हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा धरती पर घटित उन विलक्षण घटनाओं में से है जो मानवता के इतिहास में बहुत कम बार हुई हैं। यह एक ऐसी अनोखी यात्रा है जिसमें मानव की आंखों से सदैव अदृश्य रहने वाले परमात्मा को आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से लेकर नदियों, पहाड़ों, वनस्पतियों, पशुओं, पत्थर के टुकड़ों और कण-कण तक में खोज लिया।
आज लगभग सम्पूर्ण धरती पर हिन्दू धर्म फल-फूल रहा है। ई.1893 में स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो की धर्म-संसद में दिए गए व्याख्यान के बाद, संसार भर के देशों में कहीं पर मंद तो कहीं पर तीव्र गति से हिन्दू धर्म फैल गया है। विश्व के किसी भी देश में चले जाएं, हिन्दू मंदिर, हिन्दू कीर्तन, हिन्दू आश्रम, हिन्दू मठ तथा हिन्दू दर्शन को मानने वाले लोगों के दर्शन किसी न किसी रूप में हो ही जाते हैं।
यह अलग बात है कि हिन्दू धर्म के इतने विस्तृत वितान के उपरांत भी, केवल भारत को ही हिन्दुओं का देश कहा जा सकता है। जबकि आज की दुनिया में हिन्दू धर्म सर्वत्र प्रसारित हो चुका है जिसके चलते यह कहा जा सकता है कि आज का भारत हिन्दू धर्म की राजधानी मात्र रह गया है। आने वाली एक शताब्दी में यदि आधी से अधिक दुनिया हिन्दू धर्म, हिन्दू जीवन शैली तथा हिन्दू आचार-विचार को अपना ले तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस आलेख में हम हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा पर संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं।
हिन्दू धर्म की जड़ें ऋग्वेद नामक महान् ग्रंथ की दार्शनिक भावभूमि पर प्रस्फुटित हुईं। ऋग्वेद का प्राकट्य आज से लगभग 10 हजार साल पहले से लेकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक के कालखण्ड में हुआ माना जाता है। इस ग्रंथ को किसी एक मनुष्य ने नहीं लिखा। इसलिए ऋग्वेद कोई ग्रंथ-मात्र नहीं है, अपितु यह कई हजार सालों के कालखण्ड में हजारों ऋषियों द्वारा तय की गई एक विलक्षण दार्शनिक यात्रा है।
दस हजार साल बीत जोने पर भी ऋग्वेद की दार्शनिक यात्रा आज भी निरंतर जारी है, जो विभिन्न रूपों में ढलती, बदलती और आकार लेती हुई, हिन्दू धर्म के रूप में हमारे सामने है। निश्चित रूप से यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी। इस कारण ऋग्वेद की दार्शनिक भावभूमि आगे चलकर किन रूपों में प्रकट होगी, इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
वैदिक धर्म
ऋग्वैदिक काल के धर्म को वैदिक धर्म कहा जाता है। वैदिक धर्म प्रकृति तथा उसकी शक्तियों पर विस्मय करने और उन्हें नमन करने से आरम्भ हुआ और उत्तरोत्तर विकास करता हुआ प्रकृति एवं उसकी शक्तियों को बनाने वाले अदृश्य ईश्वर की स्तुतियों तक जा पहुंचा। वैदिक धर्म उस रहस्यमयी चेतना के बारे में कई तरह की उत्सुकताएं प्रस्तुत करता है जिसे वैदिक ऋषियों ने ब्रह्म, हिरण्यगर्भ, आत्मा, पुरुष और ईश्वर आदि नामों से अभिहित किया।
वैदिक ऋषियों का हिरण्यगर्भ, अपनी ही शक्ति से ब्रह्माण्ड की रचना करता है, उसमें चर एवं अचर अस्तित्वों का सृजन करता है, दिशाओं और काल का निर्माण करता है, ऋतुओं को बनाता है, जीवन एवं मृत्यु का नियंता है तथा सृष्टि को प्रकट करने से लेकर प्रलय करने तक का एकमात्र अधिकारी है। प्रलय के बाद वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को फिर से अपने भीतर समेट लेता है।
वैदिक धर्म में कर्मकाण्ड का प्रवेश
