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पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

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पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं

भारत में पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड) आज से लगभग पाँच लाख साल पहले आरम्भ हुईं तथा आज से लगभग दस हजार साल पहले तक अस्तित्व में रहीं।

मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की ‘होमो सेपियन’ प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।

काल निर्धारण

भारत में पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् ई.पू. 8000 में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।

पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल

पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाए गए हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये ई.पू. 1 लाख तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं। बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण-औजार प्राप्त हुए हैं।

आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर दूर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय ई.पू.25 हजार से ई.पू.10 हजार के बीच का है। इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से, कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।

लिखित उल्लेख

पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।

शैल चित्र

भारत के अनेक स्थानों पर उपलब्ध पहाड़ियों में शैलचित्रों की प्राप्ति हेाती है जिनसे आदिमकालीन संस्कृति का ज्ञान होता है। विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर  200 से अधिक गुफाएं पाई गई हैं जिनमें पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5,000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1,500 औजार हैं।

जीवाश्म

कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं के हैं। इन जीवाश्मों के क्षेत्र से पूर्व-पाषाण कालीन औजार मिले हैं।

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह पशु-पालन, कृषि, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव की संस्कृति की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

निवासी

इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग ‘हब्शी’ जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाए जाते हैं।

औजार

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होंगे परन्तु अब वे नष्ट हो गए हैं।

आवास

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।

आहार

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिए जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।

कृषि

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।

पशु-पालन

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि ई.पू.25 हजार के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे किंतु सामान्यतः इस युग का आदमी पशुपालन नहीं करता था।

वस्त्र

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिए उन्होंने वृक्षों की पत्तियों, छाल तथा पशुचर्म से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।

सामाजिक संगठन

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियाँ आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।

शव-विसर्जन

अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

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मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ एवं नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ

पूर्वपाषाण कालीन सभ्यताओं के बाद भारत में विश्व के अन्य क्षेत्रों की तरह पहले मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ आरम्भ हुईं एवं उनके बाद नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ आरम्भ हुईं।

गर्म युग

आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर ‘होलोसीन पीरियड’ आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। यह गर्म युग है तथा वर्तमान हिमयुग के बीच में स्थित ‘अंतर्हिम काल’ है। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशु-पालन तथा समाज को व्यवस्थित किया। आज तक धरती पर वही गर्म युग चल रहा है और मानव निरंतर प्रगति करता हुआ आगे बढ़ रहा है।

आज से लगभग 10 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु-पालन आरंभ किया। यह इस गर्म युग की सबसे बड़ी देन है। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 8000 साल पहले अर्थात् 6000 ई.पू. में आदमी ने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आग में पकाना आरंभ कर दिया था।

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ

ई.पू.8000 में धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई। इसी के साथ धरती की जलवायु शुष्क तथा ऊष्ण हो गई। जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। इस काल में धरती पर क्रो-मैगनन मानव का बोलबाला था। उसका मस्तिष्क पूर्वपाषाण कालीन मानव से काफी विकसित था।

इस कारण इस मानव ने तेजी से सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया जिससे उसके जीवन में पहले की अपेक्षा बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। यह मानव अपने अधिवास के लिए अधिक अनुकूल एवं नए क्षेत्रों की तरफ बढ़ा तथा इसने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इस संस्कृति को मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ अथवा उत्तर-पाषाण कालीन संस्कृति कहते हैं।

काल निर्धारण

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ वस्तुतः पूर्व-पाषाण-काल और नव-पाषाण काल के बीच संक्रांति काल है जिसे उत्तर पाषाण युग भी कहते हैं। भारत में इस संस्कृति का आरम्भ ई.पू.8000 के लगभग हुआ और लगभग ई.पू. 4000 तक चला।

मध्य-पाषाण-संस्कृति स्थल

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ के कई स्थल छोटा नागपुर, मध्य भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में मिले हैं। मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदीमुख-क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के बीच के क्षेत्र में भी मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति स्थल मिले हैं। बेलन की घाटी में भी इस युग के मानव के आवास मिले हैं। इस संस्कृति के स्थल सोहन नदी घाटी में भी मिले हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ प्रस्तर उपकरण उद्योग को देखते हैं।

मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

औजार

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मध्य-पाषाण-संस्कृति के विशिष्ट औजार लघु-पाषाण हैं। इस संस्कृति के मानव ने प्रमुखतः शल्क औजारों का उत्पादन किया। ये शल्क समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें मुख्य औजार शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियां हैं। बरमे और धार वाले उपकरण भी भारी संख्या में मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ काफी सीमा तक वैसी ही हैं जैसी की पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में मिली कुल्हाड़ियाँ हैं। पत्थरों के औजारों का उपयोग मुख्यतः काटने एवं छीलने के लिए होता था। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भीमबेटका से हाथ की कुल्हाड़ियाँ, विदारक, पत्तियाँ, खुरचनियाँ तथा तक्षणियाँ पायी गयी हैं। गुजरात के टिब्बों के ऊपरी स्तरों में भी पत्तियां, तक्षणियां, खुरचनियां आदि मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियां हिमालय के दूसरे हिमनद निक्षेप में भी मिली हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा के दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के औजार मिले हैं।

औजारों का विकास

मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव भी अपने औजार पत्थर से ही बनाता था परन्तु उसके औजार पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। अब वे उतने भद्दे नहीं रह गए थे। इन औजारों को रगड़ एवं घिस कर चिकना कर लिया जाता था। इससे वे सुडौल तथा चमकीले हो जाते थे।

इस काल में औजार एवं हथियार बनाने के लिए लकड़ी तथा हड्डियों का प्रयोग पहले से भी अधिक होने लगा। इससे औजारों में विविधता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हँसिया, घिरनी, सीढ़ी, डोंगी, तकली आदि भी बनायी जाने लगी।

आवास

बेलन घाटी में गुफाओं और चट्टानों से बने शरण-स्थल पाए गए हैं जो विशेष मौसमों में मनुष्यों द्वारा शिविर के रूप में उपयोग किए जाते रहे होंगे। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में भीम बेटका में भी मनुष्यों के उपयोग में आने वाली गुफाएं और चट्टानों से बने शरण-स्थान पाए गए हैं।

जलवायु

हिमकाल की समाप्ति के बाद धरती पर शुष्क एवं उष्ण जलवायु आरंभ हुआ था। मध्य-पाषाण काल में धरती की जलवायु कम आर्द्र थी। इस काल के आरंभ होने के बाद से धरती की जलवायु की परिस्थितियों में अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।

कृषि का आरम्भ

मध्य-पाषाण-काल के मानव ने ई.पू. 8000 अर्थात् आज से लगभग 10 हजार साल पहले, हल तथा बैलों की सहायता से कृषि करना आरम्भ कर दिया। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करने लग गया। इस काल का मानव गेहूँ, जौ, बाजरा आदि की खेती करता था।

पशु-पालन

कुछ स्थानों पर पशु-पालन पूर्व-पाषाण-काल में आरम्भ हो गया था। मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पशुओं की उपयोगिता को अनुभव करके पशु-पालन का काम बड़े स्तर पर आरम्भ कर दिया। इस काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था।

मिट्टी के बर्तनों का निर्माण

मध्य-पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया। कृषि तथा पशु-पालन का काम आरम्भ हो जाने से इस संस्कृति के मानव के पास सामान अधिक हो गया। अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस युग के मानव ने मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने आरम्भ किए। इस काल का मानव चाक का अविष्कार नहीं कर पाया था। अतः बर्तन हाथ से ही बनाए जाते थे।

वस्त्र-निर्माण

मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागों की कताई आरम्भ की। इन धागों को बुनकर वह वस्त्र बनाने लगा। खुदाई में बहुत-सी तकलियाँ तथा करघे मिले हैं। इस संस्कृति का मानव वस्त्रों को रंगना भी सीख गया था।

गृह-निर्माण

मध्य-पाषाण-काल के मानव ने अपने निवास के लिए स्थाई घर बनाना आरम्भ किया। इस काल के घरों की दीवारें लट्ठों तथा नारियल के तनों से बनी होती थीं और उन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता था। इनकी छतें लकड़ी, पत्ती, छाल आदि से बनती थी और फर्श कच्ची मिट्टी से बनता था।

कार्य-विभाजन तथा वस्तु-विनिमय

मध्य-पाषाण-काल के मानव ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी के बर्तन बनाता था और कोई लकड़ी के काम किया करता था। इस प्रकार सबका काम अलग-अलग बंट गया। इससे वस्तु-विनिमय आरम्भ हो गया। एक गाँव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने लिए चीजों की अदली-बदली किया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी वस्तुएँ किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त करते थे।

युद्ध का प्रारम्भ

पुरा-पाषाण-काल का मानव झुण्डों में रहता था जिनमें प्रायः संघर्ष हो जाया करता था। मध्य-पाषाण-काल में विभिन्न मानव बस्तियों के बीच युद्ध होने आरम्भ हो गए। इसलिए आत्म-रक्षा के लिए गांव के चारों और खाई बनाई जाने लगी ताकि शत्रु अचानक गांव में न घुस सकें। इस काल का मानव, युद्ध में पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था।

धर्म

खुदाई में कुछ नारी-मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है।

शव-विसर्जन

मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था।

निष्कर्ष

मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति में मानव जीवन में आए परिवर्तन अत्यंत क्रान्तिकारी थे। इस काल का मानव, सभ्यता की होड़़ में बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशु-पालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण उसमें सहकारिता की भावना विकसित हो गई थी जिससे वह एक स्थान पर गाँवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा था। उसे अपनी धरती से प्रेम होने लगा था।

इस कारण मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति के मानव में मातृभूमि की धारणा विकसित हो गई। मानव के पास भूमि, घर, पशु, अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ होने से व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हो गया और लोगों में सम्पन्नता तथा दरिद्रता का भाव भी जन्म लेने लगा था। अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ भी की जाने लगीं। सारांश यह है कि मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

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पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

नवपाषाण कालीन सभ्यताएं

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नवपाषाण कालीन सभ्यताएं

भारत में नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ सामान्यतः मध्यपाषाण कालीन सभ्यताओं के बाद आरम्भ हुईं किंतु कुछ स्थल ऐसे भी थे जिनमें पूर्वपाषाण काल के बाद सीधे ही नवपाषाण काल आ गया। हालांकि ऐसा बहुत कम स्थलों पर देखा गया है। नव पाषाण कालीन सभ्यताएं निओलिथिक पीरियड भी कहलाती हैं।

धरती पर पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता लगभग 35 लाख वर्ष तक चलती रही। भारत में इस संस्कृति की आयु लगभग 5 लाख साल सिद्ध हुई। इतने लम्बे समय तक मानव का संस्कृति के एक ही चरण में बने रहने का कारण यह था कि पूर्वपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले ‘होमो सेपियन’ मानव का मस्तिष्क अधिक विकसित नहीं था।

नवपाषाण कालीन सभ्यताएं

मध्यपाषाण कालीन सभ्यता ई.पू.8000 से ई.पू.4000 तक अर्थात् लगभग 4 हजार साल तक धरती पर रही। इसका कारण यह था कि मध्यपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाला ‘क्रोमैगनन मानव’ अधिक बड़े एवं विकसित मस्तिष्क का स्वामी था। इस कारण उसने लगभग चार हजार साल में ही मध्यपाषाण-कालीन संस्कृति को त्यागकर नव-पाषाण कालीन संस्कृति को जन्म दिया।

काल निर्धारण

पश्चिमी एशिया के इतिहास में ई.पू.8000 से ई.पू. 4000 के बीच की अवधि में पहली प्रौद्योगिक क्रांति घटित हुई, क्योंकि इसी अवधि में कृषि, कपड़़ा बुनाई, गृह-निर्माण आदि कलाओं का आविष्कार हुआ। इस प्रकार धरती पर ई.पू.4000 के आसपास नव-पाषाण-काल आरम्भ हुआ परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में भी नवपाषाण युग का आरम्भ ई.पू.4000 के लगभग हुआ।

इसी युग में भारतीय प्रायद्वीप में चावल, गेहूँ और जौ आदि महत्त्वपूर्ण अनाजों की खेती आरम्भ हुई। इस भूभाग में आरंभिक गांवों की स्थापना भी इसी युग में हुई। मानव अब सभ्यता की देहली पर पैर रखने जा रहा था। दक्षिणी भारत और पूर्वी भारत में ऐसी कुछ बस्तियों की स्थापना 1000 ई.पू. में भी होती रही।

नवपाषाण कालीन सभ्यताएं : सांस्कृतिक विशेषताएँ

नव-पाषाण-कालीन मानव का जीवन

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन पर्याप्त कष्टमय था। उसे पत्थरों के औजारों और हथियारों पर ही पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता था, इसलिए वह पहाड़ी क्षेत्रों से अधिक दूरी पर अपनी बस्तियों की स्थापना नहीं कर पाया। बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी वह केवल अपने निर्वहन भर के लिए अनाज पैदा कर पाता था।

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजार

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का उपयोग किया। पत्थर की कुल्हाड़ियां उसका प्रमुख औजार थीं जो प्रायः समस्त भारत में बड़ी संख्या में मिली हैं। उस युग के लोगों ने काटने के इस औजार का कई प्रकार से उपयोग किया। परशु (कुल्हाड़ी) चलाने में प्रवीण वीर परशुराम का प्रचीन आख्यान प्रसिद्ध है। इस युग के पॉलिशदार औजारों में लघु-पाषाणों के फलक भी हैं।

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के स्थल

नवपाषाण युग के मनुष्यों की बस्तियों को, उनके द्वारा प्रयुक्त कुल्हाड़ियों की किस्मों के आधार पर, तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बांट सकते हैं- (1.) उत्तर दिशा में बर्जेहोम, (2.) पूर्व दिशा में चिरंड तथा (3.) दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के दक्षिण में।

(1.) बुर्जहोम

कश्मीर की घाटी में श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर बर्जेहोम नामक स्थान है। यहाँ के नव-पाषाण-कालीन मानव, एक प्लेट पर, गड्ढे वाले घरों में रहते थे। पशुओं और मछलियों के आखेट पर ही उनका जीवन आश्रित था। अनुमान होता है कि वे कृषि अथवा पालतू पशुओं से परिचित नहीं थे। वे पत्थर के पॉलिशदार औजारों का उपयोग करते थे, उनके बहुत से औजार और हथियार हड्ड्यिों से बने हुए हैं।

बुर्जहोम के लोग अपरिष्कृत धूसर मृद्भाण्डों का उपयोग करते थे। बुर्जहोम में पालतू कुत्ते भी स्वामियों के शवों के साथ शवाधानों में गाढ़े जाते थे। गड्ढों वाले घरों में रहने और स्वामी के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को गाढ़ने की प्रथा भारत में नवपाषाण युगीन लोगों में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बुर्जहोम की बस्ती ई.पू.2400 की है।

(2.) चिरंड

भारत में दूसरा स्थान चिरंड है जहाँ से नवपाषाण-कालीन उपकरणों के साथ पर्याप्त मात्रा में हड्डियों के औजार भी मिले हैं। यह स्थल पटना से 40 किलोमीटर पश्चिम में गंगा के उत्तर में स्थित है। ये औजार उत्तर नवपाषाण-युगीन स्तरों वाले ऐसे क्षेत्र में मिले हैं जहाँ लगभग 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है। यहाँ पर चार नदियों- गंगा, सोन, गंडक और घाघरा का मिलन-स्थल होने के कारण खुली धरती उपलब्ध थी। चिरंड से प्राप्त हड्डियों के औजार ई.पू.1600 लगभग के हैं।

(3.) गोदावरी नदी

नवपाषाण युगीन लोगों के एक समूह का निवास दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में निवास करता था। इन्होंने अपनी बस्तियां सामान्यतः ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी तट के समीप के टीलों पर स्थापित कीं। ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों के साथ-साथ एक प्रकार के प्रस्तर-फलकों का भी उपयोग करते थे। आग में पकायी गयी लघु मृण्मूर्तियों को देखने से अनुमान होता है कि वे कई पशुओं को पालते थे। वे गाय-बैल, भेड़ और बकरियां रखते थे। वे सिलबट्टे का उपयोग करते थे, जिससे ज्ञात होता है कि वे अनाज पैदा करने की कला जानते थे।

