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मुगल सेना की दुर्दशा (128)

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मुगल सेना की दुर्दशा

हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) समाप्त होने के बाद महाराणा प्रता (Maharana Pratap) ने मुगल सेना की दुर्दशा की तथा उसे पहाड़ियों में कैद कर लिया। महाराणा प्रताप के भय से मुगल सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई।

जब महाराणा प्रताप रक्ततलाई से हल्दीघाटी (Haldighati) होता हुआ पहाड़ों में चला गया और झाला बीदा (Jhala Bida or Jhala Manna) का बलिदान हो गया तो थोड़ी ही देर बाद युद्ध भी समाप्त हो गया।

मानसिंह कच्छवाहा (Kunwar Mansingh) के आदमियों को उसी समय ज्ञात हो गया होगा कि महाराणा युद्धक्षेत्र से निकल गया है तथा मरने वाला महाराणा प्रतापसिंह नहीं, अपितु उसका सेनापति झाला बीदा अथवा झाला मानसिंह है।

मुल्ला अल्बदायूनीं (Abd al-Qadir Badayuni, 1540–1615 A.D.) ने स्पष्ट लिखा है कि हमारी सेना प्रताप के पीछे नहीं जा सकी क्योंकि उसे भय था कि प्रताप पहाड़ियों के पीछे घात लगाये खड़ा होगा। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल सेना बहुत देर तक महाराणा के भय से रक्ततलाई में खड़ी महाराणा के पुनः आक्रमण की प्रतीक्षा करती रही होगी तथा बाद में अपने शिविर में चली गई होगी।

विभिन्न ख्यातों से पता चलता है कि हल्दीघाटी से निकलकर महाराणा प्रताप, उनवास के रास्ते से कालोड़ा गांव गया जहाँ एक मशहूर वैद्य रहता था। राणा ने उससे अपने घावों का उपचार कराया। कालोड़ा लोसिंग से हल्दीघाटी के मार्ग में पड़ता है। मेवाड़ में एक उक्ति प्रचलित है-

घाव सिराया राणा रा, कालोड़ा में जाय।

 महाराणा जानता था कि इस समय गोगूंदा (Gogunda) जाना खतरे से खाली नहीं है क्योंकि मानसिंह निश्चित रूप से गोगूंदा पर आक्रमण करेगा। अतः वह हल्दीघाटी के निकट के ही पहाड़ी दर्रों में रुका रहा ताकि अपने घायल सैनिकों को युद्ध के मैदान से निकालकर कोल्यारी गांव में उनका उपचार करवा सके।

कविराज श्यामलदास (Kaviraj Shyamaldas) ने वीर विनोद (Veer Vinod) में लिखा है कि जब मुगल सेना अपने शिविर में चली गई तब महाराणा ने अपने घायलों को युद्ध के मैदान से निकाला और कोल्यारी गांव में ले जाकर उनका इलाज करवाया। फिर अपने राजपूतों एवं भीलों की सहायता से उसने समस्त पहाड़ी नाके और रास्ते रोक लिये। महाराणा की योजना मुगलों की सेना को अरावली की पहाड़ियों में ही नष्ट कर देने की थी।

उधर कुंअर मानसिंह कच्छवाहा अपनी सेनाओं के साथ उस रात बनास नदी के तट पर खमणोर (Khamnor) के निकट बने अपने शिविर में ही रुका तथा अगले दिन गोगूंदा चला गया।

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अल्बदायूंनी ने लिखा है कि दूसरे दिन हमारी सेना ने वहाँ से चलकर रणखेत को इस अभिप्राय से देखा कि हर एक ने कैसा काम किया था। फिर दर्रे (घाटी) से हम गोगूंदा पहुँचे, जहाँ राणा के महलों के कुछ रक्षक तथा मंदिरवाले जिन सबकी संख्या 20 थी, हिन्दुओं की पुरानी रीति के अनुसार अपनी प्रतिष्ठा के निमित्त अपने-अपने स्थानों से निकल आये और सब के सब लड़कर मारे गये। मुल्ला लिखता है कि मुगल अमीरों को यह भय था कि कहीं रात के समय राणा उन पर टूट न पड़े। इसलिये उन्होंने सब मोहल्लों में आड़ खड़ी करा दी और गांव के चारों तरफ खाई खुदवा कर इतनी ऊँची दीवार बनवा दी कि कोई घुड़सवार उसको फांद न सके। तत्पश्चात् वे निश्चिंत हुए। फिर वे मरे हुए सैनिकों और घोड़ों की सूची बादशाह के पास भेजने के लिये तैयार करने लगे, जिस पर सैय्यद अहमद खाँ बारहा ने कहा- ऐसे फेहरिश्त बनाने से क्या लाभ है? मान लो कि हमारा एक भी घोड़ा व आदमी मारा नहीं गया। इस समय तो खाने के सामान का बंदोबस्त करना चाहिये। लड़ाई के दूसरे ही दिन मुगल सेना के पास खाने-पीने का सामान कुछ भी न था और पीछे भी उसी कारण शाही सेना की दुर्दशा होती रही, जिसका वर्णन फारसी तवारीखों में मिलता है, परन्तु उनमें यह कहीं लिखा नहीं मिलता है कि 5,000 सवारों की सेना के साथ एक दिन तक का भी खाने का सामान क्यों न रहा!

इसका कारण यही हो सकता है कि लड़ाई के पहले ही दिन महाराणा के सैनिकों ने शत्रुसैन्य का खाने-पीने का सामान लूट लिया हो और बाहर से आपूर्ति आने का मार्ग रोक लिया हो।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इस पहाड़ी इलाके में न तो अधिक अन्न पैदा होता है और न बनजारे आते हैं, हमारी सेना भूखों मर रही है। इस पर मुगल सैनिक खाने के सामान के प्रबंध का विचार करने लगे।

मुगल सेना की दुर्दशा न हो इस भय से  वे एक अमीर की अध्यक्षता में सैनिकों को इस अभिप्राय से समय-समय पर गांव से बाहर भेजने लगे ताकि वे बाहर जाकर अन्न ले आवें और पहाड़ियों में जहाँ कहीं लोग एकत्र पाये जायें उनको कैद कर लें, क्योंकि हर एक को जानवरों के मांस और आम के फलों पर जो वहाँ बहुतायत से थे, निर्वाह करना पड़ता था।

मुगल सेना की दुर्दशा यहीं नहीं रुकी। साधारण सिपाहियों को रोटी न मिलने के कारण इन्हीं आम के फलों पर निर्वाह करना पड़ता था जिससे उनमें से अधिकांश बीमार पड़ गये। जब तेज गर्मी पड़ती है तो आम खाने से प्रायः पेटदर्द एवं पेचिश जैसी बीमारियां हो जाया करती हैं।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी के इस वर्णन से स्पष्ट है कि महाराणा प्रताप के भय से अकबर की सेना चूहों की तरह अरावली की पहाड़ियों में फंस गई। वह न तो अपने स्थान से आगे-बढ़कर अपने खाने पीने का सामान ला पा रही थी और न अरावली से निकलकर वापस अजमेर जा पा रही थी।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब शहंशाह अकबर (Shahanshah Akbar) को हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) समाप्त हो जाने की सूचना मिली तो उसने तुरंत ही महमूद खाँ को गोगूंदा जाने की आज्ञा दी।

महमूद खाँ ने रणखेत की स्थिति को देखा और वहाँ से लौटकर हर एक आदमी ने लड़ाई में कैसा काम दिया, इस विषय में जो कुछ उसके सुनने में आया, वह बादशाह से निवेदन किया। उसने मुगल सेना की दुर्दशा की पूरी बात बादशाह से छिपा ली।

महमूद खाँ ने का विवरण सुनकर बादशाह (Akbar) सामान्य रूप से तो प्रसन्न हुआ परन्तु राणा का पीछा न कर उसको जिन्दा रहने दिया, इस पर वह बहुत क्रुद्ध हुआ।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अमीरों ने विजय के लिखित वृत्तांत के साथ रामप्रसाद हाथी को, जो लूट में हाथ लगा था और जिसको बादशाह ने कई बार राणा से मांगा था, परंतु दुर्भाग्यवश वह नटता ही रहा, बादशाह के पास भेजना चाहा।

आसफ खाँ ने उक्त हाथी के साथ मुझे (मुल्ला बदायूंनी को) भेजने की सलाह दी क्योंकि मैं ही इस काम के लिये योग्य था और धार्मिक भावों को पूरा करने के लिये ही लड़ाई में भेजा गया था।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब आसफ खाँ ने मानसिंह से कहा कि अलबदायूंनी को युद्ध के समाचारों के साथ बादशाह के पास भेजा जा रहा है तो मानसिंह ने हँसी के साथ कहा कि अभी तो अल्बदायूंनी को बहुत काम करना बाकी है। उसको तो हर एक लड़ाई में आगे रहकर लड़ना चाहिये।

इस पर मैंने अर्थात् अल्बदायूंनी ने जवाब दिया कि मेरा मुरशिदी का काम तो यहीं समाप्त हो चुका, अब मुझे बादशाह की सेवा में रहकर वहाँ काम देना चाहिये। इस पर मानसिंह खुश हुआ और हँसा।

फिर 300 सवारों को मेरे साथ देकर राणा के रामप्रसाद नामक हाथी के साथ मुझे वहाँ से रवाना किया। मानसिंह भिन्न-भिन्न स्थानों पर थाने नियत करता हुआ गोगूंदा से 20 कोस मोही गांव तक शिकार खेलता हुआ मेरे साथ रहा। वहाँ से एक सिफारिशी पत्र देकर उसने मुझे सीख दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद (129)

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मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद

हल्दीघाट का युद्ध (War of Haldighati) हारने के बाद जब मानसिंह (Kunwar Masingh) अकबर (Akbar) के पास अजमेर गया तब अकबर ने मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद कर दी। हल्दीघाटी के अभियान में आसफ खाँ भी बड़े सेनापति के रूप में भेजा गया था। इसलिए अकबर ने जिस तरह मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद की थी, उसी तरह आसफ खाँ की भी ड्यौढ़ी बंद कर दी गई।

हल्दीघाटी का युद्ध रुक जाने के बाद अकबर की सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई और भूख से तड़पने लगी। भूख और कुपोषण के कारण बहुत से मुगल सैनिक बीमार पड़कर मरने लगे।

हल्दीघाटी का युद्ध रुक जाने के बाद अकबर की सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई और भूख से तड़पने लगी। भूख और कुपोषण के कारण बहुत से मुगल सैनिक बीमार पड़कर मरने लगे।

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इतना होने पर भी मानसिंह तथा आसफ खाँ (Asaf Khan) अपनी सेना को मेवाड़ की पहाड़ियों से निकालकर अजमेर की तरफ नहीं ले जा सके। इसके दो कारण थे, पहला तो यह कि मानसिंह तथा आसफ खाँ को भय था कि यदि वे बिना अतिरिक्त मुगल सेना आए अपने स्थान से निकलने का प्रयास करेंगे तो महाराणा (Maharana Pratap) के राजपूत एवं भील सैनिक मुगलों को मच्छरों की तरह मार देंगे। दूसरा कारण यह था कि उन्हें भय था कि यदि वे महाराणा को परास्त किए बिना ही बादशाह (Akbar) के पास लौट कर गए तो अवश्य ही अकबर नाराज होकर उन्हें दण्डित करेगा। मानसिंह तथा आसफ खाँ के इस भय से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबर ने उन्हें क्या आदेश देकर युद्ध करने के लिए भेजा होगा! या तो महाराणा को मारकर लौटना, या फिर मत लौटना। ऐसा ही कुछ शाही आदेश मानसिंह तथा आसफ खाँ के लिए रहा होगा। इसलिए उन दोनों ने एक उपाय सोचा। उन्होंने बड़बोले मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को अकबर की सेवा में भेजने का निश्चय किया ताकि मुल्ला बदायूंनी बादशाह अकबर के सामने जाकर शाही सेना की जीत की डींगें हांक सके। अकबर के मन में अपनी जीत के प्रति विश्वास उत्पन्न करने के लिए मानसिंह तथा आसफ खाँ ने शाही सेना की विजय के लिखित वृत्तांत के साथ महाराणा प्रताप के रामप्रसाद नामक हाथी को प्रमाण के रूप में भेजा।

