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फीरोज तुगलक की कट्टरता (139)

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फीरोज तुगलक की कट्टरता

दिल्ली सल्तनत के इतिहास में फीरोज तुगलक की कट्टरता कुख्यात है। वह हिन्दुओं को तो जीवित ही आग में झौंक देता था किंतु मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन नहीं सुन सकता था!

फीरोज तुगलक ने पिछले सुल्तान का परलोक सुधारने के लिए जनता से क्षमापत्र लिखवाकर उसकी कब्र में गढ़वाए तथा इस्लामिक शिक्षा देने के लिए मदरसों एवं मकतबों की स्थापना करने के साथ-साथ बेरोजगारी उन्मूलन का विभाग भी स्थापित किया।

फीरोज तुगलक युद्धप्रिय सुल्तान नहीं था। इस कारण उसमें सैनिकों जैसा साहस तथा उत्साह नहीं था। वह मुस्लिम स्त्रियों को करुण क्रंदन करते हुए नहीं देख सकता था इसलिए उसने विद्रोही प्रांतों को फिर से लेने का प्रयास नहीं किया। उसमें राज्यविस्तार की महत्त्वाकांक्षा भी नहीं थी। जहाँ कहीं भी मुस्लिम प्रजा का विनाश होता हो, सुल्तान अपनी विजय दृष्टि-गोचर होने पर भी या तो पीछे हट जाता था या शत्रु से सन्धि कर लेता था।

मुस्लिम लेखकों ने सुल्तान फीरोजशाह द्वारा ऐसा किए जाने के पीछे का कारण बताते हुए लिखा है कि वह धार्मिक वृत्ति का सुल्तान था। जबकि वास्तविकता यह थी कि वह एक ऐसी अटपटी धार्मिक प्रवृत्ति का सुल्तान था जो रणस्थल में भी मुसलमानों का रक्तपात नहीं देख पाता था जबकि जबकि दूसरी ओर शांति से रह रहे हिन्दुओं को नष्ट करने में उसने पूरा उत्साह दिखाया था।

इसका कारण बताते हुए मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि उलेमाओं के प्रभाव में होने के कारण फीरोज ऐसा करता था। उसने हिन्दू शासकों द्वारा शासित जाजनगर तथा नगरकोट को जीतने में पूरा उत्साह दिखाया।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय में हुए विद्रोहों के कारण दिल्ली सल्तनत के बहुत से मुस्लिम शासित प्रांत स्वतंत्र हो गए थे। फीरोज पर उन्हें फिर से सल्तनत में शमिल करने की जिम्मेदारी थी किंतु उसने इसके लिए विशेष प्रयास नहीं किये। उसने हिन्दू शासित जाजनगर तथा नगरकोट पर आक्रमण करके उन्हें फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया।

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मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में बंगाल ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। बंगाल के गवर्नर हाजी इलियास ने शमसुद्दीन इलियास शाह की उपाधि धारण करके स्वयं को बंगाल का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। फीरोज तुगलक ने बंगाल को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए ई.1353 में एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए कूच किया। जब इलियास को फीरोज तुगलक के आने की सूचना मिली तो उसने अपने को इकदला के किले में बन्द कर लिया।

फीरोज ने इलियास को किले से बाहर निकालने के लिए अपनी सेना को पीछे हटाना आरम्भ किया। जब फीरोज की सेना कई मील पीछे चली गई तो इलियास ने किले से बाहर निकलकर फीरोज की सेना का पीछा किया। अब सुल्तान की सेना लौट पड़ी। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। फीरोज की सेना को विजय प्राप्त हुई। जब वह किले पर अधिकार स्थापित करने गया तो उसने मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन सुना। जिसे सुनकर फीरोज दुर्ग पर अधिकार स्थापित किये बिना ही वहाँ से लौट पड़ा।

