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गुजराती अमीरों की औरतें लूट लीं बदमाशों ने! (100)

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गुजराती अमीरों की औरतें - www.bharatkaitihas.com
गुजराती अमीरों की औरतें

जब बदमाशों ने बादशाह अकबर की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें लूट लीं तो बादशाह की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। यह मुगल बादशाह के इकबाल के लिए सीधी चुनौती थी।

गुजराती अमीरों का विद्रोह

जब अकबर (AKBAR) ने इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) को परास्त करके सम्भल की तरफ भाग जाने के लिए विवश कर दिया तो बादशाह अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ। एक दिन कुछ बदमाशों ने अफवाह फैला दी कि बादशाह ने शाही सेना को आदेश दिए हैं कि गुजरातियों के शिविर लूट लिए जाएं।

गुजराती अमीरों की औरतें

इस पर बहुत से लोग गुजराती अमीरों के शिविर पर चढ़ बैठे और लूटमार मचाने लगे। कुछ शाही सैनिक भी उन लुटेरों के बहकावे में आ गए और वे भी गुजरातियों का माल-असबाब लूटने लगे और उनकी स्त्रियों को ले भागे। यह एक विचित्र बात थी, गुण्डे शहंशाह की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें ले भागे थे!

जब शहंशाह अकबर को इस बात की जानकारी मिली तो उसने अपने उच्च सेनापतियों को आदेश दिए कि तुरंत इस लूटपाट को बंद किया जाए तथा लुटेरों को पकड़ कर मेरे समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अकबर (AKBAR) के सेनापतियों ने थोड़ी ही देर में स्थिति पर नियंत्रण पा लिया।

लुटेरों को दण्ड

बादशाह अपने दरबार में जाकर बैठ गया। लुटेरों को पकड़कर उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया। अकबर (AKBAR) ने वहीं पर हाथी बुलवाए और अपने सामने ही उन लोगों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया।

उस काल में अपराधियों को दण्ड देने में इतनी ही देर लगती थी। क्योंकि तब तक वकीलों की वह फौज अस्तित्व में नहीं आई थी जो अदालतों से तारीख पर तारीख लेकर मुकदमों को जीवन भर चला सके।

अकबर (AKBAR) के शासन काल में न अदालतों को कहीं पर समन भेजने पड़ते थे, न अदालत दर अदालत अपीलों का सिलिसिला चलता था, न साक्ष्य जुटाए जाते थे, न अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करने वाले आयोग होते थे। न अपराधियों को जेल में बंद करके बिरयानी खिलाने का प्रबंध किया जाता था।

जराती अमीरों की औरतें वापस

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शहंशाह के विश्वसनीय लोग, शहंशाह के समक्ष जो कुछ भी कहते थे, उसी को आरोपी, उसी को गवाह, उसी को साक्ष्य तथा उसी को फोरेंसिक जांच मानकर फैसला कर दिया जाता था, वही न्याय था। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। पैतृक अधिकार से प्राप्त, निर्णय एवं न्याय करने की इसी शक्ति में, शासकीय प्रतिभा का सर्वोच्च प्रदर्शन निहित था। अकबर (AKBAR) ने भी पैतृक अधिकार से प्राप्त इस न्यायिक प्रतिभा का आनन-फानन में प्रदर्शन करके अपने शिविर में शांति स्थापित कर ली। यदि अकबर (AKBAR) अपराधियों पर कार्यवाही करने में थोड़ी भी ढिलाई बरतता तो उसके शिविर में शांति स्थापित होनी संभव नहीं थी। अपराधियों के हौंसले बढ़ते रहते और ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहतीं। गुजराती अमीरों की औरतें उन्हें वापिस लौटा दी गईं। इस विद्रोह को कुचलने के बाद अकबर ने उन गुजराती अमीरों को इब्राहीम हुसैन मिर्जा से छीने गए इलाकों का अधिकारी बना दिया जिन्हें वह अपने प्रति विश्वस्त समझने लगा था। इससे गुजराती अमीरों के शिविर में शांति का वातावरण बन गया। गुजराती सुल्तान के वजीर इतिमाद खाँ गुजराती को इन सब गुजराती अमीरों के ऊपर नियुक्त किया गया। इन अमीरों ने बादशाह को वचन दिया कि वे गुजरात से बागी मिर्जाओं को मार भगाएंगे तथा भविष्य में कभी भी उनका साथ नहीं देंगे।

अकबर की खंभात यात्रा

इसके बाद अकबर (AKBAR) ने खंभात जाने का विचार किया ताकि वह समुद्र देख सके। उसने आज तक कोई समुद्र नहीं देखा था। जब अकबर (AKBAR) खंभात पहुंचा तो उसने खंभात का बंदरगाह अपने अमीर हसन खाँ खजांची के सुपुर्द कर दिया।

अभी बादशाह खंभात में ही था कि उसे समाचार मिला कि उसने जिन गुजराती अमीरों पर विश्वास करके उन्हें जागीरें और अधिकार दिए थे, उन्होंने बगावत कर दी है। इख्तियारमुल्क नामक गुजराती अमीर शाही शिविर छोड़कर भाग गया है तथा इतिमाद खाँ ने अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को बंदी बना लिया है।

इस पर अकबर (AKBAR) ने शाबास खाँ नामक सेनापति को खंभात से अहमदाबाद भेजा ताकि अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को मुक्त करवाया जा सके और धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर बंदी बनाया जा सके।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि जब बादशाह खंभात में था, तब रूम, सीरिया, ईरान और तूरान के रहने वाले लोग उसकी सेवा में उपस्थित हुए। अकबर (AKBAR) ने उनसे भेंट करके उन्हें संतुष्ट किया। खंभात से अकबर बड़ौदा के लिए रवाना हो गया।

बड़ौदा पर अधिकार

यह नगर इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के अधिकारियों के अधीन था। अकबर (AKBAR) ने बड़ौदा पर अधिकार कर लिया। यहाँ से उसने अमीरों का एक दल चांपानेर के लिए रवाना किया ताकि वहाँ से भी विद्रोही मिर्जाओं के अधिकारियों को खदेड़ा जा सके।

मिर्जा अजीज कोका की नियुक्ति

जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था, तब उसने मिर्जा अजीज कोका  (AZIZ KOKA) को गुजरात का सूबेदार नियुक्त करके उसे अहमदाबाद भेज दिया क्योंकि उन दिनों अहमदाबाद ही गुजरात की राजधानी थी। अभी अकबर (AKBAR) बड़ौदा में ही था कि शाबास खाँ आदि मुगल अमीर धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर ले आए।

उन्हें अकबर (AKBAR) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वे बादशाह के समक्ष की गई प्रतिज्ञा भंग कर चुके थे तथा बादशाह का विश्वास खो चुके थे। इसलिए अकबर ने उन्हें फिर से अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों के नियंत्रण में रख दिया।

सूरत दुर्ग पर आक्रमण का विचार

अब अकबर (AKBAR) ने सूरत दुर्ग पर आक्रमण करने का विचार किया। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि सूरत का किला ई.1539 में मुगल सेनापति चिंगिज खाँ ने पुर्तगालियों को रोकने के लिए बनाया था।

 चिंगिज खाँ की मृत्यु के बाद यह दुर्ग विद्रोही मिर्जाओं का केन्द्र बन गया था किंतु हुमायूँ (HUMAYUN) ने उनका विद्रोह समाप्त करके उनकी जगह हम्जाबान को सूरत का दुर्गपति बनाया था। जब सूरत दुर्ग में यह सूचना पहुंची कि इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) पराजित होकर भाग गया है तथा बादशाह बड़ौदा तक आ पहुंचा है तो सूरत के किले में घबराहट फैल गई।

उस समय अकबर (AKBAR) के मरहूम चाचा मिर्जा कामरान की पुत्री गुलरुख बेगम भी अपने बेटे को लेकर सूरत के दुर्ग में छिपी हुई थी। वह अपने पुत्र को लेकर दक्षिण भारत भाग गई।

हम्जबान की बगावत

इस समय हम्जबान नामक एक तुर्की अमीर मिर्जाओं की तरफ से सूरत के दुर्ग की रक्षा कर रहा था। किसी समय हम्जाबान हुमायूँ (HUMAYUN) का विश्वस्त सेनापति था और उसी ने हम्जाबान को सूरत का किलेदार बनाया था किंतु अब वह अकबर (AKBAR) से बगावत करके बागी मिर्जाओं के साथ हो गया था।

राजा टोडरमल की रिपोर्ट

जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था तब उसने राजा टोडरमल को सूरत के किले की स्थिति का पता लगाने भेजा। ताकि किले में प्रवेश करने एवं निकलने का मार्ग ढूंढा जा सके। राजा टोडरमल अपने सैनिकों को लेकर सूरत गया तथा उसने वहाँ से लौटकर शहंशाह को सूरत के समाचार दिए। टोडरमल ने कहा कि सूरत के किले को आसानी से जीता जा सकता है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।                                                    

अकबर का सूरत अभियान – बादशाह ने हम्जाबान की जीभ कटवा ली। (101)

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अकबर का सूरत अभियान - www.bharatkaitihas.com
सूरत का किला

अकबर का सूरत अभियान उसके राजनीतिक जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। इस अभियान के बाद लगभग सम्पूर्ण गुजरात मुगल सल्तनत के अधीन हो गया। इस अभियान में अकबर ने अपने विश्वस्त सेवक हम्जाबान की जीभ कटवा ली।

अकबर (AKBAR) ने ई.1572 में गुजरात के लिए अभियान किया। अब तक उसने अहमदाबाद (AHMEDABAD), साम्बे (SAMBE), खंभात (KHAMBHAT), चम्पानेर (CHAMPANER) तथा बड़ौदा (BARODA) आदि नगर, किले एवं बंदरगाह अपने अधीन कर लिये थे और इस समय वह बड़ौदा (BARODA) में डेरा डाले हुए था। जब इस इलाके पर पूरी तरह अधिकार कर लिया गया, तब वह बड़ौदा से सूरत (SURAT) के लिए चल दिया।

अकबर का सूरत अभियान

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि 11 जनवरी 1573 को शंहशाह ने सूरत (SURAT) से एक कोस की दूरी पर अपना शिविर लगाया। शाही सेना को आया देखकर बागियों की सेना सूरत (SURAT) के किले में सिमट गई। अकबर की सेना ने अपने दूत सूरत (SURAT) के बागी किलेदार हम्जाबान (HAMZABAN) के पास भेजे तथा उससे कहा कि वह बगावत का मार्ग छोड़ दे और शहंशाह के समक्ष समर्पण कर दे।

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हम्जाबान (HAMZABAN) ने शहंशाह के दूतों की बात मानने से मना कर दिया तथा शहंशाह की शान में गुस्ताखी करते हुए कुछ कठोर वचनों का प्रयोग किया। इस पर अकबर ने सूरत (SURAT) के किले पर गोलाबारी करने के आदेश दिए। इसके साथ ही अकबर का सूरत अभियान अपने असली रंग में आ गया। अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह का शिविर दुर्ग के इतने पास था कि दुर्ग से छोड़े गए तोपों के गोले और मनजानिक के गोले बादशाह के शिविर पर गिरा करते थे। अबुल फजल लिखता है कि अपने सेवकों के कहने पर बादशाह अपना शिविर छोड़कर पास के जंगल में चला गया किंतु यहाँ भी शिविर की सीमा में गोले एवं पत्थर गिरा करते थे। मुगल सेना भी दो महीने तक सूरत के किले पर गोलाबारी करती रही। मुल्ला बदायूंनी (BADAYUNI) ने लिखा है कि इस किले पर इतनी गोलाबारी की गई कि किले के भीतर से कोई सैनिक मुँह बाहर नहीं निकाल सकता था। जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि कुछ लोग बार-बार किले से बाहर निकल कर अकबर के तोपमंचों पर आक्रमण करते थे। अबुल फजल ने लिखा है कि सैफ खाँ (SAIF KHAN) नामक एक मुगल अधिकारी बार-बार दुर्ग के गोलों की सीमा में जाकर लड़ाई करता था जिससे वह बुरी तरह से घायल हो गया।

इस पर किसी दूसरे मुगल अधिकारी ने सैफ खाँ से पूछा— “शहंशाह तुमसे प्रसन्न नहीं है फिर भी तुम बार-बार किले के निकट जाकर अपने प्राण संकट में क्यों डालते हो?”

