भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास-अनुक्रमणिका पृष्ठ पर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास नामक पुस्तक की अनुक्रमणिका दी गई है।
इस पुस्तक का लेखन आधुनिक काल के विख्यात इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने किया है तथा इसकी पाठ्य-सामग्री का संयोजन उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में इतिहास विषय के स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के सैलेबस के अनुसार किया गया है। इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस पुस्तक के अब तक कई संस्करण एवं पुनर्मुद्रण प्रकाशित हो चुके हैं।
सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ अध्याय में सभ्यता एवं संस्कृति के अंतर को समझाया गया है। हालांकि सभ्यता एवं संस्कृति एक दूसरे के पर्याय हैं किंतु इनमें बारीक भेद मौजूद हैं।
अगर इस धरती पर कोई जगह है जहाँ सभ्यता के आरम्भिक दिनों से ही मनुष्यों के सारे सपने आश्रय पाते रहे हैं, तो वह हिन्दुस्तान है।– रोम्या रोलां।
‘सभ्यता’ का शाब्दिक अर्थ ‘सभा में बैठने की योग्यता’ से होता है- ‘सभायाम् अर्हति इति।’ भौतिक रूप से सभ्यता, मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जो प्रकृति की गोद में स्वतः जन्म लेती है। सामाजिक रूप से सभ्यता मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जिसमें सामूहिक जीवन की भावना होती है।
सभ्यता
बौद्धिक रूप से सभ्यता विचारवान मनुष्यों की एक ऐसी संरचना है जिसमें समस्त मनुष्यों के विचार एक-दूसरे पर प्रभाव डालकर उस बस्ती अथवा समूह के लोगों की साझा समझ का निर्माण करते हैं। यह साझा समझ ही उस समूह के लोगों के आचरण, व्यवहार एवं आदतों का निर्माण करती है। मनुष्यों की साझा समझ के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले आचरण, व्यवहार एवं आदतों को सम्मिलित रूप से संस्कृति कहा जाता है।
इस प्रकार प्रत्येक सभ्यता की एक विशिष्ट संस्कृति होती है जो अन्य स्थानों पर विकसित होने वाली संस्कृति से अलग होती है।
इस प्रकार प्राकृतिक परिवेश, सभ्यता, विचार एवं संस्कृति परस्पर अटूट सम्बन्ध रखते हैं। ये एक दूसरे से असंपृक्त अथवा विरक्त होकर नहीं रह सकते। इनमें मित्रता का भाव होना आवश्यक है। यही भाव मनुष्य सभ्यता को सामूहिक जीवन की ओर अग्रसर करते हैं। एकाकी जीवन जीने वाला व्यक्ति किसी सभ्यता या संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकता।
सभ्य समाज
वर्तमान समय में ‘सभ्यता’ शब्द का प्रयोग मानव समाज के एक सकारात्मक, प्रगतिशील और समावेशी विकास को इंगित करने के लिए किया जाता है। अतः वर्तमान समय में सभ्यता का आशय ‘सभ्य समाज’ से है। यह सभ्य समाज क्या है? आधुनिक युग में यदि सभ्य समाज को समझने का प्रयास किया जाए तो ‘सभ्य समाज उन्नत कृषि, लंबी दूरी के व्यापार, व्यावसायिक विशेषज्ञता, नगरीकरण और वैज्ञानिक प्रगति आदि की उन्नत स्थितियों का द्योतक है।’
इन मूल तत्त्वों के साथ-साथ, सभ्यता कुछ माध्यमिक तत्त्वों, जैसे विकसित यातायात व्यवस्था, लेखन, मापन के मानक, संविदा एवं नुकसानी पर आधारित विधि-व्यवस्था, कला शैलियों, स्थापत्य, गणित, उन्नत धातुकर्म एवं खगोलविद्या आदि की स्थिति से भी परिभाषित होती है।
संस्कृति
संस्कृति शब्द का निर्माण मूलतः ‘कृ’ धातु से हुआ है जिसका अर्थ है- ‘करना’। इसके पूर्व ‘सम्’ उपसर्ग तथा ‘क्तिन्’ प्रत्यय लगने से लगने से ‘संस्कार’ शब्द बनता है जिसके अर्थ- पूरा करना, सुधारना, सज्जित करना, मांज कर चमकाना, शृंगार, सजावट करना आदि हैं। इसी विशेषण की संज्ञा ‘संस्कृति’ है। वाजसनेयी संहिता में ‘तैयार करना’ या ‘पूर्णता’ के अर्थ में यह शब्द आया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में ‘बनावट’ या ‘संरचना’ के अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है।
महाभारत में ‘श्रीकृष्ण’ के एक नाम के रूप में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार संस्कृति शब्द का अर्थ साफ या परिष्कृत करना है। संस्कृति क्या है? इस विषय पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। वर्तमान में संस्कृति शब्द अंग्रेजी के ‘कल्चर’ शब्द का पर्याय माना जाता है।
संस्कृति की परिभाषाएं
पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘संस्कृति, शारीरिक मानसिक शक्तियों के प्रशिक्षण, सुदृढ़़ीकरण या विकास परम्परा और उससे उत्पन्न अवस्था है।’
मैथ्यू आर्नोल्ड ने लिखा है- ‘संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।’
ई. वी. टॉयलर ने लिखा है- ‘संस्कृति एक जटिल सम्पूर्णता है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा अन्य योग्यताएँ समाहित हैं जिन्हें मनुष्य किसी समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है।’
अमेरिका के प्रसिद्ध दार्शनिक और शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. व्हाइटहैड के अनुसार ‘संस्कृति का अर्थ है- मानसिक प्रयास, सौन्दर्य और मानवता की अनुभूति।’
बील्स तथा हॉइजर के अनुसार ‘मानव समाज के सदस्य व्यवहार करने के जो निश्चित ढंग व तरीकों को अपनाते हैं, वे सम्पूर्ण रूप से संस्कृति का निर्माण करते है।’
प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिलिन के अनुसार ‘प्रत्येक समूह तथा समाज में आन्तरिक व बाह्य व्यवहार के ऐसे प्रतिमान होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होते हैं तथा बच्चों को सिखलाए जाते हैं, जिनमें निरन्तर परिवर्तन की सम्भावना रहती है।’
ग्रीन के अनुसार ‘संस्कृति ज्ञान, व्यवहार, विश्वास की उन आदर्श पद्धतियों को तथा ज्ञान एवं व्यवहार से उत्पन्न हुए साधनों की व्यवस्था को, जो कि समय के साथ परिवर्तित होती है, कहते हैं, जो सामाजिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है।’
एक अन्य विद्वान ने कहा है- ‘संस्कृति का उद्गम संस्कार शब्द है। संस्कार का अर्थ है वह क्रिया जिससे वस्तु के मल (दोष) दूर होकर वह शुद्ध बन जाय। मानव के मल-दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत कोष ही संस्कृति है।’
एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि ‘संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढ़़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।’
एक विद्वान की दृष्टि में ‘संस्कृति मन, आचार अथवा रुचियों की परिष्कृति या शुद्धि है।’
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इसी प्रकार संस्कृति की एक परिभाषा यह भी है कि ‘यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है।’ इस प्रकार संस्कृति शब्द का व्यापक अर्थ, समस्त सीखे हुए व्यवहारों अथवा उस व्यवहार का नाम है जो सामाजिक परम्परा से प्राप्त होता है। इस अर्थ में संस्कृति को सामाजिक प्रथाओं का पर्याय भी कहा जा सकता है। संकीर्ण अर्थ में संस्कृति का आशय ‘सभ्य’ और ‘सुसंस्कृत’ होने से है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है- ‘संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।’ उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति-रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्त्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं।
मानव द्वारा सीखा गया समस्त व्यवहार संस्कृति नहीं
डॉ. सम्पूर्णानंद ने समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति का अंग नहीं माना है। उनके अनुसार- ‘मानव का प्रत्येक विचार संस्कृति नहीं है। पर जिन कामों से किसी देश विशेष के समस्त समाज पर कोई अमिट छाप पड़े, वही स्थाई प्रभाव ही संस्कृति है।’
चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य ने भी मानव जाति द्वारा समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति नहीं माना है। उन्होंने लिखा है- ‘किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्ट पुरुषों में विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहता है, उसी का नाम संस्कृति है।’
संस्कृति का निर्माण
संस्कृति का निर्माण किसी एक कालखण्ड में अथवा कुछ विशेष लोगों द्वारा अथवा कुछ विशेष घटनाओं द्वारा नहीं होता। यह किसी भी समाज के भीतर घटने वाली बौद्धिक घटनाओं का एक चिंरतन प्रवाह है। यही कारण है कि किसी देश की संस्कृति उसकी सम्पूर्ण मानसिक निधि को सूचित करती है।
किसी देश के विभिन्न कालखण्डों में, उस देश के समस्त नागरिकों द्वारा व्यवृहत किए जाने वाले आचार-विचार से संस्कृति रूपी वृक्ष में नित्य नए पत्ते लगते हैं। बौद्धिकता केवल असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तियों में ही नहीं होती अपितु समाज का साधारण से साधारण व्यक्ति और असाधारण से असाधारण व्यक्ति देश की संस्कृति के निर्माण में अपना सहयोग देता है।
इस प्रकार एक समुदाय में रहने वाले विभिन्न मनुष्य, विभिन्न स्थानों पर रहते हुए, विशेष प्रकार के सामाजिक वातावरण, संस्थाओं, प्रथाओं, व्यवस्थाओं, धर्म, दर्शन, लिपि, भाषा तथा कलाओं का विकास करके अपनी विशिष्ट संस्कृति का निर्माण करते है। संस्कृति किसी भी समाज का समग्र व्यक्तित्त्व है, जिसका निर्माण उस समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विचार, भावना, आचरण तथा कार्यकलाप से होता है।
एक व्यक्ति या एक युग की कृति नहीं है संस्कृति
कुछ लोग चाहे कितने ही प्रभावशाली एवं युगांतकारी व्यक्तित्त्व के स्वामी क्यों न हों, वे संस्कृति का परिष्कार तो कर सकते हैं किंतु अकेले ही किसी देश या समाज की संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। क्योंकि संस्कृति कभी भी किसी एक व्यक्ति के प्रयत्न का परिणाम नहीं होती, अपितु वह ‘लोक’ अर्थात् समाज के अनगिनत व्यक्तियों के सामूहिक प्रयत्नों एवं व्यवहारों का परिणाम होती है और यह प्रयत्न अथवा व्यवहार भी ऐसा, जिसे भविष्य में आने वाली पीढ़ियां निरन्तर अपनाती रहती हैं अर्थात् व्यवहार में लाती रहती हैं और उसमें कुछ नया जोड़ती जाती हैं।
यही कारण है कि संस्कृति का विकास धीरे-धीरे होता है। वह किसी एक युग की कृति नहीं होती अपितु विभिन्न युगों के विविध मनुष्यों के सामूहिक एवं अनवरत श्रम का परिणाम होती है। वस्तुतः मनुष्य अपने मन, वचन एवं कर्म द्वारा अपने जीवन को सरस, सुन्दर और कल्याणमय बनाने के लिए जो प्रयत्न करता है, उसका सम्मिलित परिणाम ‘संस्कृति’ के रूप में प्रकट होता है।
सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध
सभ्यता और संस्कृति का सम्बन्ध बहुत गहरा है। पहले मानव सभ्यता विकसित होती है और उसके बाद मानव सभ्यता ही संस्कृति को जन्म देती है। आकार की दृष्टि से सभ्यता, किसी भी मानव समूह का स्थूल रूप है जबकि संस्कृति, मानव समूह का सूक्ष्म रूप है। हमारे प्राचीन साहित्य में सभ्यता का अन्तर्भाव ‘अर्थ’ से लिया गया है जबकि संस्कृति का आशय ‘धर्म’ से लिया गया है। सभ्यता के बिना कोई संस्कृति जन्म नहीं ले सकती और संस्कृति के बिना कोई सभ्यता जीवित नहीं रह सकती।
सभ्यता एवं संस्कृति में भेद
आजकल बहुत से लोग सभ्यता और संस्कृति को पर्याय के रूप में प्रयुक्त करते हैं जबकि इनमें अंतर है। सभ्यता, मानव समाज की बाह्य उन्नति का बोध कराती है जबकि संस्कृति, मानव समाज की आंतरिक उन्नति को इंगित करती है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की और संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। हमने किसी विशेष प्रकार के वस्त्र क्यों धारण किए हैं तो इसका आधा जवाब हमारी सभ्यता से और आधा जवाब हमारी संस्कृति से मिलेगा।
हमारे कपड़े सस्ते हैं या महंगे, इसे हमारी सभ्यता तय करेगी जबकि हमारे कपड़ों के रंग भड़कीले हैं या शांत, अथवा हमारे कपड़े हमारा कितना शरीर ढकते हैं, इन बातों को हमारी संस्कृति तय करेगी। एक समाज के द्वारा दूसरे समाज की सभ्यता की नकल की जा सकती है किंतु एक समाज के द्वारा दूसरी संस्कृति की नकल नहीं की जा सकती, हाँ एक समाज, दूसरे समाज की संस्कृति की कुछ बातों को अपना सकता है। सभ्यता को मापा जा सकता है और उसका मापदण्ड उपयोगिता है जबकि संस्कृति को मापा नहीं जा सकता।
संस्कृति का मनुष्य जाति पर प्रभाव
संस्कृति की शास्त्रीय व्याख्या के अनुसार मनुष्य आज जो कुछ भी है, वह संस्कृति की देन है। यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति छीन ली जाए तो मनुष्य श्री-हीन हो जाएगा। विद्वानों का मानना है कि आज ‘मनुष्य’ इसलिए ‘मनुष्य’ है क्योंकि उसके पास ‘संस्कृति’ है। स्वामी ईश्वरानंद गिरि के अनुसार ‘संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी।’ संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिए।
उसका आधार ‘जीवन के मूल्यों’ में है और पदार्थों के साथ ‘स्व’ को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। श्यामाचरण दुबे ने लिखा है– ‘संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की पूर्ण पृष्ठभूमि में अपना स्थान पाता है और संस्कृति के द्वारा उसे जीवन में रचनात्मक संतोष के साधन उपलब्ध होते हैं।’
कहने का अर्थ यह कि मानव जब जन्म लेता है, तब वह मानव की देह में होते हुए भी पूर्ण अर्थों में मानव नहीं होता। संस्कृति उसका परिष्कार करके उसे वास्तविक मानव बनाती है। संस्कृति, मानव को मानव बना देने वाले विशिष्ट तत्त्वों में सबसे महत्त्वपूर्ण है।
इस अध्याय में पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध स्पष्ट किया गया है। ये तीनों तत्व एक-दूसरे के अनुपूरक एवं अन्योन्याश्रित हैं तथा परिस्थितियों के अनुसार एक दूसरे का निर्माण, विकास एवं विनाश करते हैं।
पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध
प्राकृतिक परिवेश को पर्यावरण कहते हैं। चूँकि मनुष्य किसी न किसी विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण के भीतर रहता है इसलिए पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति अन्योन्याश्रित हैं। अर्थात् ये तीनों तत्त्व एक दूसरे से प्रभावित होते हैं तथा एक दूसरे के आश्रित हो जाते हैं। इनमें से किसी एक के बदलने से दूसरा एवं तीसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है।
पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव
किसी क्षेत्र के पर्यावरण का उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए ठण्डे प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा प्रवेश न हो जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा और निर्बाध प्रवेश हो।
ठण्डे प्रदेशों में निवास करने वाले लोग अपने खान-पान में मांस एवं मदिरा को अधिक मात्रा में सम्मिलित करना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के निवासी अपने खान-पान में वनस्पति, दूध-दही एवं छाछ को अधिक सम्मिलित करेंगे। ठण्डे प्रदेश के लोग ऊनी, मोटे और चुस्त कपड़े पहना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग सूती, पतले तथा ढीले कपड़े पहनेंगे।
ठण्डे प्रदेश के लोग चर्च में जूते पहनकर जाना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने जूते मंदिरों से बाहर उतारना पसंद करेंगे। बाह्य पर्यावरण के कारण अपनाई गई खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों का मनुष्य की कार्य क्षमता एवं उसकी बौद्धिक क्षमता पर गहरा असर होता है।
जिन लोगों के भोजन में मदिरा का समावेश होगा तथा जो चुस्त कपड़े पहनेंगे, वे अधिक समय तक काम करेंगे किंतु वे स्वभाव से उग्र होंगे तथा भौतिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे। जबकि जिन लोगों के भोजन में दही एवं छाछ का समावेश होगा तथा कपड़े ढीले होंगे, उनका शरीर तुलनात्मक दृष्टि से कम समय तक काम कर सकेगा किंतु उनकी प्रवृत्ति शांत होगी तथा वे आध्यात्मिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे।
इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की प्रतिक्रिया केवल भौतिक नहीं होती, अपितु बौद्धिक भी होती है।
सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर प्रभाव
जिस प्रकार पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव होता है, उसी प्रकार सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी भू-भाग में रहने वाले मानव समुदाय की आदतें, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, पर्व, अनुष्ठान आदि विभिन्न तत्त्व, सभ्यता एवं संस्कृति के ऐसे अंग हैं जो धरती के पर्यावरण को गहराई तक प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के सामंती परिवेश में शेरों, शूकरों एवं हरिणों का शिकार एक परम्परा के रूप में प्रचलित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल असुरक्षित हो गए और भारी मात्रा में इंसान द्वारा सहज रूप से काट कर नष्ट कर दिए गए। आजादी के बाद पनपी उपभोक्तावादी संस्कृति, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी का प्रसार तथा वनों के प्रति आदर के अभाव ने जंगलों को तेजी से गायब किया। आज भारत में 23.28 प्रतिशत जंगल हैं किंतु राजस्थान में केवल 9.54 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल बचे हैं।
संस्कृति में बदलाव
