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वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

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वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर के कई कारण हैं जिनमें से सबसे बड़ा कारण यह है कि वैदिक सभ्यता के जनक हिमालय पर्वत की तरफ से सप्तसिंधु क्षेत्र में आए आर्य थे जबकि द्रविड़ सभ्यता के जनक भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए हुए द्रविड़ थे।

वर्तमान समय में राखीगढ़ी आदि की खुदाई से प्रमाण मिले हैं कि जिन द्रविड़ों को भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से भारत में आया हुआ बताया जा रहा है, वस्तुतः वे भारत से भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की तरफ गए थे। आर्यों की तरह द्रविड़ों का भी मूल निवास क्षेत्र भारत भूमि ही थी।

सामान्यतः विद्वानों में यह धारणा प्रचलित है कि दक्षिण की द्रविड़ सभ्यता के जनक पश्चिमी भारत के सिंधु क्षेत्र में रहने वाले सैंधव थे। जबकि कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी प्रमाणित किया है कि दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता को जन्म देने वाले भी मूल रूप से आर्य ही थे। वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर नृवंश की भिन्नता के कारण नहीं है, अपितु स्थान की भिन्नता के कारण है। इन विद्वानों के अनुसार सिंधुघाटी सभ्यता के जनक भी आर्य ही थे।

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनमें कई अन्तर दिखाई देते हैं। मुख्य अंतर इस प्रकार से हैं-

(1.) काल सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता, वैदिक सभ्यता से अधिक प्राचीन है। माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता, वैदिक सभ्यता से लगभग दो हजार वर्ष अधिक पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता है जबकि वैदिक सभ्यता लौह युगीन सभ्यता है।

(2.) नृवंशीय अंतर

द्रविड़ लोग छोटे, काले तथा चपटी नाक वाले होते थे परन्तु आर्य लोग लम्बे, गोरे तथा सुन्दर शरीर के होते थे।

(3.) स्थान सम्बन्धी अंतर

सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में पनपी। इसकी बस्तियां पंजाब में हड़प्पा से लेकर सिंध में मोहनजोदड़ो, राजस्थान में कालीबंगा तथा गुजरात में सुत्कांगडोर तक मिली हैं जबकि आर्य सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में पनपी तथा इसका विस्तार गंगा-यमुना के दोआब, मध्य भारत तथा पूर्व में बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व तक पाया गया है।

(4.) सभ्यताओं के स्वरूप में अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता नगरीय तथा व्यापार प्रधान थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण तथा कृषि प्रधान थी। सिन्धु-घाटी के लोगों को सामुद्रिक जीवन प्रिय था और वे सामुद्रिक व्यापार में कुशल थे परन्तु आर्यों को स्थलीय जीवन अधिक प्रिय था। सिंधु घाटी की सभ्यता एवं संस्कृति उतनी उन्नत तथा प्रौढ़ नहीं थी जितनी आर्यों की थी।

(5.) सामाजिक व्यवस्था में अन्तर

द्रविड़ों का कुटुम्ब मातृक था अर्थात् माता कुटुम्ब की प्रधान होती थी, परन्तु आर्यों का कुटुम्ब पैतृक था जिसमें पिता अथवा कुटुुम्ब का अन्य कोई वयोवृद्ध पुरुष प्रधान होता था।

(6.) विवाह पद्धति में अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों में चचेरे भाई-बहिन में विवाह हो सकता था, परन्तु आर्यों में इस प्रकार के विवाहों का निषेध था।

(7.) उत्तराधिकार सम्बन्धी परम्पराओं में अंतर

सिन्धु-घाटी सभ्यता के निवासी, अपनी माता के भाई की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे। जबकि आर्य, अपने पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे।

(8.) जाति-व्यवस्था में अन्तर

सिंधु घाटी के लोगों में जाति-व्यवस्था नहीं थी जबकि आर्यों के समाज का मूलाधार जाति-व्यवस्था थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्य अलग-अलग निश्चित थे।

(9.) आवास सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग नगरों में पक्की ईटों के मकान बनाकर रहते थे किंतु वैदिक आर्य गाँवों में बांस के पर्ण-कुटीर बनाकर रहते थे।

(10.) धातुओं के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग पाषाण उपकरणों के साथ-साथ सोने-चांदी का प्रयोग करते थे तथा लोहे से अपरिचित थे परन्तु वैदिक-काल के आर्य प्रारम्भ में सोने तथा ताम्बे का और बाद में चांदी, लोहे तथा कांसे का भी प्रयोग करने लगे थे।

(11.) अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग युद्ध कला में प्रवीण नहीं थे। इसलिए उनके अस्त्र-शस्त्र साधारण कोटि के थे। वे युद्ध क्षेत्र में कवच (वर्म) तथा शिरस्त्राण आदि का उपयोग नहीं करते थे जबकि वैदिक आर्य युद्ध कला में अत्यंत प्रवीण थे तथा युद्ध क्षेत्र में आत्मरक्षा के लिए कवच और शिरस्त्राण आदि का प्रयोग करते थे।

(12.) भोजन में अन्तर

सिन्धु सभ्यता के लोगों का प्रधान आहार मांस-मछली था। वैदिक आर्य भी प्रारम्भ में मांस-भक्षण करते थे, परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में मांस भक्षण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा।

(13.) पशुओं के ज्ञान तथा महत्त्व में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग बाघ तथा हाथी से भली-भांति परिचित थे किंतु ऊँट तथा घोड़े से अपरिचित थे। सिन्धु-घाटी के लोग साण्ड को गाय से अधिक महत्त्व देते थे। वैदिक आर्य बाघ तथा हाथी से अनभिज्ञ थे। वेदों में हाथी का बहुत कम उल्लेख है। वैदिक आर्य घोड़े पालते थे जिन्हें वे अपने रथों में जोतते थे तथा युद्ध में काम लेते थे। वैदिक-काल के आर्य गाय को पवित्र मानते थे और उसे पूजनीय समझते थे।

(14.) धार्मिक धारणा में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोगों में मूर्ति-पूजा की प्रतिष्ठा थी। वे शिव तथा शक्ति की पूजा करते थे और देवी को देवता से अधिक ऊँचा स्थान प्रदान करते थे। वे लिंग-पूजक थे तथा अग्नि को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते थे। वैदिक आर्यों ने भी देवी-देवताओं में मानवीय गुणों का आरोपण किया था परन्तु वे मूर्ति-पूजक नहीं थे। ऋग्वैदिक-काल के आर्यों में शिव को कोई स्थान प्राप्त नहीं था तथा वे लिंग-पूजा के विरोधी थे। आर्य लोग सर्वशक्तिमान दयालु ब्रह्म को मानते थे तथा अग्नि-पूजक थे। उनके प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी।

(15.) कला के ज्ञान में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग लेखन-कला से परिचित थे और अन्य कलाओं में भी अधिक उन्नति कर गए थे, परन्तु प्रारम्भिक आर्य सम्भवतः लेखन-कला से परिचित नहीं थे और अन्य कलाओं में भी उतने प्रवीण नहीं थे परन्तु काव्य-कला में वे सैंधवों से बढ़कर थे।

(16.) लिपि एवं भाषागत अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों की लिपि अब तक नहीं पढ़ी जा सकी है किंतु अनुमान है कि वह एक प्रकार की चित्रलिपि थी। इस लिपि के अब तक नहीं पढ़े जाने के कारण सिन्धु-घाटी की भाषा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हो सकी है जबकि आर्यों की लिपि वर्णलिपि तथा भाषा संस्कृत थी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में पर्याप्त अन्तर था। दोनों सभ्यताओं का अलग-अलग कालों में और विभिन्न लोगों द्वारा विकास किया गया था परन्तु दोनों ही सभ्यताएँ, भारत की उच्च कोटि की सभ्यताएँ थीं। दोनों सभ्यताओं में इतना अन्तर होने पर शताब्दियों के सम्पर्क से दोनों ने एक दूसरे की संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया और उनमें साम्य हो गया। यह साम्य आज भी भारत की संस्कृति पर दिखाई पड़ता है।

सैंधव एवं आर्य सभ्यताओं के अनसुलझे प्रश्न

सिंधु सभ्यता एवं आर्य सभ्यता के सम्बन्ध में पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि-

1.  सिंधु सभ्यता नगरीय सभ्यता है।

2.  हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम सिंधु सभ्यता है क्योंकि यह सभ्यता, सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में पनपी।

3.  सैंधव सभ्यता, आर्य सभ्यता से लगभग दो हजार साल पुरानी थी।

4.  सिंधु सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे।

5.  सिंधु सभ्यता के लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

6.  सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया (ईराक) के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

7.  भारत में आने से पहले आर्य ईरान में रहते थे।

8.  आर्यों ने सैंधव लोगों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियों को नष्ट कर दिया। आर्य ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि आर्यों के पास तेज गति की सवारी के लिए घोड़े तथा लड़ने के लिए लोहे के हथियार थे।

यदि पश्चिमी इतिहासकारों की उपरोक्त बातों को स्वीकार कर लिया जाये तो इतिहास में अनेक उलझनें पैदा हो जाती हैं। इनमें से कुछ विचारणीय बिंदु शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सहायता के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं-

1.  अब तक सैंधव सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज की गई है। इनमें से केवल 6 नगर हैं, शेष गांव हैं। ऐसी स्थिति में सैंधव सभ्यता को नगरीय सभ्यता कैसे कहा जा सकता है?

2.  सिंधु सभ्यता के स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाए गए हैं न कि सिंधु नदी की घाटी में। अतः इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता कैसे हो सकता है?

3.  यदि सिंधुसभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे तो सिंधु घाटी तथा मेसोपाटिमया का मार्ग, ईरान अथवा उसके आसपास से होकर जाने का रहा होगा जहाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियां थीं। तब सैंधव लोग, घोड़े एवं लोहे से परिचित क्यों नहीं हुए?

4.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था, तो इस दौरान युद्ध, बीमारी एवं स्वाभाविक मृत्यु से घोड़े भी मरे होंगे किंतु पूरी सैंधव सभ्यता के क्षेत्र से घोड़ों की केवल दो संदिग्ध मूर्तियाँ मिली हैं तथा एक घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंन्धवों पर न तो आक्रमण किए और न उन्हें नष्ट किया।

5.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था तो उनके द्वारा प्रयुक्त लोहे के कुछ हथियार युद्ध के मैदानों अथवा सैंधव बस्तियों में गिरे होंगे अथवा छूट गए होंगे अथवा टूटने के कारण आर्य सैनिकों द्वारा फैंक दिए गए होंगे किंतु सैंधव बस्तियों से लोहे के हथियार नहीं मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण नहीं किया।

6.  आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे भारत में लोहा लाए। यदि ऐसा था तो लौह-बस्तियां सबसे पहले उत्तर भारत में स्थापित होनी चाहिए थीं किंतु आर्यों के आने के बाद उत्तर भारत में ताम्र कालीन बस्तियां बसीं जबकि उसी काल में दक्षिण भारत में लौह बस्तियां बस रही थीं। यह कैसे हुआ कि भारत में लोहे को लाने वाले आर्यों की बस्तियां उत्तर भारत में थीं जबकि लौह बस्तियां दक्षिण भारत में बस रही थीं ?

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि –

1.  सैंधव सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता अथवा सरस्वती सभ्यता कहा जाना चाहिए।

2.  सैंधव सभ्यता, लोहे एवं घोड़े से अपिरिचित रही होगी किंतु वह लोहे के हथियारों से सुसज्जित एवं घोड़ों पर बैठकर आने वाले आर्यों के आक्रमणों में नष्ट हुई इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं।

3.  यूरोपीय इतिहासकारों को यह सिद्धांत प्रतिपादित करना था कि ब्रिटेन वासियों की तरह आर्य भी भारत में बाहर से आए हैं, इसलिए उन्होंने सैंधव सभ्यता को आर्यों के आक्रमण में नष्ट होने का मिथक गढ़ा।

4.  सुदूर संवेदी उपग्रहों द्वारा उपलब्ध कराए गए सिंधु तथा सरस्वती नदी के प्राचीन मार्गों के चित्र बताते हैं कि सरस्वती नदी द्वारा कई बार मार्ग बदला गया। इससे अनुमान होता है कि इसी कारण सिंधु सभ्यता की बस्तियां भी अपने प्राचीन स्थानों से हटकर अन्यत्र चली गई होंगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

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ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म स्वयं को प्रकृति का आभारी समझता था इस काल का मानव समझ गया था कि प्रकृति की अनुकूलता से ही मानव का जीवन संभव है। इसलिए ऋग्वैदिक समाज पूर्णतः धर्म पर आधारित था।

हे आदित्य, हे मित्र, हे वरुण, हे इन्द्र! आपके प्रति मैंने बहुत अपराध किए हैं; उन्हें क्षमा करें और मुझे उस अभय-ज्योति का वरदान दें जिससे मुझे अज्ञान का क्लेश न सताए। -ऋग्वेद, 2.27.14.

भारत में ऋग्वैदिक सभ्यता का प्राकट्य सर्वप्रथम सप्त-सिंधु क्षेत्र तथा सरस्वती नदी के निकट दिखाई देता है। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव प्रदेश तथा सरस्वती नदी का अनेक मंत्रों में गुण-गान किया गया है। यद्यपि अब सरस्वती नदी विद्यमान नहीं है और उसे प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अदृश्य मान लिया गया है परन्तु उन दिनों वह सतजल तथा कुरुक्षेत्र के मध्य बहती थी।

ऋग्वैदिक आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था

यद्यपि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रन्थ है तथापि उसकी अनेक ऋचाओं में उस काल की राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है। ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म एक सुव्यवस्थित राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देने में सफल रहे थे।

दस्युओं अथवा आर्य-पूर्वों से संघर्ष

ऋग्वेद में वर्णित इंद्र यद्यपि देवताओं का राजा है तथापि इन्द्र ने आर्यों के शत्रुओं को अनेक बार हराया। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ होता है दुर्गों को तोड़ने वाला परन्तु आर्य-पूर्वों के इन दुर्गों को पहचान पाना सम्भव नहीं है। आर्यों के शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्रों के बारे में भी बहुत कम जानकारी मिलती है।

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इनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति के लोगों की बस्तियां हो सकती हैं परन्तु आर्यों की सफलता के बारे में संदेह नहीं है। इस सफलता का मुख्य कारण वे रथ थे जिनमें घोड़े जोते जाते थे। आर्यों के साथ ही पश्चिमी एशिया और भारत में घोड़ों का आगमन हुआ। आर्य सैनिक सम्भवतः कवच (वर्म) पहनते थे और उनके हथियार श्रेष्ठ थे। ऋग्वेद से जानकारी मिलती है कि ‘दिवोदास’ ने, जो भरत कुल का आर्य राजा था, ‘शंबर’ को हराया था। शंबर एक दस्यु राजा था जिसने आकाश में नब्बे, निन्यानवे अथवा सौ दुर्गों का निर्माण किया था। आकाश में दुर्ग निर्माण के उल्लेख से अनुमान होता है कि शंबर कोई पर्वतीय अनार्य राजा था जिसने पर्वतों पर बड़ी संख्या में दुर्गों का निर्माण किया था। ऋग्वेद के दस्यु सम्भवतः इसी पर्वतीय देश के मूल निवासी थे, और इन्हें हराने वाला योद्धा, एक आर्य-मुखिया था। यहाँ दिवोदास के नाम के साथ दास शब्द जुड़ा हुआ है जिससे अनुमान होता है कि यह आर्य-मुखिया, दासों से तो सहानुभुति रखता था, किन्तु दस्युओं का कट्टर शत्रु था। ऋग्वेद में दस्युहंता शब्द का बार-बार उल्लेख आया है दस्यु सम्भवतः लिंग-पूजक थे और दूध-दही, घी आदि के लिए गाय, भैंस नहीं पालते थे।