सैफ खाँ ने उत्तर दिया— “सरनाल की लड़ाई के समय मैं मार्ग भटक कर जाने के कारण युद्ध में भाग नहीं ले सका था। इस कारण मुझे अपना जीवन भार स्वरूप दिखाई देता है। यही कारण है कि अब मैं बादशाह की सेवा करके उस बोझ से मुक्त होना चाहता हूँ।”

मिर्जाओं का विद्रोह और खानेआजम (AZIZ KOKA)

जब अकबर सूरत के घेरे में उलझा हुआ था, उस समय कुछ मिर्जाओं ने पाटन (PATAN, GUJARAT) में तथा कुछ मिर्जाओं ने कालपी (KALPI, UTTAR PRADESH) में उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया। इसलिए बादशाह के लिए आवश्यक हो गया कि वह सूरत के घेरे के साथ-साथ, इधर-उधर उत्पात मचा रहे मिर्जाओं का भी दमन करे।

इसलिए बादशाह ने मालवा (MALWA) आदि क्षेत्रों से कुछ सेनाएं और बुलवा लीं तथा उन्हें खानेआजम (AZIZ KOKA) के नेतृत्व में बागी मिर्जाओं का दमन करने का काम सौंपा। खानेआजम अकबर का धाय भाई था। उसका असली नाम अजीज कोका था। अकबर ने उसे खानेआजम की उपाधि दी थी और कुछ समय पहले ही गुजरात का सूबेदार बनाया था।

हम्जाबान (HAMZABAN) का विश्वासघात

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि जब अकबर (AKBAR) दो महीने की गोलाबारी के बाद भी सूरत के किले (Surat Fort) पर अधिकार नहीं कर सका तो अकबर ने किले के चारों ओर सुरंगें खुदवानी आरम्भ कीं तथा साबात बनवाना आरम्भ किया ताकि किले को बारूद से उड़ाया जा सके।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि शहंशाह ने किले में जाने वाली नहर पर बांध बनवाकर किले के भीतर जल-आपूर्ति बंद करवा दी। जब किले के लोग प्यास से मरने लगे तो किलेदार हम्जाबान (HAMZABAN) ने अपने ससुर मौलाना निजामुद्दीन (NIZAMUDDIN) को अकबर के पास यह संदेश देकर भेजा कि यदि किले के लोगों को क्षमादान दिया जाए तो वे किला शहंशाह को समर्पित करने को तैयार हैं।

अकबर ने मौलाना निजामुद्दीन को अभयदान दिया तथा उससे कहा कि हम्जाबान सहित किसी को तकलीफ नहीं दी जाएगी। इस पर किले के लोगों ने किले से बाहर आकर अकबर के समक्ष समर्पण कर दिया।

हम्जाबान भी अकबर (AKBAR) के समक्ष उपस्थित हुआ। अकबर ने बहुत से लोगों को रस्सियों से बंधवा दिया तथा हम्जाबान की जीभ कटवा दी। यह हम्जाबान के साथ विश्वासघात था क्योंकि अकबर ने उसे अभयदान देने के पश्चात् भी उसकी जीभ कटवाई थी।

निष्कर्ष

यह घटना अकबर के गुजरात अभियान और सूरत के किले (Surat Fort) की घेराबंदी का महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें अबुल फजल और बदायूंनी जैसे इतिहासकारों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अकबर ने विद्रोहियों और बागी मिर्जाओं को दबाने के लिए कठोर सैन्य रणनीतियाँ अपनाईं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर का शराब-प्रेम किसी के भी प्राण ले सकता था! (102)

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अकबर का शराब-प्रेम

अकबर हर समय शराब के नशे में धुत्त रहता था जिसके कारण उसे अपने शरीर का भी होश नहीं रहता था। यही कारण था कि अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) किसी के भी प्राण ले सकता था!

मार्च 1573 में अकबर (AKBAR) ने सूरत के किले पर अधिकार कर लिया। इस विजय की प्रसन्नता में अकबर ने भारी नशा किया। अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) उसके सिर पर सवार हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि सूरत में हुई पानगोष्ठी अर्थात् मदिरापान गोष्ठी में अकबर ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने का निश्चय किया।

अकबर (AKBAR) ने शराब के नशे में धुत्त होकर दीवार में एक तलवार गाढ़ दी जिसकी नोक बाहर की तरफ थी। इसके बाद अकबर ने पूरे वेग से दीवार में गढ़ी हुई तलवार पर अपनी छाती मारने का उपक्रम किया ताकि तलवार को तोड़ा जा सके।

राजा मानसिंह नहीं चाहता था कि अकबर (AKBAR) यह काम करे। इसलिए उसने अकबर को रोकने का प्रयास किया किंतु अकबर ने मानसिंह को परे धकेल दिया। जब अकबर दीवार में गढ़ी तलवार पर छाती मारने ही जा रहा था, तब मानसिंह ने वह तलवार खींचकर निकाल ली।

अकबर (AKBAR) दीवार से टकराया किंतु उसके प्राण बच गए। अकबर शराब के नशे में धुत्त था। उसे पता नहीं था कि वह क्या कर रहा था। उसने नाराज होकर मानसिंह का गला पकड़ लिया और उसे घोटने लगा।

कहाँ तो अकबर अपनी जान लेने जा रहा था और कहाँ अब वह राजा मानसिंह की जान लेने पर उतारू हो गया। अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) अकबर का ही सर्वनाश करने पर उतारू हो गया क्योंकि यदि मानसिंह मर जाता तो अकबर का सर्वनाश होना निश्चित था। राजकीय मान-मर्यादाओं में पला-बढ़ा राजा मानसिंह, शाही प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए तथा अकबर के साथ अपने रिश्ते का सम्मान करते हुए अकबर का प्रतिरोध नहीं कर सका।

इस कारण अकबर (AKBAR) उस पर इतनी बुरी तरह हावी हो गया कि मानसिंह के प्राण कंठ में आ गए। यदि यह स्थिति एक-दो पल और बनी रहती तो मानसिंह के प्राण-पंखेरू उड़ गए होते। कुछ दरबारियों ने अकबर को खींचकर मानसिंह के प्राण बचाए।

यदि राजा मानसिंह को उस रात कुछ हो गया होता तो आम्बेर राजघराने के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया होता। इस समय तक राजा भारमल 83 वर्ष का वृद्ध हो चुका था। अकबर ने उसे लाहौर में नियुक्त कर रखा था। अब उसके जीवन के कुछ ही महीने शेष बचे थे।

भारमल का पुत्र भगवानदास कुछ समय पहले हुई सरनाल की लड़ाई में घायल होकर चारपाई में पड़ा था। भगवानदास का पुत्र भुवनपति भी सरनाल की लड़ाई में काम आ चुका था। इस प्रकार इस समय केवल कुंअर मानसिंह ही ऐसा था जो आम्बेर के कच्छवाहा वंश को संभाल सकता था।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) बड़ा भारी पियक्कड़ था। जब अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) नियंत्रण से बाहर हो गया तो उसने शराब कम करके ताड़ी और अफीम की लत लगा ली। अपने पिता की देखा-देखी अकबर के पुत्र जहांगीर (JAHANGIR), मुराद तथा दानियाल भी किशोरवस्था में ही भारी पियक्कड़ बन गए।

विंसेट स्मिथ ने लिखा है कि तैमूर लंग (TIMUR LANG) के राजपरिवार में मद्यपान उसी प्रकार की जन्मजात बुराई थी जिस प्रकार यह उस काल के अन्य मुस्लिम राजघरानों की दुर्बलता बनी हुई थी। अकबर का दादा बाबर गहरे पियक्कड़ स्वभाव का व्यक्ति था।  इसलिए अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) उसकी वंशानुगत कमजोरी था।

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अकबर (AKBAR) का पिता हुमायूँ (HUMAYUN) भी स्वयं को अफीम से धुत्त रखकर जड़बुद्धि बन चुका था। अकबर ने अपने भीतर दोनों गुण समाहित कर लिए थे। अर्थात् उसे शराब और अफीम दोनों की लत थी। अकबर के दो छोटे लड़के अधिक शराब पीने से मर गए। बड़ा लड़का सलीम भी हर समय शराब के नशे में डूबा हुआ रहता था। विंसेट स्मिथ कहता है कि अकबर (AKBAR) तेज नशीली वस्तुओं तथा मदान्ध कर देने वाली जड़ी-बूटियों का घोर व्यसनी था। इस तथ्य के असंख्य उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। अकबर नशीले पेय तथा खाद्य वस्तुओं से निर्मित होने वाली भयंकर नशे वाली वस्तुओं का भी सेवन कर लेता था। अकबर (AKBAR) का बेटा जहांगीर (JAHANGIR) स्वयं कहता है कि मेरा पिता चाहे शराब पिए हुए हो, चाहे स्थिर चित्त हो, मुझे सदैव शेखू बाबा कहकर पुकारता था। इस वाक्य में यह भाव छिपा हुआ है कि अकबर के लिए नशे में रहना एक आम बात थी। स्मिथ लिखता है कि यद्यपि चाटुकार भांड किस्म के लेखकों ने अकबर की मदिरापान अवस्था का कोई वर्णन नहीं किया है, तथापि यह निश्चित है कि उसने पारिवारिक परम्परा बनाए रखी और वह प्रायः आवश्यकता से अधिक शराब पीता रहा।

अकबर (AKBAR) के दरबार का ईसाई पादरी अक्वावीवा लिखता है- ‘अकबर इतनी अधिक शराब पीने लगा था कि वह प्रायः आगंतुकों से बातें करते-करते ही सो जाया करता था। इसका कारण यह था कि वह दिन में कई बार तो ताड़ी पीता था। वह अत्यंत मादक ताड़ की शराब होती थी।

वह कई बार पोस्त की शराब पीता था जो उसी प्रकार अफीम में अनेक वस्तुएं मिलाकर बनाई जाती थी। मदिरापान के दुर्गुण का पूर्ण निष्ठापूर्ण पालन उसके तीनों बेटों ने किया।’

पादरी अक्वावीवा ने लिखा है- ‘जब अकबर (AKBAR) सीमा से अधिक पी लेता था, तब पागलों जैसी विभिन्न हरकतें किया करता था। उसे एक नशीली ताड़ से निकली शराब विशेष रूप से प्रिय थी। उसके साथ वह अतयंत चटपटी अफीम का मिश्रण लिया करता था। अत्यंत नशीले पेय पदार्थों तथा अफीम को विभिन्न रूपों में सेवन करने की, अनेक पीढ़ियों से चली आई पारिवारिक परम्परा को अकबर ने खूब निभाया, उनके बार तो अतिपान करके निभाया।’

इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है- ‘इस बात पर बल देने की आवश्यकता नहीं कि दुर्गुण आत्मा जो निरंतर पापोन्मुखी हो, वही मादकता का संरक्षण चाहती है। शराब के नशे में प्रायः मनुष्य में स्त्री-शरीर की भूख बढ़ जाती है और काम-वासना का ज्वार हिलोरें लेने लगता है।’

अबुल फजल (ABUL FAZAL) में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कि वह अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) अपनी पुस्तक के माध्यम से इतिहास के समक्ष उजागर करता किंतु उसने इस बात को शब्दों की चालाकी के एक महीन आवरण में ढक कर लिखा। वह लिखता है कि अकबर (AKBAR) अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में पर्दे के पीछे रहा।

पर्दे के पीछे रहने का अर्थ यह था कि वह अपने हरम में रहा। इसका मूल कारण अकबर का अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) और स्त्री-अनुराग ही था। संभवतः इसी काल में अकबर ने शराब का अत्यधिक सेवन करना सीखा था।

इस समय अकबर (AKBAR) का पिता हुमायूँ (HUMAYUN) मर चुका था, माता हमीदा बानू काबुल में थी और अकबर के परिवार का कोई भी व्यक्ति भारत में नहीं था जो अकबर को अत्यधिक शराब पीने से रोक सके।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘शहंशाह ने महल के पास ही शराब की एक दुकान स्थापित की है। दुकान पर इतनी अधिक वेश्याएं राज्य भर से आकर एकत्रित हो गई हैं कि उनकी गणना करना भी कठिन है।’

ईसाई धर्म-प्रचारक अक्वावीवा ने अकबर (AKBAR) को स्त्रियों से कामुक सम्बन्धों के लिए फटकार लगाने का साहस किया था। अकबर ने ईसाई पादरी की बात सुनकर उससे कहा कि बादशाह को अधिकार होता है कि वह किसी के भी अपराध क्षमा कर दे, मैं भी अपना यह अपराध क्षमा करता हूँ।

अकबर (AKBAR) के शराब एवं स्त्री-प्रेम को यहीं पर विराम देकर हम इतिहास को फिर से सूरत के उसी किले में लिए चलते हैं जहाँ अकबर ने शराब के नशे में चूर होकर कुंअर मानसिंह का गला घोटने का प्रयास किया था और कुछ दरबारियों ने बादशाह को खींचकर कुंअर मानसिंह के प्राण बचाए थे।  इस घटना के बाद अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) पूरी रियाया के समक्ष उजागर हो गया।

 ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गोआ के पुर्तगाली अकबर को लड़कियां भेंट करते थे! (103)

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गोआ के पुर्तगाली अकबर को पुर्तगाली लड़कियां भेंट करते थे!