(4.) अन्य स्थल

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम की पहाड़ियों तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में नव-पाषण-संस्कृति के औजार मिले हैं। इनका काल निर्धारित नहीं किया जा सका है। इनके अतिरिक्त विंध्याचल के उत्तरी भागों में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों से भी अनेक नवपाषाण युगीन स्थल मिले हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण युगीन स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ ईसा पूर्व की छठी सहस्राब्दी में भी चावल की खेती की जाती थी। बलोचिस्तान में भी नवपाषाण युग के कुछ स्थल मिले हैं।

नवपाषाण कालीन सभ्यताएं : उत्खनन

भारत में अब तक जिन नवपाषाण युगीन स्थलों अथवा स्तरों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कीड़कल, संगनकल्लु, टी. नरसीपुर तथा तैक्कलकोट, तमिलनाडु में पेयमपल्ली, आन्ध्रप्रदेश में पिकलीहल और उतनूर। यहाँ नवपाषाण अवस्था का चरण लगभग ई.पू.2500 से ई.पू.1000 तक रहा, यद्यपि उतनूर के लिए प्राचीनतम कार्बन-तिथि ई.पू.2300 है।

नवपाषाण कालीन सभ्यताएं : जीवन शैली

आवास

नव-पाषाण युगीन मानव ने प्राकृतिक आवासों अर्थात् पर्वतीय गुफाओं एवं पेड़ों का आश्रय त्यागकर नदी तटों एवं पर्वतों के समतल स्थानों पर पेड़ों की टहनियों, तनों, सूखी लकड़ियों, घास, पशुओं की हड्डियों तथा खालों आदि से आवास बनाने आरम्भ किए। ये आवास झुण्ड में बनते थे।

औजार

इस युग के औजार एवं हथियार पत्थर से ही बनाए जाते थे किंतु अब उनमें पहले की अपेक्षा अधिक वैविध्य, कौशल एवं सौन्दर्य का समावेश किया गया। नव-पाषाण-कालीन औजारों एवं हथियारों पर पॉलिश की जाने लगी। इनके निर्माण के लिए अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप का उपयोग किया जाने लगा। इस युग के औजारों में कुल्हाड़ियाँ, चाकू, तीर, ओखली, मूसल, पीसने के औजार, स्क्रैपर तथा पॉइण्टर उपलब्ध हुए हैं।

कृषि

नवपाषाण युग की कुल्हाड़ियां उड़ीसा के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मिली हैं। देश के इस भाग में चावल की खेती और छोटे पैमाने की बस्तियों की शुरूआत काफी पहले हुई थी। बाद के नवपाषाण युगीन अधिवासी ऐसे कृषक थे जो मिट्टी और सरकंडों से बनाए गए गोलाकार अथवा चौकोर घरों में रहते थे। गोलाकार घरों में रहने वाले लोगों की सम्पत्ति सामूहिक होती थी। यह निश्चित है कि ये लोग स्थायी अधिवासी बन गए थे। ये रागी और कुलथी पैदा करते थे।

पशु-पालन

पिकलीहल के नवपाषाण युगीन अधिवासी पशुपालक थे। वे गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि पालते थे। वे मौसमी पड़ाव डालकर खंभों और खूँटों से गौशालाएं खड़ी करते थे और बाड़ों के भीतर गोबर का ढेर लगाते थे। फिर इस पड़ाव को आग लगाकर आगामी मौसम के पड़ाव के लिए इसे साफ करते थे। पिकलीहल में ऐसे राख के ढेर ओर पड़ावस्थल दोनों ही मिले हैं।

बर्तन

चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई अधिवासी समूह अनाजों की खेती करते थे और पालतू-पशु भी पालते थे, इसलिए उन्हें अनाज और दूध रखने और पकाने-खाने के लिए उन्हें बर्तनों की आवश्यकता थी। चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्त्वपूर्ण अविष्कार था। इसी युग में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाकर मजबूत बनाना सीखा।

धर्म

नव-पाषाण काल में धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गए। चूँकि शवों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी शवाधानों से प्राप्त हुई हैं इसलिए अनुमान होता है कि इस काल का मानव पुर्नजन्म में अथवा मृत्यु के बाद के किसी विशेष तरह के जीवन में विश्वास करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

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पाषाण सभ्यताओं की तुलना

विश्व के अन्य स्थलों पर विकसित हुई पाषाण कालीन सभ्यताओं की तरह भारत में भी पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालीन सभ्यताएं विकसित हुईं। तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर हमें इनमें अंतर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना

काल का अंतर

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.8000 तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.4000 तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग ई.पू.1000 तक चलता रहा।

स्थल

पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।

मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं। नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाए गए हैं।

औजार

पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं।

मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिए इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण (Microlith) तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।

आवास

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।

कृषि

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।

पशु-पालन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने ई.पू.25,000 के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशु-पालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिए जाने लगे।

बर्तन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाए जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिए चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिए आग में पकाना आरंभ किया।

सामाजिक संगठन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिए वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका।

अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गए हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।

कार्य विभाजन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिए कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशु-पालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिए इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।

शव विसर्जन

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था।

कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गईं।

धर्म

पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिए अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

भारत की आदिम जातियाँ

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भारत की आदिम जातियाँ

भारत में छः नृवंश जातियों के कंकाल एवं खोपड़ियाँ पाई गई हैं। इन्हें भारत की आदिम जातियाँ माना जाता है। ये समस्त आदिम जातियाँ प्रस्तर युगीन अथवा पाषाण कालीन सभ्यताओं से सम्बन्ध रखती थीं।

भारत की आदिम जातियाँ

(1.) नीग्रेटो

यह भारत की प्राचीनतम जाति थी जो अफ्रीका से भारत में आई थी। यह नितांत असभ्य एवं बर्बर जाति थी। ये लोग जंगली पशुओं का मांस, मछली, कंद-मूल एवं फल खाकर पेट भरते थे और कृषि-कर्म एवं पशुपालन से अपरिचित थे। यद्यपि अब यह जाति भारत की मुख्य भूमि से विलुप्त हो चुकी है तथापि अण्डमान द्वीपों में इस जाति के कुछ लोग निवास करते हैं। असम की नागा जातियों तथा त्रावणकोर-कोचीन आदि कुछ क्षेत्रों की आदिम जातियों में भी इस जाति की कुछ विशेषताएं दृष्टिगत होती हैं।

(2.) प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड

ये संभवतः फिलीस्तीन से भारत आए थे। भारत की कोल और मुण्डा जातियों में प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड जाति के गुण पाए जाते हैं। जब आर्य भारत में आए तब यह जाति पंजाब एवं उसके आसपास रहती थी। आर्यों ने इन्हें ‘अनास’, ‘कृष्णवर्ण’ और ‘निषाद’ कहकर पुकारा। यह एक विकसित जाति थी। उन्हें कृषि, पशुपालन एवं वस्त्र निर्माण का ज्ञान था।

माना जाता है कि अण्डे से सृष्टि की कल्पना इन्हीं प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगों की देन है। ये लोग पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘अमंगल निवारण’ के लिए ‘न्यौछावर करने’ की प्रथा भी इन्हीं की दी हुई है। हिन्दू-धर्म के पशु-देवता-  नाग, मकर, गणेश आदि भी इन्हीं की देन है। यह जाति आर्यों के आगमन के बाद उन्हीं में घुल-मिलकर एकाकार हो गई।

(3.) मंगोलायड

इस प्रजाति का निवास केवल एशिया महाद्वीप में पाया जाता है। इससे सम्बन्धित लोगो की त्वचा का रंग पीला, शरीर पर बालों की कमी और माथा चौड़ा होता है। इस प्रजाति की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अधखुली आंखें हैं। कतिपय प्रादेशिक विभिन्नताओं के साथ यह जाति सिक्किम, आसाम और भारत-बर्मा की सीमा पर निवास करती है।

(4.) भूमध्यसागरीय द्रविड़

दुनिया भर में इस जाति की कई शाखाएं हैं। भारत में इस जाति को द्रविड़ कहा जाता है। इनका सिर बड़ा, कद नाटा, नाक छोटी और रंग काला होता है। आर्यों के भारत आगमन के समय द्रविड़ जाति ईरान से लेकर अफगानिस्तान तथा बलोचिस्तान से लेकर पंजाब, सिंध, मालवा एवं महाराष्ट्र तक विस्तृत क्षेत्र में रहती थी।

आर्यों के भारत में आगमन से पूर्व यह जाति नीग्रेटो एवं प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड जातियों के साथ मिलकर रह रही थी। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में आज भी ब्राहुई भाषा का प्रयोग होता है, यह भाषा भूमध्यसागरीय द्रविड़ों की ही देन है। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं की जननी द्रविड़ भाषा माना जाती है।

ऋग्वेद में प्रयुक्त ‘दस्यु’ और ‘दास’ शब्दों का प्रयोग द्रविड़ों के लिए किया गया है। ईरानी भाषा में भी दस्यु शब्द मिलता है। कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में ‘दहइ’ जाति रहती थी। माना जाता है कि वही दहई जाति भारत में ‘द्रविड़’ कहलाई। भारत की संस्कृति पर पर द्रविड़ जाति का विशेष प्रभाव पड़ा जिसे आज भी देखा जा सकता है। इस जाति की सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन हम ‘सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज’ नामक अध्याय में करेंगे।

(5.) पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स

इस जाति के लोग बहुत छोटे समुदाय में भारत में रहते होंगे। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति पर इन लोगों का विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

(6.) नॉर्डिक

यह भी एक छोटा आदिम समुदाय था जिसका भारतीय संस्कृति पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

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नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

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भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ प्रस्तर युग के बाद विकसित हुईं। ताम्राश्म संस्कृति उसे कहते हैं जिसमें ताम्रधातु एवं पाषाण के उपकरण साथ-साथ उपयोग में आते थे। ताम्राश्म संस्कृति को ताम्रपाषाणिक संस्कृति (Copper Stone Culture) भी कहते हैं। कहीं-कहीं पाषाण संस्कृति और ताम्राश्म संस्कृति एक साथ चलती रहीं।

धातु काल में प्रवेश

मानव सभ्यता ने पाषाण-काल से निकलकर धातु-काल में प्रवेश किया। कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु-काल के लोग पाषाणकाल के लोगों से भिन्न थे और उत्तर-पश्चिम के मार्गों से भारत में आए थे। कतिपय अन्य विद्वानों का मत है कि धातु-काल के लोग नव-पाषाण-काल के लोगों की ही सन्तान थे।

इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धातु-काल के प्रारम्भ में, पाषाण तथा धातुओं का प्रयोग साथ-साथ होता था और दूसरी यह है कि इस सन्धि-काल की वस्तुओं के आकार तथा बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवपाषाणकाल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति करके धातु-काल की सभ्यता में बदल गयी।

धातु की खोज

अनुमान होता है कि मनुष्य द्वारा भोजन पकाने के लिए बनाए गए चूल्हों में लगे पत्थरों के गर्म होने से उनमें से धातु पिघलकर अलग हो गई होगी, जब यह घटना कई बार हुई होगी तो नव पाषाण कालीन मानव ने धातु की खोज का कार्य सम्पन्न कर लिया होगा। बहुत से विद्धानों का मानना है कि मानव ने सबसे पहले सोने की खोज की, उसके बाद ताम्बे की खोज हुई। चूँकि सोना अत्यंत अल्प मात्रा में मिलता था इसलिए औजार एवं हथियार बनाने में ताम्बे का उपयोग किया गया।

धातु-काल का अर्थ

धातु-काल से तात्पर्य उस कालावधि से है जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले ताम्बे का, उसके बाद काँसे का और अन्त में लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ। चूँकि इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है इसलिए नव-पाषाण-काल के पश्चात् से लेकर आज तक के काल को धातु-काल कहा जाता है। इस लम्बे काल में मानव-सभ्यता का विकास तेज गति से होता गया है। धातुकाल का मानव, विज्ञान के बल पर इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पाषाणकाल में सम्भव नहीं थे।

धातु-काल का विभाजन

धातु-काल को तीन भागों में बांटा जाता है- (1.) ताम्र-काल, (2.) कांस्य-काल तथा (3.) लौह-काल।

ताम्र-कांस्य सम्यता का विकास उत्तर भारत में ही हुआ। दक्षिण भारत में ताम्रकाल के बाद सीधे ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया।

ताम्र काल

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मानव द्वारा, धातुओं में सबसे पहले ताम्बे का प्रयोग आरम्भ हुआ। ताम्र-काल उस काल को कहते है जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ ताम्बे से बनाना आरम्भ किया। ताम्र-काल का आरम्भ नव-पाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। ताँबे की खोज का वास्तविक काल ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान है कि इसकी खोज ई.पू. 5,000 के आसपास हुई। मैलूकाइट नामक हरे अयस्क को कोयले के साथ ढेरी लगाकर, गर्म करने से ताँबा बहकर नीचे आ जाता था। इसका सबसे प्राचीन प्रमाण मिस्र में मिला है। मिस्र में ई.पू. 5,000 की कब्रों से तांबे के हथियार मिले है। साइप्रस में लगभग ई.पू. 3,000 में ताँबे का बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन होता था। उन दिनों रोम देश के निवासी साइप्रस से ताँबा खरीदते थे। एशिया में ताम्र का प्रयोग प्रथम बार कब हुआ, यह ठीक से ज्ञात नहीं हैं। शू किंग की गाथाओं के अनुसार चीन देश में ई.पू. 2,500 के आसपास ताम्र के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (सैन्धव सभ्यता से गुप्तकाल) तक रहा। भारत में ताम्बे का सर्वप्रथम उपयोग सैंधव सभ्यता द्वारा अथवा उसके समकालीन किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा किया गया होगा जो आर्यों के आगमन से पहले उत्तरी भारत के मैदानों में मौजूद रही होगी।

 ताम्बे को प्रयोग में लाने के कई कारण थे। पत्थर को गलाया नहीं जा सकता परन्तु ताम्बे को गलाया जा सकता है। इसलिए ताम्बे को गलाकर उससे छोटी-बड़ी कई तरह की वस्तुएँ बनाई जा सकती थीं। पत्थर की अपेक्षा ताम्बे की बनी हुई वस्तुएँ अधिक सुन्दर, सुडौल, सुदृढ़़ तथा चिकनी होती थीं। ताम्बे में यह सुविधा भी थी कि उससे चद्दरें भी बनाई जा सकती थीं और उसके टुकड़़े भी किए जा सकते थे। टूट जाने पर ताम्बे को जोड़ा भी जा सकता था।

छोटा नागपुर के पठार से लेकर उत्तरी गंगा-द्रोणी तक फैले हुए विशाल क्षेत्र में ताम्र-वस्तुओं की चालीस से अधिक निधियाँ मिली हैं परन्तु इनमें से लगभग आधी निधियाँ केवल गंगा-यमुना के दोआब से प्राप्त हुई हैं। दूसरे क्षेत्रों से छुटपुट निधियाँ ही मिली हैं। इन निधियों में कुल्हाड़े, मत्स्य-भाले, खड्ग और परशु आकृति वाली वस्तुएं हैं। इन वस्तुओं का उपयोग न केवल मछली मारने, आखेट करने और लड़ाई करने अपितु दस्तकारी, कृषि आदि अनेक कामों के लिए भी होता था।

इन ताम्र-वस्तुओं के निर्माता कुशल शिल्पकार थे। ये वस्तुएं आखेटकों अथवा घुमन्तू लोगों द्वारा निर्मित नहीं हो सकतीं। ऊपरी गंगा की घाटी में कई स्थलों पर ये वस्तुएं गेरुए रंग के बर्तनों और कच्ची मिट्टी के ढांचों के साथ मिली हैं। इससे पता चलता है कि ताम्र-निधियों का उपयोग करने वाले लोग स्थायी बस्तियों में रहते थे। दोआब के काफी बड़े भाग में बसने वाले ये सबसे पुराने आदिम कृषक और कारीगर लोग थे। गेरुए रंग के बर्तनों वाले अधिकांश स्थल गंगा-यमुना दोआब के उत्तरी भाग से मिले हैं परन्तु ताम्र-निधियां प्रायः समस्त दोआब और इसके परे भी मिली हैं।

गेरुए रंग के मृदभाण्डों की इस संस्कृति का काल मोटे तौर पर ई.पू.2000 और ई.पू.1800 के बीच का है। ताम्र-वस्तुओं तथा गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले वाले लोगों की बस्तियां जब गायब हो गईं, तो लगभग ई.पू.1000 तक दोआब निर्जन ही रहा। इस बात का कुछ संकेत मिलता है कि काले और लाल बर्तनों को उपयोग में लाने वाले लोगों की छुटफुट बस्तियां थीं परन्तु अब तक उनके सांस्कृतिक अंतर के सम्बन्ध में सुस्पष्ट धारणा नहीं बन सकी है।