पंच-जनों का युद्ध

प्राचीन आर्यों का कोई संगठित राज्य नहीं था। आर्य छोटे-छोटे राज्यों (जन) में विभक्त थे जिनमें परस्पर वैमनस्य था। फलतः आर्यों को न केवल अनार्यों से युद्ध करना पड़ा वरन् उनमें आपस में भी युद्ध होता था। इस प्रकार आर्य दोहरे संघर्ष में फंसे हुए थे। आर्यों के भीतर के संघर्ष के कारण उनके जीवन में लंबे समय तक उथल-पुथल मची रही।

पांच प्रमुख कबीलों अथवा पंचजनों की आपस में लड़ाइयां हुईं और इसके लिए उन्होंने आर्येतर लोगों की भी सहायता ली। ‘भरत’ और ‘तृत्सु’ आर्य जन थे तथा ‘वसिष्ठ’ नामक ऋषि उनके पक्षधर थे। भरत नाम का उल्लेख पहली बार ऋग्वेद में आया है। इसी नाम के आधार पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

दाशराज्ञ अथवा दस राजाओं का युद्ध

ऋग्वैदिक उल्लेख के अनुसार सरस्वती नदी के किनारे भारत नामक जन (राज्य) था, जिस पर सुदास नामक राजा शासन करता था। विश्वामित्र, राजा सुदास के पुरोहित थे। राजा तथा पुरोहित में अनबन हो जाने के कारण राजा सुदास ने विश्वामित्र के स्थान पर वसिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया। इससे विश्वामित्र बड़े अप्रसन्न हुए। उन्होंने दस राजाओं को संगठित करके, राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

दस राजाओं के इस समूह में पांच आर्य-राजा थे और पांच अनार्य-राजा थे। भरतों और दस राजाओं का जो युद्ध हुआ उसे ‘दाशराज्ञ युद्ध’ कहते हैं। यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ। इसमें भरत कुल के राजा सुदास की विजय हुई और भरतों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। जिन कबीलों की हार हुई उनमें पुरुओं का कबीला सबसे महत्त्वपूर्ण था।

कुरुओं का उदय

कालांतर में ‘भरतों’ और ‘पुरुओं’ का मेल हुआ और परिणामतः ‘कुरुओं’ का एक नया शासक कबीला अस्तित्त्व में आया। कुरु बाद में ‘पांचालों’ के साथ मिल गए और उन्होंने उत्तरी गंगा की द्रोणी में अपना शासन स्थापित किया। उत्तर-वैदिक-काल में उन्होंने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यों में परस्पर अन्य युद्ध भी हुए।

ऋग्वेद कालीन राजनीतिक संस्थाएं

(1.) गोप अथवा राजन्य

ऋग्वैदिक-काल की राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार कुटुम्ब था जो पैतृक होता था। कुटुम्ब को आधुनिक इतिहासकारों ने कबीला कहकर पुकारा है। कुटुम्ब का प्रधान, पिता अथवा अन्य कोई बड़ा-बूढ़ा पुरुष होता था जो कुटुम्ब के अन्य सदस्यों पर नियन्त्रण रखता था। कई कुटुम्बों को मिला कर एक ग्राम बनता था। ग्राम का प्रधान ‘ग्रामणी’ कहलाता था। कई ग्रामों को मिला कर ‘विस’ बनता था। विस का प्रधान ‘विसपति’ कहलाता था। कई विसों को मिला कर ‘जन’ बनता था। जन का रक्षक ‘गोप’ अथवा ‘राजन्य’ कहलाता था।

(2.) उत्तराधिकार की परम्परा

ऋग्वैदिक-काल का राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक था। ऋग्वेद में अनेक राजन्यों का उल्लेख मिलता है। राजन्य का पद आनुवंशिक था और वह उसे उत्तराधिकार के नियम से प्राप्त होता था। अर्थात् राजन्य के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था। राजन्य का पद यद्यपि वंशानुगत होता था, तथापि समिति अथवा सभा द्वारा किए जाने वाले चुनावों के बारे में भी सूचना मिलती है।

राज्य में राजन्य का स्थान सर्वोच्च था। वह सुन्दर वस्त्र धारण करता था और भव्य राज-भवन में निवास करता था जिसमें राज्य के बड़े-बड़े पदाधिकारी, पण्डित, गायक तथा नौकर-चाकर उपस्थित रहते थे। चूँकि उन दिनों गमनागमन के साधनों का अभाव था इसलिए राज्य बहुत छोटे हुआ करते थे।

(3.) राजन्य के कर्त्तव्य

राजन्य को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है। वह गोधन की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की आराधना करता था। प्रजा की रक्षा करना, शत्रुओं से युद्ध करना, राज्य में शान्ति स्थापित करना और शान्ति के समय यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, राजन्य के मुख्य कर्त्तव्य होते थे।

राजन्य अपनी प्रजा की न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का अपितु आध्यात्मिक उन्नति का भी ध्यान रखता था। राजन्य अपनी प्रजा के आचरण की देखभाल के लिए गुप्तचर रखता था जो प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में राजन्य को सूचना देते थे। राजन्य, आचरण-भ्रष्ट प्रजा को दण्डित करता था।

(4.) राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

राजन्य की सहायता के लिए बहुत से पदाधिकारी होते थे जिनमें पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी आदि प्रमुख थे।

पुरोहित

समस्त पदाधिकारियों में पुरोहित का स्थान सबसे ऊँचा था। उसका पद प्रायः वंशानुगत होता था परन्तु कभी-कभी वह किसी अन्य कुटुम्ब से भी चुन लिया जाता था। पुरोहित को बहुत से कर्त्तव्य करने होते थे। वह राजन्य का धर्मगुरु तथा परामर्शदाता होता था।

इसलिए राज्य में उसका बड़ा प्रभाव रहता था। वह रण-क्षेत्र में भी राजन्य के साथ जाता था और अपनी प्रार्थनाओं तथा मन्त्रों द्वारा राजन्य की विजय का प्रयत्न करता था। ऋग्वैदिक-काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र नामक दो प्रमुख पुरोहित हुए। उन्होंने राजाओं का पथ-प्रदर्शन किया और बदले में गायों और दासियों के रूप में भरपूर दक्षिणाएं प्राप्त कीं।

सेनानी

राज्य का दूसरा प्रमुख अधिकारी सेनानी होता था। वह भाला, कुल्हाड़ी, कृपाण आदि का उपयोग करना जानता था। वह सेना का संचालन करता था। उसकी नियुक्ति सम्भवतः राजन्य स्वयं करता था। जिन युद्धों में राजन्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं समझी जाती थी, उनमें सेनानी ही सेना का प्रधान होता था जो रण-क्षेत्र में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था।

ग्रामणी

ग्रामणी तीसरा प्रधान पदाधिकारी था। वह गाँव के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी होता था। आरम्भ में ग्रामणी योद्धाओं के एक छोटे समूह का नेता होता था परन्तु जब गांव स्थायी रूप से बस गए तो ग्रामणी गांव का मुखिया हो गया और कालांतर में उसका पद व्राजपति के समकक्ष हो गया।

कुलप

परिवार अथवा कुल का मुखिया कुलप कहलाता था।

व्राजपति

गोचर-भूमि के अधिकारी को व्राजपति कहा गया है। वह युद्ध में कुलपों और ग्रामणियांे का नेतृत्व करता था।

(5.) युद्ध-विधि

भारत में ऋग्वैदिक आर्यों की सफलता के दो प्रमुख कारण थे- घोड़ों से चलने वाले रथ और लोहे से बनने वाले हथियार। युद्ध में समस्त सक्षम-पुरुषों को भाग लेना पड़ता था। साधारण लोग पैदल युद्ध करते थे परन्तु राजन्य तथा क्षत्रिय लोग रथों पर चढ़कर युद्ध करते थे। युद्ध में आत्म-रक्षा के लिए कवच आदि का प्रयोग किया जाता था।

आक्रमण करने का प्रधान शस्त्र धनुष-बाण था परन्तु आवश्यकतानुसार भालों, फरसों तथा तलवारों का भी प्रयोग किया जाता था। ध्वजा, पताका, दुन्दुभि आदि का भी प्रयोग किया जाता था। युद्ध प्रायः नदियों के तट पर हुआ करते थे।

(6.) समिति तथा सभा

यद्यपि राजन्य राज्य का प्रधान होता था परन्तु वह स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश नहीं होता था। उसे परामर्श देने के लिए कुछ संस्थायें विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ और गण-जैसी अनेक संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं। इन परिषदों में जनता के हितों, सैनिक अभियानों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में विचार-विमर्श होता था। ऋग्वैदिक-काल में स्त्रियाँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं।

राजतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व की परिषदें सम्भवतः सभा और समिति थीं। समिति में जन की समस्त प्रजा, सदस्य होती थी परन्तु सभा में केवल उच्च-वंश के वयोवृद्धों को सदस्यता मिलती थी। ये दोनों परिषदें इतने महत्त्व की थीं कि राजन्य भी इनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करता था।

(7.) न्याय व्यवस्था

राजन्य अपने सहायकों की सहायता से विवादों एवं झगड़ों का निर्णय करता था। न्यायिक कार्य में उसे पुरोहित से बड़ी सहायता मिलती थी। जिन अपराधों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, वे चोरी, डकैती, सेंध लगाना आदि हैं। पशुओं की बड़ी चोरी हुआ करती थी। अपराधियों को उस व्यक्ति की इच्छानुसार दण्ड मिलता था जिसे क्षति पहुँचती थी। जल तथा अग्नि-परीक्षा का भी इस युग में प्रचार था।

(8.) गुप्तचर व्यवस्था

उस काल में चोरियां भी होती थीं, विशेषतः गायों की। आपराधिक गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। कर वसूल करने वाले किसी अधिकारी के बारे में हमें जानकारी नहीं मिलती। सम्भवतः ये कर राजाओं को भेंट के रूप में, स्वेच्छा से दिए जाते थे। इस भेंट को बलि कहते थे।

(9.) अन्य पदाधिकारी

राजन्य कोई नियमित सेना नहीं खड़ी करता था किंतु युद्ध के अवसर पर जो सेना एकत्र की जाती थी उसमें व्रात, गण, ग्राम और शर्ध नामक विभिन्न सैनिक समूह सम्मिलित होते थे। कुल मिलाकर यह एक कौटुम्बिक अथवा कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना का प्राधान्य था। नागरिक व्यवस्था अथवा प्रादेशिक व्यवस्था का अस्तित्त्व नहीं था। लोग अपने स्थान बदलते हुए निरन्तर फैलते जा रहे थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म एक सुव्यवस्थित विचारधारा से प्रेरित थे और उस काल के मानव को सुख एवं संतोष के साथ जीने का अवसर प्रदान करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

ऋग्वैदिक समाज

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ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक समाज पारिवारिक व्यवस्था पर आधारित था। इस काल में लोग अपनी रुचि से अपने कार्य का चयन करते थे एवं वर्ण व्यवस्था का सुस्पष्ट विभाजन नहीं हुआ था।

ऋग्वैदिक आर्यों का सामाजिक जीवन

ऋग्वेद से तत्कालीन समाज की जानकारी मिलती है जिसके अनुसार सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ।

लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

(1.) पारिवारिक जीवन

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ऋग्वेद में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक-काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भान्जे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था। रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। उसे गृहपति कहा जाता था। गृहपति के रूप में परिवार की समस्त सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता था। परिवार के समस्त सदस्यों को उसके आदेश का पालन करना होता था। आज्ञा की अवहेलना करने वाले सदस्य को वह अपनी इच्छानुसार कठोर दण्ड दे सकता था। परिवार के समस्त सदस्यों के लालन-पालन, विवाह तथा उनकी उन्नति का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य होता था। एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था।

कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था। वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

(2.) सन्तान की स्थिति

विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे। विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं। ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नहीं की गई है।

(3.) विवाह की व्यवस्था

ऋग्वैदिक-काल के विभिन्न संस्कारों में विवाह का सर्वाधिक महत्त्व था। विवाह को एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था। सामान्यतः माता-पिता ही अपने पुत्र-पुत्री के विवाह सम्बन्ध निर्धारित करते थे परन्तु कुछ स्थानों पर लड़के-लड़की की पूर्व-स्वीकृति लिए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी।

यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था। बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय

कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था।

विधवा-विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता। दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे। ऋग्वेद में अन्तर्जातीय विवाहों का भी उल्लेख है। अनुलोम तथा प्रतिलोम दोनों प्रकार के विवाहों के उदाहरण मिलते हैं। अनुलोम विवाह के अन्तर्गत ब्राह्मण विमद और राजकन्या कमद्यु तथा ब्रह्मर्षि श्यावाश्व तथा राजकन्या दार्भ्य के विवाहों का उल्लेख मिलता है। प्रतिलोम विवाह में देवयानि का राजा ययाति के साथ और ब्राह्मण कन्या शाश्वती का राजा असंग के साथ विवाह का उल्लेख मिलता है।

(4.) स्त्रियों की दशा

ऋग्वैदिक-काल में पुरुष की प्रधानता होने पर भी स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। ऋग्वेद में स्त्री को अग्नि देवता के समान माना गया है तथा कुछ मंत्रों में उसे उषा देवी के समान गौरव दिया गया है। फिर भी, ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पुत्रों की कामना देखने को मिलती है। विवाहिता स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति का हाथ बंटाती थीं।

पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग लेती थीं। ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पत्नी ही घर है, पत्नी ही गृहस्थी है, पत्नी ही आनन्द है, जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है आदि विचारों के प्रमाण मिलते हैं। वे पति की अर्द्धागिनी तथा गृह-स्वामिनी समझी जाती थीं।

स्त्रियाँ यज्ञ-याजन तथा धार्मिक उत्सवों में स्वतन्त्रतापूर्वक भाग लेती थी किंतु स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी।

इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। परिवार में स्त्री का मुख्य कार्य गृह-प्रबन्धन करना तथा बच्चों का लालन-पालन करना था। था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

(5.) नियोग-प्रथा

कुछ विद्वानों ने ऋग्वेद के एक अंश के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाज में सती-प्रथा प्रचलित थी परन्तु उनके तर्कों में विशेष बल नहीं है। अधिकांश विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक-काल में आर्यों में सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी अपितु इसके स्थान पर नियोग-प्रथा का प्रचलन था जिसके अन्तर्गत विधवा-स्त्री को पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने देवर अथवा कुटुम्ब के किसी अन्य व्यक्ति के साथ पत्नी के रूप में रहने की स्वीकृति प्राप्त थी।

नियोग-प्रथा से उत्पन्न सन्तान समाज में घृणित नहीं समझी जाती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में सधवा स्त्री को भी पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने पति के जीवनकाल में ही किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति थी। ऋग्वैदिक-काल में विधवा-विवाह के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते।

(6.) वेश-भूषा

ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहनते थे। कमर से नीचे धोती जैसा वस्त्र होता था जिसे ‘नीवि’ कहते थे। दूसरा वस्त्र काम कहलाता था और तीसरा वस्त्र अधिवास अथवा ‘द्रापि’ था जिसे शॉल की तरह ओढ़ा जाता था। वे सिर पर पगड़ी भी पहनते थे जिसे ‘ऊष्णीय’ कहते थे। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहनते थे।

कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहनते थे। स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बनाती थीं तथा जूड़ा बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे।

यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे। स्त्रियां सिर पर कुम्ब नामक विशेष प्रकार का आभूषण धारण करती थीं।

(7.) भोजन

चावल, जौ, फल, तरकारी, घी तथा दूध-दही ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। कुछ पशुओं का मांस खाया जाता था।

(8.) पेय-पदार्थ

ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। ऋग्वेद में सुरापान की निन्दा की गई है। ब्राह्मण इसे घृणा की दृष्टि से देखते थे।

