित था और इस ध्येय की पूर्ति के लिये उसे एक विशाल सेना की आवश्यकता थी जिसके व्यय के लिए धन आवश्यक था। अतः सुल्तान ने संकेत मुद्रा की योजना बनाई।
योजना का क्रियात्मक स्वरूप तथा परिणाम: प्रारम्भ में लोगों को संकेत मुद्रा से बड़ी सुविधा हुई परन्तु बाद में लोगों को आशंका हुई कि सरकार ने चाँदी की मुद्राओं का अपहरण करने के लिये यह योजना चलाई है। सरकार जनता से चाँदी की मुद्राएँ लेकर अपने राजकोष में भर लेगी और इनके स्थान पर ताँबे की मुद्राएँ प्रयुक्त होंगी।
इस आशंका का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने चाँदी तथा सोने की मुद्राओं को छिपा दिया तथा केवल ताँबे की मुद्राओं को व्यवहार में लाने लगे। स्वर्णकारों ने अपने घरों में टकसालें बना लीं और ताँबे की मुद्राएं ढालने लगे। बरनी के अनुसार प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि ताम्बे की मुद्राओं में अत्यन्त दु्रतगति से वृद्धि होने लगी। लोगों की ऐसी मनोवृत्ति हो गई कि देने के समय वे ताँबे की मुद्रा देना चाहते थे और लेने के समय चाँदी अथवा सोेने की मुद्राओं को प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे।
इस मनोवृत्ति का व्यापार पर बुरा प्रभाव पड़ा। व्यापारियों ने तांबे की मुद्राओं के बदले सामान देना बन्द कर दिया। ऐसी स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो गया। फलतः सुल्तान ने यह आदेश निकाल दिया कि संकेत मुद्रा का प्रयोग बन्द कर दिया जाय और जिसके पास ताँबें की मुद्राएँ हो, उनके बदले में वे सोने-चाँदी की मुद्राएँ ले लें।
इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि सरकारी खजाने में ताँबे की मुद्राओं के ढेर लग गये तथा राजकोष सोने-चांदी से रिक्त हो गया।
संकेत-मुद्रा योजना की समीक्षा
इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा चलाई गई संकेत मुद्रा की तीव्र आलोचना की है और उस पर पागल होने का आरोप लगाया है परन्तु वास्तव में यह योजना मुहम्मद तुगलक के पागलपन की नहीं, वरन् उसकी बुद्धिमता की परिचायक है। चीन तथा फारस में पहले से ही संकेत मुद्रा चल रही थी।
आधुनिक काल में भी पूरे विश्व में संकेत मुद्रा का प्रचलन है। चौदहवीं शताब्दी में संकेत मुद्रा का असफल हो जाना अवश्यम्भावी था क्योंकि साधारण जनता के लिए चांदी और ताँबे में बहुत अंतर था। वह संकेत मुद्रा विनिमय के महत्व को नहीं समझ सकी।
यह योजना इसलिये भी असफल हो गई क्योंकि सरकार ने सुनारों को ताम्बे की मुद्रा ढालने से नहीं रोका। सुल्तान को चाहिए था कि वह टकसाल पर राज्य का एकाधिकार रखता और ऐसी व्यवस्था करता जिससे लोग अपने घरों में संकेत मुद्रा को नहीं ढाल पाते। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुल्तान की योजना गलत नहीं थी अपितु उसके कार्यान्वयन का ढंग गलत था।
(7.) खुरासान विजय की योजना
मुहम्मद बिन तुगलक ने न केवल शासन सम्बन्धी, वरन् युद्ध अभियान सम्बन्धी भी अनेक योजनाएँ बनाईं। उसकी सर्वप्रथम योजना खुरासान पर विजय प्राप्त करने की थी।
योजना के कारण: इस योजना का सबसे बड़ा कारण मुहम्मद बिन तुगलक की महत्वाकांक्षा थी। भारत में सुल्तान ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। अपने शासन के प्रथम तीन वर्षों में उसने अपनी सत्ता तथा धाक उत्तर तथा दक्षिण में स्थित प्रान्तों में जमा ली थी। अब वह विदेश विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।
खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाने का दूसरा कारण खुरासान की तत्कालीन स्थिति थी। सुल्तान के दरबार में उन दिनों बहुत से खुरासानी अमीर थे जिन्होंने सुल्तान को खुरासान की शोचनीय दशा के बारे में जानकारी देकर खुरासान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इन दिनों फारस में अबू सईद शासन कर रहा था।
वह अल्पवयस्क तथा दुराचारी था। अमीर लोग उससे असन्तुष्ट होकर षड्यन्त्र रच रहे थे। उसका संरक्षक अमीर चौगन राज्य को छीनने का प्रयास कर रहा था। अबू सईद ने चौगन की हत्या करवा दी। इससे फारस में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और चौगन के पुत्र अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का अवसर ढूँढने लगे। खुरासान के विभिन्न प्रान्तों में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। इन परिस्थितियों में सुल्तान के लिए खुरासान पर विजय की योजना बनाना अस्वाभाविक नहीं था।
योजना का क्रियात्मक स्वरूप: मुहमद बिन तुगलक ने अपनी इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए एक विशाल सेेना तैयार की। इन सैनिकों को एक वर्ष का वेतन पहले से ही दे दिया परन्तु परिस्थितियाँ बदल जाने से सुल्तान को खुरासान योजना त्याग देनी पड़ी।योजना को त्यागने का पहला कारण यह था कि मिस्र के राजा ने खुरासान के सुल्तान अबू सईद से मैत्री कर ली और मुहमद बिन तुगलक की सहायता करने से इन्कार कर दिया।
दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों चगताई अमीरों ने विद्रोह करके तरमाशिरीन को तख्त से उतार दिया जिससे अबू सईद को अपने राज्य की पूर्वी सीमा की ओर आक्रमण की आंशका नहीं रह गई। तीसरा कारण यह था कि ऐसे दूरस्थ प्रदेश में हिन्दूकुश पर्वत के उस पार सेना तथा रसद भेजना और अपने सहधर्मियों से युद्ध करके विजय प्राप्त करना सरल कार्य नहीं था।
खुरासान योजना की समीक्षा
इतिहासकारों द्वारा मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की तीव्र आलोचना की गई है। आलोचकों का कहना है कि मार्ग की कठिनाइयों को ध्यान में नहीं रखते हुए ऐसे सुदूरस्थ देश की विजय की योजना बनाना पागलपन था परन्तु मुहमद बिन तुगलक के समर्थकों का कहना है कि यदि फारस से भारत पर आक्रमण करना सम्भव है, तब भारत से फारस पर आक्रमण करना क्यों सम्भव नहीं है।
आलोचकों के अनुसार दोआब के अकाल, राजधानी के परिवर्तन तथा संकेत मुद्रा की योजना विफल हो जाने से राज्य भयानक आर्थिक संकट में था, तब इस प्रकार की योजना बनाना मूर्खता ही थी परन्तु ऐसी कामनाएँ, अलाउद्दीन खिलजी भी कर चुका था। वास्तव में सुल्तान की योजना तर्कहीन नहीं थी। सम्भवतः परिस्थितियों के कारण ही सुल्तान ने इस योजना को त्याग दिया था।
(8.) नगरकोट पर आक्रमण की योजना
1337 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक ने नगरकोट पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, जो हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है। नगरकोट का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था और अभेद्य समझा जाता था। सुल्तान ने एक लाख सैनिकों के साथ किले पर आक्रमण कर दिया और उस पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु सुल्तान ने फिर से वह किला वहाँ के राय को लौटा दिया और दिल्ली चला आया।
(9) कराजल विजय की योजना
फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन तथा हिमाचल पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई। हिमाचल विजय की योजना चीन अभियान को सरल बनाने के लिए की गई थी। बरनी का कहना है कि सुल्तान ने कराजल के पर्वतीय प्रदेश पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई जो चीन तथा हिन्द के मार्ग में स्थित है।
कराजल विजय की योजना के कारण
बरनी का कहना कि मुहमद बिन तुगलक ने कराजल योजना को इस उद्देश्य से बनाया था जिससे वह खुरासान पर सरलता से विजय प्राप्त कर सके परन्तु चंूकि कराजल खुरासान के मार्ग में नहीं पड़ता, अतः बरनी का मत अमान्य है। हजीउद्दबीर का कहना है चूंकि कराजल की स्त्रियाँ अपने रूप तथा अन्य गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, इसलिये मुहमद बिन तुगलक उनसे विवाह करके उन्हें अपने रनिवास में लाना चाहता था। इसी ध्येय से उसने कराजल पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी। हजीउद्दीबीर का मत भी अमान्य है क्योंकि मुहमद बिन तुगलक का आचरण बड़ा पवित्र था। अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि मुहमद बिन तुगलक ने हिमाचल प्रदेश के कुछ विद्रोही सरदारों को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए यह योजना बनाई थी। फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन के धन को लूटने के लिए यह योजना बनाई थी। यह मत भी इतिहासकारों द्वारा अमान्य कर दिया गया है। अनुमान होता है कि मुहमद बिन तुगलक ने तराई के प्रदेश के किसी सरदार को दबाने के लिये ही हिमाचल पर आक्रमण किया था।
योजना के परिणाम
हिमाचल अभियान के आरम्भ में मुहमद बिन तुगलक की सेना को अच्छी सफलता मिली परन्तु जब वर्षा ऋतु आरम्भ हुई तब उसका पतन आरम्भ हो गया। वर्षा के कारण रसद का पहुँचना कठिन हो गया। इस भयानक परिस्थिति में शत्रु ने मुहमद बिन तुगलक की सेना पर आक्रमण कर दिया और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कहा जाता है कि केवल दस सैनिक इस दुःखद घटना को सुनाने के लिए लौट सके। इतनी क्षति होने पर भी मुहमद बिन तुगलक को अपने ध्येय में सफलता प्राप्त हो गई। चूंकि उस पहाड़ी सरदार के लिए पहाड़ के निचले प्रदेश में सुल्तान से विरोध करके बने रहना संभव नहीं था इसलिये उसने मुहमद बिन तुगलक की अधीनता स्वीकार कर ली।
कराजल योजना की आलोचना
कुछ इतिहासकारों ने मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की भी बड़ी आलोचना की है और उसे पागल कहा है परन्तु इसमें पागलपन की कोई बात नहीं थी। ऐसे पर्वतीय प्रदेश में धन तथा जन की क्षति होना स्वाभाविक था। अंग्रेजों को भी नेपाल विजय करने में बड़ी क्षति उठानी पड़ी थी।
मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध विद्रोहों का काल
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम 16 वर्ष आपत्ति भरे थे। इस अवधि में सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह उठ खड़े हुए। ये विद्रोह अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में विस्तृत थे। यदि एक विद्रोह उत्तर में होता तो दूसरा दक्षिण में और यदि एक विद्रोह पश्चिम में होता तो दूसरा सुदूर पूर्व में। इससे सेना के संचालन में बड़ी कठिनाई होती थी। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चौंतीस विद्रोह हुए जिनमें से 27 विद्रोह दक्षिण भारत में हुए थे। इन विद्रोहों के फलस्वरूप सल्तनत बिखरने लगी और कई स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी।
(1.) वहाबुद्दीन गुर्शस्प का विद्रोह
पहला विद्रोह 1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई वहाबुद्दीन गुर्शस्प ने किया जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। शाही सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। मुहम्मद बिन तुगलक ने गुर्शस्प की खाल में भूसा भरवाकर उसे भारत के कई शहरों में प्रदर्शित करवाया और उसके शरीर के मांस को चावल के साथ पकाकर उसकी बीवी-बच्चों के पास खाने के लिये भेजा।
(2.) किश्लू खाँ का विद्रोह
दूसरा विद्रोह ई.1328 में मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा उर्फ किश्लू खाँ ने किया। स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक ने इस विद्रोह का दमन किया। बहराम आईबा का वध कर दिया गया।
(3.) हुलाजू का विद्रोह
लाहौर का सूबेदार अमीर हुलाजू एक शक्तिशाली अमीर था। उसने भी मुहमद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह किया तथा शाही सेना द्वारा मारा गया।
(4.) जलालुद्दीन का विद्रोह
तीसरा विद्रोह 1335 ई. में मदुरा के गवर्नर जलालुद्दीन एहसान शाह ने किया। इस समय दोआब में अकाल था और प्रजा में असन्तोष फैला हुआ था। इससे लाभ उठाकर जलालुद्दीन ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ को इस विद्रोह का दमन करने के लिये भेजा परन्तु वह धार से वापस लौट आया।
अब मुहमद बिन तुगलक ने स्वयं दक्षिण के लिये प्रस्थान किया। जब सुल्तान तेलंगाना पहुँचा, तब वहाँ बड़े जोरों का हैजा फैल गया और मुहमद बिन तुगलक के बहुत से सैनिक मर गये। फलतः सुल्तान ने दिल्ली लौटने का निश्चय किया और एहसान शाह स्वतन्त्र हो गया।
(5.) मलिक हुशंग का विद्रोह
एहसान शाह के विद्रोह का प्रभाव साम्राज्य के अन्य भागों पर भी पड़ा। उत्तर तथा दक्षिण भारत में यह खबर फैल गई कि सुल्तान की मृत्यु हो गई है। फलतः 1335 ई. में दौलताबाद के सूबेदार मलिक हुशंग ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान की उस पर विशेष कृपा रहती थी परन्तु वह बड़ा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। अतः अवसर पाकर उसने विद्रोह कर दिया। अन्त में उसे भाग कर हिन्दू सरदारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी। मुहमद बिन तुगलक ने उसे क्षमा कर दिया।
(6) सैयद इब्राहीम का विद्रोह
मुहमद बिन तुगलक की मृत्यु की सूचना पाकर उत्तर में एहसान शाह के पुत्र सैयद इब्राहिम ने भी विद्रोह कर दिया। इब्राहिम, सुल्तान का बड़ा विश्वासपात्र था। अन्त में उसने आत्म समर्पण कर दिया। फिर भी उसकी हत्या करवा दी गई।
(7.) बहराम खाँ का विद्रोह
इन दिनों पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने 1337 ई. में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली साम्राज्य की दशा को देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। मुहमद बिन तुगलक की असमर्थता के कारण बंगाल स्वतंत्र हो गया।
(8.) निजाम भाई का विद्रोह
बंगाल के विद्रोह की सफलता देखकर कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने भी विद्रोह कर दिया। 1338 ई. में उसकी जीवित खाल खिंचवा ली गई।
(9.) अलीशाह का विद्रोह
अलीशाह दिल्ली सल्तनत का एक उच्च अधिकारी था। उसे मुहमद बिन तुगलक ने दक्षिण में मालगुजारी वसूल करने के लिए गुलबर्गा भेजा परन्तु उसने गुलबर्गा के हाकिम की हत्या करके शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बीदर पर भी अधिकार कर लिया। कुतलुग खाँ ने उसे परास्त करके बन्दी बना लिया। कुछ दिनों बाद उसका वध कर दिया गया।
(10.) आईन-उल-मुल्क का विद्रोह
आइन-उल-मुल्क अवध तथा जफराबाद का गवर्नर था। उसने दिल्ली सल्तनत की बड़ी सेवाएँ की थी। एक बार मुहमद बिन तुगलक दक्षिण के गवर्नर कुतलुग खाँ ख्वाजा के काम से असन्तुष्ट हो गया। इसलिये उसने ख्वाजा को वापस बुला लिया और उसके स्थान पर आइन-उल-मुल्क को नियुक्त कर दिया तथा उसे अपने बाल-बच्चों के साथ दक्षिण जाने की आज्ञा दी।
यद्यपि आइन-उल-मुल्क के लिये यह बड़े गौरव की बात थी परन्तु उसे लगा कि सुल्तान ने उसे अवध से हटाने के लिए ऐसा किया है। इसलिये उसने विद्रोह कर दिया। उसका विद्रोह सबसे भयानक था। फिर भी शाही सेना ने उसे परास्त करके बंदी बना लिया। जब वह सुल्तान के सामने लाया गया तो सुल्तान ने उसकी सेवाओं तथा उसकी विद्वता को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।
(11.) शाहू अफगान का विद्रोह
मुहमद बिन तुगलक को विपत्ति में देखकर शाहू अफगान लोदी ने मुल्तान के सूबेदार को कैद करके स्वयं को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की सूचना पाते ही मुहमद बिन तुगलक ने दिल्ली से मुल्तान के लिये प्रस्थान किया। इसकी सूचना पाते ही शाहू अफगान मुल्तान छोड़कर पहाड़ों में भाग गया और सुल्तान के पास एक प्रार्थना पत्र भेज कर क्षमादान की याचना की। फलतः मुहमद बिन तुगलक दिपालपुर से ही दिल्ली लौट आया।
(12.) विजय नगर की स्थापना (1336 ई.)
