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लौह युगीन संस्कृति

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लौह युगीन संस्कृति

भारत में लौह युगीन संस्कृति काफी विलम्ब से आई। फिर भी ऋग्वैदिक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि ऋग्वेद काल में भारत की सभ्यता लौह युग में प्रवेश कर चुकी थी।

ऋग्वेद में अयस नामक एक ही धातु का उल्लेख हुआ है। अथर्वेद में लाल-अयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। वाजसनेयी संहिता में लौह तथा ताम्र शब्द प्राप्त होते हैं।

भारत में ताम्र-कांस्य काल के बाद लौह-काल आरम्भ हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार लौह-काल का आरम्भ उत्तर तथा दक्षिण में एक साथ नहीं हुआ। दक्षिण भारत में लोहे का प्रयोग उत्तर भारत की अपेक्षा काफी बाद में हुआ।

लोहे की खोज

विश्व में सर्वप्रथम ‘हित्ती’ नामक जाति ने लोहे का उपयोग करना आरम्भ किया जो एशिया माइनर में ई.पू.1800 से ई.पू.1200 के लगभग निवास करती थी। ई.पू.1200 के लगभग इस शक्तिशाली साम्राज्य का विघटन हुआ और उसके बाद ही भारत में लोहे का प्रयोग आरंभ हुआ। लोहे की खोज के साथ ही भारत में लौह युगीन संस्कृति आरम्भ हो गई।

भारत में लौह युगीन संस्कृति के जन्मदाता

माना जाता है कि भारत में लौह युगीन संस्कृति की शुरुआत करने वाले लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और हिमालय से नीचे उतरकर दक्षिण-पश्चिम की ओर चलते-चलते महाराष्ट्र तक फैल गए। कुछ विद्वान इन्हीं को भारत में आने वाले प्रारम्भिक  आर्य मानते हैं। उनके आने से पहले भारत में जो जातियाँ निवास कर रही थीं वे सैन्धव, द्रविड़, कोल, ब्रेचीफेलस, मुण्डा आदि आदिवासी जातियाँ थी। लौह संस्कृति को जन्म देने वाले आर्य भारत में जहाँ-जहाँ गए, अपने साथ लौह का ज्ञान ले गए जिससे सम्पूर्ण भारत में लौह संस्कृति की बस्तियां बस गईं। कालान्तर में ये आर्य, मध्य प्रदेश के वनों को पार करके बंगाल की ओर भी फैल गए।

मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन

मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसकी सभ्यता एवं संस्कृति की उन्नति में अन्य किसी धातु से उतनी सहायता नहीं मिली जितनी लोहे से मिली है। लोहे के उपकरण कांस्य उपकरणों की अपेक्षा अधिक मजबूत सिद्ध हुए। लौह-काल में मनुष्य ने वैज्ञानिक विकास आरम्भ किया जिससे उसके जीवन में बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन होने लगे। प्रारंभिक लौह युगीन बस्तियों के अवशेष अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

लौह युग का काल निर्धारण

विद्वानों की धारणा है कि उत्तर भारत में इसका प्रारम्भ ईसा से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ होगा। ई.पू.800 में लोहे का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया जाने लगा। लौह उत्पादन की प्रक्रिया का ज्ञान भारत में बाहर से नहीं आया। कतिपय विद्वानों के अनुसार लौह उद्योग का प्रारम्भ, मालवा एवं बनास संस्कृतियों से हुआ। कर्नाटक के धारवार जिले से ई.पू.1000 के लोहे के अवशेष मिले हैं। लगभग इसी समय गांधार (अब पाकिस्तान में) क्षेत्र में लोहे का उपयोग होने लगा। मृतकों के साथ शवाधानों में गाढ़े गए लौह उपकरण भारी मात्रा में प्राप्त हुए हैं। ऐसे औजार बलोचिस्तान में मिले हैं।

लगभग इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी लोहे का प्रयोग हुआ। खुदाई में तीर के नोंक, बरछे के फल आदि लौह-अस्त्र मिले हैं जिनका प्रयोग लगभग ई.पू.800 से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आमतौर पर होने लगा था। लोहे का उपयोग पहले, युद्ध में और बाद में कृषि में हुआ।

लोहे के साहित्यिक प्रमाण

भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए हमें साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद में अयस नामक धातु का उल्लेख हुआ है। कहा नहीं जा सकता कि अयस का आशय ताम्बे से है या लोहे से? अथर्ववेद में लौह आयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। इनमें से लौह-अयस लोहा तथा श्याम-अयस ताम्बा अनुमानित होता है।

यूनानी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि भारतीयों को सिकंदर के भारत आने से पहले से ही लोहे का ज्ञान था। भारत के कारीगर लोहे के उपकरण बनाने में निष्णात थे। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होते हैं। साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ई.पू. आठवीं शताब्दी में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

लोहे के पुरातात्विक प्रमाण

लोहे की प्राचीनता के सम्बन्ध में साहित्यिक उल्लेखों की पुष्टि पुरातात्विक प्रमाणों से होती है। अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थलों के उत्खननों में लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस काल का मानव एक विशेष प्रकार के मृद्भाण्डों का प्रयोग करता था जिन्हें चित्रित धूसर भाण्ड कहा गया है।

इन स्थानों से लोहे के औजार तथा उपकरण यथा तीर, भाला, खुरपी, चाकू, कटार, बसुली आदि मिलते हैं। अतरंजीखेड़ा की खुदाई से धातु शोधन करने वाली भट्टियों के अवशेष मिले हैं। इस संस्कृति का काल ई.पू.1000 माना गया है। पूर्वी भारत में सोनपुर, चिरांद आदि स्थानों पर की गई खुदाई में लोहे की बर्छियां, छैनी तथा कीलें आदि मिली हैं जिनका समय ई.पू.800 से ई.पू.700 माना गया है।

लौह युगीन संस्कृति की प्रारंभिक बस्तियां

(1.) सिन्धु-गंगा विभाजक तथा ऊपरी गंगा घाटी क्षेत्र: चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति इस क्षेत्र की विशेषता है। अहिच्छत्र, आलमगीरपुर, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोह, काम्पिल्य, जखेड़ा आदि से इस संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चित्रित धूसर भाण्ड एक महीन चूर्ण से बने हुए हैं। ये चाक निर्मित हैं। इनमें अधिकांश प्याले और तश्तरियां हैं। मृद्भाण्डों का पृष्ठ भाग चिकना है तथा रंग धूसर से लेकर राख के रंग के बीच का है। इनके बाहरी तथा भीतरी तल काले और गहरे चॉकलेटी रंग से रंगे गए हैं।

खेती के उपकरणों में जखेड़ा में लोहे की बनी कुदाली तथा हंसिया प्राप्त हुई हैं। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अन्य समस्त क्षेत्रों में लोहे की वस्तुएं मिली हैं। अतरंजीखेड़ा से लोहे की 135 वस्तुएं प्राप्त की गई हैं। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा में उगाई जाने वाली फसलों के प्रमाण मिले हैं। हस्तिनापुर में केवल चावल और अजरंजीखेड़ा में गेहूँ और जौ के अवशेष मिले हैं। हस्तिनापुर से प्राप्त पशुओं की हड्डियों में घोड़े की हड्डियां भी हैं।

(2.) मध्य भारत: मध्य भारत में नागदा तथा एरण इस सभ्यता के प्रमुख स्थल हैं। इस युग में इस क्षेत्र में काले भाण्ड प्रचलित थे। पुराने ताम्रपाषाण युगीन तत्त्व इस काल में भी प्रचलित रहे। इस स्तर से 112 प्रकार के सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुछ नए मृद्भाण्डों का भी इस युग में प्रचलन रहा। घर कच्ची ईंटों से बनते थे। ताम्बे का प्रयोग छोटी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित था। नागदा से प्राप्त लोहे की वस्तुओं में दुधारी, छुरी, कुल्हाड़ी का खोल, चम्मच, चौड़े फलक वाली कुल्हाड़ी, अंगूठी, कील, तीर का सिरा, भाले का सिरा, चाकू, दरांती इत्यादि सम्मिलित हैं। एरण में लौहयुक्त स्तर की रेडियो कार्बन तिथियां निर्धारित की गई हैं जो ई.पू.100 से ई.पू.800 के बीच की हैं।

(3.) मध्य निम्न गंगा क्षेत्र: इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल पाण्डु राजार ढिबि, महिषदल, चिरण्ड, सोनपुर आदि हैं। यह अवस्था पिछली ताम्र-पाषाण-कालीन अवस्था के क्रम में आती है, जिसमें काले-लाल मृद्भाण्ड देखने को मिलते हैं। लोहे का प्रयोग नई उपलब्धि है। महिषदल में लौहयुक्त स्तर पर सूक्ष्म पाषाण उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। यहाँ से धातु-मल के रूप में लोहे की स्थानीय ढलाई का प्रमाण मिलता है। महिषदल में लोहे की तिथि ई.पू.750 लगभग की है।

(4.) दक्षिण भारत: दक्षिण भारत में प्रारंभिक कृषक समुदायों की बस्तियां ई.पू.3000 में दिखाई देती हैं। यहाँ मानव के आखेट संग्रहण अर्थव्यवस्था से, खाद्योत्पादक अर्थव्यवस्था की ओर क्रमबद्ध विकास के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त साक्ष्य संकेत देते हैं कि उस काल में गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा, पेनेरू तथा कावेरी नदियों के निकट मानव की बसावट हो चुकी थी। ये क्षेत्र शुष्क खेती तथा पशुचारण के लिए उपयुक्त थे।

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इस युग में पत्थरों की कुल्हाड़ियों को घिसकर तथा चमकाकर तैयार किया गया था। इस युग का उद्योग, पत्थरों की कुल्हाड़ियों का उद्योग कहा जा सकता है। इन बस्तियों के लोग ज्वार-बाजरा की खेती करते थे। इन बस्तियों में सभ्यता के तीन चरण मिले हैं- प्रथम चरण (ई.पू.2500 से ई.पू.1800) में पत्थर की कुल्हाड़ियां मिलती हैं। द्वितीय चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। दक्षिण भारत में नव-पाषाण-कालीन बस्तियां तथा ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। महाराष्ट्र में भी ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। ब्रह्मगिरि, पिक्लीहल, संगनाकल्लू, मास्की, हल्लूर, पोयमपल्ली आदि में भी ऐसी ही स्थिति थी। दक्षिणी भारत में लौह युग का प्राचीनतम चरण पिक्लीहल तथा हल्लूर की खुदाई एवं ब्रह्मगिरि के शवाधानों के आधार पर निश्चित किया गया है। इन शवाधानों के गड्ढों में पहली बार लोहे की वस्तुएं, काले एवं लाल मृद्भाण्ड तथा फीके रंग के भूरे तथा लाल भाण्ड प्राप्त हुए हैं।

ये मृदभाण्ड जोरवे के मृद्भाण्डों जैसे हैं। टेकवाड़ा (महाराष्ट्र) से भी ऐसे ही पाषाण प्राप्त हुए हैं। कुछ बस्तियों में पत्थरों की कुल्हाड़ियों एवं फलकों का प्रयोग, लौहकाल में भी होता रहा।

लौह युग का दक्षिण में प्रारंभ

कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम प्रयोग दक्षिण भारत में हुआ किंतु यह धारणा सही प्रतीत नहीं होती। उत्तर भारत में मिली आर्य-बस्तियों के आधार पर कहा जा सकता है कि लोहे का प्रयोग दक्षिण की बजाय उत्तर भारत में पहले हुआ। विद्वानों की धारणा है कि लौह-काल के लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र तक फैल गए। कालान्तर में मध्यप्रदेश के वनों को पार कर ये लोेग बंगाल की ओर चले गए।

दक्षिण में ताम्रकांस्य काल पर भ्रांति

प्रारंभिक खोजों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि दक्षिण में लौह संस्कृति का प्रारम्भ, पाषाण काल के बाद ही हो गया। दक्षिण में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया। हमारी राय में यह कहना उचित नहीं है कि दक्षिण भारत में पाषाण काल के बाद सीधा ही लौह काल आ गया।

दक्षिण भारत की कृषक बस्तियों के दूसरे चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद के काल में लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। अतः यह कैसे कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – लौह एवं महापाषाण संस्कृतियाँ

लौह युगीन संस्कृति

महापाषाण संस्कृति

यह भी देखें-

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

महापाषाण संस्कृति

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महापाषाण संस्कृति

महापाषाण संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही।

दक्षिण भारत के कई स्थानों से महापाषाणीय शवाधान (मेगालिथस्) प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति के लोग मृतकों को समाधियों में गाड़ते थे तथा उनकी सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े पाषाणों का प्रयोग करते थे। इस कारण इन्हें वृहत्पाषाण अथवा महापाषाण संस्कृति कहा गया है। इन शवाधानों की खुदाइयों में लोहे के औजार, हथियार तथा उपकरण प्रचुरता से मिलते हैं।