(9.) मनोरंजन

ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधनों में रथ-संचालन, द्यूतर्कीड़ा, नृत्य एवं गायन, वाद्ययंत्र बजाना तथा पशु-पक्षियों का शिकार करना सम्मिलित थे। वे अपने जीवन को सुखी और आनन्दपूर्ण बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। जीवन को उल्लास के साथ बिताना उनका सहज स्वभाव था। वे लोग आमोद-प्रमोद के लिए विविध उत्सवों का आयोजन करते थे जिनमें नृत्य, गायन एवं वाद्यों के प्रदर्शन से अपना मनोरंजन करते थे।

इन आयोजनों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे। नृत्य के साथ वीणा और करताल का प्रयोग होता था। गान में विभिन्न प्रकार के मन्त्रों तथा गीतों का और वाद्य संगीत में वीणा, दुन्दुभी, शंख, झांझ और मृदंग का प्रयोग होता था। विभिन्न अवसरों पर घुड़दौड़़, रथदौड़़ और मल्ल-युद्ध आयोजित किए जाते थे।

(10.) लेखन कला

यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों के पास ऋग्वेद जैसा महान् ग्रंथ था तथापि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तथा उस काल का समस्त ज्ञान मौखिक था किंतु यह मत सही प्रतीत नहीं होता। उस काल की संस्कृत भाषा काफी उन्नत थी जिसका व्याकरण सम्बन्धी ठाठ देखते ही बनता है। प्रत्येक क्रिया के अलंकार, वचन, पुरुष आदि सुनिश्चित हैं और कारक एवं विभक्तियाँ के रूप भी नियत हैं।

इसके उपरांत भी यदि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। डॉ. भण्डारकर ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों को ऋग्वैदिक समय से ही लेखन कला का ज्ञान था और उनकी ब्राह्मी लिपि, प्रागैतिहासिक काल के मिट्टी के बर्तनों पर प्राप्त चिह्नों से विकसित हुई परन्तु डॉ. आर. सी. मजूमदार का मानना है कि जब तक निश्चित साक्ष्य नहीं मिलते तब तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।

(11.) शिक्षा

ऋग्वैदिक-काल में शिक्षा सामान्यतः मौखिक होती थी। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठस्थ कर लेते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था। प्रत्येक ऋषिकुल एक वैदिक विद्यालय की तरह था जहाँ ऋषि-मुनि, कुमारों को शिक्षा देते थे। सभंवतः लड़के और लड़कियां दोनों ही पढ़ते थे। इसलिए कुछ स्त्रियां ऋगवेद के मंत्रों का निर्माण करती थीं। गायत्री मन्त्र उस युग के ज्ञान का उच्चतम मंत्र माना जाता था। उच्चारण के सात प्रकार और वाक् की चार अवस्थाओं का उल्लेख भी मिलता है।

(12.) औषधि

ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। उस काल में चिकित्सा करना व्यवसाय बन गया था।

(13.) आश्रम-व्यवस्था

ऋग्वैदिक काल में आश्रम-व्यवस्था का स्वरूप सामने नहीं आया था। इस समाज के लोग विभिन्न प्रकार के कर्म करते थे और सभी आर्य कहलाते थे।

(14.) गृह-व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्यों के घर बांस, लकड़ी तथा सरपत के बने होते थे। प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में पुरुषों के लिए एक अलग बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कक्ष होता था।

(15.) शव विसर्जन

इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

(16.) नैतिकता

आर्यों के जीवन में नैतिक मूल्यों को बड़ा महत्त्व दिया गया था। अतिथियों, वृद्धों तथा गुरुजनों का आदर करना तथा अपने से छोटे के साथ स्नेह रखना उत्तम समझा जाता था। चोरी, लूट-पाट, व्यभिचार आदि अनैतिक कार्यों को पाप की दृष्टि से देखा जाता था। आर्यों के जीवन में समाज सेवा की भावना का विशेष महत्त्व था।

सामाजिक वर्गीकरण

(1.) वर्ण-व्यवस्था

ऋग्वैदिक-काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था। ऋग्वेद के प्रारम्भिक मण्डलों में वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी उल्लेख नहीं मिलता। वैश्य और शूद्र शब्दों का उल्लेख दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में ही मिलता है।

वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप कर्म और श्रम के सिद्धान्त पर आधारित था। कर्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्व हो सकता था। आवश्यकतानुसार लोग अपना वर्ण बदल भी सकते थे क्योंकि वर्ण-विभाजन जन्मजात नहीं था। इस सम्बन्ध में कठोर नियमों  का अभाव था। वर्णों में परस्पर खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्ध पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था।

शूद्र द्वारा बनाए गए भोजन को करने पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था और उनके सम्पर्क में आने अथवा उनका स्पर्श करने को अपवित्रता नहीं माना जाता था। ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- ‘मैं कवि हूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं…।’ इसी प्रकार, देवापि और शान्तनु नामक दो भाइयों का उल्लेख मिलता है। देवापि पुरोहित थे और शान्तनु राजा। इससे स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक-काल में वर्ण-व्यवस्था कर्म प्रधान थी, न कि जन्म प्रधान।

(2.) आर्य-अनार्य का विभेद

ऋग्वेद में लगभग ई.पू.1500-1000 के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्यों की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था।

आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा। आर्यों एवं अनार्यों की शारीरिक रचना में भी भेद था। आर्यों की नाक ऊँची होती थी जबकि इसके विरुद्ध अनार्यों की नाक बैठी हुई आर्य लोग यज्ञ-अनुष्ठान, व्रतों का पालन करने वाले थे। आर्यों में अपने रक्त की विशुद्धता को कायम रखने की कामना थी। इस प्रकार समाज में दो वर्ग बन गए। दोनों वर्ग रंग, शरीर रचना, संस्कृति, जाति और भाषा की दृष्टि से नितान्त भिन्न थे। ऋग्वेद में उल्लेख है कि- ‘उग्र प्रकृति के ऋषि ने दोनों वर्णों का पोषण किया’।

(3) आर्यों में विभेद

आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित, शत्रु राजा की पराजय के बाद मिले धन को परस्पर बांट लेते थे। विजय से प्राप्त धन पर असामान अधिकार के कारण सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। वैश्यों एवं शूद्रों की तुलना में राजा और पुरोहित अधिक ऊंचे उठ गए। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। धीरे-धीरे ऋग्वैदिक समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

(4) दास व्यवस्था

ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्यों ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्यां में नहीं लगाया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

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ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ ऋग्वैदिक ऋचाओं में देखने को मिलती हैं। इस काल में धर्म का अर्थ ईश्वर नामक रहस्यमयी सत्ता को समझना तथा उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना था। ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं इन्हीं दो मंतव्यों से आप्लावित हैं।

ऋग्वैदिक आर्यों का जीवन धर्ममय था। जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं था जिस पर धर्म की गहरी छाप न हो। इस काल का धर्म बड़ी उच्च-दशा में था तथा प्राकृतिक शक्तियों एवं उनके नियामक देवताओं की पूजा होती थी। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्यों का धर्म बहुदेववादी था।

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

(1.) ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास

ऋग्वैदिक आर्यों का ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास था जो इस जगत् का निर्माण तथा पालन करने वाला है। प्रारम्भ में आर्यों ने वरुण को देवाधिदेव माना परन्तु बाद में उसका स्थान इन्द्र ने ले लिया। बाद में आर्यों ने अनुभव किया कि इन्द्र के ऊपर भी कोई परमसत्ता है, जो समूचे ब्रह्माण्ड को संचालित करती है तथा स्रष्टा ही सृष्टि के रूप में विस्तृत है।

वह प्रकाश के रूप में ज्योतिर्मय आकाश में व्याप्त है, वसु के रूप में अन्तरिक्ष में निवास करता है, प्राण के रूप में मनुष्य के अन्तःस्थल में विद्यमान है। वस्तुतः सृष्टा, सृष्टि, प्रकृति और मानव एक ही अनुशासन से निष्पन्न होकर तथा एक ही अनुशासन से ग्रथित होकर समन्वित हैं। ऋग्वेद तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है- ‘अग्नि वाक् में प्रतिष्ठित है और वाक् हृदय में, हृदय मुझ में, मैं अमृत्व में और अमृत्व ब्रहा में सन्निहित है।’

(2.) ऐकेश्वरवाद में विश्वास

अनेक देवताओं में विश्वास करते हुए भी ऋग्वैदिक आर्यों के धर्म का मूलाधार एकेश्वरवाद था। उनका एक ही ईश्वर था जिसे वे प्रजापति कहते थे जो सर्वव्यापी था।

ऋषियों का कहना था- ‘सत एक ही है। विद्वान उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि विभिन्न नामों से पुकारते है।’

आर्यों ने इनके उपर भी एक परम तत्त्व की प्रतिष्ठता की और उसे हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा विश्वकर्मा नामों की संज्ञा दी। एकेश्वरवाद की यही पराकाष्ठा मानी जाती है।

इसी एक तत्त्व को आर्यों ने  ‘सत’ नाम से पुकारा। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सत का ज्ञान ही आत्मा का ज्ञान है। संसार के विभिन्न जीव विभिन शरीर अवश्य धारण किए हुए हैं पर उन सब की आत्मा एक ही है। मोह जनित भेदों को नष्ट करके उस परमसत् से साक्षात्कार करना ही जीवन का परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आर्य-ऋषि परम-तत्त्व की ओर उन्मुख होने लगे।

(3.) प्राकृतिक शक्तियों की उपासना

प्राकृतिक घटनाएं यथा- वर्षारंभ, सूर्य एवं चंद्र का उदय, नदियों तथा पर्वतों आदि का अस्तित्त्व, आर्यों के लिए पहेली-जैसे थे। ऋग्वेद में ऐसी अनेक दैवी शक्तियों का समावेश है जिनकी स्तुति में विभिन्न ऋषि-कुलों ने सूक्तों की रचना की। इस प्रकार ऋग्वैदिक-काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आरंभ हुई।

ऋग्वैदिक आर्यों का विश्वास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि में ईश्वर निवास करता है। इसलिए वे इन सबकी उपासना करते थे। आर्यों ने सर्वप्रथम ‘द्यौस’ तथा ‘पृथ्वी’ की पूजा की। आर्यों का विश्वास था कि द्यौस तथा पृथ्वी की अनुकम्पा से ही मानव-जीवन सम्भव था। इन दोनों को अन्य समस्त देवताओं का जन्मदाता मान लिया गया।

आकाश देवता को ‘वरुण’ कहा जाने लगा। पृथ्वी और आकाश के मध्य में विद्यमान समस्त वस्तुओं में वरुण का वास माना गया। ऋग्वेद में वरुण के दो रूपों का उल्लेख मिलता है। एक रूप में सुख-समृद्धि देने वाला, सहृदय, सृष्टि के निर्माता का, तो दूसरा रूप है विनाश तथा अभिशाप देने वाले का।

ऋग्वैदिक आर्यों की मान्यता थी कि वरुण की भक्ति, पूजा तथा प्रार्थना से वह प्रसन्न होता है और पापियों के पाप क्षमा कर देता है। कुछ विद्वानों का माना है कि वरुण की उपासना से ही आर्यों में कर्मवाद और भक्तिमार्ग के सिद्धान्तों का उदय हुआ। जब वरुण को वृत्रासुर ने बंदी बना लिया तब इंद्र ने वृत्रासुर को मारकर वरुण को मुक्त करवाया तथा तथा उसे पुनः देवत्व प्रदान किया।

वरुण के साथ ही ‘मित्र’ की भी पूजा की जाने लगी। आर्यों ने बहिर्जगत् के प्रकाश का मानवीकरण करके उसे ‘मित्र’ का नाम दिया। दोनों को संयुक्त रूप से ‘मित्रावरुण’ कहा गया। बहिर्जगत में ‘सूर्य’ का भी बड़ा महत्त्व था। अतः आर्यों ने सूर्य को भी देवता माना। उसे सम्पूर्ण चर-अचर का रक्षक तथा मनुष्यों के समस्त सत् असत् कर्मों का दृष्टा माना गया।

सूर्य के व्यापक रूप को ‘सविता’ कहा गया। सविता में सूर्य का व्यक्त तथा रात्रि को अव्यक्त रहने वाला रूप दोनों ही सम्मिलित हैं। सविता को पाप-मोचन देवता भी माना गया है।

ऋग्वैदिक आर्यों ने ‘विष्णु’ को विश्व का संरक्षक माना। विष्णु, भक्तों की प्रार्थना पर तुरन्त सहायता के लिए पहॅुंचने वाला देवता है। ऋग्वेद में उसके तीन पदों का उल्लेख है, जिसके अनुसार वह समस्त ब्रह्मण्ड में भ्रमण करता है। विष्णु के व्यापक स्वरूप के कारण उसे ‘उरु-गाय’ अर्थात् व्यापक रूप से गमनशील, और ‘उरु-क्रम’ अर्थात् व्यापक रूप से अतिक्रमण करने वाला आदि नामों से पुकारा गया है।

ऋग्वैदिक आर्यों के लिए विष्णु के समान ही ‘अग्नि’ का भी विशेष महत्त्व था। ऋग्वेद में अग्नि की प्रार्थना सम्बन्धी लगभग 200 मंत्र हैं जो अग्नि के महत्त्व को प्रकट करते हैं। यज्ञ में अग्नि का विशेष महत्त्व था। इसीलिए उसे ‘पुरोहित’, ‘यज्ञिय’ और ‘होता’ कहा गया। अग्नि को देवताओं का मुख्य माना गया है, क्योंकि उसी के द्वारा आहुतियाँ समस्त देवताओं तक पहुँचती हैं। दाहकर्म के लिए भी अग्नि अनिवार्य थी। अग्नि को समस्त लोकों के राक्षसों को भगाने वाला कहा गया है।

वैदिक आर्य ‘सोमरस’ के प्रेमी थे। उन्होंने ‘सोम’ को भी देवता मान लिया तथा सोम को सूर्य और विद्युत से उत्पन्न हुआ बताया। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में वनस्पति से इस पेय के तैयार करने की विधि का वर्णन मिलता है परन्तु इस वनस्पति की सही पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। देवताओं के अनुरोध पर सोम चंद्रमा में समा गया जहाँ से वह जल एवं वनस्पतियों को प्राप्त हुआ।

आँधी, तूफान और वर्षा का देवता ‘इन्द्र’ था। ऋग्वेद में इसे सर्वाधिक शक्तिशाली देवता माना गया है। उसे आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी से भी अधिक बड़ा माना गया है। एक स्थान पर उसे ‘वृत्र’ नामक असुर का वध करके बादलों में रुके हुए जल को मुक्त कराने वाला कहा गया है। वृत्र को शीत, कोहरे और पाले का असुर माना गया है।

ऋग्वेद में इन्द्र की प्रार्थना करने वाली लगभग 250 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में उपरोक्त देवताओं के साथ-साथ मरुत, वात, पर्जन्य, अश्विन, यम, रुद्र, पूषण आदि देवताओं का उल्लेख है। देवियों में उषा, अदिति, सिन्धु, आरुयानी और सरस्वती के नाम उल्लेखनीय हैं। ‘उषा’ का अर्थ है- अरुणोदय के पूर्व की वेला। ‘अदिति’ का अर्थ है- सर्वव्यापिनी प्रकृति। ‘आरुयानी’ का तात्पर्य वन-देवी से है और मानवी बुद्धि का दैवीकरण ‘सरस्वती’ के रूप में किया गया था।

(4.) देवताओं का मानवीकरण

ऋग्वेद के अधिकांश मंत्र, विभिन्न देवताओं की स्तुतियाँ हैं। आराध्य और उपास्य देवों की प्रशंसा करते हुए ऋषिगण उनके गुणों का निर्देशन करते हैं। प्रारम्भिक स्तुतियाँ देवताओं को प्राकृतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं किन्तु बाद में अग्नि को अग्निदेव तथा सूर्य को सूर्यदेव आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया गया है।

