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अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

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अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन खिलजी: साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से मुस्लिम इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना है। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने साम्राज्य को केवल उत्तर भारत तक सीमित न रखकर दक्षिण भारत में भी बढ़ा लिया।

उत्तरी भारत की विजय (1299-1305 ई.)

लक्ष्य निश्चित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने साम्राज्य विस्तार का कार्य आरम्भ किया। सर्वप्रथम उसने उत्तरी भारत को जीतने की योजना बनाई।

(1.) गुजरात पर विजय

सर्वप्रथम अलाउद्दीन की दृष्टि गुजरात के अत्यन्त धन-सम्पन्न राज्य पर पड़ी। इन दिनों गुजरात में बघेला राजा कर्ण शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। अलाउद्दीन ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ को कर्ण बघेला पर आक्रमण करने भेजा।

इन सेनापतियों ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा को घेर लिया। कर्ण भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ। मुसलमानों ने गुजरात को खूब लूटा और लूट की अपार सम्पत्ति दिल्ली लाई गई। कर्ण बघेला ने अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरी के राजा रामचन्द्र के यहाँ शरण ली। कर्ण की रानी कमला देवी तथा मलिक काफूर नामक एक सुंदर युवक, दिल्ली की सेना के हाथ लगे।

उन दोनों को सुल्तान के पास दिल्ली भेज दिया गया। अलाउद्दीन ने कमला देवी को अपने हरम में डाल लिया तथा मलिक काफूर को अप्राकृतिक संसर्ग के लिये रख लिया। जब शाही सेना गुजरात से लूट का माल लेकर दिल्ली लौट रही थी तो कुछ नव-मुसलमानों ने इस खजाने को लूट लिया तथा तथा नुसरत खाँ के एक भाई और अलाउद्दीन के भतीजे को मारकर भाग गये।

विद्रोही मंगोलों ने रणथंभौर के दुर्ग में शरण ली। शाही सेना ने बर्बरता से विद्रोहियों का दमन किया। दिल्ली में रह रहे उनके परिवारों को भी नृशंसता पूर्वक मारा गया। उनकी स्त्रियों का सतीत्व लूट लिया गया तथा बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही टुकड़े करके फैंक दिया गया। बरनी ने अलाउद्दीन की इस क्रूरता की निंदा की है।

(2.) रणथम्भौर पर विजय

गुजरात पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इन दिनों रणथम्भौर में पृथ्वीराज चौहान का वंशज हम्मीर शासन कर रहा था। उसने जालोर से शाही खजाना लूटकर भागे नव-मुस्लिमों को अपने यहाँ शरण दी थी।

अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नसरत खाँ को रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। हम्मीर ने दुर्ग के अन्दर से रक्षात्मक युद्ध करने का निश्चय किया। अलाउद्दीन के सेनापतियों ने दुर्ग का घेरा डाल दिया। घेरे का निरीक्षण करते समय अचानक नसरत खाँ को एक पत्थर लगा और उसकी मृत्यु हो गई। राजपूतों ने बड़ी वीरता के साथ युद्ध करके तुर्कों के पीछे धकेल दिया।

जब सुल्तान को इसकी सूचना मिली तो उसने स्वयं रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया। वह लगभग एक वर्ष तक दुर्ग का घेरा डाले रहा। हम्मीर देव के दो मंत्रियों रणमल तथा रतनपाल ने हम्मीरदेव के साथ विश्वासघात किया जिसके काराण मुसलमान सैनिक किले की दीवारों पर चढ़ने में सफल हो गये और अभेद्य दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली। हम्मीरदेव वीरगति को प्राप्त हुआ तथा उसकी स्त्रियों ने जौहर किया। अलाउद्दीन खिलजी उलूग खाँ को रणथम्भौर सौंप कर दिल्ली लौट आया। थोड़े ही दिनों बाद उलूग खाँ बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।

(3.) मेवाड़ पर विजय

दिल्ली सल्तनत के किसी भी सुल्तान को अब तक मेवाड़ पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ था। इन दिनों रावल रत्नसिंह मेवाड़़ में शासन कर रहा था। 1303 ई. में अलाउद्दीन एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ पर आक्रमण करने चल दिया। अलाउद्दीन को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने में पांच माह लगे।

अगस्त 1303 में अलाउद्दीन का दुर्ग पर अधिकार हो गया। इसके बाद अलाउद्दीन ने दुर्ग में कत्ले आम का आदेश दिया। इस कत्ले आम में लगभग 30 हजार लोग मारे गये। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदल कर खिजा्रबाद कर दिया तथा उसे अपने पुत्र खिज्र खाँ को देकर स्वयं पुनः दिल्ली चला गया।

पद्मिनी की कथा: मलिक मुहम्मद जायसी के ग्रंथ पद्मावत में इस आक्रमण का काव्यात्मक विवरण दिया गया है। इस विवरण के अनुसार रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपने सौन्दर्य के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। अलाउद्दीन ने पद्मिनी का अपहरण करने और मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया।

चितौड़ का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था तथा अजेय समझा जाता था। अलाउद्दीन ने रत्नसिंह के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह दर्पण में रानी पद्मिनी की छवि दिखा दे तो अलाउद्दीन दिल्ली लौट जायेगा। रत्नसिंह अपने सैनिकों के रक्तपात को रोकने के लिये अलाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की छवि शीशे में दिखाने के लिये तैयार हो गया।

जब सुल्तान पद्मिनी को देखकर लौटने लगा तब राजा रत्नसिंह उसे पहुँचाने के लिये दुर्ग से बाहर आया। पहले से ही तैयार अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने राजा को कैद कर लिया। अब सुल्तान ने पद्मिनी के पास यह सूचना भेजी कि जब तक वह उसके निवास में नहीं आ जायेगी तब तक वह रत्नसिंह को मुक्त नहीं करेगा।

राजपूतों के लिये यह बड़े अपमान की बात थी परन्तु पद्मिनी ने बुद्धि से काम लिया और सुल्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह सात सौ डोलियों में वीर राजपूत सैनिकों को बैठाकर दिल्ली की ओर चल पड़ी। अवसर पाकर राजपूत सैनिकों ने रावल रत्नसिंह को मुक्त करा लिया। इस अवसर पर हुए युद्ध में गोरा मारा गया।

राजपूत सैनिक अपने राजा तथा रानी को लेकर चित्तौड़ आ गये। इसके बाद अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण हुआ। जब राजपूतों को अपनी पराजय निश्चित लगने लगी तो राजपूत स्त्रियों ने जौहर का आयोजन किया।

पद्मिनी, राजपूत स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर भस्म हो गई और राजपूत, शत्रु से लड़कर वीर गति को प्राप्त हुए। चितौड़ के दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा के. एस. लाल आदि कई इतिहासकार पद्मावत के विवरण को सही नहीं मानते। वे पद्मिनी की कथा को काल्पनिक मानते हैं। तत्कालीन इतिहासकारों इसामी, अमीर खुसरो, इब्नबतूता आदि ने इन घटनाओं का उल्लेख नहीं किया है जबकि परवर्ती फारसी इतिहासकारों अबुल फजल, हाजीउद्वीर तथा फरिश्ता ने इसे सत्य माना है।

(4.) मालवा पर विजय

चितौड़ पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त अलाउद्दीन ने 1305 ई. में ऐनुल्मुल्क मुल्तानी को मालवा अभियान का दायित्व सौंपा। इन दिनों मालवा में मलहकदेव शासन कर रहा था। राजपूतों ने बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया परन्तु अन्त में मलहकदेव परास्त हुआ तथा युद्ध क्षेत्र में मारा गया। मालवा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

(5.) उत्तरी भारत की अन्य विजयें

सुल्तान ने 1305 ई. में मालवा पर विजय प्राप्त की। इसके थोड़े ही दिन बाद उसने मांडू, उज्जैन, धारानगरी तथा चन्देरी आदि नगरों को जीत लिया। इस प्रकार 1305 ई. तक उत्तर भारत के अधिकांश राज्य अलाउद्दीन के अधीन हो चुके थे। केवल मारवाड़ अब तक अछूता था। 1306 ई. में अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत का विजय अभियान आरम्भ किया।

(6.) सिवाना पर विजय

अभी तक मारवाड़ प्रदेश के किसी भी शासक ने तुर्कों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। 1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सिवाना पर अभियान किया। सिवाना पर उन दिनों सातलदेव का शासन था जो जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव का भतीजा था तथा उसी की ओर से सिवाना दुर्ग पर नियुक्त था। अलाउद्दीन की सेना ने दो साल तक सिवाना दुर्ग पर घेरा डाले रखा। 1310 ई. में अलाउद्दीन स्वयं सिवाना आया। उसके द्वारा किये गये निर्णायक हमले में सातलदेव सम्मुख युद्ध में मारा गया। उसका राज्य दिल्ली के अमीरों में बाँट दिया गया।

(7.) जालौर पर विजय

जालौर पर चौहान शासक कान्हड़देव शासन कर रहा था। उसने अलाउद्दीन खिलजी की सेना को सोमनाथ आक्रमण के समय अपने राज्य से होकर गुजरने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिये अलाउद्दीन खिलजी ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में जालोर के विरुद्ध सेना भेजी। 1314 ई. में कान्हड़देव परास्त हो गया और जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। कुछ इतिहासकार 1311 ई. में अलाउद्दीन का जालोर पर अधिकार होना मानते हैं।

उत्तर भारत पर विजय के परिणाम

उत्तर भारत पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर अभियान आरम्भ किया परन्तु उत्तरी भारत की विजय स्थायी सिद्ध न हुई। उसके जीवन के अन्तिम भाग में राजपूताना में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और अनेक स्थानों में राजपूतों ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त कर लिया परन्तु राजपूत पूर्ववत् असंगठित ही बने रहे। वे तुर्की सल्तनत को उन्मूलित न कर सके।

दक्षिण की विजय (1306-1313 ई.)

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एक-छत्र प्रभुत्व स्थापित करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उत्तर भारत पर विजय के बाद, दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था। दक्षिण की विपुल सम्पत्ति भी अलाउद्दीन को आकृष्ट करती थी।

उत्तर भारत के अभियानों के कारण सेना तथा शासन का व्यय बहुत बढ़ गया था। उत्तर भारत को जीतने में हुए इस व्यय के मुकाबले उसे धन की प्राप्ति बहुत कम हुई थी। इसकी पूर्ति दक्षिण के धन से हो सकती थी। अलाउद्दीन यह भी चाहता था कि उसकी सेना किसी न किसी अभियान में संलग्न रहे ताकि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सके।

इन सब कारणों से उसने दक्षिण भारत के विरुद्ध अभियान आरम्भ किया। दक्षिण की भौगोलिक असुविधाओं तथा उत्तरी भारत से दूरी के कारण अब तक कोई अन्य सुल्तान दक्षिण भारत पर अभियान करने का साहस नहीं कर सका था। 1305 ई. तक मारवाड़ को छोड़कर लगभग शेष उत्तरी भारत के राज्यों को जीत लिया गया था।

इसलिये 1306 ई. में दक्षिण विजय का अभियान आरम्भ किया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण विजय का कार्य अपने गुलाम मलिक काफूर को सौंपा जिसे नसरत खाँ खम्भात से लाया था। अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को दक्षिण अभियान के लियेएक विशाल सेना प्रदान की।

इस समय दक्षिण भारत में चार प्रमुख हिन्दू राज्य थे- (1.) देवगिरी राज्य जिस पर यादवों का शासन था, इसकी राजधानी देवगिरि (दौलताबाद) थी। (2.) तेलंगाना राज्य जहाँ काकतीय वंश का शासन था, इसकी राजधानी वारंगल थी। (3.) होयसल राज्य जहाँ होयसल वंश का शासन था, इसकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। (4.) मदुरा का राज्य जहाँ पांड्य वंश का शासन था, इसकी राजधानी मदुरा थी।

(1.) वारंगल पर पहला आक्रमण (1302 ई.)

वारंगल, तेलंगाना की राजधानी थी जहाँ काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन करता था। मुसलमान इतिहासकारों ने उसे लदर देव के नाम से पुकारा है। अलाउद्दीन वारंगल को अपने राज्य में सम्मिलित नहीं करना चाहता था। उसका लक्ष्य केवल धन प्राप्त करना था।

वारंगल पर पहला आक्रमण अलाउद्दीन के आदेश से 1302 ई. में नुसरत खाँ के भतीजे छज्जू तथा फखरुद्दीन जूना (जो बाद में मुहम्मद तुगलक कहलाया) के नेतृत्व में किया गया। इस युद्ध में राजा प्रताप रुद्रदेव ने शाही सेना को परास्त कर दिया। मुस्लिम इतिहासकारों ने इस युद्ध का उल्लेख तक नहीं किया है।

(2.) देवगिरी पर पहला आक्रमण (1306 ई.)

कड़ा का गवर्नर रहते हुए अलाउद्दीन देवगिरि को जीतकर लूट चुका था। सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को फिर से देवगिरि के विरुद्ध अभियान पर भेजा। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि देवगिरि के राजा रामचन्द्र ने पूर्व में दिये गये अपने वचन के अनुसार दिल्ली को कर नहीं भेजा था और दूसरा यह कि रामचन्द्र ने गुजरात के राजा राय कर्ण तथा उसकी पुत्री देवलदेवी को अपने यहाँ शरण दी थी।

अलाउद्दीन खिलजी देवलदेवी को प्राप्त करना और देवगिरि पर फिर से अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। मलिक काफूर तथा अल्प खाँ की संयुक्त सेनाओं ने देवगिरि पर आक्रमण कर दिया। राय कर्ण दो महीने तक बड़ी वीरता के साथ मुसलमानों का सामना करता रहा परन्तु मुसलमानों की विशाल सेना के समक्ष उसके पैर उखड़ गये। देवलदेवी की रक्षा नहीं हो सकी।

वह अल्प खाँ के हाथ पड़ी और दिल्ली के रनिवास में भेज दी गई। कुछ दिन बाद शहजादे खिज्र खाँ से उसका विवाह कर दिया गया। मलिक काफूर ने सम्पूर्ण देश को उजाड़ दिया। विवश होकर राजा रामचन्द्र को सन्धि करनी पड़ी। काफूर ने रामचन्द्र को दिल्ली भेज दिया। सुल्तान ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उसे राय रय्यन की उपाधि दी। इस उदार व्यवहार के कारण रामचन्द्र ने फिर कभी अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।

(3.) वारंगल पर दूसरा आक्रमण (1310 ई.)

इसके बाद 1310 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को वारंगल पर आक्रमण करने भेजा। अलाउद्दीन ने काफूर को आदेश दिया कि यदि प्रताप रुद्रदेव सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले और अपना कोष, घोड़े तथा हाथी देने को कहे तो उससे सन्धि कर ली जाये और उसका राज्य न छीना जाये।

काफूर ने एक विशाल सेना के साथ दक्षिण के लिए प्रस्थान किया। सबसे पहले वह देवगिरि गया। राजा रामचन्द्र ने उसकी बड़ी सहायता की। देवगिरि से काफूर ने वारगंल के लिये प्रस्थान किया और वारगंल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह घेरा कई महीने तक चलता रहा। इस दौरान बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मारा गया तथा उनकी सम्पत्ति का विनाश किया गया।

जब प्रताप रुद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि तुर्क केवल धन प्राप्त करने के लिए ऐसा विध्वंस मचा रहे हैं तब वह उन्हें धन देकर शांति स्थापित करने के लिये तैयार हो गया। बरनी के कथनानुसार प्रताप रुद्रदेव ने तुर्कों को 100 हाथी, 700 घोड़े, बहुत सा सोना-चाँदी तथा अनेक अमूल्य रत्न दिये। सम्भवतः कोहीनूर हीरा भी काफूर को यहीं से मिला था। प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। काफूर 1310 ई. में देवगिरि तथा धारा होते हुए दिल्ली लौट गया।

(4.) द्वारसमुद्र पर आक्रमण (1311 ई.)

वारंगल विजय के बाद अलाउद्दीन ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों द्वारसमुद्र में होयसल राजा वीर वल्लभ (तृतीय) शासन कर रहा था उसे बल्लाल (तृतीय) भी कहते हैं। वह योग्य तथा प्रतापी शासक था। दुर्भाग्य से इन दिनों होयसल तथा यादव राजाओं में घातक प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी और दोनों एक दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयत्न कर रहे थे।

अलाउद्दीन ने इस स्थिति से लाभ उठाने के लिये 1311 ई. में मलिक काफूर को द्वारसमुद्र पर आक्रमण करने भेजा। बल्लाल, मलिक काफूर की विशाल सेना के समक्ष नहीं टिक सका तथा विवश होकर मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली। काफूर ने द्वारसमुद्र के मन्दिरों की अपार सम्पत्ति को जी भर कर लूटा। इस अपार सम्पत्ति के साथ मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

(5.) मदुरा पर आक्रमण (1311 ई.)

द्वारसमुद्र विजय के उपरान्त अलाउद्दीन ने मदुरा पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों मदुरा में पांड्य-वंश शासन कर रहा था। दुर्भाग्यवश इन दिनों सुन्दर पांड्य तथा वीर पांड्य भाइयों में घोर संघर्ष चल रहा था। वीर पांड्य ने सुन्दर पांड्य को मार भगाया और स्वयं मदुरा का शासक बन गया।

निराश होकर सुन्दर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान से सहायता मांगी। सुल्तान ऐसे अवसर की खोज में था। 1311 ई. में मलिक काफूर मदुरा पहुँच गया। काफूर ने आने की सूचना पाकर वीर पांड्य राजधानी छोड़कर भाग गया। काफूर ने मदुरा के मन्दिरों को खूब लूटा और मूर्तियों को तोड़ा। 1311 ई. में वह अपार सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया।

(6.) देवगिरि पर दूसरा आक्रमण (1312 ई.)

रामचन्द्र की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र शंकर देव देवगिरि का राजा हुआ। उसने दिल्ली के सुल्तान को कर देना बन्द कर दिया। शंकरदेव ने होयसल राजा के विरुद्ध भी मुसलमानों की सहायता करने से इन्कार कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने मलिक काफूर की अध्यक्षता में एक सेना शंकरदेव के विरुद्ध भेजी। युद्ध में शंकरदेव पराजित हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। 1315 ई. में हरपाल देव को देवगिरि का शासन सौंपकर मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

दक्षिण में अलाउद्दीन की सफलता के कारण

अलाउद्दीन की सेना मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्षिण भारत में विजय पताका फहराने में पूर्ण रूप से सफल रही। इस सफलता के कई कारण थे-

(1) दक्षिण के राज्यों का पारस्परिक संघर्ष

जिस समय मलिक काफूर ने दक्षिण अभियान आरम्भ किया, उस समय दक्षिण के राज्यों में परस्पर वैमनस्य अपने चरम पर था और वे एक दूसरे से संघर्ष करके शक्ति नष्ट कर रहे थे। वे संगठित होकर शत्रु का सामना करने के स्थान पर, अपने पड़ोसियों के विरुद्ध शत्रु की ही सहायता करने लगते थे।

(2) अलाउद्दीन की सेना की योग्यता

अलाउद्दीन के सैनिक सुधारों के कारण उसकी सेना में उत्साह था। सेना के पास पर्याप्त संसाधन थे तथा उसे अच्छा वेतन दिया जा रहा था।

(3) अलाउद्दीन के साम्राज्य विस्तृत नहीं करने की नीति

अलाउद्दीन विन्ध्य-पर्वत के दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार नहीं चाहता था। उसकी सेना धन लूटने तथा हिन्दुओं के धार्मिक स्थल नष्ट करने के उद्देश्य से दक्षिण अभियान कर रही थी।

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति

अलाउद्दीन ने उत्तरी भारत में जिस नीति का अनुसरण किया था, दक्षिण भारत में उससे भिन्न नीति का अनुसरण किया। उसकी दक्षिण नीति की प्रमुख बातें इस प्रकार थीं-

(1.) दक्षिण की सम्पत्ति लूटने की नीति

दक्षिण भारत में अलाउद्दीन का एक मात्र लक्ष्य दक्षिण की विपुल सम्पत्ति को लूटना था। ताकि वह अपनी विशाल सेना का व्यय चला सके और अपने शासन को सुव्यवस्थित रख सके।

(2.) आधिपत्य स्वीकार कराने की नीति

अलाउद्दीन यह जानता था कि सुदूर दक्षिण पर दिल्ली से शासन करना असंभव था। अतः उसने देवगिरि, तेलंगाना, द्वारसमुद्र तथा मदुरा पर विजय तो प्राप्त की परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया। जब पराजित राज्यों के शासक उसका आधिपत्य स्वीकार करने को तैयार हो जाते थे तो वह उनके राज्य लौटा देता था और पराजित राजा को अथवा पराजित राजा के वंश के अन्य व्यक्ति को राज्य दे देता था।

(3.) विजित राजाओं से उदारता की नीति

यद्यपि अलाउद्दीन स्वभाव से क्रूर तथा निर्दयी था और अपने शत्रुओं तथा विरोधियों के साथ बुरा व्यवहार करता था परन्तु दक्षिण के राजाओं के साथ उसने उदारता का व्यवहार किया। इसी कारण देवगिरि के राजा रामचन्द्र तथा होयलस के राजा बल्लाल (तृतीय) ने दक्षिण विजय में अलाउद्दीन की बड़ी सहायता की।

(4.) सेनापतियों के माध्यम से विजय की नीति

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से अनुपस्थित रहने के दुष्परिणामों से परिचित था। उसे अमीरों के विद्रोहों तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये उसने राजधानी को कभी असुरक्षित नहीं छोड़ा तथा दक्षिण-विजय का कार्य अपने सेनापतियों को दिया।

(5.) सेनापतियों पर नियंत्रण रखने की नीति

यद्यपि सुल्तान अलाउद्दीन, मलिक काफूर पर विश्वास करता था और उसी को प्रत्येक बार प्रधान सेनापति बना कर भेजा करता था परन्तु वह उस पर अपना पूरा नियन्त्रण रखने का प्रयास करता था। वह उसके साथ अल्प खाँ आदि अन्य सरदारों को भी भेजता था जिससे काफूर को विश्वासघात करने का अवसर न मिल सके। सुल्तान जब काफूर को दक्षिण भारत के अभियान पर भेजता था, तब वह उसे विस्तृत आदेश देता था। काफूर के लिये उन आदेशों की पालना करना अनिवार्य था।

अलाउद्दीन की दक्षिण नीति की समीक्षा

कुछ इतिहासकार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति को असफल मानते हैं। उनके अनुसार वह दक्षिण भारत को अपने अधीन बनाये रखने में विफल रहा। देवगिरि तथा होयसल राज्यों ने तो पराजय स्वीकार करके अलाउद्दीन से सहयोग किया किंतु तेलंगाना ने कभी सहयोग तो कभी विरोध किया। पाण्ड्य राज्य ने तो अधीनता ही स्वीकार नहीं की।

रामचंद्र देव के कारण शंकर देव का भी व्यवहार बदल गया और मलिक काफूर को पुनः दक्षिण राज्यों के विरुद्ध अभियान पर भेजना पड़ा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति सफल रही क्योंकि वह दक्षिण भारत को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं रखना चाहता था, वह उन राज्यों से धन लूटने तथा उन्हें करद राज्य बनाकर उनसे कर वसूलना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा।

अलाउद्दीन के साम्राज्य की सीमाएं

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करना था। उसे इस उदे्श्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। अपने सेनापतियों की सहायता से उसने उत्तरी तथा दक्षिणी भारत पर विजय प्राप्त करके लगभग सम्पूर्ण देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसका साम्राज्य उत्तर में मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली से लेकर दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा मदुरा तक, पूर्व में लखनौती तथा सौनार गाँव से लेकर पश्चिम में थट्टा तथा गुजरात तक विस्तृत हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अल्लाउदीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

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अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ दिल्ली सल्तनत के इतिहास में विशेष महत्व रखती हैं। उसने अपने राज्य पर कड़ाई से नियंत्रण स्थापित करने के लिए ये सुधार किए।

अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान के विरुद्ध होने वाले विद्रोहों के कारण का अनुमान लगा लेने के उपरान्त उन कारणों को दूर करने का निश्चय किया।

अमीरों के आचरण में सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सल्तनत में विद्रोहों को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये-

(1.) गुप्तचर-विभाग का संगठन

विद्रोहियों का पता लगाने के लिए सुल्तान ने गुप्तचर-विभाग फिर से संगठित किया। गुप्तचरों को अमीरों तथा राज्याधिकारियों के घरों, कार्यालयों, नगरों तथा गाँवों में नियुक्त किया गया। इससे अमीरों के बारे में छोटी से छोटी सूचना सुल्तान तक पहुँचने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि अमीरों, राज्याधिकारियों तथा साधारण लोगों की गुप्त बातें समाप्त हो गईं।

(2.) अमीरों की सम्पत्ति का हरण

अलाउद्दीन खिलजी ने उन धनी अमीरों की सम्पत्ति को छीनना आरम्भ किया जो भूमि, लोगों को इनाम अथवा दान के रूप में प्राप्त थी, बहुत से लोगों की पेन्शन छीन ली गई। जिन्हें कर मुक्त भूमि मिली थी, उनकी भूमि पर फिर से कर लगा दिया गया। इससे सुल्तान को पर्याप्त धन प्राप्त हो गया और अमीरों की समृद्धि पर अंकुश लग गया।