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जब शाही सेनापति तातार खाँ ने फीरोज तुगलक को परामर्श दिया कि वह बंगाल को अपने राज्य में मिला ले तो उसने यह कह कर टाल दिया कि बंगाल जैसे दलदली प्रान्त को दिल्ली सल्तनत में मिलाना बेकार है। इस प्रकार परिश्रम से प्राप्त हुई विजय को भी सुल्तान ने खो दिया और बंगाल स्वतन्त्र ही बना रहा। बंगाल से लौटते समय सुल्तान ने जाजनगर अर्थात वर्तमान उड़ीसा पर आक्रमण किया। जाजनगर के राजा ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और प्रतिवर्ष कुछ हाथी कर के रूप में भेजने का वचन दिया। इस युद्ध में सुल्तान ने अपनी धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता का परिचय दिया। उसने पुरी में भगवान जगन्नाथ के मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करवा दिया और मूर्तियों को समुद्र में फिंकवा दिया। जाजनगर को जीतने के बाद मार्ग में बहुत से सामन्तों तथा भूमिपतियों पर विजय प्राप्त करता हुआ फीरोज तुगलक दिल्ली लौट आया। मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में नगरकोट का राज्य स्वतन्त्र हो गया था। फीरोजशाह तुगलक ने फिर से नगरकोट को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने का निश्चय किया। नगरकोट पर आक्रमण करने का एक और भी कारण था। नगरकोट राज्य में स्थित ज्वालादेवी का मन्दिर इन दिनों अपनी धन-सम्पदा के लिए प्रसिद्ध था।

इस मन्दिर में सहस्रों यात्री दर्शन के लिए आते थे और मूर्तिपूजा करते थे। यह बात फीरोज तुगलक के लिए असह्य थी। इसलिए उसने नगरकोट पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में फीरोज तुगलक की कट्टरता मानवता को शर्मसार करने वाली थी।

नगरकोट के हिन्दू राजा ने छः महीने तक बड़ी वीरता से दुर्ग की रक्षा की किंतु अन्त में विवश होकर उसने फीरोज से संधि की प्रार्थना की। सुल्तान ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली तथा उससे विपुल धन लेकर अपनी सेना हटा ली।

ज्वालादेवी मन्दिर से फीरोज को संस्कृत भाषा में लिखी हुई 1,300 पुस्तकें मिलीं। फीरोज ने उनमें से कुछ पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम दिनों में सिंध में भयानक विद्रोह आरम्भ हो गया था। मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु सिंध के विद्रोह का दमन करते समय ज्वर से पीड़ित होकर थट्टा में हुई थी। इस कारण फीरोज तुगलक सिन्ध के लोगों को अपना शत्रु समझता था और उन्हें अपने हाथों से दण्डित करना चाहता था। इसलिए ई.1371 में उसने एक विशाल सेना के साथ सिन्ध के लिए प्रस्थान किया।

वह सिंध के मुस्लिम शासक एवं प्रजा को जी भर कर दण्डित करना चाहता था किंतु इस अभियान में फीरोज को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई परन्तु अन्त में सिन्ध के शासक ने सुल्तान फीरोज तुगलक से क्षमा याचना की। सुल्तान ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसने सिंध के शासक को हटाकर उसके भाई को सिन्ध का शासक बना दिया। बंगाल की भांति सिन्ध में भी फीरोज मुसलमानों के प्रति अपनी उदारता के कारण विफल रहा।

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि फीरोज की युद्धनीति दो अलग भागों में बंटी हुई थी। हिन्दुओं के लिए फीरोज तुगलक की कट्टरता की नीति थी तथा मुसलमानों के लिए उदारता की नीति थी। वह हिन्दुओं को नष्ट करना अपना कर्त्तव्य समझता था किंतु मुस्लिम औरतों का करुण क्रंदन नहीं सुन सकता था। उसके सैनिक युद्ध में प्राप्त विजय का भी उपभोग नहीं कर पाते थे क्योंकि फीरोज मुसलमानों के प्रति अपनी उदारता के कारण उसे खो देता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोजशाह तुगलक की करनीति (140)

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फीरोजशाह तुगलक की करनीति

फीरोजशाह तुगलक की करनीति बड़ी विचित्र थी। वह हिन्दुओं से तो कर लेना चहाता था किंतु मुसलमानों से कर नहीं लेना चाहता था अपितु जब कोई मुस्लिम सेनापति या प्रांतपति किसी हिन्दू राज्य को लूटता था तो फीरोजशाह तुगलक द्वारा लूट के माल में से पांचवा हिस्सा लिया जाता था।

फीरोजशाह तुगलक ने हिन्दुओं एवं मुसलमान शासकों के लिए अलग-अलग युद्धनीतियों का निर्वहन किया। वह मुस्लिम विद्रोहियों को क्षमा कर देता था और विधर्मी शासक को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ता था। फीरोजशाह की यह नीति शासन के प्रत्येक अंग में देखी जा सकती थी। फिर भी वह हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सका।