मुल्ला बदायूंनी (Abd al-Qadir Badayuni) ने लिखा है कि रामप्रसाद हाथी लूट में हाथ लगा था, जिसको बादशाह ने कई बार राणा से मांगा था, परंतु दुर्भाग्यवश राणा नटता ही रहा था। स्पष्ट है कि बदायूंनी ने भी अबुल फजल की तरह झूठ बोलने में कोई परहेज नहीं किया है।

क्योंकि परिस्थितियां स्वयं स्पष्ट करने में सक्षम हैं कि न तो अकबर (Akbar) को महाराणा प्रताप के रामप्रसाद नामक हाथी के बारे में कुछ पता होगा। न अकबर ने महाराणा से कभी हाथी मांग कर स्वयं को छोटा करने का प्रयास किया होगा।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि मैं बागोर और मांडलगढ़ (Mandalgarh) होता हुआ आम्बेर (Amber) पहुँचा। लड़ाई की खबर सर्वत्र फैल गई थी किंतु मैं मार्ग में उस लड़ाई में महाराणा की हार के सम्बन्ध में जो कुछ कहता, लोग उस पर विश्वास नहीं करते थे।

फिर टोडा और बसावर होता हुआ मैं फतहपुर पहुँचा, जहाँ राजा भगवानदास के द्वारा बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ और अमीरों के पत्र तथा राणा का हाथी बादशाह के नजर किया।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बादशाह ने पूछा इस हाथी का क्या नाम है?’ मैंने निवेदन किया कि ‘रामप्रसाद’। इस पर बादशाह ने कहा कि यह विजय पीर की कृपा से हुई है इसलिये इसका नाम ‘पीरप्रसाद’ रखा जाये।

 फिर बादशाह ने मुझ से पूछा कि अमीरों ने तुम्हारी बड़ी प्रशंसा लिखी है, परन्तु सच-सच कहो कि तुम कौनसी सेना में रहे और तुमने वीरता का क्या काम किया? फिर मैंने सारा हाल निवेदन किया जिस पर बादशाह ने प्रसन्न होकर मुझे 96 अशर्फियां बख्शीं।’

पाठकों को स्मरण होगा कि जब बदायूंनी ने अकबर से मानसिंह तथा आसफ खाँ के साथ महाराणा प्रताप के विरुद्ध जेहाद में जाने की अनुमति मांगी थी, तब भी अकबर ने बदायूंनी को 96 अशर्फियां देकर विदा किया था।

कहा नहीं जा सकता कि अकबर मुल्ला बदायूंनी की उन बातों से कितना सहमत और कितना संतुष्ट हुआ होगा जो बातें बदायूंनी ने अकबर को मानसिंह तथा आसफ खाँ की विजय के बारे में बताई होंगी किंतु अकबर को अधिक दिनों तक अंधेरे में नहीं रखा जा सकता था।

कुछ ही दिनों में अकबर के सामने स्थितियां स्वतः स्पष्ट होती चली गईं और वह समझ गया कि मुगलों ने हल्दीघाटी में जबर्दस्त मार खाई है।

उधर मानसिंह और आसफ खाँ भी समझ चुके थे कि महाराणा प्रताप की सेना ने मुगल सेना को गोगूंदा (Gogunda) में बंदी बना लिया है। फिर भी वे अकबर को भुलावे में रखने के लिये अपनी जीत के समाचार भेजता रहे तथा मेवाड़ से सुरक्षित रूप से निकलने का उपाय ढूंढते रहे।

महाराणा की सेना मुगल सेना से बहुत छोटी थी किंतु राणा का भय मुगल सैन्य में इस कदर व्याप्त था कि भोजन प्राप्ति के लिये गोगूंदा से निकली मुगल टुकड़ी, छोटा सा खटका होते ही कोसों दूर भाग जाती थी।

चिलचिलाती धूप, गर्म लू के थपेड़ों और कहीं भी किसी भी समय राणा के सैनिकों के टूट पड़ने का भय मुगल सेना को काल की तरह खाने लगा। उस पर महाराणा ने पहले ही दिन मुगल सेना की रसद सामग्री छीन ली थी। इस कारण मुगल सैनिक पहाड़ों में लगे आम के पेड़ों से आम तोड़कर खाने लगे। ज्यादा आम खाने से बहुत से सैनिक बीमार पड़ गये।

अकबर समझ चुका था कि हल्दीघाटी (Haldighati) में उसके हाथ कुछ नहीं आया अपितु उसने खोया ही है फिर भी अकबर ने इस तरह का अभिनय किया मानो हल्दीघाटी में मुगल सेना को भारी विजय मिली हो तथा उसकी बहुत बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो।

इसलिये 29 सितम्बर 1576 को अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) के उर्स पर अजमेर आया और वहाँ से उसने 6 लाख रुपये और कुछ सामान मक्का और मदीना के योग्य पुरुषों को बांटने के लिये देकर सुल्तान ख्वाजा को रवाना किया।

बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर (Akbar) ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ, कुलीज खाँ और आसफ खाँ (Asaf Khan) को यह आज्ञा देकर भेजा कि वे गोगूंदा से ख्वाजा का साथ छोड़ दें, राणा के मुल्क में सब जगह फिरें और जहाँ कहीं उसका पता लगे, वहीं उसको मार डालें।

मानसिंह को गोगून्दा में रहते हुए चार माह बीत गये थे किंतु उससे कुछ भी न बन पड़ा जिससे बादशाह ने मानसिंह, आसफ खाँ और काजी खाँ को वहाँ से चले आने की आज्ञा लिख भेजी।

शाही सेना गोगूंदा में कैदियों की तरह पड़ी हुई थी। जब कभी थोड़े से आदमी रसद का सामान लाने के लिये जाते तो उन पर राजपूत धावा करते थे।

कविराज श्यामलदास (Kaviraja Shyamaldas) ने वीर विनोद (Veer Vinod) में लिखा है कि इन आपत्तियों से घबराकर शाही सेना राजपूतों से लड़ती-भिड़ती अजमेर के लिए रवाना हो गई। मार्ग में महाराणा की सेना ने उन्हें जगह-जगह घेरा और बहुत से मुगल सैनिकों को मार डाला।

जब मानसिंह, आसफ खाँ और काजी खाँ अजमेर पहुँचे तो अकबर ने मानसिंह तथा आसफ खाँ की गलतियों के कारण उन दोनों की ड्यौढ़ी बंद कर दी। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि वे कौनसी गलतियां थीं जिनके कारण अकबर ने अपने सेनापतियों को अपने दरबार में आने से मना कर दिया। 

 

मुगलों के काल में किसी राजा या सेनापति को ड्यौढ़ी बंद की सजा बहुत अपमानजनक मानी जाती थी। इसका अर्थ यह था कि पराजित या अपराधी व्यक्ति बादशाह के महल की ड्यौढ़ी नहीं लांघ सकता था। अर्थात् बादशाह उसका मुंह नहीं देखता था। जब मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद की गई तो मानसिंह का बड़ा अपमान हुआ।         

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

मानसिंह पर संदेह (130)

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मानसिंह पर संदेह

महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की जीत से अकबर (Akbar) को मानसिंह (Kunwar Mansingh) पर संदेह हो गया! अकबर को शक था कि मानसिंह ने जानबूझ कर महाराणा प्रताप को जीतने का अवसर दिया है। अकबर पहले भी मानसिंह को खुले दरबार में यह उलाहना दे चुका था कि तुम हिंदुओं का पक्ष लेते हो!

जब कुंअर मानसिंह और आसफ खाँ मेवाड़ की पहाड़ियों से निकलकर अजमेर (Ajmer) चले गए तब महाराणा प्रताप भी अनेक बादशाही थानों को उजाड़ता हुआ अपने थाने स्थापित करने लगा और अपनी सेना के साथ पुनः कुंभलगढ़ चला गया।

उधर जब मानसिंह और आसफ खाँ अजमेर पहुंचे तो अकबर ने उन दोनों की ड्यौढ़ी बंद कर दी। अर्थात् उन्हें अपने सामने आने से रोक दिया। मुल्ला बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि मानसिंह और आसफ खाँ की गलतियों के कारण बादशाह (Badshah Akbar) ने उनकी ड्यौढ़ी बंद कर दी किंतु वह यह नहीं बताता कि वे कौनसी गलतियां थीं जिनके कारण मानसिंह तथा आसफ खाँ की ड्यौढ़ी बंद की गई? निश्चित रूप से अकबर को मानसिंह पर संदेह था कि उसने जानबूझ कर अपने पुराने स्वामी अर्थात् महाराणा प्रताप को जिताया है।

निजामुद्दीन अहमद बख्शी ने इस विषय में तबकाते अकबरी अर्थात् तारीखे निजामी (Tabaqat-e-Akbari i.e. Tarikh-e-Nizami) में लिखा है कि मानसिंह वापस चले आने की आज्ञा पाते ही बादशाह के दरबार में उपस्थित हुआ।

जब सेना की दुर्दशा के सम्बन्ध में जांच की गई, तो पाया गया कि सैनिक बहुत बड़ी विपत्ति में थे तो भी कुंवर मानसिंह ने अपनी सेना को राणा कीका अर्थात् प्रतापसिंह का मुल्क नहीं लूटने दिया। इसी से बादशाह मानसिंह पर अप्रसन्न हुआ और उसे दरबार से निकाल कर उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी।

निजामुद्दीन अहमद बख्शी के उक्त कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि अकबर भले ही अजमेर में ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित होकर अपनी जीत का जश्न मना रहा था किंतु वास्तव में उसे पता लग गया था कि अकबर की विजय नहीं हुई है अपितु हार हुई है! इस अप्रत्याशित हार के कारण ही अकबर को मानसिंह पर संदेह हो गया था।

अकबर को मानसिंह पर संदेह था अन्यथा वह विजयी सेनापतियों की ड्यौढ़ी क्यों बंद करता? अकबर को इस बात पर भी शक था कि मानसिंह ने जानबूझ कर महाराणा प्रताप को जीतने का अवसर दिया है। अकबर पहले भी मानसिंह को खुले दरबार में यह उलाहना दे चुका था कि तुम हिंदुओं का पक्ष लेते हो!

इस बात का प्रमाण आगे चलकर इस तथ्य से मिलता है कि अगले दस सालों तक अकबर (Akbar) मेवाड़ को जीतने के लिए अपनी सेनाएं भेजता रहा किंतु आगे के अभियानों में अकबर ने मानसिंह को कभी भी मेवाड़ के अभियान पर नहीं भेजा। इससे पुष्टि होती हे कि अकबर को मानसिंह पर संदेह केवल कुछ समय के लिए नहीं हुआ था अपितु उसका संदेह जीवन भर बना रहा।

अकबर के विश्वसनीय मुस्लिम सेनापतियों को ही मेवाड़ (Mewar) के विरुद्ध किए जाने वाले अभियानों की कमान सौंपी गई। यह अलग बात है कि आगे के समस्त अभियानों में भी अकबर के सेनापति मेवाड़ में पिटकर लौटते रहे।

जब हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) के 24 साल बाद अकबर की मृत्यु हुई तब उसे दो ही दुःख सालते थे। पहला यह कि वह महाराणा प्रताप को नहीं मार सका और दूसरा यह कि अकबर का पुत्र सलीम जीवन भर अकबर के विरुद्ध चलता रहा किंतु अकबर उसे अपने अनुकूल नहीं बना सका।

भारत की आजादी के बाद विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के लिए जो पुस्तकें लिखी गईं उनमें वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करके हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार तथा अकबर की विजय को चित्रित किया गया।

इन पुस्तकों के माध्यम से भारतीयों को समझाने का प्रयास किया गया कि जहाँ भारत के अन्य राजाओं ने दूरदृष्टि रखते हुए अकबर से संधि की तथा अपनी प्रजा एवं सेना को युद्धों की विभीषिका से बचाया वहीं महाराणा प्रताप में दूरदृष्टि का अभाव था, उसने अपनी प्रजा एवं सेना को अनावश्यक युद्धों की आग में झौंक दिया।

आजाद भारत में लिखी गई इन पुस्तकों ने भारत की जनता के मन में इस बात को लेकर स्थाई संशय उत्पन्न कर दिया कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी कि हार! वस्तुतः इस प्रश्न की तथ्यपूर्ण विवेचना की जानी चाहिए।