ऋग्वेद के युग से आगे बढ़ते ही भारत भूमि पर कर्मकाण्ड का विचार प्रकट हुआ। इसका आरम्भ, जगत्-नियंता ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कुछ अर्पण करने के भाव से हुआ। वैदिक ऋषि देवताओं को मंत्रों के साथ-साथ हविष्य आदि भी अर्पित करने लगे। घर में बनने वाले भोजन का कुछ अंश देवताओं के निमित्त किसी ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता था या अग्नि में अर्पित कर दिया जाता था। इस अर्पण के पीछे भाव यह था कि देवता, हमारे द्वारा अर्पित भोजन को ग्रहण करें ताकि वैश्वानर की जठराग्नि शांत हो। ‘वैश्वानर की जठराग्नि’ उस शाश्वत क्षुधा को कहते हैं जो प्रत्येक प्राणी के पेट में हर समय प्रज्जवलित रहती है।
जब ऋषियों द्वारा भोजन का अंश, घृत, सुगंधित द्रव्य, दिव्य औषधियां और अभिमंत्रित पदार्थ अग्नि में अर्पित किए जाते थे, तो कुछ मंत्र भी बोले जाते थे जिनके माध्यम से देवताओं को बताया जाता था कि यह सामग्री किस देवता के निमित्त अर्पित की गई है। अंत में ‘स्वाहा’ कहकर उसे अग्नि में छोड़ दिया जाता था। अग्नि को देवताओं का मुख माना गया जो देवताओं के लिए भोजन ग्रहण करता है। समय के साथ भोजन-अर्पण की यह परम्परा बड़े यज्ञ-आयोजनों एवं कर्मकाण्डों में बदलने लगी।
यद्यपि कर्मकाण्ड, ऋग्वैदिक परम्परा में बहुत बड़ा मोड़ था तथापि यजुर्वेद के माध्यम से ना-ना प्रकार के कर्मकाण्ड को ज्यों का त्यों वैदिक धर्म के अंतर्गत सहेज लिया गया जिन्हें ‘यज्ञ’ कहा गया। वैदिक परम्परा की आगे की यात्रा, इसी कर्मकाण्ड का विस्तार मात्र रही।
वैदिक धर्म के अंतर्गत ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद प्रकट हुए; ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद प्रकट हुए। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य तथा मध्वाचार्य आदि आचार्यों ने इन ग्रंथों की व्याख्याएं कीं। उपनिषदों का ज्ञान ही अपेक्षाकृत सरलीकृत रूप में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुआ जिसे हम भगवत्गीता के नाम से जानते हैं। बादरायण ने वैदिक ग्रंथों की विवेचना करके ब्रह्म, जीव और जगत् के सम्बन्ध में यत्र-तत्र बिखरे हुए विचारों को एक स्थान पर संयोजित कर दिया जिसे हम ब्रह्मसूत्र के नाम से जानते हैं।
इन सबके चलते वैदिक वांगमय का अत्यंत विस्तार हो गया और कुछ सौ सालों में ही वैदिक धर्म अपना स्वरूप बदलने के लिए तैयार हो गया।
वैदिक धर्म में लोक-परम्पराओं का समन्वय
भारत में आदि काल से ही, वैदिक परम्परा के साथ-साथ, अथवा उसके समानांतर भी कुछ पूजा-पद्धतियां जनमानस में विकसित होती रहीं। दक्षिण भारत के यमुनाचार्य, आलवार संत तथा रामानुजाचार्य आदि बड़े चिंतक, लोक में प्रचलित पूजा-पद्धतियों को अत्यधिक महत्व देते थे। उन पूजा-पद्धतियों ने बड़ी तेजी से स्वयं को भक्ति-परम्पराओं में ढाल लिया। लौकिक परम्पराओं ने वैदिक धर्म को भक्ति रूपी अमृत-धाराओं से सिंचित् करने का कार्य किया।
जिस उच्च दार्शनिक परम्परा के ऋषियों ने वैदिक ऋचाओं को प्रकट किया, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों की रचना की, उसी उच्च दार्शनिक परम्परा के ऋषियों ने आगे चलकर लोक में प्रवाहित हो रही भक्ति-धाराओं को भी आत्मसात करने में संकोच नहीं किया। इस कारण वैदिक देवताओं का स्वरूप तेजी से बदलने लगा। उनमें लोक-तत्व सम्मिलित होने लगे। वैदिक ऋचाओं एवं लोक परम्पराओं के मिश्रण ने वासुदेव धर्म का प्रणयन किया।
वैदिक धर्म में शिव तत्व का समावेश
जहाँ उत्तर भारत में वैदिक देवता विष्णु का अत्यधिक महत्व था, वहीं दक्षिण भारत की लोक-परम्पराओं में शिव-पूजन का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। इस लोकप्रियता के कारण ही कालांतर में वैदिक ब्राह्मण भी शिव को पूजने लगे। पहले दक्षिण के ब्राह्मणों ने और बाद में उत्तर के ब्राह्मणों ने विष्णु के साथ-साथ शिव को भी अत्यंत भक्तिभाव से अंगीकार किया। उन्होंने वेदों के देवता रुद्र को, जो अग्नि का एक रूप है, शिव के रूप में स्वीकार कर लिया।