सल्तनत में स्थान-स्थान पर हो रहे विद्रोहों को देखकर हिन्दू राजाओं ने भी स्वतन्त्र होने का प्रयास किया। 1336 ई. में हरिहर तथा बुक्का ने विजय नगर राज्य की स्थापना की। हरिहर तथा बुक्का, राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) के सम्बन्धी थे और दिल्ली में बन्दी बना कर रखे गये थे।
1335 ई. में तेलंगाना के हिन्दुओं ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस गम्भीर स्थिति में सुल्तान ने हरिहर तथा बुक्का की सहायता से वहाँ पर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया। उसने हरिहर को उस क्षेत्र का शासक और बुक्का को उसका मन्त्री बनाकर भेज दिया। वहाँ पहुँचने पर धीरे-धीरे हरिहर ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और विजय नगर के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना कर ली।
(13.) कृष्ण नायक का स्वतन्त्रता संग्राम
कृष्ण नायक काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) का पुत्र था। दक्षिण के विद्रोहों से उसे बड़ा प्रोत्साहन मिला। 1343 ई. में उसने मुसलमानों के विरुद्ध एक संघ बनाया। ये लोग वारंगल, द्वारसमुद्र तथा कोरोमण्ड तट के समस्त प्रदेश को दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र करने में सफल हुए। दक्षिण में केवल देवगिरि तथा गुजरात, दिल्ली सल्तनत के अधिकार में रह गये।
(14.) सुनम तथा समाना के जाटों और भट्टियों का विद्रोह
सुनम तथा समाना के जाटों तथा भट्टी राजपूतोंएवं पहाड़ी सामंतों ने विद्रोह किये। मुहमद बिन तुगलक ने इन विद्रोहों में कड़ा रुख अपनाया तथा विद्रोहियों के नेताओं को पकड़ कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया।
(15.) शताधिकारियों के विद्रोह
शताधिकारी विदेशी अमीरों को कहते थे। ये लोग प्रायः एक शत सैनिकों के नायक हुआ करते थे और प्रायः एक शत गाँवों में शान्ति रखने तथा कर वसूलने का उत्तरदायित्व निभाते थे। सुल्तान के प्रति इनकी कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी और वेे सदैव अपनी स्वार्थ सिद्धि में संलग्न रहते थे।
जब मुहमद बिन तुगलक ने उन्हें अनुशासित बनाने का प्रयत्न किया, तब उन लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने, मुहमद बिन तुगलक को स्वयं दक्षिण जाना पड़ा। उसने विद्रोहियों को परास्त कर उन्हें तितर-बितर कर दिया। हसन नाम का एक अमीर कुछ विद्रोहियों के साथ गुलबर्गा भाग गया और उसने वहाँ पर 1347 ई. में बहमनी राज्य की नींव डाली।
इस समय मुहमद बिन तुगलक को गुजरात में तगी के विद्रोह की सूचना मिली। सुल्तान ने गुजरात के लिए प्रस्थान किया। तगी सिन्ध की ओर भाग गया। मुहम्मद बिन तुगलक उसका पीछा करते हुए थट्टा पहुँचा। 20 मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई। बदायूनी ने लिखा है- ‘सुल्तान को उसकी प्रजा से तथा प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।’
इतिहासकार मुहम्मद तुगलक का शासन सही नहीं मानते! वह अपने समय के अनुसार नहीं अपितु समय से आगे शासन कर रहा था। इस कारण उसका शासन विफलताओं के लिए याद किया जाता है।
मुहम्मद बिन तुगलक योग्य तथा प्रतिभावान् व्यक्ति था। उसने शासन में कई सुधार किये तथा कई नई व्यवस्थाएँ कीं।
मुहम्मद तुगलक का शासन
(1.) स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश शासन
मुहम्मद बिन तुगलक का शासन स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। सुल्तान शासन का प्रधान तथा समस्त अधिकारों का स्रोत था। यद्यपि सुल्तान की शक्ति अनियन्त्रित थी परन्तु महत्वपूर्ण विषयों में उसे परामर्श देने के लिए एक परिषद् बनाई गई थी। परिषद् के अतिरिक्त कुछ उच्च पदाधिकारी एवं अमीर भी सुल्तान को परामर्श देते थे। सुल्तान प्रायः उनके परामर्श को नहीं मानता था।
(2.) विदेशी अमीरों की नियुक्ति
जब मुहम्मद बिन तुगलक को देशी अमीरों की अयोग्यता का पता लग गया, तब उसने विदेशी अमीरों को उच्च पद देना आरम्भ किया। यह साम्राज्य के लिए हितकर सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि वे सच्चे राजभक्त सिद्ध नहीं हुए और अवसर पाकर विद्रोह करने लगे। विदेशी तथा देशी अमीरों में संघर्ष उत्पन्न हो गया।
(3.) योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ
मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सम्पूर्ण राज्य को प्रान्तों में विभक्त किया तथा प्रत्येक प्रान्त के शासन के लिए एक ‘नायब वजीर’ नियुक्त किया जो सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था। सुल्तान की सहायता के लिए एक नायब होता था जो सुल्तान की अनुपस्थिति में उसके कार्यों को करता था।
सुल्तान का एक वजीर, अर्थात् प्रधानमन्त्री भी होता था जिसकी सहायता के लिए चार शिकदार होते थे। वजीर के चार दबीर, अर्थात सेक्रेटरी होते थे। प्रत्येक दबीर के नीचे तीन सौ लिपिक होते थे। राज्य में कोई भी पद आनुवंशिक नहीं था। कर्मचारियों की नियुक्त योग्यता के आधार पर की जाती थी।
(4.) उलेमाओं के वर्चस्व की समाप्ति
दिल्ली सल्तनत इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित थी। इस कारण शासन में उलेमाओं का बोलबाला था। बलबन तथा अलाउद्दीन खिलजी की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने भी राजनीति को धर्म से अलग रखने की नीति का अनुसरण किया। वह उलेमाओं से बहुत कम परामर्श लेता था। और उनके परामर्श के अनुसार काम नहीं करता था।
वह दोषी उलेमाओं को दण्ड देने में लेशमात्र संकोच नहीं करता था। उसने उन्हें न्याय करने के अधिकार से वंचित कर दिया जिसे वे अपना एकाधिकार समझते थे। इस कारण उलेमाओं का वर्चस्व समाप्त हो गया और वे सुल्तान से नाराज हो गये। सुल्तान ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। उसके शासन काल में हिन्दुओं को अनावश्यक रूप से दण्डित नहीं किया गया।
(5.) कठोर दण्ड विधान पर आधारित न्याय व्यवस्था
मुहम्मद बिन तुगलक न्यायप्रिय शासक था किंतु उसका दण्ड विधान बहुत कठोर था। न्याय का कार्य प्रायः काजी करते थे जिसकी सहायता के लिए मुफ्ती हुआ करते थे। न्याय विभाग का प्रधान ‘सद्र-जहान काजी उल-कुजात’ कहलाता था। उसके नीचे बहुत से काजी तथा नायब काजी होते थे। न्याय की दृष्टि में छोटे-बड़े सब समान थे। दोषियांे एवं अपराधियों को प्रायः मृत्यु दण्ड तथा अंग भंग करने का दण्ड दिया जाता था। छोटी अदालतों की अपील सुल्तान स्वयं सुनता था।
(6.) सेना पर आधारित शासन
मुहम्मद बिन तुगलक को विशाल सल्तनत संभालने के लिये विशाल सेना की व्यवस्था करनी पड़ी थी। उसकी सेना में तुर्क, फारसी तथा भारतीय समस्त प्रकार के सैनिक थे। विदेशियों को भी सेना में उच्च पद दिये गये थे। सेना के सबसे बड़े अफसर खान कहलाते थे। खान के नीचे मलिक, मलिक के नीचे अमीर, अमीर के नीचे सिपहसालार और सिपहसालार के नीचे जुन्द होते थे। सैनिकों को नकद वेतन मिलता था। उन्हें भोजन, वस्त्र तथा घोड़ों का चारा भी मिलता था। विद्रोहों को दबाने के लिये सेना हर समय सक्रिय रहती थी।
(7.) पुलिस तथा जेल
मुहम्मद बिन तुगलक ने अपराधों की रोकथाम के लिये पुलिस तथा जेल का अच्छा प्रबन्ध किया। पुलिस विभाग का प्रधान पदाधिकारी कोतवाल था। वह शान्ति तथा व्यवस्था के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी होता था। सुल्तान ने गुप्तचर विभाग की भी व्यवस्था की थी। जेलों की संख्या कम थी क्योंकि प्रायः मृत्यु दण्ड तथा अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। किले ही जेल का काम करते थे।
(8.) लगान वसूली की व्यवस्था
मुहम्मद बिन तुगलक ने लगान अथवा मालगुजारी वसूल करने का भी सुदृढ़ प्रबन्ध किया था। सारी भूमि शिकों में विभक्त कर दी गई थी। प्रत्येक शिक में एक शिकदार नियुक्त किया गया था जो मालगुजारी वसूल करता था। दोआब की भूमि एक सहस्र गाँवों में विभक्त थी जो हजारह कहलाती थी। कभी-कभी भूमि ठेकेदारों को दी जाती थी।
(9.) अकाल राहत की व्यवस्था
जब दो-आब में लम्बा दुर्भिक्ष पड़ा और किसानों की हालत खराब होने लगी तो मुहम्मद बिन तुगलक अपना दरबार सरगद्वारी ले गया और वहाँ पर ढाई वर्ष तक दुर्भिक्ष पीड़ितों की सहायता करता रहा। उसने किसानों को लगभग 70 लाख रुपये तकावी के रूप में बँटवाये। अकाल का प्रभाव कम करने के लिये सुल्तान ने बहुत से कुएँ खुदवाये और बेकार पड़ी भूमि को कृषि करने योग्य बनवाया। सुल्तान ने कृषि का एक अलग विभाग खोला और उसके प्रबन्धन के लिये अमीरकोह नामक अधिकारी नियुक्त किया।
(10.) डाक व्यवस्था
मुहम्मद बिन तुगलक ने डाक वितरण की अच्छी व्यवस्था करवाई। डाक घुड़सवारों तथा पैदल हरकारों द्वारा भेजी जाती थी। सरकार की ओर से सड़कों के दोनों किनारों पर वृक्ष लगवाये गये और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर डाक-चौकियाँ बनवाई गईं। प्रत्येक चौकी पर दस धावक नियुक्त किये गये जो एक स्थान से दूसरे स्थान को पत्र तथा सूचनाएँ पहुँचाते थे।
(11.) दरबार का गौरव
मुहम्मद बिन तुगलक का दरबार बड़ा शानदार था। वह विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके दरबार में बड़े-बड़े विद्वान रहते थे। विदेशों से लोग आकृष्ट होकर उसके दरबार में आते थे तथा पद और नाम पाते थे। सुल्तान दो प्रकार के दरबार करता था- दरबार ए आम तथा दरबार ए खास। इन दरबारों में सुल्तान प्रजा की शिकायतें सुनता था और राज्य की समस्याओं पर विचार करता था।
(12.) गुलामों की व्यवस्था
मुहम्मद बिन तुगलक के राज्य में गुलामों के साथ दुर्व्यवहार नहीं होता था और उनके आराम का ध्यान रखा जाता था। गुलाम स्त्री-पुरुष सुल्तान तथा अमीरों के महलों में काम करते थे। गुलाम स्त्रियाँ गुप्तचरों का भी काम करती थीं। गुलाम स्वतन्त्र भी कर दिये जाते थे और राज्य के ऊँचे-ऊँचे पदों पर भी पहुँच जाते थे।
(13.) हिन्दुओं के साथ अच्छा व्यवहार
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में हिन्दुओं के साथ उतनी ज्यादती नहीं की गई जितनी उसके पूर्ववर्ती शासकों के काल में की गई थी। केवल उन्हीं हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया गया जो सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करते थे। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जो हिन्दुओं के होली त्यौहार में शामिल होता था। उसने योग्य हिन्दुओं को शासन में उच्च पद प्रदान किये।
(14.) प्रान्तीय शासन
प्रान्त का शासक नायब सुल्तान कहलाता था। उसे सैनिक तथा प्रशासकीय दोनों कार्य करने पड़ते थे। उसे न्याय का भी कार्य करना पड़ता था। प्रान्तीय खर्च करने के बाद जो धन बचता था, वह केन्द्रीय कोष में भेज दिया जाता था। प्रान्तपति अपने प्रान्तों में स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होते थे। मुहम्मद बिन तुगलक के बहुत से प्रांतपतियों ने सुल्तान से विद्रोह करके स्वतंत्र होने का प्रयास किया।
मुहम्मद बिन तुगलक की विफलताएँ
मुहम्मद बिन तुगलक एक शासक के रूप में सर्वथा असफल ही रहा। उसने अपने पिता से एक विशाल साम्राज्य प्राप्त किया था जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत का बहुत बड़ा अंश सम्मिलित था परन्तु मुहम्मद बिन तुगलक के मरने से पहले ही उसका साम्राज्य बिखरने लगा था। जिन प्रान्तों पर उसका अधिकार था, उन प्रांतों के प्रांतपति एक-एक करके विद्रोह कर रहे थे। अपनी विजय योजनाओं में भी उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली। उसकी शासन सम्बन्धी अधिकांश योजनाओं को असफलता का आलिंगन करना पड़ा।