अकबर के स्त्री-प्रेम की चर्चा पूरी सल्तनत में थी। गोआ के पुर्तगाली भी अकबर की इस कमजोरी से परिचित थे। इसलिए उन्होंने अकबर के दरबार एवं महल में पहुंच बनाने के लिए पुर्तगाली लड़कियों का सहारा लेने का निश्चय किया। ऐसा करना उनके लिए कठिन भी नहीं था।

अबुल फजल लिखता है कि जब अकबर (AKBAR) सूरत में था, तब गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) अकबर से मिलने के लिए आए। उन दिनों गोआ और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पुर्तगालियों का अधिकार था।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) ईसाई थे और इस क्षेत्र में ईसाई धर्म को बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) नहीं चाहते थे कि अकबर (AKBAR) का सूरत के दुर्ग पर अधिकार हो। इसलिए वे लोग सूरत दुर्ग में रह रहे बागी मिर्जाओं की सहायता करने के लिए आए थे किंतु जब उन्होंने अकबर की विशाल सैन्य-शक्ति को देखा तो उन्होंने बागी मिर्जाओं की सहायता करने की बजाय अकबर से मित्रता करने का विचार किया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) दल ने अकबर (AKBAR) को बहुत सारी भेंट एवं उपहार देकर अकबर के प्रति मित्रता का प्रदर्शन किया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर बड़ी उत्सुकता से उन पुर्तगालियों से मिला तथा उनसे पुर्तगाल देश के बारे में जानकारी प्राप्त की। अकबर ने उन लोगों से यूरोप के शिष्टाचार एवं अन्य प्रथाओं की भी जानकारी ली। अकबर पुर्तगालियों से मिलने में इसलिए भी रुचि रखता था क्योंकि कुछ वर्ष पहले पुर्तगालियों ने अकबरको दो सुंदर पुर्तगाली लड़कियां भेंट की थीं।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) जिन लड़कियों को भेंट करने के लिए लाए थे, इनमें से एक का नाम मारिया मस्केरेन्हास था, वह 18 साल की थी और दूसरी लड़की का नाम जूलियाना मस्केरेन्हास था, वह 17 साल की थी। अकबर (AKBAR) ने मारिया मस्केरेन्हास से विवाह कर लिया तथा उसकी बहिन जूलियाना मस्केरेन्हास अकबर के हरम में चिकित्सक नियुक्त की गई ताकि वह हरम की औरतों की चिकित्सा कर सके।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा अकबर के कट्टर आलोचक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तकों में इन पुर्तगाली औरतों का उल्लेख नहीं किया है, इसलिए बहुत समय तक इन पुर्तगाली औरतों का इतिहास अंधकार में ही रहा।

ग्रीस देश के पत्रकार थॉमस स्मिथ ने तथा फ्रांस के प्रथम बारबौन राजा फिलिप्पे पर शोध करने वाले ग्रीस के प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में इस स्त्री का उल्लेख किया तो अकबर (AKBAR) की गुमनाम पुर्तगाली बेगम का इतिहास भारतीयों के सामने आया।

जे. ए. इज्मेल ग्रेसियाज ने भी अपनी शोध में सिद्ध किया है कि अकबर (AKBAR) की एक पुर्तगाली बेगम थी।

ग्रीस तथा फ्रांस के इन लेखकों ने सिद्ध किया है कि लेडी जूलियाना अकबर (AKBAR) के दरबार में रहने वाली ईसाई स्त्री थी। वह अकबर के हरम की चिकित्सक थी। वह अकबर की एक पत्नी की बहिन थी। लेडी जूलियाना का विवाह बौरबन राजकुमार जीन फिलिप्पि से हुआ था। लेडी जूलियाना के प्रयासों से आगरा में पहला क्रिश्चियन चर्च बना।

यूरोपियन लेखक लिखते हैं कि किसी समय ये दोनों बहनें ईसाई मिशनियों द्वारा आगरा में लाई गई थीं तथा अकबर (AKBAR) को भेंट की गई थीं। कुछ स्थानों पर यह भी संदर्भ मिलता है कि ये दोनों बहिनें पुर्तगाली नहीं थीं अपितु अकबर के न्यायमंत्री अब्दुल हाई की पुत्रियां थीं तथा वे अपने पिता के साथ पश्चिमी आरमीनिया के सिलसिया कस्बे से भारत आई थीं।

थॉमस स्मिथ नामक पत्रकार ने लिखा है कि ये दोनों लड़कियां आरमीनिया से भारत आई थीं तथा अकबर (AKBAR) ने उनमें से एक का विवाह फ्रांस के राजकुमार जीन फिलिप्पे से किया था जो आगे चलकर फ्रांस का राजा बना। थॉमस स्मिथ लिखता है कि जीन फिलिप्पे एक धनी फ्रैंच सैनिक का पुत्र था। यह परिवार फ्रांस के शाही परिवार से सम्बन्धित था।

प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में लिखा है कि जीन फिलिप्पे ने अकबर (AKBAR) की पुर्तगाली क्रिश्चियन स्त्री की बहिन से विवाह किया था। अकबर ने जीन फिलिप्पे को भारत में बड़े क्षेत्र का राजा बनाया तथा उसे बहुत सी धनराशि भेंट की। प्रिंस मिशेल के अनुसार जीन फिलिप्पे फ्रांस के सम्राट हेनरी (चतुर्थ) का भतीजा था। बाद में जीन फिलिप्पे फ्रांस का प्रथम बोरबन राजा बना।

प्रिंस मिशेल के अनुसार जब जीन फिलिप्पे अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए भारत आया तो आगरा आकर बीमार पड़ गया। अकबर के आदेश से अकबर के हरम की चिकित्सक जूलियाना ने फिलिप्पे की चिकित्सा की।

फिलिप्पे इस लेडी चिकित्सक से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अकबर (AKBAR) से जूलियाना का हाथ अपने लिए मांग लिया। अकबर ने जूलियाना फिलिप्पे को सौंप दी। इस औरत से फिलिप्पे को कुछ औलादें हुईं जो भारत के भोपाल शहर में रहती थीं। बताया जाता है कि इस परिवार के वंशज आज भी भोपाल में निवास करते हैं।

कुछ विद्वानों ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) के महल में जूलियाना नाम की और भी औरतें थीं जिनमें से एक का नाम लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा था। संभवतः लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा (Juliana D’Costa) एवं अकबर की साली जूलियाना मस्केरेन्हास ग्रेसियाज (Juliana Mascarenhas Gracias) के इतिहास एक दूसरे से गड्डमड्ड हो गए हैं।

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एक लेखक ने लिखा है कि जूलियाना मस्केरेन्हास (Juliana Mascarenhas Gracias) की बहिन मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी कहा गया क्योंकि वह ईसाई थी। जमन नामक एक शोधकर्ता ने इस मत को अस्वीकार करते हुए सिद्ध किया है कि मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी नहीं कहा गया। यह उपाधि तो मुगलों में पहले से ही चल रही थी। अकबर (AKBAR) की माँ हमीदा बानू बेगम को मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अकबर की हिन्दू पत्नी जो आम्बेर की राजकुमारी थी, उसे भी मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मारिया मस्केरेन्हास को ईसाई होने के कारण मरियम मकानी की उपाधि दी गई। फ्रैडरिक फैंथम ने ई.1895 में प्रकाशित अपनी पुस्तक रेमीनेंसेज ऑफ आगरा में लिखा है कि अकबर (AKBAR) की एक क्रिश्चियन पत्नी थी जिसका नाम मैरी था। वह लिखता है कि इतिहासकारों ने अकबर की इस बेगम का अकबर पर प्रभाव बहुत कम करके आंका है। इस बेगम के प्रभाव के कारण अकबरईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था। जमन नामक शोधकर्ता ने लिखा है कि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अकबर के शासन काल में मुगल एम्पायर पर यूरोप की ईसाई औरतों का प्रभाव था किंतु जूलिया मस्केरेन्हास की कहानी में कुछ काल्पनिक सामग्री भी जोड़ दी गई है।

अकबर (AKBAR) ने ई.1562 में आगरा में एक चर्च बनाने की अनुमति प्रदान की। लगभग 74 साल तक यह चर्च आगरा में खड़ा रहा। ई.1636 में अकबर के पोते शाहजहाँ ने इस चर्च को तुड़वाया। जब भारत पर अंग्रेजों का बोलबाला हो गया, तब उसी स्थान पर सेंट पीटर्स रोमन कैथोलिक कैथेडरल नाम से एक नया चर्च बनाया गया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की भारतीय प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया ने अपनी पुस्तक पोर्चूगीज इण्डिया एण्ड मुगल रिलेशन्स (1510-1735) में लिखा है कि अकबर (AKBAR) के जोधा नामक कोई स्त्री नहीं थी। डोना मारिया मैस्केरेन्हास (The Hindi phrase “डोना मारिया मैस्केरेन्हास” (Dona Maria Mascarenhas) एक पुर्तगाली स्त्री थी जिसे जोधा नाम दिया गया।

प्रोफेसर लिखती है कि मारिया मस्केरेन्हास तथा उसकी बहिन जूलियाना (Juliana Mascarenhas Gracias) को पुर्तगालियों ने तस्करों के हाथों से मुक्त करवाकर गुजरात के शासक बहादुरशाह को सौंपा था। बहादुरशाह ने उन बहिनों को बादशाह के दरबार में उपहार के रूप में भिजवाया।

प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया के अनुसार अकबर ने मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) की पहचान छिपाने के लिए उसे जोधा बाई नाम दिया। कुछ विद्वानों ने इस बात पर भी शोध की है कि मुगल इतिहासकारों ने इन बहिनों का इतिहास क्यों छिपाया!

यह बात सही नहीं लगती कि बादशाह अकबर ने इन बहिनों का इतिहास छुपाया। जब मुगल इतिहासकारों ने अकबर की हिन्दू बेगमों की पहचान नहीं छिपाई तो उन्होंने भला अकबर की ईसाई बेगमों की पहचान क्यों छिपाई होगी!