फीरोज तुगलक ने जाजनगर और नगरकोट को छोड़कर किसी भी हिन्दू शासक पर आक्रमण नहीं किया। राजपूताना के राजाओं से युद्ध करना उसके वश की बात नहीं थी। इसलिए दिल्ली सल्तनत के जो क्षेत्र मुहम्मद बिन तुगलक के समय दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र हो गए थे, वह फीरोज तुगलक के समय में भी दिल्ली सल्तनत में फिर से नहीं मिलाए जा सके।

फीरोज तुलगक ने केवल दो मुस्लिम शासकों के विरुद्ध युद्ध किए जिनमें से पहला था बंगाल तथा दूसरा था सिंध। बंगाल में जब उसने मुस्लिम औरतों का क्रंदन सुना तो वह बंगाल से भाग आया तथा सिंध के मुस्लिम शासक ने जब सुल्तान से क्षमा याचना की तो सुल्तान फीरोज तुगलक ने उसे क्षमा कर दिया।

फीरोज तुगलक ने युद्ध की बजाय सल्तनत की कर-व्यवस्था में अधिक रुचि ली। फीरोजशाह तुगलक की करनीति बड़ी विचित्र थी। फीरोज को सुल्तान बनने से पहले सल्तनत की राजस्व व्यवस्था का कुछ अनुमान था। इसके आधार पर उसने ख्वाजा हिसामुद्दीन नामक एक अनुभवी व्यक्ति को सल्तनत का राजस्व निरीक्षक नियुक्त किया।

ख्वाजा हिसामुद्दीन ने सल्तनत के राजस्व अभिलेख का अध्ययन किया तथा छः साल तक विभिन्न प्रांतों में घूम-घूमकर सल्तनत के वास्तविक राजस्व का आकलन किया और सुल्तान को सूचित किया कि सल्तनत को खालसा भूमि से प्रतिवर्ष छः करोड़ पचासी लाख टंका आय होनी चाहिए। यह सिफारिश ही खालसा भूमि पर होनी वाली खेती के सम्बन्ध में फीरोजशाह तुगलक की करनीति बन गई।

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ख्वाजा की सलाह के अनुसार सुल्तान ने सल्तनत की सम्पूर्ण खालसा भूमि के लिए प्रतिवर्ष छः करोड़ पचासी लाख टंका भू-राजस्व एकत्रित करने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि जब तक फीरोज तुगलक सुल्तान के पद पर बैठा रहा, दिल्ली सल्तनत को खालसा भूमि से इतनी ही आय होती रही।

खालसा भूमि का अर्थ होता है, वह भूमि जो शुद्ध रूप से केन्द्र सरकार के अधीन हो। सल्तनत की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था किंतु भूमिकर के अतिरिक्त भी आय के साधन थे। चूंकि सुल्तान को सैनिक अभियानों पर धन व्यय नहीं करना था इसलिए उसे राजकोष भरने की उतनी चिन्ता नहीं थी जितनी शासन को दृढ़ता देने की।

फीरोज तुगलक ने कुरान के नियमानुसार जनता पर केवल चार कर- खिराज, जकात, जजिया तथा खाम जारी रखे, शेष समस्त कर हटा दिए।

खिराज उस कर को कहते थे जो भूमिपतियों, जागीरदारों अथवा प्रांतपतियों से राजस्व-संग्रहण का अधिकार देने के बदले लिया जाता था। फीरोज तुगलक मुस्लिम-किसानों से 15 प्रतिशत भू-राजस्व के रूप में लेता था जबकि हिन्दू प्रजा को अब भी 50 प्रतिशत भू-राजस्व कर देना पड़ता था।

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जकात केवल मुसलमानों से लिया जाता था। प्रत्येक मुसलमान के लिए अनविार्य था कि वह अपनी आय में से चालीसवां हिस्सा अर्थात् ढाई प्रतिशत सुल्तान को दे। सुल्तान इस धन का उपयोग इस्लाम की सेवा में करता था। जजिया हिन्दुओं से लिया जाता था। आठवीं शताब्दी में हुए अरब आक्रमण के समय से ही ब्राह्मण जजिया से मुक्त थे किंतु फीरोजशाह तुगलक ने उलेमाओं के कहने पर ब्राह्मणों पर भी जजिया लगा दिया। शाक्त सम्प्रदाय के हिन्दुओं का उसने विशेष रूप से दमन किया। खाम अथवा खम्स लूट में प्राप्त माल को कहते थे। कुरान के अनुसार सुल्तान को लूट में से केवल 20 प्रतिशत कर लेना चाहिए। शेष भाग सेना को मिलना चाहिए किंतु अल्लाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद बिन तुगलक हिन्दू राज्यों से प्राप्त लूट के माल में से 80 प्रतिशत स्वयं लेते थे तथा 20 प्रतिशत अपनी सेना में बंटवाते थे। फीरोज तुगलक ने लूट के माल का कुरान के नियमों के अनुसार बंटवारा करवाना तय किया। फीरोज तुगलक ने पांच नहरों का निर्माण करवाया। इनमें सबसे लम्बी नहर 150 मील लम्बी थी जो यमुनाजी के जल को हिसार तक ले जाती थी। दूसरी नहर 96 मील लम्बी थी जो सतलज एवं घग्घर को आपस में जोड़ती थी। तीसरी मांडवी तथा सिरमौर की पहाड़ियों से आरम्भ होकर हांसी तक पहुंचती थी।

