30 अप्रेल 1236 को सुल्तान इल्तुमिश की मृत्यु हो गई। उसने शहजादी रजिया फीरोजशाह को अपनी उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु तुर्की अमीरों ने रजिया के निकम्मे एवं अयोग्य भाई रुकुनुद्दीन फीरोजशाहको सुल्तान बनाने का निश्चय किया।
शहजादी रजिया के पिता इल्तुतमिश के द्वारा की गई व्यवस्था के अनुसार शहजादी रजिया को सुल्तान बनना था किंतु इतिहास को यह निर्णय इतनी आसानी से स्वीकार्य नहीं था। तुर्क शासकों में उत्तराधिकार के नियम निश्चित नहीं थे। सुल्तान के मरते ही सल्तनत के ताकतवर अमीरों में संघर्ष आरम्भ हो जाता था और विजयी अमीर सल्तनत पर अधिकार कर लेता था। यहाँ तक कि सुल्तान के प्रतिभाशाली पुत्र भी प्रायः राज्याधिकार से वंचित रह जाते थे।
इल्तुतमिश का योग्य एवं बड़ा पुत्र नासिरुद्दीन महमूद, इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही मर गया था। उसका दूसरा पुत्र रुकुनुद्दीन निकम्मा और अयोग्य था तथा अन्य सभी पुत्र अवयस्क थे। इन सब बातों को सोच कर ही इल्तुमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
तुर्की अमीरों द्वारा शहजादी रजिया का विरोध
जब इल्तुतमिश की मृत्यु हुई तो तुर्की अमीर, एक औरत को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। भारत में मुस्लिम सुल्तान, अरब के खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में शासन करते थे। अरब वालों के रिवाजों के अनुसार औरत, मर्दों के द्वारा भोगे जाने के लिये बनाई गई थी न कि शासन करने के लिये।
इस कारण मर्द अमीरों के लिए, औरत सुल्तान का अनुशासन मानना बड़े शर्म की बात थी। इल्तुतमिश के अमीरे हाजिब (प्रधानमंत्री) मुहम्मद जुनैदी ने रजिया का विरोध किया।
रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की ताजपोशी
30 अप्रेल 1236 को इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त पर बैठा दिया। अमीरों के फैसले के आगे रजिया हाथ मलती रह गई और तख्त रुकुनुद्दीन फीरोजशाह के हाथ लग गया।
तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार रुकुनुद्दीन रूपवान, दयालु तथा दानी सुल्तान था परन्तु उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। वह प्रायः मद्यपान करके दरबार में बैठकर रक्कासाओं के नाच देखा करता था और प्रायः हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर चमकदार स्वर्ण-मुद्राएँ बाँटा करता था। वह अपने पिता इल्तुतमिश के जीवन काल में बदायूँ तथा लाहौर का गवर्नर रह चुका था परन्तु उसने सुल्तान बनने के बाद मिले अवसर से कोई लाभ नही उठाया और दिन रात मद्यपान तथा भोग-विलास में डूबा रहा।
मद्यपान में धुत्त रहने के कारण रुकुनुद्दीन राज्य कार्यों की उपेक्षा करता था। इस कारण उसकी माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान का जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले मुसलमानों में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी और अब रुकुनुद्दीन जैसे निकम्मे सुल्तान की राजमाता बन गई थी। इसलिये तुर्कान के विरुद्ध भी षड़यंत्र आरम्भ हो जाने निश्चित ही थे।
ब्रिटिश शासन के काल में पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर बड़ा प्रभाव पड़ा। भारतीय वेषभूषा, खानपान, रहन-सहन सभी में आमूलचूल परिवर्तन हो गया।
भारतीय संस्कृति की दो बड़ी विशेषताएं हैं- यह बाहर से बहुत सख्त दिखाई देती है किंतु भीतर से इसमें सहिष्णुता का लचीलापन मौजूद है। भारतीय संस्कृति को वैदिक-काल से लेकर आधुनिक काल तक विदेशियों के बहुत बड़े आघात झेलने पड़े हैं।
बाहर से सख्त रहकर भारतीय संस्कृति ने दूसरी संस्कृतियों की बुराइयों को अपने भीतर प्रवेश करने से रोका है तथा इस प्रकार स्वयं को नष्ट होने से बचाया है तथा भीतर से लचीलापन धारण करके इसने विदेशी संस्कृतियों की अच्छाइयों को ग्रहण किया है तथा इस प्रकार अपना विकास किया है।
भारतीय संस्कृति की इन विशेषताओं ने विदेशी संस्कृतियों को यह सुविधा दी कि वे भारतीय संस्कृति को अपना कर भारतीय संस्कृति में ही रंग जाएं। यदि भारतीय संस्कृति में ये दो गुण नहीं होते तो यह शक, कुषाण, हूण, पह्लव एवं मुस्लिम संस्कृतियों के आक्रमणों के समय या तो लड़कर नष्ट हो गई होती या फिर आत्मसमर्पण करके अपना स्वरूप पूरी तरह खो चुकी होती।
पाश्चात्य संस्कृति का अर्थ
भारत में जिसे पाश्चात्य संस्कृति कहा जाता है, उसका आशय यूरोपीय देशों की संस्कृति से है। इस संस्कृति का विकास यूनान तथा रोम में ईसा से लगभग 1000 साल पहले हुआ। यही संस्कृति निरंतर विकसित एवं संवर्द्धित होती हुई यूरोप की आधुनिक संस्कृति बन गई। भारतीय राष्ट्रवाद रूपी शिशु को पश्चिमी शिक्षा रूपी माँ ने दूध पिलाया।
भारतीय संस्कृति का विदेशों से सम्पर्क
भारत का विदेशों से सम्पर्क वैदिक-काल से है। वैदिक-काल के बहुत से साक्ष्य पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर ईरान, ईराक तथा असीरिया आदि तक के एशियाई देशों तथा दक्षिण-पूर्व में लंका, थाईलैण्ड, इण्डोनेशियाई द्वीपों, कम्बोडिया, वियतनाम आदि देशों से प्राप्त होते हैं किंतु उस काल में इन एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति ही फैली हुई थी। जबकि यूरोप, अमरीका, अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया आदि महाद्वीपों के देशों के लोग आदिम अवस्था में थे तथा उनमें सभ्यता का प्रसार नहीं हुआ था।
भारत में पुर्तगाली संस्कृति का आगमन
पाश्चात्य संस्कृति से भारतीय संस्कृति का सामना 15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक से आरम्भ होना मानना चाहिए जब ई.1498 में पहली बार पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा के नेतृत्व में भारत आए। इन व्यापारियों ने भारतीय स्त्रियों से विवाह किए जिनसे उत्पन्न संतानें ‘गोआनी’ कहलाईं।
आरम्भिक पुर्तगालियों ने भारत में कैथोलिक धर्म के प्रसार का कार्य शुरु किया। पुर्तगाली संस्कृति के सम्पर्क से भारतीय भाषाओं में अनेक पुर्तगाली शब्दों का समावेश हुआ, जैसे- कमरा, नीलाम, पादरी, मेज, कमीज आदि। उनके सम्पर्क से गोआ के क्षेत्रों में एक नई भाषा चली जो पुर्तगाली भाषा का विकृत रूप थी।
यूरोप के अन्य देशों की संस्कृतियों का आगमन
पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) से डच, इंग्लैण्ड से अंग्रेज और फ्रांस से फ्रांसीसी व्यापारी भारत आने लगे। डचों की गतिविधियां व्यापार करने तथा व्यापार के लिए कुछ भू-भागों पर अधिकार करने तक सीमित रहीं। जब इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1608 में भारत में प्रवेश किया तब इंग्लैण्ड पर महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) का तथा भारत पर मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था।
ई.1615 में अंग्रेजों का दूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने कम्पनी के लिए कुछ व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कीं। ई.1644 में फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। इससे अंग्रेजों एवं फ्रांसिंसियों के बीच भारत में व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी किंतु ई.1760 में वैण्डीवाश के युद्ध के बाद भारत में फ्रैंच शक्ति परास्त हो गई तथा ई.1765 में बक्सर के युद्ध के बाद मुगल बादशाह एवं अंग्रेजों के बीच हुई इलाहाबाद संधि से अंग्रेज भारत के स्वामी बन गए।
उस समय तक भारत के विभिन्न हिस्सों में पुर्तगाली, डच, ब्रिटिश तथा फ्रैंच संस्कृतियों ने थोड़ा-बहुत प्रभाव डाला था किंतु अब यूरोपीय संस्कृति पूरी मजबूती के साथ भारतीय संस्कृति पर अपना शिकंजा कस सकती थी। यद्यपि अंग्रेजों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी बल-प्रयोग नहीं किया तथा न ही ईसाई धर्म को भारत में अपना राज-धर्म बनाया तथापि अंग्रेजों के खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, शादी-विवाह के ढंग, त्यौहार आदि परम्पराओं ने भारतीयों को प्रभावित किया।
पाश्चात्य संस्कृति के प्रसार के साधन
(1.) अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार
भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना से पूर्व शिक्षा का प्रसार बहुत ही कम था। फिर भी उच्च-वर्ण-हिन्दू एवं शासक वर्ग से जुड़े मुस्लिम अपने-अपने बच्चों को अपने-अपने धर्म से प्रभावित शिक्षा दिलवाते थे। लॉर्ड विलियम बैंटिक के शासन-काल (ई.1828-35) में भारत में पाश्चात्य शिक्षा का सूत्रपात हुआ।
भारत में पाश्चात्य शिक्षा का जनक लॉर्ड मैकाले था, जिसने भारतीयों के मस्तिष्क में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से अंग्रेजी चिंतन प्रविष्ट कराने के सिद्धांत का सहारा लिया ताकि भारतीय लोग अंग्रेजों की श्रेष्ठता में विश्वास रखें। लार्ड हार्डिंग्ज के शासन काल में लार्ड मैकाले ने शिक्षा के नवीन पाठ्यक्रम की व्यवस्था की। अंग्रेजी शिक्षा के प्रचलन से भारत की प्राचीन परम्पराएं एवं संस्थाएं समाप्त होने लगीं तथा भारतीयों में पाश्चात्य व्यक्तिवाद का बीजारोपण हुआ जिससे भारतीय सामाजिक जीवन की विशेषताएं विस्मृत होने लगीं।
पाश्चात्य शिक्षा से नगरीय एवं ग्रामीण, धनी एवं निर्धन तथा शिक्षित एवं अशिक्षित वर्ग के बीच वैचारिक खाई गहरी हो गई। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवयुवकों के खान-पान, वेशभूषा, अभिवादन तथा विचार-विमर्श के ढंग में पाश्चात्य संस्कृति का लेप चढ़ गया। अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी शिक्षा एवं अंग्रेजी चिंतन भारतीयों युवकों पर हावी होने लगा। भारत में मिशनरी स्कूल खोलकर उनमें अंग्रेज पादरी नियुक्त किए गए। इन स्कूलों से शिक्षित युवक भारतीय संस्कृति के आलोचक और ईसाई धर्म के प्रशंसक बन गए।
(2.) यातायात के साधनों का विकास
ई.1857 की प्रथम सैनिक क्रांति के बाद भारत में रेलों एवं सड़कों का तेजी से विस्तार किया गया ताकि युद्ध, विद्रोह एवं दंगों की स्थिति में सेनाओं एवं सैन्य-संसाधनों को तेजी से गंतव्य तक पहुँचाया जा सके। जल-परिवहन को भी तेजी से बढ़ाया गया और समय के साथ वायु-परिवहन भी आरम्भ हुआ।
परिवहन सुविधाओं के विस्तार से भारत का कच्चा माल तेजी से इंग्लैण्ड जाने लगा और वहाँ से विलासिता की सामग्री भारत आने लगी। इस कारण भारतीय जन-जीवन में भौतिकवादी प्रवृत्ति का प्रसार हुआ। बहुत से भारतीय सामाजिक वर्जनाएं त्यागकर यूरोप जाने लगे और वहाँ की विलासितापूर्ण जीवन शैली के अभ्यस्त होने लगे।
अब उन्हें नैतिकता और धार्मिकता के स्थान पर सुख-सुविधाएं जुटाने की अधिक चिंता होने लगी। भारत के सम्पन्न और पाश्चात्य-शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में यूरोपीय युवतियों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा तथा वे यूरोपीय युवतियों से विवाह करने लगे। यूरोपीय स्त्रियों ने भारतीयों के रहन-सहन, वेशभूषा एवं खान-पान को तेजी से बदला।
(3.) ईसाई धर्म का प्रचार
अंग्रेज शिक्षक एवं पादरी हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति को पिछड़ा हुआ बताते थे एवं ईसाई धर्म एवं ईसाइयत को श्रेष्ठ सिद्ध करते थे। इस कारण शासकों के रहन-सहन एवं तौर तरीके भारतीयों को लुभाने लगे। बहुत से भारतीय ईसाई बन गए और अंग्रेजों की तरह रहने का प्रयास करने लगे। भारत सरकार ने ईसाई धर्म प्रचारकों को अनेक सुविधाएं प्रदान कीं तथा पानी के जहाजों एवं सैनिक छावनियों में ईसाई धर्म प्रचारकों को नियुक्त किया गया।
सेनाओं में ‘पादरी लेफ्टिनेण्ट’ एवं ‘मिशनरी कर्नल’ नियुक्त किए गए। इनका काम भारतीय सैनिकों को ईसाई बनाना था। ईसाई बनने वाले भारतीय सैनिकों को पदोन्नति और अधिक वेतन दिए जाते थे। सरकारी स्कूलों में बाईबिल की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई।
मिशनरी स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा दी जाती थी। अनेक मिशनरियों ने अस्पताल खेलकर भारतीयों को विश्वास जीता। बेरोजगारों, अकाल पीड़ितों, कैदियों, अनाथ बच्चों आदि को तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई बनाया गया। इस प्रकार भारत में अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति का तेजी से प्रसार होने लगा और भारतीय संस्कृति अपमानित एवं बदनाम की जाने लगी।
(4.) सरकार नौकरियों का प्रलोभन
अंग्रेज सरकार ने ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों एवं अंग्रेजी पढ़ने वालों के लिए सरकारी नौकरियों का प्रलोभन भी दिया। अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया। इस कारण अंग्रेजी पढ़े-लिखे युवकों को ही नौकरी मिलना संभव रह गया। इस कारण शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी भाषा का प्रचलन बढ़ गया।
सरकारी नौकरी के दौरान भारतीय युवक अपने अंग्रेज अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे जिससे भारतीय युवकों पर उनकी जीवन शैली का रंग चढ़ने लगा। पेन्ट, कोट, टाई और हैट सरकारी पोशाक बन गई तथा मेज-कुर्सी पर भोजन करना जीवन-शैली का हिस्सा बन गया।
(5.) पश्चिमी देशों से सम्पर्क
अनेक भारतीय राजा एवं उनके परिवार यूरोप घूमने के लिए जाने लगे। इसी प्रकार धनी युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंण्ड की यात्रा एवं दीर्घ प्रवास करने लगे। बहुत से व्यापारियों का भी इंग्लैण्ड आना-जाना आरम्भ हो गया। इस कारण भारत का सम्पन्न एवं शिक्षित वर्ग अंग्रेजियत को बहुत करीबी से देखने लगा और उनके ही रहन-सहन का अभ्यस्त होने लगा। भारतीय भाषा, कपड़े, भोजन, पूजा-पद्धति हेय दृष्टि से देखे जाने लगे।
(6.) औद्योगिक विकास
औद्योगिक विकास के कारण भारत में पूँजीपति वर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग शिक्षित एवं धनी था जिसने अंग्रेजों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पाश्चात्य जीवन-शैली को अपनाया। उद्योग-मालिकों ने अपने कार्यालयों में पाश्चात्य ढंग के महंगे फर्नीचर, सोफासैट, पर्दे एवं फूलदान लगवाए। वे अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अंग्रेज अधिकारियों की स्त्रियों को महंगे उपहार देने लगे जिससे भारत में रिश्वत देकर काम करवाने की संस्कृति का विकास हुआ।