विफलताओं के कारण
मुहम्मद बिन तुगलक अपनी विफलता के लिए स्वयं उत्तरदायी नहीं था। उसकी परिस्थितियों तथा उसके दुर्भाग्य ने उसकी समस्त योजनाओं को विफल बनाया। उसकी विफलता के निम्नलिखित कारण थे-
(1.) योग्य अधिकारियों का अभाव
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में योग्य मुसलमान अमीरों और सेनापतियों का अभाव था। यदि उसकी सेवा में योग्य अधिकारी होते तो वे उसकी महत्वाकांक्षी योजनाओं को सफल बनाने का मार्ग अवश्य ढूंढ लेते। कम से कम उसकी कुछ योजनाएं तो अवश्य ही सफल रही होतीं जो उसके राज्य को बिखरने से रोक लेतीं।
(2.) प्रकृति की प्रतिकूलता
प्रकृति भी मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध रही। उत्तर भारत में दीर्घकाल तक वर्षा के अभाव के कारण भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जिसके कारण प्रजा को असह्य यातनाएँ भोगनी पड़ीं। सुल्तान के प्रयास करने पर भी प्रजा को कष्टों से मुक्ति नहीं मिली। प्रजा कर देने में असफल हो गई, इससे राजकोष पर बहुत बुरा असर पड़ा।
(3.) प्रजा का असहयोग
मुहम्मद बिन तुगलक प्रजा के सहयोग तथा सहानुभूति से वंचित रहा। प्रजा कर देने में उपेक्षा करती थी और विद्रोह करने को उद्यत रहती थी।
(4.) विदेशियों का शासन में समावेश
सुल्तान जिसके साथ उदारता तथा सहानुभूति दिखलाता था, वही उसका शत्रु हो जाता था और विद्रोह करने को उद्यत हो जाता था। सुल्तान ने विदेशी अमीरों को अपने यहाँ शरण दी और उन्हें ऊँचे पदों पर नियुक्त किया परन्तु अवसर मिलने पर वे भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करने लगे।
(5.) कट्टरपन्थियों का असहयोग
उलेमा, मौलवी तथा शेख, मुहम्मद बिन तुगलक की उदार एवं स्वतंत्र नीतियों से बड़े असन्तुष्ट थे और उसकी हर नीति की आलोचना करके जनता में असंतोष फैलाया करते थे।
(6.) साम्राज्य की विशालता
मुहम्मद बिन तुगलक का साम्राज्य इतना विस्तृत था कि विद्रोहों का दमन करना उसके लिए असंभव सा हो गया। जब सुल्तान एक स्थान पर विद्रोह शांत करता था, तब दूसरे स्थान में विद्रोह आरम्भ हो जाता था।
(7.) प्रान्तपतियों के विद्रोह
प्रजा के असंतोष से प्रान्तपतियों ने लाभ उठाने का प्रयत्न किया और विद्रोह करके अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने लगे।
(8.) सुल्तान की योजनायें समय से आगे थीं
मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएँ अपने समय से बहुत आगे थीं। उसके अधिकारियों, उलेमाओं एवं जन सामान्य में उन योजनाओं को समझने की क्षमता नहीं थी। इसलिये वे लोग उन योजनाओं को विफल बना देते थे। ऐसी दशा में सुल्तान के क्रोध की सीमा नहीं रह जाती थी और वह कठोर दण्ड देता था। इससे अधिकारियों, उलेमाओं एवं जन सामान्य में सुल्तान के प्रति और भी अधिक नाराजगी हो जाती थी।
(9.) धन का अपार व्यय
मुहम्मद बिन तुगलक को अपनी विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में अपार धन व्यय करना पड़ता था। इसलिये उसे करों में वृद्धि करनी पड़ी थी। इस कर वृद्धि से जनता में सुल्तान के विरुद्ध बड़ा असंतोष फैला।
(10.) सुल्तान की त्रुटियाँ
कुछ विद्वानों के विचार में मुहम्मद बिन तुगलक की विफलता का मुख्य उत्तरदायित्व उसकी त्रुटियों पर था। इन विद्वानों का कहना है कि मुहम्मद बिन तुगलक में सामंजस्य, व्यावहारिक बुद्धि, मानवीय चरित्र की परख, अपने सहयोगियों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने, लोगों में विश्वास उत्पन्न करने तथा धैर्यपूर्वक कार्य करने की शक्ति का सर्वथा अभाव था।
इन दुर्बलताओं के कारण ही सुल्तान को असफलता प्राप्त हुई। हो सकता है कि इन दुर्बलताओं तथा त्रुटियों के कारण ही मुहम्मद बिन तुगलक असफल रहा हो परन्तु मूलतः परिस्थितियों के कारण ही सुल्तान को विफलताओं का सामना करना पड़ा था।
इतिहासकारों के लिए मुहम्मद तुगलक का चरित्र एक रहस्यमयी पहेली बन गया है। कुछ लोगों के लिए वह एक महान शासक था और कुछ इतिहासकार उसे बुरा शासक मानते हैं।
मुहम्मद तुगलक का चरित्र
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल की घटनाओं तथा उसके चरित्र का समीक्षात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि मुहम्मद मध्यकालीन सुल्तानों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक तथा प्रभावोत्पादक था। उसके समान विद्वान् एवं प्रतिभावान सुल्तान उसके पूर्व दिल्ली के तख्त पर नहीं बैठा था। वह फारसी का प्रकाण्ड पण्डित, उच्चकोटि का साहित्यकार तथा विद्या-व्यसनी था।
वह तार्किक, सत्यान्वेषी तथा ओजस्वी वक्ता था। उसे अरबी भाषा का भी ज्ञान था। उसने साहित्य का गहन अध्ययन किया था। दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, ज्योतिष आदि शास्त्रों में उसकी विशेष रुचि थी। वह न केवल शुद्ध बौद्धिक शास्त्रों में, अपितु भौतिक विज्ञान रसायन विज्ञान तथा आयुर्वेद आदि विद्याओं के अध्ययन में भी रुचि रखता था और उनका अनुशीलन करता था।
मुहम्मद बिन तुगलक विद्यानुरागी होने के साथ-साथ कर्मठ भी था। सुल्तान बनने से पूर्व ही उसने सैनिक तथा प्रशासकीय क्षेत्रों में अपनी योग्यता तथा कौशल का परिचय दे दिया था और पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर चुका था। उसने अपने सम्पूर्ण शासनकाल में बड़े साहस, धैर्य, उत्साह तथा तत्परता से शासन किया जिससे उसके शारीरिक बल तथा मानसिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।
अपनी उदारता तथा न्यायप्रियता के लिये वह विदेशों में भी विख्यात हो गया था। मिश्र के शासक से उसकी मित्रता थी। वह बड़ा ही दृढ़ प्रतिज्ञ तथा आत्मविश्वासी व्यक्ति था। उसकी वीरता तथा साहस श्लाघनीय थे। इस्लाम में उसकी पूर्ण निष्ठा थी। वह सदा इस्लाम के नियमों का पालन करता था परन्तु वह अन्ध-विश्वासी नहीं था।
धार्मिक नियमों को तर्क की कसौटी पर कसकर ही उनका अनुगमन करता था। उसने स्वयं को परम्परागत रूढ़ियों के चंगुल में नहीं फँसने दिया। उसने उलेमा वर्ग की उपेक्षा की। उसका आचरण अत्यन्त पवित्र था। उसमें उच्च कोटि का नैतिक बल था। सुल्तान के ये समस्त गुण श्लाघनीय हैं।
मुहम्मद बिन तुगलक में गुणों के साथ-साथ कुछ दुर्बलताएँ भी थीं। उसमें विनय का अभाव था तथा अहंकार एवं प्रमाद का प्राबल्य था। वह प्रायः दूसरों की सलाह की उपेक्षा करता था। विस्तृत अध्ययन तथा ज्ञानकोष ने उसे आवश्यकता से अधिक आदर्शवादी बना दिया था।
वह अत्यधिक काल्पनिक योजनाएँ बनाता था जो सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से अत्यन्त तर्कपूर्ण तथा आकर्षक परन्तु अव्यावहारिक होती थीं। नई योजनाएं बनाने का उसे चाव था कि वह प्रायः बिना अनुभवी व्यक्तियों का परामर्श लिए अविलम्ब अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए आतुर हो उठता था।
इस आतुरता के कारण उसे बड़ी हानि उठानी पड़ती थी। हठधर्मी होने के कारण वह अपनी भूलों का अनुभव करने के उपरान्त भी उन्हें सुधारने का प्रयत्न नहीं करता था। प्रायः वह समय तथा परिस्थिति का ध्यान नहीं रखता था। वह जानता था कि कठोर दण्ड देने की नीति से जनता में असन्तोष बढ़ रहा है, उलेमाओं की उपेक्षा तथा तिरस्कार के कारण भी विरोध में वृद्धि हो रही है।
विदेशियों को ऊँची नौकरियाँ देने से तुर्की अमीरों में ईर्ष्या-द्वेष बढ़ रहा है और शासन का काम बिगड़ रहा है परन्तु उसने समय रहते अपनी नीति में परिवर्तन नहीं किया जिससे स्थिति उत्तरोत्तर बिगड़ती चली गई। अपनी नीति पर दृढ़ रहने और समय तथा परिस्थितियों के अनुकूल कार्य नहीं से उसे निरंतर असफलताएं झेलनी पड़ीं।
उसने ऐसे कई व्यक्तियों को सेवा में रख लिया जो साम्राज्य के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुए। अतः स्पष्ट है कि मुहम्मद बिन तुगलक अत्यन्त प्रतिभाशाली तथा कर्मठ शासन था परन्तु अपनी कुछ दुर्बलताओं के कारण वह सफल नहीं हो सका। इसी से कुछ इतिहासकारों ने उसे मुस्लिम जगत् का विद्वानतम मूर्ख सुल्तान कहा है।
यद्यपि सुल्तान में अनेक दुर्बलताएँ थी परन्तु इन दुर्बलताओं के कारण उसे मूर्ख, पागल तथा विरोधी गुणों का सम्मिश्रण कहना उचित नहीं है। किसी भी समकालीन इतिहासकार ने उस पर इस प्रकार का लांछन नहीं लगाया है, प्रत्युत उसकी गणना विश्व के महान् बादशाहों में ही की है।
उसके शासन का अध्ययन करने पर भी ऐसी धारणा बनाने के लिए आधार नहीं मिलता। इब्नबतूता ने उसे निस्संदेह विरोधी गुणों का सम्मिश्रण बतलाया है परन्तु किसी महान् व्यक्ति के गुणों तथा दोषों को एक साथ देखने पर उनमें विरोधाभास दिखाई देने लगता है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि मुहम्मद बिन तुगलक एक ही समय में परस्पर विरोधी कार्य नहीं करता था। न्याय करते समय निष्पक्ष न्याय करता था और दण्ड देते समय कठोर दण्ड देता था। क्योंकि उस युग में कठोर दण्ड देने की प्रथा थी। इसी प्रकार यद्यपि सुल्तान धर्मानुरागी था परन्तु उलेमाओं के अपराधों को क्षमा नहीं करता था।
उसे दोआब में कर वृद्धि, राजधानी परिवर्तन, संकेत मुद्रा का प्रचलन, खुरासान एवं चीन विजय की योजना आदि किसी भी कार्य से यह सिद्ध नहीं हाता कि सुल्तान पागल अथवा विरोधी गुणों का सम्मिश्रण था।
अनेक इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक के सम्पूर्ण शासन को असफल सिद्ध करने का प्रयास किया है परन्तु निष्पक्ष समीक्षा करने पर उसके शासन की अच्छाइयाँ भी देखने को मिलती हैं। यह सत्य है कि उसका शासन काल, मध्य काल के अन्य शासकों की तरह अशान्तिमय था और अपने पिता से जिस विशाल साम्राज्य को प्राप्त किया था, उसका आधा ही वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हुआ परन्तु युद्ध तथा शासन के क्षेत्र में उसने गयासुद्दीन तुकलक से अधिक सफलताएँ अर्जित की थीं।
नगरकोट तथा कराजल पर विजय प्राप्त करने वाला वह पहला मुसलमान शासक था। इससे सल्तनत की उत्तरी सीमा सुरक्षित हो गई। उसने अनेक विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया। सैनिक क्षेत्र की भांति शासन के क्षेत्र में भी उसकी कई योजनाएँ सफल रही थीं। शासन के प्रारम्भिक काल में मुहम्मद बिन तुगलक को अपनी नई व्यवस्था में विपुल सफलता प्राप्त हुई।
बरनी का कहना है कि नियत समय पर कर वसूल हो जाता था और किसी को सुल्तान की आज्ञा की उपेक्षा करने का साहस नहीं होता था। उसकी न्याय-व्यवस्था की समस्त ने मुक्त कंठ से प्रश्ंासा की है। अकाल के समय में उसने जनता की समुचित सहायता की। मुहम्मद बिन तुगलक की मुद्रा नीति भी अत्यन्त व्यापक तथा श्लाघनीय थी।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि मुहम्मद बिन तुगलक को शासन के अनेक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त हुई थी। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने मुहम्मद तुगलक की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘इसमें संदेह नहीं कि मुहम्मद बिन तुगलक मध्यकालीन सुल्तानों में सबसे अधिक योग्य था। मुस्लिम विजय के उपरान्त जितने भी सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठे, उनमें वह निस्संदेह सबसे अधिक विद्वान् और गुण-सम्पन्न था।’
मुहम्मद बिन तुगलक का शासन काल दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक युगान्तरकारी घटना थी क्योंकि उसके समय ही वह अपने विकास के चरम पर पहुँची थी।
क्या मुहम्मद तुगलक का चरित्र विभिन्नताओं का सम्मिश्रण था ?