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की इन बहिनों के इतिहास पर शोध के निष्कर्ष अलग-अलग बातें कह सकते हैं किंतु सारांश रूप में इतना कहा जा सकता है कि ये पुर्तगाली बहिनें गोआ के पुर्तगालियों द्वारा अकबर (AKBAR) को उपहार स्वरूप दी गई थीं तथा अकबर इन औरतों के प्रभाव के कारण ईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी! (104)

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शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) तैमूरी खान का शहजादा था, इसलिए अकबर उसे मारना नहीं चाहता था, उसे अपनी सेवा में रखना चाहता था किंतु शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

सूरत विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने बहुत से लोगों को पकड़कर बंदीगृह में रख दिया तथा सूरत दुर्ग में मौजूद समस्त कीमती सामग्री आगरा के लिए रवाना कर दी। सूरत के दुर्ग (Surat Fort) में कुछ बड़ी तोपें भी थीं जिन्हें सुलेमानी तोपें कहा जाता था।

इन्हीं तोपों के कारण अकबर (AKBAR) को सूरत का किला जीतने में दो माह से अधिक का समय लगा था। अकबर ने इन तोपों को बैलगाड़ियों एवं ऊंटगाड़ियों पर लदवाकर आगरा के लिए रवाना कर दिया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) अभी कुछ और दिन सूरत में रुककर आसपास के बंदरगाहों तथा नगरों पर अधिकार करना चाहता था किंतु स्थानीय गवर्नरों ने इस कार्य में अकबर की सहायता नहीं की तथा सेना के पास रसद का अभाव होने लगा, इसलिए अकबर ने अपनी सेना को लौटने के आदेश दिए तथा स्वयं भी एक सेना के साथ रवाना हो गया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है- ‘इसी समय बगलाना का जमींदार बहारजी अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। यह उधर की ओर का बड़ा जमींदार था। बगलाना देश 100 कोस लम्बा और 30 कोस चौड़ा है। यहाँ के जागीरदार के पास 2000 सवार और 16 हजार प्यादे हैं। यहाँ की आय साढ़े छः करोड़ दाम सालाना है। पहाड़ियों की चोटी पर सालही और मालहीर दो दुर्ग हैं। इस देश में अंतःपुर एवं चिंतापुर नामक दो बड़े नगर हैं। यह देश गुजरात तथा दक्षिण के बीच स्थित है।’

मुगल बादशाह तथा उनके अधिकारी, भारत के स्थानीय राजाओं को जमींदार कहते थे। उस काल के मुगल अभिलेखों में जयपुर एवं जोधपुर जैसे बड़े राजाओं के लिए भी जमींदार शब्द का प्रयोग किया गया है।

अतः अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने जिसे बगलाना का जमींदार लिखा है, वह वस्तुतः उस क्षेत्र का कोई बड़ा राजा था। बहारजी नाम से अनुमान होता है कि यहाँ किसी गुजराती अथवा पारसी राजा की बात हो रही है क्योंकि ये लोग परम्परा से अपने नाम के पीछे आज भी जी लगाते हैं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बहारजी अपने साथ शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के गले में जंजीर बांधकर अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। किसी समय शरफुद्दीन मिर्जा अकबर का बड़ा कृपापात्र था किंतु पिछले कुछ वर्षों में वह भी बागी मिर्जाओं में सम्मिलित हो गया था।

अकबर (AKBAR) शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) को मारना नहीं चाहता था किंतु उसे मृत्यु का भय दिखाकर फिर से अपने पक्ष में करना चाहता था। इसलिए अकबर ने शरफुद्दीन मिर्जा को एक भयंकर हाथी के सामने पटकवाया तथा शरफुद्दीन मिर्जा से कहा कि यदि वह शपथ ले कि भविष्य में कभी भी बादशाह से बगावत नहीं करेगा तथा बादशाह की सेवा करेगा तो उसे क्षमा किया जा सकता है किंतु शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने हाथी के पैरों कुचले जाकर मरना पसंद किया, अकबर (AKBAR) की सेवा में दुबारा आने से मना कर दिया।

इस पर भी अकबर (AKBAR) ने शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के प्राण नहीं लिए। हाथी को वहाँ से हटा दिया गया और शरफुद्दीन मिर्जा को जेल में बंद कर दिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) दर-दर भटका करता था, इसी से उसकी नीचता प्रकट होती थी।

अकबर (AKBAR) को ज्ञात हुआ कि बगलाना के जमींदार बहारजी ने मरहूम इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की बेगमों और लड़कियों को भी पकड़ने का प्रयास किया था जो बगलाना के क्षेत्र में से होकर गुजर रही थीं।

बहारजी इस कार्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सका था फिर भी वह इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की एक पुत्री तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की दो साल की कमाई लूटने में सफल रहा था। अकबर (AKBAR) इस बात को कतई सहन नहीं कर सकता था कि कोई भी अमीर, शत्रु या जमींदार शाही परिवार के किसी भी व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने का साहस करे, भले ही शाही परिवार का वह व्यक्ति अकबर का शत्रु ही क्यों न हो!

इसलिए अकबर (AKBAR) ने मीर खाँ यथावल को आदेश दिए कि वह बगलाना के जागीरदार बहारजी को बंदी बना ले। बहारजी की कैद से इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की पुत्री को छुड़ा लिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बगलाना के जमींदार ने अकबर की बड़ी अच्छी सेवा की।

इससे अनुमान होता है कि अकबर (AKBAR) ने बहारजी को मुक्त करके अपनी सेवा में ले लिया था। गुजरात विजय के बाद अकबर सीकरी के लिए रवाना हो गया। बहुत से अमीर अकबर की वापसी में उसे सिद्धपुर तक छोड़ने के लिए गए। जब अकबर सिद्धपुर पहुंचा तो उसे खानेआजम अजीज कोका (AZIZ KOKA) की चिंता हुई। खानेआजम अकबर का धायभाई था।

अकबर (AKBAR) ने उसे गुजरात का गवर्नर बना तो दिया था किंतु उसे ज्ञात था कि मिर्जाओं का विद्रोह अभी पूरी तरह थमा नहीं है। वे फिर से उपद्रव कर सकते हैं और खानेआजम के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। इसलिए अकबर ने खानेआजम को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने हृदय की चिंताएं व्यक्त करते हुए लिखा कि शासक को सदैव सक्रिय रहना चाहिए।

लोगों की छोटी-छोटी भूलों की उपेक्षा करनी चाहिए। विवादों का निर्णय बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए। मित्रों और शत्रुओं के प्रति निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।

अकबर (AKBAR) के इस पत्र से लगता है कि अकबर बहुत समझदार व्यक्ति था किंतु जब हम उसके द्वारा शराब के नशे में की गई हरकतों के बारे में पढ़ते हैं तो हमें लगता है कि वह भी मुहम्मद बिन तुगलक की तरह ‘समझदार-पागल’ था।

खानदेश का शासक राजा अली खाँ भी अकबर (AKBAR) को विदा करने के लिए सिद्धपुर तक आया था। अकबर ने उसे भी वापस खानदेश भेज दिया। मालवा का गवर्नर मुजफ्फर खाँ भी सिद्धपुर आया था। उसे भी अकबर ने यहीं से मालवा के लिए रवाना कर दिया।

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इसके बाद अकबर (AKBAR) ने तीन हिन्दू सेनापतियों कुंअर मानसिंह, राजा जगन्नाथ और राजा गोपाल तथा छः मुस्लिम अमीरों को आदेश दिया कि वे ईडर होते हुए डूंगरपुर जाएं तथा वहाँ के राजाओं को अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए समझाएं। यहाँ अकबर का आशय ईडर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा उदयपुर के शासकों से था जो अब भी अकबर की पहुंच से बाहर थे। इसके बाद अकबर ने सिद्धपुर से पाटन, सिरोही तथा जालौर होते हुए अजमेर का मार्ग पकड़ा। अकबर का पुत्र दानियाल इस समय आम्बेर में रह रहे थे। अकबर ने एक सेना भगवानदास के पुत्र माधोसिंह के नेतृत्व में आम्बेर भिजवाई ताकि वह शहजादे दानियाल को अपनी सुरक्षा में आम्बेर से अजमेर ला सके। इस सेना के साथ जयपुर की राजकुमारी हीराकंवर जो कि राजा भारमल की पुत्री, भगवंतदास की बहिन तथा मानसिंह एवं माधोसिंह की बुआ थी और जिसका विवाह अकबर के साथ हुआ था, आम्बेर भिजवाया गया ताकि वह अपने भतीजे भुवनपति की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने अपने पीहर जा सके। राजा भगवान दास का पुत्र भुवनपति सरनाल की लड़ाई में काम आया था। अजमेर से अकबर सीकरी चला गया।

3 जून 1573 को अकबर (AKBAR) ने अपनी राजधानी में प्रवेश किया। बड़े-बड़े अमीर और सूबेदार अकबर (AKBAR) का स्वागत करने के लिए राजधानी में एकत्रित हुए। इस अवसर पर लाहौर का सूबेदार हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ।

वह अपने साथ मसूद हुसैन मिर्जा और उन तमाम लोगों को लेकर आया था जो लड़ाई में पकड़े गए थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि इन सबको गाय के कच्चे चमड़े में लपेटा हुआ था और उनके सींग भी नहीं हटाए गए थे।              

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तैमूरी शहजादे बगावत पर उतर आए (105)

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तैमूरी शहजादे

जब तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) बगावत पर उतर आए तब अकबर ने उन्हें नष्ट करने की एक गुप्त योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने के लिए आगरा से गुजरात तक सेनाओं की दौड़ का आयोजन किया ताकि मुगल सेनाएं जल्दी से जल्दी गुजरात पहुंच जाएं तथा किसी को अकबर की योजना की भनक भी न लगे।

अकबर (AKBAR) सूरत का दुर्ग जीतने के बाद सिद्धपुर, पाटन, सिरोही, जालौर तथा अजमेर होता हुआ आगरा पहुंचा जहाँ अनेक बड़े सूबेदारों, अमीरों एवं मुगल बेगों ने अकबर का स्वागत किया।

लाहौर का सूबेदार हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) बगावत करने वाले मसूद हुसैन मिर्जा और उन तमाम लोगों को लेकर आया था जो लड़ाई में पकड़े गए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि इन सबको गाय के कच्चे चमड़े में लपेटा हुआ था और उनके सींग भी नहीं हटाए गए थे। यह एक वीभत्स दृश्य था।

कच्ची खाल में लिपटे मिर्जाओं के मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थीं जिन्हें वे अपने हाथों से उड़ा भी नहीं सकते थे। इन मिर्जाओं की पीड़ा का वर्णन करना संभव नहीं है।

अकबर की तरह ये भी तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) थे तथा इन्हें मिर्जा (Mirza) कहा जाता था। बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान में हमने चर्चा की थी कि जब उज्बेक योद्धा शैबानी खाँ (SHAIBANI KHAN) ने बाबर (BABUR)  को समरकंद (SAMARAKAND)  से तथा अन्य तैमूरी बादशाहों को खुरासान (KHORASAN) तथा ट्रांसऑक्सियाना (TRANSOXIANA)  से निकाल दिया था, तब बहुत से तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) तथा उनके सैनिक भाग-भाग कर बाबर (BABUR)  की शरण में आए थे।

बाबर (BABUR)  ने इन्हें बड़े प्रेम से अपने पास रखा था किंतु इन मिर्जाओं ने पग-पग पर बाबर (BABUR)  के साथ धोखा किया था। बाबर (BABUR)  के पुत्र हुमायूँ (HUMAYUN) ने भी अनेक मिर्जाओं को अपनी शरण में रखा तथा उन्होंने भी हुमायूँ के साथ धोखा किया। जब हुमायूँ (HUMAYUN) दुबारा भारत में अपने पैर जमाने में सफल रहा था, तब हुमायूँ ने इन मिर्जाओं को संभल की बड़ी जागीर दी थी, यह वही जागीर थी जो बाबर (BABUR) ने हुमायूँ को दे रखी थी।

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इस जागीर में वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में आजमपुर तथा निहटौर आदि के इलाके सम्मिलित थे। हुमायूँ (HUMAYUN) ने इन मिर्जाओं को यह अधिकार दे रखा था कि जब वह युद्ध के मैदान में लड़ रहा होता था तब ये मिर्जा हुमायूँ के घोड़े के चारों ओर रहकर युद्ध करते थे। जब हुमायूँ की मृत्यु हो गई, तब अकबर (AKBAR) ने भी मिर्जाओं की संभल की जागीर बनाए रखी तथा युद्ध के मैदान में बादशाह के घोड़े के पास रहकर लड़ने के अधिकार को भी अक्षुण्ण रखा किंतु मिर्जाओं के रक्त में वफादारी कम, धोखाधड़ी अधिक थी। ये सारे मिर्जा (Timurid Dynasty) के थे और इनमें से बहुत से मिर्जा, बाबर (BABUR) के चाचा, ताऊ तथा दादा-परदादा के वंशज थे। इनमें से बहुतों के साथ बाबर के खानदान की शहजादियों के विवाह किए गए थे और बहुत से मिर्जाओं की पुत्रियों के विवाह बाबर की बहिनों एवं बेटी-पोतियों के साथ हुए थे। इस कारण बाबर के खानदान में मिर्जाओं को अवध्य माना जाता था। फिर भी अवसर आने पर बाबर, हुमायूँ (HUMAYUN) और अकबर तीनों को ही इन मिर्जाओं के विरुद्ध कार्यवाही करनी पड़ी थी। मिर्जा लोग धूर्त, मक्कार और विश्वासघाती थे। इन्हें स्वयं पता नहीं था कि ये अपनी जिंदगी से तथा बाबर के परिवार से चाहते क्या थे!