संसार में बहुत से ऐसे युद्ध हुए हैं जिनके विवरण इतिहास के पन्नों पर बहुत विस्तार से लिखे गए और वे जनमानस में भी बहुत लोकप्रिय हुए किंतु उनमें जीत-हार का निर्णय स्पष्ट रूप से नहीं हो सका।

इन युद्धों में दोनों पक्षों ने बहुत-कुछ खोया किंतु सब-कुछ नहीं जिसके कारण न तो किसी पक्ष की स्पष्ट विजय हुई और न किसी पक्ष की स्पष्ट पराजय हुई।

हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) भी उन्हीं युद्धों में से एक था जिसमें दोनों पक्षों ने कुछ न कुछ खोया अवश्य था किंतु सब-कुछ नहीं। अकबर ने अपनी साख खोई थी और महाराणा ने अपने विश्वस्त सेनापति गंवाए थे। यही कारण था कि दोनों पक्षों के कवियों और लेखकों ने हल्दीघाटी के युद्ध में अपने-अपने स्वामियों की विजय बताते हुए उनका पक्ष स्पष्ट किया।

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यदि तथ्यों की विवेचना की जाए तो हम पाते हैं कि इस युद्ध में अकबर ने केवल इतना प्राप्त किया था कि उसके अमीरों एवं सेनापतियों को मेवाड़ की भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति से वास्तविक परिचय हो गया था जबकि महाराणा ने इस युद्ध के माध्यम से कालजयी ख्याति एवं देशवासियों की अटूट श्रद्धा प्राप्त की। जैसे-जैसे समय बीतता गया, महाराणा प्रताप साहसी योद्धा से ऐतिहासिक योद्धा, ऐतिहासिक योद्धा से कालजयी योद्धा और कालजयी योद्धा से मिथकों का नायक बनता चला गया। आज भी बहुत से लोग महाराणा प्रताप में इतनी अधिक श्रद्धा रखते हैं जितनी कि वे अपने देवी-देवताओं में रखते हैं जबकि अकबर को समाज के किसी भी वर्ग में ऐसी श्रद्धा, ऐसा आदर और ऐसा प्रेम प्राप्त नहीं हो सका! हल्दीघाटी के युद्ध (war of Haldighati) में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जीत बताई है किंतु 18 जून 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध होने से लेकर 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप का स्वर्गवास होने तक की समस्त घटनाओं का समग्र विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि इस युद्ध में अकबर को विजय प्राप्त नहीं हुई थी। युद्ध के मैदान में न तो महाराणा प्रताप रणखेत रहा, न युद्ध के पश्चात् महाराणा ने समर्पण किया और न ही, युद्ध के पश्चात् के महाराणा के लगभग 21 वर्ष के जीवन काल में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच कोई संधि हुई जिससे यह कहा जा सके कि अकबर को विजय प्राप्त हुई।

न तो महाराणा प्रताप और न उसका पुत्र अमरसिंह कभी भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुए। उनके बाद भी कोई महाराणा किसी मुगल बादशाह के दरबार में नहीं गया।

राणा रासौ आदि मेवाड़ (Mewar) से सम्बन्ध रखने वाली अनेक प्राचीन पुस्तकों में महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की विजय लिखी गई है। उदयपुर के जगदीश मंदिर की 13 मई 1652 की प्रशस्ति में लिखा है- अपनी प्यारी तलवार हाथ में लिये प्रतापसिंह प्रातःकाल युद्ध में आया तो मानसिंह वाली शत्रु की सेना ने छिन्न-भिन्न होकर पैर संकोचते हुए पीठ दिखाई-

कृत्वा करे खंगलतां स्ववल्लभां प्रतापसिंहे समुपागते प्रगे।

सा खंडिता मानवती द्विपंचमूः संकोचयन्ती चरणौ परांगमुखी।

निश्चित रूप से अकबर (Akbar) को मानसिंह (Kunwar Mansingh) पर संदेह हल्दीघाटी युद्ध में अकबर की पराजय और प्रताप की विजय सूचित करता है जिसकी आधुनिक इतिहासकारों ने पूरी तरह अनदेखी की है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम (131)

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हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम

हल्दीघाटी युद्ध (War of Haldighati) का परिणाम क्या निकला? इस विषय पर इतिहासकारों ने बहुत कुछ लिखा है किंतु उसके सूक्ष्म तत्वों पर विचार नहीं किया है। कोई युद्ध कैसे लड़ा जाता है, उसका कैसे अंत होता है और युद्ध के बाद दोनों पक्षों का आचरण क्या रहता है, यही वे सूक्ष्म तत्व हैं जिनके आधार पर किसी युद्ध का परिणाम तय होता है। हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम भी इसी आधार पर निकाला जाना चाहिए!

हल्दीघाटी के युद्ध में दोनों पक्षों के लेखकों एवं कवियों ने अपने-अपने पक्ष की जीत के दावे किए। इस आलेख में हम उन दावों में निहित तथ्यों की समीक्षा करेंगे। उदयपुर राज्य का इतिहास लिखने वाले महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपना मत प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

उस समय के संसार के सबसे सम्पन्न और प्रतापी बादशाह अकबर (Akbar) के सामने एक छोटे से प्रदेश का स्वामी प्रतापसिंह (Maharana Pratap) कुछ भी न था क्योंकि मेवाड़ के बहुत से नामी-नामी सरदार बहादुरशाह और अकबर की चित्तौड़ (Chittor) की चढ़ाइयों में पहले ही मर चुके थे, जिससे थोड़े ही स्वामिभक्त सरदार प्रतापसिंह की तरफ से लड़ने के लिये रह गये थे।

मेवाड़ (Mewar) का सारा पूर्वी उपजाऊ इलाका अकबर की चित्तौड़ विजय के समय से ही बादशाही अधिकार में चला गया था, केवल पश्चिमी पहाड़ी प्रदेश ही प्रताप के अधिकार में था, तो भी प्रताप का कुलाभिमान, बादशाह के आगे दूसरे राजाओं के समान सिर न झुकाने का अटल व्रत, अनेक आपत्तियाँ सहकर भी अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने का प्रण और उसका वीरत्व, ये ही उसको उत्साहित करते रहे थे।

हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमान बादशाहों की लड़ाइयों में मुसलमान लेखकों का लिखा हुआ वर्णन एकपक्षीय होता है, तो भी मुसलमान लेखकों के कथन से ही निश्चित है कि शाही सेना की बुरी तरह दुर्दशा हुई और प्रतापसिंह के लौटते समय भी मुगल सेना की स्थिति ऐसी न रही कि वह उसका पीछा कर सके और उसका भय तो उस सेना पर यहाँ तक छा गया कि वह यही स्वप्न देखती थी कि राणा पहाड़ के पीछे रहकर, हमारे मारने की घात में लगा हुआ होगा। दूसरे दिन गोगूंदा पहुँचने पर भी शाही अफसरों को यही भय बना रहा कि राणा आकर हमारे पर टूट न पड़े।

मेवाड़ी सैनिकों के भय से मुगलों ने उस गांव के चौतरफ खाई खुदवाकर घोड़ा न फांद सके, इतनी ऊँची दीवार बनवाई और गांव के तमाम मौहल्लों में आड़ खड़ी करवा दी गई।

फिर भी शाही सेना गोगूंदे (Gogunda) में कैदी की भांति सीमाबद्ध ही रही और अन्न तक न ला सकी जिससे उसकी और भी दुर्दशा हुई। इन सब बातों पर विचार करते हुए यही मानना पड़ता है कि इस युद्ध में प्रतापसिंह की ही प्रबलता रही थी।

मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद ने अकबरी दरबार में हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है-

नमक हलाल मुगल और मेवाड़ के सूरमा ऐसे जान तोड़कर लड़े कि हल्दीघाटी के पत्थर इंगुर (Redish-Yellow) हो गये। यह वीरता ऐसे शत्रुओं के सामने क्या काम कर सकती थी जिसके साथ असंख्य तोपें और रहकले आग बरसाते थे और ऊँटों के रिसाले आंधी की तरह दौड़ते थे। यह सही है कि अकबर की सेना के सामने महाराणा की सैन्य संख्या कुछ भी न थी किंतु सैन्य संख्या तो जीत-हार का निर्णय नहीं करती।

हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम यदि कोई निकला था तो वह इतना ही था कि अकबर (Akbar) ने अल्प समय के लिये मेवाड़ के बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया था। इस भू-भाग में से भी केवल माण्डलगढ़ को छोड़कर शेष धरती, महाराणा प्रताप ने अकबर के जीवन काल में ही मुगलों से वापस छीन ली थी।

वैसे भी युद्ध के समय किसी पक्ष द्वारा, शत्रु पक्ष का भू-भाग, दुर्ग, धन-सम्पत्ति तथा पशु छीन लेने से अथवा शत्रु पक्ष के परिवार को बंदी बना लेने से उसकी विजय सिद्ध नहीं होती।

ई.1948 एवं 1965 में पाकिस्तान ने भारत का भू-भाग दबा लिया किंतु जीत निश्चत रूप से भारत की हुई थी। ठीक वही स्थिति हल्दीघाटी के युद्ध की थी। अकबर ने मेवाड़ का बहुत सा भू-भाग दबा लिया किंतु जीत महाराणा की हुई।

युद्ध के मैदान में अकबर की सेना के भय की स्थिति यह थी कि प्रताप के घोड़े ने मानसिंह के हाथी के मस्तक पर अपने दोनों पांव टिका दिये और महाराणा ने अपना भाला मानसिंह पर देकर मारा।

मानसिंह (Kunwar Mansingh) झुक गया और महाराणा ने उसे मरा हुआ जानकर अपने घोड़े को मानसिंह के हाथी से हटा लिया। इस पूरे घटनाक्रम में कोई भी मुगल सैनिक महाराणा पर हमला करने का दुस्साहस नहीं कर सका।

युद्ध के दौरान मुगल सेना की स्थिति इतनी बुरी थी कि जब महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) हल्दीघाटी से बाहर निकल गया तब अकबर की भयभीत सेना, महाराणा का पीछा तक न कर सकी।

युद्ध के पश्चात् की स्थिति यह थी कि जब तक अकबर जीवित रहा, वह महाराणा प्रताप को जान से मारने तथा महाराणा प्रताप के बाद महाराणा अमरसिंह (Maharana Amarsingh) को युद्ध अथवा संधि के माध्यम से अपनी अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार करवाने के लिये तरसता रहा।

मुहम्मद हुसैन आजाद ने लिखा है कि 5 अक्टूबर 1605 को आगरा के महलों में जब अकबर की मृत्यु (Death of Akbar) हुई तो उसकी दो ही अधूरी आशाएं थीं। पहली यह कि वह महाराणा प्रताप को काबू में न ला सका और दूसरी यह कि वह मानबाई तथा जहांगीर (Jahangir) के पुत्र खुसरो (Khusro) को अपना उत्तराधिकारी न बना सका।

यह भी हल्दीघाटी युद्ध (War of Haldighati) का परिणाम था कि मेवाड़ के महाराणाओं ने कभी भी मुगलों, मराठों एवं अंग्रेजों के दरबार में उपस्थिति नहीं दी। यहाँ तक कि ई.1881 में जब अंग्रेजों ने महाराणा सज्जनसिंह (Maharana Sajjansingh) को ग्रैण्ड कमाण्डर ऑफ दी स्टार ऑफ इण्डिया का खिताब देना चाहा तो महाराणा ने अपने वंश के प्राचीन गौरव तथा पूर्वजों का बड़प्पन बताते हुए यह सम्मान लेने से मना कर दिया।

अंत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड रिपन स्वयं यह खिताब लेकर मेवाड़ आया और उसने 23 नवम्बर 1881 को महाराणा के दरबार में हाजिर होकर उसे यह खिताब दिया।

ई.1903 में जब दिल्ली में इंग्लैण्ड के सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में वायसराय एवं गवर्नर जनरल द्वारा दरबार का आयोजन किया गया तब महाराणा फतहसिंह दिल्ली तो पहुँचा किंतु उसने दरबार में भाग नहीं लिया।