महापाषाण संस्कृति का काल निर्धारण

महापाषाण संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही। माना जाता है कि दक्षिण भारत में लौह युग आरंभ होने के साथ ही महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण की परम्परा आरंभ हुई। ब्रह्मगिरि से प्राप्त महापाषाणीय शवाधानों का काल-निर्धारण ई.पू. तीसरी सदी से ई.पू. पहली सदी के बीच किया गया है। इस प्रकार इस संस्कृति का काल निर्धारण अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है।

महापाषाण संस्कृति के प्रमुख क्षेत्र

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इस तरह के शवाधान महाराष्ट्र में नागपुर के पास, कर्नाटक में मास्की, आंध्र प्रदेश में नागार्जुन कोंडा तथा तमिलनाडु में अदिचलाल्लूर तथा केरल में पाई गई है। महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के तरीकों ने बस्तियों की योजनाओं को भी प्रभावित किया किंतु खेती और पशुचारण के काम परम्परागत रूप से होते रहे। मद्रास के तिन्नेवेली जिले के आदिचल्लूर नामक स्थान से कुछ पात्र मिले हैं। इन पात्रों में हथियार, औजार, आभूषण और अन्य सामग्री रख दी जाती थी। इस प्रकार के पात्रों का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है। ब्रह्मगिरि, कोयम्बटूर जिले के सुलर, पाण्डिचेरी के अरिकमेडु से भी महापाषाणीय शवाधान मिले हैं। उत्तर भारत: इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में भी देखने को मिलते हैं। उत्तरी गुजरात के दारापुट में एक महापाषाणिक रचना मिली है जो एक प्राचीन चैत्य भी हो सकती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में कराची जिले के कलक्टर कैप्टेन प्रीडी ने कहा था कि सम्पूर्ण पर्वतीय जिले में बड़ी संख्या में प्रस्तर की कब्रें मौजूद हैं जो हमारी पश्चिमी सीमा तक बढ़ आई हैं। इन कब्रों में द्वार का अभाव है अन्यथा ये शेष बातों में दक्षिण भारत की कब्रों के समान ही हैं।

ई.1871 से 1873 की अवधि में कार्लाइल ने पूर्वी राजथान का दो बार भ्रमण किया। उन्होंने फतहपुर सीकरी के पास अनेक संगोरा शवाधानों की उपस्थिति का उल्लेख किया परन्तु वे महापाषाणिक शवाधान नहीं हैं। वे प्रस्तरों के आयताकार ढेर हैं जिनमें प्रस्तरों के ही छोटे शवाधान कक्ष बने हुए हैं। इन शवाधानों की छतें भी प्रस्तरों की हैं। इन संगोरों में अधिकतर राख एवं निस्तप्त हड्डियां भरी हुई हैं।

कार्लाइल ने देवसा में भी महापाषाण समूहों को देखा था। कश्मीर के बुर्झामा नामक स्थान पर भी महापाषाणिक पांच विशालाकाय पत्थर मिले हैं। इन्हें ई.पू.400 से ई.पू 300 के बीच रखा गया होगा।

महापाषाण शवाधानों का निर्माण

महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के कई तरीके देखने में आते हैं। कभी-कभी मृतकों की हड्डियां बड़े कलशों में जमा करके गड्ढे में गाड़ी जाती थीं। इस गड्ढे को ऊपर से पत्थरों अथवा केवल पत्थर से ढंक दिया जाता था। कभी-कभी दोनों ही तरीके अपनाए जाते थे। कलश तथा गड्ढों में कुछ वस्तुएं रखी जाती थीं। कुछ शवों को पकाई हुई मिट्टी की शव पेटिकाओं में भी रखा जाता था। कुछ मामलों में मृतक के शवाधान पत्थरों से बनाए गए हैं। ग्रेनाइट पत्थरों की पट्टिकाओं से बने ताबूतनुमा शवाधानों में भी शवों को दफनाया गया है। भारत में चार प्रकार के महापाषाण-युगीन शवाधानों के अवशेष मिले हैं-

(1.) संगौरा वृत्त

इस प्रकार के शवाधान अनेक गोलाकार पत्थरों को सम्मिलित कर बनाए गए हैं। इन संगौरा वृत्तों को देखकर लगता है कि उस समय शव को लोहे के औजारों, मृत्तिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की अस्थियों के साथ दफना दिया जाता था। उसके बाद समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगौरा वृत्त नयाकुण्ड बोरगांव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।

(2.) ताबूत

यह भी अंत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में मिलते हैं।

(3.)  मैनहरि

इस प्रकार के शवाधानों में शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था जो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इन स्तम्भाकार पत्थरों की लम्बाई 1.5 मीटर से 5.5 मीटर तक पाई जाती है। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के मास्की और गुलबर्गा क्षेत्रों से मिली हैं।

(4.) महापाषाण तुम्ब

इस प्रकार के शवाधानों के निर्माण में सर्वप्रथम पत्थर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी रखी जाती थी। उपरोक्त बनावट किसी मेज का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तुम्ब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के ब्रह्मगिरि एवं तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थानों पर प्रायः देखी गई हैं।

(5.) अन्य समाधियां

उपरोक्त चार प्रकार की समाधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के शवाधान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाए गए हैं। डॉ. विमलचंद्र पाण्डेय ने आठ प्रकार के महापाषाणीय शवाधानों का वर्णन किया है- (1) सिस्ट समाधि, (2) पिट सर्किल, (3) कैर्न सर्किल, (4) डोल्पेन, (5) अम्ब्रेला स्टोन, (6) हुड स्टोन, (7) कन्दराएं और (8) मोहिर।

शवाधानों से प्राप्त सामग्री

इन शवाधानों से जो सामग्री मिली है उसका प्रयोग तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत तथा दक्षिण भारत में किया जाता था। कुछ विशेष प्रकार के बर्तन भी पाए गए हैं। इन शवाधानों से प्राप्त, ‘पायों वाले प्याले’ ठीक वैसे ही हैं जैसे कि उन दिनों की तथा उनसे भी पुरानी भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र तथा ईरान की कब्रों से मिले हैं। घोड़ों की हड्डियां और घोड़ों से सम्बन्धित सामग्री का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि घुड़सवारी वाले लोग इस क्षेत्र में पहुँच गए थे। घोड़ों को दफनाने के उदाहरण नागपुर के निकट जूनापानी से प्राप्त होते हैं। ये महापाषाणीय उदाहरण विशेष रूप से मृतकों के अंतिम संस्कार के तरीके तथा देशी एवं विदेशी परम्पराओं का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।

महापाषाण संस्कृति की लौह सामग्री

महापाषाणीय युग के स्थलों, विदर्भ में नागपुर के निकट जूनापानी से लेकर दक्षिण में आदिचनल्लूर तक लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में लोहे की वस्तुएं समान रूप से पाई गई हैं। लोहे की विभिन्न प्रकार की वस्तुएं, जैसे चपटी लोहे की कुल्हाड़ियां, जिसमें पकड़ने के लिए लोहे का दस्ता होता था, फावड़े, बेल्चे, खुरपी, कुदालें, हंसिये, फरसे, फाल, सब्बल, बरछे, छुरे, छैनी, तिपाइयां, स्टैण्ड, तश्तरियां, लैम्प, कटारें, तलवारें, तीर के फल तथा बरछे के फल, त्रिशूल आदि प्राप्त हुए हैं।

इन औजारों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। जैसे- घोड़े के सामान जिनमें लगाम का लोहे का वह हिस्सा जो घोड़े के मुंह में होता है, फंदे के आकार वाली नाक तथा मुंह पर लगाने वाली छड़ें आदि। धातु की अन्य वस्तुओं में सबसे अधिक संख्या में पशुओं की गर्दन में बांधी जाने वाली ताम्र व कांस्य की घंटियां प्राप्त हुई हैं। इस संस्कृति के लोग काले व लाल रंग के बर्तनों का उपयोग करते थे।

दक्षिण भारत की महापाषाण सभ्यता से चित्रित धूसर भाण्ड परम्परा के साथ लोहे के जो उपकरण मिले हैं, उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि इस सभ्यता के मानव द्वारा लौह उपकरणों का उपयोग सीमित कार्य के लिए ही किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

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महापाषाण संस्कृति

वैदिक सभ्यता

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वैदिक सभ्यता

वैदिक सभ्यता संसार की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह देखकर आश्चर्य होता कि आज से 10 हजार साल पहले के युग में भी मानव ने इतनी उत्कृष्ट सभ्यता का विकास किया।

वैदिक सभ्यता एवं साहित्य की सत्य के प्रति ललक को ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की इस ऋचा से समझा जा सकता है- न मुझे दाहिने का ज्ञान है और न बाएं, न मैं पूर्व दिशा को जानता हूँ और न पश्चिम को। मेरी बुद्धि परिपक्व नहीं है, मैं हताश तथा व्याकुल हूँ। यदि आप मेरा पथ प्रदर्शन करें तो मुझे इस प्रसिद्ध अभय ज्योति का ज्ञान हो जाएगा।

प्राचीन आर्यों की बस्तियां यूरोप से लेकर मध्य एशिया एवं भारत में सप्त-सिंधु प्रदेश तथा सरस्वती के तट तक पाई गई हैं किंतु आर्यों की सभ्यता का इतिहास निश्चत रूप से इन बस्तियों से भी पुराना है। आर्यों का प्राचीनतम साहित्य ई.पू. 2500 से मिलना आरम्भ हो जाता है किंतु संभव है कि भारत में आर्य इस अवधि से भी पहले से रह रहे हों।

प्राचीन आर्य संस्कृति के बारे में जानने के दो तरह के स्रोत उपलब्ध हैं-

(1.) पुरातत्त्व सामग्री: मृदभाण्ड, मुद्राएं, अस्त्र-शस्त्र, भवनावशेष आदि।

(2.) वैदिक साहित्य: वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, सूत्र।

वैदिक-काल

वैदिक-काल, उस काल को कहते हैं जिसमें आर्यों ने वैदिक ग्रन्थों की रचना की। ये ग्रन्थ एक दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमिक विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना हुई। वेदों की रचना के बाद उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थ रचे गए। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों की संख्या और उनका स्वरूप जब इतना विशाल हो गया कि उन्हें कंठस्थ करना कठिन हो गया तो उन्हें संक्षिप्त स्वरूप देने के लिए सूत्रों की रचना हुई।

इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना में सहस्रों वर्ष लगे। विद्वानों की मान्यता है कि वैदिक साहित्य की रचना ई.पू.4,000 से ई.पू.600 के बीच हुई। इसलिए इस काल को वैदिक-काल कहा जाता है तथा इस काल की आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है।

वैदिक सभ्यता का काल विभाजन

वैदिक-काल को दो भागों में विभक्त किया गया है-

(1) ऋग्वैदिक-सभ्यता ( ई.पू.4,000 से ई.पू.1000 )

चारों वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसलिए ऋग्वेद काल की सभ्यता सर्वाधिक पुरानी है। ऋग्वेद के रचनाकाल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। पी. वी. काणे आदि कुछ विद्वान इस ग्रंथ को ई.पू.4000 से ई.पू.2500 के बीच रचा गया मानते हैं तो मैक्समूलर आदि विद्वान इसका रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं। ऋग्वेद काल में आर्य लोग सप्त-सिन्धु क्षेत्र (सिन्धु, सरस्वती, परुष्णी, वितस्ता, शतुद्रि, अस्किनी, विपाशा नदियों का क्षेत्र) में निवास करते थे। इस काल की सभ्यता को ऋग्वैदिक सभ्यता कहते हैं।

(2) उत्तर-वैदिक सभ्यता (ई.पू.1000 से ई.पू.600)

उत्तर-वैदिक काल में यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् रचे गए। इनमें से अथर्ववेद की रचना ई.पू.1000 के आसपास हुई जबकि ब्राह्मण-ग्रंथ एवं आरण्यक ई.पू.600 तक रचे जाते रहे। उपनिषदों की रचना ई.पू. से ई.पू. के बीच हुई। इस काल में आर्य सभ्यता सरस्वती, दृशद्वती तथा गंगा नदियों के मध्य की भूमि में पहुँच गई थी और आर्यों ने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र था। उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों की सभ्यता का यहीं विकास हुआ। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना इसी क्षेत्र में हुई। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक सभ्यता का क्रमशः विकास होता गया और इसमें अनेक परिवर्तन होते चले गए।

(3) सूत्रकाल

वैदिक सभ्यता एवं साहित्य में तीसरा युग सूत्रकाल के नाम से अभिहित किया जा सकता है। उत्तर-वैदिक ग्रंथों की रचना सूत्र-ग्रंथों की रचना के आरम्भ होने के साथ समाप्त होती है। सूत्रों की रचना ई.पू.600 से ई.पू.200 तक हुई। इस अवधि को सूत्रकाल कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वेद

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वेद

वेद संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। आश्चर्य होता कि आज से 10 हजार साल पहले के युग में भी मानव ने इतनी उत्कृष्ट भाषा का विकास किया, इतनी उत्कृष्ट संस्कृति को जन्म दिया एवं इतने उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया!