कहा जाता है कि मुहम्मद बिन तुगलक में महान् आदर्शवाद के साथ नृशंसता, अपार उदारता के साथ निर्दयता तथा आस्तिकता के साथ-साथ घोर नास्तिकता मौजूद थी। इसलिये कुछ इतिहासकारों ने उसे विभिन्नताओं का सम्मिश्रण कहा है। इस धारणा का मूलाधार इब्नबतूता तथा बरनी के निम्नलिखित कथन हैं-
(1.) इब्नबतूता का कथन
इब्नबतूता लिखता है- ‘मुहम्मद दान देने तथा रक्तपात करने में सबसे आगे है। उसके द्वार पर सदैव कुछ दरिद्र मनुष्य धनवान होते हैं तथा कुछ प्राण दण्ड पाते देखे जाते हैं। अपने उदार तथा निर्भीक कार्यों और निर्दय तथा कुछ हिंसात्मक व्यवहारों के कारण जन साधारण में उसकी बड़ी ख्याति है। यह सब होते हुए भी वह बड़ा विनम्र तथा न्यायप्रिय व्यक्ति है। धार्मिक अवसरों के प्रति उसकी बड़ी सहानुभूति है। वह प्रार्थना बड़ी सावधानी से करता है और उसका उल्लंघन करने पर कठोर दण्ड की आज्ञा देता है। उसका वैभव विशाल है और उसका आमोद-प्रमोद साधारण सीमा का उल्लंघन कर गया है किन्तु उसकी उदारता उसका विशिष्ट गुण है।’
(2.) बरनी का मत
बरनी लिखता है- ‘सुल्तान की शारीरिक तथा मानसिक शक्तियाँ असीम गुण-सम्पन्न नहीं समझी जा सकतीं और उसकी साधारण दयालुता तथा उसकी सैयदों तथा इस्लाम-भक्त मुसलमानों को मृत्यु दण्ड देने की उत्कण्ठा तथा उसकी आस्तिकता गर्म तथा ठण्डी साँस लेने के समान प्रतीत होती हैं। यह एक ऐसा रहस्य है जो बुद्धिभ्रम उत्पन्न कर देता है।’
दोनों मतों की विवेचना
इब्नबतूता तथा बरनी के कथनों के आधार पर मुहम्मद बिन तुगलक इतिहासकारों को कौतूहलवर्द्धक विभिन्नताओं का सम्मिश्रण प्रतीत होता है। डॉ. ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि ‘ऊपर से देखने पर ही हमें प्रतीत होता है कि मुहम्मद विरोधी तत्त्वों का आश्चर्यजनक योग था किन्तु वास्तव में मुहम्मद तुगलक का चरित्र ऐसा नहीं था।’
गवेषणात्मक दृष्टि से देखने पर ये विभिन्नताएँ निर्मूल सिद्ध हो जाती हैं और एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं जान पड़तीं। मुहम्मद बिन तुगलक मध्यकालीन शासकों में सर्वाधिक विद्वान् तथा प्रतिभाशाली था। उसकी योजनाएँ, उसकी बुद्धिमत्ता तथा उसके व्यापक दृष्टिकोण की परिचायक हैं। उसकी विफलताएं, उसकी मूर्खता की परिचायक नहीं हैं।
उसके विचार तथा सिद्धान्त गलत नहीं थे। उसे विफलता कर्मचारियों की अयोग्यता तथा प्रजा के असहयोग के कारण मिलती थी। सुल्तान के आदर्श ऊँचे थे। उसने अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप में बदले का प्रयास किया। उसकी योजनाएँ विपरीत परिस्थितियों के कारण असफल रहीं परन्तु अनुकूल परिस्थितियों में उनकी सफल कार्यान्विति हो सकती थी।
मुहम्मद बिन तुगलक उदार तथा दानी सुल्तान था। वह अपराधियों तथा कर्त्तव्य भ्रष्ट लोगों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था परन्तु उसमें रक्त-रंजन की भावना नहीं थी। वह प्रायः उन विद्रोहियों को क्षमा कर देता था जिन्होंने भूत काल में राज्य की सेवा की थी। प्रायः ऐसा हुआ कि जिन लोगों को उसने सम्मान तथा उच्च पद दिये, वे ही उसके शत्रु हो गये।
ऐसी दशा में सुल्तान का अत्यंत क्रोधित हो जाना अस्वाभाविक नहीं था। जब राज्य में चारों ओर अशांति फैली थी तब कठोरता से विरोधियों तथा आज्ञा का उल्लघंन करने वालों को दंड देना सुल्तान की रक्त-रंजन की प्रवृत्ति का द्योतक नहीं माना जा सकता।
मुहम्मद बिन तुगलक के समक्ष जैसी परिस्थितियाँ थीं और जिस युग में वह शासन कर रहा था, उनमें मुहम्मद बिन तुगलक ने जैसा व्यवहार किया वैसा करना स्वाभाविक ही था। मुहम्मद बिन तुगलक में उच्चकोटि की धार्मिकता थी परन्तु वह उलेमाओं के हाथ की कठपुतली नहीं बना। उसका दृष्टिकोण बड़ा व्यापक था। उसने राजनीति को धर्म से अलग रखा।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुहम्मद तुगलक का चरित्र विरोधी प्रवृत्तियों का सम्मिश्रण नहीं था। डॉ. मेहदी हुसैन ने भी इस बात को सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यद्यपि सुल्तान में विरोधी तत्त्व विद्यमान थे तथापि वे उसके जीवन के विभिन्न कालों में प्रकट हुए थे और उनके स्पष्ट कारण भी विद्यमान थे। अतः उसे विरोधी तत्त्वों का मिश्रण नहीं कहा जा सकता।
क्या मुहम्मद बिन तुगलक पागल था? कुछ इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक को पागल तथा झक्की बताया है। एल्फिन्सटन पहला इतिहासकार था जिसने सुल्तान में पागलपन का कुछ अंश होने का लांछन लगाया। परवर्ती यूरोपीय इतिहासकारों हैवेल, इरविन, स्मिथ तथा लेनपूल ने भी एल्फिन्स्टन के इस मत का अनुमोदन किया परन्तु आधुनिक इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते कि मुहम्मद तुगलक पागल था!
यद्यपि बरनी तथा इब्नबतूता ने सुल्तान के कार्यों की तीव्र आलोचना की है तथापि उस पर पागलपन का लांछन नहीं लगाया है। वास्तव में यह आरोप केवल वे इतिहासकार ही लगा सकते हैं जो मुहम्मद बिन तुगलक के चरित्र तथा कार्यों की ठीक से समीक्षा नहीं करते।
गार्डिनर ब्राउन ने लिखा है- ‘उसके समय के किसी भी व्यक्ति ने इस बात की ओर संकेत नही किया है कि वह पागल था। उसके व्यावहारिक तथा सक्रिय चरित्र से यह पता नहीं लगता कि वह काल्पनिक था।’
(1) रक्तपात में रुचि होने का आरोप
आरोप का कारण
मुहम्मद बिन तुगलक को पागल सिद्ध करने के लिए सबसे पहला प्रमाण यह दिया जाता है कि उसमें रक्तपात के प्रति बड़ी रुचि थी। इस कारण उसे अकारण ही लोगों का रक्तपात करने में आनन्द आता था। इस धारणा का मूल आधार इब्नबतूता का यह कथन प्रतीत होता है कि सदैव कोई न कोई मृत शरीर सुल्तान के महल के समक्ष दृष्टिगोचर होता था। एल्फिन्स्टन तथा अन्य यूरोपीय इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक को इसी आधार पर पागल सिद्ध करने का प्रयास किया है।
आरोप की समीक्षा
विचारणीय बात यह है कि किन कारणों से तथा किन लोगों की सुल्तान हत्या किया करता था। वास्तव में सुल्तान बड़ा क्रोधी तथा उग्र प्रकृति का व्यक्ति था और वह इस बात को सहन नहीं कर पाता था कि लोग उसका विरोध करें। वह विभिन्न अपराधों में भेद नहीं कर पाता था।
यह भी ध्यान देने की बात है कि मध्य युग में अपराधियों को यूरोप तथा एशिया में प्रायः प्राण दण्ड दिया जाता था। इस बात के लिए कोई आधार नहीं कि सुल्तान को मनुष्यों का रक्तपात करने में आनन्द आता था। इस प्रकार का लांछन केवल इब्नबतूता तथा बरनी द्वारा लगाया गया है परन्तु यह नहीं भूलना चाहिये कि बरनी उलेमा वर्ग का था जो सुल्तान से बड़ा वैमनस्य रखता था क्योंकि सुल्तान ने इस वर्ग को विशेषाधिकारों से वंचित कर दिया था और अपराध करने पर उन्हें साधारण व्यक्तियों की भांति दण्ड मिलता था।
निष्कर्ष
वास्तव में सुल्तान बड़े स्वतन्त्र विचार का तथा अपने समय से बहुत आगे था। जब उसकी योजनाएँ असफल होती थीं और लोग उसकी अवहेलना करते थे तो वह विरोधियों को प्रायः मृत्यु दण्ड तथा अंग-भंग करने के दण्ड देता था। ऐसा उस युग के हर सुल्तान ने किया था।
(2) बीस गुना कर वृद्धि का आरोप
आरोप का कारण
मुहम्मद बिन तुगलक को पागल सिद्ध करने के लिए दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि उसने दोआब में कर वृद्धि करके बड़ी बर्बरता के साथ उसे वसूल किया। कहा जाता है कि एक पागल शासक की भांति मुहम्मद तुगलक ने इसे दस या बीस गुना कर दिया। इतना ही नहीं, घरों तथा चरागाहों पर भी कर लगाया गया। इन असह्य करों के कारण प्रजा को भयानक कष्ट सहने पड़े।
इसी बीच में अकाल पड़ गया। सल्तनत के कर्मचारियों ने प्रजा की संकटापन्न स्थिति में इतनी कठोरता से कर वसूल करना आरम्भ किया कि किसान लोग भयभीत होकर जंगलों में भाग गये। बरनी का कहना है कि सुल्तान ने जंगलों में भी किसानों का पीछा करने की आज्ञा दी। वहाँ उन्हें घेर कर कठोर दण्ड दिया गया। अपनी प्रजा के साथ इस प्रकार का व्यवहार एक पागल सुल्तान ही कर सकता था।
आरोप की समीक्षा
बरनी की यह उक्ति विश्वसनीय नहीं है। उलेमा वर्ग का होने के कारण बरनी सुल्तान से द्वेष रखता था और उसकी निन्दा करता था। सुल्तान ने बरनी की जन्म-भूमि बरान के निवासियों को कठोर दण्ड दिया था। इस कारण बरनी ने सुल्तान की कर नीति की इतनी तीव्र आलोचना की है और सुल्तान द्वारा दिये गये दण्ड का अतिरंजित चित्रण किया है।
गार्डनर ब्राउन के अनुसार करों में बहुत साधारण वृद्धि की गई थी। फरिश्ता ने इस वृद्धि को तीन से चार गुना बताया है। ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक ने करों में 5 से 10 प्रतिशत की वृद्धि करने के लिये भूमि कर को बढ़ाने की बजाय मकान तथा चारागाहों पर कर लगाया था।
दोआब की कर-वृद्धि में पागलपन की कोई बात नहीं थी। दो आब में कर वृद्धि का कार्य अलाउद्दीन खिलजी ने आरम्भ किया। मुहम्मद बिन तुगलक तो केवल उस नीति के परम्परागत रूप का निर्वहन कर रहा था। वह युग ऐसा ही था। उसमें हिन्दुओं को धन संग्रहण करने से रोकने तथा उन्हें हमेशा के लिये निर्धन बनाने का काम धार्मिक काम समझा जाता था।
इसलिये गयासुद्दीन तुगलक ने हिन्दुओं के नाम यह आदेश जारी किया कि वे धन संग्रहण नहीं करें। दोआब अत्यन्त धन सम्पन्न प्रदेश था। अच्छी फसल होने के कारण वहाँ के लोग प्रायः विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे। उनकी आर्थिक स्थिति को तोड़ने के लिये यह आवश्यक था कि उन पर इतना कर लगाया जाये कि उनके पास रोटी खाने के अलावा और कुछ न बचे। अतः सुल्तान ने पूरी जांच कराने के बाद बड़ी सावधानी के साथ इस योजना को तैयार करवाया था।