जब दक्षिण के शिव, रुद्र बनकर वैदिक धर्मावलंबियों के बीच आए तो बड़ी धूमधाम से आए। चूंकि वैदिक लोग अग्नि की पूजा करते थे, इसलिए शिव के सामने निरंतर प्रज्जवलित रहने वाला एक धूना स्थापित कर दिया गया। लोक परम्परा में शिव का वाहन नांदिया अथवा नंदी था जिसकी पूजा सिंधु घाटी सभ्यता में होती थी, वही बैल सनातन ग्रंथों में धर्म का स्वरूप बन गया। अर्थात् शिव को धर्म रूपी बैल पर सवारी करने वाला माना गया। लोक में प्रचलित नाग-पूजा के सर्प वासुकी और तक्षक के नाम से शिव के गले में आ बैठे।
लोकधर्म में नदियों की उपासना होती थी, गंगा को देवनदी, देवापगा एवं सुरसरी माना जाता था, उन्हें शिवजी के सिर पर विराजित कर दिया गया। लोक में चंद्रमा की उपासना प्रचलित थी, शुक्ल पक्ष की द्वितीया के चंद्रमा को शिव के सिर पर अंकित कर दिया गया। भूत-प्रेत, नंदी-भृंगी जैसी लौकिक मान्यताओं को सनातन धर्म में शिव के गण बना दिया गया।
शिव-परिवार में भी अद्भुत समन्यवन किया गया। शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के वाहनों- बैल, सिंह, मूषक, मोर आदि को एक ही चित्र में स्थान दे दिया गया। इस समन्वय में सारे अस्तित्व परस्पर विरोधी हैं। इस रूपक के माध्यम से मानव-मात्र को संदेश दिया गया कि परस्पर विरोधी मत, एक दूसरे के पूरक के रूप में, एक ही धर्म के भीतर रह सकते हैं। बहुत लंबे समय से भारत में भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा होती है।
वासुदेव-नारायणीय धर्म का प्राकट्य
वासुदेव धर्म को नारायणीय धर्म भी कहा जाता है। इस धर्म का अवतरण, वैदिक चिंतन की दार्शनिक भावभूमि पर हुआ। मान्यता है कि इस धर्म का प्रारंभ ईसा के जन्म से 1400 वर्ष पूर्व अर्थात् आज से लगभग 3400-3500 वर्ष पूर्व हुआ। जब वैदिक ज्ञान तथा कर्मकाण्ड के साथ-साथ मनुष्य में ईश्वर की भक्ति करने का विचार प्रकट हुआ, उसी समय से वासुदेव धर्म प्रकट होने लगा। इस धर्म में भगवान वासुदेव अर्थात् विष्णु की पूजा होती थी जिन्हें नारायण भी कहा जाता था। इन्हीं नामों के आधार पर इस धर्म को वासुदेव धर्म एवं नारायणीय धर्म कहा जाने लगा। वासुदेव धर्म का आरम्भ उत्तर भारत में हुआ। आगे चलकर शैव मत की तरह वासुदेव धर्म में भी लौकिक परम्पराओं का समावेश होने लगा जिसके कारण वासुदेव धर्म में अनेक प्रकार के दार्शनिक तत्वों का समन्वय होता चला गया।
सात्वत धर्म का उदय
यादवों में सत्वत नामक बड़ा राजा हुआ। उसके वंशज सात्वत कहलाते थे। इस शाखा के यादव बहुत प्रभावशाली थे। सात्वत लोग मूलतः वासुदवे-नारायणीय धर्म का पालन करते थे। आगे चलकर सात्वत कई शाखाओं में बंट गए जिनमें से एक शाखा वृष्णि और दूसरी शाखा अंधक कहलाती थी। अंधक शाखा में श्रीकृष्ण के नाना उग्रसेन और मामा कंस हुए। जबकि वृष्णि शाखा में श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव और स्वयं श्रीकृष्ण हुए। इन वृष्णि वंशियों ने ही आगे चलकर सात्वत धर्म में श्रीकृष्ण की पूजा करनी आरम्भ की।
श्रीकृष्ण भक्ति, वासुदेव धर्म में उत्पन्न एक अद्भुत अवधारणा थी जो अचानक या अनायास उत्पन्न नहीं हुई थी, अपितु इसका एक लम्बा इतिहास रहा। वासुदेव धर्म का इतिहास इस बात के कई प्रमाण देता है कि वासुदेव धर्म श्रीकृष्ण के अवतरण से पहले भी अस्तित्व में था, उसमें श्रीकृष्णभक्ति की अवधारणा बहुत बाद में सम्मिलित हुई।