उद्योगों में काम करने के लिए गांवों के लोग तेजी से शहरों को पलायन करने लगे। ये मजदूर भी अपने मालिकों की पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित हुए। उनकी वेश-भूषा भी बदलने लगी। वे भी अब केंटीन में जाकर मेज-कुर्सी पर बैठकर चाय, कॉफी, सिगरेट, मदिरा आदि का सेवन करने लगे। ये मजदूर जब अपने गांव जाते थे तो अपनी समृद्धि का ढिंढोरा पीटने के लिए गांवों में भी इन चीजों का प्रदर्शन करते थे।
इस कारण गांवों में भी नगरों की नकल आरम्भ हुई। इस प्रकार पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे जीवन के समस्त पक्षों को प्रभावित किया तथा भारतीय समाज में बड़ी क्रांति उत्पन्न कर दी।
पाश्चात्य संस्कृति का सामाजिक प्रभाव
पाश्चात्य संस्कृति का जाति प्रथा पर प्रभाव
अंग्रेजों ने कभी भी जाति-प्रथा समाप्त करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से कोई प्रहार नहीं किया किंतु जब लोग नौकरी, व्यापार शिक्षा आदि के लिए अपने घर एवं गांव से बाहर जाकर रहने लगे तो जाति-प्रथा में स्वतः शिथिलता आने लगी। पश्चिमी चिंतन ने समस्त भारतीयों को एक स्तर पर ला दिया। अंग्रेजी शिक्षा के कारण भी लोग मनुष्य का आकलन उसकी जाति की बजाय उसकी मेधा, क्षमता, ज्ञान एवं धन-सम्पत्ति के आधार पर करने लगे।
पाश्चात्य संस्कृति का छुआ-छूत पर प्रभाव
उच्च जातियों के भारतीय लोग अपने खान-पान को शुद्ध रखने के लिए किसी अन्य जाति के व्यक्ति के हाथ का छुआ हुआ नहीं खाते थे किंतु बाद में होटलों में दूसरों के हाथ की बनी हुई चाय, बिस्कुट, सोड़ा आदि का सेवन करने लगे तथा शराब से बनी औषधियों का प्रयोग भी निःसंकोच करने लगे। यहाँ तक कि होटलों में किसी भी जाति के व्यक्ति के हाथों से बना भोजन खाने लगे।
होटलों में बैरे का काम प्रायः निम्न जाति के लोग करते थे। रेलों, ट्रामों और बसों में सभी जातियों के लोग साथ-साथ यात्रा करने लगे। अंग्रेजों के आने से पहले, प्रत्येक जाति के अपने अलग कुएं एवं तालाब होते थे किंतु अंग्रेजों के आने के बाद, घरों में आने वाले नल के पानी की आपूर्ति का काम हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, हरिजन आदि समस्त जातियों के लोग करते थे।
उच्च समझी जाने वाली सभी जातियों के लोग उसी जल का प्रयोग करने लगे। हिन्दुओं के देवी-देवताओं को भी उसी जल से स्नान कराया जाने लगा। इन सब बातों से छुआछूत की भावना शिथिल पड़ने लगी।
खान-पान पर प्रभाव
भारतीय लोग भोजन के मामले में सर्वाधिक दकियानूसी माने जाते थे। वे अपने परम्परागत भोजन को ही श्रेष्ठ समझते थे। शुरू-शुरू में ब्राह्मण, यूरोपियनों द्वारा भारत में लाये गए आलू-टमाटर आदि का सेवन नहीं करते थे तथा बाजार में भोजन नहीं करते थे किंतु अंग्रेजों के सम्पर्क में आने के बाद वे होटलों में बैठकर चाय-कॉफी, बिस्किट, ब्रेड (डबल रोटी), का प्रयोग धड़ल्ले से करने लगे। शहरी मध्यम वर्ग में आमलेट का भी खूब प्रचलन हो गया।
वैवाहिक सम्बन्धों पर प्रभाव
20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय समाज सुधारकों ने अंतर्जातीय एवं अंतर्धार्मिक विवाहों को बढ़ावा दिया किंतु इस कार्य में उस समय अधिक सफलता नहीं मिली। विद्वानों की मान्यता है कि आधुनिक युग में होने वाले अन्तर्जातीय विवाह, पाश्चात्य सभ्यता के ही प्रभाव का परिणाम है। सहशिक्षा प्राप्त करने वाले, एक साथ खेलने वाले एवं कार्यालयों में सहकर्मी के रूप में काम करने वाले युवक एवं युवतियां प्रायः अंतर्जातीय विवाह करते हैं।
पर्दा-प्रथा पर प्रभाव
अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत में पर्दा प्रथा का प्रचलन अपने चरम पर था किंतु अंग्रेज स्त्रियां अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने की अभ्यस्त थीं। भारतीय युवतियों पर भी उनकी इन आदतों का प्रभाव पड़ा तथा भारतीय लड़कियों ने भी यूरोपीय महिलाओं के वस्त्र अपना लिए। गांवों की बजाय शहरों में यह प्रक्रिया अधिक तेजी से हुई। शहरों में पर्दा-प्रथा लगभग समाप्त हो गई।
संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन
प्राचीन आर्यों ने संयुक्त परिवार प्रथा का निर्माण किया था। कृषि एवं कुटीर उद्योगों के कारण संयुक्त परिवार प्रथा ही व्यावहारिक थी किंतु जब अंग्रेजों के शासन में शिक्षित युवक सरकारी विभागों एवं निजी कम्पनियों में काम करने के लिए अपने घरों, गांवों एवं नगरों से बाहर जाकर रहने लगे तो वे अपने परिवारों को भी ले गए। इस कारण संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन आरम्भ हो गया। भारतीय लोगों में भी सामुदायिक भावना के स्थान पर पाश्चात्य संस्कृति की वैयक्तिक भावना का विकास हुआ।
धार्मिक प्रभाव
पाश्चात्य शिक्षा के कारण हमारे धार्मिक विश्वासों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। ईसाई शिक्षकों एवं धर्म प्रचारकों ने भारतीय धर्म की जमकर खिल्ली उड़ाई तथा हिन्दू-धर्म में उपेक्षित चल रही निम्न जातियों के बहुत से परिवारों को बराबरी का लालच देकर ईसाई बना लिया। बहुत से शिक्षित एवं सम्पन्न लोग भी अंग्रेजों में अपनी उठ-बैठ बढ़ाने के लिए ईसाई बन गए।
पाश्चात्य संस्कृति के खुलेपन से प्रभावित होकर बहुत से हिन्दुओं ने हिन्दू-धर्म की धार्मिक-प्रथाओं का विरोध किया। बंगाल के कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों ने अपना धर्म बदल लिया। धीरे-धीरे हजारों भारतीयों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया जिससे भारतीय धर्म और संस्कृति के अस्तित्त्व को चुनौती मिलने लगी।
इसलिए भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग ने मोर्चा संभाला तथा राजा राममोहनराय, केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द आदि विचारकों ने हिन्दू-धर्म के भीतर सुधार की प्रक्रिया आरम्भ की और भारतीयों में अपनी धार्मिक एवं आध्यात्मिक विरासत के प्रति विश्वास, उत्साह एवं गौरव उत्पन्न किया। उनके द्वारा चलाए गए सुधारवादी आन्दोलनों के फलस्वरूप शिक्षित हिन्दू समाज में अन्ध-विश्वास एवं जादृ-टोने जैसी बातों का स्थान तर्क और ज्ञान लेने लगा।
जब धर्म पर छाया हुआ पाखण्ड और बाह्य आडम्बरों का आवरण हटने लगा तो लोगों में धर्म के वास्तविक रूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। भारतीयों में अपने धर्म के प्रति विश्वास एवं श्रद्धा उत्पन्न हुई।
पाश्चात्य संस्कृति का आर्थिक प्रभाव
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का भारत के आर्थिक जन-जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत के कुटीर उद्योग समृद्ध एवं आत्म-निर्भर स्थिति में थे तथा कुटीर उद्योगों से उत्पादित माल न केवल स्थानीय लोगों की आवश्यकताएं पूरी करता था अपितु विदेशों को भी निर्यात किया जाता था जिसके बदले में भारत को विदेशों से सोना और चांदी प्राप्त होते थे किन्तु अंग्रेजों ने भारतीयों के उद्योग-धंधे नष्ट करके उन्हें बल-पूर्वक बंधुआ मजदूर बनाया तथा नील की खेती जैसे कार्यों में झौंक दिया।
कम्पनी के ‘गुमाश्तों’ की बेईमानी और भारतीयों पर किए जाने वाले अमानवीय अत्याचार के प्रमाण तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों की रिर्पोटों एवं डायरियों में मिलते हैं। अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए भारतीयों का अमानवीय आर्थिक शोषण किया। अंग्रेजों ने भारत से कच्चा माल इंग्लैण्ड ले जाने एवं वहाँ की मिलों से तैयार माल भारत लाने की नीति अपनाई। मिलों में निर्मित माल, हाथ से बने माल की तुलना में सस्ता होता था इसलिए आम-भारतीय मिलों का माल ही खरीदता था।
इस कारण कुटीर-उद्योगों की विशेषकर वस्त्र-उद्योग की कमर टूट गई। जॉन सुलिवन ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति एवं उसके प्रभाव को दर्शाते हुए लिखा है- ‘हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु ले लेती है और टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।’
उद्योग धंधे नष्ट हो जाने से बेरोजगार हुए लोग भी खेती के काम में जुट गए। इस कारण कृषि पर जनसंख्या का भार अधिक हो गया और प्रति-व्यक्ति आय घट गई। अंग्रेजों ने कृषि का वाणिज्यीकरण किया जिसके कारण किसानों को स्थानीय मांग की आपूर्ति के स्थान पर अंग्रेजी कम्पनी की मांग की आपूर्ति के लिए फसलें बोनी पड़ती थीं और दूसरी ओर स्थानीय आवश्यकताओं के लिए अन्न आदि नहीं मिलने से महंगाई बढ़ने लगी।
कुछ क्षेत्रों में केवल गन्ना, कपास और नील की खेती की जाने लगी जिससे उन क्षेत्रों में अकाल और भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। ई.1876-78 में दक्षिण भारत में भयंकर अकाल पड़ा, फिर भी इस समय 69 लाख पौंड मूल्य का अनाज भारत से इंग्लैण्ड को निर्यात किया गया और भारत के श्रमिक, कृषक एवं निर्धन लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर गए।
अंग्रेजों ने भारत पर शासन करते हुए दो विश्व-युद्ध लड़े। इस दौरान सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत से बड़े-बड़े जहाज भरकर चावल एवं खाद्यान्न भेजा गया। इस कारण बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ गया। भुखमरी, दुर्भिक्ष एवं उसके बाद फैलने वाली महामारियों से भारतीय संस्कृति की महानताएं लुप्त हो गईं। लोग उदारता, सहिष्णुता, दान-दक्षिणा जैसी महान बातें भूलकर एक-दूसरे को लूटकर खाने लगे।
एक वक्त पेट भरने के लिए बहू-बेटियों की लाज बेची गई। इंसानों ने पेड़ के पत्तों एवं छालों को उबालकर पेट भरने का प्रयास किया किंतु जब इससे भी पेट नहीं भरा तो कुछ स्थानों पर भूखे लोग मनुष्यों को मारकर खा गए। जानवर तो पहले ही घास एवं चारे की कमी के कारण काल के गाल में समा चुके थे। हैवानियत का ऐसा नंगा नाच पहले कभी नहीं देखा गया जब सभ्यता के दौर में भी मुनष्य ने मनुष्य को मारकर खाया हो।
पाश्चात्य संस्कृति का शिक्षा पर प्रभाव
भारत में पारम्परिक शिक्षा धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन पर केन्द्रित थी। ब्राह्मण वर्ग के लोग वर्षों तक वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों, नीतिग्रंथों, काव्यशास्त्रों, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि का अध्ययन करते थे। वाणिज्य कर्म में संलग्न वैश्य परिवारों के लोग सामान्य लिखना-पढ़ना, बही लिखना एवं हिसाब लगाना आदि सीखते थे। क्षत्रिय भी लिखने-पढ़ने की सामान्य शिक्षा ग्रहण करने के साथ शस्त्र संचालन, अश्व संचालन एवं सैन्य संचालन आदि का प्रशिक्षण लेते थे।
शिल्पियों एवं शूद्रों के लिए सामान्यतः शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। मुसलमानों के शासनकाल में भारत की परम्परागत शिक्षा व्यवस्था लगभग तहस-नहस हो गई थी फिर भी मंदिरों, चटशालाओं एवं ब्राह्मण गुरुओं के घरों पर बालकों की शिक्षा चलती रही थी।
अंग्रेजों ने प्रारम्भ में भारतीय विषयों को ही पढ़ाए जाने की नीति जारी रखी तथा भाषा का माध्यम भी वही रखा किंतु साथ ही नवीन गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायन शास्त्र, एनोटोमी तथा अन्य लाभदायक विज्ञान की शिक्षा भी विद्यालयी पाठ्यक्रमों में शामिल की गई।
ई.1835 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने लार्ड मैकाले को शिक्षा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जिसने फरवरी 1835 में भारतीय शिक्षा प्रणाली पर एक लेख प्रकाशित किया जिसमें मैकाले ने कहा- ‘भारत में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार होना चाहिए, क्योंकि हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करने का प्रयत्न करना चाहिए जो हमारे और शासितों के बीच वार्तालाप का माध्यम बन सके, जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो किंतु बुद्धि और विचारों से भारतीय न हो।’
विलियम बैंटिक मैकाले के विचारों से सहमत था। अतः भारत में अंगेजी भाषा एवं अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार आरम्भ किया गया। ई.1835 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की नींव रखी गई। इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों और ईसाई मिशनरीज के प्रयत्नों से भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास हुआ। अंग्रेजों ने भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाया।
भारतीयों के लिए यह भाषा अत्यंत कठिन थी तथा मातृभाषा नहीं होने के कारण अधिकतर लोग इसे जल्दी से सीख नहीं पाते थे। इस कारण लाखों लोग अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ने लगे या शिक्षा से पूर्णतः दूर हो गए।
ई.1855 में कम्पनी के बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष चाल्र्स वुड ने भारत में नई शिक्षा नीति लागू की जिसके अनुसार प्रत्येक प्रान्त में एक शिक्षा विभाग खोला गया; कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई; निजी शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देने की प्रथा आरम्भ हुई; अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए संस्थाएं स्थापित हुईं तथा कलकत्ता में एक महिला विद्यालय स्थापित कर स्त्री-शिक्षा के आन्दोलन को शक्तिशाली बनाया गया।
भारत में पाश्चात्य साहित्य और विज्ञान के प्रवेश से बहुत से सकारात्मक परिवर्तन भी हुए। भारत में पाश्चात्य ज्ञान, राष्ट्रवाद एवं क्रांतिकारी विचारों का प्रवेश हुआ। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने अनुभव किया कि हमारे देश की भाषाओं में भी उच्च-कोटि के साहित्य का सृजन होना चाहिए। उन्होंने इस प्रकार के साहित्य का सृजन करने के लिए सोसाइटियां, छापाखाने तथा समाचार-पत्र स्थापित किए।
नई शिक्षा का सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में भी प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी पढ़कर लोगों में इच्छा उत्पन्न हुई कि वे भारत में भी समाज-सुधार करें। सुधार की प्रवृत्ति विशेषतः हिन्दुओं में दिखाई देती थी। इस कारण हिन्दुओं में जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा आदि के उन्मूलन, विधवा-विवाह के प्रचार, खान-पान के नियंत्रण को हटाने, छुआछूत मिटाने, हरिजनोद्धार करने आदि के प्रयास आरम्भ हुए।
इस प्रकार देश में अंग्रेजी शिक्षा के बाद बुद्धिजीवियों का एक नया वर्ग उत्पन्न हुआ, जिसने लोगों में स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के विचारों का प्रचार किया और इसे प्राप्त करने के लिए स्वयं भी संघर्ष किया। चूंकि हिन्दी पूरे देश की सम्पर्क भाषा नहीं थी इसलिए अंग्रेजी ने इस अंतराल को भरना आरम्भ किया। अंग्रेजी सम्पर्क की दूसरी भाषा के रूप में उभरी तथा उसने भारत के हिन्दी एवं अहिन्दी भाषी प्रान्तों के लोगों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान का मार्ग खोल दिया तथा उनके बीच में वैचारिक समानता स्थापित हुई।
अंग्रेजी पढ़कर लोगों को यह ज्ञान हुआ कि अंग्रेज पादरी एवं मिशनरी व्यर्थ ही भारत के धर्म, दर्शन एवं संस्कृति की खिल्ली उड़ाते हैं, भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान पाश्चात्य संस्कृति एवं ज्ञान से कहीं अधिक श्रेयस्कर है। ई.1801-1802 में उपनिषदों का फ्रेंच भाषा में अनुवाद हुआ। जब जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने उसे पढ़ा तो उसे भारतीय दार्शनिक चिंतन की महानता का ज्ञान हुआ।
वहीं से पाश्चात्य दर्शन पर भारतीय प्राच्य दर्शन की श्रेष्ठता का सिद्धांत विकसित होने लगा। विलियम जॉन्स ने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुवाद किया, मैक्समूलर ने ‘वेदों’ का अनुवाद किया तथा संस्कृत साहित्य एवं दर्शन को लोकप्रिय बनाया। भारतीय विश्वविद्यालयों में भी संस्कृत का आलोचनात्मक अध्ययन प्रारम्भ हुआ।
बी. जी. भण्डारकर, राजेन्द्रलाल मिश्रा तथा के. टी. तेलंग आदि विद्वानों ने भारतीयों के समक्ष पाश्चात्य ज्ञान की विशेषताओं को और पश्चिम के समक्ष भारतीय ज्ञान की विशेषताओं को रखा। दयानन्द सरस्वती, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, विवेकानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे, दादा भाई नौरोजी आदि बुद्धिजीवी इस नव-जागृत भारत के प्रमुख समाज-सुधारक थे।
भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ कब आरम्भ हुईं, इसके बारे में कोई निश्चित तिथि नहीं दी जा सकती किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आज से कई लाख साल पहले भी भारत में ऐसा आदमी रहता था जो पत्थरों को हथियारों की तरह उपयोग में लेता था। भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ उसी आदमी की विकास यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज से लगभग 454 करोड़ वर्ष पहले, आग के गोले के रूप में धरती का जन्म हुआ जो धीरे-धीरे ठण्डी होती हुई आज से लगभग 380 करोड़ साल पहले इतनी ठण्डी हो गई कि धरती पर एक-कोषीय जीव का पनपना संभव हो गया।
आज से लगभग 2.80 करोड़ वर्ष पहले धरती पर बंदरों का उद्भव हुआ। माना जाता है कि इन्हीं बंदरों में से कुछ बुद्धिमान बंदर अपने मस्तिष्क के आयतन, हाथ-पैरों के आकार, रीढ़ की हड्डी एवं स्वर-रज्जु (वोकल कॉड) की लम्बाई में सुधार करते हुए और विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए, आदि-मानवों में बदल गए। विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए इन्हीं आदि मानवों ने पाषाण सभ्यताओं को जन्म दिया। भारत की पाषाण सभ्यताएँ भी अनेक चरणों से होकर गुजरीं।
पाषाण-कालीन मानव संस्कृति का विकास
आस्ट्रेलोपिथेकस
धरती पर मानव का आगमन हिमयुग अथवा अभिनूतन युग (प्लीस्टोसीन) में हुआ जो एक भूवैज्ञानिक युग है। कहा नहीं जा सकता कि अभिनूतन युग का आरम्भ ठीक किस समय हुआ। पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्रों में पत्थर के औजारों के साथ लगभग 35 लाख वर्ष पुराने मानव अवशेष मिले हैं। इस युग के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहते हैं। इस आदिम मानव के मस्तिष्क का आकार 400 मिलीलीटर था। यह दो पैरों पर खड़ा होकर चलता था किंतु यह सीधा तन कर खड़ा नहीं हो सकता था और शब्दों का उच्चारण करने में असमर्थ था, इसलिए इसे आदमी एवं बंदर के बीच की प्रजाति कहा जाता है।
यह पहला प्राणी था जिसने धरती पर पत्थर का उपयोग हथियार के रूप में किया। उसके द्वारा उपयोग में लाये गए पत्थरों की पहचान करना संभव नहीं है। क्योंकि उसने प्रकृति में मिलने वाले पत्थर को ज्यों का त्यों उपयोग किया था, उसके आकार या रूप में कोई परिवर्तन नहीं किया था।
होमो इरेक्टस
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होमो इरैक्टस का अर्थ होता है- ‘सीधे खड़े होने में दक्ष।’ इस मानव के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म इण्डोनेशिया के ‘जावा’ द्वीप से प्राप्त किए गए हैं। होमो इरैक्टस के मस्तिष्क का आयतन 1,000 मिलीलीटर था। इस आकार के मस्तिष्क वाला प्राणी बोलने में सक्षम होता है। इनके जीवाश्मों के पास बहुत बड़ी संख्या में दुधारी, अश्रु बूंद आकृति की हाथ की कुल्हाड़ियां और तेज धारवाले काटने के औजार तथा कच्चे कोयले के अवशेष मिले हैं। अनुमान है कि यह प्राणी कच्चा मांस खाने के स्थान पर पका हुआ मांस खाता था। उसने पशु-पालन सीख लिया था तथा वह अपने पशुओं के लिए नए चारागाहों की खोज में अधिक दूरी तक यात्राएं करता था। यह मानव लगभग 10 लाख साल पहले अफ्रीका से बाहर निकला। इसके जीवाश्म चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत में नर्मदा नदी की घाटी में भी मिले हैं। वह यूरोप तथा उत्तरी धु्रव में हिम युग होने के कारण उन क्षेत्रों तक नहीं गया। यूरोप में उसने काफी बाद में प्रवेश किया। लगभग 7 लाख साल पहले तक वह 20 या 30 प्रकार के उपकरण बनाता था जो नोकदार, धारदार तथा घुमावदार थे। होमो इरैक्टस प्रजाति से दो उप-पजातियों ने जन्म लिया- (1.) निएण्डरथल और (2.) होमो सेपियन।
निएण्डरथल
आज से लगभग ढाई लाख साल पहले ‘निएण्डरथल’ नामक मानव अस्तित्त्व में आया जो आज से 30 हजार साल पहले तक धरती पर उपस्थित था। ये लम्बी-लम्बी भौंह वाले, ऐसे मंद-बुद्धि पशु थे जिनकी चेष्टाएं पशुओं के जैसी अधिक और मानवों जैसी कम थीं। अर्थात् ये भारी भरकम शरीर वाले ऐसे उपमानव थे जिनमें बुद्धि एवं समझ कम थी। चेहरे-मोहरे से नीएण्डरतल आज के आदमी से अधिक अलग नहीं थे फिर भी वे हमसे काफी तगड़े थे।
उनका मस्तिष्क भी आज के आदमी की तुलना में काफी बड़ा था किंतु उसमें जटिलता कम थी, सलवटें भी कम थीं और उसका मस्तिष्क उसके शरीर के अनुपात में काफी कम था। इस कारण निएण्डरतल अपने बड़े मस्तिष्क का लाभ नहीं उठा पाया। वस्तुतः निएण्डरतल आज की होमोसपियन जाति का ही सदस्य था। इसने भी पत्थरों के औजारों का उपयोग किया। आज से 30 हजार साल पहले यह उप-मानव धरती से पूरी तरह समाप्त हो गया।
होमो सेपियन
आज से 5 लाख साल पहले ‘होमो इरेक्टस’ काफी-कुछ हमारी तरह दिखाई देने लगा। इसे ‘होमो सेपियन’ अर्थात् ‘हमारी जाति के’ नाम दिया गया। इस मानव के मस्तिष्क का औसत आयतन लगभग 1300 मिलीलीटर था। भारत में मानव का प्रथम निवास, जैसा कि पत्थर के औजारों से ज्ञात होता है, इसी समय आरम्भ हुआ। इस युग में धरती के अत्यंत विस्तृत भाग को हिम-परतों ने ढक लिया था।
होमो सेपियन सेपियन
आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले आधुनिक मानव अस्तित्त्व में आ चुके थे। ये होमो सेपियन जाति का परिष्कृत रूप थे। इन्हें ‘होमो सेपियन सेपियन’ कहा जाता है।
क्रो-मैगनन मैन
आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले ‘होमो सेपियन सेपियन’ जाति के कुछ मनुष्य यूरोप में जा बसे। वे बौद्धिक रूप में अपने समकालीन नीएण्डरतलों से अधिक श्रेष्ठ थे। उनमें नए काम करने की सोच थी। वे अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे जिनके फलक अधिक बारीक थे।
वे शरीर को ढकना सीख गए थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनकी अंगीठियां खाना पकाने में अधिक उपयोगी थीं। वे बोलने की शक्ति रखते थे। इन्हें क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। यह मानव लगभग 10 हजार वर्षों तक नीएण्डरथलों के साथ रहा जब तक कि नीएण्डरथल समाप्त नहीं हो गए। क्रो-मैगनन का शरीर निएण्डरथल के शरीर से बड़ा था। इसके मस्तिष्क का औसत आयतन लगभग 1600 मिलीलीटर था।
आज से 30 हजार साल पहले जब नीएण्डरथल समाप्त हो गए तब पूरी धरती पर केवल क्रो-मैगनन मानव जाति का ही बोलबाला हो गया जो आज तक चल रहा है। वस्तुतः क्रो-मैगनन मानव ही प्रथम वास्तविक मानव है जो आज से लगभग 40 हजार साल पहले अस्तित्त्व में आया। इस समय धरती पर उत्तरवर्ती हिमयुग आरम्भ हो रहा था तथा लगभग पूरा यूरोप हिम की चपेट में था।
पाषाण कालीन सभ्यताएं एवं संस्कृतियाँ
पाषाण-काल मानव सभ्यता की उस अवस्था को कहते हैं जब मनुष्य अपने दिन प्रतिदिन के कामों में पत्थर से बने औजारों एवं हथियारों का प्रयोग करता था तथा धातु का प्रयोग करना नहीं जानता था। मनुष्य ने जब प्रथम बार पृथ्वी पर आखें खोलीं तो पत्थर को अपना हथियार बनाया। उस काल का मनुष्य, नितांत अविकसित अवस्था में था और जंगली जीवन व्यतीत करता था। जैसे-जैसे उसके मस्तिष्क का विकास होता गया, वह पत्थरों के हथियारों तथा औजारों को विकसित करता चला गया। इसी के साथ वह सभ्य जीवन की ओर बढ़ा। मानव की इस अवस्था के बारे में इतिहासकार डॉ. इश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘मनुष्य औजार प्रयुक्त करने वाला पशु है।’
निःसंदेह संस्कृति की समस्त उन्नति, जीवन को सुखी एवं आरामदायक बनाने के लिए प्रकृति के साथ चल रहे युद्ध में, औजारों तथा उपकरणों के बढ़ते हुए उपयोग के कारण हुई है। मनुष्य का भौतिक इतिहास, मनुष्य के औजार विहीन अवस्था से निकलकर वर्तमान में पूर्ण मशीनी अवस्था में पहुँचने तक का लेखा-जोखा है।
अध्ययन की दृष्टि से पाषाण युग को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-
(1.) पूर्व-पाषाण काल (Palaeolithic Period)
(2.) मध्य-पाषाण काल (Mesolithic Period)
(3.) नव-पाषाण काल (Neolithic Period)
संस्कृति के ये तीनों काल एक के बाद एक करके अस्तित्त्व में आए किंतु ऐसे स्थल बहुत कम मिले हैं जहाँ तीनों अवस्थाओं के अवशेष देखने को मिलते हैं। विंध्य के उत्तरी भागों तथा बेलन घाटी में पूर्व-पाषाण-काल, मध्य-पाषाण-काल और नव-पाषाण-काल की तीनों अवस्थाएं क्रमानुसार देखने को मिलती हैं।
भारत में पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड) आज से लगभग पाँच लाख साल पहले आरम्भ हुईं तथा आज से लगभग दस हजार साल पहले तक अस्तित्व में रहीं।
मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की ‘होमो सेपियन’ प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।
काल निर्धारण
भारत में पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् ई.पू. 8000 में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।
पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल
पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाए गए हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये ई.पू. 1 लाख तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं। बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण-औजार प्राप्त हुए हैं।
आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर दूर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय ई.पू.25 हजार से ई.पू.10 हजार के बीच का है। इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से, कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।
लिखित उल्लेख
पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।
शैल चित्र
भारत के अनेक स्थानों पर उपलब्ध पहाड़ियों में शैलचित्रों की प्राप्ति हेाती है जिनसे आदिमकालीन संस्कृति का ज्ञान होता है। विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर 200 से अधिक गुफाएं पाई गई हैं जिनमें पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5,000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1,500 औजार हैं।
जीवाश्म
कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं के हैं। इन जीवाश्मों के क्षेत्र से पूर्व-पाषाण कालीन औजार मिले हैं।
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं
इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह पशु-पालन, कृषि, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव की संस्कृति की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-
निवासी
इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग ‘हब्शी’ जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाए जाते हैं।
औजार
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होंगे परन्तु अब वे नष्ट हो गए हैं।
आवास
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।
आहार
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिए जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।
कृषि
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।
पशु-पालन
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि ई.पू.25 हजार के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे किंतु सामान्यतः इस युग का आदमी पशुपालन नहीं करता था।
वस्त्र
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिए उन्होंने वृक्षों की पत्तियों, छाल तथा पशुचर्म से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।
सामाजिक संगठन
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियाँ आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।
शव-विसर्जन
अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।
मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ एवं नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ
पूर्वपाषाण कालीन सभ्यताओंके बाद भारत में विश्व के अन्य क्षेत्रों की तरह पहले मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँआरम्भ हुईं एवं उनके बाद नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ आरम्भ हुईं।
गर्म युग
आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर ‘होलोसीन पीरियड’ आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। यह गर्म युग है तथा वर्तमान हिमयुग के बीच में स्थित ‘अंतर्हिम काल’ है। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशु-पालन तथा समाज को व्यवस्थित किया। आज तक धरती पर वही गर्म युग चल रहा है और मानव निरंतर प्रगति करता हुआ आगे बढ़ रहा है।
आज से लगभग 10 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु-पालन आरंभ किया। यह इस गर्म युग की सबसे बड़ी देन है। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 8000 साल पहले अर्थात् 6000 ई.पू. में आदमी ने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आग में पकाना आरंभ कर दिया था।
मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ
ई.पू.8000 में धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई। इसी के साथ धरती की जलवायु शुष्क तथा ऊष्ण हो गई। जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। इस काल में धरती पर क्रो-मैगनन मानव का बोलबाला था। उसका मस्तिष्क पूर्वपाषाण कालीन मानव से काफी विकसित था।
इस कारण इस मानव ने तेजी से सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया जिससे उसके जीवन में पहले की अपेक्षा बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। यह मानव अपने अधिवास के लिए अधिक अनुकूल एवं नए क्षेत्रों की तरफ बढ़ा तथा इसने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इस संस्कृति को मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ अथवा उत्तर-पाषाण कालीन संस्कृति कहते हैं।
काल निर्धारण
मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ वस्तुतः पूर्व-पाषाण-काल और नव-पाषाण काल के बीच संक्रांति काल है जिसे उत्तर पाषाण युग भी कहते हैं। भारत में इस संस्कृति का आरम्भ ई.पू.8000 के लगभग हुआ और लगभग ई.पू. 4000 तक चला।
मध्य-पाषाण-संस्कृति स्थल
मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ के कई स्थल छोटा नागपुर, मध्य भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में मिले हैं। मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदीमुख-क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के बीच के क्षेत्र में भी मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति स्थल मिले हैं। बेलन की घाटी में भी इस युग के मानव के आवास मिले हैं। इस संस्कृति के स्थल सोहन नदी घाटी में भी मिले हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ प्रस्तर उपकरण उद्योग को देखते हैं।
मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं
औजार
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मध्य-पाषाण-संस्कृति के विशिष्ट औजार लघु-पाषाण हैं। इस संस्कृति के मानव ने प्रमुखतः शल्क औजारों का उत्पादन किया। ये शल्क समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें मुख्य औजार शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियां हैं। बरमे और धार वाले उपकरण भी भारी संख्या में मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ काफी सीमा तक वैसी ही हैं जैसी की पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में मिली कुल्हाड़ियाँ हैं। पत्थरों के औजारों का उपयोग मुख्यतः काटने एवं छीलने के लिए होता था। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भीमबेटका से हाथ की कुल्हाड़ियाँ, विदारक, पत्तियाँ, खुरचनियाँ तथा तक्षणियाँ पायी गयी हैं। गुजरात के टिब्बों के ऊपरी स्तरों में भी पत्तियां, तक्षणियां, खुरचनियां आदि मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियां हिमालय के दूसरे हिमनद निक्षेप में भी मिली हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा के दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के औजार मिले हैं।
औजारों का विकास
मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव भी अपने औजार पत्थर से ही बनाता था परन्तु उसके औजार पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। अब वे उतने भद्दे नहीं रह गए थे। इन औजारों को रगड़ एवं घिस कर चिकना कर लिया जाता था। इससे वे सुडौल तथा चमकीले हो जाते थे।
इस काल में औजार एवं हथियार बनाने के लिए लकड़ी तथा हड्डियों का प्रयोग पहले से भी अधिक होने लगा। इससे औजारों में विविधता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हँसिया, घिरनी, सीढ़ी, डोंगी, तकली आदि भी बनायी जाने लगी।
आवास
बेलन घाटी में गुफाओं और चट्टानों से बने शरण-स्थल पाए गए हैं जो विशेष मौसमों में मनुष्यों द्वारा शिविर के रूप में उपयोग किए जाते रहे होंगे। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में भीम बेटका में भी मनुष्यों के उपयोग में आने वाली गुफाएं और चट्टानों से बने शरण-स्थान पाए गए हैं।
जलवायु
हिमकाल की समाप्ति के बाद धरती पर शुष्क एवं उष्ण जलवायु आरंभ हुआ था। मध्य-पाषाण काल में धरती की जलवायु कम आर्द्र थी। इस काल के आरंभ होने के बाद से धरती की जलवायु की परिस्थितियों में अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।
कृषि का आरम्भ
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने ई.पू. 8000 अर्थात् आज से लगभग 10 हजार साल पहले, हल तथा बैलों की सहायता से कृषि करना आरम्भ कर दिया। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करने लग गया। इस काल का मानव गेहूँ, जौ, बाजरा आदि की खेती करता था।
पशु-पालन
कुछ स्थानों पर पशु-पालन पूर्व-पाषाण-काल में आरम्भ हो गया था। मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पशुओं की उपयोगिता को अनुभव करके पशु-पालन का काम बड़े स्तर पर आरम्भ कर दिया। इस काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था।
मिट्टी के बर्तनों का निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया। कृषि तथा पशु-पालन का काम आरम्भ हो जाने से इस संस्कृति के मानव के पास सामान अधिक हो गया। अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस युग के मानव ने मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने आरम्भ किए। इस काल का मानव चाक का अविष्कार नहीं कर पाया था। अतः बर्तन हाथ से ही बनाए जाते थे।
वस्त्र-निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागों की कताई आरम्भ की। इन धागों को बुनकर वह वस्त्र बनाने लगा। खुदाई में बहुत-सी तकलियाँ तथा करघे मिले हैं। इस संस्कृति का मानव वस्त्रों को रंगना भी सीख गया था।
गृह-निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने अपने निवास के लिए स्थाई घर बनाना आरम्भ किया। इस काल के घरों की दीवारें लट्ठों तथा नारियल के तनों से बनी होती थीं और उन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता था। इनकी छतें लकड़ी, पत्ती, छाल आदि से बनती थी और फर्श कच्ची मिट्टी से बनता था।
कार्य-विभाजन तथा वस्तु-विनिमय
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी के बर्तन बनाता था और कोई लकड़ी के काम किया करता था। इस प्रकार सबका काम अलग-अलग बंट गया। इससे वस्तु-विनिमय आरम्भ हो गया। एक गाँव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने लिए चीजों की अदली-बदली किया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी वस्तुएँ किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त करते थे।
युद्ध का प्रारम्भ
पुरा-पाषाण-काल का मानव झुण्डों में रहता था जिनमें प्रायः संघर्ष हो जाया करता था। मध्य-पाषाण-काल में विभिन्न मानव बस्तियों के बीच युद्ध होने आरम्भ हो गए। इसलिए आत्म-रक्षा के लिए गांव के चारों और खाई बनाई जाने लगी ताकि शत्रु अचानक गांव में न घुस सकें। इस काल का मानव, युद्ध में पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था।
धर्म
खुदाई में कुछ नारी-मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है।
शव-विसर्जन
मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था।
निष्कर्ष
मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति में मानव जीवन में आए परिवर्तन अत्यंत क्रान्तिकारी थे। इस काल का मानव, सभ्यता की होड़़ में बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशु-पालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण उसमें सहकारिता की भावना विकसित हो गई थी जिससे वह एक स्थान पर गाँवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा था। उसे अपनी धरती से प्रेम होने लगा था।
इस कारण मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति के मानव में मातृभूमि की धारणा विकसित हो गई। मानव के पास भूमि, घर, पशु, अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ होने से व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हो गया और लोगों में सम्पन्नता तथा दरिद्रता का भाव भी जन्म लेने लगा था। अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ भी की जाने लगीं। सारांश यह है कि मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था।
भारत में नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ सामान्यतः मध्यपाषाण कालीन सभ्यताओं के बाद आरम्भ हुईं किंतु कुछ स्थल ऐसे भी थे जिनमें पूर्वपाषाण काल के बाद सीधे ही नवपाषाण काल आ गया। हालांकि ऐसा बहुत कम स्थलों पर देखा गया है।नव पाषाण कालीन सभ्यताएं निओलिथिक पीरियड भी कहलाती हैं।
धरती पर पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता लगभग 35 लाख वर्ष तक चलती रही। भारत में इस संस्कृति की आयु लगभग 5 लाख साल सिद्ध हुई। इतने लम्बे समय तक मानव का संस्कृति के एक ही चरण में बने रहने का कारण यह था कि पूर्वपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले ‘होमो सेपियन’ मानव का मस्तिष्क अधिक विकसित नहीं था।
नवपाषाण कालीन सभ्यताएं
मध्यपाषाण कालीन सभ्यता ई.पू.8000 से ई.पू.4000 तक अर्थात् लगभग 4 हजार साल तक धरती पर रही। इसका कारण यह था कि मध्यपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाला ‘क्रोमैगनन मानव’ अधिक बड़े एवं विकसित मस्तिष्क का स्वामी था। इस कारण उसने लगभग चार हजार साल में ही मध्यपाषाण-कालीन संस्कृति को त्यागकर नव-पाषाण कालीन संस्कृति को जन्म दिया।
काल निर्धारण
पश्चिमी एशिया के इतिहास में ई.पू.8000 से ई.पू. 4000 के बीच की अवधि में पहली प्रौद्योगिक क्रांति घटित हुई, क्योंकि इसी अवधि में कृषि, कपड़़ा बुनाई, गृह-निर्माण आदि कलाओं का आविष्कार हुआ। इस प्रकार धरती पर ई.पू.4000 के आसपास नव-पाषाण-काल आरम्भ हुआ परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में भी नवपाषाण युग का आरम्भ ई.पू.4000 के लगभग हुआ।
इसी युग में भारतीय प्रायद्वीप में चावल, गेहूँ और जौ आदि महत्त्वपूर्ण अनाजों की खेती आरम्भ हुई। इस भूभाग में आरंभिक गांवों की स्थापना भी इसी युग में हुई। मानव अब सभ्यता की देहली पर पैर रखने जा रहा था। दक्षिणी भारत और पूर्वी भारत में ऐसी कुछ बस्तियों की स्थापना 1000 ई.पू. में भी होती रही।
नवपाषाण कालीन सभ्यताएं : सांस्कृतिक विशेषताएँ
नव-पाषाण-कालीन मानव का जीवन
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन पर्याप्त कष्टमय था। उसे पत्थरों के औजारों और हथियारों पर ही पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता था, इसलिए वह पहाड़ी क्षेत्रों से अधिक दूरी पर अपनी बस्तियों की स्थापना नहीं कर पाया। बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी वह केवल अपने निर्वहन भर के लिए अनाज पैदा कर पाता था।
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजार
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का उपयोग किया। पत्थर की कुल्हाड़ियां उसका प्रमुख औजार थीं जो प्रायः समस्त भारत में बड़ी संख्या में मिली हैं। उस युग के लोगों ने काटने के इस औजार का कई प्रकार से उपयोग किया। परशु (कुल्हाड़ी) चलाने में प्रवीण वीर परशुराम का प्रचीन आख्यान प्रसिद्ध है। इस युग के पॉलिशदार औजारों में लघु-पाषाणों के फलक भी हैं।
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के स्थल
नवपाषाण युग के मनुष्यों की बस्तियों को, उनके द्वारा प्रयुक्त कुल्हाड़ियों की किस्मों के आधार पर, तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बांट सकते हैं- (1.) उत्तर दिशा में बर्जेहोम, (2.) पूर्व दिशा में चिरंड तथा (3.) दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के दक्षिण में।
(1.) बुर्जहोम
कश्मीर की घाटी में श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर बर्जेहोम नामक स्थान है। यहाँ के नव-पाषाण-कालीन मानव, एक प्लेट पर, गड्ढे वाले घरों में रहते थे। पशुओं और मछलियों के आखेट पर ही उनका जीवन आश्रित था। अनुमान होता है कि वे कृषि अथवा पालतू पशुओं से परिचित नहीं थे। वे पत्थर के पॉलिशदार औजारों का उपयोग करते थे, उनके बहुत से औजार और हथियार हड्ड्यिों से बने हुए हैं।
बुर्जहोम के लोग अपरिष्कृत धूसर मृद्भाण्डों का उपयोग करते थे। बुर्जहोम में पालतू कुत्ते भी स्वामियों के शवों के साथ शवाधानों में गाढ़े जाते थे। गड्ढों वाले घरों में रहने और स्वामी के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को गाढ़ने की प्रथा भारत में नवपाषाण युगीन लोगों में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बुर्जहोम की बस्ती ई.पू.2400 की है।
(2.) चिरंड
भारत में दूसरा स्थान चिरंड है जहाँ से नवपाषाण-कालीन उपकरणों के साथ पर्याप्त मात्रा में हड्डियों के औजार भी मिले हैं। यह स्थल पटना से 40 किलोमीटर पश्चिम में गंगा के उत्तर में स्थित है। ये औजार उत्तर नवपाषाण-युगीन स्तरों वाले ऐसे क्षेत्र में मिले हैं जहाँ लगभग 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है। यहाँ पर चार नदियों- गंगा, सोन, गंडक और घाघरा का मिलन-स्थल होने के कारण खुली धरती उपलब्ध थी। चिरंड से प्राप्त हड्डियों के औजार ई.पू.1600 लगभग के हैं।
(3.) गोदावरी नदी
नवपाषाण युगीन लोगों के एक समूह का निवास दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में निवास करता था। इन्होंने अपनी बस्तियां सामान्यतः ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी तट के समीप के टीलों पर स्थापित कीं। ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों के साथ-साथ एक प्रकार के प्रस्तर-फलकों का भी उपयोग करते थे। आग में पकायी गयी लघु मृण्मूर्तियों को देखने से अनुमान होता है कि वे कई पशुओं को पालते थे। वे गाय-बैल, भेड़ और बकरियां रखते थे। वे सिलबट्टे का उपयोग करते थे, जिससे ज्ञात होता है कि वे अनाज पैदा करने की कला जानते थे।
(4.) अन्य स्थल
भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम की पहाड़ियों तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में नव-पाषण-संस्कृति के औजार मिले हैं। इनका काल निर्धारित नहीं किया जा सका है। इनके अतिरिक्त विंध्याचल के उत्तरी भागों में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों से भी अनेक नवपाषाण युगीन स्थल मिले हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण युगीन स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ ईसा पूर्व की छठी सहस्राब्दी में भी चावल की खेती की जाती थी। बलोचिस्तान में भी नवपाषाण युग के कुछ स्थल मिले हैं।
नवपाषाण कालीन सभ्यताएं: उत्खनन
भारत में अब तक जिन नवपाषाण युगीन स्थलों अथवा स्तरों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कीड़कल, संगनकल्लु, टी. नरसीपुर तथा तैक्कलकोट, तमिलनाडु में पेयमपल्ली, आन्ध्रप्रदेश में पिकलीहल और उतनूर। यहाँ नवपाषाण अवस्था का चरण लगभग ई.पू.2500 से ई.पू.1000 तक रहा, यद्यपि उतनूर के लिए प्राचीनतम कार्बन-तिथि ई.पू.2300 है।
नवपाषाण कालीन सभ्यताएं: जीवन शैली
आवास
नव-पाषाण युगीन मानव ने प्राकृतिक आवासों अर्थात् पर्वतीय गुफाओं एवं पेड़ों का आश्रय त्यागकर नदी तटों एवं पर्वतों के समतल स्थानों पर पेड़ों की टहनियों, तनों, सूखी लकड़ियों, घास, पशुओं की हड्डियों तथा खालों आदि से आवास बनाने आरम्भ किए। ये आवास झुण्ड में बनते थे।
औजार
इस युग के औजार एवं हथियार पत्थर से ही बनाए जाते थे किंतु अब उनमें पहले की अपेक्षा अधिक वैविध्य, कौशल एवं सौन्दर्य का समावेश किया गया। नव-पाषाण-कालीन औजारों एवं हथियारों पर पॉलिश की जाने लगी। इनके निर्माण के लिए अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप का उपयोग किया जाने लगा। इस युग के औजारों में कुल्हाड़ियाँ, चाकू, तीर, ओखली, मूसल, पीसने के औजार, स्क्रैपर तथा पॉइण्टर उपलब्ध हुए हैं।
कृषि
नवपाषाण युग की कुल्हाड़ियां उड़ीसा के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मिली हैं। देश के इस भाग में चावल की खेती और छोटे पैमाने की बस्तियों की शुरूआत काफी पहले हुई थी। बाद के नवपाषाण युगीन अधिवासी ऐसे कृषक थे जो मिट्टी और सरकंडों से बनाए गए गोलाकार अथवा चौकोर घरों में रहते थे। गोलाकार घरों में रहने वाले लोगों की सम्पत्ति सामूहिक होती थी। यह निश्चित है कि ये लोग स्थायी अधिवासी बन गए थे। ये रागी और कुलथी पैदा करते थे।
पशु-पालन
पिकलीहल के नवपाषाण युगीन अधिवासी पशुपालक थे। वे गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि पालते थे। वे मौसमी पड़ाव डालकर खंभों और खूँटों से गौशालाएं खड़ी करते थे और बाड़ों के भीतर गोबर का ढेर लगाते थे। फिर इस पड़ाव को आग लगाकर आगामी मौसम के पड़ाव के लिए इसे साफ करते थे। पिकलीहल में ऐसे राख के ढेर ओर पड़ावस्थल दोनों ही मिले हैं।
बर्तन
चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई अधिवासी समूह अनाजों की खेती करते थे और पालतू-पशु भी पालते थे, इसलिए उन्हें अनाज और दूध रखने और पकाने-खाने के लिए उन्हें बर्तनों की आवश्यकता थी। चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्त्वपूर्ण अविष्कार था। इसी युग में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाकर मजबूत बनाना सीखा।
धर्म
नव-पाषाण काल में धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गए। चूँकि शवों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी शवाधानों से प्राप्त हुई हैं इसलिए अनुमान होता है कि इस काल का मानव पुर्नजन्म में अथवा मृत्यु के बाद के किसी विशेष तरह के जीवन में विश्वास करता था।
विश्व के अन्य स्थलों पर विकसित हुई पाषाण कालीन सभ्यताओं की तरह भारत में भी पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालीन सभ्यताएं विकसित हुईं। तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर हमें इनमें अंतर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना
काल का अंतर
तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.8000 तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.4000 तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग ई.पू.1000 तक चलता रहा।
स्थल
पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं। नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाए गए हैं।
औजार
पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं।
मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिए इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण (Microlith) तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।
आवास
तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।
कृषि
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।
पशु-पालन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने ई.पू.25,000 के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशु-पालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिए जाने लगे।
बर्तन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाए जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिए चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिए आग में पकाना आरंभ किया।
सामाजिक संगठन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिए वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका।
अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गए हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।
कार्य विभाजन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिए कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशु-पालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिए इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।
शव विसर्जन
तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था।
कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गईं।
धर्म
पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिए अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।
भारत में छः नृवंश जातियों के कंकाल एवं खोपड़ियाँ पाई गई हैं। इन्हें भारत की आदिम जातियाँ माना जाता है। ये समस्त आदिम जातियाँ प्रस्तर युगीन अथवा पाषाण कालीन सभ्यताओं से सम्बन्ध रखती थीं।
भारत की आदिम जातियाँ
(1.) नीग्रेटो
यह भारत की प्राचीनतम जाति थी जो अफ्रीका से भारत में आई थी। यह नितांत असभ्य एवं बर्बर जाति थी। ये लोग जंगली पशुओं का मांस, मछली, कंद-मूल एवं फल खाकर पेट भरते थे और कृषि-कर्म एवं पशुपालन से अपरिचित थे। यद्यपि अब यह जाति भारत की मुख्य भूमि से विलुप्त हो चुकी है तथापि अण्डमान द्वीपों में इस जाति के कुछ लोग निवास करते हैं। असम की नागा जातियों तथा त्रावणकोर-कोचीन आदि कुछ क्षेत्रों की आदिम जातियों में भी इस जाति की कुछ विशेषताएं दृष्टिगत होती हैं।
(2.) प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड
ये संभवतः फिलीस्तीन से भारत आए थे। भारत की कोल और मुण्डा जातियों में प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड जाति के गुण पाए जाते हैं। जब आर्य भारत में आए तब यह जाति पंजाब एवं उसके आसपास रहती थी। आर्यों ने इन्हें ‘अनास’, ‘कृष्णवर्ण’ और ‘निषाद’ कहकर पुकारा। यह एक विकसित जाति थी। उन्हें कृषि, पशुपालन एवं वस्त्र निर्माण का ज्ञान था।
माना जाता है कि अण्डे से सृष्टि की कल्पना इन्हीं प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगों की देन है। ये लोग पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘अमंगल निवारण’ के लिए ‘न्यौछावर करने’ की प्रथा भी इन्हीं की दी हुई है। हिन्दू-धर्म के पशु-देवता- नाग, मकर, गणेश आदि भी इन्हीं की देन है। यह जाति आर्यों के आगमन के बाद उन्हीं में घुल-मिलकर एकाकार हो गई।
(3.) मंगोलायड
इस प्रजाति का निवास केवल एशिया महाद्वीप में पाया जाता है। इससे सम्बन्धित लोगो की त्वचा का रंग पीला, शरीर पर बालों की कमी और माथा चौड़ा होता है। इस प्रजाति की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अधखुली आंखें हैं। कतिपय प्रादेशिक विभिन्नताओं के साथ यह जाति सिक्किम, आसाम और भारत-बर्मा की सीमा पर निवास करती है।
(4.) भूमध्यसागरीय द्रविड़
दुनिया भर में इस जाति की कई शाखाएं हैं। भारत में इस जाति को द्रविड़ कहा जाता है। इनका सिर बड़ा, कद नाटा, नाक छोटी और रंग काला होता है। आर्यों के भारत आगमन के समय द्रविड़ जाति ईरान से लेकर अफगानिस्तान तथा बलोचिस्तान से लेकर पंजाब, सिंध, मालवा एवं महाराष्ट्र तक विस्तृत क्षेत्र में रहती थी।
आर्यों के भारत में आगमन से पूर्व यह जाति नीग्रेटो एवं प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड जातियों के साथ मिलकर रह रही थी। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में आज भी ब्राहुई भाषा का प्रयोग होता है, यह भाषा भूमध्यसागरीय द्रविड़ों की ही देन है। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं की जननी द्रविड़ भाषा माना जाती है।
ऋग्वेद में प्रयुक्त ‘दस्यु’ और ‘दास’ शब्दों का प्रयोग द्रविड़ों के लिए किया गया है। ईरानी भाषा में भी दस्यु शब्द मिलता है। कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में ‘दहइ’ जाति रहती थी। माना जाता है कि वही दहई जाति भारत में ‘द्रविड़’ कहलाई। भारत की संस्कृति पर पर द्रविड़ जाति का विशेष प्रभाव पड़ा जिसे आज भी देखा जा सकता है। इस जाति की सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन हम ‘सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज’ नामक अध्याय में करेंगे।
(5.) पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स
इस जाति के लोग बहुत छोटे समुदाय में भारत में रहते होंगे। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति पर इन लोगों का विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
(6.) नॉर्डिक
यह भी एक छोटा आदिम समुदाय था जिसका भारतीय संस्कृति पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया है।
भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ प्रस्तर युग के बाद विकसित हुईं। ताम्राश्म संस्कृति उसे कहते हैं जिसमें ताम्रधातु एवं पाषाण के उपकरण साथ-साथ उपयोग में आते थे। ताम्राश्म संस्कृति को ताम्रपाषाणिक संस्कृति (Copper Stone Culture) भी कहते हैं।कहीं-कहीं पाषाण संस्कृति और ताम्राश्म संस्कृति एक साथ चलती रहीं।
धातु काल में प्रवेश
मानव सभ्यता ने पाषाण-काल से निकलकर धातु-काल में प्रवेश किया। कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु-काल के लोग पाषाणकाल के लोगों से भिन्न थे और उत्तर-पश्चिम के मार्गों से भारत में आए थे। कतिपय अन्य विद्वानों का मत है कि धातु-काल के लोग नव-पाषाण-काल के लोगों की ही सन्तान थे।
इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धातु-काल के प्रारम्भ में, पाषाण तथा धातुओं का प्रयोग साथ-साथ होता था और दूसरी यह है कि इस सन्धि-काल की वस्तुओं के आकार तथा बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवपाषाणकाल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति करके धातु-काल की सभ्यता में बदल गयी।
धातु की खोज
अनुमान होता है कि मनुष्य द्वारा भोजन पकाने के लिए बनाए गए चूल्हों में लगे पत्थरों के गर्म होने से उनमें से धातु पिघलकर अलग हो गई होगी, जब यह घटना कई बार हुई होगी तो नव पाषाण कालीन मानव ने धातु की खोज का कार्य सम्पन्न कर लिया होगा। बहुत से विद्धानों का मानना है कि मानव ने सबसे पहले सोने की खोज की, उसके बाद ताम्बे की खोज हुई। चूँकि सोना अत्यंत अल्प मात्रा में मिलता था इसलिए औजार एवं हथियार बनाने में ताम्बे का उपयोग किया गया।
धातु-काल का अर्थ
धातु-काल से तात्पर्य उस कालावधि से है जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले ताम्बे का, उसके बाद काँसे का और अन्त में लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ। चूँकि इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है इसलिए नव-पाषाण-काल के पश्चात् से लेकर आज तक के काल को धातु-काल कहा जाता है। इस लम्बे काल में मानव-सभ्यता का विकास तेज गति से होता गया है। धातुकाल का मानव, विज्ञान के बल पर इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पाषाणकाल में सम्भव नहीं थे।
धातु-काल का विभाजन
धातु-काल को तीन भागों में बांटा जाता है- (1.) ताम्र-काल, (2.) कांस्य-काल तथा (3.) लौह-काल।
ताम्र-कांस्य सम्यता का विकास उत्तर भारत में ही हुआ। दक्षिण भारत में ताम्रकाल के बाद सीधे ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया।
ताम्र काल
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मानव द्वारा, धातुओं में सबसे पहले ताम्बे का प्रयोग आरम्भ हुआ। ताम्र-काल उस काल को कहते है जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ ताम्बे से बनाना आरम्भ किया। ताम्र-काल का आरम्भ नव-पाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। ताँबे की खोज का वास्तविक काल ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान है कि इसकी खोज ई.पू. 5,000 के आसपास हुई। मैलूकाइट नामक हरे अयस्क को कोयले के साथ ढेरी लगाकर, गर्म करने से ताँबा बहकर नीचे आ जाता था। इसका सबसे प्राचीन प्रमाण मिस्र में मिला है। मिस्र में ई.पू. 5,000 की कब्रों से तांबे के हथियार मिले है। साइप्रस में लगभग ई.पू. 3,000 में ताँबे का बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन होता था। उन दिनों रोम देश के निवासी साइप्रस से ताँबा खरीदते थे। एशिया में ताम्र का प्रयोग प्रथम बार कब हुआ, यह ठीक से ज्ञात नहीं हैं। शू किंग की गाथाओं के अनुसार चीन देश में ई.पू. 2,500 के आसपास ताम्र के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (सैन्धव सभ्यता से गुप्तकाल) तक रहा। भारत में ताम्बे का सर्वप्रथम उपयोग सैंधव सभ्यता द्वारा अथवा उसके समकालीन किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा किया गया होगा जो आर्यों के आगमन से पहले उत्तरी भारत के मैदानों में मौजूद रही होगी।
ताम्बे को प्रयोग में लाने के कई कारण थे। पत्थर को गलाया नहीं जा सकता परन्तु ताम्बे को गलाया जा सकता है। इसलिए ताम्बे को गलाकर उससे छोटी-बड़ी कई तरह की वस्तुएँ बनाई जा सकती थीं। पत्थर की अपेक्षा ताम्बे की बनी हुई वस्तुएँ अधिक सुन्दर, सुडौल, सुदृढ़़ तथा चिकनी होती थीं। ताम्बे में यह सुविधा भी थी कि उससे चद्दरें भी बनाई जा सकती थीं और उसके टुकड़़े भी किए जा सकते थे। टूट जाने पर ताम्बे को जोड़ा भी जा सकता था।
