उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था से तात्पर्य वेदों की रचना के बाद के काल में आश्रम व्यवस्था के स्वरूप से है। इस कालखण्ड में बुद्धकाल, मौर्यकाल तथा शुंगकाल में आर्यों की आश्रम व्यवस्था का अध्ययन किया गया है।
उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था में आश्रमों का विभाजन वैदिक काल की आश्रम व्यवस्था के अनुरूप ही था। उसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था किंतु चूंकि बुद्ध के आविर्भाव से लेकर मौर्य काल तक के कालखण्ड में देश में बौद्धों की संख्या अधिक हो गई थी इसलिए वे वैदिक आश्रम व्यवस्था को स्वीकार नहीं करते थे।
उत्तर वैदिक आश्रमव्यवस्था
बौद्ध काल में आश्रम व्यवस्था की स्थिति
छठी शताब्दी ईसा पूर्व के काल को बौद्ध काल कहा जाता है। इस काल में भारत में अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का अभ्युदय हुआ जिनमें बौद्ध और जैन-धर्म प्रमुख थे। इन धर्मों के अनुयाई प्राचीन आश्रम-मर्यादा का पालन नहीं करते थे। धर्मसूत्रों और स्मृतियों आदि प्राचीन ग्रंथों में वर्णाश्रम धर्म पर आधारित आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया गया है परन्तु बौद्ध साहित्य से प्राचीन भारतीय समाज का वास्तविक चित्र प्राप्त होता है।
जातक कथाएं और गौतम बुद्ध के संवाद तत्कालीन समाज की जानकारी देते हैं। बौद्ध साहित्य में गृहस्थ के लिए ‘गहपति’ (गृहपति) शब्द का प्रयोग किया गया है। कुछ गहपति अतुल धन के स्वामी होते थे और कुछ साधारण गृहस्थ भी। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर चलने वाले गृहपति को बौद्ध साहित्य में ‘उपासक’ कहा गया है। कोई भी गहपति या किसी भी परिवार का सदस्य यहाँ तक कि बालक भी ‘भिक्षुव्रत’ ग्रहण करके बौद्धसंघ का सदस्य बन सकता था।
स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार था। भिक्षुाओं एवं भिक्षुणियों को बौद्ध संघारामों में निःशुल्क भोजन, आश्रय एवं वस्त्र मिलते थे तथा उन्हें धर्म चर्चा एवं प्रतिदिन कुछ समय के लिए भिक्षाटन के अतिक्ति कोई काम नहीं करना पड़ता था। इसलिए समाज के बहुत से निर्धन एवं आलसी लोग बौद्धभिक्षु बन गए। इस कारण प्राचीन आर्यों द्वारा स्थापित वर्ण, आश्रम एवं पुरुषार्थ सम्बन्धी व्यवस्थाएं टूटने लगीं।
मौर्य काल में आश्रम-व्यवस्था की स्थिति
मौर्य काल में आश्रम-व्यवस्था के स्वरूप की जानकारी कौटिल्य के अर्थशास्त्र और यूनानी लेखकों के विवरण से प्राप्त होती है। कौटिल्य ने चारों आश्रमों के ‘स्वधर्म’ इस प्रकार बताए हैं-
(1.) ब्रह्मचारी आश्रम
ब्रह्मचारी का स्वधर्म स्वाध्याय, अग्निकर्म (यज्ञ), अभिषेक, भैक्षव्रत (भिक्षा द्वारा निर्वाह), आचार्य के प्रति सेवा या भक्ति है। आचार्य के अभाव में ब्रह्मचारी अपने गुरु-पुत्र अथवा अपने से ज्येष्ठ ब्रह्मचारी के प्रति सेवा या भक्ति रखता था।
(2.) गृहस्थ आश्रम
गृहस्थ के स्वधर्म अपने व्यवसाय द्वारा आजीविका कमाना, अपने से समान स्थिति वाले परिवार में विवाह करना जिसका ऋषि (गोत्र) अपने परिवार के ऋषि से भिन्न हो, ऋतुगामित्व (पत्नी के साथ मासिक धर्म के पश्चात् सहवास); देवता, पितर, अतिथि तथा भृत्यों के प्रति कर्त्तव्यों का पालन करने में अपनी आय खर्च करना और शेष राशि से अपना एवं अपने परिवार का निर्वाह करना।
(3.) वानप्रस्थ आश्रम
वानप्रस्थी का स्वधर्म ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना, भूमि पर शयन करना, जटा धारण करना, अजिन (मृगचर्म) ओड़ना, अग्निहोत्र तथा अभिशेष करना, देवता, पितर तथा अतिथियों की पूजा करना और वन्य-आहार (कंद, मूल एवं फल) से निर्वाह करना था।
(4.) परिव्राज्य आश्रम
परिव्राज्य के स्वधर्म इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखना, अनारम्भ (कोई भी व्यवसाय नहीं करना) निष्किंचनत्व (कोई भी सम्पत्ति न रखना), संग-त्याग (किसी की भी संगति नहीं करना), अनेक स्थानों से भिक्षा ग्रहण कर निर्वाह करना, जंगल में निवास करना तथा बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता रखना था।
कौटिल्य द्वारा वर्णित आश्रमों के स्वधर्म, स्मृति-ग्रन्थों में वर्णित स्वधर्मों से कुछ भिन्न हैं। कौटिल्य ने सर्वप्रथम गृहस्थ का स्वधर्म निर्दिष्ट किया। अतः कौटिल्य की दृष्टि में गृहस्थ आश्रम का महत्त्व सर्वाधिक था। कौटिल्य की सम्मति में स्वधर्म का पालन करना श्रेयस्कर है तथा राज्य का कर्त्तव्य है कि वह समस्त प्रजा को वर्ण-धर्म और आश्रम धर्म में स्थिर रखे।
द्विज वर्ग के लिए आवश्यक था कि उनके परिवार का प्रत्येक बालक सोलह वर्ष तक ब्रह्मचारी रहकर विद्याध्ययन करे तथा अपने शरीर, मन और बुद्धि को भलिभाँति विकसित कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे। गृहस्थ का कर्त्तव्य था कि वह अपनी पत्नी, सन्तान, माता-पिता, अवयस्क भाई-बहिन और अपने परिवार की विधवा स्त्रियों का भरण-पोषण करे। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता था, उसके लिए बारह पण दण्ड का विधान था।
कौटिल्य ने व्यवस्था दी कि कोई भी मनुष्य अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा न करे। यदि कोई मनुष्य अपनी पत्नी और सन्तान के भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था किए बिना ही प्रवज्या ग्रहण कर ले तो उसे दण्ड दिया जाय। यही दण्ड उस व्यक्ति के लिए भी है, जो किसी स्त्री को प्रव्रज्या दे। ऐसे मनुष्य ही परिव्राजक बनें जिनमें सन्तानोत्पत्ति की शक्ति नष्ट हो गयी हो और जिन्होंने धर्मस्थों (धर्मस्थ न्यायालयों के न्यायधीशों) से परिव्राजक होने की अनुमति प्राप्त कर ली हो।
किसी ऐसे परिव्राजक को जनपद में न आने दिया जाए, जिसने वानप्रस्थ ग्रहण किए बिना ही प्रव्रज्या ग्रहण कर ली हो। कौटिल्य के अनुसार मनुष्य को अपना पूरा जीवन गृहस्थ आश्रम में ही व्यतीत नहीं करना चाहिए। परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के बाद मनुष्य को वानप्रस्थी बनना चाहिए और अन्त में सन्यास लेकर अकिंचनवृत्ति स्वीकार करनी चाहिए।
बौद्धकाल, मौर्यकाल एवं परवर्ती कालों में भी बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों के अनुयाई आश्रम-व्यवस्था का अनुसरण नहीं करते थे। लाखों लोग किसी बौद्ध आचार्य से प्रव्रज्या ग्रहण करके भिक्षु बन जाते थे। जब सनातन पौराणिक धर्म पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा तब धर्मसूत्रों के आचार्यों ने व्यवस्था दी कि जब भी व्यक्ति को वैराग्य उत्पन्न हो जाय, वह परिव्राजक बन जाए, चाहे वह ब्रह्मचर्य आश्रम में हो और चाहे गृहस्थ या वानप्रस्थ में।
कौटिल्य इस मत से सहमत नहीं था। उसने व्यवस्था दी कि केवल ऐसे व्यक्ति ही परिव्राजक बनें जिन्होंने अपनी पत्नी, सन्तान और परिवारजनों के भरण-पोषण की व्यवस्था कर दी हो, जिनमें सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो चुकी हो और जिन्होंने प्रव्रज्या के लिए धर्मस्थों से अनुमति प्राप्त कर ली हो।
बुद्ध के समय से ही कुछ स्त्रियों ने प्रव्रज्या ग्रहण करके भिक्षुणी बनना प्रारम्भ कर दिया था तथा भिक्षुणियों के पृथक् संघ स्थापित हो गए थे किन्तु कौटिल्य को स्त्रियों का परिव्राजिका बनना पसन्द नहीं था। इसलिए कौटिल्य ने व्यवस्था दी कि यदि कोई व्यक्ति स्त्रियों को परिव्राजक बनाए तो उसे दण्ड दिया जाए किंतु मौर्य युग एवं उसके बाद भी स्त्रियां पूर्ववत् परिव्राजिका बनती रहीं। कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र में ऐसी परिव्राजिकाओं का उल्लेख हुआ है जिनका उपयोग गुप्तचरों के रूप में किया जाता था।
यूनानी लेखकों के विवरणों से भी भारत के सन्यासियों का परिचय मिलता है। सिकन्दर ने तक्षशिला में पन्द्रह ऐसे सन्यासियों को देखा जो सांसारिक जीवन को त्याग कर ध्यान, तपस्या और समाधि में समय व्यतीत कर रहे थे। सिकन्दर इन सन्यासियों की साधना-विधि जानना चाहता था। अतः जब सिकन्दर की ओर से ओनेसिक्रितस इन सन्यासियों से मिला, तो उनमें से एक सन्यासी ने कहा- ‘अश्वारोहियों के लम्बे चोगे और ऊँचे बूट पहन कर कोई व्यक्ति साधना-विधि नहीं जान सकता। यदि सचमुच इसे जानना चाहते हो तो तुम्हें अपने समस्त वस्त्र उतार कर गर्म चट्टानों पर हमारे साथ बैठना होगा।’
यूनानी लेखकों ने दण्डी नामक वृद्ध सन्यासी का उल्लेख किया है जो जंगल में पर्णकुटी में निवास करता था और उसके अनेक शिष्य थे। सिकन्दर ने ओनेसिक्रितस को उसे बुलाने के लिए भेजा। ओनेसिक्रितस ने दण्डी के पास जाकर कहा- ‘परम-शक्ति-सम्पन्न द्यौ-देवता के पुत्र सिकन्दर ने तुम्हें बुलाया है। वह समस्त मनुष्यों का स्वामी एवं अधीश्वर है। यदि तुम उसके आदेश को स्वीकार करके उसके पास चलोगे तो वह बहुमूल्य उपहारों से तुम्हें सन्तुष्ट करेगा किन्तु यदि तुमने उसके आदेश का पालन नहीं किया तो वह तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देगा।’
दण्डी ने उपेक्षापूर्ण हंसी हंसते हुए कहा-
‘सबका अधिपति ईश्वर है वह कभी किसी का बुरा नहीं करता। ज्योति, जीवन, शान्ति, जल, शरीर और आत्मा का वही स्रष्टा है। मै उस ईश्वर का उपासक हूँ जो युद्ध नहीं करता और जिसे हत्या से घृणा है। सिकन्दर ईश्वर नहीं है, क्योंकि उसे भी एक दिन मरना है, वह अपने को संसार का स्वामी कैसे समझ सकता है! सिकन्दर मुझे जिन उपहारों का लालच दिखा रहा है, मेरे लिए वे अनुपयोगी हैं। संसार के लोग जिन वस्तुओं का संग्रह करते हैं, मेरे लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। उनसे मनुष्य को केवल चिन्ता और दुःख की प्राप्ति होती है। मैं पर्णशय्या पर निश्चिंत होकर सोता हूँ, क्योंकि मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसकी रक्षा के लिए मुझे चिन्ता करनी पड़े। यदि मेरे पास स्वर्ण होता तो मुझे सुख की नींद कैसे आ सकती थी। सिकन्दर मेरा सिर काट सकता है किन्तु मेरी आत्मा को नष्ट करने की शक्ति उसमें नहीं है। सिकन्दर अपना डर, उन लोगों को दिखाए, जिन्हें स्वर्ण और सम्पत्ति की चाह हो और जो मृत्यु से डरते हों। हम ब्राह्मण न तो मौत से डरते हैं और न हमें सम्पत्ति से कोई प्रेम है। इसलिए तुम सिकन्दर से कहो कि जो कुछ तुम्हारे पास है और जो तुम दूसरों को दे सकते हो, दण्डी को उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए वह सिकन्दर के पास नहीं जाएगा, किन्तु यदि सिकन्दर दण्डी से कुछ प्राप्त करना चाहे तो वह मेरे पास आ सकता है।’
ओनेसिक्रितस से दण्डी का उत्तर सुनकर सिकन्दर को भारत के संन्यासियों के जीवन दर्शन का परिचय मिला।
शुंग काल में आश्रम-व्यवस्था की स्थिति
मौर्यवंश के पतन के बाद वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ। उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था की दृष्टि से यह कालखण्ड अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस काल के चिन्तकों ने गृहस्थाश्रम को अधिक महत्त्व दिया। महाभारत का वर्तमान स्वरूप शुंग काल में तैयार हुआ था। अतः महाभारत में शुंग काल की आश्रम व्यवस्था का परिचय मिलता है।
महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि जिस प्रकार समस्त प्राणी अपने जीवन के लिए माता पर आश्रित होते हैं वैसे ही अन्य समस्त आश्रमों की स्थिति का आधार गृहस्थ आश्रम है। शान्तिपर्व के एक प्रकरण में विदेह के राजा जनक और उसकी पत्नी के बीच का वार्तालाप संकलित है।
जब राजा जनक ने संन्यास लेने का विचार किया तब जनक की रानी ने कहा- ‘वे संन्यासग्रहण करके कर्त्तव्यों से विमुख हो रहे हैं।’
महाभारत में कर्त्तव्यपालन से विमुख होकर संन्यासी बनने वाले व्यक्तियों की उपमा उन कुत्तों से की गई जो भोजन की आशा में दूसरों के मुंह की ओर देखते रहते हैं। शान्तिपर्व में एक कथा दी गई है जिसमें किशोर-वय के भिक्षुओं ने इन्द्र के समझाने पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना स्वीकार कर लिया था। महाभारत-युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर को अपने बन्धु-बान्धवों के विनाश पर बड़ा संताप हुआ और उसने वैरागी होकर भिक्षुवृत्ति ग्रहण करने का विचार किया।
इस पर अन्य पाण्डवों ने उसे समझाया कि ‘यह पाप-पूर्ण वृत्ति है। जो मनुष्य अकेला रहता है तथा पुत्र-पौत्रों, देवताओं, ऋषियों एवं अतिथियों का भरण-पोषण नहीं करता, उस मनुष्य में और जंगली पशुओं में कोई अन्तर नहीं है। जंगली पशु-पक्षी कभी मोक्ष प्राप्त नहीं करते। वृक्ष और पहाड़ सांसारिक झंझटों से दूर अकेले खड़े रहते हैं, वे भी मोक्ष-सिद्धि नहीं कर पाते।
मनुष्य को अपने सामाजिक कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना चाहिए, तभी वह पितृऋण, देव-ऋण और ऋषि-ऋण से मुक्त हो सकता है। यह गृहस्थ आश्रम द्वारा ही सम्भव है। जो लोग केवल मोक्ष को अपना लक्ष्य मानकर गृहस्थ धर्म की उपेक्षा करते हैं, वे निन्दनीय हैं।’
वैदिक धर्म के इस पुनरुत्थान काल में समाज का नेतृत्व जिन ब्राह्मणों के पास था, वे भिक्षु या सन्यासी बने बिना ही एवं गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ही अपने धार्मिक कर्त्तव्यों का पालन किया करते थे। पुराणों, स्मृतियों तथा अन्य प्राचीन साहित्य में भी गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई।
मनु के अनुसार कहा कि जिस प्रकार वायु को पाकर ही समस्त प्राणी जीवन धारण करने में समर्थ होते हैं, वैसे ही समस्त आश्रम गृहस्थ पर आधारित होकर अपनी सत्ता को कायम रख सकते हैं। ब्रह्माण्ड-पुराण और विष्णु-पुराण के अनुसार अन्य समस्त आश्रम, गृहस्थ आश्रम में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः वही सबसे श्रेष्ठ है। वायु-पुराण में गृहस्थ आश्रम को शेष तीनों आश्रमों की ‘प्रतिष्ठायोनि’ कहा गया है।
भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव जितना गहरा एवं व्यापक है, उतना और किसी ग्रंथ का नहीं है। भारतीय संस्कृति का निर्माण इसी ग्रंथ के आदर्शों पर हुआ है।
भारतीय लोक-जीवन में रामायण, महाभारत एवं पुराणों का महत्व सदियों से है। इन ग्रंथों को वेदों के समान आदर दिया जाता है। रामायण भारतीयों का आदि-काव्य है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में की थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव अत्यंत प्राचीन काल से है।
महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने संस्कृत में की थी। रामायण एवं महाभारत के रचनाकालों में सदियों का अंतर है किंतु इनके रचनाकाल को सम्मिलित रूप से महाकाव्य काल कहा जाता है। पुराणों की रचना भी सदियों के अंतराल में होती रही किंतु उनके रचना काल को भी समग्र रूप से पुराण काल कहा जाता है।
महाकाव्यों के अवतरण की पृष्ठभूमि
उपनिषदों में वैदिक धर्म के आडम्बर युक्त जटिल कर्मकाण्डों तथा यज्ञों का विरोध किया गया था और निर्गुण ब्रह्म, कर्मवाद, मोक्ष आदि सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया किन्तु उपनिषदों का अगोचर निर्णुण ब्रह्म इतना गूढ़ और सूक्ष्म था कि केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही उसे समझ सकता था। सामान्य मनुष्यों के लिए वह अत्यन्त कठिन था। इस कारण उपनिषदों के ज्ञान से जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं।
उपनिषदों ने मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्रह्म से साक्षात्कार, मनन निदिध्यासन तथा समाधि आदि नवीन साधन बताए किंतु उनका पालन भी जनसाधारण के लिए सम्भव नहीं था। न उनके लिए घर-बार छोड़़कर परिव्राजक बनना और ब्रह्म की प्राप्ति का प्रयत्न करना सम्भव था। इस कारण जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाओं को पूरा करने की लिए वैदिक धर्म के अंतर्गत कतिपय नवीन धार्मिक मत उत्पन्न हुए जिन्होंने उपनिषदों की मूल विचारधारा को सुरक्षित रखा किंतु उनके बाह्य रूप पर्याप्त भिन्नता लिए हुए थे।
इनमें से कुछ आस्तिक धर्म थे जो वेद, ईश्वर तथा ब्राह्मणों में आस्था रखते थे किंतु यज्ञादि कर्मकाण्डों के स्थान पर ईश्वर के किसी विशिष्ट रूप शिव, विष्णु, दुर्गा आदि को अपना आराध्य मानते थे तथा अपने आराध्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भक्ति को एकमात्र साधन मानते थे। दूसरे नास्तिकवादी धर्म एवं मत थे जो वेदों के प्रामाण्य, ईश्वरवाद तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व को अस्वीकर करते थे तथा उचित आचार-विचार को ही संसार तथा कर्मबंधन से छूटने का उपाय मानते थे।
आस्तिक एवं नास्तिक विचारधाराओं के अंतर्गत बहुत से मत उत्पन्न हुए जिनमें से अधिकांश अल्पजीवी सिद्ध हुए किंतु चार धर्म जनमानस में गहराई तक अपनी पैठ बनाने में सफल रहे। इनमें से आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म एवं शैव धर्म तथा नास्तिक विचारधारा के अंतर्गत जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म थे।
आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म का बीज वेदों में उपलब्ध था। महाकाव्य काल में यह बीज प्रस्फुटित होकर सुंदर पौधे का आकार लेने लगा। रामायण में राम को तथा महाभारत में श्रीकृष्ण को युग-पुरुष के रूप में वर्णित किया गया तथा उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया। राम तथा कृष्ण के रूप में जनसामान्य के समक्ष भक्त-वत्सल भगवान का विराट रूप सामने आया जो सर्वशक्तिमान, शत्रुहंता, दयालु, भक्तों की पुकार सुनने वाला, दुष्टों का विनाश करने वाला तथा धर्म की स्थापना करने वाला रूप था। इन दोनों ग्रंथों में विविध कथाओं के माध्यम से भगवान के गुणों और विशेषताओं का निरूपण किया गया जिससे जनसामान्य में भगवान के प्रति आस्था का उदय हो सके।
श्रीराम का काल
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12,96,000 वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8,64,000 वर्ष रही। द्वापर के बाद ई.पू. 3,102 में कलियुग आरम्भ हुआ।
यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8,69,119 वर्ष पहले हुआ। वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5,114 अर्थात् आज से लगभग 7,133 वर्ष पूर्व हुआ। पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा रामेश्वरम् और श्रीलंका के बीच स्थित रामसेतु को कार्बन डेटिंग के आधार पर 7000 वर्ष पुराना आकलित किया है।
रामायण का रचनाकाल
रामायण तथा महाभारत के वास्तविक रचना काल के बारे में विद्वानों ने अलग-अलग धारणाएं प्रस्तुत की हैं किंतु अधिकांश भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वान रामायण तथा महाभारत की रचना को बुद्ध से भी पहले की मानते हैं। इनमें से भी रामायण की रचना महाभारत की रचना से पहले हुई थी। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है।
रामायण के अयोध्या काण्ड के 109वें सर्ग के चौतीसवें श्लोक में बुद्ध का स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार हुआ है- ‘यथा हि चोरः तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।’ अर्थात् ‘बुद्ध यानी जो नास्तिक है और नाम मात्र का बुद्धिजीवी है, वह चोर के समान दंड का अधिकारी है।’
निश्चित रूप से यह श्लोक रामायण में बहुत बाद में जोड़ा गया है किंतु इस उक्ति के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि रामायण की रचना, बुद्ध के आविर्भाव के पश्चात् हुई। मैकडॉनल ने रामायण के मूल रूप को ई.पू. 500 की रचना स्वीकार किया है। विख्यात पाश्चात्य विद्वान वेबर ने रामायण में उल्लिखित ‘यवन’ शब्द के आधार पर रामायण को यवन आक्रमण के बाद की अर्थात् ई.पू. चौथी शताब्दी की रचना माना है।
अर्थात् इन दोनों के अनुसार रामायण की रचना बुद्ध के बाद हुई। विन्टरनित्स के अनुसार इस ग्रन्थ की मूल रचना ई.पू. चौथी शताब्दी में हुई तथा इसका अन्तिम स्वरूप दूसरी शताब्दी ईस्वी के लगभग निश्चित हुआ था।
बौद्ध साहित्य के कई प्रारम्भिक ग्रंथों पर रामायण का प्रभाव देखा जा सकता है। दशरथ जातक पर यह प्रभाव सर्वाधिक दिखाई देता है तथा इस जातक में श्रवण कुमार की कथा का भी उल्लेख है। प्रसिद्ध विद्वान सिलवा लेवी के अनुसार सद्धर्मस्मृति उपाख्यान निश्चित रूप से वाल्मीकि का ऋणी है क्योंकि इस ग्रन्थ में जम्बू द्वीप का वर्णन काफी अंशों में रामायण के वर्णन से मेल खाता है।
सद्धर्मस्मृति उपाख्यान में नदियों, समुद्रों, देशों एवं द्वीपों को उन्हीं नामों से सम्बोधित किया गया है जिन नामों से उनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हो चुका है। रामायण के अयोध्या काण्ड में मिथिला एवं विशाला नामक दो भिन्न नगरों का उल्लेख है जब कि बुद्ध के समय तक दोनों नगर वैशाली के रूप में एक हो गए थे। अतः इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि रामायण, बुद्ध पूर्व की रचना है।
रामायण की रचना महाभारत से पहले हुई। महाभारत में न केवल महर्षि वाल्मीकि एवं रामायण का उल्लेख हुआ है अपितु राम से सम्बन्धित स्थानों को तीर्थ के रूप में स्वीकार किया गया है। रामायण में वर्णित भारतीय भौगोलिक सीमाएं महाभारत कालीन भारत की अपेक्षा काफी न्यून हैं। इसके विपरीत रामायण में कहीं भी महाभारत एवं उसके किसी पात्र का उल्लेख नहीं हुआ है। अतः रामायण महाभारत के पूर्व की रचना है।
महर्षि पाणिनी का काल ई.पू. पांचवीं शताब्दी सिद्ध हो चुका है। रामायण में यत्र-तत्र अपाणिनीय प्रयोग मिलते हैं जिनसे सिद्ध होता है कि रामायण की रचना पाणिनी के आविर्भाव से पूर्व हुई। डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। याकोबी के अनुसार रामायण के प्रथम एवं सप्तम काण्ड प्रक्षिप्त हैं। उनमें आए हुए बुद्ध एवं यवनों के उल्लेख मूल रामायण के नहीं हैं। रामायण के वे भाग जिनमें राम, पुरुषोत्तम के रूप में निरूपित हैं, निश्चित ही बुद्ध से पहले लिखे गए।
महर्षि वाल्मीकि का परिचय
महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ के रचियता थे। इस ग्रंथ का प्रधान लक्ष्य मानव के चरित्र का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करना था। महर्षि वाल्मीकि आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। वाल्मीकि के सम्बन्ध में महाभारत एवं पुराणों में कथाएं मिलती हैं। इन ग्रंथों में वाल्मीकि को ‘भार्गव’ अर्थात् भृगुवंश में उत्पन्न बताया गया है। महाभारत के ‘रामोपाख्यान’ के रचयिता को भी भार्गव कहा गया है।
एक आख्यान के अनुसार वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु किरातों के साथ रहने से वे ‘रत्नाकर’ नामक डाकू बन गए। एक बार उन्होंने देवर्षि नारद आदि सप्त-ऋषियों को लूटने के लिए उनका मार्ग रोका। उन ऋषियों ने वाल्मीकि से कहा कि जिन कुटुम्बियों के लिए तुम नित्य पाप-संचय करते हो, उनसे जाकर पूछो कि वे तुम्हारे इस पाप के सहभागी बनने के लिए तैयार हैं या नहीं!
