सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी हुई दिखाई देती है। हिन्दी साहित्य के इतिहास (History of Hindi Literature) में पंद्रहवीं शताब्दी को भक्तिकाल (Bhakti Period) के रूप में याद किया जाता है। मुसलमानों के अत्याचारों से संत्रस्त हिन्दुओं को अपने धर्म पर अडिग रहने के लिए उन्हें भक्ति का सम्बल दिया गया।

इस काल में लगभग पूरे भारत में बड़ी संख्या में संतों एवं भक्त-कवियों का आविर्भाव (Emergence) हुआ। इन्होंने जनकवियों के रूप में अपने भक्ति भरे उद्गार प्रकट किए और जनभाषा (Vernacular Language) में जनजागृति का सराहनीय कार्य किया। भक्तिकाल में भक्ति की दो धाराएं प्रबल रूप में सामने आईं—सगुण भक्तिधारा और निर्गुण भक्तिधारा। इसी काल में रामानंद के 12 शिष्यों का आविर्भाव हुआ, जिनमें से कबीर भी एक थे।

कबीर का दर्शन और गुरु का महत्व

संत कबीर निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि हैं, किन्तु वे सगुण को पूरी तरह नकार नहीं पाए। उनके काव्य में यह सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व स्पष्ट रूप से प्रस्फुटित होता है। वे कहते हैं—

“सगुण की सेवा करो, निर्गुण को करूं ध्यान।

निर्गुण सगुण के परे, तहिं हमारा ध्यान।।”

कबीर का जन्म ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार, संवत् 1455 अर्थात् 1398 ईस्वी में होना सिद्ध होता है। बीजक (Bijak) इनका एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ (Authentic Text) माना जाता है। बीजक में यह भी लिखा है कि कबीर ने न तो कभी कागज छुआ और न ही कभी कलम पकड़ी, फिर भी वे चारों युगों की बातें मौखिक ही बता देते थे—

“मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहीं हाथ।

चारिउ युग का महातम, कबीर मुखहि जनाई बात।।” (साखी-187)

कबीर अनुभव जन्य बात कहा करते थे— तू कहता कागद की लेखी। मैं कहता आँखिन की देखी।।” अतः यह माना जाने लगा कि कबीर बीजक भी कबीर के अनुयायियों (Followers) ने कबीर से सुनकर लिखा था। किंतु यह संभव नहीं लगता कि इतने बड़े संत-भक्त कबीर पढ़ने-लिखने से वंचित रह गए हों। उनके अनुयायी अनंतदास ने “कबीर परिचई” में उनके उद्गार इस प्रकार स्पष्ट किए हैं—

“हम तो भगति मुक्ति में आया। गुरु परसाद रामगुण गाया।।

राम भरोसे गिनो न काहू। सब मिलि राजा रंक रिसाहू।।

रामनहरा राम है, मति न सके कोइ।

पतिताहूं ना डरौं, करता करे सो होइ।।” (पृ.27/226)

कबीर जानते थे कि भक्ति से ही मुक्ति संभव है और यह भक्ति बिना गुरु-कृपा (Guru’s Grace) के संभव नहीं है। बीजक के प्रारंभ में ही कबीर गुरु की महत्ता प्रतिपादित कर देते हैं—

“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरुदेव की, गोविंद दियो मिलाय।।” (पृ. 5, पद-1)

राम-नाम का वास्तविक स्वरूप

गुरु-कृपा से ही कबीर भक्ति-पथ पर अग्रसर होते हैं। कबीर परिचई से स्पष्ट होता है कि कबीर के गुरु रामानंद थे। अतः कुछ विद्वानों का मानना है कि कबीर के पदों में जहाँ-जहाँ “राम” का नाम आया है, वह उनके गुरु रामानंद के लिए है। जबकि कबीर साहित्य का अवगाहन करने पर पता चलता है कि यहाँ एक वैचारिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व विद्यमान है और कबीर के राम केवल निर्गुण ब्रह्म (Attributeless Absolute) के प्रतीक हैं।