वैदिक ग्रन्थों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) वेद अथवा संहिता (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद),

(2.) ब्राह्मण-ग्रंथ (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद),

(3.) सूत्र (श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र)।

प्रथम दो अर्थात् संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुति भी कहा गया है। श्रुति का अर्थ है जो सुना गया हो। प्राचीन आर्यों का विश्वास था कि संहिता और ब्राह्मण किसी मनुष्य की कृति नहीं थे। उनमें दिए गए उपदेशों को ऋषियों तथा मुनियों ने ब्रह्मा के मुख से सुना था। इसी से इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है।

इन ग्रन्थों में दिए गए उपदेश ब्रह्म-वाक्य हैं इसलिए वे सर्वथा सत्य हैं। उन पर संदेह नहीं किया जा सकता। संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में जो उपदेश दिए गए हैं वे बहुत लम्बे हैं। अतः आर्य-विद्वानों ने जन-साधारण के लिए उपदेशों को संक्षेप में छोटे-छोटे वाक्यों में लिख दिया। इन्हीं रचनाओं को ‘सूत्र’ कहते हैं। सूत्र का अर्थ है- ‘संक्षेप में कहना।’ इन ग्रन्थों में बड़ी-बड़ी बातें संक्षेप में लिखी गई हैं इसलिए इन्हें सूत्र कहा गया।

(1.) वेद अथवा संहिता

वेद संस्कृत की विद् धातु से निकला है जिसका अर्थ है- जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। वेद उन ग्रन्थों को कहते हैं जो ज्ञान की प्राप्ति के एकमात्र साधन समझे जाते थे। वेद-वाक्य ब्रह्म-वाक्य होने के कारण चिरन्तन सत्य थे और उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने से इहलोक तथा परलोक दोनों ही सुधरता था। अर्थात् इस संसार में सुख की प्राप्ति होती थी और मृत्यु हो जाने पर मोक्ष मिलता था। वेदों का भारतीयों के जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। वेद भारतीय धर्म और संस्कृति का शाश्वत और अक्षय कोष हैं।

 वेदों को संस्कृत-साहित्य की जननी कहा जाता है। सिन्धु-घाटी की सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी तथा आर्य-सभ्यता का निर्माण वैदिक आर्यों द्वारा किया गया था। वेदों को हम भारतीय समाज का प्राण कह सकते हैं जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता था। वेदों के उपरान्त जितने साहित्य लिखे गए उन सब का आधार वेद ही है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। प्राचीन आर्यों द्वारा  केवल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद की रचना की गई। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘वेद-त्रयी’ अथवा ‘त्रयी’ कहा गया। अथर्ववेद बहुत बाद का है जो सबसे अन्त में लिखा गया।

प्रारम्भ में वेदों का पठन-पाठन मौखिक था। विभिन्न आश्रमों के ऋषि-मुनि अपने-अपने ढंग से इनका पाठ करते थे। इस कारण विभिन्न पाठ-परम्पराएँ चल पड़ीं। गुरु-शिष्य परम्परा एवं पिता-पुत्र परम्परा द्वारा ये मंत्र ऋषि कुलों में स्थिर रहते थे और श्रुति द्वारा शिष्य, गुरु से या पुत्र, पिता से जानता था। इस कारण  उन्हें श्रुति भी कहा जाता था।

 विविध ऋषिकुलों में जो विविध सूक्त, श्रुति द्वारा चले आते थे, धीरे-धीरे उन्हें संकलित किया जाने लगा। इस महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रधान श्रेय महाभारत कलीन महर्षि वेदव्यास को है। उन्होंने वैदिक सूक्तों को एकत्रित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद को संहिता बद्ध किया। जब वेदों को लिखित रूप में संहिताबद्ध कर दिया गया तब इन्हें ‘संहिता’ कहा जाने लगा। संहिता का अर्थ होता है- संग्रह। चूँकि इन ग्रन्थों में मन्त्रों का संग्रह है, इसलिए इन्हें संहिता कहा गया।

(1.) ऋग्वेद

यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ऋक् तथा वेद। ऋक् का अर्थ होता है स्तुति-मन्त्र। स्तुति-मन्त्र को ऋचा भी कहते हैं। जिस वेद में स्तुति मन्त्रों अर्थात् ऋचाओं का संग्रह किया गया है उसे ऋग्वेद कहते हैं। सूर्य, वायु, अग्नि आदि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। इसलिए ये ऋचाएँ इन्हीं देवताओं की स्तुति में लिखी गयीं। ऋचाओं का संग्रह किसी एक ऋषि ने नहीं किया। वरन् वे विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न समय में संकलित की गईं। ऋग्वेद दस मण्डलों अथवा भागों में विभक्त है।

प्रत्येक मण्डल कई अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक् का अर्थ होता है जो बाद में कहा गया है। चूँकि इनका स्थान मण्डल के बाद है, इसलिए इन्हें अनुवाक् कहा गया है। प्रत्येक अनुवाक् कई सूक्तों में विभक्त है। सूक्त का अर्थ होता है अच्छी उक्ति अर्थात् जो अच्छी प्रकार कहा गया हो। ऋग्वेद में 10 मण्डल हैं जिनमें 1028 सूक्त हैं। प्रत्येक सूक्त कई ऋचाओं अर्थात् स्तुति-मन्त्रों में विभक्त है, ऋचाओं की कुल संख्या 10,580 है।

प्रत्येक सूक्त के साथ किसी ऋषि और देवता का नाम भी मिलता है। वस्तुतः ऋषि ही उस सूक्त का रचयिता होता था। इस प्रकार के ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्धाज और वशिष्ठ के नाम उल्लेखनीय हैं। मंत्र रचयिता ऋषियों में कुछ स्त्रियों के नाम भी हैं जिनमें लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलोमी और काक्षवृति के नाम उल्लेखनीय हैं। पहले, नौवें तथा दसवें मण्डल के प्रत्येक सूक्त के रचनाकार अलग-अलग ऋषि हैं। सम्भवतः ये ऋषि वैदिक सूक्तों के मूल लेखकों के पुराण पुरुष हैं।

नौवें मण्डल के सूक्त केवल सोम से सम्बद्ध हैं। कहीं-कहीं मण्डल के स्थान पर अष्टक शब्द का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद के अधिकांश सूक्त देव-स्तुति और प्रार्थना रूप में हैं तथा यज्ञ और कर्मकाण्ड प्रधान हैं। यज्ञों में सुगन्धित सामग्री की आहुति देकर आर्य ऋषि, देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना करते थे।

ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी रचना सम्भवतः 4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक के काल में हुई थी। यद्यपि ऋग्वेद स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है जिनका प्रधानतः धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व है तथापि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्त्व है क्योंकि इस काल का इतिहास जानने के लिए यही ग्रन्थ एकमात्र साधन है। कुछ मन्त्रों से आर्यों के पारस्परिक तथा अनार्यों से किए गए युद्धों का पता लगता है। यह भारत ही नही, वरन् विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इसकी प्राचीनता के कारण ही भारत का मस्तक विश्व की समस्त संस्कृतियों में सबसे ऊँचा है। इसकी रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई।

मैक्समूलर ने लिखा है- ‘विश्व के इतिहास में वेद उस रिक्त स्थान की पूर्ति करता है जिसे किसी भी भाषा का कोई भी साहित्यिक ग्रन्थ नहीं भर सकता। यह हमें अतीत के उस काल में पहुँचा देता है जिसका कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता और उस पीढ़ी के लोगों के वास्तविक शब्दों से परिचित करा देता है जिसका हम इसके अभाव में केवल धुधंला ही मूल्यांकन कर सकते थे।’

(2.) यजुर्वेद

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यह दो शब्दों से मिलकर बना है- यजुः तथा वेद। यज् शब्द का अर्थ होता है यजन करना। यजुः उन मन्त्रों को कहते थे जिसके द्वारा यजन अथवा पूजन किया जाता था अर्थात् यज्ञ किए जाते थे। इसलिए यजुर्वेद उस वेद को कहते हैं जिसमें यज्ञों का विधान है। मूलतः यह कर्म-काण्ड प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में बलि की प्रथा, उसकी महत्ता तथा विधियों का वर्णन है। यजुर्वेद में सूक्तों के साथ-साथ अनुष्ठान भी हैं जिन्हें सस्वर पाठ करते जाने का विधान है। ये अनुष्ठान अपने समय की उन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के परिचायक हैं जिनमें इनका उद्गम हुआ था। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग शुक्ल यजुर्वेद कहलाता है जो स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है और दूसरा भाग कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है जिसमें पूर्व साहित्य का संकलन है। शुक्ल यजुर्वेद को ‘वाजसनेयी संहिता’ भी कहते है। पाठ भेद के कारण इसकी दो शाखाएँ है- ‘कृण्व’ और ‘माध्यन्दनीय’। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाओं का उल्लेख मिलता है- काठक संहिता, कपिष्ठक संहिता, मैत्रेयी संहिता और तैतिरीय संहिता। इन सब में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें चालीस अध्याय हैं जिनमें से प्रत्येक का सम्बन्ध किसी न किसी याज्ञिक अनुष्ठान से है। अन्तिम अध्याय ‘इशोपनिषद’ है जिसका सम्बन्ध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्म चिन्तन से है।

यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में हुए थी। इस वेद की ऐतिहासिक उपयोगिता भी है। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन की झांकी मिलती है। इस वेद से ज्ञात होता है कि अब आर्य, सप्त-सिन्धु से कुरुक्षेत्र में चले आए थे तथा अब प्रकृति-पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और वर्ण-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हो गया था। इस प्रकार यजुर्वेद, ऋग्वैदिक-काल के बाद, आर्यों के जीवन में आए परिवर्तनों को भी प्रकट करता है।

(3.) सामवेद

साम के दो अर्थ होते हैं- शान्ति तथा गीत। यहाँ पर साम का अर्थ है गीत। इसलिए सामवेद का अर्थ हुआ वह वेद जिसके पद गेय हैं और जो संगीतमय हैं। सामवेद में केवल 66 मन्त्र नए हैं। शेष मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। सामवेद के मन्त्र गेय होने के कारण मन को शान्ति देते हैं। यज्ञादि अवसरों पर इन मन्त्रों का पाठ किया जाता है। पाठ-भेद के कारण इसकी तीन  शाखाएँ हैं- कौथुम शाखा, राणायीनय शाखा और जैमिनीय शाखा।

(4.) अथर्ववेद

‘अथ’ का अर्थ होता है मंगल अथवा कल्याण, अथर्व का अर्थ होता है अग्नि और अथर्वन् का अर्थ होता है पुजारी। इसलिए अथर्ववेद उस वेद को कहते है जिसमें पुजारी मन्त्रों तथा अग्नि की सहायता से भूत-पिशाचों से रक्षा कर मनुष्य का मंगल अथवा कल्याण करते हैं। इसकी रचना प्रथम तीन वेदों की रचना के बहुत बाद में हुई। अथर्ववेद की दो शाखाएँ मिलती हैं- शौनक और पिप्लाद। इसमें चालीस अध्याय हैं और इसका सम्बन्ध मुख्यतः आर्यों के घरेलू जीवन से है।

 अथर्ववेद में बहुत से प्रेतों तथा पिशाचों का उल्लेख है जिनसे बचने के लिए मन्त्र दिए गए हैं। विपत्तियों और व्याधियों के निवारण के लिए भी मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। ये मन्त्र जादू-टोने की सहायता से मनुष्य की रक्षा करते हैं। इस ग्रन्थ में कुछ मन्त्र ऋग्वेद के हैं और कुछ सामवेद के। यह आर्यों के पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें आर्येतर लोगों के विश्वासों तथा प्रथाओं की भी जानकारी मिलती है।

(2.) ब्राह्मण ग्रंथ

ब्राह्मण, ‘ब्रह्म’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है वेद। इसलिए ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते है जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गई है। इनमें यज्ञों के स्वरूप तथा उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। चूँकि यज्ञ करने तथा कराने का कार्य पुरोहित करते थे जो ब्राह्मण होते थे, इसलिए केवल ब्राह्मणों से संबंधित होने के कारण इन ग्रन्थों का नाम ब्राह्मण रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना ‘ब्रह्मर्षि देश’ में हुई थी।

ब्राह्मण ग्रन्थों के दो भाग हैं- (1.) विधि और (2.) अर्थनाद अर्थात् आख्यानों, पुराणों और इतिहास द्वारा नियमों के अर्थ की व्याख्या।

प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण हैं। ऋग्वेद के कौषितकी या सांख्यायान और ऐतरेय ब्राह्मण हैं। कृष्ण यजुर्वेद का तैतिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण है। शतपथ ब्राह्मण एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें एक सौ अध्याय हैं। इसके रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। इस ग्रंथ में याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन है तथा विविध अनुष्ठानों के प्रयोजनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

सामवेद के तीन ब्राह्मण हैं- ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविश ब्राह्मण और जैमिनीय ब्राह्मण। सामवेद के छान्दोग्य के मंत्र ब्राह्मण एवं सामविधान ब्राह्मण हैं। अर्थवेद का गोपथ ब्राह्मण है।