आज से लगभग 5300 साल पहले, महाभारत युद्ध के पश्चात्, बहुत सारे यदुवंशी द्वारका के निकट प्रभासपट्टन में मदिरा पान करके, परस्पर लड़ते हुए मारे गए। इस घटना के बाद श्रीकृष्ण और उनके अग्रज बलराम ने भी अपनी लीलाओं पर विराम लगाते हुए, पृथ्वीलोक त्याग दिया। इसके बाद अर्जुन द्वारिका के यदुवंशियों को अपने साथ हस्तिनापुर ले आये। राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को मथुरा का राजा बनाया।
माना जाता है कि मथुरा से श्रीकृष्ण उपासना का आरम्भ हुआ। राजा वज्रनाभ ने अपने पितामह श्रीकृष्ण की उपासना को विस्तार दिया। वज्रनाभ के राजनीतिक वर्चस्व के कारण श्रीकृष्ण की उपासना विस्तार पा गई। उसके बाद यदुवंशियों का भारत के बड़े भूभाग में विस्तार हो गया।
वासुदेव धर्म अथवा नारायणीय धर्म में भगवान वासुदेव की पूजा हुआ करती थी जिन्हें नारायण भी कहा जाता था। इस कारण जब वासुदेव धर्म में श्रीकृष्ण की भक्ति आरम्भ हुई तो वसुदेव के पुत्र होने के कारण श्रीकृष्ण बड़ी सरलता से वासुदेव के रूप में स्वीकार कर लिए गए। वासुदेव धर्म में भगवान विष्णु के जितने भी नाम प्रचलित थे, यथा- वासुदेव, नारायण, दामोदर, केशव आदि, सभी श्रीकृष्ण के पर्याय मान लिए गए।
चार हाथों की अवधारणा
नारायण धर्म में विष्णु के चार हाथों की अवधारणा थी। यह अवधारणा पुराणों ने दी। पुराणों में वर्णित राजा पौंड्रक स्वयं को वासुदेव कहता था और वह अपने दो प्राकृत हाथों के साथ, दो कृत्रिम हाथ भी लगाता था। उसने घोषणा की कि श्रीकृष्ण, वासुदेव नहीं है, वासुदेव मैं हूँ, देखो मेरे चार हाथ हैं। बाद के पुराणों में श्रीकृष्ण और विष्णु के भी चार हाथ हो गए। ये चार हाथ वासुदेव के हैं और वे वासुदेव श्रीकृष्ण में अंतर्भुक्त होने लगे, जो वसुदेव के पुत्र होने से भी वासुदेव के नाम से स्वीकार लिए गए। पौराणिक श्रीकृष्ण का पौंड्रक से संघर्ष हुआ, जिसमें पौंड्रक मारा गया अर्थात वासुदेव तो एक ही रहेगा। इस आख्यान ने देवकीनंदन श्रीकृष्ण को वासुदेव अर्थात् नारायण के रूप में प्रतिष्ठित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पंचरात्र धर्म
पंचरात्र धर्म प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण वैष्णव आगम सम्प्रदाय है। आज भी दक्षिण भारत और देश के अधिकांश विष्णु मंदिरों, यथा- तिरुपति बालाजी और श्रीरंगम में इसी पंचरात्र आगम की विधियों के अनुसार पूजा होती है।
पंचरात्र धर्म का सबसे पहला उल्लेख वैदिक ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। यह ग्रंथ ईस्वी पूर्व 1000 से लेकर ई.पू.700 के बीच लिखा गया। इस ग्रंथ में पुरुष (विष्णु) द्वारा पांच दिन तक चलने वाले पंचरात्र सत्र (महायज्ञ) किए जाने का वर्णन है। अर्थात् आज से लगभग 3000 साल पहले पंचरात्र धर्म अस्तित्व में था।
पंचरात्र धर्म में वेदों के जटिल यज्ञ-कर्मकांड के स्थान पर भगवान की भक्ति, मूर्तिपूजा, दान-दक्षिणा और मंदिर-निर्माण पर बल दिया जाता है। महाभारत के शांति पर्व के अंतर्गत नारायणीय आख्यान में पंचरात्र धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। गुप्त काल अर्थात् ईसा की चौथी-पांचवीं शताब्दी तक, यह धर्म पूरे भारत में एक प्रमुख धर्म बन चुका था।
पंचरात्र नाम की कई व्याख्याएं हैं। एक व्याख्या के अनुसार पांच रात्रियों में होने वाली पूजा के कारण इसे पंचरात्र कहा गया। एक अन्य व्याख्या के अनुसार रात्र का एक अर्थ ज्ञान भी है। माना जाता है कि भगवान नारायण ने पांच रातों में ऋषियों को पांच प्रमुख विषयों- परम तत्त्व, मुक्ति, भक्ति, योग और संसार का ज्ञान दिया था।
पंचकाल पूजा में भक्त के दैनिक जीवन को उपासना के पांच भागों में बांटा गया है। अभिगमन (मंदिर जाना), उपादान (पूजा सामग्री जुटाना), इज्या (मूल पूजा), स्वाध्याय (ग्रंथ पठन) और योग (ध्यान)।