भर्तिकाल से पूर्व वैदिक वाङ्मय (Vedic Literature) में सगुण ब्रह्म के बजाय निर्गुण ब्रह्म का चिंतन ही प्रमुख था। वहाँ अवतारवाद (Incarnationism) की कोई परिकल्पना नहीं थी। कबीर ने भी ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप को ही “आतम-राम” के रूप में अपनाया। भक्तिकाल के सगुण भक्तों ने भी निर्गुण ब्रह्म की सत्ता का निषेध नहीं किया है, अपितु सगुण भक्ति-मार्ग में प्रवेश से पूर्व निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप पर पर्याप्त चिंतन किया है।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में ब्रह्म के सगुण और निर्गुण…… दो स्वरूप बताते हुए दोनों को ही अगमनीय, अथाह, अनादि और अनुपम कहा है और उस ब्रह्म के नाम (राम) को इन दोनों स्वरूपों से बड़ा बताया है, क्योंकि वह इन दोनों स्वरूपों को अपने वश में रखता है—

“अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अथ अगाध अनादि अनूपा।

मोरें मत बड़ नाम दुइ तें। किए जेहि जुग निज निज बसतें।।” (रा. बाल. 23/2)

शायद यही कारण रहा हो कि कबीर सगुण-निर्गुण से ही इतर ब्रह्म का चिंतन करते हैं, जहाँ सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व समाप्त हो जाता है। महाकवि सूरदास भी “भ्रमरगीत-सार” के प्रारंभ में सगुण भक्ति-पथ में प्रवृत्त होने का कारण बताते हुए लिखते हैं—

“रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब किन ध्यावे।

सब विधि अगम विचारहि ताते सूर सगुन लीला पद गावै।।”

अवतारवाद का खंडन और प्रेम का मार्ग

कबीर अवतारवाद में विश्वास नहीं रखते। वे अवतारी पुरुषों को महापुरुष तो मानते हैं, किन्तु ईश्वर नहीं मानते। यहाँ उनका पारमार्थिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व मुखर होता है। बीजक में वे कहते हैं—

” दशरथ सुत तिहुँ लोकहि जाना, राम नाम का मर्म है आना।।” (शब्द-109, पृ. 164)।

राम-नाम के मर्म की ओर संकेत करते हुए “ज्ञान चौंतीसा” में कबीर कहते हैं—

“ररा रति रहा अरुझाई। राम के कहे दुख दरिद्र जाई।।

ररा कहै सुनहु रे भाई। सतगुरु पूछे के सेवक आई।।” (पद-27, पृ.177)

अर्थात् “र” अक्षर संसार को इस झगड़े में उलझाए हुए है कि राम-राम कहने से सब दुःख-दारिद्य दूर होता है, किंतु वह यह भी कहता है कि सद्गुरु को पूछकर ही राम-नाम का सेवन करो। बीजक के प्रारंभ में गुरु वंदना करते हुए कबीर ज्ञान व भक्ति के मार्ग में दुधा से प्रवृत्त करने के उपकार को प्रतिपल स्मृत करते हुए अपने आपको गुरु-चरणों में न्यौछावर करते हुए कहते हैं—

“बलिहारी गुरुदेव की, घड़ी-घड़ी सौ बार।

भक्ति ज्ञान दुधाव के, करत लिया भवपार।।” (पृ. 5, पद 2)

कबीर की यह भक्ति अपने-आतम-राम निर्गुण-ब्रह्म के प्रति बहुत ही दृढ़ है। इसमें दिखावा नहीं, दृढ़ आस्था है, विश्वास (Faith) है, समर्पण है और अपार प्रेम है। प्रेम के बिना भक्ति संभव ही नहीं है। कबीर कहते हैं—

“भक्ति पियारी राम की, जैसी पियारी आग।

सारा पुट्टन जरि मुवा, बहुरि ले आवे मांग।।” (साखी-267, पृ. 207)