इस पर वाल्मीकि ने नारद आदि सप्तऋषियों को वृक्ष से बांध दिया और अपने घर जाकर वही प्रश्न पूछा। वाल्मीकि के परिजनों ने उत्तर दिया कि परिवार का भरण-पोषण करना तुम्हारा कर्त्तव्य है और परिवार तुम्हारे पाप का भागीदार नहीं है। यह उत्तर सुनकर वाल्मीकि के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। नारद ने उन्हें राम-राम जपने का उपदेश दिया किंतु वाल्मीकि राम-राम नहीं बोल सके और ‘मरा-मरा’ जपने लगे।
इस प्रकार ‘मरा-मरा’ स्वतः ही ‘राम-राम’ हो गया। कई वर्षों तक निश्चल रहकर तपस्या करने से दीमकों ने उनके शरीर पर अपना घर अर्थात् ‘वाल्मीक’ बना लिया। उनकी घनघोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें ‘वाल्मीक’ से बाहर निकलने का निर्देश देते हुए कहा कि वाल्मीक में तपस्या करने के कारण तुम्हारा दूसरा जन्म हुआ है। आज से तुम वाल्मीकि नाम से जाने जाओगे। कुछ पुराणों के अनुसार इससे पूर्व उनका नाम ‘च्यवन’ था किंतु स्कन्द पुराण में ऋषि बनने से पूर्व इनका नाम ‘अग्निशर्मन’ दिया गया है।
ऋषि बन जाने के बाद वाल्मीकि ने आध्यात्मिक जीवन आरम्भ किया। बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए। ऋषि भरद्वाज भी उनके शिष्य थे। एक बार वे भरद्वाज के साथ नदी में स्नान करके लौट रहे थे, तब मार्ग में उन्होंने एक व्याध को, अपने बाण से मैथुनासक्त क्रौंच पक्षियों का शिकार करते हुए देखा। उनमें से एक पक्षी मर गया और उसका साथी करुण क्रंदन करने लगा। वाल्मीकि का हृदय करुणा से द्रवित हो उठा और उनके मुख से एक छन्द फूट पड़ा-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमरू शास्वती समा।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।।
अर्थात- हे निषाद! तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।
मुख से अकस्मात निकले हुए शब्दों को एक श्लोक का रूप प्राप्त होते देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु क्रोध में निषाद को इतना बड़ा शाप देने का उन्हें दुःख भी हुआ। तभी परमपिता ब्रह्मा प्रकट हुए और कहा- ‘पछताने का कोई कारण नहीं है। यह श्लोक तुम्हारी कीर्ति का कारण बनेगा। इसी छन्द में तुम राम के चरित्र की रचना करो।’ ब्रह्माजी के आदेशानुसार वाल्मीकि ने चौबीस हजार श्लोकों से युक्त ‘रामायण’ नामक महाकाव्य का सृजन किया।
वाल्मीकि रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार एक बार तप एवं स्वाध्याय में मग्न एवं भाषण-कुशल नारद से वाल्मीकि ने प्रश्न किया कि इस संसार में ऐसा कौन महापुरुष है जो आचार-विचार एवं पराक्रम में आदर्श माना जा सकता है? नारद ने उन्हें रामकथा का सार सुनाया, वाल्मीकि ने उसी कथा को श्लोकबद्ध करके रामायण की रचना की। इस वृत्तान्त से प्रतीत होता है कि उस काल में श्रीराम के जीवन से सम्बन्धित कुछ कथाएं प्रचलित थीं, वाल्मीकि ने उन्हीं को आधार बनारक छन्देबद्ध महाकाव्य की रचना की।
रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार श्रीराम द्वारा अपनी पत्नी सीता का त्याग करने पर महर्षि वाल्मीकि ने ही गर्भवती सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया। वाल्मीकि के आश्रम में सीता के दो जुडवां पुत्र हुए। महर्षि ने ही उन बालकों के नाम ‘कुश’ एवं ‘लव’ रखे। सीता के दोनों पुत्र वाल्मीकि के आश्रम में पलकर बड़े हुए।
वाल्मीकि ने ही लव और कुश के बड़े होने पर उन्हें स्वयं के द्वारा रचित रामायण का सस्वर पाठ करना सिखाया। लव और कुश स्थान-स्थान पर जाकर रामायण का गायन करने लगे। जिस समय श्रीराम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब कुश एवं लव ने यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया और वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ भी उन्होंने रामायण का गायन किया। उनके गायन से श्रीराम मन्त्रमुग्ध हो गए और राम को ज्ञात हुआ कि ये ऋषिकुमार नहीं अपितु श्रीमराम और सीता के पुत्र हैं। श्रीराम ने सीता को अपने पास बुलवा लिया।
वाल्मीकि स्वयं सीता के साथ राम-सभा में उपस्थित हुए और उन्होंने सीता के सतीत्व की साक्षी दी। उन्होंने अपने सहस्र वर्षों के तप एवं सत्यप्रतिज्ञा को साक्षी बनाकर श्रीराम से सीता को स्वीकार करने की प्रार्थना की। वाल्मीकि के कहने पर ही देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ लेकर भूमि में प्रवेश किया। महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में केवल यही वृत्तान्त प्राप्त होता है।
रामायण का वर्तमान रूप
रामायण के वर्तमान स्वरूप में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड नामक सात अध्याय हैं तथा 24,000 श्लोक हैं। विद्वानों की मान्यता है कि मूल रामायण में अयोध्याकाण्ड से लेकर लंकाकाण्ड तक केवल पांच काण्ड ही थे, बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड बाद में जोड़े गए।
बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य अध्यायों से भिन्न है तथा इन अध्यायों के बहुत से कथन अन्य पांच अध्यायों से मेल भी नहीं खाते। वाल्मीकि ने पांच अध्यायों वाले मूल रामायण ग्रन्थ में राम को उनके युग का महान् पुरुष माना है और उसी रूप में उनका चरित्र चित्रण किया है किन्तु बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में राम को विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि ये दोनों काण्ड बाद के युग के हैं।
पाठ की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण के चार प्रामाणिक संस्करण उलपब्ध है- उदिच्य पाठ, दक्षिणात्य पाठ, गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठ। वर्तमान में तीन लेखकों की अत्यंत प्रसिद्ध रामायण उपलब्ध हैं- वाल्मीकि रामायण, वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण और तुलसीदास कृत रामचरित मानस। इन तीनों की मूल कथा समान है किंतु कवियों ने तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक धारणाएं अपने-अपने ढंग से वर्णित की हैं। इस कारण तीनों ग्रंथों के पात्रों के चरित्र-चित्रण में परिवर्तन हो गया है। महर्षि वाल्मीकि के राम एक महापुरुष हैं जिनमें मानवीय दृढ़ताएं एवं दुर्बलताएं हैं किन्तु वेदव्यास एवं तुलसीदास के राम घट-घटवासी एवं सर्वशक्तिमान विष्णु के अवतार हैं। वे पतित-पावन एवं मोक्षदायक हैं।
रामायण की कथा
रामायण की कथा संक्षेप में इस प्रकार से है- अयोध्या के ईक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ की तीन रानियां- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी थीं। उनके चार पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए। राम का विवाह विदेह के राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ। वृद्धावस्था में दशरथ, अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राज्य देकर संसार से निवृत्त होना चाहते थे किंतु रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे- अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य और कौशल्या-पुत्र राम को चौदह वर्ष का बनवास।
राम ने अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन-गमन किया और चित्रकूट में रहने लगे। राजा दशरथ की, पुत्र-वियोग में मृत्यु हो गयी। कैकेयी के पुत्र भरत ने राज्य पर बड़े भाई राम का अधिकार माना और वे राम-लक्ष्मण एवं सीता को वापस लाने के लिए वन गए।
राम अपने पिता के वचनों का पालन करने के लिए चौदह वर्ष वन में व्यतीत करने के निश्चय पर अडिग रहे। तब राजकुमार भरत श्रीराम की चरण-पादुकाएं लेकर अयोध्या लौट गए। राम, लक्ष्मण और सीता, चित्रकूट छोड़कर गोदावरी नदी के तट पर चले गए तथा वहाँ पंचवटी नामक स्थान पर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।
लंका का राजा रावण, राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में सीता का अपहरण करके लंका ले गया। राम ने किष्किन्धा के राजा सुग्रीव, उनके सेनानायक हनुमान एवं उनकी सेना की सहायता से रावण पर आक्रमण किया तथा उसे पराजित करके सीता को वापस प्राप्त किया। इस कार्य में रावण के छोटे भाई विभीषण ने राम की सहायता की। राम, लक्ष्मण और सीता चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या लौट आए जहाँ राम का राज्याभिषेक किया गया।
रावण के यहाँ रहने के कारण कुछ अयोध्यावासी, देवी सीता की पवित्रता पर संदेह करते हुए राजा रामचंद्र की आलोचना करने लगे। अतः राम ने गर्भवती सीता का त्याग कर दिया। देवी सीता महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं जहाँ उन्होंने कुश एवं लव नामक जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उन्हें स्वयं द्वारा रचित रामायण सुनाई तथा उन्हें रामायण के गायन का निर्देश दिया।
जब राम ने अश्वमेध यज्ञ किया तब कुश और लव ने यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया तथा वे अयोध्या पहुँचे। कुश और लव ने राम के समक्ष रामायण का गायन किया। राम को ज्ञात हुआ कि वे देवी सीता एवं श्रीराम के ही पुत्र हैं तो राम ने सीता को अयोध्या बुलवाया। वाल्मीकि सीता को लेकर अयोध्या पहुँचे, जहाँ वाल्मीकि के कहने पर देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ ली तथा भूमि में प्रवेश किया।
भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव
आर्य-संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ
रामायण प्राचीन आर्यों की उच्च आदर्श युक्त संस्कृति की संवाहक है। रामकथा के माध्यम से वाल्मीकि ने आर्यों के संघर्षमय जीवन, त्याग, वचन पालन एवं सामाजिक मर्यादा-पालन के लिए प्राण तक त्यागने की परम्पराओं का वर्णन किया है। आर्यों के साथ-साथ इस ग्रन्थ में वानर संस्कृति एवं राक्षस संस्कृति की परम्पराओं का भी वर्णन किया गया है।
वानर एवं राक्षस दोनों ही अनार्य संस्कृतियां थीं किंतु इन दोनों में बहुत अंतर था। वानर जाति आर्यों की मित्र थी जबकि राक्षस जाति आर्यों की शत्रु थी। वाल्मीकि ने आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को, वानर संस्कृति के प्रतीकों के रूप में सुग्रीव, बाली एवं हनुमान को तथा राक्षस संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में रावण को प्रस्तुत किया गया है।
राम उच्च सामाजिक मर्यादाओं के पालन के पक्षधर हैं तथा निजी स्वार्थों की अपेक्षा परिवार एवं समाज में नैतिकता, सत्य, न्याय और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं किंतु राक्षस-राज रावण अनीति, अन्याय एवं अत्याचार के माध्यम से विजय प्राप्त करना चाहता है। उसके लिए पारिवारिक सम्बन्ध, सामाजिक मर्यादाएं एवं नैतिकता कुछ भी मूल्य नहीं रखती है।
राम-रावण का युद्ध वस्तुतः आर्य और अनार्य संस्कृतियों के संघर्ष की गाथा है जिसमें सत्य की असत्य पर, न्याय की अन्याय पर तथा नैतिकता की अनैतिकता पर विजय होती है।
रामायण में आर्य पारिवारिक जीवन के उच्चतम आदर्शों का निरूपण हुआ है। राम अपने सम्पूर्ण जीवन में स्वयं को आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र एवं आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका जीवन-चरिर्त्र आज भी भारतीय संस्कृति का आदर्श माना जाता है। राम, आर्य जीवन के उच्च आदर्श के प्रतीक हैं।
वे आदर्श पुत्र होने के कारण, पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके, चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करते हैं, आदर्श भाई होने के कारण वे सहर्ष अपने भाई भरत को राज्य देना स्वीकार करते हैं। राजकुमार भरत भी आदर्श भाई का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तथा ज्येष्ठ भाई राम के होते हुए राजपद स्वीकार नहीं करते। देवी सीता आदर्श पत्नी का कर्त्तव्य निभाती हैं और राजमहलों का सुख त्यागकर अपने पति राम के साथ वन-गमन करती हैं। लक्ष्मण भी भ्रातृत्व भावना का उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वे अपने पिता का राज्य, अपना परिवार और महलों के सुख छोड़कर वनवासी भाई के साथ वन के कष्टों को सहर्ष स्वीकार करते हैं।
आदर्श राजा होने के कारण ही राम ने प्रजा द्वारा की जा रही आलोचना को स्वीकार किया और अपनी प्राणप्रिय सीता का त्याग किया किन्तु आदर्श पति होने के कारण उन्होंने किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं किया और एक-पत्नीव्रत का पालन किया जो उस युग में असाधारण बात थी। देवी सीता का चरित्र भारतीय नारीत्व का साक्षात् प्रतीक है।
भारतीय स्त्रियों के दैनिक जीवन में सीता की पवित्रता और पतिव्रत धर्म आज भी आदर्श का प्रतिमान है। पतिव्रत एवं पत्नीव्रत का जैसा सुन्दर आदर्श राम-सीता के दाम्पत्य जीवन से मिलता है, वह अन्यत्र मिलना दुष्कर है। दशरथ ने पिता का, भरत और लक्ष्मण ने भाई का, कौशल्या और सुमित्रा ने माता का, सुग्रीव ने मित्र का तथा हनुमान ने सेवक का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, वह आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
रामायणकार वाल्मीकि ने यथार्थ जीवन के सम्बन्ध में दृष्टि प्रस्तुत की है न कि काल्पनिक आदर्श के सम्बन्ध में। वालमीकि ने राम के एक पत्नीव्रत की असाधारणता को कहीं गौरव प्रदान नहीं किया। जबकि वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग के अनुसार राजा दशरथ की तीन सौ पचास रानियां बताई गई हैं। स्वयं दशरथ के पुत्र इस बात का उपालम्भ देते हैं कि राजा दशरथ काम-पाश में बंधे हुए कैकयी के वशवर्ती थे। राम का अपनी पत्नी सीता के प्रति अनुराग कम नहीं था।
वे शरद् ऋतु में स्वयं को अकेला जानकर लक्ष्मण से कहते हैं- ‘सीता को न देखकर शोक से अभितप्त शरद् के चार मास मुझे सौ वर्षों जैसे जान पड़ते हैं। मैं प्रिया के बिना दुःखी हूँ।’ सीता का अपहरण हो जाने के बाद विलाप करते हुए क्रुद्ध राम लक्ष्मण से कहते हैं- ‘यदि सीता मुझे सकुशल वापिस नहीं मिली तो मैं तीनों लोकों को नष्ट कर दूँगा। तुम इस समय मेरे पराक्रम से जगत् को आकुल और मर्यादाहीन हुआ देखोगे।’ सीता के लिए राम का जगत् को नष्ट करने का संकल्प अपनी पत्नी के प्रति समर्पण भाव को व्यक्त करता है।
एक स्थान पर राम पुनः लक्ष्मण से कहते हैं- ‘लोगों की ऐसी धारणा है कि समय बीतने से शोक दूर हो जाता है किन्तु प्राणप्रिय सीता को न देखकर मेरा शोक तो उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। मुझे इस बात का दुःख नहीं कि सीता दूर है और उसका हरण कर लिया गया है, मुझे दुःख इस बात का है कि उसका यौवन बीता जा रहा है।’
इससे स्पष्ट है कि वाल्मीकि द्वारा प्रस्तुत भारतीय संस्कृति काल्पनिक एवं खोखले आदर्शवाद पर नहीं अपितु जीवन के कटु यथार्थ को भी पूरी तरह समझती है।
वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य के नायक राम को महापुरुष ही रहने दिया, उन्हें अवतार घोषित नहीं किया जबकि सोलहवीं सदी के कवि तुलसीदास ने राम को विष्णु का अवतार बनाकर शील, सौन्दर्य एवं शक्ति का चरम रूप प्रस्तुत किया। वाल्मीकि के राम आर्य-संस्कृति के पूर्णतम प्रतिनिधि हैं। हजारों साल तक आर्य जाति राम के आदर्शों पर चलती रही। आज भी भारतीय समाज का सबसे बड़ा आदर्श राम ही हैं।
रामायण में धर्म एवं नैतिकता
रामायण का प्रधान लक्ष्य मनुष्य के चरित्र का वह आदर्श प्रस्तुत करना है जिससे मनुष्य देवत्व पर पहुँचता है। रामायण के अनुसार चरित्र ही धर्म है और चरित्रवान राम धर्म के मूर्तरूप हैं। यह चरित्र सत्यनिष्ठा, वचन पालन एवं शौर्य पर आधारित है। इस धर्म की कुँजी मन का संयम, इन्द्रियों पर अधिकार और कर्त्तव्यपालन की तत्परता है।
परिवार एवं समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना, लोक-जीवन की मर्यादा की रक्षा करना और समाज की व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान करना इसका महान् आचार है। यही वह धर्म-बन्धन है जो जीवन को उचित मार्ग पर ले जाता है। इस धर्म-बन्धन में बंधा हुआ मनुष्य स्वार्थ से परमार्थ को श्रेष्ठ समझते हुए लोक-कल्याण की साधना में लगा रहता है।
इसीलिए राम विमाता कैकेयी के कहने मात्र से राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार को त्याग देते हैं। वाल्मीकि के राम युद्ध-भीरू नहीं हैं। वे प्रजाजनों को आश्वस्त करते हुए कहते हैं- ‘मैं अकेला ही सारी पृथ्वी को अपने बाणों से नष्ट करके अपना अभिषेक करा सकता हूँ किंतु मैं अधर्म से डरता हूँ, क्योंकि मैं धर्म के बन्धन से बंधा हुआ हूँ।’
अतः राम का संकल्प है कि वह लोभ, मोह, अज्ञान या किसी भी तामसी प्रवृत्ति से सत्य के सेतु को नहीं तोड़ेंगे। जीवन का अमूल्य कोष धर्म और सत्य है जिसके खो जाने से मनुष्य सर्वथा दरिद्र हो जाता है किन्तु इस कोष की वृद्धि से वह देवता बन जाता है। वाल्मीकि के राम ने किसी काल्पनिक मोक्ष के लिए धर्म का मार्ग अपनाने की बजाए मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर सन्तुलित समाज, व्यवस्थित राष्ट्र, मर्यादित आचार और संयत व्यवहार की आधारशिला पर धर्म का सुदृढ़ प्रसाद खड़ा किया है।
मनुष्य मानवीय-दुर्बलताओं से ग्रस्त होता है किंतु वाल्मीकि ने राम के जिन गुणों का उल्लेख किया है वे गुण एक साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकते। राम में पिता के प्रति आज्ञाकारिता, छोटे भाइयों भरत एवं लक्ष्मण के प्रति वात्सल्य, गुरुओं के प्रति आदर, पत्नी के प्रति अनुराग, सुग्रीव एवं विभीषण के प्रति मित्रता, राज्य तथा ऐश्वर्य के प्रति अनासक्ति, रावण जैसे दुष्ट के विरुद्ध प्रति पराक्रम आदि गुण बताए हैं।
वाल्मीकि ने राम के भीतर सहृदयता, कोमलता, अनुकम्पा, शास्त्रज्ञान, सौम्यता तथा जितेन्द्रिय आदि गुणों को भी दर्शाया है। राम अपने जीवन में प्रत्येक स्थल पर आदर्शों की प्रतिष्ठा करते हुए दिखाई देते हैं। राम ने प्रजा और परिवारजनों के आग्रह को अस्वीकार करके अपने पिता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए वन-गमन स्वीकार किया।
उनके इस आचरण में बड़प्पन दिखाने का भाव नहीं है अपितु नैतिकता की भव्यता है। राम भली-भांति जानते थे कि राजा का आचरण, प्रजा के लिए अनुकरणीय हो जाता है इसलिए राजा को जीवन के हर क्षण में प्रजाजन के समक्ष उच्च-आदर्श रखना चाहिए। जब जबालि ने राम से यह कहा कि माता, पिता, भाई आदि कोई किसी का नहीं होता, अतः राम को चाहिए कि वह लौटकर अयोध्या चला जाए और राज्य का भोग करे।
तब राम ने उत्तर दिया- ‘ऐसा करके मैं यथेष्टचारी कहलाऊँगा और प्रजा-जन भी मेरा ही अनुसरण करेंगे, क्योंकि प्रजा, राजा का अनुसरण करती है। देवताओं एवं ऋषियों ने सत्य को मान्यता दी है, सत्यवादी इस लोक और परलोक दोनों में शाश्वत कल्याण को प्राप्त होता है।’ इस प्रकार वाल्मीकि ने राम के माध्यम से धर्म एवं नैतिकता के मानदण्डों की स्थापना की है।
आदर्श स्त्री के रूप में सीता
जिस प्रकार वाल्मीकि के राम, भारतीय पुरुषों के आदर्श हैं उसी प्रकार देवी सीता, भारतीय नारियों की आदर्श हैं। वह पति-परायण, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा विकट परिस्थितियों में भी पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली नारी हैं। जब राम को वन-गमन का आदेश होता है, तब जनक जैसे बड़े राजा की पुत्री और दशरथ जैसे बड़े राजा की पुत्रवधू होते हुए भी वे चौदह वर्ष की दीर्घ अवधि का वनवास स्वीकार करती हैं क्योंकि भारतीय नारी का आदर्श हर स्थिति में अपने पति का साथ निभाना है।
वनवास में सीता अपने देवर लक्ष्मण को पुत्रवत् स्नेह देती हैं। जब रावण पंचवटी से सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है और उन्हें नाना प्रकार के भय दिखाकर अपनी पत्नी बनने को कहता है, तब भी सीता रावण को अपने पति के बल का परिचय देकर अपने सतीत्व की रक्षा करती हैं।
जब राम-रावण युद्ध में राम विजयी होते हैं तब सीता अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देने को सहर्ष तत्पर हो जाती हैं। एक साधारण धोबी के कहने पर जब राम, सीता का त्याग कर देते हैं, तब भी वह अपने पति के प्रति किसी प्रकार का दुर्भाव मन में न लाकर वाल्मीकि आश्रम में जीवन व्यतीत करती हैं और अपने पुत्रों- कुश एवं लव का समुचित पालन-पोषण करके मातृत्व के कर्त्तव्य का निर्वाह करती हैं।
अन्त में अपने पति की मर्यादा की रक्षा करने के लिए, ताकि भविष्य में भी कोई व्यक्ति उनके पति पर अंगुली न उठा सके, सीता भूमि में प्रवेश करती हैं। इस प्रकार सीता का आचरण और उनका पातिव्रत्य आज भी भारतीय नारियों के लिए सबसे बड़ा आदर्श है।
रामायण का साहित्यिक महत्त्व
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रामायण संस्कृत भाषा का ही नहीं अपितु विश्व की किसी भी भाषा का पहला महाकाव्य है। साहित्यिक दृष्टि से रामायण एक अनुपम ग्रंथ है। भाव, भाषा और कथा तीनों ही स्तर पर रामायण एक विलक्षण ग्रंथ है। इसमें संस्कृत भाषा के क्लिष्टमत और सरलतम छन्दों एवं अलंकारों का प्रयोग किया गया है। पूरे ग्रंथ में अलंकारों का चमत्कारपूर्ण-विन्यास तथा रसों का पूर्ण परिपाक मिलता है। रामायण की कथा में शृंगार, वीर, शान्त, रौद्र, वात्सल्य, प्रेम, करुणा, वीभत्स, भक्ति आदि समस्त रसों का यथास्थान प्रयोग किया गया है। पाठक की रुचि एवं उत्सुकता को बनाए रखने के लिए शृंगार, वीर तथा करुणा रसों के माध्यम से कथा को अत्यंत रोचक एवं ग्राह्य बनाया गया है। अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास का आदेश देते समय पिता दशरथ की मनोदशा, माता कौशल्या एवं सुमित्रा का भाव-विह्वल होकर मातृ-प्रेम का प्रदर्शन, सीता का पातिव्रत्य धर्म, लंका में सीता की मनोदशा, दुःख के क्षणों में भी राम का सौम्य चरित्र आदि विभिन्न भावों का मनोवैज्ञानिक ढंग से अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। साहित्यिक-सौन्दर्य की अनुभूति इस महाकाव्य की प्रमुख विशेषता है। ग्रंथ में प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन के साथ-साथ नारी-सौन्दर्य का अनुपम वर्णन किया गया है। चित्रकूट, गंगा नदी, पम्पासरोवर, पंचवटी वन, दण्डक वन के मनोरम दृश्य तथा शरद् एवं वर्षा ऋतु के मनोहारी वर्णन के साथ ही बाली की पत्नी तारा के अनुपम सौन्दर्य का भी सुंदर वर्णन किया गया है।
नारी-सौन्दर्य के अन्तर्गत वाल्मीकि ने लंका-काण्ड में हनुमान द्वारा लंका में सीता को खोजते समय जिन अनेक सुन्दर स्त्रियों को देखा उन स्त्रियों के अंग-प्रत्यंगों तथा चेष्टाओं का भी आकर्षक वर्णन किया गया है। सुन्दर-काण्ड में जब हनुमान लंका में पहुँच कर रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, तब महल की नारियों के सौन्दर्य का अनुपम वर्णन करते हुए वाल्मीकि ने लिखा है-
‘रति के परिश्रम से खिन्न रावण की सूक्ष्म कटि वाली स्त्रियां जहाँ-तहाँ खाली स्थानों में सो रही थीं। कोई सुन्दर वर्ण की नृत्य-कुशल नारी अपने लिटाए अंगों में नृत्य के विभ्रमों को प्रकट कर रही थी, कोई सर्वांग-सुन्दरी पटह नामक वाद्य यन्त्र को वैसे ही आलिंगित किए हुए थी जैसे कोई अपने प्रियतम का आलिंगन करती है। इसी प्रकार कोई कमल-लोचना वीणा का आलिंगन किए हुए थी। रावण की पत्नी मन्दोदरी मुक्ता-मणियों से युक्त आभूषणों से अलंकृत थी और अपनी शोभा से स्वयं भवन को सुन्दर बना रही थी। उसका गोरा बदन स्वर्ण की आभा की भांति प्रकाशवान था।’
रामायण में मानव की अन्तः-प्रकृति और मनोवृत्तियों का बड़ा स्वाभाविक चित्रण हुआ है। इन समस्त दृष्टियों से रामायण काव्य-कला का सुन्दर उदाहरण है। संस्कृत साहित्य एवं भारत की विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर इसका प्रभाव है। संस्कृत के महाकवि कालीदास एवं भवभूति तथा लोकभाषा के कवि गोस्वामी तुलसीदास की कृतियां वाल्मीकि की रामायण से सर्वाधिक प्रभावित हुई हैं। निःसन्देह रामायण संस्कृत भाषा एवं भारतीय संस्कृति का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व एवं साहित्यिक जगत् का अनूठा ग्रंथ है।
रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व
ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धता की दृष्टि से भी रामायण का अत्यधिक महत्त्व है। डॉ. याकोबी के अनुसार, विषय-वर्णन की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण दो भागों में विभाजित की जा सकती है- (1.) बालकाण्ड और अयोध्याकाण्ड में वर्णित अयोध्या की घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ हैं, (2.) दण्डकारण्य एवं रावण-वध से सम्बन्धित घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु रावण है।
इनमें से अयोध्या की घटनाएं ऐतिहासिक हैं, जिनका सम्बन्ध निर्वासित इक्ष्वाकुवंशीय राजकुमार से है। रावण-वध से सम्बन्धित घटनाओं का मूल उद्गम वेदों में वर्णित देवताओं की कथाओं में देखा जा सकता है। अतः डॉ. याकोबी के अनुसार, रामकथा से सम्बन्धित इन सारे आख्यान काव्यों की रचना इक्ष्वाकु वंश के सूतों ने सर्वप्रथम की, जिनमें रावण और हनुमान से सम्बन्धित प्रचलित आख्यानों को मिलाकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।
रामायण में वर्णित रामकथा, आर्यों द्वारा की गई दक्षिण विजय का प्रथम वर्णन है। दक्षिण भारत के प्राचीनतम शिलालेखों में उत्तरी भारत के इक्ष्वाकुवंशीय राजा रामचन्द्र का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है कि राम के दक्षिण प्रवेश के पश्चात् दक्षिण भारत में आर्यों की सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव फैला। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी अद्भुत प्रतिभा द्वारा विविध सूत्रों को समेट कर एक उत्कृष्ट मौलिक काव्य की सृष्टि की।
यदि यह कहा जाए कि भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव रामायण से भी अधिक है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। जहाँ रामायण आदर्श समाज का चित्रण करते हुए समाज को अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, वहीं महाभारत में समाज के वास्तविक स्वरूप का चित्रण करते हुए, मानव मात्र को अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया गया है।
महाभारत युद्ध का काल
नृवंश विज्ञानी, जीव विज्ञानी, पुरातत्व विज्ञानी तथा भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि धरती पर वर्तमान मानव अर्थात् होमो सेपियन सेपियन की शुरुआत आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले हुई एवं उसकी उन्नत पीढ़ी ‘क्रोमैगनन मैन’ की शुरुआत आज से लगभग 40 हजार साल पहले हुई।
पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 10,000 साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन करना आरंभ किया। भारत में भी खेती आरम्भ होने का काल यही माना जाता है। अतः महाभारत का युद्ध इस काल के बाद का ही है। क्योंकि महाभारत के युद्ध का समय मनुष्य के कृषि आरम्भ करने से काफी बाद का है।
भारत में आदमी द्वारा हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाने के प्राचीनतम अवशेष आज से लगभग 6600 वर्ष पुराने मिले हैं। अतः माना जा सकता है कि महाभारत का युद्ध इस तिथि के बाद ही हुआ क्योंकि महाभारत काल में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला काफी विकसित हो चुकी थी।
हस्तिनापुर से हुई खुदाई में पेंटेड ग्रे रंग के मिट्टी के बर्तन तथा ताम्बे के तीर, तलवारें आदि मिले हैं। इनकी अवधि ई.पू. 3138 से लेकर ई.पू. 3000 अर्थात् आज से लगभग 5156 वर्ष से लेकर 5018 वर्ष पुरानी है। कुरुक्षेत्र में हुई खुदाई से प्राप्त ताम्बे के शस्त्रों की अवधि भी यही है।
सी. वी. वैद्य एवं करन्दीकर के अनुसार महाभारत के युद्ध का काल ई.पू. 3102 है। ताकेश्वर भट्टाचार्य ने इसका काल ई.पू. 1432 माना है। अन्य साहित्यिक, पौराणिक स्रोतों के आधार पर भी भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ।
महाभारत ग्रंथ का रचना काल
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महाभारत की रचना का मूल समय ई.पू.चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। मूल महाभारत में चौबीस हजार श्लोक थे जिससे इसे ‘चतुर्विंशति साहस्री संहिता’ अथवा ‘साहस्री संहिता’ कहा जाता था। बाद में इसके श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख हो गई जिसके कारण इसे ‘शतसाहस्री संहिता’ कहा गया। पाणिनि के अष्टाध्यायी में वेदव्यास या महाभारत का उल्लेख नहीं मिलता, किंतु पतंजलि के व्याकरण-महाभाष्य में महाभारत की कथा का उल्लेख अनेक बार हुआ है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत का निर्माण पाणिनि के बाद में एवं पतंजलि से पहले हुआ होगा। रामायण में दिए गए भौगोलिक विवरण, महाभारत से प्राचीनतर हैं। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि तथा रामायण दोनों का उल्लेख है। महाभारत में संक्षिप्त रामकथा भी दी गई है जिसे अलग से ‘अध्यात्म रामायण’ कहा जाता है। महाभारत का एक हिस्सा ‘हरिवंश पुराण’ कहलाता है। इसमें भी रामायण के नाट्य प्रदर्शन का विवरण है। इनसे स्पष्ट है कि महाभारत की रचना, रामायण की रचना के बाद हुई। भाषा की दृष्टि से महाभारत की भाषा कई स्थानों पर ‘ब्राह्मणों’ और ‘उपनिषदों’ की भाषा से साम्य रखती है।
इससे प्रतीत होता है कि महाभारत के कुछ अंश उत्तर-वैदिक युग के बाद के है। महाभारत के अनेक स्थलों पर यूनानी, शक,पह्लव आदि विदेशी जातियों का उल्लेख है। ये जातियाँ ई.पू. पहली और दूसरी शताब्दी में भारत में आयीं।
मेक्डॉनल्ड ने इसे ई.पू. 500 और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने इसे ई.पू. 200 की रचना माना है। आर.जी. भण्डारकर का मत है कि ई.पू. 500 तक महाभारत एक प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ बन चुका था। हैप्किन्स का मत है कि महाभारत ग्रंथ को वर्तमान स्वरूप में आने के लिए पांच चरणों से गुजरना पड़ा-
(1.) भारतवंश के गान, जो ई.पू.400 तक बन चुके थे, (मौर्यकाल से पूर्व)
(2.) पाण्डवों का वीरकाव्य जो ई.पू.400 और ई.पू.200 के बीच में लिखा गया, (मौर्यकाल)
(3.) श्रीकृष्ण को भगवान मानने वाले भागवत धर्म का ग्रन्थ जिसकी रचना ई.पू.200 से ई.200 के मध्य हुई, (शुंगकाल)
(4.) कुछ बाद के पर्व और आरम्भिक पर्व की प्रस्तावनाएं जो ई.200 से ई.400 के बीच किसी समय जोड़ी गई (गुप्तकाल)
(5.) बाद के प्रक्षेप और सम्पूर्ण ग्रन्थ का सम्पादन जो ई.400 के बाद हुआ। (गुप्तकाल)
ई.442 का एक गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें एक लाख श्लोक वाले महाभारत का उल्लेख है। अतः इस समय तक महाभारत का वर्तमान रूप निश्चित रूप से तैयार हो चुका था।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि महाभारत की मूल रचना र्ई.पू. चार सौ के आसपास अर्थात् मौर्यकाल में हुई तथा इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्तकाल में सामने आया।
महर्षि वेदव्यास का परिचय
ताम्रयुगीन भारतीय सभ्यता में हुए एक युद्ध की कथा के माध्यम से प्राचीन आर्य संस्कृति के वैभव को समग्र रूप से प्रस्तुत करने वाले ‘महाभारत’ नामक महाकाव्य के रचियता वेद व्यास हैं। उन्हें वैदिक संहिताओं को लिपिबद्ध करने, वैदिक शाखाओं का प्रवर्तन करने, ब्रह्मसूत्रों का प्रणयन करने, महाभारत ग्रन्थ की रचना करने तथा वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने वाला तत्त्वज्ञानी माना जाता है।
वेदव्यास को सर्वज्ञ, सत्यवादी, सांख्य, योग, धर्म आदि शास्त्रों का ज्ञाता एवं दिव्य दृष्टि वाला महापुरुष माना जाता है। उन्हें भगवान कहकर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की महानता का ज्ञान कराया जाता है।
वेदव्यास का मूल नाम कृष्ण द्वैपायन था। उनके पिता महर्षि पाराशर थे। महाभारत के आदि पर्व में आए उल्लेख के अनुसार एक बार महर्षि पाराशर तीर्थयात्रा करते हुए यमुना नदी के किनारे पहुँचे। उस समय धीवरों के राजा दाशराज की कन्या सत्यवती नाव खे रही थी। महर्षि पाराशर उस नाव में बैठे। नाव में महर्षि, सत्यवती के सौन्दर्य पर मोहित हो गए और उन्होंने सत्यवती के समक्ष रति-इच्छा प्रकट की।
सत्यवती धीवर की कन्या थी इसलिए उसकी देह से सदैव मछली की दुर्गन्ध निकला करती थी, उसे मत्स्यगंधा भी कहते थे। सत्यवती ने महर्षि पाराशर से कहा कि नदी के दोनों तरफ महर्षिगण स्नान कर रहे हैं, इसलिए यह कैसे सम्भव है! तब पाराशर ने अपनी तपस्या के प्रभाव से चारों ओर कोहरा पैदा कर दिया। उस कोहरे में पाराशर ने रति-इच्छा पूरी की, फिर सत्यवती को वरदान दिया कि पुत्र को जन्म देने के बाद वह फिर से कन्या बन जोयगी और उसके शरीर से दुर्गन्ध की बजाए सुगन्ध आया करेगी।
महर्षि पाराशर के वरदान से सत्यवती की कोख से यमुना के एक द्वीप पर एक पुत्र पैदा हुआ। घने अन्धकार में वीर्याधान करने के कारण यह पुत्र एकदम कृष्ण-वर्ण का उत्पन्न हुआ, इसलिए उसका नाम कृष्ण पड़ा और चूँकि वह यमुना के एक द्वीप पर उत्पन्न हुआ इसलिए द्वैपायन कहलाया।
पुत्र को जन्म देने के बाद सत्यवती पुनः कन्या बन गई और उसकी देह से सुगंध निकलने लगी जो एक योजन अर्थात् आठ मील दूर से भी अनुभव की जा सकती थी। इस कारण सत्यवती का नाम योजनगंधा भी पड़ गया। इसी सत्यवती का विवाह कुरुवंशी राजा शान्तनु से हुआ था जिनसे चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उसी से कुरुवंश आगे बढ़ा।
सामविधान ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार वेदव्यास विष्वक्सेन नामक आचार्य के शिष्य थे। पौराणिक साहित्य में उन्हें भगवान का अवतार कहा गया है। वैशाख पूर्णिमा को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। आषाढ़ पूर्णिमा को उन्हीं के नाम पर ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है।
पुराणों के अनुसार कृष्ण द्वैपायन ने चतुष्पाद वैदिक ग्रन्थ (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) का विभाजन कर उसकी तीन स्वतन्त्र संहिताएं (ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद) बनायीं, इस कारण इन्हें वेद-व्यास कहा गया। घृताची नामक अप्सरा से इन्हें शुकदेव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। घृताची को अरणी भी कहा जाता है।
कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य के रुग्ण होने के कारण वेदव्यास ने माता सत्यवती के निर्देश से विचित्रवीर्य की रानियों अम्बिका एवं अम्बालिका तथा एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर नामक नियोगज पुत्र उत्पन्न हुए। शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र, पाण्डु, अभिमन्यु, परीक्षित, जनमेजय तथा शतानीक नामक आठ पीढ़ी के कुरूवंशी राजा वेदव्यास के समकालीन थे।
प्राचीन साहित्य में वेदव्यास को चिरंजीव कहा गया है। वेदव्यास ने अत्यन्त कठोर तपस्या करके बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कीं। वे दूर-श्रवण, दूर-दर्शन आदि अनेक विद्याओं में प्रवीण थे। द्रौपदी स्वयंवर तथा इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में महर्षि वेदव्यास स्वयं उपस्थित थे।
पाण्डवों के वनवासकाल में वे पाण्डवों को धीरज बंधाते रहते थे। महाभारत-युद्ध के समय वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की ताकि संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन सुना सके। पाण्डवों की विजय के बाद वेदव्यास ने युधिष्ठिर को राजधर्म और राजदण्ड का उपदेश दिया।
महाभारत की रचना प्रक्रिया एवं वर्तमान स्वरूप
महाभारत की रचना मूलतः वेदव्यास ने की। शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद् में ‘इतिहास पुराण’ का उल्लेख मिलता है किन्तु इन ग्रन्थों में उल्लिखित ‘इतिहास पुराण’ स्वतन्त्र ग्रन्थ न हेाकर, आख्यान एवं उपाख्यान के रूप में ब्राह्मण ग्रन्थों में सम्मिलित किए गए थे। ये आख्यान अत्यन्त छोटे होते थे। इस कारण उनका विभाजन ‘पर्व’ एवं ‘उपपर्व’ आदि में नहीं किया जाता था।
वेदव्यास ने ब्राह्मण ग्रन्थों में निर्दिष्ट ‘इतिहास पुराण’ के आख्यानों को पर्व एवं उपपर्व आदि से युक्त साहित्य में ढाल दिया। इस प्रकार उनकी कृति एक नवीन साहित्यिक ग्रंथ बन गई। वर्तमान समय में महाभारत में 18 पर्व और एक लाख श्लोक हैं। आकार की विशालता तथा विषय-वस्तु की विविधता के कारण यह विश्व का सबसे बड़ा ग्रन्थ और सबसे बड़ा महाकाव्य है किंतु वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत इतना बड़ा नहीं था।
महाभारत ग्रन्थ के विकास के सम्बन्ध में तीन अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। वेदव्यास ने वैशम्पायन आदि अपने पांच शिष्यों को महाभारत सिखाया। वैशम्पायन ने सर्पसत्र के समय जनमेजय के सामने महाभारत की कथा सुनाई। वैशम्पायन का यह आख्यान प्रश्नोत्तर के रूप में है। इस प्रकार वेदव्यास के मूल महाभारत में वैशम्पायन द्वारा परिवर्द्धन हुआ। इसके बाद शौनक ऋषि ने द्वादशवर्षीय यज्ञ के अन्त में नैमिषारण्य में महाभारत की कथा सुनाई।
वेदव्यास ने महाभारत को ‘जय’ नाम दिया। जब वैशम्पायन ने जनमेजय को इसकी कथा सुनाई तब इसके 24,000 श्लोक थे और इसका नाम ‘भारत’ पड़ गया। शौनक ऋषि ने इस कथा में परिवर्द्धन करके इसका नाम ‘महाभारत’ कर दिया। आश्वलायन गृह्यसूत्र के समय महाभारत नाम प्रचलित था। इस समय तक इसके श्लोकों की संख्या एक लाख हो गयी जिसके कारण इसे ‘शतसाहस्री संहिता’ कहा गया।
वर्तमान समय में अध्यात्म रामायण, भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम तथा हरिवंश पुराण महाभारत के भीतर समाहित हैं। महाभारत में प्राचीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियों की जानकारी मिलती है। यह ग्रंथ धर्म, अर्थ, नीति, दर्शन, तत्त्वज्ञान एवं मोक्ष आदि सिद्धांतों का ज्ञान कराने वाले अपूर्व ग्रन्थ है।
महाभारत की कथा-वस्तु
हस्तिनापुर के कुरुवंशी राजा शान्तनु के बड़े पुत्र का नाम देवव्रत था। जब शान्तनु ने धीवर-कन्या सत्यवती से विवाह किया तब सत्यवती द्वारा शर्त रखे जाने पर कि मेरी कोख से जन्मा पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा होगा, देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी होने की शपथ ली ताकि देवव्रत या उसके वंशज कभी राज्य पर दावा नहीं करें।
इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत को भीष्म कहा जाता था। राजा शांतनु को रानी सत्यवती से चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगद राजा बना किंतु उसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई तो छोटा पुत्र विचित्रवीर्य राज्य का अधिकारी हुआ। विचित्रवीर्य संतान उत्पन्न करने में अक्षम थे इसलिए माता सत्यवती के आदेश पर वेदव्यास ने विचित्रवीर्य की दो रानियों अम्बा एवं अम्बिका से तथा उसकी एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर नामक तीन पुत्र हुए।
इनमें से बड़े पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे और पाण्डु जन्म से ही पाण्डु-रोग (पीलिया) से ग्रस्त थे। विदुर दासी-पुत्र थे। बड़े पुत्र धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने के कारण छोटे पुत्र पाण्डु को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी, गांधार देश की राजकुमारी थी। उसे एक सौ पुत्र हुए जो कौरव कहलाते थे।
महाराज पाण्डु की दो रानियां थीं- कुंती एवं माद्री। एक बार महाराज पाण्डु ने शिकार खेलते हुए भ्रमवश एक ऋषि को मार डाला। ऋषि ने महाराज पाण्डु को भयानक शाप दे दिया। महाराज पाण्डु शाप-मुक्त होने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए अपनी दोनों रानियों के साथ वन को चले गए। महाराज पाण्डु के लौट आने तक के लिए धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। बनवास काल में कुन्ती ने युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को तथा माद्री ने नकुल एवं सहदेव को जन्म दिया। पाण्डु पुत्र होने के कारण ये पांचों राजकुमार पाण्डव कहलाए।
वनवास काल में ही महाराज पाण्डु की मृत्यु हो गई और छोटी रानी माद्री सती हो गई। महारानी कुंती, स्वर्गीय महाराज पाण्डु के पांचों राजकुमारों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई। गुरु द्रोणाचार्य ने एक सौ कौरव राजकुमारों एवं पांच पाण्डव राजकुमारों को शिक्षा दी।
हस्तिनापुर का भावी राजा कौन होगा, इस प्रश्न पर कौरव एवं पाण्डव एक दूसरे के शत्रु हो गए। तीसरे पाण्डव अर्जुन ने एक स्वयंवर को जीतकर पांचाल देश की राजकुमारी द्रोपदी से विवाह किया किन्तु माता कुन्ती द्वारा अनजाने में कहे गए एक कथन के कारण शेष चारों पाण्डवों का भी द्रोपदी से विवाह कर दिया गया।
भीष्म पितामह की मध्यस्थता में पाण्डवों ने अपने पिता के राज्य का कुछ भाग प्राप्त कर इन्द्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाया। पाण्डवों ने दिग्विजय का आयोजन करके अपने राज्य को काफी विस्तृत कर लिया और ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट हो गया। उसने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया जिसमें देश भर के राजा उपस्थित हुए।
ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन पाण्डवों का इतना उत्थान सहन नहीं कर सका। उसने पाण्डवों का सर्वनाश करने के उद्देश्य से उन्हें द्यूत-क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया। उस काल में द्यूतक्रीड़ा के निमंत्रण को युद्ध के निमत्रण की तरह समझा जाता था तथा कोई भी क्षत्रिय इसे अस्वीकार नहीं कर सकता था।
दुर्योधन तथा उसके मामा शकुनि की धूर्तता के कारण राजा युधिष्ठिर जुए में अपना राज्य तथा अपनी महारानी द्रोपदी को खो बैठे। श्रीकृष्ण के धिक्कारने पर धृतराष्ट्र ने द्रोपदी पुनः पाण्डवों को लौटा दी तथा पांचों पाण्डवों को अपनी पत्नी द्रोपदी सहित तेरह वर्षों के लिए वनवास में जाना पड़ा जिनमें से तेरहवां वर्ष अज्ञातवास के रूप में व्यतीत करना था। पकड़े जाने पर दुबारा वनवास जाने की शर्त थी।
पांचों पाण्डव बारह वर्ष वनवास में तथा तेरहवां वर्ष विराट नगर के राजा के यहाँ अज्ञातवास में बिताकर हस्तिनापुर लौटे और अपना राज्य मांगा किंतु दुर्योधन ने सुईं की नोक जितनी भूमि भी पाण्डवों को देने से मना कर दिया। पाण्डवों के ममेरे भाई एवं यदु-वंशी राजा श्रीकृष्ण, कौरवों और पाण्डवों में मेल कराने के लिए हस्तिनापुर गए किंतु दुर्योधन ने उनकी बात भी नहीं मानी।
इस पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का पक्ष ग्रहण किया। जब दोनों सेनाएं युद्धक्षेत्र में पहुँचीं तो अर्जुन ने यह कहकर युद्ध करने में संकोच दिखाया कि मैं भूमि के लिए अपने बांधवों को नहीं मारना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण ने उसे कर्म करने का उपदेश दिया और अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया।
श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन पुनः युद्ध के लिए तैयार हुआ और कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पाण्डवों के बीच 18 दिन तक तक भीषण युद्ध हुआ। चूंकि इस युद्ध में समस्त बड़े भारत वंशी राजाओं ने युद्ध किया था इसलिए इसे महाभारत का युद्ध कहा जाता है। युद्ध में दोनों पक्षों को भयानक क्षति पहुँची किंतु अन्त में पाण्डव विजयी रहे। समस्त कौरव भाई अपनी सेनाओं एवं परिजनों सहित मृत्यु को प्राप्त हुए।
युद्ध में विजय के उपलक्ष्य में पाण्डवों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और छत्तीस वर्ष तक राज्य करने के बाद अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राज्य सौंपकर द्रोपदी सहित तपस्या करने हिमाचल में चले गए और वहीं उन्होंने देहत्याग किया।
महाभारत के दो प्रमुख संस्करण उपलब्ध होते हैं- उत्तरी तथा दक्षिणी। इनेक कथावृत्तांत में कुछ अन्तर है। महाभारत के प्रकाशित तथा पूर्ण संस्करणों में कलकत्ता, बम्बई तथा कुम्भकोणम् के संस्करण महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। यद्यपि अब भण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना द्वारा प्रकाशित महाभारत का संस्करण ही सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है तथापि गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संस्करण को भारत में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है।
महाभारत में वर्णित धार्मिक परिस्थितियाँ
यद्यपि महाभारत की कथा कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए युद्ध से सम्बन्धित है तथापि इसमें अनेक आख्यानों, उपाख्यानों एवं धर्म-दर्शन की चर्चाओं के माध्यम से विशाल ताना-बाना बुना गया है। मूल कथा के साथ-साथ अनेक प्राचीन कथाओं को भी स्थान दिया गया है।
नीति सम्बन्धी प्रवचानों का अविरल प्रवाह पूरी कथा के साथ-साथ चलता है। इस ग्रंथ में आर्यों के प्राचीन धर्म के विविध रूप एवं पक्ष दर्शाए गए हैं। वैदिक यज्ञों एवं विविध अनुष्ठानों का विशद वर्णन किया गया है जिनसे तत्कालीन संस्कृति के दर्शन सहज ही हो जाते हैं। विष्णु के दशावतारों की कथाएं एवं रामकथा उपाख्यानों के रूप में प्राप्त होती हैं।
भगवान शिव, दुर्गा, राम एवं कृष्ण की पूजा बार-बार बताई गई है। पाण्डवों का भगवान शिव, हनुमान एवं स्वर्ग के विभिन्न देवी-देवताओं का पाण्डवों के साथ सम्पर्क एवं सम्बन्ध बताया गया है। इस ग्रंथ में भारत की बहुत सी नदियों, पर्वतों, वनों एवं वृक्षों आदि का उल्लेख हुआ है तथा उनकी पूजा होती हुई दिखाई गई है। लोक के अंतर्गत प्रचलित भूत, प्रेत, पिशाच, विद्याधर, नाग, यक्ष, गन्धर्व एवं किन्नर आदि का भी वर्णन किया गया है और कई स्थानों पर बलि प्रथा का उल्लेख हुआ है।
सम्पूर्ण ग्रंथ में ऋषि-आश्रमों, राजप्रासादों और ब्रह्मणों के घरों में वैदिक यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें सूर्य, इन्द्र और अग्नि आदि देवताओं का आह्वान होता हुआ दिखाया जा रहा है। सामान्य गृहस्थों को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और दुर्गा आदि की पूजा करते हुए दिखाया गया है।
महाभारत में यज्ञों और पशु-बलियों के साथ-साथ हिडिम्बा की कथा के माध्यम से नरबलि का भी उल्लेख किया गया है जो राक्षसों में प्रचलित थी और आर्य इसे उचित नहीं मानते थे। ऐतरेय, शतपथ एवं तैत्तिरीय ब्राह्मणों में पुरुषमेध के उन्मूलन का उल्लेख है। रामायण एवं महाभारत में इस सम्बन्ध में वर्णित उल्लेख संभवतः वहीं से लिए गए हैं।
वेदव्यास के महाभारत में प्राचीन भारतीय समाज में गाने-बजाने, खेलने-कूदने, मेले-तमाशे करने, कुश्ती-दंगल करने, देवताओं के निमित्त उत्सव मनाने, शिशु जन्म के संस्कार करने, नंदीमुख कर्म, षष्ठी पूजा, श्राद्ध कर्म, धार्मिक मेलों के आयोजन आदि का वर्णन मिलता है। महाभारत में आए उल्लेखों के अनुसार तत्कालीन समाज में हाथी, बैल, हंस, गरुड़ आदि पशु-पक्षियों को पवित्र माना जाता था। समाज में भूत-प्रेत एवं पिशाचों को वश में करना, टोने-टोटके करना आदि अंध-विश्वासों का भी वर्णन है।
भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव
महाभारत में जीवन-दृष्टियाँ
महाभारत के उद्योग पर्व के 42वें अध्याय में जीवन जीने की तीन दृष्टियों का उल्लेख हुआ है- (1.) नियतिवादी, (2.) प्रज्ञावादी और (3.) अध्यात्मवादी।
धृतराष्ट्र नियतिवादी दृष्टिकोण के पक्षधर हैं। वे कहते हैं- ‘किसी बात के होने या न होने में मनुष्य का केाई हाथ नहीं होता, सब कुछ भाग्य पर निर्भर है। अतः किसी प्रकार के परिश्रम या अध्यवसाय के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, काम-धन्धे के प्रति उपेक्षा भाव रखना चाहिए और किसी वस्तु की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए।’
विदुर धृतराष्ट्र के इस दर्शन से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं- ‘पुरुषार्थ एवं पराक्रम से अनर्थ को टाला जा सकता है और बुद्धि से अपना भविष्य सुधारा जा सकता है। मनुष्य का लक्षण कर्म है और कर्म को छोड़कर बैठना मृत्यु है। अतः सदाचारपूर्वक कर्म करते हुए अपना उत्थान करना चाहिए यही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।’
जब धृतराष्ट्र और विदुर एक-दूसरे के मत से सहमत नहीं होते हैं तब ऋषि सनत्सुजात को बुलाया जाता है। सनत्सुजात कहते हैं- ‘प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद अमृत या अमरता है। प्रमाद के कारण आसुरी वृत्ति वाले मनुष्य मृत्यु से पराजित होते हैं और अप्रमाद अर्थात् संत प्रवृत्ति वाले ब्रह्मस्वरूप या अमर हो जाते हैं। कुछ लोग प्रमाद के स्थान पर यम को मृत्यु का एक रूप कहते हैं। दृढ़तापूर्वक यम-नियमों का पालन करके जो ब्रह्माचर्य प्राप्त होता है, उसे ही कुछ लोग अमृत और अमरता से जोड़ते हैं।’
इस प्रकार महाभारत के इस अध्याय में इन तीनों जीवन-दृष्टियों पर गहनता से विचार किया गया है।
वर्णाश्रम व्यवस्था और सदाचार
महाभारत ने शील और सदाचार को सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार माना है। महाभारत के अनुसार समाज के चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) गुण और कर्म पर आधारित हैं। बालक के उपनयन के बाद शिक्षा, शील और सदाचार से उसके वर्ण का निर्णय होता है। महाभारत के वन-पर्व में अजगर के प्रश्न करने पर कि, ‘ब्राह्मण कौन है?’ युधिष्ठिर कहते हैं- ‘जिस व्यक्ति में सत्य, दान, क्षमा, शील, दया, दम और अंहिसा हो वही ब्राह्मण है।’
अजगर फिर प्रश्न करता है कि क्या ये गुण शूद्र में हो तो वह ब्राह्मण कहलाएगा? युधिष्ठिर कहते हैं- ‘यदि शूद्र में ये गुण हैं तो निश्चय ही वह ब्राह्मण है, जिसमें चरित्र नहीं है, वह शूद्र है।’ इस प्रकार महाभारत कालीन समाज में वर्णों की व्यवस्थाएं गुण, कर्म और स्वभाव पर टिकी हैं न कि जाति, कुल और परम्परा पर।
महाभारत के शान्ति पर्व में चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। महाभारत के शान्ति पर्व में कहा गया है- ‘सबसे गहरा रहस्य यह है कि मनुष्य से अधिक श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।’ इस प्रकार महाभारत मनुष्य के मनुष्य होने को बड़ा मानता है न कि उसके वर्ण या व्यवासाय को।
महाभारत में आदर्श
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के रूप में आर्य संस्कृति के प्रतिमानों को धर्म एवं नीति के सुदृढ़ आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया है। महाभारत का प्रत्येक पात्र अपने आप में विशिष्ट है और वह किसी न किसी गुण अथवा अवगुण का प्रतिनिधित्व करता है।
वेदव्यास ने श्रीकृष्ण को नारायण का अवतार मानकर ही उनसे सम्बन्धित प्रसंग लिखे हैं। कुरुराज्य का मंत्री विदुर भी श्रीकृष्ण की भांति एक आदर्श पात्र है। वह नीतिशास्त्र एवं धर्मशास्त्र का ज्ञाता है। स्पष्टभाषी होने के कारण वह राज्यलोभी धृतराष्ट्र को धर्म एवं नीति पर चलने के लिए प्रेरित करता है तथा धृतराष्ट्र को उसके पुत्रमोह के लिए धिक्कारता है।
भीष्म के रूप में वेदव्यास ने एक अलग तरह का आदर्श प्रस्तुत किया है। वे धर्म और न्याय के प्रतीक होते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा के कारण हस्तिानापुर के राजसिंहासन से बंधे हुए हैं और द्रौपदी के वस्त्रहरण पर भी चुप रहते हैं। इतना ही नहीं भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त होते हुए भी भीष्म युद्ध-भूमि में अधर्मी दुर्योधन की तरफ से लड़ते हैं। वे चाहते हैं कि इस युद्ध में धर्म अर्थात् पाण्डव पक्ष की विजय हो, इसलिए वे पाण्डवों को अपनी मृत्यु का तरीका बताते हैं।
इसी प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण भी मनुष्य के गुणों की पराकाष्ठा है। वे सत्यवादी हैं, कष्ट सहकर भी धर्म के पथ से च्युत नहीं होते। वनपर्व में वे अदृश्य यक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों में धर्म का पक्ष लेते हैं और अपने बलशाली भाई भीम या अर्जुन के स्थान पर अपनी विमाता माद्री के पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना करते हैं। उनमें सत्य और धर्म पर अडिग रहने के प्रति उत्साह है न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने पर।
वेदव्यास ने भीमसेन के रूप में शारीरिकि बल एवं नीति का समन्वय किया है। अर्जुन के रूप में उन्होंने शौर्य, ईश-भक्ति और भ्रातृत्व प्रेम से युक्त अदुभुत पात्र की रचना की है। नकुल और सहदेव के रूप में उन्होंने विमाता के पुत्रों को अपने बड़े भाइयों के प्रति विनय एवं सदाशयी रहने वाला दिखाया है। पांचों भाई अत्यंत बलशाली होते हुए भी धर्म के मार्ग पर चलते हैं और बड़ों के सामने विनम्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं। वे निरंतर विपत्तियों का सामना करते हुए भी धैर्य नहीं खोते।
महाभारत की द्रौपदी एक आदर्श नारी है। पांच पतियों की पत्नी होते हुए भी वह सती, साध्वी और पतिव्रता है। महारानी द्रौपदी के चरित्र के द्वारा वेदव्यास ने भारतीय नारियों के समक्ष अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। वन-पर्व में द्रौपदी के गुणों का बहुत सुन्दर वर्णन हुआ है। पाण्डवों के वन में निवास करने के दौरान एक बार श्रीकृष्ण और सत्यभामा उनसे मिलने आते हैं।
सत्यभामा द्रौपदी से पूछती है- ‘उसके पांचों पति किस तरह उसके अनुकूल रहते हैं?’