(3.) मद्यपान-निषेध

अलाउद्दीन ने स्वयं मद्यपान त्याग दिया और अन्य लोगों को भी शराब पीने से रोक दिया। अलाउद्दीन ने शराब पीने के अपने बहुमूल्य बर्तन तुड़वा दिये और आज्ञा दी कि दिल्ली में जितनी शराब है वह सड़कों पर फैंक दी जाये। सुल्तान की आज्ञा का पालन किया गया और दिल्ली की सड़क शराब से भर गयी। सुल्तान ने यह भी आज्ञा दे दी कि यदि कोई व्यक्ति मद्यपान किये हुए मिले तो उसे दिल्ली के बाहर एक गड्ढे में फिंकवा दिया जाय। सुल्तान की आज्ञा का उल्लंघन करने वालों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था की गई।

(4.) अमीरों की सामाजिक गोष्ठियों तथा पारस्परिक विवाहों का निषेध

अलाउद्दीन खिलजी ने अमीरों की दावतें बन्द करवा दीं और उन्हें एक दूसरे के यहाँ आने जाने तथा गोष्ठी करने से मना कर दिया। बिना सुल्तान की आज्ञा के अमीर लोग परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध भी नहीं स्थापित कर सकते थे। इससे अमीरों का संगठन धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।

(5.) प्रान्तों पर कड़ा नियन्त्रण

अलाउद्दीन खिलजी ने प्रांतीय सेना पर अपना सीधा नियन्त्रण रख प्रांतपतियों की शक्ति को कम करने का प्रयत्न किया। उसने प्रान्तों में रहने वाली सेना की नियुक्त तथा सैनिकों का नियन्त्रण, स्थानान्तरण, पद वृद्धि आदि सारे कार्य अपने हाथ में ले लिये। सैनिकों को भूमि देने के स्थान पर नकद वेतन देना आरम्भ किया। उसने इस बात पर जोर दिया कि प्रान्तपति निर्धारित संख्या में सैनिक रखें तथा उन्हें पूरा वेतन दें।

(6.) जलाली अमीरों का दमन

अलाउद्दीन ने उन समस्त जलाली अमीरों को नष्ट कर दिया जिन्होंने धन अथवा पद के प्रलोभन से विरोधियों का साथ दिया था। उनकी सम्पत्ति छीन ली गई और बहुतों की आँखें निकलवा कर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। दूसरे अमीरों को उन्मूलित करने में भी सुल्तान ने संकोच नहीं किया। उसने कई अनेक उच्च पदाधिकारियों तथा उनके सम्बन्धियों को विष दिलवा कर मार डाला।

(7.) हिन्दुओं का कठोरता से दमन

अलाउद्दीन खिलजी ने हिन्दुओं को पूरी तरह निर्धन बनाने का प्रयत्न किया जिससे वे विद्रोह की कल्पना तक नहीं कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुल्तान ने कई कदम उठाये। दोआब बड़ा ही उपजाऊ प्रदेश था और वहाँ के हिन्दू प्रायः विद्रोह खड़ा कर देते थे।

अतः सुल्तान ने दो आब के क्षेत्र में उपज का 50 प्रतिशत मालगुजारी के रूप में वसूल करने की आज्ञा दी। जजिया, चुंगी तथा अन्य कर पूर्ववत् हिन्दुओं को देने पड़ते थे। चौधरी और मुकद्दम लोगों को घोड़ों पर चढ़ने, हथियार रखने, अच्छे वस्त्र पहनने, पान खाने से मनाही कर दी गई। इस प्रकार हिन्दुओं की समस्त सुविधाएँ छीन ली गईं और उनके साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार किया गया।

न्याय व्यवस्था में सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा के लिये न्याय की समुचित व्यवस्था की। हिन्दुओं के झगड़ों का न्याय भी मुस्लिम काजियों द्वारा किया जाता था किंतु हिन्दुओं के झगड़ों का निबटारा अलग प्रकर से किया जाता था। मुसलमान प्रजा की बजाय हिन्दुओं पर अधिक कड़े दण्ड लगाये जाते थे तथा अधिक कड़ी शारीरिक यातानाएं दी जाती थीं।

(1.) लोक आधारित न्याय व्यवस्था

अलाउद्दीन से पहले, दिल्ली सल्तनत की न्याय व्यवस्था, मुस्लिम धर्म ग्रन्थों पर आधारित थी परन्तु अलाउद्दीन ने उसे लौकिक स्वरूप प्रदान किया। उसने इस्लाम की उपेक्षा नहीं की परन्तु उसने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि परिस्थिति तथा लोक कल्याण के विचार से जो नियम उपयुक्त हों, वही राजनियम होने चाहिए।

(2.) उपयुक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति

सुल्तान ने न्याय करने वाले काजियों की संख्या में वृद्धि कर दी ताकि लोगों को न्याय के लिये अपने झगड़ों का निबटारा करवाने के लिये अधिक दिनों तक नहीं भटकना पड़े तथा अपराधियों को जल्दी से जल्दी सजा दी जा सके।

(3.) न्यायाधीशों की सहायतार्थ पुलिस तथा गुप्तचरों का प्रबन्ध

सुल्तान ने न्यायाधीशों की सहायता के लिए पुलिस की भी समुचित व्यवस्था की। प्रत्येक नगर में एक कोतवाल रहता था जो पुलिस का प्रधान होता था। उसका प्रधान कर्त्तव्य अपराधों का अन्वेषण करना होता था। न्यायाधीश की सहायता के लिए पुलिस के साथ-साथ गुप्तचरों का भी प्रबन्ध किया गया जो अपराधों एवं अपराधियों के अन्वेषण में सहायता करते थे।

(4.) कठोर दण्ड का विधान

अलाउद्दीन का दण्ड-विधान अत्यन्त कठोर था। अपराधी तथा उसके साथियों और सम्बन्धियों को बिना किसी प्रमाण के केवल सन्देह के कारण मृत्यु-दण्ड तक दे दिया जाता था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान से जनता में शासन के प्रति भय बैठ गया। लोग अपराध करने तथा विवाद में पड़ने से डरने लगे।

सेना में सुधार

अलाउद्दीन ने बाह्य आक्रमणों से साम्राज्य की रक्षा करने, साम्राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने तथा साम्राज्य का विस्तार करने के लिये मजबूत सेना का गठन किया तथा उसमें कई सुधार किये-

(1.) सैनिकों की भर्ती करने में सुधार

सुल्तान ने सेना को पूर्ण रूप से अपने नियंत्रण में रखने के लिए सेना के सम्बन्ध में निर्णय लेने का काम अपने तक सीमित कर लिया। उसने सैनिकों को भर्ती करने की व्यवस्था में परिवर्तन किया। सेना का संगठन करने के लिए उसने ‘आरिज-ए-मुमालिक’ की नियुक्ति की। सेना में वही लोग भर्ती किये जाते थे जो घोड़े पर चढ़ना, अस्त्र-शस्त्र चलाना तथा युद्ध करना जानते थे।

(2.) सैनिकों का प्रशिक्षण

उस काल में सेना के प्रशिक्षण एवं परेड आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। सैनिकों का प्रशिक्षण रण क्षेत्र में ही होता था तथा सेना को सक्रिय बनाने रखने के लिए उसे हर समय किसी न किसी युद्ध में नियोजित रखना पड़ता था। शांति काल में सेना को आखेट में व्यस्त रखा जाता था।

(3.) सैनिकों का वर्गीकरण तथा नकद वेतन की व्यवस्था

सुल्तान ने घुड़सवार सैनिकों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया और प्रत्येक श्रेणी के सैनिकों का वेतन निश्चित कर दिया। पहली श्रेणी का सैनिक दो से अधिक घोड़े रखता था, दूसरी श्रेणी का सैनिक केवल दो घोड़े और तीसरी श्रेणी का सैनिक केवल एक घोड़ा रखता था। प्रथम श्रेणी के सैनिक को 234 टंक, द्वितीय श्रेणी के सैनिक को 152 टंक और तृतीय श्रेणी के सैनिकों को 78 टंक वार्षिक वेतन मिलता था। सैनिकों को जागीर देने की प्रथा हटा दी गई और उन्हें नकद वेतन दिया जाने लगा।

(4.) उत्तम अश्वों की व्यवस्था

अलाउद्दीन खिलजी की सेना में घुड़सवार सैनिकों की प्रधानता थी। अतः सुल्तान ने अश्व-विभाग के सुधार पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उसने बाहर से अच्छी नस्ल के घोड़ों को मंगाने की व्यवस्था की। प्रायः मंगोलों के परास्त होने पर सुल्तान को लूट में अच्छे घोड़े प्राप्त हो जाते थे। दक्षिण भारत के राजाओं को परास्त करके सुल्तान ने कुछ अच्छे घोड़े प्राप्त किये थे। राज्य ने अच्छी नस्ल के घोड़े उत्पन्न करने की भी व्यवस्था की।

(5.) हुलिया की व्यवस्था

प्रायः लोग सैन्य-प्रदर्शन के समय अथवा रणक्षेत्र में घोड़े तथा सवार लाकर दिखा देते थे जबकि वे घोड़े तथा सवार वास्तव में युद्ध में भाग नहीं लेते थे। इस बेईमानी को रोकने के लिए सुल्तान ने सैनिकों की हुलिया लिखवाने की प्रथा चलाई। फलतः प्रत्येक सैनिक को एक रजिस्टर में अपनी हुलिया लिखवाना पड़ता था।

(6.) घोड़ों को दागने की व्यवस्था

सैनिक सदैव अच्छे घोड़े नहीं रखते थे। सुल्तान ने इसके लिए घोड़ों को दागने की प्रथा चलाई जिससे सैनिक झूठे घोड़े दिखला कर सुल्तान को धोखा न दें।

(7.) अच्छे शस्त्रों तथा सेनापतियों की व्यवस्था

सुल्तान द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था में सैनिकों को अच्छे से अच्छे घोड़ों तथा उत्तम हथियारों से सज्जित होकर राज्य की सेवा के लिये सदैव तैयार रहना पड़ता था। सुल्तान ने अपनी सेना के संचालन के लिये योग्य सेनापतियों को नियुक्त किया।

(8.) स्थायी सेना की व्यवस्था

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की। यह सेना राज्य की सेवा के लिये सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी। इस स्थायी सेना में चार लाख पचहत्तर हजार सैनिक होते थे।

(9.) दुर्गों की व्यवस्था

सुल्तान ने उन समस्त किलों की मरम्मत कराई जो मंगोलों के मार्गों में पड़ते थे। उसने बहुत से नये दुर्ग भी बनवाये। इन किलों में उसने योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों की अध्यक्षता में सुसज्जित सेनायें रखीं।

आर्थिक सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिये कई आर्थिक सुधार किये-

(1.) व्यक्तिगत सम्पत्ति का अपहरण

अलाउद्दीन खिलजी अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को आन्तरिक उपद्रवों का कारण समझता था। इसलिये उसने अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को उन्मूलित करके उस सम्पत्ति को राजकीय कोष में जमा कर लिया। इस कार्य के लिये उसने साधारण जनता से लेकर अमीरों तक पर अत्याचार किये तथा उनकी हत्याएं करवाईं।

(2.) दान की भूमि का अपहरण

मुसलमानों को मिल्क, इनाम, इशरत (पेंशन) तथा वक्फ (दान) के रूप में जो भूमि प्राप्त थी, उसका सुल्तान ने अपहरण कर लिया। इस प्रकार की कुछ भूमि फिर भी बची रह गई थी परन्तु अधिकांश भूमि छीन ली गई थी।

(3.) जागीरों का अपहरण

सुल्तान ने सैनिकों को जागीर देने की प्रथा बन्द करके नकद वेतन देने की व्यवस्था की। इससे राज्य की आय में वृद्धि हो गई।

(4.) सम्पूर्ण भूमि का खालसा भूमि में परिवर्तन

खालसा भूमि उस भूमि को कहते थे जो सीधे केन्द्र सरकार के अधिकार में होती थी। चूंकि अलाउद्दीन ने जागीरदारी की प्रथा हटा दी, इसलिये अब समस्त भूमि सीधे सरकार के नियन्त्रण में आ गई और खालसा भूमि बन गई।

(5.) भूमि की नाप तथा कर का निर्माण

सुल्तान ने सम्पूर्ण भूमि की नाप करवा कर सरकारी लगान निश्चित कर दिया। जितनी उपजाऊ भूमि होती थी, उसी के हिसाब से लगान देना पड़ता था। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करवाकर लगान वसूल करना आरम्भ किया। इसके लिये एक बिस्वा को एक इकाई माना गया। वह लगान को गलले में लेना पसंद करता था। लगान का निर्धारण तीन प्रकार से किया जाता था-

1. कनकूत- कनकूत से आशय यह था कि जब फसल खड़ी हो तभी लगान का अन्दाजा लगा लिया जाय।

2. बटाई- बटाई से यह तात्पर्य था कि अनाज तैयार हो जाने पर सरकार का हिस्सा निश्चित करके ले लिया जाय।

3. लंकबटाई- लंकबटाई से यह तात्पर्य था कि फसल तैयार हो जाने पर बिना पीटे ही सरकारी हिस्सा ले लिया जाय।

(6.) करों में वृद्धि

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि इतना अधिक कर केवल दोआब में लिया जाता था जहाँ की भूमि अधिक उपजाऊ थी और लोग अधिक विद्रोह करते थे।

(7.) हिन्दू राज्याधिकारियों के विशेषाधिकारों का समापन

यद्यपि सुल्तान ने लगान वसूली के लिए अपने सैनिक अफसर नियुक्त कर दिये थे तथापि पुरानी व्यवस्था को वह पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका था। लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों को नष्ट नहीं किया गया परन्तु उन पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गये और कभी भी राज्य के विरुद्ध सिर नहीं उठा सके।

(8.) दोआब में अनाज लेने की व्यवस्था

दोआब के किसानों से लगान के रूप में अनाज लिया जाता था। उस अनाज को जमा करने के लिए सरकारी बखार होते थे। इन बखारों में इतना अधिक अनाज जमा होता था कि अकाल के समय सेना  के लिये पर्याप्त होता था।

(9.) दीवान ए मुस्तखराज की स्थापना

अलाउद्दीन खिलजी ने बकाया कर वसूलने के लिये दीवान-ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की। उसने सम्पूर्ण साम्राज्य को कई भागों में विभक्त करके प्रत्येक भाग को एक सैन्य-अधिकारी के अनुशासन में रख दिया। यह सैन्य अधिकारी जनता से मालगुजारी वसूल करता था और जितनी सेना उसके सुपुर्द की जाती थी, उसका व्यय निकालने के उपरान्त शेष धन राजकोष में भेज देता था।

अलाउद्दीन द्वारा किये गये सुधारों के परिणाम

उपरोक्त सुधारों से राजकीय आय में भारी वृद्धि हो गई। जनता पर करों का बोझ बढ़ गया। करों का अधिकांश बोझ हिन्दुओं पर ही पड़ा जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि था और जिन्हें अन्य करों के अतिरिक्त जजिया भी देना पड़ता था।

अलाउद्दीन द्वारा बाजारों का प्रबन्धन

राज्य में घूसखोरी तथा अनैतिक तरीके से धन संग्रहण की प्रवृत्ति को रोकने के लिये अलाउद्दीन खिलजी ने बाजारों में मूल्य नियंत्रण के लिये कठोर उपाय किये।

(1.) वस्तुओं का सूचीकरण तथा उनका मूल्य निर्धारण

अलाउद्दीन ने उन वस्तुओं की सूचि तैयार करवाई जिनकी उसके सैनिकों को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती थी। यह सूचि ऐसी सावधानी से बनाई गई थी कि प्रतिदिन के प्रयोग की कोई वस्तु छूटी नहीं थी। इन सब वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिये गये। इन वस्तुओं को कोई भी दुकानदार निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य पर नहीं बेच सकता था। 

(2.) वस्तुओं की पूर्ति की व्यवस्था

सुल्तान ने बाजार में वस्तुओं की माँग तथा पूर्ति में संतुलन बनाने के लिये भी राज्य की ओर से व्यवस्था की। वस्तुओं की पूर्ति का उत्तरदायित्व राज्य ने अपने ऊपर ले लिया। जो वस्तुएँ राज्य स्वयं उत्पन्न कर सकता था, उनके उत्पन्न करने की व्यवस्था की गई; जो राज्य के सुदूर प्रान्तों से मँगवाई जाती थीं, वे वहाँ से मँगवाई जाने लगीं और जो वस्तुएँ देश में नहीं मिल सकती थीं, वे विदेशों से मँगवाई जाने लगीं।

(3.) वितरण की व्यवस्था

वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था के साथ-साथ उनके बाजारों में वितरण की भी समुचित व्यवस्था की गई। दिल्ली में तीन बाजारों की व्यवस्था की गई। एक बाजार सराय अदल कहलाती थी, दूसरी शहना-ए-मण्डी और तीसरे बाजार का नाम अब उपलब्ध नहीं है। तीनों बाजारों में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती थीं। प्रत्येक नियन्त्रित दूकान को उतनी ही मात्रा में वस्तुएँ दी जाती थीं जितनी उस दुकान के उपभोक्ताओं की मांग होती थी।

(4.) बाजार के कर्मचारी

अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार में कई श्रेणियों के अधिकारी नियुक्त किये और उन्हें आदेश दिये कि वे बाजारों पर कड़ा नियंत्रण रखें। इस व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी दीवाने रियासत कहलाता था। उसे तीनों बाजारों पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। दीवाने रियासत के नीचे प्रत्येक बाजार में तीन पदाधिकारी नियुक्त किये गये थे।

पहला पदाधिकारी शाहनाह (निरीक्षक), दूसरा बरीद-ए-मण्डी (लेखक) और तीसरा मुन्हीयान (गुप्तचर) कहलाता था। शाहनाह बाजार के सामान्य कार्यों को देखता था, बरीद घूम-घूम कर बाजार का नियन्त्रण करता था और मुन्हीयान गुप्त एजेन्ट अथवा कारदार होता था।

बरीद बाजार की पूरी सूचना शाहनाह के पास, शाहनाह इस सूचना को दीवाने रियासत के पास और दीवाने रियासत सुल्तान के पास भेज देता था। मुन्हीयान को सुल्तान स्वयम् नियुक्त करता था। वह बाजार की अपनी अलग रिपोर्ट तैयार करके सीधे ही सदर दफ्तर में भेजता था। यदि उसकी तथा अन्य पदाधिकारियों की रिपोर्ट में कुछ अन्तर पड़ता था तो गलत रिपोर्ट देने वाले को बड़ा कठोर दण्ड दिया जाता था।

(5.) कठोर दण्ड की व्यवस्था

सुल्तान उन लोगों को बड़े कठोर दण्ड देता था जो बईमानी करते थे और त्रुटियुक्त बाट रखते थे। कहा जाता है कि जो व्यापारी जितना कम तोलता था, उतना ही मांस उसके शरीर से काटने के निर्देश दिये गये थे परन्तु कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब इस नियम को कार्यान्वित किया गया हो।

(6.) कपड़े के क्रय-विक्रय की व्यवस्था

सुल्तान की ओर से कपड़ों का भी मूल्य निर्धारित किया परन्तु इस मूल्य पर कपड़ा बेचने में व्यापारियों को हानि होने की सम्भावना थी। इसलिये व्यापारियों में कपड़े की दूकानों का अनुज्ञापत्र लेने का साहस नहीं होता था। इसलिये सुल्तान ने कपड़े का व्यापार मुल्तानी व्यापारियों को सौंप दिया। इन व्यापारियों को कपड़ा खरीदने के लिए राजकोष से धन मिलता था और कपड़ा बिक जाने पर इन्हें निर्धारित कमीशन दिया जाता था।

(7.) पशुओं का मूल्य निर्धारण

सुल्तान ने पशुओं के क्रय-विक्रय पर भी राज्य का पूरा नियन्त्रण रखा और उनका मूल्य निर्धारित कर दिया। इस प्रकार प्रथम श्रेणी के घोड़ों का मूल्य 100 से 120 टंक, दूसरी श्रेणी के घोड़ों का 80 टंक और तीसरी श्रेणी के घोड़ों का 65 से 70 टंक निश्चित किया गया। टट्टुओं का मूल्य 10 से 25 टंक निश्चित किया गया। दूध देने वाली गाय का मूल्य तीन-चार टंक और बकरियों का मूल्य 10 से 14 जीतल निश्चित किया गया।

(8.) गुलामों तथा वेश्याओं का मूल्य निर्धारण

बाजार की अन्य वस्तुओं की तरह गुलामों तथा वेश्याओं का भी मूल्य निश्चित किया गया। गुलामों का मूल्य 5 से 12 टंक तथा वेश्या का मूल्य 20 से 40 टंक निश्चित किया गया। कुछ उत्तम गुलामों के दाम 100 से 200 टंक हुआ करते थे। बड़े सुन्दर गुलामों के लड़के 20 से 30 टंक में खरीदे जा सकते थे। गुलाम नौकरानियों का मूल्य 10 से 15 टंक हुआ करता था। घर में कामों के लिये गुलाम 7 से 8 टंक में खरीदे जा सकते थे।

(9.) दलालों का नाश

सुल्तान ने बाजार से दलालों को निकाल दिया तथा उनके नेताओं को कठोर दण्ड दिया।

बाजार प्रबंधन के परिणाम

बाजार के इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि आवश्यक वस्तुएं कम मूूल्य पर मिलने लगीं। सैनिकों के लिये यह संभव हो गया कि वे कम वेतन में भी सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें और अपने परिवार का ठीक से पालन कर सकें। दलालों को बाजार से हटा देने से समस्त चीजों के मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित मूल्य पर बने रहे तथा बाजार से काला बाजारी जैसे हरकतें समाप्त हो गईं।

डॉ. के. एस. लाल ने सिद्ध किया है कि बाजारों का यह नियंत्रण केवल राजधानी तथा उसके आसपास तक ही सीमित था। डॉ. लाल के अनुसार उसकी सफलता भावों को कम करनू में उतनी नहीं है जितनी कि एक लम्बे समय तक भावों को नियंत्रण में रखने में है। बरनी ने लिखा है कि सुल्तान की मृत्युपर्यंत वस्तुओं के भाव एक जैसे ही बने रहे।

सुधारों की सफलता

यह पहले बताया जा चुका है कि सुल्तान के तीन प्रधान लक्ष्य थे- पहला मंगोलों के आक्रमणों को रोकना, दूसरा अमीरों के षड्यन्त्रों तथा विद्रोहों को नष्ट कर आंतरिक शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित करना और तीसरा साम्राज्य का विस्तार करना। अलाउद्दीन ने जिन उद्देश्यों से सुधार आरम्भ किये थे उनमें उसे पूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

(1.) विशाल तथा सुसंगठित सेना की सहायता से उसने मंगोलों को भगाया और सम्पूर्ण भारत में अपनी राज-सत्ता स्थापित की।

(2.) अमीरों के षड्यन्त्रों तथा विद्रोहों के दबाने में भी उसे अपूर्व सफलता प्राप्त हुई। कड़े नियमों तथा कठोर दण्ड द्वारा अपने अपराधों में कमी कर दी। वस्तुओं का मूल्य गिर जाने से साधारण जनता का जीवन सुखी हो गया और लोग सुल्तान की निरंकुशता के समर्थक बन गये।

(3.) यद्यपि सुल्तान को अपनी आय का अधिकांश भाग युद्धों में ही व्यय करना पड़ता था परन्तु सार्वजनिक हित के भी बहुत से कार्य किये गये। उसने दिल्ली के पास एक सुन्दर महल बनवाया। इस्लामी विद्वानों तथा फकीरों को सुल्तान का आश्रय प्राप्त था।

(4.) सुधारों का सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि केन्द्रीय सरकार की शक्ति बहुत बढ़ गई और सुल्तान की सत्ता सर्व-व्यापी हो गई। सुदूरस्थ प्रान्तों के प्रान्तपति भी सुल्तान की आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करने लगे।

(5.) राज्य के समस्त पदाधिकारी बड़ी सतर्कता तथा ईमानदारी के साथ काम करते थे क्योंकि नियमानुसार कार्य न करने वालों को कठोर दण्ड दिये जाते थे।

सुधारों की विफलता

अलाउद्दीन खिलजी की राज्य व्यवस्था सैनिक शक्ति पर आधारित थी। उसके समस्त सुधार सुल्तान की सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिये किये गये थे। ऐसा शासन दीर्घकालीन नहीं हो सकता था। ज्यों-ज्यों सुल्तान की शारीरिक एवं मानसिक शक्ति क्षीण होने लगी, त्यों-त्यों उसकी नीतियों के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा।

बहुत से लोग सुल्तान की योजनाओं से असन्तुष्ट थे। अमीर अपनी जागीरें फिर से प्राप्त करने की ताक में थे। राजपूत जागीरदार एवं पुराने राजवंश अपने खोये हुए राज्यों एवं अधिकारों को फिर से प्राप्त करने के लिये प्रयासरत थे। व्यापारी वर्ग भी सुल्तान की नीतियों से असंतुष्ट था। वस्तुओं के भाव निश्चित कर देने से व्यापारी वर्ग लाभ से वंचित हो गया था। जो व्यापारी दिल्ली से बाहर जाते थे, उनके कुटुम्ब पर शासन द्वारा पूरा नियंत्रण रखा जाता था।