यद्यपि ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना याज्ञिकों के पथ-प्रदर्शन के लिए की गई थी तथापि इनसे आर्यों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना प्रधानतः गद्य में की गई है परन्तु कहीं-कहीं पद्य भी विरल रूप से मिलते हैं। इनकी भाषा परिष्कृत तथा उच्च कोटि की है।

आरण्यक तथा उपनिषद् भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। ब्राह्मणों के परिशिष्ट ‘आरण्यक’ कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग ‘उपनिषद’ हैं।

आरण्यक

आरण्यक उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनकी-रचना ‘अरण्यों’ अर्थात् ‘जंगलों’ के शान्त वातावरण में हुई और जिनका अध्ययन-चिन्तन भी जंगलों में एकान्तवास में किया जाना चाहिए। ये ग्रन्थ वानप्रस्थाश्रमियों के लिए होते थे। वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर लोग जंगलों में चले जाते थे और वहीं पर चिन्तन तथा मनन किया करते थे। आत्मा क्या है, सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ, सृष्टि किन तत्त्वों से बनी है, सृष्टि का नियन्त्रक कौन है, परमसत्ता का स्वरूप कैसा है, इस प्रकार के गूढ़ विषयों का चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों में किया गया है। अध्यात्म-चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता है।

उपनिषद्

यह तीन शब्दों से मिलकर बना है- उप+नि+षद्। उप का अर्थ होता है समीप, नि का अर्थ होता है नीचे और षद् का अर्थ होता है बैठना। इसलिए उपनिषद् उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनका अध्ययन गुरु के समीप नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिए। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भाग में आते हैं। ये ज्ञान प्रधान ग्रन्थ हैं। इनमें उच्च कोटि का दार्शनिक विवेचन मिलता है। उपनिषदों की तुलना में संसार में कोई अन्य श्रेष्ठ दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है।

उपनिषदों से हमें ज्ञात होता है कि इस युग में वर्ण तथा वर्णाश्रम व्यवस्था दृढ़ रूप से स्थापित हो गए थे तथा मानव की सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया था।

उपलब्ध उपनिषद ग्रन्थों की संख्या लगभग दो सौ है किन्तु उनमें से केवल बारह का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके नाम हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषितकी और श्वेताश्वतर। अधिकांश उपनिषद ई.पू.1000 से ई.पू.300 के बीच की अवधि में रचे गए। विभिन्न काल-खण्डों में रचे जाने के कारण उपनिषदों की भाषा, कथन-शैली तथा वैचारिक पृष्ठभूमि में अंतर है।

उपनिषदों का प्रमुख विषय ‘दर्शन’ है। वेदों में ज्ञान-मार्ग सम्बन्धी जो बातें पाई जाती है, उन्हीं का विकास आगे चलकर उपनिषदों के रूप में हुआ। वस्तुतः उपनिषद्, वेद के उन स्थलों की व्याख्या है जिनमें यज्ञों से अलग हटकर ऋषियों ने जीवन के गहन तत्त्वों पर विचार किया गया है। दूसरे शब्दों में, उपनिषद आर्य मस्तिष्क के धर्म से दर्शन की ओर झुकाव का परिणाम हैं। इनकी प्रवृत्ति उपासना से ध्यान की ओर, यज्ञ से चिन्तन की ओर तथा बाह्य प्रकृति की आराधना से अन्तरात्मा की खोज की ओर है।

ये ब्रह्मज्ञान के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष तथा सृष्टि आदि के सम्बन्ध में उपनिषदों में व्यक्त विचार ही शंकर के दर्शन के मूल में है। उपनिषद ही वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों- अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि को मूल सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। गीता में भी उपनिषदों का सार है। बौद्ध और जैन मतों के अधिकांश सिद्धान्त भी इन्हीं पर आधारित हैं। वर्तमान समय में हिन्दू-धर्म के प्रमुख सिद्धान्त भी उपनिषदों से ही लिए गए हैं।

जर्मन विद्वान शोपेन हावर ने लिखा है- ‘सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को उँचा उठाने वाला कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। इनसे मुझे जीवन में शान्ति मिली है। इन्हीं से मृत्यु के समय भी शान्ति मिलेगी।’

(3.) सूत्र

सूत्र का शाब्दिक अर्थ होता है धागा। इसलिए सूत्र उन ग्रन्थों को कहते हैं जो इस प्रकार लिखे जाते थे मानो कोई चीज धागे में पिरो दी गई हो। और उनमें एक क्रम स्थापित हो गया हो। जब वैदिक साहित्य का रूप अत्यन्त विशाल हो गया तो उसे कंठस्थ करना बहुत कठिन हो गया। इसलिए एक ऐसी रचना-शैली का विकास किया गया जिसमें वाक्य तो छोटे-छोटे हों परन्तु उनमें बड़े-बड़े भावों तथा विचारों का समावेश हो। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहा गया। महर्षि पाणिनि ने सूत्रों की तीन विशेषताएँ बताई हैं-

(1.) वे कम अक्षरों में लिखे जाते हैं,

(2.) वे असंदिग्ध होते हैं और

(3.) वे सारगर्भित होते हैं।

सूत्र साहित्य के तीन भाग हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्रों में वैदिकयुगीन यज्ञों और उनके वर्गीकरण का समावेश है, गृह्य सूत्रों में गार्हस्थिक संस्कार, अनुष्ठान, आचार-विचार और कर्मकाण्ड का वर्णन है तथा धर्म सूत्रों में धार्मिक नियम, राजा-प्रजा के कर्त्तव्य और अधिकार, सामाजिक वर्ण प्रधान भेद, आश्रम आदि विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख है।

सूत्रों में कल्प-सूत्र सर्वाधिक महत्त्व का है। सूत्रों की रचना करने वालों में महर्षि पाणिनि प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों की रचना 700 ई.पू. से 200 ई.पू. के बीच हुई। सूत्रों में आर्यों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का भी पर्याप्त परिचय मिलता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वेदांग

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प्राचीन ऋषि

वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, उपनिषद, आरण्यक एवं ब्राह्मण ग्रंथों पर हम पिछले अध्याय में चर्चा कर चुके हैं। इस अध्याय में वेदांग पर चर्चा की जा रही है।

विपुल वैदिक साहित्य अर्थात् वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक एवं उपनिषदों को पढ़ने एवं उनके गूढ़ अर्थ को समझने के लिए शिक्षा, छन्द, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और कल्प नामक छः विधाएं बनाई गईं जिन्हें वेदांग कहते हैं। पाणिनी के अनुसार, व्याकरण वेद का मुख है, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त श्रोत्र, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द दोनों पैर हैं।

वेदांग

शिक्षा

इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। अर्थात् वे मंत्रों में प्रयुक्त स्वरों, व्यंजनों एवं विशिष्ट ध्वनियों का उच्चारण कैसे किया जा सकता है, इसका अध्ययन वेदांग की ‘शिक्षा’ नामक शाखा में करवाया जाता है।

कल्प

वेदों में यज्ञयाग आदि कर्मकांड के उपदेश आए हैं, किस यज्ञ में किन मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए, किसमें कौन सा अनुष्ठान किस रीति से करना चाहिए, इत्यादि कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि कल्पसूत्र ग्रंथों में है। इसलिए कर्मकांड की पद्धति जानने के लिए कल्पसूत्र ग्रंथों के अध्ययन की आवश्यकता होती है। यज्ञ यागादि का ज्ञान ‘श्रौतसूत्र’ से होता है और षोडश संस्कारों का ज्ञान ‘स्मार्तसूत्र’ से मिलता है।

वैदिक कर्मकांड में यज्ञों का बहुत विस्तार है। प्रत्येक यज्ञ की विधि श्रौतसूत्र से देखनी होती है। इसलिए अनेक श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं। स्मार्तसूत्र सोलह संस्कारों का वर्णन करते हैं, इसलिए ये भी पर्याप्त विस्तृत हैं। श्रौतसूत्रों में यज्ञयाग के नियम हैं और स्मार्तसूत्रों में अर्थात् गृह्यसूत्रों में उपनयन, जातकर्म, विवाह, गर्भाधान, आदि षोडश संस्कारों का विधि विधान दिया गया है। कल्प की तीसरी शाखा ‘धर्मसूत्र’ कहलाती है।

व्याकरण

व्याकरण से प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। आचार्य वररुचि ने व्याकरण के पाँच प्रयोजन बताए हैं- (1) रक्षा (2) ऊह (3) आगम (4) लघु तथा (5) असंदेह।

(1) व्याकरण के अध्ययन का उद्देश्य वेदों की रक्षा करना है।

(2) ऊह का अर्थ है-कल्पना। वैदिक मन्त्रों में न तो लिंग है और न ही विभक्तियाँ। लिंगों और विभक्तियों का प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो व्याकरण का ज्ञाता हो।

(3) आगम का अर्थ है- श्रुति। श्रुति कहती है कि ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि वह वेदों का अध्ययन करे।

(4) लघु का अर्थ है- शीघ्र उपाय। वेदों में अनेक ऐसे शब्द हैं जिनकी जानकारी एक जीवन में सम्भव नहीं है। व्याकरण वह साधन है जिससे समस्त शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है।

(5) असंदेह का अर्थ है- संदेह न होना। संदेहों को दूर करने वाला व्याकरण होता है, क्योंकि वह शब्दों का समुचित ज्ञान करवाता है।

निरुक्त

वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में हुआ है, निरूक्त में उनके उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख किया गया है। शब्द की उत्पत्ति तथा व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह निरुक्त बताता है। यास्काचार्य का निरुक्त प्रसिद्ध है। इसको शब्द-व्युत्पत्ति-शास्त्र भी कह सकते हैं। वेद का यथार्थ अर्थ समझने के लिए निरुक्त को जानने की अत्यंत आवश्यकता है।

ज्योतिष

वेदमंत्रों में नक्षत्रों का जो वर्णन हुआ है, उसे ठीक प्रकार से समझने के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान करवाया जाता है। इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अर्थ वेदांग ज्योतिष से है। अंतरिक्ष में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि ग्रह किस प्रकार गति करते हैं, सूर्य, चंद्र आदि के ग्रहण कब होंगे, अन्य तारकों की गति कैसी होती है आदि का ज्ञान ज्योतिष शास्त्र में करवाया जाता है।

इस प्रकार वेदांगों का ज्ञान वेद का उत्तम बोध होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

छन्द

वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, वृहती आदि छंदों का ज्ञान छंद-शास्त्र से होता है। इस शास्त्र में मुख्यतः यह बताया जाता है कि प्रत्येक छंद के पाद कितने होते हैं और ह्रस्व-दीर्घ आदि अक्षर प्रत्येक पाद में कैसे होने चाहिए। छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है-

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्

तस्मात्सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

उपनिषदों का चिंतन

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उपनिषदों का चिंतन

उपनिषदों का चिंतन संसार का सबसे गंभीर दार्शनिक चिंतन है। इसमें ईश्वर तथा जीव के परस्पर सम्बन्धों को जानने का प्रयास किया गया है। मुण्डक उपनिषद में कहा गया है कि दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर रहते हैं, उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, दूसरा पक्षी फल नहीं खाता अपितु अपने सखा को देखता है। इस श्लोक में फल खाने वाला पक्षी जीव है और उसे देखने वाला ईश्वर। ये साथ-साथ रहते हैं। 

ई.पू.600 के आसपास, उत्तर-वैदिक-काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। आरण्यकों ने यज्ञीय प्रक्रिया से स्वतंत्र तथा ज्ञान की श्रेष्ठता से सम्पन्न जिस ‘तत्त्व चिंतन प्रधान धर्म’ की प्रवृत्ति आरम्भ की थी उसका चरमोत्कर्ष उपनिषदों में हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा अनेक उपनिषदों की रचना हुई। इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया।

उपनिषदों का चिंतन

ऋग्वेद में बहुदेववाद के साथ-साथ एक ही परम शक्ति का भी किंचित् वर्णन किया गया था। उपनिषद् काल में यह चिंतन निष्कर्ष तक पहुँच गया। इस सृष्टि से परे एक अपरिवर्तनशील शक्ति है जिसे ‘ब्रह्म’ कहा गया। वह इस सृष्टि का निर्माता, नियंत्रणकर्ता और संहारकर्ता है। यह ‘परमात्मा’ आत्मा के रूप में सभी जीवों में निवास करता है। व्यक्ति की मृत्यु के बाद यह आत्मा नए शरीर में प्रवेश करता है।

इस प्रकार आत्मा बार-बार नए शरीर धारण करता हुआ अपने सत्कर्मों के बल पर अपने बंधनों से मुक्त होकर पुनः परमात्मा से युक्त हो जाता है। इस चिंतन के अनुसार कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता। किसी भी प्रकार का उचित या अनुचित कर्म परिपक्व होकर फलदायी अवश्य होता है। इसी कर्मफल को भोगने के लिए आत्मा को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। कर्म और आत्मा के इन सिद्धांतों के साथ मोक्ष का सिद्धांत जुड़ा हुआ है जो कि मनुष्य मात्र का अंतिम गंतव्य है।