इसलिए जब भी अवसर मिलता था, बगावत का झण्डा बुलंद कर देते थे। यद्यपि इतिहास की पुस्तकों में अकबर (AKBAR)  के काल में हुए मिर्जाओं के विद्रोह को बहुत कम महत्व दिया गया है तथापि जब हम अबुल फजल, मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी, राहुल सांकृत्यायन आदि लेखकों की पुस्तकों पर दृष्टिपात करते हैं तो ज्ञात होता है कि अकबर (AKBAR)  के काल में हुआ मिर्जाओं का विद्रोह देश-व्यापी था।

विद्रोही मिर्जाओं की गतिविधियां उत्तर में संभल से लेकर पूर्व में कालपी तथा कन्नौज तक, मध्य भारत में बयाना एवं मालवा तक, पश्चिम में गुजरात से लेकर दक्षिण में खानदेश तक फैली हुई थीं। इतने बड़े विद्रोह को दबाने में अकबर (AKBAR)  को बहुत शक्ति, ऊर्जा, समय, धन और संसाधन व्यय करने पड़े थे।

इस बार के मिर्जाओं के विद्रोह में मसूद हुसैन मिर्जा, मुहम्मद हुसैन मिर्जा, शाह मिर्जा, इब्राहीम मिर्जा तो सम्मिलित थे ही, साथ ही बाबर (BABUR)  के मरहूम बेटे कामरान की पुत्री गुलरुख बेगम भी बागी मिर्जाओं में सम्मिलित हो गई थी, वह इब्राहीम हुसैन मिर्जा की बीवी थी। बागी मिर्जा, अकबर (AKBAR) के अमीरों की सेनाओं द्वारा हर जगह हराए गए और वहाँ से उखाड़कर भगाए गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब बादशाह अकबर (AKBAR) हकीम मिर्जा के पीछे पंजाब की तरफ गया था, तब संभल की तरफ के मिर्जाओं ने दिल्ली में आकर उत्पात किया था। जब खानखाना हकीम खाँ ने उन्हें दिल्ली से भगा दिया तो इन मिर्जाओं ने भागकर गुजरात में शरण ली थी। इस प्रकार ये तैमूरी शहजादे अकबर के शासनकाल के आरम्भ से ही अकबर को परेशान कर रहे थे।

गुजरात पर उन दिनों चिंगीज खाँ नामक एक अफगान अमीर का शासन था। उसने इन मिर्जाओं को भड़ौंच की जागीर दी। इतनी सी जागीर से मिर्जाओं का काम चलने वाला नहीं था। इसलिए मिर्जाओं ने चिंगीज खाँ को मार दिया तथा गुजरात से लेकर खानदेश तक के बहुत से नगरों पर कब्जा कर लिया।

इस प्रकार पाटन, अहमदाबाद, बड़ौदा, चम्पानेर, सूरत, भड़ौंच आदि नगर मिर्जाओं के प्रमुख केन्द्र बन गए। अकबर (AKBAR)  ने इन सभी स्थानों पर स्वयं जाकर उन्हें अपने अधिकार में लिया था और मिर्जाओं को मार भगाया था। अन्य स्थानों पर भी शाह कुली खाँ महरम, धायभाई अजीज कोका, राजा टोडरमल, खानखाना मुनीम खाँ, कुंअर मानसिंह, बीकानेर के कुंअर रायसिंह आदि ने मिर्जाओं को परास्त करके भगाया था।

शाह कुली खाँ महरम जब नगरकोट के अभियान में था, उस समय कुछ मिर्जा भागकर उस तरफ चले गए। शाह कुली खाँ ने उनमें से कई मिर्जाओं को मार दिया जिनमें गुलरुख बेगम का पति इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी सम्मिलित था। शाह कुली खाँ ने मसूद हुसैन मिर्जा और उसके साथियों को पकड़ कर गाय की कच्ची खाल में लपेट दिया।

मुगलों के राज्य में किसी भी अमीर, उमराव अथवा बेग को यह अनुमति नहीं थी कि वह किसी तैमूरी शहजादे (TIMURID SHAHZADE) को इस तरह अपमानित अथवा पीड़ित करे किंतु हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अकबर (AKBAR) का अत्यंत विश्वसनीय था और अकबर ने उसे खानेजहाँ की उपाधि दे रखी थी।

इसलिए उसने मसूद हुसैन मिर्जा तथा अन्य तैमूरी शहजादों को गाय की कच्ची खाल में बंद करके अकबर (AKBAR)  के समक्ष प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया था।

अकबर (AKBAR)  को अपने खानदान के शहजादों को इस हालत में देखकर बहुत बुरा लगा किंतु अकबर (AKBAR)  के दरबारियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि बागियों को इस हालत में देखकर अकबर (AKBAR) के दरबारियों में हर्ष की लहर दौड़ गई किंतु अकबर (AKBAR) को उन पर बड़ी दया आई तथा अकबर (AKBAR) ने उन्हें इस पोषाक से मुक्त करवाकर अलग-अलग मुगल अधिकारियों के संरक्षण में रख दिया ताकि उन्हें सुधरने का अवसर मिल सके।

अकबर (AKBAR) के अमीरों को जिम्मेदारी दी गई कि वे इन मिर्जाओं का चाल-चलन देखकर उसकी सूचना अकबर (AKBAR)  को दें ताकि उनके सम्बन्ध में अंतिम निर्णय ले सके।

अभी अकबर (AKBAR) को गुजरात से आए हुए कुछ ही समय हुआ था कि सुल्तान ख्वाजा समाचार लेकर आया कि मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने खंभात में शाही सेना को परास्त कर दिया है और बागी मिर्जाओं एवं गुजरातियों ने अहमदाबाद घेर लिया है। तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE) एक बार फिर से बगावत पर उतर आए थे।)

जब अकबर (AKBAR) को ये समाचार मिले तो अकबर (AKBAR) ने तुरंत गुजरात पहुंचने का निश्चय किया। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर ने आगरा से पाटन तक एक सैनिक दौड़ का आयोजन किया।

इसमें 16 सेनापतियों ने भाग लिया जिनमें से 13 हिन्दू सेनापति थे। अकबर (AKBAR) स्वयं भी एक तेज सांडनी पर सवार होकर कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ गुजरात के लिए रवाना हो गया। अबुल फजल ने अकबर की यात्रा का जो वर्णन किया है, उससे अकबर की बेचैनी का अनुमान लगाया जा सकता है।

  ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गुजरात की बगावत से विचलित हो गया अकबर (106)

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गुजरात की बगावत

अकबर को समाचार मिला कि कामरान की बेटी गुलरुख बेगम का पुत्र मुजफ्फर हुसैन मिर्जा अकबर के सैनिकों को मार रहा है। गुजरात की बगावत से अकबर बुरी तरह विचलित हो गया।

जब अकबर (Akbar) को ज्ञात हुआ कि मिर्जाओं ने गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) में आकर फिर से झण्डा बुलंद कर दिया है तो अकबर ने अपने 16 सेनापतियों को पाटन पहुंचने का आदेश दिया। अकबर स्वयं भी एक तेज सांडनी पर सवार होकर कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ गुजरात की ओर दौड़ा। राजस्थान एवं गुजरात में मादा ऊंट को साण्ड कहा जाता है। कुछ लेखक उसे मादा ऊंट होने के कारण साण्डनी लिखते हैं।

इस बार गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) में खड़े किए गए उपद्रव के तीन बड़े नेता थे। एक तो था मुहम्मद हुसैन मिर्जा, दूसरा था मुजफ्फर हुसैन मिर्जा तथा तीसरा था अख्तियारुल्मुल्क। इनमें से मुजफ्फर हुसैन मिर्जा कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और इब्राहीम हुसैन मिर्जा का 16 वर्षीय पुत्र था। अब वह जवान हो गया था।

बगावत का जो झण्डा कामरान ने हुमायूँ के खिलाफ उठाया था, अब उस झण्डे को बुलंद किए रखने की जिम्मेदारी कामरान के नवासे मुजफ्फर हुसैन मिर्जा के कंधों पर आ गई थी। मुजफ्फर हुसैन मिर्जा समझता था कि वह अकबर (Akbar) जैसे शक्तिशाली बादशाह को अपनी तलवार से काट डालेगा।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दौलताबाद में मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने सुना कि अकबर (Akbar) राजधानी सीकरी की ओर प्रयाण कर रहा है तो उसने सूरत में आकर उत्पात खड़ा कर दिया। सूरत के किलेदार कुलीच खाँ को दुर्ग में बंद होकर अपनी जान बचानी पड़ी।

इस पर मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) भड़ौंच चला गया। अकबर (Akbar) ने भड़ौंच में कुतुबुद्दीन खाँ को नियुक्त किया था किंतु कुतुबुद्दीन के अधिकारी कुतुबुद्दीन से गद्दारी करके मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) से मिल गए। इस प्रकार मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने भड़ौंच पर अधिकार कर लिया।

इस विजय से उत्साहित होकर मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने खंभात पर भी अधिकार कर लिया। इख्तियारुल्मुल्क भी अहमदाबाद पर चढ़ बैठा। अकबर (Akbar) ने यहाँ धायभाई अजीज कोका (AJIJ KOKA) अर्थात् खानेआजम को नियुक्त कर रखा था। इस समय वह अहमदाबाद से बाहर किसी पहाड़ी क्षेत्र में था।

इसलिए खानेआजम को भागकर एक अज्ञात दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। जब इख्तियारुल्मुल्क अहमदाबाद में घुसने को हुआ तो अजीज कोका (AJIJ KOKA) उस अज्ञात दुर्ग से बाहर निकलकर अहमदाबाद की तरफ भागा। इख्तियारुल्मुल्क को अहमदाबाद से दूर हटना पड़ा।

इसी समय मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) खंभात से अहमदाबाद आया तथा इख्तियारुल्मुल्क और शेर खाँ फुलादी के पुत्रों से मिल गया। अब इन लोगों ने अहमदाबाद में घुसने की तैयारी की।

अबुल फजल ने लिखा है कि गुजरातियों ने लम्बे-लम्बे भाषण दिए तथा तीन दिन तक बहस की। तब तक खानेआजम ने अहमदाबाद में घुसकर अहमदाबाद की तरफ आने वाले मार्गों को बंद कर दिया।