द्रौपदी कहती है– ‘मैं अंहकार, काम और क्रोध को छोड़कर पाण्डवों की सेवा करती हूँ। मैं कभी उन्हें कटु-वचन नहीं कहती, असभ्य की भांति व्यवहार नहीं करती। पतियों के अभिप्रायपूर्ण संकेत का सदैव अनुसरण करती हूँ। देवता, मनुष्य, गन्धर्व या कितना भी रूपवान-सम्पन्न पुरुष मेरे सामने आ जाए, फिर भी मेरा मन पाण्डवों को नहीं छोड़ता। पतियों और उनके सेवकों को भोजन कराए बिना मैं कभी भोजन नहीं करती। उनके सोने के बाद ही मैं सोती हूँ। बाहर से जब मेरे पति आते हैं, तब मैं मुस्कराकर उनका स्वागत करती हूँ। मेरे पति जिस बात को या वस्तु को पसन्द नहीं करते, मैं भी उसे त्याग देती हूँ। गुरुजनों की सेवा-सुश्रुषा से ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं।’
द्रौपदी के इस कथन में आदर्श नारी का चरित्र स्पष्ट होता है। इस आख्यान के माध्यम से वेदव्यास भारतीय नारियों को पति से प्रेम करने एवं उसके प्रति अनुरक्त रहने की शिक्षा देते हैं।
ज्ञान का विश्व-कोष
महाभारत ज्ञान का विश्व-कोष है। इस ग्रन्थ में मानवीय व्यवहार की जटिलताओं एवं सुंदरताओं की विशद व्याख्या की गई है। इसकी समग्रता के सम्बन्ध में स्वयं वेदव्यास ने कहा है- ‘इस ग्रन्थ में जो कुछ सत्य है, वह अन्यत्र है परन्तु जो कुछ इसमें नहीं है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।’
निःसन्देह यह ग्रन्थ तत्कालीन धार्मिक, नैतिक और ऐतिहासिक आदर्शों का अमूल्य भण्डार है। महाभारत समस्त दर्शनों का सार एवं स्मृतियों का विस्तृत विवेचन-ग्रन्थ है तथा इसमें स्थान-स्थान पर आए उपाख्यानों के द्वारा लोकधर्म के विभिन्न अंगों पर बड़ी गहराई तक प्रकाश डाला गया है।
मानव जीवन की ऐसी कोई समस्या या ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिस पर इस ग्रन्थ में विस्तृत विवेचन न किया गया हो। आदि पर्व में महाभारत को केवल इतिहास ही नहीं, अपितु धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र भी कहा गया है।
महाभारत में कौरव-पाण्डवों के राजनीतिक संघर्ष का इतिहास तो है ही परन्तु साथ ही वह आर्य-संस्कृति और हिन्दू-धर्म के सर्वांगीण विकास की गाथा भी है। इस विशाल ग्रंथ में अनेक प्राचीन कथाएं सुंदर बागीचों की तरह सजाई गई हैं। इन कथाओं में दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, रामकथा, शिव-कथा, सावित्री एवं सत्यवान की कथा, मत्स्यावतार सहित दशावतार की कथा, नल और दमयन्ती की कथा आदि प्रमुख हैं।
महाभारत एक श्रेष्ठ धर्मशास्त्र है जिसमें पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन के विधि-विधानों तथा धर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है। शान्ति-पर्व में राजधर्म, आपद्धर्म एवं मोक्ष का तथा अनुशासन-पर्व में दान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह नीतिशास्त्र का भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। शान्ति-पर्व में भीष्म पितामह द्वारा धर्म एवं राजनीति पर लम्बा व्याख्यान दिया गया है। सभा-पर्व में नारद का राजनीतिक विषय पर व्याख्यान है।
विदुर के रूप में महाभारत की कथा को एक ऐसा दुर्लभ पात्र दिया गया है जिसकी कल्पना करना भी कठिन हैं। दासी-पुत्र, मंत्री एवं कनिष्ठ-भ्राता होते हुए भी विदुर सत्य के तेज से प्रकाशित हैं और धर्म एवं नीति के व्याख्याकार हैं। विदुर की भांति संजय भी अंधे राजा को सदैव सत्य ही बताते हैं किंतु पुत्र मोह से ग्रस्त धृतराष्ट्र उनकी बातों से सहमत नहीं होता और उन्हें बार-बार झिड़कता है किंतु न तो विदुर और न संजय कभी भी अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हैं।
इस कारण विदुर नीति एवं संजय नीति का भारतीय संस्कृति में बहुत आदर हुआ। उन्हें आज भी अनुकरणीय माना जाता है। महाभारत अध्यात्म का भी अनुपम ग्रन्थ है। इसमें श्रीमद्भागवद्गीता, सनत्सुजात के उपदेश, अनुगीता, पाराशर गीता, मोक्ष धर्म आदि महत्त्वपूर्ण अंश संकलित हैं। महाभारत में श्रेष्ठ धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों का समावेश होने से इसे ‘हिन्दू-धर्म का वृहत् कोष’ कहा गया है। पौराणिक आख्यानों-उपाख्यानों का समावेश होने से इसे ‘पुराण-संहिता’ भी माना गया है।
महाभारत में मोक्ष के साधनों के रूप में कर्म, भक्ति, ज्ञान, तप आदि मार्गों का विवेचन होने से इसे ‘मोक्षशास्त्र’ भी कहते हैं। महाभारत में मोक्ष के साधनों और सांसारिक सुखों के बीच समन्वय किया गया है और चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की, मानव-जीवन के लक्ष्य के रूप में प्रतिष्ठा हुई है। धर्म को प्रधान पुरुषार्थ माना गया है।
महाभारत के अनुसार मनुष्य को धर्म का उल्लंघन किए बिना अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति, निवृति, कर्म और सन्यास सम्बन्धी विचारों का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन एवं समन्वयन हुआ है। महाभारत की शिक्षा का सार यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोककल्याण के लिए धर्मसम्मत कर्त्तव्य का पालन करता रहे।
साहित्यिक महत्त्व
साहित्य की दृष्टि से महाभारत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। एक प्रौढ़ महाकाव्य में जो लक्षण होने चाहिए, वे सभी लक्षण इस ग्रंथ में अपनी उच्चता के साथ उपस्थित हैं। भाषा, विचार, भाव, कथा, रोचकता, लोकोपयोगिता आदि विभिन्न दृष्टियों से यह उच्च कोटि का साहित्यिक ग्रंथ है। छंद, अलंकार, रस आदि की दृष्टि से भी यह एक प्रौढ़ रचना है।
इस ग्रंथ की कथा में शृंगार रस, भक्ति रस और शान्त रस का परिपाक स्थान-स्थान पर हुआ है। वात्सल्य रस एवं वीभत्स रस भी अपने चरमोत्कर्ष के साथ उपस्थित हैं। स्वयं वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में लिखा है कि भविष्य में जितने भी लेखक होंगे, वे अपने ग्रंथों का लेखन इस ग्रंथ को आधार बनाकर करेंगे।
महाकाव्यों में इतिहास
रामायण तथा महाभारत दोनों ही महाकाव्यों में प्राचीन हिन्दू सभ्यता का वर्णन है। कुछ पाश्चात्य विद्वानों की धारणा है कि ये ग्रन्थ पूर्णतः लाक्षणिक हैं जिनमें कोई ऐतिहासिक सामग्री नहीं हैं परन्तु उनका मत गलत है। यह माना जा सकता है कि आलंकारिक वर्णनों एवं क्षेपकों आदि के कारण इनमें उपलब्ध तत्कालीन ऐतिहासिक सामग्री और बाद की ऐतिहासिक सामग्री को अलग कर पाना कठिन है किंतु ये ग्रंथ पूर्णतः अनैतिहासिक नहीं हैं।
राम तथा उनकी अयोध्या, रावण तथा उसकी लंका, रामसेतु निर्माण, राम-रावण युद्ध, कौरव तथा उनका हस्तिनापुर, पाण्डव तथा उनका इंद्रप्रस्थ, कौरव-पाण्डव युद्ध, श्रीकृष्ण एवं उनकी द्वारिका और कुरुक्षेत्र का मैदान सभी कुछ ऐतिहासिक सिद्ध हो चुके हैं।
भौतिक साक्ष्यों की कार्बन डेटिंग राम के काल को ई.पू. 5000 सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रकार महाभारत का युद्ध ई.पू.3102 के लगभग निर्धारित करते हैं। माना जाता है कि राम के वास्तविक काल के बाद रामायण का तथा महाभारत के वास्तविक काल के बाद महाभारत ग्रंथ का प्रणयन हुआ होगा।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव युगातीत है। अर्थात् काल के प्रभाव से महाभारत का महत्व कम नहीं हुआ है, अपतिु समय के साथ इसमें वृद्धि होती चली गई है।
महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से बहुत उन्नत थी। आर्यों ने मानव जीवन की उन्नति की लिए बहुमुखी चिंतन किया था।
महाकाव्य काल में आर्यों की राजनीतिक दशा
महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा में राजनीतिक दशा का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। महाकाव्य काल तक आते-आते आर्यों का प्रसार पूर्व की ओर अंग तक हो गया। देश में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हुई। कुरु, पांचाल, कौशाम्बी, कौशल, काशी, विदेह, मगध तथा अंग इस युग के विशाल राज्य थे। महाजनपद की अवधारणा महाकाव्य काल के पश्चवर्ती बुद्धकाल में आई। महाकाव्य काल के राजा ‘महाराजाधिराज, सम्राट तथा चक्रवर्ती’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे जो उनके राज्य विस्तार एवं प्रभुत्व की शक्ति प्रतीक थीं।
चक्रवर्ती राजा चतुरंगिणी सेना रखते थे जिसमें अश्व, गज, रथ तथा पैदल सैनिक होते थे। शक्तिशाली राजा दिग्विजय का आयोजन करते थे तथा उसके पश्चात् राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठान करते थे। श्रीराम एवं युधिष्ठिर ने दिग्विजय यज्ञ किए।
महाकाव्य काल में राजपद वंशानुगत होता था तथ ज्येष्ठ पुत्र को मिलता था परन्तु ज्येष्ठ पुत्र यदि शरीर से दोषपूर्ण होता था तो उसे राजपद नहीं दिया जाता था। महाभारत में धृतराष्ट्र को अन्धा होने के कारण राजा नहीं बनाया गया। राजा धर्मानुकूल शासन करते थे और वे सर्वाधिकार सम्पन्न होते हुए भी निरंकुश नहीं होते थे।
राज्याभिषेक के अवसर पर राजा को प्रजा-पालन की शपथ लेनी पड़ती थी। राजा के लिए दुष्टों का दमन करना आवश्यक समझा जाता था। रामायण एवं महाभारत दोनों में प्रजापलन एवं दुष्टों का दमन राजा के आवश्यक गुण बताए गए हैं। महाभारत स्पष्टतः अन्यायी एवं दुराचारी शासकों के वध का निर्देश करता है। वेण, नहुष, निमि तथा सुदास आदि अत्याचारी राजाओं को प्रजा द्वारा मार डाला गया था।
राजा मंत्रिपरिषद् की सलाह पर शासन-कार्य करता था। रामायण में राजदरबार में मन्त्रियों के अतिरिक्त गुरु, ऋषि, पुरोहित, विद्वान तथा सैनिक पदाधिकारियों का उल्लेख है जो विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। राम के राजतिलक के समय राज्य के प्रमुख पुरुषों की एक सभा हुई थी।
रामायण के अयोध्याकाण्ड में शासन के 18 विभागों का उल्लेख हुआ है जो निम्नलिखित अधिकारियों के अधीन थे-
महाभारत में भी राजा के अनेक मन्त्रियों का उल्लेख है। एक स्थान पर कहा गया है कि जिस प्रकार पशु मेघ पर, स्त्री अपने पति पर तथा ब्राह्मण वेद पर निर्भर करते हैं उसी प्रकार राजा अपने मन्त्रियों पर निर्भर करता है। इस ग्रन्थ में मन्त्रियों की संख्या 36 उल्लिखित है जो चारों वर्णों से लिए जाते थे। शासन में पुरोहितों का स्थान महत्वपूर्ण था।
मंत्रियों के विभागों को तीर्थ कहा जाता था। महाभारत काल में मुख्यतः राजतन्त्रीय व्यवस्था प्रचलित थी किंतु महाभारत में पाँच गणतन्त्रात्मक राज्यों का भी उल्लेख है- अन्धक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज। इन पाँचों का एक संघ था जिसके अध्यक्ष श्रीकृष्ण थे। इस संघ के अन्तर्गत प्रत्येक गण को स्वायत्तता प्राप्त थी।
महाकाव्य काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति
महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा में धार्मिक स्थिति का बड़ा महत्व है। महाकाव्य काल तक आते-आते वैदिक धर्म का स्वरूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया। पूर्व-वैदिक कालीन ‘कर्मकाण्ड-प्रधान धर्मों’ तथा उत्तर-वैदिक कालीन ‘ज्ञान प्रधान धर्मों’ का समन्वय होकर इस समय धर्म का व्यावहारिक रूप सामने आया जो सर्व-साधारण के लिए सुलभ था। प्राचीन वैदिक देवताओं का महत्व कम हो गया था तथा नए देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हो रही थी।
इनमें विष्णु, शिव, गणेश, पार्वती, दुर्गा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (शिव) को त्रिमूर्ति कहा गया तथा उन्हें क्रमश. सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता एवं संहर्त्ता स्वीकार किया गया। शीघ्र ही ब्रह्मा का महत्व कम हो गया तथा शिव और विष्णु महाकाव्य कालीन धर्म के प्रमुख देवता हो गए। अवतारवाद एवं पुनर्जन्म की अवधारणाओं का समावेश हुआ।
राम और कृष्ण विष्णु के अवतार मान लिए गए। यह धारणा प्रचलित हुई कि ईश्वर अपने भक्तों की सहायता के लिए समय-समय पर पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। वह धर्म की स्थापना करते हैं, सज्जनों की रक्षा करते हैं तथा दुष्टों का विनाश करते हैं। महाभारत के भगवत्गीता वाले अंश में भगवान के बारे में यह धारणा प्रमुख रूप से स्थापित की गई है।
महाकाव्यों ने सामान्य जनता के समक्ष मोक्ष-प्राप्ति का एक सरल उपाय प्रस्तुत किया। यह था भक्ति का साधन जो सभी के लिए समान रूप से सुलभ था। इसके अनुसार ईश्वर, अपने उपासक द्वारा की गई भक्ति से प्रसन्न होकर उपासक को सभी पापों से मुक्त करके अपनी शरण में ले लेते हैं। महाभारत में पंचरात्र धर्म का वर्णन मिलता है जो आगे चलकर वैष्णव-धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ।
महाभारत में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मान्यता के अनुसार धर्मपालन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें शैव तथा शाक्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता तथा उदारता पर भी बल दिया गया है। भगवद्गीता महाभारत के ‘भीष्म-पर्व’ का अंश है। इसमें कर्म, भक्ति तथा ज्ञान इन तीनों का सुन्दर समन्वय मिलता है। गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गयी है।
भक्ति का महत्व बताते हुए कृष्ण स्वयं यह कहते हैं- ‘सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।’ रामायण तथा महाभारत में अनेक वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है परन्तु यज्ञों में होने वाली हिंसा का विरोध किया गया है तथा चित्त-शुद्धि को ही एकमात्र साधन स्वीकार किया गया।
दोनों महाकाव्यों में सत्य, अहिंसा, सदाचार, तप, त्याग आदि के पालन का उपदेश दिया गया है। महाकाव्यों का मुख्य उद्देश्य समाज में सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा करना था। विभिन्न कथाओं तथा चरित्रों के माध्यम से असत्य पर सत्य तथा अन्याय पर न्याय की विजय प्रदर्शित की गयी है। रामायण में सच्चरित्रता पर विशेष बल दिया गया है तथा कहा गया है कि यह चरित्र ही है जो मनुष्य को देवता की कोटि में पहुँचाता है। महाकाव्यों द्वारा प्रतिपादित आदर्श प्रत्येक युग के लिए अनुकरणीय है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वैदिक युग से चले आ रहे धार्मिक विश्वासों तथा क्रियाकलापों में महाकाव्य काल में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपनिषद काल में स्वतंत्र धार्मिक चिंतन की जो प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई थी, वह इस युग में अपने चरम पर पहुँच गई।
महाकाव्य काल में आर्यों की सामाजिक दशा
महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा की वास्तविक तस्वीर सामाजिक अवस्था से ज्ञात होती है। महाकाव्य युगीन समाज भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। ऋग्वेद के समान रामायण में भी कहा गया है कि विराट पुरुष के मुँह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उरुभाग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र वर्णों की उत्पत्ति हुई। चारों वर्णों में ब्राह्मण अब भी सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। रामायण तथा महाभारत में ब्राह्मणों की कई कोटियां बताई गई हैं। कुछ ब्राह्मण क्षत्रिय कर्म करते थे तथा कुछ ब्राह्मण कृषि तथा पशुपालन द्वारा भी अपनी जीविका चलाते थे।
सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों का स्थान सबसे नीचे था। उन्हें न तो तपस्या का अधिकार था और न वे विद्याध्ययन के लिए गुरुकुलों में जा सकते थे। रामायण में शम्बूक नामक एक शूद्र का उल्लेख हुआ है जो अनाधिकार तप करने के कारण राम के हाथों मारा गया किंतु राम ने निषादराज तथा शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया तथा केवट का अनुरोध स्वीकार करके उसे भी सम्मान दिया। अतः कहा जा सकता है कि इए काल में शूद्रों के सम्मान की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी।
महाभारत में आए एक प्रसंग के अनुसार एकलव्य नामक निषाद बालक को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया, जब उसने अपनी निष्ठा एवं लगन से स्वयं ही धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त कर ली तो द्रोणाचार्य ने उसके दायें हाथ का अंगूठा कटवा लिया किन्तु इस काल में शूद्रों की स्थिति में सुधार के चिह्न भी मिलते है। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि शूद्र-सेवकों का भरण-पोषण करना द्विज का कर्त्तव्य है।
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राजा की मंत्रिपरिषद में शूद्र प्रतिनिधि भी रखे जाते थे। युधिष्ठिर ने राजसूय यंत्र के अवसर पर शूद्र प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया था। महाभारत के शान्तिपर्व में लिखा गया है कि चारों वर्णों को वेद पढ़ना चाहिए तथा शूद्र से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। महाभारत में विदुर, मातंग, कायव्य आदि व्यक्तियों को, जन्मना शूद्र होते हुए भी प्रतिष्ठित स्थान दिए गए। उन्हें सेवावृत्ति, कृषि, पशुपालन, वाणिज्य आदि का भी अधिकार था। महाकाव्य काल में वर्णों के साथ-साथ जातियों के नाम भी मिलते हैं। रामायण में यवन और शक तथा महाभारत में यवन, शक, किरात, पह्लव, आदि विदेशी जातियों का भी उल्लेख है। समाज में चार आश्रमों का विधान इस युग में भी देखने को मिलता है। शान्तिपर्व में चारों आश्रमों को ब्रह्मलोक में पहुँचने के चार सोपान बताए गए हैं। चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम का सर्वाधिक महत्व था। महाकाव्य काल में स्त्रियों की दशा वैदिक-काल की अपेक्षा हीन थी। फिर भी समाज में उनके महत्व को पूर्णतः नकारा नहीं गया था। बाल-विवाह नहीं होते थे। उच्च-वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं। रामायण में कौशल्या और तारा को ‘मंत्रविद्’ कहा गया है। अत्रेयी ‘वेदान्त’ का अध्ययन करती हुई तथा सीता ‘संध्या’ करती हुई दिखाई गई हैं।
महाभारत में द्रौपदी को ‘पण्डिता’ कहा गया है। वह युधिष्ठिर तथा भीष्म से धर्म एवं नैतिकता पर वार्तालाप करती है। महाभारत स्त्री को धर्म, अर्थ तथा काम का मूल बताता है। अनुशासन पर्व में कहा गया है कि स्त्रियाँ समृद्धि की देवी हैं। अतः समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिये।
समाज में बहुविवाह तथा अन्तर्जातीय-विवाह का प्रचलन था। उच्च कुल के लोग अनेक पत्नियाँ रखते थे। क्षत्रिय कुलों में विवाह स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे। नियोग की प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें पति के नपुंसक अथवा रुग्ण होने पर पत्नी पर-पुरुष के साथ सन्तानोत्पत्ति हेतु सम्पर्क कर सकती थी।
महाभारत में सती-प्रथा के उदाहरण भी प्राप्त होते हैं, जैसे- माद्री अपने पति पाण्डु के साथ सती हो गई थी किन्तु ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ स्त्रियों ने अपने पतियों की मृत्यु के बाद सतीत्व का अनुसरण नहीं किया। महारानी कुंती महाराज पाण्डु के साथ सती नहीं हुईं। अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ भी सती नहीं हुई थीं।
महाभारत में हजारों यादव-विधवाओं का उल्लेख है जो अर्जुन के साथ द्वारिका से हस्तिनापुर तक गयी थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि शक-सीथियनों के आक्रमणों के कारण समाज में सती-प्रथा का प्रचलन बढ़ने लगा था। कहीं-कहीं पर्दा-प्रथा के उल्लेख भी मिलते हैं। इस प्रथा पर भी विदेशी आक्रमणों का ही प्रभाव था। महाभारत में वेश्याओं के भी उल्लेख मिलते है।
महाकाव्य काल में आर्यों की आर्थिक दशा
ऋग्वैदिक-काल, उत्तरवैदिक-काल तथा उपनिषद काल की तरह महाकाव्य काल में भी कृषि तथा पशुपालन आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे। हलों द्वारा कृषि होती थी जिन्हें बैलों की सहायता से खींचा जाता था। रामायण में राजा जनक को तथा महाभारत में युधिष्ठिर को हल चलाते हुए दिखाया गया है। इससे कृषि की महत्ता प्रतिपादित होती है।
सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था किंतु ‘कुल्याओं’ (छोटी नहरों) का भी उल्लेख मिलता है। राज्य कृषि की उन्नति की ओर विशेष ध्यान देता था। उस काल में गेहूँ, जौ, उड़द, चना, तिल तथा चावल प्रमुख फसलें थी। भूमि उपजाऊ थी। गाय, बैल, हाथी, घोड़े भेड़ प्रमुख पालतू पशु थे। पशुओं की देख-रेख के लिए राज्य की ओर से ‘गोपाध्यक्ष’ नामक पदाधिकारी नियुक्त किया जाता था।
कृषि एवं पशुपालन के साथ-साथ व्यवसाय एवं व्यापार भी उन्नति पर थे। महाभारत में अनेक व्यवसाइयों का उल्लेख मिलता है जो विभिन्न स्थानों में श्रेणियाँ बनाकार निवास करते थे। प्रमुख व्यवसायियों में स्वर्णकार, लौहकार, बढ़ई, खनक, कुम्भकार, चर्मकार, रजक, शौण्डिक, तन्तुवाय, कम्बलकार, वैद्य, मालाकार, नापित आदि सम्मिलित थे। शिल्पी अपने कार्य में निपुणता प्राप्त कर चुके थे।
वे हाथीदांत, स्वर्ण, मणि तथा विविध रत्नों से सुन्दर आभूषण बनाते थे। आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही व्यापार उन्नति पर थे। व्यापार मुख्यतः वैश्य जाति के लोग ही करते थे। रामायण में ‘यवद्वीप (वर्तमान में जावा)’ तथा ‘सुवर्णद्वीप (वर्तमान में सुमात्रा)’ का उल्लेख हुआ है जहाँ भारतीय व्यापारी जाया करते थे।
महाभारत में भी समुद्री यात्राओं, द्वीपों, जलपोतों आदि का उल्लेख है निससे ज्ञात होता है कि उस समय समुद्री व्यापार उन्नति पर था। कम्बोज, गन्धार, सिन्ध, प्राग्ज्योतिष (असम), विन्ध्यप्रदेश, चीन तथा बाह्लीक आदि देशों से व्यापार होता था तथा अनेक वस्तुएं मंगवायी जाती थीं। कम्बोज तथा बाह्लीक उत्तम घोड़ों के लिए विख्यात थे।
श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन मानव मात्र को शांति देने वाला है। यह मनुष्य को ज्ञान, योग, भक्ति एवं कर्म के पथ पर चलने का सुझाव देता है। यह दर्शन महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित है।
