मुगल शहजादे अपने भाइयों एवं चाचाओं को मारकर ही तख्त प्राप्त कर पाते थे। मुगलों में यह परम्परा सदियों से चली आ रही थी। दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) अपने ही मालिकों के खून से नहाता रहा। आगरा का लाल किला (Red Fort of Agra) भी इसका अपवाद नहीं था।
शाहजहाँ (Shah Jahan) को तीन दिन से पेशाब नहीं आ रहा था। उसे कोई यौन सम्बन्धी रोग हो गया था जिसके उपचार के लिए हकीमों ने गरम तासीर वाली दवाइयां खिलाई थीं जिससे पेशाब की नली में सूजन आ गई थी और पेशाब नहीं उतर रहा था।
इस कारण वह अपने महल से उठकर दरबार में नहीं जा पा रहा था। यौन सम्बन्धी रोग होने से इस बीमारी को दूसरे लोगों से गुप्त रखा गया था। शाही हकीम, शहजादा दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा शहजादी जहांआरा (Jahanara) के अलावा किसी और को बादशाह के कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।
हरम में नियुक्त नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों ने जरूरत से ज्यादा दिमाग लगाया और आनन-फानन में यह अफवाह फैला दी कि बादशाह मर गया है और शहजादा दारा-शिकोह उसके नाम से बादशाहत चला रहा है। हरामखोर किस्म के कुछ नौकरों ने यह अफवाह फैलाने में भी कोई कसर नहीं रखी कि शहजादे दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा शहजादी जहांआरा (Jahanara Begum) ने बादशाह को कैद कर लिया है तथा बादशाह वही आदेश जारी करता है जो आदेश उसे दाराशिकोह के द्वारा जारी करने के लिए दिए जाते हैं।
शाहजहां (Shah Jahan) की अन्य तीन शहजादियों- पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum) और गौहरा बेगम (Gouhara Begum) ने भी ने भी शाहजहां की बीमारी का हाल बढ़ा-चढ़ा कर अपने-अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजा जिसे पढ़कर, राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर बैठे शहजादों की बेचैनी दिन पर दिन बढ़ने लगी।
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मुगल शहजादे अपनी भीतर पल रही लाल किला (Red Fort) पाने की चाहत के कारण र्धर्य और सब्र से काम नहीं ले पाते थे। वैसे भी मुगल शहजादों में उत्तराधिकार का प्रश्न शहजादों के खून से ही सुलझता आया था। पीढ़ी-दर पीढ़ी मुगल शहजादे अपने बाप का तख्त और दौलत पाने के लिए एक दूसरे का कत्ल करते आए थे।
अपने पुरखों से कुछ अलग करने नहीं जा रहे थे मुगल शहजादे, उनकी नसों में चंगेजी और तूमैरी खूनों का खतरनाक मिश्रण जोर मार रहा था जो खून-खराबे और मैदाने जंग के अलावा और किसी भाषा में नहीं समझता था। इसलिए शाहजहां के बेटों की बगावत के खूनी इतिहास की तरफ बढ़ने से पहले हम तैमूरी और चंगेजी इतिहास के पन्नों को कुछ पीछे चलकर टटोलते हैं।
भारत में मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) की नींव रखने वाला बाबर अपने पुरखों के दो राज्यों- समरकंद (Samarkand) और फरगना (Fargana) को छोड़कर भारत आया था क्योंकि बाबर (Babur) के ताऊ अहमद मिर्जा (Ahmed Mirza) ने समरकंद का और मामा महमूद खाँ ने फरगना का राज्य बाबर से छीन लिये थे और नौजवान बाबर को अपनी जान बचाने के लिए तीन साल तक पहाड़ों में छिपकर रहना पड़ा था।
पहाड़ियों में भटकते हुए बाबर (Babur) को किसी ने भारत की कमजोर राजनीतिक स्थिति की जानकारी दी जिससे उत्साहित होकर वह अपनी थोड़ी-बहुत सेना के साथ भारत के लिए चल दिया तथा उसके जैसे हजारों बेरोजगार युवक अपना भाग्य चमकने की आशा में उसकी सेना में भर्ती हो गए थे।
इसी सेना के बल पर बाबर भारत में अपना राज्य कायम करने में सफल हुआ था।
बाबर के चार पुत्र थे- हुमायूँ (Humayun), कामरान (Kamran), अस्करी (Askari) तथा हिन्दाल (Hindal)। बाबर अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था तथा परिवार की एकता के महत्व को अच्छी तरह समझता था। जब तक बादशाह का परिवार नहीं चाहता था, दुनिया का कोई भी बादशाह सुख से राज्य नहीं भोग सकता था। जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसने अपने बड़े पुत्र हुमायूं को भारत का बादशाह घोषित किया तथा उससे वचन लिया कि वह अपने भाइयों से प्रेम करेगा, उनके अपराधों को क्षमा करेगा और उन्हें कभी भी जान से नहीं मारेगा। जब बाबर मर गया तो हुमायूं ने अपना राज्य अपने भाइयों में बांट दिया ताकि भाइयों में राज्य के लिए झगड़ा न हो। फिर भी हुमायूं के भाइयों कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल ने अपने बड़े भाई के साथ बड़ी दुष्टता की और पग-पग पर हुमायूं को धोखा दिया जिससे हुमायूं का राज्य उसके हाथ से निकल गया। दस साल तक फारस के बादशाह तहमास्प की शरण में रहने के बाद जब हुमायूं ने दुबारा भारत पर अधिकार किया तब उसने अपने छोटे भाई मिर्जा हिन्दाल को मार डाला। दूसरे भाई कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भेज दिया तथा तीसरे भाई मिर्जा अस्करी को भी उसके साथ रवाना किया। इसके कुछ दिन बाद ही हुमायूं की स्वयं की भी मृत्यु हो गई।