इससे उनके परिवारों की सुरक्षा पर हर समय खतरा बना रहता था। किसान और हिन्दू जनता, करों के बोझ से दब गई थी। गुप्तचर विभाग की मनमानी से भी लोगों में असंतोष बढ़ गया था। सुल्तान के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति को शासन के सम्बन्ध में निर्णय लेने और उसे लागू करने का अधिकार नहीं था। ऐसी व्यवस्था तब तक ही चल सकती थी जब तक कि सुल्तान में उसे चलाने की योग्यता रहे। इन सब कारणों से उसकी व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकी और अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ उसी के साथ समाप्त हो गईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अल्लाउदीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

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अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अलाउद्दीन ने कठोरता से शासन किया तथा अपने राज्य का लगातार विस्तार किया। इस कारण बहुत से लोग उससे नाराज हो गए तथा अल्लाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह लगातार होते रहे।

तुर्की अमीर तो विद्रोही प्रकृति के थे ही, गैर तुर्की अमीर भी कुछ कम नहीं थे। वे सब सुल्तान को अपने-अपने गुट के वश में करने के लिये षड़यंत्र एवं विद्रोह रचते रहते थे। अलाउद्दीन खिलजी की स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुशता की नीति से अमीरों में उसके विरुद्ध अत्यधिक असन्तोष रहता था। इस कारण अलाउद्दीन खिलजी को कई विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

(1.) नव-मुसलमानों का विद्रोह

जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में जो मंगोल इस्लाम स्वीकार करके दिल्ली के निकट मंगोलपुरी में बस गये थे, वे नव-मुस्लिम कहलाते थे। ये लोग अब भी अपने को विदेशी समझते थे और सल्तनत के विरुद्ध षड़यन्त्र रचते रहते थे। 1307 ई. में जब नसरत खाँ तथा उलूग खाँ गुजरात से लौट रहे थे, तब नव-मुस्लिम सैनिकों ने उसे मार्ग में लूटने के लिए विद्रोह कर दिया और सुल्तान के भतीजे तथा नसरत खाँ के भाई की हत्या कर दी।

इस विद्रोह को बड़ी नृशंसतापूर्वक दबाया गया। नव-मुस्लिमों की जागीरें छीन ली गई। और उन्हें नौकरियों से वंचित कर दिया गया। इससे नव-मुसलमानों का असन्तोष और बढ़ गया और उन्होंने सुल्तान की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा।

अलाउद्दीन खिलजी को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने अपनी सेना को आज्ञा दी कि वे नव-मुसलमानों को समूल नष्ट कर दें। बरनी का कहना है कि इस आज्ञा के पाते ही लगभग तीन हजार नव मुस्लिम तलवार के घाट उतार दिये गये और उनकी सम्पत्ति छीन ली गई।

(2.) अकत खाँ का विद्रोह

दूसरा विद्रोह अकत खाँ का था जो अलाउद्दीन खिलजी का भतीजा था। जब अलाउद्दीन रणथम्भौर जा रहा था तब वह तिलपत नामक स्थान पर कुछ दिनों के लिए रुक गया और आखेट में व्यस्त हो गया। इसी समय अकत खाँ ने अपने सैनिकों को सुल्तान पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। सुल्तान घायल हो गया परन्तु बच गया।

सुल्तान ने विद्रोहियों का पीछा किया और अकत खाँ तथा उसके साथियों को पकड़ कर उनका वध करवा दिया। अकत खाँ के भाइयों जिनका इस विद्रोह से कोई सम्बन्ध नहीं था, उनकी सम्पत्ति जब्त करके उन्हें बंदी बना लिया गया।

(3.) अमीर उमर तथा मंगू खाँ का विद्रोह

अमीर उमर तथा मंगू खाँ अलाउद्दीन खिलजी की बहिन के पुत्र थे। जिस समय अलाउद्दीन रणथम्भौर का घेरा डाले हुए था, उन्हीं दिनों इन लोगों ने बदायूँ तथा अवध में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। ये विद्रोह शीघ्र ही दबा दिए गये और अमीर उमर तथा मंगू खाँ को बंदी बनाकर उनकी आँखें निकलवा ली गईं।

(4.) हाजी मौला का विद्रोह

हाजी मौला अलाउद्दीन खिलजी का एक असन्तुष्ट अधिकारी था। वह काजी अलाउलमुल्क की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली का कोतवाल बनना चाहता था परन्तु सुल्तान ने तमर्दी को इस पद पर नियुक्त कर दिया। इससे हाजी मौला को बड़ी निराशा हुई और वह षड्यन्त्र रचने लगा। जब सुल्तान रणथम्भौर के घेरे के दौरान सकंटापन्न स्थिति में था, तब हाजी मौला ने दिल्ली के कोतवाल तमर्दी की हत्या करके राजकोष पर अधिकार कर लिया।

इस पर अलाउद्दीन ने उलूग खाँ को उसका दमन करने के लिये भेजा परन्तु उसके दिल्ली पहुँचने के पूर्व ही हमीदुद्दीन नामक राजभक्त अधिकारी ने हाजी मौला को परास्त करके उसका वध कर दिया। हाजी मौला के समस्त सम्बन्धियों तथा समर्थकों की भी निर्दयता पूर्वक हत्या की गई।

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह के कारण

यद्यपि अलाउद्दीन विद्रोहों का दमन करने में सफल रहा था परन्तु स्थायी शान्ति स्थापित करने के लिए इन विद्रोहों के वास्तविक कारणों का पता लगाना आवश्यक था जिससे ऐसी व्यवस्था की जाये कि भविष्य में विद्रोहों की सम्भावना नहीं रह जाये। अपने शुभचिन्तकों का परामर्श लेने के उपरान्त सुल्तान इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विद्रोह के पाँच कारण हैं-

(1.) गुप्तचर विभाग की अयोग्यता

अलाउद्दीन ने अनुभव किया कि उसका गुप्तचर विभाग ढंग से कार्य नहीं कर रहा है। इस कारण सुल्तान को समय रहते षड़यंत्रों तथा साम्राज्य के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं की जानकारी नहीं मिल पाती।

(2.) मद्यपान गोष्ठियाँ

अलाउद्दीन ने विद्रोह का दूसरा कारण अमीरों की मद्यपान गोष्ठियों को ठहराया। इन गोष्ठियों में सुल्तान तथा अन्य अमीरों के विरुद्ध षड्यन्त्र रचे जाते थे। अतः मद्यपान को रोकना आवश्यक समझा गया।

(3.) अमीरों की सामाजिक गोष्ठियाँ तथा वैवाहिक सम्बन्ध

अमीरों के परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं उनकी सामाजिक गोष्ठियाँ भी विद्रोहों का कारण समझी गईं। इनके माध्यमों से अमीरों को धड़ेबंदी करने एवं सुल्तान के विरुद्ध संगठित होने का अवसर मिलता था। इस कारण जब कभी किसी एक अमीर के विरुद्ध कार्यवाही की जाती थी तब उसके धड़े के अन्य अमीर भी विद्रोह पर उतर आते थे।

(4.) कुछ अमीरों के पास धन का बाहुल्य

सुल्तानों की कमजोरी एवं उनकी हत्याओं के सिलसिले का लाभ उठाकर कुछ अमीरों ने अत्यधिक धन एकत्रित कर लिया था। इस धन का उपयोग सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में होता था। धन कमाने की चिंता नहीं होने के कारण अमीरों को विद्रोहों के बारे में सोचने का अवकाश प्राप्त हो जाता था।

(5.) स्थानीय शासकों पर नियंत्रण का अभाव

प्रांतीय एवं स्थानीय शासकों पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होने से, उन्हें भी दिल्ली के अमीरों की भांति धन एकत्रित करने तथा उसकी सहायता से विद्रोह करने का अवसर प्राप्त हो जाता था।

(6.) सुल्तान तथा जनता में प्रत्यक्ष सम्पर्क का अभाव

अब तक की शासन पद्धति में सुल्तान का जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था। इसके कारण जनता सुल्तान की ओर से उदासीन बनी रहती थी और स्थानीय लोगों के भड़कावे में आकर सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती थी।

इस प्रकार अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह लगातार होते रहे तथा अल्लाउदीन उन विद्रोहों का लगातार दमन करने में सफल रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

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अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

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अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

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अल्लाउद्दीन खिलजी मंगोल नीति

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अलाउद्दीन खिलजी 1296 ई. में दिल्ली के तख्त पर बैठा था। उसके तख्त पर बैठने से पहले भी मंगोल कई बार भारत पर आक्रमण कर चुके थे। यहाँ तक कि जलालुद्दीन खिलजी मंगोलों को दिल्ली के बाहर मंगोलपुरी बसाकर रहने की अनुमति दे चुका था।

मंगोलों के आक्रमण

अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली तख्त पर बैठने के कुछ माह बाद मंगोलों का पहला आक्रमण हुआ तथा 1307 ई. तक वे अलाउद्दीन खिलजी के राज्य पर आक्रमण करते रहे। अलाउद्दीन खिलजी ने 1316 ई. तक शासन किया था। इस प्रकार उसके शासन के अंतिम नौ वर्ष का समय मंगोलों के आक्रमण से मुक्त रहा।

(1.) कादर का आक्रमण

मंगोलों का पहला आक्रमण 1296 ई. में कादर के नेतृत्व में हुआ। उस समय अलाउद्दीन को गद्दी पर बैठे कुछ महीने ही हुए थे। अलाउद्दीन ने अपने मित्र जफर खाँ को उनके विरुद्ध भेजा। जफरखाँ ने मंगेालों को जालंधर के निकट परास्त किया। तथा उनका भीषण संहार किया।

(2.) देवा तथा साल्दी का आक्रमण

मंगोलों ने 1297 ई. में देवा तथा साल्दी के नेतृत्व में अलाउद्दीन खिलजी के राज्य पर दूसरा आक्रमण किया। उनका ध्येय पंजाब, मुल्तान तथा सिन्ध को जीत कर अपने राज्य में मिलाना था। उन्होंने सीरी के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अलाउद्दीन ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ तथा जफर खाँ को मंगोलों का सामना करने के लिए भेजा। उन्होंने सीरी का दुर्ग मंगालों से पुनः छीन लिया तथा साल्दी को 2000 मंगोलों सहित बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया। इस विजय के बाद अलाउद्दीन तथा उसके भाई उलूग खाँ को जफर खाँ से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई क्योंकि मंगोलों पर लगातार दो विजयों से सेना में जफर खाँ की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी।

(3.) कुतलुग ख्वाजा का आक्रमण

मंगोलों का सबसे अधिक भयानक आक्रमण 1299 ई. में दाऊद के पुत्र कुतुलुग ख्वाजा के नेतृत्व में हुआ। उसने दो लाख मंगोलों के साथ बड़े वेग से आक्रमण किया। उसकी सेना तेजी से बढ़ती हुई दिल्ली के निकट पहुँच गई। उनका निश्चय दिल्ली पर अधिकार करने का था।

इस बीच मंगोलों के भय से हजारों लोग दिल्ली में आकर शरण ले चुके थे। इससे दिल्ली में अव्यवस्था फैल गई। मंगोलों द्वारा दिल्ली की घेराबंदी कर लिये जाने के बाद तो स्थिति और भी खराब हो गई। इस पर भी अलाउद्दीन ने साहस नहीं छोड़ा। जफर खाँ को मंगोलों से लड़ने का अनुभव था इसलिये उसे अग्रिम पंक्ति में रखकर शाही सेना ने मंगोलों का सामना किया।

जफर खाँ तथा उसकी सेना ने हजारों मंगोलों का वध किया तथा वे लोग मंगोलों को काटते हुए काफी आगे निकल गये। मंगोलों ने घात लगाकर जफर खाँ को मार डाला। उस समय अलाउद्दीन तथा उसका भाई उलूग खाँ पास में ही युद्ध कर रहे थे किंतु उन्होंने जफर खाँ को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।

रात होने पर मंगोल अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गये। इतिहासकार के. एस. लाल के अनुसार इस युद्ध से अलाउद्दीन को दोहरा लाभ हुआ। पहला लाभ मंगोलों पर विजय के उपलक्ष्य में और दूसरा लाभ जफर खाँ की मृत्यु के रूप में। बरनी लिखता है कि मंगोल सैनिकों पर जफर खाँ की वीरता का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि जब उनके घोड़े पानी नहीं पीते थे तो वे घोड़ों से कहते थे कि क्या तुमने जफर खाँ को देख लिया है जो तुम पानी नहीं पीते ?

(4.) तुर्गी का आक्रमण

1302 ई. में मंगोल सरदार तुर्गी ने एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के पास यमुना के तट पर आ डटा। इन दिनों अलाउद्दीन चितौड़ अभियान पूरा करके दिल्ली लौटा ही था। वह दिल्ली छोड़कर सीरी के दुर्ग में चला गया। इस कारण राजधानी असुरक्षित हो गई। मंगोलों ने दिल्ली की गलियों तक धावे मारे किंतु तीन महीने बाद वे वापस चले गये।

(5.) अलीबेग का आक्रमण

1305 ई. में 50 हजार मंगोलों ने अलीबेग की अध्यक्षता में दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया। मंगोलों की सेना अमरोहा तक पहुँच गई। गाजी तुगलक उन दिनों दिपालपुर में था। उसने मंगोलों से भीषण युद्ध किया और उन्हें बड़ी क्षति पहुँचाई। असंख्य मंगोलों का संहार हुआ और वे भारत की सीमा के बाहर खदेड़ दिये गये। अलबेग तथा तार्तक को कैद करके दिल्ली लाया गया जहां उनका कत्ल कर दिया गया और उनके सिरों को सीरी के दुर्ग की दीवार में चिनवा दिया गया।

(6.) इकबाल मन्दा का आक्रमण

1307 ई. में मंगोल सरदार इकबाल मन्दा ने विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण किया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस विपत्ति का सामना करने के लिए मलिक काफूर तथा गाजी मलिक तुगलक के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। मलिक काफूर ने रावी नदी के तट पर कबक को परास्त करके उसे बीस हजार मंगोलों सहित कैद कर लिया। इन्हें दिल्ली लाकर हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया। बदायूं दरवाजे पर उनके सिरों की एक मीनार बनाकर इससे वे इतने आतंकित हो गये कि अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में उन्हें फिर कभी भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ।

मंगोलों की असफलता के कारण

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में मंगोलों को समस्त आक्रमणों में असफल होना पड़ा। उनकी पराजय के कई कारण थे-

(1.) इस समय मंगोल कई शाखाओं में विभक्त होकर पारस्परिक संघर्षों में व्यस्त थे। इस कारण वे संगठित होकर पूरी शक्ति के साथ भारत पर आक्रमण नहीं कर सके।

(2.) मंगोल अपने साथ स्त्रियों, बच्चों तथा वृद्धों को भी लाते थे जो युद्ध क्षेत्र में सेना के लिए भार बन जाते थे।

(3.) दाऊद की मृत्यु के बाद मंगोल अस्त-व्यस्त हो गये थे। दिल्ली सल्तनत पर लगातार आक्रमणों के कारण उनकी सैन्य शक्ति काफी छीज गई थी।

(4.) अलाउद्दीन के सैनिक गुण तथा उसकी संगठन प्रतिभा ने मंगोलों को जीतने नहीं दिया।

मंगोलों के आक्रमण का प्रभाव

मंगोलों के आक्रमण का भारत पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा-

(1.) मंगोलों के आक्रमणों में सहस्रों व्यक्तियों के प्राण गये और उनकी सम्पत्ति लूटी गई।

(2.) मंगोलों से भयभीत रहने के कारण जनता राज्य के संरक्षक तथा अवलम्ब की ओर झुक गई और उसमें राज-भक्ति की भावना प्रबल हो गई। इससे सुल्तान की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई।

(3.) मंगोलों के आक्रमण की निरन्तर सम्भावना बनी रहने के कारण सुल्तान को अत्यन्त विशाल सेना की व्यवस्था करनी पड़ी। इसका प्रभाव शासन व्यवस्था पर भी पड़ा। शासन का स्वरूप सैनिक हो गया और सेना की स्वेच्छाचरिता तथा निरंकुशता में वृद्धि हो गई।

(4.) मंगोलों का सफलता पूर्वक सामना करने के लिए सुल्तान को बड़े सैनिक तथा प्रशासकीय सुधार करने पड़े।

अलाउद्दीन की सीमा नीति

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने राज्य को मंगोलों के आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए बलबन की सीमा नीति का अनुसरण किया। उसने इसके निम्नलिखित उपाय किये-

(1.) अलाउद्दीन खिलजी ने पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा पंजाब, मुल्तान एवं सिंध में नये दुर्गों का निर्माण करवाया

(2.) सीमा प्रदेश के दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में विशाल सेनायें रक्खी गईं।

(3.) समाना तथा दिपालपुर की किलेबन्दी की गई।

(4.) सेना की संख्या में वृद्धि की गई और हथियार बनाने के कारखाने खोले गये।

(5.) राजधानी की सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था की गई और दिल्ली के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराया गया।

(6.) सीरी में एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया गया ।

(7.) सेना की रणनीति में परिवर्तन किया गया। सेना की सुरक्षा के लिए खाइयाँ खुदवाई गईं, लकड़ी की दीवारें बनवाई गईं तथा हाथियों के दस्तों की व्यवस्था की गई।

(8.) आक्रमणकारियों की वास्तविक शक्ति से अवगत होने के लिए गुप्तचर विभाग की व्यवस्था की गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

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अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ उसकी सुधार योजनाओं का परिणाम थीं। ये उपलब्धियाँ सीमित कालखण्ड के लिए ही अर्जित की जा सकी थीं। अलाउद्दीन के मरते ही उसकी समस्त उपलब्धियाँ काल के गाल में समा गईं।

अलाउद्दीन खिलजी के शासन में 1312 ई. से 1316 ई. तक का काल प्रतिक्रिया का काल माना जाता है। 1312 ई. तक अलाउद्दीन के समस्त उद्देश्य पूरे हो चुके थे। साम्राज्य विस्तार का कार्य पूरा हो चुका था। मंगोलों को बुरी तरह परास्त किया जा चुका था। उत्तर भारत में स्थानीय शासन पर भी कब्जा कसा जा चुका था तथा दक्षिण भारत में राजाओं से वार्षिक कर लेना स्वीकार करवाकर उन्हें दिल्ली के अधीन बनाया जा चुका था।

1312 ई. के आते-आते सुल्तान वृद्ध होने लगा। उसके कई विश्वस्त अमीर एवं सेनापति भी मर गये। वृद्धावस्था के कारण सुल्तान की मानसिक स्थिति ठीक न रह गयी थी। राज्य की सैनिक शक्ति 1306 ई. से धीरे-धीरे मलिक काफूर के हाथों में चली गई। 1312 ई. के बाद काफूर का सेना पर पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया। यद्यपि शाहजादा खिज्र खाँ सुल्तान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था परन्तु उसमें इतने विशाल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी।

दरबार में दो दल बन गये थे। एक दल शहजादे खिज्र खाँ का था जिसे शहजादे की माँ मलिका-ए-जहाँ संभाल रही थी। शहजादे का मामा अल्ला खाँ उसका सहयोग कर रहा था। दूसरा दल मलिक काफूर का था जिसका सेना के ऊपर प्रभाव था। मलिक काफूर की दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। अतः वह ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने लगा जिससे सम्पूर्ण राजनैतिक शक्ति उसके हाथ में आ जाये।

काफूर ने राजवंश में फूट पैदा करने के लिये सुल्तान को समझाया कि मलिका-ए-जहाँ, खिज्र खाँ तथा अल्प खाँ, सुल्तान की हत्या करवाने का प्रयत्न कर रहे हैं। अलाउद्दीन खिलजी, मलिक काफूर के कहने में आ गया और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ तथा मुबारक खाँ को ग्वालियर के कारागार में डलवा दिया।

सुल्तान ने मलिका-ए-जहाँ को पुरानी दिल्ली में कैद कर लिया। अल्प खाँ की हत्या करवा दी। इससे अमीरों एवं राजघराने में सुल्तान के विरुद्ध अंसतोष की अग्नि और अधिक भड़क गई। इन्हीं परिस्थितियों में 1 जनवरी 1316 को अलाउद्दीन की मृत्यु हो गयी। कुछ इतिहासकारों का मत है कि मलिक काफूर ने अलाउद्दीन खिलजी को विष देकर मार डाला।

अलाउद्दीन का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

(1.) निरक्षर होने पर भी बुद्धि की प्रचुरता

बरनी के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी निरा अशिक्षित व्यक्ति था। यद्यपि सुल्तान निरक्षर था परन्तु उसमें बौद्धिक प्रतिभा पूरी थी। उसे योग्य व्यक्तियों की अद्भुत परख थी जिससे वह योग्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त कर सका था। अलाउद्दीन खिलजी ने कवि टेनिसन के कथन को सिद्ध कर दिया कि ‘केवल वही शासन कर सकता है जो पढ़-लिख नहीं सकते।’

(2.) शुष्क व्यवहार एवं क्रूरता की प्रतिमूर्ति

अलाउद्दीन खिलजी शुष्क स्वभाव का व्यक्ति था। इस कारण वह पारिवारिक प्रेम से सदैव वंचित रहा। यद्यपि उसके हरम में अनेक स्त्रियाँ थीं परन्तु उसकी एक भी स्त्री उसके हृदय पर अधिकार नहीं जमा सकी। अलाउद्दीन खिलजी क्रूरता तथा निर्दयता का साक्षात् स्वरूप था। बरनी का कहना है कि उसने फैरोह से भी अधिक निर्दोष व्यक्तियों का रक्तपात किया। जलालुद्दीन का वध, अपने सम्बन्धियों का हत्याकाण्ड, नए मुसलमानों तथा उनके निर्दोष स्त्री-बच्चों की निर्मम हत्या सुल्तान की क्रूरता के परिचायक हैं।

(3.) बर्बर तथा अत्याचारी

वी. ए. स्मिथ का कथन है- ‘अलाउद्दीन वास्तव में बर्बर अत्याचारी था। उसके हृदय में न्याय के लिये तनिक भी स्थान नहीं था…….. उसका शासन लज्जापूर्ण था।’

(4.) प्रतिशोध की भावना

अलाउद्दीन सन्देहशील व्यक्ति था। उसमें प्रतिशोध की भावना कूट-कूट कर भरी थी। यदि उसे किसी की विश्वसनीयता पर सन्देह हो जाता तो उसके प्राण लिये बिना उसका पीछा नहीं छोड़ता था। वह इतना अकृतज्ञ था कि उसने उन्हीं अमीरों का दमन किया जिनके सहयोग से उसने तख्त प्राप्त किया था।

(5.) खेलों से लगाव

सुल्तान को शिकार करने एवं अन्य प्रकार के खेलों से बड़ा लगाव था। उसे कबूतरों तथा बाजों को उड़ाने का बड़ा चाव था जिन्हें पालने एवं उड़ाने के लिए उसने अपनी सेवा में कई बालकों को नियुक्त कर रखा था।

(6.) इस्लाम में दृढ़ विश्वास

अलाउद्दीन खिलजी निरक्षर होने के कारण कुरान का अध्ययन नहीं कर सकता था, न वह रमजान का व्रत रखता था, न नमाज पढ़ता था और न राज्य के शासन में धर्म का हस्तक्षेप ही होेने देता था परन्तु उसका इस्लाम में दृढ़ विश्वास था। वह कभी किसी को अधार्मिक बात नहीं करने देता था। उसकी कठोर नीतियों के कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं पर भारी कुठाराघात हुआ।

(7.) सूफी सन्तों के प्रति श्रद्धा

अलाउद्दीन खिलजी की सूफी सन्त निजामुद्दीन औलिया के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। राजवंश के लगभग समस्त सदस्य निजामुद्दीन औलिया के शिष्य बन गए थे।

(8.) महत्वाकांक्षी

अलाउद्दीन अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। वह सिकन्दर की भांति विश्व विजय करने की कामना रखता था। वह एक नया धर्म भी चलाना चाहता था। काजी अलाउल्मुल्क के समझाने पर उसने उसने इन दोनों योजनाओं को छोड़ दिया तथा सम्पूर्ण भारत विजय की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की।

(9.) व्यावहारिक बुद्धि

यद्यपि अलाउद्दीन अत्यंत महत्वाकांक्षी था तथापि उसमें व्यावहारिक बुद्धि थी। हठधर्मी होते हुए भी वह अपने शुभचिन्तकों के परामर्श को स्वीकार कर लेता था। वह वास्तविकता का सदैव ध्यान रखता था और कूटनीति से काम लेता था। किसी भी योजना को कार्यान्वित करने से पूर्व उसकी अच्छी तरह तैयारी करता था। अलाउद्दीन साम्राज्य विस्तार का इच्छुक था किंतु उसने दक्षिण भारत के राजाओें पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त उन्हें मुस्लिम गवर्नरों को न सौंपकर उन्हीं राजाओं को करद बनाकर सौंप दिया था। इससे उसकी व्यावहारिक बुद्धि का परिचय मिलता है।

(10.) कुशल सेनापति

कुछ इतिहासकार अलाउद्दीन की सामरिक विजयों का श्रेय उसके सेनापतियों को देते हैं परन्तु यह निष्कर्ष उचित नहीं है। जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में अलाउद्दीन ने कई बड़ी विजयें प्राप्त कीं जिनसे वह सेना में लोकप्रिय हो गया। उसने मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन किया और भिलसा तथा देवगिरि को जीतकर अपने सैनिक गुणों का परिचय दिया।

तख्त पर बैठने के उपरान्त भी उसने चित्तौड़ युद्ध सहित कई युद्धों में स्वयं भाग लिया। सुल्तान ने विजय का कार्य अपने सेनापतियों को इसलिए सौंप दिया था कि मंगोलों के आक्रमण एवं अमीरों की षड़यंत्रकारी प्रवृत्ति के कारण वह राजधानी से दूर नहीं जाना चाहता था।

(11.) लक्ष्य पूर्ति के लिये अनैतिक साधनों का प्रयोग

अलाउद्दीन खिलजी अपने लक्ष्य को सदैव सर्वोपरि रखता था और उसकी पूर्ति के लिये वह नैतिक तथा अनैतिक समस्त प्रकार के साधनों का प्रयोग करने के लिये उद्यत रहता था।

(12.) स्वेच्छाचारिता

अलाउद्दीन अत्यंत स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश शासक था फिर भी विश्वसनीय परामर्शदाताओं के सुझाव को स्वीकार कर लेता था। उसने काजी अलाउल्मुल्क के परामर्श पर विश्व विजय करने और नया धर्म चलाने का निश्चय त्याग दिया। मलिक काफूर के परामर्श पर उसने अपने पुत्रों को बंदी बना लिया परन्तु जब वह किसी कार्य को करने का निश्चय कर लेता था तब वह किसी की भी नहीं सुनता था। उसके द्वारा किया गया बाजार नियंत्रण उसकी स्वेच्छाचारिता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

(13.) कुशल शासक

अलाउद्दीन न केवल एक महान् विजेता, वरन् एक कुशल शासक भी था। उसमें अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की योजनाएं बनाने की शक्ति थी। सैनिकों की प्रत्यक्ष रूप से भर्ती करना, उन्हें नकद वेतन देने की व्यवस्था करना, सैनिकों को हुलिया लिखवाना तथा उनके घोड़ों को दाग लगवाने का विधान बनाना, बाजारों का नियंत्रण तथा वस्तुओं की मांग एवम् आपूर्ति की समुचित व्यवस्था करना, इस बात के द्योतक हैं कि वह एक कुशल शासक था।

(14.) पथ-प्रदर्शक

अलाउद्दीन में अपने अमीरों, सेनापतियों एवं राज्याधिकारियों का पथ प्रदर्शन करने एवं उन्हें नई दिशा देने की प्रतिभा थी। उसके द्वारा किये गये अधिकांश सेना सम्बन्धी सुधारों तथा भूमि-सम्बन्धी सुधारों का अनुसरण आगे चलकर शेरशाह सूरी तथा अकबर दोनों ने किया था।

(15.) इस्लामी विद्वानों का प्रश्रयदाता

यद्यपि अलाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु वह इस्लामिक विद्वानों का आदर करता था और उन्हें प्रश्रय देता था। अमीर खुसरो तथा हसन उसके समय के बहुत बड़े विद्वान थे। अलाउद्दीन उन्हें बहुत आदर देता था। बहुसंख्य हिन्दू विद्वानों के प्रति उसे कोई लगाव नहीं था।

(16.) स्थापत्य एवं निर्माण से लगाव

आलाउद्दीन को स्थापत्य कला से प्रेम था। उसने बहुत से दुर्गों का निर्माण करवाया जिसमें अलाई का दुर्ग सबसे अधिक प्रसिद्ध था। उसने बहुत सी भग्न मस्जिदों का भी जीर्णोद्धार करवाया। 1311 ई. में उसने कुतुब मस्जिद को विस्तृत करने और सहन में एक नयी मीनार बनवाने का कार्य आरम्भ करवाया। उसने एक बड़े दरवाजे का भी निर्माण करवाया।

(17.) सुल्तान की सफलता

दिल्ली के सुल्तानों में अलाउद्दीन का नाम महत्वपूर्ण है। जिस समय वह तख्त पर बैठा था, उस समय दिल्ली सल्तनत की स्थिति बड़ी डावांडोल थी। मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था, आन्तरिक विद्रोह की सदैव सम्भावना बनी रहती थी, अमीर सदैव अवज्ञा करने को उद्यत रहते थे और अधिकांश जनता असन्तुष्ट थी।

इस प्रकार तख्त पर बैठने के समय अलाउद्दीन की स्थिति संकटापन्न थी परन्तु उसने धैर्य तथा साहस से संकटों का सामना किया और 1296 ई. से लेकर 1320 ई. तक पूरे 24 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन किया।

दिल्ली सल्तनत के इतिहास में अलाउद्दीन खिलजी का स्थान

कई इतिहासकारों की दृष्टि में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ सुल्तान था किंतु कई अन्य इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं हैं। स्मिथ ने उसके शासन को सर्वथा गौरवहीन बताते हुए लिखा है कि वह वास्तव में बड़ा ही बर्बर तथा क्रूर शासक था और न्याय का बहुत कम ध्यान रखता था। इसके विपरीत एल्फिन्स्टन के विचार में अलाउद्दीन का शासन बड़ा ही गौरवपूर्ण था।

अलाउद्दीन खिलजी: दिल्ली सल्तनत का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान

जो विद्वान अलाउद्दीन को दिल्ली सल्तनत का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान मानते हैं वे अपने मत के अनुमोदन में निम्नलिखित तर्क उपस्थित करते हैं-

(1.) उच्चकोटि का सेनानायक

अलाउद्दीन एक वीर सैनिक तथा कुशल सेनानायक था। वह महत्वाकांक्षी, साहसी, दृढ़प्रतिज्ञ तथा प्रतिभावान शासक था। दिल्ली के सुल्तानों में कोई भी ऐसा नहीं है जौ सैनिक दृष्टिकोण से उसकी समता कर सके। सुल्तान में ईश्वर प्रदत्त ऐसे गुण थे कि जो भी लोग उसकी अधीनता में कार्य करते थे, वे उसके अनुगामी हो जाते थे और सदैव सुल्तान के हित-साधन में संलग्न रहते थे।

(2.) भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक

यद्यपि अलाउद्दीन के पूर्ववर्ती तुर्क सुल्तानों ने भी भारत विजय का कार्य किया था परन्तु सम्पूर्ण भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक अलाउद्दीन खिलजी ही था। उसने अपनी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और एक अत्यन्त विशाल साम्राज्य की स्थापना की। साम्राज्य संस्थापक के रूप में अलाउद्दीन ने दो बड़े कार्य किये थे। पहला कार्य दक्षिण भारत की विजय और दूसरा कार्य पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था। अलाउद्दीन के केवल ये दो कार्य ही उसे दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं।

(3.) शान्ति तथा सुव्यवस्था का शासन काल

अलाउद्दीन ने लगभग बीस वर्ष तक अत्यन्त सफलतापूर्वक शासन किया था। उसके सम्पूर्ण शासन काल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रही। राज्य में चोरी, डकैती तथा लूटमार नहीं होती थी। उसका दण्ड विधान इतना कठोर था कि लोगों को अपराध करने तथा झगड़ा करने का साहस नहीं होता था।

(4.) मौलिक तथा रचनात्मक प्रतिभा

अलाउद्दीन में उच्च कोटि की मौलिकता थी। उसके पूर्ववर्ती सुल्तानों ने जो संस्थाएं स्थापित की थीं, अलाउद्दीन उनसे संन्तुष्ट नहीं रहा और उसने उनमें कई बड़े परिवर्तन किये। उसने अपने उद्देश्यों की पूर्ति एवं राज्य कल्याण के लिये नई संस्थाओं की भी स्थापना की। स्थायी सेना की व्यवस्था, भूमि सम्बधी नियमों का निर्माण, बाजारों का प्रबंधन, दक्षिण भारत की विजय आदि ऐसे कार्य थे जो तब तक केवल अलाउद्दीन ने ही किये थे।

(5.) राजनीतिक एकता की स्थापना

अलाउद्दीन दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिण पर अपनी सत्ता स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार दिल्ली के सुल्तानों में सर्वप्रथम उसी ने राजनीतिक एकता स्थापित की थी। उसने प्रान्तीय शासन को केन्द्रीय शासन के अनुशासन तथा नियंन्त्रण में लाकर शासन में भी एकरूपता स्थापित की।

(6.) लौकिक राज्य की स्थापना

बलबन के बाद अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने राजनीति को धर्म से अलग करने का प्रयास किया। उसने उलेमाओं को राजनीतिक मामलों और राज्य के कार्यों में हस्तक्षेप करने से अलग कर दिया।

(7.) पथ-प्रदर्शन का कार्य

अलाउद्दीन की शासन-व्यवस्था का महत्व इस बात से प्रकट होता है कि शेरशाह सूरी तथा अकबर ने भी अपनी शासन व्यवस्था में उसके सिद्धांतों का समावेश किया।

(8.) साहित्य तथा स्थापत्य को प्रश्रय

अलाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु वह साहित्य तथा स्थापत्य कला का आश्रयदाता था। उसके दरबार में कई उच्च कोटि के कवि तथा साहित्यकार रहते थे जिनमें अमीर खुसरो तथा अमीर हसन उल्लेखनीय हैं। अलाउद्दीन ने अलाई दरवाजे का निर्माण करवाया जो उस काल के भवनों में भव्य तथा सुन्दर है। उसने बहुत से दुर्गों, मस्जिदों तथा राज्य प्रासादों का भी निर्माण करवाया।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि दिल्ली के सुल्तानों में अलाउद्दीन को सर्वोत्कृष्ट स्थान प्राप्त होना चाहिए।

अलाउद्दीन खिलजी: दिल्ली सल्तनत का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान नहीं

जो इतिहासकार अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते, वे अपने मत के अनुमोदन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं-

(1.) अस्थायी कार्य

अलाउद्दीन ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जो स्थायी हो सका। अलाउद्दीन के समकालीन शेख वशीर दीवाना ने लिखा है- ‘अलाउद्दीन के राज्य की कोई स्थायी नींव नहीं थी और खिलजी वंश के विनाश का कारण अलाउद्दीन के शासन की स्वाभाविक दुर्बलता थी।’

(2.) एक व्यक्ति का शासन

सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘स्वेच्छाचारी शासन स्वभावतः अनिश्चित तथा अस्थायी होता है।’ अलाउद्दीन का शासन भी स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। राज्य की सारी शक्तियां केवल सुल्तान में केन्द्रीभूत थीं। इसलिये अलाउद्दीन का शासन अच्छा नहीं माना जा सकता और न ही उसे दिल्ली सल्तनत का सबसे महान सुल्तान माना जा सकता है।

(3.) सैनिक शक्ति पर आधारित शासन

अलाउद्दीन ने अपनी सेना के बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी और सेना के बल पर ही बीस साल तक उस पर शासन किया था। जिस सुल्तान का शासन जनता की इच्छा पर आधारित नहीं होकर सैनिक शक्ति द्वारा चलाया जाये, उसे महान सुल्तान नहीं माना जा सकता।

(4.) क्रूर तथा निर्दयी शासन

अलाउद्दीन का शासन बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी था। वह बर्बरता तथा नृशंसता के साथ लोगों को दण्ड देता था। साधारण अपराधों के लिये भी अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड दे दिया करता था।

(5.) स्वार्थी तथा दुश्चरित्र

सुल्तान का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही घृणित था। वह स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक मैथुन का व्यसनी था। वह बड़ा ही स्वार्थी था और अपने हित के लिए अपने निकटतम सम्बन्धियों एवं राज्याधिकारियों की हत्या करने में लेशमात्र संकोच नहीं करता था।

(6.) हिन्दुओं के साथ घृणित व्यवहार

सुल्तान अपनी हिन्दू प्रजा को घृणा तथा सन्देह की दृष्टि से देखता था तथा उसे सब प्रकार से अपमानित तथा पददलित करने का प्रयत्न करता था। हिन्दुओं को दरिद्र तथा विपन्न बनाना उसकी नीति का एक अंग था ताकि वे कभी भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सकें।

(7.) स्वार्थपूर्ण सुधार

अलाउद्दीन की समस्त सुधार योजनाएं सुल्तान तथा सल्तनत की स्वार्थपूर्ति के उद्देश्य से आरम्भ की गई थीं न कि लोक-कल्याण के लिये। उसकी आर्थिक योजनाओं से केवल उसके सैनिकों को लाभ हुआ, जनसाधारण को नहीं। उसकी योजनाओं से सब लोग असंतुष्ट थे। उसकी सारी योजनाएं युद्धकालीन थी जो शान्ति के शासन के समय के लिए सर्वथा अनुपयुक्त थीं। फलतः वे समस्त अस्थायी सिद्ध हुईं।

(8.) आवश्यकता से अधिक केन्द्रीभूत शासन

यद्यपि अलाउद्दीन ने ऐसे युग में शासन किया था जब केन्द्रीभूत शासन की आवश्यकता थी परन्तु केन्द्रीभूत शासन की भी कुछ सीमाएं होती हैं। अलाउद्दीन इन सीमाओं का उल्लंघन कर गया। उसने केवल थोड़े से व्यक्तियों की सहायता से शासन करने का प्रयत्न किया था, इसलिये उसका शासन लोकप्रिय न बन सका और जब इन सहायकों की मृत्यु हो गई, तब उसका साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया।

(9.) सांस्कृतिक कार्यों की उपेक्षा

अलाउद्दीन में साहित्य तथा कला के संवर्द्धन की प्रवृत्ति नहीं थी। उसका सारा ध्यान सेना को प्रबल बनाने तथा राज्य जीतने की ओर रहा। इसलिये सांस्कृतिक दृष्टि से उसका शासन गौरवहीन था।

(10.) निम्नकोटि के लोगों को प्रोत्साहन

अलाउद्दीन अपने अमीरों को नीचा दिखाने के लिये प्रायः निम्न वर्ग के कम योग्य लोगों को प्रोत्साहन देकर उन्हें उच्च पद दिया करता था जिसका राज्य पर बुरा प्रभाव पड़ा और अन्त में साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ।

(11.) उत्तराधिकारियों की रक्षा की उपेक्षा

अलाउद्दीन ने अपने पुत्रों को उचित शिक्षा नहीं दिलवाई जो उसके केन्द्रीभूत शासन को चला सकते थे। इसलिये उसके मरते ही उसका साम्राज्य ध्वस्त हो गया। उसने अपने उत्तराधिकारियों की रक्षा करने की बजाय उन्हें कारागृह में बंद कर दिया।

उपर्युक्त तर्कों आधार पर कहा जाता है कि अलाउद्दीन का शासन सर्वथा गौरवहीन था और दिल्ली के सुल्तानों में उसे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ सीमित समय के लिए थीं। अलाउद्दीन की दुर्बलताएं उस युगीन प्रभाव के कारण थीं। उसकी विफलताएं अक्षम्य नहीं हैं। जिस युग तथा जिन परिस्थतियों में उसे कार्य करना पड़ा, उसके अनुकूल उसने आचरण किया और जिस लक्ष्य को उसने सामने रखा, उसे पूर्ण कर दिखाया, चाहे वह उच्च स्तर का रहा हो अथवा निम्न स्तर का। इसलिये उसकी गिनती दिल्ली सल्तनत के सर्वश्रेष्ठ सुल्तानों में होनी चाहिए।

अलाउद्दीन खिलजी के पूर्ववर्ती सुल्तानों में केवल इल्तुतमिश तथा बलबन ही उसकी स्पर्धा कर सकते हैं परन्तु विजेता तथा शासक दोनों ही रूपों में वे न्यूनतर ठहरते हैं।

अलाउद्दीन के पश्चवर्ती सुल्तानों में मुहम्मद बिन तुगलक ही उसकी समानता का दावा कर सकता है परन्तु जहाँ अलाउद्दीन को अपने समस्त उद्देश्यों में सफलता मिली, वहीं मुहम्मद बिन तुगलक को अपने समस्त उद्देश्यों में असफलता मिली। यदि केवल एक बिंदु को छोड़ दिया जाये कि उसने बहुसंख्य हिन्दू प्रजा पर भयानक अत्याचार किये तो दिल्ली के सुल्तानों तथा मध्यकाल के इतिहास में अलाउद्दीन को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया जाना चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – खिलजी वंश का उत्थान और पतन

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन की सुधार योजनाएँ

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह

अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

खिलजी वंश का पतन

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खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारी उमर खिलजी, मुबारक खिलजी, तथा नासिरूद्दीन खुसरो शाह अयोग्य निकले। इस कारण इन शासकों के काल में खिलजी वंश का पतन हो गया।

अलाउद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारी

1316 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु हो गई। इस समय उसकी बेगम मलिका-ए-जहाँ तथा पुत्र खिज्र खाँ कारागृह में बन्द थे। सेना पर मलिक काफूर का नियंन्त्रण था। इसलिये वही उत्तराधिकार का निर्णय कर सकता था। उसने अमीरों को एकत्रित किया और उन्हें सुल्तान की एक वसीयत दिखलायी जिसमें सुल्तान ने अपने सबसे छोटे पुत्र उमर को अपना उत्तराधिकारी और मलिक काफूर को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया था।

उस समय उमर केवल पांच साल का था। स्वार्थी अमीरों ने इस वसीयत को स्वीकार कर लिया। उमर सुल्तान घोषित कर दिया गया और मलिक काफूर उसका संरक्षक बन गया। इस प्रकार राज्य की सारी शक्ति मलिक काफूर के हाथों में चली गई और वह सल्तनत का वास्तविक शासक बन गया।

राज्य की बागडोर हाथ में आते ही काफूर ने खिलजी वंश के समर्थकों पर अत्याचार करने आरम्भ किये। खिलजी वंश के समस्त समर्थकों को उसने पदच्युत कर दिया। खिज्र खाँ तथा सुल्तान के दूसरे पुत्र शादी खाँ की आँखें निकलवा ली गईं। सुल्तान के तीसरे पुत्र मुबारक की भी आँखें निकलवाने का प्रयास किया गया परन्तु इस कार्य में सफलता न मिली।

मलिक काफूर ने अलाउद्दीन की बेगम मलिका-ए-जहाँ से विवाह कर लिया तथा उसकी सारीे सम्पत्ति छीन कर उसे कारागार में डाल दिया। मुबारक खाँ भी जेल में बन्द कर दिया गया। इस प्रकार मलिक काफूर ने सल्तनत पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाया परन्तु उसके ये समस्त प्रयत्न उस समय निष्फल सिद्ध हुए जब ग्वालियर के किले में बन्द मुबारक खाँ कर्मचारियों को घूस देकर दुर्ग से निकल भागा और दिल्ली आ पहुँचा। उसने कुछ अमीरों को अपनी ओर मिलाकर मलिक काफूर के विरुद्ध संगठन खड़ा किया तथा केवल 35 दिन के क्रूर शासन के उपरान्त मलिक काफूर की हत्या कर दी गई।

अब मुबारक खाँ, सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर का संरक्षक बन गया परन्तु छः दिन बाद ही मुबारक ने पांच वर्षीय सुल्तान उमर की आँखें निकलवा लीं और कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के नाम से तख्त पर बैठ गया।

मुबारक खिलजी

मुबारक खाँ अनुभव-शून्य नवयुवक था। तख्त पर बैठने के समय उसकी आयु 17-18 वर्ष थी। दिल्ली के तख्त पर बैठने के उपरान्त उसने अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिये सेना को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया। उसने सैनिकों को छः महीने का वेतन पेशगी दे दिया तथा अपने पिता के समय के बनाये हुए समस्त कठोर नियमों को हटा दिया।

इससे लोगों ने राहत की सांस ली तथा चारों ओर अच्छा वातावरण बना किंतु मुबारक खिलजी पुराने नियमों एवं व्यवस्थाओं के स्थान पर नये नियम अथवा नई व्यवस्थाएँ नहीं बना सका इससे लोगों में उच्छृखंलता आ गई और उनका नैतिक स्तर बहुत गिर गया। साम्राज्य के विभिन्न भागों में उपद्रव तथा विद्रोह होने लगे।

गुजरात का विद्रोह

मुबारक खाँ को सबसे पहले गुजरात में हुए विद्रोह का सामना करना पड़ा। अल्प खाँ की हत्या के बाद गुजरात में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी थी। गुजरात ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। मुबारक खिलजी ने एक विशाल सेना भेज कर इस विद्रोह को शान्त किया और गुजरात में फिर से दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्थापित की।

देवगिरि का विद्रोह

इन दिनों देवगिरि में यादव राजा हरपाल देव शासन कर रहा था। दिल्ली की गड़बड़ी से लाभ उठा कर उसने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस पर मुबारक खाँ ने एक सेना भेजकर देवगिरि पर अभियान किया। इस युद्ध में हरपाल देव परास्त हो गया। उसकी जिन्दा खाल खिंचवा ली गई और देवगिरि में एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया।

असदुद्दीन का विद्रोह

जब सुल्तान मुबारक खाँ देवगिरि से दिल्ली लौट रहा था तब उसे असदुद्दीन के षड़यंत्र का सामना करना पड़ा जो अलाउद्दीन का भतीजा था। असदुद्दीन ने मुबारक खाँ की हत्या करके तख्त हासिल करने का षड्यन्त्र रचा। मुबारक खाँ को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने असदुद्दीन तथा उसके साथियों की सम्बन्धियों सहित हत्या करवा दी।

खिज्र खाँ की हत्या

अब मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ की ओर ध्यान दिया। खिज्र खाँ जिसे पहले ही अन्धा कर दिया गया था, इन दिनों अपनी स्त्री देवल देवी के साथ ग्वालियर के किले में बंद था। मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ को आदेश भिजवाया कि वह देवल देवी को दिल्ली भेज दे। खिज्र खाँ ने इस आज्ञा का पालन नहीं किया। इसलिये उसकी भी हत्या करवा दी गई।

मुबारक खाँ का अंत

मुबारक खाँ के पतन का कारण उसकी क्रूरता तथा विलासिता की प्रवृत्ति तो थी ही, साथ ही गुजरात का रहने वाला खुसरो नाम का एक अमीर भी उसक पतन के लिये जिम्मेदार था। खुसरो गुजरात का रहने वाला था उसने किसी समय इस्लाम स्वीकार कर लिया था। वह मुबारक खाँ का विश्वस्त था। उसने मुबारक खाँ को नष्ट करने और सल्तनत पर कब्जा करने के लिये मुबारक खाँ को दुर्गुणों में फंसाना आरम्भ किया।

मुबारक खाँ की क्रूरता और विलासिता बढ़ती ही चली गई। वह शराब के नशे में डूबा रहता और विलासिता में चूर होकर औरत के कपड़े पहनकर दरबार में आने लगा। उसने भांडों तथा वेश्याओं को दरबार में पुराने तथा अनुभवरी अमीरों का अभद्र संकेतों तथा अशिष्ट भाषा द्वारा अभिवादन करने की आज्ञा दे दी। बरनी लिखता है कि कभी-कभी सुल्तान नंगा होकर अपने दरबारियों के बीच दौड़ा करता था। उसने खलीफा की उपाधि भी धारण कर ली।

खुसरो ने सुल्तान की आज्ञा से 40 हजार अश्वारोहियों की एक सेना तैयार कर ली जिसके बल पर वह सुल्तान को मारने की योजना बनाने लगा। अन्त में एक दिन खुसरो अपने साथियों के साथ रात्रि के समय सुल्तान के महल में घुस गया। सुल्तान ने खुसरो से पूछा कि यह शोरगुल क्यों है?

खुसरो ने उत्तर दिया कि कुछ घोड़े छूट गये हैं ओर ये लोग उन्हें पकड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। खुसरो यह कह ही रहा था कि खुसरो के आदमी सुल्तान मुबारक खाँ के कक्ष में घुस गये। सुल्तान आतंकित होकर उछल पड़ा और रनिवास की ओर भागा किंतु खुसरो ने उसके बाल पकड़ लिये।

जहीरा नामक आदमी ने भालों से छेदकर सुल्तान को मार डाला। मुबारक का सिर धड़ से अलग करके नीचे चौक में फैंक दिया गया। दूसरे दिन खुसरो ने सुल्तान की मृत्यु का घोषणा कर दी और स्वयं नासिरूद्दीन खुसरो शाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार खिलजी वंश का अन्त हो गया।

नासिरूद्दीन खुसरोशाह

नासिरूद्दीन खुसरोशाह गुजरात का रहने वाला चालाक तथा दुष्टमति व्यक्ति था। उसने किसी समय इस्लाम स्वीकार कर लिया था। वह मुबारक खाँ के सम्पर्क में था। जब मुबारक खाँ दिल्ली का सुल्तान बन गया तब उसके भाग्य का भी उत्कर्ष हो गया। मुबारक खाँ ने खुसरो को तेलंगाना के राय का विद्रोह दबाने के लिए भेजा।

खुसरो को इस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। वह दक्षिण में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना चाहता था परन्तु मुबारक खाँ ने उसे दिल्ली बुलवा लिया। अब खुसरो ने दिल्ली में अपनी महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देना आरम्भ किया। उसने मुबारक खाँ को विलासिता की ओर धकेला तथा उसकी हत्या करके 15 अप्रेल 1320 को स्वयं दिल्ली के तख्त पर बैठ गया।

खुसरो की अलोकप्रियता

खुसरो ने अपने साथियों को राज्य में ऊँचे पद देकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसने पुराने अमीरों को उनके पदों पर रहने देकर और उन्हें नई पदवियां देकर प्रसन्न करने का प्रयास किया। उसे शेख निजामुद्दीन औलिया का नैतिक समर्थन प्राप्त हो गया परन्तु तुर्की अमीर उसे पसंद नहीं करते थे। इसके कई कारण थे-

(1.) खुसरो मूलतः हिन्दू धर्म से था तथा बाद में मुसलमान बना था। इसलिये तुर्की अमीरों को वह सुल्तान के रूप में स्वीकार नहीं था।

(2.) खुसरो हिन्दुओं में भी निम्न समझे जाने वाले वर्ग से था। इसलिये स्वयं को उच्च रक्त वंश का समझने वाले तुर्क अमीर उसे सुल्तान स्वीकार करने में अपनी तौहीन समझते थे।

(3.) खुसरो अपनी क्रूरता एवं कृतघ्नता के कारण पर्याप्त अलोप्रिय हो चुका था क्योंकि उसने सुल्तान को पतन के गर्त में धकेल कर सुल्तान की तथा उसके पूरे परिवार की नृशंसतापूर्वक हत्या करवाई थी।

(4.) खुसरो हिन्दुओं के साथ विशेष सहानुभूति दिखाता था और अपने सम्बन्धियों को ऊँचे पद देता था।

(5.) खुसरो ने कई अमीरों को अपमानित किया था। इससे वे भी उसके प्रबल विरोधी थे।

(6.) अमीरों ने खुसरो पर आरोप लगाया कि वह आधा हिन्दू है तथा शाही महलों में मूर्तिपूजा को प्रोत्साहन देता है। वस्तुतः खुसरो के बहुत से सम्बन्धी अब भी हिन्दू थे और वे महलों में रहकर मूर्ति पूजा करते थे।

खुसरो का अंत

खुसरो की अलोकप्रियता तथा उसके क्रूर कामों से उसके विरोधियों की संख्या बढ़ती ही गई। दिपालपुर के हाकिम गाजी मलिक ने खुसरो के विरुद्ध मोर्चा खोला। उसने अन्य हाकिमों को भड़काकर उन्हें संगठित किया। अन्त में दिल्ली के निकट गाजी मलिक तथा खुसरो की सेनाओं में भीषण लड़ाई हुई जिसमें गाजी मलिक की जीत हुई और 5 सितम्बर 1320 को वह खुसरो को मारकर दिल्ली का सुल्तान बन गया। इस प्रकार एक नये राजवंश का प्रादुर्भाव हुआ।

खिलजी वंश के पतन के कारण

अलाउद्दीन खिलजी के शासन में खिलजी वंश का शासन चरमोत्कर्ष को पहुँच गया था परन्तु उसके जीवन के अन्तिम भाग में ही खिलजी वंश की नींव हिलने लगी थी। उसकी मृत्यु होते ही खलजी वंश का पतन हो गया। खलजी वंश के पतन के कई कारण थे-

(1.) मलिक काफूर पर अत्यधिक भरोसा

खिलजी वंश के पतन का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व अलाउद्दीन खिलजी पर था। उसने अपने पुत्रों पर विश्वास करने के स्थान पर मलिक काफूर पर भरोसा किया। उसने मलिक काफूर को इतना शक्तिशाली बना दिया कि सल्तनत की सम्पूर्ण सेना पर मलिक काफूर का नियंत्रण हो गया। मलिक काफूर ने सुल्तान तथा उसके वंशजों को नष्ट करने के लिये सुल्तान को उसके पुत्रों के विरुद्ध भड़काकर शहजादों को बंदी बना लिया।

(2.) कमजोर उत्तराधिकारी की नियुक्ति

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने जीवन काल में अपने बड़े पुत्रों को जेल में डलवाकर अपने छः वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी। उन दिनों में जब हर अमीर भेड़िये की तरह सुल्तान के तख्त का शिकार करने की फिराक में रहता था अलाउद्दीन ने जवान और अनुभवी पुत्रों के जीवित रहते हुए अपने छः वर्ष के पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इससे मलिक काफूर को सुल्तान का संरक्षक बनकर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने का अवसर मिल गया।

(3.) खिज्र खाँ को अंधा करके कैद में डाल दिया जाना

अलाउद्दीन खिलजी का बड़ा पुत्र खिज्र खाँ अंधा करके उसकी स्त्री सहित ग्वालियर के दुर्ग में बंद कर दिया गया था। अलाउद्दीन के दूसरे पुत्र मुबारक खाँ को भी ग्वालियर दुर्ग में बंद कर दिया गया था। इस कारण वे मलिक काफूर के विरुद्ध कुछ नहीं कर सके।

(4.) उत्तराधिकारियों की अयोग्यता

सुल्तान के कई पुत्र थे। उसकी मृत्यु के समय खिज्र खाँ, मुबारक खाँ तथा शादी खाँ युवा थे। उमर शिहाबुद्दीन केवल छः साल का बालक था। सुल्तान ने अपने पुत्रों की शिक्षा का प्रबंध नहीं किया तथा उन्हें योग्य बनाने का भी कोई प्रयास नहीं किया। इसलिये उनमें मलिक काफूर जैसे दुर्दांत अमीर से स्वयं को बचाने तथा तख्त पर अधिकार करने की योग्यता भी नहीं थी।

(5.) सैनिक शासन की स्वाभाविक दुर्बलता

अलाउद्दीन ने सेना के बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी जिसे चलाने के लिये उसे विशाल स्थायी सेना की आवश्यकता रहती थी। अतः सेना के हित के लिए उसने अन्य समस्त हितों को त्याग दिया था। सैनिक शासन कभी स्थायी नहीं हो पाता क्योंकि शक्ति की कुछ सीमाएं होती है। अलाउद्दीन की शक्ति सीमा का उल्लंघन कर गई थी, अतः वही उसके पतन का कारण सिद्ध हुई।

(6.) योग्य परामर्शदाताओं का अभाव

खिलजी वंश के पतन का एक यह भी कारण था कि अलाउद्दीन के जीवन के अन्तिम भाग में सुल्तान का कोई अच्छा पारामर्शदाता न रहा। अलाउद्दीन ने अपने वीर तथा बुद्धिमान् परामर्शदाताओं की सहायता से विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी परन्तु उसके शासन काल के अन्तिम भाग में ये समस्त परामर्शदाता काल कवलित हो गये थे और सुल्तान असहाय तथा किंकर्त्तव्यमूढ़ हो गया था।

(7.) नीच लोगों को प्रात्साहन

खिलजी वंश के सुल्तानों ने नीच व्यक्तियों को अपना प्रिय बनाया। अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को और मुबारक ने खुसरो को अपना प्रिय तथा विश्वासपात्र बनाया। इन्हीं दोनों के कारण खिलजी वंश का पतन हुआ। काफूर ने अलाउद्दीन को बहकाकर राजवंश में कलह का बीज बो दिया जिससे खिलजी वंश की जड़ें हिल गईं। खुसरो ने मुबारक को दुर्व्यसनों मे फंसा कर उसका सत्यानाश कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक

अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष

अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार

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अल्लाउद्दीन खिलजी : मंगोल नीति

अल्लाउदीन खिलजी की उपलब्धियाँ

खिलजी वंश का पतन

तैमूरलंग का भारत आक्रमण एवं उसके प्रभाव

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तैमूरलंग का भारत आक्रमण
तैमूरलंग का भारत आक्रमण

तैमूरलंग का भारत आक्रमण भारत के मध्यकालीन इतिहास की सबसे घृणित घटनाओं में से एक है। इस आक्रमण में लाखों निर्दोष हिन्दुओं को अपने प्राण गंवाने पड़े।

तैमूरलंग

प्रारंभिक जीवन

तैमूरलंग का जन्म 1336 ई. में समरकंद से 50 मील दूर मावरा उन्नहर के कैच नामक नामक नगर में हुआ था। उसके पिता का नाम अमीर तुर्क अथवा अमीर तुर्गे था जो तुर्कों के बरलस कबीले की गुरकन शाखा का नायक था। अमीर तुर्गे ने तैमूर की शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था की।

तैमूर ने कुरान के अध्ययन के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा युद्धकला में महारथ हासिल कर ली। अल्प आयु में ही वह एक छोटे भूभाग का शासक बना दिया गया। तैमूर ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि बारह या चौदह वर्ष की अवस्था से ही स्वतंत्रता की भावना से उसका हृदय ओत-प्रोत हो गया था। एक सामन्त का पुत्र होने के कारण तैमूर पहले चगताई वंश के शासन के अधीन था।

संयोग से उसमें तथा उसके स्वामी में अनबन हो गई। फलतः उसे कई तरह की यातनाएं सहन करनी पड़ी और सुरक्षति स्थान की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। एक बार जब शत्रु उसका पीछा कर रहे थे, तब उसकी टांग टूट गई और वह लंगड़ा हो गया, तभी से वह तैमूर लंग कहलाने लगा।

समरकंद के तख्त की प्राप्ति

1369 ई. में 33 वर्ष की अवस्था में उसे अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो गई। 1370 ई. में उसने तुर्क सरदारों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें तुर्क सरदारों ने उसे अपना सरदार चुन लिया। 1370 ई. में उसने समरकंद पर अधिकार कर लिया और वहाँ का शासक बन गया।

साम्राज्य विस्तार

समरकंद हाथ में आते ही तैमूर ने अपने राज्य को विशाल साम्राज्य में बदलने का निर्णय लिया। कुछ ही समय में उसने ख्वारिज्म, फारस, मेसोपोटामिया आदि देशों पर विजय प्राप्त कर ली और उसका साम्राज्य चंगेज खाँ के साम्राज्य जितना विस्तृत हो गया। इसके बाद तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

तैमूरलंग का भारत आक्रमण : कारण

जफरनामा में तैमूरलंग का भारत आक्रमण करने के कारणों का उल्लेख किया गया है। उसके द्वारा भारत पर आक्रमण किये जाने के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) तैमूर ने कुरान का अच्छा अध्ययन किया था। वह इस्लाम को भारत में फैलाने के लिये भारत पर आक्रमण करने की योजनाएं बनाने लगा।

(2.) तैमूर अफगानिस्तान के भारत आक्रांताओं की तरह भारत पर विजय प्राप्त करके काफिरों का नाश करना और इस्लामी जगत में अपना नाम कमाना चाहता था।

(3.) उन दिनों भारत में तुगलक शासन अत्यन्त दुर्बल हो रहा था जिसके कारण कुव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप था। तैमूर भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था।

(4.) तैमूर भारत की समृद्धि से अवगत था और वह इसकी अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था।

(5.) तैमूर मूर्ति पूजकों पर विजय प्राप्त करके गाजी की उपाधि प्राप्त करना चाहता था।

(6.) उन दिनों मुल्तान के शासक सारंग खाँ तथा तैमूर के पोते पीर मोहम्मद में संघर्ष चल रहा था। पीर मोहम्मद काबुल का गर्वनर था। उसने सारंग खाँ से कर मांगा और जब उसने कर देने से इन्कार कर दिया तब पीर मोहम्मद ने मुल्तान पर आक्रमण कर दिया। उसने सिन्ध नदी को पार करके छः माह में उच्च तथा मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इस संघर्ष ने भी तैमूर को भारत पर आक्रमण करने के लिये प्रेरित किया।

तैमूरलंग का भारत आक्रमण

तैमूर ने अप्रैल 1398 में 92,000 घुड़सवार सेना के साथ समरकन्द से प्रस्थान किया और कुछ ही समय में सिंधु नदी को पार कर लिया। उसके पोते पीर मोहम्मद ने तब तक सिंध के पश्चिमी भाग को रौंद कर मुल्तान पर अधिकार कर रखा था।

पंजाब का पतन

तैमूर लाहौर की ओर बढ़ा और उसने लाहौर के गर्वनर मुबारक खाँ को परास्त कर दिया। तैमूर की सेनाएं चिनाब नदी के पास पीर मोहम्मद की सेनाओं से मिल गईं। वहाँ से तैमूर की सेनाएं तुलम्बा की ओर बढ़ीं और वहाँ के शासक जसरथ को परास्त किया जो खोखरों का सरदार था। इसके बाद तैमूर लंग पाक-पतन, भटनेर, सरस्वती, फतेहाबाद तथा कैथल को लूटता हुआ पानीपत के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ा। वह दिल्ली से थोड़ी दूर रुक कर दिल्ली पर आक्रमण करने  की तैयारी करने लगा।

एक लाख हिन्दू बंदियों की हत्या

उस समय तक उसने एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिये उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि एक लाख हिन्दू बंदियों का कत्ल कर दिया जाये। तैमूर की सेना ने यह काम सफलता पूर्वक सम्पादित कर लिया।

दिल्ली में प्रवेश

दिल्ली का सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तथा उसका प्रधान मन्त्री मल्लू इकबाल खाँ अपनी विशाल सेना लेकर तैमूर का सामना करने के लिए दिल्ली से निकले परन्तु जब उन्होंने सुना कि तैमूर ने एक लाख हिन्दू बंदियों का कत्ल करवा दिया, तो दिल्ली की सेना बुरी तरह घबरा गई और युद्ध के मैदान से भाग खड़ी हुई। मल्लू इकबाल बरान की ओर तथा नासिरुद्दीन महमूद गुजरात की ओर भाग गया। 7 सितम्बर 1398 को तैमूर ने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने फीरोजशाह तुगलक की कब्र के पास अल्लाह को धन्यवाद दिया।

दिल्ली में कत्लेआम

तैमूर पंद्रह दिन तक दिल्ली में रहा। यद्यपि उसने दिल्ली वालों को यह आश्वासन दिया था कि वह दिल्ली में कत्लेआम नहीं मचायेगा किंतु दिल्ली में प्रवेश करते ही उसने अपनी सेना को कत्ले आम करने का आदेश दिया। यह कत्ले आम पूरे तीन दिन तक चलता रहा। उसने असंख्य स्त्रियों तथा पुरुषों को गुलाम बनाया।

कई हजार शिल्पकार और यंत्रकार शहर से बाहर लाये गये और युद्ध में सहायता देने वाले राजाओं, अमीरों और अफगानों में बांटे गये। जफरनामा के अनुसार शहरपनाह तथा सिरी के महल नष्ट कर दिये गये। हिन्दुओं के सिर काट कर उनके ऊँचे ढेर लगा दिये गये और उनके धड़ हिंसक पशु-पक्षियों के लिये छोड़ दिये गये…….

जो निवासी किसी तरह बच गये वे बंदी बना लिये गये। लेनपूल ने लिखा है- इस लूट के पश्चात् तैमूर का प्रत्येक सिपाही धनवान हो गया तथा उन्हें बीस से दो सौ तक गुलाम अपने देश ले जाने को मिले। तैमूर लिखता है- ‘काबू के बाहर हो मेरी सेना पूरे शहर में बिखर गई और उसने लूटमार तथा कैद के अतिरिक्त और कुछ परवाह न की। यह सब कुछ अल्लाह की मर्जी से हुआ है। मैं नहीं चाहता था कि नगरवासियों को किसी भी प्रकार की तकलीफ हो, पर यह अल्लाह का आदेश था कि नगर नष्ट कर दिया जाये।’

उत्तर भारत में भारी तबाही

दिल्ली को नष्ट-भ्रष्ट कर तैमूर मेरठ और हरिद्वार की ओर बढ़ा। स्थान-स्थान पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों में भीषण संग्राम हुआ। इसमें लाखों हिन्दू मारे गये। स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बनाया गया। हरिद्वार में उसने प्रत्येक घाट पर गाय का वध करवाया। लेनपूल लिखता है कि कत्लेआम के यथार्थ उत्सव के उपरांत धर्म के सैनिक तैमूर ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और समझा कि उसका भारत आने का उद्देश्य पूरा हुआ।

तैमूर ने शिवालिक की पहाड़ियों पर विजय प्राप्त कर ली और वहाँ से लूट का माल लेकर वह जम्मू की ओर बढ़ा। तैमूर ने जम्मू के राजा को पराजित कर उसे मुसलमान बनने के लिये बाध्य किया। तैमूर ने खिज्र खाँ सैयद को सुल्तान, लाहौर तथा दिपालपुर का शासक बनाया। 19 मार्च 1399 को तैमूर ने फिर से सिंधु नदी पार की तथा समरकन्द चला गया।

तैमूर के भारत आक्रमण के प्रभाव

तैमूरलंग का भारत आक्रमण मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। वह उस तेज तूफान की तरह आया जो अपने मार्ग में पड़ने वाली हर वस्तु को उजाड़कर चला गया। लाखों हिन्दू मर गये। लाखों गुलाम बनाकर ले जाये गये। लाखों गायें काट कर खाई गईं। तीर्थों की पवित्रता भंग की गई। स्त्रियों के सतीत्व लूटे गये।

खेतों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया तथा लाखों हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर विवश किया गया। इस आक्रमण से भारत में इतने बड़े परिवर्तन हुए कि हम इसे नये युग का आरम्भ करने वाला कह सकते हैं। इस आक्रमण का न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से वरन् सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्व है।

राजनीतिक प्रभाव

तैमूरलंग का भारत आक्रमण से तैमूर के वंशज भारत के घनिष्ट सम्पर्क में आ गये। तैमूर ने पंजाब अपने राज्य में मिला लिया और खिज्र खाँ को उस प्रान्त का शासन चलाने के लिए गर्वनर नियुक्त कर दिया। जब तक खिज्र खाँ जीवित रहा तब तक वह समरकन्द की अधीनता में कार्य करता रहा।

तैमूर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और खिज्र खाँ के उत्तराधिकारी स्वतंत्रता पूर्वक पंजाब में शासन करने लगे। तैमूर के वंशज कभी इस बात को नहीं भूले कि पंजाब उनके साम्राज्य का एक अंग था। इसलिये अब उनकी दृष्टि सदैव पंजाब पर लगी रहती थी। आगे चलकर जब बाबर ने पंजाब पर आक्रमण किया तब उसने दावा किया कि पंजाब पर उसके पूर्वज तैमूर का अधिकार था।

तैमूर के आक्रमण से तुगलक साम्राज्य के प्रान्तपति दिल्ली से स्वतंत्र हो गये। ख्वाजा जहाँ ने जौनपुर में, दिलावर खाँ ने मालावा में तथा मुजफ्फर ने गुजरात में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। तैमूर के आक्रमण ने तुगलकवंश पर ऐसा घातक प्रहार किया कि थोड़े ही दिनों के बाद उसका अन्त हो गया और दिल्ली में एक नये राजवंश की स्थापना हुई।

सांस्कृतिक प्रभाव

तैमूर के आक्रमण का भारत पर सांस्कृतिक प्रभाव भी हुआ। भारत के विभिन्न प्रांत छोटे-छोटे राज्यों में बंटकर दिल्ली की छाया से मुक्त हो गये और स्वतंत्रता पूर्वक अपनी संस्कृति का सृजन तथा संवर्धन करने लगे। इस प्रकार मालवा, गुजरात, बंगाल, जोनपुर तथा बहमनी राज्यों में शिल्पकला की वृद्धि हुई।

साहित्यिक क्षेत्र में जौनपुर की विशेष रूप से उन्नति हुई। जौनपुर साहित्यकारों तथा धर्माचार्यों का केन्द्र बन गया। गुजरात तथा बहमनी राज्यों में भी जौनपुर की भांति साहित्य की विपुल उन्नति हुई। तैमूर भारत की भव्य शिल्प-कला से अत्यधिक प्रभावित हुआ था और उसने भारतीय कारीगरों को अपने साथ ले जाकर समरकन्द में कई मस्जिदें एवं भवन बनवाये।

इससे भारतीय भवन निर्माण कला को नया क्षेत्र तथा नया वायुमण्डल प्राप्त हुआ। भारतीय भवन निर्माण कला ने मध्य एशिया को स्थापत्य कला के सम्मिश्रण से नया स्वरूप प्रदान किया और लगभग सवा-सौ वर्षों के उपरान्त पुनः विदेश से अपनी मातृ-भूमि में इसका प्रत्यागमन हुआ। भारत में इसका अपने नये स्वरूप में मुगल बादशाहों के आश्रय में विकास हुआ जो अपने चरम को पहुँच गया।

आर्थिक प्रभाव

तैमूर के आक्रमण का भारत पर आर्थिक प्रभाव भी पड़ा। इस आक्रमण ने भारत की आर्थिक व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट कर दी। तैमूर के मार्ग में जितने समृद्ध नगर तथा गांव पड़े, सब नष्ट हो गये क्योंकि आक्रमणकारी जिधर से निकलते, गांवों को लूटते, उजाड़ते, जलाते तथा लोगों की हत्या करते जाते थे।

लाखों लोगों के शव खुले में पड़े हुए सड़ते रहे जिससे उत्तर भारत में भांति-भांति के रोग फैल गये। जनता की पीड़ा का कहीं अन्त न था। कृषि तथा व्यापार नष्ट-भ्रष्ट हो गया और अकाल पड़ गया। इससे मानवों एवं पशुओं की मृत्यु हुई। आक्रमणकारी भारत की अपार सम्पत्ति लूट कर अपने देश को ले गये और जनता में ऐसा भय और आंतक फैल गया कि लम्बे समय तक उत्तर भारत में हा-हाकार मचा रहा।

सामाजिक प्रभाव

तैमूर के आक्रमण और तबाही से उत्तरी भारत में भारतीय समाज का ताना-बाना हिल गया। लोगों का मनोबल टूट कर बिखर गया। वे स्वयं को परास्त और निस्तेज अनुभव करने लगे। उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपनी बहिन बेटियों की इज्जत लुटते देखी। अपने पुत्रों और भाइयों के कटे हुए सिरों के ढेर देखे।

अपनी गायों को शत्रुओं द्वारा खाये जाते हुए देखा। उन्होंने अपने खेतों और घरों को जले हुए देखा। वे एक दूसरे से आँख मिलाने लायक नहीं रहे। चारों तरफ ऐसी भयानक बर्बादी मची कि लोग उस बर्बादी से फिर कभी उबर ही नहीं सके। वे हमेशा के लिये निर्धन और पराजित हो गये। वे भविष्य में न कोई युद्ध लड़ सके न किसी आक्रांता का सामना कर सके।

मुसलमानों पर प्रभाव

भारत में जो मुसलमान मुहम्मद गौरी के समय से रह रहे थे, उनमें विजेता होने का भाव था और वे हिन्दू प्रजा को अपने से नीचे के स्तर का समझते थे किंतु तैमूर की सेना ने भारत में रह रहे मुसलमानों को भी नहीं बख्शा तथा उनका भी कत्ले आम मचाया। इससे भारत के हिन्दू तथा मुसलमान एक ही धरातल पर खड़े हुए दिखाई दिये। के. एस. लाल ने लिखा है कि इस आक्रमण से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता की भावना उत्पन्न हुई।

दिल्ली सल्तनत पर प्रभाव

तैमूर की वापसी के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद, अपने वजीर मल्लू इकबाल के भय से कन्नौज की तरफ भाग गया तथा दिल्ली पर वजीर का शासन कायम हो गया। कुछ दिन बाद मल्लू ने पंजाब के प्रांतपति खिज्र खाँ के विरुद्ध अभियान किया जिसे तैमूर ने नियुक्त किया था। खिज्र खाँ ने मल्लू को मार दिया।

इससे दिल्ली का तख्त खाली हो गया और एक अफगान सरदार दौलत खाँ लोदी ने दिल्ली को अपने अधिकार में ले लिया। 1412 ई. में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूदशाह की मृत्यु हो गई तथा 1414 ई. में खिज्र खाँ ने दिल्ली पर अधिकार करके सैयद वंश के शासन की स्थापना की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक

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दिल्ली सल्तनत कालीन दुर्ग का खण्डहर

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली सल्तनत से खिलजियों का शासन समाप्त करने में सफल रहा उसका वास्तविक नाम गाजी तुगलक था।

तुगलक कौन थे?