पंचरात्र धर्म में परम सत्ता भगवान नारायण (वासुदेव या विष्णु) की पूजा होती थी। इस धर्म की सबसे बड़ी और मौलिक दार्शनिक विशेषता इसका चतुर्व्यूह सिद्धांत है। इसमें परमेश्वर वासुदेव के चार स्वरूपों (व्यूहों) की उपासना की जाती थी, जिन्हें मानवीय चेतना के अंगों का प्रतीक भी माना गया। ये चार व्यूह इस प्रकार थे-
वासुदेव (श्रीकृष्ण): सर्वाेपरि सत्ता और चित्त (विशुद्ध चेतना) के प्रतीक।
संकर्षण (बलराम): वासुदेव से प्रकट हुए, जो जीव या अहंकार के प्रतीक हैं।
प्रद्युम्न (कृष्ण के पुत्र): संकर्षण से उत्पन्न, जो मन के प्रतीक हैं।
अनिरुद्ध (कृष्ण के पौत्र): प्रद्युम्न से प्रकट हुए, जो बुद्धि के प्रतीक हैं।
आरम्भ में इन चारों वृष्णि-वीरों (चतुर्व्यूह) की स्वतंत्र पूजा होती थी, जो बाद में नारायण या विष्णु के दशावतार सिद्धांत में विलीन हो गई।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के पास स्थित घोसुंडी (नगरी) से प्राप्त शिलालेख में भी संकर्षण-वासुदेव के पूजा-गृह का उल्लेख मिलता है।
भागवत धर्म
भागवत धर्म छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व अर्थात् आज से लगभग 2600 साल पहले आरम्भ हुआ। वासुदेव धर्म, नारायणीय धर्म, सात्वत धर्म, एकांतिक धर्म तथा भागवत धर्म में कोई विशेष अंतर नहीं था। ये सभी धर्म वैष्णव धर्म के प्रारंभिक रूप थे। ये धर्म प्राचीन भारत के वे आस्तिक सम्प्रदाय हैं, जिनमें परमेश्वर (भगवान) के प्रति अनन्य प्रेम, निष्काम भक्ति और शरणागति को मोक्ष का मुख्य साधन माना गया।
ये सभी सम्प्रदाय वैदिक कर्मकांडों की जटिल बलि-प्रथा और कठोर योग-तपस्या के विकल्प के रूप में अत्यंत सुलभ और नैतिक भक्ति-मार्ग के रूप में विकसित हुए। इनका आरम्भ उत्तर-वैदिक काल के अंत में, उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ।
पांचवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में, अर्थात् आज से लगभग ढाई हजार साल पहले लिखी गई पाणिनि की अष्टाध्यायी के सूत्र- ‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ (4.3.98) से प्रमाणित होता है कि इस काल में वासुदेव कृष्ण को केवल ऐतिहासिक महापुरुष नहीं, अपितु पूजनीय भगवान माना जाता था।
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का समय सूत्रकाल कहलाता है। इस काल में तक्षशिला की तरफ भागवत धर्म का प्रबल प्रचार उदय हो रहा था। उस कालखण्ड में श्रीकृष्ण उपासना की जो परंपरा थी, उसे भागवत धर्म का बहुत बड़ा पड़ाव माना जा सकता है।
मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित हेलियोडोरस का गरुड़ स्तंभ (लगभग 113 ईसा पूर्व) इसका सबसे ठोस पुरातात्विक प्रमाण है। इसमें यवन (ग्रीक) राजदूत हेलियोडोरस ने स्वयं को ‘परम भागवत’ कहा है। उसने देवाधिदेव वासुदेव के सम्मान में गरुड़ ध्वज स्थापित किया।
शुंगकाल में भागवत धर्म
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा में शुंग काल का बड़ा पड़ाव है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी को शुंग काल कहा जाता है। इस काल में भागवत धर्म ने बड़ी अंगड़ाई ली, क्योंकि मौर्य काल तक तो जनमानस पर बौद्ध धर्म ही छाया हुआ था।
शुंग ब्राह्मण थे, ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र ने मौर्य राजा को मारा। उनके बाद कण्व वंश का शासन हुआ। ये भी ब्राह्मण थे। इनके काल में भी ब्राह्मण धर्म का उत्कर्ष हुआ। यही ब्राह्मण धर्म आगे चलकर सनातन धर्म कहलाने लगा।
सदियों से जो यज्ञ बंद हो गए थे, शुंगों के शासनकाल में वे फिर से प्रारंभ हुए। सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने प्रथम अश्वमेध यज्ञ किया। इस काल में वेदों का संकलन हुआ, पुराणों का संकलन हुआ।