जो भी हो, दोआब के उत्तरी भाग तथा ऊपरी गंगा की घाटी में धातु युग का वास्तविक आरम्भ ताम्र वस्तुओं और गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले लोगों के साथ ही हुआ परन्तु किसी भी स्थल पर इनकी बस्ती लगभग सौ साल से अधिक समय तक टिकी नहीं रही। न ही ये बस्तियां बड़ी थीं और न काफी बडे़ क्षेत्र में फैली हुई थीं। इन बस्तियों का अंत क्यों और कैसे हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हिन्दू-धर्म में तांबे के बर्तनों को पवित्र तथा धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है तो इसका कारण सम्भवतः यह है कि तांबा मानव द्वारा खोजी गई प्रथम धातु थी।

ताम्राश्म संस्कृति की विशेषताएँ

ताम्राश्म संस्कृति के लोगों के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति के लोग पशुपालक थे, कृषि करते थे, साधारण किस्म के ताम्बे का प्रयोग करते थे और ग्रामीण परिवेश में रहते थे।

काल निर्धारण

कालक्रम के अनुसार ताम्र-पाषाण संस्कृति, सिंधु सभ्यता की कांस्य संस्कृति के बाद आती है। वैज्ञानिक विधि से निर्धारित की गई तिथियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण संस्कृति का प्रारंभ ई.पू.2150 के पश्चात् हुआ था। कुछ क्षेत्रों में इस संस्कृति का चरण ई.पू.1000 तक चला, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में ई.पू.800 तक अथवा उसके बाद ईस्वी 600 (गुप्तकाल) तक भी चलता रहा। जब तक लोहे के औजारों का प्रचलन नहीं हुआ, तब तक पुराने औजारों का उपयोग होता रहा परन्तु अनेक क्षेत्रों में काले-लाल मृदभाण्डों का उपयोग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक होता रहा।

ताम्र एवं पाषाण का एक साथ उपयोग

इस काल के मानवों द्वारा ताम्र एवं पाषाण उपकरणों का उपयोग एक साथ किया जाता रहा इसलिए इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति भी कहते हैं। इस अवस्था में तांबे का उत्पादन सीमित था। तांबे की भी अपनी सीमाएं थी। केवल तांबे से बनाया गया औजार नरम होता था। तांबे के साथ टिन मिलाकर एक अधिक मजबूत और उपयोगी कांसे की मिश्र धातु बनाने की कला लोगों को ज्ञात नहीं थी। कांसे के औजारों ने कीट, मिò और मेसोपोटामिया में प्राचीनतम सभ्यताओं के उदय में सहायता दी। सिन्धुवासी भी कांसे का प्रयोग करते थे परन्तु दो-आब क्षेत्र की ताम्र-पाषाणिक अवस्था में कांसे के औजारों का प्रायः अभाव ही है।

प्रस्तर फलकों का प्रयोग

ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के लोगों ने पत्थर के जिन छोटे औजारों और हथियारों का उपयोग किया उनमें प्रस्तर-फलकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि कई स्थलों पर प्रस्तर-फलक उद्योग ने खूब उन्नति की तथापि पत्थर की कुल्हाड़ियों का भी उपयोग होता रहा। ऐसे स्थल पहाड़ियों से अधिक दूर नहीं होते थे, परन्तु ऐसे ही अनेक स्थल नदी मार्गों पर भी खोजे गए हैं। कुछ स्थलों से तांबे की कई वस्तुएं मिली हैं। आहड़ और गिलूँड ऐसे ही स्थल हैं जो राजस्थान की बनास घाटी के शुष्क क्षेत्र में स्थित हैं।

आहड़ से पत्थर की कोई कुल्हाड़ी या फलक नहीं मिला है। इसके विपरीत, यहाँ से तांबे की कई कुल्हाड़ियां और दूसरी वस्तुएं मिली हैं, क्योंकि तांबा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। गिलूँड में प्रस्तर-फलक उद्योग मिलता है। महाराष्ट्र के जोर्वे तथा चंदोली से तांबे की सपाट तथा आयताकार कुल्हाड़ियां मिली हैं, चंदोली से तांबे की तक्षणियाँ (छेनियाँ) भी मिली हैं।

यातायात के साधनों में वृद्धि

पाषाण-काल के आरंभिक चरण में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था परन्तु पशु-पालन आरंभ होने से बोझा ढोने का काम पशुओं द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊँटों का प्रयोग होने लगा। ताम्रकाल में यह कार्य पशुओं के साथ-साथ पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियेदार गाड़ियों से भी किया जाने लगा। जल यात्राओं के लिए नावों का निर्माण भी आरम्भ हो गया।

कृषि में उन्नति

कृषि का काम मध्य-पाषाण-काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु अब कृषि बहुत बड़े परिमाण में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिए मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। अनुमान है कि इस काल का मानव कृषि कार्य में हल का उपयोग नहीं करता था। ये लोग नुकीले पत्थर के दूसरे सिरे में लकड़ी के डण्डे फंसा कर उससे धरती खोदते थे। इस संस्कृति की बस्तियों से हल नहीं मिला है।

ये लोग चावल, गेहूँ, बाजरा, मसूर, उड़द तथा मूँग जैसी कई दालें और मटर पैदा करते थे। महाराष्ट्र में नर्मदा तट पर स्थित नवदाटोली में इन समस्त अनाजों के अवशेष मिले हैं। सम्भवतः भारत के किसी भी अन्य स्थल के उत्खनन में इतने अधिक अनाज प्राप्त नहीं हुए हैं। नवदाटोली के लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। दक्खन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी। निचले दक्खन में रागी, बाजरा और इसी कोटि के दूसरे कई अनाजों की खेती होती थी।

पशु-पालन

विद्धानों का मत है कि ताम्र-पाषाणिक काल का मानव पशुओं को दूघ या घी प्राप्त करने के लिए नहीं पालता था अपितु मांस प्राप्ति, बोझा ढोने, कृषि करने तथा यातायात के लिए करता था। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी महाराष्ट्र में रहने वाले ताम्र-पाषाण काल के लोगों ने पशुओं को पालतू बनाया था और वे खेती भी करते थे। वे गाय, बकरी, सूअर और भैंस पालते थे और हिरन का आखेट करते थे। इस काल की बस्तियों से ऊंट के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जो घोड़े या पालतू गधे या जंगली गधे के हो सकते हैं। ये लोग निश्चय ही गौ-मांस खाते थे, सूअर के मांस का बहुत उपयोग नहीं होता था।

मछली एवं चावल का भोजन

बिहार और पश्चिमी बंगाल से, जहाँ चावल की खेती होती थी, मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी प्रदेशों में रहने वाले ताम्र-पाषाण के लोग मछली और चावल खाते थे। देश के इस भाग में आज भी मछली और चावल लोकप्रिय भोजन हैं।

हस्तकलाएं

इस काल का मानव तांबे की वस्तुएं और पत्थर के औजार बनाने में निपुण था। इस काल के छोटे आकार के बहुत सारे पत्थर के औजार मिले हैं, जिन्हें लघुपाषाण कहते हैं। वे कताई और बुनाई की कला भी जानते थे, क्योंकि मालवा से उस काल की तकली की चक्रियां मिली हैं। महाराष्ट्र से कपास, सन और रेशम के तन्तु मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग कपड़ा भी तैयार करते थे।

विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों का उपयोग

ताम्र-पाषाण काल के लोग विभिन्न प्रकार के मृदभाण्डों का उपयोग करते थे। इनमें से एक प्रकार के बर्तन काले-लाल रंग के थे। अनुमान होता है कि इनका प्रचलन दूर-दूर तक था। इन बर्तनों को चाक पर बनाया जाता था। कभी-कभी इन पर सफेद रैखिक आकृतियां भी चित्रित की जाती थीं। यह तथ्य न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बस्तियों के सम्बन्ध में है अपितु बिहार और पश्चिमी बंगाल में खोजी गई बस्तियों के सम्बन्ध में भी है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में रहने वाले इस काल के लोगों ने टोंटी वाले लोटे, धरनी-युक्त तश्तरियां और धरनी-युक्त कटोरे बनाए थे। यह सोचना गलत होगा कि जिन भी लोगों ने काले-लाल बर्तनों का उपयोग किया उनकी संस्कृति भी एक ही थी। उनके बर्तनों और औजारों की बनावट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। इस काल के लोगों ने लोटों तथा तश्तरियों का उपयोग तो किया किंतु थालियों का उपयोग नहीं किया।

कार्य-कुशलता में वृद्धि

धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। अब कार्य-विभाजन का सिद्धान्त बहुत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से लोगों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलम्बी से परावलम्बी हो गया।

पक्के भवनों का निर्माण

इस काल से पहले के लोग आम तौर से पकी हुई ईटों से परिचित नहीं थे। धूप में सुखाई तथा आग में पकाई हुई ईटों के भवनों का निर्माण इसी काल में आरम्भ हुआ किंतु इनका उपयोग विरले ही होता था। इस काल में अधिकतर घर टट्टर को लीपकर बनाए जाते थे और इन पर संभवतः छप्पर भी डाले जाते थे। ये मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती थी।

इन आवासों में मनुष्य, पशु तथा भण्डारण के लिए अलग-अलग प्रबन्ध रहता था। पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगांव स्थान पर आरंभिक ताम्र-पाषाण काल के चूल्हों सहित मिट्टी के बड़े भवन और गोलाकार गड्ढों वाले भवन खोजे गए हैं। बाद की अवस्था ( ई.पू.1300-1000) का पांच कमरों का एक कमरा गोलाकार है। इससे पता चलता है कि इस युग के परिवार बड़े होते थे।

नगरीय सभ्यता के जनक

ताम्र-पाषाणिक अर्थ-व्यवस्था वस्तुतः ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था थी। जैसे कि इनामगांव तथा पश्चिमी मध्य प्रदेश की एरण तथा कयथ बस्तियों की किलेबंदी करके इनके चहुंओर खाइयां खोदी गई थीं जिससे अनुमान होता है कि ताम्राश्म संस्कृति के मानव ने नगरीय सभ्यता को जन्म दिया था।

धार्मिक भावना का सुढ़ढ़ीकरण

इस युग में कृषि कार्य विस्तृत हो जाने के कारण मानव पर प्रकृति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता अधिक प्रभाव डालने लगी। इस कारण इस काल के मानव ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवता के रूप में पूजना आरम्भ किया। पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया। धार्मिक भावना के उदय के साथ-साथ इस युग के मानव में अन्धविश्वास भी उत्पन्न हो गया और वह जादू-टोना में विश्वास करने लगा।

 स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण काल का मानव मातृदेवियों की उपासना करता था। कच्ची मिट्टी की नग्न लघु मूर्तियों की भी पूजा होती थी। इनामगांव से मातृदेवी की एक मूर्ति मिली है जो पश्चिमी एशिया से मिली मातृदेवी की मूर्ति जैसी है। मालवा और राजस्थान से प्राप्त वृषभ की रूढ़ शैली की मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि वृषभ की अनुष्ठानिक पूजा होती थी।

शवाधान

ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों के शव-संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस काल में महाराष्ट्र क्षेत्र में मृतक के शव को अपने भवन के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाढ़ा जाता था। हड़प्पा के लोगों की तरह उनके पृथक समाधि क्षेत्र नहीं होते थे। कब्र में मिट्टी की हांडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थीं, जो परलोक में मृतक के उपयोग के लिए होती थीं।

पश्चिमी महाराष्ट्र में चंदोली और नेवासा के शवाधानों में कुछ बच्चों को उनके गलों में तांबे की मणियों की मालाएं पहनाकर गाढ़ा गया था परन्तु दूसरे बच्चों के शवाधानों में केवल मिट्टी के बर्तन देखने को मिलते हैं। इनाम गांव के एक वयस्क व्यक्ति को मिट्टी और तांबे के बर्तनों के साथ गाढ़ा गया है।

ताम्राश्म संस्कृति की दुर्बलताएं

सामाजिक असमानताएं

ताम्र-पाषाण काल में सामाजिक असमानताएं आरंभ होने के प्रमाण मिलते हैं। कायथा के एक भवन से तांबे की 29 चूड़ियां और दो विशिष्ट कुल्हाड़ियां मिली हैं। उसी स्थान से मिट्टी के घड़ों में से सेलखड़ी और कार्नेलियन-जैसे कुछ मूल्यवान पत्थरों की मणियों की मालाएं मिली हैं। अनुमान है कि ये वस्तुएं समृद्ध लोगों की थीं।

कष्टमय जीवन

पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गाढ़े गए बच्चों के शवावशेषों से इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है। अन्न-उत्पादक अर्थव्यवस्था के उपरांत भी बच्चों की मृत्यु-दर बहुत ऊंची थी। इसके कारणों का पता लगाना कठिन है। कुपोषण अथवा महामारी के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरे होंगे। उस काल के ताम्र-पाषाणिक समाज तथा अर्थव्यवस्था में दीर्घायु प्राप्ति को बढ़ावा मिलना सम्भव नहीं था।

हड़प्पा सभ्यता से तकनीकी आदान-प्रदान का अभाव

ताम्र-निधियों वाले ये लोग हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे, और ये लोग गेरुए रंग के बर्तनों वाले जिस प्रदेश में रहते थे वह भी हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों सभ्यताओं में सम्पर्क होना तथा तकनीकी कौशल का आदान प्रदान होना स्वाभाविक था किंतु ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा सभ्यता के लोगों के ज्ञान का लाभ नहीं उठाया। इसलिए वे कांसे के बारे में नहीं जान सके।

भारत में ताम्र बस्तियों की खोज

भारत में ताम्र निर्मित सामग्री सबसे पहले गंगा-यमुना के दोआब में उपलब्ध हुई थी। गुनेरियां नामक स्थान से ताम्बे एवं कांसे की वस्तुओं का विशाल भण्डार मिला है। इस सामग्री में कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटारें, हार्पून एवं छल्ले प्रमुख हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इस क्षेत्र से प्राप्त कुल्हाड़ियों को पांच भागों में बांटा है। तलवारें प्रायः एक जैसी हैं। इन तलवारों के ब्लेड पत्ती के समान हैं एवं मुठिया तथा धार के साथ समूची तलवार एक ही सांचे में ढाली गई है। कटार का निर्माण भी इसी प्रकार से किया गया है। यह समग्र सामग्री सिंधु घाटी से प्राप्त सामग्री से भिन्न है।

प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियाँ

भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (वैदिक-काल से लेकर गुप्तकाल) तक रहा। दक्षिण भारत में नवपाषाणिक अवस्था एकाएक ताम्र-पाषाणिक अवस्था में बदल गई। इसलिए इन संस्कृतियों को नवपाषाणिक ताम्र-पाषाणिक नाम दिया गया है।

दूसरे भागों, विशेषतः पश्चिमी महाराष्ट्र और राजस्थान के लोग सम्भवतः उपनिवेशिक थे परन्तु तिथिक्रमानुसार, मालवा और मध्य भारत की कुछ बस्तियां, जैसे कि कायथा और एरण की बस्तियां, सबसे पुरानी थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में ताम्र-पाषाणिक बस्तियां कालांतर में स्थापित हुईं। पश्चिमी बंगाल में ताम्र-पाषाणिक बस्तियों की स्थापना सम्भवतः सबके अंत में हुई।

(1.) कायथा संस्कृति (ई.पू. 2150 से ई.पू.1400)

कायथा संस्कृति की बस्तियां मध्यप्रदेश में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित हैं। कायथा टीले से 12 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव मिला है जिसमें ताम्रपाषाणिक संस्कृति से लेकर गुप्त राजवंश के काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मृदभाण्ड बनाने की तीन परम्पराएं मिली हैं। प्रथम पात्र परम्परा हल्के गुलाबी रंग की है जिस पर बैंगनी रंग की चित्रकारी मिलती है।

दूसरी पात्र परम्परा पाण्डुरंग की है। बर्तनों पर लाल रंग से चित्रण अभिप्राय संजोये गए हैं। तीसरी परम्परा अलंकृत लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा है जिन पर कंघी की तरह के किसी उपकरण से आरेखण किया गया है।

(2.) आहड़ संस्कृति (ई.पू.1900 से ई.पू.1200)

यह बस्ती राजस्थान के उदयपुर नगर से 4 किलोमीटर दूर आहड़ नामक स्थान पर मिली है। आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है। इस स्थान को अब धूलकोट कहते हैं। यहाँ पर कायथा की तुलना में ताम्र उपकरण अधिक मिले हैं। इस संस्कृति के लोग सुखाई गई कच्ची ईंटों की सहायता से भवन बनाते थे। मकानों में दो-तीन मुंह वाले चूल्हे भी मिले हैं।

यहाँ से बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं। कपड़़ों पर छपाई के ठप्पे भी प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति में शवों को गाड़ते समय शव का मस्तक उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर रखे गए हैं। आहड़ संस्कृति को बनास संस्कृति भी कहते हैं क्योंकि इस सभ्यता का प्रसार सम्पूर्ण बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में पाया गया है।

(3.) गिलूण्ड संस्कृति (1700 ई.पू. से 1300 ई.पू.)