ई.1911 में जब इंग्लैण्ड का सम्राट जार्ज पंचम दिल्ली आया तो भी महाराणा फतहसिंह दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर जार्ज पंचम का स्वागत करके, उसके जुलूस तथा दरबार में भाग लिये बिना ही उदयपुर लौट आया। ई.1921 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स उदयपुर आया तो महाराणा फतहसिंह (Maharana Fatehsingh) ने उससे भेंट तक नहीं की।

इस प्रकार हल्दीघाटी के युद्ध के सैंकड़ों साल बाद भी भारत के राजनीतिक गगन में हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की विजय की गूंज सुनाई देती रही। ये समस्त ऐतिहासिक घटनाएं इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर पराजित हुआ था, किसी भी रूप में उसकी विजय नहीं हुई थी।

जबकि दूसरी तरफ इस युद्ध में महाराणा प्रताप निश्चित रूप से विजयी रहा था, किसी भी अंश में उसकी पराजय नहीं हुई थी। हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम यही निकला था, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं! आधुनिक साम्यवादी लेखकों ने हल्दीघाटी के युद्ध के वास्तविक इतिहास पर जो धूल बिछाई है, आशा है कि इस तथ्यपरक विवेचन के बाद वह धूल छंट जाएगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अकबर का गोगूंदा अभियान (132)

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अकबर का गोगूंदा अभियान

जब अकबर (Akbar) के सारे सेनापति मिलकर भी महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) को नहीं घेर सके तो महाराणा प्रताप को ढूंढने अकबर स्वयं गोगूंदा आया! अकबर का गोगूंदा अभियान भी कुछ काम न आया। अकबर महाराणा प्रताप की हत्या करना चाहता था किंतु हत्या करना तो दूर वह महाराणा की छाया को भी नहीं छू पा रहा था।

हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) से पहले, हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान तथा युद्ध समाप्ति के बाद अकबर की सेना के भय का स्तर क्या था? अबुल फजल तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने अकबर की सेना के भय का उल्लेख किया है जिससे इस बात का अनुमान लगाया जाना सहज है कि इस युद्ध में अकबर के सैनिक बड़ी संख्या में मरे थे।

महाराणा प्रताप तथा उसकी सेना मानसिंह (Kunwar Mansingh) तथा उसकी सेना को ठोक-पीट कर पहाड़ियों में चली गई थी जबकि मानसिंह की सेना गोगूंदा (Gogunda) की पहाड़ियों में कैद होकर रह गई थी।

मुहम्मद हुसैन आजाद ने अपनी रचना अकबरी दरबार में हल्दीघाटी के युद्ध का वर्णन करते हुए यह लिखकर अकबर (Akbar) की सेना की हार की पुष्टि की है कि भले ही अकबर की सेना महाराणा की सेना से बहुत बड़ी थी किंतु सैनिकों की संख्या युद्ध में जीत-हार का निर्णय नहीं कर सकती। इस पंक्ति का सीधा-सीधा अर्थ यह है कि अकबर नहीं महाराणा जीता था।

हल्दीघाटी की विफलता के बाद अकबर की क्रोधाग्नि और भी भड़क उठी। अकबर किसी भी कीमत पर महाराणा प्रताप हत्या करना चाहता था जबकि उसके सेनापति प्रताप को छू भी नहीं पा रहे थे।

इधर शाही सेनाओं के मेवाड़ से अजमेर चले जाने के बाद महाराणा प्रतापसिंह ने अपनी सेना के साथ गुजरात की तरफ अभियान किया तथा बादशाही थानों को लूटकर हल्दीघाटी के युद्ध में हुए व्यय की क्षतिपूर्ति करने लगा। इस पर अकबर ने स्वयं गोगूंदा जाने का विचार किया ताकि महाराणा प्रताप को ढूंढकर मारा जा सके।

अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (Abul Fazal) ने अकबरनामा में लिखा है कि 13 अक्टूबर 1576 को अकबर अजमेर से गोगूंदा के लिये रवाना हुआ। उसके गोगुंदा पहुँचने से पहले ही महाराणा प्रताप पहाड़ों में चला गया। अकबर ने गोगूंदा पहुँचकर कुतुबुद्दीन खाँ, राजा भगवंतदास (Raja Bhagwan Das Kachchhwaha) और कुंवर मानसिंह (Kunwar Mansingh) को महाराणा प्रताप को ढूंढने के लिए पहाड़ों में भेजा।

कुतुबुद्दीन खाँ, राजा भगवंतदास और कुंवर मानसिंह जहाँ-जहाँ गये, वहाँ-वहाँ महाराणा उन पर हमला करता रहा। अंत में उन्हें परास्त होकर बादशाह के पास लौटना पड़ा।

अबुलफजल ने उनकी पराजय का हाल छिपाकर इतना ही लिखा है- ‘वे राणा के प्रदेश में गये परन्तु उसका कुछ पता न लगने से बिना आज्ञा ही लौट आये जिस पर अकबर ने अप्रसन्न होकर उनकी ड्यौढ़ी बंद कर दी। जो माफी मांगने पर बहाल की गई।’

मुंशी देवी प्रसाद (Munshi Devi Prasad) ने ‘महाराणा श्री प्रतापसिंहजी का जीवन चरित्र’ में लिखा है कि इसके बाद अकबर बांसवाड़ा की तरफ गया। वह 6 माह तक राणा के मुल्क में या उसके निकट रहा परन्तु राणा ने उसकी परवाह तक न की। बादशाह (Badshah Akbar) के मेवाड़ (Mewar) से चले जाने पर राणा भी पहाड़ों से उतरकर शाही थानों पर हमला करने लगा और मेवाड़ में होकर जाने वाले शाही लश्कर का आगरे का रास्ता बंद कर दिया। अकबर का गोगूंदा अभियान विफल हो गया।

अबुल फजल लिखता है कि यह समाचार पाकर बादशाह ने भगवन्तदास, कुंवर मानसिंह, बैराम खाँ के पुत्र मिर्जा खाँ अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना, कासिम खाँ और मीरबहर आदि को राणा पर भेजा।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मैं उस समय बीमारी के कारण बसावर में रह गया था और बांसवाड़ा के रास्ते से लश्कर में जाना चाहता था किंतु अब्दुल खाँ ने वह रास्ता बंद और कठिनतापूर्ण बताकर मुझे लौटा दिया। फिर मैं सारंगपुर, उज्जैन के रास्ते से दिवालपुर में जाकर बादशाह के पास उपस्थित हुआ।

मुंशी देवी प्रसाद ने लिखा है कि मुगल सेनापति महाराणा को काबू में न ला सके। वे महाराणा को पकड़ने का बहुत प्रयास करते थे परन्तु कभी भी सफल न हो सके। मुगल सेनापति, किसी पहाड़ पर राणा के पड़ाव की सूचना पाकर उसे घेरते किंतु महाराणा दूसरे पहाड़ से निकलकर मुगलों पर छापा मारता था।

इस दौड़-धूप का फल यह हुआ कि उदयपुर और गोगूंदा से शाही थाने उठ गये और मोही का थानेदार मुजाहिद बेग मारा गया।

राजप्रशस्ति महाकाव्य सर्ग 4 के संदर्भ से मुंशी देवी प्रसाद ने लिखा है कि एक बार महाराणा के सैनिकों ने शाही सेना पर आक्रमण किया जिसमें मिर्जा खाँ अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना की औरतें कुंवर अमरसिंह के द्वारा पकड़ी गईं।

महाराणा ने उनका बहिन-बेटी की तरह सम्मान कर प्रतिष्ठा के साथ उन्हें अपने पति के पास पहुँचा दिया। महाराणा के इस उत्तम बर्ताव के कारण मिर्जा खाँ उस समय से ही मेवाड़ के महाराणाओं के प्रति सद्भाव रखने लगा।

हल्दीघाटी की पराजय की कसक अकबर के हृदय से जाती नहीं थी। वह अपने जीवन काल में महाराणा को मृत देखना चाहता था।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि 15 अक्टूबर 1578 को अकबर ने पुनः भारी सैन्य तैयारी के साथ शाहबाज खाँ मीरबख्शी को कुंवर मानसिंह, राजा भगवन्तदास, पायन्द खाँ मुगल, सैय्यद कासिम, सैय्यद हाशिम, सैय्यद राजू, उलगअसद तुर्कमान, गाजी खाँ बदख्शी, शरीफ खाँ अतगह, मिर्जा खाँ अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना (Abdur Rahim Khan-i-Khana) और गजरा चौहान आदि के साथ मेवाड़ पर चढ़ाई करने भेजा।

मुंशी देवीप्रसाद ने लिखा है कि अकबर की लगभग समस्त सेना शाहबाज खाँ (Shahbaz Khan Kamboh) मीरबख्शी को दे दी गई किंतु भयभीत मीरबख्शी ने इस सेना को भी अपर्याप्त समझा तथा अकबर से और सेना की मांग की। अकबर ने अपनी बची-खुची सेनाओं को शेख इब्राहीम फतहपुरी के नेतृत्व में मेवाड़ के लिये रवाना किया।

अबुल फजल ने लिखा है- ‘शाहबाज खाँ कुम्भलगढ़ (Kumbhalgarh) को विजय करने का विचार करके आगे बढ़ा। उसने राजा भगवानदास तथा कुंवर मानसिंह को इस विचार से कि वे राजपूत होने के कारण राणा से लड़ने में सुस्ती करेंगे, उन्हें बादशाह के पास भेज दिया। इस तरह उसने हिन्दू सेनापतियों को इस युद्ध से पूरी तरह अलग कर दिया और शरीफ खाँ, गाजी खाँ आदि को साथ लेकर कुम्भलगढ़ की ओर बढ़ा तथा कुम्भलगढ़ के नीचे की समतल भूमि पर स्थित केलवाड़ा पर अधिकार कर लिया।’

कविराज श्यामलदास ने वीर विनोद में लिखा है कि- ‘इसके बाद मुगल सैनिक, पहाड़ी पर चढ़ने लगे।’

कुम्भलगढ़ का दुर्ग चित्तौड़ के समान एक अलग पहाड़ी पर स्थित नहीं है किंतु पहाड़ी की विस्तृत श्रेणी के सबसे ऊँचे स्थान पर बना हुआ है जिससे उस पर घेरा डालना सहज काम नहीं है। राजपूत शाही फौज पर पहाड़ों की घाटियों से आक्रमण करने लगे।

एक रात उन्होंने मुगलों की सेना पर छापा मारा और मुगलों के चार हाथी दुर्ग में लाकर महाराणा को भेंट किये। शाही सेना ने नाडोल एवं केलवाड़ा की तरफ से नाकाबंदी करके दुर्ग को घेरना आरम्भ किया।

तब महाराणा ने यह सोचकर कि किले में रसद का आना कठिन हो जायेगा, वह राव अखैयराज सोनगरा (Akhairaj Songara) के पुत्र भाण सोनगरा (Bhan Songara) को कुंभलगढ़ का दुर्गपति नियुक्त करके राणपुर चला गया। महाराणा प्रताप की माँ महारानी जयवंता बाई (Jaiwanta Bai) अखैराज सोनगरा की पुत्री थी और भाण सोनगरा महाराणा प्रताप का मामा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

महाराणा प्रताप की हत्या करना चाहता था अकबर ! (133)

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महाराणा प्रताप की हत्या करना चाहता था अकबर

अकबर (Akbar) किसी भी कीमत पर महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की हत्या करना चाहता था किंतु उसके सेनापति इस कार्य में सफल नहीं हो पा रहे थे। इस कारण अकबर अत्यंत निराश रहा करता था। अकबर ने सेनापतियों से कहा महाराणा को मारे बिना आओगे तो तुम्हारा सिर कलम होगा!