शुंग काल से भागवत धर्म के सम्बन्ध में पुरातात्विक साक्ष्य प्रारंभ होने लगते हैं। मथुरा चूंकि शूरसेन प्रांत है, कृष्ण शूरसेनी हैं, यदु वंश में शौरसेनी हैं। मथुरा शौरसेन साम्राज्य का केंद्र था। इसलिए वहाँ से भागवत धर्म के साक्ष्य मिलने की आशा में उत्खनन किया गया। वहाँ से मूर्तियों के साथ एक प्राचीन शिलालेख भी मिला।
मथुरा के गायत्री टीले से एक बड़ा शिल्प मिला है जिसमें एक आदमी अपने सिर पर रखी टोकरी में एक शिशु को लिए जा रहा है। यह वसुदेव और कृष्ण का मथुरा से प्राप्त सबसे प्राचीन अंकन है। इसे प्रथम शताब्दी ईस्वी का माना जाता है किंतु राजस्थान में इससे भी पुराना शिलालेख मिला है जिसमें श्रीकृष्ण उपासना का उल्लेख है। मथुरा या ब्रजमंडल के पुरातत्व साक्ष्यों में इतना पुराना कोई उल्लेख नहीं मिलता।
राजस्थान में चित्तौड़गढ़ से 16 किलोमीटर दूर स्थित घोसुंडी (नगरी, माध्यमिका) से डॉक्टर भंडारकर को दो शिलालेख प्राप्त हुए। उनमें लिखा है कि सर्वतात ने यहाँ पर संकर्षण और वासुदेव की प्रतीक शिलाएं पूजा हेतु स्थापित की और उनके लिए नारायण वाटक नाम से यह स्थान बनाया। वाटक का मतलब बाड़ा अर्थात् पत्थरों से निर्मित आयताकार घेरा।
प्राचीन काल में मंदिर नहीं बनते थे, खाली घेरा बना देते, बीच में चबूतरा बना देते, उस पर देवता के प्रतीक रूप पत्थर रख देते और उसकी पूजा की जाती थी। ईसा से दो शताब्दी पूर्व का यह नारायण वाटक है। यह प्राचीन नारायणीय धर्म की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जिसके प्रभाव से इस पूजा-स्थल को नारायण वाटक कहा गया है। उक्त दोनों शिलालेख उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
भगवत्-गीता का महाभारत में समावेश
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा में शुंगकाल का बड़ा पड़ाव है। गुप्त शासकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसे युगांतरकारी योगदान कहा जा सकता है। इस काल में हिन्दू धर्म का बाह्य स्वरूप बड़ी चमक-धमक के साथ समाज में प्रतिष्ठित हुआ। गुप्त शासकों ने बड़ी संख्या में विष्णु मंदिर बनवाए तथा देव-प्रतिमाओं का निर्माण करवाया। गुप्त शासक विष्णू पूजक थे, उनके काल में मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प ने बड़ी अंगड़ाई ली। शेषशायी विष्णु तथा मेदिनी उद्धारक वराह इस काल में विशेष रूप से प्रतिष्ठित हुए। यज्ञों के भव्य आयोजन होने लगे, ब्राह्मणों की पूजा फिर से होने लगी। हिन्दू ग्रंथों विशेषकर पुराणों का लेखन इसी काल में हुआ।
महाभारत में वासुदेव की उपासना, नारायण की उपासना है किंतु उसमें कृष्ण-पूजा का उल्लेख नहीं है। वर्तमान समय में महाभारत के भीष्म पर्व में भगवत गीता उपलब्ध है। माना जाता है कि पांचवीं शताब्दी ईस्वी में अर्थात् गुप्तों के शासन काल में, जिस समय भागवत धर्म का स्वरूप अपने चरम को प्राप्त कर रहा था, किसी ने गीता को महाभारत में जोड़ दिया। पांचवीं शताब्दी ईस्वी में भारत आए बौद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने इस बात का उल्लेख अपने यात्रा संस्मरणों में किया है।
महाभारत के केवल इसी भाग में श्रीकृष्ण को पहली बार ब्रह्म के रूप में दिखाया गया है। गीता के श्रीकृष्ण स्वयं ब्रह्म हैं अर्थात् वे अवतारी हैं, अवतार नहीं। भागवत परंपरा में, श्रीकृष्ण उपासना की परंपरा में जो कृष्ण हैं, वे ब्रह्म के रूप में पूज्य हैं। जबकि रामकथाओं में राम को अवतारी न मानकर अवतार के रूप में स्वीकार किया गया है।
सनातन धर्म और हिन्दू धर्म
वैदिक धर्म, यज्ञ एवं कर्मकाण्ड, वासुदेव धर्म, नारायणीय धर्म, सात्वत धर्म, भागवत धर्म तथा पंचरात्र धर्म आदि विभिन्न सम्प्रदायों के सिद्धांत मूलतः एक जैसे ही थे। इन सभी सम्प्रदायों में विष्णु को ही विभिन्न नामों से पूजा जाता था, इसलिए आगे चलकर ये सम्प्रदाय परस्पर घुलने-मिलने लगे और एक बड़े सम्प्रदाय के रूप में सामने आने लगे।
धर्म का यह विराट् एवं समन्वित स्वरूप ही लगभग सम्पूर्ण भारत-भूमि पर प्रसारित हो गया, धर्म के इस विराट् स्वरूप को सनातन धर्म कहा जाने लगा, जिसका अर्थ होता है वह धर्म जो अत्यंत प्राचीन काल से, आदि काल से या परम्परागत रूप से चला आ रहा है।
आगे चलकर सिंधु नदी के पूर्व में निवास करने वाले मनुष्यों के इन्हीं धार्मिक विश्वासों को हिन्दू धर्म कहा जाने लगा। इस प्रकार वैदिक धर्म ने वासुदेव धर्म, नारायणीय धर्म, सात्वत धर्म, भागवत धर्म, सनातन धर्म तथा हिन्दू धर्म तक की शानदार यात्रा तय की।
वैदिक धर्म तथा हिन्दू धर्म में अंतर
आज हिन्दू धर्मावलम्बी जिन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, उनमें से अधिकांश देवी-देवता ऋग्वेद में नहीं हैं। ऋग्वेद में इन्द्र, सूर्य एवं विष्णु आदि जो देवता विद्यमान हैं, उनके स्वरूप भी हिन्दू धर्म के इन्द्र, सूर्य एवं विष्णु आदि देवताओं से पर्याप्त भिन्न हैं। ऋग्वेद में देवता तो हैं किंतु उसमें आज के हिन्दू धर्म की तरह न तो मूर्तिपूजा का उल्लेख है, न एकादशी, पूर्णमासी तथा अमावस्या आदि को निराहार रहकर व्रत करने की परम्परा है, न सूर्य-चंद्र को अर्घ्य-अर्पण किया जाता है, न चंद्रदर्शन की मान्यता है, न ब्राह्मण को भोजन कराने की परम्परा है, न पीपल को जल-सिंचन किया जाता है, न श्राद्ध, न पितृ-तर्पण आदि-आदि ना-ना विधान हैं। न ही शरद् पूर्णिमा को खीर बनाकर अर्पित करने का प्रावधान है।
वैदिक परम्परा में न कोई शनिदेव हैं, न काला-गोरा भैंरों हैं, न काली माई है। न मंदिर हैं, न घण्टी-घण्टा हैं, न आरती है, न चढ़ावा है, न प्रसाद है और न ठाकुरजी का भोग है। वेदों में न तो 108 मनकों की माला फेरने की परम्परा है, न किसी पर देवी-देवता का भाव आता हुआ दिखाई देता है।
इस प्रकार आज का हिन्दू धर्म, लगभग पूरी तरह से वैदिक धर्म से अलग है, फिर भी यह कितने आश्चर्य की बात है कि दस हजार साल पहले का वैदिक धर्म और आज का हिन्दू धर्म एक ही हैं। इन दोनों का दार्शनिक आधार एक है, इस कारण हिन्दू धर्म वैदिक परम्परा का ही आकर्षक और बदला हुआ रूप है। प्राचीन वैदिक धर्म तथा वर्तमान हिन्दू धर्म की जड़ों का स्रोत या बीज एक ही है। वैदिक धर्म से ही हिन्दू धर्म का क्रमिक विकास हुआ।
एक ही दिशा में अग्रसर होती हुई यात्रा
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा अथवा हिन्दू धर्म के इतिहास को समझने की दृष्टि से यह कहना उचित होगा कि दस हजार साल पहले के वैदिक धर्म तथा आज के हिन्दू धर्म के ठीक मध्य में भागवत धर्म खड़ा है। वैदिक धर्म में कर्मकाण्ड का प्रवेश एवं भगवान शिव का समन्यवन; वासुदेव धर्म अथवा नारायण धर्म का प्राकट्य; सात्वत धर्म का प्राकट्य एवं उसमें भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का आरम्भ; पंचरात्र धर्म का अवतरण, भागवत धर्म का प्राकट्य, भागवत धर्म में दशावतार का दर्शन, सनातन धर्म का उदय एवं उसमें हिन्दू पूजा-पद्धतियों का स्फुरण, एक ही दिशा में की जा रही युग-युगीन दार्शनिक, अध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
इस तथ्य को इस प्रकार समझा जा सकता है कि ऋग्वेद में ब्रह्म (ईश्वर, परम-चेतना, परम-आत्मा) को ज्ञानचक्षुओं से समझने की उत्सुकता है, भागवत् धर्म में परमात्मा को प्रेम के माध्यम से पाने का प्रयास है और आज के हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ, जप-तप और दान-व्रत आदि से परमात्मा को करतल पर रखे आमलक फल की तरह सुलभ होने की उद्घोषणा है।