श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन जानने से पहले इस पुस्तक का संक्षिप्त परिचय एवं इसकी रचना की पृष्ठभूमि जाननी आवश्यक है। महाभारत नामक महाकाव्य में कौरव-पाण्डव युद्ध की मूल कथा के साथ-साथ अध्यात्म-रामायण, विष्णु-सहस्रनाम, अनुगीता, श्रीमद्भगवत्गीता और हरिवंश-पुराण आदि ग्रंथ भी समाहित हैं। महाभारत की कथा के आधार पर भारतीय जन मानस में यह धारणा प्रचलित है कि भगवद्गीता, भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुई। भगवान ने गीता का उपदेश अपने शिष्य अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया।
महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। साहित्यिक एवं पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ। अतः भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश देने की घटना उसी समय हुई होगी।
श्रीमद्भगवत्गीता का रचनाकाल
आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार, दर्शनत्रशास्त्री तथा अन्य क्षेत्रों के विद्वान महाभारत युद्ध के काल को महाभारत ग्रंथ का रचना काल नहीं मानते। उनके अनुसार ग्रंथ की रचना, युद्ध के बहुत बाद में हुई। महाभारत नामक ग्रंथ की रचना का मूल समय ई.पू. चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी में सामने आया। अतः गीता भी उसी काल की अथवा उसके बाद के किसी काल की रचना होनी चाहिए।
बाली द्वीप से गीता की एक अत्यंत प्राचीन पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें केवल अस्सी श्लोक ही हैं। बहुत से विद्वान इसी को गीता की मूल प्रति मानते हैं जिसे बाद में 700 श्लोकों में बदल दिया गया। भारतीय मुख्य भूमि और बाली द्वीप के बीच आर्यों एवं द्रविड़ों का आना-जाना रामायण काल एवं उससे भी पहले से है। अतः बाली में मिली गीता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आधुनिक काल में प्राप्त श्रीमद्भगवत्गीता में चार मनुओं का उल्लेख है-
बाद में मनुओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई। कुछ पुराणों में 28 मनुओं की मान्यता भी है। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता का लेखन पौराणिक काल से पहले उस समय हुआ जब देश में चार मनुओं को ही मान्यता थी। यह काल उपनिषदों का काल है। पुराण उस समय भविष्य के गर्भ में थे। इसीलिए गीता पुराण नहीं है, उपनिषद है।
गीता में उपलब्ध सामग्री पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि वर्तमान गीता में ब्रह्मसूत्र, तीन वेद तथा वेदांत का उल्लेख है। सांख्य दर्शन तथा योग का विचार भी गीता में अपने चरम पर है। गीता में अहिंसा, शील, यज्ञकर्म, पीपल की श्रेष्ठता, कुबेर यक्ष आदि की पूजा का उल्लेख किया गया है। ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर गीता की रचना के काल का अनुमान लगाया जा सकता है। गीता में अवतारवाद को पूरी तरह स्थापित किया गया है और श्रेष्ठ कर्म को भी योग बताया गया है।
आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार तथा दर्शनशास्त्री यह सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि मूल रूप में भगवद्गीता, महाभारत का हिस्सा नहीं थी, यह गुप्त शासकों के काल में प्रक्षेपक के रूप में महभारत में जोड़ी गई। इस घटना का उल्लेख पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्त शासकों के समय भारत आए फाह्यान ने किया है। वह लिखता है- ‘भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों देशवासी चर्चा करते थे।’
गीता के काल पर विशद् शोध करने वाले प्रोफसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता पहले अलग ग्रंथ थी, गुप्तकाल के आसपास यह महाभारत में सन्निवेशित हुई। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि गुप्तकाल में गीता न केवल मौजूद थी अपितु महाभारत का हिस्सा बन गई थी। इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि गीता के 80 श्लोक, महाभारत में जुड़ने से पहले ही 700 श्लोकों में बदले गए होंगे।
आधुनिक शोधों के आधार पर माना गया है कि भगवद्गीता की रचना ई.पू. पांचवी शताब्दी में हुई। अर्थात् मौर्य काल से भी सौ साल पहले। बाद में इसके मूल पाठ में अनेक हेर-फेर होते रहे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू.200 में अर्थात् शुंगकाल में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।
गीता का प्राचीन स्वरूप
गुप्तकाल से पहले भारत में एक भी ग्रंथ ऐसा नहीं मिला है जिसमें भगवद्गीता का उल्लेख किया गया हो किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता इससे पहले अस्तित्व में नहीं थी। वह किसी स्वतंत्र ग्रंथ की तरह दर्शनशास्त्र का एक ग्रंथ थी। उसे भगवान की वाणी के रूप में मान्यता नहीं मिली थी और उस काल की गीता का दर्शन भी आज की गीता से भिन्न था।
होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।
पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है।
हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं।
फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है।
रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था। ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।
इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं। पश्चिमी दार्शनिक सुकरात की मृत्यु ईसा से 399 साल पहले हुई। उनके विचारों में गीता के बहुत से सिद्धांतों का समावेश है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि उस काल में गीता का दर्शन धरती के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका था।
पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाए एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है। बहुत से भारतीय मानते हैं कि भारत में श्रीकृष्ण के जन्म से बहुत पहले से बहुत से उपनिषद मौजूद थे।
भगवान श्री कृष्ण ने उन उपनिषदों के श्रेष्ठ विचारों के सार को गीता के रूप में उच्चारित किया। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता के विचार किसी एक समय में प्रकट नहीं हुए। ये सैंकड़ों वर्षों के चिंतन का परिणाम हैं जो ईसा से लगभग पांच सौ साल पहले ठोस रूप ले चुके थे। बाली द्वीप से मिली गीता के 80 श्लोकों को गीता का एक प्रारम्भिक रूप माना जाना चाहिए।
भगवद्गीता का वास्तविक लेखक
भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं- ‘तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।’
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।
आधुनिक काल के अनेक विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा।
कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।
चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालीदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ कादंबरी में भी गीता का उल्लेख मिलता है।
पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी-यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है- ‘भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे।’
अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था। इससे पहले ‘गीता’ एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी।
सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री-यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है। गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं।
प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म ई.788 में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।
प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी। प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे।
डॉ. देसाई इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं। खेर ने मराठी में ‘मूल गीता की खोज’ नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया।
स्वामी विवेकानंद ने लिखा है- ‘गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं। गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।’
इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया। गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसीलिए वैष्णवीय तन्त्रसार में कहा गया है-
सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः
पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।
अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।
गीता की उपनिषदों से समानता
गीता और उपनिषदों में शब्दों और विचारों की पर्याप्त समानता पाई जाती है। कठोपनिषद् का निम्नलिखित श्लोक गीता के द्वितीय अध्याय के बीसवें श्लोक से लगभग शब्दशः उद्धृत किया गया है-
न जायते भ्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चित्र बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
(कठोपनिषद्, 1.2.18)
इसी प्रकार कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक का गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक से तादाम्य है-
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानोतो नायं हन्ति न हन्यते।।
(कठोपनिषद्, 1.2.19)
भगवत्गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक से भाव ग्रहण किया गया है-
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यतः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विद्युः।
देवयान और पितृयान मार्गों का विचार सर्वप्रथम वेदों में आया था। इस विचार को उपनिषदों ने ग्रहण किया और बाद में गीता ने भी ग्रहण कर लिया। गीता के आठवें अध्याय के चौबीसवें एवं पच्चीसवें श्लोक में इसका वर्णन है-
कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।
एवं त्ययि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
(ईशावास्योपनिषद्, 2)
गीता के ग्यारहवें अध्याय का विषय ‘विश्वरूप दर्शन’ मुण्डकोपनिषद् के निम्नलिखित श्लोक से प्रेरित है-
गीता के तृतीय अध्याय का बयालीसवां श्लोक कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक के दर्शन से साम्य रखता है-
इन्द्रियेभ्यः पराहह्यार्था अर्थेभ्यश्चः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।
(कठोपनिषद्, 1.3,10-11)
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गीता ने श्वेताश्वतरोपनिषद् के ईश्वरवाद और भक्ति तथा उपसना के महत्व को भी ग्रहण किया है। कठोपनिषद् में जिस अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया गया है ठीक वैसा ही गीता के पन्द्रहवें अध्याय में भी किया गया है परन्तु जहां कठोपनिषद् ने अश्वत्थ वृक्ष को ‘ब्रह्म’ माना है और ‘सद्’ मानने के कारण उसका नाश असम्भव माना है वहीं गीता ने उसको ‘संसार’ और ‘असद्’ माना है और इसलिए उसको उखाड़ फैंकने का उपदेश दिया है। अश्वत्थ शब्द का प्रयोग संसार के लिए ही उचित बैठता है क्योंकि अश्वत्थ का शाब्दिक अर्थ है- जो कल तक नहीं ठहरता, अर्थात् नाशवान्। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वेदों एवं उपनिषदों से लिए गए संदर्भों की गीता में पुनरावृत्ति मात्र नहीं की गई है अपितु उन दार्शनिक सिद्धांतों का आगे विकास करने की दृष्टि से उन्हें ग्रहण किया गया है। उपनिषद् शास्त्रार्थ की तरह लिखे गए हैं जबकि गीता व्याख्यान की तरह है। उपनिषदों में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों मार्गों का विवरण होने पर भी ज्ञान पर अधिक जोर दिया गया है, गीता उपनिषदों से अधिक व्यावहारिक और समन्वयवादी है। गीता में ‘कर्म’ और ‘भक्ति’ पर विशेष बल दिया गया है तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति का समन्वय किया गया है। डॉ. राधाकृष्णन् के अनुसार गीता में परस्पर विरोधी तत्वों का समवन्य करके उन्हें पूर्णता दी गई है।
स्वयं वेदव्यासजी ने गीता के अंत में कहा है-
गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरै।
यां स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद्विनिसृता।।
अर्थात् गीता को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अन्तःकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्त्तव्य है। जो कि स्वयं श्री पद्मनाभ भगवान् विष्णु के मुखारविन्द से निकली हुई है। फिर अन्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन है! विलियम वॉन हम्बोल्ट ने लिखा है- ‘गीता किसी ज्ञात भाषा में उपस्थित गीतों में सम्भवतः सर्वाधिक सुन्दर और एकमात्र दार्शनिक गीत है।’
क्या गीता में बहुत से ग्रंथों के सिद्धांतों का मेल है ?
भारतीय चिंतन परम्परा अनेक दार्शनिक मतों का उदय हुआ जिनमें परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए गए हैं। गीता के लेखक ने इन विरोधी एवं असंगत दिखाई पड़ने वाले तत्वों को मिलकार एक क्रमबद्ध सूत्र में पिरो दिया है जिन्हें स्वीकार करके, पाठक सच्चे आत्मिक जीवन की ओर बढ़ सकता है।
गीता पर भाष्य एवं टीकाएँ
संस्कृत साहित्य परम्परा में उन ग्रन्थों को ‘भाष्य’ कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को मान्यता पाने के लिए उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा गीता पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था अर्थात् उनका भाष्य उनकी टीकाएँ लिखनी होती थीं। इस कारण गीता पर अनेक दार्शनिकों एवं धर्माचार्यों ने टीकाएँ लिखीं। संप्रदायों के अनुसार उन टीकाओं की संक्षिप्त सूची इस प्रकार है-
(1.) अद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ: शंकराचार्य कृत शांकराभाष्य, श्रीधर कृत सुबोधिनी, मधुसूदन सरस्वती कृत गूढ़ार्थ दीपिका।
(2.) विशिष्टाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : यामुनाचार्य कृत गीता अर्थसंग्रह, जिस पर वेदांत देशिक कृत गीतार्थ-संग्रह रक्षा टीका है। रामानुजाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर वेदांत देशिक कृत तात्पर्य चंद्रिका टीका है।
(3.) द्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : मध्वाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर जयतीर्थकृत प्रमेय दीपिका टीका है, मध्वाचार्य कृत गीता-तात्पर्य निर्णय।
(4.) शुद्धाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : वल्लभाचार्य कृत तत्व दीपिका, जिस पर पुरुषोत्तम कृत अमृत तरंगिणी टीका है।
(5.) कश्मीरी लेखकों द्वारा गीता की टीकाएँ: अभिनव गुप्त कृत गीतार्थ संग्रह। आनंदवर्धन कृत ज्ञानकर्मसमुच्चय।
आधुनिक काल के लेखकों द्वारा गीता की टीकाएं –
भावार्थ दीपिका : संत ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वरकृत
ज्ञानेश्वरी : संत ज्ञानेश्वर (मराठी अनुवाद)
गीतारहस्य : बालगंगाधर तिलक
Essays on Gita : अरविन्द घोष
ईश्वरार्जुन संवाद : परमहंस योगानन्द
गीता तत्व विवेचनी टीका : जयदयाल गोयन्दका
भगवदगीता का सार : स्वामी क्रियानन्द
गीता साधक संजीवनी : स्वामी रामसुखदास
अनासक्ति योग : मोहनदास गांधी
गीता-प्रवचन : विनोबा भावे
श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन
वर्तमान समय में गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। नौवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य द्वारा रचित गीताभाष्य में भी श्लोकों की संख्या 700 बताई गई है– ‘तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यासः सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैः पनिबंध।’
20वीं सदी के लगभग जावा की भाषा में भीष्मपर्व का एक अनुवाद हुआ जिसमें गीता के अनेक मूल श्लोक सुरक्षित हैं। श्रीपाद कृष्ण बेल्वेलकर के अनुसार जावा के इस प्राचीन संस्करण में गीता के केवल साढ़े इक्यासी श्लोक मूल संस्कृत के हैं। उनसे भी वर्तमान पाठ का समर्थन होता है। गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र की गणना ‘प्रस्थानत्रयी’ में की जाती है।
गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों की जो अध्यात्म विद्या थी, उसको गीता सर्वांश में स्वीकार करती है। उपनिषदों की अनेक विद्याएँ गीता में हैं। जैसे, संसार के स्वरूप के सम्बन्ध में अश्वत्थ विद्या, अनादि अजन्मा ब्रह्म के विषय में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति या जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या और अपरा प्रकृति या भौतिक जगत के विषय में क्षरपुरुष विद्या। इस प्रकार वेदों का ब्रह्मवाद और उपनिषदों का अध्यात्म, दोनों ही गीता में संयोजित हैं, उसे ही ब्रह्मविद्या कहा गया है।
गीता में ब्रह्मविद्या का आशय निवृत्तिपरक ज्ञानमार्ग से है। इसे सांख्य-मत कहा जाता है जिसके साथ निवृत्ति-मार्गी जीवन-पद्धति जुड़ी हुई है किंतु गीता उपनिषदों के युग से आगे बढ़कर उस काल की देन है जब भारत में एक नया दर्शन जन्म ले रहा था और जो गृहस्थों के प्रवृत्ति-धर्म को निवृत्ति-मार्ग के समान फलदायी मानता था।
गीता में ‘योगशास्त्रे’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अभिप्राय ‘कर्मयोग’ से है। गीता में योग की दो परिभाषाएँ बताई गई हैं। एक निवृत्ति मार्ग की सृष्टि से जिसमें ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अर्थात् गुणों के वैषम्य में साम्यभाव रखना ही योग है। यह सांख्य सम्मत परिभाषा है।
गीता में योग की दूसरी परिभाषा ‘योगः कर्मसु कौशलम’ के रूप में दी गई है जिसका अर्थ है कि ऐसे उपाय से कर्म करना जिससे वह कर्म, बंधन का कारण न बने और कर्म करनेवाला व्यक्ति स्वयं को उसी असंग या निर्लेप स्थिति में रखे जो ज्ञानमार्गियों को मिलती है। इसी युक्ति का नाम बुद्धियोग है और यही गीता के योग का सार है।
गीता के अठारह अध्याय हैं जिनमें से दूसरे अध्याय में प्रयुक्त ‘तस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता’ का अभिप्राय ‘निर्लेप कर्म की क्षमतावली बुद्धि’ से है। यह संन्यास द्वारा वैराग्य प्राप्त करने की स्थिति नहीं थी अपितु कर्म करते हुए प्रतिक्षण मन को वैराग्ययुक्त स्थिति में स्थिर करने की युक्ति थी। यही गीता का कर्मयोग है। गीता में अनेक स्थलों में ‘सांख्य के निवृत्ति मार्ग’ और ‘कर्म के प्रवृत्तिमार्ग’ की व्याख्या की गई है और दोनों को श्रेयस्कर बताया गया है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म.दर्शन मूलतः उपनिषदों के दर्शन पर आधारित है। जहाँ उपनिषदों में परस्पर विरोधी एवं भिन्न-भिन्न दर्शन प्रस्तुत किए गए हैं, वहीं पर श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म.दर्शन उन समस्त दर्शनों का समन्यव प्रस्तुत करता है।
गीता के अठारह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पृथा के पुत्र अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिए गए उपदेशों के एक निश्चित क्रम में हैं तथा विषय-वस्तु एवं दर्शन की दृष्टि से वे एक दूसरे से सम्बद्ध हैं।
प्रथम अध्याय
गीता के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुन-विषाद-योग है। वह गीता के उपदेश का विलक्षण दृश्य प्रस्तुत करता है जिसमें श्रोता अर्जुन और वक्ता श्रीकृष्ण जीवन की प्रगाढ़ समस्या के समाधान के लिये प्रवृत्त होते हैं। अर्जुन वीर क्षत्रिय था किंतु अपने ही बंधु-बांधवों को युद्ध के मैदान में खड़ा देखकर वह क्षत्रियोचित कर्म भूलकर श्रीकृष्ण से युद्ध से विमुख होने की आज्ञा मांगने लगा। उसका तर्क धर्मयुक्त जान पड़ता है जिसमें वह भूमि के लिए स्वजनों का वध नहीं करना चाहता किंतु उसने स्वयं ही उसे कायरता कहा है। इस प्रकार पहले अध्याय में भूमिका रूप में अर्जुन ने भगवान से अपनी स्थिति कही है।
द्वितीय अध्याय
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दूसरे अध्याय का नाम सांख्य-योग है। अर्जुन को प्रियजनों के जीवन के लिए कातर होकर रोते हुए देखकर कृष्ण उसे ध्यान दिलाते हैं कि क्षत्रिय होने के कारण उसे इस प्रकार का क्लैव्य प्रदर्शित करना उचित नहीं है। वे अर्जुन को भारत के दो प्राचीन एवं विख्यात दर्शनों की जानकारी देते हैं जिससे अर्जुन को कर्त्तव्य का वास्वतिक ज्ञान हो तथा वह कातरता एवं क्लैव्य का त्याग कर दे। कृष्ण ने अर्जुन की युक्तियों को प्रज्ञावाद का झूठा रूप कहा। कृष्ण कहते हैं कि प्रज्ञादर्शन काल, कर्म और स्वभाव से होने वाले संसार की सब घटनाओं और स्थितियों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करता है। जीना और मरना, जन्म लेना और बढ़ना, विषयों का आना और जाना। सुख और दुःख का अनुभव, ये तो संसार में होते ही हैं, इसी को प्राचीन आचार्य पर्यायवाद का नाम भी देते थे। काल की चक्रगति इन समस्त स्थितियों को लाती और ले जाती है। जीवन के इस स्वभाव को जान लेने पर शोक नहीं होता। यही भगवान का व्यंग्य है कि प्रज्ञायुक्त दृष्टिकोण को मानते हुए भी अर्जुन इस प्रकार के मोह में क्यों पड़ा है? प्रज्ञावाद के अनुसार जीवन की नित्यता और शरीर की अनित्यता निश्चित है। ‘नित्य जीव’ के लिए शोक करना उतना ही व्यर्थ है जितना ‘अनित्य शरीर’ को बचाने की चिंता। ये दोनों अपरिहार्य हैं।
जन्म और मृत्यु बारी-बारी से होते ही हैं, ऐसा समझकर शोक करना उचित नहीं है। दूसरा दृष्टिकोण स्वधर्म का है। जन्म से ही प्रकृति ने सबके लिए एक धर्म नियत किया है। उसमें जीवन का मार्ग, इच्छाओं की परिधि, कर्म की शक्ति सभी कुछ आ जाता है। इससे निकल कर भागा नहीं जा सकता। कोई भागे भी तो प्रकृति उसे फिर खींच लाती है।
इस प्रकार भगवान ने अर्जुन को काल के परिवर्तन, जीव की नित्यता और व्यक्ति के स्वधर्म का ज्ञान कराया है जिसे सांख्य की बुद्धि कहा गया है। इससे आगे भगवान ने योगमार्ग की बुद्धि का भी वर्णन किया। यह बुद्धि कर्म या प्रवृत्ति मार्ग के आग्रह की बुद्धि है। कर्मयोगी को कर्म करते हुए कर्म के फल की आसक्ति से बचना आवश्यक है।
अर्जुन को संदेह हुआ कि क्या इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त करना संभव है, व्यक्ति कर्म करे और फल की इच्छा न करे? इसलिए अर्जुन ने पूछा कि इस प्रकार का दृढ़ प्रज्ञावाला व्यक्ति जीवन का व्यवहार कैसे करता है? आना, जाना, खाना, पीना, कर्म करना, उनमें लिप्त होकर भी निर्लेप कैसे रहा जा सकता है?
कृष्ण ने मन के संयम की व्याख्या करते हुए अर्जुन को बताया कि काम, क्रोध, भय, राग, द्वेष के द्वारा मन का सौम्यभाव बिगड़ जाता है और इंद्रियाँ वश में नहीं रहतीं। बाहर से कोई विषयों को छोड़ भी दे तो भी भीतर का मन नहीं मानता। विषयों का स्वाद जब मन से जाता है, तभी मन प्रफुल्लित, शांत और सुखी होता है। इसे गीता में ब्राह्मी-स्थिति कहा है।
तीसरा अध्याय
तीसरे अध्याय का नाम कर्म-योग है। अर्जुन भगवान से प्रश्न करता है कि सांख्य और योग इन दोनों मार्गों में आप किसे अच्छा समझते हैं और क्यों नहीं यह निश्चित कहते कि मैं इन दोनों में से किसे अपनाऊँ? इस पर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि लोक में दो निष्ठाएँ या जीवन-दृष्टियाँ हैं- सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग और कर्ममार्गियों के लिए कर्मयोग। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि संसार में कोई व्यक्ति कर्म छोड़ ही नहीं सकता।
प्रकृति तीनों गुणों (सत्, रज एवं तम) के प्रभाव से व्यक्ति को कर्म करने के लिए बाध्य करती है। कर्म से बचने वाले बाहरी रूप से तो कर्म छोड़कर बैठ जाते हैं किंतु मन उसमें ही डूबा रहता है। यह मिथ्याचार है। मन में कर्मेद्रियों को रोककर कर्म करना ही श्रेयस्कर है। कर्म के बिना तो भोजन के लिए अन्न भी नहीं मिल सकता। श्रीकृष्ण ने कर्म के विधान को चक्र के रूप में उपस्थित किया।
न केवल विभिन्न मनुष्यों के कर्मचक्र सामाजिक व्यवस्था में अरों की तरह परस्पर पिरोए हुए हैं अपितु पृथ्वी के मनुष्य और स्वर्ग के देवता दोनों का सम्बन्ध भी कर्मचक्र पर आश्रित है। धरती पर मनुष्य कृषि करते हैं और दैवीय शक्तियाँ वृष्टि का जल भेजती हैं। अन्न और पर्जन्य दोनों कर्म से उत्पन्न होते हैं। एक में मानवीय कर्म, दूसरे में दैवीय कर्म। कर्म के पक्ष में लोकसंग्रह की युक्ति भी दी गई है, अर्थात् कर्म के बिना समाज का ढाँचा खड़ा नहीं रह सकता।
राजा जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। कृष्ण ने स्वयं अपना ही दृष्टांत देकर कहा कि मैं नारायण का रूप हूँ, मेरे लिए कुछ कर्म शेष नहीं है। फिर भी तंद्रारहित होकर कर्म करता हूँ और अन्य लोग मेरे मार्ग पर चलते हैं। अंतर इतना ही है कि मूर्ख लिप्त होकर कर्म करते हैं और ज्ञानी असंग-भाव से कर्म करते हैं।
चौथा अध्याय
गीता के चौथे अध्याय का नाम ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग है। इसमें बाताया गया है कि ज्ञान प्राप्त करके कर्म करते हुए भी कर्मसंन्यास का फल किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। इसमें सच्चे कर्मयोग को चक्रवर्ती राजाओं की परंपरा में घटित माना है। मांधाता, सुदर्शन आदि अनेक चक्रवर्ती राजाओं के दृष्टांत दिए गए हैं।
भगवान अर्जुन को अपना संकल्प भी बताते हैं कि जब भी धर्म की हानि होती है मैं साधुओं की रक्षा एवं धर्म के उत्थान के लिए अवतार लेता हूँ। गीता के इसी अध्याय में कहा गया है- ‘क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।’ अर्थात् इस लोक में कर्मां से सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है। अर्थात् इस अध्याय में कर्म का महत्व भलीभांति स्थापित कर दिया गया है किंतु उस कर्म में असंग भाव होना चाहिए अर्थात् फल की आसक्ति से बचकर कर्म करना चाहिए।
पांचवा अध्याय
गीता के पाँचवे अध्याय का नाम कर्म-संन्यास-योग है। इस अध्याय में फिर मनुष्य के कर्म और अनासक्ति भाव सम्बन्धी युक्तियाँ और भी दृढ़ रूप में कही गई हैं। इसमें कर्म के साथ मन के सम्बन्ध को विशुद्ध करने पर बल दिया गया है। यह भी कहा गया है कि साधना के उच्च धरातल पर पहुँचकर सांख्य और योग में कोई भेद नहीं रह जाता।
किसी एक मार्ग पर ठीक प्रकार से चले तो समान फल प्राप्त होता है। जीवन के समस्त कर्मों का समर्पण कर देने से व्यक्ति शांति के ध्रुव-बिंदु पर पहुँच जाता है और जल में खिले कमल के समान कर्म रूपी जल से लिप्त नहीं होता।
छठा अध्याय
गीता के छठे अध्याय का नाम आत्म-संयम-योग है जिसका विषय नाम से ही प्रकट है। जितने विषय हैं उन सबसे इंद्रियों का संयम ही कर्म और ज्ञान का निचोड़ है। सुख और दुःख में मन की समान स्थिति को ही योग कहते हैं।
सातवाँ अध्याय
गीता के सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान-योग है। वैदिक दृष्टि में मानव मात्र के लिए विज्ञान जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सृष्टि के वैविध्य का ज्ञान ही विज्ञान है और वैविध्य से एकत्व स्थापित करना ज्ञान है। ये दोनों दृष्टियाँ मानव के लिए उचित हैं। विज्ञान की दृष्टि से गीता ने प्रकृति के दो रूपों- अपरा और परा की सुनिश्चित व्याख्या दी है।
अपरा प्रकृति में आठ तत्व हैं, पंचभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। जिस अंड से मानव का जन्म होता है। उसमें ये आठों तत्व रहते हैं किंतु यह प्राकृत सर्ग है अर्थात् यह जड़ है। इसमें ईश्वर की चेष्टा के संपर्क से जो चेतना आती है उसे परा प्रकृति कहते हैं; वही जीव है। आठ तत्वों के साथ मिलकर जीवन नौवाँ तत्व हो जाता है। इस अध्याय में भगवान के अनेक रूपों का उल्लेख किया गया है (जिनका और अधिक विस्तार विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में है)।
सातवें अध्याय में विशेष भगवती दृष्टि का भी उल्लेख है जिसका सूत्र- ‘वासुदेवः सर्वमिति’ अर्थात् सब वसु या शरीरों में एक ही देवतत्व है, उसी की संज्ञा ‘विष्णु’ है किंतु लोक में अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अनेक नामों और रूपों में उसी एक देवतत्व की उपासना की जाती है।
आठवाँ अध्याय
गीता के आठवें अध्याय का नाम ‘अक्षर-ब्रह्म-योग’ है। उपनिषदों में अक्षर विद्या का विस्तार हुआ। गीता में उस अक्षर विद्या का सार दिया गया है- ‘अक्षर ब्रह्म परमं’ अर्थात् परब्रह्म की संज्ञा अक्षर है। मनुष्य, अर्थात् जीव और शरीर की संयुक्त रचना का ही नाम अध्यात्म है। जीवसंयुक्त भौतिक देह की संज्ञा क्षर है और केवल शक्तितत्व की संज्ञा आधिदैवक है। देह के भीतर जीव, ईश्वर तथा भूत ये तीन शक्तियाँ मिलकर जिस प्रकार कार्य करती हैं उसे अधियज्ञ कहते हैं। गीता के अनुसार ‘ऊँ’ एकाक्षर ब्रह्म है।
नौवाँ अध्याय
गीता के नौवें अध्याय का नाम राज-गुह्य-योग है। इसमें कहा गया है कि अध्यात्म विद्या विद्याराज्ञी है और यह गुह्य ज्ञान सबमें श्रेष्ठ है। राजा शब्द का एक अर्थ मन भी था। अतएव मन की दिव्य शक्तियों को किस प्रकार ब्रह्ममय बनाया जाय, इसकी युक्ति ही राजविद्या है। इस क्षेत्र में ब्रह्मतत्व का निरूपण ही प्रधान है, उसी से व्यक्त जगत का बारंबार निर्माण होता है।
वेद का समस्त कर्मकांड, यज्ञ, अमृत, और मृत्यु, संत और असंत, और जितने भी देवी देवता है, सबका पर्यवसान ब्रह्म में है। लोक में जो अनेक प्रकार की देवपूजा प्रचलित है, वह भी अपने अपने स्थान में ठीक है।
दसवाँ अध्याय
गीता के दसवें अध्याय का नाम विभूति-योग है। इसका सार यह है कि लोक में स्थित समस्त देवता एक ही भगवान की विभूतियाँ हैं। मनुष्य के समस्त गुण और अवगुण भगवान की शक्ति के ही रूप हैं। कोई पीपल पूज रहा है। कोई पहाड़, नदी या समुद्र को, कोई उनमें रहने वाले मछली और कछुओं को। इस प्रकार कितने ही देवी-देवता हैं, उनका कोई अंत नहीं।
विश्व के इतिहास में देवताओं की यह भरमार सर्वत्र पाई जाती है। भागवतों ने इनकी सत्ता को स्वीकारते हुए सबको विष्णु का रूप मानकर समन्वय की एक नई दृष्टि प्रदान की। इसी का नाम विभूति-योग है। जो सत्व जीव बल युक्त अथवा चमत्कार युक्त हैं, वे सब भगवान का रूप हैं। इतना मान लेने से मनुष्य ‘चित्त-निर्विरोध’ स्थिति में पहुँच जाता है।
ग्यारहवाँ अध्याय
गीता के ग्यारहवें अध्याय का नाम विश्व-रूप-दर्शन-योग है। इसमें भगवान ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया। विराट रूप का अर्थ है मानवीय धरातल और परिधि के ऊपर जो अनंत विश्व का प्राणवंत रचना विधान है, उसका साक्षात दर्शन। विष्णु का जो चतुर्भुज रूप है, वह मानवीय धरातल पर सौम्यरूप है।
बारहवाँ अध्याय
गीता के बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है। जब अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा तो उसके मस्तक का विस्फोट होने लगा। उसने कहा- ‘दिशो न जाने न लभे च शर्म।’ तब भगवान ने अर्जुन को बताया कि मेरे शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का सबसे सुगम एवं सर्वोच्च साधन भक्ति है। इस पथ का अनुसरण करने वाले व्यक्ति में दिव्यगुण उत्पन्न हो जाते हैं।
तेरहवाँ अध्याय
गीता के तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ है। इस अध्याय में भगवान ने अर्जुन को प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के बारे में बताया है। भगवान कहते हैं कि शरीर क्षेत्र है, उसको जानने वाला जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है। प्रकृति अचेतन गतिविधि है और पुरुष निष्क्रिय चेतना है। शरीर वह क्षेत्र है जिसमें वृद्धि, ह्रास और मृत्यु जैसी घटनाएं घटती हैं तथा निष्क्रिय और अनासक्त चेतन इन सब घटनाओं का साक्षी होता है, वह क्षेत्रज्ञ है।
चौदहवाँ अध्याय
चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रय-विभाग-योग है। यह अध्याय समस्त वैदिक, दार्शनिक और पौराणिक चिंतन का निचोड़ है। इसमें सत्व, रज तथा तम नामक तीन गुणों की अनेक व्याख्याएँ हैं। गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रधान या प्रकृति है। गुणों के वैषम्य से ही वैकृत सृष्टि का जन्म होता है। अकेला सत्व शांत स्वभाव से निर्मल प्रकाश की तरह स्थिर रहता है और अकेला तम भी जड़वत निश्चेष्ट रहता है किंतु दोनों के बीच में छाया हुआ रजोगुण उन्हें चेष्टा के धरातल पर खींच लाता है। गति तत्व का नाम ही रजस है।
पन्द्रहवाँ अध्याय
पन्द्रहवें अध्याय का नाम पुरुषोत्तम-योग है। इसमें विश्व का अश्वत्थ (पीपल) के रूप में वर्णन किया गया है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं। उसके पत्ते वेद हैं और शाखाएं नीचे की ओर एवं शाश्वत हैं। यह अश्वत्थ रूपी संसार महान विस्तार वाला है। देश और काल में इसका कोई अंत नहीं है किंतु इसका मूल या केंद्र जिसे जिसे ऊर्ध्व भी कहते हैं, वह ब्रह्म ही है।
एक ओर वह परम तेजवान है जो विश्वरूपी अश्वत्थ को जन्म देता है तथा सूर्य और चंद्र के रूप में प्रकट है, दूसरी ओर वही चैतन्य, प्राणी शरीर में आया हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। नर या पुरुष के तीन प्रकार हैं- क्षर, अक्षर और अव्यय। पंचभूतों का नाम क्षर है, प्राण का नाम अक्षर है और मनस्तत्व या चेतना की संज्ञा अव्यय है। इन्हीं तीन नरों की एकत्र स्थिति से मानवी चेतना का जन्म होता है उसे ही ऋषियों ने वैश्वानर अग्नि कहा है।
सोलहवाँ अध्याय
गीता के सोलहवें अध्याय का नाम दैवासुर-सम्पद-विभाग-योग है। इस अध्याय में देवों एवं असुरों की संपत्तियों का वर्णन किया गया है। ये दोनों सम्पदाएं एक-दूसरे से बिलकुल विरुद्ध हैं। दैवी संपत्ति कल्याण करने वाली है और आसुरी-संपत्ति बाँधने वाली तथा नीच योनियों और नरकों में ले जाने वाली है। जो साधक इन दोनों विभागों को ठीक रीति से जान लेगा, वह आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग होते ही दैवी संपत्ति स्वतः प्रकट हो जाएगी। दैवी संपत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मा से सम्बन्ध रह जाएगा।
सत्रहवाँ अध्याय
सत्रहवें अध्याय का नाम ‘श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग’ है। इस अध्याय का सम्बन्ध सत, रज और तम नामक तीन गुणों से ही है। जिस मनुष्य में जिस गुण का प्रादुर्भाव होता है, उसकी श्रद्धा या जीवन की निष्ठा वैसी ही बन जाती है। यज्ञ, तप, दान, कर्म ये सब तीन प्रकार की श्रद्धा से संचालित होते हैं। यहाँ तक कि आहार भी तीन प्रकार का है। भगवान ने उनके भेद और लक्षण बताए हैं।
अठारहवाँ अध्याय
अठारहवें अध्याय का नाम ‘मोक्ष-संन्यास-योग’ है। इसमें गीता के समस्त उपदेशों का सार एवं उपसंहार दिया गया है। यहाँ पुनः मानव जीवन के लिए तीन गुणों का महत्व कहा गया है। पृथ्वी के मानवों में और स्वर्ग के देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं जो प्रकृति के चलाए हुए इन तीन गुणों से बचा हो।
मनुष्य को सतर्क होकर चलना आवश्यक है जिससे वह अपनी बुद्धि और वृत्ति को बुराई से बचा सके और क्या कार्य है, क्या अकार्य है, इसको पहचान सके। धर्म और अधर्म को, बंध और मोक्ष को, वृत्ति और निवृत्ति को जो बुद्धि ठीक से पहचनाती है, वही सात्विक बुद्धि है और वही मानव की सच्ची उपलब्धि है।
इस प्रकार गीता के गीता के अठारह अध्याय भारतीय उपनिषदों का तारतम्यपूर्ण सार प्रस्तुत करते हैं तथा समाज के समक्ष ज्ञान, भक्ति एवं कर्म पर आधारित एक नवीन आदर्श की स्थापना करते हैं। गीता के अठारह अध्यायों की समाप्ति पर अर्जुन को ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह समस्त संदेहों को त्यागकर कर्म के पथ पर प्रवृत्त होता है।
आर्यों ने जिस वैदिक धर्म की स्थापना की थी, वह धर्म उत्तर वैदिक काल तथा महाकाव्य काल में ब्राह्मण धर्म के रूप में विकसित हुआ किंतु ईसा छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में प्रजा में ब्राह्मण धर्म से असंतोष उत्पन्न हो गया जिसके कारण भारत में वैचारिक एवं धार्मिक क्रांति ने जन्म लिया।
ईसा के जन्म से लगभग 3500 वर्ष पहले भारत भूमि पर सिंधु-संस्कृति का उद्भव हुआ था जो लगभग 2000 वर्ष तक अपनी सुगन्ध बिखेरकर ई.पू. 1500 के आसपास काल के गाल में समा गई। सिंधु-घाटी के ऊपरी क्षेत्र अर्थात् सप्तसिंधु प्रदेश में वैदिक-आर्य-संस्कृति प्रकाश में आनी आरम्भ हुई। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं।
अर्थात् इन विद्वानों के अनुसार वैदिक संस्कृति के प्रकाश में आने की घटना ई.पू.2500 से कुछ पहले हुई होगी। जबकि पी. वी. काणे के अनुसार ऋग्वेद की रचना ई.पू.4000 से लेकर ई.पू.1000 के बीच की अवधि में हुई। अतः काणे आदि विद्वानों के अुनसार वैदिक संस्कृति का उद्भव ई.पू. 4000 से पहले हुआ होगा। इस दृष्टि से वैदिक संस्कृति, सिंधु-संस्कृति की पूर्ववर्ती अथवा समकालीन थी।
वैदिक संस्कृति ईसा के जन्म से लगभग 600 वर्ष पूर्व तक बिना किसी बाधा के निरंतर विकास करती रही। छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैदिक संस्कृति के सामने जैन-धर्म तथा बौद्ध धर्म नामक दो बड़ी चुनौतियों ने जन्म लिया जिनके कारण ईसा पूर्व की छठी शताब्दी को भारतीय संस्कृति के इतिहास में बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्रांति का समय माना जाता है।
वैदिक धर्म का आधार ज्ञान अर्थात् वेद था किंतु समय के साथ यज्ञों एवं कर्मकाण्डों की जटिलता बढ़ती गई तथा समाज में अनेक प्रकार के अन्धविश्वास पनप गए। ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक आते-आते जीवन के प्रत्येक अंग में विभिन्न प्रकार की रुढ़ियों तथा पुराहितों के बढ़ते हुए अधिकारों के कारण अनेक प्रकार की विकृतियों ने जन्म ले लिया।
इस कारण जन साधारण में वैदिक-काल से चली आ रही तार्किकता और संतुलित चिंतन पद्धति का अभाव हो गया। पुरातन परम्पराओं एवं मान्यताओं की आड़ में जनता का शोषण किया जाने लगा। इसलिए कुछ लोगों में वैदिक परम्पराओं से विश्वास उठने लगा और वे सत्य की खोज में लग गए। ये लोग किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व उसे परखना चाहते थे। इस दृष्टि से हम इस युग को धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन का युग भी कह सकते हैं।
ब्राह्मण धर्म से असंतोष के कारण
प्रजा हजारों सालों से वैदिक धर्म का पालन करती आ रही थी, वैदिक धर्म ही कालांतर में ब्राह्मण धर्म कहलाने लगा था फिर प्रजा भी ब्राह्मण धर्म से असंतोष उत्पन्न हुआ, तो उसके पीछे कई कारण थे।
वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रांति का युग
पुरातन परम्पराओं को संदेह की दृष्टि से देखने की यह प्रवृत्ति उस काल में न केवल भारत में अपितु विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी देखी जा सकती है। उस काल में अनेक देशों में ऐसे बड़े विचारक हुए जिन्होंने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों को अमान्य घोषित करके मानव जाति को चिंतन की नवीन दिशा प्रदान की। चीन में महात्मा कन्फयूशियस और लाओत्से ने, यूनान में हिराक्लिटस और पाइथोगेरस ने, ईरान में महात्मा जरथ्रुस्त्र ने और भारत में महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध ने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। उनके विचारों ने अपने अपने देश के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जिनके कारण मानव संस्कृति ने अगले चरण में प्रवेश किया।
भारत में सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के कारण
भारत में छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व की सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-
(1.) धर्म के वास्तविक स्वरूप की खोज के प्रयास
ऋग्वैदिक-काल में मनुष्य जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिए आश्रम व्यवस्था आरम्भ होने लगी थी। उत्तरवैदिक-काल में आश्रम व्यवस्था पूरी तरह विकसित हो गई। इस व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य को 50 वर्ष की आयु के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में एवं 75 वर्ष की आयु के पश्चात् सन्यास आश्रम में व्यतीत करने का प्रावधान किया गया।
वानप्रस्थ एवं सन्यास के दौरान मनुष्य धर्म, अध्यात्म तथा दर्शन के विविध पक्षों से लेकर मनुष्य जीवन की सार्थकता एवं मृत्यु के बाद मिलने वाले पुनर्जन्म, कर्मानुसार गति आदि विषयों पर निरंतर चिंतन करता था। तीर्थों एवं वनों में भ्रमण करते रहने से उसका सम्पर्क अपने ही जैसे बहुत से चिंतनशील व्यक्तियों से होता था।
निरंतर चिंतन एवं सम्पर्क के कारण वे धर्म के वास्तविक स्वरूप को खोजने का प्रयास करने लगे। इन लोगों के भीतर धर्म के वर्तमान स्वरूप के बारे में असंतोष उत्पन्न होने लगा। इसी असंतोष ने आगे चलकर भारतीय धर्म का स्वरूप बदल दिया।
(2.) उपनिषदों के विचारों का प्रचार
अनेक उपनिषदों में वैदिक धर्म की कमजोरियों की चर्चा की गई जिन्होंने प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान आकर्षित किया तथा वे इन बुराइयों का विरोध करने लगे। अनेक उपनिषदों ने कर्मकाण्ड की भी आलोचना की तथा ज्ञान की प्राप्ति को ही मोक्ष का साधन बताया। उन्होंने अहिंसा तथा आचरण की पवित्रता पर जोर दिया। इस प्रकार उपनिषदों ने ही जैन एवं बौद्ध मत की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।
(3.) ब्राह्मणों की प्रधानता से असंतोष
ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण ब्राह्मणों की प्रधानता से असंतोष का उत्पन्न होना था। उत्तरवैदिक-काल में पुरोहितों, यज्ञकर्ताओं एवं अनुष्ठानकर्ताओं की स्थिति सर्वोपरि हो गई। इन्हें ब्राह्मण कहा जाता था। वे समाज की शिक्षण और यजन सम्बन्धी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूरी करते थे। सम्पूर्ण समाज उन्हें विशेष आदर देता था। यज्ञों तथा धार्मिक कर्मकाण्डों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ ब्राह्मणों की प्रधानता भी बढ़ गई।
उस युग में जीवन की प्रत्येक समस्या को सुलझाने का एकमात्र आधार वेद ही माने जाते थे और वेदों को पढ़ने और उनकी व्याख्या करने का विशेषाधिकार ब्राह्मण वर्ग के पास था, अतः उनका प्रभुत्व बढ़ने लगा। शिशु के जन्म से लेकर वृद्धावस्था में मृत्यु होने तक ऐसा कोई कार्य नहीं था जो ब्राह्मणों से पूछे बिना पूरा हो सके।
इससे ब्राह्मण वर्ग अहंकारी और सुविधाभोगी बन गया। पौराणिक काल तक आते-आते समाज में ब्राह्मणों का प्रभुत्व सर्वोपरि हो गया। ब्राह्मणों के इस प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। जैन एवं बौद्ध मत, ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध उत्पन्न प्रतिक्रिया के परिणाम थे।
(4.) बहुदेववाद से असंतोष
ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण ब्राह्मण धर्म का बहुदेववाद भी था। यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों ने एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था तथापि एकेश्वरवाद का सिद्धान्त आर्य प्रजा में लोकप्रिय नहीं हो पाया था। इस कारण वैदिक धर्म बहुदेववादी हो गया। सृष्टि की लगभग समस्त शक्तियाँ देवी-देवता मान ली गईं। यहाँ तक कि राजा-रानियों और प्रसिद्ध योद्धाओं को भी देवता मान लिया गया।
देवी-देवताओं को संतुष्ट रखने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, हवन, उपासना, जप-तप आदि किए जाते थे। बुद्ध एवं महावीर के प्रयासों से इस काल में पुनः एकेश्वरवाद ने जोर पकड़ा और लोग सोचने लगे कि जब ‘ब्रह्म’ सर्वत्र व्याप्त है तो इतने सारे देवी-देवताओं की उपासना की क्या आवश्यता है? उनका यह भी मानना था कि मनुष्य को अपने आत्मोत्कर्ष के लिए देवताओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य-विधाता हैं। इस नवीन चिंतन के कारण समाज में बहुदेववादी ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध असन्तोष उठ खड़ा हुआ।
(5.) यज्ञ एवं कर्मकाण्ड से असंतोष
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ऋग्वैदिक-काल में आर्यों का धर्म सरल तथा आडम्बरहीन था। वे यज्ञ और अनुष्ठान स्वयं कर लेते थे। यज्ञ के लिए पुरोहित की आवश्यकता नहीं थी परन्तु धीरे-धीरे कर्मकाण्ड और तरह-तरह के विधि विधानों की प्रधानता बनी। अब पुरोहितों की सहायता लेना आवश्यक हो गया। उन्हें भी देवताओं के समान पूज्य समझा जाने लगा। पहले एक पुरोहित से काम चल जाता था। अब उनकी संख्या सात और सात से बढ़कर सत्रह हो गई। कुछ यज्ञ तो वर्षों तक चलते थे। ब्राह्मणों ने यज्ञों को अपने रोजगार का मुख्य साधन बना लिया था इसलिए उन्होंने यज्ञों को कर्मकाण्ड से पूर्ण, अत्यधिक जटिल, कठोर तथा खर्चीला बना दिया। यज्ञों में पशुबलि पर अत्यधिक जोर दिया जाने लगा। साधारण व्यक्ति के लिए ऐसे यज्ञों को करवाना असम्भव हो गया। ब्राह्मणों ने धर्म के आधार पर पुनर्जन्म और स्वर्ग-नर्क की धारणाएँ पैदा करके जनता का शोषण करना शुरु कर दिया। वे जादू-टोना, झाड़-फूंक, तन्त्र-मन्त्र आदि के नाम पर प्रजा से धन लेते थे। इस कारण जनसामान्य में विरोध की भावना पनपने लगी। निर्धन लोग मौजूदा धर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ थे और उन्हें भी मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा थी। पशुबलि के विरुद्ध भी समाज में बड़ा विरोध था। यही कारण था कि जब महावीर तथा बुद्ध ने धर्म के सरल एवं अहिंसक स्वरूप को प्रस्तुत किया तो बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई बन गए।
(6.) क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्द्धा
ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों में वर्चस्त की प्रतिस्पर्द्धा का उत्पन्न होना भी था। ऋग्वैदिक आर्यों की सामाजिक व्यवस्था उदार एवं लचीली थी। यद्यपि वर्ण व्यवस्था अस्तित्त्व में आ चुकी थी किंतु वह कर्म पर आधारित थी और कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था। चारों वर्णों की समाज में समान आवश्यकता थी परन्तु धार्मिक जटिलता के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था भी जटिल होने लगी।
अब चारों वर्णों को वंशानुगत सीमाओं में बाँध दिया गया। अर्थात् अब वर्ण का निश्चय व्यक्ति के कर्म के आधार पर न होकर जन्म के आधार पर होने लगा। ऋग्वैदिक समाज में ब्राह्मणों को उनके साधनामय, त्यागमय एवं सादगीपूर्ण जीवन के लिए सर्वोपरि स्थान दिया गया था तथा क्षत्रियों को देश की रक्षा तथा शासन-व्यवस्था का भार सौंपा गया था। अतः समाज में इन दोनों वर्णों की स्थिति श्रेष्ठ थी परन्तु बाद में क्षत्रियों को ब्राह्मणों की प्रभुता अखरने लगी।