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उपनिषदों का चिंतन जीवए सृष्टिए आत्मा आदि के सम्बन्ध में बड़े स्तर पर तार्किक एवं बौद्धिक विवेचन प्रस्तुत करता है। याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा ‘आत्मन्’ को पहचानने और ‘आत्मन्’ तथा ‘ब्रह्म’ के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया। ‘ब्रह्मा’ सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला। आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला। मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाता है? इस प्रश्न ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को जन्म दिया। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य का अगला जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है। अच्छी और बुरी योनि के विचार ने स्वर्ग और नर्क की अवधारणा को जन्म दिया। इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया। मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया।

ज्ञान, विश्वास, संयम, सत्य और श्रद्धा आदि उत्तम गुणों से सम्पन्न तपस्वी तथा सन्यासी मृत्यु के बाद देवयान से जाकर ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त कर लेता है। कर्त्तव्यपालन तथा यज्ञादि करने वालो गृहस्थ मृत्यु के बाद पितृयान से जाकर चन्द्रमा में पहुँचता है।

अपना उत्तम कर्मफल समाप्त होने पर वह पुनः पृथ्वी पर पहले पौधे के रूप में और फिर द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य) के रूप में जन्म लेता है। पापाचरण में रत व्यक्ति मर कर पुनः शूद्र वर्ण में अथवा कुत्ते आदि की योनि में जन्म लेता है, ये सारी धारणाएं इस युग में स्थापित हुईं।

मृत्यु के सम्बन्ध में धार्मिक विश्वासों ने इस युग के धर्म को निराशावादी बना दिया तथा संसार को दुःखमय मानकर त्यागने के लिए प्रेरित किया। वैदिक युग के आर्यों का धर्म आशावादी तथा आनंदपूर्ण था, उसमें मोक्ष की धारण और चिंता नहीं थी। उत्तर-वैदिक युग के धर्म में स्वर्ग की प्राप्ति का विश्वास था किंतु उपनिषद् युग में धर्म का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति बन गया। मोक्ष के सम्मुख इहलोक के सुख या आनंद का कोई मूल्य नहीं था। वृहदारण्यक उपनिषद् में यह तथ्य बहुत मार्मिक रूप में समझाया गया है।

वानप्रस्थ ग्रहण करते समय याज्ञवल्क्य ऋषि ने अपनी सम्पत्ति अपनी दोनों पत्नियों- कात्यायनी तथा मैत्रेयी में बांट दी। मैत्रेयी ने याज्ञवलक्य से पूछा- ‘यदि धन सम्पत्ति, गायों से भरी यह पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊंगी?’

 याज्ञवलक्य के मना करने पर मेत्रैयी ने कहा- ‘जिस धन सम्पत्ति से मैं अमर नहीं होती, उसे लेकर मैं कया करूंगी? इसलिए आप मुझे ज्ञान ही दे दीजिए।’ मैत्रेयी के इस सम्भाषण से प्रसन्न होकर याज्ञवलक्य ने उसे आत्मत्तव का ज्ञान दिया।

उपनिषद् तथा सूत्र युग के धर्म में नैतिकता का स्तर पूर्ववत् ही उच्च था। इस काल में नैतिकता पर सर्वाधिक बल दिया गया। सत्य, तप, श्रद्धा, दृढ़संकल्प, शुचिता, शरीर, वाणी और मन का संयम इन्द्रियों का वशीकरण, पापाचरण से विरति आदि से ही मनुष्य कर्म बंधन से छूटकर मोक्ष पद का अधिकारी बन जाता है।

प्रत्येक मनुष्य से उच्च नैतिकता की अपेक्षा करने के कारण इस काल में तीन ऋणों- पितृऋण, देवऋण तथा ऋषिऋण से उऋण होने तथा प्रतिदिन पंच महायज्ञ- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा भूतयज्ञ करने को धार्मिक कार्यों में सम्मिलित किया गया। उपनिषद्कालीन ज्ञान और तपस्या पर बल देने वाली धार्मिक विचारधारा के साथ-साथ ब्राह्मण ग्रंथों की यज्ञीय कर्मकाण्ड की धारा भी इस युग में बनी रही।

असंख्य पशुबलि तथा अनेक दीर्घकालिक यज्ञों की संख्या नगण्य रह गई किंतु फिर भी अनेक प्रकार के यज्ञ किए जाते रहे। श्रौतसूत्रों तथा गृह्यसूत्रों से इस धार्मिक प्रक्रिया का ज्ञान होता है।

इस काल में रचे गए धर्मसूत्रों ने समाज को प्राणवान इकाई के रूप में ग्रहण किया था, व्यक्ति को नहीं। समाज का उत्कर्ष एवं अभ्युत्थान ही चरम लक्ष्य था। राजा हो या प्रजा, सभी के कर्त्तव्यों का निर्धारण धर्म के रूप में किया गया था। महत्व कर्त्तव्य का था, अधिकार का नहीं। इन कर्त्तव्यों का सफल पालन ही मनुष्य जीवन का चरम ध्येय था और वह उसी से मोक्ष प्राप्त कर सकता था। कर्त्तव्य और धर्म की इस पृष्ठभूमि में धर्मसूत्रों में शासन तथा राजनीति का विवेचन हुआ है।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर वैदिक धर्म तथा उपनिषद काल के धर्म में निम्नलिखित अंतर स्पष्ट किए जा सकते हैं-

1. वेदों का बहुदेववाद, इस युग में एकेश्वरवाद में परिणत हो गया।

2. धर्म के तात्विक चिंतन ने दर्शन को जन्म दिया।

3. पुनर्जन्म, मोक्ष और कर्मवाद के सिद्धांत प्रतिपादित हुए।

4. मृत्यु के पश्चात् कालीन जीवन के लिए स्वर्ग एवं नर्क की अवधारण पुष्ट हुई।

5. उच्च नैतिक गुणों एवं सत्कर्मों पर बहुत बल दिया गया।

उपनिषद कालीन धर्म की कठिनाइयाँ

ऋग्वेद काल में धर्म का स्वरूप सरल एवं सहज स्फूर्त था, ब्राह्मण ग्रंथों के काल में धर्म बाह्याडम्बर तथा कर्मकाण्ड बोझिल हो गया। उपनिषद काल में धर्म के उस आडम्बर-प्रधान कर्मकाण्ड तथा यज्ञों का विरोध करके निर्गुण ब्रह्म, आत्मा, कर्म, मोक्ष आदि का प्रतिपादन किया गया किंतु धर्म का यह रूप भी मनुष्यों को संतुष्ट नहीं कर सका। उपनिषदों का इन्द्रियातीत निर्गुण ब्रह्म इतना अधिक गूढ़ तथा सूक्ष्म था कि स्थूल बुद्धि जनसामान्य के लिए वह अगम्य तथा दुर्बोध था।

इसके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि आदि जो साधन बताए गए थे, वे स्वयं में इतने कष्टसाध्य थे कि जन-सामान्य द्वारा उनका पालन करना अत्यंत दुष्कर था। सांसारिक मोहमाया का त्याग करके परिव्राजक या सन्यासी बनकर ब्रह्मप्राप्ति करना अधिकांश जनता के लिए दुराशा मात्र ही था। इसलिए धर्म के स्वतंत्र चिंतकों ने जीवन के विभिन्न प्रश्नों और धर्म के विभिन्न दृष्टिकोणों पर पुनः विचार किया।

जो आश्रम व्यवस्था उपनिषद् काल में सुनिश्चित हो चुकी थी, उसके अंतिम दो चरण वानप्रस्थ तथा सन्यास इस चिंतन के लिए सर्वाधिक उपादेय बने। उनके कारण भारत का आध्यात्मिक तथा धार्मिक नेतृत्व ऋषियों एवं ब्राह्मणों के हाथों से निकलकर वानप्रस्थी परिव्राजकों और सन्यासियों के हाथों में चला गया। इस कारण देश में अनेक नवीन धार्मिक मत-मतांतर उत्पन्न होने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक साहित्य का महत्त्व

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वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक साहित्य का महत्त्व न केवल उसकी प्राचीनता के कारण है अपितु इस बात में भी है कि वैदिक साहित्य में उच्च कोटि का दर्शन, विज्ञान एवं अध्यात्म बीज रूप से उपलब्ध है। इसमें सृष्टि के निर्माण, ईश्वर के अस्तित्व एवं मानव जीवन के उद्देश्य आदि विषयों पर अत्यंत गंभीर जानकारी दी गई है।

(1.) विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान

वैदिक ग्रन्थों का, विशेषतः ऋग्वेद का विश्व इतिहास में सर्वोच्च स्थान है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना भारत की पवित्र भूमि में हुई। इन ग्रन्थों के कारण विश्व की समस्त संस्कृतियों में भारत का मस्तक सबसे ऊँचा है। ये ग्रन्थ सिद्ध करते हैं कि भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति, विश्व में सर्वाधिक प्राचीन है। पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति से आलोक प्राप्त हुआ।

(2.) उत्कृष्ट जाति के इतिहास की झांकी

वैदिक साहित्य से, उत्कृष्ट आर्य-जाति की झांकी प्राप्त होती है। आर्यों का विश्व की विभिन्न जातियों में ऊँचा स्थान है। यह जाति शारीरिक बल, मानसिक प्रतिभा तथा आध्यात्मिक चिन्तन में अन्य जातियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ रही है इसलिए जिन ग्रन्थों में इन आर्यों के जीवन की झांकी मिलती है वे निश्चय ही बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

(3.) प्रारम्भिक आर्यों का इतिहास जानने का एकमात्र साधन

आर्यों के मूल-स्थान तथा उनके प्रारम्भिक जीवन का परिचय प्राप्त करने का एकमात्र साधन वैदिक ग्रन्थ हैं। यदि ये ग्रन्थ उपलब्ध न होते तो भारतीय आर्यों का सम्पूर्ण प्रारम्भिक इतिहास अन्धकारमय होता और उसका कुछ भी ज्ञान हमें प्राप्त नहीं हो सकता था।

(4.) हमारे पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब

वैदिक ग्रन्थ हमारे पूर्वजों के जीवन का प्रतिबिम्ब हैं। इनका अध्ययन करने से हमें अपने पूर्वजों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन का परिचय मिलता है। यदि वैदिक ग्रन्थ न होते तो हमें भी किसी बर्बर तथा असभ्य जाति की सन्तान कहा जा सकता था परन्तु इन ग्रन्थों ने हमें अत्यन्त सभ्य तथा सुसंस्कृत जाति की सन्तान होने का गौरव प्रदान किया है।

(5.) वैदिक धर्म के स्रोत

वैवैदिक साहित्य ही प्राचीन वैदिक आर्यों के धर्म को जानने का मूल स्रोत है। वर्तमान समय में हिन्दू धर्म को जो भी आंतरिक स्वरूप है, उसका आधार वैदिक साहित्य ही है।

(6.) हमारी सभ्यता का मूलाधार

वैदिक ग्रन्थ ही हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के मूलाधार तथा प्रबल स्तम्भ हैं। जिन आदर्शों तथा सिद्धान्तों का इन ग्रन्थों में निरूपण किया गया है वे आदर्श तथा सिद्धांत भारतीयों के जीवन के पथ-प्रदर्शक बन गए। इन ग्रन्थों ने हमारे जीवन को सुंदर सांचे में ढाल दिया। यद्यपि भारत पर अनेक बर्बर जातियों के आक्रमण हुए जिन्होंने इसको बदलने का प्रयत्न किया परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। अनेक शताब्दियों के बीत जाने पर भी हमारे जीवन के आदर्श तथा सिद्धान्त वही हैं जिन्हें वैदिक ऋषियों तथा मुनियों ने निर्धारित किया था।

(7.) हिन्दू-धर्म का प्राण

वैदिक ग्रन्थ हिन्दू-धर्म के प्राण हैं। हिन्दू-धर्म के मूल सिद्धान्तों का दर्शन हमें वैदिक ग्रन्थों में ही होता है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य वास्तव में धर्ममय है। इसका कारण यह है कि ऋषियों ने भौतिक जीवन की अपेक्षा आध्यात्मिक जीवन को अधिक महत्त्व दिया था। वे इस जगत को नाशवान तथा निस्सार समझते थे। इसी से उन्होंने जीवन के प्रत्येक अंग पर धर्म की छाप डाल दी। हमारे ऋषियों ने समाज को धर्म की एक ऐसे लकुटी प्रदान की जिसके सहारे यह समाज आज तक सुरक्षित चला आ रहा है।

(8.) आध्यात्मिक विवेचन के कोष

वैदिक ग्रन्थ आध्यात्मिक विवेचन के विशाल कोष हैं। विश्व की किसी भी जाति के इतिहास में इतने विस्तृत तथा गहन रूप से आघ्यात्मिक विवेचन नहीं हुआ जितना वैदिक ग्रन्थों में हुआ है।