अकबर के सेनापति शाहबाज खाँ (Shahbaz Khan Kamboh) ने महाराणा प्रताप को कुंभलगढ़ के दुर्ग (Kumbhalgarh Fort) में घेर लिया किंतु महाराणा प्रताप ने अखैराज सोनगरा (Akhairaj Songara) के पुत्र भाण सोनगरा (Bhan Songara) को कुंभलगढ़ का दुर्गपति बनाकर दुर्ग उसे सौंप दिया तथा स्वयं राण (Ran Village) चला गया। अबुल फजल (Abul Fazal) ने लिखा है कि महाराणा प्रताप के दुर्ग से चले जाने के बाद कुंभलगढ़ के दुर्ग में अकस्मात ही एक बड़ी तोप फट गई जिससे दुर्ग में रखा हुआ लड़ाई का सामान जल गया।

इस पर भाण सोनगरा ने दुर्ग के द्वार खोल दिये। कविराज श्यामलदास (Kaviraj Shyamaldas) ने लिखा है कि भाण सोनगरा मुगलों पर काल बनकर टूट पड़ा। इस युद्ध में भाण सोनगरा एवं बहुत से नामी राजपूत, दुर्ग के द्वार एवं मंदिरों पर लड़ते हुए काम आये। कुंभलगढ़ दुर्ग पर शाहबाज खाँ का अधिकार हो गया।

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डॉ. गिरीशनाथ माथुर ने अपने शोधपत्र ‘महाराणा प्रतापकालीन दीवेर युद्ध’ (Battle of Dewair) में लिखा है कि महाराणा को कुंभलगढ़ दुर्ग में न पाकर शाहबाज खाँ ने अगले दिन दोपहर में गोगूंदा (Gogunda) पर आक्रमण किया। महाराणा को वहाँ भी न पाकर शाहबाज खाँ आधी रात को उदयपुर (Udaipur) में घुस गया और वहाँ भारी लूटपाट मचाई किंतु महाराणा वहाँ भी नहीं था। महाराणा इस दौरान गोड़वाड़ (Godwar) क्षेत्र में स्थित सूंधा के पहाड़ों (Sundha Mountains) में चला गया। इधर शाहबाज खाँ की हताशा बढ़ती जा रही थी और उधर अकबर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वह जल्द से जल्द महाराणा प्रताप की हत्या का समाचार सुनना चाहता था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि शाहबाज खाँ महाराणा प्रताप को ढूंढने बांसवाड़ा (Banswara) की तरफ चला गया। वह दिन और रात बांसवाड़ा की तरफ के पहाड़ों में महाराणा को ढूंढता रहा किंतु महाराणा की छाया को भी नहीं छू सका और थक-हार कर पंजाब की तरफ चला गया जहाँ उन दिनों बादशाह का डेरा था। शाहबाज खाँ के जाते ही महाराणा प्रताप फिर से पहाड़ों से निकल आया। कविराज श्यामलदास ने लिखा है कि जब छप्पन की तरफ स्थित चावण्ड के राठौड़ उत्पात करने लगे तो महाराणा ने राठौड़ों के स्वामी लूणा को चावण्ड से निकाल दिया तथा स्वयं अपना निवास नियत करके, चावण्ड में रहने लगा। महाराणा प्रताप ने चावण्ड (Chavand) में अपने महल तथा चामुण्डा माता का मंदिर (Chamunda Mata Temple) बनवाया जो आज भी विद्यमान हैं।

गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि इन्हीं दिनों भामाशाह ने अकबर के अधिकार वाले मालवा प्रांत (Malwa Region) पर आक्रमण करके मुगलों से 25 लाख रुपये तथा 20 हजार अशर्फियां वसूल कीं। भामाशाह (Bhamashah) ने वे अशर्फियां चूलियां ग्राम (Chulia Village) में महाराणा को भेंट की।

इस धन से 25 हजार सैनिक 12 वर्ष तक जीवन निर्वाह कर सकते थे। भामाशाह द्वारा दी गई इस धनराशि के कारण भामाशाह मेवाड़ के इतिहास में अमर हो गया। उसे अद्भुत दानवीर के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हो गई।

अकबर (Akbar) इन दिनों पंजाब में था। जब उसने महाराणा प्रताप की इन कार्यवाहियों के बारे में सुना तो वह क्रोध से तिलमिला गया। अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर ने शाहबाज खाँ को बुलाकर कहा कि तुम अभी मेवाड़ जाओ। महाराणा प्रताप की हत्या अब अकबर की एकमात्र इच्छा बन गया था।

उसके साथ मुहम्मद हुसैन, शेख तीमूर बदख्शी और मीरजादा अली खाँ को भी भेजा गया। इन सेनापतियों से कहा गया कि यदि तुम प्रताप का दमन किये बिना वापस आओगे तो तुम्हारा सिर कलम कर दिया जायेगा। शाहबाज खाँ को, नई सेनाओं की भर्ती के लिये बहुत बड़ा खजाना भी दिया गया।

दिसम्बर 1578 में शाहबाज खाँ पुनः मेवाड़ के लिये रवाना हुआ। उसके आते ही प्रताप फिर से पहाड़ों में चला गया। मुगल सेनाएं तीन महीने तक पहाड़ों में भटकती रहीं और महाराणा प्रताप को ढूंढती रहीं किंतु महाराणा प्रताप मुगल सेना के हाथ नहीं लगा। इस पर ई.1580 के आरम्भ में शाहबाज खाँ मैदानी क्षेत्र के थानों पर मुगल अधिकारी नियुक्त करके मेवाड़ से चला गया।

शाहबाज खाँ, प्रताप को मारे या पकड़े बिना ही फिर से अकबर के दरबार में लौटा था। इस कारण अकबर शाहबाज खाँ से बहुत नाराज हुआ। अकबर ने शाहबाज खाँ का सिर तो कलम नहीं किया किंतु उससे अजमेर की सूबेदारी छीन ली तथा मिर्जा खाँ अर्थात् अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का सूबेदार बना दिया।

अकबर के इस कदम से शाहबाज खाँ असंतुष्ट हो गया। मुंशी देवी प्रसाद ने लिखा है कि एक दिन शाहबाज खाँ ने बादशाह के दरबार में अवज्ञा की तो अकबर ने उसे रायसल दरबारी के पहरे में रखवा दिया।

डॉ. गिरीशनाथ माथुर ने लिखा है कि शाहबाज खाँ के चले जाने पर महाराणा ई.1580 में पुनः मेवाड़ आया तथा एक वर्ष तक गोगूंदा से 16 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित ढोल गांव में रहा।

तत्पश्चात् महाराणा, तीन वर्ष तक गोगूंदा (Gogunda) से पांच किलोमीटर दूर बांसड़ा गांव में रहा। इस बीच प्रताप ने पूरे मेवाड़ में राजाज्ञा प्रचारित करवाई कि मेवाड़ी प्रजा मैदानी भाग में खेती न करे। यदि किसी ने एक बिस्वा भूमि पर भी खेती करके मुसलमानों को हासिल दिया तो उसका सिर तलवार से उड़ा दिया जायेगा। इस आज्ञा के बाद मेवाड़ के किसान मैदानी क्षेत्रों को खाली करके पहाड़ों पर चले गये और वहाँ किसी तरह अपना पेट पालने लगे।

कविराज श्यामलदास (Kaviraj Shyamaldas) ने लिखा है कि जब मेवाड़ से अनाज का एक दाना भी नहीं मिला तो मुगल सेनाएं देश के दूसरे हिस्सों से अनाज मंगवाने लगीं। इस अनाज को प्रताप के सैनिक लूट लिया करते थे। एक बार प्रताप को सूचना मिली कि ऊँटाले के एक किसान ने शाही थानेदार की आज्ञा से अपने खेत में सब्जी बोई है।

उस किसान को रात के समय मुगल सेना के शिविर में रखा जाता था ताकि महाराणा उसका सिर न काट सके। महाराणा प्रताप ने एक रात शाही फौज में घुसकर किसान का सिर काट डाला और लड़ता-भिड़ता फिर से पहाड़ों में चला गया। प्रताप की इस कार्यवाही के बाद उस सम्पूर्ण प्रदेश में खेती पूरी तरह बंद हो गई जिसमें मुगल सेना का शिविर लगा हुआ था।

कर्नल जेम्स टॉड (James Tod) ने लिखा है कि उन दिनों आगरा से यूरोप के बीच का व्यापार सूरत बंदरगाह (Surat Bandargah) के माध्यम से होता था। प्रताप के भय से यह समस्त व्यापार बंद हो गया क्योंकि आगरा से सूरत तक जाने के लिये मेवाड़ से होकर जाना पड़ता था और प्रताप के सिपाही इस माल को लूट लेते थे।

इस बीच हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) को हुए सात साल बीत गए। चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गोगूंदा और उदयपुर पर अब भी मुगलों का अधिकार था और महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) पहाड़ी गांवों में रह रहा था। अकबर (Akbar) अपनी सारी शक्ति मेवाड़ के विरुद्ध झौंककर पूरी तरह निराश हो गया था। अक्टूबर 1583 में महाराणा ने कुंभलगढ़ पर फिर से अधिकार करने की योजना बनाई। सबसे पहले उसने दिवेर थाने पर आक्रमण किया जहाँ अकबर की ओर से सुल्तान खाँ नामक थानेदार नियुक्त था।

 प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान उदयपुर में उपलब्ध ‘सूर्यवंश’ (Suryavansh) नामक ग्रंथ में लिखा है कि जब प्रताप की सेना ने दिवेर पर आक्रमण किया तो आसपास के पांच और मुगल थानेदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिवेर पहुँच गये। महाराणा प्रताप की हत्या अब तक नहीं हो पाई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

पीथल और पाथल (134)

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पीथल और पाथल

पीथल (Pithal) और पाथल (Pathal) बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीसिंह (Kunwar Prithvisingh Rathore) और मेवाड़ के महाराणा प्रतापसिंह (Maharana Pratap) को कहा जाता है। कन्हैयालाल सेठिया (Kanhaiyalal Sethia) ने इसी शीर्षक से एक कविता लिखकर पीथल और पाथल के बीच हुए संवाद का काव्यमय वर्णन किया है। यह घटना डिंगल के कवियों में विशेष लोकप्रिय है जिसमें कहा गया है कि प्रताप रूपी सिंह अकबर (Akbar) रूपी गीदड़ के साथ नहीं बैठेगा!

राजस्थान में यह जनश्रुति प्रचलित है कि एक दिन अकबर ने अपने दरबार में रहने वाले बीकानेर के राजा रायसिंह राठौड़ (Maharaja Raisingh of Bikaner) के छोटे भाई पृथ्वीराज राठौड़ से कहा कि राणा प्रताप अब हमें बादशाह कहने लगा है और हमारी अधीनता स्वीकार करने पर उतारू हो गया है।

कुंअर पृथ्वीराज, भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था तथा अपने समय का श्रेष्ठ कवि था। जब उसने अकबर के मुँह से यह बात सुनी तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने अकबर से कहा कि यह सूचना असत्य है। इस पर अकबर ने कहा कि तुम सत्य सूचना मंगवाकर मुझे सूचित करो।

मलसीसर ठाकुर भूरसिंह शेखावत ने ‘महाराणा यश प्रकाश’ में लिखा है कि इस पर पृथ्वीराज राठौड़ ने नीचे लिखे हुए दो दोहे बनाकर महाराणा के पास भेजे-

पातल जो पतसाह, बोलै, मुख हूंतां बयण।

मिहर पछम दिस मांह, ऊगे कासप राव उत।।

पटकूं मूंछां पाण, के पटकूं निज तन करद।

दीजे लिख दीवाण, इण दो महली बात इक।।

अर्थात्- यदि पातल (महाराणा प्रताप) अकबर को अपने मुख से बादशाह कहे तो कश्यप का पुत्र (सूर्य) पश्चिम दिशा में उग जावे। अर्थात् यह असंभव है। हे दीवाण! (महाराणा) मैं अपनी मूंछों पर ताव दूँ अथवा अपनी तलवार से अपने ही शरीर पर प्रहार करूं, इन दो में से एक बात लिख दीजिये।

ज्ञातव्य है कि उदयपुर के महाराणा, भगवान एकलिंगजी को मेवाड़ का राजा और स्वयं को उनका दीवान अर्थात् मंत्री कहते थे। भूरसिंह शेखावत ने महाराणा यशप्रकाश में लिखा है कि महाराणा ने इन दोहों का उत्तर इस प्रकार भिजवाया-

तुरक कहासी मुख पतौ, इण तन सूं इकलिंग।

ऊगै जांही ऊगसी, प्राची बीच पतंग।।

खुसी हूंत पीथल कमध, पटको मूंछां पाण।

पछटण है जेतै पतौ, कलमाँ सिर केवाण।

सांग मूंड सहसी सको, समजस जहर सवाद।

भड़ पीथल जीतो भलां, वैण तुरक सूं बाद।।

अर्थात्- भगवान् एकलिंगजी (Bhagwan Ekling Ji) इस शरीर से (प्रतापसिंह के) मुख से अकबर को तुर्क ही कहलवायेंगे और सूर्य यथावत् पूर्व दिशा में उदय होता रहेगा। हे राठौड़ पृथ्वीराज! जब तक प्रतापसिंह की तलवार यवनों के सिर पर है तब तक आप अपनी मूछों पर खुशी से ताव देते रहिये।