जब हुमायूं की मृत्यु हुई तो उसके दो पुत्र थे जिनमें से बड़ा पुत्र अकबर केवल 13 साल का लड़का था तथा हुमायूं का दूसरा पुत्र हकीम खां अल्पवयस्क बालक था।
अकबर के संरक्षक बैराम खाँ (Bairam Khan) द्वारा अकबर (Akbar) को भारतीय प्रांतों का तथा हुमायूं के छोटे पुत्र हकीम खाँ को काबुल का बादशाह बनाया गया किंतु हकीम खाँ की माँ चूचक बेगम (Mah Chuchak Begum) ने उजबेगों (Uzbeks) से सहयोग प्राप्त करके अकबर से उसका राज्य छीनने तथा अपने पुत्र को भारत का राज्य दिलाने का षड़यंत्र किया।
अकबर (Akbar) के संरक्षक बैराम खाँ (Bairam Khan) ने हकीम खाँ तथा उसके सहयोगियों का बुरी तरह दमन किया। हकीम खां को काबुल से भी निकाल दिया गया। अंत में हकीम खाँ ने अपने बड़े भाई अकबर के पैरों में गिरकर क्षमा मांगी। अकबर ने उसे काबुल का राज्य फिर से दे दिया।
हकीम खाँ तीस साल तक काबुल (Kabul) पर राज्य करता रहा। ई.1585 में हकीम खाँ की मृत्यु के बाद अकबर ने उसका राज्य अपने राज्य में मिला लिया।
अकबर के चार पुत्र हुए सलीम(Saleem or Jahangir), मुराद (Murad), दानियाल (Daniyal) तथा हुसैन (Husain)। अकबर की वृद्धावस्था आने तक केवल सलीम ही जीवित बचा था। इनमें से मुराद तथा दानियाल, ज्यादा शराब पीने से मरे थे।
बादशाह का एक ही जीवित पुत्र होने से सलीम का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था फिर भी राज्य पाने की लालसा में उसने अपने पिता अकबर के विरुद्ध दो बार सशस्त्र विद्रोह किया तथा अपने बाप के कई नौकरों, मित्रों, सम्बन्धियों और मंत्रियों को मार डाला।
इस कारण अकबर (Akbar) ने सलीम के बड़े पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु जब अकबर रोग शैय्या पर पड़ा अंतिम सांसें ले रहा था, तब एक दिन अचानक सलीम, अकबर के महल में घुस गया। उसने अकबर के पलंग के पास लटक रही अपने दादा हूमायूं की तलवार निकालकर अपने हाथ में ले ली।
अकबर अपने जीवन से निराश हो गया और उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वे सलीम के सिर पर बादशाह का ताज रख दें। इस प्रकार सलीम अपने बाप अकबर के जीवित रहते ही जहांगीर के नाम से बादशाह बना और उसने अपने बड़े पुत्र खुसरो पर भयानक अत्याचार किया।
जहांगीर (Jahangir) ने अपने पुत्र खुसरो (Khusro or Khusrau) के खास मित्रों को जीवित ही गधों और बैलों की खालों में सिलवा दिया तथा उसके अन्य सैंकड़ों साथियों को एक मील लम्बी सूली पर कतार में लटका दिया।
खुसरो को हाथी पर बैठाकर, लटकते हुए शवों की कतारों के बीच से ले जाया गया। उससे कहा गया कि अपने हर आदमी की लाश के सामने रुके और झुक कर उसका सलाम कुबूल करे।
इस अपमान के बाद खुसरो की आँखें फोड़ कर उसे कारागार में डाल दिया गया। सत्रह साल बाद जहांगीर ने उसे अपने एक अन्य पुत्र खुर्रम को सौंप दिया ताकि खुर्रम अपने बाप जहांगीर के खिलाफ बगावत न करे। खुर्रम ने अपने अंधे एवं बड़े भाई खुसरो को बुरहानपुर के दुर्ग में तड़पा-तड़पा कर मारा।
कुछ दिन बाद खुर्रम (Khurram or Shahjahan) ने अपने बाप जहांगीर के खिलाफ बगावत कर ही दी। खुर्रम के बड़े भाई परवेज (Parvez) ने उसे दक्षिण भारत में धकेल दिया। कुछ दिन के लिए खुर्रम शांत होकर बैठ गया किंतु जैसे ही जहांगीर की मृत्यु हुई खुर्रम ने नूरजहां (Noorjahan) तथा अपने अन्य भाई शहरयार (Shahryar or Shehryar) के खिलाफ उत्तराधिकार का युद्ध लड़ा।
उसने मुगल शहजादा शहरयार तथा उसके पुत्रों को अंधा करवाकर कत्ल करवाया। अपने दूसरे भाई दानियाल के पुत्रों को भी अंध करके मरवाया तथा अपने मृतक भाई खुसरो के एकमात्र जीवित पुत्र दावरबख्श की भी हत्या करके अपने बाप के तख्त पर शान से बैठा।
शाहजहां (Shahjahan) के बारे में कहा जाता है कि उसने अठारह मुगल शहजादे मौत के घाट उतारे जो या तो उसके चाचा थे या उसके भाई थे। इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार से कहा जाता है-
सबळ सगाई ना गिणै, सबळां में नहीं सीर।
खुर्रम अठारह मारिया, कै काका कै बीर।।
आज वही खुर्रम शाहजहां (Shahjahan) के नाम से बादशाह था और मुगल शहजादे उसका तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा (Kohinoor Diamond) तथा लाल किला (Red Fort) पाने के लिए अपने बाप के खून के प्यासे हो रहे थे।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता