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ऊपर हम पढ़ आए हैं कि मानव जाति ने जो कुछ भी भूतकाल से परम्पराओं, आदतों और जीवन शैली के रूप में ग्रहण किया है और जिन परम्पराओं तथा आदतों को मानव जाति वर्तमान समय में व्यवहार में ला रही है, वही हमारी संस्कृति है। कुछ समय बाद मनुष्य इनमें से बहुत सी परम्पराओं को भूल जाएगा और अपनी आदतों को बदल लेगा। इस कारण भविष्य काल में संस्कृति का रूप भी बदल जाएगा। इस दृष्टि से संस्कृति गतिशील तत्त्व है। यह पल-पल बदलती है किंतु इसके बदलाव की आहट प्रायः तुरन्त सुनाई नहीं देती। वैदिक-काल में हमारी संस्कृति कुछ और तरह की थी। बुद्ध के काल में संस्कृति का रूप अलग हो गया। गुप्त काल में भारतीय संस्कृति में बहुत बड़ा बदलाव आया। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों एवं अंग्रेजों के आगमन आदि से हुए राजनीतिक एवं आर्थिक बदलावों ने हमारी संस्कृति को आमूलचूल बदल दिया। प्राकृतिक आपदाओं एवं वैज्ञानिक खोजों सहित विभिन्न कारक, मानव की संस्कृति को प्रभावित करते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, हमारी संस्कृति में बदलाव आता है फिर भी किसी समाज की संस्कृति अक्षय रहती है।
अक्षय रहने वाली संस्कृति की तुलना उस स्त्री से की जा सकती है जो हजारों साल की हो जाने पर भी कभी बूढ़ी नहीं होती। वह क्षण-क्षण अपना नया शृंगार करके नवीन रूप धारण करती है। वह ना-ना प्रकार के विचारों और व्यवहारों से स्वयं को सजाती एवं संवारती है। नवीन विचार एवं व्यवहार संस्कृति के लिए नवीन आभूषणों का काम करते हैं।
संस्कृति सदैव भूतकाल की आदतें छोड़़ती जाती है तथा जीवन जीने के नवीन तरीकों का विकास करती हुई, कभी भी अपनी आकर्षण शक्ति को नहीं खोती। जब किसी काल खण्ड में संस्कृति में एक साथ बड़े परिवर्तन होते हैं तो उन्हें सांस्कृतिक क्रांति कहा जाता है।
संतुलित सभ्यता एवं संस्कृति
जिन समुदायों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का चिंतन किया जाता है, उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति इस प्रकार विकसित होती हैं कि उनसे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुँचती। अपितु पर्यावरण की सुरक्षा होती है।
भारत में वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने जैसे धार्मिक विधान बनाए गए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।
भारतीय संस्कृति में सादगी पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। सादा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकताओं को इतना नहीं बढ़ायेगा कि पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। संत पीपा का यह दोहा इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह व्याख्यायित करता है-
स्वामी होना सहज है, दुरलभ होणो दास।
पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।
असंतुलित सभ्यता एवं संस्कृति
जिस सभ्यता अथवा संस्कृति में ऊर्जा की अधिकतम खपत हो, वह संस्कृति धरती के पर्यावरण में गंभीर असंतुलन उत्पन्न करती है। पश्चिमी देशों में विकसित उपभोक्तावादी संस्कृति, ऊर्जा के अधिकतम खपत के सिद्धांत पर खड़ी हुई है। इस संस्कृति ने धरती के पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है।
इस संस्कृति का आधार एक ऐसी मानसिकता है जो मनुष्य को व्यक्तिवादी होने तथा अधिकतम वस्तुओं के उपभोग के माध्यम से स्वयं को सुखी एवं भव्यतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी संस्कृति में इस बात पर विचार ही नहीं किया जाता कि व्यक्तिवादी होने एवं अधिकतम सुख अथवा भव्यता प्राप्त करने की होड़़ में प्रकृति एवं पर्यावरण का किस बेरहमी से शोषण किया जा रहा है तथा उसके संतुलन को किस तरह से सदैव के लिए नष्ट किया जा रहा है।
पश्चिमी देशों एवं अमरीका में विकसित ‘फास्ट फूड कल्चर’, ‘यूज एण्ड थ्रो कल्चर’ तथा ‘डिस्पोजेबल कल्चर’ पर्यावरण को स्थाई रूप से क्षति पहुँचाते हैं। कहा जा सकता है कि उपभोक्तावादी संस्कृति, धरती के पर्यावरण में भयानक असंतुलन उत्पन्न करती है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध में ईसा मसीह द्वारा दो हजार साल पहले कही गई यह बात आज भी सुसंगत है- ‘सुईं के छेद में से ऊँट भले ही निकल जाए किंतु एक अमीर आदमी स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता।’
असंतुलित एवं संतुलित संस्कृतियों के उदाहरण
प्रकृति के संसाधनों को क्षति पहुँचाए बिना उनका उपयोग करना, पर्यावरणीय संस्कृति का अंग है जबकि यूज एण्ड थ्रो कल्चर, डिस्पोजेबल कल्चर, उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति है।
कागज की थैलियों, मिट्टी के सकोरों तथा पत्तों के दोनों का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण हैं तो पॉलिथीन कैरी बैग्ज, प्लास्टिक की तश्तरियां तथा थर्मोकोल के गिलास, यूज एण्ड थ्रो कल्चर का उदाहरण हैं।
फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर का उदाहरण है। नीम और बबूल की दांतुन पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो टूथपेस्ट का उपयोग उपभोक्तावादी एवं बाजारीकरण की संस्कृति का उदाहरण है।
मल त्याग के बाद पानी से प्रक्षालन पर्यावरणीय संस्कृति है तो कागज का प्रयोग यूज एण्ड थ्रो कल्चर है। शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिए कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिए अधिक विनाशकारी है।
भारत में किसी इंजन या मशीन के खराब हो जाने पर उसे ठीक करवाया जाता है और ऐसा लगातार तब तक किया जाता है जब तक कि उसे ठीक करवाना असंभव अथवा अधिक खर्चीला न हो जाए किंतु अमरीका का आम आदमी, कम्पयूटर खराब होते ही कूड़े के ढेर में, कार खराब होते ही डम्पिंग यार्ड में, घड़ी, कैलकुलेटर, सिलाई मशीन आदि खराब होते ही घर से बाहर फैंक देता है जिन्हें नगरपालिका जैसी संस्थाओं द्वारा गाड़ियों में ढोकर समुद्र तक पहुंचाया जाता है। इससे समुद्र में इतना प्रदूषण होता है कि बड़ी संख्या में समुद्री जीव मर जाते हैं।
एक आम भारतीय अपनी कार को तब तक ठीक करवाता रहता है जब तक कि उसे बेच देने का कोई बड़ा कारण उत्पन्न नहीं हो जाता किंतु उसे कभी भी कूड़े के ढेर या समुद्र में नहीं फैंका जाता। उसका पुर्जा-पुर्जा अलग करके किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाने लायक बना लिया जाता है या फिर उसके सामान को पुनर्चक्रण (रीसाइकिलिंग) में डाल दिया जाता है। भारत में कबाड़ियों द्वारा घर-घर जाकर खरीदी जाने वाली अखबारी रद्दी और खाली बोतलें श्रम आधारित भारतीय संस्कृति के पूँजीवादी अमरीकी कल्चर से अलग होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।
भारतीय रोटी को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, उबले हुए आलू तथा छाछ जैसी सस्ती चीजों के साथ खाया जा सकता है जबकि ब्रेड के लिए बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाए पूँजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं। अब भारत में भी इसी पूँजीवादी संस्कृति का प्रसार हो गया है।
इस अध्याय में भारतीय संस्कृति का प्रसार विषय पर संक्षिप्त चर्चा की गई है।भारतीय संस्कृति का प्रसार न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ। यहाँ तक कि यूरोप की संस्कृति के मूल तत्व वैदिक आर्यों के द्वारा भारत से इटली एवं यूनान आदि देशों को ले जाए गए।
विश्व में अनेक प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृतियां हैं। उन सबमें भारतीय संस्कृति का स्थान सबसे अनुपम एवं सर्वोच्च है। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत विगत हजारों साल से अत्यन्त समृद्ध रहा है। अपनी अनेक अप्रतिम विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति अमर है। यह सम्पूर्ण विश्व के मानव समाज की अमूल्य निधि है।
14वीं शताब्दी के इतिहासकार अब्दुल्ला वासफ ने अपने ग्रंथ ताजियत उल अम्सार में लिखा है- ‘समस्त लेखकों की एकमत से यह राय है कि पृथ्वी पर रहने के लिए भारत सबसे अधिक रमणीय स्थल है और विश्व का सबसे आनन्ददायक प्रदेश है…… यदि यह कहा जाए कि स्वर्ग भारत में है तो आश्चर्य मत करना क्योंकि स्वर्ग स्वयं ही भारत से तुलना योग्य नहीं है।’
अंग्रेजी विद्वान मुरे ने लिखा है- ‘पाश्चात्य जगत् की कल्पनाओं में यह भारत हमेशा ही अत्युत्तम और अलंकृत, स्वर्ण और रत्नों से जगमगाता तथा मनमोहक गंधों से सुरभित रहा……..।’ एक अन्य विद्वान थार्नटन ने लिखा है- ‘भारत की प्राचीन स्थिति निश्चित रूप से अतिविशिष्ट भव्यता की रही होगी।’ काण्डट ब्जोन्सर्टजेरना ने लिखा है- ‘भारत में हर वस्तु विशिष्ट, भव्य और रूमानी है……।’
श्रीमती मैनिंग ने लिखा है– ‘मनुष्य के मस्तिष्क का जितना भी विस्तार सम्भव है, हिन्दुओं के पास उसका सर्वाधिक विस्तार था।’
पियरे लोती ने लिखा है- ‘हे भारत! मैं तुम्हें विस्मययुक्त श्रद्धा और आश्चर्य के साथ प्रणाम करता हूँ …… कला और दर्शन के क्षेत्र में अति-उच्च स्थान प्राप्त उस भारत को जिसका मैं विशेषज्ञ हूँ।’
प्रो. मैक्समूलर ने लिखा है- ‘मानव मस्तिष्क के अध्ययन के इतिहास में स्वयं के अध्ययन में तथा हमारे वास्तविक अस्तित्त्व के अध्ययन में भारत का स्थान समस्त देशों में प्रथम है। अपने विशेष अध्ययन के लिए आप मानव मस्तिष्क के किसी भी क्षेत्र को चुनें, भले ही वह भाषा हो या धर्म, या पौराणिक कथाएँ, या दर्शन या फिर चाहे विधि या प्रथाएं या प्रारम्भिक कला या प्रारम्भिक विज्ञान, हर स्थिति में चाहने या न चाहने पर भी आपको भारत जाना ही होगा क्योंकि मानव के इतिहास की सबसे अधिक मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री का कोष भारत में और केवल भारत में ही है।’
भारतीय संस्कृति की पावन धारा का प्रवाह, कब आरम्भ हुआ, इसका ठीक-ठीक काल निर्धारण नहीं हो सकता किंतु यह निर्विवाद है कि यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है तथा इस समय यह धरती पर विश्व की प्राचीनतम जीवित संस्कृति है क्योंकि भारतीय संस्कृति के साथ जन्म लेने वाली अन्य वैश्विक संस्कृतियां आज काल के गाल में समा गई हैं।
मेसोपोटामिया की सुमेरियन, असीरियन, बेबीलोनियन और रवाल्दी प्रभूति, मिस्र, ईरान, यूनान और रोम की प्राचीन संस्कृतियां काल के गाल में समा चुकी हैं। उनके ध्वंसावशेष ही अब उनकी गाथा कहते हैं। केवल चीन की ही संस्कृति ऐसी है जो प्राचीनता के मामले में भारतीय संस्कृति के समकक्ष ठहरती है।
विश्व की अन्य प्राचीन संस्कृतियों की भांति भारतीय संस्कृति ने भी विगत कई हजार वर्षों में काल के क्रूर थपेड़े सहन किए हैं। विश्व भर की प्राचीन संस्कृतियां इन थपेड़ों के कारण अपना अस्तित्त्व खो बठीं किंतु भारतीय संस्कृति आज भी पूरे उल्लास के साथ जीवित है। हालांकि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारतीय संस्कृति की भौगोलिक सीमाओं में निरंतर संकुचन हुआ है और यह संकुचन आज भी जारी है।
एक समय था जब भारत देश का नामकरण ‘भारत’ के रूप में नहीं हुआ था किंतु तब भी भारतीय संस्कृति अत्यंत विकसित अवस्था में विद्यमान थी और इसकी सीमा पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से आरम्भ होकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी एवं उसके आगे के सैंकड़ों द्वीपों तक विस्तृत थी।
उष्णकटिबन्धीय द्वीपों में भारतीय संस्कृति का विस्तार
आज जिन देशों को दीपान्तर अथवा पार-महाद्वीपीय देश कहा जाता है, उनमें भी भारतीय संस्कृति ही व्यवहृत होती थी। दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया (उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीप) क्षेत्रों में स्थित इण्डोनेशिया, विएतनाम, मलेशिया, कम्बोडिया आदि देशों में भी भारतीय संस्कृति ही प्रसारित थी तथा उसके दर्शन आज भी इन देशों में किए जा सकते हैं। भारतीय पुराणों में उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के एक विशाल द्वीप समूह को ‘द्वीपान्तर भारत’ अर्थात् समुद्र-पार-भारत कहा गया है।
जब यूरोपवासियों ने भारत को ‘इण्डिया’ कहा तब उन्होंने पारद्वीपीय द्वीपों के एक बड़े समूह की भारतीय संस्कृति से साम्यता के आधार पर उसे ‘इण्डोनेशिया‘ कहा। जो ‘इण्डिया इन एशिया’ की ध्वनि देता है। डचों द्वारा शासित औपनिवेशिक काल में इस द्वीप समूह को ईस्ट-इण्डीज कहा जाता था।
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भूगोलविदों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार ईस्ट-इण्डीज द्वीप, किसी समय एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक जुड़े हुए थे। बाद में भूगर्भीय हलचलों के कारण टूट-टूट कर अर्द्धचंद्राकार आकृति में बिखर गए। इनमें से जावा, सुमात्रा, बाली तथा बोर्नियो बड़े द्वीप हैं। भारतीय पौराणिक साहित्य तथा चीनी साहित्य थाइलैण्ड, कम्बोडिया, विएतनाम, मलेशिया तथा इण्डोनेशियाई द्वीपों से भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध रामकथा के काल से भी पहले ले जाते हैं। उस काल में भारत की भौगोलिक सीमाएं जम्बूद्वीप (भारत) से लेकर सिंहल द्वीप (श्रीलंका), स्याम (थाइलैण्ड), यवद्वीप (जावा), स्वर्णद्वीप (सुमात्रा), मलय द्वीप (मलेशिया), शंखद्वीप (बोर्नियो), बाली तथा आंध्रालय (ऑस्ट्रेलिया) तक थीं। मलय द्वीप अथवा मलाया को अब मलेशिया कहते हैं, काम्बोज, कम्बोडिया (कम्पूचिया) के नाम से अलग देश है। उस काल के चम्पा राज्य के द्वीप वर्तमान में विएतनाम और कम्बोडिया (कम्पूचिया) में बंट गए हैं। यहाँ आज भी संस्कृत भाषा व्यवहार में लाई जाती है। उस काल में भारत के राजा दूर-दूर के समुद्री द्वीपों पर अधिकार कर लेते थे। इनमें कुशद्वीप (अफ्रीका) तथा वाराहद्वीप (मेडागास्कर) प्रमुख हैं।
रामकथा से पहले से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने तक इनमें से अधिकांश द्वीप भारत का हिस्सा थे तथा यहाँ की प्रजा हिन्दू थी। मेडागास्कर अब अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण-पूर्व में समुद्र के बीच स्थित एक विशाल द्वीप है तथा अलग राष्ट्र है। दक्षिण एशियाई द्वीपों में स्थित बोर्नियो नामक द्वीप पर ब्रुनेई नामक देश की राजधानी का नाम आज भी ‘बंडर सिरी बगवान’ है जो ‘बंदर श्री भगवान’ अर्थात् हनुमानजी की ओर संकेत करता है।
वाल्मीकि रामायण में सप्तद्वीपों का उल्लेख
वाल्मीकि रामायण में लिखा है- ‘यत्रवन्तो यवद्वीपः सप्तराज्योपशोभितः।।’ अर्थात् यवद्वीप में सात राज्य हैं। निश्चित रूप से उस काल में यवद्वीप (जावा), भारत की मुख्य भूमि के पर्याप्त निकट रहा होगा। इसके निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अन्य द्वीप होंगे जिनमें से छः-सात द्वीप मानव-बस्तियों की उपस्थिति की दृष्टि से प्रमुख रहे होंगे।
वायुपुराण के छः द्वीपों की आर्य बस्तियां
वायुपुराण के एक श्लोक में कहा गया है- ‘अंगद्वीपं, यवद्वीपं, मलयद्वीपं, शंखद्वीपं, कुशद्वीपं वराहद्वीपमेव च।। एवं षडेषे कथिता अनुद्वीपाः समन्त्तः। भारतं द्वीपदेशो वै दक्षिणे बहुविस्तरः।।’
अर्थात्- अंग द्वीप, यव द्वीप, मलय द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप तथा वराह द्वीप आदि, भारतवर्ष के अनुद्वीप हैं जो दक्षिण की ओर दूर तक फैले हुए हैं।
इस काल में बाली द्वीप भी इन्हीं द्वीपों की शृंखला में गिना जाता था जहाँ भारतीय आर्यों की बस्तियां थीं और जहाँ मनुस्मृति के आधार पर सामाजिक एवं न्याय व्यवस्था स्थापित थी।
लंका के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध
लंका को आजकल सीलोन कहा जाता है जो कि सिंहल का अपभ्रंश है। पौराणिक काल में लंका को सिंहल द्वीप भी कहा जाता था। पौराणिक काल में लंका का आशय जिस द्वीप से होता था, उसमें मलय एवं सुमात्रा की भूमि भी सम्मिलित थी। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है- ‘तथैव मलयद्वीपमेवमेव सुसंवृतम्। नित्यप्रमुदिता स्फीता लंकानाम महापुरी।’
इस श्लोक से ज्ञात होता है कि ब्रह्माण्ड पुराण के रचना काल में मलयद्वीप लंका के ठीक निकट उसी प्रकार स्थित रहा होगा जिस प्रकार आज लंका, भारत के निकट है। सुमात्रा द्वीप पर आज भी सोनी-लंका नामक एक स्थान है जो सुमात्रा के उत्तर-पूर्व वाले पर्वत के निकट समुद्र तट पर स्थित है। इस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में सुवर्ण उपलब्ध था। इस स्वर्ण की प्राप्ति पहले यक्षों ने और बाद में राक्षसों द्वारा की गई।
अर्थात् कलियुग में राजा-प्रजा दरिद्री हो जाएंगे, इसलिए यहाँ लोभ के कारण नित्य ही आया करेंगे।
लंका के राजा रावण का नाना सुमाली, अपने राक्षसों को भगवान विष्णु के संहार से बचाने के लिए, लंका छोड़़कर पाताल में जाकर रहने लगा। यह पाताल जावा-सुमात्रा-बाली आदि द्वीप समूह का कोई द्वीप होना अनुमानित किया जाता है।
इस घटना के सही समय के बारे में यद्यपि अलग-अलग मान्यताएं हैं तथापि भारतीय वांगमय मानता है कि यह घटना आज से लगभग सात हजार साल पहले हुई। इन द्वीपों पर रामकथा के प्रसंगों वाली हजारों साल पुरानी प्रतिमाएं मिलती हैं। पश्चिम के वैज्ञानिक भी भगवान राम का अवतरण-काल आज से सात हजार साल पुराना मानते हैं। रामसेतु की कार्बन डेटिंग भी इस कालखण्ड की पुष्टि करती है।
सुमात्रा द्वीप को भारतीय पौराणिक साहित्य में सुवर्ण द्वीप तथा अंगद्वीप कहा गया है जहाँ स्वर्ण के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। यक्ष जाति के लोगों ने अपना स्वर्ण, स्वर्णद्वीप (इसे अंगद्वीप भी कहते थे) से लाकर सिंहल द्वीप (लंका) में रखा था। यक्षों का राजा कुबेर इस धन की रक्षा करता था।
राक्षसों के राजा रावण का बचपन (आन्ध्रालय) ऑस्टेलिया में व्यतीत हुआ था। रावण ने आन्ध्रालय से आकर लंका पर चढ़ाई की तथा लंका के राजा कुबेर को परास्त करके सोने की लंका पर अधिकार कर लिया तथा उसका पुष्पक विमान भी छीन लिया।
इसके बाद राक्षस पुनः लंका में रहने लगे। कुबेर और रावण, दोनों ही विश्रवा के पुत्र थे। बाली एवं जावा द्वीपों पर आज भी राक्षसों की तरह दिखाई देने वाली मूर्तियाँ यत्र-तत्र दिखाई देती हैं। बाली द्वीप पर राक्षस जैसी दिखने वाली विशालाकाय मूर्तियों का बड़ा संग्रहालय है। इन मूर्तियों की उपस्थिति भारतीय पौराणिक साहित्य में वर्णित राक्षसों के इन द्वीपों से सम्बन्ध की पुष्टि करती हैं।
उष्णकटिबन्धीय द्वीपों का समुद्र में बिखराव
जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण, भारत भूमि के निकट स्थित द्वीप, समुद्र में दूर-दूर तक छितराते चले गए। आज इनमें से दूरस्थ द्वीप ऑस्ट्रेलिया एवं मेडागास्कर के नाम से जाने जाते हैं। इन द्वीपों के दूर चले जाने के कारण भारत देश की परिकल्पना भी संकुचित होती चली गई।
आर्यावर्त
प्राचीन काल में भारत के लिए ‘आर्यावर्त‘ नाम प्रचलित हुआ। मनु स्मृति (संभावित रचना काल ई.पू. दूसरी शताब्दी से दूसरी शताब्दी ईस्वी) में लिखा है कि जो सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के मध्य में देव-निर्मित देश है, वह ‘ब्रह्मावर्त’ कहलाता है। उस देश का परम्परागत आचरण ही भिन्न-भिन्न शाखाओं सहित वर्णों के लिए सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पांचाल, शूरसेन आदि से मिलकर ‘ब्रह्मर्षि देश’ बना है। यह ब्रह्मावर्त के पश्चात् है।
इस देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मणों से पृथ्वी के समस्त जन को अपना चरित्र सीखना चाहिए। हिमालय तथा विन्ध्याचल के मध्य में विनशन के पूर्व तथा प्रयाग के पश्चिम में स्थित देश ‘मध्यदेश’ कहलाता है। पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक; एवं हिमालय से विन्ध्य पर्वतों के मध्य जो देश है, वह विद्वानों द्वारा ‘आर्यावर्त’ के रूप में जाना जाता है। अर्थात् ब्रह्मवर्त, ब्रह्मर्षि देश एवं मध्यदेश से मिलकर आर्यावर्त बनता था।
उत्तरापथ
आर्य जन, लम्बे समय तक आर्यावर्त, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश एवं मध्यदेश में निवास करते रहे। बिहार तथा बंगाल का दक्षिण-पूर्वी भाग आर्यों के प्रभाव से बहुत समय तक मुक्त रहा परन्तु अन्त में आर्यों ने इस भू-भाग पर भी प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को ‘उत्तरापथ’ कहा।
दक्षिणा-पथ
विन्ध्य पर्वत तथा घने वनों के कारण दक्षिण भारत में बहुत दिनों तक आर्यों का प्रवेश न हो सका। इन गहन वनों तथा पर्वतमालाओं को पार करने का साहस सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने किया। सबसे पहले अगस्त्य ऋषि दक्षिण-भारत में गए। इस प्रकार आर्यों की दक्षिण विजय केवल सांस्कृतिक विजय थी। वह राजनीतिक विजय नहीं थी। धीरे-धीरे आर्य सम्पूर्ण दक्षिण भारत में पहुँच गए और उसके कोने-कोने में आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया। आर्यों ने दक्षिण-भारत को ‘दक्षिणा-पथ’ नाम दिया।
भारत देश की भौगोलिक सीमाओं का संकुचन
विष्णु-पुराण के लिखे जाते समय (अनुमानतः ई.300 से 600 के बीच) भारत की भौगोलिक सीमाएं हिमालय पर्वत से हिन्दमहासागर तक विस्तृत थीं क्योंकि विष्णु-पुराण में भारत भूमि का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-
उत्तरं यत्समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नामा, भारती यत्र संतति।
भारत वर्ष के नौ विभाग
राजशेखर (ई.873-920) ने अपने ग्रंथ ‘काव्यमीमांसा’ में प्राचीन भारत के विभिन्न विभागों का वर्णन किया है- यह भगवान् मेरु प्रथम वर्ष पर्वत है। उसके चारों ओर ‘इलावृत्त वर्ष’ है। उसके उत्तर में श्वेत, नील तथा शृंगवान नामक तीन वर्ष हैं। उनके देश रम्यक, हिरण्यमय, उत्तर-कुरु आदि हैं।
दक्षिण में भी निषध, हेमकूट तथा हिमवान् नामक तीन पर्वत हैं। इनके भी हरिवर्ष, किम्पुरुष, भारत आदि तीन देश हैं। उनमें यह भारतवर्ष है और इसके नौ भेद (विभाग) हैं यथा- इन्द्रद्वीप, कसेरुमान्, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व, वरुण तथा कुमारी। हिमालय तथा विन्ध्याचल एवं पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र के मध्य आर्यावर्त है। वहीं पर चतुराश्रम तथा चार वर्ण पाए जाते हैं। वहीं सदाचार की जड़ भी है।
भारत वर्ष का बिखराव
इतिहास के प्रत्येक कालखण्ड में पश्चिम की ओर से होने वाले क्रूर सैन्य आक्रमणों ने भारतवासियों को राजनैतिक रूप से एक नहीं रहने दिया किंतु भारतीय संस्कृति ने एक ऐसी सुदृढ़़ रज्जु का काम किया जिसने आसेतु हिमालय, भारत वासियों को सदैव एक होने का अनुभव कराया किंतु जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने के बाद भारतीयों की सांस्कृतिक एकता की रज्जु टूटने लगी तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांगलादेश आदि नाम से अलग-अलग देश बन गए।
बाद में अंग्रेजों के दीर्घ शासन काल में नेपाल, भूटान तथा बर्मा भी भारत से अलग कर दिए गए। इस बिखराव के पश्चात् भी ‘भारत’ के नाम से जो देश वर्तमान समय में अस्तित्त्व में है, वह भौगोलिक विस्तार की दृष्टि से विश्व में सातवां स्थान रखता है तथा संसार की कुल जनसंख्या का छठा हिस्सा भारत में निवास करता है। इस दृष्टि से यह विश्व का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा देश है।
भारतीय संस्कृति के अध्ययन की आवश्यकता
भारतीय संस्कृति का अध्ययन पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से हो रहा है। प्रत्येक भारतीय को अपनी राष्ट्रीय संस्कृति की विशेषताओं से परिचित होना चाहिए ताकि देश की वर्तमान समस्याओं का हल ढूँढने के लिए हम राष्ट्र के पूर्वगामी अनुभवों, परम्पराओं और प्रयासों के प्रकाश में अपना मार्ग खोज सकें। इसके अध्ययन से हमें न केवल इसके गुण-दोष ही ज्ञात होंगे अपितु यह भी ज्ञात होगा कि किन कारणों से संस्कृति का उत्कर्ष और अपकर्ष होता है।
निःसन्देह भारतीय संस्कृति का अतीत अत्यन्त उज्जवल था तथा इस संस्कृति में कुछ ऐसी महान् बातें हैं जो विश्व की अन्य संस्कृतियों में नहीं पाई जातीं। फिर भी भारतीय संस्कृति के अनेक पुरातन तत्त्वों को आज का समाज स्वीकार नहीं कर सकता। अतः भारतीय संस्कृति के अध्ययन से ही उन विशेषताओं एवं त्याज्य पुरातन तत्त्वों को चिह्नित किया जा सकता है।
भारतीय संस्कृति का उद्भव एवं निर्माण
भारतीय संस्कृति का उद्भव, धरती भर की सभ्यताओं में घटने वाली सबसे अद्भुत घटना थी। आज भारत में विविध प्रकार की संस्कृतियां रहती हैं जिनमें अलग-अलग तरह के आचार-विचार एवं रीति-रिवाज हैं। बहुत से विद्वानों का मत है कि भारतीय संस्कृति को प्राचीन आर्यों ने जन्म दिया किंतु बहुत से अन्य विद्वान इस मत को स्वीकार नहीं करते।
पश्चिमी विद्वान हेरास और भारतीय विद्वान चटर्जी की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को है। फेयर सर्विस का विश्वास है कि यह हिन्दी-ईरानी क्षेत्र की अपनी उपज है। प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता व्हीलर की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति का उद्भव और विकास पश्चिमी एशिया की सुमेरियन संस्कृति के प्रभाव से हुआ। हमारी राय में इन समस्त विद्वानों के मत अपूर्ण हैं। वास्तविकता यह है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा में आर्य-संस्कृति है जिसे द्रविड़़ों की संस्कृति ने स्पर्श करके और अधिक परिष्कृत, सुकोमल एवं मानवीय बना दिया है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के अनुसार ‘भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियां हुई हैं।
पहली क्रांति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आए अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियों से सम्पर्क हुआ। आर्यों ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की, वही आर्यों अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई, वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यों के दिए हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है।
दूसरी क्रांति तब हुई तब महावीर और गौतम बुद्ध ने, स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिंतनधारा को खींचकर वे अपनी मनोवांछित दिशा की ओर ले गए।
तीसरी क्रांति उस समय हुई जब इस्लाम, विजेताओं के धर्म के रूप में भारत पहुँचा और इस देश में हिन्दुत्व के साथ उसका सम्पर्क हुआ और चौथी क्रांति तब हुई जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ तथा उसके सम्पर्क में आकर हिन्दुत्व एवं इस्लाम दोनों ने नवजीवन का अनुभव किया। भारतीय संस्कृति नूतन अवदानों को ग्रहण करने के बाद भी अपना मौलिक रूप हमेशा कायम रखती आई है।
यदि दिनकर के मत को स्वीकार कर लिया जाए तो इसका अर्थ यह है कि केवल आर्यों ने इस देश की संस्कृति का निर्माण नहीं किया, वे भारत में बाहर से आए उनके भारत में आने से पूर्व ही कोई संस्कृति यहाँ फल-फूल रही थी। जबकि आधुनिक भारतीय विद्वान इस बात को स्वीकार नहीं करते कि आर्य कहीं और से चलकर भारत आए। उनकी दृष्टि में आर्य जाति इसी देश की मूल निवासी है।
डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी ने लिखा है- ‘अब आर्यों के आक्रमण और भारत के मूल निवासियों के साथ उनके संघर्ष की प्राक्कल्पना को धीरे-धीरे त्याग दिया जा रहा है।’ अविनाश चन्द्र दास के विचार में ‘सप्त-सिन्धु ही आर्यों का आदि देश था।’
कुछ अन्य विद्वानों के विचार में काश्मीर तथा गंगा का मैदान आर्र्यों का आदि-देश था। भारतीय सिद्धान्त के समर्थकों का कहना है कि आर्य-ग्रन्थों में आर्यों के कहीं बाहर से आने की चर्चा नहीं है और न अनुश्रुतियों में कहीं बाहर से आने के संकेत मिलते हैं। इन विद्वानों का यह भी कहना है कि वैदिक-साहित्य आर्यों का आदि साहित्य है।
यदि आर्य सप्त-सिन्धु में कहीं बाहर से आए तो इनका साहित्य अन्यत्र क्यों नहीं मिलता। ऋग्वेद की भौगोलिक स्थिति से भी यही प्रकट होता है कि ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना करने वालों का मूल स्थान पंजाब तथा उसके समीप का देश ही था। आर्य-साहित्य से हमें ज्ञात होता है गेहूँ तथा जौ प्राचीन आर्यों के प्रमुख खाद्यान्न थे। पंजाब में इन दोनों अन्नों का ही बाहुल्य है। अतः यही आर्यों का आदि-देश रहा होगा।
सप्तसिंधु क्षेत्र को आर्यों का आदि देश मानने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की सभ्यता, आर्य-सभ्यता से भिन्न तथा अधिक प्राचीन है। जब सिन्धु-प्रदेश की प्राचीनतम सभ्यता अनार्य थी तब सप्त-सिन्धु कैसे आर्यों का आदि-देश हो सकता है!
इस समस्या का निवारण इस तथ्य से हो जाता है कि सिंधु सभ्यता का विस्तार सिंधु नदी घाटी में था तथा आर्य बस्तियों का प्रसार उनके पड़ौस में पंजाब तथा काश्मीर की तरफ था क्योंकि सिंधु नदी घाटी सभ्यता क्षेत्र से उसी काल की आर्य बस्तियां नहीं मिली हैं अपितु वे थोड़ी हटकर स्थित थीं।
पश्चिमी विद्वानों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में कम से कम 1000 साल की अवधि तक सैन्धव बस्तियां एवं आर्य बस्तियां उत्तर भारत में एक साथ विद्यमान रहीं। आर्यों का प्राचीनतम साहित्य अर्थात् ऋग्वेद 2500 ई.पू. से मिलने लगता है जबकि सैन्धव सभ्यता 3500 ई.पू. से 1500 ई.पू. तक अस्तित्त्व में थी।
इस अध्याय में भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ लिखी गई हैं। भारतीय संस्कृति अपनी विशेषताओं के कारण ही संसार भर में सबसे अनूठी है।
भारत में आर्य संस्कृति का प्रसार
सप्त-सिन्धु प्रदेश में निवास
भारतीय आर्य चाहे भारत के मूल-निवासी रहे हों और चाहे मध्य एशिया से भारत में आए हों परन्तु यह निश्चित है कि प्रारम्भ में वे सप्त-सिन्धु प्रदेश में रहते थे, यहीं से वे शेष भारत में फैले। सप्त-सिन्धु वही प्रदेश था जिसे वर्तमान में पंजाब कहा जाता है। पंजाब, का संधि विग्रह होता है- पंच+अम्बु, अर्थात् पाँच जलों अथवा नदियों का देश। सप्त-सिन्धु का भी अर्थ है, सात नदियों का देश। उन दिनों इस प्रदेश में सात नदियाँ पाई जाती थीं।
उनमें से पाँच-शतुद्रि (सतलज), विपासा (व्यास), परुष्णी (रावी), चिनाब (असिक्नी) तथा झेलम (वितस्ता) तो अब भी विद्यमान हैं और दो नदियाँ- सरस्वती तथा दृशद्वती, विलुप्त हो गई हैं। प्राचीन आर्यों ने अपने ग्रन्थों में इसी सप्त-सिन्धु का गुणगान किया है। इसी जगह उन्होंने वेदों की रचना की और यहीं पर उनकी सभ्यता तथा संस्कृति का सृजन हुआ। यहीं से भारतीय आर्य शेष भारत में फैले।
ब्रह्मावर्त में प्रवेश
सप्त सिन्धु क्षेत्र से आर्य पूर्व की ओर बढ़े। सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने के इनके दो प्रधान कारण हो सकते हैं। प्रथम तो यह कि इनकी जनसंख्या में वृद्धि हो गई, जिससे इन्हें नए स्थान को खोजने की आवश्यकता पड़ी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार करने के लिए ये लोग आगे बढ़े। सप्त-सिन्धु से प्रस्थान करने का जो भी कारण रहा हो, इतना तो निश्चित है कि वे बड़ी मन्द-गति से आगे बढ़े क्योंकि अनार्यों के साथ उन्हें भीषण संघर्ष करना पड़ा।
अनार्यों से अधिक बलिष्ठ, वीर, साहसी तथा रण-कुशल होने के कारण आर्यों ने उन पर विजय प्राप्त कर ली और उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मावर्त के नाम से पुकारा।
ब्रह्मर्षि-देश में प्रवेश
ब्रह्मावर्त क्षेत्र के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद आर्यों ने अपनी युद्ध-यात्रा जारी रखी। अब उन्होंने आगे बढ़कर पूर्वी राजस्थान, गंगा तथा यमुना के दो-आब और उसके निकटवर्ती प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस सम्पूर्ण प्रदेश को उन्होंने ब्रह्मर्षि-देश कहा।
मध्य-देश में प्रवेश
ब्रह्मर्षि-देश पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद आर्य और आगे बढ़े तथा हिमालय एवं विन्ध्य-पर्वत के मध्य की भूमि पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। आर्यों ने इस प्रदेश का नाम मध्य-देश रखा।
सुदूर-पूर्व में प्रवेश
बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व का भाग आर्यों के प्रभाव से बहुत दिनों तक मुक्त रहा परन्तु अन्त में उन्होंने इस भू-भाग पर अधिकार कर लिया। आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत को आर्यावर्त एवं उत्तरापथ कहा।
दक्षिणा-पथ में प्रवेश
विन्ध्य पर्वत तथा घने वनों के कारण दक्षिण भारत में बहुत दिनों तक आर्यों का प्रवेश नहीं हो सका। इन गहन वनों तथा पर्वतमालाओं को पार करने का साहस सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने किया। सबसे पहले अगस्त्य ऋषि दक्षिण-भारत में गए।
इस प्रकार आर्यों की दक्षिण विजय केवल सांस्कृतिक विजय थी। धीरे-धीरे आर्य सम्पूर्ण दक्षिण भारत में पहुँच गए और उसके कोने-कोने में आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया। आर्यों ने दक्षिण-भारत को ‘दक्षिणा-पथ’ कहा।
भारतीय संस्कृति के विभिन्न सोपान
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पूर्व वैदिक-काल से लेकर उत्तरवैदिक-काल तक भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों का निर्माण हो चुका था। इस दीर्घ काल में भारतीय समाज में बौद्धिक चिंतन का महाविस्फोट हुआ तथा समाज के लिए निश्चित परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं धार्मिक विश्वास स्थापित हुए। आर्य ऋषियों एवं राजाओं ने समाज के लिए आदर्श संस्कृति के निर्माण के भागीरथ प्रयत्न किए। उत्तरवैदिक-काल में भारतीय संस्कृति सिंधु संस्कृति के सम्पर्क में आने लगी। सिंधु संस्कृति के प्रभाव से भारतीय आर्यों में लिंगपूजा, नदियों की पूजा, पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों की पूजा आदि नवीन परम्पराओं एवं नवीन विचारों का प्रसार हुआ। भारतीय आर्य छोटे-छोटे ‘जन’ में रहा करते थे जिनकी तुलना पुरातन कबीलों अथवा गांवों से की जा सकती है किंतु सिंधु संस्कृति के प्रभाव से उनमें भी नगरीय सभ्यता का विकास हुआ जिन्हें वे ‘पुर’ कहा करते थे। आर्य राजाओं ने इसी दौरान अपने राज्यों का विस्तार करके महाजनपदों की स्थापना की। मौर्यकाल में बौद्धों के प्रभाव से भारतीय संस्कृति में बड़ी क्रांति हुई। इस काल में भारतीय समाज 16 बड़े महाजनपदों में विभक्त था। इस काल में यज्ञों में दी जाने वाली पशु-बलियों पर रोक लगी। देश भर में बौद्ध मठ एवं विहार स्थापित हो गए।
लोग बड़ी संख्या में बौद्ध-भिक्षु बनकर इन मठों एवं विहारों में प्रवेश करने लगे ताकि उन्हें राजकीय संरक्षण में चल रहे इन मठों में बिना कोई काम किए भोजन, कपड़ा एवं आश्रय मिल सके तथा उन्हें युद्धों में भाग नहीं लेना पड़े।
ईसा की पहली एवं दूसरी शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी की ओर से आए शकों द्वारा पश्चिमी भारत में शासन स्थापित किए जाने के बाद भारतीय संस्कृति में बड़ा परिवर्तन होता हुआ दिखाई देता है। उनके प्रभाव से सम्पूर्ण उत्तर भारत में यक्षपूजन की परम्परा आरम्भ हुई। इस काल में यक्ष-यक्षियों एवं रुद्र तथा उनकी पत्नी शक्ति की मिट्टी की मूर्तियाँ बहुत बड़ी संख्या में बनने लगीं। इस काल के आदर्श, अपने पूर्ववर्ती एवं पश्चवर्ती भारतीय समाज के आदर्शों से बिल्कुल भिन्न हैं।
गुप्तकाल में भारतीय संस्कृति ने एक बार पुनः बड़ी करवट ली एवं भारतीय संस्कृति में युगांतकारी परिवर्तन आया। वैष्णव धर्म अपने चरम पर पहुँच गया। विष्णु एवं उनके अवतारों को समर्पित करके मंदिरों, मूर्तियों एवं चित्रों का निर्माण हुआ। समाज में व्यापक स्तर पर मनाए जाने वाले धार्मिक समारोह, दान, तप-व्रत एवं तीर्थों का महत्त्व स्थापित हुआ।
ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाएं नए सिरे से समाज द्वारा स्वीकार कर ली गईं। भारतीय समाज में नवीन आदर्शों, मानव मूल्यों एवं सदाचार के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना का प्रसार हुआ। यही कारण है कि गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है। यह शांति और समृद्धि का युग था। इस काल में घरों में ताले लगने तक बंद हो गए। इसी काल में पुराणों की रचना हुई तथा षड्दर्शन का विकास हुआ।
गुप्त काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। गुप्त सम्राटों ने इसे पल्लवित एवं पुष्पित करने में महान् योगदान दिया। उनके प्रयासों से भारतीय संस्कृति को दृढ़ता प्राप्त हुई। उसी सांस्कृतिक दृढ़ता का परिणाम था कि परवर्ती गुप्तकाल में भारत पर हुए विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृतियां, भारतीय संस्कृति के आधार पर चोट नहीं कर सकीं। अपितु हूणों, खिजरों एवं पह्लवों के साथ आईं विदेशी संस्कृतियाँ स्वयं ही भारतीय संस्कृति में विलोपित हो गईं।
भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ
भारतीय संस्कृति की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो विश्व की किसी अन्य संस्कृति में नहीं पाई जातीं। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा धरती की पंचमहाभूतों के रूप में कल्पना किसी अन्य संस्कृति में साकार नहीं हुई है। अग्नि देवता, वायु देवता, वरुण देवता तथा धरती देवी जैसे देवी-देवताओं की पूजा केवल इसी संस्कृति में होती है।
प्राकृतिक शक्तियों की देवी-देवताओं के रूप में पूजा भारतीय संस्कृति के अतिरिक्त केवल प्राचीन यूनान में ही पाई जाती थी। देवी-देवताओं के वाहनों के रूप में गरुड़, मोर, मूषक, नाग, श्वान, सिंह, बैल आदि की कल्पना भी भारतीय संस्कृति में ही हुई है।
इन विशेषताओं के कारण ही भारतीय संस्कृति में नदियों, पहाड़ों, वृक्षों तथा पशु-पक्षियों की पूजा होती है जो संसार भर की किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलती। भारत के अतिरिक्त दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में ये परम्पराएं भारतीय संस्कृति अर्थात् प्राचीन आर्य संस्कृति के प्रभाव से मिलती हैं।
गंगा-यमुना आदि नदियों की पूजा; गायों, बछड़ों, नागों, गरुड़ आदि पशु-पक्षियों की पूजा; तुलसी, पीपल, बड़ एवं खेजड़ी आदि वृक्षों की पूजा केवल भारतीय संस्कृति में ही पाई जाती हैं। विभिन्न पर्वों एवं तिथियों पर नदियों में स्नान करना, श्राद्ध करना, षोडश संस्कार करना, शव को विधि विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ अग्नि को समर्पित करने जैसी परम्पराएं केवल भारतीय संस्कृति में मिलती हैं।
भारत की प्राचीन संस्कृति का गुणगान करते हुए यूरोपीय लेखकों ने लिखा है-
‘प्राचीन हिन्दू कवित्वपूर्ण लोग थे। वह निश्चित रूप से एक संगीतमय जाति थी और वे लोग वाणिज्य-व्यापार की क्षमता वाले लोग थे। वह दार्शनिकों का देश था। विज्ञान में भी वे सदा ही दक्ष और परिश्रमी थे। कला ने तो मानो भारत में ही स्वयं को निःशेष कर दिया था। संसार में साहित्य, धर्मशास्त्र और अध्यात्म-विद्या के जनक हिन्दू थे। उनकी भाषा विश्व में सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ और सबसे सुंदर है। सत्यवादिता, शूरता और वैयक्तिक चरित्र, प्रतिष्ठा में प्राचीन हिन्दुओं का राष्ट्रीय चरित्र अनुपमेय था। उनके उपनिवेशों ने विश्व को ज्ञान से भर दिया। उनके राजा आज भी समुद्र के देवताओं की भांति पूजे जाते हैं। उनकी सभ्यता आज भी सभ्य संसार के हर कोने में ओत-प्रोत है और हमारे जीवन के हर दिन हमारे चारों और फैली है।’
अष्टांग योग, ध्यान, धारणा, समाधि, प्राणायाम एवं देव-पूजन; देवनागरी लिपि एवं उसकी विशिष्ट प्रकार की ध्वनियां; नृत्य, संगीत एवं गायन की अनुपम शैलियां; चित्रकला सहित विविधि प्रकार की ललित कलाओं की शैलियां; पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण, तिलांजलि आदि आचार-विचार किसी अन्य संस्कृति में देखने को नहीं मिलते हैं।
सिन्धु संस्कृति के उत्खनन से प्राप्त विभिन्न प्रकार की सामाग्री से एक विशिष्ट प्रकार की मानव सभ्यता एवं संस्कृति संसार के सामने आई है जो एक विशेष प्रकार के रहन-सहन को प्रकट करती है और जिसकी तुलना संसार की माया सभ्यता जैसी प्राचीनतम संस्कृतियों में भी नहीं मिलती। भारतीय संस्कृति को संसार की किसी अन्य संस्कृति से जोड़ने के कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हुए हैं।
भारतीय संस्कृति की उदार, सहिष्णु एवं समन्वयात्मक प्रवृत्ति निःसन्देह आदर्श मानव-समाज की रचना के लिए ठोस आधार प्रस्तुत करती है। सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से विश्व भर की कोई भी संस्कृति, भारतीय संस्कृति की समता नहीं कर सकतीं।
यूरोप तथा अमरीका जैसे देशों में राष्ट्रवाद, अपने पड़ौसी देश के लिए भयोत्पादक एवं मानव संहारी तत्त्व के रूप में प्रकट हुआ जबकि भारतीय राष्ट्रवाद का स्वरूप देश की संस्कृति के अलोक में ही उद्भासित होता है जो अत्यंत उदार है और प्राणी मात्र को अभयदान देने वाला है। भारतीय संस्कृति का शान्ति, अहिंसा और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश परमाणु युद्ध की विभीषिका से त्रस्त मानवता के लिए विश्व-शांति की आशा संजोए हुए है। भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
(1.) प्राचीनता
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। इसका दीर्घकालीन स्थायित्व आज भी देखा जा सकता है। प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताएँ इस समय नष्ट हो चुकी है। मिस्र, असीरिया, बेबीलोनिया, क्रीट, यूनानी आदि संस्कृतियाँ, अपने वैभव के चरम पर पहुँचकर समाप्त हो गईं। आज प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मों का एक भी अनुयाई धरती पर नहीं बचा है।
आज संसार की प्राचीनतम संस्कुतियों में से केवल चीन और भारत की संस्कृतियां ही जीवित बची हैं। बहुसंख्य भारतीय आज भी हजारों साल पुराने वैदिक धर्म का पालन करते हैं। इस देश के पुरोहित एवं ब्राह्मण आज भी वेद मन्त्रों द्वारा यज्ञ कुण्ड में आहुति देकर देवी-देवताओं को प्रसन्न करते हैं। उपनिषदों और श्रीमद्भगवद् गीता ने भारत की धरती पर ज्ञान की जो धारा प्रवाहित की थी, वह आज भी इस देश में बह रही है।
हजारों साल पहले लिखी गई रामायण और महाभारत आज भी भारतीय स्त्रियां को सीता, अनुसुइया, सती, सावित्री और पार्वती के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। राम और कृष्ण आज भी साधारण से साधारण और विशिष्ट से विशिष्ट व्यक्ति के लिए उच्च-आदर्शों की पराकाष्ठा है। महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी ने साधारण मनुष्य के लिए सादाजीवन और सदाचरण का जो पथ प्रशस्त किया था वह आज भी इस देश की अनुपम धरोहर है।
प्रसिद्ध अमरीकी विद्वान विल ड्यूरेण्ट ने भारतीय संस्कृति की प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘यहाँ ईसा से 2900 साल पहले या इससे भी पहले मोहनजोदड़ो से लेकर महात्मा गांधी, रमण और टैगोर तक उन्नति और सभ्यता का शानदार सिलसिला जारी है। यहाँ ईसा से आठ शताब्दी पहले उपनिषदों से आरम्भ होकर ईसा के आठ सौ साल बाद शंकर तक ईश्वरवाद के हजारों रूप प्रतिपादित करने वाले दार्शनिक हुए हैं। यहाँ के वैज्ञानिकों ने तीन हजार साल पहले ज्योतिष का आविष्कार किया और इस जमाने में भी कई नोबल पुरुस्कार जीते हैं। कोई भी लेखक मिस्र, बेबीलोनिया और असीरिया के इतिहास की भाँति भारत के इतिहास को समाप्त नहीं कर सकता, क्योंकि भारत में अभी तक इतिहास का निर्माण हो रहा है, उसकी सभ्यता अब भी क्रियाशील है।’
ड्यूरेण्ट भले ही भारतीय संस्कृति को ईसा से 2900 साल पहले या सिंधु घाटी सभ्यता के काल तक ले जाते हैं किंतु वास्तव में यह संस्कृति उससे भी कही अधिक पुरानी है।
काउण्ट ब्जोर्न्स्टजेरना के अनुसार ‘पृथ्वी पर कोई राष्ट्र अपनी सभ्यता और प्राचीनता के सम्बन्ध में भारत की प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। …… बैली की गणना के अनुसार यदि यह सत्य है कि ईसा से 3000 साल पहले हिन्दुओं ने खगोल विज्ञान और रेखागणित के ज्ञान में इतनी उच्च दक्षता प्राप्त कर ली थी, तो भला कितनी सदियों पूर्व उनकी संस्कृति का उदय हुआ होगा। क्योंकि मानव मस्तिष्क विज्ञान के मार्ग पर कदम-कदम ही चलता है।’
हिन्दुओं के चार युगों का विवेचन करके के प्रश्चात् डॉ. हैलेहेद लिखते हैं- ‘हिन्दुओं की इतनी प्राचीनता के सम्मुख मूसा का काल तो कल का सा ही लगता है और मॅथ्यूसेलाह का जीवन अल्पावधि से अधिक कुछ नहीं।’
अमेरिका के येल कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. स्टाईल हिन्दू लेखों की आश्चर्यजनक प्राचीनता से इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने सर वी जोन्स को पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वे हिन्दुओं के प्राचीन ग्रंथों की खोज करें।
कार्बन डेटिंग पद्धति के आधार पर पश्चिमी वैज्ञानिक मानते हैं कि अयोध्या के राजा रामचंद्र आज से लगभग 7000 साल पहले अर्थात् ईसा से लगभग 5000 साल पहले हुए। भारतीय संस्कृति तो इससे भी प्राचीन है क्योंकि राजा रामचंद्र के पहले भी ईक्ष्वाकु वंश के राजाओं की एक सुदीर्घ परम्परा मौजूद थी।
प्रो. मैक्स डंकर के अनुसार एक प्राचीन भारतीय राजा स्पेटेम्बस अर्थात् डायोनिसियस का शासनकाल ईसा से लगभग 6,717 वर्ष पहले निर्धारित होता है। मिस्र के टिनाईट थेबाईन राजवंश के प्रमुख ‘मैनथे’ की तालिकाओं में सबसे प्राचीन राजा का शासनकाल ईसा से 5,867 वर्ष पूर्व निर्धारित होता है तथा गीजा के पिरामिड के संस्थापक सौफी का शासनकाल ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व निर्धारित होता है। इस प्रकार भारत के प्राचीनतम राजाओं में से एक स्पेटेम्बस अर्थात् डायोनिसियस का शासनकाल मिस्र के प्राचीनतम राजा से लगभग 1000 वर्ष पहले का है।
(2.) धार्मिकता, आध्यात्मिकता एवं दार्शनिकता
किसी भी देश की संस्कृति उस देश के नागरिकों के दार्शनिक विचारों, आध्यात्मिक चिंतन, धार्मिक आचरण, कविता, साहित्य और कला के विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है। भारतीय संस्कृति ने स्वयं को जिस रूप में सर्वाधिक सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया, वह है- धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन। ‘मनु’ ने अपने ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ में धर्म के दस लक्षण बताए हैं-
धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम।।
अर्थात्- धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह, धी (बुद्धि विवेक), विद्या, सत्य और क्रोध न करना। वैष्णव धर्म से लेकर जैन धर्म, बौद्ध धर्म, शैव मत, शाक्त मत आदि समस्त धर्मों और मतों की आत्मा में धर्म के यही दस लक्षण विद्यमान हैं।
भारत में यह विचार सदा से चला आ रहा है कि, आँखों से दिखाई देने वाले इस स्थूल संसार से परे भी कोई सत्ता है, जिससे जीवन एवं शक्ति प्राप्त करके यह प्रकृति फल-फूल रही है। भारत में हजारों साल से ‘कण-कण में भगवान’ की चिंतन धारा फल-फूल रही है। साथ ही ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में स्वयं को तथा स्वयं में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को समाए हुए देखने की प्रवृत्ति रही है।
भारतीय अध्यात्म विगत हजारों वर्षों से भारतीयों को भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करता आया है। षडदर्शन में वर्णित समस्त दार्शिनिक विचार भी मनुष्य को ‘ब्रह्म’ अथवा ‘मोक्ष’ की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। जैन-धर्म ‘नमो अरिहंताणम्….’ के ‘पंचमकार मंत्र’ के माध्यम से और बौद्ध धर्म ‘अप्प दीपो भव’ के घोष के माध्यम से मनुष्य मात्र के ‘आत्मकल्याण’ की ही युक्ति सुझाते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय को ‘ब्रह्म की प्राप्ति’ अथवा ‘मोक्ष की प्राप्ति’ अथवा ‘आत्मकल्याण’ ही मानव-जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि प्रतीत होती है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ , ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ तथा ‘सियाराम मय सब जग जानी’ का उद्घोष केवल भारतीय संस्कृति ही कर सकी है।
(3.) सहिष्णुता
विभिन्न संस्कृतियों, मान्यताओं, चिंतन धाराओं एवं सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान का भाव भारतीय संस्कृति का प्रधान तत्त्व है। आर्य संस्कृति पर द्रविड़़ संस्कृति का जो व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, वही इसी प्रवृत्ति का द्योतक है।
सम्राट अशोक ने आज से लगभग 2200 साल पहले पहले, प्रजा को दिए गए संदेशों में लिखा है- ‘लोग केवल अपने ही सम्प्रदाय का आदर और बिना कारण दूसरे सम्प्रदाय की निन्दा न करें। जो व्यक्ति ऐसा करता है, वह अपने सम्प्रदाय को भी क्षति पहुंचाता है और दूसरे सम्प्रदाय का भी अपकार करता है। लोग एक-दूसरे के धर्म को ध्यान से सुनें और उनकी सेवा करें क्योंकि समस्त सम्प्रदाय में बहुत से विद्वान हैं तथा वे मानव कल्याण का कार्य करते हैं।’
अशोक द्वारा प्रतिपादित यह भावना आज भी भारतीयों में विद्यमान है। यदि आज जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म, कबीरपंथी, राधास्वामी आदि विभिन्न मत-मतांतर, भारतीय अध्यात्म की मूल धारा अर्थत् हिन्दू-धर्म की विभिन्न शाखाओं के रूप में देखे जाते हैं तो उसका कारण हिन्दू-धर्म में सबको अपनाने और साथ लेकर चलने की भावना ही है। सहिष्णुता की भावना के बल पर भारतीय समाज ने यवन, शक, कुषाण, हूण, पह्लव आदि जातियों को अपने भीतर आत्मसात् कर लिया।
यदि अपवाद स्वरूप मिलने वाले कुछ उदाहरणों को छोड़़ दिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजाओं ने विभिन्न धर्मों को मानने वाली प्रजा पर धार्मिक अत्याचार नहीं किए और न ही दो राजाओं के बीच साम्प्रदायिक युद्ध ही हुए। जबकि यूरोप में न केवल एक धर्म ने दूसरे धर्म पर, परन्तु अपने ही धर्म में विभिन्न मत रखने वालों पर जो भीषण अत्याचार किए, उनसे यूरोपीय इतिहास के अनेक पृष्ठ रक्तरंजित हैं।
प्राचीन काल में भारत ही एकमात्र ऐसा देश था, जहाँ हिंसा और धर्मान्धता का प्राधान्य नहीं रहा। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘विभिन्न देवताओं की श्रद्धापूर्वक उपासना करने वाले भी मेरा ही भजन करते हैं।’
भारतीय विचारकों ने इस्लाम के साथ भी ताल-मेल बैठाने का भरपूर प्रयास किया। इसी समन्वयकारी भावना के कारण ‘अल्लोपनिषद्’ की रचना हुई तथा भजनों में ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ जैसी पंक्तियां जोड़ी गईं। मुसलमानों को प्रेम का संदेश देने के लिए भारतीय संस्कृति को ‘गंगा-जमनी तहजीब’ कहा गया।
हिन्दुओं ने सूफियों को भारत के अध्यात्म, योग-साधना और रहस्यवाद का मुस्लिम संस्करण मानकर उसे प्रेम तथा प्रतिष्ठा प्रदान की। इस प्रकार के और भी कई प्रयास हुए किंतु ‘इस्लाम’ अपनी संस्कृति एवं सिद्धांतों के साथ किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण भारतीय संस्कृति का इस्लाम पर प्रभाव लगभग शून्य रहा।
भारत ने विदेशों से धार्मिक अत्याचारों द्वारा पीड़ित होकर आने वाले पारसियों, यहूदियों और सीरियन ईसाइयों को अपने यहाँ उदारतापूर्वक शरण दी। भारतीयों का यह अटूट विश्वास है कि भगवान एक अचिन्तय, अव्यक्त, सर्वशक्तिमान सत्ता है, विविध प्रकार की उपासनाएँ उस तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे– ‘ईश्वर एक है किंतु उसके विभिन्न स्वरूप हैं। जैसे एक घर का मालिक, एक के लिए पिता, दूसरे के लिए भाई और तीसरे के लिए पति है और विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, उसी प्रकार ईश्वर भी विभिन्न कालों एवं देशों में भिन्न-भिन्न नामों एवं भावों से पूजा जाता है। इसीलिए धर्मों की अनेकता देखने को मिलती है।’
(4.) आनुकूल्यता
आनुकूल्य का अभिप्राय है- स्वयं को बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल बनाते रहना। प्रकृति में वही प्राणी दीर्घजीवी होता है जो स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढालता रहे। पृथ्वी पर किसी समय हाथियों से भी कई गुना बडे़ ‘डायनोसोर’ नामक प्राणी रहते थे, उनके द्वारा किए जाने वाले अत्यधिक भोजन, उनकी जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि एवं उनके परस्पर झगड़ों के चलते, उन्होंने स्वयं अपने लिए ऐसी खतरनाक परिस्थितियां उत्पन्न कर लीं कि वे उन्हीं परिस्थितियों में फंस कर नष्ट हो गए। संस्कृतियों के सम्बन्ध में भी यह नियम लागू होता है।
मिस्र, मैक्सिको और ईरान की प्राचीन संस्कृतियाँ, विदेशी संस्कृतियों के आक्रमणों में स्वयं भी कमजोर हो गईं तथा उन्होंने दूसरी संस्कृतियों को भी गंभीर आघात पहुँचाए। इस कारण वे संस्कृतियां नष्ट हो गईं। ईसा से लगभग 5000 वर्ष पहले भारत में विकसित हुई सिंधु संस्कृति भी स्वयं को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं कर सकी तो वह भी आज से लगभग 1700 वर्ष पहले समाप्त हो गई जबकि आर्य संस्कृति आनुकूल्यता के गुण से सम्पन्न होने के कारण विभिन्न प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई और विदेशी संस्कृतियों को स्वयं में आत्मसात करती हुई आज तक जीवित है।
आनुकूल्यता की इस प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति ने विदेशी संस्कृतियों की विशेषताओं एवं विकृतियों को भी आत्मसात किया। यही कारण है कि वैदिक संस्कृति में उद्भव से लेकर वर्तमान समय तक आमूल-चूल परिवर्तन हो जाने के बाद भी इस संस्कृति की मूल आत्मा आज भी पूर्ण उत्साह के साथ जीवित है। वैदिक युगीन यज्ञ-प्रधान हिन्दू-धर्म ने वेदान्ती युग, कर्मकाण्डी युग तथा बौद्ध युग में निरंतर परिवर्तित होते हुए, मध्य-काल में इस्लाम के भीषण प्रहार सहे तथा उनके बचने के लिए स्वयं को भक्ति प्रधान बना लिया।
इस प्रकार उसने हर काल में नवीन रूप एवं नवीन उत्साह धारण किया। इसी प्रकार मुस्लिम एवं ब्रिटिश शासनकाल में शिक्षित भारतीयों द्वारा विदेशी रहन-सहन, विदेशी भाषाओं और विदेशी वेश-भूषाओं को अपनाकर आनुकूल्यता के सिद्धांत का सहारा लिया और अपने परम्परागत धर्म और सामाजिक आदर्शों का परित्याग नहीं किया।
(5.) ग्रहणशीलता
संस्कृति की उदार सोच एवं उसका लचीलापन ही उसकी ग्रहणशीलता का निर्माण करती है। ग्रहणशीलता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि दूसरी संस्कृतियों की विकृतियों को ग्रहण करने की प्रक्रिया में कोई संस्कृति अपनी मौलिकता को खो बैठे अपिुत ग्रहणशीलता का अर्थ यह होता है कि दूसरी संस्कृति से आई बुराई का परिमार्जन करके उसकी अच्छाइयों को आत्मसात कर ले। भारतीय संस्कृति के सम्पर्क में जो भी नवीन तत्त्व आते गए, भारतीय संस्कृति उन्हें विवेकपूर्ण चिंतन के साथ आत्मसात् करती गई।
बाह्य दृष्टि से भारतीय संस्कृति निषेधात्मक और पृथकत्व-प्रिय दिखाई देती है परन्तु यदि इसमें ग्रहणशीलता नहीं होती तो वह संभवतः बहुत पहले ही, अन्य संस्कृतियों की तरह विलुप्त हो गई होती।
विभिन्न काल खण्डों में चीन, मंगोलिया, ईरान, यूनान, अरब, फ्रांस, हॉलैण्ड, पुर्तगाल तथा इंग्लैण्ड आदि देशों से सैनिक आक्रांता, धर्म प्रचारक तथा व्यापारी अपनी-अपनी संस्कृतियों को लेकर भारत में आए और उन्होंने जन-धन, शस्त्र एवं शास्त्र के बल पर भारतीय समाज एवं संस्कृति को बदलने का भरपूर प्रयास किया किंतु वे भारतीय संस्कृति को नष्ट नहीं कर सके। शक, कुषाण तथा हूण आदि तो भारतीय संस्कृति में ही समा गए।
तुर्क और मंगोल अपनी विकसित संस्कृति लेकर आए। उन्होंने हमारी भाषा, धर्म तथा नीति-विधान को अत्यधिक प्रभावित किया जिसे भारतीय संस्कृति ने स्वीकार कर लिया किंतु तुर्क एवं मंगोल भी भारतीय संस्कृति को नष्ट नहीं कर सके। भारतीय ज्योतिष विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान, यूनानी, इस्लामी और ईसाई प्रभाव से समृद्ध हुआ है। भारतीय भाषाओं के शब्दकोषों पर भी विदेशी भाषाओं का बहुत प्रभाव है।
भारत में आज संसार की बहुत सी संस्कृतियों के धार्मिक विश्वास और रहन-सहन के ढंग मिलते हैं तथा विभिन्न प्रकार की पूजा-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीनकाल के वेद, कपिल मुनि के सांख्य और चार्वाक के निरीश्वरवाद से लेकर आधुनिक युग के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद तक की विभिन्न विचारधाराएँ और दर्शन भारत के विभिन्न समुदायों में प्रचलित हैं। विवाह सात जन्मों के बंधन में बांधने वाला पवित्र संस्कार भी है तो इच्छा मात्र से तोड़ा जाने वाला भौतिक सम्बन्ध भी।
(6.) व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से समष्टि का विकास
भारतीय संस्कृति का आधारभूत विचार ‘व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से समष्टि का विकास’ करना है। सर्वांगीण विकास का लक्ष्य ‘दैहिक, दैविक और भौतिक’ उन्नति करना है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के लिए चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। इनकी प्राप्ति के लिए आश्रम व्यवस्था की स्थापना की गई। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम पहले तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करने के लिए थे जबकि वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम में मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न किया जाता था।
इस प्रकार भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तत्त्वों पर समान रूप से बल दिया गया है। मनुष्य को चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का प्रयत्न समान रूप से करना चाहिए। धर्म का अनुसरण करके ‘अर्थ’ की उपलब्धि करने, धर्मानुसार ‘काम’ का सेवन करने और ‘मोक्ष’ को अन्तिम लक्ष्य बनाकर कर्म करने से मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है।
यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक, आर्थिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का विकास हो। ‘नहीं दरिद्र सम दुःख जग मांहि…..। लोक लाह परलोक निबाहू……..। पराधीन, सपनेहुं सुख नांहि…..। दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं काहुहि व्यापा।। रामराज बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गए सब सोका।। नहीं दरिद्र कोई दुःखी न दीना…. आदि संदेश देने वाला भारतीय साहित्य मनुष्य मात्र को यह संदेश देता है कि वह अपना सर्वांगीण विकास करे। वह सद्कर्मों के माध्यम से इस लोक में भी उपलब्धियां अर्जित करे तथा मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाले परलोक को भी सुधारे।
इस प्रकार सम्पूर्ण भारतीय साहित्य इस विचार पर खड़ा है कि मनुष्य मात्र के सर्वांगीण विकास से ही सम्पूर्ण समाज का विकास संभव है। इसी को व्यक्ति से समष्टि का विकास कहा जाता है।
(7.) जीवन शैली का सहज प्रवाह
भारतीय संस्कृति किसी विशेष धर्म, विशेष पुस्तक, विशेष वेशभूषा या विशेष धार्मिक नेता द्वारा बताए गए सिद्धांतों की कठोर कारा में कैद नहीं है। यद्यपि हिन्दू-धर्म भारतीय संस्कृति का मुख्य अंग है तथापि हिंदू धर्म का दायरा बहुत विस्तृत होने से भारतीय संस्कृति किसी विशेष प्रकार की पूजा-पद्धति तक ही सीमित नहीं है। हिन्दू-धर्म बहुव्यापी, उदार एवं मानव मन में सहज प्रवाहित होने वाली जीवन शैली के रूप में प्रकट हुआ है तथा इसकी यह उदारता एवं व्यापकता आज भी बनी हुई है।
प्राचीनतम वैदिक धर्म से लेकर पश्चवर्ती पौराणिक धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, भागवत् धर्म, वैष्णव सम्प्रदाय, शैव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, कबीर पंथी, दादू पंथी, सतनामी, सिक्ख धर्म आदि ना-ना प्रकार के मत-मतांतर इसी धर्म की विभिन्न शाखाएं हैं। इनमें से जो भी मत या मतांतर स्वयं को हिन्दू-धर्म के भीतर माने या बाहर, उसे ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता है। इसलिए कहा जाता है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, जीवन पद्धति है।
हिन्दू-धर्म के लोग मंदिर से लेकर बौद्ध मठ, जैन उपाश्रय, सिक्खों के गुरुद्वारे, कबीर पंथियों के आश्रम, दादू पंथियों के दादूद्वारे तक में बड़ी सहजता से आता-जाता है। हिन्दू मंदिरों में भी किसी भी मत-मतांतर के व्यक्ति को सहज रूप से आने-जाने की छूट है।
हिन्दू-धर्म के भीतर वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, रामचरित मानस, विविध पुराण, सत्यार्थ प्रकाश, भगवद्गीता आदि किसी भी ग्रंथ को धार्मिक पुस्तक के रूप में पढ़ने की छूट है। जनेऊ पहनने या नहीं पहनने; मुण्डन करवाने या नहीं करवाने; गंगाजी नहाने या नहीं नहाने, मूर्ति-पूजा करने या नहीं करने, मंदिर में जाने या नहीं करने, रातिजगा करने या नहीं करने, व्रत करने या नहीं करने, यज्ञ करने या नहीं करने, श्राद्ध करने या नहीं करने तथा विभिन्न कर्मकाण्डों को करने या नहीं करने की पूरी छूट है। आदमी को जो अच्छा लगे उसकी इच्छा पर निर्भर है किसी पर भी धर्म की ओर से कोई पाबंदी नहीं है।
(7.) विश्वकल्याण की भावना
विश्वभर की मानव संस्कृतियों में विश्वकल्याण की भावना का प्राकट्य सबसे पहले भारतीय संस्कृति में ही देखा जा सकता है। वेदों में ऐसी अनेक उक्तियां आई हैं जिनमें विश्वमंगल एवं प्राणी मात्र के कल्याण की कामना की गई है।
सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखाभाग्भवेत्।।
अर्थात् समस्त मनुष्य सुखी होवें, समस्त रोगमुक्त रहें, समस्त मनुष्य मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी भी मनुष्य को दुःख का भागी न बनना पड़े।
अयं निः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
अर्थात् यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी गणनावृत्ति संकुचित चित्त वाले व्यक्तियों की होती है। इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
अर्थात्- जब सारा विश्व ही आत्मीय है तब कोई भी अपने लिए अनुचित माना जाने वाला आचरण दूसरों के प्रति क्यों करे?
भारतीयों में व्याप्त विश्वमंगल की इसी कामना के कारण आज तक भारतवासियों ने किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया। अपितु भारतीय ऋषि-मुनि एवं भिक्षु विश्व-शांति एवं प्राणी मात्र को सुखी बनाने का संदेश लेकर विश्व के अन्य देशों एवं दूरस्थ द्वीपों में गए। यही कारण है कि यदि भारत भूमि पर उत्पन्न धर्मों अर्थात् हिन्दू-धर्म, बौद्ध धर्म, जैन-धर्म एवं सिक्ख धर्म के अनुयाइयों की संख्या पर विचार किया जाए तो आज विश्व भर में निवास कर रहे मानवों की लगभग आधी संख्या इन्हीं धर्मों के भीतर स्थित है।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ संसार की अन्य संस्कृतियों से अलग हैं तथा भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ ही वास्तविक भारत का निर्माण करती हैं।
जब हम भारतीय संस्कृति के तत्त्व विषय पर विचार करते हैं तो हम इस संस्कृति की कुछ निश्चित एवं मूलभूत विशेषताओं को सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति पर आच्छादित हुआ पाते हैं।
भारतीय संस्कृति में एकता के तत्त्व
भारत वर्ष के भौगोलिक विस्तार, जनसंख्या प्रसार, सांस्कृतिक वैविध्य, भाषाई बहुलता, क्षेत्रीय पहचान, वेषभूषा के अंतर तथा राजनीतिक विशृंखलता आदि तत्त्वों के कारण अधिकांश पाश्चात्य विद्वानों ने यह मान्यता बनाई है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है और न कभी अतीत में रहा है। उनकी दृष्टि में विशाल भारत छोटे-छोटे राज्यों का ‘समूह’ अथवा ‘संघ’ मात्र है।
अनेक विदेशी विद्वानों ने भारत को जातियों, भाषाओं, मत-मतान्तरों, संस्कृतियों और रीति-रिवाजों का अजायबघर कहकर पुकारा है जबकि इस कथन में रंचमात्र भी सच्चाई नहीं है। भारत सदियों से एक विशाल देश रहा है और अपनी विशालता के कारण यह कई प्रकार की विशिष्टताओं एवं जटिलताओं से परिपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में जिस प्रकार की जातीय आधारित संरचना दिखाई देती है, वह विश्व की किसी अन्य संस्कृति में उपलब्ध नहीं है।
देश में निवास करने वाले अनेकानेक समुदायों में अलग-अलग प्रकार के रीति-रिवाज और विधि-विधान प्रचलित हैं किंतु इनमें बाह्य भिन्नता दिखाई देते हुए भी आंतरिक ‘ऐक्य’ मौजूद है।
(1.) भौगोलिक एकता
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यद्यपि हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक विस्तृत विशाल भारत देश में अनेक पर्वत, पठार, मैदान एवं भू-प्रदेश स्थित हैं तथा उनमें अलग-अलग जलवायु, जीव-जन्तु एवं वनस्पतियाँ विद्यमान हैं, तथापि प्रकृति ने इसे एक भौगोलिक इकाई बनाया था तथा एक देश के रूप में संगठित किया था। प्राचीन काल में हजारों वर्षों तक उत्तर में स्थित हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में स्थित बंगाल की खाड़ी तक इसकी प्राकृतिक सीमा थी किंतु राजनीतिक विभाजनों ने इस देश की भौगोलिक एकता को भंग कर दिया। फिर भी वर्तमान समय में उत्तर में स्थित हिमालय की दुर्गम चोटियां इसकी उत्तरी सीमा का निर्माण करती हैं तथा शेष तीनों आरे से समुद्र ने इसे अच्छी तरह से घेर रखा है। यद्यपि उत्तर में स्थित चीन, नेपाल और भूटान की सीमाएं भारत की सीमाओं से प्राकृतिक आधार पर विभक्त नहीं की जा सकतीं तथापि हिमालय की ऊंची चोटियां उन देशों को भारत से सुस्पष्ट ढंग से अलग करती हैं। पूर्व में स्थित बांगलादेश भी यद्यपि प्राकृतिक रूप से भारत से अलग नहीं है किंतु भारत और बांगला देश का विभाजन प्राकृतिक नहीं है, राजनीतिक है। इसी प्रकार पश्चिम में स्थित पाकिस्तान भी ऐसा देश है जो केवल राजनीतिक रेखा के माध्यम से अलग है। भारत के दक्षिण में स्थित श्रीलंका भारत से समुद्र द्वारा स्पष्ट रूप से अलग हैं।
अंग्र्रेज इतिहासकार स्मिथ के अनुसार ‘भारत निःसन्देह एक स्वतंत्र भौगोलिक इकाई है, जिसका एक नाम होना सर्वथा ठीक ही है।’
भारतीयों को प्राचीनकाल से ही इस भौगोलिक एकता का ज्ञान है। जिस समय से आर्य सभ्यता सम्पूर्ण देश में प्रसारित हो गई, तब से इस भौगोलिक एकता के चिह्न हमारे धार्मिक और लौकिक साहित्य में मिलते हैं। कात्यायन से आरम्भ होकर कोई ऐसा प्रसिद्ध कवि, आचार्य, नीतिकार और राजनीतिज्ञ नहीं हुआ जो भारत के किसी भाग को विदेश समझता हो। रामायण एवं महाभारत में सम्पूर्ण देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ ही किया गया है। विष्णु-पुराण में बताया गया है कि समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण का सारा प्रदेश ‘भारत’ है और उसके निवासी भारत की सन्तान है।
(2.) राजनीतिक एकता
कुछ विद्वानों के अनुसार यह देश केवल अंग्रेजी शासन के अन्तर्गत ही एक-सूत्र में बँध सका, इससे पूर्व नहीं। यह कथन ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है। यद्यपि प्राचीनकाल में देश की विशालता के कारण और यातायात के साधनों के अभाव के कारण पूर्ण राजनीतिक-एकता स्थापित नहीं हो सकी परन्तु प्राचीन भारतवासी, देश में राजनीतिक एकता, केन्द्रीय सत्ता के आदर्श एवं प्रांतीय शासन संस्थाओं से भली-भाँति परिचित थे।
महत्त्वाकांक्षी हिन्दू नरेश दिग्विजय करके चक्रवर्ती सम्राट बनने का प्रयास करते थे। प्रतापी नरेश अपने साम्राज्य का विस्तार करके अपनी सार्वभौमिक प्रतिष्ठा के लिए राजसूय, अश्वमेध, वाजपेय आदि यज्ञ करते थे। मगध के नन्द, मौर्य और गुप्त सम्राटों ने उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम के विशाल भू-भागों को अपने अधीन करके देश में एक केन्द्रीय शासन व्यवस्था बनाए रखी। दिल्ली सल्तनत एवं मुगलों के शासन काल भी देश का अधिकांश भू-भाग एक केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था के अधीन रहा। ब्रिटिश काल में भारत की राजनीतिक एकता और अधिक दृढ़ हो गयी जिसने भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का नए सिरे से उदय किया।
इसी राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर भारत देश के विभिन्न प्रान्तों में निवास करने वाले स्त्री-पुरुषों ने राजनीतिक एवं सामजिक संगठन बनाए तथा राष्ट्रीय संस्थाओं के झण्डे के नीचे एकत्रित होकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में भाग लिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सम्पूर्ण देश में एक जैसी राजनीतिक, आर्थिक एवं शासन व्यवस्था लागू की गई।
(3.) आध्यात्मिक एकता
भारत के विभिन्न प्रांतों में आदि काल से अनेक प्रकार के धार्मिक विचारों, अनेक प्रकार की भाषाओं, अनेक प्रकार की वेषभूषाओं एवं सैंकड़ों जातियों के विद्यमान होने पर भी भारत की सांस्कृतिक एकता प्राचीनकाल से मौजूद रही है। भारतीय संस्कृति विविध सम्प्रदायों तथा जातियों के आचार-विचार, विश्वास और आध्यात्मिक साधनाओं का समन्वय है। यह संस्कृति वैदिक, बौद्ध, जैन, हिन्दू, मुस्लिम और आधुनिक संस्कृतियों के सम्मिश्रण से बनी है।
भारत भूमि पर उत्पन्न हुए विभिन्न धार्मिक मतों एवं सम्प्रदायों के दार्शनिक और नैतिक सिद्धान्तों में मूलभूत साम्य है। निष्काम भक्ति, अष्टांग योग, एकेश्वरवाद, आत्मा का अमरत्व, कर्मफल सिद्धांत, पुनर्जन्म की अवधारणा, मोक्ष अथवा निर्वाण की अवधारणा आदि तत्त्व प्रायः समस्त धर्मों की निधि हैं।
धार्मिक कर्मकाण्डों और संस्कारों में भी बहुत समानता हैं। यम, नियम, शील, तप और सदाचार पर समस्त सम्प्रदाय जोर देते हैं। ऋषि-मुनियों, सन्त-महात्माओं और महापुरुषों का सम्मान, बिना किसी भेदभाव के सर्वत्र होता है। समस्त सम्प्रदायों के तीर्थस्थान, पवित्र नदियाँ और पर्वत सम्पूर्ण भारत में फैले हुए हैं। यही सांस्कृतिक एकता एवं अखण्डता का सबल प्रमाण है।
भारत को आध्यात्मिक एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास रामायण काल से ही होने लगे थे। जब कोई राजा चक्रवर्ती पद प्राप्त करता था अथवा अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञ करता था तो उसके अभिषेक के लिए देश भर के तीर्थों से जल मंगवाया जाता था। अयोध्या के राजा श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले दक्षिण भारत में शिवलिंग की स्थापना की। आज भी वह स्थान रामेश्वरम् के नाम से प्रसिद्ध है तथा भारत भर से श्रद्धालु रामेश्वरम् जाकर जल चढ़ाते हैं।
भारत के विभिन्न भागों में द्वादशज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई ताकि लोग इनके दर्शनार्थ सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करें और उन्हें राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का भान हो। प्रत्येक भारतीय अपने जीवन में कम से कम एक बार इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन अवश्य करना चाहता है, इससे उनमें राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का भाव स्वतः स्फूर्त होता है क्योंकि इनके दर्शनों के लिए किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करना होता है।
भारतीय धर्मग्रंथों में बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम की चर्चा चार धामों के रूप में की गई है। देश भर में रहने वाले हिन्दू अपने जीवन में कम से कम एक बार इन धामों की यात्रा रकना चाहते हैं। आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में भारत की चारों दिशाओं में एक-एक मठ की स्थापना की ताकि भारत की आध्यात्मिक एकता को अक्षुण्ण रखा जा सके-
(1.) दक्षिण भारत में स्थित रामेश्वरम् में वेदांतज्ञान मठ।
(2.) पूर्वी भारत में स्थित जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन मठ।
(3.) पश्चिमी भारत में स्थित द्वारकापुरी में शारदा मठ (कालिका)।
(4.) उत्तरी भारत में बद्रीनाथ में स्थित ज्योतिर्मठ।
भारतीय प्रतिदिन स्नान करते समय विभिन्न नदियों का स्मरण करते हैं-
गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति!
नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
(4.) रीति-रिवाजों की एकता
रीति-रिवाजों के मामले में हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि विभिन्न भारतीय सम्प्रदाय एक जैसे हैं। उत्तर एवं दक्षिण भारत के निवासियों के रीति-रिवाजों में बाह्य रूप से भले ही अंतर दिखता हो किंतु उनकी मूल आत्मा एक है। यहाँ तक कि भारत तथा उससे अलग हुए देशों के मुसलमान अपने विचारों और रीति-रिवाजों की दृष्टि से तुर्की तथा अरब देशों के मुसलमानों की अपेक्षा भारतीय हिन्दुओं के अधिक निकट हैं।
आधुनिक पारसी गुजराती बोलते हैं, उनके शादी-ब्याह के रीति-रिवाज और नीति-विधान भारतीय है। भारत के ईसाई तथा मुसलमान जिस प्रांत में रहते हैं, वे उसी प्रांत की भाषा बोलते हैं। हिन्दुओं एवं मुसलमानों के शादी-विवाह का ढंग हिन्दुओं के सात-फेरों और मुसलमानों के निकाह पढ़ने के अतिरिक्त समस्त मामलों में लगभग एक जैसा है। बहुत से हिन्दू जो मध्य-काल में मुसलमान बन गए थे, आज भी अपने घरों में हिन्दू-जीवन-शैली का पालन करते हैं।
हिन्दुओं की संस्कृति पर भी मुसलमानों के बहुत से रीति-रिवाजों का प्रभाव पड़ा है। दूल्हे के मुंह पर फूलों का सेहरा बांधना, हिन्दू रीति-रिवाजों का अंग बन गया है जबकि यह मुस्लिम संस्कृति का अंग था। यद्यपि आज का भारतीय समाज आर्य, द्रविड़़ सीथियन, हूण, तुर्क, पठान, मंगोल आदि देशी-विदेशी जातियों के सम्मिश्रण से बना है तथापि उनके खान-पान, शिष्टाचार, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद, पर्व, उत्सव, मेले आदि में काफी-कुछ समानता है।
(5.) साहित्य की एकता
भारतीय साहित्य एवं कला के विषय समस्त प्रान्तों में एक जैसे रहे हैं, यथा- धार्मिक भावना, नैतिक भावना, रहस्यानुभूति तथा प्रतीकात्मकता आदि। साहित्य एवं कला के आधार- कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, अलंकार, रस आदि समस्त जगह समान हैं। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति, बौद्ध एवं जैन साहित्य समस्त भारत में समान रूप से प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।
संस्कृत वांगमय में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मनुष्य के चार पुरुषार्थ बताया गया है। छठी शताब्दी ईस्वी में तमिल भाषा में तिरुवल्लुवर द्वारा रचित तिरुक्कुरुल में तीन अध्याय हैं जिनके शीर्षक क्रमशः धर्म, अर्थ एवं काम हैं। जिस प्रकार संस्कृत वांगमय की धार्मिक रचनाओं के प्रारम्भ में मंगलाचरण एवं देवस्तुति की परम्परा है, ठीक उसी तरह इस ग्रंथ के प्रारम्भ में भी ईशस्तुति की गई है।
(6.) कलाओं की एकता
देश भर में स्थित कला-स्मारकों में प्रान्तीय विशेषताएं होते हुए भी स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत और रंगमंच आदि में भारतीयता ही दिखाई देती है। अजन्ता, एलोरा, विदिशा उदयगिरी, बोधगया के चैत्य एवं विहार तथा सारनाथ, साँची, भरहुत, अमरावती, मथुरा, गया आदि स्थानों के विहार तथा स्तूप भारत को एक ही धार्मिक भावना से प्रेरित सिद्ध करते हैं।
अंतर केवल इतना है कि हिन्दुओं के स्थापत्य एवं विविध प्रकार की ललितकलाओं में हिन्दू देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है, बौद्धों के स्थापत्य एवं ललितकलाओं में भगवान बुद्ध एवं अन्य बौद्ध देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है। जैनों के स्थापत्य एवं विविध प्रकार की ललितकलाओं में जैन तीर्थंकरों एवं जैन देवी-देवताओं को प्रमुखता दी गई है।
(7.) भाषाई एकता
भारतीयों की मान्यता है कि उन्हें भाषा का ज्ञान देवताओं ने करवाया। देवताओं की भाषा ‘संस्कृत’ थी। इसलिए भारतीय आज भी ‘संस्कृत’ को ‘देवभाषा’ कहते हैं। प्राचीन आर्यों द्वारा मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाए गए वेदों की भाषा भी संस्कृत थी। इसलिए भारत में सांस्कृतिक विचारों का आदान-प्रदान संस्कृत भाषा के माध्यम से ही आरम्भ हुआ तथा संस्कृत भाषा में अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई।
रामायण, महाभारत, उपनिषद, गीता एवं पुराण भी संस्कृत में लिखे गए। यद्यपि प्रारम्भिक जैन एवं बौद्ध मतावलम्बियों ने प्राचीन वैदिक संस्कृति से विद्रोह करके अपने-अपने दर्शनों का प्रसार किया था इसलिए बौद्धों ने प्राकृत और जैनों ने पालि भाषा को अपने उपदेशों का मुख्य माध्यम बनाया किंतु बौद्धिक प्रतिस्पर्द्धा की दृष्टि से उन्हें भी बाद में संस्कृत भाषा को ही अपनाना पड़ा। राजनैतिक अध्ययन एवं शासन तंत्र में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग होता था। अतः यह अन्तर-प्रान्तीय उपयोग की भाषा बन गई। मध्य-युग तक इसका खूब प्रचार रहा तथा इस काल में भी अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गए।
हिन्दी तथा देश की विविध प्रान्तीय भाषाओं यथा- मराठी, गुजराती, बंगला, पंजाबी, तमिल, तेलुगू आदि का मूल स्रोत भी संस्कृत है। इनकी शब्दावली पर संस्कृत का ही अधिक प्रभाव है। इन समस्त भाषाओं के साहित्य में भी समानता है, क्योंकि उनके प्रेरणा के मूल स्रोत रामायण, महाभारत एवं पुराणों की कथाएँ, उनके नायकों के जीवन चरित्र, देवी-देवताओं के वृत्तान्त ही रहे हैं।
इस प्रकार संस्कृत ने प्रान्त, जाति, सम्प्रदाय और बोली आदि का अतिक्रमण करके भारतीयों को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। तुर्कों एवं मुगलों के काल में जब देश में तुर्की एवं फारसी का प्रचार हुआ तो हिन्दी सहित समस्त प्रांतीय भाषाओं में तुर्की एवं फारसी शब्दों का प्रवेश हो गया।
अतः निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि क्षेत्र, भाषा, धर्म एवं जाति के आधार पर भारतीय संस्कृति में भले ही अलग-अलग प्रकार के तत्त्व दिखाई देते हों किंतु उन सबका आत्म-तत्त्व एक ही है और वह केवल भारतीयता है, भारतीयता के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत
सौभाग्य से भारतीय संस्कृतिका इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत विपुल मात्रा में उपलब्ध हैं। प्राचीनतम काल की भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने का सबसे बड़ा साधन तो स्वयं वेद ही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि वेदों को केवल धार्मिक साहित्य समझकर न पढ़ा जाए अपितु उनमें में लिखी गई ऋचाओं के संदर्भों को संस्कृति के इतिहासके परिप्रेक्ष्य में भी समझा जाए।
लोकांचल में बहुत पहले से ही संख्या, लिपि, गणना, धातुतन्त्र, आदि शास्त्र प्रचलित रहे हैं और ऐसे ही अप्रमेय शिल्पयोग लोकानुबन्धी हैं और बहुत कोटि कल्पों से इनकी शिक्षा पाई जाती है। – ललितविस्तर, 10, 297.
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सभ्यता एवं संस्कृतियां जब विकास करती हैं तो उनके आरम्भिक चरण में मानव को भाषा, लिपि, लेखनकला, चित्रकला एवं मूर्तिकला आदि का ज्ञान नहीं होता। इसलिए उस काल का इतिहास जुटाने में भौतिक अवशेषों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए अण्डमान निकोबार के एक आदिवासी समुदाय की बस्ती के बाहर स्थित टीलों की खुदाई करके पता लगाया जा सकता है कि उस टीले में मछलियों की हड्डियां, नारियल के कड़े छिलके, कछुओं के खोल, बड़े पशुओं की हड्डियां एक के ऊपर एक कितने स्तरों में दबे हुए हैं? वे कितने पुराने हैं? विभिन्न स्तरों में जमा मछलियों एवं नारियलों को छीलने के लिए किस सामग्री अथवा विधि का प्रयोग किया गया था? इस सामग्री के अध्ययन से न केवल उस टीले में रहने वाले आदिवासियों की प्राचीनता का ज्ञान होता है अपितु विभिन्न कालखण्ड में उस कबीले की अनुमानित संख्या, खान-पान की आदतों एवं रहन-सहन के तौर तरीकों आदि का भी अनुमान हो जाता है। इसी प्रकार उस बस्ती के आसपास स्थित शवाधानों (कब्रों) की खोज करके उनके रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा उनके धार्मिक विचारों आदि का पता लगाया जा सकता है। उन शवों की हड्डियों की कार्बन डेटिंग से उनकी आयु तथा नृवंशविज्ञान के माध्यम से उन मृत मानवों की मूल नृवंशीय जाति का पता लगाया जा सकता है कि वे नीग्रेटो जाति के हैं या भूमध्यसागरीय द्रविड़ हैं या पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स जाति के हैं।
विश्व की अन्य सभ्यताओं की भांति प्राचीन भारतीयों ने भी अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़़े हैं जिन्हें जोड़कर इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय इतिहास का निर्माण किया है। जब कोई सभ्यता मूर्तिकला, स्थापत्य कला तथा लेखन कला का विकास कर लेती है तब उस सभ्यता का इतिहास जानने के दो प्रमुख स्रोत उपलब्ध हो जाते हैं- (1.) साहित्यक स्रोत तथा (2.) पुरातात्विक स्रोत। इस अध्याय में हम भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए इन दोनों स्रोतों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
साहित्यिक स्रोत
सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए उपलब्ध प्राचीन भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) भारतीय साहित्यिक स्रोत तथा (2) विदेशी विवरण।
(1.) भारतीय साहित्यिक स्रोत
भारतीयों को ई.पू. 2500 में लिपि की जानकारी हो चुकी थी परन्तु सबसे प्राचीन उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा पूर्व चौथी सदी की हैं। ये हस्तलिपियाँ मध्य एशिया से प्राप्त हुई हैं। भारत में ये लिपियाँ भोजपत्रों और ताड़पत्रों पर लिखी गई हैं, परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत की प्राकृत भाषा का प्रचार हो गया था, ये हस्तलिपियाँ मेष-चर्म तथा काष्ठ-पट्टियों पर भी लिखी गई हैं।
इन्हें भले ही अभिलेख कहा जाता हो, परन्तु ये हस्तलिपियाँ ही हैं। चूँकि उस समय मुद्रण-कला का जन्म नहीं हुआ था इसलिए ये हस्तलिपियाँ अत्यधिक मूल्यवान समझी जाती थीं। समस्त भारत से संस्कृत की पुरानी हस्तलिपियाँ मिली हैं, परन्तु इनमें से अधिकतर हस्तलिपियाँ दक्षिण भारत, कश्मीर एवं नेपाल से प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार के अधिकांश हस्तलिपि-लेख, संग्रहालयों और हस्तलिपि ग्रंथालयों में सुरक्षित हैं। ये हस्तलिपियां प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।
प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (अ.) धार्मिक ग्रन्थ (ब.) अन्य ग्रन्थ।
(अ.) धार्मिक ग्रन्थ
यद्यपि अधिकांश प्राचीन भारतीय ग्रंथ, धार्मिक विषयों से सम्बन्धित हैं तथापि वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, धर्मसूत्र, बौद्ध-साहित्य, जैन साहित्य आदि धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं। बिम्बसार के पहले के राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिए ये ग्रंथ ही प्रमुख साधन हैं। इनमें धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तथ्यों की प्रचुरता के साथ-साथ राजनैतिक तथ्य भी मिलते हैं।
(i) हिन्दू-धर्म ग्रंथ
हिन्दुओं के धार्मिक साहित्य में वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण और महाभारत) तथा पुराणों आदि का समावेश होता है। यह साहित्य, प्राचीन भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों पर काफी प्रकाश डालता है किंतु इनके देश-काल का पता लगाना काफी कठिन है।
वैदिक साहित्य
ऋग्वेद सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ है। इतिहासकार इसके रचनाकाल के बारे में एकमत नहीं हो सके हैं। जर्मन विद्वान याकोबी के अनुसार ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.4500 से ई.पू. 3000 है तथा ब्राह्मणों का रचनाकाल ई.पू. 3000 से ई.पू. 2000 है। सुप्रसिद्ध लेखक पी. वी. काणे ने वेदों का रचना काल ई.पू.4000 से ई.पू.1000 माना है। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.1500 से ई.पू.1000 के बीच की अवधि का मानते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषदों को ई.पू.1000-500 के लगभग का माना जाता है।
प्रायः समस्त वैदिक ग्रंथों में क्षेपक मिलते हैं जिन्हें सामान्यतः प्रारम्भ अथवा अंत में देखा जा सकता है। कहीं-कहीं ग्रंथ के बीच में भी क्षेपक मिलते हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः प्रार्थनाएं मिलती हैं और बाद के वैदिक ग्रंथों में प्रार्थनाओं के साथ-साथ कर्मकांडों, जादू टोनों और प्राचीन व्याख्यानों का समावेश मिलता है। उपनिषदों में दार्शनिक चिंतन प्रमुखता से मिलता है।
पुराण
अधिकांश प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। प्रमुख पुराण 18 हैं। इनमें विष्णु-पुराण, स्कन्द पुराण, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण आदि प्रमुख हैं। पुराणों से प्राचीन काल के राज-वंशों की वंशावली का पता चलता है। पुराण, चार युगों का उल्लेख करते हैं- कृतयुग (सत्युग), त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग।
बाद में आने वाले प्रत्येक युग को पहले के युग से अधिक निकृष्ट बताया गया है और यह भी बताया गया है कि एक युग के समाप्त होने पर जब नए युग का आरम्भ होता है तो नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक मानदण्डों का अधःपतन होता है।
महाकाव्य
वाल्मीकि कृत रामायण एवं वेदव्यास कृत महाभारत को महाकाव्य माना जाता है। डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। इसी प्रकार रामायण में मूलरूप से 12,000 श्लोक थे जो आगे चलकर 24,000 हो गए। इस महाकाव्य में भी उपदेश मिलते हैं जिन्हें बाद में जोड़ा गया है। अनुमान है कि रामायण का वर्तमान स्वरूप, महाभारत ग्रंथ की रचना के बहुत बाद में लिखा गया।
महाभारत की रचना ई.पू. चौथी शताब्दी (मौर्यकाल) मानी जाती है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। रामायण और महाभारत में ई.पू. दसवीं शताब्दी से ई.पू. चौथी शताब्दी तक की परिस्थितियों को चित्रित किया गया है। महाभारत में मूलरूप से 8,800 श्लोक थे और इसे यव संहिता कहा जाता था अर्थात् विजय सम्बन्धी संचयन।
आगे चलकर इसमें 24,000 श्लोक हो गए और इसका नाम प्राचीन वैदिक कुल- ‘भरत’ के नाम पर भारत हो गया। अंत में श्लोकों की संख्या बढ़ कर एक लाख तक पहुँच गई और इसे महाभारत अथवा शतसह संहिता कहा जाने लगा। इसमें व्याख्यान, विवरण और उपदेश मिलते हैं। मुख्य व्याख्यान कौरव-पांडव संघर्ष का है जो उत्तर-वैदिक-काल का हो सकता है। विवरण वाला अंश उत्तर-वैदिक-काल का और उपदेशात्मक खण्ड उत्तर-मौर्य एवं गुप्तकाल का हो सकता है।
उत्तर-वैदिक धार्मिक साहित्य
उत्तर-वैदिक-काल के धार्मिक साहित्य में कर्मकाण्ड की भरमार मिलती है। राजाओं और तीनों उच्च वर्णों के लिए किए जाने वाले यज्ञों के नियम, स्रोतसूत्र में मिलते हैं। राज्याभिषेक जैसे उत्सवों के विवरण भी इन्हीं में है।
इसी प्रकार जन्म, नामकरण यज्ञोपवीत, विवाह, दाह आदि संस्कारों से सम्बद्ध कर्मकांड गृह्यसूत्र में मिलते हैं। स्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र- दोनों ही लगभग ई.पू. 600-300 के हैं। शल्वसूत्र में बलि-वेदियों के निर्माण के लिए विभिन्न आकारों का नियोजन है। यहीं से ज्यामिति और गणित प्रारम्भ होते हैं।
(ii) बौद्ध ग्रंथ
बौद्धों के धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों तथा घटनाक्रमों की जानकारी मिलती है। प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, यह भाषा मगध यानी दक्षिणी बिहार में बोली जाती थी। इन ग्रंथों को ईसा पूर्व दूसरी सदी में श्रीलंका में संकलित किया गया। यह धार्मिक साहित्य बुद्ध के समय की परिस्थितियों की जानकारी देता है।
इन ग्रंथों में हमें न केवल बुद्ध के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है अपितु उनके समय के मगध, उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ शासकों के बारे में भी जानकारी मिलती है। बौद्धों के गैर धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं– ‘गौतम बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बन्धित कथाएँ।’
माना जाता है कि गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध, 550 से भी अधिक पूर्वजन्मों से गुजरे। इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया। पूर्वजन्म की ये कथाएँ, जातक कथाएँ कहलाती हैं। प्रत्येक जातक कथा एक प्रकार की लोककथा है। ये जातक ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी सदी तक की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।
(iii) जैन ग्रंथ
जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई थी। इन्हें ईसा की छठी सदी में गुजरात के वल्लभी नगर में संकलित किया गया था। इन ग्रंथों में ऐसे अनेक ग्रंथ है जिनके आधार पर हमें महावीर कालीन बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को समझने में सहायता मिलती है। जैन ग्रंथों में व्यापार एवं व्यापारियों के उल्लेख बहुतायत से मिलते हैं।
(ब.) धर्मशास्त्र
धर्मसूत्र और स्मृतियों को सम्मिलित रूप से धर्मशास्त्र कहा जाता है। धर्मसूत्रों का संकलन ई.पू.600-ई.पू.200 में हुआ। प्रमुख स्मृतियों को ईसा की आरंभिक छः सदियों में विधिबद्ध किया गया। इनमें विभिन्न वर्णों, राजाओं तथा राज्याधिकारियों के अधिकारों का नियोजन है। इनमें संपत्ति के अधिकरण, विकल्प तथा उत्तराधिकार के नियम दिए गए हैं। इनमें चोरी, आक्रमण, हत्या, जारकर्म इत्यादि के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था है।
(स.) अन्य ग्रन्थ
अर्थशास्त्र, हर्षचरित, राजतरंगिणी, दीपवंश, महावंश तथा बड़ी संख्या में उपलब्ध तमिल-ग्रंथों से भी ऐतिहासिक तथ्य प्राप्त होते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधि-ग्रंथ है। इसमें मौर्य-वंश के इतिहास की जानकारी उपलब्ध होती है। यह ग्रंथ पन्द्रह अधिकरणों यानी खण्डों में विभक्त है। इनमें दूसरा और तीसरा अधिकरण अधिक प्राचीन है। अनुमान है कि इन अधिकरणों की रचना विभिन्न लेखकों ने की। इस ग्रंथ को ईस्वी सन् के आरंभकाल में वर्तमान रूप दिया गया।
इसके सबसे पुराने अंश मौर्यकालीन समाज एवं अर्थतंत्र की दशा के परिचायक हैं। इसमें प्राचीन भारतीय राजतंत्र तथा अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। प्राचीन साहित्य में भास, कालीदास और बाणभट्ट की कृतियाँ उपलब्ध हैं। इनका साहित्यिक मूल्य तो है ही, इनमें कृतिकारों के समय की परिस्थितियाँ भी प्रतिध्वनित हुई हैं।
कालीदास ने अनेक काव्यों और नाटकों की रचना की, जिनमें अभिज्ञान शाकुंतलम सबसे प्रसिद्ध है। कालीदास के इस महान् सर्जनात्मक कृतित्त्व में ‘गुप्तकालीन मध्य-भारत’ के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की भी झलक मिलती है। बाणभट्ट के हर्ष चरित से हर्ष के शासन-काल का तथा कल्हण की राजतरंगिणी से काशमीर के इतिहास का पता चलता है। दीपवंश तथा महावंश से श्रीलंका के इतिहास का पता चलता है।
संगम साहित्य
संस्कृत ग्रंथों के साथ-साथ, प्राचीनतम तमिल ग्रंथ भी उपलब्ध हैं जिन्हें ‘संगम साहित्य’ कहा जाता है। राजाओं द्वारा संरक्षित विद्या-केन्द्रों में रहने वाले कवियों ने तीन-चार सदियों के काल में इस साहित्य का सृजन किया था। चूँकि ऐसी साहित्य सभाओं को संगम कहते थे, इसलिए यह सम्पूर्ण साहित्य, संगम साहित्य के नाम से जाना जाता है।
यद्यपि इन कृतियों का संकलन ईसा की प्रारंभिक चार सदियों में हुआ, तथापि इनका अंतिम संकलन छठी सदी में होना अनुमानित है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य एकमात्र प्रमुख स्रोत है। व्यापार और वाणिज्य के बारे में इससे जो जानकारी मिलती है, उसकी पुष्टि विदेशी विवरणों तथा पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी होती है।
चरित लेखन
चरित लेखन में भारतीयों ने ऐतिहासिक विवेक का परिचय दिया है। चरित लेखन का आरम्भ सातवीं सदी में बाणभट्ट के हर्षचरित के साथ हुआ। हर्षचरित अलंकृत शैली में लिखी गई एक अर्धचरित्रात्मक कृति है। बाद में इस शैली का अनुकरण करने वालों के लिए यह बोझिल बन गई। इस ग्रंथ में हर्षवर्धन के आरंभिक कार्यकलापों का वर्णन है। यद्यपि इसमें अतिशयोक्ति की भरमार है, फिर भी इसमें हर्ष के राजदरबार की और हर्षकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। इसके बाद कई चरित्र ग्रंथ लिखे गए।
संध्याकर नंदी के रामचरित में पाल-शासक रामपाल और कैवर्त किसानों के बीच हुए संघर्ष का वर्णन है। इस संघर्ष में रामपाल की विजय हुई। बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित में अपने आश्रयदाता कल्याण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1127 ई.) की उपलब्ध्यिों का वर्णन किया है। बारहवीं और तेरहवीं सदियों में गुजरात के कुछ व्यापारियों के चरित लिखे गए।
बारहवीं सदी में रचित कल्हण की राजतरंगिणी ऐतिहासिक कृतित्त्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध चरित प्रस्तुत किया गया है यह प्रथम कृति है जिसमें आधुनिक दृष्टि युक्त इतिहास की कई विशेषताएँ निहित हैं।
(2.) विदेशी विवरण
प्राचीन भारत के इतिहास निर्माण के लिए विदेशी विवरणों का भी उपयोग किया गया है। जिज्ञासु पर्यटक के रूप में अथवा भारतीय धर्म को स्वीकार करके तीर्थयात्री के रूप में, अनेक यूनानी, रोमन तथा चीनी यात्री भारत आए और उन्होंने भारत के सम्बन्ध में आंखों देखे विवरण लिखे। विदेशी विवरणों से, भारतीय संदर्भों का कालक्रम एवं तिथि निर्धारण करना संभव हो पाया है। अध्ययन की सुविधा से विदेशी विवरण को दो भागों में बांट सकते हैं-
(अ.) विदेशी लेखकों के विवरण तथा (ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण।
(अ.) विदेशी लेखकों के विवरण
विदेशी लेखकों में यूनानी लेखक एरियन, प्लूटार्क, स्ट्रैबो, प्लिनी, जस्टिन आदि, चीनी लेखक सुमाचीन, तिब्बती लेखक तारानाथ आदि आते हैं। तारानाथ के द्वारा लिखे गए भारतीय वृत्तांत कंग्युर एवं तंग्युर नामक ग्रंथों में मिलते हैं।
(ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण
विदेशी यात्रियों में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज, चीनी यात्री फाह्यान, तथा ह्वेनत्सांग और मुसलमान विद्वान अल्बेरूनी प्रमुख हैं। यूनानी लेखकों से हमें सिकन्दर के भारतीय आक्रमण का, यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की पुस्तक इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल का, चीनी लेखकों से शक पार्थियन और कुशाण जातियों के इतिहास का, फाह्यान के विवरण से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल का, युवान-च्वांड् के ग्रंथ- ‘सि-यू-की’ के विवरण से हर्षवर्धन के शासनकाल का और अल्बेरूनी की पुस्तक- ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के विवरण से महमूद गजनवी के आक्रमण के समय के भारत के राजनीतिक वातावरण का ज्ञान होता है।
विदेशी विवरणों का मूल्यांकन
भारतीय स्रोतों में ई.पू. 324 में सिकंदर के भारत पर आक्रमण की कोई जानकारी नहीं मिलती। उसके भारत में प्रवास एवं उपलब्धियों के इतिहास की रचना के लिए यूनानी विवरण ही एकमात्र उपलब्ध स्रोत हैं। यूनानी यात्रियों ने, सिकंदर के एक समकालीन भारतीय योद्धा के रूप में सैण्ड्रोकोटस का उल्लेख किया है। यूनानी विवरणों का यह राजकुमार सैण्ड्रोकोटस और भारतीय इतिहास का चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसके राज्यारोहण की तिथि 322 ई.पू. निर्धारित की गई है, एक ही व्यक्ति थे।
यह पहचान प्राचीन भारत के तिथिक्रम के लिए सुदृढ़़ आधारशिला बन गई है। इस तिथि क्रम के बिना भारतीय इतिहास की रचना करना सम्भव नहीं है। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी दूत मेगस्थिनीज की इण्डिका उन उद्धरणों के रूप में संरक्षित है जो अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने उद्धृत किए हैं। इन उद्धरणों को मिलाकर पढ़ने पर न केवल मौर्य शासन-व्यवस्था के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है अपितु मौर्यकालीन सामाजिक वर्गों तथा आर्थिक क्रियाकलापों के बारे में भी जानकारी मिलती है।
यह कृति आंखें मूँदकर मान ली गई बातों अथवा अतिरंजनाओं से मुक्त नहीं है। अन्य प्राचीन विवरणों पर भी यह बात लागू होती है। ईसा की पहली और दूसरी सदियों के यूनानी तथा रोमन विवरणों में भारतीय बन्दरगाहों के उल्लेख मिलते हैं और भारत तथा रोमन साम्राज्य के बीच हुए व्यापार की वस्तुओं के बारे में भी जानकारी मिलती है।
यूनानी भाषा में लिखी गई टोलेमी की ‘ज्योग्राफी’ और ‘पेरीप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी’ पुस्तकें, प्राचीन भारतीय भूगोल और वाणिज्य के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री प्रदान करती हैं। पहली पुस्तक में मिलने वाली आधार सामग्री ईस्वी 150 की और दूसरी पुस्तक ईस्वी 80 से 115 की मानी जाती है। प्लिनी की ‘नेचुरलिस हिस्टोरिका’ पहली शताब्दी ईस्वी की है। यह लैटिन भाषा में है और भारत एवं इटली के बीच होने वाले व्यापार की जानकारी देती है।
चीनी पर्यटकों में फाह्यान और युवान-च्वांड् प्रमुख हैं। दोनों ही बौद्ध थे। वे बौद्ध तीर्थों का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन करने भारत आए थे। फाह्यान ईसा की पांचवी सदी के प्रारंभ में आया था और युवान-च्वांड् सातवीं सदी के दूसरे चतुर्थांश में। फाह्यान ने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी दी है, तो युवान-च्वांड् ने हर्षकालीन भारत के बारे में इसी प्रकार की जानकारी दी है।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत
भारतीयसंस्कृति का इतिहासजानने के पुरातात्विक स्रोत गुफाओं, नदियों के किनारों, तालाबों के किनारों, टीलों तथा धरती में दबे हुए मिलते हैं। पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर भारत की संस्कृति का इतिहास लिखा गया है।
पुरातात्विक स्रोतों को को मुख्यतः चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) अभिलेख (2) दानपत्र (3) मुद्राएँ और (4) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष।
भारतीयसंस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत
(1.) अभिलेख
अभिलेखों में भारतीयसंस्कृति का इतिहास छिपा पड़ा है। प्राचीन भारत का इतिहास जानने के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विश्वसनीय साधन अभिलेख हैं। ये प्रधानतः स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर मिलते हैं परन्तु कभी-कभी मूर्तियों, पात्रों तथा ताम्रपत्रों पर भी अंकित मिलते हैं। ये लेख देशी तथा विदेशी दोनों हैं। देशी अभिलेखों में अशोक के अभिलेख, प्रयाग का स्तम्भ लेख तथा हाथीगुम्फा के अभिलेख सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। विदेशी अभिलेखों में एशिया माइनर में स्थित बोगजकोई के अभिलेख अधिक प्रसिद्ध हैं।
अशोक के अभिलेखों से उसके धर्म तथा उसकी शिक्षाओं का परिचय मिलता है। अशोक के अभिलेख ही उसकी शिक्षाओं तथा राजाज्ञाओं को जानने का एकमात्र साधन हैं। इसी प्रकार हाथीगुम्फा के अभिलेख खारवेल-नरेश के शासन काल का इतिहास जानने के एकमात्र साधन हैं। बोगजकोई के अभिलेख से भी भारतीय इतिहास पर यत्किंचित प्रकाश पड़ा है।
अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘प्रारंभिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।’
पश्चिमी इतिहासकार फ्लीट ने अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हमें केवल अभिलेखों के धैर्यपूर्ण अध्ययन से प्राप्त होता है।’
पुरालेख
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प्राचीन अभिलेखों को पुरालेख कहते हैं तथा प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहते हैं। पुरालेखों तथा अन्य प्राचीन लेखों की प्राचीन लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहते हैं। मुद्राओं, मुहरों, प्रस्तरों, स्तंभों, चट्टानों, ताम्रपत्रों, विजय-स्तम्भों तथा मंदिरों की भित्तियों के साथ-साथ ईंटों और मूर्तियों पर भी पुरालेख उत्कीर्ण किए गए हैं। ये पूरे देश में प्राप्त होते हैं। ईसा की आरंभिक सदियों में इस कार्य के लिए ताम्रपत्रों का उपयोग होने लगा था किंतु पत्थरों पर भी भारी संख्या में लेख उत्कीर्ण किए जाते रहे। सम्पूर्ण भारत में मंदिरों की दीवारों पर भी स्थायी स्मारकों के रूप में भारी संख्या में अभिलेख खोदे गए हैं। विभिन्न स्थानों से लाखों की संख्या में प्राप्त अभिलेख देश के विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, पर सर्वाधिक संख्या में अभिलेख, मैसूर के प्रमुख पुरालेख शास्त्री के कार्यालय में संगृहीत हैं। मौर्य, मौर्योत्तर, सीथियन, गुप्त तथा कलचुरी काल के अधिकांश अभिलेख कार्पस् इंस्क्रिप्शओनम् इंडिकारम नामक ग्रंथमाला के चार खण्डों में संगृहीत एवं प्रकाशित किए गए हैं। गुप्तोत्तर काल के अभिलेख सुव्यवस्थित रूप से संगृहीत नहीं हो पाए हैं। दक्षिण भारत के अभिलेखों की लिपि-शैलियों की सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं। फिर भी 50,000 से भी अधिक अभिलेखों का, जिनमें अधिकांश दक्षिण भारत के लेख हैं, प्रकाशन अभी शेष है।
पुरालेखों की भाषा
भारत के सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं और ईसा पूर्व तीसरी सदी के हैं। ईसा की दूसरी सदी में अभिलेखों के लेखन के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया गया। चौथी-पांचवीं सदी में संस्कृत भाषा का सर्वत्र प्रचार-प्रचार हुआ किंतु तब भी प्राकृत भाषा का उपयोग होता रहा। प्रादेशिक भाषाओं में अभिलेखों की रचना नौवीं-दसवीं शताब्दियों से होने लगी।
पुरालेखों की लिपि
हड़प्पा संस्कृति के अभिलेख, जिनको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, सम्भवतः एक ऐसी भावचित्रात्मक लिपि में लिखे गए हैं जिसमें विचारों एवं वस्तुओं को चित्रों के रूप में व्यक्त किया जाता था। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किए गए हैं, यह लिपि दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत से प्राप्त अशोक के कुछ लेख खरोष्ठी लिपि में भी हैं, ये भी दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी।
पश्चिमोत्तर भारत के अतिरिक्त शेष प्रदेशों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रचार रहा। अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेखों के लिए यूनानी और ब्राह्मी लिपियों का भी उपयोग हुआ है। गुप्तकाल के अंत तक देश की प्रमुख लिपि ब्राह्मी-लिपी ही बनी रही। गुप्तकाल के बाद ब्राह्मी-लिपि की प्रादेशिक शैलियों में बड़ा अंतर आया और उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए।
पुरालेखों का कालक्रम
भारत से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन लेख, हड़प्पा संस्कृति की मुहरों पर मिलते हैं। ये लगभग 2500 ई.पू. के हैं। इन पुरालेखों को पढ़ना अब तक सम्भव नहीं हो पाया है। सबसे पुराने जिन अभिलेखों को पढ़ना सम्भव हो पाया है वे ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख हैं। फिरोजशाह तुगलक ने मेरठ में अशोक के एक स्तम्भलेख का पता लगाया था।
उसने यह अशोक-स्तंभ दिल्ली मंगवाया और अपने राज्य के पंडितों से इस पर उत्कीर्ण लेख को पढ़ने का आदेश दिया किन्तु किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली। अठारहवीं सदी के अंतिम चरण में अंग्रेजों ने जब अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें भी इसी कठिनाई का सामना करना पड़ा। ई.1837 में जेम्स प्रिंसेप को इन अभिलेखों को पढ़ने में पहली बार सफलता मिली जो बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का सिविल अधिकारी था।
पुरालेखों के प्रकार