आहड़ के निकट गिलूण्ड से भी ताम्रपाषाणिक बस्ती मिली है। यहाँ से चूने के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। यहाँ से लाल एवं काले मृदभाण्डों की ही संस्कृति प्राप्त हुई है। यहाँ से 100 गुणा 80 फुट आकार के ईंटों से बने विशाल भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐसे भवन आहड़ में देखने को नहीं मिलते।

(4.) नवदाटोली संस्कृति (1500 ई.पू. से 1200 ई.पू.)

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मिलने के कारण इसे मालवा संस्कृति भी कहा जाता है। यह नर्बदा नदी के बायें किनारे पर स्थित है। यहाँ से मिले मृदभाण्ड गुलाबी रंग के हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्रण किया गया है। यहाँ से ताम्र उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। यहाँ से स्वर्ण, ताम्र, मृदा, शंख एवं सेलखड़ी पत्थर से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। कुछ अग्निकुण्ड भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि इस संस्कृति में अग्नि पूजा भी होती थी।

(5.) जोरवे संस्कृति (1400 ई.पू. से 700 ई.पू.)

पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रवर नदी तट पर स्थित जोरवे नामक गांव से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। बाद में नासिक, नेवासा, इनामगांव, दैमाबाद आदि स्थलों से भी इस संस्कृति के अवशेष मिले। इस संस्कृति में बस्तियां बसाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था। जोर्वे संस्कृति का प्रत्येक गांव 35 से भी अधिक गोलाकार अथवा आयताकार भवनों की एक सुगठित बस्ती होती थी। घरों के बीच एक से दो मीटर चौड़ी गलियां छोड़़ी गई हैं। यहाँ से कुम्हार, सुनार, हाथीदांत के शिल्पकारों के औजार मिले हैं जो बस्ती की पश्चिमी सीमा पर रहते थे।

समृद्ध किसान गांव के बीच में रहते थे। दस्तकारों के मकानों का आकार, समृद्ध किसानों के घरों के आकार की तुलना में छोटा है। यहाँ से अल्प मात्रा में ताम्बे के उपकरण पाए गए हैं। मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं जिनमें मातृदेवी एवं वृषभ की मूर्तियाँ विशेष हैं। इस संस्कृति में खेती के लिए नहरों एवं बांधों का निर्माण किए जाने के प्रमाण मिले हैं। दैमाबाद से कांसे की वस्तुएं बड़ी संख्या में मिली हैं। दैमाबाद से ताम्बे से निर्मित- रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे तथा हाथी की मूर्तियाँ मिली हैं।

(6.) पूर्वी भारत की बस्तियां (2000 ई.पू.)

पूर्वी भारत से चावल पर आधारित एक विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम संस्कृति का पता चला है। यह 2000 ई.पू. के आसपास अस्तित्त्व में रही होगी। उड़ीसा तथा बंगाल प्रांत के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर, बांकुरा, पांडु राजार ढिबी, महिषदल आदि में इस संस्कृति की बस्तियां मिली हैं। यहाँ गारे और सरकण्डे से निर्मित घरों के साथ-साथ चावल तथा मूंग सहित तरह-तरह की फसलों का समृद्ध संग्रह देखने को मिलता है।

(7.) ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दो-आब की बस्तियां (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.)

इन क्षेत्रों से गेरुए रंग के मृदभाण्डों वाली बस्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के बसौली तथा बिजनौर जिले के राजपुर परसू से नई किस्म के बर्तन प्राप्त हुए हैं। ये दोनों ही स्थान ताम्र भण्डार क्षेत्र में स्थित हैं। इस संस्कृति में अतरंजीखेड़ा का प्रमुख स्थान है। यहाँ से धूसर भाण्ड वाली बस्तियां मिली हैं। सहारनपुर से लेकर इटावा तक इस संस्कृति के लगभग 110 स्थल मिले हैं जिन्हें गेरुए रंग के मृदभाण्डों की संस्कृति कहते हैं।

(8.) ऐतिहासिक कालों की बस्तियां

उत्तर भारत में ताम्र पाषाणिक संस्कृति, जनपद युग एवं मगधीय साम्राज्य (600 ई.पू. से 300 ई.पू.) तथा शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल (300 ई.पू. से 600 ई.) तक अस्तित्त्व में रहीं जबकि पश्चिमी भारत में 3500 ई.पू. के आसपास ताम्रकांस्य संस्कृति जन्म ले चुकी थी।

(9.) सिंधु नदी घाटी क्षेत्र में ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियाँ

सिंधु नदी घाटी में भी ताम्बे एवं कांसे की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं किंतु यहाँ पर तलवार एवं हार्पून का अभाव है। इस क्षेत्र से मिले इस काल के हथियार साधारण कोटि के हैं। यहाँ पर धातु के साथ-साथ पाषाण सामग्री का उपयोग भी चलता रहा।

कांस्य की खोज

पाषाण की तुलना में ताम्बा अधिक उपयोगी था किंतु मुलायम होने के कारण इससे कठोर कार्य नहीं लिया जा सकता था। इसलिए मनुष्य ताम्बे से अधिक कठोर धातु की खोज में जुटा तथा उसने कांसे को खोज निकाला। यह मिश्रित धातु थी जो ताम्बे में टिन के मिश्रण से तैयार की जाती थी। दो धातुओं के मिश्रण से तीसरी धातु बनाने की क्षमता अर्जित कर लेना, इस युग के मानव की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।

ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

आज से कुछ हजार वर्ष पहले, सिंध और बलोचिस्तान के जो प्रदेश आज की तरह रेगिस्तान नहीं थे। इन क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती थी तथा घने जंगलों से परिपूर्ण थे। जल और जंगल के कारण इन क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने अच्छा विकास किया। ई.पू.4000 में भी इस क्षेत्र में ग्रामीण बस्तियां थीं।

इन बस्तियों में पाषाण युग के बाद ताम्र युग का विकास हुआ। इन बस्तियों के लोगों का पश्चिम एशिया में स्थित मानव बस्तियों से सम्पर्क होने का भी अनुमान है। क्योंकि सिंध एवं बलोचिस्तान जैसे उपकरण पश्चिम एशियाई बस्तियों में भी प्राप्त हुए हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इन बस्तियों को चार भागों में विभक्त किया है-

(1) क्वेटा संस्कृति

बोलन के दर्रे में प्राप्त अवशेषों के आधार पर),

(2) अमरी-नल संस्कृति

सिंध में अमरी नामक स्थान पर तथा बलोचिस्तान में नल नदी की घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर,

(3) कुल्ली संस्कृति

बलोचिस्तान में कोल्बा नामक स्थान से प्राप्त अवशेषों के आधार पर तथा

(4) झोब संस्कृति

उत्तरी बलोचिस्तान की झोब घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर।

राजस्थान की ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

राजस्थान में भी पाषाण काल के अंतिम वर्षों में ताम्रकाल आरंभ हो गया था। राजस्थान के पुरातत्त्व विभाग ने भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के सहयोग से कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूण्ड, नोह आदि स्थानों पर उत्खनन किया। इन उत्खननों में हमें सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एवं सिंधु सभ्यता के समकक्ष सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हएु हैं।

ताम्र-पाषाणिक एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति में अंतर

ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव पकी हुई ईंटों से घर बनाना नहीं जानता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव पकी हुई ईटों से घर बनाता था। ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव ताम्र औजारों के साथ-साथ प्रस्तर निर्मित औजारों का प्रयोग करता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव ताम्र एवं कांस्य से बने औजारों का प्रयोग करता था।

ताम्र-पाषाणिक बस्तियां पूर्वी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत एवं महाराष्ट्र में नासिक तक प्राप्त हुई हैं जबकि ताम्र-कांस्य बस्तियां बिलोचिस्तान एवं सिंध क्षेत्र में अधिक प्राप्त हुई हैं। ताम्र-पाषाण-कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला अर्थात् कांसा बनाने की विधि से अपरिचित था जबकि ताम्र-कांस्य कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला से अच्छी तरह परिचित हो गया था।

यह एक आश्चर्य की ही बात है कि सिंधु सभ्यता जो कि ताम्र-पाषाण काल से भी पुरानी है, में कांसे का प्रयोग होता था। इससे अनुमान होता है कि ताम्र-पाषाणिक अवस्था में जी रहे लोगों का उन क्षेत्रों से सम्पर्क नहीं था जो उनके समकालीन होते हुए भी कांस्य का उपयोग कर रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

लौह युगीन संस्कृति

महापाषाण संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

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सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता भारत भूमि पर प्रकट होने वाली सर्वप्रथम सुविकसित सभ्यता मानी जाती है। इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। यह तृतीय कांस्य-कालीन सभ्यता थी।

जिस समय सिंधु घाटी सभ्यता अस्तित्व में आई, लौह सभ्यताएं भविष्य के गर्भ में थीं, यहाँ तक कि इसके समानांतर रह रही प्राचीन बस्तियां अभी भी नव पाषाणकाल में जी रही थीं तथा उनमें ताम्बे की खोज होनी अभी बाकी थी।

निश्चित रूप से सिंधु घाटी सभ्यता, नवपाषाण कालीन बस्तियों से ही विकसित हुई थी किंतु सिंधु वासियों ने न केवल ताम्बे की अपितु उसके साथ-साथ टिन की खोज में भी सफलता अर्जित कर ली थी जिसके कारण वे मिश्रधातु ‘कांस्य’ अथवा ‘कांसे’ का निर्माण कर पाए थे तथा इस धातु के कारण वे सभ्यता, संस्कृति एवं विज्ञान के मामले में अपनी समकालीन संस्कृतियों से अचानक ही तेजी से आगे निकल गए थे।

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चूँकि इस सभ्यता के अधिकांश भग्नावशेष सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में उपलब्ध हुए हैं, इसलिए इसे सिन्धु-घाटी सभ्यता अथवा ‘सैन्धव सभ्यता’ कहा जाता है। हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो नामक नगरों के आस-पास इस सभ्यता के बड़े केन्द्र प्राप्त होने से इस संस्कृति को ‘हड़प्पा संस्कृति’ एवं मोहेनजोदड़ो संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है। आसपास की भूमि से ऊपर उभरे हुए विशाल टीलों में दबी पड़ी इस सभ्यता के उत्खनन का कार्य ई.1920 में हड़प्पा में आरम्भ किया गया। हड़प्पा, अखण्ड भारत के पंजाब प्रांत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ‘माण्टगोमरी’ जिले में स्थित था। लाहौर से लगभग 100 मील दक्षिण-पश्चिम में रावी नदी के तट पर हड़प्पा सभ्यता के टीले विद्यमान थे। इन टीलों का उत्खनन कार्य करवाने वालों में दयाराम साहनी तथा माधोस्वरूप वत्स अग्रणी थे। ई.1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में सिन्ध प्राप्त के लरकाना जिले में खुदाई का काम हुआ, जिसके फलस्वरूप ‘मोहेनजोदड़ो’ नामक स्थान पर एक सैन्धव नगर के अवशेष उपलब्ध हुए। यद्यपि इन दोनों स्थानों के बीच लगभग 680 किलोमीटर की दूरी है तथापि दोनों स्थानों की खुदाई में प्राप्त अवशेषों में अद्भुत साम्यता थी।

दोनों केन्द्रों से प्राप्त सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर सर जॉन मार्शल ने सिद्ध किया कि ये अवशेष एक ही पूर्वेतिहासिक सभ्यता से सम्बद्ध हैं।

अर्नेस्ट मैके, एन. जी. मजूमदार, सर ऑरेल स्टीन, एच. हारग्रीव्ज, पिगट, मोरटीमर व्हीलर, रंगनाथराव, एच. डी. सांकलिया, बी. बी. लाल, बी. के. थापर आदि पुरातत्त्वेताओं ने खोज और खनन के कार्य को आगे बढ़ाया जिससे यह पता चला कि यह प्राचीन सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक ही सीमित नहीं थी। सिंधु की सहायक नदियों के किनारों से भी इस काल की सभ्यता के अवशेष बड़ी संख्या में प्राप्त हुए।

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार क्षेत्र

इस सभ्यता का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान के बलोचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब, भारत के गंगा घाटी, पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात तक था। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे। अफगानिस्तान में क्वेटा, कीली, गुलमुहम्मद, मुण्डिगक नदी के किनारे-किनारे तथा डम्बसदात में भी सिन्धु सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष मिले हैं। बलोचिस्तान के उत्तर-पूर्व में लोरलाय घाटी तथा जोब नदी की घाटी में भी इस सभ्यता के कई स्थल मिले हैं।

मान्यता है कि दक्षिणी बलोचिस्तान की ‘कुल्ली सभ्यता’ सिन्धु सभ्यता का ही प्रारम्भिक रूप रही होगी। उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा से मिले अवशेषों का निचला स्तर सिन्धु सभ्यता से भी पहले का है जबकि ऊपरी स्तर सिन्धु सभ्यता से सम्बन्धित है। पंजाब में रोपड़ तथा गुजरात में लोथल और रंगपुर नामक स्थानों से प्राप्त अवशेष भी सिन्धु सभ्यता के समकालीन प्रमाणित होते हैं।

इस प्रकार अखण्ड भारत में सैन्धव सभ्यता का विस्तार पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित सुत्कांगाडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर एवं विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे तथा उत्तर में शिमला की पहाड़ियों की तलहटी से लेकर दक्षिण में नर्बदा और ताप्ती नदियों के मध्य भगवार तक था।

रंगनाथराव ने इस सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम में लगभग 1600 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण में लगभग 1100 किलोमीटर माना है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यह क्षेत्र आज के पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, साथ ही प्राचीन मिस्र और मेसीपोटामिया से भी बड़ा था। ई.पू.3000 एवं ई.पू.2000 में संसार का कोई भी अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

हड़प्पा संस्कृति के अब तक 1400 से अधिक स्थलों का पता लग चुका है। इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में थे। अब तक ज्ञात स्थलों में से केवल छः स्थलों को ही नगर माना जाता है। इन नगरों में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थे- पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहेनजोदड़ो। सिन्धु नदी इन्हें एक दूसरे से जोड़ती थी। तीसरा नगर सिन्ध प्रांत में चहुन्दड़ो था जो मोहेनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। चौथा नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थान पर है।

पांचवा नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर तथा छठा नगर हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली नामक स्थल पर है। बनवाली में भी कालीबंगा की तरह दो सांस्कृतिक अवस्थाओं- हड़प्पा पूर्व सभ्यता और हड़प्पा-कालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। बिना पकी ईटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा-पूर्व युग के हैं। इन समस्त स्थलों पर उन्नत और समृद्ध हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुत्कांगाडोर और सुरकोटड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति के उन्नत रूप के दर्शन होते हैं जहाँ नगर दुर्ग स्थित हैं।

गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी एवं कच्छ क्षेत्र में धौलावीरा नामक स्थलों पर इस संस्कृति की उत्तरावस्था के दर्शन होते हैं। हरियाणा में राखीगढ़ी तथा कुणाल एवं उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर में भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता का काल

सिन्धु-घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है। बुलीहॉल, गार्डन चाइल्ड, बेक आदि विद्वान विश्व की नदी घाटी सभ्यताओं में सिन्धु सभ्यता को सबसे प्राचीन एवं प्रारम्भिक मानते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 4,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 3,000 वर्ष पूर्व और कुछ ने केवल 2,500 वर्ष पूर्व की बताया है।

 डॉ. राधकुमुद मुकर्जी ने इसे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए लिखा है– ‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता का न तो मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है और न वह उसकी ऋणी है।’

जॉन मार्शल और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी का मत है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू.3250 से भी बहुत पहले हुआ होगा। प्रो. के. एन. शास्त्री और डॉ. राजबली पाण्डेय इसे ई.पू. 4000 साल पुरानी सभ्यता मानते हैं। अब यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि सिन्धु-सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर इसका समय 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. तक बताया है।