हो सकता है कि सरकारी कर्मचारियों ने प्रजा के साथ जो अत्याचार किया, उससे सुल्तान अवगत न रहा हो। इसमें सन्देह नहीं कि जब सुल्तान को प्रजा के कष्ट का पता चला तब उसने निराकरण की समुचित व्यवस्था की। उसने कर घटा दिया। भोजन तथा चारे का प्रबन्ध करवाया और किसानों में 70 लाख रुपये की तकावी बंटवाई।
उसने ढाई साल तक अपना मुख्यालय सरगद्वारी में बनाये रखा और वहाँ रहकर वह किसानों को अकाल राहत पहुँचाने का कार्य करता रहा। ये समस्त कार्य सुल्तान की उदारता के परिचायक हैं। किसी अन्य सुल्तान ने अकाल के समय किसानों के साथ ऐसी सहानुभूति नहीं दिखाई थी।
निष्कर्ष
कर-वृद्धि के आधार पर सुल्तान को पागल कहना निराधार है। हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति खराब करने तथा उन्हें विद्रोह करने योग्य न छोड़ने का कार्य उस युग के हर सुल्तान ने किया था।
(3) राजधानी के परिवर्तन का आरोप
आरोप का कारण
सुल्तान को पागल सिद्ध करने के लिए तीसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि एक पागल की भांति वह अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि ले गया था। सुल्तान ने दिल्ली के समस्त निवासियों को देवगिरि चले जाने की आज्ञा दे दी। सुल्तान की आज्ञा के उल्लंघन का साहस किसी को नहीं हुआ।
व्यापारी, दुकानदार, सरकारी कर्मचारी समस्त को भयभीत होकर देवगिरि के लिए प्रस्थान कर देना पड़ा। बरनी का कहना है कि दिल्ली नगर बिल्कुल उजड़ गया और मनुष्य की कौन कहे, कुत्ते तथा बिल्ली भी वहाँ पर नहीं रह गये। अन्धे, लँगड़े तथा लूले भी घसीट कर देवगिरि पहुँचाये गये। इस प्रकार का कार्य एक पागल तथा झक्की सुल्तान ही कर सकता था।
आरोप की समीक्षा
बरनी का कथन पूर्णतः विश्वसनीय नहीं है। उसमें अतिरंजना प्रतीत होती है। वास्तव में राजधानी के परिवर्तन में ऐसी कोई बात नहीं थी जिसके कारण सुल्तान को पागल कहा जाये। राजधानी का परिवर्तन प्राचीन काल से ही भारत में होता चला आया है।
देवगिरि, दिल्ली सल्तनत के केन्द्र में स्थित था जहाँ से शासन को सुचारू रीति से चलाया जा सकता था। राजधानी का परिवर्तन सुल्तान की बुद्धिमत्ता तथा उसकी दूरदर्शिता का द्योतक है, न कि उसके पागलपन का! अपनी योजना को कार्यान्वित करते समय सुल्तान ने वे समस्त व्यवस्थाएँ कीं जो एक बुद्धिमान शासक को करनी चाहिये थीं। फिर भी सुल्तान अपनी योजना में असफल रहा जिसका कारण यह था कि प्रजा दिल्ली से दौलताबाद जाकर रहना नहीं चाहती थी।
निष्कर्ष
सफलता अथवा असफलता के आधार पर ही किसी योजना के औचित्य का निश्चय नहीं किया जा सकता। अतः इस आधार पर मुहम्मद बिन तुगलक को पागल नहीं माना जा सकता।
(4) संकेत-मुद्रा के प्रचलन का आरोप
आरोप का कारण: सुल्तान को पागल सिद्ध करने के लिए चौथा प्रमाण यह दिया जाता है कि उसने संकेत मुद्रा का प्रचलन एक मूर्ख तथा झक्की व्यक्ति की भांति किया था। एक पागल की भांति उतावलेपन में आकर उसने तांबे की मुद्राएँ चला दीं।
न उसने मुद्राओं के निर्माण पर राज्य का एकाधिकार रखा और मुद्राओं पर ऐसे चिन्ह अंकित करने की व्यवस्था की जिससे सर्वसाधारण इन मुद्राओं का निर्माण न कर सके। इससे बढ़कर और क्या पागलपन हो सकता था। परिणाम यह हुआ कि समस्त कुशल लोग अपने घरों में ताँबे की मुद्राएँ बनाने लगे जिससे व्यापार ध्वस्त हो गया और जब सुल्तान ने इन संकेत मुद्रओं के बदले सोने-चाँदी की मुद्राएँ देना आरम्भ किया, तब राजकीय कोष रिक्त हो गया जिससे साम्राज्य पतनोन्मुख हो चला। इस प्रकार सुल्तान की योजना तथा उसका क्रियात्मक स्वरूप दोनों ही सुल्तान के पागलपन के द्योतक हैं।
आरोप की समीक्षा
संकेत मुद्रा का प्रचलन मुहम्मद बिन तुगलक के पागलपन का प्रतीक नहीं है। उससे पहले ही चीन तथा फारस में कागज की संकेत मुद्रा का प्रचलन हो चुका था। आधुनिक युग में भी संकेत-मुद्रा का प्रचलन है। अतः इस योजना में कोई ऐसी बात न थी जिससे उस पर पागलपन का लांछन लगाया जाये।
क्रियात्मक रूप में योजना की असफलता का कारण यह था कि यह योजना अपने समय से बहुत आगे थी। उस काल की जनता चांदी के सिक्के छोड़कर ताम्बे के सिक्के स्वीकार नहीं कर सकी। सुनारों ने भी ताम्बे के सिक्के ढालकर इस योजना को निष्फल कर दिया।
निष्कर्ष
मुहम्मद बिन तुगलक को इस योजना में अपनी प्रजा का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ परन्तु योजना की असफलता के आधार पर ही सुल्तान को पागल कहना उचित नहीं है।
(5) खुरासान तथा चीन की विजय योजनाएं बनाने का आरोप
आरोप का कारण
मुहम्मद बिन तुगलक के पागलपन के पक्ष में पाँचवा प्रमाण यह दिया जाता है कि एक पागल आदमी की तरह उसने खुरासान तथा चीन विजय की योजनाएँ बर्नाईं। दिल्ली से इतनी दूर स्थित देशों को जीतने की योजना बनाना सुल्तान के पागलपन का प्रमाण है।
आरोप की समीक्षा
मुहम्मद बिन तुगलक की चीन तथा खुरासान पर विजय प्राप्त करने की योजनाओं में ऐसी कोई बात नहीं थी जिसके आधार पर उसे पागल कहा जाये! वह महत्वाकांक्षी सुल्तान था। राज्य को चलाने के लिये धन प्राप्त करने तथा इतिहास में स्थान प्राप्त करने के लिये ख्याति प्राप्त करने की आकांक्षा करना किसी भी सुल्तान के लिये पागलपन का प्रमाण नहीं मानी जा सकतीं।
सिकन्दर ऐसा ही कर चुका था। अलाउद्दीन खिलजी भी ऐसा करना चाहता था। बाद में समरकंद और फरगना का शासक बाबर भी भारत विजय करने में सफल रहा था। जब बाहर से आकर शासक भारत विजय कर सकते थे तो भारत से बाहर जाकर शासक ऐसा क्यांे नहीं कर सकते थे।
यह भी विचारणीय है कि मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भारत में अब कुछ विजय करना शेष नहीं रह गया था। उसके पास विजय योजनाओं के लिए प्रचुर साधन भी थे। जब उसे इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ दिखाई नहीं दीं तो उसने इन योजनाओं को छोड़ दिया।
निष्कर्ष
चीन तथा खुरासान पर विजय प्राप्त करने के लिये बनाई गई योजनाओं के लिये मुहम्मद बिन तुगलक को पागल नहीं कहा जा सकता, वरन् उसकी प्रशंसा की जानी चाहिये कि वह दूरदर्शी राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ था। ये योजनाएँ सुल्तान की महत्वाकांक्षा का द्योतक हैं, न कि उसके पागलपन का।
(6) काल्पनिकता का आरोप
आरोप का कारण
मुहम्मद बिन तुगलक के पागल होने के पक्ष में एक यह भी प्रमाण उपस्थित किया जाता है कि वह उन्मुक्त व्यक्ति की भांति कल्पनाएँ किया करता था।
आरोप की समीक्षा
मुहम्मद बिन तुगलक अत्यंत कल्पनाशील सुल्तान था। नई योजनाएं बनाने में उसकी विशेष रुचि रहती थी। कई बार इन योजनाओं को कार्यरूप में परिणत करना असम्भव हो जाता था और अन्ततोगत्वा ये योजनाएं असफल हो जाती थीं किंतु केवल असफलताओं के आधार पर सुल्तान को पागल कहना सर्वथा अनुचित होगा।
उसमें मौलिक प्रतिभा थी। इसलिये उसमें कल्पनाशीलता तथा योजना प्रेमी होना स्वाभाविक ही था। उसकी कोई भी योजना ऐसी नहीं थी जो अनुकूल परिस्थितियों में कार्यान्वित नहीं की जा सकती थी। उसकी योजनाएँ इस कारण विफल नहीं हुईं कि वे कार्यान्वित नहीं की जा सकती थीं, वरन् वे इसलिये विफल हुईं क्योंकि वे अपने समय से बहुत आगे थीं। उन योजनाओं को सफल बनाने में राज्याधिकारियों तथा जनसाधारण का सहयोग प्राप्त नहीं हो सका।
निष्कर्ष
उपरोक्त समीक्षा से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुहम्मद बिन तुगलक पागल नहीं था अपितु वह अपने समय से बहुत आगे था। उस परम्परागत वातावरण में उसकी क्रांतिकारी योजनाएं उसके समय के लोगों की समझ में नहीं आती थीं। यदि वह आधुनिक काल में हुआ होता तो उसकी गणना महान् बादशाहों में हुई होती। वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक युगांतरकारी सोच का धनी था।
उसने उस काल की संकीर्णता तथा असहिष्णुता को हटाने का प्रयत्न किया था। वह कठमुल्लाओं के राज्य की जगह स्वतंत्र विचारों पर आधारित राजतन्त्र स्थापित करना चाहता था और राजनीति को धार्मिक प्रभाव से मुक्त करना चाहता था परन्तु ऐसा करना उस काल की धारणा के विरुद्ध था। इसमें संदेह नहीं कि वह स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था, परन्तु उसका शासन उदार था जो उसके ह्नदय की विशालता तथा उसके व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है। अतः सुल्तान को पागल कहना सर्वथा निराधार है।
लेनपूल ने लिखा है- ‘मुहम्मद बिन तुगलक मध्यकाल में सर्वाधिक आकर्षक व्यक्ति था। वह ऐसा व्यक्ति था जिसके विचार अपने समय से बहुत आगे थे। अलाउद्दीन खिलजी ने शासन की समस्याओं पर विचार किया था परन्तु उसका मस्तिष्क शक्तिशाली था, सभ्य नहीं। मुहम्मद बिन तुगलक अपनी योजनाओं में उससे अधिक साहसी था तथा उसके विचार एक शिक्षित और सभ्य मस्तिष्क के विचार थे।’
डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘यह सत्य है कि वह असफल रहा परन्तु उसकी असफलता का कारण बहुत बड़े अंश में वे परिस्थितियाँ थीं जिन पर उसका बहुत थोड़ा या बिल्कुल नियन्त्रण नहीं था।’
स्पष्ट है कि यह आरोप गलत है कि मुहम्मद तुगलक पागल था!