सेवक स्वामी सखा सिय पिय के
यदि यह कहा जाए कि वैदिक धर्म से लेकर हिन्दू धर्म तक की सुदीर्घ यात्रा में विष्णु, अग्नि और रुद्र के बदले हुए रूपों ने इस विराट धर्म को आकार दिया, तो इस धर्म के इतिहास को सरलता से समझा जा सकता है। ‘सनातन धर्म’ एवं ‘हिन्दू धर्म’ नाम से प्रकाशित इस विराट धर्म के केंद्र में भगवान विष्णु एवं उसके अवतारों तथा भगवान शिव को, अतिप्राचीन काल में पूजित देवता वासुदेव अथवा नारायण के समकक्ष स्थान दिया गया। इस पूरी यात्रा में न केवल विष्णु का स्वरूप विराट् हुआ अपितु भगवान शिव का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया।
यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय में शिव के लिए यह कहा गया कि तुम शमशान में रहते हो, तस्करों, ठगों और डाकुओं के स्वामी हो, दुष्ट और बदमाशों के साथी हो किंतु सनातन धर्म में आकर वही शिव विष्णु के समकक्ष हो गया।
लोक परम्पराओं में श्मशान में रहने वाला, भभूत रमाने वाला, नग्न रहने वाला, भीख मांगकर खाने वाला, जंगलों में रमने वाला, खप्पर में खाने वाला शिव सनातन के ग्रंथों में आकर ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के’ अर्थात् भगवान राम का सेवक, स्वामि और सखा हो गया।
इसी समन्यव का चमत्कार था कि अघोरी शिव के साथ हिमाचल की पुत्री गौरा विराजित हो गईं। शिव और गौरा के साथ-साथ यक्ष पूजा, मुरगन अर्थात् कार्तिकेय की पूजा और गणेश पूजा भी प्रचलित हो गईं।
हिन्दू धर्म में जितनी प्रतिष्ठा विष्णु की है, उतनी ही प्रतिष्ठा शिव की हो गई और उतनी ही प्रतिष्ठा शिव-अर्द्धांगिनी गौरी की हो गई। उन्हें दुर्गा और पार्वती कहकर तो पूजा ही गया, इसके साथ ही भारत भर में जितनी भी देवियां, लोकदेवियां, क्षेत्रीय देवियां और कुल देवियां हैं, उन सभी को दुर्गा का ही अवतार मान लिया गया।
वासुदेव एवं प्रतिवासुदेव
जैन धर्म के त्रिषष्ठी शलाका पुरुष नामक संग्रह में अलग-अलग युगों में हुए वासुदेव और प्रति-वासुदेव की सूची दी गई है। इस सूची के अनुसार त्रेता युग में राम वासुदेव हैं तो रावण प्रति-वासुदेव है। द्वापर में श्रीकृष्ण वासुदेव हैं तो कंस प्रति-वासुदेव है। इस प्रकार हर युग की विस्तृत सूची दी गई है। यह सूची इस बात की द्योतक है कि इस ग्रंथ के लिखे जाने तक श्रीराम और श्रीकृष्ण को वासुदेव अर्थात् भगवान विष्णु के अवतारों के रूप में मान्यता मिल चुकी थी। वासुदेव एवं प्रतिवासुदेव का विचार हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा का एक और अनोखा पड़ाव माना जाना चाहिए।
यदुवंशियों का श्रीकृष्ण भक्ति पर आघात
कुछ शताब्दियों के अंतराल में भारत के यदुवंशी राजाओं के वंशज मथुरा से लेकर अफगानिस्तान, ईरान तथा ईराक तक फैल गए। ये यदुवंशी श्रीकृष्णभक्ति को भी अपने साथ उन देशों में ले गए। माना जाता है कि जब ये यदुवंशी मुसलमान बन गए तो उन्होंने चंद्रमा को अपना पूज्य मान लिया क्योंकि यदुवंशी मूलतः चंद्रवंशी थे। अफगानिस्तान से लेकर ईरान और ईराक तक के समस्त चंद्रवंशी मुसलमान बनकर चंद्रमा की पूजा करने लगे। उनके प्रभाव से सम्पूर्ण इस्लाम जगत में चंद्रमा को पूज्य मान लिया गया। अब वही मुसलमान बने यदुवंशी भारत भूमि पर आक्रमण करके भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों को नष्ट करने लगे। हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा पर यह एक बड़ा आघात था।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