वे स्वयं को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानने लगे। शतपथ ब्राह्मण में उनकी प्रतिक्रिया का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है जिसमें क्षत्रिय को ब्राह्मण से श्रेष्ठ बताया गया है। उपनिषद् काल में ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच प्रभुत्व की प्रतिस्पर्द्धा और अधिक बढ़ गई। इस काल में क्षत्रियों ने भी दार्शनिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में अपनी धाक जमाने का प्रयत्न किया।
भारतीय दर्शन की एक विशेष शाखा ‘ब्रह्मविद्या’ की स्थापना का श्रेय क्षत्रिय विद्वानों को ही है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के इस संघर्ष की झलक साहित्यिक रचनाओं में भी मिलती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में जहाँ कहीं भी चतुर्वर्णों का उल्लेख है, वहाँ सदैव पहले ब्राह्मणों का उल्लेख है, उनके बाद क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का। जबकि बौद्ध-ग्रन्थों में पहले क्षत्रिय वर्ण का उल्लेख है और फिर ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र वर्णों का।
वैश्यों के पास धन-सम्पत्ति थी परन्तु ब्राह्मण वैष्यों को अपने बराबर सम्मान देने को तैयार नहीं थे। अतः वैश्यों में भी ब्रह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया और उन्होंने क्षत्रियों का साथ दिया। शूद्र पहले से ही उपेक्षित थे। इसलिए उन्हें मौजूदा धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था से कोई लगाव नहीं था। यही कारण था कि जब महावीर और बुद्ध ने एक नवीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत की तो क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों ने उसका स्वागत किया।
(7.) अनार्य संस्कृतियों में असंतोष
अनार्य संस्कृतियों में असंतोष उत्पन्न होने से भी प्रजा के बड़े वर्ग में ब्राह्मण धर्म से असंतोष हो गया। यद्यपि उत्तरी भारत में वैदिक धर्म ईसा से ढाई हजार साल पहले से फल-फूल रहा था तथापि ई.पू. छठी शताब्दी तक पूर्वी भारत पूर्ण रूपेण आर्य संस्कृति के प्रभाव में नहीं आया था। वह अनार्य संस्कृति का गढ़ समझा जाता था। आर्य प्रवृत्ति-मार्गी थे। वे संसार-त्याग, वैराग्य, काया-क्लेश आदि सिद्धान्तों में विश्वास नहीं करते थे।
इसके विपरीत पूर्वी भारत में उत्पन्न होने वाले जैन एवं बौद्ध मत, दोनों ही निवृत्ति-मूलक थे। यह आर्यों की प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह था। ब्राह्मणों के विरुद्ध असन्तोष का एक बड़ा कारण वेद तथा उन पर आधारित ग्रंथ थे। ब्राह्मणों की दृष्टि में वैदिक ज्ञान ईश्वर प्रदत्त था और कोई भी वेद विरुद्ध बात अधर्म थी परन्तु समाज में एक ऐसा प्रबुद्ध वर्ग तैयार हो रहा था जो वेदों को पूर्ण मानने को तैयार नहीं था।
उनकी दृष्टि में वैदिक-ज्ञान सीमित था और उसमें अनेक त्रुटियाँ थीं। उनका मानना था कि केवल वेद मन्त्रों में आस्था रखने और मन्त्रों का उच्चारण करते रहने से सभ्यता का विकास नहीं होगा। उपनिषदों में भी इसी प्रकार की भावना दिखाई पड़ती है।
बौद्ध साहित्य से ज्ञात होता है कि समाज का एक वर्ग ‘वेद प्रामाण्य’ के विषय पर ब्राह्मणों का कट्टर आलोचक था। जैन-धर्म के बाइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा तेबीसवें तीर्थंकर महावीर और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध ने भी वेदों की मान्यताओं के विरुद्ध विचार व्यक्त किए।
(8.) संस्कृत के विरुद्ध असंतोष
इस काल में बोलचाल की भाषा प्राकृत तथा पालि थी परन्तु समस्त धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में थे। धार्मिक कर्मकाण्ड भी संस्कृत भाषा में सम्पादित कराये जाते थे। केवल ब्राह्मण ही इस भाषा में व्यवहार कर सकते थे। जनसामान्य को न तो संस्कृत लिखना-पढ़ना आता था और न वह संस्कृत के मन्त्रों का अर्थ समझ पाती थी। अतः इस भाषा के विरुद्ध भी असन्तोष पनप रहा था। लोग धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए भी किसी सरल भाषा को चाहते थे ताकि वे भी धार्मिक बातों को समझ सकें।
इस प्रकार छठी शताब्दी ई.पू. तक आते-आते जनसामान्य धार्मिक रुढ़ियों तथा सामाजिक बन्धनों को तोड़ने के लिए तत्पर हो चुका था। वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों एवं वर्ण आधारित सामाजिक व्यवस्था से उसका विश्वास उठने लगा था। अतः इस समय जनसामान्य में ऐसी किसी भी नवीन धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अवतरण हो सकता था जो समाज के प्रत्येक वर्ग को एक समान समझने एवं एक समान व्यवहार करने की सुविधा देती हो।
पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी जैन धर्म के अंतिम दो तीर्थंकर हैं तथा दोनों ही जैन धर्म के सिद्धांतों एवं जैन दर्शन के प्रणेता हैं किंतु इनके दर्शन में कुछ अंतर है।
जैन-धर्म का जन्म
जैन-धर्म का जन्म कब हुआ, इसके बारे में ठीक से नहीं कहा जा सकता। जैन साहित्य के अनुसार जैन-धर्म आर्यों के वैदिक धर्म से भी पुराना है किंतु जैन-धर्म का प्रादुर्भाव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था इसलिए जैन-धर्म वैदिक धर्म से पुराना नहीं हो सका। जैन-धर्म की स्थापना एवं विकास में योग देने वाले तपस्वी सन्यासियों को तीर्थंकर कहा जाता है।
जैन-धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव तथा दूसरे तीर्थंकर अरिष्टनेमि का नाम ऋग्वेद के सूक्तों से ग्रहण किया गया है। विष्णु-पुराण एवं भागवत् पुराण में भी ऋषभदेव की कथा का उल्लेख है जहाँ ये नारायण के अवतार माने गए हैं। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। प्रथम बाईस तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि उनके बारे में निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते किंतु तेईसवें एवं चौबीसवें तीर्थंकर निश्चित रूप से ऐतिहासिक व्यक्ति थे।
भगवान पार्श्वनाथ
जैन साहित्य के अनुसार पार्श्वनाथ का जन्म महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व आठवीं सदी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका उल्लेख ब्राह्मण साहित्य में भी मिलता है। वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उनकी माता का नाम वामा था। भारतीय पुराणों में अश्वसेन नामक एक नागराजा का उल्लेख मिलता है। जैन मूर्तियों में मिलने वाला नाग पार्श्वनाथ का प्रतीक है।
पार्श्वनाथ का विवाह कुशस्थल की राजकन्या प्रभावती के साथ हुआ था। 30 वर्ष की अवस्था तक उन्होंने वैभव-विलास का जीवन व्यतीत किया। फिर गृहस्थ जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल गए। 83 दिनों की घोर तपस्या के बाद उन्हें वाराणसी के सम्मेद पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 70 वर्ष तक उन्होंने धर्म प्रचार का काम किया। 100 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित मार्ग का अनुसरण करने वाले ‘निग्रन्थ’ कहलाए, जिसका अर्थ होता है- ‘सांसरिक बन्धनों से मुक्त हो जाने वाले।’ इस प्रकार जैन-धर्म का पुराना नाम ‘निग्रन्थ धर्म’ है जिसमें राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं है।
पार्श्वनाथ के अनुयाइयों की संख्या बहुत अधिक थी। जैन साहित्य में पार्श्वनाथ की अनुयाई स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है। महावीर स्वामी के माता-पिता भी पार्श्वनाथ के अनुयाई थे। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को संगठित करके चार गणों की स्थापना की तथा उन्हें अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह नामक चार सिद्धान्तों पर चलने को कहा।
पार्श्वनाथ ने ब्राह्मणों के बहुदेववाद और यज्ञवाद का विरोध किया। वे वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते थे तथा हिंसात्मक यज्ञों के विरोधी थे। जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था में भी उनका विश्वास नहीं था। पार्श्वनाथ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है। अतः स्पष्ट है कि महावीर स्वामी, जैन-धर्म के संस्थापक नहीं थे।
उनके जन्म से सैंकड़ों वर्ष पूर्व जैन-धर्म संगठित हो चुका था। उसके अपने विधि-विधान थे। जीवन-यापन की विशेष व्यवस्था थी। उनके अपने चार संघ थे। प्रत्येक संघ एक-एक गणधर की देखरेख में काम करता था। महावीर स्वामी ने उनकी मौजूदा व्यवस्था में सुधार करके उसे लोकप्रिय बनाया। इसीलिए उन्हें जैन-धर्म का सुधारक माना जाता है।
महावीर स्वामी
जैन-धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ई.पू. 599 में वैशाली के निकट कुण्डग्राम के ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में हुआ। कुछ स्रोत महावीर का जन्म ई.पू. 540 में होना बताते हैं। उनके पिता सिद्धार्थ, ज्ञातृक क्षत्रियों के छोटे से राज्य कुण्डग्राम के राजा थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था जो लिच्छवी वंश के प्रसिद्ध राजा चेटक की बहिन थी।
महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धनाम था। उनके जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि बड़ा होने पर वह या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा अथवा परमज्ञानी भिक्षु। वर्धमान को बाल्यकाल में क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई। युवावस्था में उनका विवाह यशोदा नामक सुन्दर राजकन्या के साथ किया गया।
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इस वैवाहिक सम्बन्ध से उनके एक पुत्री भी हुई जिसका विवाह जमालि नामक क्षत्रिय सरदार के साथ किया गया। वर्धमान जब 30 वर्ष के हुए तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इस घटना से उनकी निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति और अधिक मजबूत हो गयी। उन्होंने अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर घर त्याग दिया और भिक्षु बन गए। महावीर ने तेरह माह तक भिक्षु के वस्त्र धारण करके घोर तपस्या की। परन्तु उन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली। इस पर उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के सम्प्रदाय को छोड़़ दिया और अकेले ही तपस्या करने लगे। उनके वस्त्र जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गए तब वर्धमान निर्वस्त्र रहने लगे। उनके नग्न शरीर को कीट-पतंग काटने लगे परन्तु वे पूर्णतः उदासीन रहे। बारह वर्ष तक शरीर की उपेक्षा कर वे सब प्रकार के कष्ट सहते रहे। उन्होंने संसार के समस्त बन्धनों का उच्छेद कर दिया। संसार से वे सर्वथा निर्लिप्त हो गए। अन्त में जम्भियग्राम (जृम्भिका) के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) सरिता के तट पर महावीर को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। तभी उन्हें ‘केवलिन्’ की उपाधि मिली। इन्द्रियों को जीत लेने के कारण वे ‘जिन’ कहलाए। साधना में अपूर्व साहस दिखलाने के लिए वे महावीर कहलाए। समस्त सांसारिक बन्धनों को तोड़ देने से वे ‘निग्रन्थ’ कहलाए।
सत्य का ज्ञान हो जाने के बाद महावीर ने जनसामान्य को जीवनयापन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया। वे अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्थान-स्थान पर घूमने लगे। मगध, काशी, कोसल आदि राज्य उनके प्रचार क्षेत्र थे। महावीर स्वामी का कई राजवंशों से निकट का सम्बन्ध था, इसलिए उन्हें अपने विचारों के प्रचार में उन राजवंशों से काफी सहायता मिली।
उनकी सत्यवाणी तथा जीवन के सरल मार्ग से प्रभावित होकर सैंकड़ों लोग उनके अनुयाई बन गए। राजा-महाराजा, वैश्य-व्यापारी तथा अन्य लोग उनके उपदेशों का अनुसरण करने लगे और धीरे-धीरे उनके अनुयाइयों की संख्या काफी बढ़ गई। जैन साहित्य के अनुसार लिच्छवी का राजा चेटक, अवन्ती का प्रद्योत, मगध के राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु, चम्पा का राजा दधिवाहन और सिन्धु-सौबीर का राजा उदयन सहित अनेक तत्कालीन राजा, महावीर स्वामी के अनुयाई थे। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार बिम्बिसार और प्रद्योत, महात्मा बुद्ध के अनुयाई थे।
इससे पता चलता है कि उस युग के हिन्दू शासक धार्मिक दृष्टि से काफी उदार तथा सहिष्णु थे और वे ज्ञानी पुरुषों का समान रूप से आदर करते थे। इसी कारण जैन और बौद्ध दोनों धर्मों ने उन्हें अपना-अपना अनुयाई मान लिया। अन्त में ई.पू.527 में 72 साल की आयु में पावापुरी (पटना) में महावीर स्वामी को मोक्ष प्राप्त हुआ। कुछ स्रोत उनका निधन ई.पू. 467 में होना मानते हैं। उनके निधन के बाद भी जैन-धर्म उनके बताए सिद्धांतों पर चलता रहा तथा उनके मुख्य शिष्य जैन-संघ का प्रबंध करते रहे।
पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी के दर्शन में अंतर
भगवान पार्श्वनाथ तथा महावीर स्वामी के सिद्धान्तों में विशेष अंतर नहीं था। पार्श्वनाथ ने चार व्रतों की आवश्यकता पर जोर दिया था, महावीर स्वामी ने उनके साथ ‘ब्रहाचर्य’ नामक एक और व्रत जोड़ दिया। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को वस्त्र पहनने की स्वीकृति दे दी थी परन्तु महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुओं को निर्वस्त्र रहने को कहा। महावीर अपने बताए सिद्धांतों में से दो सिद्धांतों- ब्रह्मचर्य एवं वैराग्य पर अधिक जोर देते थे।
जैन गण
महावीर के शिष्यों में साधु एवं गृहस्थ, स्त्री एवं पुरुष, धनी एवं निर्धन सभी थे। ये शिष्य आगे चलकर 11 समूहों में बंट गए जिन्हें ‘गण’ कहते थे। प्रत्येक समूह का नेता ‘गणधर’ कहलाता था। इस प्रकार के 13 गणों का उल्लेख पाया जाता है।
जैन-धर्म के सिद्धान्त बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की अपेक्षा थोड़े क्लिष्ट हैं। इस कारण जन साधारण की समझ में नहीं आते हैं। इसी कारण जैन धर्म को बौद्ध धर्म की अपेक्षा कम लोकप्रियता प्राप्त हुई।
निवृत्ति मार्ग
जैन धर्म, आर्यों के प्रवृत्तिमूलक धर्म के विरुद्ध निवृत्तिमार्गी था। वह आर्यों की भाँति इस संसार के समस्त सुखों की कामना नहीं करता। उसके लिए संसार के समस्त सुख, दुःखमूलक तथा व्याधि रूप हैं। क्योंकि संसार के सुखों को भोगने से कामनाएँ शान्त नहीं होतीं, अपितु बढ़ती हैं।
मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से पीड़ित है। गृहस्थ जीवन में भी सुख-शान्ति नहीं है। जैन-धर्म के अनुसार सारा संसार दुःखमय है। इस दुःख का कारण कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा है जिससे मनुष्य आजीवन घिरा रहता है। बौद्ध धर्म की भाँति जैन-धर्म की मुख्य समस्या भी दुःख और दुःख-विरोध हैं। जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य का सुख सांसारिक सुखों को भोगने में नहीं है अपितु इस संसार को त्यागने में है।
मनुष्य को सब कुछ त्यागकर, कभी अन्त न होने वाले दुःखों को त्यागकर, संसार से कोई सम्बन्ध न रखकर तथा भिक्षु बनकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। इस प्रकार जैन-धर्म वस्तुतः भिक्षु धर्म है। यह निवृत्ति मार्ग है जो आर्यों की प्रवृत्तिमूलक विचारधारा के विपरीत था।
जीव और अजीव
महावीर के अनुसार सम्पूर्ण दृश्य जगत् ‘जीव’ और ‘अजीव’ नामक दो तत्त्वों में विभक्त है। ये दोनों ही तत्त्व शाश्वत हैं, अनादि और अनन्त हैं। इनसे ही मिलकर यह जगत् बनता है। इसलिए जगत भी अनादि और अनन्त है। जीव तथा अजीव का कर्त्ता कोई नहीं है। जीव चैतन्य द्रव्य है और अजीव चैतन्य रहित है। जैन-धर्म में आत्मा के अस्तित्त्व को विश्वास सहित और ज्ञानपूर्वक माना गया है।
जीव ही आत्मा है तथा यह सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। जीव का विस्तार शरीर के अनुसार होता है। इसका कार्य अनुभूति है अर्थात् जीव को सुख दुःख सन्देह, ज्ञान आदि का अनुभव होता है। जीव, अजीव के ढाँचे (शरीर) में रहता है। अजीव अवस्था अर्थात् जड़ पदार्थ को पुद्गल कहते हैं। पुद्गल उस वस्तु को कहते हैं जिसे जोड़कर बड़ा किया जा सके अथवा तोड़कर छोटा किया जा सके।
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इसके सबसे लघुत्तम भाग अर्थात् परमाणुओं के आपस में मिलने से भौतिक संसार के विभिन्न रूप बनते हैं, जिनके पाँच गुण हैं– स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द। इस प्रकार, जीव और अजीव के मिलने से जगत् की रचना होती है। जीव और अजीव के सम्बन्ध का माध्यम कर्म है। पुद्गल ही कर्म है जो जीव को घेरे रहता है जैसे खान के भीतर धातु मिट्टी में मिली रहती है, इसी प्रकार जीव इस कर्म नामक बारीक ‘मैटर’ से सना रहता है। वह हर समय जीवन से चिपटा रहता है। कर्म, जीव पर रूप, रंग, रस और गन्ध की विशिष्ट छाप लगाते हैं जिसे ‘लेश्या’ कहते हैं। इनसे पृथक होना अर्थात् पुद्गल से अलग होना, कर्म के बन्धन को तोड़ना है। कर्म के बन्धन को तोड़ने का अर्थ है- जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना। इसी का नाम मोक्ष है। इस प्रकार जीव के दो रूप होते हैं- मुक्त जीव और बद्ध जीव। जो जीव त्रिरत्न तथा पंचव्रतों के पालन के कारण जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए, वे मुक्त जीव हैं किंतु जो जीव जन्म-मरण के बंधने में बंधे होते हैं, वे बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव भी दो प्रकार के होते हैं- स्थावर एवं जंगम। जल, पृथ्वी, वायु और वनस्पति स्थावर जीव हैं जिनमें एक ही इन्द्रिय होती है। मुष्य, पशु और पक्षी जंगम जीव हैं जिनमें पांच इंद्रियां होती हैं।
अजीव अचेतन तत्त्व हैं इसके अंतर्गत पांच पदार्थ आते हैं- धर्म, अधर्म, काल, आकाश तथा पुद्गल। यह समस्त संसार जीव एवं अजीव के घात-प्रतिघात से संचालित होता है।
बन्ध और मुक्ति
बन्ध के दो मुख्य कारण हैं- राग और द्वेष। इनसे ही चार कषायों- क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय एवं विकास होता है। राग और द्वेष जीव में आसक्ति या कामना उत्पन्न करते हैं। इससे जीव अपना विवेक खो बैठता है और संसार में भटकता रहता है। वह राग और द्वेष से उत्पन्न कषायों- हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ आदि का आश्रय लेता है।
जैन आगम में कर्म, ‘क्रिया’ को नहीं कहते अपितु ‘पुद्गल-परमाणुओं’ को कहते हैं। पुद्गल-परमाणुओं का बहना या बनना ‘आश्रव’ कहलाता है। यही आश्रव व्यक्ति के कर्मबन्ध का कारण होता है। वह हिंसा आदि को सत्य और पाने योग्य समझकर आचरण करता है तथा कर्मों के बन्धनों में बंध जाता है। इसी को बन्ध कहते हैं। आश्रव और बन्ध पुनर्जन्म के मुख्य कारण हैं।
राग और द्वेष दुःख ही पैदा नहीं करते, सुख भी पैदा करते हैं। जो कर्म दुःख के कारण होते हैं उन्हे पाप कहा जाता है और सुख के कारण होते है उन्हें पुण्य कहा जाता है। पाप और पुण्य दोनों का जन्म आसक्ति के कारण होता है। ‘पुण्य-बन्ध’ से जीव का जो शरीर बनता है वह ‘पाप-बन्ध’ से बनने वाले शरीर से भिन्न किस्म का होता है।
‘पाप बन्ध’ की अवस्था में जीव पूर्ण रूप से ‘कषाय-ग्रस्त’ हो जाता है परन्तु ‘पुण्य-बन्ध’ की अवस्था में ‘कषाय’ जीव की विवेक शक्ति को पूरी तरह से नहीं दबा पाते। ‘पुण्य-बन्ध’ की अवस्था में जीव में यह विवेक बना रहता है कि क्या चीज ग्रहण करने योग्य है और क्या त्याज्य है? इस प्रकार की जिज्ञासा का उदय ही राग-द्वेष पर रोक लगाता है।
इस रोक को ‘संवर’ कहते हैं। संवर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संचित कर्म कटते हैं या नष्ट हो जाते हैं। कर्म-नाश की इस प्रकिया को ‘निर्जरा’ कहते हैं। पूर्ण निर्जरा की स्थिति का ही दूसरा नाम ‘मुक्ति’ है।
मोक्ष अथवा निर्वाण
राग-द्वेष या आसक्ति के बन्धन से मुक्ति ही ‘मोक्ष’ है। मोक्ष का ही दूसरा नाम ‘निर्वाण’ है। निर्वाण, जैन-धर्म का चरम लक्ष्य है। इसके लिए कर्म-फल से मुक्ति पाना आवश्यक है। निर्वाण की अवस्था में मनुष्य समस्त प्रकार की कामनाओं से मुक्त होकर अन्नत शान्ति को प्राप्त करता है।
निर्वाण का अर्थ अस्तित्त्व की समाप्ति नहीं है। इसका अभिप्राय जीव के भौतिक अंश अर्थात् पुद्गल के विनाश से है। जीव का आत्मिक तत्त्व कभी समाप्त नहीं होता। निर्वाण का अर्थ शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता भी नहीं है। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति विशुद्ध रूप में देख-सुन सकता है।
जैन-धर्म के सिद्धान्त – त्रिरत्न
जीव के लिए कैवल्य अथवा मोक्ष की प्राप्ति सरल नहीं है। महावीर ने कैवल्य प्राप्ति के लिए तीन साधन बताए जो जैन-धर्म में ‘त्रिरत्न’ के नाम से प्रसिद्ध हैं- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र। जैन-धर्म के अनुसार पूर्व जन्म के कर्म-फल को नष्ट करने तथा इस जन्म के कर्म-फल से बचने के लिए ‘त्रिरत्नों’ का पालन करना आवश्यक है। इसी से मनुष्य निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है।
(1.) सम्यक ज्ञान
सम्यक ज्ञान का अर्थ है सही विचार अर्थात् सत् और असत् का भेद समझ लेना। जैन-धर्म के अनुसार तीर्थंकरों की शिक्षाओं के ध्यानपूर्वक अध्ययन से सत् और असत् का भेद ग्रहण हो जाता है। यह सत्य और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक् ज्ञान है।
ज्ञान पाँच प्रकार का होता है-
1. मति ज्ञान- जो इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होता है, जैसे नाक के द्वारा गन्ध का ज्ञान होना।
2. श्रुति ज्ञान- वह ज्ञान जो सुनकर अथवा वर्णन के द्वारा प्राप्त होता है। इसे शास्त्र ज्ञान भी कहते हैं।
3. अवधि ज्ञान- अर्थात् दूर देश और काल का ज्ञान।
4. मन पर्याय- अन्य व्यक्तियों के भावों और विचारों को जान लेने वाला ज्ञान और
5. केवल्य ज्ञान- देश-काल की सीमाओं से परे का सम्पूर्ण ज्ञान। यह पूर्ण ज्ञान है, जो निग्रन्थों को प्राप्त होता है।
जीव में पूर्ण ज्ञान रहता है परन्तु भौतिक आवरण के कारण वह छिप जाता है। भौतिक तत्त्व का नाश होते ही जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह निग्रन्थ हो जाता है।
(2.) सम्यक् दर्शन
सम्यक् दर्शन का अर्थ है- यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा। तीर्थंकरों और जैन शास्त्रों में निहित ज्ञान के प्रति संशय रहित पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा ही सम्यक् दर्शन है। इसके आठ अंग हैं- (1.) सन्देह अथवा संशय को दूर करना, (2.) सांसारिक सुखों की इच्छा को दूर करना, (3.) आसक्ति-विरक्ति को दूर करना, (4.) गलत रास्ते से दूर रहना, (5.) मिथ्या धारणाओं से दूर रहना, (6.) सही विश्वास पर जमे रहना, (7.) समस्त प्राणियों से समान प्रेम रखना और (8.) जैन-धर्म के सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था रखना।
इन आठ अंगों का पालन करने के लिए तीन प्रकार की गलतियों से बचना आवश्य है- (1.) अन्ध-विश्वास से बचना (2.) देवी-देवताओं के पूजन से पुण्य प्राप्ति की आशा से बचना और (3.) कपटी साधु सन्तों के कपटजाल से बचना।
(3.) सम्यक चरित्र
तीर्थंकरों द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलकर नैतिक एवं सदाचार पूर्ण जीवन-यापन करना ही सम्यक चरित्र है। इन्द्रियाँ जीव के बाह्य उपकरण हैं और इनकी सहायता से वह बाह्य जगत की जानकारी प्राप्त करता है।
उदाहरण के लिए आँख का काम है देखना। प्रत्येक जीव सुन्दर दृश्य को देखना पसन्द करेगा और असुन्दर दृश्य से आँखें हटा लेगा अर्थात् सुन्दर दृश्य में उसकी आसक्ति है परन्तु जो जीव सुन्दर-असुन्दर के भेद के प्रति उदासीन होकर अनासक्त हो जाता है, उसके लिए समस्त दृश्य एक समान हो जाते हैं। इसी को सम्यक-आचरण कहते हैं।
बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम-दुःख-सुख-भाव ही सम्यक आचरण है और इसी को सम्यक-चरित्र कहते हैं। सम्यक् चरित्र के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पंच अणुव्रतों का पालन किया जाना चाहिए। पंचव्रत के पालन में महावीर ने गृहस्थों और यतियों में भेद किया है। क्योंकि ये दोनों एक जैसे नियम नहीं पाल सकते। सामान्य श्रावक के लिए ये पंच-अणुव्रत रूप में और मुनियों के लिए पंच-महाव्रत के रूप में हैं।
जैन-धर्म के सिद्धान्त – पंच अणुव्रत
(1.) अहिंसा अणुव्रत: निरपराध को दण्डित या पीड़ित नहीं करना।
(2.) सत्य अणुव्रत: प्रेम, द्वेष एवं उद्वेग आदि वृत्तियों को संयमित करके सच बोलना।
