षड़यंत्र (116)

– ‘क्या बात है लाल मुहम्मद?’

– ‘हुजूर कहते हुए जुबान कटती है। जान बख्शी जाये तो कुछ हिम्मत करूं।’

– ‘बिना किसी डर के अपनी बात कहो, लाल मुहम्मद। तुम हमारे भरोसेमंद हो।’

शहजादे खुर्रम से आश्वासन पाकर लाल मुहम्मद ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और खुर्रम की ओर बढ़ा दी।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने चिट्ठी एक साँस में पढ़ डाली।

– ‘हुजूर! खानखाना का मुखबिर यह चिट्ठी लेकर शहजादे परवेज के पास जाता था। किसी तरह मेरे हाथ पड़ गया।’

– ‘वह मुखबिर कहाँ है?’

– ‘वह मेरे डेरे में कैद है।’

– ‘उसे मेरे सामने हाजिर किया जाये।’

थोड़ी ही देर बाद लाल मुहम्मद, खानखाना के मुखबिर को लेकर खुर्रम के डेरे में हाजिर हुआ।

– ‘क्या तुझे इस चिट्ठी के साथ पकड़ा गया है?’

मुखबिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

– ‘सच कह नहीं तो जीभ खींच लूंगा।’

मुखबिर ने इस पर भी जुबान नहीं खोली तो खुर्रम ने तलवार उठाई। यह देखकर मुखबिर खुर्रम के पैरों में गिर पड़ा- ‘मेरी जान बख्शी जाये हुजूर।’

– ‘क्यों बख्शी जाये तेरी जान?’

– ‘मैं तो गुलाम हूँ। कुसूरवार तो कोई और है।’

– ‘तो कुसूरवार का नाम बता।’

– ‘चिट्ठी लिखने वाले का नाम चिट्ठी के नीचे दर्ज है।’

– ‘मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ।’

– ‘जिसका नाम चिट्ठीके नीचे लिखा है, उसी ने मुझे यह चिट्ठी दी थी।’

– ‘खानखाना ने?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘सच कहता है?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘किसके पास ले जा रहा था?’

– ‘महावतखाँ के पास।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस नामुराद को कैद में रख और खानखाना को मेरे सामने हाजिर कर।’

थोड़ी ही देर में खानखाना शहजादे के डेरे में था।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने खानखाना की ओर चिट्ठी बढ़ाई।

खानखाना खुर्रम के हाथ से खत लेकर उत्सुकता से पढ़ने लगा।

– ‘हुजूर जरा जोर से पढ़िये ताकि मैं भी सुन सकूं।’ खुर्रम ने व्यंग्य से कहा।

– ‘जो सौ आदमी नजरों में मेरी देखभाल नहीं रखते होते तो बेचैनी से कभी का उड़कर वहाँ पहुँच जाता।’ खानखाना ने पढ़ा।

– ‘यह क्या है शहजादे?’ खानखाना ने खुर्रम से पूछा।

– ‘यही तो हम जानना चाहते हैं हुजूर कि यह क्या है?’ शहजादे के शब्द तल्खी और व्यंग्य से पूरी तरह लबरेज थे।

– ‘जब तक यह पता न लगे कि यह चिट्ठी किसने और किसे लिखी है, तब तक इसके बारे में कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।’

– ‘अब ज्यादा होशियारी मत दिखाइये खानखाना। यह चिट्ठी आपने लिखी है और दुष्ट महावतखाँ को लिखी है। यह भी जान लीजिये कि आपका जो मुखबिर यह चिट्ठी लेकर महावतखाँ को देने जा रहा था, उसी ने हमें यह सब बताया है।’ अपनी बात पूरी करते-करते खुर्रम की आँखों में खून उतर आया।

– ‘यह सरासर गलत है। मेरे विरुद्ध कोई साजिश हुई है।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस बूढ़े शैतान को हथकड़ी-बेड़ी लगा दे और तब तक मत छोड़ जब तक मैं खुद तुझे ऐसा करने का हुक्म न दूँ।’

खुर्रम का ऐसा आदेश सुनकर खानखाना ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा-

‘रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।

फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।’[1]

खर्रुम ने एक न सुनी। उसके आदेश से खानखाना के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गयीं तथा उसे उसी के डेरे में कैद कर दिया गया। थोड़ी ही देर बाद दाराबखाँ को भी हथकड़ियों बेड़ियों सहित खानखाना के डेरे में लाकर बंद किया गया। अपने बूढ़े बाप को इस हालत में देखकर दाराबखाँ फूट-फूट कर रोने लगा। दाराबखाँ ही एकमात्र बेटा था जो अब तक खानखाना का साथ निभा रहा था। खानखाना ने उसे दिलासा देते हुए कहा-

‘रहिमन चुप ह्नै बैठिये देखि दिनन को फेर।

जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर।’

-अध्याय 116, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  सीधे-सीधे चलने वाला प्यादा भी वजीर बन जाता है किंतु टेढ़ी चाल चलने वाला वजीर कभी भी बादशाह नहीं बन सकता। क्योंकि टेढ़ी चाल की तासीर ही ऐसी है।

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