अकबर और टोडरमल : यदि राजा टोडरमल न होता तो अकबर का राज्य उखड़ गया होता (72)

अकबर और टोडरमल दोनों ही एक दूसरे पर पूरा विश्वास करते थे। हालांकि अकबर के हिन्दू मंत्रियों (Hindu Ministers of Akbar) और सेनापतियों में से एक भी ऐसा नहीं था जिसने कभी अकबर के विरुद्ध बगावत की हो किंतु टोडरमल एक ऐसा विलक्षण मंत्री था जिसने सेनापति न होते हुए भी सेनाओं का नेतृत्व किया और अकबर के दुश्मनों का सफाया किया।

 इस समय तक अकबर को शासन करते हुए 11 साल हो चुके थे। वह तेजी से अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था किंतु अफगान सेनापतियों, मुगल शहजादों, मिर्जाओं और उज्बेक लड़ाकों द्वारा लगातार की जा रही बगावतों के कारण राज्य-विस्तार का काम धीमी गति से चल रहा था।

इस बीच राजपूताना के अनेक हिन्दू राज्य अकबर से अधीनस्थ मित्रता स्वीकार कर चुके थे किंतु चित्तौड़ का दुर्ग अब भी गर्व से अपना सीना फुलाए हुए निर्भय खड़ा था। चित्तौड़ के प्रशस्त भाल पर उसके शासकों द्वारा विजयी इतिहास के अक्षर गहराई से टंकित किए गए थे जिनके कारण अकबर अब तक चित्तौड़ से दूर ही रहा था।

ई.1567 तक अकबर ने उज्बेकों का दमन कर दिया, मिर्जा हकीम, मिर्जा सुल्तान, खानेजमां और आसफ खाँ भी दबाए जा चुके थे। अतः अकबर चित्तौड़ की तरफ बढ़ने की तैयारी करने लगा।

अकबर के चित्तौड़ आक्रमण से पहले हमें अकबर के उन विख्यात मंत्रियों एवं सेनापतियों की चर्चा करनी होगी जो इस समय तक अकबर के दरबार में आ-आकर एकत्रित हो चुके थे। इनमें से कई राजपुरुषों का उल्लेख चित्तौड़ के घेरे में होगा।

अकबर ने अपने नौ दरबारियों को नवरत्न घोषित किया था जिनमें राजा बीरबल, मियां तानसेन, अबुल फजल, राजा मानसिंह, राजा टोडरमल, मुल्ला दो प्याजा, फकीर अजियोदीन तथा अब्दुल रहीम खानखाना सम्मिलित थे।

इनमें से राजा टोडरमल का उल्लेख उज्बेकों के दमन के समय हो चुका है।  टोडरमल का जन्म उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में स्थित सीतापुर जिले के लहार अथवा लहरपुर गांव में 1 जनवरी 1500 को हुआ था। कुछ लोगों ने उन्हें अग्रवाल, कुछ ने पंजाबी, कुछ ने टंडनखत्री तथा कुछ ने कायस्थ माना है।

बिहार प्रांत के पटना नगर के दीवान मोहल्ले में, नौजरघाट पर स्थित चित्रगुप्त का मंदिर राजा टोडरमल ने बनवाया था। इससे अनुमान होता है कि टोडरमल कायस्थ था। टोडरमल की बाल्यावस्था में ही टोडरमल के पिता की मृत्यु हो गई। उस समय तक हिन्दू फारसी नहीं पढ़ते थे, इससे उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलती थीं।

टोडरमल के परिवार में आजीविका का कोई साधन नहीं होने से टोडरमल ने फारसी भाषा का अध्ययन किया तथा अपना जीवन एक कार्यालय लिपिक के रूप में आरम्भ किया जिसे उन दिनों दफ्तर-मुंशी कहा जाता था। जब शेरशाह सूरी का उदय हुआ तब टोडरमल ने शेरशाह की नौकरी कर ली तथा उन्नति करता हुआ उच्च पदों तक जा पहुंचा।

जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ (Humayun) को भारत से बाहर कर दिया और शेरशाह के राज्य की पश्चिमी सीमा गक्खरों के प्रदेश से मिल गई, तब शेरशाह सूरी ने बिहार की तरह पंजाब में भी रोहतास नामक नवीन दुर्ग बनवाया ताकि वहाँ एक सेना रखकर गक्खरों एवं बादशाह हुमायूँ को शेरशाह के राज्य में प्रवेश करने से रोका जा सके।

जब हुमायूँ ने सूर सल्तनत का अंत कर दिया तथा दुबारा से मुगलिया सल्तनत स्थापित हुई, तब हुमायूँ ने टोडरमल को शाही सेवा में पूर्ववत् रहने दिया। इस प्रकार अकबर और टोडरमल (Akabr and Todarmal) पहली बार एक दूसरे के निकट आए।

 जब अकबर बादशाह हुआ तब उसने अनुभव किया कि वह अपनी सल्तनत का प्रशासनिक कार्य अफगान अमीरों, उज्बेकों एवं मुगल शहजादों के भरोसे नहीं छोड़ सकता क्योंकि वे अवसर मिलते ही बगावत करते हैं।

इसलिए अकबर (Shahanshah Akbar) ने अपनी सेना में हिन्दू राजाओं एवं राजकुमारों को नियुक्त किया तथा प्रशासन में ऐसे प्रतिष्ठिति हिन्दुओं को नियुक्त किया जो राजा तो नहीं थे किंतु उनकी प्रशासनिक क्षमताएं निश्चित रूप से श्रेष्ठ थीं। अकबर ने ऐसे हिन्दुओं को राजा एवं मियां की उपाधियां देकर उनकी हैसियत अन्य अमीरों के बराबर अथवा उनसे भी ऊंची कर दी। टोडरमल (Todarmal) भी उन्हीं में से एक था।

इतिहास की पुस्तकों में टोडरमल का सर्वप्रथम उल्लेख ई.1565 में मिलता है जब उसने अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानेजमां का विद्रोह दबाने में विशेष प्रतिभा का प्रदर्शन किया था।

यह वही अली कुली खाँ था जिसने हेमू का तोपखाना छीनकर पानीपत की लड़ाई का फैसला युद्ध आरम्भ होने से पहले ही कर दिया था। यदि अली कुली खाँ शैबानी अर्थात् खानजमां को दबाने में अकबर को टोडरमल की सेवाएं नहीं मिली होतीं तो अकबर का राज्य उसी समय उखड़ गया होता!

अकबर और टोडरमल के वास्तविक सम्बन्ध यहीं से आरम्भ हुए। अकबर को टोडरमल के काम करने का तरीका इतना पसंद आया कि अकबर ने उसे आगरा का प्रभारी बना दिया। अकबर ने राजा टोडरमल को बंगाल की टकसाल का प्रबंधन करने का भी जिम्मा दे दिया। अकबर ने टोडरमल को दीवान ए मुशरिफ अर्थात् वित्तमंत्री बनाया तथा उसे वकील-उस्-सल्तनत अर्थात् बादशाह का सलाहकार भी नियुक्त किया। मुगल सल्तनत के 15 सूबों में नियुक्त दीवान राजा टोडरमल के अधीन काम किया करते थे। अकबर ने टोडरमल को 4000 का मनसब प्रदान किया।

यह एक उच्च मनसब था जो अकबर द्वारा बहुत कम सेनापतियों, अमीरों एवं राजाओं को दिया गया था। बाद में उसे गुजरात का सूबेदार बनाया गया। मुश्किल समय में अकबर ने टोडरमल को पंजाब में कई मोर्चों पर भेजा। अंत में अकबर ने टोडरमल को अपने दरबार के नवरत्नों में सम्मिलित कर लिया।

टोडरमल अकबर के हिन्दू दरबारियों में पहला था जिसने धोती-कुर्ता छोड़कर मुगलों की तरह बरजू-चोगा और मोजे पहनने आरम्भ किए। टोडरमल ठाकुरजी को भोग लगाए बिना भोजन नहीं करता था।

एक बार किसी यात्रा में किसी व्यक्ति ने टोडरमल के ठाकुरजी की प्रतिमा चुरा ली। इस पर टोडरमल ने अन्न-जल का त्याग कर दिया।

जब अकबर को यह बात ज्ञात हुई तो उसने टोडरमल से कहा कि प्रतिमा चोरी गई है, ठाकुरजी अब भी सब स्थान पर हैं। इस तरह आत्मघात करना उचित नहीं है। इस पर टोडरमल ने अन्न-जल ग्रहण करना आरम्भ कर दिया।

ई.1567 में महाराणा उदयसिंह के विरुद्ध हुए चित्तौड़ दुर्ग के घेरे में राजा टोडरमल की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण थी कि जहाँ लाखेटाबारी का मोर्चा स्वयं अकबर संभाल रहा था, वहीं सूरजपोल की तरफ का मोर्चा राजा टोडरमल संभाल रहा था।

आगे चलकर महाराणा प्रताप से हुए हल्दीघाटी युद्ध से पहले ई.1576 में महाराणा प्रताप से मिलने के लिए अकबर ने जिन दो प्रतिनिधियों को गोगूंदा भेजा था उनमें राजा मानसिंह तथा राजा टोडरमल ही सम्मिलित किए गए थे।

टोडरमल ने अकबर के राजस्व प्रबंधन को चुस्त एवं दुरुस्त बनाया। राजा टोडरमल द्वारा चलाई गई कुछ परम्पराएं तो आज भी भारत के राजस्व प्रशासन में प्रचलित हैं। टोडरमल ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के लहरपुर में अपने लिये एक दुर्ग-महल का निर्माण करवाया।

टोडरमल ने भागवत पुराण का फारसी में अनुवाद किया। ई.1585 में राजा मानसिंह ने काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया किंतु हिंदुओं ने उसके बनाए मंदिर को स्वीकार नहीं किया तब राजा टोडरमल ने अपने धन से काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया। कुछ लोगों का मानना है कि टोडरमल ने अकबर से धन लेकर काशी विश्वनाथ का मंदिर बनवाया। 

इस प्रकार अकबर और टोडरमल के सम्बन्ध स्थाई बने रहे और अकबर ने उस पर विश्वास करके अपनी सल्तनत में बड़े-बड़े अधिकार एवं दायित्व सौंप दिए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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