कबीर को राम-भक्ति आग के समान प्रिय है। आग लगने पर वह सारे गाँव को जला डालती है, फिर भी भोजन बनाने या घर में उजाला करने के लिए व्यक्ति उसे दूसरों के घरों से मांग लाता है। राम-भक्ति के लिए ऐसे प्रेम की प्रगाढ़ता जरूरी है। किंतु ऐसा निष्कलुष एवं निर्बोध प्रेम तभी संभव है, जब व्यक्ति में राग-द्वेष, छल-कपट और अहंकार (Ego) के भाव न आएं।

कबीर कहते हैं, कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नांहि। सीस उतारे भुइं धरे, तब पैठे घर मांहि।।”

कबीर का व्यक्तित्व और ‘हद-बेहद’ का दर्शन

कबीर के मन में संतों-भक्तों-गुरुजनों और प्राणियों के प्रति कोमल एवं कल्याणकारी भाव हैं, ऐसे भाव, जो उन्हें जगत से लौटाकर आत्मलीनता (Self-absorption) में दृढ़ करते हैं। ब्रह्म के प्रति इस तरह की आत्मलीनता ही भक्ति की पराकाष्ठा (Climax of Devotion) कही जाती है।

कबीर बाहरी दिखावा पसंद नहीं करते। उनका कहना है कि मन में विषय-विकार-रूपी विष रखें और आत्मचेतना-रूपी अमृत से अनजान रहते हुए मूर्तिपूजा (Idolatry) करें, तो ऐसे लोग भक्ति के मूल स्वरूप का बिगाड़ ही करते हैं—

“कबीर न भक्ति बिगारिया, कंकर पथर धोय।

अन्तर में विष राखिके, अमृत डारिन खोय।।” (साखी-251)

“कबीर” शब्द है अरबी भाषा का, जिसका अर्थ होता है— महान, श्रेष्ठ। कबीर के बारे में कहा गया है—

“हद तपे से औलिया, बेहद तपे सो पीर।

हद बेहद दोऊ तपे, ताको नाम कबीर।”

यह हद और बेहद क्या? हद तो है गृहस्थ की मर्यादा और बेहद है गृहस्थ की मर्यादा से बाहर रहने वाले साधु, किंतु कबीर तो गृहस्थ भी थे, साधु-संत एवं योगी भी थे और इनसे ऊपर भी थे। उनके जीवन का यही संतुलन उनके काव्य के सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व को सुलझाता है। एक साखी में वे कहते हैं—

“हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।

हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध।।” (साखी-189)

यहीं गृहस्थ-मर्यादा एवं वैराग्य-मर्यादा से परे स्वरूप-स्थिति में अनुभवजन्य ज्ञान की बात कही गई है। यह दूसरों के लिए दुर्बोध (Incomprehensible) भी है और सर्वोच्च भी है। यह स्थिति गुरु-कृपा बिना संभव नहीं होती। गुरु-कृपा से मनुष्य को देवत्व प्राप्त करते देर नहीं लगती। कबीर कहते हैं—

“बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ बार।

मानुष से देवता किया, करत न लागी बार।।” (पद-14)

रामानंद की देन और कबीर की अनन्यता

अपने गुरु रामानंद से राम के प्रति ऐसी ही प्रेम भक्ति कबीर ने प्राप्त की थी, जिससे उनका कायाकल्प होते देर नहीं लगी। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि उनके पदों में एक अनन्यसाधारण बात मिलती है जो सिद्धों और योगियों की अक्खड़ता भरी उक्तियों में नहीं है, जो वेदान्तियों के तर्क-कर्कश ग्रंथों में नहीं है जो समाज-सुधार की “हाय-हाय” में नहीं है।