सुल्तान फीरोजशाह तुगलक ने दिल्ली के तख्त पर अपने अधिकार को पुष्ट बनाने के लिये स्वयं को खलीफा का नायब घोषित कर दिया। उसने खुतबे तथा मुद्राओं में खलीफा के नाम के साथ-साथ अपना नाम भी खुदवाया।
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु थट्टा में हुई थी। उस समय फीरोज तुगलक शाही खेमे में उपस्थित था। मुहम्मद बिन तुगलक के कोई पुत्र नहीं था। प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ ने दिल्ली का तख्त हड़पने की नीयत से एक अल्पवयस्क बालक को विगत सुल्तान का पुत्र घोषित कर दिया और स्वयं उसका संरक्षक बन गया किंतु दिल्ली के अमीरों को उसकी यह कार्यवाही पसंद नहीं आई इसलिये उन्होंने नये सुल्तान का मनोनयन करने के लिये अमीरों की एक सभा बुलाई।
सुल्तान फीरोजशाह तुगलक
फीरोज तुगलक का प्रारम्भिक जीवन
मुहम्मद बिन तुगलक के बाद फीरोजशाह तुगलक दिल्ली के तख्त पर बैठा। फरोजशाह का जन्म 1309 ई. में हुआ था। उसके पिता का नाम सिपहसालार रजब तुगा तथा माता का नाम बीबी नैला था। सिपहसालार रजब तुगा, सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का भाई था और बीबी नैला, पूर्वी पंजाब में दिपालपुर के भट्टी सूबेदार रणमल की पुत्री थी। राजपूत स्त्री का पुत्र होते हुए भी फीरोज कट्टर मुसलमान था और उसे हिन्दुओं से घृणा थी। मुहम्मद बिन तुगलक फीरोज को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।
दिल्ली के तख्त की प्राप्ति
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो जाने पर अमीरों, सेना के सरदारों तथा उलेमाओं ने सुल्तान का उत्तराधिकारी नियुक्त करने के लिए एक सभा की। शेख नासिरूद्दीन अवधी ने फीरोज का नाम प्रस्तावित किया। विचार-विमर्श के उपरान्त निर्वाचन समिति ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। फलतः फीरोज उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।
फीरोज मजहबी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसका कहना था कि उसे राज्य की बिल्कुल आकांक्षा नहीं थी। इसलिये उसने अमीरों के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मक्का जाने की इच्छा प्रकट की परन्तु अमीरों के दबाव के कारण तथा साम्राज्य के हित में उसने राज्य की बागडोर ग्रहण करना स्वीकार कर लिया। 22 मार्च 1351 को 42 वर्ष की आयु में थट्टा के निकट शाही खेमे में उसका राज्याभिषेक हुआ।
सुल्तान फीरोजशाह तुगलक की समस्याएँ
यद्यपि अमीरों, सरदारों तथा उलेमाओं ने फीरोज तुगलक को विधिवत् सुल्तान निर्वाचित कर लिया था और वह निर्विरोध दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था परन्तु उसका मार्ग पूर्णतः निरापद नहीं था। उसे निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ा-
(1.) ख्वाजाजहाँ तथा विगत सुल्तान के पुत्र की समस्या
सल्तनत का प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ, फीरोज को सुल्तान बनाने के पक्ष में नहीं था। वह खुदाबन्दजादा के अल्पवयस्क पुत्र को जो सुल्तान मुहम्मद का भान्जा था, सुल्तान का पुत्र घोषित करके उसके अधिकारों का समर्थन कर रहा था।
(2.) सिंध से सुरक्षित निकलने की समस्या
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के समय शाही खेमा राजधानी से सैंकड़ों मील दूर युद्ध के मैदान में था जिसे अफरा-तफरी के माहौल में शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिये जाने की आशंका थी।
(3.) प्रजा को सन्तुष्ट करनेकी समस्या
फीरोज के तख्त पर बैठने के समय सल्तनत की अधिकांश प्रजा तुगलकों के शासन से असंतुष्ट थी और आर्थिक संकट से घिरी हुई थी। सुल्तान के लिये यह समस्या अत्यन्त भयानक तथा घातक थी। राज्य के हित में इसका सुलझना नितान्त आवश्यक था अन्यथा साम्राज्य का विनाश हो सकता था।
(4.) रिक्त राजकोष की समस्या
मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की विफलताओं एवं विद्रोहों के कारण राज्य की आर्थिक दशा खराब हो चुकी थी। ख्वाजाजहाँ ने भी अमीरों का समर्थन प्राप्त करने के लिये काफी धन लुटा दिया था। स्वयं फीरोज ने सरकारी कर्ज माफ कर दिया तथा लोगों से विगत सुल्तान के लिये क्षमादान पत्र लिखवाने हेतु भी बहुत सा धन बांट दिया। इससे सरकारी कोष लगभग रिक्त हो गया।
(5.) अमीरों तथा उलेमाओं को नियंत्रण में रखने की समस्या
फीरोज की पांचवी समस्या अमीरों तथा उलेमाओं को प्रसन्न करके उन्हें अपने नियंत्रण एवं विश्वास में रखने की थी। मुहम्मद बिन तुगलक की नीति से अमीर तथा उलेमा अत्यन्त अप्रसन्न हो गये थे। इसलिये वह नीति अब चलने वाली नहीं थी।
(6.)विद्रोही प्रान्तों की समस्या
फीरोज की छठी समस्या विद्रोही प्रान्तों की थी। जिन प्रान्तों ने विद्रोह कर दिया था, उन्हें पराजित करके फिर से सल्तनत के अधीन करना आवश्यक था।
(7.) शासन की समस्या
फीरोज की छठवीं समस्या शासन को सुव्यवस्थित करने की थी। मुहम्मद बिन तुगलक ने भारतीय अमीरों की अयोग्यता को देखते हुए विदेशी अमीरों को शासन में उच्च अधिकार दिये थे किंतु फीरोज को भारत के तुर्की अमीरों तथा उलेमाओं ने सुल्तान बनाया था इसलिये उसे उन्हीं में से उच्च अधिकारी चुनने थे।
सुल्तान फीरोजशाह तुगलक की समस्याओं का निराकरण
(1.) ख्वाजाजहाँ तथा विगत सुल्तान केकथित पुत्र की हत्या
यद्यपि फीरोज तख्त पर बैठ गया था परन्तु भविष्य में चलकर इस बालक के कारण कठिनाई उत्पन्न हो सकती थी। इसलिये अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए फीरोज ने ख्वाजाजहाँ की हत्या करवा दी और विगत सुल्तान के कथित पुत्र को भी अपने मार्ग से हटा दिया। इस कारण इस समस्या से सदा के लिये छुटकारा मिल गया।
(2.) सिंध से सुरक्षित निष्कासन
यदि अमीरों में सुल्तान के विषय में झगड़ा चलता रहता तो निःसंदेह शाही खेमा दो भागों में बंट जाता, ऐसी स्थिति में शत्रुओं द्वारा उनके विनाश की पूरी संभावना थी किंतु चूंकि ख्वाजाजहाँ तथा उसके द्वारा घोषित मुहम्मद बिन तुगलक के पुत्र की हत्या हो गई इसलये शाही खेमा एक जुट बना रहा और सुरक्षित राजधानी लौट आया।
(3.) प्रजा को संतुष्ट करने के लिये कर्जों एवं करों की माफी
ख्वाजाजहाँ ने राजकोष का जो धन लोगों में बांट दिया था, फीरोज ने उस धन को वापस लेने का प्रयत्न नहीं किया। इससे लोगों की प्रसन्नता की सीमा न रही और वे सुल्तान के समर्थक बन गये। जिन लोगों पर सरकार का कर्जा था, फीरोज ने उस कर्जे को भी माफ कर दिया। इससे भी बहुत से लोग नये सुल्तान के कृतज्ञ बन गये।
जिन लोगों को मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में यातनाएँ सहनी पड़ी थीं तथा क्षति उठानी पड़ी थी, उन्हें धन देकर संतुष्ट किया गया और उनसे क्षमादान पत्र लिखवा कर उन पत्रों को मुहम्मद बिन तुगलक की कब्र में गड़वाया गया जिससे उसका परलोक सुधर जाय। इस प्रकार तख्त पर बैठते ही सुल्तान ने उदारता तथा सद्भावना का परिचय दिया जिससे उसे लोकप्रियता प्राप्त हो गई। उसने जनता पर लगाये जा रहे करों में से 23 करों को हटा दिया।
(4.) रिक्त राजकोष की पूर्ति
अब तक के सुल्तान राजकोष की पूर्ति जनता पर कर बढ़ाकर करते थे किंतु फीरोज ने कर बढ़ाने के स्थान पर व्यापार, कृषि एवं जागीरदारी व्यवस्था को चुस्त बनाने का प्रयास किया जिससे राजस्व में वृद्धि हो तथा सुल्तान के प्रति असंतोष भी नहीं बढ़े। उसके प्रयासों से जनता में खुशहाली आई, लोगों की आय बढ़ी तथा सरकार के कोष में भी धन की पर्याप्त आमदनी हुई।
(5.) अमीरों तथा उलेमाओं की सलाह से शासन
फीरोज ने अमीरों तथा उलेमाओं से परामर्श तथा सहायता लेकर शासन करना आरम्भ किया। फीरोज धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था इसलिये उसने धर्म आधारित शासन का संचालन किया। इससे अमीर एवं उलेमा सुल्तान से संतुष्ट रहने लगे किंतु फीरोज कुछ ही दिनों में उलेमाओं के हाथ की कठपुतली बन गया।
(6.) खोये हुए प्रांतोंको फिर से प्राप्त करने का प्रयास
मुहम्मद बिन तुगलक के समय में हुए विद्रोहों के कारण दिल्ली सल्तनत के बहुत से प्रांत स्वतंत्र हो गये थे। फीरोज पर उन्हें फिर से सल्तनत में शमिल करने की जिम्मेदारी थी किंतु उसने इसके लिये विशेष प्रयास नहीं किये। उसने बंगाल पर विजय प्राप्त की किंतु मुस्लिम स्त्रियों का क्रन्दन सुन कर उसने बंगाल को अपनी सल्तनत में शामिल किये बिना ही छोड़ दिया। उसने जाजनगर, नगरकोट तथा सिंध पर आक्रमण करके उन्हें फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया।
(7.) शासन सुधार के लिये योग्य अधिकारियों की नियुक्ति
सल्तनत के शासन को सुचारू रीति से संचालित करने के लिये फीरोज ने योग्य तथा अनुभवी व्यक्तियों की नियुक्तियाँ की। उसने मलिक मकबूल को नायब वजीर के पद पर नियुक्त किया और उसे ‘खान-ए-जहाँ’ की उपाधि से विभूषित किया। भूमि-कर की समुचित व्यवस्था करने के लिए फीरोज ने ख्वाजा निजामुद्दीन जुनैद को नियुक्त किया।
मलिक गाजी को ‘नायब आरिज’ के पद पर नियुक्त करके सेना के संगठन के कार्य सौंपा। मलिक गाजी शहना को सार्वजनिक निर्माण विभाग का कार्य दिया। इस प्रकार उसने शासन को सुचारू रीति से संचालित करने का प्रयास किया।
(8.) तख्त पर अधिकार पुष्ट करने के लिये खलीफा के नाम का प्रयोग
फीरोज तुगलक ने दिल्ली के तख्त पर अपने अधिकार को पुष्ट बनाने के लिये स्वयं को खलीफा का नायब घोषित कर दिया। उसने खुतबे तथा मुद्राओं में खलीफा के नाम के साथ-साथ अपना नाम भी खुदवाया।
निष्कर्ष: इस प्रकार फीरोज तुगलक ने अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया तथा धीरे-धीरे दिल्ली के तख्त पर अपनी स्थिति सुदढ़ कर ली।
सुल्तान फीरोजशाह तुगलक की युद्ध नीति
फीरोज तुगलक सामरिक प्रवृत्ति का सुल्तान नहीं था। इस कारण उसमें वीर सैनिकों जैसा साहस तथा उत्साह नहीं था। वह मुस्लिम स्त्रियों को करुण क्रंदन करते हुए नहीं देख सकता था इसलिये उसने विद्रोही प्रांतों को फिर से लेने का प्रयास नहीं किया। उसमें राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। वह मुसलमानों के लिए कोमल हृदय का व्यक्ति था।
विजय दृष्टि-गोचर होने पर भी वह या तो पीछे हट जाता था या शत्रु से सन्धि कर लेता था। वह ऐसी धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था कि रणस्थल में भी मुसलमानों का रक्तपात उसके लिये असह्य था। उलेमाओं के प्रभाव में होने के कारण फीरोज ने हिन्दू शासकों द्वारा शासित जाजनगर तथा नगरकोट को जीतने में पूरा उत्साह दिखाया।
बंगाल पर विजय
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में बंगाल ने दिल्ली से अपना विच्छेद कर लिया था। हाजी इलियास ने शमसुद्दीन इलियास शाह की उपाधि धारण करके स्वयं को बंगाल का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। फीरोज तुगलक ने बंगाल को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिये 1353 ई. में एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए कूच किया।
जब इलियास को फीरोज तुगलक के आने की सूचना मिली तो उसने अपने को इकदला के किले में बन्द कर लिया। फीरोज ने उसे किले से निकालने के लिये अपनी सेना को पीछे हटाना आरम्भ किया। जब उसकी सेना कई मील पीछे चली गई तो इलियास ने किले से बाहर निकलकर फीरोज की सेना का पीछा किया। अब सुल्तान की सेना लौट पड़ी। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। फीरोज की सेना को विजय प्राप्त हुई।