डॉ पाण्डेय का मत है कि- ‘सिंधु सभ्यता की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के उपर एक, सात स्तर मिले हैं। यदि एक नगर के बसने, पनपने और उजड़ने के लिए 500 साल का समय दिया जाए तो सात नगरों के बसने, विकसित होने और उजड़ने में लगभग 3500 साल लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है, जिसके पूर्व सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यदि भू-गर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों के स्तर मिल सकते हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष की है।’

बलोचिस्तान एवं मकरान में मिली पुरातत्विक वस्तुओं के आधार पर भी यह माना जाता है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ईसा से 4000 साल पूर्व क्वेटा, अमरी, नाल, कुली, झोव आदि स्थानों पर छोटी बस्तियों के रूप में हो गया था। डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता ई.पू.3500 से ई.पू.2250 के मध्य अपने चरम पर थी। सर मोरटीमर व्हीलर इस सभ्यता को ई.पू.2500 से ई.पू.1500 के मध्य की मानते हैं। डॉ. फ्रेंकफर्ट ने इसका काल ई.पू.2800 का माना है।

डॉ. फबरी ने इसका समय ई.पू.2800-2500 माना है। नवीनतम खोजों के आधार पर डॉ. अर्नेस्ट मैके ने भी डॉ. फबरी के मत की पुष्टि की है। ‘कार्बन-14 परीक्षण प्रणाली’ के अनुसार सिन्धु सभ्यता का काल एक विवादास्पद प्रश्न है परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ई.पू.3000 में भारत-भूमि पर सिन्धु सभ्यता के रूप में स्वतंत्र एवं समृद्ध सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा सुमेरियाई सभ्यताओं से किसी भी प्रकार कम उन्नत नहीं थी।

डॉ. फ्रैंकफर्ट ने लिखा है- ‘यह बिना किसी सन्देह के निर्धारित हो चुका है कि भारत ने एक ऐसी संस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा की जिसने यूनानियों के पहले इस विश्व को सभ्य बनाया।’

सिंधु घाटी सभ्यता के तीन स्तर

हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर पाए गए हैं- (1.) प्रारंभिक काल (ई.पू.3500 से ई.पू.2800 ई.पू.), (2.) मध्य-काल या चरमोत्कर्ष काल ( ई.पू.2800 से ई.पू.2200) तथा (3.) अवनति काल ( ई.पू.2200 से ई.पू.1500)

कांस्य कालीन सभ्यता

सैन्धव सभ्यता प्रधानतः कांस्य कालीन सभ्यता थी तथा उस काल के तृतीय चरण की सभ्यता है। इसका गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करने पर इसमें कांस्य-काल की चरमोन्नति दिखाई देती है। कांस्य कालीन सभ्यता कालक्रम के अनुसार ताम्र कालीन सभ्यता के बाद की तथा लौह कालीन सभ्यता के पूर्व की ठहरती है।

समकालीन सभ्यताओं से सम्पर्क

हड़प्पा सभ्यता का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा। ये लोग पहिए वाली बैलगाड़ियों एवं जल-नौकाओं का उपयोग करते थे। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का भी उपयोग करते थे। इस कारण अन्य स्थानों के लिए इनका आवागमन एवं परिवहन पहले की सभ्यताओं की तुलना में अधिक सुगम था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती होंगी और उन देशों से हड़प्पावासियों के व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। सोना, चांदी, ताम्बा आदि धातुएं सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलती थीं। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते होंगे। हड़प्पावासी ताम्बा राजस्थान से, सीपी और शंख काठियावाड़ से तथा देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते होंगे।

अनुमान है कि हड़प्पा संस्कृति के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान की अन्य मानव बस्तियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पावासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह्ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि सिन्धुघाटी के शहरों में बनी हुई वस्तुएं दजला और फरात के बाजारों में बिकती थीं….. अरब सागर के किनारों से लाई गई मछलियां मोहनजोदड़ो के भोजन में सम्मिलित थीं। 

सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता

यह प्रश्न आज भी नहीं सुलझ पाया है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे! सिन्धु सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों की शारीरिक बनावट के विश्लेषण के आधार पर मानवशास्त्र वेत्ताओं ने सिन्धु सभ्यता का विकास करने वालों लोगों को चार नस्लों- (1.) आदिम आग्नेय, (2.) मंगोलियन, (3.) भूमध्यसागरीय तथा (4.) अल्पाइन से सम्बन्धित बताया है।

इनमें से भूमध्यसागरीय जाति के लोगों की खोपड़ियां सर्वाधिक संख्या में मिली हैं जबकि मंगोलियन तथा अल्पाइन नस्ल के लोगों की केवल एक-एक खोपड़ी मिली है। अतः जब तक सिन्धु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त मोहरों पर अंकित लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता तब तक यह कहना कठिन होगा कि इस सभ्यता के निर्माता किस जाति या नस्ल के थे? सैन्धव सभ्यता के निर्माताओं के सम्बन्ध में विद्वानों में विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं-

(1.) सैन्धव सभ्यता के निवासी मिश्रित नस्ल के थे

सिंधु सभ्यता से मिली चार नस्लों की खोपड़ियों के आधार पर कर्नल स्युअल और डॉ गुह्बा की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता का निर्माण किसी एक नस्ल अथवा जाति के लोगों ने नहीं किया। सिन्धु सभ्यता नागरिक सभ्यता थी। इसके मुख्य नगर व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख केन्द्र बने हुए थे। अतः आजीविका की तलाश में अनेक प्रजातियों के लोग यहाँ आकर बस गए थे।

(2.) सैन्धव सभ्यता के निवासी द्रविड़़ थे

सर जॉन मार्शल तथा प्रो. रामलखन बनर्जी आदि कुछ विद्वानों ने माना है कि चूँकि खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों में भूमध्यसागरीय नस्ल की प्रधानता है, अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को दिया जाना चाहिए। द्रविड़ लोग भूमध्यसागरीय नस्ल की ही एक शाखा थे। कुछ विद्वान बलोचिस्तान आदि भागों में बोली जाने वाली ‘ब्राहुई’ भाषा तथा द्रविड़ों की भाषा में समानता के कारण भी द्रविड़ों को इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं। दक्षिण भारत के द्रविड़ों के मिट्टी तथा पत्थर के बर्तन और आभूषण सिन्धु-घाटी के लोगों के बर्तन तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं।

(3.) सैन्धव सभ्यता के निवासी सुमेरियन थे

प्रोफेसर चाइल्ड ने सुमेरियन लोगों को इस सभ्यता का निर्माता माना है। डॉ. हाल ने भी उनके मत की पुष्टि की है। पिगट के अनुसार इस सभ्यता का मूल पूर्णतः भारतीय था परन्तु वे इस पर सुमेरियन प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं।

(4.) सैन्धव सभ्यता के निवासी आर्य थे

लक्ष्मण स्वरूप, रामचंद्र, शंखरानन्द, दीक्षितार तथा डॉ. पुसालकर के अनुसार सैन्धव सभ्यता के निर्माता या तो आर्य थे अथवा आर्यों ने इस सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। डॉ. पुसालकर के शब्दों में- ‘यह आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है। अधिक से अधिक हम यह कह सकते हैं कि सम्भवतः ऋग्वैदिक आर्य वहाँ की जनता का एक महत्त्वपूर्ण भाग थे और उन्होंने भी सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास में अपना योग दिया।’

(5.) सैन्धव निवासी असुर थे

एक विद्वान के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही असुर थे जिसका वर्णन वेदों में मिलता है।

निष्कर्ष

सैन्धव सभ्यता की खुदाई में विभिन्न जातियों से सम्बद्ध मानवों की हड्डियाँ मिली हैं अतः यह मानना उचित होगा कि सिन्धु-घाटी के निर्माता मिश्रित जाति के थे तथापि सैन्धव समाज में द्रविड़ जाति की प्रधानता थी। सैन्धव सभ्यता के निर्माता जो भी रहे होंगे किंतु उनकी कुछ बातें उन्हें अपनी समकालीन मानव सभ्यताओं से बिल्कुल अलग करती हैं।

सैन्धव सभ्यता के लोग अपने भवनों का निर्माण पक्की ईंटों से करते थे जबकि सुमेरियन सभ्यता के लोग कच्ची ईंटों के मकान बनाते थे। सिंधु सभ्यता के स्थलों से न तो सुमेरियन शहरों की तरह मन्दिर मिले हैं और न मिस्र के नगरों जैसे महल या मकबरे। सिंधु सभ्यता में लिंगपूजा, योनिपूजा, पीपल पूजा, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों का महत्त्व, स्नान-ध्यान का महत्त्व और सफाई का महत्त्व आदि ऐसे प्रमाण मिले हैं जो अन्य समकालीन अथवा पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त नहीं हुए हैं।

सैन्धव सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरुष प्रतिमाओं के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, मृण्मूर्तियाँ आदि वस्तुएं सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता का धर्म

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सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का धर्म क्या था, किन सिद्धांतों पर टिका हुआ था, इसके सम्बन्ध में कोई लिखित जानकारी नहीं मिलती किंतु सिंधु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातत्व सामग्री के आधार पर यह अनुमान लागाने का प्रयास किया गया है कि सिंधु सभ्यता का धर्म कैसा था!

सिंधु सभ्यता के निवासी भलीभांति शिक्षित थे और उन्होंने लिपि, लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं के साथ-साथ धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का विकास कर लिया था। उनकी कलाप्रियता, धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का परिचय सिंधु सभ्यता की मुद्राओं पर बनी आकृतियों, बर्तनों पर की गई चित्रकारियों, शवाधानों में मिली वस्तुओं आदि से मिलता है।

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है। इस कारण उनकी भाषा और उसमें व्यक्त विचारों का ज्ञान नहीं हो सका है। फिर भी विविध स्थलों की खुदाई से प्राप्त मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है कि सैन्धव संस्कृति के विकास के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएँ विद्यमान थीं। वे आधुनिक भारतीयों की तरह जल, अग्नि, सूर्य, वायु, धरती आदि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ वृक्षों एवं पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।

विश्वरूप स्रष्टिकर्ता अथवा परमपुरुष की उपासना

सिन्धुवासियों द्वारा मन्दिरों में पूजा-उपासना करने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है किन्तु सिन्धु सभ्यता की खुदाई में मिली कुछ मुद्राएं, लिंग, योनियां एवं मातृदेवियों की मूर्तियाँ सिधु सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का परिचय देती हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी प्रजनन शक्तियों की परिचायक शक्तियों की पूजा देवी-देवता के रूप में करते रहे होंगे। यही सिंधु सभ्यता का धर्म था।

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खुदाई में मिली एक मुद्रा पर तीन मुख वाला उर्ध्वलिंग व्यक्ति योग मुद्रा में बैठा हुआ है। इस व्यक्ति के सिर पर दो सींग बने हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट धारण किया हुआ है। इस योगी के गले में तिकोनी माला है और हाथों में ऊपर तक मणियों की लड़ियाँ हैं। योगी के निकट हाथी, चीता, गैण्डा और भैंसा बने हुए हैं और उसके आसन के नीचे हरिणों का एक जोड़ा है। मुद्रा के उपरी हिस्से पर छः शब्द अंकित हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। बहुत से विद्वानों का मत है कि मुद्रा पर अंकित चित्र भगवान शिव का है क्योंकि शिव को योगीश्वर, त्रिशूलधारी, पशुपति, त्रयम्बक तथा त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। इस योगी के साथ शिव के विशिष्ट वाहन नन्दी का कोई अंकन नहीं किया गया है जिससे प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा भगवान शिव की नहीं है अपितु ‘विश्वरूप त्वष्टा’ की है जिसकी चर्चा ऋग्वेद में हुई है। वहाँ इसे विश्वकर्मा प्रजापति का रूप एवं पुत्र बताया गया है। यह सृष्टि में स्रष्टा के अवतार का प्रतीक है। इनके तीन सिर, मन, प्राण और वाक् को प्रकट करते हैं जिनसे विश्व की सृष्टि होती है। योगी का ऊर्ध्वलिंग स्रष्टा की प्रजनन शक्ति का परिचायक है। इसके आसन के नीचे बने हुए दो हरिण, प्रजापति और उषा के, हरिण और हरिणी के रूप में सम्भोग करने के सूचक हैं, जिसकी चर्चा मैत्रायणि संहिता और ऐतरेय ब्राह्मण में आई है। इसके दोनों और दिखाए गए पशुओं के चित्र ऋग्वेद में वर्णित त्वष्टा के पशुपति रूप को प्रकट करते हैं।

सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली एक अन्य मुद्रा पर एक अन्य योगी का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि नागों से घिरा हुआ योगी का यह चित्र भी भगवान शिव का है, क्योंकि वे अपने गले में नाग धारण करते हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक धनुर्धारी शिकारी का चित्र पाया गया है। विद्वानों की मान्यता है कि यह चित्र किरात वेशधारी भगवान शिव का है। इन समस्त साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस देवता की आकृति के पीछे ‘विश्वरूप स्रष्टिकर्ता’ अथवा ‘परम पुरुष’ की परिकल्पना है।

परमनारी की पूजा

सिन्धु नगरों की खुदाई में मिट्टी की बनी हुई बहुत सी नारी मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान होता है कि सिन्धु संस्कृति में परमनारी की पूजा अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती होगी। विद्वानों का मत है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। अतः सिंधुवासी पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे। इस देवी की पूजा समस्त कृषि प्रधान समाजों में प्रचलित थी। वे लोग देवी के समक्ष पशु-पक्षी अथवा नरबलि देते थे और उसके बदले में वह उन्हें धनधान्य देती थी। कालान्तर में मातृदेवी की उपासना से ही शक्ति-पूजा की परम्परा का विकास हुआ होगा।

मातृदेवी की मूतियाँ प्रायः नग्न रूप में मिली हैं। मूर्ति की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार प्रदर्शित किया गया है। सिर पर कुल्हाड़ी से मिलती-जुलती आकृति की कोई वस्तु भी दिखाई पड़ती है। कुछ मूर्तियों में देवी को जननी के रूप में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में देवी द्वारा शिशु को स्तनपान करते हुए प्रदर्शित किया गया है। एक मूर्ति में एक ऐसी स्त्री बनी हुई है जिसके गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ प्रदर्शित किया गया है।

सम्भवतः यह वानस्पतिक जगत की देवी का प्रतीक हो। एक अन्य मूर्ति के शीश पर एक पक्षी पंख फैलाए बैठा है। संभवतः यह पक्षी जगत की देवी की प्रतीक हो। इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिन्धुवासी मातृदेवी को समस्त लोक की जननी एवं पालनकर्ता मानते थे। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान मिले हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धुवासी इन प्यालों में तेल अथवा धूप जलाकर मातृदेवी अथवा पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे।

प्रजनन शक्ति की पूजा

परमपुरुष और परमनारी के साथ-साथ सिन्धुवासी प्रजनन शक्ति की, लिंग एवं योनि के प्रतीकांे के रूप में भी पूजा करते थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में बहुत से लिंग मिले हैं। ये सामान्य पत्थर, लाल पत्थर अथवा नीले पत्थर के बने हैं। ये लिंग कुछ इंच से लेकर चार फुट की ऊँचाई तक के हैं। विद्वानों का मत है कि सिंधुवासी छोटे आकार के लिंगों की पूजा अपने घरों में करते थे और बड़े आकार के लिंग विशेष स्थानों अथवा चबूतरों पर प्रतिष्ठित करके पूजे जाते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म में लिंग पूजा संभवतः सिन्धुवासियों की ही देन है। अर्नेस्ट मैके का मत है कि लिंग की आकृति के जो पत्थर मिले हैं उन्हें पूजा का प्रतीक नहीं समझना चाहिए। उनसे सम्भवतः कूटने-पीसने का काम लिया जाता रहा होगा जैसाकि आज भी मूसल, लोढ़े अथवा बट्टे से लिया जाता है।

खुदाई में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने बहुत से छल्ले मिले हैं जिनका आकार आधा इंच से लेकर चार इंच तक है। बहुत से विद्वानों ने इन छल्लों को योनियों का प्रतीक मानकार यह मत व्यक्त किया है कि सिन्धुवासी योनि की पूजा भी करते थे। आर्य लोग योनि पूजक नहीं थे। अतः आज भारत में लिंग-योनि पूजा की जो परम्परा देखने को मिलती है, वह निस्सन्देह अनार्यों की देन है। छल्लों के बारे में मैके का मत है कि अधिकांश छल्ले स्तम्भों के आधार थे न कि योनियों के प्रतीक।