तुगलकों के सम्बन्ध में प्रारंभिक जानकारी फरिश्ता तथा इब्नबतूता के विवरणों से मिलती है। उन दोनों के अनुसार तुगलक, तुर्क थे। फरिश्ता के अनुसार तुगलक भारत में बलबन के समय आये थे और इब्नबतूता के अनुसार तुगलक भारत में अलाउद्दीन खिलजी के समय सिंध से आये थे। भारत आने से पहले तुगलक, सिन्ध तथा तुर्किस्तान के बीच में निवास करते थे।

‘तारीखे रशीदी’ के रचियता मिर्जा हैदर के कथनानुसार तुगलक मंगोल थे परन्तु उसकी बात सही नहीं है क्योंकि-

(1.) भारत में तुगलक वंश की स्थापना करने वाले

गाजी मलिक को 29 बार मंगोलों से युद्ध करना पड़ा। यदि वह मंगोल होता तो मंगोलों से इतने युद्ध नहीं करता।

(2.) गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, बलबन का गुलाम था। उस समय तक मंगोल, तुर्कों के गुलाम नहीं होते थे।

(3.) तुगलकों की आकृति तुर्कों से मिलती थी न कि मंगोलों से।

(4.) तुर्की अमीरों के रहते यह संभव नहीं था कि गाजी तुगलक मंगोल होते हुए भी, तुर्क सुल्तान की हत्या करके स्वयं सुल्तान बन जाता।

(5.) यदि तुगलक मंगोल होते तो बलबन और अलाउद्दीन खिलजी उन्हें अपनी सेवा में नहीं रखते क्योंकि वे दोनों मंगोलों के बड़े शत्रु थे।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह माना जाना ही उचित है कि तुगलक तुर्क थे।

गयासुद्दीन का प्रारम्भिक जीवन

गयासुद्दीन का बचपन का नाम गाजी तुगलक था। इब्नबतूता के कथनानुसार गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, सुल्तान बलबन का गुलाम था और उसकी माता एक जाट स्त्री थी परन्तु अन्य इतिहासकारों का कहना है कि गाजी तुगलक अपने दो भाइयों रजब तुगलक तथा अबूबकर तुगलक के साथ खुरासान से भारत आया।

उसने अलाउद्दीन खिलजी के यहाँ नौकरी कर ली। वह युद्ध में कुशल सैनिक था। धीरे-धीरे वह सुल्तान का कृपापात्र बन गया और दिपालपुर का गवर्नर बना दिया गया। अलाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिनों में गाजी तुगलक की गिनती दिल्ली के प्रमुख अमीरों में होती थी।

सुल्तान मुबारक खिलजी की हत्या होने के बाद खुसरोशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा। खुसरोशाह के अत्याचारों से तंग आकर गाजी तुगलक ने विद्रोह का झंडा उठाया। दिल्ली के कई तुर्की अमीर उसके साथ हो गये। गाजी तुगलक अपनी सेना लेकर दिल्ली आया। दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ में उसने खुसरोशाह को परास्त करके उसका वध कर दिया।

इसके बाद दिल्ली के अमीरों ने एक स्वर से गाजी तुगलक को अपना सुल्तान निर्वाचित किया। इस प्रकार सितम्बर 1320 में वह दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने गयासुद्दीन तुगलक शाह गाजी की उपाधि धारण की। इस प्रकार उसने दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के नाम से एक नये शासक वंश की स्थापना की।

गयासुद्दीन की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

तुगलक वंश का संस्थापक जिस समय दिल्ली के तख्त पर बैठा, उस समया सल्तनत की दशा बड़ी शोचनीय थी। इस कारण नये सुल्तान के समक्ष कई कठिनाइयां मुँह बाये खड़ी थीं। उसकी दो प्रमुख कठिनाइयां थीं-

(1.) साम्राज्य की विशृंखलता

इस समय केन्द्रीय सरकार के शक्तिहीन हो जाने के कारण अलाउद्दीन का विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो रहा था। प्रांतीय गवर्नर तथा हिन्दू राजा स्वयं को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने का प्रयास कर रहे थे। पंजाब में जो नव-मुस्लिम बस गये थे, वे सदैव षड्यन्त्र रचा करते थे और विद्रोह करने के लिए उद्यत रहा करते थे।

पंजाब के खोखर लोग अब भी विद्रोह करते थे। सिन्ध में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। दक्षिण-सिन्ध लगभग स्वतन्त्र हो गया था। गुजरात में भी अशान्ति फैली थी और वहाँ के गवर्नर स्वतन्त्र होने का प्रयत्न कर रहे थे। बंगाल का प्रान्त दिल्ली से दूर होने के कारण स्वतंत्र होने का प्रयत्न करता रहता था। राजपूताना के वीर राजपूत भी अपने खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे। दक्षिण के राज्य भी धीरे-धीरे स्वतन्त्र हो रहे थे।

(2.) साम्राज्य की आर्थिक दुर्दशा

गयासुद्दीन की दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई सल्तनत की आर्थिक विपन्नता थी। मुबारक खिलजी तथा खुसरोशाह ने राजकोश का सारा धन सेना तथा अयोग्य व्यक्तियों को बाँट दिया था। इससे राजकोष बिल्कुल रिक्त हो गया था। अलाउद्दीन के कठोर नियमों के कारण बहुत से किसान खेत छोड़कर भाग गये थे इसलिये कृषि की दशा भी अच्छी नहीं थी।

गयासुद्दीन के सुधार

गयासुद्दीन ने अपना शासन जमाने के लिये कई कार्य किये तथा नई सुधार योजनाएं आरम्भ कीं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है-

(1.) आर्थिक सुधार

सबसे पहले गयासुद्दीन ने आर्थिक सुधारों की ओर ध्यान दिया। जिन लोगों ने राज्य का धन हड़प लिया था, विशेषकर जिन लोगों ने खुसरो से रिश्वत ली थी, उन्हें सारा धन राजकोष में वापस जमा करवाने के लिये बाध्य किया गया।

(2.) राजवंश की महिलाओं का उद्धार

जिन लोगों ने खिलजी राजवंश की  महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था, उन्हें दण्ड दिया गया। खिलजी राजवंश की महिलाओं में से जो विवाह के योग्य थीं, उनके लिए उचित वर ढूँढ़ कर उनका विवाह कर दिया गया। अन्य महिलाओं को पेंशन देने की व्यवस्था की गई।

(3.) पदों तथा पदवियों का वितरण

जिन लोगों ने खुसरो के विरुद्ध गयासुद्दीन की सहायता की थी, उन्हें पदों तथा जागीरों से पुरस्कृत किया गया। उसने अपने सम्बन्धियों को भी अनुग्रहीत किया। इस प्रकार गयासुद्दीन ने अमीरों तथा अपने सम्बन्धियों को सन्तुष्ट कर बड़ी सतर्कता के साथ शासन का कार्य आरम्भ किया।

(4.) कृषि का सुधार

राजधानी में व्यवस्था स्थापित करने के बाद गयासुद्दीन तुगलक ने कृषि सुधारों की ओर ध्यान दिया। उसने अलाउद्दीन की कठोर नीति को त्याग दिया और किसानों के साथ उदारता का व्यवहार किया। राज्य की ओर से भूमि का निरीक्षण करवा कर भूमि-कर निश्चित कर दिया। उपज का सातवाँ अथवा दसवाँ भाग राज्य द्वारा लेना तय किया गया।

किसानों को अनेक प्रकार की सुविधायें दी गईं। उन्हें हल-बीज के लिये राज्य की ओर से धन दिया गया और सिंचाई के लिए कुएँ तथा नहरें खुदवाई गईं। गयासुद्दीन तुगलक के आर्थिक सुधार दो सिद्धांतों पर अधारित थे- (1.) कोई अमीर अधिक अमीर न हो और (2.) कोई भी व्यक्ति इतना दरिद्र न हो कि उसका भरण पोषण भी कठिन हो जाये।

(5.) न्याय सम्बन्धी सुधार

गयासुद्दीन ने न्याय विभाग में भी सुधार किया। उसने प्राचीन निर्णयों तथा कुरान के सिद्धान्तों के आधार पर एक न्याय विधान बनवाया और तदनुसार न्याय करने की आज्ञा दी। इस प्रकार गयासुद्दीन तुगलक, दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने न्याय विधान बनवाया।

(6.) डाक की व्यवस्था

गयासुद्दीन ने सल्तनत के विभिन्न भागों में डाक पहुँचाने की सुन्दर व्यवस्था की। डाक वितरण के लिये घुड़सवार तथा पैदल सिपाही लगाये गये जो डाक लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते थे। प्रत्येक मार्ग पर निश्चित दूरी पर चौकियाँ बनाई गई। जहाँ पर पत्र-वाहक सदैव उपस्थित रहते थे।

ये पत्र-वाहक एक हाथ में थैला और दूसरे हाथ में लाठी लिए रहते थे। उनके सिरों पर घन्टियाँ लगी रहती थीं। पत्र-वाहक दौड़ता हुआ जाता था। घन्टी की आवाज से अगली चौकी के पत्र-वाहक को पता लग जाता था कि डाक आ रही है।

(7.) दान व्यवस्था

तुगलक वंश का संस्थापक उदार तथा दानशील शासक था। उसने परिश्रमशील तथा अध्यवसायी व्यक्तियों को प्रोत्साहन दिया। गरीबों के लिये उसने एक दानशाला की व्यवस्था की। जहाँ फकीरों, भिखारियों तथा जरूरतमंद विद्वानों की आर्थिक सहायता की जाती थी।

(8.) सैन्य सुधार

गयासुद्दीन ने सेना में भी कई सुधार किये। उसने सैनिकों के साथ उदारता का व्यवहार किया। सेना का वेतन वह अपने सामने बँटवाता था जिससे धन का अपव्यय न हो। उसने अपनी सेना में, योग्य सेनापतियों की अधीनता में हजारों नये घुड़सवारों को भर्ती किया। घोड़ों का अच्छी तरह निरीक्षण किया जाता था और उन्हें दागा जाता था।

(9.) शासन की सुव्यवस्था

गयासुद्दीन के समय की शासन व्यवस्था, न्याय तथा समानता के सिद्धान्त पर आधारित थी। वह प्रजा के हित का सदैव ध्यान रखता था। वह अपने कर्मचारियों को अच्छा वेतन देता था। परिश्रमी तथा ईमानदार व्यक्तियों को ऊँचे पदों पर नियुक्त करता था तथा योग्य व्यक्तियों को समुचित पुरस्कार देता था।  उसने सूबेदारों से राजस्व वसूलने के अधिकार छीन लिये। पुलिस विभाग में भी उसने कुछ परिवर्तन किये।

(10) धार्मिक व्यवस्था

तुगलक वंश का संस्थापक तुगलक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार हिन्दुओं के प्रति उसका व्यवहार उदार नहीं था। अलाउद्दीन खिलजी ने हिन्दुओं पर जो कर लगाये थे वे ज्यों के त्यों जारी रहे। उसने हिन्दुओं के नाम यह फरमान जारी किया कि वे पूंजी का संग्रह न करें।

हिन्दुओं को लूटना, उनको जबरन मुसलमान बनाना तथा उनके देवालयों को धराशायी करना उसके शासन में भी पूर्ववत् बना रहा। युद्ध के समय में वह हिन्दुओं के मन्दिरों तथा मूर्तियों को विध्वंस करने में लेश-मात्र भी संकोच नहीं करता था। गयासुद्दीन ने मुसलमान जनता के नैतिक जीवन को ऊँचा उठाने के लिये भी कई प्रयास किये।

गयासुद्दीन के सैनिक अभियान

गयासुद्दीन ने अपने शासन काल में निम्नलिखित सैनिक अभियान किये-

(1.) वारंगल पर आक्रमण (1321 ई.)

इन दिनों तेलंगाना में काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन कर रहा था। वह अलाउद्दीन खिलजी के समय से दिल्ली को खिराज दे रहा था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली को खिराज देना बन्द कर दिया और स्वतन्त्र होने का प्रयास करने लगा।

गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जूना खाँ को एक विशाल सेना देकर वारंगल पर आक्रमण करने भेजा। जूना खाँ ने वारंगल पर घेरा डाल दिया। छः माह तक घेरा चलने पर भी दिल्ली की सेना को विजय प्राप्त नहीं हुई। इसी बीच शहजादे जूना खाँ को सुल्तान के मरने की आशंका हुई और वह घेरा उठाकर दिल्ली की ओर रवाना हो गया।

दिल्ली पहुँच कर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। वह सुल्तान से क्षमा याचना करके 1323 ई. में पुनः वारंगल के लिये रवाना हो गया। राजा प्रताप रुद्रदेव की पराजय हुई और वह सपरिवार बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। तेलंगाना का राज्य, दिल्ली में मिला लिया गया और वहाँ पर एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया। इस विजय से जूना खाँ ने सुल्तान का विश्वास अर्जित कर लिया।

(2.) जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण (1323 ई.)

जाजनगर के राजा भानुदेव (द्वितीय) ने प्रताप रुद्रदेव की सहायता की थी, अतः जूना खाँ ने वारंगल विजय के बाद जाजनगर पर आक्रमण कर दिया। इस अभियान में शाहजादे को सामरिक विजय के साथ-साथ लूट कर बहुत सा माल तथा 50 हाथी मिले। जूना खाँ लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। उड़ीसा को दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया गया।

(3.) मंगोल आक्रमण (1324 ई.)

मंगोल 1307 ई. के बाद से भारत से दूर थे। 1324 ई. में सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के शासन काल में मंगोलों ने एक बार फिर भारत की ओर रुख किया तथा समाना पर आक्रमण किया। इस समय शहजादा जूना खाँ वारंगल आक्रमण में व्यस्त था।

इसलिये गयासुद्दीन तुगलक ने समाना के हाकिम अलाउद्दीन की सहायता के लिए दिल्ली से एक सेना भेजी। इस सेना ने पहली बार शिवालिक पहाड़ी के पास तथा दूसरी बार व्यास नदी के किनारे मंगोलों को परास्त किया। प्रमुख मंगोल योद्धा बंदी बना लिये गये तथा शेष मंगोालों को दिल्ली सल्तनत की सीमा से बाहर निकाल दिया गया।

(4.) लखनौती पर आक्रमण (1324 ई.)

राजधानी दिल्ली से दूर होने के कारण बंगाल के प्रान्तपति अवसर पाते ही स्वतंत्र होने की चेष्टा करते थे। इन दिनों बंगाल में शमसुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा था। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई।

उसने अपने भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया। शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया तथा राजधानी दिल्ली का प्रबन्ध अपने पुत्र जूना खाँ को सौंप कर, स्वयं एक सेना लेकर बंगाल के लिए चल दिया।

बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया।

(5.) तिरहुत के शासक से संघर्ष (1324 ई.)

जब तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन लखनौती से दिल्ली को लौट रहा था तब उसने मार्ग में तिरहुत पर आक्रमण किया। इन दिनों राजा हरिसिंहदेव मिथिला पर शासन कर रहा था। हरिसिंह पराजित होकर जंगलों में भाग गया। तिरहुत दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया गया। अहमद खाँ को वहाँ का गवर्नर बनाया गया।

गयासुद्दीन की हत्या (1325 ई.)

तिरहुत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त सुल्तान ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान ने जूना खाँ के पास आज्ञा भेजी कि राजधानी से कुछ दूरी पर एक महल बनाया जाये जिससे सुल्तान उसमें रात्रि व्यतीत कर दूसरे दिन समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश कर सके। इस पर शाहजादे ने मीर-इमारत अहमद अयाज को लकड़ी का एक महल बनाने की आज्ञा दी।

जब सुल्तान वापस आया तब शाहजादे ने तुगलकाबाद में बड़े समारोह के साथ उसका स्वागत किया। तुगलकाबाद से तीन-चार मील दूर अफगानपुर में सुल्तान को प्रीतिभोज देने के लिए एक शामियाना लगवाया गया। जब भोजन समाप्त हो गया तब समस्त आमन्त्रित व्यक्ति शामियाने के बाहर निकल आये।

केवल सुल्तान तथा उसका एक छोटा पुत्र, जिसमें सुल्तान की विशेष अनुरक्ति थी, शामियाने के भीतर रह गये। इसी समय शाहजादे जूना खाँ ने सुल्तान से कहा कि जो हाथी बंगाल से लाये गये हैं, उनका संचालन हो। सुल्तान सहमत हो गया। जब हाथियों का संचालन हो रहा था तब अचानक शामियाना गिर पड़ा और सुल्तान तथा उसके अल्पवयस्क पुत्र महमूद खाँ की मृत्यु हो गई। उसी रात को सुल्तान का शरीर तुगलकाबाद के मकबरे में दफन कर दिया गया। इब्नबतूता ने सुल्तान की मृत्यु का सारा दोष जूना खाँ पर डाला है।

गयासुद्दीन का चरित्र

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक अनुभवी सेनापति तथा सुलझा हुआ शासक था। उसने खिलजियों के शासनकाल में सीमा रक्षक के रूप में अच्छी ख्याति अर्जित की थी। वह परिस्थतियों को समझने तथा उनका लाभ उठाने की शक्ति रखता था। इसीलिये वह एक साधारण सैनिक से सुल्तान बन गया।

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के बाद से दिल्ली सल्तनत में चल रही अराजकता की स्थिति को समाप्त करने में सफल रहा। सुल्तान के रूप में भी वह सफल रहा। उसने दिल्ली सल्तनत में शांति स्थापित की और कानून का राज्य स्थापित किया। उसने दक्षिण में वारंगल तथा पश्चिमोत्तर में मंगोलों से सफल युद्ध किये।

उसने किसानों की हालत सुधारने का प्रयास किया जिससे सल्तनत को मजबूती दी जा सके। वह न्याय प्रिय शासक था इसलिये दिन में दो बार दरबार लगाकर लोगों के झगड़े निबटाता था।

उसने दिल्ली सल्तनत के गौरव को बढ़ाया। उसके दुर्भाग्य से उसका पुत्र जूना खाँ अत्यंत महत्वाकांक्षी था जो जल्दी से जल्दी दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था इसलिये जूना खाँ ने छल से सुल्तान की हत्या कर दी।

–डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

तुगलक वंश का संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ

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मुहम्मद तुगलक का चरित्र

मुहम्मद तुगलक पालक था?

सुल्तान फीरोजशाह तुगलक

फीरोजशाह तुगलक की धार्मिक नीति

फीरोजशाह तुगलक का शासन प्रबंध

फीरोजशाह तुगलक का चरित्र

फीरोजशाह का मूल्यांकन

तुगलक वंश का पतन

मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ

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मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ

मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि वह एक बुद्धिमान शासक था किंतु इन योजनाओं की विफलताओं के कारण उसे पागल सुल्तान कहा गया।

मुहम्मद बिन तुगलक

प्रारंभिक जीवन

मुहम्मद बिन तुगलक के बचपन का नाम फखरुद्दीन मुहम्मद जूना खाँ था। वह अपने चार भाइयों में सबसे बड़ा, सर्वाधिक महत्वाकांक्षी एवं सबसे प्रतिभावान था। उसका पालन-पोषण एक सैनिक की भांति हुआ था। पिता गाजी तुगलक ने उसकी शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध किया। सुल्तान खुसरोशाह ने उसे कुछ घोड़ों का अध्यक्ष नियुक्त किया।

खुसरोशाह के विरुद्ध जूना खाँ ने ही षड़यंत्र रचना आरम्भ किया था जिसमें उसका पिता गाजी तुगलक भी शामिल हो गया। जब यह षड़यंत्र सफल हो गया तो गाजी खाँ को सुल्तान बनाया गया तथा जूना खाँ को उसका उत्तराधिकारी घोषित किया गया। कुछ दिन बाद सुल्तान ने उसे उलूग खाँ की उपाधि दी। अपने पिता के अधीन काम करते हुए उसने वारंगल विजय करके तथा जाजनगर विजय करके अच्छी ख्याति अर्जित कर ली।

दिल्ली के तख्त की प्राप्ति

जूना खाँ प्रारम्भ से ही महत्वाकांक्षी था। खुसरोशाह के विरुद्ध किये गये विद्रोह के सफल रहने के बाद वह युवराज पद से संतुष्ट नहीं था। उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। इसलिये वह पिता की मृत्यु का संदेह होते ही वारंगल से घेरा उठाकर दिल्ली लौट आया था किंतु पिता को जीवित देखकर वह बड़ा निराश हुआ।

1325 ई.में जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बंगाल विजय के लिये गया तब जूना खाँ ने उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया तथा सुल्तान के दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही उसकी हत्या करवा दी। उसकी मृत्यु के तीन दिन बाद ही जूना खाँ, मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तथा चालीस दिन तक काले वस्त्र पहनकर अफगानपुरी में शोक मनाता रहा।

जब गयासुद्दीन के समस्त अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो गये तब उसने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। दिल्ली पहुँचने के बाद फरवरी अथवा मार्च 1325 में भव्य समारोह के साथ मुहम्मद बिन तुगलक का राज्याभिषेक हुआ।

सल्तनत की स्थिति

मुहम्मद बिन तुगलक को अपने पिता से अत्यन्त सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था। मेहदी हुसैन के अनुसार इतना विशाल साम्राज्य आज तक किसी तुर्क सुल्तान को अपने पिता से नहीं मिला था। उसके पिता का राजकोष भी धन तथा रत्नों से परिपूर्ण था। इब्नबतूता लिखता है कि गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद में एक प्रासाद बनवाया जिसकी ईंटें स्वर्ण से आवरित की गईं।

इस महल के भीतर उसने बहुमूल्य वस्तुओं को संग्रहीत किया और एक सरोवर बनवाया जिसमें स्वर्ण को पिघलाकर भरा गया था। अतः स्पष्ट है कि मुहम्मद बिन तुगलक को सुल्तान बनते समय किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं था। तख्त पर बैठते समय उसके तीन भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। इस प्रकार उसे न बाह्य आक्रमणों का भय था और न आन्तरिक विद्रोह का।

सुल्तान के पद को सुदृढ़ता प्रदान करने का कार्य

दिल्ली का सुल्तान बनते समय मुहम्मद बिन तुगलक के समक्ष केवल एक समस्या थी कि लोग उसे पितृहन्ता न समझें। इससे साम्राज्य में उसके विरुद्ध वातावरण बनता तथा सुल्तान को हटाने के षड़यंत्र आरम्भ हो जाते। इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक ने लोकप्रियता अर्जित करने तथा सुल्तान के पद को सुदृढ़ता प्रदान करने के उद्देश्य से कई उपाय किये-

(1) समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश

बरनी ने लिखा है कि मुहम्मद बिन तुगलक के नगर प्रवेश से पूर्व दिल्ली को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया। गुम्बजें निर्मित की गईं तथा मार्गों को सुंदर वस्त्रों से अलंकृत किया गया। सुल्तान बनने के उपलक्ष में राजधानी में ढोल बजाये गये। सुल्तान ने जनता में सोने चांदी की बिखेर की।’ इस समारोह का जन-साधारण पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। सुल्तान ने सड़कों पर स्वर्ण तथा रजत मुद्राओं की वर्षा करके जनता को मुग्ध कर लिया और लोग उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

(2) पदों तथा पदवियों का वितरण

अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए सुल्तान ने पदों तथा पदवियों का नये सिरे से वितरण किया। उसने विद्वानों, कवियों तथा दीन-दुखियों को वार्षिक पेन्शनें, जागीरें तथा इनाम दिये। इस प्रकार धन, पद तथा पदवियों का वितरण करके सुल्तान ने ऐसी लोकप्रियता अर्जित की कि लोगों को उसे पितृहन्ता कहने का साहस नहीं हुआ। इस प्रकार अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना कर उसने शासन का कार्य आरम्भ किया।

(3) निजामुद्दीन औलिया का आशीर्वाद

उन दिनों दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया का बड़ा प्रभाव था। मुहम्मद बिन तुगलक ने औलिया को उसी समय अपने पक्ष में कर लिया था जिस समय गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान पर था। औलिया को मुहम्मद बिन तुगलक के पक्ष में देखकर जनसामान्य ने भी नये सुल्तान का विरोध नहीं किया।

(4) खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति

भारत के प्रारंभिक तुर्की सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठने के बाद खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति प्राप्त करके मुस्लिम जगत में अपनी धाक जमाते थे। परवर्ती तुर्की शासकों ने इस परम्परा को तोड़ दिया था। मुहम्मद बिन तुगलक ने मिस्र के अब्बासी खलीफाओं से स्वयं को भारत के सुल्तान पद की स्वीकृति दिलवाई। उसने अपने सिक्कों एवं खुतबों पर खलीफाओं का नाम अंकित करवाया।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएँ

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं-

(1.) योजनाओं का काल- 1324 ई. से 1335 ई. तक के काल में सुल्तान ने कई योजनाएं बनाकर लागू कीं जिनमें सुल्तान को आंशिक सफलता तथा आंशिक विफलता प्राप्त हुई।

(2.) विद्रोहों का काल- 1335 ई. से 1351 ई. तक का काल जिसमें साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह हुए और सुल्तान का जीवन इन विद्रोहों का दमन करने में ही समाप्त हो गया।

(1.) राजस्व शासन में सुधार 

तख्त पर बैठते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने राजस्व सुधार के लिये कई कानून बनाये। उसने सूबों की आय-व्यय का हिसाब रखने के लिये एक रजिस्टर तैयार करवाया। उसने समस्त सूबेदारों को अपने-अपने सूबों के हिसाब भेजने के आदेश दिये। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि सल्तनत के समस्त सूबों में समान लगान-व्यवस्था लागू की जाये और कोई भी गांव लगान देने से मुक्त न रहे।

(2.) कृषि की उन्नति का प्रयास

गयासुद्दीन तुगलक की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने भी कृषि की उन्नति के लिये प्रयास किये। उसने अलग से कृषि विभाग की स्थापना की। उस विभाग का नाम दीवाने कोही था। इस कार्य के लिये साठ वर्ग मील का एक भूभाग चुनकर उसमें विभिन्न फसलें बोई गई। तीन वर्ष में 70 लाख टका (रुपया) व्यय किया गया किंतु सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता तथा समय की कमी के कारण यह योजना असफल रही और बंद कर दी गई।