खंभात का मुगल गवर्नर कुतुबुद्दीन भी भड़ौंच से पराजित होकर अहमदाबाद पहुंच गया तथा खानेआजम से आ मिला। इस प्रकार दोनों तरफ गोलबंदी हो गई। जब बहुत बड़ी संख्या में बागी मिर्जा एवं गुजराती अमीर अहमदाबाद पहुंच गए तो युद्ध अनिवार्य हो गया।

अबुल फजल लिखता है कि यदि शाही सेना बागियों का सामना करती तो जीत शाही सेना की होती किंतु न तो खानेआजम को अपने अधिकारियों पर भरोसा था और न खंभात से आए कुतुबुद्दीन को अपने सैनिकों पर भरोसा था।

इसलिए वे अहमदाबाद में बंद होकर बैठे रहे, उन्होंने अपनी तरफ से मिर्जाओं पर आक्रमण करने की कोई पहल नहीं की। खानेआजम ने इसका कारण यह बताया कि शहंशाह अकबर (Akbar) ने खानेआजम को सलाह दी थी कि जब बागी आपस में मिल जाएं और उनकी शक्ति बढ़ जाए, तब युद्ध के सम्बन्ध में सोच-समझ कर निर्णय करना चाहिए।

अहमदाबाद के मुगल अमीरों में फाजिल खाँ नामक एक उत्साही अमीर भी था। उसे यह अच्छा नहीं लगा कि शत्रु-दल अहमदाबाद को घेरकर खड़ा रहे और मुगल सेना अहमदाबाद के भीतर दुबक कर बैठी रहे।

इसलिए एक दिन फाजिल खाँ खानेआजम से अनुमति लेकर खानपुर दरवाजे से बाहर निकला और उसने बागियों को युद्ध के लिए ललकारा। जब मिर्जाओं तथा गुजराती अमीरों की सेना ने फाजिल खाँ तथा उसकी सेना को अहमदाबाद से बाहर आया देखा तो वे फाजिल खाँ तथा उसकी सेना पर टूट पड़े।

फाजिल खाँ के गद्दार सैनिक उसी समय मोर्चा छोड़कर भाग गए।

मिर्जाओं की सेना ने फाजिल खाँ को घायल कर दिया। वह फिर से भाग कर अहमदाबाद नगर में घुस गया। नगर में घुसने के कुछ देर बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

सुल्तान ख्वाजा भी फाजिल खाँ के साथ अहमदाबाद से बाहर निकला था। वह भी उल्टे पांव नगर की तरफ भागा किंतु उसका घोड़ा उछला और सुल्तान ख्वाजा एक खाई में गिर गया। इस पर एक टोकरी में रस्सी बांधकर सुल्तान ख्वाजा को खाई से बाहर निकाला गया। नगर के दरवाजे बंद हो गए तथा मिर्जाओं एवं गुजरातियों की सम्मिलित सेना नगर से थोड़ी दूर, अपने स्थान पर लौट गई।

खानेआजम अजीज कोका (AJIJ KOKA) (AJIJ KOKA) ने अगले ही दिन सुल्तान ख्वाजा को एक पत्र देकर अकबर (Akbar) के पास सीकरी भिजवाया। जब सुल्तान ख्वाजा अहमदाबाद के समाचार लेकर अकबर (Akbar) के पास पहुंचा तो अकबर (Akbar) विचलित हो गया।

अबुल फजल लिखता है कि अकबर (Akbar) का अजीज कोका (AJIJ KOKA) (AJIJ KOKA) से बड़ा प्रेम था। उसने तुरंत गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) को शांत करने का निर्णय लिया। अकबर (Akbar) ने अपना हरम कुंअर रायसिंह, सैयद महमूद बारहा तथा सुजात खाँ को सौंपा और अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा कि आप सबको तुरंत पाटन पहुंचना है। मैं भी पाटन जा रहा हूँ किंतु मेरा दिल कहता है कि मुझसे पहले पाटन कोई नहीं पहुंच सकता।

अकबर (Akbar) ने मानसिंह कच्छावा, राजा टोडरमल, बिहारीमल, शेख इब्राहीम हकीमउलमुल्क, शेख अहमद आदि सेनापतियों को शहजादों की रक्षा के लिए सीकरी में नियुक्त किया। अबुल फजल ने यहाँ राजा बिहारी मल का नाम गलत लिखा है क्योंकि वह इस समय लाहौर में नियुक्त था।

23 अगस्त 1573 को अकबर (Akbar) एक तेज साण्डनी पर सवार होकर गुजरात के लिए रवाना हो गया। अकबर (Akbar) के वफादार सेनापतियों ने घोड़ों एवं साण्डनियों पर सवार होकर अकबर (Akbar) को चारों ओर से घेर लिया और वे भी अकबर (Akbar) के साथ तेज गति से अहमदाबाद की तरफ बढ़ने लगे।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर (Akbar) ने 27 अमीरों को पाटण पहुंचने के आदेश दिए थे जिनमें से 15 हिन्दू थे। अबुल फजल ने अकबर (Akbar) के साथ जाने वाले मुस्लिम सेनापतियों की संख्या 14 तथा हिन्दू सेनापतियों की संख्या 13 बताई है।

इस प्रकार अकबर (Akbar) ने पूरी शक्ति से गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) का सामना करने का संकल्प लिया। रविवार को सीकरी से रवाना होने के बाद अकबर (Akbar) एक पहर रात बीतने तक चलता रहा तथा टोडा नामक कस्बे में जाकर रुका। प्रातः होते ही वह फिर से रवाना हो गया तथा सोमवार को ही हंसमहल पहुंच गया। वहाँ थोड़ी देर विश्राम करने के बाद अकबर (Akbar) और भी अधिक तेज गति से चला और एक रात पहर बीतने तक चलता रहा। इस बार वह मुईज्जाबाद पहुंचकर रुका।             

 ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

मिर्जाओं की बगावत : रात के अंधेरों में भी गुजरात की तरफ दौड़ता रहा अकबर! (107)

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मिर्जाओं की बगावत

गुजरात (Gujarat) के मिर्जाओं की बगावत को कुचलने तथा खानेआजम (Khan-e-Azam) अजीज कोका (Aziz Koka) को संकट (से उबारने के उद्देश्य से अकबर (Akbar) रविवार की सुबह फतहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) से रवाना हुआ और टोडा (Toda), हंसमहल (Hans Mahal) तथा मुईज्जाबाद (Muizzabad) में थोड़ी-थोड़ी देर विश्राम करता हुआ मंगलवार की सुबह नाश्ते के समय अजमेर (Ajmer) पहुंच गया।

अकबर (Akbar) ने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) की दरगाह पर जाकर ख्वाजा से सहायता की याचना की तथा दरगाह के लोगों में बख्शीश बांटी। दिन भर वह दरगाह के पास बने अजमेर के किले (Ajmer Fort) में विश्राम करता रहा और शाम होने पर घोड़े पर बैठकर गुजरात (Gujarat) के लिए चल दिया। अगले दिन सुबह अकबर (Akbar) मेड़ता (Merta) पहुंच गया।

अबुल फजल (Abul Fazl) ने लिखा है कि इस समय तक शाह कुली खाँ महरम (Shah Quli Khan), सईद मुहम्मद खाँ बारहा (Sayyid Muhammad Khan Barha) और मुहम्मद कुली खाँ तोकबाई (Muhammad Quli Khan Tokbai) आदि अमीर (Mughal Nobles) मेड़ता (Merta) से भी आगे निकल चुके थे।

अकबर (Akbar) ने बहुत थोड़ी देर के लिए मेड़ता (Merta) में विश्राम किया और फिर घोड़े (Horse) पर बैठकर जैतारण (Jaitaran) की ओर चल दिया। कुछ देर जैतारण (Jaitaran) में ठहरने के बाद अकबर (Akbar) फिर से रवाना हो गया।

तब तक शाम (Evening) हो चुकी थी और अकबर (Akbar) घने जंगल से गुजर रहा था। अकबर (Akbar) ने इस स्थान पर शिकार खेलने का विचार किया। थोड़ी ही देर में अकबर (Akbar) को एक काला हिरण (Black Deer) दिखाई दिया। अकबर (Akbar) ने एक शीघ्रगामी चीता हिरण के पीछे छोड़ा तथा यह विचार किया कि यदि यह चीता इस हिरण को पकड़ लेगा तो अवश्य ही मिर्जाओं की बगावत का नेतृत्व करने वाला मुहम्मद हुसैन मिर्जा (Muhammad Husain Mirza) हमारे हाथ आ जाएगा।

कुछ देर की भागमभाग के बाद चीते ने हिरण को दबोच लिया। मध्यरात्रि तक अकबर (Akbar) सोजत (Sojat) पहुंच गया जो वर्तमान में जोधपुर (Jodhpur) के निकट पाली जिले (Pali District) में स्थित है। अकबर (Akbar) ने वहीं पर विश्राम करने का निश्चय किया।

बृहस्पतिवार के सूर्योदय तक अकबर (Akbar) ने सोजत (Sojat) में विश्राम किया। अकबर (Akbar) सिरोही (Sirohi) होते हुए गुजरात (Gujarat) जाना चाहता था किंतु उसके सेवक उसे जालौर (Jalore) होते हुए गुजरात (Gujarat) ले जाना चाहते थे क्योंकि उन्हें सिरोही (Sirohi) के रास्ते गुजरात (Gujarat) जाने में भय लगता था।

वे अकबर (Akbar) को भुलावे में डालकर जालोर (Jalore) की तरफ वाले मार्ग पर ले गए। जब अकबर (Akbar) जालोर (Jalore) पहुंचा तो बहुत नाराज हुआ।

शुक्रवार (Friday) की प्रातः (Morning) अकबर (Akbar) जालोर (Jalore) से आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने पर उसे एक शेर (Lion) दिखाई दिया। अकबर (Akbar) के दरबारियों (Courtiers) ने उस शेर (Lion) का शिकार (Hunt) करने का विचार किया किंतु अकबर (Akbar) ने उन्हें शेर (Lion) का शिकार (Hunt) करने से रोक दिया और आगे बढ़ता रहा।

मार्ग में एक स्थान पर अकबर (Akbar) की अग्रिम सेना ने अकबर (Akbar) के लिए एक खेमा (Camp) लगा रखा था। जब आसपास के क्षेत्र (Region) में रहने वाले घोड़े के व्यापारियों को ज्ञात हुआ कि शहंशाह मिर्जाओं की बगावत दबाने के लिए अहमदाबाद जा रहा है और यहाँ से होकर निकलने वाला है तो वे बहुत से घोड़े लेकर खड़े हो गए ताकि उन्हें शंहशाह को अच्छे दामों पर बेचा जा सके।

अकबर (Akbar) ने उन लोगों के घोड़े खरीदकर अपने अमीरों एवं सेवकों में वितरित कर दिए। आधी रात के समय अकबर (Akbar) ने यहाँ विश्राम किया और फिर घोड़े पर बैठकर चल दिया। अगले दिन शनिवार की आधी रात तक वह लगातार चलता रहा।

रविवार के अंत तक भी उसने बहुत कम विश्राम किया और सोमवार की सायं, वह पाटन से बीस कोस दूर डीसा पहुंच गया। मिर्जाओं की बगावत ने अकबर को इतना उद्वेलित कर रखा था कि उसका दिन का चैन और रातों की नींद भी उड़ी हुई थी।

अकबर (Akbar) इतनी तेजी से क्यों चल रहा था और अपनी इस यात्रा का काफी हिस्सा रात में क्यों पूरा कर रहा था, इसका एक विशेष कारण था। अकबर (Akbar) किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था कि उसके आने की सूचना शत्रु को पहले ही मिल जाए।

अकबर (Akbar) अपने शत्रुओं को अपने अचानक आगमन से चौंकाना चाहता था ताकि उन्हें संभलने का मौका दिए बिना ही दबोचा जा सके। अकबर (Akbar) यह भी नहीं चाहता था कि अकबर (Akbar) के आने की सूचना पाकर उसके शत्रु अहमदाबाद (Ahmedabad) पर आक्रमण करके अजीज कोका (Aziz Koka) को नुक्सान पहुंचाने का प्रयास करें।