(9.) हिन्दू समाज के स्तम्भ

वैदिक ग्रन्थों को हम हिन्दू समाज का स्तम्भ कह सकते हैं। वैदिक ऋषियों ने हमारे समाज को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए दो व्यवस्थाएँ की थीं। इनमें से एक थी वर्ण-व्यवस्था और दूसरी थी वर्णाश्रम धर्म इन्हीं दोनों स्तम्भों पर भारतीय समाज को खड़ा किया गया था और इन्हीं का अनुसरण कर समाज का चूड़ान्त विकास किया जाना था।

(10.) भारतीय भाषाओं की जननी

वैदिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। संस्कृत से ही भारत की अधिकांश भाषाएँ निकली हैं। भारत की समस्त भाषाओं पर संस्कृत का थोड़ा-बहुत प्रभाव अवश्य पड़ा है। वास्तव में आर्य-परिवार की समस्त भाषाएँ इसकी पुत्रियां हैं तथा संस्कृत उनकी जननी है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

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वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर के कई कारण हैं जिनमें से सबसे बड़ा कारण यह है कि वैदिक सभ्यता के जनक हिमालय पर्वत की तरफ से सप्तसिंधु क्षेत्र में आए आर्य थे जबकि द्रविड़ सभ्यता के जनक भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए हुए द्रविड़ थे।

वर्तमान समय में राखीगढ़ी आदि की खुदाई से प्रमाण मिले हैं कि जिन द्रविड़ों को भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से भारत में आया हुआ बताया जा रहा है, वस्तुतः वे भारत से भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की तरफ गए थे। आर्यों की तरह द्रविड़ों का भी मूल निवास क्षेत्र भारत भूमि ही थी।

सामान्यतः विद्वानों में यह धारणा प्रचलित है कि दक्षिण की द्रविड़ सभ्यता के जनक पश्चिमी भारत के सिंधु क्षेत्र में रहने वाले सैंधव थे। जबकि कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी प्रमाणित किया है कि दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता को जन्म देने वाले भी मूल रूप से आर्य ही थे। वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर नृवंश की भिन्नता के कारण नहीं है, अपितु स्थान की भिन्नता के कारण है। इन विद्वानों के अनुसार सिंधुघाटी सभ्यता के जनक भी आर्य ही थे।

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनमें कई अन्तर दिखाई देते हैं। मुख्य अंतर इस प्रकार से हैं-

(1.) काल सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता, वैदिक सभ्यता से अधिक प्राचीन है। माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता, वैदिक सभ्यता से लगभग दो हजार वर्ष अधिक पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता है जबकि वैदिक सभ्यता लौह युगीन सभ्यता है।

(2.) नृवंशीय अंतर

द्रविड़ लोग छोटे, काले तथा चपटी नाक वाले होते थे परन्तु आर्य लोग लम्बे, गोरे तथा सुन्दर शरीर के होते थे।

(3.) स्थान सम्बन्धी अंतर

सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में पनपी। इसकी बस्तियां पंजाब में हड़प्पा से लेकर सिंध में मोहनजोदड़ो, राजस्थान में कालीबंगा तथा गुजरात में सुत्कांगडोर तक मिली हैं जबकि आर्य सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में पनपी तथा इसका विस्तार गंगा-यमुना के दोआब, मध्य भारत तथा पूर्व में बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व तक पाया गया है।

(4.) सभ्यताओं के स्वरूप में अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता नगरीय तथा व्यापार प्रधान थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण तथा कृषि प्रधान थी। सिन्धु-घाटी के लोगों को सामुद्रिक जीवन प्रिय था और वे सामुद्रिक व्यापार में कुशल थे परन्तु आर्यों को स्थलीय जीवन अधिक प्रिय था। सिंधु घाटी की सभ्यता एवं संस्कृति उतनी उन्नत तथा प्रौढ़ नहीं थी जितनी आर्यों की थी।

(5.) सामाजिक व्यवस्था में अन्तर

द्रविड़ों का कुटुम्ब मातृक था अर्थात् माता कुटुम्ब की प्रधान होती थी, परन्तु आर्यों का कुटुम्ब पैतृक था जिसमें पिता अथवा कुटुुम्ब का अन्य कोई वयोवृद्ध पुरुष प्रधान होता था।

(6.) विवाह पद्धति में अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों में चचेरे भाई-बहिन में विवाह हो सकता था, परन्तु आर्यों में इस प्रकार के विवाहों का निषेध था।

(7.) उत्तराधिकार सम्बन्धी परम्पराओं में अंतर

सिन्धु-घाटी सभ्यता के निवासी, अपनी माता के भाई की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे। जबकि आर्य, अपने पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे।

(8.) जाति-व्यवस्था में अन्तर

सिंधु घाटी के लोगों में जाति-व्यवस्था नहीं थी जबकि आर्यों के समाज का मूलाधार जाति-व्यवस्था थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्य अलग-अलग निश्चित थे।

(9.) आवास सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग नगरों में पक्की ईटों के मकान बनाकर रहते थे किंतु वैदिक आर्य गाँवों में बांस के पर्ण-कुटीर बनाकर रहते थे।

(10.) धातुओं के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग पाषाण उपकरणों के साथ-साथ सोने-चांदी का प्रयोग करते थे तथा लोहे से अपरिचित थे परन्तु वैदिक-काल के आर्य प्रारम्भ में सोने तथा ताम्बे का और बाद में चांदी, लोहे तथा कांसे का भी प्रयोग करने लगे थे।

(11.) अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग युद्ध कला में प्रवीण नहीं थे। इसलिए उनके अस्त्र-शस्त्र साधारण कोटि के थे। वे युद्ध क्षेत्र में कवच (वर्म) तथा शिरस्त्राण आदि का उपयोग नहीं करते थे जबकि वैदिक आर्य युद्ध कला में अत्यंत प्रवीण थे तथा युद्ध क्षेत्र में आत्मरक्षा के लिए कवच और शिरस्त्राण आदि का प्रयोग करते थे।

(12.) भोजन में अन्तर

सिन्धु सभ्यता के लोगों का प्रधान आहार मांस-मछली था। वैदिक आर्य भी प्रारम्भ में मांस-भक्षण करते थे, परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में मांस भक्षण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा।

(13.) पशुओं के ज्ञान तथा महत्त्व में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग बाघ तथा हाथी से भली-भांति परिचित थे किंतु ऊँट तथा घोड़े से अपरिचित थे। सिन्धु-घाटी के लोग साण्ड को गाय से अधिक महत्त्व देते थे। वैदिक आर्य बाघ तथा हाथी से अनभिज्ञ थे। वेदों में हाथी का बहुत कम उल्लेख है। वैदिक आर्य घोड़े पालते थे जिन्हें वे अपने रथों में जोतते थे तथा युद्ध में काम लेते थे। वैदिक-काल के आर्य गाय को पवित्र मानते थे और उसे पूजनीय समझते थे।

(14.) धार्मिक धारणा में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोगों में मूर्ति-पूजा की प्रतिष्ठा थी। वे शिव तथा शक्ति की पूजा करते थे और देवी को देवता से अधिक ऊँचा स्थान प्रदान करते थे। वे लिंग-पूजक थे तथा अग्नि को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते थे। वैदिक आर्यों ने भी देवी-देवताओं में मानवीय गुणों का आरोपण किया था परन्तु वे मूर्ति-पूजक नहीं थे। ऋग्वैदिक-काल के आर्यों में शिव को कोई स्थान प्राप्त नहीं था तथा वे लिंग-पूजा के विरोधी थे। आर्य लोग सर्वशक्तिमान दयालु ब्रह्म को मानते थे तथा अग्नि-पूजक थे। उनके प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी।

(15.) कला के ज्ञान में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग लेखन-कला से परिचित थे और अन्य कलाओं में भी अधिक उन्नति कर गए थे, परन्तु प्रारम्भिक आर्य सम्भवतः लेखन-कला से परिचित नहीं थे और अन्य कलाओं में भी उतने प्रवीण नहीं थे परन्तु काव्य-कला में वे सैंधवों से बढ़कर थे।

(16.) लिपि एवं भाषागत अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों की लिपि अब तक नहीं पढ़ी जा सकी है किंतु अनुमान है कि वह एक प्रकार की चित्रलिपि थी। इस लिपि के अब तक नहीं पढ़े जाने के कारण सिन्धु-घाटी की भाषा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हो सकी है जबकि आर्यों की लिपि वर्णलिपि तथा भाषा संस्कृत थी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में पर्याप्त अन्तर था। दोनों सभ्यताओं का अलग-अलग कालों में और विभिन्न लोगों द्वारा विकास किया गया था परन्तु दोनों ही सभ्यताएँ, भारत की उच्च कोटि की सभ्यताएँ थीं। दोनों सभ्यताओं में इतना अन्तर होने पर शताब्दियों के सम्पर्क से दोनों ने एक दूसरे की संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया और उनमें साम्य हो गया। यह साम्य आज भी भारत की संस्कृति पर दिखाई पड़ता है।

सैंधव एवं आर्य सभ्यताओं के अनसुलझे प्रश्न

सिंधु सभ्यता एवं आर्य सभ्यता के सम्बन्ध में पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि-

1.  सिंधु सभ्यता नगरीय सभ्यता है।

2.  हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम सिंधु सभ्यता है क्योंकि यह सभ्यता, सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में पनपी।

3.  सैंधव सभ्यता, आर्य सभ्यता से लगभग दो हजार साल पुरानी थी।

4.  सिंधु सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे।

5.  सिंधु सभ्यता के लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

6.  सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया (ईराक) के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

7.  भारत में आने से पहले आर्य ईरान में रहते थे।

8.  आर्यों ने सैंधव लोगों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियों को नष्ट कर दिया। आर्य ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि आर्यों के पास तेज गति की सवारी के लिए घोड़े तथा लड़ने के लिए लोहे के हथियार थे।

यदि पश्चिमी इतिहासकारों की उपरोक्त बातों को स्वीकार कर लिया जाये तो इतिहास में अनेक उलझनें पैदा हो जाती हैं। इनमें से कुछ विचारणीय बिंदु शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सहायता के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं-

1.  अब तक सैंधव सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज की गई है। इनमें से केवल 6 नगर हैं, शेष गांव हैं। ऐसी स्थिति में सैंधव सभ्यता को नगरीय सभ्यता कैसे कहा जा सकता है?

2.  सिंधु सभ्यता के स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाए गए हैं न कि सिंधु नदी की घाटी में। अतः इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता कैसे हो सकता है?

3.  यदि सिंधुसभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे तो सिंधु घाटी तथा मेसोपाटिमया का मार्ग, ईरान अथवा उसके आसपास से होकर जाने का रहा होगा जहाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियां थीं। तब सैंधव लोग, घोड़े एवं लोहे से परिचित क्यों नहीं हुए?

4.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था, तो इस दौरान युद्ध, बीमारी एवं स्वाभाविक मृत्यु से घोड़े भी मरे होंगे किंतु पूरी सैंधव सभ्यता के क्षेत्र से घोड़ों की केवल दो संदिग्ध मूर्तियाँ मिली हैं तथा एक घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंन्धवों पर न तो आक्रमण किए और न उन्हें नष्ट किया।

5.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था तो उनके द्वारा प्रयुक्त लोहे के कुछ हथियार युद्ध के मैदानों अथवा सैंधव बस्तियों में गिरे होंगे अथवा छूट गए होंगे अथवा टूटने के कारण आर्य सैनिकों द्वारा फैंक दिए गए होंगे किंतु सैंधव बस्तियों से लोहे के हथियार नहीं मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण नहीं किया।

6.  आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे भारत में लोहा लाए। यदि ऐसा था तो लौह-बस्तियां सबसे पहले उत्तर भारत में स्थापित होनी चाहिए थीं किंतु आर्यों के आने के बाद उत्तर भारत में ताम्र कालीन बस्तियां बसीं जबकि उसी काल में दक्षिण भारत में लौह बस्तियां बस रही थीं। यह कैसे हुआ कि भारत में लोहे को लाने वाले आर्यों की बस्तियां उत्तर भारत में थीं जबकि लौह बस्तियां दक्षिण भारत में बस रही थीं ?