प्रताप अपने सिर पर सांग (भाले) का प्रहार सहेगा क्योंकि अपने बराबर वाले का यश जहर के समान कटु होता है। हे वीर पृथ्वीराज! उस तुर्क अर्थात् अकबर के साथ के वचन रूपी विवाद में आप भलीभांति विजयी हों।

कन्हैयालाल सेठिया ने भी महाराणा द्वारा कष्ट सहन करके भी संघर्ष जारी रखने के संदर्भ में पीथल और पाथल शीर्षक से एक बड़ी भावप्रवण काव्य की रचना की है। उन्होंने लिखा है कि एक बार महाराणा ने अपने परिवार के दुःखों से घबराकर अकबर को पत्र लिखा कि मैं तुम्हारी अधीनता स्वीकार करने को तैयार हूँ। 

अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।

नान्हों सो अमर्यो चीख पड़्यो राणा रो सोयो दुःख जाग्यो।

     हूँ लड़्यो घणो हूँ सह्यो घणो मेवाड़ी मान बचावण नै।

     मैं पाछ नहीं राखी रण में बैर्यां रो खून बहावण नै।

जब याद करूँ हल्दीघाटी नैणां में रगत उतर आवै।

सुखदृदुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा जावै।

     पण आज बिलखतो देखूँ हूँ जद राजकंवर नैॉ रोटी नै।

     तो क्षात्र धर्म नै भूलूँ हूँ भूलूँ हिंदवाणी चोटी नै।

आ सोच हुई दो टूक तड़कॉ राणा री भीम बजर छाती।

आँख्यां मैं आँसू भर बोल्यो हूँ लिखस्यूँ अकबर नै पाती।

     राणा रो कागद बाँच हुयो अकबर रो सपनो सो सांचो।

     पण नैण कर्या बिसवास नहीं जद् बाँच बाँच नै फिर बाँच्यो।

बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथल नै तुरत बुलावण नै।

किरणां रो पीथल आ पूग्यो अकबर रो भरम मिटावण नै।

     म्हें बांध लियो है पीथल! सुणॉ पिंजरा में जंगली सेर पकड़।

     यो देख हाथ रो कागद है तू देखां फिरसी कियां अकड़।

हूँ आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है।

अब बता मनै किण रजवट नैॉ रजपूती खून रगां में है।

     जद पीथल कागद ले देखी राणा री सागी सैनांणी।

     नीचै सूं धरती खिसक गयी आख्यों मैं भर आयो पाणी।

पण फेर कही तत्काल संभल आ बात सफा ही झूठी है।

राणा री पाग सदा ऊंची राणा री आन अटूटी है।

     ज्यो हुकुम होय तो लिख पूछूँ, राणा नै कागद रै खातर।

     लै पूछ भला ही पीथल! तूॉ आ बात सही बोल्यो अकबर।

म्हें आज सुणी हैॉ नाहरियो, स्याळां रै सागै सोवैलो।

म्हें आज सुणी हैॉ सूरजड़ो बादल री ओटां खोवैलो

     पीथल रा आखर पढ़ता ही राणा री आँख्यां लाल हुई।

     धिक्कार मनैॉ हूँ कायर हूँ नाहर री एक दकाल हुई।

हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं मेवाड़ धरा आजाद रहै।

हूँ घोर उजाड़ां मैं भटकूँ पण मन में माँ री याद रह्वै

     पीथल के खिमता बादल री जो रोकै सूर उगाली नै।

     सिंहा री हाथल सह लेवै वा कूंख मिली कद स्याळी ने।

जद राणा रो संदेश गयो पीथल री छाती दूणी ही।

हिंदवाणों सूरज चमके हो अकबर री दुनियां सूनी ही।

यह एक श्रेष्ठ साहित्यिक रचना है जिसमें शौर्य के उच्च भावों की सृष्टि की गई है किंतु इस कविता का इतिहास की सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।

न तो कभी महाराणा अपने परिवार के दुःखों से घबराया, न कभी महाराणा के परिवार ने घास की रोटी खाई, न महाराणा कभी इतना निर्धन हुआ कि उसके पास खाने को अनाज भी न रहा।

न कभी महाराणा ने अकबर (Akbar) को लिखा कि वह अकबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार है। यह तो अकबर के द्वारा रचा गया केवल एक झूठ था जिस पर पृथ्वीराज राठौड़ ने महाराणा प्रताप को पत्र लिखकर वस्तुस्थिति पूछी थी और महाराणा ने उस पत्र का समुचित उत्तर भिजवाकर स्पष्ट कर दिया था कि मैंने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए पत्र नहीं लिखा।

ऐसा एक पत्राचार महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह (Maharana Amarsingh) तथा अब्दुर्रहीम खानखाना (Abdur Rahim Khan-i-Khana) के बीच हुआ था जिसकी चर्चा हम यथा-समय करेंगे।

 -डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

मीना बाजार (135)

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मीना बाजार

हिन्दू कवियों की दृष्टि में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Akbar) गौरवहीन पुरुष और निर्लज्जा नारियों को खरीदने के लिए मीना बाजार (Meena Bazar) लगाने वाला निर्लज्ज ग्राहक था!

जब कुंअर पृथ्वीराज राठौड़ (Kunwar Prithvisingh Rathore) को महाराणा (Maharana Pratap) की ओर से समुचित उत्तर मिल गया तो कुंअर पृथ्वीराज राठौड़ बहुत प्रसन्न हुआ और महाराणा की प्रशंसा में उसका उत्साह बढ़ाने के लिये उसने यह गीत लिखकर भेजा-

नर जेथ निमाणा निलजी नारी, अकबर गाहक बट अबट।

चोहटै तिण जायर चीतोड़ो, बेचै किम रजपूत घट।।

रोजायतां तणैं नवरोजै, जेथ मसाणा जणो जण।

हींदू नाथ दिलीचे हाटे, पतो न खरचै खत्रीपण।।

परपंच लाज दीठ नह व्यापण, खोटो लाभ अलाभ खरो।

रज बेचबा न आवै राणो, हाटे मीर हमीर हरो।।

पेखे आपतणा पुरसोतम, रह अणियाल तणैं बळ राण।

खत्र बेचिया अनेक खत्रियां, खत्रवट थिर राखी खुम्माण।।

जासी हाट बात रहसी जग, अकबर ठग जासी एकार।

है राख्यो खत्री ध्रम राणै, सारा ले बरतो संसार।।

अर्थात्-

जहाँ गौरवहीन पुरुष और निर्लज्ज नारियां हैं और जैसा चाहिये वैसा ग्राहक अकबर है, उस बाजार में चित्तौड़ का स्वामी राणा प्रताप रजपूती को कैसे बेचेगा?

 मुसलमानों के नौरोज में प्रत्येक व्यक्ति लुट गया किंतु हिन्दुओं का स्वामी प्रतापसिंह दिल्ली के उस बाजार में अपने क्षात्रत्व को नहीं बेचता।

राणा हम्मीर का वंशधर प्रताप, प्रपंची अकबर की लज्जाजनक दृष्टि को अपने ऊपर नहीं पड़ने देता और पराधीनता के सुख के लाभ को बुरा तथा अलाभ को अच्छा समझकर बादशाही दुकान पर रजपूती बेचने कदापि नहीं आता।

अपने पुरखों के उत्तम कर्त्तव्य देखते हुए महाराणा प्रताप ने भाले के बल से क्षत्रिय धर्म को अचल रक्खा, जबकि अन्य क्षत्रियों ने अपने क्षत्रियत्व को बेच डाला।

अकबर रूपी ठग भी एक दिन इस संसार से चला जायेगा और उसकी यह हाट भी उठ जायेगी परन्तु संसार में यह बात अमर रह जायगी कि क्षत्रियों के धर्म में रहकर उस धर्म को केवल राणा प्रतापसिंह ने ही निभाया।

अब पृथ्वी भर में सबको उचित है कि उस क्षत्रियत्व को अपने बर्ताव में लावें अर्थात् राणा प्रतापसिंह की भांति विपत्ति भोगकर भी पुरुषार्थ से धर्म की रक्षा करें।

इस पद में नौरोज के उत्सव (Nowruz Festival) में अपने वाले गौरवहीन पुरुषों, निर्लज्ज नारियों एवं अकबर जैसे ग्राहक का उल्लेख किया गया है। यह बताना समीचीन होगा कि नौरोज का उत्सव ईरानी प्रथा के अनुसार प्रत्येक नये सौर वर्ष के प्रारंभ में 1 फरवरी से 19 दिन तक मनाया जाता था।

मुगल बादशाह भी यह उत्सव बहुत धूमधाम से मनाते थे। अकबर इस दौरान हिन्दू राजाओं की तरह भव्य पोषाक धारण करके एवं ब्राह्मणों से तिलक लगवाकर शामियाने में बैठ जाता था।

इस अवसर पर अकबर के आदेश से मीना बाजार सजाया जाता था जिसमें मुसलमान अमीरों एवं हिन्दू उमरावों की औरतें दुकानें लगाती थीं जिन पर बादशाह तथा उसके हरम की औरतें खरीददारी करती थीं। रात भर नाच-गाना होता था।

कहीं-कहीं लिखा है कि इस बाजार में केवल अकबर (Akbar) तथा मुगल शहजादे (Mughal Princes) ही सामान खरीदने आते थे जबकि कहीं-कहीं यह भी लिखा है कि इस मेले में अकबर ही एकमात्र पुरुष होता था, शेष सब महिलाएं होती थीं।

कुछ लोगों का मानना है कि अकबर (Akbar) देश-विदेश की स्त्रियों से अपनी हवस बुझाता था। उसके हरम में देश-विदेश की पांच हजार औरतें थीं जो उसकी वासना-पूर्ति का खिलौना भर थीं। इन औरतों से भी अकबर को संतुष्टि नहीं होती थी। इसलिए उसने मीना बाजार का चलन आरम्भ किया जहाँ से वह अपनी पसंद की शहजादियों, अमीर जादियों एवं हिन्दू कुमारियों को अपने महल में बुलाता और अपने हरम में डाल लेता था।

विंसेट स्मिथ तथा अबुल फजल (Abul Fazal) आदि ने अकबर के हरम का विस्तार से उल्लेख किया है। पी. एन. ओक (Purushottam Nagesh Oak) ने अकबर के हरम में औरतों की स्थिति पशु-समूह के समान बताई है।

अबुल फजल के हवाले से सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि जब किसी मुगल अथवा हिन्दू अमीर की पत्नी अथवा पुत्री को अकबर के हरम में प्रवेश करने की इच्छा होती थी तब उसे लिखित में अनुमति मांगनी होती थी और उसे एक महीने तक शहंशाह के हरम में रहकर शहंशाह की सेवा करने के बाद अपने पति अथवा परिवार के पास लौट जाना होता था।

हालांकि मुझे इतिहास की किसी पुस्तक में उल्लेख नहीं मिला किंतु आधुनिक समय में डॉ. विवेक आर्य एवं नसीब सैनी आदि बहुत से लेखक हिन्दू वीरांगना किरण देवी का उल्लेख करते हैं।

उनके अनुसार जब अकबर ने बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज की रानी किरण देवी को अपनी हवस की शिकार बनाना चाहा तो किरण देवी ने अपनी कटार निकालकर अकबर पर आक्रमण कर दिया। बड़ी कठिनाई से अकबर के प्राण बच सके।

यद्यपि आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव, जवाहर लाल नेहरू एवं राहुल सांकृत्यायन आदि आधुनिक लेखकों ने अकबर के मीना बाजार का उल्लेख नहीं किया है तथापि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpai) ने अकबर द्वारा लगाए जाने वाले मीना बाजार को धिक्कारते हुए लिखा है- 

मैं वीर पुत्र, मेरी जननी के जगती में जौहर अपार।

अकबर के पुत्रों से पूछो, क्या याद उन्हें मीना बाजार?

क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग में जलने वाला आग प्रखर?