वृक्ष-पूजा

सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर वृक्षों के चित्र मिले हैं जिनके आधार पर विद्वानों का मत है कि सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है। मार्शल का मत है कि मुद्रा में अंकित टहनियाँ पीपल की हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि वृक्ष-पूजा के दो रूप प्रचलित थे-

(1.) वृक्ष को उसके प्राकृतिक रूप में पूजना, जैसे कि तुलसी पूजन।

(2.) वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजना, जैसे पीपल की पूजा।

ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धुवासी पीपल को बड़ा पवित्र मानते थे। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। कहीं इसकी पांच पत्तों की टहनी और कहीं ग्यारह पत्तों की शाखा चित्रित की गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।

वेदों में पीपल का पेड़ विश्व-सृष्टि के प्रतीक के रूप में अंकित है। तैतिरीय ब्राह्मण में ब्रह्म को वृक्ष कहा गया है। भारत में पीपल को ब्रह्म का रूप समझ कर पूजा जाता है। सिन्धु सभ्यता के नगरों तथा ग्रामों के चौराहों और रास्तों पर बड़े-बड़े पीपल के पेड़ रहे होंगे, जिनकी जड़ों को स्त्री-पुरुष पूजते और जल से सींचते होंगे, जैसा कि आज भी होता है।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सिन्धुवासियों में पीपल के साथ-साथ तुलसी, नीम, खजूर, बबूल आदि वृक्षों की पूजा भी प्रचलित रही होगी। भारत में वृक्ष-पूजा की परम्परा बहुत पुरानी है। बौद्ध मतानुयायी भी पीपल की पूजा करते थे।

पशु-पूजा

वृक्ष-पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी पशु-पूजा में भी विश्वास रखते थे। कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। खिलौनों के रूप में भी बैल मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। इसलिए विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव सभ्यता में बैल का बड़ा महत्त्व रहा होगा। शहरों की सड़कों पर बड़े-बड़े बैल विचरते होंगे और लोग श्रद्धा से उन्हें भोजन आदि देते होंगे। विद्वानों का अनुमान है कि बैल की पूजा शक्ति के प्रतीक के रूप में की जाती होगी। वैदिक साहित्य में भी बैल को देवत्व का प्रतीक और बड़ा पवित्र समझा गया है।

बैल की भांति भैंस और भैंसा की भी पूजा की जाती थी, क्योंकि अनेक मुद्राओं पर इनके चित्र मिले हैं। गाय की पूजा भी अवश्य होती थी। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। नाग-पूजा काफी प्रचलित थी। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं। सम्भव है कि ये पशु-पक्षी हिन्दू-धर्म की भांति सैन्धव धर्म में भी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों।

सैन्धव प्रदेश की कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था।

सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे। कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं। आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

अग्नि-पूजा

सैन्धव लोग अग्नि-पूजा भी करते थे। कालीबंगा के मकानों में कोयले, राख तथा जली हुई लकड़ियों से भरे हुए गड्ढे मिले हैं। एक चबूतरे पर कुआँ खुदा हुआ है तथा अग्नि स्थान पर पक्की ईंटों से निर्मित एक आयताकार गड्ढा मिला है जिसमें पशुओं की हड्डियां पाई गईं। दूसरे चबूतरे पर आयताकार सात अग्नि-वेदिकाएं एक कतार में थीं। यह कोई यज्ञभूमि प्रतीत होती है, जहाँ सामूहिक रूप से बैठकर यज्ञ करते थे। कुएं, हड्डियों भरे हुए गड्ढे तथा यज्ञवेदियों के पास-पास मिलने से अनुमान किया जाता है कि सैन्धव लोग नहाकर पवित्र होने के बाद यज्ञ करते थे तथा इस अवसर पर पशु-बलि दिया करते थे। कुछ मूर्तियों एवं मुद्राओं के हिस्से धुएं से काले पड़े हुए हैं। अनुमान है कि सैंधव-वासी पूजा में धूप-दीप का भी प्रयोग करते थे।

जल-पूजा

मोहेनजोदड़ो के दुर्ग की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय मिला है। ईंटों के स्थापत्य का यह एक सुंदर नमूना है। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें मजबूत हैं। जलाशय के चारों और एक बारामदा है जिसकी चौड़ाई 5 मीटर है। जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इन स्नानागारों के ऊपर कमरे बने हुए थे जिनमें सम्भवतः पुजारी रहते थे।

जलाशय के निकट एक कुआं भी मिला है जिसके पानी से जलाशय को भरा जाता होगा। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे। जलाशय के दोनों सिरों पर स्नानागार की सतह तक सीढ़ियां बनी हुई हैं। अनुमान है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था तथा धार्मिक प्रथाओं में शारीरिक शुद्धि अथवा स्नान-ध्यान पर विशेष ध्यान दिया जाता होगा। आज भी भारत के धार्मिक कृत्यों में ऐसे स्नान का बड़ा महत्त्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधुवासी जल को भी देवता मानकर उसकी पूजा करते थे।

धार्मिक चिह्न

खुदाई में प्राप्त अनेक अवशेषों पर सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक के चिह्न मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि इन चिह्नों का भी कुछ धार्मिक महत्त्व रहा होगा। सम्भव है कि यह चिह्न किसी देवी-देवता के प्रतीक रहे हों अथवा किसी धार्मिक भावना के प्रतीक के रूप में इनकी पूजा की जाती हो। यह भी संभव है कि इन चिह्नों के माध्यम से रोग, बुरी नजर, प्रेतात्माओं आदि को दूर भगाया जाता हो। कुछ मुद्राओं पर बने चित्रों में नर-नारियों को सींग धारण किए हुए दिखाया गया है।

संभवतः शीश पर सींग धारण करने का भी कुछ धार्मिक महत्त्व था। इसी प्रकार स्तम्भ, स्वास्तिका और धूप-दीप आदि के प्रदर्शन का भी धार्मिक महत्त्व रहा होगा। हिन्दू-धर्म में आज भी स्वास्तिक, शंख, मछली आदि चिह्नों को पवित्र माना जाता है। माण्डने बनाने की प्रथा भी इन्हीं चिह्नों के अंकन की परम्परा का विकास हो सकता है।

मूर्ति-पूजा

मुद्राओं पर अंकित देवी-देवताओं के चित्रों तथा धार्मिक चिह्नों के अंकन से निश्चित हो जाता है कि सैन्धव लोग ईश्वर की सगुण-साकार उपासना करते थे और उनमें मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किंतु वे लोग इन मूर्तियों की स्थापना एवं धार्मिक चिह्नों के अंकन के लिए मंदिर नहीं बनाते थे क्योंकि सैंधव स्थलों की खुदाई में अभी तक मंदिर जैसी कोई रचना नहीं मिली है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहेनजोदड़ो में जिस स्थान पर कुषाणकालीन बौद्ध-स्तूप खड़ा है, उसके नीच सैन्धव वासियों का मन्दिर दबा हुआ हो सकता है।

धार्मिक अनुष्ठानों में नृत्य एवं संगीत का महत्त्व

सर जॉन मार्शल ने मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी आकृतियों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि ये नारी मूर्तियाँ मन्दिरों की उपासिकाएँ रही होंगी। खुदाई में प्राप्त निर्वस्त्र नृत्यांगना को विद्वानों ने देवदासी या उपासिका मानकर देवदासी प्रथा प्रचलित होने की कल्पना भी की है। संगीत एवं नृत्य के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने की परिपाटी भी रही होगी।

पशु-बलि

सैन्ध्व लोग, अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि भी देते होंगे। कालीबंगा में एक चबूतरे पर सात यज्ञकुण्डों की कतार वाले चबूतरे के निकट स्थित दूसरे चबूतरे पर खुदे कुएं के पास के गड्ढे में पशुओं की हड्डियां मिली हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यज्ञों के समय पशु-बलि दी जाती होगी। यह भी संभव है कि बलि देने से पशुओं को भी जल से स्नान कराया जाता हो।

योग साधना

सैन्धव स्थलों से प्राप्त बहुत सी मुद्राओं पर योगियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। उनकी योगसन मुद्राओं के आधार पर कह कहा जा सकता है कि सैन्धव सभ्यता में योग साधना का बड़ा महत्त्व था।

परलोक में विश्वास

सैन्धव लोग मानव जीवन की यात्रा केवल इसी लोक तक सीमित नहीं समझते थे इसलिए वे शव को या तो विधि-विधान पूर्वक शवाधानों में गाढ़ते थे। या उसे जलाकर उसकी भस्मी कलश में रख दी जाती थी। शव को गाढ़ते समय या उसकी भस्मी के कलश के साथ पशु-पक्षी, मछली, मनके, कड़े, बर्तन आदि चीजें रखते थे। संभवतः उनका विश्वास था कि मनुष्य को दूसरे लोक में पहुँचकर ये वस्तुएं प्राप्त होंगी।

एक मृद्भाण्ड पर बकरा, गाय या बैल एवं कुत्ता अंकित है। इस अंकन का आशय पशु-बलि से हो सकता है। कुछ मुद्राएँ गण्डे एवं ताबीज की तरह बनाई गई हैं जो संभवतः गले में पहनी जाती होंगी या भुजाओं एवं कमर पर बांधी जाती होंगी। इन ताबीजों से अनुमान होता है कि सैन्धव-वासी जादू व टोने-टोकटे में भी विश्वास करते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म के साथ तुलना

सिन्धु वासियों के धर्म तथा आधुनिक हिन्दू-धर्म में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं। इस आधार पर स्टुअर्ट, पिगट तथा जॉन मार्शल आदि पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म का स्रोत सिन्धु घाटी रहा होगा।

जॉन मार्शल ने लिखा है- ‘सिन्धु घाटी के धर्म में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनसे मिलती जुलती बातें हमें अन्य देशों में भी मिल सकती हैं और यह बात समस्त प्रागैतिहासिक धर्मों के विषय में ठीक सिद्ध होगी किंतु उनका धर्म इतनी विशेषता के साथ भारतीय है कि आधुनिक युग में प्रचलित हिन्दू-धर्म से बड़ी कठिनाई से ही उसका भेद किया जा सकता है।’

प्राचीन सिन्धुवासियों तथा आधुनिक हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों में समानता एवं असमानताएं इस प्रकार से हैं-

क्र.सं.सिन्धु-वासियों की धार्मिक आस्थाएंहिन्दुओं की धार्मिक आस्थाएं
1.सिन्धु-वासियों ने परम-पुरुष तथा परम-नारी को सजृन-शक्ति के प्रतीक रूप में माना।हिन्दू लोग शिव एवं पार्वती की पूजा करते हैं।
2.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर की प्रतिमाएं मिली हैं जिनके पास पशु बैठे हुए हैं।हिन्दूओं के शिव भी योगीश्वर हैं और पशुपतिनाथ के रूप में विख्यात है।
3.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर के पास नाग बैठे हैं।हिन्दुओं के शिव के गले में भी नाग हैं।
4.सैन्धवों की मुद्राओं के योगी त्रिनेत्रधारी हैं।हिन्दुओं के शिव भी त्रिनेत्रधारी हैं। 
5.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के पास विभिन्न पशु बैठे हैं किंतु साण्ड नहीं है।हिन्दुओं के शिव बैल की सवारी करते हैं।
6.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के सिर पर दो सींग हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट है।हिन्दुओं के शिव के सिर पर चंद्रमा है तथा उनके पास त्रिशूल रहता है।
7.सिन्धुवासी लिंग एवं योनि की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में भी लिंग पूजा का महत्त्व है तथा लिंग के आधार में योनि बनाई जाती है।
8.सिन्धुवासी बहुदेववादी होते हुए भी एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते थे।हिन्दू भी बहुदेववादी होते हुए एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं।
9.सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। पीपल का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी तुलसी, पीपल, बड़, आंवला, शीशम आदि वृक्षों का धार्मिक महत्त्व है।
10.सिन्धुवासियों में पवित्र-स्नान और जल-पूजा का धार्मिक महत्त्व था।आधुनिक हिन्दू-धर्म में भी विशेष अवसरों पर नदी स्नान अथवाघरों में स्नान का विशेष महत्त्व है।
11.सिन्धुवासी सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक आदि धार्मिक चिह्नों की पूजा करते थे। हिन्दू-धर्म में स्वास्तिक, शंख, कौड़ी एवं मछली आदि चिह्न पवित्र और शुभ माने जाते हैं।
12.सिन्धुवासी अनेक पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पशु-पक्षियों को देवताओं का वाहन मानकर धार्मिक महत्त्व दिया जाता है। हाथी इन्द्र का, बाघ दुर्गा का, मेंढा ब्रह्मा का, मकर गंगा का, भैंसा यम का, बैल शंकर का, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है।
13.सिन्धुवासी मातृ-देवी की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पृथ्वी को पूजनीय माना जाता है।
14.सिन्धुवासी देवप्रतिमाओं की पूजा करते थे और देवप्रतिमाओं के समक्ष धूप-दीप जलाते थे।यह प्रथा हिन्दू-धर्म में भी प्रचलित है।
15.सिन्धु प्रदेश में देवताओं की सेवा के लिए उपासिकाएं एवं देवदासियाँ होती थीं।हिन्दू-धर्म में भी यह परम्परा दीर्घकाल तक प्रचलित रही।
16.सिन्धुवासी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि देते थे।हिन्दू-धर्म के शाक्त-सम्प्रदाय में  देवी को सन्तुष्ट करने के लिए पशु-बलि दी जाती थी।
17.सिन्धुवासियों के धार्मिक जीवन में योग साधना का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी योग साधना प्रमुख रूप से प्रचिलित है।
18.सिन्धुवासी यज्ञ-हवन जैसे अनुष्ठान करते थे।हिन्दू-धर्म में भी यज्ञ-हवन प्रचलित हैं।
19.सिन्धुवासी देवी-देवताओं की प्रतिमा के लिए मंदिर नहीं बनाते थे।हिन्दू-धर्म में मंदिर बनाने का प्रचलन है।
20.सिन्धुवासी देव-पूजन में नृत्य एवं संगीत को महत्त्व देते थे।हिन्दू-धर्म में भी ईश्वर की भक्ति करते समय कीर्तन एवं नृत्य आदि का महत्त्व है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता का समाज

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सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता का समाज प्राीचनतम भारत की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक तृतीय कांस्य कालीन सभ्यता का समाज था जिसका अर्थ है कि इस काल के मानव ने अपने से पूर्व की समस्त सभ्यताओं से काफी अधिक उन्नति कर ली थी।

सैन्धव सभ्यता की खुदाई में मिली वस्तुओं से अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु सभ्यता का समाज अत्यंत उन्नत अवस्था में था। सैन्धव सभ्यता के आवासों की बनावट एवं नगर योजना के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में लोगों का सामाजिक स्तर एक जैसा नहीं था। समाज कई वर्गों में विभाजित था। पुजारी, पदाधिकारी, ज्यातिषि, वैद्य, आदि लोगों को उच्च वर्ग का समझा जाता होगा। कृषक, बढ़ई, कुम्हार, मछुआरे, मल्लाह, गाड़ीवान, चरवाहे आदि कर्मकार निम्न वर्ग के रहे होंगे। नगर में ऊँचे स्थान पर बने दुर्ग इस बात का प्रमाण हैं कि सैन्धव समाज में कोई न कोई राजनैतिक व्यवस्था विद्यमान थी।

भवन निर्माण

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सैन्धव स्थलों की खुदाई से प्राप्त भवन अवशेषों से सिंधु सभ्यता की भवन निर्माण कला की जानकारी मिलती है। सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग होना एक अदभुत बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में मुख्यतः धूप में सुखाई गई ईटों का उपयोग होता था। समकालीन मैसोपोटामिया में भी सीमित मात्रा में पकाई हुई ईटों का उपयोग होता था किन्तु हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर हुआ है। अधिकांश भवन दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे। सिंधु सभ्यता के आवासीय भवनों के द्वार एवं खिड़कियाँ मुख्य मार्ग पर नहीं खुलते थे, अपितु गलियों और सहायक सड़कों की ओर खुलते थे। खुदाई में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग के निवासियों के आवासीय भवनों के भग्नावशेष मिले हैं। साधारण वर्ग के लोगों के भवन छोटे होते थे जिनकी सामान्यतः लम्बाई 30 फुट और चौड़ाई 27 फुट होती थी। इस भवन में चार से पांच कक्ष होते थे। उच्च वर्ग के लोगों के घर बड़े होते थे जिनका आकार छोटे घरों की तुलना में दुगुना या उससे अधिक होता था और उनमें कक्षों की संख्या भी अधिक होती थी।