(3.) दोआब पर कर में वृद्धि

तख्त पर बैठने के थोड़े ही दिन बाद सुल्तान ने दोआब पर कर में वृद्धि की। बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस तथा बीस गुना था। किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त घरी, अर्थात गृहकर तथा चरही अर्थात् चरागाह कर भी लगाया गया।

प्रजा को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ। दुर्भाग्य से इन्हीं दिनों अकाल पड़ा और चारों ओर विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। शाही सेनाओं ने विद्रोहियों को कठोर दण्ड दिये। इस पर लोग जंगलों में भाग गये। शाही सेना ने जंगलों से लोगों को पकड़कर उन्हें यातनाएं दीं। यद्यपि सुल्तान ने बाद में प्रजा की सहायता के लिए कई व्यवस्थाएँ कीं परन्तु वे उस समय की गयीं जब प्रजा का सर्वनाश हो चुका था। इस कारण प्रजा सुल्तान की उदारता से कोई लाभ नहीं उठा सकी।

 कर वृद्धि के कारण

इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा दो आब में की गई कर वृद्धि के अलग-अलग कारण बताये हैं-

(1.) बदायूनीं का कहना है कि यह अतिरिक्त कर दोआब की विद्रोही प्रजा को दण्ड देने तथा उस पर नियन्त्रण रखने के लिए लगाया गया था। सर हेग ने भी इस मत का अनुमोदन किया है।

(2.) कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सुल्तान ने अपने रिक्त कोष की पूर्ति के लिए दोआब पर अतिरिक्त कर लगाया था।

(3.) गार्डनर ब्राउन का कहना है कि दोआब साम्राज्य का सबसे अधिक धनी तथा समृद्धिशाली भाग था। इसलिये इस भाग से साधारण दर से अधिक कर वसूला जा सकता था।

(4.) अधिकांश विद्वानों का मानना है कि दोआब का कर, शासन-प्रबन्ध को सुधारने के विचार से बढ़ाया गया था।

कर नीति की असफलता: सुल्तान की यह योजना सफल नहीं हुई। इसके दो प्रमुख कारण थे- (1.) प्रजा बढ़े हुए कर को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि कोई भी अधिक कर देना पसन्द नहीं करता। (2.) इन्हीं दिनों दोआब में अकाल पड़ गया था, जनता बढ़े हुए कर को चुका नहीं सकती थी।

कर नीति की समीक्षा

बरनी ने मुहम्मद बिन तुगलक की कर नीति की कटु आलोचना की है। कुछ इतिहासकारों ने बरनी की आलोचना पर आक्षेप लगाये हैं कि बरनी की आलोचना में अतिरंजना है। बरनी की इस कटु आलोचना का कारण यह था कि बरनी उलेमा वर्ग का था जिसके साथ सुल्तान की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी।

इसलिये सुल्तान की निन्दा करना बरनी के लिए स्वाभाविक ही था। इसके अतिरिक्त बरनी बरान का रहने वाला था और बरान को भी दोआब के कर का शिकार बनना पड़ा था। इसलिये उसमें मात्भूमि के प्रेम का आवेश था परन्तु बरनी द्वारा की गई कटु आलोचना बिल्कुल निर्मूल भी नहीं कही जा सकती।

गार्डन ब्राउन ने सुल्तान को बिल्कुल निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न किया है और प्रजा की हालत खराब होने का सारा दोष अकाल पर डाला है परन्तु यदि ऐसा था तो सुल्तान को अकाल आरम्भ होते ही अतिरिक्त कर हटा देना चाहिए था और प्रजा की सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए थी। उसे शाही कर्मचारियों पर भी पूरा नियन्त्रण रखना चाहिए था। जबकि सुल्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया इसलिये सुल्तान को उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता।

(4.) राजधानी का परिवर्तन

सुल्तान की चौथी योजना राजधानी का स्थान परिवर्तन करने की थी। उसने दिल्ली के स्थान पर दक्षिण भारत में स्थित देवगिरि को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया और उसका नाम दौलताबाद रखा।

राजधानी परिवर्तन के कारण: सुल्तान द्वारा राजधानी परिवर्तन का निर्णय लेने के पीछे कई कारण बताये जाते हैं-

(1.) दिल्ली मुहम्मद बिन तुगलक की सल्तनत के उत्तरी भाग में स्थित थी जबकि  देवगिरि साम्राज्य के केन्द्र में स्थित थी जहाँ से साम्राज्य के विभिन्न भागों पर यथोचित नियन्त्रण रखा जा सकता था।

(2.) यद्यपि दक्षिण भारत को दिल्ली के सुल्तानों ने विजय कर लिया था परन्तु वहाँ पर उनकी सत्ता स्थायी रूप से नहीं रह पाती थी। इसलिये मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण में अपनी राजधानी बनाकर वहाँ भी अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना सकता था।

(3.) याहया का कहना है कि दोआब में कर-वृद्धि तथा अकाल के कारण दिल्ली में बड़ा असन्तोष तथा अशान्ति फैल गई। इसलिये यहाँ की हिन्दू जनता को दण्ड देने के लिए सुल्तान ने समस्त दिल्ली वासियों को देवगिरि जाने की आज्ञा दी।

(4.) इब्नबतूता के अनुसार कुछ लोग सुल्तान की नीति से असन्तुष्ट थे। ये लोग पत्रों में गालियाँ लिख कर और उन्हें तीरों में बाँध कर रात्रि के समय सुल्तान के महल में फेंका करते थे। चंूकि तीर फेंकने वालों का पता लगाना कठिन था इसलिये सम्पूर्ण दिल्ली निवासियों को उन्मूलित करने के लिए सुल्तान ने राजधानी के परिवर्तन करने की योजना बनाई।

(5.) बरनी के अनुसार सुल्तान ने मध्यम श्रेणी तथा उच्च-वर्ग के लोगों का विनाश करने के लिए राजधानी परिवर्तन की योजना तैयार की थी।

(6.) कुछ विद्वानों की धारणा है कि मंगोल आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित रखने के लिए सुल्तान ने देवगिरि को राजधानी बनाने की योजना बनाई।

विभिन्न इतिहासकारों द्वारा बताये गये उपरोक्त कारणों में से याहया, इब्नबतूता तथा बरनी द्वारा बताये गये मत निराधार हैं। मंगोलों के आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित बनाने के लिये उसे दूर ले जाने का तर्क भी अमान्य है क्योंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए ही अलाउद्दीन खिलजी तथा बलबन अपनी सीमा की सुरक्षा तथा समुचित व्यवस्था करने में सफल सिद्ध हुए थे। अतः निश्चित रूप से केवल इतना ही कहा जा सकता है कि शासन की सुविधा तथा दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ़ करने के लिए सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन की योजना बनाई थी।

राजधानी परिवर्तन का स्वरूप: इतिहासकारों का अनुमान है कि साम्राज्य की सुव्यवस्था के लिए सुल्तान ने दो राजधानियाँ रखने का निश्चय किया। उत्तरी साम्राज्य की राजधानी दिल्ली और दक्षिण की देवगिरि होनी थी। देवगिरि के महत्व को बढ़ाने के लिए सुल्तान ने राजवंश के लोगों, बड़े-बड़े अमीरों, विद्वानों, सन्त महात्माओं आदि को वहाँ पर बसाने का निश्चय किया।

इन लोगों के बसने पर ही देवगिरि मुस्लिम सभ्यता के प्रसार का केन्द्र बन सकती थी। दक्षिण में मुस्लिम जनसंख्या के बढ़ जाने पर ही दक्षिण पर पूर्ण सत्ता स्थापित रह सकती थी। अतः सुल्तान ने अपनी माता मखदूम-जहाँ को देवगिरि भेज दिया। उसके साथ दरबार के अमीरों, विद्वानों, घोड़ों, हाथियों, राजकीय भण्डारों आदि को भी भेजा।

इन लोगों की सुविधा के लिए सुल्तान ने अनेक प्रकार का प्रबन्ध किया। दिल्ली से दौलताबाद जाने वाली सड़क की मरम्मत कराई गई और उसके किनारे आवश्यक वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था की गई। लोगों के लिए सवारियों का भी प्रबन्ध किया गया। यात्रियों को कई प्रकार की सुविधायें दी गईं। दौलताबाद में भव्य भवनों का निर्माण कराया गया और समस्त प्रकार की सुविधाओं को देने का प्रयत्न किया गया।

राजधानी परिवर्तन के परिणाम

राजधानी परिवर्तन के निम्नलिखित परिणाम निकले-

(1.) जो लोग दिल्ली से दौलताबाद गये थे, वे इस परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं थे। उन्हें दिल्ली की स्मृतियाँ सम्भवतः वेदना पहुँचाया करती थीं। उन्हें यह स्थानान्तरण दण्ड के समान प्रतीत हुआ। इसलिये वे सुल्तान की निंदा करने लगे।

(2.) जब सुल्तान को लोगों के असन्तोष की जानकारी हुई तब उसने असन्तुष्ट लोगों को फिर दिल्ली लौटने की आज्ञा दे दी। बरनी के अनुसार दौलताबाद जाने वाले लोगों में से बहुत कम लोग वापस दिल्ली जीवित लौट सके।

(3.) इस योजना को कार्यान्वित करने में सुल्तान को बड़ा धन व्यय करना पड़ा। जिससे राजकोष को धक्का पहुँचा।

(4.) प्रजा में बड़ा असन्तोष फैला जिससे सुल्तान की लोकप्रियता को बहुत बड़ा धक्का लगा और उसे अपना पुराना गौरव नहीं मिल सका।

(5.) दिल्ली से दौलताबाद जाने तथा वापस दिल्ली आने में अनेक लोगों को अपने प्राण खो देने पड़े तथा सहस्रों परिवारों की समृद्धि समाप्त हो गई।

(6.) दक्षिण भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सुल्तान को बड़ी सुविधा हुई।

(7.) देवगिरि की गौरव-गरिमा में वृद्धि हो गई।

(8.) यद्यपि दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग तथा वहाँ के राजकोष के परिपूर्ण हो जाने से आरम्भ में दक्षिण के विद्रोहियों का दमन करने में बड़ी सुविधा हुई परन्तु अन्त में जब दक्षिण में विद्रोहों का विस्फोट हुआ तब दुर्ग तथा कोष का यही बल साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ क्योंकि इसका प्रयोग सुल्तान के विरुद्ध होने लगा।

राजधानी परिवर्तन के निर्णय की समीक्षा

मुहम्मद बिन तुगलक की इस योजना की विद्वानोें ने तीव्र आलोचना की है और सुल्तान को क्रूर, अदूरदर्शी तथा प्रजापीड़क बताया है। कुछ इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहा है परन्तु वास्तव में राजधानी का परिवर्तन कोई पागलपन भरी योजना नहीं थी। इसके पहले भी हिन्दू राजाओं ने अपनी राजधानियों का परिवर्तन किया था।

आधुनिक काल में भी राजधानियों का परिवर्तन होता रहता है। सुल्तान की यह आलोचना तर्क तथा उपयोगिता पर आधारित थी। फिर भी वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। इसका कारण यह था कि आयोजना के कार्यान्वित करने का ढंग ठीक नहीं था। उसे यह कार्य धीरे-धीरे करना चाहिए था। पहले केवल सरकारी कार्यालयों तथा सरकारी कर्मचारियों को ले जाना चाहिए था। फिर कुछ समय के प्रयोग तथा अभ्यास के उपरान्त अन्य लोगों को वहाँ भेजा जाना चाहिये था।

(5.) मंगोलों को धन देने की योजना

दोआब में कर बढ़ा देने तथा राजधानी के परिवर्तन से जो गड़बड़ी पैदा हो गई थी, उससे प्रोत्साहित होकर मंगोलों ने 1328 ई. में तरमाशिरीन के नेतृत्व मंें भारत पर आक्रमण कर दिया। मंगोल सिंध नदी को पार करके दिल्ली के निकट आ गये। मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें बहुत-सा धन देकर उनसे अपना पीछा छुड़ाया।

मंगोलों को धन देने की नीति की समीक्षा

मुहम्मद तुगलक की मंगोलों को धन देने की नीति की तीव्र आलोचना की गई है। इससे मंगोलों को सुल्तान की दुर्बलता का पता लग गया और उनका भारत पर आक्रमण करने का प्रलोभन बढ़ गया परन्तु वास्तविकता यह है कि सुल्तान उन दिनों ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि मंगोलों का सामना कर सके।

सुल्तान के पास सल्तनत को नष्ट-भ्रष्ट होने तथा पराजय से बचाने का कोई दूसरा उपाय ही न था। मुहम्मद बिन तुगलक से धन स्वीकार करने के बाद तरमाशिरीन ने दिल्ली के सुल्तान के साथ सदैव मैत्री-भाव रखा। यदि कायरता अथवा दुर्बलता के कारण सुल्तान ने धन दिया होता तो तरमाशिरीन उससे मैत्री-भाव रखने के स्थान पर उस पर पुनः आक्रमण करता।

(6.) संकेत मुद्रा चलाने की योजना

मुहम्मद बिन तुगलक ने मुद्रा प्रबन्ध को सुधारने के लिये अनेक योजनाएँ बनाईं। उसने भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ ढलवाईं जो कला की दृष्टि से बड़ी सुन्दर थीं। उसने दीनार नामक स्वर्ण मुद्रा चलाई तथा अदली नामक रजत-मुद्रा का पुनरुद्धार किया।

मुद्रा सुधार के सम्बन्ध में सुल्तान की सबसे बड़ी योजना संकेत मुद्रा चलाने की थी। यह योजना राजधानी परिवर्तन के विफल हो जाने के उपरान्त लागू की गई थी। सुल्तान ने सोने-चांदी की मुद्राओं के स्थान पर ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं।

संकेत मुद्रा चलाने के कई कारण थे-

(1.) संकेत-मुद्रा चलाने का प्रथम कारण राज्य में चाँदी का अभाव होना बताया जाता है। उन दिनों न केवल भारतवर्ष में, अपितु सम्पूर्ण विश्व में चाँदी की कमी अनुभव की जा रही थी।

(2.) चाँदी की मुद्रा के अभाव के कारण लोगों को व्यापार तथा लेन-देन में बड़ी असुविधा हो रही थी। इस असुविधा को दूर करने के लिए ही मुहम्मद तुगलक ने ताँबे की मुद्रा चलाने की योजना बनाई थी।

(3.) मुहम्मद तुगलक को नई योजनाएँ बनाने का व्यसन था। वह सदैव नई-नई योजनाओं की कल्पना किया करता था।

(3.) मुहम्मद तुगलक सांकेतिक मुद्रा चलाकर ख्याति प्राप्त करना चाहता था। वह अपने नवीन कृत्यों द्वारा अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देना चाहता था तथा वह इतिहास में अपना नाम अमर बनाना चाहता था।

(4.) मुहम्मद तुगलक ने अपने रिक्त कोष को भरने के लिये यह योजना बनाई। विद्रोहों को दबाने, अकाल-पीड़ितों की सहायता करने, नई योजनाओं को कार्यान्वित करने, नवीन भवनों का निर्माण कराने तथा मुक्त-हस्त से पुरस्कार देने से राजकोष रिक्त हो गया था और सुल्तान बड़े आर्थिक संकट में पड़ गया था। इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए ही सुल्तान ने संकेत मुद्रा के चलाने की योजना बनाई।

(5.) मुहम्मद तुगलक अस्थिर विचारों का व्यक्ति था। जब उसने देखा कि चीन, फारस आदि देशों में संकेत मुद्रा का प्रचलन है, तब उसने भी अपने राज्य में संकेत मुद्रा चलाने की आज्ञा दी।

(6.) मुहम्मद तुगलक विश्व-विजय की कामना से प्रेरित था और इस ध्येय की पूर्ति के लिये उसे एक विशाल सेना की आवश्यकता थी जिसके व्यय के लिए धन आवश्यक था। अतः सुल्तान ने संकेत मुद्रा की योजना बनाई।

योजना का क्रियात्मक स्वरूप तथा परिणाम: प्रारम्भ में लोगों को संकेत मुद्रा से बड़ी सुविधा हुई परन्तु बाद में लोगों को आशंका हुई कि सरकार ने चाँदी की मुद्राओं का अपहरण करने के लिये यह योजना चलाई है। सरकार जनता से चाँदी की मुद्राएँ लेकर अपने राजकोष में भर लेगी और इनके स्थान पर ताँबे की मुद्राएँ प्रयुक्त होंगी।

इस आशंका का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने चाँदी तथा सोने की मुद्राओं को छिपा दिया तथा केवल ताँबे की मुद्राओं को व्यवहार में लाने लगे। स्वर्णकारों ने अपने घरों में टकसालें बना लीं और ताँबे की मुद्राएं ढालने लगे। बरनी के अनुसार प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि ताम्बे की मुद्राओं में अत्यन्त दु्रतगति से वृद्धि होने लगी। लोगों की ऐसी मनोवृत्ति हो गई कि देने के समय वे ताँबे की मुद्रा देना चाहते थे और लेने के समय चाँदी अथवा सोेने की मुद्राओं को प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे।

इस मनोवृत्ति का व्यापार पर बुरा प्रभाव पड़ा। व्यापारियों ने तांबे की मुद्राओं के बदले सामान देना बन्द कर दिया। ऐसी स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो गया। फलतः सुल्तान ने यह आदेश निकाल दिया कि संकेत मुद्रा का प्रयोग बन्द कर दिया जाय और जिसके पास ताँबें की मुद्राएँ हो, उनके बदले में वे सोने-चाँदी की मुद्राएँ ले लें।

इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि सरकारी खजाने में ताँबे की मुद्राओं के ढेर लग गये तथा राजकोष सोने-चांदी से रिक्त हो गया।

संकेत-मुद्रा योजना की समीक्षा

इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा चलाई गई संकेत मुद्रा की तीव्र आलोचना की है और उस पर पागल होने का आरोप लगाया है परन्तु वास्तव में यह योजना मुहम्मद तुगलक के पागलपन की नहीं, वरन् उसकी बुद्धिमता की परिचायक है। चीन तथा फारस में पहले से ही संकेत मुद्रा चल रही थी।

आधुनिक काल में भी पूरे विश्व में संकेत मुद्रा का प्रचलन है। चौदहवीं शताब्दी में संकेत मुद्रा का असफल हो जाना अवश्यम्भावी था क्योंकि साधारण जनता के लिए चांदी और ताँबे में बहुत अंतर था। वह संकेत मुद्रा विनिमय के महत्व को नहीं समझ सकी।

यह योजना इसलिये भी असफल हो गई क्योंकि सरकार ने सुनारों को ताम्बे की मुद्रा ढालने से नहीं रोका। सुल्तान को चाहिए था कि वह टकसाल पर राज्य का एकाधिकार रखता और ऐसी व्यवस्था करता जिससे लोग अपने घरों में संकेत मुद्रा को नहीं ढाल पाते। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुल्तान की योजना गलत नहीं थी अपितु उसके कार्यान्वयन का ढंग गलत था।

(7.) खुरासान विजय की योजना

मुहम्मद बिन तुगलक ने न केवल शासन सम्बन्धी, वरन् युद्ध अभियान सम्बन्धी भी अनेक योजनाएँ बनाईं। उसकी सर्वप्रथम योजना खुरासान पर विजय प्राप्त करने की थी।

योजना के कारण: इस योजना का सबसे बड़ा कारण मुहम्मद बिन तुगलक की महत्वाकांक्षा थी। भारत में सुल्तान ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। अपने शासन के प्रथम तीन वर्षों में उसने अपनी सत्ता तथा धाक उत्तर तथा दक्षिण में स्थित प्रान्तों में जमा ली थी। अब वह विदेश विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाने का दूसरा कारण खुरासान की तत्कालीन स्थिति थी। सुल्तान के दरबार में उन दिनों बहुत से खुरासानी अमीर थे जिन्होंने सुल्तान को खुरासान की शोचनीय दशा के बारे में जानकारी देकर खुरासान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इन दिनों फारस में अबू सईद शासन कर रहा था।

वह अल्पवयस्क तथा दुराचारी था। अमीर लोग उससे असन्तुष्ट होकर षड्यन्त्र रच रहे थे। उसका संरक्षक अमीर चौगन राज्य को छीनने का प्रयास कर रहा था। अबू सईद ने चौगन की हत्या करवा दी। इससे फारस में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और चौगन के पुत्र अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का अवसर ढूँढने लगे। खुरासान के विभिन्न प्रान्तों में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। इन परिस्थितियों में सुल्तान के लिए खुरासान पर विजय की योजना बनाना अस्वाभाविक नहीं था।

योजना का क्रियात्मक स्वरूप: मुहमद बिन तुगलक ने अपनी इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए एक विशाल सेेना तैयार की। इन सैनिकों को एक वर्ष का वेतन पहले से ही दे दिया परन्तु परिस्थितियाँ बदल जाने से सुल्तान को खुरासान योजना त्याग देनी पड़ी।योजना को त्यागने का पहला कारण यह था कि मिस्र के राजा ने खुरासान के सुल्तान अबू सईद से मैत्री कर ली और मुहमद बिन तुगलक की सहायता करने से इन्कार कर दिया।

दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों चगताई अमीरों ने विद्रोह करके तरमाशिरीन को तख्त से उतार दिया जिससे अबू सईद को अपने राज्य की पूर्वी सीमा की ओर आक्रमण की आंशका नहीं रह गई। तीसरा कारण यह था कि ऐसे दूरस्थ प्रदेश में हिन्दूकुश पर्वत के उस पार सेना तथा रसद भेजना और अपने सहधर्मियों से युद्ध करके विजय प्राप्त करना सरल कार्य नहीं था।

खुरासान योजना की समीक्षा

इतिहासकारों द्वारा मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की तीव्र आलोचना की गई है। आलोचकों का कहना है कि मार्ग की कठिनाइयों को ध्यान में नहीं रखते हुए ऐसे सुदूरस्थ देश की विजय की योजना बनाना पागलपन था परन्तु मुहमद बिन तुगलक के समर्थकों का कहना है कि यदि फारस से भारत पर आक्रमण करना सम्भव है, तब भारत से फारस पर आक्रमण करना क्यों सम्भव नहीं है।

आलोचकों के अनुसार दोआब के अकाल, राजधानी के परिवर्तन तथा संकेत मुद्रा की योजना विफल हो जाने से राज्य भयानक आर्थिक संकट में था, तब इस प्रकार की योजना बनाना मूर्खता ही थी परन्तु ऐसी कामनाएँ, अलाउद्दीन खिलजी भी कर चुका था। वास्तव में सुल्तान की योजना तर्कहीन नहीं थी। सम्भवतः परिस्थितियों के कारण ही सुल्तान ने इस योजना को त्याग दिया था।

(8.) नगरकोट पर आक्रमण की योजना

1337 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक ने नगरकोट पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, जो हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है। नगरकोट का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था और अभेद्य समझा जाता था। सुल्तान ने एक लाख सैनिकों के साथ किले पर आक्रमण कर दिया और उस पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु सुल्तान ने फिर से वह किला वहाँ के राय को लौटा दिया और दिल्ली चला आया।

(9) कराजल विजय की योजना

फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन तथा हिमाचल पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई। हिमाचल विजय की योजना चीन अभियान को सरल बनाने के लिए की गई थी। बरनी का कहना है कि सुल्तान ने कराजल के पर्वतीय प्रदेश पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई जो चीन तथा हिन्द के मार्ग में स्थित है।

कराजल विजय की योजना के कारण

बरनी का कहना कि मुहमद बिन तुगलक ने कराजल योजना को इस उद्देश्य से बनाया था जिससे वह खुरासान पर सरलता से विजय प्राप्त कर सके परन्तु चंूकि कराजल खुरासान के मार्ग में नहीं पड़ता, अतः बरनी का मत अमान्य है। हजीउद्दबीर का कहना है चूंकि कराजल की स्त्रियाँ अपने रूप तथा अन्य गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, इसलिये मुहमद बिन तुगलक उनसे विवाह करके उन्हें अपने रनिवास में लाना चाहता था। इसी ध्येय से उसने कराजल पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी। हजीउद्दीबीर का मत भी अमान्य है क्योंकि मुहमद बिन तुगलक का आचरण बड़ा पवित्र था। अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि मुहमद बिन तुगलक ने हिमाचल प्रदेश के कुछ विद्रोही सरदारों को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए यह योजना बनाई थी। फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन के धन को लूटने के लिए यह योजना बनाई थी। यह मत भी इतिहासकारों द्वारा अमान्य कर दिया गया है। अनुमान होता है कि मुहमद बिन तुगलक ने तराई के प्रदेश के किसी सरदार को दबाने के लिये ही हिमाचल पर आक्रमण किया था।