जब हाय सहस्रों माताएं, तिल-तिल जलकर हो गईं अमर।

वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूँ।

यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

सिराजुद्दौला जिंदा होकर लौटा आया है!

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सिराजुद्दौला

बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला ईस्वी 1757 में मर गया था किंतु पूरे 267 साल बाद फिर से जीवित होकर भारत में घुसने की कोशिश कर रहा है।

बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के अधीन वर्तमान बांग्लादेश के साथ-साथ पश्चिमी बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र भी शामिल थे। बांग्लादेश के मुसलमानों ने मांग की है कि सिराजुद्दौला के शासन वाले पूरे क्षेत्र बांग्लादेश को मिलने चाहिए।

बांग्लादेश के मुसलमानों की इस बात के दो अर्थ निकलते हैं, पहला यह कि नवाब सिराजुद्दौला जैसे घृणित लोग कभी मरते नहीं, वे हर काल में जीवित होकर लौट कर आते हैं और दूसरा यह कि बांगलादेश के मुसलमान स्वयं को सिराजुद्दौला के वंशज और उत्तराधिकारी समझते हैं।

ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान में कुछ लोग स्वयं को महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी की औलाद मानते हैं तथा उनके नामों से तोपें और मिसाइलें बनाकर दुनिया को मारना चाहते हैं।

ठीक वैसे ही जैसे भारत में कुछ लोग स्वयं को बाबर के वंशज और उत्तराधिकारी मानते हैं, और वक्फ के माध्यम से पूरे भारत को हड़प जाना चाहते हैं।

आज के भारत में वक्फ बोर्ड के पास दस लाख एकड़ धरती है, इतनी धरती तो स्वयं महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, बाबर या सिराजुद्दौला के पास भी नहीं थी।

बांगलादेश के मुसलमानों की इस खतरनाक मांग पर मीठी सी प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बांग्लादेश के उन मुसलमानों को खुश एवं सुखी रहने की शुभकामनाएं देते हुए कहा है- ‘आम्ही लॉलीपॉप खात बसणार नाही।’ अर्थात् हम लॉलीपॉप खाकर बैठे नहीं रहेंगे।

ममता बनर्जी ने यह लॉलपॉप छाप प्रतिक्रिया इसलिए दी है कि कहीं पश्चिमी बंगाल में बैठे उनके मुस्लिम वोटर नाराज न हो जाएं। ये वही ममता बनर्जी हैं जो अपने मुस्लिम मतदाओं को खुश करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दीपावली पर मिठाई के स्थान पर पत्थर भेजने की इच्छा व्यक्त कर चुकी हैं तथा नरेन्द्र मोदी की कमर में रस्सी बांधकर बांगलादेश भेजने का इरादा भी जता चुकी हैं।

हैरानी होती है ममता बनर्जी के मुस्लिम-मतदाता प्रेम को देखकर! क्या उनकी प्रतिक्रिया केवल इतनी सी होनी चाहिए थी कि हम बैठकर लॉलीपॉप नहीं खाएंगे! क्या उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था कि भारत माता की तरफ बढ़ने वाले हाथ काट दिए जाएंगे, भारत के विरुद्ध बोलने वालों की जीभ खींची ली जाएगी! जब तक मेरे शरीर में रक्त की एक बूंद है, तब तक कोई बांग्लादेशी भारत की एक इंच भूमि भी नहीं ले सकता!

ममता बनर्जी को यहीं पर छोड़ देते हैं, क्योंकि उनके लिए इतना ही काफी है। अब  थोड़ी सी चर्चा उस सिराजुद्दौला की करते हैं जो मरने के बाद जीवित होकर एक बार फिर से भारत में घुसना चाहता है।

ईस्वी 1748 में दिल्ली का निकम्मा और अय्याश बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला घृणित यौन रोगों की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए अत्यधिक शराब पीकर मर गया। उसके मरते ही बंगाल के सूबेदार अली वर्दी खाँ ने स्वयं को बंगाल का स्वतंत्र नवाब घोषित कर दिया।

उस समय बंगाल सूबे में आज का बांग्लादेश, पश्चिमी बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र आते थे। अलीवर्दी खाँ के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने अपनी छोटी पुत्री के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया। जब ईस्वी 1756 में अलीवर्दी खाँ मर गया तो अलीवर्दी खाँ का यही नवासा सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना।

इसी सिराजुद्दौला और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना के बीच 23 जून 1757 को कलकत्ता के पास प्लासी के मैदान में प्लासी का युद्ध लड़ा गया था। सिराजुद्दौला की सेना में 50,000 सैनिक थे। जबकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर लॉर्ड क्लाइव के पास केवल 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे।

नवाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों पर चारों तरफ से आक्रमण करने के लिए अपनी सेना के चार टुकड़े किए तथा प्रत्येक टुकड़े को एक मुस्लिम सेनापति के अधीन रखा। जब युद्ध आरम्भ होने ही वाला था, तब नवाब सिराजुद्दौला के चार में से तीन सेनापति सिराजुद्दौला को छोड़कर लॉर्ड क्लाइव की ओर चले गए। इन बागी सेनापतियों का नेतृत्व नवाब सिराजुद्दौला का जवांई मीर जाफर कर रहा।

नवाब सिराजुद्दौला भी युद्ध का मैदान छोड़कर पटना की ओर भाग गया। अंग्रेजों ने उसे पटना पहुंचने से पहले ही पकड़कर कैद कर लिया। 28 जून 1757 को अँग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।

2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन ने अपने नाना नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कर दी। इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने लिखा है- ‘प्लासी एक ऐसा सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी लोगों और मीर जाफर ने नवाब को अँग्रेजों के हाथों बेच दिया था।’

इस युद्ध के बाद अंग्रजों ने भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित की। इसी बंगाल से आगे बढ़कर अंग्रेजों ने पहले अवध पर, बाद में दिल्ली पर और अंत में लगभग पूरे भारत पर कब्जा किया था।

जब अंग्रेजों ने भारत में 11 ब्रिटिश प्रांत स्थापित किए, तब बंगाल को भी एक प्रांत बनाया गया था। उस बंगाल प्रांत में आज का बांग्लादेश, पश्चिमी बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र आते थे।

ईस्वी 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल प्रांत के दो टुकड़े किए। उसने पूर्वी बंगाल नामक प्रांत में मुसलमानों की संख्या अधिक रखकर बंगाली हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बनाया और पश्चिमी बंगाल में बिहारी एवं उड़िया भाषी लोगों की संख्या रखकर बंगाली हिन्दुओं का अल्पंख्यक बनााया।

कर्जन का उद्देश्य यह था कि पूर्वी बंगाल के लोग मजहब के नाम पर बंगाली हिन्दुओं को मारें तथा पश्चिमी बंगाल के लोग भाषा के नाम पर बंगाली हिन्दुओं को मारें।

उस समय बंगाली हिन्दुओं ने ऐसी अद्भुत एकता दिखाई तथा इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया कि ईस्वी 1911 में अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन रद्द करके फिर से एक प्रांत बनाना पड़ा।

ईस्वी 1947 में जब जिन्ना ने भारत का विभाजन करवाया, तब वह पूरा का पूरा बंगाल पूर्वी पाकिस्तान के नाम से चाहता था किंतु सरदार पटेल तथा उनके सचिव वी. पी. मेनन, वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन को यह समझाने में सफल रहे कि यदि पूरा बंगाल पाकिस्तान को दिया गया तो बंगाल में हिन्दुओं का नर-संहार होगा। इसलिए यह तय किया गया कि पूर्वी बंगाल अर्थात् मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान को दिया जाए तथा पश्चिमी बंगाल अर्थात् हिन्दू बहुल क्षेत्र भारत में रहने दिया जाए।

इस विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान अर्थात् आज के बांगलादेश से हिन्दुओं को भारत अर्थात् आज के पश्चिमी बंगाल में आना था और यहाँ के मुसलमानों को पूर्वी पाकिस्तान में जाना था किंतु गांधी की जिद पर ऐसा नहीं हो सका। इस कारण बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू जनसंख्या पूर्वी पाकिस्तान में रह गई जिन्हें 1947 के बाद सेे ही समाप्त किया जा रहा है।

1947 में बांग्लादेश में 22 प्रतिशत हिन्दू थे। जब भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं का नरसंहार हुआ तब वहां के हिन्दुओं ने पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं के लिए एक अलग देश की मांग की किंतु नेहरू ने लियाकत अली से समझौता कर लिया तथा बंगाली हिन्दुओं की इस मांग को ठुकरा दिया।

अब बांग्लादेश में केवल 8 प्रतिशत बंगाली हिन्दू रह गए हैं। बांग्लादेश के मुसलमान न केवल इन 8 प्रतिशत हिन्दुओं का सफाया करना चाहते हैं, अपितु पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा को बांग्लादेश में लेकर इन क्षेत्रों के हिन्दुओं का भी सफाया करना चाहते हैं।

इसी निश्चय के साथ पूरे 267 साल के बाद बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला न जाने किस कब्र से निकलकर बाहर आ गया है और पूरा बंगाल मांग रहा है। वही सिराजुद्दौला जिसे उसके ही दौहित्र मीरन ने अपनी ही तलवार से कतल कर दिया था।

ममता बनर्जी लॉलीपॉप खाने की बात करके, सिराजुद्दौला को रोकने की बजाय लीपापोती कर रही हैं ताकि ममता बनर्जी पर कोई देशद्रोही होने का आरोप न लगा सके। कानूनी रूप से देशद्रोही न सही, किंतु व्यावहारिक रूप से वे क्या हैं, कोई भी समझदार आदमी यह आसानी से समझ सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू धर्म के सिद्धांत ही बचा सकते हैं दुनिया को!

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हिन्दू धर्म के सिद्धांत

आज दुनिया भर में जिस तरह बमों और मिसाइलों की बरसात की जा रही है, उनसे मानव जाति का भविष्य अंधकारमय दिखाई देता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ऐसी स्थिति में केवल हिन्दू धर्म के सिद्धांत ही दुनिया को बचा सकते हैं!

विगत चौदह सौ साल से इस्लाम ने पूरी दुनिया में जेहाद छेड़ रखा है, इस कारण पूरी दुनिया मजहबी उन्माद की शिकार होती रही है। यदि संसार भर की सभ्यताओं को मजहबी उन्माद से बचने का तरीका यदि कोई बता सकता है, तो वह केवल हिन्दू धर्म के सिद्धांत ही हैं।

क्योंकि हिन्दू धर्म के सिद्धांत मनुष्य को प्राणी मात्र से प्रेम करने का सिद्धांत देते हैं। वे किसी रिलीजन, मजहब या पंथ की काराओं में बंद नहीं हैं। हिन्दुओं ने आज तक धरती के किसी कोने में किसी भी प्राणी को धर्म के प्रचार के लिए नहीं मारा है।

आज से लगभग दो हजार साल पहले जब ईसाई रिलीजन का उदय हुआ था तो ईसाइयों ने प्राचीन रोमन धर्म को मानने वाले लोगों का बेरहमी से कत्ल किया था और केवल उन्हीं लोगों को जीवित छोड़ा था जो ईसाई रिलीजन में आने को तैयार हुए। जनता की तो कौन कहे, उन रोमन सम्राटों को भी जहर देकर मार डाला गया जो ईसाई रिलीजन मानने को तैयार नहीं हुए। इस तरीके से ही सम्पूर्ण यूरोप को ईसाई बनाया गया। इसी तरीके से अमरीकी महाद्वीपों, अफ्रीकी महाद्वीप तथा ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के आदिवासियों को बलपूर्वक इसाई बनाया गया तथा एशिया महाद्वीप के बहुत से देशों में इसाइयत का प्रचार और प्रसार किया गया।

आज संसार की एक तिहाई जनसंख्या ईसाई रिलीजन को मानती है तथा दुनिया भर में ईसाइयों की कुल आबादी 238 करोड़ है। 30 देशों ने स्वयं को ईसाई देश घोषित कर रखा है। सम्पूर्ण यूरोप, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया के दशों की प्रजा बहुसंख्यक है। अफ्रीका और एशिया में भी बहुत से देशों की बहुसंख्यक जनता ईसाई है।  भारत और चीन सहित अनेक देशों में इसाई रिलीजन तेजी से पैर पसार रहा है।