छोटा नागपुर के पठार से लेकर उत्तरी गंगा-द्रोणी तक फैले हुए विशाल क्षेत्र में ताम्र-वस्तुओं की चालीस से अधिक निधियाँ मिली हैं परन्तु इनमें से लगभग आधी निधियाँ केवल गंगा-यमुना के दोआब से प्राप्त हुई हैं। दूसरे क्षेत्रों से छुटपुट निधियाँ ही मिली हैं। इन निधियों में कुल्हाड़े, मत्स्य-भाले, खड्ग और परशु आकृति वाली वस्तुएं हैं। इन वस्तुओं का उपयोग न केवल मछली मारने, आखेट करने और लड़ाई करने अपितु दस्तकारी, कृषि आदि अनेक कामों के लिए भी होता था।
इन ताम्र-वस्तुओं के निर्माता कुशल शिल्पकार थे। ये वस्तुएं आखेटकों अथवा घुमन्तू लोगों द्वारा निर्मित नहीं हो सकतीं। ऊपरी गंगा की घाटी में कई स्थलों पर ये वस्तुएं गेरुए रंग के बर्तनों और कच्ची मिट्टी के ढांचों के साथ मिली हैं। इससे पता चलता है कि ताम्र-निधियों का उपयोग करने वाले लोग स्थायी बस्तियों में रहते थे। दोआब के काफी बड़े भाग में बसने वाले ये सबसे पुराने आदिम कृषक और कारीगर लोग थे। गेरुए रंग के बर्तनों वाले अधिकांश स्थल गंगा-यमुना दोआब के उत्तरी भाग से मिले हैं परन्तु ताम्र-निधियां प्रायः समस्त दोआब और इसके परे भी मिली हैं।
गेरुए रंग के मृदभाण्डों की इस संस्कृति का काल मोटे तौर पर ई.पू.2000 और ई.पू.1800 के बीच का है। ताम्र-वस्तुओं तथा गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले वाले लोगों की बस्तियां जब गायब हो गईं, तो लगभग ई.पू.1000 तक दोआब निर्जन ही रहा। इस बात का कुछ संकेत मिलता है कि काले और लाल बर्तनों को उपयोग में लाने वाले लोगों की छुटफुट बस्तियां थीं परन्तु अब तक उनके सांस्कृतिक अंतर के सम्बन्ध में सुस्पष्ट धारणा नहीं बन सकी है।
जो भी हो, दोआब के उत्तरी भाग तथा ऊपरी गंगा की घाटी में धातु युग का वास्तविक आरम्भ ताम्र वस्तुओं और गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले लोगों के साथ ही हुआ परन्तु किसी भी स्थल पर इनकी बस्ती लगभग सौ साल से अधिक समय तक टिकी नहीं रही। न ही ये बस्तियां बड़ी थीं और न काफी बडे़ क्षेत्र में फैली हुई थीं। इन बस्तियों का अंत क्यों और कैसे हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हिन्दू-धर्म में तांबे के बर्तनों को पवित्र तथा धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है तो इसका कारण सम्भवतः यह है कि तांबा मानव द्वारा खोजी गई प्रथम धातु थी।
ताम्राश्म संस्कृति की विशेषताएँ
ताम्राश्म संस्कृति के लोगों के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति के लोग पशुपालक थे, कृषि करते थे, साधारण किस्म के ताम्बे का प्रयोग करते थे और ग्रामीण परिवेश में रहते थे।
काल निर्धारण
कालक्रम के अनुसार ताम्र-पाषाण संस्कृति, सिंधु सभ्यता की कांस्य संस्कृति के बाद आती है। वैज्ञानिक विधि से निर्धारित की गई तिथियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण संस्कृति का प्रारंभ ई.पू.2150 के पश्चात् हुआ था। कुछ क्षेत्रों में इस संस्कृति का चरण ई.पू.1000 तक चला, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में ई.पू.800 तक अथवा उसके बाद ईस्वी 600 (गुप्तकाल) तक भी चलता रहा। जब तक लोहे के औजारों का प्रचलन नहीं हुआ, तब तक पुराने औजारों का उपयोग होता रहा परन्तु अनेक क्षेत्रों में काले-लाल मृदभाण्डों का उपयोग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक होता रहा।
ताम्र एवं पाषाण का एक साथ उपयोग
इस काल के मानवों द्वारा ताम्र एवं पाषाण उपकरणों का उपयोग एक साथ किया जाता रहा इसलिए इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति भी कहते हैं। इस अवस्था में तांबे का उत्पादन सीमित था। तांबे की भी अपनी सीमाएं थी। केवल तांबे से बनाया गया औजार नरम होता था। तांबे के साथ टिन मिलाकर एक अधिक मजबूत और उपयोगी कांसे की मिश्र धातु बनाने की कला लोगों को ज्ञात नहीं थी। कांसे के औजारों ने कीट, मिò और मेसोपोटामिया में प्राचीनतम सभ्यताओं के उदय में सहायता दी। सिन्धुवासी भी कांसे का प्रयोग करते थे परन्तु दो-आब क्षेत्र की ताम्र-पाषाणिक अवस्था में कांसे के औजारों का प्रायः अभाव ही है।
प्रस्तर फलकों का प्रयोग
ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के लोगों ने पत्थर के जिन छोटे औजारों और हथियारों का उपयोग किया उनमें प्रस्तर-फलकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि कई स्थलों पर प्रस्तर-फलक उद्योग ने खूब उन्नति की तथापि पत्थर की कुल्हाड़ियों का भी उपयोग होता रहा। ऐसे स्थल पहाड़ियों से अधिक दूर नहीं होते थे, परन्तु ऐसे ही अनेक स्थल नदी मार्गों पर भी खोजे गए हैं। कुछ स्थलों से तांबे की कई वस्तुएं मिली हैं। आहड़ और गिलूँड ऐसे ही स्थल हैं जो राजस्थान की बनास घाटी के शुष्क क्षेत्र में स्थित हैं।
आहड़ से पत्थर की कोई कुल्हाड़ी या फलक नहीं मिला है। इसके विपरीत, यहाँ से तांबे की कई कुल्हाड़ियां और दूसरी वस्तुएं मिली हैं, क्योंकि तांबा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। गिलूँड में प्रस्तर-फलक उद्योग मिलता है। महाराष्ट्र के जोर्वे तथा चंदोली से तांबे की सपाट तथा आयताकार कुल्हाड़ियां मिली हैं, चंदोली से तांबे की तक्षणियाँ (छेनियाँ) भी मिली हैं।
यातायात के साधनों में वृद्धि
पाषाण-काल के आरंभिक चरण में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था परन्तु पशु-पालन आरंभ होने से बोझा ढोने का काम पशुओं द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊँटों का प्रयोग होने लगा। ताम्रकाल में यह कार्य पशुओं के साथ-साथ पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियेदार गाड़ियों से भी किया जाने लगा। जल यात्राओं के लिए नावों का निर्माण भी आरम्भ हो गया।
कृषि में उन्नति
कृषि का काम मध्य-पाषाण-काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु अब कृषि बहुत बड़े परिमाण में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिए मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। अनुमान है कि इस काल का मानव कृषि कार्य में हल का उपयोग नहीं करता था। ये लोग नुकीले पत्थर के दूसरे सिरे में लकड़ी के डण्डे फंसा कर उससे धरती खोदते थे। इस संस्कृति की बस्तियों से हल नहीं मिला है।
ये लोग चावल, गेहूँ, बाजरा, मसूर, उड़द तथा मूँग जैसी कई दालें और मटर पैदा करते थे। महाराष्ट्र में नर्मदा तट पर स्थित नवदाटोली में इन समस्त अनाजों के अवशेष मिले हैं। सम्भवतः भारत के किसी भी अन्य स्थल के उत्खनन में इतने अधिक अनाज प्राप्त नहीं हुए हैं। नवदाटोली के लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। दक्खन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी। निचले दक्खन में रागी, बाजरा और इसी कोटि के दूसरे कई अनाजों की खेती होती थी।
पशु-पालन
विद्धानों का मत है कि ताम्र-पाषाणिक काल का मानव पशुओं को दूघ या घी प्राप्त करने के लिए नहीं पालता था अपितु मांस प्राप्ति, बोझा ढोने, कृषि करने तथा यातायात के लिए करता था। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी महाराष्ट्र में रहने वाले ताम्र-पाषाण काल के लोगों ने पशुओं को पालतू बनाया था और वे खेती भी करते थे। वे गाय, बकरी, सूअर और भैंस पालते थे और हिरन का आखेट करते थे। इस काल की बस्तियों से ऊंट के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जो घोड़े या पालतू गधे या जंगली गधे के हो सकते हैं। ये लोग निश्चय ही गौ-मांस खाते थे, सूअर के मांस का बहुत उपयोग नहीं होता था।
मछली एवं चावल का भोजन
बिहार और पश्चिमी बंगाल से, जहाँ चावल की खेती होती थी, मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी प्रदेशों में रहने वाले ताम्र-पाषाण के लोग मछली और चावल खाते थे। देश के इस भाग में आज भी मछली और चावल लोकप्रिय भोजन हैं।
हस्तकलाएं
इस काल का मानव तांबे की वस्तुएं और पत्थर के औजार बनाने में निपुण था। इस काल के छोटे आकार के बहुत सारे पत्थर के औजार मिले हैं, जिन्हें लघुपाषाण कहते हैं। वे कताई और बुनाई की कला भी जानते थे, क्योंकि मालवा से उस काल की तकली की चक्रियां मिली हैं। महाराष्ट्र से कपास, सन और रेशम के तन्तु मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग कपड़ा भी तैयार करते थे।
विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों का उपयोग
ताम्र-पाषाण काल के लोग विभिन्न प्रकार के मृदभाण्डों का उपयोग करते थे। इनमें से एक प्रकार के बर्तन काले-लाल रंग के थे। अनुमान होता है कि इनका प्रचलन दूर-दूर तक था। इन बर्तनों को चाक पर बनाया जाता था। कभी-कभी इन पर सफेद रैखिक आकृतियां भी चित्रित की जाती थीं। यह तथ्य न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बस्तियों के सम्बन्ध में है अपितु बिहार और पश्चिमी बंगाल में खोजी गई बस्तियों के सम्बन्ध में भी है।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में रहने वाले इस काल के लोगों ने टोंटी वाले लोटे, धरनी-युक्त तश्तरियां और धरनी-युक्त कटोरे बनाए थे। यह सोचना गलत होगा कि जिन भी लोगों ने काले-लाल बर्तनों का उपयोग किया उनकी संस्कृति भी एक ही थी। उनके बर्तनों और औजारों की बनावट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। इस काल के लोगों ने लोटों तथा तश्तरियों का उपयोग तो किया किंतु थालियों का उपयोग नहीं किया।
कार्य-कुशलता में वृद्धि
धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। अब कार्य-विभाजन का सिद्धान्त बहुत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से लोगों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलम्बी से परावलम्बी हो गया।
पक्के भवनों का निर्माण
इस काल से पहले के लोग आम तौर से पकी हुई ईटों से परिचित नहीं थे। धूप में सुखाई तथा आग में पकाई हुई ईटों के भवनों का निर्माण इसी काल में आरम्भ हुआ किंतु इनका उपयोग विरले ही होता था। इस काल में अधिकतर घर टट्टर को लीपकर बनाए जाते थे और इन पर संभवतः छप्पर भी डाले जाते थे। ये मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती थी।
इन आवासों में मनुष्य, पशु तथा भण्डारण के लिए अलग-अलग प्रबन्ध रहता था। पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगांव स्थान पर आरंभिक ताम्र-पाषाण काल के चूल्हों सहित मिट्टी के बड़े भवन और गोलाकार गड्ढों वाले भवन खोजे गए हैं। बाद की अवस्था ( ई.पू.1300-1000) का पांच कमरों का एक कमरा गोलाकार है। इससे पता चलता है कि इस युग के परिवार बड़े होते थे।
नगरीय सभ्यता के जनक
ताम्र-पाषाणिक अर्थ-व्यवस्था वस्तुतः ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था थी। जैसे कि इनामगांव तथा पश्चिमी मध्य प्रदेश की एरण तथा कयथ बस्तियों की किलेबंदी करके इनके चहुंओर खाइयां खोदी गई थीं जिससे अनुमान होता है कि ताम्राश्म संस्कृति के मानव ने नगरीय सभ्यता को जन्म दिया था।
धार्मिक भावना का सुढ़ढ़ीकरण
इस युग में कृषि कार्य विस्तृत हो जाने के कारण मानव पर प्रकृति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता अधिक प्रभाव डालने लगी। इस कारण इस काल के मानव ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवता के रूप में पूजना आरम्भ किया। पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया। धार्मिक भावना के उदय के साथ-साथ इस युग के मानव में अन्धविश्वास भी उत्पन्न हो गया और वह जादू-टोना में विश्वास करने लगा।
स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण काल का मानव मातृदेवियों की उपासना करता था। कच्ची मिट्टी की नग्न लघु मूर्तियों की भी पूजा होती थी। इनामगांव से मातृदेवी की एक मूर्ति मिली है जो पश्चिमी एशिया से मिली मातृदेवी की मूर्ति जैसी है। मालवा और राजस्थान से प्राप्त वृषभ की रूढ़ शैली की मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि वृषभ की अनुष्ठानिक पूजा होती थी।
शवाधान
ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों के शव-संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस काल में महाराष्ट्र क्षेत्र में मृतक के शव को अपने भवन के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाढ़ा जाता था। हड़प्पा के लोगों की तरह उनके पृथक समाधि क्षेत्र नहीं होते थे। कब्र में मिट्टी की हांडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थीं, जो परलोक में मृतक के उपयोग के लिए होती थीं।
पश्चिमी महाराष्ट्र में चंदोली और नेवासा के शवाधानों में कुछ बच्चों को उनके गलों में तांबे की मणियों की मालाएं पहनाकर गाढ़ा गया था परन्तु दूसरे बच्चों के शवाधानों में केवल मिट्टी के बर्तन देखने को मिलते हैं। इनाम गांव के एक वयस्क व्यक्ति को मिट्टी और तांबे के बर्तनों के साथ गाढ़ा गया है।
ताम्राश्म संस्कृति की दुर्बलताएं
सामाजिक असमानताएं
ताम्र-पाषाण काल में सामाजिक असमानताएं आरंभ होने के प्रमाण मिलते हैं। कायथा के एक भवन से तांबे की 29 चूड़ियां और दो विशिष्ट कुल्हाड़ियां मिली हैं। उसी स्थान से मिट्टी के घड़ों में से सेलखड़ी और कार्नेलियन-जैसे कुछ मूल्यवान पत्थरों की मणियों की मालाएं मिली हैं। अनुमान है कि ये वस्तुएं समृद्ध लोगों की थीं।
कष्टमय जीवन
पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गाढ़े गए बच्चों के शवावशेषों से इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है। अन्न-उत्पादक अर्थव्यवस्था के उपरांत भी बच्चों की मृत्यु-दर बहुत ऊंची थी। इसके कारणों का पता लगाना कठिन है। कुपोषण अथवा महामारी के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरे होंगे। उस काल के ताम्र-पाषाणिक समाज तथा अर्थव्यवस्था में दीर्घायु प्राप्ति को बढ़ावा मिलना सम्भव नहीं था।
हड़प्पा सभ्यता से तकनीकी आदान-प्रदान का अभाव
ताम्र-निधियों वाले ये लोग हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे, और ये लोग गेरुए रंग के बर्तनों वाले जिस प्रदेश में रहते थे वह भी हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों सभ्यताओं में सम्पर्क होना तथा तकनीकी कौशल का आदान प्रदान होना स्वाभाविक था किंतु ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा सभ्यता के लोगों के ज्ञान का लाभ नहीं उठाया। इसलिए वे कांसे के बारे में नहीं जान सके।