योजना के परिणाम

हिमाचल अभियान के आरम्भ में मुहमद बिन तुगलक की सेना को अच्छी सफलता मिली परन्तु जब वर्षा ऋतु आरम्भ हुई तब उसका पतन आरम्भ हो गया। वर्षा के कारण रसद का पहुँचना कठिन हो गया। इस भयानक परिस्थिति में शत्रु ने मुहमद बिन तुगलक की सेना पर आक्रमण कर दिया और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कहा जाता है कि केवल दस सैनिक इस दुःखद घटना को सुनाने के लिए लौट सके। इतनी क्षति होने पर भी मुहमद बिन तुगलक को अपने ध्येय में सफलता प्राप्त हो गई। चूंकि उस पहाड़ी सरदार के लिए पहाड़ के निचले प्रदेश में सुल्तान से विरोध करके बने रहना संभव नहीं था इसलिये उसने मुहमद बिन तुगलक की अधीनता स्वीकार कर ली।

कराजल योजना की आलोचना

कुछ इतिहासकारों ने मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की भी बड़ी आलोचना की है और उसे पागल कहा है परन्तु इसमें पागलपन की कोई बात नहीं थी। ऐसे पर्वतीय प्रदेश में धन तथा जन की क्षति होना स्वाभाविक था। अंग्रेजों को भी नेपाल विजय करने में बड़ी क्षति उठानी पड़ी थी।

मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध विद्रोहों का काल

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम 16 वर्ष आपत्ति भरे थे। इस अवधि में सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह उठ खड़े हुए। ये विद्रोह अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में विस्तृत थे। यदि एक विद्रोह उत्तर में होता तो दूसरा दक्षिण में और यदि एक विद्रोह पश्चिम में होता तो दूसरा सुदूर पूर्व में। इससे सेना के संचालन में बड़ी कठिनाई होती थी। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चौंतीस विद्रोह हुए जिनमें से 27 विद्रोह दक्षिण भारत में हुए थे। इन विद्रोहों के फलस्वरूप सल्तनत बिखरने लगी और कई स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी।

(1.) वहाबुद्दीन गुर्शस्प का विद्रोह

पहला विद्रोह 1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई वहाबुद्दीन गुर्शस्प ने किया जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। शाही सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। मुहम्मद बिन तुगलक ने गुर्शस्प की खाल में भूसा भरवाकर उसे भारत के कई शहरों में प्रदर्शित करवाया और उसके शरीर के मांस को चावल के साथ पकाकर उसकी बीवी-बच्चों के पास खाने के लिये भेजा।

(2.) किश्लू खाँ का विद्रोह

दूसरा विद्रोह ई.1328 में मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा उर्फ किश्लू खाँ ने किया। स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक ने इस विद्रोह का दमन किया। बहराम आईबा का वध कर दिया गया।

(3.) हुलाजू का विद्रोह

लाहौर का सूबेदार अमीर हुलाजू एक शक्तिशाली अमीर था। उसने भी मुहमद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह किया तथा शाही सेना द्वारा मारा गया।

(4.) जलालुद्दीन का विद्रोह

तीसरा विद्रोह 1335 ई. में मदुरा के गवर्नर जलालुद्दीन एहसान शाह ने किया। इस समय दोआब में अकाल था और प्रजा में असन्तोष फैला हुआ था। इससे लाभ उठाकर जलालुद्दीन ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ को इस विद्रोह का दमन करने के लिये भेजा परन्तु वह धार से वापस लौट आया।

अब मुहमद बिन तुगलक ने स्वयं दक्षिण के लिये प्रस्थान किया। जब सुल्तान तेलंगाना पहुँचा, तब वहाँ बड़े जोरों का हैजा फैल गया और मुहमद बिन तुगलक के बहुत से सैनिक मर गये। फलतः सुल्तान ने दिल्ली लौटने का निश्चय किया और एहसान शाह स्वतन्त्र हो गया।

(5.) मलिक हुशंग का विद्रोह

एहसान शाह के विद्रोह का प्रभाव साम्राज्य के अन्य भागों पर भी पड़ा। उत्तर तथा दक्षिण भारत में यह खबर फैल गई कि सुल्तान की मृत्यु हो गई है। फलतः 1335 ई. में दौलताबाद के सूबेदार मलिक हुशंग ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान की उस पर विशेष कृपा रहती थी परन्तु वह बड़ा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। अतः अवसर पाकर उसने विद्रोह कर दिया। अन्त में उसे भाग कर हिन्दू सरदारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी। मुहमद बिन तुगलक ने उसे क्षमा कर दिया।

(6) सैयद इब्राहीम का विद्रोह

मुहमद बिन तुगलक की मृत्यु की सूचना पाकर उत्तर में एहसान शाह के पुत्र सैयद इब्राहिम ने भी विद्रोह कर दिया। इब्राहिम, सुल्तान का बड़ा विश्वासपात्र था। अन्त में उसने आत्म समर्पण कर दिया। फिर भी उसकी हत्या करवा दी गई।

(7.) बहराम खाँ का विद्रोह

इन दिनों पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने 1337 ई. में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली साम्राज्य की दशा को देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। मुहमद बिन तुगलक की असमर्थता के कारण बंगाल स्वतंत्र हो गया।

(8.) निजाम भाई का विद्रोह

बंगाल के विद्रोह की सफलता देखकर कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने भी विद्रोह कर दिया। 1338 ई. में उसकी जीवित खाल खिंचवा ली गई।

(9.) अलीशाह का विद्रोह

अलीशाह दिल्ली सल्तनत का एक उच्च अधिकारी था। उसे मुहमद बिन तुगलक ने दक्षिण में मालगुजारी वसूल करने के लिए गुलबर्गा भेजा परन्तु उसने गुलबर्गा के हाकिम की हत्या करके शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बीदर पर भी अधिकार कर लिया। कुतलुग खाँ ने उसे परास्त करके बन्दी बना लिया। कुछ दिनों बाद उसका वध कर दिया गया।

(10.) आईन-उल-मुल्क का विद्रोह

आइन-उल-मुल्क अवध तथा जफराबाद का गवर्नर था। उसने दिल्ली सल्तनत की बड़ी सेवाएँ की थी। एक बार मुहमद बिन तुगलक दक्षिण के गवर्नर कुतलुग खाँ ख्वाजा के काम से असन्तुष्ट हो गया। इसलिये उसने ख्वाजा को वापस बुला लिया और उसके स्थान पर आइन-उल-मुल्क को नियुक्त कर दिया तथा उसे अपने बाल-बच्चों के साथ दक्षिण जाने की आज्ञा दी।

यद्यपि आइन-उल-मुल्क के लिये यह बड़े गौरव की बात थी परन्तु उसे लगा कि सुल्तान ने उसे अवध से हटाने के लिए ऐसा किया है। इसलिये उसने विद्रोह कर दिया। उसका विद्रोह सबसे भयानक था। फिर भी शाही सेना ने उसे परास्त करके बंदी बना लिया। जब वह सुल्तान के सामने लाया गया तो सुल्तान ने उसकी सेवाओं तथा उसकी विद्वता को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।

(11.) शाहू अफगान का विद्रोह

मुहमद बिन तुगलक को विपत्ति में देखकर शाहू अफगान लोदी ने मुल्तान के सूबेदार को कैद करके स्वयं को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की सूचना पाते ही मुहमद बिन तुगलक ने दिल्ली से मुल्तान के लिये प्रस्थान किया। इसकी सूचना पाते ही शाहू अफगान मुल्तान छोड़कर पहाड़ों में भाग गया और सुल्तान के पास एक प्रार्थना पत्र भेज कर क्षमादान की याचना की। फलतः मुहमद बिन तुगलक दिपालपुर से ही दिल्ली लौट आया।

(12.) विजय नगर की स्थापना (1336 ई.)

सल्तनत में स्थान-स्थान पर हो रहे विद्रोहों को देखकर हिन्दू राजाओं ने भी स्वतन्त्र होने का प्रयास किया। 1336 ई. में हरिहर तथा बुक्का ने विजय नगर राज्य की स्थापना की। हरिहर तथा बुक्का, राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) के सम्बन्धी थे और दिल्ली में बन्दी बना कर रखे गये थे।

1335 ई. में तेलंगाना के हिन्दुओं ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस गम्भीर स्थिति में सुल्तान ने हरिहर तथा बुक्का की सहायता से वहाँ पर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया। उसने हरिहर को उस क्षेत्र का शासक और बुक्का को उसका मन्त्री बनाकर भेज दिया। वहाँ पहुँचने पर धीरे-धीरे हरिहर ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और विजय नगर के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना कर ली।

(13.) कृष्ण नायक का स्वतन्त्रता संग्राम

कृष्ण नायक काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) का पुत्र था। दक्षिण के विद्रोहों से उसे बड़ा प्रोत्साहन मिला। 1343 ई. में उसने मुसलमानों के विरुद्ध एक संघ बनाया। ये लोग वारंगल, द्वारसमुद्र तथा कोरोमण्ड तट के समस्त प्रदेश को दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र करने में सफल हुए। दक्षिण में केवल देवगिरि तथा गुजरात, दिल्ली सल्तनत के अधिकार में रह गये।

(14.) सुनम तथा समाना के जाटों और भट्टियों का विद्रोह

सुनम तथा समाना के जाटों तथा भट्टी राजपूतोंएवं पहाड़ी सामंतों ने विद्रोह किये। मुहमद बिन तुगलक ने इन विद्रोहों में कड़ा रुख अपनाया तथा विद्रोहियों के नेताओं को पकड़ कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया।

(15.) शताधिकारियों के विद्रोह

शताधिकारी विदेशी अमीरों को कहते थे। ये लोग प्रायः एक शत सैनिकों के नायक हुआ करते थे और प्रायः एक शत गाँवों में शान्ति रखने तथा कर वसूलने का उत्तरदायित्व निभाते थे। सुल्तान के प्रति इनकी कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी और वेे सदैव अपनी स्वार्थ सिद्धि में संलग्न रहते थे।

जब मुहमद बिन तुगलक ने उन्हें अनुशासित बनाने का प्रयत्न किया, तब उन लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने, मुहमद बिन तुगलक को स्वयं दक्षिण जाना पड़ा। उसने विद्रोहियों को परास्त कर उन्हें तितर-बितर कर दिया। हसन नाम का एक अमीर कुछ विद्रोहियों के साथ गुलबर्गा भाग गया और उसने वहाँ पर 1347 ई. में बहमनी राज्य की नींव डाली।

इस समय मुहमद बिन तुगलक को गुजरात में तगी के विद्रोह की सूचना मिली। सुल्तान ने गुजरात के लिए प्रस्थान किया। तगी सिन्ध की ओर भाग गया। मुहम्मद बिन तुगलक उसका पीछा करते हुए थट्टा पहुँचा।  20 मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई। बदायूनी ने लिखा है- ‘सुल्तान को उसकी प्रजा से तथा प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।’

–डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मुहम्मद तुगलक का शासन एवं विफलताएँ

इतिहासकार मुहम्मद तुगलक का शासन सही नहीं मानते! वह अपने समय के अनुसार नहीं अपितु समय से आगे शासन कर रहा था। इस कारण उसका शासन विफलताओं के लिए याद किया जाता है।

मुहम्मद बिन तुगलक योग्य तथा प्रतिभावान् व्यक्ति था। उसने शासन में कई सुधार किये तथा कई नई व्यवस्थाएँ कीं।

मुहम्मद तुगलक का शासन

(1.) स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश शासन

मुहम्मद बिन तुगलक का शासन स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। सुल्तान शासन का प्रधान तथा समस्त अधिकारों का स्रोत था। यद्यपि सुल्तान की शक्ति अनियन्त्रित थी परन्तु महत्वपूर्ण विषयों में उसे परामर्श देने के लिए एक परिषद् बनाई गई थी। परिषद् के अतिरिक्त कुछ उच्च पदाधिकारी एवं अमीर भी सुल्तान को परामर्श देते थे। सुल्तान प्रायः उनके परामर्श को नहीं मानता था।

(2.) विदेशी अमीरों की नियुक्ति

जब मुहम्मद बिन तुगलक को देशी अमीरों की अयोग्यता का पता लग गया, तब उसने विदेशी अमीरों को उच्च पद देना आरम्भ किया। यह साम्राज्य के लिए हितकर सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि वे सच्चे राजभक्त सिद्ध नहीं हुए और अवसर पाकर विद्रोह करने लगे। विदेशी तथा देशी अमीरों में संघर्ष उत्पन्न हो गया।

(3.) योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सम्पूर्ण राज्य को प्रान्तों में विभक्त किया तथा प्रत्येक प्रान्त के शासन के लिए एक ‘नायब वजीर’ नियुक्त किया जो सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था। सुल्तान की सहायता के लिए एक नायब होता था जो सुल्तान की अनुपस्थिति में उसके कार्यों को करता था।

सुल्तान का एक वजीर, अर्थात् प्रधानमन्त्री भी होता था जिसकी सहायता के लिए चार शिकदार होते थे। वजीर के चार दबीर, अर्थात सेक्रेटरी होते थे। प्रत्येक दबीर के नीचे तीन सौ लिपिक होते थे। राज्य में कोई भी पद आनुवंशिक नहीं था। कर्मचारियों की नियुक्त योग्यता के आधार पर की जाती थी।

(4.) उलेमाओं के वर्चस्व की समाप्ति

दिल्ली सल्तनत इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित थी। इस कारण शासन में उलेमाओं का बोलबाला था। बलबन तथा अलाउद्दीन खिलजी की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने भी राजनीति को धर्म से अलग रखने की नीति का अनुसरण किया। वह उलेमाओं से बहुत कम परामर्श लेता था। और उनके परामर्श के अनुसार काम नहीं करता था।

वह दोषी उलेमाओं को दण्ड देने में लेशमात्र संकोच नहीं करता था। उसने उन्हें न्याय करने के अधिकार से वंचित कर दिया जिसे वे अपना एकाधिकार समझते थे। इस कारण उलेमाओं का वर्चस्व समाप्त हो गया और वे सुल्तान से नाराज हो गये। सुल्तान ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। उसके शासन काल में हिन्दुओं को अनावश्यक रूप से दण्डित नहीं किया गया।

(5.) कठोर दण्ड विधान पर आधारित न्याय व्यवस्था

मुहम्मद बिन तुगलक न्यायप्रिय शासक था किंतु उसका दण्ड विधान बहुत कठोर था। न्याय का कार्य प्रायः काजी करते थे जिसकी सहायता के लिए मुफ्ती हुआ करते थे। न्याय विभाग का प्रधान ‘सद्र-जहान काजी उल-कुजात’ कहलाता था। उसके नीचे बहुत से काजी तथा नायब काजी होते थे। न्याय की दृष्टि में छोटे-बड़े सब समान थे। दोषियांे एवं अपराधियों को प्रायः मृत्यु दण्ड तथा अंग भंग करने का दण्ड दिया जाता था। छोटी अदालतों की अपील सुल्तान स्वयं सुनता था।

(6.) सेना पर आधारित शासन

मुहम्मद बिन तुगलक को विशाल सल्तनत संभालने के लिये विशाल सेना की व्यवस्था करनी पड़ी थी। उसकी सेना में तुर्क, फारसी तथा भारतीय समस्त प्रकार के सैनिक थे। विदेशियों को भी सेना में उच्च पद दिये गये थे। सेना के सबसे बड़े अफसर खान कहलाते थे। खान के नीचे मलिक, मलिक के नीचे अमीर, अमीर के नीचे सिपहसालार और सिपहसालार के नीचे जुन्द होते थे। सैनिकों को नकद वेतन मिलता था। उन्हें भोजन, वस्त्र तथा घोड़ों का चारा भी मिलता था। विद्रोहों को दबाने के लिये सेना हर समय सक्रिय रहती थी।

(7.) पुलिस तथा जेल

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपराधों की रोकथाम के लिये पुलिस तथा जेल का अच्छा प्रबन्ध किया। पुलिस विभाग का प्रधान पदाधिकारी कोतवाल था। वह शान्ति तथा व्यवस्था के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी होता था। सुल्तान ने गुप्तचर विभाग की भी व्यवस्था की थी। जेलों की संख्या कम थी क्योंकि प्रायः मृत्यु दण्ड तथा अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। किले ही जेल का काम करते थे।

(8.) लगान वसूली की व्यवस्था

मुहम्मद बिन तुगलक ने लगान अथवा मालगुजारी वसूल करने का भी सुदृढ़ प्रबन्ध किया था। सारी भूमि शिकों में विभक्त कर दी गई थी। प्रत्येक शिक में एक शिकदार नियुक्त किया गया था जो मालगुजारी वसूल करता था। दोआब की भूमि एक सहस्र गाँवों में विभक्त थी जो हजारह कहलाती थी। कभी-कभी भूमि ठेकेदारों को दी जाती थी।

(9.) अकाल राहत की व्यवस्था

जब दो-आब में लम्बा दुर्भिक्ष पड़ा और किसानों की हालत खराब होने लगी तो मुहम्मद बिन तुगलक अपना दरबार सरगद्वारी ले गया और वहाँ पर ढाई वर्ष तक दुर्भिक्ष पीड़ितों की सहायता करता रहा। उसने किसानों को लगभग 70 लाख रुपये तकावी के रूप में बँटवाये। अकाल का प्रभाव कम करने के लिये सुल्तान ने बहुत से कुएँ खुदवाये और बेकार पड़ी भूमि को कृषि करने योग्य बनवाया। सुल्तान ने कृषि का एक अलग विभाग खोला और उसके प्रबन्धन के लिये अमीरकोह नामक अधिकारी नियुक्त किया।

(10.) डाक व्यवस्था

मुहम्मद बिन तुगलक ने डाक वितरण की अच्छी व्यवस्था करवाई। डाक घुड़सवारों तथा पैदल हरकारों द्वारा भेजी जाती थी। सरकार की ओर से सड़कों के दोनों किनारों पर वृक्ष लगवाये गये और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर डाक-चौकियाँ बनवाई गईं। प्रत्येक चौकी पर दस धावक नियुक्त किये गये जो एक स्थान से दूसरे स्थान को पत्र तथा सूचनाएँ पहुँचाते थे।

(11.) दरबार का गौरव

मुहम्मद बिन तुगलक का दरबार बड़ा शानदार था। वह विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके दरबार में बड़े-बड़े विद्वान रहते थे। विदेशों से लोग आकृष्ट होकर उसके दरबार में आते थे तथा पद और नाम पाते थे। सुल्तान दो प्रकार के दरबार करता था- दरबार ए आम तथा दरबार ए खास। इन दरबारों में सुल्तान प्रजा की शिकायतें सुनता था और राज्य की समस्याओं पर विचार करता था।

(12.) गुलामों की व्यवस्था

मुहम्मद बिन तुगलक के राज्य में गुलामों के साथ दुर्व्यवहार नहीं होता था और उनके आराम का ध्यान रखा जाता था। गुलाम स्त्री-पुरुष सुल्तान तथा अमीरों के महलों में काम करते थे। गुलाम स्त्रियाँ गुप्तचरों का भी काम करती थीं। गुलाम स्वतन्त्र भी कर दिये जाते थे और राज्य के ऊँचे-ऊँचे पदों पर भी पहुँच जाते थे।

(13.) हिन्दुओं के साथ अच्छा व्यवहार

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में हिन्दुओं के साथ उतनी ज्यादती नहीं की गई जितनी उसके पूर्ववर्ती शासकों के काल में की गई थी। केवल उन्हीं हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया गया जो सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करते थे। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जो हिन्दुओं के होली त्यौहार में शामिल होता था। उसने योग्य हिन्दुओं को शासन में उच्च पद प्रदान किये।

(14.) प्रान्तीय शासन

प्रान्त का शासक नायब सुल्तान कहलाता था। उसे सैनिक तथा प्रशासकीय दोनों कार्य करने पड़ते थे। उसे न्याय का भी कार्य करना पड़ता था। प्रान्तीय खर्च करने के बाद जो धन बचता था, वह केन्द्रीय कोष में भेज दिया जाता था। प्रान्तपति अपने प्रान्तों में स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होते थे। मुहम्मद बिन तुगलक के बहुत से प्रांतपतियों ने सुल्तान से विद्रोह करके स्वतंत्र होने का प्रयास किया।

मुहम्मद बिन तुगलक की विफलताएँ

मुहम्मद बिन तुगलक एक शासक के रूप में सर्वथा असफल ही रहा। उसने अपने पिता से एक विशाल साम्राज्य प्राप्त किया था जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत का बहुत बड़ा अंश सम्मिलित था परन्तु मुहम्मद बिन तुगलक के मरने से पहले ही उसका साम्राज्य बिखरने लगा था। जिन प्रान्तों पर उसका अधिकार था, उन प्रांतों के प्रांतपति एक-एक करके विद्रोह कर रहे थे। अपनी विजय योजनाओं में भी उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली। उसकी शासन सम्बन्धी अधिकांश योजनाओं को असफलता का आलिंगन करना पड़ा।

विफलताओं के कारण

मुहम्मद बिन तुगलक अपनी विफलता के लिए स्वयं उत्तरदायी नहीं था। उसकी परिस्थितियों तथा उसके दुर्भाग्य ने उसकी समस्त योजनाओं को विफल बनाया। उसकी विफलता के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) योग्य अधिकारियों का अभाव

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में योग्य मुसलमान अमीरों और सेनापतियों का अभाव था। यदि उसकी सेवा में योग्य अधिकारी होते तो वे उसकी महत्वाकांक्षी योजनाओं को सफल बनाने का मार्ग अवश्य ढूंढ लेते। कम से कम उसकी कुछ योजनाएं तो अवश्य ही सफल रही होतीं जो उसके राज्य को बिखरने से रोक लेतीं।

(2.) प्रकृति की प्रतिकूलता

प्रकृति भी मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध रही। उत्तर भारत में दीर्घकाल तक वर्षा के अभाव के कारण भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जिसके कारण प्रजा को असह्य यातनाएँ भोगनी पड़ीं। सुल्तान के प्रयास करने पर भी प्रजा को कष्टों से मुक्ति नहीं मिली। प्रजा कर देने में असफल हो गई, इससे राजकोष पर बहुत बुरा असर पड़ा।

(3.) प्रजा का असहयोग

मुहम्मद बिन तुगलक प्रजा के सहयोग तथा सहानुभूति से वंचित रहा। प्रजा कर देने में उपेक्षा करती थी और विद्रोह करने को उद्यत रहती थी।

(4.) विदेशियों का शासन में समावेश

सुल्तान जिसके साथ उदारता तथा सहानुभूति दिखलाता था, वही उसका शत्रु हो जाता था और विद्रोह करने को उद्यत हो जाता था। सुल्तान ने विदेशी अमीरों को अपने यहाँ शरण दी और उन्हें ऊँचे पदों पर नियुक्त किया परन्तु अवसर मिलने पर वे भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करने लगे।

(5.) कट्टरपन्थियों का असहयोग

उलेमा, मौलवी तथा शेख, मुहम्मद बिन तुगलक की उदार एवं स्वतंत्र नीतियों से बड़े असन्तुष्ट थे और उसकी हर नीति की आलोचना करके जनता में असंतोष फैलाया करते थे।

(6.) साम्राज्य की विशालता

मुहम्मद बिन तुगलक का साम्राज्य इतना विस्तृत था कि विद्रोहों का दमन करना उसके लिए असंभव सा हो गया। जब सुल्तान एक स्थान पर विद्रोह शांत करता था, तब दूसरे स्थान में विद्रोह आरम्भ हो जाता था।

(7.) प्रान्तपतियों के विद्रोह

प्रजा के असंतोष से प्रान्तपतियों ने लाभ उठाने का प्रयत्न किया और विद्रोह करके अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने लगे।

(8.) सुल्तान की योजनायें समय से आगे थीं

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएँ अपने समय से बहुत आगे थीं। उसके अधिकारियों, उलेमाओं एवं जन सामान्य में उन योजनाओं को समझने की क्षमता नहीं थी। इसलिये वे लोग उन योजनाओं को विफल बना देते थे। ऐसी दशा में सुल्तान के क्रोध की सीमा नहीं रह जाती थी और वह कठोर दण्ड देता था। इससे अधिकारियों, उलेमाओं एवं जन सामान्य में सुल्तान के प्रति और भी अधिक नाराजगी हो जाती थी।

(9.) धन का अपार व्यय

मुहम्मद बिन तुगलक को अपनी विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में अपार धन व्यय करना पड़ता था। इसलिये उसे करों में वृद्धि करनी पड़ी थी। इस कर वृद्धि से जनता में सुल्तान के विरुद्ध बड़ा असंतोष फैला।

(10.) सुल्तान की त्रुटियाँ

कुछ विद्वानों के विचार में मुहम्मद बिन तुगलक की विफलता का मुख्य उत्तरदायित्व उसकी त्रुटियों पर था। इन विद्वानों का कहना है कि मुहम्मद बिन तुगलक में सामंजस्य, व्यावहारिक बुद्धि, मानवीय चरित्र की परख, अपने सहयोगियों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने, लोगों में विश्वास उत्पन्न करने तथा धैर्यपूर्वक कार्य करने की शक्ति का सर्वथा अभाव था।

इन दुर्बलताओं के कारण ही सुल्तान को असफलता प्राप्त हुई। हो सकता है कि इन दुर्बलताओं तथा त्रुटियों के कारण ही मुहम्मद बिन तुगलक असफल रहा हो परन्तु मूलतः परिस्थितियों के कारण ही सुल्तान को विफलताओं का सामना करना पड़ा था।

–डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक

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मुहम्मद तुगलक पालक था?

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सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

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हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

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काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...