इससे आभास होता है कि प्राकृतिक शक्ति को ही दिव्य शक्ति में परिवर्तित किया गया। इसके लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। उनमें मानव अथवा पशु गुणों का आरोपण करके उन्हें जीवित शक्तियाँ माना। धीरे-धीरे प्रत्येक देवता की एक पत्नी भी स्वीकार कर ली गई तथा उसे देवी माना गया। कालान्तर में वैदिक देवता और देवियों में मानवीय दुर्बलताओं का भी दिग्दर्शन किया गया तथा यह माना गया कि वे मनुष्यों की तरह कार्य कर  सकते हैं।

(5.) देवताओं का वर्गीकरण

ऋग्वेद में 33 देवताओं की प्रार्थना की गई है जिन्हें तीन वर्गों में बांटा गया है। प्रत्येक वर्ग में 11 देवता हैं, जिनमें से एक सर्वप्रधान है- (1) आकाश के देवता- आकाश के देवता में द्यौस, वरुण, मित्र, सविता, पूषण, उषा, अदिति तथा अश्विन आदि सम्मिलित थे। आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता सूर्य हैं। (2) मध्य-स्थान के देवता- मध्य स्थान के देवताओं में इन्द्र, मरुत, वायु, पर्जन्य आदि आते हैं। मध्य-स्थान के सर्वश्रेष्ठ देवता वायु अथवा इन्द्र हैं। (3) पृथ्वी के देवता- पृथ्वी के देवताओं में पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती आदि आते थे। पृथ्वी के प्रधान देवता अग्नि हैं।

(6.) देवताओं की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक-काल के देवताओं में कुछ निश्चित विशेषताएँ पाई जाती हैं- (1) समस्त देवी-देवता सदाचार तथा नैतिकता के प्रतीक हैं। (2) समस्त देवता दयावान तथा शुभचिन्तक हैं। कोई भी देवता दुष्ट स्वभाव का नहीं है। (2) समस्त देवता अलग-अलग गुणों एवं शक्तियों वाले हैं और इनके कार्य भी विभिन्न प्रकार के हैं। (3) समस्त देवता जन्म लेते हैं परन्तु फिर अमर हो जाते हैं। (4) समस्त देवता वायु में भ्रमण करते हैं जिनके रथों में घोड़े अथवा अन्य पशु-पक्षी जुते रहते हैं। (5) इन्हें मानव-स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है तथा इन्हें मनुष्य के खाद्य-पदार्थ, यथा दूध, अन्न आदि की बलि दी जाती है।

(7.) देवियों की तुलना में देवताओं को प्रमुखता

आर्यों ने उषा काल का प्रतिनिधित्व करने वाली उषस् और अदिति जैसी देवियों की भी पूजा की किंतु ऋग्वैदिक-काल में इन देवियों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। पितृत्ंत्रात्मक समाज के वातावरण में देवियों की अपेक्षा इन्द्र एवं वरुण आदि देवताओं को अधिक महत्त्व मिलना स्वाभाविक था।

(8.) धार्मिक कृत्य

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देवताओं की आराधना मुख्यतः स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से की जाती थी। ऋग्वैदिक-काल में स्तुति पाठ का बड़ा महत्त्व था। स्तुति पाठ अकेले और सामूहिक रूप में होते थे। आर्यों का विश्वास था कि प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचती है और ईश्वर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होता है। गायत्री मन्त्र का बड़ा महत्त्व था और इसका पाठ दिन में तीन बार अर्थात् प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या समय किया जाता था। आरम्भ में प्रत्येक कबीले अथवा कुल का अपना एक विशिष्ट देवता होता था। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण कबीले के सदस्य इस स्तुतिगान में भाग लेते थे। ‘यज्ञ’ ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना पद्धति के मुख्य अंग थे। इसलिए ऋग्वेद-धर्म को ‘यज्ञ-धर्म’ कहा जाता है। यज्ञों में अन्न, घी, जौ तथा सुगन्धित सामग्री की आहुति दी जाती थी तथा देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना की जाती थी। प्रारम्भ में प्रत्येक आर्य यजन कार्य स्वयं करत था, परन्तु बाद में ब्राह्मण अथवा पुरोहित की सहायता ली जाने लगी। सम्पूर्ण ‘जन’ अर्थात् ‘कबीले’ द्वारा दी जाने वाली यज्ञबलि को ग्रहण करने के लिए अग्नि और इंद्र का आह्नान किया जाता था। ऋग्वैदिक-काल में यज्ञाहुति के अवसर पर कोई अनुष्ठान अथवा मंत्रपाठ नहीं होता था। उस समय शब्द की चमत्कारिक शक्ति को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था जितना उत्तर-वैदिक-काल में दिया जाने लगा था।

ऋग्वैदिक-काल में आर्य, आध्यात्मिक उन्नति अथवा मोक्ष के लिए देवताओं की आराधना नहीं करते थे। वे इन देवताओं से मुख्यतः संतति, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि मांगते थे। ऋग्वेद में वृहत एवं व्ययात्मक यज्ञों का भी उल्लेख मिलता है, जो प्रायः राजाओं और धनी व्यक्तियों द्वारा करवाए जाते थे।

(9.) पितरों की पूजा

ऋग्वैदिक आर्यों में पितरों की पूजा प्रचलित थी। उनका मानना था कि पितरों की कृपा प्राप्त करने से कष्ट क्षीण होते हैं।

(10.) सदाचार पर बल

ऋग्वैदिक आर्यों में सदाचार पर बहुत बल दिया जाता था। चोरी, डकैती, मिथ्या भाषण, निरपराधों एवं निःशक्तों की हत्या, पराये धन का हरण आदि कार्य निकृष्ट माने जाते थे। जादू, टोना-टोटका, धोखा, व्यभिचार आदि को पाप समझते थे। ऋग्वेद में पाप पुण्य और स्वर्ग-नर्क की परिकल्पना भी मिलती है। आर्यों का विश्वास था कि पुण्यकर्म करने वाले लोग मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग में रहते हैं तथा पापकर्म करने वाले लोग नर्क एवं अन्धकूप में धकेले जाते हैं।

(11.) दान

ऋग्वैदिक आर्यों में दान देने की परम्परा थी। आर्य अपने पुरोहितों को गाय, रथ, घोड़े, दास-दासियां दान करते थे। पुरोहितों को दान देने के जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गायों और स्त्री दासों के रूप में दान देना बताया गया है, भूखंड के रूप में कभी नहीं।

(12.) मंदिरों तथा मूर्तियों का अभाव

ऋग्वैदिक-काल में मन्दिरों का निर्माण नहीं हुआ था और न मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किन्तु ऋग्वेद में एक स्थान पर दस गायें देकर इन्द्र की प्रतिमा लेने का उल्लेख आया है। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वैदिक आर्य मूर्ति-पूजा से परिचित थे। उनकी पूर्ववर्ती एवं समकालीन सैन्धव सभ्यता में मूर्ति-पूजा बड़े स्तर पर प्रचलित थी।

(13.) आत्मा एवं मोक्ष सम्बन्धी विचार

आर्य लोग अमरता में विश्वास करते थे। कुछ विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक आर्यों में पुनर्जन्म की भावना का उदय हो चुका था। ऋग्वेद में मोक्ष का उल्लेख नहीं मिलता परन्तु पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कहना कठिन है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ उसे सहज मानव धर्म का स्वरूप प्रदान करती हैं जो दूसरों के प्रति करुणा तथा सहअस्तित्व के सिद्धांत में विश्वास रखता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

आर्यों का आर्थिक जीवन

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आर्यों का आर्थिक जीवन

आर्यों का आर्थिक जीवन अध्ययन की दृष्टि से दो भागों में रखा जा सकता है। पहला है- ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन और दूसरा है उत्तरवैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन। इस अध्याय में में हम ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन सरल था, उसमें जटिलता उत्पन्न नहीं हुई थी। प्रारंभिक ऋग्वैदिक आर्यों की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः पशुचारी थी, अन्न-उत्पादक नहीं थी, इसलिए लोगों से नियमित करों की उगाही बहुत कम होती थी। भूमि अथवा अनाज के दान के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता। समाज में कबीलाई बंधन शक्तिशाली थे। करों की उगाही अथवा भू-संपत्ति के आधार पर सामाजिक वर्ग अभी अस्तित्त्व में नहीं आए थे। इस काल की आर्थिक दशा इस प्रकार से थी-

(1) गाँवों की व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में रहते थे। ऋग्वेद में नगरों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। गाँव पास-पास होते थे। वन्य पशुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा के लिए मिट्टी के घरों वाली बस्तियों की झाड़ियों अथवा अन्य कांटों आदि से किलेबंदी की जाती थी। अधिकांश घर बांस तथा लकड़ी के बने होते थे।

(2) कृषि

ऋग्वैदिक आर्यों का प्रधान व्यवसाय कृषि था। प्रत्येक परिवार का अलग खेत होता था परन्तु चरागाह सबका एक होता था। खेती हल से की जाती थी। ऋग्वेद के आरंभिक भाग में फाल के उल्लेख मिलते हैं। उनके फाल सम्भवतः लकड़ी के बने होते थे। ऋग्वैदिक लोग बुवाई, कटाई और मंडाई से परिचित थे। उन्हें विभिन्न ऋतुओं की भी अच्छी जानकारी थी। ये लोग प्रधानतः गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे। इस काल के आर्य, फल तथा तरकारी भी पैदा करते थे।

(3) पशु-पालन

ऋग्वैदिक आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशु-पालन था। पशुओं में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयोगी होती थी। गाय को अध्न्या कहा गया है अर्थात् जो मारी न जाय। ऋग्वेद में गाय के बारे में आए बहुत सारे उल्लेखों से यही सिद्ध होता है कि आर्य पशुपालक थे। अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने गायों के लिए लड़ी थीं।

ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का उपयोग हुआ हैं। जिसका अर्थ ‘गायों की खोज’ होता है। गाय को सबसे बड़ी सम्पत्ति समझा जाता था। बैलों से हल जोतने तथा गाड़ी खींचने के काम लिया जाता था। घोड़ों का प्रयोग रथों में किया जाता था। आर्यों द्वारा पाले जाने वाले अन्य पशु, भेड़, बकरी तथा कुत्ते थे। कुत्ते घरों तथा बस्तियों की रखवाली करते थे।

(4) पशुओं का शिकार

ऋग्वैदिक आर्य मांस खाते थे। इसलिए वन्य पशुओं का शिकार भी उनकी जीविका का साधन था। ये लोग धनुष-बाण तथा लोहे के भालों द्वारा सूअर, हरिण तथा भैंसों का शिकार करते थे और पक्षियों को जाल में फंसा कर पकड़ते थे। शेरों को चारों ओर से घेर कर मारा जाता था।

(5) मृद्भाण्ड

हरियाणा के भगवानपुरा से और पंजाब के तीन स्थलों से चित्रित धूसर मृदभांड और बाद के काल के हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। भगवानपुरा में मिली वस्तुओं का तिथि निर्धारण ई.पू.1600 से ई.पू.1000 तक किया गया है। ऋग्वेद की रचना इस काल में हो रही थी। इन चारों स्थानों का भौगोलिक क्षेत्र वही है जो ऋग्वेद में दर्शाया गया है।

यद्यपि इन चारों स्थलों पर चित्रित धूसर पात्र मिले हैं फिर भी यहाँ से न तो लौह-सामग्री और न ही अनाज मिले हैं। अतः हम चित्रित धूसर मृद्भांड की एक लौह-पूर्व अवस्था के बारे में सोच सकते हैं जो ऋग्वैदिक अवस्था की समकालिक है।

(6) दस्तकारी के कार्य

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ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पकारों के उल्लेख मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि आर्य लोग इन शिल्पों से भली-भांति परिचित थे। तांबे अथवा कांसे के लिए प्रयुक्त अयस शब्द से ज्ञात होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। जब वे उप-महाखंड के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे तब वे सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते होंगे। ऋग्वैदिक-काल के बढ़ई रथ तथा गाड़ियाँ बनाते थे। ये लोग लकड़ी के प्याले भी बनाते थे और उन पर बहुत अच्छी नक्काशी करते थे। शिल्पी ताम्बे एवं कांसे के विभिन्न प्रकार के बर्तन, अस्त्र-शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। सुनार, सोने-चांदी के आभूषण बनाते थे। चर्मकार लोग चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे। सीना-पिरोना, चटाइयां बुनना, ऊनी तथा सूती कपड़े बनाना आदि भी जीविका के साधन थे। कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

(7) व्यापार

ऋग्वैदिक आर्यों की जीविका का एक साधन व्यापार भी था। ये लोग विदेशी तथा आन्तरिक दोनों प्रकार का व्यापार करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु-विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी से बनी मुद्राओं का प्रयोग होने लगा। इस काल में निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा। कपड़े, चमड़े तथा चद्दरें व्यापार की मुख्य वस्तुएँ होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग होता था।

(8) ऋण की प्रथा

ऋग्वैदिक-काल में ब्याज पर ऋण देने की प्रथा थी। वैश्य, साहूकार तथा महाजन यह कार्य करते थे और यह उनकी जीविका का प्रमुख साधन होता था। ऋण चुकाना एक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था और न चुकाने पर उसे निश्चित समय तक महाजन की सेवा करनी पड़ती थी।

ऋग्वैदिक सामाज में कलाओं का विकास

बौद्धिक परिपक्वता के कारण ऋग्वैदिक-काल के लोगों ने विभिन्न प्रकार की रचनात्मक कलाओं का विकास किया। वे सही अर्थों में कला-प्रेमी थे।

(1) काव्य कला

ऋग्वैदिक आर्य, काव्य-कला में बड़े कुशल थे। ऋग्वेद पद्य शैली में लिखा गया है। ऋग्वेद का अधिकांश काव्य धार्मिक गीति-काव्य है। इस काल की कविता में स्वाभाविकता तथा सौन्दर्य है। उषा की प्रशंसा में ऋषियों ने बड़ी भावुकता प्रकट की है।

(2) लेखन कला

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्य लेखन-कला से परिचित थे अथवा नहीं परन्तु डॉ. भण्डारकर आदि अनेक विद्वानों की धारणा है कि वे इस कला को जानते थे। उस काल के मृदभाण्डों पर बनी आकृतियां ब्राह्मी लिपि जैसी दिखती हैं।

(3) अन्य कलाएँ

ऋग्वैदिक आर्य अन्य कई कलाओं में प्रवीण थे। गृह निर्माण-कला में वे इतने निपुण थे कि सहस्र-स्तम्भ तथा सहस्र-द्वार के भवनों का निर्माण करते थे। ऋग्वैदिक आर्य कताई, बुनाई, रगांई, धातु-कला, संगीत कला, नृत्य कला एवं गायन कला में भी निपुण थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

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उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी उस काल के साहित्य से मिलती है। इस काल में आर्यों ने उन्नत राजनीतिक व्यवस्था विकसित कर ली थी।

ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद एवं ब्राह्मण ग्रंथों (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) की रचना हुई। ऋग्वेद के बाद में लिखे गए, इन ग्रन्थों के रचना काल को उत्तर-वैदिक-काल कहते हैं। पी. वी. काणे के अनुसार उत्तर-वैदिक-कालीन ग्रंथ, उत्तरी गंगा की घाटी में लगभग ई.पू.1000-600 में रचे गए थे। ऋग्वैदिक तथा उत्तर-वैदिक-काल की सभ्यता एवं संस्कृति में पर्याप्त अन्तर है।

उत्तर-वैदिक सभ्यता स्थलों की पुरातात्त्विक खुदाइयों एवं अन्वेषण के परिणाम स्वरूप 500 बस्तियों के अवशेष मिले हैं। इन्हें चित्रित धूसर भाण्ड वाले स्थल कहते हैं क्योंकि इन स्थलों पर बसे हुए लोगों ने मिट्टी के चित्रित एवं भूरे कटोरों और थालियों का उपयोग किया। वे लोहे के औजारों का भी उपयोग करते थे। बाद के वैदिक ग्रंथों और चित्रित धूसर भाण्डों के लौह अवस्था वाले पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर हम ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान के लोगों के जीवन के बारे में कुछ जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