भारत में ताम्र बस्तियों की खोज
भारत में ताम्र निर्मित सामग्री सबसे पहले गंगा-यमुना के दोआब में उपलब्ध हुई थी। गुनेरियां नामक स्थान से ताम्बे एवं कांसे की वस्तुओं का विशाल भण्डार मिला है। इस सामग्री में कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटारें, हार्पून एवं छल्ले प्रमुख हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इस क्षेत्र से प्राप्त कुल्हाड़ियों को पांच भागों में बांटा है। तलवारें प्रायः एक जैसी हैं। इन तलवारों के ब्लेड पत्ती के समान हैं एवं मुठिया तथा धार के साथ समूची तलवार एक ही सांचे में ढाली गई है। कटार का निर्माण भी इसी प्रकार से किया गया है। यह समग्र सामग्री सिंधु घाटी से प्राप्त सामग्री से भिन्न है।
प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियाँ
भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (वैदिक-काल से लेकर गुप्तकाल) तक रहा। दक्षिण भारत में नवपाषाणिक अवस्था एकाएक ताम्र-पाषाणिक अवस्था में बदल गई। इसलिए इन संस्कृतियों को नवपाषाणिक ताम्र-पाषाणिक नाम दिया गया है।
दूसरे भागों, विशेषतः पश्चिमी महाराष्ट्र और राजस्थान के लोग सम्भवतः उपनिवेशिक थे परन्तु तिथिक्रमानुसार, मालवा और मध्य भारत की कुछ बस्तियां, जैसे कि कायथा और एरण की बस्तियां, सबसे पुरानी थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में ताम्र-पाषाणिक बस्तियां कालांतर में स्थापित हुईं। पश्चिमी बंगाल में ताम्र-पाषाणिक बस्तियों की स्थापना सम्भवतः सबके अंत में हुई।
(1.) कायथा संस्कृति (ई.पू. 2150 से ई.पू.1400)
कायथा संस्कृति की बस्तियां मध्यप्रदेश में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित हैं। कायथा टीले से 12 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव मिला है जिसमें ताम्रपाषाणिक संस्कृति से लेकर गुप्त राजवंश के काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मृदभाण्ड बनाने की तीन परम्पराएं मिली हैं। प्रथम पात्र परम्परा हल्के गुलाबी रंग की है जिस पर बैंगनी रंग की चित्रकारी मिलती है।
दूसरी पात्र परम्परा पाण्डुरंग की है। बर्तनों पर लाल रंग से चित्रण अभिप्राय संजोये गए हैं। तीसरी परम्परा अलंकृत लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा है जिन पर कंघी की तरह के किसी उपकरण से आरेखण किया गया है।
(2.) आहड़ संस्कृति (ई.पू.1900 से ई.पू.1200)
यह बस्ती राजस्थान के उदयपुर नगर से 4 किलोमीटर दूर आहड़ नामक स्थान पर मिली है। आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है। इस स्थान को अब धूलकोट कहते हैं। यहाँ पर कायथा की तुलना में ताम्र उपकरण अधिक मिले हैं। इस संस्कृति के लोग सुखाई गई कच्ची ईंटों की सहायता से भवन बनाते थे। मकानों में दो-तीन मुंह वाले चूल्हे भी मिले हैं।
यहाँ से बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं। कपड़़ों पर छपाई के ठप्पे भी प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति में शवों को गाड़ते समय शव का मस्तक उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर रखे गए हैं। आहड़ संस्कृति को बनास संस्कृति भी कहते हैं क्योंकि इस सभ्यता का प्रसार सम्पूर्ण बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में पाया गया है।
(3.) गिलूण्ड संस्कृति (1700 ई.पू. से 1300 ई.पू.)
आहड़ के निकट गिलूण्ड से भी ताम्रपाषाणिक बस्ती मिली है। यहाँ से चूने के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। यहाँ से लाल एवं काले मृदभाण्डों की ही संस्कृति प्राप्त हुई है। यहाँ से 100 गुणा 80 फुट आकार के ईंटों से बने विशाल भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐसे भवन आहड़ में देखने को नहीं मिलते।
(4.) नवदाटोली संस्कृति (1500 ई.पू. से 1200 ई.पू.)
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मिलने के कारण इसे मालवा संस्कृति भी कहा जाता है। यह नर्बदा नदी के बायें किनारे पर स्थित है। यहाँ से मिले मृदभाण्ड गुलाबी रंग के हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्रण किया गया है। यहाँ से ताम्र उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। यहाँ से स्वर्ण, ताम्र, मृदा, शंख एवं सेलखड़ी पत्थर से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। कुछ अग्निकुण्ड भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि इस संस्कृति में अग्नि पूजा भी होती थी।
(5.) जोरवे संस्कृति (1400 ई.पू. से 700 ई.पू.)
पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रवर नदी तट पर स्थित जोरवे नामक गांव से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। बाद में नासिक, नेवासा, इनामगांव, दैमाबाद आदि स्थलों से भी इस संस्कृति के अवशेष मिले। इस संस्कृति में बस्तियां बसाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था। जोर्वे संस्कृति का प्रत्येक गांव 35 से भी अधिक गोलाकार अथवा आयताकार भवनों की एक सुगठित बस्ती होती थी। घरों के बीच एक से दो मीटर चौड़ी गलियां छोड़़ी गई हैं। यहाँ से कुम्हार, सुनार, हाथीदांत के शिल्पकारों के औजार मिले हैं जो बस्ती की पश्चिमी सीमा पर रहते थे।
समृद्ध किसान गांव के बीच में रहते थे। दस्तकारों के मकानों का आकार, समृद्ध किसानों के घरों के आकार की तुलना में छोटा है। यहाँ से अल्प मात्रा में ताम्बे के उपकरण पाए गए हैं। मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं जिनमें मातृदेवी एवं वृषभ की मूर्तियाँ विशेष हैं। इस संस्कृति में खेती के लिए नहरों एवं बांधों का निर्माण किए जाने के प्रमाण मिले हैं। दैमाबाद से कांसे की वस्तुएं बड़ी संख्या में मिली हैं। दैमाबाद से ताम्बे से निर्मित- रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे तथा हाथी की मूर्तियाँ मिली हैं।
(6.) पूर्वी भारत की बस्तियां (2000 ई.पू.)
पूर्वी भारत से चावल पर आधारित एक विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम संस्कृति का पता चला है। यह 2000 ई.पू. के आसपास अस्तित्त्व में रही होगी। उड़ीसा तथा बंगाल प्रांत के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर, बांकुरा, पांडु राजार ढिबी, महिषदल आदि में इस संस्कृति की बस्तियां मिली हैं। यहाँ गारे और सरकण्डे से निर्मित घरों के साथ-साथ चावल तथा मूंग सहित तरह-तरह की फसलों का समृद्ध संग्रह देखने को मिलता है।
(7.) ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दो-आब की बस्तियां (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.)
इन क्षेत्रों से गेरुए रंग के मृदभाण्डों वाली बस्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के बसौली तथा बिजनौर जिले के राजपुर परसू से नई किस्म के बर्तन प्राप्त हुए हैं। ये दोनों ही स्थान ताम्र भण्डार क्षेत्र में स्थित हैं। इस संस्कृति में अतरंजीखेड़ा का प्रमुख स्थान है। यहाँ से धूसर भाण्ड वाली बस्तियां मिली हैं। सहारनपुर से लेकर इटावा तक इस संस्कृति के लगभग 110 स्थल मिले हैं जिन्हें गेरुए रंग के मृदभाण्डों की संस्कृति कहते हैं।
(8.) ऐतिहासिक कालों की बस्तियां
उत्तर भारत में ताम्र पाषाणिक संस्कृति, जनपद युग एवं मगधीय साम्राज्य (600 ई.पू. से 300 ई.पू.) तथा शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल (300 ई.पू. से 600 ई.) तक अस्तित्त्व में रहीं जबकि पश्चिमी भारत में 3500 ई.पू. के आसपास ताम्रकांस्य संस्कृति जन्म ले चुकी थी।
(9.) सिंधु नदी घाटी क्षेत्र में ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियाँ
सिंधु नदी घाटी में भी ताम्बे एवं कांसे की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं किंतु यहाँ पर तलवार एवं हार्पून का अभाव है। इस क्षेत्र से मिले इस काल के हथियार साधारण कोटि के हैं। यहाँ पर धातु के साथ-साथ पाषाण सामग्री का उपयोग भी चलता रहा।
कांस्य की खोज
पाषाण की तुलना में ताम्बा अधिक उपयोगी था किंतु मुलायम होने के कारण इससे कठोर कार्य नहीं लिया जा सकता था। इसलिए मनुष्य ताम्बे से अधिक कठोर धातु की खोज में जुटा तथा उसने कांसे को खोज निकाला। यह मिश्रित धातु थी जो ताम्बे में टिन के मिश्रण से तैयार की जाती थी। दो धातुओं के मिश्रण से तीसरी धातु बनाने की क्षमता अर्जित कर लेना, इस युग के मानव की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।
ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ
आज से कुछ हजार वर्ष पहले, सिंध और बलोचिस्तान के जो प्रदेश आज की तरह रेगिस्तान नहीं थे। इन क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती थी तथा घने जंगलों से परिपूर्ण थे। जल और जंगल के कारण इन क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने अच्छा विकास किया। ई.पू.4000 में भी इस क्षेत्र में ग्रामीण बस्तियां थीं।
इन बस्तियों में पाषाण युग के बाद ताम्र युग का विकास हुआ। इन बस्तियों के लोगों का पश्चिम एशिया में स्थित मानव बस्तियों से सम्पर्क होने का भी अनुमान है। क्योंकि सिंध एवं बलोचिस्तान जैसे उपकरण पश्चिम एशियाई बस्तियों में भी प्राप्त हुए हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इन बस्तियों को चार भागों में विभक्त किया है-
(1) क्वेटा संस्कृति
बोलन के दर्रे में प्राप्त अवशेषों के आधार पर),
(2) अमरी-नल संस्कृति
सिंध में अमरी नामक स्थान पर तथा बलोचिस्तान में नल नदी की घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर,
(3) कुल्ली संस्कृति
बलोचिस्तान में कोल्बा नामक स्थान से प्राप्त अवशेषों के आधार पर तथा
(4) झोब संस्कृति
उत्तरी बलोचिस्तान की झोब घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर।
राजस्थान की ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ
राजस्थान में भी पाषाण काल के अंतिम वर्षों में ताम्रकाल आरंभ हो गया था। राजस्थान के पुरातत्त्व विभाग ने भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के सहयोग से कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूण्ड, नोह आदि स्थानों पर उत्खनन किया। इन उत्खननों में हमें सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एवं सिंधु सभ्यता के समकक्ष सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हएु हैं।
ताम्र-पाषाणिक एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति में अंतर
ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव पकी हुई ईंटों से घर बनाना नहीं जानता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव पकी हुई ईटों से घर बनाता था। ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव ताम्र औजारों के साथ-साथ प्रस्तर निर्मित औजारों का प्रयोग करता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव ताम्र एवं कांस्य से बने औजारों का प्रयोग करता था।
ताम्र-पाषाणिक बस्तियां पूर्वी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत एवं महाराष्ट्र में नासिक तक प्राप्त हुई हैं जबकि ताम्र-कांस्य बस्तियां बिलोचिस्तान एवं सिंध क्षेत्र में अधिक प्राप्त हुई हैं। ताम्र-पाषाण-कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला अर्थात् कांसा बनाने की विधि से अपरिचित था जबकि ताम्र-कांस्य कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला से अच्छी तरह परिचित हो गया था।
यह एक आश्चर्य की ही बात है कि सिंधु सभ्यता जो कि ताम्र-पाषाण काल से भी पुरानी है, में कांसे का प्रयोग होता था। इससे अनुमान होता है कि ताम्र-पाषाणिक अवस्था में जी रहे लोगों का उन क्षेत्रों से सम्पर्क नहीं था जो उनके समकालीन होते हुए भी कांस्य का उपयोग कर रहे थे।
सिंधु घाटी सभ्यता भारत भूमि पर प्रकट होने वाली सर्वप्रथम सुविकसित सभ्यता मानी जाती है। इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। यह तृतीय कांस्य-कालीन सभ्यता थी।
जिस समय सिंधु घाटी सभ्यता अस्तित्व में आई, लौह सभ्यताएं भविष्य के गर्भ में थीं, यहाँ तक कि इसके समानांतर रह रही प्राचीन बस्तियां अभी भी नव पाषाणकाल में जी रही थीं तथा उनमें ताम्बे की खोज होनी अभी बाकी थी।
निश्चित रूप से सिंधु घाटी सभ्यता, नवपाषाण कालीन बस्तियों से ही विकसित हुई थी किंतु सिंधु वासियों ने न केवल ताम्बे की अपितु उसके साथ-साथ टिन की खोज में भी सफलता अर्जित कर ली थी जिसके कारण वे मिश्रधातु ‘कांस्य’ अथवा ‘कांसे’ का निर्माण कर पाए थे तथा इस धातु के कारण वे सभ्यता, संस्कृति एवं विज्ञान के मामले में अपनी समकालीन संस्कृतियों से अचानक ही तेजी से आगे निकल गए थे।
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चूँकि इस सभ्यता के अधिकांश भग्नावशेष सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में उपलब्ध हुए हैं, इसलिए इसे सिन्धु-घाटी सभ्यता अथवा ‘सैन्धव सभ्यता’ कहा जाता है। हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो नामक नगरों के आस-पास इस सभ्यता के बड़े केन्द्र प्राप्त होने से इस संस्कृति को ‘हड़प्पा संस्कृति’ एवं मोहेनजोदड़ो संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है। आसपास की भूमि से ऊपर उभरे हुए विशाल टीलों में दबी पड़ी इस सभ्यता के उत्खनन का कार्य ई.1920 में हड़प्पा में आरम्भ किया गया। हड़प्पा, अखण्ड भारत के पंजाब प्रांत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ‘माण्टगोमरी’ जिले में स्थित था। लाहौर से लगभग 100 मील दक्षिण-पश्चिम में रावी नदी के तट पर हड़प्पा सभ्यता के टीले विद्यमान थे। इन टीलों का उत्खनन कार्य करवाने वालों में दयाराम साहनी तथा माधोस्वरूप वत्स अग्रणी थे। ई.1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में सिन्ध प्राप्त के लरकाना जिले में खुदाई का काम हुआ, जिसके फलस्वरूप ‘मोहेनजोदड़ो’ नामक स्थान पर एक सैन्धव नगर के अवशेष उपलब्ध हुए। यद्यपि इन दोनों स्थानों के बीच लगभग 680 किलोमीटर की दूरी है तथापि दोनों स्थानों की खुदाई में प्राप्त अवशेषों में अद्भुत साम्यता थी।
दोनों केन्द्रों से प्राप्त सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर सर जॉन मार्शल ने सिद्ध किया कि ये अवशेष एक ही पूर्वेतिहासिक सभ्यता से सम्बद्ध हैं।