संभवतः अपने धायभाई अजीज कोका (Aziz Koka) को लेकर अकबर (Akbar) के मन में कोई दबी हुई कुण्ठा भी काम कर रही थी। अपने एक धायभाई को तो अकबर (Akbar) ने स्वयं ही मरवा डाला था और अकबर (Akbar) नहीं चाहता था कि उसका दूसरा धायभाई अकबर (Akbar) की किसी ढिलाई की वजह से मारा जाए।

इसलिए अकबर (Akbar) रात-रात भर चलकर गुजरात (Gujarat) की तरफ दौड़ा जा रहा था। डीसा (Deesa) से एक संदेशवाहक पाटन (Patan) की ओर दौड़ाया गया ताकि वहाँ से एक सेना तुरंत अहमदाबाद (Ahmedabad) के लिए रवाना की जा सके।

अकबर (Akbar) स्वयं पाटन (Patan) को एक तरफ छोड़ता हुआ डीसा (Deesa) से सीधे ही अहमदाबाद (Ahmedabad) की ओर बढ़ गया। बालिसाना (Balisana) पहुंचकर अकबर (Akbar) रुक गया। पाटन (Patan) से अकबर (Akbar) की सेना भी आ पहुंची। यहाँ पर सेना को क्रमबद्ध किया गया।

बैराम खाँ (Bairam Khan) का पुत्र रहीम खाँ (Rahim Khan) पाटन (Patan) का सूबेदार था। वह भी पाटन (Patan) की सेना के साथ अकबर (Akbar) के समक्ष हाजिर हुआ। इस समय रहीम (Rahim) 16 साल का हो चुका था और सेना का नेतृत्व कर सकता था।

अकबर (Akbar) ने उसे अपनी सेना के मध्य भाग में नियुक्त किया। खान किला (Khan Qila) को दायें पक्ष का, वजीर खाँ (Wazir Khan) को बायें पक्ष का, मुहम्मद कुली खाँ (Muhammad Quli Khan) को हरावल (Front Guard) का नेतृत्व सौंपा गया। बादशाह ने स्वयं को अल्तमश (Altamash) में रखा। उसके साथ सौ चुने हुए खूंखार सैनिक थे जो पलक झपकते ही आदमी की जान ले लेते थे।

मुगल सेना (Mughal Army) में मध्य स्थान के अग्रगामी संरक्षक दल को इल्तमश या अल्तमश (Iltamash or Altamash) कहते थे। यह भाग हरावल (Front Guard) से कुछ दूरी बनाकर रखता था। जब हरावल (Front Guard) अपना काम कर चुकते थे तब अल्तमश (Altamash) आगे बढ़कर शत्रुओं का तेजी से सफाया करता था।

हमने अब तक अकबर (Akbar) के जिन अभियानों की चर्चा की है, वे सब किसी न किसी दुर्ग पर हुए थे। यह पहला अवसर था जब अकबर (Akbar) खुले मैदान में अपने शत्रु का सामना करने जा रहा था।

बालिसाना (Balisana) से कुछ संदेशवाहक अहमदाबाद (Ahmedabad) की तरफ दौड़ाए गए। उन्हें खानेआजम (Khan-e-Azam) तक यह संदेश पहुंचाना था कि शहंशाह मिर्जाओं की बगावत दबाने के उद्देश्य से, मिर्जाओं (Mirza Rebels) और गुजरातियों (Gujaratis) की सम्मिलित सेना पर हमला करने आ गया है, आप लोग भी नगर के दरवाजे खोलकर शहंशाह (Emperor) से आकर मिल जाएं।

बादशाह घोड़े पर सवार होकर बालिसाना (Balisana) से अहमदाबाद (Ahmedabad) के लिए रवाना हुआ। वह रात भर घोड़े पर चलता रहा और कुछ दिन चढ़े वह चैताना नामक गांव (Chaitana Village) पहुंचा। यहाँ पर शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के स्थानीय सेनापति राबलिया (Rablio) ने अकबर (Akbar) का रास्ता (Path) रोका।

उसके सैनिकों (Soldiers) ने दुर्ग से बाहर निकलकर शाही सेना पर आक्रमण किया। अकबर (Akbar) की सेना ने बहुत कम समय में राबलिया (Rablio) के बहुत से सैनिकों को मार डाला। बचे हुए सैनिक भाग कर दुर्ग में चले गए।

इस पर अकबर (Akbar) ने आगे का मार्ग पकड़ा। दो कोस चलने के बाद बादशाह रुक गया। यहीं पर यूसुफ खाँ (Yusuf Khan) और कासिम खाँ (Qasim Khan) आदि अमीर (Mughal Nobles) अपनी सेनाएं लेकर आ गए।

उनके आने के बाद बादशाह फिर रवाना हुआ और अहमदाबाद (Ahmedabad) से तीन कोस पहले रुक गया। यहाँ से उसने आसफ खाँ (Asaf Khan) को अहमदाबाद (Ahmedabad) भिजवाया ताकि वह खानेआजम (Khan-e-Azam) को संदेश पहुंचा सके कि शाही सेना आ पहुंची है। वह भी नगर के द्वार खोलकर अपनी सेना को ले आए।

✍️- डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अहमदाबाद का युद्ध अकबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया (108)

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अकबर अपने दरबारियों के साथ

अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) अकबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया। अकबर ने आगरा से अहमदाबाद तक का 960 किलोमीटर लम्बा मार्ग 10 दिन में तय किया।

अहमदाबाद (Ahmedabad) से तीन कोस पहले रुक कर अकबर ने अपनी सेनाओं (armies) को जमाया। इस समय तक अकबर के बहुत से सेनापतियों (commanders) की सेनाएं अकबर से आ मिली थीं जो अपनी-अपनी सेनाओं के साथ सीकरी (Fatehpur Sikri) और आगरा (Agra) और विभिन्न स्थानों से अहमदाबाद की तरफ दौड़ रही थीं।

राहुल सांस्कृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि अकबर ने औसतन पचास मील अर्थात् अस्सी किलोमीटर प्रतिदिन की गति से सीकरी से अहमदाबाद तक की दूरी तय की। उसने लगभग 600 मील (miles) अर्थात् 960 किलोमीटर (kilometers) की दूरी लगभग दस दिन में पूरी की तथा ग्यारहवें दिन वह अहमदाबाद के पास जा पहुंचा।

अबुल फजल (Abul Fazl, historian) ने लिखा है कि इस समय अकबर के पास तीन हजार सैनिक (soldiers) थे किंतु उसके शत्रुओं (enemies) की संख्या 20 हजार थी। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni, chronicler) ने भी लिखा है कि अहमदाबाद का युद्ध भले ही कितना भयान क्यों न हो किंतु अकबर के सारे सैनिकों की संख्या कुल मिलाकर 3 हजार से ज्यादा नहीं थी किंतु गुजराती (Gujaratis) ने बीस हजार गुजराती, मुगल (Mughals), अफगान (Afghans), अबीसीनियन (Abyssinians) और राजपूत (Rajputs) एकत्रित कर रखे थे।

यदि अब्दुल कादिर बदायूंनी के इस कथन पर विचार किया जाए तो एक बड़ी विचित्र स्थिति सामने आती है, बाबर (Babur) के आगमन के समय जो मुगल और अफगान एक दूसरे के विरुद्ध लड़े थे, आज बहुत से मुगल और अफगान गुजराती अमीर (nobles) और मिर्जा (Mirzas) के झण्डों के तले एक पक्ष में होकर अकबर के विरुद्ध लड़ रहे थे।

खानवा (Battle of Khanwa) के मैदान में राजपूत बाबर के खिलाफ लड़े थे किंतु अहमदाबाद का युद्ध उस युद्ध से बहुत अलग था, आज बहुत से राजपूत अकबर के पक्ष में तो बहुत से राजपूत अकबर के विरुद्ध लड़ रहे थे। इसी प्रकार अबीसीनियन भी दोनों पक्षों में रहकर एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रहे थे।

अहमदाबाद नगर के बाहर मुगल (Mughals)-मुगल से लड़ रहा था, राजपूत (Rajputs)-राजपूत से लड़ रहा था, हब्शी (Habshi, Abyssinians)-हब्शी से लड़ रहा था और अफगान (Afghans)-अफगान से लड़ रहा था।

अकबर ने सौ चुने हुए सैनिक (soldiers) को अपने चारों ओर रखा तथा शेष सेना को अलग-अलग सेनापतियों (commanders) के कमान में रखकर हरावल (vanguard), दायें पार्श्व (right flank), बायें पार्श्व (left flank), अल्तमश (Altamash unit) सहित मध्य भाग (center) आदि का गठन किया।

अबुल फजल ने अपने विवरणों में मुगल बादशाह (Mughal Emperor) के सैनिकों की संख्या सदैव कम करके दिखाई है तथा शत्रु-दल की सेना की संख्या खूब बढ़ा-चढ़ा कर लिखी है तथा अंत में मुगल बादशाहों की जीत दिखाई है।

यदि अकबर के 27 सेनापति एक-एक हजार सैनिक भी लेकर आए हों तो भी अकबर के सैनिकों की संख्या कम से कम 27 हजार हो गई होगी। जबकि वास्तव में इस युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) में अकबर के सैनिकों की संख्या 50 हजार से किसी भी हालत में कम नहीं रही होगी।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर को आशा थी कि जब वह साबरमती नदी (Sabarmati River) के तट पर पहुंचेगा तब अजीज कोका (Aziz Koka, Mughal noble) अपनी सेना के साथ वहीं पर बादशाह को मिलेगा किंतु अजीज कोका अख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) के भय से अहमदाबाद से बाहर ही नहीं निकल पाया।

अख्तियाररुलमुल्क इस ताक में था कि जैसे ही अजीज कोका अहमदाबाद से बाहर निकले, उसे मार डाला जाए।

अबुल फजल द्वारा दी गई सूची में हिंदू सेनानायक (Hindu Generals) में जगन्नाथ रायसल (Jagannath Raisal), जयमल (Jaimal), जगमल पटवार (Jagmal Patwar), राजा बीरबल (Birbal), राजा दीपचंद (Raja Deepchand), मानसिंह दरबारी (Man Singh), रामदास कच्छावा (Ramdas Kachhwaha), रामचंद्र (Ramchandra), सांवलदास (Sanwaldas), जाइन कायथ (Jain Kayath), हरदास (Hardas), ताराचंद (Tarachand), खवास (Khwas) और लाल कलावंत (Lal Kalawant) के नाम लिखे गए हैं।

अबुल फजल लिखता है कि रूपसिंह (Rupsingh) का पुत्र जयमल (Jaimal) एक भारी कवच (armor) पहनकर बादशाह के समक्ष उपस्थित हुआ। बादशाह ने अपने निजी उपयोग का एक हल्का कवच उसे दिलवा दिया तथा उसका भारी कवच मालदेव (Maldev) के पौत्र कर्ण (Karan) को भेंट कर दिया जिसके पास कवच नहीं था।

वास्तव में वह कवच जयमल के पिता रूपसिंह का था। जब जयमल के पिता रूपसिंह ने मालदेव के पुत्र कर्ण को अपना कवच पहने हुए देखा तो वह गुस्से से आग-बबूला हो गया।

कर्ण के पिता मालदेव तथा रूपसिंह के बीच परम्परागत शत्रुता (rivalry) थी। इसलिए रूपसिंह ने अपना कवच उतार दिया और नाराज होकर बादशाह के सेवकों (servants) से कहा कि वे बादशाह से मेरा कवच लाकर मुझे वापस लौटा दें।

जब बादशाह के सेवकों ने यह बात बादशाह से कही तो बादशाह ने रूपसिंह से कहलवाया कि हमने तुम्हारे पुत्र से तुम्हारा कवच हमारे कवच के बदले में लिया है, इसलिए अब उस कवच पर तुम्हारा अधिकार नहीं है।

इस पर रूपसिंह जोरों से चिल्लाने लगा। जब राजा भगवानदास कच्छावा (Raja Bhagwandas Kachhwaha) को रूपसिंह की इस बदतमीजी के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने जाकर रूपसिंह को शांत किया।