जब वह किले पर अधिकार स्थापित करने गया तो उसने मुस्लिम स्त्रियों को करुण क्रंदन सुना। जिसे सुनकर फीरोज दुर्ग पर अधिकार स्थापित किये बिना ही वहाँ से लौट पड़ा। जब शाही सेनापति तातार खाँ ने फीरोज तुगलक को परामर्श दिया कि वह बंगाल को अपने राज्य में मिला ले तो उसने यह कह कर टाल दिया कि बंगाल जैसे दलदली प्रान्त को दिल्ली सल्तनत में मिलाना बेकार है। इस प्रकार परिश्रम से प्राप्त हुई विजय को भी सुल्तान ने खो दिया और बंगाल स्वतन्त्र ही बना रहा।
जाजनगर पर विजय
बंगाल से लौटते समय सुल्तान ने जाजनगर, अर्थात वर्तमान उड़ीसा पर आक्रमण किया। जाजनगर के राजा ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और प्रतिवर्ष कुछ हाथी कर के रूप में भेजने का वचन दिया। इस युद्ध में सुल्तान ने अपनी धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता का परिचय दिया। उसने पुरी में भगवान जगन्नाथ के मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करवा दिया और मूर्तियों को समुद्र में फिंकवा दिया। जाजनगर को जीतने के बाद मार्ग में बहुत से सामन्तों तथा भूमिपतियों पर विजय प्राप्त करता हुआ फीरोज तुगलक दिल्ली लौट आया।
नगरकोट पर विजय
मुहम्मद तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में नगरकोट का राज्य स्वतन्त्र हो गया था। फीरोज ने फिर से नगरकोट को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने का निश्चय किया। नगरकोट पर आक्रमण करने का एक और भी कारण था। नगरकोट राज्य में स्थित ज्वालामुखी का मन्दिर इन दिनों अपनी धन सम्पदा के लिए प्रसिद्ध था।
इस मन्दिर में सहस्रों यात्री दर्शन के लिये आते थे और मूर्तिपूजा करते थे। यह बात फीरोज के लिए असह्य थी। इसलिये उसने नगरकोट पर आक्रमण कर दिया। नगरकोट के हिन्दू राजा ने छः महीने तक बड़ी वीरता से दुर्ग की रक्षा की किंतु अन्त में विवश होकर उसने फीरोज से संधि की प्रार्थना की।
सुल्तान ने उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया तथा उससे विपुल धन लेकर अपनी सेना हटा ली। ज्वालामुखी मन्दिर से फीरोज को संस्कृत भाषा में लिखी हुई 1,300 पुस्तकें भी उपलब्ध हुईं। फीरोज ने उनमें से कुछ पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया।
सिन्ध पर विजय
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम दिनों में सिंध में भयानक विद्रोह आरम्भ हो गया था। मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु सिंध के विद्रोह का दमन करते समय ज्वर से पीड़ित होकर थट्टा में हुई थी। फीरोज सिन्ध वालों की इस दुष्टता को भूला नहीं था। इसलिये 1371 ई. में उसने एक विशाल सेना के साथ सिन्ध के लिए प्रस्थान किया।
इस अभियान में फीरोज को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई परन्तु अन्त में सिन्ध के शासक ने सुल्तान से क्षमा याचना की। सुल्तान ने उसकी प्रार्थना को तुरन्त स्वीकार कर लिया और उसके भाई को सिन्ध का शासक बना दिया। बंगाल की भांति सिन्ध में भी फीरोज मुसलमानों के प्रति अपनी उदारता के कारण विफल रहा।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि फीरोज की युद्ध नीति दो अलग भागों में बंटी हुई थी। हिन्दुओं के लिये अलग नीति थी तथा मुसलमानों के लिये अलग नीति थी। वह हिन्दुओं को नष्ट करना अपना कर्त्तव्य समझता था किंतु मुस्लिम औरतों का करुण क्रंदन नहीं सुन सकता था। उसके सैनिक युद्ध में प्राप्त विजय का भी उपभोग नहीं कर पाते थे क्योंकि फीरोज मुसलमानों के प्रति अपनी उदारता के कारण उसे खो देता था।
फीरोजशाह की धार्मिक नीति मजहबी कट्टरता पर आधारित थी। फीरोजशाह तुगलक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम तथा कुरान में विश्वास होने के कारण उसने इस्लाम आधारित शासन का संचालन किया।
फीरोजशाह की धार्मिक नीति
फीरोजशाह की धार्मिक नीति का परिचय उसकी पुस्तक फतुहाते फिरोजशाही से मिलता है-
(1.) अमीरों तथा उलेमाओं की सलाह से शासन
फीरोजशाह तुगलक ने उलेमाओं के समर्थन से राज्य प्राप्त किया था इसलिये उसने उलेमाओं को संतुष्ट रखने की नीति अपनाई तथा उलेमाओं के हाथ की कठपुतली बन गया। वह उलेमाओं से परामर्श लिये बिना कोई कार्य नहीं करता था।
(2.) स्वयं को खलीफा का नायब घोषित करना
वह दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्वयं को खलीफा का नायब घोषित किया।
(3.) कुरान के अनुसार लूट का बंटवारा
फीरोज तुगलक ने युद्ध में मिला लूट का सामान सेना तथा राज्य में उसी अनुपात में बांटने की व्यवस्था लागू की जैसे कुरान द्वारा निश्चित किया गया है, अर्थात् पांचवां भाग राज्य को और शेष सेना को।
(4.) धार्मिक असहिष्णुता की नीति
फीरोजशाह तुगलक ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। उसके शासन काल में हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था। एक ब्राह्मण को सुल्तान के महल के सामने जिन्दा जलवा दिया गया। उस पर यह आरोप लगाया गया कि वह मुसलमानों को इस्लाम त्यागने के लिए उकसाता है।
(5.) हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन
फीरोजशाह तुगलक अपनी हिन्दू प्रजा को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित करता था और जो हिन्दू मुसलमान हो जाते थे उन्हें जजिया कर से मुक्त कर देता था। फतुहाते फिरोजशाही में वह लिखता है- मैंने अपनी काफिर प्रजा को पैगम्बर का धर्म स्वीकार करने के लिये उत्साहित किया और मैंने यह घोषित किया कि जो मुसलमान हो जावेगा उसे जजिया से मुक्त कर दिया जावेगा।
(6.) मंदिरों को तोड़ने एवं लूटने की नीति
फीरोज तुगलक ने मध्यकालीन मुस्लिम सुल्तानों की तरह हिन्दू मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ने एवं लूटने की नीति जारी रखी। उसने जाजनगर में जगन्नाथपुरी तथा नगरकोट में ज्वाला देवी मंदिर के आक्रमण के समय हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। उसने पुरी के जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियां तुड़वाकर समुद्र में फिंकवा दीं। उसने नगर ज्वालादेवी मंदिर की सम्पदा लूटने के लिये नगर कोट पर आक्रमण किया तथा मंदिर को नष्ट करके वहाँ से भारी सम्पदा प्राप्त की।
(7.) ध्वस्त मंदिरों के पुनर्निर्माण पर रोक
फीरोज तुगलक के शासन में जो मंदिर तोड़ दिये जाते थे उनके पुनर्निर्माण पर रोक लगा दी गई थी।
(8.) हिन्दू मेलों पर प्रतिबंध
फीरोजशाह तुगलक ने हिन्दू मेलों पर प्रतिबंध लगा दिया।
(9.) मस्जिदों का निर्माण
फीरोजशाह ने इस्लाम के उन्नयन के लिये मस्जिदों का निर्माण करवाया। बरनी के अनुसार फीरोजशाह ने 40 मस्जिदों का निर्माण करवाया।
(10.) दीवाने खैरात का गठन
फीरोजशाह ने मुसलमानों की पुत्रियों के विवाह में सहायता देने के लिए ‘दीवाने खैरात’ खोला। कोई भी मुसलमान इस कार्यालय में अर्जी देकर पुत्री के विवाह के लिये आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकता था। प्रथम श्रेणी के लोगों को 50 टंक, द्वितीय श्रेणी के लोगों को 30 टंक और तृतीय श्रेणी के लोगों को 20 टंक दिया जाता था। मुस्लिम विधवाओं तथा अनाथों को भी इस विभाग से आर्थिक सहायता मिलती थी।
(11.) मदरसों एवं मकतबों का निर्माण
फीरोजशाह तुगलक ने इस्लाम की शिक्षा के प्रसार के लिए कई मदरसे तथा मकतब खुलवाये। वह इस्लामिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देता था। प्रत्येक विद्यालय में मस्जिद की व्यवस्था की गई थी। इन संस्थाओं को राज्य से सहायता मिलती थी। विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति तथा अध्यापकों को पेंशन दी जाती थी। मकतबों को राज्य की ओर से भूमि भी मिलती थी।
(12.) हिन्दू जनता पर धार्मिक कर
उसने कुरान के नियमानुसार जनता पर केवल चार कर- खिराज, जकात, जजिया तथा खाम को जारी रखे। शेष समस्त कर हटा दिये गये।
(13.) ब्राह्मणों पर जजिया कर
अरब आक्रमण के समय से ही ब्राह्मण जजिया कर से मुक्त थे किंतु फीरोज ने उलेमाओं के कहने पर ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगा दिया। शाक्त सम्प्रदाय के हिन्दुओं का उसने विशेष रूप से दमन किया।
(14.) शियाओं के साथ दुर्व्यवहार
न केवल हिन्दुओं, वरन् शिया सम्प्रदाय के मुसलमानों के साथ भी फीरोज का व्यवहार अच्छा नहीं था। शिया मुसलमानों के सम्बन्ध में वह लिखता है- मैंने उन समस्त को पकड़ा और उन पर गुमराही का दोष लगाया। जो बहुत उत्साही थे, उन्हें मैंने प्राणदण्ड दिया। मैंने उनकी पुस्तकों को आम जनता के बीच जला दिया। अल्लाह की मेहरबानी से शिया सम्प्रदाय का प्रभाव दब गया।
(15.) सूफियों के प्रति घृणा
फीरोजशाह तुगलक सूफियों को भी घृणा की दृष्टि से देखता था क्योंकि सूफियों के विचार वेदान्त दर्शन से साम्य रखते थे।
निष्कर्ष
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि फीरोज ने एक कट्टर सुन्नी मुसलमान की भांति शासन किया। उसकी धार्मिक नीतियों के कारण उसके राज्य में हिन्दुओं का जीवन बहुत कष्टमय हो गया था। शियाओं एवं सूफियों के लिये भी सल्तनत की ओर से कोई संरक्षण उपलब्ध नहीं था। इसी कारण बरनी तथा अफीफ ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है।
डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘फीरोज में उस विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले बादशाह (अकबर) की प्रतिभा का शतांश भी नहीं था जिसने सार्वजनिक हितों का उच्च मंच से समस्त सम्प्रदायों तथा धर्मों के प्रति शान्ति, सद्भावना तथा सहिष्णुता का सन्देश दिया।’
फीरोजशाह तुगलक को युद्धों से विरक्ति थी जिसके लिए मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि वह शांत प्रकृति का सुल्तान था। शासन सुधारों में उसकी विशेष रुचि थी। इसलिए फीरोजशाह तुगलक की शासनव्यवस्था अच्छी थी।
फीरोजशाह तुगलक की शासनव्यवस्था
फीरोजशाह तुगलक प्रजा के कल्याण की ओर विशेष रूप से ध्यान देता था परन्तु उलेमाओं के प्रभाव में होने के कारण धार्मिक संकीर्णता का शिकार था। इस कारण वह हिन्दुओं के साथ बड़ा अत्याचार करता था। फीरोजशाह तुगलक की शासनव्यवस्था में निम्नलिखित सुधार हुए-
(1.) स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन
अन्य मध्यकालीन मुसलमान शासकों की भांति फीरोजशाह तुगलक की शासनव्यवस्था भी स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश थी। सुल्तान स्वयं राज्य का प्रधान था और वही प्रधान सेनापति था। सुल्तान के नीचे उसका प्रधानमन्त्री था जो सुल्तान को महत्वपूर्ण कार्यों में परामर्श देता था। फीरोज का प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ मकबूल योग्य व्यक्ति था।
वह सुल्तान के साथ युद्ध स्थल में जाता था और कभी-कभी सुल्तान की अनुपस्थिति में दिल्ली के शासन का भार उसी के ऊपर रहता था। महत्वपूर्ण विषयों पर सलाह लेने के लिये सुल्तान दरबार का आयोजन करता था तथा अमीरों से परामर्श लेता था।
(2.) इस्लाम आधारित शासन
फीरोज में उच्च कोटि की धार्मिक कट्टरता थी। चूंकि उलेमाआंे के अनुरोध पर वह तख्त पर बैठा था, इसलिये वह समस्त कार्य उनकी सहायता तथा परामर्श से करता था। इस प्रकार फीरोज ने इस्लाम आधारित शासन की स्थापना की। वह कुरान के नियम के अनुसार शासन करता था। उसके शासन में हिन्दुओं को उतना लाभ नहीं हुआ जितना मुसलमानों को।
श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘फीरोज न तो अशोक था न अकबर जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया था, वरन् वह औरंगजेब की भांति कट्टरपंथी था।’
(3.) सेना का प्रबन्ध