(3.) अस्तेय अणुव्रत अथवा अचौर्याणुव्रत: किसी की वस्तु न चुराना और कोई पड़ी हुई वस्तु न उठाना।
(4.) ब्रह्मचर्य अणुव्रत: अपने दाम्पत्य में संतुष्ट रहना तथा मन-वचन-कर्म से पर-स्त्री या पर-पुरुष से सम्पर्क न रखना।
(5.) अपरिग्रह अणुव्रत अथवा परिग्रह परमाणु व्रत: आवश्यकता से अधिक धन तथा धान्य का संग्रह नहीं करना।
जैन यतियों एवं साधुओं के लिए निर्धारित पंचव्रत, पंच महाव्रत कहलाते हैं।
जैन-धर्म के सिद्धान्त – पंच महाव्रत
(1.) अहिंसा
मन, वचन और कर्म से किसी का अहित नहीं करना ही अहिंसा है। अहिंसा का उपदेश ही महावीर स्वामी की शिक्षाओं और जैन-धर्म के सिद्धान्तों का मूल मन्त्र है। अहिंसा का व्यापक अर्थ प्राणी-मात्र के प्रति दया, समानता और उपकार की भावना रखने से है। गृहस्थों के लिए पूर्ण अहिंसाव्रत धारण करना कठिन है, इसलिए उनके लिए स्थूल अहिंसा का विधान किया गया है जिसका अर्थ है- निरपराधियों की हिंसा नहीं करना।
(2.) सत्य
महावीर स्वामी ने सत्य वचन पर अत्यधिक जोर दिया, क्योंकि बिना सत्य भाषण के अहिंसा का पालन सम्भव नहीं है। महावीर स्वामी का उपदेश था कि मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए।
(3.) अस्तेय
अस्तेय का अर्थ है- ‘जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे ग्रहण नहीं करना।’ महावीर स्वामी ने चोरी को महान् अनैतिक कार्य बताया तथा इससे दूर रहने को कहा। उन्होंने गृहपति की अनुमति के बिना किसी के घर में नहीं जाने तथा भिक्षा में प्राप्त अन्न को गुरु की इच्छा के बिना ग्रहण न करने को भी अस्तेय में सम्मिलित किया।
(4.) अपरिग्रह
अपरिग्रह का अर्थ है– ‘संग्रह न करना’ और इसका व्यापक अर्थ है- ‘किसी भी वस्तु में ममत्व नहीं रखना।’ महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नहीं रखता, वह संसार के मायाजाल से दूर रहता है।
(5.) ब्रह्मचर्य
पार्श्वनाथ ने उपरोक्त चार महाव्रत ही बताए थे, महावीर स्वामी ने चार व्रतों में पाँचवाँ व्रत जोड़कर इन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति का साधन बताया। ब्रह्मचर्य का अर्थ विपरीत लिंगी शरीर से दूर रहना होता है।
जैन-धर्म के सिद्धान्त – सात शील व्रत
महावीर के धर्म में पाँच व्रतों के साथ-साथ सात शील व्रतों के पालन का भी निर्देशन किया गया-
(1.) दिग्व्रत: अपनी क्रिया को कुछ विशिष्ट दिशाओं में सीमित करना।
(2.) देशव्रत: अपना कार्य कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित रखना।
(3.) अनर्थ दण्डव्रत: बिना कारण अपराध का भागी न बनाना।
(4.) सामयिक: अपने ऊपर विचार करने के लिए समय का कुछ भाग निश्चित करना।
(5.) प्रोषधोपवास: प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की अष्टमियों और चतुर्दशियों को उपवास करना।
(6.) उपभोग-प्रतिभोग परिणाम: दैनिक उपभोग की वस्तुओं और पदार्थों को नियमित करना।
(7.) अतिथि संविभाग: घर आए साधु या उपासक को भोजन कराने के बाद भोजन करना।
पाँच समिति
जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में पाँच बातों की सतर्कता बरतनी चाहिए-
(1.) ईर्या समिति: चलते-फिरते समय सावधानी रखना ताकि किसी जीव को कष्ट न पहुंचे।
(2.) भाषा समिति: बोलते समय सावधानी रखना ताकि किसी मानव को ठेस न पहुँचे।
(3.) एषणा समिति: खाना खाते समय सावधानी बरतना ताकि कोई जीव न मरे।
(4.) आदान निक्षेप समिति: वस्तुओं को उठाते, रखते और प्रयोग करते समय सावधानी रखना जिससे दूसरे को कष्ट न हो।
(5.) उत्सर्ग समिति: मल-मूत्र त्याग में सावधानी रखना तथा गन्दगी न फैलाना।
जैन-धर्म के सिद्धान्त – अनेकान्तवाद अथवा स्याद् वाद
जैन दर्शन के अनुसार वस्तु के अनन्त स्वरूप हैं। ज्ञानी अथवा अर्हत् या जीवनमुक्त व्यक्ति ही उन वस्तुओं की अनन्त्ता को जान सकते हैं। सामान्य जन वस्तु के कुछ स्वरूपों को ही जानते हैं। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है-
(1.) है,
(2.) नहीं है,
(3.) है और नहीं है,
(4.) कहा नहीं जा सकता,
(5.) है, किन्तु कहा नहीं जा सकता,
(6.) नहीं है और कहा नहीं जा सकता,
(7.) है और नहीं है, किन्तु कहा नहीं जा सकता।
जैन-धर्म में इसे अनेकान्तवाद, स्याद्वाद अथवा सप्त-भंगी का सिद्धान्त कहते हैं। यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति किसी एक स्वरूप को जाने हुए हो और दूसरा किसी और स्वरूप को।यह भी सम्भव है कि वक्ता जाने हुए स्वरूप को भी आवश्यकतानुसार अंशमात्र ही कहे। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के इस प्रकार के कथन परस्पर-विरोधी प्रतीत हो सकते हैं।
जबकि वे अपनी-अपनी दृष्टि से ठीक हैं। यदि मनुष्य तटस्थ भाव से उसी वस्तु का दर्शन करता है और जैसी वह उसे दिखाई देती है, वह वैसी ही उसे बताता है तो वह बताना सत्य ही कहा जाएगा, असत्य नहीं। समझ और विवेक के परिणाम की भिन्नता के कारण स्वरूप को समझने में कल्पना की अधिकता रहेगी ही।
अनेकान्तावाद अथवा स्यादवाद इसी दृष्टि को जगाता है। वस्तु के अनेक स्वरूपों को जानने के लिए ‘आविष्ट बुद्धि’ नहीं अपितु ‘निर्मल बुद्धि’ चाहिए। यदि बुद्धि निर्मल है तो विविधता चाहे भाव की हो या विचार या कर्म की हो, वह विचित्र न लग कर स्वाभाविक लगेगी। स्याद्वादी वही हो सकता है जो निर्मल अन्तःकरण वाला है, प्रशान्त है और जिसकी संवेदना सूक्ष्म को ग्रहण करती है।
तपस्या और उपवास
महावीर ने आत्मा को वश में करने तथा पाँच आचरणों का पालन करने में तपस्या और उपवास पर सर्वाधिक बल दिया। उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बताई- एक बाह्य तथा दूसरी आन्तरकि। बाह्य तपस्या में व्रत, अन्न त्याग, भिक्षाचार्य तथा कष्ट सहन करना मुख्य हैं। आन्तरिक तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान तथा शरीर त्याग सम्मिलित है।
बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में आन्तरिक तपस्या करने की क्षमता आती है और उससे आदमी में अच्छे विचारों का विकास होता है। महावीर स्वामी ने तपस्या का सबसे सरल उपाय उपवास बताया है। इससे शरीर एवं आत्मा शुद्ध होते हैं और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।
जैन धर्म विश्व के सबसे पुराने धर्मों में से है। वर्तमान समय में जैन-धर्म के सिद्धांत, दर्शन एवं मान्यताओं पर महावीर स्वामी का प्रभाव सबसे अधिक है।
महावीर स्वामी की मान्यताएँ
महावीर स्वामी ने जैन-धर्म के सिद्धांत निर्धारित करने से पहले, उस युग में प्रचलित धार्मिक और सामाजिक बुराइयों के सम्बन्ध में कई बातें कहीं-
(1.) वेदों के ज्ञान में विश्वास नहीं
महावीर स्वामी ने जीवन में नैतिकता का पालन करने पर जोर दिया तथा ब्राह्मण धर्म के सिद्धांतों, वेदों, यज्ञों और कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनका कहना है था कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि वैदिक ज्ञान ही एकमात्र पूर्ण और निर्विवाद है। उनके अनुसार वेद ईश्वरीय कृति न होकर मानवीय कृति थे। अहिंसावादी होने के कारण महावीर, हिंसक यज्ञों को स्वीकार नहीं कर सकते थे। उनके अनुसार यज्ञ तथा कर्मकाण्ड यांत्रिक थे और उनसे मनुष्य की अन्तःशुद्धि सम्भव नहीं थी।
(2.) ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं
महावीर का विचार था कि मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान् है और शक्ति तथा नैतिकता है, वही भगवान् है। इसके आधार पर माना जाता है कि जैन-धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करता तथा वह ईश्वर को सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। जैन-धर्म के अनुसार संसार वास्तविक है और इसका कभी भी विनाश नहीं होता।
संसार छः द्रव्यों का समुच्चय है। ये द्रव्य हैं- (1.) जीव, (2.) पुद्गल, (3.) धर्म, (4.) अधर्म, (5.) आकाश और (6.) काल। ये समस्त द्रव्य शाश्वत, नित्य और अनश्वर हैं। अतः सृष्टि भी अनादि और अनन्त है। उपरोक्त द्रव्यों के संगठन एवं विघटन के कारण इनसे निर्मित पदार्थों के रूप में परिवर्तन होता रहता है।
(3.) आत्मा के अस्तित्त्व में विश्वास
महावीर आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तन हो सकते हैं किन्तु आत्मा अजर-अमर है और सदैव एक सी बनी रहती है। वे जीव को ही आत्मा मानते हैं और उनके अनुसार जीव केवल मनुष्य, पशु और वनस्पति में ही नहीं है, अपितु विश्व के कण-कण में समाया है।
(4.) कर्मफल एवं पुनर्जन्म में विश्वास
महावीर स्वामी का मानना था कि यदि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो कर्मों के बन्धन नष्ट हो सकते हैं और निर्वाण प्राप्त हो सकता है। उनका उपदेश था-‘मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्म-फल का नाश करे और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्म-फल संगृहीत न करे, ऐसा करने से मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी।’
इसका अर्थ यह हुआ कि जैन-धर्म कर्म-फल एवं पुनर्जन्म दोनों में विश्वास रखता है। मनुष्य की उन्नति-अवनति स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर करती है। किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं हो सकता। इस प्रकार, कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है।
(5.) सामाजिक समानता में विश्वास
महावीर स्वामी ने आर्यों की वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और जैन-धर्म का द्वार बिना किसी भेदभाव के समस्त वर्णों के लिए खोल दिया। उनकी मान्यता थी कि समस्त देहधारियों की आत्मा एक जैसी है तथा निर्वाण व्यक्तिगत पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
इसलिए मोक्ष प्राप्ति के सम्बन्ध में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। महावीर स्वामी के बाद उनके अनुयाई समानता के इस सिद्धान्त को व्यवहार में नहीं ला सके और उनमें जाति-भेद के संस्कार विद्यमान रहे। यही कारण है कि जैन-धर्म शूद्र कही जाने वाली जातियों को नहीं अपना सका।
(6.) स्त्री स्वातन्त्र्य में विश्वास
बाईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने स्त्रियों को निर्वाण-प्राप्ति की अधिकारिणी माना था। महावीर स्वामी ने भी उनके इस विचार का अनुसरण किया तथा अपने धर्म तथा संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिए। इस कारण अनेक स्त्रियों ने जैन-धर्म की दीक्षा ली। पुरुषों की भाँति स्त्रियों के भी दो वर्ग थे- एक श्रमणियों का और दूसरा श्राविकाओं का। इन्हें भी उपासना करने तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करने का अधिकार था।
जैन-धर्म का संगठन
अनुश्रुति के अनुसार महावीर स्वामी के शिष्य समुदाय में 14 हजार श्रमण, 36 हजार श्रमणियाँ, 1 लाख 69 हजार श्रावक तथा 3 लाख 18 हजार श्राविकाएं थीं। महावीर ने पावापुरी में जैन-संघ की स्थापना की जिसके अध्यक्ष वे स्वयं थे। महावीर स्वामी के जीवन में 11 गणधर अर्थात् मुख्य प्रचारक थे। जब महावीर का निधन हुआ तब केवल केवल एक गणधर सुधर्मन् ही जीवित बचे थे।
अगले 22 वर्ष तक यही सुधर्मन् जैन संघ के अध्यक्ष रहे। तदनंतर जम्बू स्वामी जैन संघ के नायक हुए जो लगभग 44 वर्षों तक जैन संघ के प्रमुख रहे। उन्होंने मथुरा तथा शूरसेन में जैन-धर्म का व्यापक प्रचार किया। उनके उपरांत जैन संघ का विशेष विवरण प्राप्त नहीं होता। मगध के अंतिम नंद शासक के समय सम्भूति विजय जैन संघ के अध्यक्ष थे।
उनके बाद भद्रबाहु जैन संघ के छठे अध्यक्ष हुए जो सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे। भद्रबाहु ने जैन-धर्म के प्रमुख ग्रंथ कल्पसूत्र की रचना की। इसमें तेईस तीर्थंकरों की जीवनियां, जैन संघ के प्रमुखों तथा मतों के विवरण हैं एवं जैन साधुओं के लिए बनाए गए नियम लिखे हुए हैं। जैन-धर्म के इतिहास में आचार्य भद्रबाहु का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
जैन-धर्म का प्रचार एवं प्रसार
महावीर स्वामी के प्रयत्नों से जैन-धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से आरम्भ हुआ। लोगों द्वारा इस धर्म को तेजी से अपनाने के कई कारण थे-
(1.) इसका मुख्य कारण स्वयं महावीर स्वामी का इसके प्रचार-प्रसार में भाग लेना था। वे स्वयं साल के आठ माह तक स्थान-स्थान पर घूम-घूमकर अपने मत का प्रचार करते थे तथा वर्षा ऋतु के चार मास किसी एक स्थान पर बिताते थे।
(2.) महावीर स्वामी ने जन-भाषा ‘पालि’ में अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया जिससे लोगों ने उनके उपदेशों एवं विचारों को बड़ी सरलता से समझ लिया। अन्य लोक-भाषाओं में जैन-धर्म के साहित्य की रचना हुई जिससे यह धर्म आसानी से लोकप्रिय बन गया।
(3.) जैन-धर्म के शीघ्र प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक समानता की भावना थी। महावीर ने अपने धर्म का द्वार समस्त जाति के लिए समान रूप से खोल रखा था। इस कारण वैदिक धर्म की कठोर वर्ण व्यवस्था में उपेक्षित अनुभव कर रहे लोगों ने महावीर के विचारों को अपना लिया।
(4.) जैन-धर्म के प्रचार-प्रसार में महावीर स्वामी द्वारा संस्थापित जैन-संघों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
(5.) जैन-धर्म के दार्शनिक ग्रंथों ने इस धर्म को जनता की दृष्टि में आदरणीय बना दिया। जैन मुनि इन्द्रभूति, वायुभूति, भद्रबाहु, जिनसेन, गुणभद्र, हेमचन्द्र आदि ने विविध ग्रन्थों की रचना करके इसके प्रचार-प्रसार में विपुल योगदान दिया।
(6.) महावीर की सफलता को ब्राह्मणों के विरुद्ध क्षत्रियों की सफलता के रूप में देखा गया। इस भावना से प्रेरित होकर बहुत से राजाओं, राजपुत्रों एवं क्षत्रियों ने इस धर्म को अपना लिया।
(7.) महावीर स्वामी राजवंश से सम्बन्धित थे और भारत में कई राजवंशों के साथ उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस कारण इस धर्म को राज्याश्रय मिल गया जिसने इस धर्म के प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। ईस्वी सन् के प्रारम्भ होने तक जैन-धर्म लगभग सम्पूर्ण भारत में फैल गया किंतु जैन-धर्म का प्रसार बौद्ध धर्म तथा वैष्णव धर्म की भाँति नहीं हो पाया।
समय-समय पर इसका विकास अवरुद्ध भी होता रहा किंतु यह भारत में स्थायित्व प्राप्त करने में सफल रहा। राजपूतकाल में इसका आंशिक रूप में पुनरुत्थान भी हुआ। आज भी महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात सहित भारत के अनेक प्रांतों में जैन-धर्म के लगभग 45 लाख अनुयाई निवास करते हैं। भारत की जनसंख्या में इनका योगदान लगभग 0.4 प्रतिशत है।
जैन-धर्म को राज्याश्रय
महावीर स्वामी ने समकालीन मगध शासकों- बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदायीभद्र अथवा उदयन ने जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया। अवन्ती, वत्स, अंग, चम्पा, सौबीर आदि राज्यों के शासकों ने भी इसे स्वीकार कर इसके प्रसार में सहयोग दिया। वज्जि, लिछच्वी एवं मगध वंश से महावीर का पारिवारिक सम्बन्ध होने से उस पूरे क्षेत्र में जैन-धर्म का तेजी से प्रसार हुआ।
सिकन्दर के आक्रमण के समय जैन साधु सिंधु-नदी के तट तक विद्यमान थे। जैन जैन ग्रंथों के अनुसार सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम समय में जैन-धर्म स्वीकार कर लिया था। मौर्य-सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रपौत्र सम्प्रति ने जैन-धर्म को दक्षिण भारत में फैलाने में सहयोग दिया। ईसा पूर्व द्वितीय शती में कलिंगराज खारवेल ने जैन-धर्म ग्रहण किया और विशाल जैन प्रतिमा का निर्माण करवाया।
उज्जैन नरेश गर्दभिल्ल, उसके पुत्र विक्रम तथा जैन मुनि कालकाचार्य के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व पहली शती में मालवा की राजधानी उज्जैन इस धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र थी। कुषाण नरेशों के समय मथुरा में जैन-धर्म का खूब प्रसार हुआ। पांचवीं से बारहवीं शती ईस्वी तक दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चौलुक्य तथा राष्ट्रकूट राजाओं ने जैन-धर्म को आश्रय एवं प्रोत्साहन दिया।
राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष (ई.814-74) ने जैन-धर्म के प्रचार में विशेष रुचि दिखाई। चौलुक्य राजा सिद्धराज एवं उसके पुत्र कुमारपाल, जैन-धर्म के महान् संरक्षक थे। हेमचंद्र नामक प्रसिद्ध जैन मुनि कुमारपाल की सभा में ही था।
राजपूत काल में अनेक चौहान, प्रतिहार, परमार आदि राजपूत राजा भी जैन-धर्म के प्रति आदर का भाव रखते थे और जैन मंदिरों तथा उपाश्रयों को भूमि एवं भेंट आदि प्रदान करते थे। जब भारत भूमि पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हो गए तब राजपूत राजाओं ने जैन-धर्म को संरक्षण देना लगभग समाप्त कर दिया। इससे जैन-धर्म की क्षति हुई।
जैन-धर्म में विभाजन
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महावीर स्वामी के जीवनकाल में ही जैन-धर्म में मतभेद उत्पन्न हो गया। स्वयं उन्हीं के दामाद जमालि क्षत्रिय का महावीर स्वामी से ‘क्रियमाणकृत’ के सिद्धान्त पर मतभेद हो गया और वह जैन-संघ से अलग हो गया। महावीर स्वामी की पुत्री ‘प्रियदर्शना’ भी लगभग 1000 भिक्षुणियों के साथ जैन-संघ से पृथक हो गई परन्तु कालान्तर में वह अपनी समस्त अनुयाइयों के साथ संघ में वापस लौट आई। इस घटना से जैन-धर्म के प्रचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। महावीर स्वामी के बाद जैन यातियों में भी आचार सम्बन्धी परिवर्तन होने लगे। महावीर के निर्वाण के 160 वर्ष पश्चात् मगध में 12 वर्ष का लम्बा अकाल पड़ा जिसके फलस्वरूप बहुत से जैन भिक्षुओं को आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़़कर मैसूर चले जाना पड़ा। बहुत से जैन साधु, आचार्य सम्भूति विजय के शिष्य स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रह गए। मगध के इस जैन समुदाय ने प्राचीन जैन ग्रंथों के संकलन के लिए पाटलिपुत्र में एक सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में द्वादष अंगों का संकलन किया गया जिन्हें जैन-धर्म के सिद्धांतों का महत्त्वपूर्ण संकलन माना जाता है। इस संकलन के समय महावीर के बताए सिद्धांतों में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए। प्राचीन जैन साधु नग्न रहते थे परन्तु अब कुछ साधु वस्त्र धारण करने लगे।
इस सम्मेलन को ‘प्रथम जैन परिषद्’ एवं ‘पाटलिपुत्र-वाचना’ कहा जाता है। अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ पाटलिपुत्र आए तो उन्होंने इन परिवर्तनों को स्वीकार करने से मना कर दिया।
दिगम्बर एवं श्वेताम्बर सम्प्रदाय
इस कारण जैन-धर्म दो शाखाओं- दिगम्बर और श्वेताम्बर में बंट गया। मगध के जैन साधुओं ने श्वेत वस्त्र पहनने आरम्भ कर दिए थे इसलिए वे श्वेताम्बर कहलाए जबकि नग्न रहने वाले साधुओं को दिगम्बर कहा गया। श्वेताम्बरों की तुलना में दिगम्बर सम्प्रदाय को अधिक लोकप्रियता हुई। इसलिए इन दोनों सम्प्रदायों में मतभेद और बढ़े।
यद्यपि इन दोनों सम्प्रदायों के सिद्धांतों एवं दार्शनिक चिंतन में विशेष अंतर नहीं है तथापि बाह्य स्वरूप में कुछ अन्तर हैं-
क्र.स.
दिगम्बर सम्प्रदाय
श्वेताम्बर सम्प्रदाय
1.
दिगम्बर सम्प्रदाय अधिक कट्टरपंथी है और इसके अनुयाई, धर्म के नियमों का पालन कठोरता से करते हैं।
श्वेताम्बर सम्प्रदाय उदारवादी है और इसके अनुयाई मानवीय दुर्बलताओं को ध्यान में रखकर, नियम-पालन में अधिक कठोरता नहीं बरत्ते।
2.
दिगम्बर सम्प्रदाय के साधु निर्वस्त्र रहते हैं।
श्वेताम्बर सम्प्रदाय के साधु श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।
3.
दिगम्बर सम्प्रदाय स्त्रियों को इसी जीवन में निर्वाण प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं मानता।
श्वेताम्बर सम्प्रदाय उनको निर्वाण की अधिकारिणी मानता है।
4.
दिगम्बर सम्प्रदाय का विश्वास है कि ‘कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति के बाद व्यक्ति को आहार की आवश्यकता नहीं रहती।
श्वेताम्बर वालों का मत है कि इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता रहती है।
5.
दिगम्बर सम्प्रदाय के मतानुसार भगवान महावीर ने विवाह किया ही नहीं था। न उनके कोई पुत्री थी।
श्वेताम्बर मत की मान्यता है कि भगवान महावीर ने यशोदा से विवाह किया था और उनके प्रियदर्शना नामक पुत्री हुई थी।
6.
दिगम्बर मत के अनुसार 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ पुरुष थे।
श्वेताम्बर मत के अनुसार 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ स्त्री थे।
7.
दिगम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण नहीं मानता।
श्वेताम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण मानता है।
कालान्तर में जैन-धर्म की दोनों शाखाएं भी तेरापन्थी, मन्दिर मार्गी, स्थानकवासी आदि अन्य उपशाखाओं में बंट गई और जैन-धर्म भी, हिन्दू-धर्म की भांति अनेक मत-मतान्तरों में विभाजित हो गया।
जैन-धर्म को व्यापक लोकप्रियता न मिलने के कारण
बौद्ध धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक व्यापक नहीं हो पाया। इसके कई कारण थे-
(1.) जैन-धर्म के सीमित प्रसार का मुख्य कारण इस धर्म में दार्शनिक पक्ष की प्रधानता होना और इसके आचरण सम्बन्धी नियमों में कठोरता का होना था। अहिंसा, नग्नता, केशलुंचन, संथारा तथा काया-क्लेश के सिद्धान्त जनसामान्य के लिए कभी भी आकर्षण का विषय नहीं हो सकते थे।
(2.) महावीर स्वामी ने जाति-प्रथा का विरोध किया था परन्तु उनके अनुयाई इस सिद्धान्त को हृदय से नहीं अपना पाए और संघ में प्रवेश के लिए उच्च जातियों के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाती रही। इससे जैन-धर्म निम्न जातियों में अलोकप्रिय हो गया।
(3.) महावीर ने ईश्वर एवं देवी-देवताओं की पूजा का निषेध किया था किंतु जैन धर्मावलम्बियों ने ईश्वर की जगह तीर्थंकरों को पूजना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सुविधानुसार नए देवी-देवताओं के अस्तित्त्व की कल्पना कर ली। सामान्य हिन्दू ईश्वर को छोड़़कर तीर्थंकरों तथा वैदिक देवी-देवताओं के स्थान पर जैन देवी-देवताओं को पूजने को तैयार नहीं हुआ।
(4.) ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका। समय के साथ-साथ इस धर्म में ब्राह्मण धर्म की अनेक बातें घुस गईं। ब्राह्मण धर्म की जाति-व्यवस्था, धार्मिक तथा सामाजिक संस्कार, भक्तिवाद और उसके देवी देवता भी जैन-धर्म में प्रवेश पा गए। इसलिए जैन-धर्म का बाह्य स्वरूप हिन्दू-धर्म जैसा ही हो गया और उसमें नवीनता का अभाव हो गया।
(5.) भारतीय जनसमुदाय सैंकड़ों सालों से कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास करता आया था किंतु जैन दर्शन में संचित कर्मों की पुद्गल के रूप में कल्पना की गई जो एक प्रकार का अजीव अर्थात् ‘मैटर’ था। परम्परागत भारतीय समाज पुद्गल के सिद्धांत पर विश्वास नहीं कर सका।
(6.) जैन संघों का संगठन जनतन्त्रात्मक नहीं था। जैन संघों की शक्ति प्रारम्भ से ही धर्माचार्यों अथवा गणधरों के हाथों में केन्द्रित रही। इस कारण अन्य लोगों ने स्वयं को उपेक्षित अनुभव किया।
(7.) जैन संघों में प्रगतिशील वैधानिक व्यवस्था का अभाव था। इसलिए संघों की व्यवस्था पर कुछ लोग हावी हो गए और उन्होंने मनमाने ढंग से कार्य किया जिससे शेष लोग दूर छिटक गए।
(8.) जैन संघों में उद्देश्य के लिए समर्पित ऐसे विद्वानों की कमी रही जो अन्य धर्मों के दार्शनिक विचारों का खण्डन करके अपने धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित कर पाते। इस कारण यह धर्म अन्य धर्मों की दौड़़ में बहुत पीछे रह गया।
(9.) भारत के कुछ शासकों ने जैन-धर्म को आश्रय अवश्य दिया परन्तु इस धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्ष जैसे आश्रयदाता नहीं मिल पाए जो उसे देशव्यापी बना देते।
(10.) अन्य धर्मों की प्रतिद्वन्द्विता के कारण जैन-धर्म के प्रसार को धक्का लगा। यद्यपि बौद्ध धर्म उसका मुख्य प्रतिद्वन्द्वी था तथापि हिन्दू-धर्म की शैव एवं वैष्णव शाखाओं के उत्थान ने भी इस धर्म की प्रगति को अवरुद्ध किया।
(11.) दिगम्बर, श्वेताम्बर, तेरापंथी, मंदिरमार्गी, स्थानकवासी आदि शाखाओं के परस्पर मतभेदों ने भी जैन-धर्म के विकास को अवरुद्ध किया।
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