कुछ विशाल भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। एक भवन 242 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा था। दीवारों में छेद बनाकर उनमें शहतीरें लगाई जाती थीं और फिर बल्लियाँ डालकर मजबूत चटाई बिछा देते थे। उस पर मिट्टी एवं गोबर से फर्श को पक्का बनाया जाता था। बड़े भवनों के दरवाजे बड़े तथा चौडे़ होते थे।

कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े थे कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ-जा सकती थीं। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कमरों में खूंटियाँ भी लगी होती थीं। भवन में खिड़कियों तथा दरवाजों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा तथा प्रकाश की कमी न हो।

दीवारों के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। ईंटों का नाप आधुनिक ईंटों से काफी मिलता-जुलता है। ईंटों को आग में पकाया जाता था। दीवारों में ईंटों को जोड़ने के लिए मिट्टी का गारा काम लाया जाता था। धनिक या उच्च वर्ग के लोग मिट्टी के गारे में चूना भी मिलाते थे। मकानों का निर्माण नींव डालकर किया जाता था। दो मंजिले मकानों की नींव अधिक गहरी होती थी और ऐसे मकानों की पहली मंजिल की दीवारें भी अधिक चौड़ी बनाई जाती थीं।

डॉ. मैके के अनुसार दीवारों पर प्लास्टर भी किया जाता था। निचली मंजिल से ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए लकड़ी और पत्थर से सीढियां बनाई जाती थीं, जो प्रायः बहुत उँची व तंग होती थीं। अधिकांश मकानों के दरवाजे तीन या चार फुट चौड़े होते थे। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियां भी बनाई जाती थीं। घरों के मध्य में प्रायः आँगन रखा जाता था। आँगन के एक कोने में रसोईघर होता था।

घर के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट स्नानागार तथा शौचालय बनाए जाते थे। ऐसा संभवतः जल निकासी की सुविधा के लिए किया जाता होगा। स्नानागार तथा शौचालय के फर्श पक्की ईंटों के होते थे। आँगन में पक्की ईंटों से चुना हुआ एक कुआँ होता था। कुछ कुंओं के भीतर सीढ़ियों के चिह्न भी मिले हैं।

सैन्धव स्थलों से कुछ विशेष भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा एवं मोहेनजोदड़ो दोनों ही स्थानों से एक-एक दुर्ग अथवा गढ़ी के अवशेष मिले हैं जो नगर से अलग टीले पर बनाया गया था। हड़प्पा दुर्ग की लम्बाई 460 गज, चौड़ाई 215 गज और ऊंचाई लगभग 45-50 फुट है। गढ़ी की बाहरी दीवार में कई बुर्ज और द्वार बने हुए हैं। गढ़ी के समीप अनेक भवन स्थित थे जिनमें भण्डागार विशेष उल्लेखनीय है। छ-छः कमरों की दो पंक्तियों में बने बड़े-बड़े भवन भी मिले हैं।

दोनों पंक्तियों के मघ्य काफी चौड़ा मार्ग है। ये भवन अन्न संग्रहण के काम में आते होंगे। इन भण्डागारों का मुख्य द्वार नदी की ओर था। सम्भवतः नदी मार्ग से ही इन भण्डागारों में अन्न सामग्री आती-जाती थी। इन भण्डागारों से थोडी दूर पर 18 बड़े-बड़े गोलाकार चबूतरे मिले हैं। चबूतरों के बीच में छेद होता था। अनुमान है कि ये चबूतरे अन्न पीसने के काम में आते होंगे। इन चबूतरों के उत्तर में सात-सात मकानों की दो पंक्तियाँ मिली है, जिनके समीप सोलह भट्टियाँ हैं। अनुमान है कि ये श्रमिकों के आवास रहे होंगे।

इस गढ़ी के भीतर सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है एक विशाल स्नानागार। इस स्नानागार के मध्य में प्रधान स्नान-कुण्ड, पूर्व-पश्चिम तथा दक्षिण में बरामदे और उनके पीछे लघु कक्ष स्थित हैं। प्रधान स्नान कुण्ड के उत्तर की ओर मार्ग के लिए जगह छोड़़कर आठ लघु स्नानगृह बने हुए हैं, जिनमें पानी आने की व्यवस्था है तथा ऊपर की ओर जाने की सीढ़ियाँ हैं। स्नानागार का फर्श पक्की ईटों का बनाया गया है और सीलन से बचाने के लिए राल का लेप किया गया है।

स्नान कुण्ड की सफाई करने तथा गन्दा पानी बाहर निकालने के लिए इसके दक्षिणी भाग में एक नाली बनी हुई है। यह स्नानागार धार्मिक अवसरों पर पुजारियों अथवा शासकीय व्यक्तियों के विशेष स्नान के उपयोग में आता होगा। स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म की भाँति सैन्धवासियों के धर्म में भी पवित्र स्नान का विशेष महत्त्व रहा होगा।

इस प्रकार भवन निर्माण के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग जैसा विभाजन मौजूद था।

सैन्धव परिवार

सभ्यता का समाज पारिवारिक व्यवस्था में विश्वास करता था। सैन्धव सभ्यता से प्राप्त भवनों और उनमें स्थित पृथक-पृथक कक्षों की योजना से लगता है कि सिन्धु सभ्यता में परिवार ही समाज की मूल ईकाई थी। कक्षों की संख्या, आंगन में कुओं की उपस्थिति, प्रवेश द्वार के निकट शौचालय एवं स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जा सकता है कि सैन्धव समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित रही होगी और माता-पिता, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री आदि एक साथ रहते होंगे।

खुदाई में प्राप्त नारी मूर्तियों की बहुलता और मातृदेवी की लोकप्रियता के आधार पर विद्वानों का मानना है कि सैन्धव समाज मातृ-प्रधान था, अर्थात् परिवार में माता का स्थान सर्वोपरि होता था। द्रविड़ समाज भी मातृ-प्रधान था।

सैन्धव समाज में नारी का स्थान

विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक था। वह परिवार की मुखिया एवं पोषिका समझी जाती थी। उसका मुख्य काम बच्चों का लालन-पालन एवं घर पर रहकर सूत कातना था। मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी-चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सैन्धव स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था और वे धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में पुरुषों के साथ समान रूप से सम्मिलित होती थीं।

रहन-सहन

सैन्धव स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में अस्त्र-शस्त्रों की अल्पता इस बात की सूचक है कि सैन्धव लोग शान्ति-प्रिय थे और समृद्ध जीवन बिताने की कामना करते थे। खुदाई से प्राप्त घड़े, कलश, थालियाँ, कटोरे, तश्तरियाँ, गिलास, चम्मच आदि बर्तन उनकी सम्पन्नता के द्योतक हैं। विभिन्न मुद्राओं पर अंकित पलंग, कुर्सियाँ, तिपाइयाँ आदि भी उनकी सम्पन्नता का उद्घोष करते हैं।

वेश-भूषा

खुदाई में प्राप्त अधिकांश नारी-मूर्तियाँ नग्न हैं परन्तु सैन्धव लोग वस्त्रों का प्रयोग करते थे। सिन्धु-घाटी के लोग ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। उनके वस्त्र साधारण हुआ करते थे। खुदाई में एक पुरुष की मूर्ति मिली है जिसमें वह एक शॉल ओढ़े हुए है। शॉल बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी कांख के नीचे जाता है। विद्वानों का अनुमान है कि इनके दो मुख्य वस्त्र रहे होंगे। एक शरीर के नीचे के भाग को ढँकने के लिए और दूसरा ऊपर के भाग के लिए।

हड़प्पा की खुदाई में मिली सामग्री से अनुमान होता है कि स्त्रियाँ सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनती थीं जो सिर के पीछे की ओर पंखे की तरह उठा रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों तथा पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं होता था। कुछ स्त्रियां पगड़ी भी पहनती थीं। कुछ स्त्री मूर्तियों को नुकील टोपी पहने हुए दिखाया गया है।

केश-विन्यास

खुदाई में प्राप्त शीशा और कंघी तथा कुछ मुद्राओं पर मिले अंकन से ज्ञात होता है कि सैन्धव स्त्री-पुरुष केश-सज्जा किया करते थे। मूर्तियों से पता चलता है कि पुरुष दाढ़ी और मूँछ दोनों रखते थे एवं वे अपने केशों को संवारकर पीछे की ओर बाँध लेते थे। खुदाई में हजामत बनाने का उस्तरा भी मिला है।

कुछ मुद्राओं और मूर्तियों से पता चलता है कि कुछ लोग दाढ़ी रखते थे परन्तु मूँछे मुंडवा लेते थे। सैन्धव स्त्रियाँ, आज की हिन्दू स्त्रियों की भाँति बीच से माँग निकालकर चोटी करती थीं। कुछ स्त्रियाँ अपनी चोटी को सिर के पीछे लपेट लेती थीं। कुछ स्त्रियाँ बालों को जूड़ा बनाकर पीछे फीते से बाँध लेती थीं।

शृंगार एवं आभूषण

सैंधव स्त्रियाँ आज की हिन्दू स्त्रियों की भांति काजल, सुरमा, सिन्दूर, बालों की पिन, इत्र तथा पाउडर का प्रयोग करती थीं। मैके के अनुसार, वे लिपिस्टिक का प्रयोग भी करती थीं। खुदाई में कण्ठहार, कर्णफूल, हंसली, बाजूबन्द, कडे़ छल्ले, अंगूठियाँ, पायजेब तथा नाक में पहनने के आभूषण मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही आभूषणों का चाव था। ये आभूषण विभिन्न धातुओं के बने होते थे और उन पर पच्चीकारी का काम किया जाता था। धनी लोग सोने-चाँदी मणि-माणिक्य के आभूषण पहनते थे तथा निर्धन स्त्री-पुरुष तांबा, हड्डी एवं मिट्टी से बने आभूषण पहनते थे।

सिंधु सभ्यता का समाज और खान-पान

सैन्धव स्थलों की खुदाई में गेहूँ, जौ, चावल, खजूर आदि के बीज, अधजली हड्डियाँ तथा फलों के छिलके मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि  सैन्धवासियों के खान-पान का स्तर उच्च था। मुद्राओं पर अंकित चित्रों से उनके माँसाहारी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। वे मछली, गाय, सूअर, भेड़ तथा मुर्गे का मांस खाते थे। गाय, भैंस तथा बकरी के दूध का उपयोग किया जाता था। यह कहना कठिन है कि वे लोग दूध से घी निकालना जानते थे अथवा नहीं।

मदिरा-पान

जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्त्व संग्रहालय में एक जार प्रदर्शित किया गया है जिसे ‘वाइन टारपीडो’ कहते हैं। यह मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर विशेष प्रकार की पॉलिश है। यह बेलनाकार आकृति में है, इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त होता है। उदयुपर संग्रहालय का जार गुजरात के एक सैन्धव सभ्यता स्थल से मिला है।

इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इन जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें सैन्धव सभ्यता के बंदारगाहों तक पहुँचाते हों।

सिंधु सभ्यता का समाज और आमोद-प्रमोद

सैन्धववासियों में कई प्रकार के आमोद-प्रमोद प्रचलित थे। मछली पकड़ना और शिकार करना मनोरंजन के प्रिय साधन थे। एक मुद्रा पर कुछ लोगों को तीर-कमान से एक बारहसिंगे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य मुद्रा पर एक पुरुष को दो शेरों से लड़ते हुए दिखाया गया है। बर्तनों एवं मुद्राओं पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि वे लोग मुर्गे, तीतर और बटेर लड़ाते थे। खेलकूद और व्यायाम में भी उनकी रुचि थी। एक मुद्रा पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुए दिखाया गया है।

 वे लोग घरों में भी कई प्रकार के खेल खेला करते थे। अनेक स्थलों से पत्थर, मिट्टी और हाथी दाँत से बने हुए सुन्दर चौकोर पासे मिले हैं। इन पर आधुनिक पासों की तरह अलग-अलग संख्या के बिन्दू बने हैं। इनसे प्रतीत होता है कि सैन्धववासी शतरंज अथवा चौपड़ जैसे घरेलू खेल अथवा जुआ खेला करते थे। नृत्य और संगीत सिन्धुवासियों के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन था। धातु की बनी हुई नर्तकी की एक सुन्दर मूर्ति मिली है।

कुछ मुद्राओं पर तबले, ढोल तुरही, वीणा आदि वाद्ययंत्र उत्कीर्ण हैं। नृत्य के समय इन वाद्यों का प्रयोग किया जाता होगा। सैन्धव स्थलों की ख्ुादाई में बच्चों के खिलौने बड़ी संख्या में मिले है। इनमें झुनझुने, सीटियाँ, बैलगाड़ियाँ, नर-नारियों की आकृतियों एवं पशु-पक्षियों की आकृतियों वाले खिलौने प्रमुख हैं। कुछ पशु आकृति वाले खिलौनों की गर्दन एवं सिर हिलते हैं। कुछ खिलौनों में हाथ-पैरों को अलग से धागे की सहायता से जोड़ा गया है जिसे खींचने पर खिलौने के हाथ-पैर हिलते हैं।

यातायात के साधन

सिन्धु-घाटी के लोग कच्ची सड़कें बनाते थे। बैलगाड़ी मुख्य सवारी होती थी। हड़प्पा में ताम्बे का एक वाहन मिला है जो इक्के के आकार का है। नौकाएं भी यातायात एवं परिवहन का साधन थीं।

सिंधु सभ्यता का समाज और मृतक-संस्कार

सैन्धव स्थलों से मिले शवाधानों, अस्थि कलशों एवं राख के घड़ों आदि के आधार विश्वास किया जाता है कि सैन्धववासी तीन प्रकार से शवों का अन्तिम संस्कार करते थे-

(1.) पूर्ण समाधिकरण- अर्थात् पूरे शव को गाड़ दिया जाता था।

(2.) आंशिक समाधिकरण- अर्थात् शव को पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे भाग को गाड़ा जाता था।

(3.) अग्नि संस्कार- अर्थात् शव को जलाया जाता था और कभी-कभी उसकी भस्म गाड़ दी जाती थी। हांडियों और कलशों में इस प्रकार की भस्म तथा जली हुई अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं।

हड़प्पा तथा कालीबंगा से कुछ शवाधान (कब्र) मिले हैं, जिनमें रखे शव का सिर उत्तर दिशा की ओर है। ऐसा किसी धार्मिक विश्वास के आधार पर ही किया गया होगा। शवाधानों में रखे शवों के साथ विविध आभूषण, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी मिली हैं, जिनसे अनुमान किया जाता है कि सैन्धववासी सम्भवतः परलोक के जीवन की कल्पना करते थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई में कोई शवाधान प्राप्त नहीं हुआ है। अतः इस नगर के लोग शवों को या तो अग्नि में जलाते होंगे अथवा नदी में बहाते होंगे।

इस प्रकार हम देखते है कि सिंधु सभ्यता का समाज अत्यत उन्नत समाज था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

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सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था बड़ी उन्नत अवस्था में थी। यह केवल कृषि एवं पशुपालन पर आधारित नहीं थी अपितु व्यापार, शिल्प एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों से सम्पन्न थी।

शिक्षा

सिंधु सभ्यता का समाज शिक्षित समाज था। सैन्धववासी लिखना-पढ़ना जानते थे अतः अनुमान है कि उन्होंने शिक्षा देने का एक निश्चित तरीका विकसित कर लिया होगा। खुदाई में लकड़ी की कुछ तख्तियाँ मिली हैं। इन तख्तियों पर लकड़ी की कलमों से लिखा जाता था।

खुदाई में बड़ी संख्या में प्राप्त खिलौने के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि बच्चों को प्रत्यक्ष ज्ञान उपलब्ध कराने में खिलौनों का प्रयोग किया जाता होगा। माप-तौल के निश्चित साधनों की उपस्थिति से अनुमान होता है कि बच्चों को अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी।

खुदाई में प्राप्त बाटों की दशमलव ईकाइयों के आधार पर यह अनुमान भी है कि सैन्धववासी दशमलव पद्धति से परिचित थे। भवन और नगर निगम की निश्चित योजना से स्पष्ट है कि विद्यार्थयों को ज्यामिति के उच्च सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी। विद्वानों का माना है कि सैन्धववासियों को ज्योतिष के सिद्धान्तों की भी जानकारी रही होगी।