फीरोज में न तो उच्चकोटि के सैनिक गुण थे और न वह सामरिक प्रवृत्ति का सुल्तान था। इसलिये उसमें सैनिक संगठन की भी क्षमता नहीं थी। उसने साम्राज्य का सैनिक संगठन जाति-प्रथा के आधार पर किया था। स्थायी सैनिकों को जागीरें दी गई थीं। जो सैनिक अस्थायी रूप से काम करते थे, उन्हें सरकारी कोष से नकद वेतन दिया जाता था।
कुछ ऐसे भी सैनिक थे जिन्हें किसी गांव की भूमि का एक भाग वेतन के रूप में मिलता था। घुड़सवारों को आदेश दिया गया कि वे उत्तम घोड़ों को सैनिक दफ्तर में लाकर रजिस्ट्री कराएं। घोड़ों के निरीक्षण के लिए नायब अर्जे मुमालिक की नियुक्ति की गई थी। मुसलमान सैनिकों के साथ दया दिखाई जाती थी।
इस कारण वृद्ध, रुग्ण तथा अक्षम सैनिकों को भी सेना से अलग नहीं किया जाता था। फीरोज ने एक नया नियम बनवाया कि जब कोई सैनिक वृद्धावस्था के कारण असमर्थ हो जाए तो उसके स्थान पर उसके पुत्र अथवा दामाद या उसके गुलाम को रख लिया जाए। इस नियम का सेना की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ा। बहुत से योग्य सैनिकों का स्थान कमजोर सैनिकों ने ले लिया।
(4.) न्याय व्यवस्था
फीरोज कट्टर मुसलमान था। इसलिये उसने न्याय व्यवस्था कुरान के नियमों के आधार पर की थी। वह अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था परन्तु उसने दण्ड विधान की कठोरता को हटा दिया। अंग-भंग करने के दण्ड पर रोक लगा दी गई। प्राणदण्ड भी बहुत कम दिया जाता था।
सुल्तान की उदारता के कारण कई बार दण्ड के भागी लोग भी दण्ड पाने से बच जाते थे। शरीयत के नियमों के अनुसार न्याय किया जाता था। मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था। फीरोज तुगलक के काल में न्याय उतना पक्षपात रहित तथा कठोर नहीं था जितना मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में।
(5.) मुद्रा की व्यवस्था
मुद्रा की समस्या के सुलझाने का कार्य मुहम्मद तुगलक के काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु पूरा नहीं हो सका था। फीरोज ने इस अधूरे कार्य को पूर्ण करने का प्रयत्न किया। उसने छोटे-छोटे मूल्य की मुद्राएं चलाईं जिनका प्रयोग छोटे व्यवसायों में हो सकता था। फीरोज धातु की शुद्धता पर विशेष रूप से ध्यान देता था परन्तु अधिकारियों की बेइमार्नी के कारण मुद्रा सम्बन्धी सुधार में विशेष सफलता नहीं मिली।
(6.) कर नीति
सल्तनत की आय का प्रमुख साधन भूमि कर था। भूमि कर के अतिरिक्त आय के अन्य साधन भी थे। चूंकि सुल्तान को सैनिक अभियानों पर धन व्यय नहीं करना था इसलिये उसे राजकोष भरने की उतनी चिन्ता नहीं थी जितनी प्रजा को सुखी बनाने की। उसने उन समस्त 23 करों को हटा लिया जिनसे प्रजा को कष्ट होता था। उसने कुरान के नियमानुसार जनता पर केवल चार कर- खिराज, जकात, जजिया तथा खाम को जारी रखे।
युद्ध में मिला लूट का सामान सेना तथा राज्य में फिर उसी अनुपात में बंटने लगा जैसे कुरान द्वारा निश्चित किया गया है, अर्थात् पांचवां भाग राज्य को और शेष सेना को। सुल्तान की इस उदार नीति का अच्छा परिणाम हुआ। व्यापार तथा कृषि दोनों की उन्नति हुई। वस्तुओं का मूल्य कम हो गया और लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति होने लगी। सुल्तान की आय में वृद्धि हो गई और सुल्तान के पास इतना धन हो गया कि वह लोक सेवा के कार्यों को कर सके।
(7.) जागीर प्रथा
सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत फीफों में और प्रत्येक फीफ जिलों में विभक्त थी जिनके शासन के लिए विभिन्न अधिकारी नियुक्त किये जाते थे। इन अधिकारियों को सरकार की ओर से जागीरें मिलती थीं। अलाउद्दीन खिलजी ने जागीर प्रथा को समाप्त कर दिया था। वह अपने अफसरों को नकद वेतन देता था किंतु मुहम्मद बिन तुगलक को यह प्रथा फिर से चलानी पड़ी थी। फीरोज तुगलक ने जागीर प्रथा को नियमित रूप से स्थापित कर दिया। इसका परिणाम सरकार के लिए बहुत बुरा हुआ। जब तुगलक वंश डगमगाने लगा तब ये जागीरदार अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे।
(8.) कृषि व्यवस्था
फीरोज तुगलक ने कृषि की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने हिसामुद्दीन नामक व्यक्ति को लगान की जांच पड़ताल करने के लिए नियुक्त किया। हिसामुद्दीन ने 6 वर्ष तक राज्य के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और किसानों की वास्तविक दशा का पता लगाया। कृषि की उन्नति के लिये हिसामुद्दीन की रिपोर्ट के आधार पर कई सुधार किये गये।
इन सुधारों का ध्येय किसानों के कष्ट दूर करके उन्हें अधिक से अधिक सुविधायें देना था। फलतः जितने कष्टदायक कर थे, सब हटा दिये गए। फीरोज ने 23 करों को बन्द कर दिया। सरकारी मालगुजारी कम कर दी। किसानों का बोझ घटाने के लिए प्रान्तीय तथा स्थानीय अधिकारियों से धन के रूप में भेंट लेना बन्द कर दिया।
(9.) सिंचाई की व्यवस्था
वर्षा के अभाव के कारण प्रायः अकाल पड़ता था और प्रजा को कष्ट भोगना पड़ता था। इसलिये अनावृष्टि के समय सिंचाई करने के लिए फीरोज तुगलक ने चार नहरें बनवाईं। तारीखे मुबारकशाही के रचियता ने चार नहरों का उल्लेख किया है। इनमें से एक नहर सतलज से निकल कर घग्घर तक जाती थी।
दूसरी नहर सिरमूर की पहाड़ियों के पास से निकल कर हांसी होती हुई हिसार फीरोजा तक जाती थी। तीसरी नहर घघ्घर से फीरोजाबाद तक और चौथी यमुना से निकलकर फीरोजाबाद के एक स्थान तक जाती थी। फीरोज तुगलक ने बहुत बड़ी संख्या में कुएं भी खुदवाये।
सिंचाई की अच्छी व्यवस्था हो जाने से बेकार पड़ी भूमि पर भी खेती होने लगी। नहरों के निरीक्षण के लिए कुशल इंजीनीयर रखे गये। नदियों पर बांध भी बंधवाये गये। सिंचाई व्यवस्था अच्छी होने से किसानों की आय में वृद्धि हो गई। राज्य की ओर से सिंचाई सुविधा उलब्ध करवाये जाने के बदले में किसानों से उपज का दसवां भाग लिया जाता था।
(10.) बेकारी की समस्या
उन दिनों मध्यम श्रेणी के लोगों में बेकारी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया। नगरों में बेकार लोगों की संख्या इतनी बढ़ गई कि उनकी समस्या सुलझाने के लिये सुल्तान ने बेकारी उन्मूलन का अलग विभाग खोला। कोतवाल को आदेश दिया गया कि वह बेकार लोगों की सूची बनाये।
बेकार लोगों को दीवान के पास आवेदन भेजना पड़ता था और योग्यतानुसार लोगों को काम दिया जाता था। शिक्षित व्यक्तियों को महल में नौकर रख लिया जाता था। जो लोग किसी अमीर का गुलाम बनना चाहते थे, उन्हें सिफारिशी चिट्ठियां दी जाती थीं।
(11.) औषधालय
फीरोज तुगलक को स्वयं औषधि विज्ञान का अच्छा ज्ञान था। उसने दिल्ली में एक ‘दारूलसफा’ (औषधालय) स्थापित करवाया जिसमें रोगियों को निःशुल्क औषधियां मिलती थीं। रोगियों के भोजन की व्यवस्था राज्य की ओर से की जाती थी और देख-भाल के लिये योग्य हकीमों को रखा जाता था।
(12.) यात्रियों की सहायता
मुस्लिम फकीरों तथा सुल्तानों की समाधियों के दर्शनार्थ जाने वाले यात्रियों को राज्य की ओर से दान देने की व्यवस्था की गई।
(13.) मुहम्मद के कार्यों का प्रायश्चित
फीरोज तुगलक को मुहम्मद बिन तुगलक के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। उसने मुहम्मद बिन तुगलक के पापों का प्रायश्चित करना आरम्भ किया। जिन व्यक्तियों को मुहम्मद ने प्राण दण्ड दिया था, अथवा जिन्हें अंग-भंग की सजा दी थी, फीरोज ने उन्हें अथवा उनके परिवार वालों को धन देकर उनसे क्षमापत्र प्राप्त किये जिन्हें एक सन्दूक में बन्द करके मुहम्मद बिन तुगलक की समाधि के सिरहाने रखा गया। जिन लोगों के गांव अथवा भूमि छिन गई थी, वह वापस लौटा दी गई।
(14.) गुलाम प्रथा
फीरोज के शासन काल में गुलामों का बाहुल्य था। इन गुलामों की दशा बड़ी ही दयनीय थी। फीरोज तुगलक ने उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया। ये गुलाम युद्ध सैनिक होने के कारण असभ्य तथा अशिक्षित थे। इसलिये ये राज्य के लिये सहायक सिद्ध होने के स्थान पर राज्य के लिए भार बन गये थे।
फिरोज ने इनके लिए एक अलग विभाग खोला और उसका नाम ‘दीवाने बन्दगान’ रखा। इस विभाग का एक अलग कोष तथा अलग दीवान होता था। सुल्तान ने 40,000 गुलामों को केन्द्र में रखा और उन्हें योग्यतानुसार विभिन्न विभागों में नियुक्त कर दिया। कुछ गुलामों की शिक्षा की व्यवस्था की गई और कुछ को सुल्तान के अंग-रक्षकों में भर्ती कर लिया गया। शेष 1,60,000 गुलाम साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में भेज दिये गये और प्रांतीय गवर्नरों तथा अधिकारियों के संरक्षण में रखे गये।
(15.) शिक्षा तथा साहित्य
यद्यपि फीरोज स्वयं बहुत बड़ा विद्वान नहीं था परन्तु वह शिक्षा तथा साहित्य का पोषक था। उसने शिक्षा के प्रसार के लिए बहुत से मदरसे तथा मकतब खुलवाये। इन संस्थाओं को राज्य से सहायता मिलती थी। विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति तथा अध्यापकों को पेंशन दी जाती थी। मकतबों को राज्य की ओर से भूमि मिलती थी।
सुल्तान ने साहित्य सृजन को संरक्षण तथा सहायता प्रदान की। सुप्रसिद्ध इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक तारीखे फीरोजशाही की रचना फीरोज तुगलक के शासन काल के प्रारंभिक भाग में की थी। शम्से सिराज अफीफ ने अपनी इतिहास की पुस्तक इसी काल में लिखी थी। धर्म तथा नीति पर इस काल में कई ग्रंथ लिखे गये। फीरोज ने बहुत से संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद कराया। मौलाना जलालुद्दीन रूमी इस काल का बहुत बड़ा तत्त्ववेत्ता था।
(16.) लोक सेवा के कार्य
फीरोज तुगलक के शासन काल में लोक सेवा के अनेक कार्य किये गये। निर्माण कार्य में सुल्तान की विशेष रुचि थी। उसने 1350 ई. में दिल्ली के निकट फीरोजाबाद नामक नगर स्थापित किया। उसके गौरव को बढ़ाने के लिए उसने अम्बाला तथा मेरठ जिले से लाकर अशोक के दो स्तम्भ लगवाये।
फीरोज ने जौनपुर, फतेहाबाद तथा हिसार नामक नगरों का निर्माण करवाया। बरनी के अनुसार फीरोज ने 50 बांधों, 40 मस्जिदों, 30 कॉलेजों, 20 महलों, 100 सरायों, 200 नगरों, 30 झीलों, 100 औषधालयों, 5 मकबरों, 100 स्नानागारों, 10 स्तंभों, 40 सार्वजनिक कुओं तथा 150 पुलों का निर्माण करवाया। फीरोज को उपवन लगवाने का भी बड़ा शौक था। उसने दिल्ली के निकट 1,200 बाग लगवाये। अन्य कई स्थानों पर भी उसने बाग लगवाये। उसने अलाउद्दीन द्वारा बनवाये गये 30 उपवनों का जीर्णोद्धार करवाया।
(17.) राज दरबार तथा राज परिवार की व्यवस्था
फीरोज तुगलक का स्वभाव सरल एवं जीवन सादा था। उसके दरबार में अधिक तड़क-भड़क नहीं थी। ईद तथा शबेरात के अवसर पर अमीर लोग सज-धज कर आते थे। उनका बड़ा सम्मान होता था। इस आमोद-प्रमोद में धनी-गरीब, समस्त भाग लेते थे। राज्य परिवार की व्यवस्था को ‘कारखाना’ कहते थे। इसके अलग-अलग विभाग थे और इसके अलग-अलग पदाधिकारी तथा कर्मचारी होते थे। प्रत्येक कारखाने का अलग राजस्व विभाग होता था।
निष्कर्ष
उपरोक्त आधार वर कहा जा सकता है कि फीरोजशाह तुगलक की शासनव्यवस्था दिल्ली सल्तनत के अन्य सुल्तानों की शासन व्यवस्था की तुलना में अधिक अच्छी थी किंतु यह व्यवस्था केवल मुसलमान प्रजा के लिए ही थी। हिन्दुओं कर जीवन बहुत कष्टमय था।
चूंकि शासन को कठोरता से चलाया गया था इसलिए उसके समय में न तो कोई बड़ा विद्रोह हुआ और न उसके समय में कोई भयानक अकाल पड़ा। मुसलमानों के प्रति बरती जा रही उदारता के कारण मुसलमान सैनिकों का नैतिक पतन आरम्भ हो गया और उनकी आकांक्षा तथा उत्साह मन्द पड़ गये।
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