उत्तर-वैदिक-कालीन बस्तियाँ

कृषि और विविध शिल्पों के कारण उत्तर-वैदिक-काल के लोग अब स्थायी जीवन बिताते थे। पुरातात्त्विक खुदाई तथा अन्वेषण से हमें उत्तर-वैदिक-काल की बस्तियों के बारे में कुछ जानकारी मिलती है। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थान न केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली (कुरु-पांचाल) में, अपितु पंजाब एवं हरियाणा के समीपवर्ती क्षेत्र मद्र और मत्स्य (राजस्थान) में भी मिले हैं। कुल मिलाकर ऐसे 500 स्थल मिले हैं जो प्रायः ऊपरी गंगा की घाटी में स्थित हैं।

इनमें से हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा और नोह जैसे चंद स्थलों की ही खुदाई हुई है। चूँकि यहाँ की बस्तियों के भौतिक अवशेष एक मीटर से तीन मीटर की ऊँचाई तक व्याप्त हैं, इसलिए अनुमान होता है कि यहाँ एक से तीन सदियों तक बसवाट रही। ये अधिकतर नई बस्तियाँ थीं। इनके पहले इन स्थानों पर बस्तियाँ नहीं थीं। लोग मिट्टी की ईटों के घरों में अथवा लकड़ी के खंभों पर आधारित टट्टर और लेप के घरों में रहते थे।

यद्यपि उनके घर घटिया प्रकार के थे परन्तु चूल्हों और अनाजों (चावल) के अवशेषों से पता चलता है कि चित्रित धूसर भांडों का उपयोग करने वाले उत्तर-वैदिक-कालीन लोग खेती करते थे और स्थायी जीवन बिता रहे थे। वे लोग लकड़ी के फालों वाले हल से खेत जोतते थे, इसलिए किसान अधिक पैदा नहीं कर पाते थे। इस समय का किसान, नगरों के उत्थान में अधिक योगदान करने में समर्थ नहीं था।

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तर-वैदिक-काल में आर्यों की राजनीतिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया था। इस काल में राजन्य ने शेष तीन वर्णों पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। ऐतरेय ब्राह्मण में राजन्य के सापेक्ष, ब्राह्मण को जीविका-खोजी और दान ग्रहण करने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसे हटाया जा सकता था। वैश्य को दान देने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसका इच्छापूर्वक दमन किया जा सकता था। सबसे कठोर बातें शूद्रों के बारे में पढ़ने को मिलती हैं। उसे दूसरों का सेवक, दूसरों के आदेश पर काम करने वाला और दूसरों द्वारा मनमर्जी से पीटने योग्य कहा गया है।

(1.) शासन क्षेत्र में परिवर्तन

ऋग्वैदिक आर्यों की राज-सत्ता केवल सप्त-सिन्धु क्षेत्र तक सीमित थी, परन्तु उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में वे पंजाब से लेकर गंगा-यमुना के दोआब में स्थित समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गए थे। भरत और पुरु नामक दो प्रमुख कबीले एकत्र हुए और इस प्रकार कुरु-जन कहलाए। आरम्भ में ये लोग दोआब के सीमांत में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश में बसे हुए थे परन्तु कुरुओं ने शीघ्र ही दिल्ली और दोआब के उत्तरी भाग पर अधिकार जमा लिया।

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इस क्षेत्र को कुरुदेश कहते हैं। शनैःशनैः ये लोग पंचालों से मिलते गए। वर्तमान बरेली, बदायूँ और फर्रूखाबाद जिलों में फैला हुआ, उस समय का पंचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण पुरोहितों के लिए प्रसिद्ध था। कुरु-पंचालों का दिल्ली और उत्तरी तथा मध्य दोआब पर अधिकार स्थापित हो गया। मेरठ जिले के हस्तिनापुर स्थान पर उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की। महाभारत युद्ध की दृष्टि से कुरु कबीले के इतिहास का बड़ा महत्त्व है, और यही युद्ध महाभारत की प्रमुख घटना है। समझा जाता है कि यह युद्ध ई.पू.950 के आसपास कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया था। ये दोनों ही कुरु जन के सदस्य थे। परिणामतः लगभग सम्पूर्ण कुरु कबीला नष्ट हो गया। कालान्तर में आर्यों ने दक्षिण-भारत में भी अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार आरम्भ किया। उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम चरण में, ई.पू.600 के आसपास, वैदिक लोग दोआब से पूर्व की ओर कोशल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और विदेह (उत्तरी बिहार) में फैल चुके थे। यद्यपि कोसल का रामकथा से बड़ा सम्बन्ध है, पर वैदिक साहित्य में राम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में वैदिक आर्यों को ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों और काले एवं लाल रंग के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे।

ये लोग यहाँ लगभग 1800 ई.पू. में बसे हुए थे। आर्यों को इस क्षेत्र में सम्भवतः ऐसे लोगों की बस्तियां भी जहां-तहां मिलीं जो काले और लाल बर्तनों का उपयोग करते थे। अनुमान होता है कि ये लोग एक मिश्रित संस्कृति वाले थे जिसे हड़प्पा कालीन संस्कृति नहीं कहा जा सकता। उत्तर-वैदिक लोगों के शत्रु जो भी रहे हों, उनका प्रत्यक्षतः किसी बड़े और सुसम्बद्ध क्षेत्र पर अधिकार नहीं था और उनकी संख्या उत्तरी गंगा की घाटी में बहुत अधिक नहीं थी, विस्तार के दूसरे चरण में भी उत्तर-वैदिक आर्यों की सफलता का कारण लोहे के औजारों और घोड़ों वाले रथों का उपयोग किया जाना था।

(2.) राजन्य की शक्तियों में वृद्धि

ऋग्वैदिक-काल में राज्य का आकार बहुत छोटा होता था परन्तु उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना की गई और राजन्य अर्थात् राजा पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गए। अब वीर विजयी राजन्य स्वयं को र्साभौम, एकराट् आदि उपाधियों से विभूषित करने लगे। राजन्य अपने प्रभाव में वृद्धि के लिए राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध आदि यज्ञ करने लगे। ये यज्ञ राजन्य की सार्वभौम सत्ता के सूचक होते थे।

समझा जाता था कि राजसूय यज्ञों से राजाओं को दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। अश्वमेध यज्ञ में जितने क्षेत्र में राजा का घोड़ा निर्बाध विचरण करता था उतने क्षेत्र पर उस राजा का अधिकार हो जाता था। वाजपेय यज्ञ में अपने सगोत्रीय बंधुओं के साथ रथों की दौड़़ होती थी। इन सब आयोजनों और अनुष्ठानों से लोग प्रभावित होते थे। साथ ही राजा की शक्ति और प्रभाव भी बढ़ता था। अब राजन्य को देवता का स्वरूप समझा जाने लगा। राजन्य की आज्ञा का पालन करना आवश्यक था। यद्यपि राजन्य का पद अब भी वंशानुगत था परन्तु निर्वाचन-प्रणाली भी आरम्भ हो गई थी। निर्वाचन राजवंश तक ही सीमित था।

(3.) जनपद एवं राष्ट्र की धारणा का उदय

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में राज्य के विस्तार के साथ राजन्य अथवा राजा की शक्ति बढ़ती गई। कबीलाई अधिकार प्रदेश-विशेष तक सीमित थे। राजन्य का शासन कई कबीलों पर होता था परन्तु आर्यों के प्रमुख कबीलों ने उन प्रदेशों पर भी अधिकार जमा लिया जहाँ दूसरे कबीले बसे हुए थे। आरम्भ में प्रत्येक प्रदेश को वहाँ बसे हुए कबीले का नाम दिया गया था, पर अंत में जनपद नाम, प्रदेश नाम के रूप में रूढ़ हो गया। आरम्भ में पंचाल एक कबीले का नाम था परन्तु बाद में यह एक प्रदेश का नाम हो गया। राष्ट्र शब्द, जो प्रदेश का सूचक है, पहली बार इसी काल में प्रकट हुआ।

(4.) सीमित राजतंत्र

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में राजन्य ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अधिक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश हो गया था परन्तु राजन्य पर पुरोहित का नियन्त्रण होता था। पुरोहित सोम को अपना राजन्य मानता था और वह राजन्य की समस्त आज्ञाएँ मानने के लिए बाध्य नहीं था।

कभी-कभी पुरोहित, राजन्य के विरुद्ध विद्रोह भी कर देता था। राजन्य को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह पुरोहित के साथ कभी भी धोखा नहीं करेगा। राज्य के नियमों की पालना करना तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना राजन्य का परम धर्म होता था। राजन्य पर धर्म का भी बहुत बड़ा नियन्त्रण रहता था। अतः उसे धर्मानुकूल शासन करना होता था। 

(5.) पदाधिकारियों में वृद्धि

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा पदाधिकारियों की संख्या तथा उनके अधिकारों में बड़ी वृद्धि हो गयी। ऋग्वैदिक-काल में केवल तीन पदाधिकरी थे- पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी परन्तु अब स्थपति, निषाद-स्थपति, शतपति आदि नये पदाधिकारी भी उत्पन्न हो गए थे।

स्थपति सम्भवतः राज्य के एक भाग का शासक होता था और उसे शासन के साथ-साथ न्यायिक कार्य भी करने होते थे। निषाद-स्थपति सम्भवतः उस पदाधिकरी को कहते थे जो उन आदिवासियों पर शासन करता था, जिन पर आर्यों ने विजय प्राप्त कर ली थी।

शतपति नामक पदाधिकरी के अनुशासन में सम्भवतः सौ गाँव रहते थे। अब पुराने पदाधिकारियों के अधिकारों में भी वृद्धि हो गयी थी। राजन्य अपने सिंहासन से उतर कर पुरोहित को प्रणाम करता था। अब राजन्य रण-क्षेत्र में कम ही जाया करता था, इसलिए सेनानी रण-क्षेत्र में सेना का संचालन करता था। फलतः उसके प्रभाव में भी वृद्धि हो गयी थी।

उत्तर-वैदिक-काल में भी राजन्य की कोई स्थायी सेना नहीं होती थी। युद्ध के अवसर पर जन से सैनिक टुकड़ियां एकत्र की जाती थीं। युद्ध में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अनुष्ठान यह था कि राजन्य को अपनी प्रजा (विश्) के साथ एक पात्र में भोजन करना पड़ता था। ग्रामणी के अधिकार तथा प्रभाव में तो इतनी वृद्धि हो गयी थी कि उसे राजकृत अर्थात् राजन्य को बनाने वाला कहने लगे थे। राजकाज चलाने में राजमहिषी भी राजन्य की सहायता करती थी।

(6.) सभा तथा समिति के अधिकारों में कमी

यद्यपि सभा तथा समिति का अस्तित्त्व उत्तर-वैदिक-काल में भी बना रहा परन्तु अब उनके अधिकार तथा प्रभाव में बड़ी कमी हो गयी। समिति बड़ी संस्था थी और सभा छोटी। अब राज्य-विस्तार बढ़ जाने के कारण समिति का जल्दी-जल्दी बुलाया जाना सम्भव नहीं था। इसलिए राजन्य उसके परामर्श की उपेक्षा करने लगा और अधिकांश कार्य अपने निर्णय से करने लगा। सभा का महत्त्व भी घट गया।

(7.) न्याय व्यवस्था में सुधार

उत्तर-वैदिक-कालीन न्याय-व्यवस्था ऋग्वैदिक-काल की न्याय-व्यवस्था की अपेक्षा अधिक सुदृढ़़ तथा व्यापक हो गई थी। अब राजन्य न्यायिक कार्य में पहले से अधिक रुचि लेने लगा परन्तु वह अपने न्यायिक अधिकारों को प्रायः अपने पदाधिकारियों को दे देता था।

गाँवों के झगड़ों का निर्णय ग्राम्यवादिन करता था जो गाँव का न्यायाधीश होता था। ब्राह्मण की हत्या बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। ब्राह्मण को प्राण-दण्ड नहीं दिया जाता था। सोने की चोरी तथा सुरापान बड़े अपराध समझे जाते थे। दीवानी मुकदमों का निर्णय प्रायः पंचों द्वारा किया जाता था।

(8.) जनपद राज्यों का आरम्भ

उत्तर-वैदिक-काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जनपद राज्यों का आरम्भ हुआ। न केवल गोधन की प्राप्ति के लिए, अपितु भूमि पर अधिकार के लिए भी युद्ध होने लगे। कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया महाभारत युद्ध सम्भवतः इसी काल में हुआ।

(9.) राजन्य को भेंट व्यवस्था

वैदिक-काल का प्रधानतः पशुपालक समाज, अब कृषक बन गया। अब वह अपने राजन्य को प्रायः भेंट देने में समर्थ था। कृषकों के बल पर राजाओं की शक्ति बढ़ी और उन्होंने उन पुरोहितों को खूब दान-दक्षिणा दी जिन्होंने वैश्यों अर्थात् सामान्य प्रजा के विरोध में अपने आश्रयदाताओं की सहायता की। शूद्रों के छोटे समुदाय का काम सेवा करना था।

(10.) कर व्यवस्था

इस काल में करों की वसूली और दक्षिणा आम बात हो गई। इन्हें सम्भवतः संगृहित्री नामक अधिकारी जमा करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

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उत्तरवैदिक समाज

नारद संहिता, गार्गी संहिता और वृहत संहिता ज्योतिष साहित्य के ऐसे ग्रन्थ हैं जिनसे उत्तरवैदिक समाज की जानकारी प्राप्त होती है। कल्पसूत्र साहित्य में विविध सामाजिक और धार्मिक विधि-विधानों तथा नियम- निर्देशों का वर्णन है। यद्यपि उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के गृह-निर्माण, वेश-भूषा, खान-पान, मनोरंजन आदि में विशेष परिवर्तन नहीं हुए थे परन्तु सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन हुए।

उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की सामाजिक दशा

(1.) पिता की शक्तियों में वृद्धि

उत्तरवैदिक समाज में, परिवार में पिता की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई। अब पिता अपने पुत्र को उत्तराधिकार से वंचित कर सकता था। राज-परिवारों में ज्येष्ठाधिकार को अधिकाधिक महत्त्व दिया जाने लगा। राज-परिवारों के अतिरिक्त अन्य परिवारों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति पर पिता के समस्त पुत्रों का समान अधिकार होता था। कभी-कभी पिता अपने जीवन-काल में ही अपने पुत्रों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति का विभाजन कर देता था और फिर उन्हें अपना अलग परिवार बसाने की अनुमति दे-देता था। इस काल में पूर्व-पुरुषों की पूजा होने लगी।

(2.) उत्तरवैदिक समाज में गोत्र व्यवस्था

उत्तर-वैदिक-काल में गोत्र व्यवस्था दृढ़ हुई। गोत्र शब्द का अर्थ है गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समस्त कुल के गोधन को एक साथ रखा जाता था परन्तु बाद में इस शब्द का अर्थ हो गया- एक मूल पुरुष के वंशज। गोत्रीय बहिर्विवाह की प्रथा आरम्भ हो गई। एक ही गोत्र अथवा पूर्व-पुरुष वाले समुदाय के सदस्यों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लग गया।

(3.) नगरों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में निवास करते थे। ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है परन्तु जब उत्तर-वैदिक आर्य गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदानों में आ गए तब उन्होंने बड़े-बड़े नगरों को बसाया तथा नगरों में निवास करना आरम्भ किया। अब यही नगर, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन के केन्द्र बन गए। नगरों की वास्तविक शुरूआत का आभास उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर में मिलता है। हस्तिनापुर और कौशाम्बी को उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर के आदिम पद्धति के नगर माना जा सकता है। इन्हें प्राक्-नगरीय स्थल कहा जा सकता है।