घरों से गंदे पानी की निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था से पता चलता है कि सैन्धववासी सार्वजिनक सफाई के प्रति सतर्क थे। वे रोगों से बचने का उपाय जानते थे और उन्हें चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान भी था। अतः बच्चों को अंकगणित, ज्यामिति, संगीत, नृत्य, चित्रकला, स्वच्छता एवं चिकित्सा आदि विषय पढ़ाए जाते होंगे।

लिपि

सैन्धव स्थलों से प्राप्त बर्तनों, मुद्राओं एवं ताम्रपत्रों पर अनेक प्रकार के लेख उत्कीर्ण हैं। ये लेख एक या दो पंक्तियों में हैं। इसलिए आधुनिक भाषा-विज्ञानी, इन लेखों को पढ़ने में सफल नहीं हो सके हैं। फिर भी सैन्धव लिपि में प्रयुक्त होने वाले कुछ संकेतों का पता लगा लिया गया है। हण्टर का मत है कि ये लेख चित्रलिपि में हैं। अतः सैन्धव-लिपि को चित्रात्मक लिपि मानना चाहिए। लिपि का प्रत्येक चित्र किसी विशेष शब्द अथवा वस्तु को प्रकट करता है।

विद्वानों ने अब तक 396 चिह्नों की सूची बनाई है। विद्वानों का माना है कि यह लिपि पहली पंक्ति में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी और दूसरी पंक्ति बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती थी। इस प्रकार की लिखावट को ‘बॉस्ट्रोफेडोन’ (Boustrofedon) कहते हैं। पहचाने गए संकेतकों के आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु लिपि, अपनी समकालीन सुमेरिया और मिस्र की लिपियों की तुलना में अधिक उन्नत और परिष्कृत थी।

सैन्धव कलाएँ

सैन्धव स्थलों से प्राप्त दैनिक उपयोग की सामग्री एवं भवनावशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि सैंधव संस्कृति में विभिन्न कलाओं का विकास हो चुका था तथा कलाओं की दृष्टि से यह एक उन्नत संस्कृति थी। सैन्धववासी न केवल सुंदर नगरों की रचना करने में सफल हुए थे अपितु भवन निर्माण पद्धति से भी उन लोगों की कलाप्रियता की जानकारी मिलती है। वे मिट्टी एवं कांसे के बर्तन और मिट्टी, कांसे और पत्थरों से अनेक प्रकार की मूर्तियाँ बनाने में निष्णात थे। हड़प्पा से प्राप्त एक नर्तकी त्रिभ्ंगी मुद्रा में नृत्य करने के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है। यहाँ से प्राप्त दो पाषाण-प्रतिमाएं विशेष उल्लेखनीय हैं।

इनमें से एक लाल पत्थर की खण्डित मानव-मूर्ति है जिसका सिर टूटा हुआ है किंतु धड़ सुरक्षित अवस्था में है। दूसरी प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित एक नर्तक की है जिसने नृत्य-मुद्रा में अपना बायां पैर ऊपर उठा रखा है। एक अन्य खण्डित प्रतिमा किसी पुजारी या योगी की है जिसकी आँखें अधखुली हैं। पाषाण मूर्तियों में पशु-पक्षियों की अनेक मूर्तियाँ की मिली हैं। एक बैल मूर्ति उल्लेखनीय है जिसका मुख्य शरीर पत्थर से निर्मित है परन्तु सींग और कान किसी अन्य पदार्थ से बने हैं।

सैन्धव सभ्यता की मूर्तिकला के सम्बन्ध में जाँन मार्शल ने लिखा था- ‘सैन्धव धर्म और कला अद्भुत हैं और उन पर अपनी एक विशिष्ट छाप है। इस काल में हम अन्य देशों में कोई ऐसी वस्तु नहीं जानते जो शैली की दृष्टि से यहाँ बनी मूर्तियों से साम्य रखती हो …….. ये मूर्तियाँ इतनी सुन्दर हैं कि चौथी ईसा पूर्व कोई भी यूनानी कलाकार इनको अपनी कृति बताने में गौरव का अनुभव करेगा।’

सैन्धववासियों की चित्रकला की जानकारी मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्रों से होती है। सैन्धववासी, रेखाओं और बिन्दुओं के माध्यम से बर्तनों पर हिरण, खरगोश, कौआ, बत्तख, गिलहरी, मोर, साँप, मछली आदि पशु-पक्षी और पीपल, नीम, खजूर आदि पेड़-पौधों के चित्र बनाते थे। अनेक बर्तनों पर मानव आकृतियाँ भी बनी हुई हैं। एक बर्तन पर मछुआरे का चित्र है जो बाँस पर जाल लटकाए जा रहा है और उसके पैरों के पास मछली और कछुए पड़े हैं। कुछ बर्तनों पर बने चित्र बड़े आकर्षक हैं और वास्तविक जान पड़ते हैं।

आर्थिक जीवन

सिन्धु घाटी में वर्तमान में लगभग 15 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। इसलिए यह प्रदेश अधिक उपजाऊ नहीं है किंतु सिंधु सभ्यता के उत्खनन स्थलों को देखने से अनुमान होता है कि उस काल में यह प्रदेश अधिक उपजाऊ था। ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकंदर का एक समकालीन इतिहासकार जानकारी देता है कि सिन्धु क्षेत्र उपजाऊ प्रदेश था।

इससे भी पहले के काल में सिन्धु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति अधिक थी और इस कारण यहाँ वर्षा भी अधिक होती थी। इस कारण पूरे प्रदेश में घने जंगल थे जिनसे व्यापक स्तर पर जलाऊ लकड़ी प्राप्त की जाती थी। इस लकड़ी का उपयोग ईंटें पकाने, कृषि उपकरण बनाने, युद्ध के औजार बनाने तथा भवन बनाने में होता था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो जैसे विशाल तथा वैभवपूर्ण नगर जिस संस्कृति में विद्यमान थे वह निश्चय ही बड़ा सम्पन्न रहा होगा। चूँकि यह सभ्यता कृषि-प्रधान नहीं थी इसलिए यहाँ के निवासियों का आर्थिक जीवन प्रमुखतः व्यापार तथा उद्योग-धन्धों पर आधारित था। व्यापार तथा उद्योग उन्नत दशा में था। सिन्धु-वासियों का आर्थक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण तथा स्थानीयकरण पर आधारित था। उनमें श्रम-विभाजन तथा संगठन की कल्पना की भी जा सकती है। एक प्रकार का व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे। यदि इस सभ्यता को औद्योगिक सभ्यता कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

हड़प्पा सभ्यता में निम्नलिखित व्यवसाय तथा उद्योग प्रचलित थे-

(1.) कृषि

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सिन्धु सभ्यता के लोग सिंधु नदी में बाढ़ के उतर जाने पर नवंबर के महीने में बाढ़ के मैदानों में गेहूं और जौ बो देते थे और आगामी बाढ़ आने से पहले, अप्रेल के महिने में गेहूं और जौ की फसल काट लेते थे। इस क्षेत्र से कोई फावड़ा या फाल नहीं मिला है, परन्तु कालीबंगा में हड़प्पा-पूर्व अवस्था के जिन कूँडों की खोज हुई है, उनसे पता चलता है कि हड़प्पा-काल में राजस्थान के खेतों में हल जोते जाते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग सम्भवतः लकड़ी के हल का उपयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे या बैल, इस बात का पता नहीं चलता। फसल काटने के लिए पत्थर के हँसियों का उपयोग होता होगा। गबरबंदों अथवा नालों को बांधों से घेरकर जलाशय बनाने की बिलोचिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में प्रथा रही है, परन्तु अनुमान होता है कि सिन्धु सभ्यता में नहरों से सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी। हड़प्पा संस्कृति के गांव, जो प्रायः बाढ़ के मैदानों के समीप बसे होते थे, न केवल अपनी आवश्यकता के लिए अपितु नगरों में रहने वाले कारीगरों, व्यापारियों और दूसरे नागरिकों के लिए भी पर्याप्त अनाज पैदा करते थे। सिन्धु सभ्यता के किसान गेहूँ, जौ, राई, मटर, आदि पैदा करते थे। वे दो किस्मों का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनवाली से बढ़िया किस्म का जौ मिला है। वे तिल और सरसों भी पैदा करते थे।

हड़प्पा-कालीन लोथल के लोग ई.पू.1800 में भी चावल का उपयोग करते थे। लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं। मोहेनजोदड़ो, हड़प्पा और सम्भवतः कालीबंगा में भी विशाल धान्य कोठारों में अनाज जमा किया जाता था।

किसानों से सम्भवतः करों के रूप में यह अनाज प्राप्त किया जाता था और पारिश्रमिक के रूप में धान्य-कोठारों से श्रमिकों को वितरित होता था। यह बात हम मेसोपोटामिया के नगरों के सादृश्य के आधार पर कह सकते हैं जहाँ पारिश्रमिक का भुगतान जौ के रूप में होता था। सिन्धु सभ्यता के लोग कपास पैदा करने वाले सबसे पुराने लोगों में से थे। इसीलिए यूनानियों ने कपास को सिंडोन नाम दिया जिसकी व्युत्पत्ति सिन्ध शब्द से हुई है।

(2.) शिकार

सिन्धु-घाटी के लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी थे। वे मांस, मछली तथा अंडे आदि का प्रयोग करते थे। मांस प्राप्त करने के लिए वे पशुओं का शिकार करते थे। पशुओं के बाल, खाल तथा हड्डी से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(3.) पशुपालन

सिन्धु सभ्यता के लोग खेती करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पशु पालते थे। खुदाई से प्राप्त मुहरों पर पशुओं के चित्र मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, कुत्ता और सूअर उनके पालतू पशु थे। सिन्धुवासियों को बड़े कूबड़ वाला सांड विशेष रूप से पसंद था। आरम्भ से ही कुत्ते दुलारे पशु थे। बिल्ल्यिों को भी पालतू बना लिया गया था। कुत्ता और बिल्ली, दोनों के पैरों के निशान मिले हैं। बैलों और गधों का उपयोग भारवहन के लिए होता था। आश्चर्य की बात है कि खुदाई में ऊँट की हड्डियाँ नहीं मिली हैं। घोड़े के अस्तित्त्व के बारे में भी केवल तीन प्रमाण मिले हैं।

मोहेनजोदड़ो की एक ऊपरी सतह से और लोथल से एक-एक संदिग्ध लघु मूण्मूर्ति मिली है जिसे घोड़े की मूर्ति कहा जा सकता है। घोड़े के अवशेष, जो ई.पू.2000 के आसपास के हैं, गुजरात के सुरकोटड़ा नामक स्थान से मिले हैं। अनुमान होता है कि हड़प्पा-काल में ऊँट तथा घोड़े का उपयोग आम तौर पर नहीं होता था। हड़प्पा संस्कृति के लोग हाथी तथा गेंडे से भली-भांति परिचित थे।

मेसोपोटामिया के समकालीन सुमेर सभ्यता के नगरों के लोग भी प्रायः सिन्धु प्रदेश जैसे ही अनाज पैदा करते थे और उनके पालतू पशु भी प्रायः वही थे जो हड़प्पा संस्कृति वालों के थे परन्तु गुजरात में बसे हुए हड़प्पा संस्कृति के लोग चावल पैदा करते थे और पालतू हाथी भी रखते थे। मेसोपोटामिया के नगरवासियों के लिए ये दोनों बातें सम्भव नहीं थी।

(4.) शिल्प तथा व्यवसाय

हड़प्पा संस्कृति कांस्य-युग की है। हड़प्पा सभ्यता का मानव कुशल शिल्पी तथा व्यवसायी था। वह पत्थर के अनेक प्रकार के औजारों का उपयोग करता था तथा कांस्य-निर्माण से भी भली-भांति परिचित थे। धातुकर्मी तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे। चूँकि हड़प्पावासियों के लिए ये दोनों धातुएं सुलभ नहीं थीं। इसलिए हड़प्पा में कांस्य-वस्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं हुआ।

तांबा राजस्थान में खेतड़ी की खानों तथा बिलोचिस्तान से मंगाया जाता होगा। टिन बड़ी कठिनाई से सम्भवतः अफगानिस्तान से प्राप्त किया जाता था। टिन की कुछ पुरानी खदानें बिहार के हजारी बाग में मिली हैं। हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से मिले कांसे के औजारों और हथियारों में टिन का अनुपात कम है। फिर भी इस सभ्यता से बहुत सारी कांस्य वस्तुएँ मिली हैं, जिनसे स्पष्ट है कि हड़प्पा समाज के कारीगरों में कसेरों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने मूर्तियाँ और बर्तन ही नहीं, विविध प्रकार की कुल्हाड़ियां, आरियां, छुरे और भाले आदि हथियार भी बनाए।

सैन्धव सभ्यता में कई शिल्पों का विकास हुआ। मोहेनजोदड़ो से बुने हुए सूती कपड़़े का एक टुकड़़ा मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़़े के छापे देखने को मिले हैं। कताई के लिए तकलियों का उपयोग होता था। बुनकर सूती और ऊनी कपड़़ा बुनते थे। ईटों की विशाल ईमारतों से ज्ञात होता है कि राजगीरी एक महत्त्वपूर्ण कौशल था। इनसे राजगीरों के एक वर्ग के अस्तित्त्व की भी सूचना मिलती है। हड़प्पा संस्कृति के लोग नौकाएं बनाना जानते थे। मुहरें और मृण्मूर्तियाँ बनाना महत्त्वपूर्ण शिल्प-व्यवसाय थे।

सुनार, चांदी, सोना और कीमती पत्थरों के आभूषण बनाते थे। चांदी और सोना अफगानिस्तान से आता होगा और कीमती पत्थर दक्षिणी भारत से। हड़प्पा संस्कृति के कारीगर मणियों के निर्माण में भी निपुण थे। कुम्हार के चाक का खूब उपयोग होता था। उनके मिट्टी के बर्तनों की अपनी विशेषता थी। बर्तनों को चिकना और चमकीला बनाया जाता था। उन पर चित्रकारी की जाती थी। हाथी-दाँत की भी विभिन्न वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(5) व्यापार

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। अतः यह अनुमान लगाया गया है कि ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती थीं और इन लोगों का विदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। सोना, चांदी, ताम्बा आदि सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलता था। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते थे। यहाँ के निवासी सम्भवतः ताम्बा राजपूताना से, सीपी, शंख आदि काठियावाड़ से और देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते थे।

हड़प्पा संस्कृति का मानव धातु की मुद्राओं का उपयोग नहीं करता था। सम्भव है कि व्यापार वस्तु-विनिमय से चलता हो। निर्मित वस्तुओं और सम्भवतः अनाज के बदले में वह पड़ोसी प्रदेशों से धातुएं प्राप्त करता था और उन्हें नौकाओं तथा बैलगाड़ियों से ढोकर लाता था। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। वह पहिए का उपयोग जानता था। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का उपयोग करते थे।

इन लोगों के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पा वासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह्ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

(6) नाप तथा तौल

खुदाई में बड़ी संख्या में बाट मिले हैं। कुछ बाट इतने बड़े हैं कि वे रस्सी से उठाये जाते होंगे और कुछ इतने छोटे हैं कि उनका प्रयोग जौहरी करते होंगे। अधिकांश बाट घनाकार हैं। लम्बाई नापने के लिए फुट होता था। मोहेनजोदड़ो की खुदाई में सीपी का बना हुआ एक फुट के बराबर माप का टुकड़ा मिला है। कांसे की बनी एक शलाका पर छोटे-छोटे निशान अंकित हैं, यह फुट प्रतीत होता है। तौलने के लिए तराजू का प्रयोग होता था।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते हैं कि सैन्धव सभ्यता और संस्कृति पर धर्म, कला एवं शिक्षा का विपुल प्रभाव था। जीवन का कोई अंग शायद ही इन पक्षों से अछूता था। सैन्धव सामाज में पुरोहित, शासक, व्यापारी, श्रमिक और कृषक रहते थे जो अलग-अलग कार्य करके सामाजिक विन्यास की रचना करते थे।

सैन्धव सभ्यता के लोग सुसभ्य और सांस्कृतिक थे। उनके रहन-सहन का ढंग आधुनिक हिन्दू समाज की तरह काफी उन्नत था तथा समकालीन संस्कृतियों से काफी आगे था। भारतीय आर्यों ने सैंधव संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। यही कारण है कि आज के हिन्दू-धर्म पर सैन्धव संस्कृति का व्यापक प्रभाव है। सैंधव वासियों का आर्थिक जीवन भी पर्याप्त विकसित था। ईसा से लगभग 1500 वर्ष पहले इस संस्कृति का विलोपन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

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सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

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