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि –

1.  सैंधव सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता अथवा सरस्वती सभ्यता कहा जाना चाहिए।

2.  सैंधव सभ्यता, लोहे एवं घोड़े से अपिरिचित रही होगी किंतु वह लोहे के हथियारों से सुसज्जित एवं घोड़ों पर बैठकर आने वाले आर्यों के आक्रमणों में नष्ट हुई इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं।

3.  यूरोपीय इतिहासकारों को यह सिद्धांत प्रतिपादित करना था कि ब्रिटेन वासियों की तरह आर्य भी भारत में बाहर से आए हैं, इसलिए उन्होंने सैंधव सभ्यता को आर्यों के आक्रमण में नष्ट होने का मिथक गढ़ा।

4.  सुदूर संवेदी उपग्रहों द्वारा उपलब्ध कराए गए सिंधु तथा सरस्वती नदी के प्राचीन मार्गों के चित्र बताते हैं कि सरस्वती नदी द्वारा कई बार मार्ग बदला गया। इससे अनुमान होता है कि इसी कारण सिंधु सभ्यता की बस्तियां भी अपने प्राचीन स्थानों से हटकर अन्यत्र चली गई होंगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

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ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म स्वयं को प्रकृति का आभारी समझता था इस काल का मानव समझ गया था कि प्रकृति की अनुकूलता से ही मानव का जीवन संभव है। इसलिए ऋग्वैदिक समाज पूर्णतः धर्म पर आधारित था।

हे आदित्य, हे मित्र, हे वरुण, हे इन्द्र! आपके प्रति मैंने बहुत अपराध किए हैं; उन्हें क्षमा करें और मुझे उस अभय-ज्योति का वरदान दें जिससे मुझे अज्ञान का क्लेश न सताए। -ऋग्वेद, 2.27.14.

भारत में ऋग्वैदिक सभ्यता का प्राकट्य सर्वप्रथम सप्त-सिंधु क्षेत्र तथा सरस्वती नदी के निकट दिखाई देता है। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव प्रदेश तथा सरस्वती नदी का अनेक मंत्रों में गुण-गान किया गया है। यद्यपि अब सरस्वती नदी विद्यमान नहीं है और उसे प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अदृश्य मान लिया गया है परन्तु उन दिनों वह सतजल तथा कुरुक्षेत्र के मध्य बहती थी।

ऋग्वैदिक आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था

यद्यपि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रन्थ है तथापि उसकी अनेक ऋचाओं में उस काल की राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है। ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म एक सुव्यवस्थित राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देने में सफल रहे थे।

दस्युओं अथवा आर्य-पूर्वों से संघर्ष

ऋग्वेद में वर्णित इंद्र यद्यपि देवताओं का राजा है तथापि इन्द्र ने आर्यों के शत्रुओं को अनेक बार हराया। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ होता है दुर्गों को तोड़ने वाला परन्तु आर्य-पूर्वों के इन दुर्गों को पहचान पाना सम्भव नहीं है। आर्यों के शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्रों के बारे में भी बहुत कम जानकारी मिलती है।

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इनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति के लोगों की बस्तियां हो सकती हैं परन्तु आर्यों की सफलता के बारे में संदेह नहीं है। इस सफलता का मुख्य कारण वे रथ थे जिनमें घोड़े जोते जाते थे। आर्यों के साथ ही पश्चिमी एशिया और भारत में घोड़ों का आगमन हुआ। आर्य सैनिक सम्भवतः कवच (वर्म) पहनते थे और उनके हथियार श्रेष्ठ थे। ऋग्वेद से जानकारी मिलती है कि ‘दिवोदास’ ने, जो भरत कुल का आर्य राजा था, ‘शंबर’ को हराया था। शंबर एक दस्यु राजा था जिसने आकाश में नब्बे, निन्यानवे अथवा सौ दुर्गों का निर्माण किया था। आकाश में दुर्ग निर्माण के उल्लेख से अनुमान होता है कि शंबर कोई पर्वतीय अनार्य राजा था जिसने पर्वतों पर बड़ी संख्या में दुर्गों का निर्माण किया था। ऋग्वेद के दस्यु सम्भवतः इसी पर्वतीय देश के मूल निवासी थे, और इन्हें हराने वाला योद्धा, एक आर्य-मुखिया था। यहाँ दिवोदास के नाम के साथ दास शब्द जुड़ा हुआ है जिससे अनुमान होता है कि यह आर्य-मुखिया, दासों से तो सहानुभुति रखता था, किन्तु दस्युओं का कट्टर शत्रु था। ऋग्वेद में दस्युहंता शब्द का बार-बार उल्लेख आया है दस्यु सम्भवतः लिंग-पूजक थे और दूध-दही, घी आदि के लिए गाय, भैंस नहीं पालते थे।

पंच-जनों का युद्ध

प्राचीन आर्यों का कोई संगठित राज्य नहीं था। आर्य छोटे-छोटे राज्यों (जन) में विभक्त थे जिनमें परस्पर वैमनस्य था। फलतः आर्यों को न केवल अनार्यों से युद्ध करना पड़ा वरन् उनमें आपस में भी युद्ध होता था। इस प्रकार आर्य दोहरे संघर्ष में फंसे हुए थे। आर्यों के भीतर के संघर्ष के कारण उनके जीवन में लंबे समय तक उथल-पुथल मची रही।

पांच प्रमुख कबीलों अथवा पंचजनों की आपस में लड़ाइयां हुईं और इसके लिए उन्होंने आर्येतर लोगों की भी सहायता ली। ‘भरत’ और ‘तृत्सु’ आर्य जन थे तथा ‘वसिष्ठ’ नामक ऋषि उनके पक्षधर थे। भरत नाम का उल्लेख पहली बार ऋग्वेद में आया है। इसी नाम के आधार पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

दाशराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध

ऋग्वैदिक उल्लेख के अनुसार सरस्वती नदी के किनारे भारत नामक जन (राज्य) था, जिस पर सुदास नामक राजा शासन करता था। विश्वामित्र, राजा सुदास के पुरोहित थे। राजा तथा पुरोहित में अनबन हो जाने के कारण राजा सुदास ने विश्वामित्र के स्थान पर वसिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया। इससे विश्वामित्र बड़े अप्रसन्न हुए। उन्होंने दस राजाओं को संगठित करके, राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

दस राजाओं के इस समूह में पांच आर्य-राजा थे और पांच अनार्य-राजा थे। भरतों और दस राजाओं का जो युद्ध हुआ उसे ‘दाशराज्ञ युद्ध’ कहते हैं। यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ। इसमें भरत कुल के राजा सुदास की विजय हुई और भरतों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। जिन कबीलों की हार हुई उनमें पुरुओं का कबीला सबसे महत्त्वपूर्ण था।

कुरुओं का उदय

कालांतर में ‘भरतों’ और ‘पुरुओं’ का मेल हुआ और परिणामतः ‘कुरुओं’ का एक नया शासक कबीला अस्तित्त्व में आया। कुरु बाद में ‘पांचालों’ के साथ मिल गए और उन्होंने उत्तरी गंगा की द्रोणी में अपना शासन स्थापित किया। उत्तर-वैदिक-काल में उन्होंने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यों में परस्पर अन्य युद्ध भी हुए।

ऋग्वेद कालीन राजनीतिक संस्थाएं

(1.) गोप अथवा राजन्य

ऋग्वैदिक-काल की राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार कुटुम्ब था जो पैतृक होता था। कुटुम्ब को आधुनिक इतिहासकारों ने कबीला कहकर पुकारा है। कुटुम्ब का प्रधान, पिता अथवा अन्य कोई बड़ा-बूढ़ा पुरुष होता था जो कुटुम्ब के अन्य सदस्यों पर नियन्त्रण रखता था। कई कुटुम्बों को मिला कर एक ग्राम बनता था। ग्राम का प्रधान ‘ग्रामणी’ कहलाता था। कई ग्रामों को मिला कर ‘विस’ बनता था। विस का प्रधान ‘विसपति’ कहलाता था। कई विसों को मिला कर ‘जन’ बनता था। जन का रक्षक ‘गोप’ अथवा ‘राजन्य’ कहलाता था।

(2.) उत्तराधिकार की परम्परा

ऋग्वैदिक-काल का राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक था। ऋग्वेद में अनेक राजन्यों का उल्लेख मिलता है। राजन्य का पद आनुवंशिक था और वह उसे उत्तराधिकार के नियम से प्राप्त होता था। अर्थात् राजन्य के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था। राजन्य का पद यद्यपि वंशानुगत होता था, तथापि समिति अथवा सभा द्वारा किए जाने वाले चुनावों के बारे में भी सूचना मिलती है।

राज्य में राजन्य का स्थान सर्वोच्च था। वह सुन्दर वस्त्र धारण करता था और भव्य राज-भवन में निवास करता था जिसमें राज्य के बड़े-बड़े पदाधिकारी, पण्डित, गायक तथा नौकर-चाकर उपस्थित रहते थे। चूँकि उन दिनों गमनागमन के साधनों का अभाव था इसलिए राज्य बहुत छोटे हुआ करते थे।

(3.) राजन्य के कर्त्तव्य

राजन्य को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है। वह गोधन की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की आराधना करता था। प्रजा की रक्षा करना, शत्रुओं से युद्ध करना, राज्य में शान्ति स्थापित करना और शान्ति के समय यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, राजन्य के मुख्य कर्त्तव्य होते थे।

राजन्य अपनी प्रजा की न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का अपितु आध्यात्मिक उन्नति का भी ध्यान रखता था। राजन्य अपनी प्रजा के आचरण की देखभाल के लिए गुप्तचर रखता था जो प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में राजन्य को सूचना देते थे। राजन्य, आचरण-भ्रष्ट प्रजा को दण्डित करता था।

(4.) राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

राजन्य की सहायता के लिए बहुत से पदाधिकारी होते थे जिनमें पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी आदि प्रमुख थे।

पुरोहित

समस्त पदाधिकारियों में पुरोहित का स्थान सबसे ऊँचा था। उसका पद प्रायः वंशानुगत होता था परन्तु कभी-कभी वह किसी अन्य कुटुम्ब से भी चुन लिया जाता था। पुरोहित को बहुत से कर्त्तव्य करने होते थे। वह राजन्य का धर्मगुरु तथा परामर्शदाता होता था।

इसलिए राज्य में उसका बड़ा प्रभाव रहता था। वह रण-क्षेत्र में भी राजन्य के साथ जाता था और अपनी प्रार्थनाओं तथा मन्त्रों द्वारा राजन्य की विजय का प्रयत्न करता था। ऋग्वैदिक-काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र नामक दो प्रमुख पुरोहित हुए। उन्होंने राजाओं का पथ-प्रदर्शन किया और बदले में गायों और दासियों के रूप में भरपूर दक्षिणाएं प्राप्त कीं।

सेनानी

राज्य का दूसरा प्रमुख अधिकारी सेनानी होता था। वह भाला, कुल्हाड़ी, कृपाण आदि का उपयोग करना जानता था। वह सेना का संचालन करता था। उसकी नियुक्ति सम्भवतः राजन्य स्वयं करता था। जिन युद्धों में राजन्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं समझी जाती थी, उनमें सेनानी ही सेना का प्रधान होता था जो रण-क्षेत्र में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था।

ग्रामणी

ग्रामणी तीसरा प्रधान पदाधिकारी था। वह गाँव के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी होता था। आरम्भ में ग्रामणी योद्धाओं के एक छोटे समूह का नेता होता था परन्तु जब गांव स्थायी रूप से बस गए तो ग्रामणी गांव का मुखिया हो गया और कालांतर में उसका पद व्राजपति के समकक्ष हो गया।

कुलप

परिवार अथवा कुल का मुखिया कुलप कहलाता था।

व्राजपति

गोचर-भूमि के अधिकारी को व्राजपति कहा गया है। वह युद्ध में कुलपों और ग्रामणियांे का नेतृत्व करता था।

(5.) युद्ध-विधि

भारत में ऋग्वैदिक आर्यों की सफलता के दो प्रमुख कारण थे- घोड़ों से चलने वाले रथ और लोहे से बनने वाले हथियार। युद्ध में समस्त सक्षम-पुरुषों को भाग लेना पड़ता था। साधारण लोग पैदल युद्ध करते थे परन्तु राजन्य तथा क्षत्रिय लोग रथों पर चढ़कर युद्ध करते थे। युद्ध में आत्म-रक्षा के लिए कवच आदि का प्रयोग किया जाता था।

आक्रमण करने का प्रधान शस्त्र धनुष-बाण था परन्तु आवश्यकतानुसार भालों, फरसों तथा तलवारों का भी प्रयोग किया जाता था। ध्वजा, पताका, दुन्दुभि आदि का भी प्रयोग किया जाता था। युद्ध प्रायः नदियों के तट पर हुआ करते थे।

(6.) समिति तथा सभा

यद्यपि राजन्य राज्य का प्रधान होता था परन्तु वह स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश नहीं होता था। उसे परामर्श देने के लिए कुछ संस्थायें विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ और गण-जैसी अनेक संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। इन परिषदों में जनता के हितों, सैनिक अभियानों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में विचार-विमर्श होता था। ऋग्वैदिक-काल में स्त्रियाँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं।

राजतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व की परिषदें सम्भवतः सभा और समिति थीं। समिति में जन की समस्त प्रजा, सदस्य होती थी परन्तु सभा में केवल उच्च-वंश के वयोवृद्धों को सदस्यता मिलती थी। ये दोनों परिषदें इतने महत्त्व की थीं कि राजन्य भी इनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करता था।