(4.) खान-पान

उत्तरवैदिक समाज के आर्यों का भोजन ऋग्वैदिक-काल जैसा ही था। उसमें विशेष अन्तर नहीं आया था। अन्न, दूध, वनस्पति से बने हुए पदार्थ एवं माँस उनके भोजन के मुख्य अंग थे। अन्न में गेहूँ, जौ, चावल मुख्य थे। चावल की खेती अधिक की जाने लगी थी। दूध से दही, मक्खन और घी तैयार किया जाता था। दूध में दूसरी वस्तुओं को पकाकर कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते थे।

 वैदिक साहित्य में ओदन, क्षीरोदन तथा तिलोदन आदि शब्दों का उल्लेख अनेक बार हुआ है। दूध में चावलों को पकाकर ‘क्षीरोदन’ अर्थात् खीर और तिलों को पकाकर ‘तिलोदन’ बनाई जाती थी। ऋग्वैदिक-काल की भाँति इस युग में भी साग-सब्जियों तथा फलों का सेवन प्रचुरता से होता था। सामान्यतः भेड़, बकरा-बकरी, बैल और कभी-कभी घोड़े का माँस खाया जाता था। शिकार में मारे गए पशु-पक्षियों का मांस भी खाया जाता था किंतु सामान्यतः मांस-भक्षण को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था, ब्राह्मणों के लिए इसका निषेध हो गया था।

अथर्ववेद के एक सूक्त में मांस-भक्षण तथा सुरापान को पाप बताया गया है। अतः स्पष्ट है कि अंहिसा के विचार को श्रेष्ठ समझा जाता था। अब सोम के स्थान पर मासर, पूतिका, अर्जुनानी आदि अन्य पेय पदार्थों का प्रयोग होने लगा था। समाज के निम्न वर्गों में सुरापान बढ़ रहा था।

(5.) स्त्रियों की दशा में परिवर्तन

उत्तरवैदिक समाज में स्त्रियों की दशा पहले से बिगड़ गई। राजवंशों तथा सम्पन्न परिवारों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित हो गई थी। इसलिए घरों में स्त्रियों का जीवन कलहपूर्ण हो गया। कन्याओं को दुःख का कारण समझा जाने लगा। अथर्ववेद में पुत्री के जन्म पर खिन्नता का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर पुत्री के लिए ‘कृषण’ शब्द का उल्लेख किया गया है।

‘गोमिल-गृह सूत्र’ में कन्याओं द्वारा यज्ञोपतीत धारण करने का उल्लेख मिलता है। यज्ञोपवीत विधाध्ययन का चिह्न है। स्पष्ट है कि इस युग में भी स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। उपनिषदों में कुछ विदुषी स्त्रियों का उल्लेख है। जनक की राजसभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया था। गन्धर्व-गृहीता नामक महिला परम विदुषी तथा भाषण कला में निपुण थी। मैत्रेयी जैसी विदुषी महिला भी इसी युग में हुई। यज्ञादि धार्मिक अवसरों और सार्वजनिक सभाओं में स्त्रियाँ अब भी भाग लेती थीं।

गोद लेने की प्रथा का विकास हो गया था। गोद के लिए भाई की सन्तान को प्राथमिकता दी जाती थी। कुछ कन्याएँ अविवाहित रूप में आजीवन अपने पति के परिवार में रहती थी। यदा-कदा कन्याओं का विक्रय होता था और दहेज-प्रथा प्रचलित हो गई थी। विधवा स्त्री के लिए नियोग की प्रथा अब भी प्रचलित थी। विधवा स्त्री को विवाह करने का अधिकार था। सती-प्रथा का उल्लेख इस युग में भी नहीं मिलता है। पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं हुआ था।

(6.) उत्तरवैदिक समाज में वैवाहिक सम्बन्ध में जटिलता

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उत्तरवैदिक समाज में विवाह को पवित्र एवं आवश्यक संस्कार समझा जाता था किंतु विवाह सम्बन्धी नियम कठोर हो गए थे। अविवाहित पुरुष को यज्ञ करने का अधिकार नहीं था। यज्ञादि के लिए पुत्र का होना आवश्यक था और पुत्र-प्राप्ति के लिए विवाह आवश्यक था। ‘सगोत्री विवाह’ अच्छा नहीं समझा जाता था। भिन्न गोत्र में विवाह करना अच्छा समझा जाता था। अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि विधवा-विवाह तथा बहु-विवाह प्रथाओं का प्रचलन हो गया था। मनु की दस पत्नियाँ थीं। याज्ञवल्क्य ऋषि के मैत्रेयी और कात्यायनी नामक दो पत्नियाँ थी। ऐतरेय ब्राह्मण में हरिश्चन्द्र नामक व्यक्ति की 100 पत्नियों का उल्लेख है परन्तु बहु-विवाह के ये उदाहरण धनी एवं राजपरिवारों तक ही सीमित थे। साधारण लोग केवल एक विवाह करते थे।  ‘एक पुरुष-एक पत्नी’, यही सामान्य व्यवस्था थी। एक स्त्री के एक से अधिक पति नहीं होते थे। विवाह युवावस्था में किया जाता था तथा बाल-विवाह का प्रचलन नहीं था। सपिण्ड, सगोत्र और सप्रवर विवाहों पर प्रतिबन्ध लगने लगा था और सूत्रकाल के आते-आते इस प्रकार के विवाहों पर स्पष्ट रूप से निषेध कर दिया गया। विवाह सामान्यतः सजातीय होते थे। उच्च-वर्ण की कन्या का विवाह निम्न-वर्ण में नहीं होता था।

उत्तरवैदिक साहित्य में अन्तर्जातीय विवाहों के उल्लेख भी मिलते हैं। तैतिरीय संहिता में आर्य पुरुष और शूद्र कन्या के विवाह का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण में ऋषि च्यवन और राजकन्या सुकन्या के विवाह का उल्लेख है। इस प्रकार के अन्तर्जातीय विवाहों के बारे में विद्वानों की मान्यता है कि साधारणतः श्रेष्ठ जाति के पुरुष निम्न जाति की स्त्रियों के साथ विवाह कर सकते थे। अर्थात् अनुलोम विवाह होते थे परन्तु प्रतिलोम विवाह वर्जित थे।

स्त्री, पुरुष की सहधर्मिणी थी तथा घर एवं समाज में स्त्री का बहुत सम्मान था। शतपथ ब्राह्मण में उसे पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है। धर्म-सूत्रों में तो स्त्रियों के प्रति उदार रुख अपनाया गया है। उदाहरणार्थ, वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है कि चाहे पत्नी दोषी हो, झगड़ालू हो, घर छोड़कर चली गई हो, उसके साथ बलात्कार हुआ हो, उसे त्यागा नहीं जाएगा।

धर्मसूत्रों में पत्नी को त्यागने वाले पति के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। आपस्तम्ब सूत्र में लिखा है कि जिस पति ने अन्याय से अपनी पत्नी का परित्याग किया हो, वह गधे का चमड़ा ओढकर प्रतिदिन सात गृहों में यह कहते हुए भिक्षा माँगे कि उस पुरुष को भिक्षा प्रदान करो, जिसने अपनी पत्नी को त्याग दिया है।

इस युग में माता के पद को बहुत उँचा और पवित्र समझा जाता था। वशिष्ठ सूत्र में माता का स्थान उपाध्याय, आचार्य और पिता से श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार इस युग में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि उत्तरवैदिक युग के अन्तिम चरण में स्त्रियों की स्थिति में काफी गिरावट आ गई थी। कन्याओं को बेचने तथा दहेज लेने के उल्लेख मिलते हैं।

ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि एक अच्छी स्त्री वह है जो उत्तर नहीं देती। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि पत्नी को पति के पहले भोजन नहीं करना चाहिए। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को दुःख का कारण माना गया है। मैत्रायनी संहिता में स्त्री को जुआ और शराब की भाँति पुरुष का दोष माना गया है।

(7.) उत्तरवैदिक समाज में वर्ण-व्यवस्था में जटिलता

ऋग्वैदिक युग के रथेष्ठ और राजन्य उत्तर-वैदिक-काल में क्षत्रिय कहलाने लगे। यज्ञकर्ता, ब्रह्मवादी एवं तत्त्वचिन्तक, ब्राह्मण कहलाते थे। कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य करने वाले लोगों को वैश्य कहा जाता था। अनार्य लोग शूद्र कहलाते थे। उत्तर-वैदिक-कालीन ग्रंथों में प्रथम तीन वर्णों को उच्च और शूद्रों को निम्न समझा जाता था।

तीनों उच्च वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों का उपनयन संस्कार होता था। चौथे वर्ण का उपनयन संस्कार नहीं हो सकता था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ गई थी। ब्राह्मणों को देवताओं का प्रिय माना जाने लगा। इस युग में सामाजिक प्रभुता तथा प्रतिष्ठा के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों में प्रतिस्पर्धा होती थी। इस कारण कुछ क्षत्रियों ने विशिष्ट ज्ञान अर्जित किया।

उनकी विद्वता से प्रभावित होकर ब्राह्मण भी उन क्षत्रियों के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाने लगे। श्वेतकेतु आरुणेय ने जैवलि नामक क्षत्रिय से और गार्ग्य नामक ब्राह्मण ने राजा अजातशुत्र से शिक्षा प्राप्त की थी।

ऋग्वैदिक-काल में वैश्य शब्द का उल्लेख नहीं है किंतु उत्तरवैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि वैश्यों का सामाजिक स्तर ब्राह्मणों तथा क्षत्रिय से निम्न था। चूँकि यह वर्ण विविध व्यवसायों के द्वारा राष्ट्र की समृद्धि के लिए प्रयत्नशील था, अतः इसकी उपेक्षा करना सम्भव नहीं था। इसलिए वैश्यों को भी विद्या की प्राप्ति तथा यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज कहा जाता था।

 शूद्रों पर कई तरह के प्रतिबंध थे किंतु राज्याभिषेक से सम्बन्धित ऐसे कई सार्वजनिक अनुष्ठान थे जिनमें शूद्र, सम्भवतः मूल कबीले के सदस्यों की हैसियत से भाग लेते थे। कुछ विशेष वर्गों के शिल्पियों को, जैसे रथकारों को, समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त था और उन्हें उपनयन संस्कार के अधिकारियों की सूची में सम्मिलित किया गया था।

उत्तरवैदिक समाज में वर्ण-व्यवस्था जाति-प्रथा का रूप लेती जा रही थी। कार्य अथवा व्यवसाय के स्थान पर जन्म, जाति का आधार होने लगा था। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल की चार जातियों के अतिरिक्त दो और जातियाँ बन गयी थीं। इनमें से एक निषाद कहलाती थी और दूसरी व्रात्य। निषाद लोग अनार्य थे। सम्भवतः ये लोग भील जाति के थे। व्रात्य लोग सम्भवतः आर्य एवं अनार्य रक्त-मिश्रण से उत्पन्न हुए थे। विभिन्न व्यवसायों के अनुसार बढ़ई, लोहार, मोची आदि उपजातियाँ बनने लगी थीं और अन्तर्जातीय-विवाह को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा था।

(8.) उत्तरवैदिक समाज में आश्रम-व्यवस्था की दृढ़ता

ऋग्वेद में आश्रम व्यवस्था  की जानकारी नहीं मिलती। उत्तरवैदिक-काल के ग्रन्थों में केवल तीन आश्रमों- (1.) ब्रह्मचर्य (2.) गृहस्थ (3.) वानप्रस्थ आश्रम की जानकारी मिलती है, अंतिम अथवा चौथे आश्रम की स्थापना स्पष्ट रूप से नहीं हुई थी। सूत्र-ग्रन्थों में चारों आश्रमों की जानकारी मिलती है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। आश्रम व्यवस्था केवल द्विज जातियों के लिए थी। शूद्रों के लिए एकमात्र गृहस्थ आश्रम ही बताया गया था।

(9.) वंशानुगत उद्योग-धन्धे

अब व्यवसाय वंशानुगत हो गया था और एक परिवार के लोग एक ही व्यवसाय करने लगे थे। यही कारण था कि उपजातियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

(10.) शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि

वैदिक यज्ञों में वृद्धि हो जाने के कारण शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि हो गई। यद्यपि शिक्षा का मुख्य विषय वेदों का अध्ययन ही था परन्तु वैदिक मन्त्रों के साथ-साथ विज्ञान, गणित, भाषा, युद्ध-विद्या आदि की भी शिक्षा दी जाने लगी। विद्यार्थी, गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करता था और ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करता था। शिक्षा समाप्त होने पर वह गुरु को दक्षिणा देकर घर आता था और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म ऋग्वैदिक काल के धर्म से थोड़ा अधिक जटिल था। उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः विभिन्न प्रकार के यज्ञों की अवधारणा पर आधारित था।

ऋग्वैदिक-काल का धर्म, सरल तथा आडम्बरहीन था परन्तु उत्तर-वैदिक काल का धर्म जटिल तथा आडम्बरमय हो गया। इस काल में उत्तरी दोआब में ब्रह्माण धर्म के प्रभाव के अंतर्गत आर्य संस्कृति का विकास हुआ। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण उत्तर-वैदिक साहित्य का संकलन कुरु-पांचाल प्रदेश में हुआ। यज्ञकर्म और इससे सम्बन्धित अनुष्ठान और विधियां इस संस्कृति की मेरूदंड थीं।

(1.) ब्राह्मणों की प्रधानता

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म ब्राह्मणों की प्रधानता पर आधारित था। इस काल में उनका महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना इसी काल में हुई। इन ग्रन्थों के रचयिता ब्राह्मण थे और इनका सम्बन्ध भी ब्राह्मणों से ही था। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के सच्चे ज्ञान का अधिकारी ब्राह्मणों को ही समझा जाता था। ब्राह्मण ही यज्ञ करता और कराता था, इसलिए उसका आदर-सम्मान भी अधिक था।

इस काल में ब्राह्मण का स्थान इतना ऊँचा हो गया था कि वह भू-सुर, भू-देव आदि नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। यज्ञों के प्रसार के कारण ब्राह्मणों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। आरम्भ में पुरोहितों के सोलह वर्गों में से ब्राह्मण एक वर्ग मात्र था, परन्तु शनैः शनैः इन्होंने दूसरे पुरोहित-वर्गों को पछाड़ दिया और ये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वर्ग बन गए। ये अपने और अपने यजमानों के लिए पूजा-पाठ और यज्ञ करते थे।

साथ ही, कृषि कर्म से सम्बन्धित समारोहों का आयोजन भी करते थे। ये अपने आश्रयदाता राजा के लिए युद्ध में सफलता की कामना करते थे और बदले में राजा की ओर से दान-दक्षिणा तथा सुरक्षा का वचन मिलता था। उच्चाधिकार के लिए ब्राह्मणों का कभी-कभी योद्धा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रियों से संघर्ष भी होता था परन्तु जब इन दो उच्च वर्णों का निम्न वर्णों से मुकाबला होता था तो ये आपसी मतभेदों को भुला देते थे। उत्तर-वैदिक-काल के अंत में इस बात पर बल दिया जाने लगा कि इन दो उच्च वर्णों को परस्पर सहयोग करके शेष समाज पर शासन करना चाहिए।

(2.) यज्ञ के महत्त्व में वृद्धि

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म यज्ञों की प्रधानता पर आधारित था। इस युग में यज्ञों के महत्त्व में इतनी अधिक वृद्धि हो गई थी कि इसे यज्ञों का युग कहा जाना चाहिए। इस काल में रचा जाने वाला यजुर्वेद, यज्ञ प्रधान ग्रन्थ है। उसमें यज्ञों के विधान की विस्तृत विवेचना की गई है। यज्ञों को करने में भी सरलता न रह गई थी। गृहस्थ स्वयं यज्ञ नहीं कर सकता था वरन् उसे याज्ञिकों की आवश्यकता पड़ती थी। यज्ञ में समय भी अधिक लगता था।