कोई अनन्य साधारण बात। वह क्या है? फिर वह वस्तु भी क्या है, जिसे रामचंद्र से पाकर कबीर जैसा मस्तमौला फक्कड़ हमेशा के लिए उनका क्रीतदास हो गया। ……राम और उनकी भक्ति — ये ही रामानंद की कबीर को देन है। इन्हीं दो वस्तुओं ने कबीर को योगियों से अलग कर दिया, सिद्धों से अलग कर दिया, मुल्लाओं से अलग कर दिया। इन्हीं को पकड़कर कबीर “वीर” हो गए— सबसे अलग, सबसे ऊपर, सबसे विलक्षण, सबसे सरस, सबसे तेज।

कबीर मानते थे कि भक्ति के बिना हर कोई इस भ्रामक जगत (Illusory World) में गोते खा रहा है, डूब रहा है, कोई भी पार नहीं उतर रहा है और इस बात पर कोई विचार भी नहीं कर रहा है—

“भरम का बाँधा यह जगत, कोई न करे विचार।

हरि की भक्ति जाने बिना, बूड़ी मुवा संसार।।” (रमैनी-74)

पर, कबीर इस पर विचार करते हैं और जानते हैं कि यह हरि-भक्ति “राम” की भक्ति है और इस भवसागर (Ocean of Mundane Existence) से पार उतारने में राम का नाम ही एकमात्र जहाज है। राम की शरण में जाने से यह संसार-सागर गाय के खुर सदृश सहज ही पार किया जा सकता है—

“इच्छा करि भवसागरहि, बोहित राम अधार।

कहहिं कबीर हरिशरण गहु, गोपदवत विस्तार।।” (रमैनी-20)

निरंजन राम और शब्द-साधना (Niranjan Rama and Word-Sadhana)

कबीर राम से अनन्य प्रेम करते हैं और राम के वास्तविक स्वरूप को समझते हैं। वे यह भी जानते हैं कि राम अलख-निरंजन, संसार के कर्ता, पालक और संहारक (Destroyer) हैं। गीता में श्रीकृष्ण जिस प्रकार अर्जुन को अपने स्वरूप के बारे में बताते हैं, ठीक उसी प्रकार का स्वरूप कबीर के राम का है, जो उन्हें पुकार-पुकार कर कहता है—

“मैं सिरजौं, मैं मारिहूं, मैं जारौं, मैं खाऊं।

जल थल नभ में रमि रहौं, मोर निरंजन नाऊं।।” (रमैनी-21)

इस निरंजन राम को कबीर “बावन अक्षरों” में खोजकर उसके चिंतन-मनन की बात कहते हैं— बावन अक्षर सोधिके, रमे मो चित लाग।”

ठीक यही बात राम-स्नेही रामदयाल के स्वामी हरिरामदासजी भी कहते हैं। उनके अनुसार “रा” और “म” को जाने बिना तो वेदों और पुराणों का ज्ञान भी थोथा है, अर्थात् उसमें कोई सार नहीं है — एके रे-मो बिण जाण्या, थोथा वेद-पुराणी।” यह रे-मो, अर्थात् राम का नाम ब्रह्म के सगुण और निर्गुण रूप से भी ऊपर है, जो निराकार-स्वरूप (Formless Absolute), परिपूर्ण, परब्रह्म परमेश्वर और पूर्णांक है।

तुलसीदासजी ने अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा” कहकर अपनी सम्मति में ब्रह्म के नाम को बड़ा बताया है, जबकि कबीर का सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व यहाँ समाप्त होता है जहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि सगुण-निर्गुण से भी परे (ब्रह्म में) मेरा ध्यान लगा हुआ है — सगुण निर्गुण तें परे, तहां हमारा ध्यान।” ಕबीर ब्रह्मांडव्यापी भूमण्डलीय चेतना (Cosmic Consciousness) में आत्मलीन हैं। सच्चे संत का स्वभाव भी ऐसा ही होता है।

डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल संत-स्वभाव के बारे में लिखते हैं — “संत एक ऐसे लोक का संदेश लाता है, जो शाश्वत (Eternal) है, जिसमें देश और काल के अपने भेद भूलकर एक में मिलते हैं, जिसे हम प्रेम का लोक कहते हैं, प्रेम ही मानवीय हृदय की वास्तविक शक्ति है। जिस क्षण मन में प्रेम का उदय होता है, मानव के लिए सेवा और भक्ति का अपूर्व द्वार खुल जाता है।” (साहित्य संदेश, जुलाई-अगस्त, 1958)।

इस द्वार के खुलते ही आतम-राम पुकारकर कहने लगता है कि हे कबीर, मैं तेरे द्वार पर खड़ा हूँ, मुझसे मिल लो, मैं तो सर्वव्यापक हूँ और सभी में मिल रहा हूँ, अतः तुम्हें ही मुझसे मिलना होगा, मैं तुममें नहीं मिलूंगा—

“द्वारे तेरे राम जी, मिलहु कबीर मोहि।

तै तो सब में मिलि रहा, मैं न मिलूंगा तोहि।।” (साखी-258)

प्रेम की पराकाष्ठा और विविध संबंध

आतम-राम सचेत करता है कि जो विषय-वासनाओं (Sensual Desires) में मिला हुआ है, उसे मैं नहीं मिल सकता, किंतु कबीर के लिए अन्य सभी रस अन्तरस हैं, वे तो केवल राम-रस में ही तल्लीन हैं। कबीर की प्रेमभक्ति इतनी अंतरंग है कि उसकी बहिरंग छवि तो कोई भांप ही नहीं सकता। कबीर कहते हैं—

“हाड़ जले जस लाकड़ी, बार जले जस घास।

कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरे कपास।।” (साखी-274)

अर्थात् शवदाह (Cremation) के समय हड्डियाँ लकड़ी की तरह जल जाती हैं, बाल घास की तरह जल जाते हैं। भगवान के विरह (Pangs of Separation) में भक्त भी अनुदिन जलता रहता है, किंतु ठीक वैसे ही, जैसे कोठी में भीतर-ही-भीतर कपास जल जाए और बाहर किसी को पता तक नहीं चल पाए! यहाँ कबीर राम-भक्ति को पुनः आग के समान ही प्रिय बताते हुए अपने-आपको राम के प्रेम में तिल-तिल जलते रहने से उपमित करते हैं, जो कबीर के आंतरिक सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व की गहराई को दर्शाता है। कबीर की प्रेम-प्रतीति कितनी प्रगाढ़ है। वे अपने आतम-राम को शास्त्रों में नहीं, प्रेम में खोजते हैं—

“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।”

कबीर के ये ढाई आखर “राम” नाम के ढाई आखर ही हैं और वे कहते हैं कि जो कोई इन ढाई आखरों को प्रेम-पूर्वक पढ़ेगा, वही पंडित हो जाएगा।

कबीर ने अपने आतम राम को ब्रह्म स्वरूप मानते हुए उसकी तरह-तरह से वंदना, स्तुति और भक्ति की है। वे अपने राम से तरह-तरह के संबंध जोड़ते हैं। कहीं वे अपने को राम का कुत्ता बताते हैं, कहीं अपने को राम की पत्नी और कहीं राम को अपना साला, तो कहीं राम को अपना पुत्र बताते हैं—

“कबीरा कूता राम का, मुतिया मेरा नांउ।

गले प्रेम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊ।।”

“हरि मोर पिव, मैं राम की बहुरिया।

राम बड़े, मैं तन ही लहरिया।।” (शब्द-36)

“हम बहनोई, राम मोर सारा।

हमहि बाप, हरि पुत्र हमारा।।” (शब्द-100)

भक्ति के विविध भाव और निष्कर्ष

कबीर ब्रह्म के स्वरूप को आतम-राम के रूप में देखते हैं। उसे सगुण-निर्गुण स्वरूप में और इनसे परे भी देखते हैं। कबीर की भक्ति में दास्यभाव (Servant Attitude), दार्स्थभाव, माधुर्यभाव (Sweet/Spouse Attitude) और वात्सल्यभाव (Parental Attitude) भी है। वे अपने बारे में तो सोचते ही हैं, दूसरों के बारे में भी चिंतन करते हैं। उनका चिंतन कल्याणकारी है। वे चाहते हैं कि राम का भजन करने से ही कर्म-बंधन (Bondage of Karma) से छुटकारा मिल सकता है और भवसागर की कठिनाइयों से मुक्ति मिल सकती है। वे कहते हैं—

“कहहिं कबीर सुनो हो संतो, जिन यह सृष्टि बनाई।

छाड़ि पसार राम भजु बौरे, भवसागर कठिनाई।।” (शब्द-25)

रामरस का पान करने वाले भक्त को मृत्यु का भी भय नहीं होता। कबीर कहते हैं— हमन मरैं मरिहैं संसारा। हमको मिला जीवावनहारा।” जो भक्त जीवावनहारा अर्थात् राम से स्नेह करता है, उसे अमर होने से कौन रोक सकता है? कबीर शून्य में ध्यान लगाने वालों, अजपा जाप करने वालों और अनहदनाद सुनने वालों को नष्ट होते देख रहे हैं, जबकि रामसनेहियों को नहीं।

“शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद हू मरि जाय।

रामसनेही ना मरे, कह कबीर समझाय।।”

ब्रह्म के बहुविध स्वरूप का चिंतन करते हुए कबीर बौद्धमता, वेदमत और हठयोग-सरीखी साधनाओं को मृतप्रायः मानते हुए मन-मंदिर में स्थित राम की भक्ति को ही श्रेष्ठ मानते हैं और उसे ही मुक्ति का हेतु मानते हुए कहने लगते हैं—

“हम तो भगति मुक्ति में आया।

गुरु परसाद राम गुण गाया।।”

कबीर में भी भक्तिभाव का स्फुरण हुआ और वे कह उठे — कबहु बाढ़ियं बल आपणी, छोड़ि बिरानी आस। जाके आंगन नदिया बहे, सो कस मरे पियास।। (कबीर बीजक : साखी-227) अर्थात जिसके आंगन में नदिया बहती हो वह क्यों प्यासा मरे? उसे तो अपने बादल पर भरोसा करना चाहिए। कबीर ने ऐसा ही किया और भक्तिकाल के संतों-भक्तों में अपनी निराली पहचान बनाई।

निष्कर्ष

सनातन धर्म परम्परा में सगुण-भक्ति और निर्गुण भक्ति का सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व सदा से ही बना हुआ है। इस अंतर्द्वन्द्व का कारण यह प्रतीत होता है कि परमात्मा न दिखकर भी दिखने का आभास देता है। कबीर में भी यह सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व बहुतायत से दिखता है। हालांकि वे बार-बार स्वयं को निर्गुण भक्ति पर स्थिर करने का प्रयास करते हैं और इस प्रयास में वे कभी-कभी सगुण और निर्गुण दोनों को नकारने का भी असफल प्रयास करते हैं।

वस्तुतः कबीर के गुरु रामानंद सगुण भक्ति के बहुत बड़े संत थे। उन्हीं के शिष्य नरहरि ने तुलसीदास को बाल्यकाल में धर्मग्रंथों का अध्ययन करवाया और तुलसीदास सगुण भक्ति के सबसे बड़े भक्त-कवि बने। अतः कबीर के लिए यह संभव नहीं था कि वे स्वयं को इस प्रभाव से पूरी तरह मुक्त कर पाते, यही वजह है कि उनका काव्य इस सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर हमारे सामने आता है, जहाँ वे स्वयं को सगुण भक्ति से पूरी तरह अलग नहीं कर पाते और न ही निर्गुण भक्ति को सगुण भक्ति से श्रेष्ठ घोषित कर पाते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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