अर्नेस्ट मैके, एन. जी. मजूमदार, सर ऑरेल स्टीन, एच. हारग्रीव्ज, पिगट, मोरटीमर व्हीलर, रंगनाथराव, एच. डी. सांकलिया, बी. बी. लाल, बी. के. थापर आदि पुरातत्त्वेताओं ने खोज और खनन के कार्य को आगे बढ़ाया जिससे यह पता चला कि यह प्राचीन सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक ही सीमित नहीं थी। सिंधु की सहायक नदियों के किनारों से भी इस काल की सभ्यता के अवशेष बड़ी संख्या में प्राप्त हुए।
सिंधु घाटी सभ्यताका विस्तार क्षेत्र
इस सभ्यता का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान के बलोचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब, भारत के गंगा घाटी, पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात तक था। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे। अफगानिस्तान में क्वेटा, कीली, गुलमुहम्मद, मुण्डिगक नदी के किनारे-किनारे तथा डम्बसदात में भी सिन्धु सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष मिले हैं। बलोचिस्तान के उत्तर-पूर्व में लोरलाय घाटी तथा जोब नदी की घाटी में भी इस सभ्यता के कई स्थल मिले हैं।
मान्यता है कि दक्षिणी बलोचिस्तान की ‘कुल्ली सभ्यता’ सिन्धु सभ्यता का ही प्रारम्भिक रूप रही होगी। उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा से मिले अवशेषों का निचला स्तर सिन्धु सभ्यता से भी पहले का है जबकि ऊपरी स्तर सिन्धु सभ्यता से सम्बन्धित है। पंजाब में रोपड़ तथा गुजरात में लोथल और रंगपुर नामक स्थानों से प्राप्त अवशेष भी सिन्धु सभ्यता के समकालीन प्रमाणित होते हैं।
इस प्रकार अखण्ड भारत में सैन्धव सभ्यता का विस्तार पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित सुत्कांगाडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर एवं विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे तथा उत्तर में शिमला की पहाड़ियों की तलहटी से लेकर दक्षिण में नर्बदा और ताप्ती नदियों के मध्य भगवार तक था।
रंगनाथराव ने इस सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम में लगभग 1600 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण में लगभग 1100 किलोमीटर माना है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यह क्षेत्र आज के पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, साथ ही प्राचीन मिस्र और मेसीपोटामिया से भी बड़ा था। ई.पू.3000 एवं ई.पू.2000 में संसार का कोई भी अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।
सिंधु घाटी सभ्यताके प्रमुख स्थल
हड़प्पा संस्कृति के अब तक 1400 से अधिक स्थलों का पता लग चुका है। इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में थे। अब तक ज्ञात स्थलों में से केवल छः स्थलों को ही नगर माना जाता है। इन नगरों में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थे- पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहेनजोदड़ो। सिन्धु नदी इन्हें एक दूसरे से जोड़ती थी। तीसरा नगर सिन्ध प्रांत में चहुन्दड़ो था जो मोहेनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। चौथा नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थान पर है।
पांचवा नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर तथा छठा नगर हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली नामक स्थल पर है। बनवाली में भी कालीबंगा की तरह दो सांस्कृतिक अवस्थाओं- हड़प्पा पूर्व सभ्यता और हड़प्पा-कालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। बिना पकी ईटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा-पूर्व युग के हैं। इन समस्त स्थलों पर उन्नत और समृद्ध हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुत्कांगाडोर और सुरकोटड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति के उन्नत रूप के दर्शन होते हैं जहाँ नगर दुर्ग स्थित हैं।
गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी एवं कच्छ क्षेत्र में धौलावीरा नामक स्थलों पर इस संस्कृति की उत्तरावस्था के दर्शन होते हैं। हरियाणा में राखीगढ़ी तथा कुणाल एवं उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर में भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता का काल
सिन्धु-घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है। बुलीहॉल, गार्डन चाइल्ड, बेक आदि विद्वान विश्व की नदी घाटी सभ्यताओं में सिन्धु सभ्यता को सबसे प्राचीन एवं प्रारम्भिक मानते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 4,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 3,000 वर्ष पूर्व और कुछ ने केवल 2,500 वर्ष पूर्व की बताया है।
डॉ. राधकुमुद मुकर्जी ने इसे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए लिखा है– ‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता का न तो मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है और न वह उसकी ऋणी है।’
जॉन मार्शल और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी का मत है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू.3250 से भी बहुत पहले हुआ होगा। प्रो. के. एन. शास्त्री और डॉ. राजबली पाण्डेय इसे ई.पू. 4000 साल पुरानी सभ्यता मानते हैं। अब यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि सिन्धु-सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर इसका समय 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. तक बताया है।
डॉ पाण्डेय का मत है कि- ‘सिंधु सभ्यता की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के उपर एक, सात स्तर मिले हैं। यदि एक नगर के बसने, पनपने और उजड़ने के लिए 500 साल का समय दिया जाए तो सात नगरों के बसने, विकसित होने और उजड़ने में लगभग 3500 साल लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है, जिसके पूर्व सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यदि भू-गर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों के स्तर मिल सकते हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष की है।’
बलोचिस्तान एवं मकरान में मिली पुरातत्विक वस्तुओं के आधार पर भी यह माना जाता है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ईसा से 4000 साल पूर्व क्वेटा, अमरी, नाल, कुली, झोव आदि स्थानों पर छोटी बस्तियों के रूप में हो गया था। डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता ई.पू.3500 से ई.पू.2250 के मध्य अपने चरम पर थी। सर मोरटीमर व्हीलर इस सभ्यता को ई.पू.2500 से ई.पू.1500 के मध्य की मानते हैं। डॉ. फ्रेंकफर्ट ने इसका काल ई.पू.2800 का माना है।
डॉ. फबरी ने इसका समय ई.पू.2800-2500 माना है। नवीनतम खोजों के आधार पर डॉ. अर्नेस्ट मैके ने भी डॉ. फबरी के मत की पुष्टि की है। ‘कार्बन-14 परीक्षण प्रणाली’ के अनुसार सिन्धु सभ्यता का काल एक विवादास्पद प्रश्न है परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ई.पू.3000 में भारत-भूमि पर सिन्धु सभ्यता के रूप में स्वतंत्र एवं समृद्ध सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा सुमेरियाई सभ्यताओं से किसी भी प्रकार कम उन्नत नहीं थी।
डॉ. फ्रैंकफर्ट ने लिखा है- ‘यह बिना किसी सन्देह के निर्धारित हो चुका है कि भारत ने एक ऐसी संस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा की जिसने यूनानियों के पहले इस विश्व को सभ्य बनाया।’
सिंधु घाटी सभ्यता के तीन स्तर
हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर पाए गए हैं- (1.) प्रारंभिक काल (ई.पू.3500 से ई.पू.2800 ई.पू.), (2.) मध्य-काल या चरमोत्कर्ष काल ( ई.पू.2800 से ई.पू.2200) तथा (3.) अवनति काल ( ई.पू.2200 से ई.पू.1500)
कांस्य कालीन सभ्यता
सैन्धव सभ्यता प्रधानतः कांस्य कालीन सभ्यता थी तथा उस काल के तृतीय चरण की सभ्यता है। इसका गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करने पर इसमें कांस्य-काल की चरमोन्नति दिखाई देती है। कांस्य कालीन सभ्यता कालक्रम के अनुसार ताम्र कालीन सभ्यता के बाद की तथा लौह कालीन सभ्यता के पूर्व की ठहरती है।
समकालीन सभ्यताओं से सम्पर्क
हड़प्पा सभ्यता का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा। ये लोग पहिए वाली बैलगाड़ियों एवं जल-नौकाओं का उपयोग करते थे। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का भी उपयोग करते थे। इस कारण अन्य स्थानों के लिए इनका आवागमन एवं परिवहन पहले की सभ्यताओं की तुलना में अधिक सुगम था।
हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती होंगी और उन देशों से हड़प्पावासियों के व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। सोना, चांदी, ताम्बा आदि धातुएं सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलती थीं। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते होंगे। हड़प्पावासी ताम्बा राजस्थान से, सीपी और शंख काठियावाड़ से तथा देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते होंगे।
अनुमान है कि हड़प्पा संस्कृति के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान की अन्य मानव बस्तियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पावासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह्ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।
सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि सिन्धुघाटी के शहरों में बनी हुई वस्तुएं दजला और फरात के बाजारों में बिकती थीं….. अरब सागर के किनारों से लाई गई मछलियां मोहनजोदड़ो के भोजन में सम्मिलित थीं।
सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता
यह प्रश्न आज भी नहीं सुलझ पाया है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे! सिन्धु सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों की शारीरिक बनावट के विश्लेषण के आधार पर मानवशास्त्र वेत्ताओं ने सिन्धु सभ्यता का विकास करने वालों लोगों को चार नस्लों- (1.) आदिम आग्नेय, (2.) मंगोलियन, (3.) भूमध्यसागरीय तथा (4.) अल्पाइन से सम्बन्धित बताया है।
इनमें से भूमध्यसागरीय जाति के लोगों की खोपड़ियां सर्वाधिक संख्या में मिली हैं जबकि मंगोलियन तथा अल्पाइन नस्ल के लोगों की केवल एक-एक खोपड़ी मिली है। अतः जब तक सिन्धु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त मोहरों पर अंकित लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता तब तक यह कहना कठिन होगा कि इस सभ्यता के निर्माता किस जाति या नस्ल के थे? सैन्धव सभ्यता के निर्माताओं के सम्बन्ध में विद्वानों में विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं-
(1.) सैन्धव सभ्यता के निवासी मिश्रित नस्ल के थे
सिंधु सभ्यता से मिली चार नस्लों की खोपड़ियों के आधार पर कर्नल स्युअल और डॉ गुह्बा की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता का निर्माण किसी एक नस्ल अथवा जाति के लोगों ने नहीं किया। सिन्धु सभ्यता नागरिक सभ्यता थी। इसके मुख्य नगर व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख केन्द्र बने हुए थे। अतः आजीविका की तलाश में अनेक प्रजातियों के लोग यहाँ आकर बस गए थे।
(2.) सैन्धव सभ्यता के निवासी द्रविड़़ थे
सर जॉन मार्शल तथा प्रो. रामलखन बनर्जी आदि कुछ विद्वानों ने माना है कि चूँकि खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों में भूमध्यसागरीय नस्ल की प्रधानता है, अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को दिया जाना चाहिए। द्रविड़ लोग भूमध्यसागरीय नस्ल की ही एक शाखा थे। कुछ विद्वान बलोचिस्तान आदि भागों में बोली जाने वाली ‘ब्राहुई’ भाषा तथा द्रविड़ों की भाषा में समानता के कारण भी द्रविड़ों को इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं। दक्षिण भारत के द्रविड़ों के मिट्टी तथा पत्थर के बर्तन और आभूषण सिन्धु-घाटी के लोगों के बर्तन तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं।
(3.) सैन्धव सभ्यता के निवासी सुमेरियन थे
प्रोफेसर चाइल्ड ने सुमेरियन लोगों को इस सभ्यता का निर्माता माना है। डॉ. हाल ने भी उनके मत की पुष्टि की है। पिगट के अनुसार इस सभ्यता का मूल पूर्णतः भारतीय था परन्तु वे इस पर सुमेरियन प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं।
(4.) सैन्धव सभ्यता के निवासी आर्य थे
लक्ष्मण स्वरूप, रामचंद्र, शंखरानन्द, दीक्षितार तथा डॉ. पुसालकर के अनुसार सैन्धव सभ्यता के निर्माता या तो आर्य थे अथवा आर्यों ने इस सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। डॉ. पुसालकर के शब्दों में- ‘यह आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है। अधिक से अधिक हम यह कह सकते हैं कि सम्भवतः ऋग्वैदिक आर्य वहाँ की जनता का एक महत्त्वपूर्ण भाग थे और उन्होंने भी सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास में अपना योग दिया।’
(5.) सैन्धव निवासी असुर थे
एक विद्वान के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही असुर थे जिसका वर्णन वेदों में मिलता है।
निष्कर्ष
सैन्धव सभ्यता की खुदाई में विभिन्न जातियों से सम्बद्ध मानवों की हड्डियाँ मिली हैं अतः यह मानना उचित होगा कि सिन्धु-घाटी के निर्माता मिश्रित जाति के थे तथापि सैन्धव समाज में द्रविड़ जाति की प्रधानता थी। सैन्धव सभ्यता के निर्माता जो भी रहे होंगे किंतु उनकी कुछ बातें उन्हें अपनी समकालीन मानव सभ्यताओं से बिल्कुल अलग करती हैं।
सैन्धव सभ्यता के लोग अपने भवनों का निर्माण पक्की ईंटों से करते थे जबकि सुमेरियन सभ्यता के लोग कच्ची ईंटों के मकान बनाते थे। सिंधु सभ्यता के स्थलों से न तो सुमेरियन शहरों की तरह मन्दिर मिले हैं और न मिस्र के नगरों जैसे महल या मकबरे। सिंधु सभ्यता में लिंगपूजा, योनिपूजा, पीपल पूजा, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों का महत्त्व, स्नान-ध्यान का महत्त्व और सफाई का महत्त्व आदि ऐसे प्रमाण मिले हैं जो अन्य समकालीन अथवा पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त नहीं हुए हैं।
सैन्धव सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरुष प्रतिमाओं के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, मृण्मूर्तियाँ आदि वस्तुएं सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं।
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