बहुत से यज्ञ वर्ष भर चलते थे और उनमें बहुत अधिक धन व्यय करना पड़ता था। राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ केवल राजा ही कर सकते थे। इस कारण सर्वसाधारण के लिए यज्ञ करवाना कठिन कार्य हो गया। यज्ञों का आयोजन सामूहिक रूप से और निजी रूप से भी होता था। सामूहिक यज्ञों में राजन्य और उस जन-समुदाय के समस्त सदस्य भाग लेते थे।

निजी यज्ञ अलग-अलग लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में आयोजित किए जाते थे, क्योंकि इस काल में वैदिक लोग स्थायी जीवन बिताते थे और उनके अपने सुव्यवस्थित कुटुम्ब थे। अग्नि को व्यक्तिगत रूप से आहुति दी जाती थी और ऐसी प्रत्येक क्रिया एक अनुष्ठान अथवा यज्ञ का रूप धारण कर लेती थी।

(3.) विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रारम्भ

उत्तर-वैदिक-काल में पूरी आर्य संस्कृति ही यज्ञमय दिखाई देती है। शतपथ ब्राह्मण कहता है– ‘ऋक् पृथ्वी है, यजुष् अन्तरक्षि है और साम द्युलोक है, अतः इनमें विहित उपचारों के द्वारा अर्थात् अग्नि, इन्द्र, और सूर्य के आह्वान द्वारा मनुष्य इन तीनों लोकों को जीत लेता है।’

भौतिक यज्ञ करने से मनुष्य विश्व की शक्तियों का आह्वान करके उन्हें अपने में धारण करता है। अतः इस युग में विभिन्न उद्देश्यों को लेकर विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विधान हुआ।

दैनिक यज्ञ

प्रत्येक परिवार में प्रतिदिन पाँच महायज्ञ होते थे-

(अ) देवयज्ञ

इस यज्ञ में अग्नि को भोजन, घी, दूध, दही की आहुति दी जाती है।

(ब) भूतयज्ञ

इस यज्ञ में प्रजापति, काम, विश्वैदेवी तथा पृथ्वी, जल, वायु एवं आकाश नामक चारों तत्त्वों को भोजन की बलि दी जाती है।

(स) पितृयज्ञ

इसमें पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

(द) ब्रह्मयज्ञ

इसमें वैदिक पाठों का स्वाध्याय करना पड़ता है।

(य) मनुष्य यज्ञ

इसमें स्वयं भोजन करने से पहले किसी अतिथि को भोजन कराया जाता है।

अग्निहोत्र

इन पांच यज्ञों के साथ-साथ व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः एवं सायंकाल में ‘अग्निहोत्र’ करना होता था जिसके अंतर्गत सूर्योदय से पहले सूर्य और प्रजापति को और सूर्यास्त के बाद अग्नि और प्रजापति को जौ और चावल की आहुति दी जाती थी।

मासिक यज्ञ

दैनिक यज्ञों के साथ-साथ प्रत्येक मास में कुछ निश्चित यज्ञों को करने का प्रावधान किया गया था। महीने में दो बार, प्रतिपदा और पूर्णिमा को ‘दर्शपूर्णमासेष्टि’ की जाती है, इनमें क्रमशः अग्नि और इन्द्र तथा अग्नि और सोम को ‘पुरोडाश’ दिया जाता था। उत्तरवैदिक आर्यों के अनुसार अग्नि तीन प्रकार की होती है- गार्हपत्य, दक्षिण और आह्वनीय। गार्हपत्य अग्नि की वेदी गोल होती है। दक्षिण-अग्नि की वेदी अर्द्धवृत्त के आकार की होती है। आह्वनीय अग्नि की वेदी चौकोर होती है।

वार्षिक यज्ञ

वर्ष में तीन बार बसन्त ऋतु, वर्षा ऋतु और शरद् ऋतु के आरम्भ में क्रमशः ‘वैश्वदेव’, ‘वरुणप्रधान’ और ‘साकमेध’ यज्ञ किए जाते थे। पहले में अग्नि, सोम सविता, सरस्वती और पूषा के लिए पाँच तर्पण किए जाते थे और इसके बाद मरुतों को पुरोडाश, विश्वदेवों को दूध और द्यावा एवं पृथ्वी को पुराडोश दिया जाता था।

दूसरे अर्थात् वरुण-प्रधान यज्ञ में आटे से बनी मेण्ढे और भेड़ की मूर्तियाँ दूध के साथ वरुण और मरुतों को भेंट की जाती थीं। वर्षा के लिए करीर के फलों की बलि दी जाती थी। इसके बाद हल के दो भागों की पूजा होती थी। गृह उपचारों में श्रावण पूर्णिमा को विष्णु, वर्षा ऋतु और श्रावण के देवता को पकवान चढ़ाया जाता था।

मार्ग-शीर्ष की पूर्णिमा को आग्रहायणी पर्व मनाया जाता था। इस अवसर पर घरों की सफाई व सफेदी की जाती थी। शरद या वसन्त में पशुधन की वृद्धि के लिए शुलगव यज्ञ किया जाता था जिसमें रुद्र को बैल की बलि दी जाती थी।

सोमयज्ञ: वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। इसे धनी व्यक्ति करते थे। यह प्रायः वसन्त में नए वर्ष के आरम्भ में किया जाता था। इसे करने से पहले 16 याज्ञिक नियुक्त किए जाते थे जो यजमान और उसकी पत्नी को दीक्षित करते थे। फिर सोम की बूँटी गाड़ी में भर कर लाई जाती थी। पहले दिन गर्म दूध की आहुति होती थी। दूसरे दिन सोम को वेदी पर लाकर सिलबटे से पीसा और छन्ने से छाना जाता था। फिर इसे कलशों में भरकर दूध में मिलाया जाता था और कटोरों में देवताओं को भेट किया जाता था।

प्रायः दिन में तीन बार सोम की स्तुति होती था। तीसरे दिन अग्नि और सोम को बलि दी जाती थी और अन्त में यजमान अवभृव नामक स्नान करता था। सोमयज्ञ भी सात प्रकार के थे। इनमें ‘वाजपेय यज्ञ’ शक्ति प्राप्त करने के लिए किये जाते थे। इसमें रथों की दौड़़ होती थी। ‘राजसूय यज्ञ’ और ‘अश्वमेध यज्ञ’ राजाओं के लिए थे तथा लम्बे चलते थे। कुछ यज्ञों में पशु-बलि दी जाती थी किन्तु पशुबलि को सामान्यतः अच्छा नहीं समझा जाता था। पशुबलि के समय लोग मुँह दूसरी ओर फेर लेते थे और इस अपराध के लिए देवताओं से क्षमा माँगते थे।

(4.) यज्ञों में बलि का चलन

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म न केवल यज्ञों की प्रधानता पर आधारित था अपितु इस काल में यज्ञों में बलिप्रथा भी आरम्भ हो गई थी। ऋग्वेद काल में यज्ञ में केवल फल तथा दूध की बलि दी जाती थी परन्तु अब यज्ञ में पशु तथा सोम की बलि का महत्त्व हो गया। बड़ी-बड़ी बलियों और यज्ञों के अवसर पर राजाओं की ओर से समाज के समस्त वर्गों के लोगों को जिमाया जाता था। ऐसा नहीं था कि सभी लोग यज्ञों में बलि करते थे। ऐसा केवल क्षत्रिय राजाओं द्वारा किए जाने वाले कुछ अनुष्ठानों ही किया जाता था। इस काल में भी मांसाहार को बहुत बुरा माना जाता था।

(5.) याज्ञिक वर्ग की उत्पत्ति

यज्ञों की संख्या तथा महत्त्व में वृद्धि हो जाने तथा उनमें जटिलता आ जाने से ब्राह्मणों में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो गया जो यज्ञों का विशेषज्ञ होता था। इस वर्ग का एकमात्र व्यवसाय अपने यजमान के यहाँ यज्ञ कराना तथा उससे यज्ञ-शुल्क एवं दान प्राप्त करना हो गया। ब्राह्मण उन सोलह प्रकार के पुरोहितों में से एक थे जो यज्ञों का नियोजन करते थे।

समस्त पुरोहितों को उदारतापूर्वक दान-दक्षिणा दी जाती थी। यज्ञों के अवसर पर जो मंत्र पढ़े जाते थे, उनका उच्चारण यज्ञकर्ता को बड़ी सावधानी से करना होता था। यज्ञकर्ता को यजमान कहते थे। यज्ञ की सफलता यज्ञ के अवसर पर उच्चारित चमत्कारिक शक्ति वाले शब्दों पर निर्भर करती थी। वैदिक आर्यों द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठान दूसरे हिन्द-यूरोपीय लोगों में भी देखने को मिलते हैं परन्तु अनेक अनुष्ठानों का विकास भारत भूमि में हुआ।

यज्ञ विधियों का आविष्कार, संयोजन एवं विकास ब्राह्मण पुरोहितों ने किया। उन्होंने बहुत सारे अनुष्ठानों का आविष्कार किया, इनमें से अनेक अनुष्ठान आर्येतर प्रजाओं से लिए गए थे। उत्तरवैदिक साहित्य में मिलने वाले उल्लेखों के अनुसार राजसूय यज्ञ करने वाले प्रधान पुरोहित को 2,40,000 गायें दक्षिणा के रूप में दी जाती थीं।

पुरोहितों को यज्ञों में, गायों के साथ-साथ सोना, कपड़ा और घोड़े भी दिए जाते थे। यद्यपि पुरोहित दक्षिणा के रूप में कभी-कभी भूमि भी मांगते थे, तथापि यज्ञ की दक्षिणा के रूप भूमि-दान की प्रथा उत्तर-वैदिक-काल में भली-भाँति स्थापित नहीं हुई थी। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि अश्वमेध यज्ञ में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम इन समस्त दिशाओं का, पुरोहित को दान कर देना चाहिए। बड़े स्तर पर पुरोहितों को भूमि-दान किया जाना सम्भव नहीं था। एक उल्लेख ऐसा भी मिलता है कि पुरोहितों को दी जाने वाली भूमि ने अपना हस्तांतरण सम्भव नहीं होने दिया।

(6.) उच्चकोटि का दार्शनिक विवेचन

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म उच्च कोटि के दार्शनिक विवेचन पर आधारित था। ई.पू.600 के आसपास, उत्तर-वैदिक-काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा उपनिषदों की रचना हुई। इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया।

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इस काल के याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा आत्मन् को पहचानने और आत्मन् तथा ब्रह्म के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया। ब्रह्मा सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला। आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला। इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। पुनर्जन्म के सिद्धान्त का अनुमोदन भी इसी युग में किया गया। इसके अनुसार मनुष्य का आगामी जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है। इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया। मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया। षड्दर्शन अर्थात् सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा की रचना इसी काल में हुई।

स्तुति पाठ

जिन भौतिक कारणों से लोग पूर्वकाल में देवताओं की आराधना करते थे, उन्हीं कारणों से अब भी करते थे परन्तु पूजा-पद्धति में काफी परिवर्तन हो गया था। स्तुति पाठ पहले की तरह ही होते थे, पर देवताओं को संतुष्ट करने की दृष्टि से अब उनका उतना महत्त्व नहीं रह गया था।

(7.) देवताओं के महत्त्व में परिवर्तन

उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल के देवताओं का महत्त्व घट रहा था और उनका स्थान अन्य नये देवता ग्रहण कर रहे थे। इन्द्र और अग्नि को, पहले जैसा महत्त्व नहीं था। इस युग में प्रजापति का महत्त्व देवताओं से अधिक हो गया। ऋग्वैदिक-काल के दूसरे कई गौण देवताओं को भी उच्च स्थान प्रदान किए गए।

पशुओं के देवता रुद्र, उत्तर-वैदिक-काल में एक महत्त्वपूर्ण देवता बन गए। रुद्र को महादेव तथा पशुपति के नाम से पुकारा जाने लगा। रुद्र के साथ-साथ शिव का महत्त्व बढ़ने लगा। विष्णु अब उन लोगों के संरक्षक देवता समझे जाने लगे जो ऋग्वैदिक-काल में अर्द्ध-घुमंतू जीवन बिताते थे और अब स्थायी जीवन बिताने लगे थे।

विष्णु, वासुदेव कहलाने लगे। भागवत सिद्धान्त का बीजारोपण भी इसी युग में हो गया था। जब समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया तो प्रत्येक वर्ण के पृथक देवता अस्तित्त्व में आ गए। पूषन को प्रारम्भ में गौ-रक्षक समझा जाता था किंतु बाद में शूद्रों का देवता बन गया।

(8.) आडम्बर तथा अन्ध विश्वासों में वृद्धि

उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के उत्तरी मैदान में बस जाने के कारण वे मानसून पर अत्यधिक निर्भर रहने लगे। फलतः उन्हें अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि का सामना करना पड़ा। कृषि पर कीट-पतंगों एवं रोगों का आक्रमण होता था। अतः फसलों को नष्ट होने से बचाने के लिए मन्त्र-तन्त्र का प्रयोग होने लगा जिनका उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

ऋग्वैदिक-काल का विशुद्ध धर्म अब धीरे-धीरे आडम्बरों तथा अन्ध-विश्वासों का जाल बनने लगा था। अब यह विश्वास हो गया था कि यज्ञों तथा मन्त्रों द्वारा न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है वरन् उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। अब भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा था। अथर्ववेद में भूत-प्रेतों का वर्णन है और तन्त्र-मन्त्रों द्वारा इनसे रक्षा का उपाय भी बताया गया है। कुछ प्रतीक-वस्तुओं की भी पूजा होने लगी। उत्तर-वैदिक-काल में मूर्ति-पूजा भी आरम्भ हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

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उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था में ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा क्रमशः परिवर्तन होता गया था तथा अब उसमें जटिलता आने लगी थी। अब वे गाँवों के अतिरिक्त नगरों में भी निवास करने लगे थे और उनका जीवन अधिक सम्पन्न हो गया था।

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था की प्रमुख गतिविधियाँ

(1.) धातु-ज्ञान में वृद्धि

आर्यों को ऋग्वैदिक-काल में ताम्र, स्वर्ण तथा अयस् आदि धातुओं का ज्ञान प्राप्त था परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में उन्हें लौह-अयस्, ताम्र-अयस्, रांगा, सीसा तथा चांदी का भी ज्ञान था। इस काल में लाल-अयस् तथा कृष्ण-अयस् का भी उल्लेख मिलता है। सम्भवतः लाल-अयस का तात्पर्य ताम्बे से और कृष्ण-अयस् का तात्पर्य लोहे से था।

(2.) लोहे के उपयोग में वृद्धि

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उत्तर-वैदिक-काल में लोहे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। पाकिस्तान के गांधार प्रदेश में 1000 ई.पू. के आसपास गाढ़े गए शवों के साथ लोहे के बहुत सारे औजार और उपकरण मिले हैं। इस प्रकार की लौह निर्मित वस्तुएं बिलोचिस्तान से भी मिली हैं। लगभग उसी समय से पूर्र्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी लोहे का उपयोग हो रहा था। पुरातात्विक अन्वेषण से ज्ञात होता है कि 800 ई.पू. के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीरों के फलक और भालों के फलक जैसे लोहे के औजार बनने लग गए थे। लोहे के इन हथियारों से उत्तर-वैदिक आर्यों ने उत्तरी दो आब में बसे अपने बचे-खुचे शत्रुओं को परास्त किया होगा। उत्तरी गंगा की घाटियों के जंगलों को साफ करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ी का उपयोग हुआ होगा। उस काल में वर्षामान 35 से 65 सेंटीमीटर तक होने से ये जंगल बहुत घने नहीं रहे होंगे। वैदिक-काल के अंतिम चरण में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश और विदेह में फैल गया था। ई.पू. सातवीं सदी से इन प्रदेशों में लोहे के औजार मिलने लग जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक हुआ। लोहे के हथियारों का उपयोग लगातार बढ़ते जाने के कारण योद्धा-वर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा। नए कृषि औजारों और उपकरणों की सहायता से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे।