पुरालेख कई प्रकार के हैं। कुछ अभिलेखों में अधिकारियों और जन-सामान्य के लिए जारी किए गए सामाजिक, धार्मिक तथा प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचनाएं हैं। अशोक के अभिलेख इसी कोटि के हैं।
दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे आनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें, बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने स्तंभों, प्रस्तर-फलकों, मंदिरों अथवा मूर्तियों पर उत्कीर्ण करवाया है।
तीसरे वर्ग में प्रशस्तियों के रूप में लिखे गए अभिलेख हैं जिनमें राजाओं तथा विजेताओं के गुणों और उनकी सफलताओं का विवरण रहता है, पर उनकी पराजयों तथा कमजोरियों का कोई उल्लेख नहीं रहता। चन्द्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति इसी कोटि की है।
चौथे वर्ग में दान अभिलेख मिलते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों, कारीगरों तथा व्यापारियों के द्वारा, धार्मिक प्रयोजन से धन, स्वर्ण, रत्न, मवेशी, भूमि आदि के रूप में दिए गए विशिष्ट दान का उल्लेख रहता है।
(2.) दानपत्र
दानपत्रों से भी भारतीयसंस्कृति का इतिहास ज्ञात होता है। राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमिदानों से सम्बन्धित अभिलेख विशेष महत्त्व के हैं। इनसे प्राचीन भारत के भूमिबन्दोबस्त के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। अधिकांश दानपत्र, ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण हैं। इन अभिलेखों में भिक्षुओं, पुरोहितों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों तथा अधिकारियों को दिए गए गांवांे, भूमियों तथा राजस्व के दानों का उल्लेख रहता है।
(3.) मुद्राएँ
मुद्राएं भारतीयसंस्कृति का इतिहास बताती हैं तथा संसकृति के पक्ष में ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में मुद्राओं से बड़ी सहायता मिली है। इनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्मिथ ने लिखा है- ‘सिकन्दर के आक्रमण के समय से मुद्राएँ प्रत्येक युग में इतिहास के अन्वेषण के कार्य में अमूल्य सहायता पहुँचाती रही हैं।’
वास्तव में ई.पू. 206 से ई.300 तक के भारतीय इतिहास को जानने के प्रधान साधन मुद्राएँ ही हैं। इण्डो-पार्थियन तथा बैक्ट्रियन लोगों के इतिहास का पता हमें मुद्राओं से ही लगता है। मुद्राओं से हमें राजाओं के नाम, उनकी वेष-भूषा, उनके शासन-काल तथा उनके राजनीतिक एवं धार्मिक विचारों को जानने में बड़ी सहायता मिली है। राज्य की सीमा निर्धारित करने में भी कभी-कभी मुद्राओं का सहारा लिया जाता है।
मुद्राओं से राज्य की आर्थिक दशा का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यदि मुद्राएँ शुद्ध सोने-चांदी की होती हैं तो उनसे देश की सम्पन्नता प्रकट होती है परन्तु यदि वे मिश्रित धातुओं की होती हैं तो उनसे राज्य की विपन्नता का पता लगता है। मुद्राओं के चित्रों तथा अभिलेखों से राज्य की कला तथा साहित्य की अवस्था का भी ज्ञान होता है।
गुप्तकालीन मुद्राएँ बड़ी ही सुन्दर तथा कलात्मक हैं और उन पर शुद्ध तथा गीतमय संस्कृत लेख लिखे हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गुप्त-सम्राट् साहित्य तथा कला के प्रेमी थे। प्राचीन भारत में सिक्कों पर धार्मिक चिह्न और संक्षिप्त लेख अंकित होते थे जिनसे उस समय की कला एवं धार्मिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है।
मुद्राशास्त्र
सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। सबसे प्राचीन सिक्के आग में पकाई हुई मिट्टी के हैं। उसके बाद तांबा, चांदी, सोना और लेड (सीसा) धातुओं से सिक्के बनाये गए। पूरे देश से पकी हुई मिट्टी से बनाए गए सिक्कों के सांचे बड़ी संख्या में मिले हैं। इनमें से अधिकांश सांचे कुषाण काल के अर्थात् ईसा की आरंभिक तीन सदियों के हैं। गुप्तोत्तर काल में ये सांचे लगभग लुप्त हो गए।
प्राचीन काल में लोग अपना पैसा मिट्टी तथा कांसे के बर्तनों में जमा रखते थे। ऐसी अनेक निधियों, जिनमें न केवल भारतीय सिक्के हैं अपितु रोमन साम्राज्य जैसी विदेशी टकसालों में ढाले गए सिक्के भी हैं, देश के अनेक भागों में खोजी गई हैं। ये निधियां अधिकतर कलकत्ता, पटना, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, बम्बई और मद्रास के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। बहुत से भारतीय सिक्के इंगलैण्ड, नेपाल, बांगलादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के संग्रहालयों में भी रखे गए हैं।
ब्रिटेन ने भारत पर लम्बे समय तक शासन किया, इसलिए ब्रिटेन के सार्वजनिक संग्रहालयों के साथ-साथ ब्रिटिश अधिकारियों के निजी संग्रहालयों में भी भारतीय सिक्के संग्रहीत किए गए हैं। विभन्न संग्रहालयों द्वारा भारत के प्रमुख राजवंशों के सिक्कों की सूचियां तैयार करके प्रकाशित करवाई गई हैं। कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम तथा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम आदि के सिक्कों की सूचियां उपलब्ध हैं परन्तु अब भी सिक्कों के अनेक संग्रहों की सूचियां नहीं बन पायी हैं और न ही प्रकाशित हुई हैं।
हमारे देश के सबसे पुराने सिक्कों पर कुछ चिह्न देखने को मिलते हैं, पर बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवी-देवताओं के नाम तथा तिथियाँ अंकित की गई हैं। जिन-जिन स्थानों पर ये सिक्के मिलते हैं उनके बारे में स्पष्ट हो जाता है कि उस प्रदेश में इनका प्रचलन रहा है। इस प्रकार खोजे गए सिक्कों के आधार पर कई राजवंशों के इतिहास की पुनर्रचना सम्भव हुई है। विशेषतः उन हिन्द-यवन शासकों के इतिहास की जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुँचे थे और जिन्होंने ईसा पूर्व दूसरी एवं पहली सदियों में भारतीय क्षेत्रों पर शासन किया था।
सिक्कों से, क्षेत्र विशेष एवं काल विशेष के आर्थिक हतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। प्राचीन भारत में राजाओं की अनुमति से, बड़े व्यापारियों एवं स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने सिक्के चलाए। इससे शिल्प और व्यापार की उन्नत व्यवस्था की सूचना मिलती है। सिक्कों के कारण बड़ी मात्रा मे लेन-देन करना सम्भव हुआ और व्यापार को बढ़ावा मिला।
सबसे अधिक सिक्के मौर्योत्तर काल के मिले हैं, विशेषतः तांबे, चादी एवं सोने के सिक्के। गुप्त शासकों ने सोने के सबसे अधिक सिक्के जारी किए। इससे पता चलता है कि गुप्तकाल में व्यापार और वाणिज्य खूब बढ़ा। गुप्तोत्तर काल के बहुत कम सिक्के मिले हैं, इससे उस समय में व्यापार और वाणिज्य की अवनति की सूचना मिलती है।
(4.) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष
प्राचीन भवन एवं उनके अवशेष भारतीयसंस्कृति का इतिहास एवं उसकी गौरवगाथा बताते हैं। प्राचीन काल के मन्दिरों, मूर्तियों, स्तूपों, खण्डहरों आदि के अध्ययन से भी प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में बड़ी सहायता मिली है। यद्यपि इनसे राजनीतिक दशा का विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं होता है परन्तु धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है। प्राचीन स्मारकों का अध्ययन कर विभिन्न कालों की कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया गया है। काल विशेष में किस सामग्री का प्रयोग किया जाता था और किस शैली में इसका निर्माण होता था आदि बातों की जानकारी प्राप्त हुई है।
कला-कृतियों की प्राचीनता का अध्ययन कर कालक्रम को भी निर्धारित किया गया है। मूर्तियों तथा मन्दिरों के अध्ययन से लागों के धार्मिक विचारों तथा विश्वासों का पता लगता है। गुप्तकाल की मूर्तियों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उस काल में वैष्णव, शैव, बौद्ध आदि धर्मों का प्रचलन था और उनमें धार्मिक सहिष्णुता थी। मूर्तियों और चित्रों का अध्ययन करने से हमें सामाजिक दशा का भी पता लगता है क्योंकि इनसे लोगों की वेश-भूषा, खान-पान, वनस्पतियों तथा पालतू पशुओं आदि का पता लगता है।
प्राचीन स्मारकों के अध्ययन से हमें स्थानीय शासकों के परस्पर सम्बन्धों तथा विदेशी शासकों के साथ सम्बन्धों का भी ज्ञान होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के स्मारकों से ज्ञात होता है कि भारत का विदेशी शासकों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। पुराने खण्डहरों की खुदाइयों से इतिहास निर्माण में उपयोगी मूल्यवान सामग्री मिलती है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में जो खुदाइयाँ हुई हैं उनसे भारत की एक अत्यन्त प्राचीन सभ्यता का पता लगा है जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता कहा गया है।
टीलों का उत्खनन
पूरे भारत में प्राचीन समारक एवं भवनों के अवशेष देखने को मिलते हैं। इनमें से अधिकांश स्मारकों एवं भवनों के अवशेषों को मिट्टी के टीलों के नीचे से खोद कर निकाला गया है। दक्षिण भारत में पत्थर के मंदिर और पूर्वी भारत में ईटों से बने विहार, टीलों के नीचे मिले हैं। इनमें से जिन थोड़े से टीलों का उत्खनन हुआ है, उन्हीं से हमें प्राचीन काल के जन-जीवन के बारे में कुछ जानकारी मिली है। टीलों का उत्खनन दो प्रकार से हो सकता है- (1.) लम्बरूप खुदाई तथा (2.) क्षैतिज खुदाई।
लम्बरूप खुदाई सस्ती पड़ती है। इसलिए भारत में अधिकांश स्थलों की खुदाई लम्बरूप में की गई है। इस खुदाई का लाभ यह है कि इससे एक क्षेत्र पर विभिन्न कालों में होने वाले क्रमिक सांस्कृतिक विकास का अध्ययन करने में सहायता मिलती है किंतु इस प्रकार के उत्खनन से प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक चरणों के भौतिक जीवन का पूर्ण और समग्र चित्र नहीं मिल पाता। किसी भी काल की समग्र जानकारी प्राप्त करने के लिए क्षैतिज खुदाई करना आवश्यक है किंतु अत्यधिक खर्चीली होने के कारण क्षैतिज खुदाईयां बहुत कम की गई हैं।
विभिन्न टीलों के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष, विभिन्न अनुपातों में सुरक्षित रखे गए हैं। सूखी जलवायु के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमोत्तर भारत के पुरावशेष अधिक सुरक्षित बने रहे, परन्तु मध्य गंगा घाटी और डेल्टाई क्षेत्रों की नम और आर्द्र जलवायु में लोहे के औजार भी गल गए। कच्ची मिट्टी से बने भवनों के अवशेषों का दिखाई देना कठिन होता है इस कारण नम और जलोढ़ क्षेत्रों में पक्की ईटों और पत्थर के बने हुए भवनों के काल के अवशेष ही प्राप्त होते हैं।
पश्चिमोत्तर भारत में किए गए उत्खननों से ऐसे नगरों का पता चला है जिनकी स्थापना लगभग 2500 ई.पू. में हुई थी। इसी प्रकार के उत्खननों से हमें गंगा की घाटी में विकसित हुई भौतिक संस्कृति के बारे में जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि उस समय के लोग जिस प्रकार की बस्तियों में रहते थे उनका विन्यास क्या था, वे किस प्रकार के मृद्भांडों का उपयोग करते थे, किस प्रकार के घरों में रहते थे, किन अनाजों का उपयोग करते थे, और किस प्रकार के औजारों अथवा हथियारों का उपयोग करते थे।
दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन आदि भी रख देते थे और इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े़ पत्थर खडे़ करते थे। ऐसे स्मारकों को महापाषाण कहते हैं। समस्त महापाषाण इस श्रेणी में नहीं आते।
जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत् उत्खनन किया जाता है उसे पुरातत्त्व कहते हैं। उत्खनन और गवशेषणा के फलस्वरूप प्राप्त भौतिक अवशेषों का विभिन्न प्रकार से वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है जिससे यह पता चलता है कि वे स्थान कहाँ हैं, जहाँ से ये धातुएँ प्राप्त की गईं। इनसे धातु विज्ञान के विकास की अवस्थाओं का पता लगाया जाता है। पशुओं की हड्डियों का परीक्षण कर पालतू पशुओं तथा उनसे लिए जाने वाले कामों के बारे में जानकारी एकत्रित की गई है।
भारतीयों में ऐतिहासिक विवेक
प्राचीन भारतीयों पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें ऐतिहासिक बोध का अभाव था। यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय लेखकों ने वैसा इतिहास नहीं लिखा जैसा आजकल लिखा जाता है, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह इतिहास ग्रंथ लिखे किंतु हमारे धर्मग्रंथों में, विशेषकर पुराणों में तत्कालीन इतिहास मिलता है जो वस्तु-तत्त्व की दृष्टि से विश्वकोशीय है और गुप्त साम्राज्य के प्रारंभ तक के राजवंशीय इतिहास को उपलब्ध कराता है। काल-बोध, जो इतिहास का एक महत्त्वूपर्ण घटक है, अभिलेखों में देखने को मिलता है।
इनमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं से सम्बन्धित किसी शासक विशेष के शासन वर्षों का उल्लेख रहता है। प्राचीन भारत में कई संवत् आरम्भ किए गए जिनके आधार पर घटनाओं को अंकित किया गया। विक्रम संवत्, 58 ई.पू. में आरम्भ हुआ, शक संवत् 78 ई.पू. में और गुप्त संवत 319 ई.पू. में। अभिलेखों में स्थानों और तिथियों का उल्लेख रहता है। पुराणों और जीवन चरित्रों में घटनाओं के कारण तथा परिणाम दिए गए हैं। इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए ये सब चीजें अपरिहार्य हैं, परन्तु इनके बारे में सुव्यवस्थित जानकारी नहीं मिलती।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीयसंस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
अनुक्रमणिका – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के अध्यायों की सूची दी गई है। पाठक इन अध्यायों के शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धि अध्याय तक पहुंच सकते हैं।
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भारत में चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय लेकर आए। उनके भारत आगमन का समय भारत के इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। उस काल में मुहम्मद गौरी हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को मारकर दिल्ली, अजमेर, हांसी, संभल सहित सम्पूर्ण चौहान साम्राज्य को निगल जाना चाहता था।
ऐसे संकट काल में सूफी दरवेश बड़ी संख्या में भारत के विभिन्न नगरों में आकर बैठ गए। ये दरवेश अपने मीठे गीतों एवं सम्मोहक नृत्यों के द्वारा हिन्दू प्रजा को अपनी ओर लुभाने लगे। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भी उनमें से एक थे। उन्होंने अजमेर में अपना डेरा जमाया। इस ई-बुक में भारत के चिश्तिया सम्प्रदाय तथा ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।
यह पुस्तक अमेजन पर ई-बुक के रूप में एक साथ पढ़ी जा सकती है।
अनुक्रमणिका – रजिया सुल्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक रजिया सुल्तान के अध्यायों का क्रम दिया गया है। आप नीचे दिए गए अध्याय शीर्षकों पर क्लिक करके सीधे ही उन अध्यायों तक पहुंच सकते हैं।
रजिया सुल्तान मध्यकालीन भारत के इतिहास की एक प्रमुख महिला शासक थी। भारतीय इतिहास के क्षितिज पर उसका आगमन कट्टरपंथी इस्लामिक चिंतन से ग्रस्त तुर्की अमीरों के बीच हुआ जिन पर नियंत्रण पाना कोई आसान बात नहीं थी। फिर भी रजिया ने उन्हें नियंत्रित किया तथा सुल्तान की अवज्ञा करने वाले अमीरों को कोड़ों से पीटा।
उस युग में एक मुस्लिम महिला के लिए किसी मुस्लिम पुरुष को पीटना सरल कार्य नहीं था किंतु रजिया ने यह किया।
रजिया सुल्तान बिना कोई पर्दा किए, पुरुष सुल्तानों की तरह घोड़े पर बैठकर अपनी प्रजा का सुख-दुख जानने के लिए दिल्ली की सड़कों पर निकलती थी। उस युग में किसी महिला के लिए ऐसा करना संभव नहीं था किंतु रजिया ने इसे संभव करके दिखाया।
इस ई-बुक में डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने रजिया के इतिहास एवं जीवन चरित्र की इन्हीं विशेषताओं को उजागर किया है। यह एक रोचक पुस्तक है।
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