भगवानदास के कहने पर रूपसिंह ने बादशाह के समक्ष उपस्थित होकर अपनी गलती के लिए क्षमा-याचना (apology) की। बादशाह ने रूपसिंह की ओर बड़ी उपेक्षा (disdain) से देखा।

इस पर राजा भगवानदास ने बादशाह से कहा कि आप इसका अपराध क्षमा करें क्योंकि इसने भांग पी रखी है।

इस पर भी जब अकबर प्रसन्न नहीं हुआ तो राजा भगवानदास ने अकबर से कहा कि मैं आपको शत्रु (enemy) पर विजय (victory) प्राप्त करने की अग्रिम बधाई देता हूँ क्योंकि इस समय आपकी विजय के तीन लक्षण (omens) प्रकट हुए हैं। पहला लक्षण यह कि आप घोड़े (horse) पर सवार हैं, दूसरा लक्षण यह कि हवा (wind) हमारे पीछे की तरफ से चल रही है और तीसरा लक्षण यह है कि हमारे साथ आकाश में चील-कौवे (eagles-crows) भी चल रहे हैं।

कहा नहीं जा सकता कि इस कथन का अकबर पर क्या प्रभाव हुआ क्योंकि इस सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं मिलता है।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर के सेनापतियों ने अकबर को सलाह दी कि अजीज कोका के आने तक इसी स्थान पर प्रतीक्षा की जाए किंतु अकबर अपने साथ दो अंगरक्षक (bodyguards) लेकर अहमदाबाद नगर की तरफ चल पड़ा।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा (Muhammad Hussain Mirza) ने डेढ़ हजार सैनिक (soldiers) के साथ अकबर पर हमला बोला जिसके कारण अकबर का घोड़ा (horse) घायल हो गया तथा अफवाह (rumor) फैल गई कि अकबर मारा गया। इस कारण अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) एक नए दौर में पहुंच गया किंतु यह अफवाह अकबर के पक्ष पर कोई दुष्प्रभाव (impact) नहीं डाल सकी क्योंकि अकबर उनके साथ ही रहकर लड़ाई (battle) कर रहा था।

स्पष्ट है कि या तो यह विवरण (account) मनगढ़त है या फिर गलत ढंग से लिखा गया है। क्योंकि न तो अकबर अपनी सेना (army) से अलग होकर, केवल दो अंगरक्षक (bodyguards) के साथ अहमदाबाद (Ahmedabad) की तरफ जाने की गलती कर सकता था और न यह संभव था कि यदि इस अवस्था में अकबर पर डेढ़ हजार सैनिक हमला करते तो अकबर किसी भी हालत में जीवित रह सकता था।

अवश्य ही अकबर की काफी बड़ी सेना (army) अकबर के साथ चल रही थी।

अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) अकबर के समय के लगभग सभी लेखकों ने बहुत बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है। अबुल फजल (Abul Fazl, historian) की अपेक्षा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni, chronicler) ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh) में इस युद्ध (battle) का अधिक स्पष्ट वर्णन (description) किया है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गुजराती अमीर जौ की तरह काट डाले अकबर ने (109)

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गुजराती अमीर

गुजराती अमीर (Gujrati Nobles)) अकबर से बगावत करने पर उतारू थे। अकबर (Akbar) ने उन्हें जौ के दानों की तरह काट डाला।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने मुंतखब उत तवारीख (historical chronicle) में लिखा है कि जिस समय अकबर अहमदाबाद (Ahmedabad) के निकट पहुंचा, दुश्मन की सेना (enemy army) असावधानी की नींद में सो रही थी। जब उन्होंने बिगुल (bugle sound) की आवाज सुनी तो शत्रु के सैनिक असमंजस में पड़कर घोड़ों पर चढ़ने को दौड़े।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा (बागी नेता (rebel leader)) दो-तीन और घुड़सवारों के साथ दरिया किनारा (river bank) भाग आया ताकि समझ सके कि माजरा क्या है! हुआ यह कि तुर्क सुमान कुली भी दो-तीन घुड़सवारों के साथ इस ओर से दरिया किनारे गया हुआ था।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने उससे पूछा- ‘हुजूर यह कैसी फौज है?’
उसने जवाब दिया- ‘शाही फौज (Royal Army)!’

मिर्जा ने कहा- ‘मेरे सेवकों ने मुझे आज ही बताया है कि उन्होंने चौदह दिन पहले अकबर को फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) में छोड़ा था। यदि यह शाही फौज है तो हमेशा साथ रहने वाले हाथी (war elephants) कहाँ हैं?’

इस पर सुमान कुली ने कहा- ‘चार सौ कोस नौ दिन में हाथी कैसे तय कर सकते हैं?’
तब हुसैन मिर्जा ने इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) के साथ पांच हजार घुड़सवार किला (fort) की ओर भेजे ताकि खान-ए-आजम बाहर निकल कर गुजराती (Gujaratis) पर आक्रमण नहीं कर सके।

उधर अकबर की शाही फौज (Mughal Army) ने आनन-फानन में दरिया पार कर लिया। मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने पहले ही अनुमान लगा लिया था कि अकबर की सेना साबरमती नदी (Sabarmati River) को पार करने में विलम्ब नहीं करेगी।

इस कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा के पंद्रह सौ सैनिकों ने शाही सेना के हरावल (vanguard) पर हमला किया। यहीं पर बागी मिर्जाओं की तरफ से मुहम्मद कुली खाँ और तर खाँ दीवाना भी अपनी सेनाओं के साथ नियुक्त थे।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सैनिकों ने अबीसीनियन (Abyssinians) और अफगान (Afghans) ने साथ मिलकर अकबर की सेना के बायें पक्ष पर धावा बोला जो वजीर खाँ (Wazir Khan) की कमान में था।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि दोनों ओर से नौजवान युद्धरत हुए तथा जौ के दाने की तरह साफ कर दिए गए।
इतनी घमासान जंग (battle) हुई कि यह पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी। जब शहंशाह ने देखा कि उसकी फौज का हरावल बिखर गया है तो वह जोर से चिल्लाया- ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)!’ उन दिनों मुगल (Mughals) में यही यलगार लगाई जाती थी।

अकबर ने एक मजबूत हमला (attack) करके दुश्मन की पंक्तियों को तोड़ दिया तथा उन्हें अस्त-व्यस्त कर दिया। बहुत से सिर हवा में उड़ गए। सैफ खाँ कोका दुश्मन के व्यूह (battle formation) में कूद पड़ा और उस भंवर में फंस गया जिसमें से वह कभी बाहर नहीं निकल सका।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।

उसका रास्ता एक कांटेदार झाड़ी ने रोका। उसका इरादा घोड़े को कुदा देने का था, ऐसे में दुर्भाग्य से उसके घोड़े की लगाम एक झाड़ी में अटक गई और घोड़े की काठी खींचते हुए उसे जमीन पर गिरा दिया।

गदाई अली (Turk soldier) नामक एक तुर्क, जो तेजी से मुहम्मद हुसैन मिर्जा का पीछा कर रहा था, धरती पर गिरे हुए मुहम्मद हुसैन मिर्जा पर तेजी से कूदा और उसे बंदी (captured) बनाकर शहंशाह के पास ले आया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने अपनी स्वाभाविक दयालुता (mercy) और अपने अच्छे स्वभाव के कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा को डांट-फटकार लगाने के बाद उसे रायसिंह (Raisingh, Rajput commander) के सुपुर्द कर दिया।

अबुल फजल (Abul Fazl, historian) ने लिखा है कि रायसिंह को सीकरी (Sikri, royal harem guard) में हरम की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था जबकि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने रायसिंह को युद्ध का मैदान (battlefield) में मौजूद दिखाया है।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि इस दौरान वजीर खाँ (Wazir Khan) अबीसीनियनों और गुजरातियों से निबट रहा था और आमने-सामने की लड़ाई में अपना पैतृक जौहर (valor) दिखा रहा था। जब दुश्मनों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा और शाह मिर्जा की हार की सूचना सुनी तो उन्होंने जंग का मैदान (battlefield) से पीठ दिखाई।

विजय की संभावना से ज्यादा जान प्यारी समझ कर वे तेजी से भाग गए। इसी समय अकबर के सेनापति खान-ए-कलाँ (Khan-e-Kalan, Mughal general) ने शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों को पूरी तरह परास्त कर दिया। इस प्रकार मैदान दुश्मनों से पूरी तरह खाली हो गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस युद्ध में अकबर के सिपाहियों की तुलना उन दर्जियों (tailors) से की है जो युद्ध के मैदान में शत्रु सैनिकों को अपनी तलवार (swords) से काटते हैं तथा तीर (arrows) से उनके शरीर सिलते हैं। वह लिखता है कि विजय के बाद शहंशाह मैदाने जंग (battlefield) के पास की पहाड़ी (hill) पर चढ़ा और जंगजुओं के भुजबल (strength) का अंदाजा लगाने में व्यस्त हो गया।

तब अचानक इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) जिसे खाने-आजम (Khan-e-Azam) को शहंशाह के साथ मिलने से रोकने के लिए नियुक्त किया गया था, मिर्जाओं की पराजय की सूचना सुनकर अपने मोर्चे से हट गया और अपने पांच हजार घुड़सवारों के साथ खुले मैदान में आ गया।

एक बार फिर से दोनों पक्षों में तेज संघर्ष (conflict) आरम्भ हो गया। शहंशाह ने अपनी टुकड़ियों को तीरों की बौछार (arrow volley) करने के आदेश दिए।

इख्तियार-उल-मुल्क से आगे चल रही टुकड़ी ने ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)‘ का नारा लगाया और धूल पर लम्बे हो गए अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हुए। हुसैन खाँ (Husain Khan) लड़ने वालों में आगे था इसलिए शहंशाह ने अना खंजर (ceremonial dagger) उसे भेंट कर दिया।

इख्तियार-उल-मुल्क के घोड़े की लगाम टूटने से वह एक रास से ही भाग खड़ा हुआ। जब तक कि उसका घोड़ा कांटों वाली झाड़ी में न गिर गया जैसे गधा (donkey) कीचड़ में गिरता है।

अकबर के तुर्क सिपाही (Turkish soldiers) इख्तियार-उल-मुल्क के पीछे चल रहे थे। उन्होंने इख्तियार-उल-मुल्क को घेर लिया। सोहराब बेग तुर्कमान (Sohrab Beg Turkmen) ने झपट कर इख्तियार-उल-मुल्क को पकड़ लिया।

इख्तियार-उल-मुल्क ने सोहराब बेग से कहा- ‘तुम तुर्कमान लगते हो जो पवित्र अली (Ali) और उसके साथियों के अनुयायी हैं। मैं बुखारा (Bukhara) का सैयद हूँ, मुझे छोड़ दो।’
सोहराब बेग ने जवाब दिया- ‘मैं तुम्हें कैसे छोड़ दूँ, तुम इख्तियार-उल-मुल्क हो। मैं तुम्हें पहचानता हूँ और काफी देर से तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ।’

इसके बाद सोहराब बेग घोड़े से नीचे उतरा और उसने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर (head) उसके धड़ (torso) से अलग कर दिया। कोई मुगल सैनिक (Mughal soldier) इख्तियार-उल-मुल्क का घोड़ा ले गया। इसलिए सोहराब बेग ने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर एक कपड़े से ढंका और शाबाशी (reward) पाने के लिए बादशाह के पास ले गया।

इसी समय इख्तियार-उल-मुल्क का पैदा किया बवंडर (chaos) थम गया। रायसिंह (Raisingh) के सेवकों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा को हाथी से उतारा तथा उसे बल्लम (spear) के एक ही वार से बिना अस्तित्व वाले संसार में भेज दिया।

अकबर ने इख्तियार-उल-मुल्क तथा मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सिर (heads) आगरा किला (Agra Fort) के बाहर लटकाने के लिए भेज दिए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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