(7.) न्याय व्यवस्था

राजन्य अपने सहायकों की सहायता से विवादों एवं झगड़ों का निर्णय करता था। न्यायिक कार्य में उसे पुरोहित से बड़ी सहायता मिलती थी। जिन अपराधों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, वे चोरी, डकैती, सेंध लगाना आदि हैं। पशुओं की बड़ी चोरी हुआ करती थी। अपराधियों को उस व्यक्ति की इच्छानुसार दण्ड मिलता था जिसे क्षति पहुँचती थी। जल तथा अग्नि-परीक्षा का भी इस युग में प्रचार था।

(8.) गुप्तचर व्यवस्था

उस काल में चोरियां भी होती थीं, विशेषतः गायों की। आपराधिक गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। कर वसूल करने वाले किसी अधिकारी के बारे में हमें जानकारी नहीं मिलती। सम्भवतः ये कर राजाओं को भेंट के रूप में, स्वेच्छा से दिए जाते थे। इस भेंट को बलि कहते थे।

(9.) अन्य पदाधिकारी

राजन्य कोई नियमित सेना नहीं खड़ी करता था किंतु युद्ध के अवसर पर जो सेना एकत्र की जाती थी उसमें व्रात, गण, ग्राम और शर्ध नामक विभिन्न सैनिक समूह सम्मिलित होते थे। कुल मिलाकर यह एक कौटुम्बिक अथवा कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना का प्राधान्य था। नागरिक व्यवस्था अथवा प्रादेशिक व्यवस्था का अस्तित्त्व नहीं था। लोग अपने स्थान बदलते हुए निरन्तर फैलते जा रहे थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म एक सुव्यवस्थित विचारधारा से प्रेरित थे और उस काल के मानव को सुख एवं संतोष के साथ जीने का अवसर प्रदान करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

ऋग्वैदिक समाज

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ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक समाज पारिवारिक व्यवस्था पर आधारित था। इस काल में लोग अपनी रुचि से अपने कार्य का चयन करते थे एवं वर्ण व्यवस्था का सुस्पष्ट विभाजन नहीं हुआ था।

ऋग्वैदिक आर्यों का सामाजिक जीवन

ऋग्वेद से तत्कालीन समाज की जानकारी मिलती है जिसके अनुसार सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ।

लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

(1.) पारिवारिक जीवन

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ऋग्वेद में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक-काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भान्जे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था। रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। उसे गृहपति कहा जाता था। गृहपति के रूप में परिवार की समस्त सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता था। परिवार के समस्त सदस्यों को उसके आदेश का पालन करना होता था। आज्ञा की अवहेलना करने वाले सदस्य को वह अपनी इच्छानुसार कठोर दण्ड दे सकता था। परिवार के समस्त सदस्यों के लालन-पालन, विवाह तथा उनकी उन्नति का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य होता था। एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था।

कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था। वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

(2.) सन्तान की स्थिति

विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे। विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं। ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नहीं की गई है।

(3.) विवाह की व्यवस्था

ऋग्वैदिक-काल के विभिन्न संस्कारों में विवाह का सर्वाधिक महत्त्व था। विवाह को एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था। सामान्यतः माता-पिता ही अपने पुत्र-पुत्री के विवाह सम्बन्ध निर्धारित करते थे परन्तु कुछ स्थानों पर लड़के-लड़की की पूर्व-स्वीकृति लिए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी।

यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था। बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय

कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था।

विधवा-विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता। दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे। ऋग्वेद में अन्तर्जातीय विवाहों का भी उल्लेख है। अनुलोम तथा प्रतिलोम दोनों प्रकार के विवाहों के उदाहरण मिलते हैं। अनुलोम विवाह के अन्तर्गत ब्राह्मण विमद और राजकन्या कमद्यु तथा ब्रह्मर्षि श्यावाश्व तथा राजकन्या दार्भ्य के विवाहों का उल्लेख मिलता है। प्रतिलोम विवाह में देवयानि का राजा ययाति के साथ और ब्राह्मण कन्या शाश्वती का राजा असंग के साथ विवाह का उल्लेख मिलता है।

(4.) स्त्रियों की दशा

ऋग्वैदिक-काल में पुरुष की प्रधानता होने पर भी स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। ऋग्वेद में स्त्री को अग्नि देवता के समान माना गया है तथा कुछ मंत्रों में उसे उषा देवी के समान गौरव दिया गया है। फिर भी, ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पुत्रों की कामना देखने को मिलती है। विवाहिता स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति का हाथ बंटाती थीं।

पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग लेती थीं। ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पत्नी ही घर है, पत्नी ही गृहस्थी है, पत्नी ही आनन्द है, जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है आदि विचारों के प्रमाण मिलते हैं। वे पति की अर्द्धागिनी तथा गृह-स्वामिनी समझी जाती थीं।

स्त्रियाँ यज्ञ-याजन तथा धार्मिक उत्सवों में स्वतन्त्रतापूर्वक भाग लेती थी किंतु स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी।

इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। परिवार में स्त्री का मुख्य कार्य गृह-प्रबन्धन करना तथा बच्चों का लालन-पालन करना था। था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

(5.) नियोग-प्रथा

कुछ विद्वानों ने ऋग्वेद के एक अंश के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाज में सती-प्रथा प्रचलित थी परन्तु उनके तर्कों में विशेष बल नहीं है। अधिकांश विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक-काल में आर्यों में सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी अपितु इसके स्थान पर नियोग-प्रथा का प्रचलन था जिसके अन्तर्गत विधवा-स्त्री को पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने देवर अथवा कुटुम्ब के किसी अन्य व्यक्ति के साथ पत्नी के रूप में रहने की स्वीकृति प्राप्त थी।

नियोग-प्रथा से उत्पन्न सन्तान समाज में घृणित नहीं समझी जाती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में सधवा स्त्री को भी पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने पति के जीवनकाल में ही किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति थी। ऋग्वैदिक-काल में विधवा-विवाह के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते।

(6.) वेश-भूषा

ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहनते थे। कमर से नीचे धोती जैसा वस्त्र होता था जिसे ‘नीवि’ कहते थे। दूसरा वस्त्र काम कहलाता था और तीसरा वस्त्र अधिवास अथवा ‘द्रापि’ था जिसे शॉल की तरह ओढ़ा जाता था। वे सिर पर पगड़ी भी पहनते थे जिसे ‘ऊष्णीय’ कहते थे। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहनते थे।

कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहनते थे। स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बनाती थीं तथा जूड़ा बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे।

यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे। स्त्रियां सिर पर कुम्ब नामक विशेष प्रकार का आभूषण धारण करती थीं।

(7.) भोजन

चावल, जौ, फल, तरकारी, घी तथा दूध-दही ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। कुछ पशुओं का मांस खाया जाता था।

(8.) पेय-पदार्थ

ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। ऋग्वेद में सुरापान की निन्दा की गई है। ब्राह्मण इसे घृणा की दृष्टि से देखते थे।

(9.) मनोरंजन

ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधनों में रथ-संचालन, द्यूतर्कीड़ा, नृत्य एवं गायन, वाद्ययंत्र बजाना तथा पशु-पक्षियों का शिकार करना सम्मिलित थे। वे अपने जीवन को सुखी और आनन्दपूर्ण बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। जीवन को उल्लास के साथ बिताना उनका सहज स्वभाव था। वे लोग आमोद-प्रमोद के लिए विविध उत्सवों का आयोजन करते थे जिनमें नृत्य, गायन एवं वाद्यों के प्रदर्शन से अपना मनोरंजन करते थे।

इन आयोजनों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे। नृत्य के साथ वीणा और करताल का प्रयोग होता था। गान में विभिन्न प्रकार के मन्त्रों तथा गीतों का और वाद्य संगीत में वीणा, दुन्दुभी, शंख, झांझ और मृदंग का प्रयोग होता था। विभिन्न अवसरों पर घुड़दौड़़, रथदौड़़ और मल्ल-युद्ध आयोजित किए जाते थे।

(10.) लेखन कला

यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों के पास ऋग्वेद जैसा महान् ग्रंथ था तथापि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तथा उस काल का समस्त ज्ञान मौखिक था किंतु यह मत सही प्रतीत नहीं होता। उस काल की संस्कृत भाषा काफी उन्नत थी जिसका व्याकरण सम्बन्धी ठाठ देखते ही बनता है। प्रत्येक क्रिया के अलंकार, वचन, पुरुष आदि सुनिश्चित हैं और कारक एवं विभक्तियाँ के रूप भी नियत हैं।

इसके उपरांत भी यदि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। डॉ. भण्डारकर ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों को ऋग्वैदिक समय से ही लेखन कला का ज्ञान था और उनकी ब्राह्मी लिपि, प्रागैतिहासिक काल के मिट्टी के बर्तनों पर प्राप्त चिह्नों से विकसित हुई परन्तु डॉ. आर. सी. मजूमदार का मानना है कि जब तक निश्चित साक्ष्य नहीं मिलते तब तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।

(11.) शिक्षा

ऋग्वैदिक-काल में शिक्षा सामान्यतः मौखिक होती थी। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठस्थ कर लेते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था। प्रत्येक ऋषिकुल एक वैदिक विद्यालय की तरह था जहाँ ऋषि-मुनि, कुमारों को शिक्षा देते थे। सभंवतः लड़के और लड़कियां दोनों ही पढ़ते थे। इसलिए कुछ स्त्रियां ऋगवेद के मंत्रों का निर्माण करती थीं। गायत्री मन्त्र उस युग के ज्ञान का उच्चतम मंत्र माना जाता था। उच्चारण के सात प्रकार और वाक् की चार अवस्थाओं का उल्लेख भी मिलता है।

(12.) औषधि

ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। उस काल में चिकित्सा करना व्यवसाय बन गया था।

(13.) आश्रम-व्यवस्था

ऋग्वैदिक काल में आश्रम-व्यवस्था का स्वरूप सामने नहीं आया था। इस समाज के लोग विभिन्न प्रकार के कर्म करते थे और सभी आर्य कहलाते थे।

(14.) गृह-व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्यों के घर बांस, लकड़ी तथा सरपत के बने होते थे। प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में पुरुषों के लिए एक अलग बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कक्ष होता था।

(15.) शव विसर्जन

इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

(16.) नैतिकता

आर्यों के जीवन में नैतिक मूल्यों को बड़ा महत्त्व दिया गया था। अतिथियों, वृद्धों तथा गुरुजनों का आदर करना तथा अपने से छोटे के साथ स्नेह रखना उत्तम समझा जाता था। चोरी, लूट-पाट, व्यभिचार आदि अनैतिक कार्यों को पाप की दृष्टि से देखा जाता था। आर्यों के जीवन में समाज सेवा की भावना का विशेष महत्त्व था।

सामाजिक वर्गीकरण

(1.) वर्ण-व्यवस्था

ऋग्वैदिक-काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था। ऋग्वेद के प्रारम्भिक मण्डलों में वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी उल्लेख नहीं मिलता। वैश्य और शूद्र शब्दों का उल्लेख दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में ही मिलता है।

वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप कर्म और श्रम के सिद्धान्त पर आधारित था। कर्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्व हो सकता था। आवश्यकतानुसार लोग अपना वर्ण बदल भी सकते थे क्योंकि वर्ण-विभाजन जन्मजात नहीं था। इस सम्बन्ध में कठोर नियमों  का अभाव था। वर्णों में परस्पर खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्ध पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था।

शूद्र द्वारा बनाए गए भोजन को करने पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था और उनके सम्पर्क में आने अथवा उनका स्पर्श करने को अपवित्रता नहीं माना जाता था। ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- ‘मैं कवि हूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं…।’ इसी प्रकार, देवापि और शान्तनु नामक दो भाइयों का उल्लेख मिलता है। देवापि पुरोहित थे और शान्तनु राजा। इससे स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक-काल में वर्ण-व्यवस्था कर्म प्रधान थी, न कि जन्म प्रधान।

(2.) आर्य-अनार्य का विभेद

ऋग्वेद में लगभग ई.पू.1500-1000 के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्यों की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था।

आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा। आर्यों एवं अनार्यों की शारीरिक रचना में भी भेद था। आर्यों की नाक ऊँची होती थी जबकि इसके विरुद्ध अनार्यों की नाक बैठी हुई आर्य लोग यज्ञ-अनुष्ठान, व्रतों का पालन करने वाले थे। आर्यों में अपने रक्त की विशुद्धता को कायम रखने की कामना थी। इस प्रकार समाज में दो वर्ग बन गए। दोनों वर्ग रंग, शरीर रचना, संस्कृति, जाति और भाषा की दृष्टि से नितान्त भिन्न थे। ऋग्वेद में उल्लेख है कि- ‘उग्र प्रकृति के ऋषि ने दोनों वर्णों का पोषण किया’।

(3) आर्यों में विभेद

आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित, शत्रु राजा की पराजय के बाद मिले धन को परस्पर बांट लेते थे। विजय से प्राप्त धन पर असामान अधिकार के कारण सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। वैश्यों एवं शूद्रों की तुलना में राजा और पुरोहित अधिक ऊंचे उठ गए। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। धीरे-धीरे ऋग्वैदिक समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

(4) दास व्यवस्था

ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्यों ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्यां में नहीं लगाया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

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