राजा, सैनिक और प्रशासकीय आवश्यकताओं के लिए, इस अतिरिक्त उपज को एकत्र कर सकता था। इस अतिरिक्त उपज को ईसा-पूर्व छठी सदी में स्थापित हुए नगरों के लिए भी जमा किया जा सकता था। इन भौतिक लाभों के कारण किसान का कृषि कार्य में लगातार लगे रहना स्वाभाविक था। लोग अपनी पुरानी बस्तियों से बाहर निकलकर समीप के नए क्षेत्रों में फैलने लगे। इस प्रकार लोहे का उपयोग बढ़ते जाने से आर्यों का ग्राम्य प्रधान जीवन नगरीकरण की ओर बढ़ने लगा तथा छोटे-छोटे जन के स्थान पर बड़े-बड़े जनपद राज्यों की स्थापना का मार्ग खुल गया।

(3.) भूमिपतियों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक-काल में भूमिपतियों का कहीं नाम नहीं था परन्तु अब बड़े-बड़े भूमिपतियों का प्रादुर्भाव हो रहा था। बहुत से भूमिपति सम्पूर्ण गाँव के स्वामी होते थे। गाँव के लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव रहता था।

(4.) वैश्यों के काम का निर्धारण

उत्तर-वैदिक-काल में वैश्य वर्ग के अंतर्गत सामान्य प्रजा का समावेश होता था। उन्हें कृषि और पशुपालन जैसे उत्पादक कार्य सौंपे गए थे। कुछ वैश्य शिल्पकार भी थे। वैदिक-काल के अंत में वे व्यापार में जुट गए। उत्तर-वैदिक-काल में सम्भवतः केवल वैश्य ही भेंट अथवा उपहार देते थे। क्षत्रिय, वैश्यों से प्राप्त भेंट पर अपनी जीविका चलाते थे। सामान्य कबीलाई प्रजा को भेंट देने वालों की स्थिति में पहुँचने में लंबा समय लगा। कई ऐसे अनुष्ठान थे जिनके माध्यम से विश् अथवा वैश्यों को राजन्य के अधीन बनाया जाता था।

(5.) कृषि में आमूलचूल परिवर्तन

वैदिक-काल के आर्य मुख्यतः पशुपालक थे किंतु उत्तर-वैदिक-काल मे कृषि में बड़ी उन्नति हो गयी थी। अब आर्य लोग गंगा-यमुना की अत्यन्त उपजाऊ भूमि में पहुँच गए थे। अब वे बड़े-बड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। कृषि सम्बन्धी लोहे के औजार बहुत थोड़े मिले हैं किंतु इसमें संदेह नहीं कि उत्तर-वैदिक-कालीन लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि ही था।

कुछ वैदिक ग्रंथों में छः आठ, बारह और चौबीस बैलों द्वारा जोते जाने वाले हलों के उल्लेख मिलते हैं। इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। हलों के फाल लकड़ी के होते थे। उत्तरी गंगा की नरम मिट्टी में इनसे संभवतः काम चल जाता था। यज्ञों में होने वाली पशु-बलि के कारण पर्याप्त बैल उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इसलिए कृषि आदिम स्तर की थी परन्तु इसमें संदेह नहीं कि यह व्यापक स्तर पर होती थी।

शतपथ ब्राह्मण में हल की जुताई से सम्बन्धित अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। प्राचीन आख्यानों के अनुसार सीता के पिता विदेहराज जनक भी स्वयं हल जोतते थे। उस जमाने में राजन्य और राजकुमार भी शारीरिक श्रम करने में संकोच नहीं करते थे। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर कहा जाता है। बाद में उच्च वर्णों के लोगों द्वारा हल जोतने पर निषेध लग गया।

इस काल के कृषक विभिन्न प्रकार की खादों का भी प्रयोग करने लगे थे। वैदिक लोग यव (जौ) पैदा करते रहे परन्तु उत्तर-वैदिक काल में उनकी मुख्य पैदावार धान (चावल) और गेहूँ बन गया। कालांतर में गेहूँ का स्थान प्रमुख हो गया। आज भी उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोगों का मुख्य अनाज गेहूँ ही है। दोआब में पहुँचने पर वैदिक लोगों को चावल की भी जानकारी मिली। वैदिक ग्रंथों में चावल को व्रीहि कहा गया है।

हस्तिनापुर से चावल के जो अवशेष मिले हैं वे ईसा पूर्व आठवीं सदी के हैं। अनुष्ठानों में चावल के उपयोग के विधान मिलते हैं परन्तु अनुष्ठानों में गेहूँ का बहुत कम उपयोग होता था। उत्तर-वैदिक-काल में कई तरह की दालें भी उगाई जाती थीं।

(6.) वाणिज्य तथा व्यापार में उन्नति

उत्तर-वैदिक-काल में, ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा व्यापार तथा वाणिज्य में अधिक वृद्धि हो गयी थी। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अब वे एक विशाल मैदान के निवासी बन गए थे जो बड़ा ही उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न था। इस काल में व्यापारियों का एक अलग वर्ग बन गया था जिन्हें वणिक कहते थे। धनी व्यापारी श्रेष्ठिन् कहलाता था।

आर्य लोगों का आन्तरिक व्यापार पहाड़ियों में रहने वाले किरातों के साथ होता था, जिन्हें ये कपड़े देकर औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करते थे। अब ये लोग समुद्र से भी परिचित हो गए थे और बड़ी-बड़ी नावों द्वारा सामुद्रिक व्यापार भी करते थे। अब आर्य लोग निष्क, शतमान तथा कृष्णाल नाम की मुद्राओं का प्रयोग करने लगे थे जिससे व्यापार में बड़ी सुविधा होने लगी।

(7.) अन्य व्यवसायों की उन्नति

ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अब उद्योग धन्धों में भी अधिक वृद्धि हो गई थी और कार्य विभाजन का सिद्धान्त दृढ़ हो गया था। यजुर्वेद में उन सब व्यवसायों का उल्लेख है जिन्हें इस काल की आर्य प्रजा करती थी। इनमें शिकारी, मछुए, पशुपालक, हलवाह, जौहरी, चटाई बनाने वाले, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, कसाई, सुनार, बढ़ई आदि आते हैं।

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था में कलाओं की भूमिका

उत्तर-वैदिक-काल में कला के क्षेत्र में भी कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। काव्य-कला का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया था।

(1.) नगर एवं गृह निर्माण कला

ऋग्वैदिक-काल के बड़े गांव, उत्तरवैदिक-काल में बड़े-बड़े नगरों में परिवर्तित होने लगे थे। तैत्तिरीय ब्राह्मण में नगर में निवास करने वालों को नगरिन कहा गया है। राज्यों की राजधानियों में बडे-बड़े विशाल भवन एवं महल बनने लगे थे। हस्तिनापुर में ई.पू.900 से ई.पू. 500 की अवधि के स्तरों की खुदाई में बस्ती के अस्तित्त्व और नगरीय जीवन के प्रारंभ होने के प्रमाण मिलते हैं परन्तु पुरातत्त्व की यह जानकारी हस्तिनापुर के सम्बन्ध में महाभारत से मिलने वाली जानकारी से मेल नहीं खाती।

क्योंकि इस महाकाव्य का वर्तमान स्वरूप बहुत बाद में, ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में लिखा गया था, जब भौतिक जीवन की काफी उन्नति हो चुकी थी। उत्तर-वैदिक काल के लोग कच्ची और पक्की ईटों, मिट्टी बाँस तथा अन्य प्रकार की लकड़ी की सहायता से बनाए जाते थे। लकड़ी के बड़े बड़े लठ्ठों की सहायता से घर की छत बनाई जाती थी। घास-फूस और रबर इत्यादि की सहायता से छत पाटी जाती थी।

घर में अनेक कक्ष होते थे जिनमें फर्नीचर भी प्रयुक्त होता था। हस्तिनापुर की खुदाई में मिट्टी के जो स्मारक मिले हैं वे भव्य और टिकाऊ नहीं रहे होंगे। आगे चलकर हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया। इसलिए कुरु-जन प्रयाग के समीप कौशाम्बी में जाकर बस गया।

(2.) धातु शिल्प कला

उत्तर-वैदिक-काल में अनेक कलाओं और शिल्पों का उदय हुआ। हमें लुहारों और धातुकारों के बारे में जानकारी मिलती है। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास निश्चय ही इनका सम्बन्ध लोहे के उत्पादन से रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से 1000 ई.पू. के पहले के तांबे के कई औजार मिले हैं उनसे वैदिक और अवैदिक दोनों ही समाजों में ताम्रकारों का अस्तित्त्व सूचित होता है।

वैदिक लोगों ने सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की तांबे का उपयोग किया था। वैदिक लोगों ने सर्वप्रथम ताम्र धातु का उपयोग किया था। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थलों से भी तांबे के औजार मिले हैं। इन ताम्र-वस्तुओं का उपयोग मुख्यतः युद्ध, आखेट और आभूषणों के लिए भी होता था।

(3.) बर्तन निर्माण कला

उत्तर-वैदिक-काल के लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से परिचित थे- काले एवं लाल भांड, काले रंग के भांड, चित्रित धूसर भांड और लाल भांड। अंतिम किस्म के भांड उन्हें अधिक प्रिय थे। ये भांड प्रायः पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिले हैं परन्तु इस युग के विशिष्ठ भांड हैं- चित्रित धूसर भांड। इनमें कटोरे और थालियां मिली हैं जिनका उपयोग उच्च वर्णों के लोगों द्वारा पूजा-पाठ अथवा भोजन अथवा दोनों कामों के लिए होता था। चित्रित धूसर भांडों के साथ कांच की वस्तुएं और कंकण मिले हैं। उनका उपयोग भी उच्च वर्ग के सदस्य ही करते होंगे।

(4.) वस्त्र कला

इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। वस्त्र रंग-बिरंगे एवं सिले हुए होते थे। ऋग्वैदिक-काल की भांति वास, अधिवास, नीवी, तार्प्य, पगड़ी, उत्तरीय, अन्तरीय, कम्बल, शॉल आदि वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। धनी और राजपरिवारों के सदस्यों के वस्त्रों पर सोने-चाँदी की जरी का काम होता था। साधु-सन्यासी एवं आदिवासी लोग मृग चर्म का प्रयोग करते थे।

(5.) आभूषण निर्माण कला

पुरातात्त्विक खुदाई और वैदिक ग्रंथों से विशिष्ट शिल्पों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी मिलती है। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में जौहरियों के भी उल्लेख मिलते हैं। ये सम्भवतः समाज के धनी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। स्त्री पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। उनके आभूषण ऋग्वैदिक-काल के समान ही थे। आभूषणों में कीमती पत्थरों को जड़ा जाता था। इस युग में चाँदी के आभूषणों का प्रयोग बढ़ गया जबकि ऋग्वैदिक-काल में चाँदी के आभूषण बहुत कम थे।

(6.) मनोरंजन

आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन के साधनों में ऋग्वेदकाल की तुलना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। पहले की भाँति नृत्य, संगीत, जुआ, घुड़दौड़़, रथ-दौड़़ आदि मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

(7.) बुनाई कला

बुनाई का काम केवल स्त्रियाँ करती थीं, फिर भी यह काम बड़े पैमाने पर होता था।

(8.) काव्य कला

ऋग्वेद में केवल स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है, परन्तु यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा सूत्रों की रचना के द्वारा काव्य-क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया गया। यजुर्वेद में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है। सामवेद गीति-काव्य है। संगीत-कला पर उसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अथर्ववेद में भूत-प्रेत से रक्षा तथा तन्त्र-मन्त्र का विधान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में उच्चकोटि की दार्शनिक विवेचना है। सूत्रों की रचना इसी काल में हुई। सूत्रों के प्रादुर्भाव से, सूचनाओं को संक्षेप में लिखने की कला की उन्नति हुई।

(9.) खगोल विद्या

इस काल में खगोल विद्या की भी उन्नति हुई तथा आर्यों को अनेक नए नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हो गया।

(10.) अन्य कलाएं

उत्तर-वैदिक-काल में चर्मकार, कुम्हार तथा बढ़ई आदि शिल्पों ने बहुत उन्नति की।

(11.) औषधि विज्ञान

औषधि-विज्ञान अब भी अवनत दशा में था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था बहुत ही उन्नत दशा में थी और समाज में चारों ओर विविध प्रकार के कार्य हो रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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उत्तर वैदिक साहित्य

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं।

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं। उत्तर वैदिक साहित्य का रचनाकाल कई शताब्दियों में विस्तृत है।

उत्तर वैदिक साहित्य – दर्शन ग्रन्थ

आर्यों ने अन्य कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की भी रचना की, जिनका विश्व संस्कृति पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अनेक ऋषियों ने दर्शन-शास्त्र के ग्रंथों का निर्माण किया। प्रमुख भारतीय दर्शनों की संख्या छः है-

(1.) कपिल मुनि का सांख्य-दर्शन,

(2.) पतन्जलि का योग-दर्शन,

(3.)  कण्व का वैशेषिक दर्शन,

(4.) गौतम का न्याय-दर्शन,

(5.) जैमिनि का पूर्व मीमांसा दर्शन तथा

(6.) बादरायण का उत्तर-मीमांसा दर्शन।

हिन्दू-धर्म के अध्यात्मवाद का भवन षडदर्शन के इन्हीं छः स्तम्भों पर खड़ा है।

महाकाव्य

महाकाव्यों की रचना ई.पू.800 से ई.पू. 400 के बीच हुई। महाकाव्यों का आशय संस्कृत भाषा में लिखे दो महाकाव्यों से है-

(1.) रामायण- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मिीकि ने की।

(2.) महाभारत- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। महाभारत का एक अंश गीता कहलाता है जिसमें निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया गया है। रामायण एवं महाभारत का हिन्दू-समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी भारतीय समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है।

स्मृतियाँ

आर्यों ने स्मृतियों की भी रचना की। स्मृतियों में मनु स्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति तथा नारद स्मृति प्रमुख हैं। मनुस्मृति की रचना शुंगकाल में ई.पू.200 से ई.पू.100 के बीच होनी अनुमानित है। याज्ञवलक्य स्मृति की रचना ईस्वी 100 से ईस्वी 300 के बीच होनी अनुमानित है। नारद स्मृति की रचना ई.100 से ई.400 के बीच होनी अनुमानित है। ई.400 से ई.600 की अवधि में कात्यायन स्मृति एवं वृहस्पति स्मृति की भी रचना हुई। ये दोनों ही स्मृतियां अब तक अप्राप्य हैं। कुछ स्मृतियां, यथा- पराशर स्मृति, शंख स्मृति, देवल स्मृति का रचना काल ई.600 से ई.900 के बीच का माना जाता है।

पुराण

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प्रमुख पुराणों की संख्या 18 है जिनमें विष्णु-पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण तथा भागवत पुराण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वायु पुराण, विष्णु-पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण आदि प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण की रचना ई.600 से ई.900 के बीच मानी जाती है। महाकाव्यों तथा पुराणों में वैदिक आदर्शों का प्रतिपादन किया गया है। अन्तर यह है कि महाकाव्यों में इसे मनुष्य के मुख से और पुराणों मे देवताओं के मुख से प्रतिपादित बताया गया है। 18 प्रमुख पुराणों के बाद 18 उप-पुराणों की रचना हुई। इनमें- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म पुराण सम्मिलित हैं। महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था। भारतीय पुराण भारत के अति प्राचीन इहिास एवं वैदिक संस्कृति की जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...