आज से लगभग 1400 साल पहले जब इस्लाम का उदय हुआ, तब इस्लाम के प्रचारकों ने भी वही नीति अपनाई जो ईसाई रिलीजन ने अपनाई थी। अन्य मजहब वालों को मारो और उन्हें बलपूर्वक अपने मजहब में लाओ। आज दुनिया भर में 190 करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं। 57 देशों ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित कर रखा है।

आज दुनिया के कुल 193 देशों में से भारत सहित एशिया के कुछ ही देश बचे हैं जिनकी जनता ईसाई रिलीजन और इस्लाम मजहब के उदय से पहले प्रचलित धर्मों को मानती है। इनमें से इजराइल देश की बहुसंख्य जनता यहूदी धर्म को मानती है, भारत और नेपाल की बहुसंख्यक जनता हिन्दू धर्म को मानती है, चीन, जापान, कोरिया आदि एशियाई देशों की बहुसंख्य जनता बौद्ध धर्म को मानती है।

आज दुनिया में एक भी देश ऐसा नहीं है जिसने स्वयं को हिन्दू देश घोषित कर रखा हो। जिन-जिन देशों में इसाइयत का प्रसार बढ़ रहा है, उन-उन देशों में नास्तिकों की संख्या भी बढ़ रही है। चीन और कोरिया में नास्तिकों की बढ़ती हुई जनसंख्या को देखकर आश्चर्य होता है।

आज भी ईसाई रिलीजन एवं इस्लाम पूरी दुनिया को अपने-अपने मजहब में लेने के लिए प्रयासरत हैं। इनमें से अधिकतर प्रयास हिंसात्मक तरीकों से हो रहे हैं तो कुछ प्रयास भय, चमत्कार, लालच एवं अन्य तरीकों से हो रहे हैं। इन दो रिलीजन या मजहब वालों के अतिरिक्त दुनिया में तीसरा अन्य कोई रिलीजन या मजहब, दूसरे रिलीजन, मजहब या धर्म वालों को अपने भीतर लेने के प्रयास नहीं करता। अर्थात् जो यहूदी नहीं है, वह यहूदी नहीं बन सकता, जो पारसी नहीं है, वह पारसी नहीं बन सकता।

हिन्दू धर्म की ऐसी स्थिति नहीं है, कोई भी व्यक्ति हिन्दू बन सकता है किंतु हिन्दू धर्म किसी भी अन्य रिलीजन या मजहब वालों को अपने भीतर लेने के लिए न तो प्रोत्साहित करता है और न प्रयास करता है। यहाँ तक कि इस काम को बुरा भी समझता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति चाहे तो वह हिन्दू धर्म अपना सकता है, बौद्ध बन सकता है, जैन बन सकता है, सिक्ख बन सकता है।

आज से लगभग 1300 साल पहले अरब के खलीफाओं की सेनाओं ने भारत में घुसकर मारकाट मचानी आरम्भ की। इन सेनाओं का कार्य हिन्दुओं को मुसलमान बनाना या उन्हें मार डालना था। उस समय हिन्दू प्रजा ने अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने के लिए हिन्दू धर्म के दरवाजे भीतर से बंद करने आरम्भ कर लिए।

इस्लाम से बचने के लिए हिन्दुओं ने हिन्दू धर्म के दरवाजों पर मोटे-मोटे ताले लटका दिए। ये ताले केवल अपनी जाति के अंतर्गत विवाह करने, किसी अन्य जाति के व्यक्ति के साथ बैठकर भोजन नहीं करने, किसी अन्य के हाथ का स्पर्श किया हुआ भोजन नहीं खाने जैसी परम्पराओं के रूप में थे। इनमें आचरण की शुद्धता, गौपूजा, शाकाहार, ईशभक्ति आदि की परम्पराएं शामिल थीं। तभी से हिन्दू धर्म पर जाति, धर्म, पंथ आदि के ताले लगे हुए हैं। इन तालों के कारण ही आज तक हिन्दू धर्म के सिद्धांत जीवित बच पाए हैं।

हिन्दू धर्म के दरवाजे पर सबसे बड़ा ताला यह लगाया गया कि जो व्यक्ति किसी भी प्रकार से या किसी भी कारण से एक बार ईसाई या मुसलमान हो जाता है, उसे हिन्दू धर्म में वापस स्वीकार नहीं किया जाए। हालांकि आर्य समाज ने इन तालों को खोलने के प्रयास किए, किंतु आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में होने वाली मूर्तिपूजा का इतना घनघोर विरोध किया कि सनातनी हिन्दुओं ने आर्यसमाज के प्रयासों को विफल कर दिया।

विगत चौदह सौ सालों में 57 देशों की लगभग सम्पूर्ण प्रजा इस्लाम स्वीकार कर चुकी है तथा बहुत से देशों में जनता का तेजी सी इस्लामीकरण हो रहा है। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं का चिंतित होना स्वाभाविक है कि वे हिन्दू धर्म के सिद्धांत कैसे बचाएं? अपनी संस्कृति एवं परम्पराओं की रक्षा कैसे करें?

भारत में यद्यपि 2011 के बाद से जनगणना नहीं हुई है तथापि बहुत सी डेमाग्राफी सम्बन्धी रिपोर्टें भारत सरकार को चेतावनी देती रही हैं कि कितने साल बाद भारत में मुसलमानों की संख्या कितनी हो जाएगी तथा कितने साल बाद भारत इस्लामिक देश हो जाएगा।

इस्लामिक कट्टरपंथियों ने भारत में गजवा ए हिन्द नामक कार्यक्रम चला रखा है जो पीएफआई, वक्फ बोर्ड, अल्पसंख्यक बोर्ड, लव जिहाद, लैण्ड जिहाद, थूक जिहाद, मूत्र जिहाद आदि उपकरणों के माध्यम से भारत में इस्लामीकरण का काम आगे बढ़ाता है। इण्डोनेशिया में बैठे जाकिर नाइक जैसे कट्टरपंथी लोग पूरी दुनिया में इस्लामीकरण को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं।

इन कट्टरपंथियों के प्रयासों को विफल करने के लिए आवश्यक है कि हिन्दू जाति अपने दरवाजों पर लगे सांस्कृतिक तालों को फिर से खोले तथा उन कन्वर्टेड हिन्दुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाने का प्रयास करे जिनके पुरखे विगत 1400 सालों में मुसलमान या इसाई बन गए।

वर्ष 2024 के अंतिम महीनों में उत्तर प्रदेश के जौनपुर नगर में 100 कन्वर्टेड परिवारों ने फिर से हिन्दू धर्म में वापसी की है। इन लोगों के पूर्वज ब्राह्मण थे और जजिया न दे पाने के कारण इस्लाम स्वीकार करने को विवश हुए थे। ये 100 परिवार अब फिर से सत्य-सनातन धर्म में लौट आए हैं। घर वापसी के लिए इन परिवारों के समक्ष क्या चुनौतियां थीं, उनका समाजशास्त्रीय अध्ययन करवाया जाना चाहिए।

हिन्दू धर्म में वापसी करने वालों को बताया जाना चाहिए कि हिन्दू बनने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता है, केवल मंदिर या तीर्थ में जाकर या अपने ही घर में रहकर मन में यह स्वीकार करना पड़ता है कि मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं। मैं आज के बाद किसी भी मनुष्य या जीव के प्रति हिंसा नहीं करूंगा और दूसरों को भी हिंसा न करने के लिए प्रेरित करूंगा। समस्त प्राणियों में अपने भगवान को देखूंगा। मेरे लिए कोई पराया नहीं है, मैं सबका हूँ और सब मेरे हैं। हिन्दू होने का अर्थ अपने भीतर केवल इतना परिवर्तन करना ही है।

हिन्दू धर्म में वापसी करने वाला कोई जनेऊ पहने या न पहने, तिलक लगाए या न लगाए, मूर्ति पूजा करे या न करे, कोई व्रत करे या न करे, किसी तीर्थ में जाए या न जाए, केवल और केवल श्रीहरि विष्णु या शिवशंकर या भगवती दुर्गा के प्रति स्वयं को समर्पित करे, उनके चरणों का ध्यान करके सबसे उदारता का व्यवहार करे। वेदों और गायों को नमस्कार करे, बस इतने भर से आदमी हिन्दू हो जाता है और हिन्दू बना रहता है। आज जो एक सौ करोड़ से अधिक हिन्दू धरती पर रहते हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे ही हैं। हिन्दू धर्म के सिद्धांत हिन्दुओं को यही सिखाते हैं।

हिन्दुओं की घर वापसी के कार्य में कोई भय, लालच या दबाव से कार्य नहीं लिया जाना चाहिए। जो भी कट्टरपंथी चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई हों या किसी अन्य पंथ या मजहबी विचारों के हों, यदि इस कार्य में बाधा उत्पन्न करें तो उनके साथ कानूनी तरीके से निबटा जाना चाहिए।

केवल जौनपुर का अकेला प्रकरण नहीं है, विगत 10-15 वर्षों में घर वापसी के ऐसे सैंकड़ों प्रकरण निजी एवं सामूहिक स्तर पर हुए हैं। देश भर में हजारों ऐसे लोग, गांव एवं समुदाय हैं जो अब हिन्दू धर्म में वापसी करना चाहते हैं किंतु इन लोगों को अपने ही परिवार एवं समाज वालों द्वारा अत्याचार किए जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से की जा रही हिन्दू धर्म में वापसी में बाधा उत्पन्न करता है, अत्याचार करता है, हिंसा करता है तो घर वापसी करने वाले की रक्षा के लिए विशेष कानून बनना चाहिए तथा पीड़ित व्यक्ति को सरकार की ओर से निशुल्क कानूनी सहायता दी जानी चाहिए।

यदि भारतीय जनता पार्टी की सरकार इन कार्यों को करती है राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बढ़ावा मिलेगा। मजहबी कलह कम होगी तथा पूरे संसार के सामने एक मिसाल कायम होगी।

विगत पिचहत्तर साल की भारतीय राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि अनेकता में एकता जैसे नारे किसी काम के नहीं होते, एकता में ही एकता है। जब किसी देश की जनता में राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक एकता नहीं होती है, तभी अनेकता में एकता जैसे झूठे नारे लगाने पड़ते हैं। इसी लिए योगीजी ने बंटेंगे तो कटेंगे तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे जैसे नारे दिए हैं।

हिन्दू धर्म सबका है, यह किसी की बपौती नहीं है। हिन्दू धर्म किसी प्रकार के कन्वर्जन में विश्वास नहीं रखता किंतु अब उसे अपने दरवाजे कम से कम उन लोगों के लिए तो खोल ही देने चाहिए जो अपने पुरखों की परम्परा में लौटना चाहते हैं।

भारत के लोगों को शायद यह पता नहीं होगा कि गाजा में हमास की स्थापना करने वाले शेख इस्माइल अहमद यासीन के पुत्र शिन बेथ ने इसलिए इस्लाम छोड़कर ईसाइयत स्वीकार कर ली है कि वह मजहब के नाम पर इंसानों की हत्या होते हुए नहीं देखना चाहता। उसने भारत के हिन्दुओं का आह्वान किया है कि वे मध्य-एशिया में आएं और हमें गीता का उपदेश देकर युद्धों की विभीषिकाओं से बाहर निकालें।

इस्माइल अहमद यासीन के पुत्र शिन बेथ केवल और केवल हिन्दू धर्म के सिद्धांत ही आज मध्य एशिया में शांति स्थापित कर सकते हैं। जब विदेशी मुसमान इस बात को समझ सकते हैं तो वे लोग क्यों नहीं समझ सकते जिनके पुरखे हिन्दू थे और जो लोग विगत 800 सालों से हिन्दुओं के बीच में, हिन्दुओं के साथ रह रहे हैं।

देश को एक करने का हमारे सामने यही उज्जवल समय है। हम अपने दिलों और दिमागों के दरवाजे खोलें। जो घर छोड़कर चले गए हैं, उन्हें प्रेम से बुलाएं और इज्जत देकर बैठाएं। मेरी समझ में तो सुख और शांति की बस यही राह निकलती है। 

यदि हिन्दू जाति अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं परम्परा को बचाना चाहती है तो हिन्दू धर्म को अपने दरवाजे उन लोगों के लिए खोलने होंगे जो विगत एक हजार सालों में अन्य मजहबों में चले गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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