चौथी घग्घर से फीरोजाबाद तक तथा पांचवी नहर यमुनाजी से फीरोजाबाद तक पहुंचती थी। फीरोज तुगलक ने किसानों के लिए 160 कुएं भी खुदवाए।

जो किसान सिंचाई के लिए सरकारी नहरों का पानी उपयोग करते थे, उन्हें अपनी उपज का 10 प्रतिशत अतिरिक्त कर देना पड़ता था। फीरोज तुगलक ने दिल्ली के आसपास फलों के 1,200 बाग लगवाए जिनसे सल्तनत को एक लाख अस्सी हजार टंका आय होने लगी।

कुछ मुस्लिम लेखकों ने लिखा है कि फीरोजशाह तुगलक के शासन काल में दिल्ली सल्तनत में एक भी ऊजड़ (ऊसर) गांव नहीं था और एक भी ऐसा खेत नहीं था जो बिना जुते रहता हो। इस कारण उसके शासन में इतनी फसल होती थी कि सल्तनत में अकाल पड़ने बंद हो गए।

शम्से शिराज अफीक ने लिखा है- ‘जनता के घर अन्न, सम्पत्ति, घोड़ों तथा फर्नीचर से भरे पड़े थे। प्रत्येक व्यक्ति के पास प्रचुर मात्रा में सोना तथा चांदी थी, कोई ऐसी स्त्री नहीं थी जिसके पास आभूषण न हों और न कोई ऐसा घर था जिसमें अच्छे पलंग और दीवान न हों। धन खूब था और सभी लोग आराम से रहते थे। इस युग में राज्य को दिवालियापन का सामना नहीं करना पड़ता था। दो-आब से अस्सी लाख टंका आय होती थी और दिल्ली का राजस्व छः करोड़ पचासी लाख टंका था।’

कोई भी व्यक्ति जिसने मध्यकालीन इतिहास का किंचित् भी अध्ययन किया हो, वह जानता है कि हिन्दुओं को पेट भर भोजन मिलना कठिन था। हिन्दुओं के लिए धन-सम्पत्ति रखना वर्जित था। सोने-चांदी के जेवर की तो कौन कहे, हिन्दुओं के घरों में मिट्टी के बर्तन भी ढंग के नहीं थे। इसलिए यह कहना कठिन नहीं है कि या तो शम्से शिराज अफीक ने पूरी तरह से झूठ लिखा है या फिर उसका यह कथन केवल मुस्लिम प्रजा के लिए है।

तत्कालीन मुस्लिम लेखकों ने लिखा है कि फीरोज तुगलक ने 300 नगरों की स्थापना की। वस्तुतः यह संख्या उन गांवों की हो सकती है जो अल्लाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में शाही सैनिकों के अत्याचारों के कारण उजड़ गए थे और फीरोजशाह तुगलक द्वारा नहरों का निर्माण करने के कारण फिर से बसने लगे थे। फिर भी फीरोजशाह के काल में आगरा के निकट फिरोजाबाद, दिल्ली के निकट कोटला फीरोजशाह, बदायूं के निकट फीरोजपुर आदि नगर अवश्य ही बसाए गए थे।

फीरोजशाह तुगलक ने 4 मस्जिदों, 30 महलों, 200 काफिला सरायों, 5 तालाबों, पांच दवाखानों, 100 कब्रों, 10 गुसलखानों, 10 दरगाहों और 100 पुलों का निर्माण करवाया। वह मेरठ तथा खिज्राबाद से दो अशोक-स्तंभों को उठाकर दिल्ली लाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोजशाह तुगलक का शासन (114)

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फीरोजशाह तुगलक का शासन

फीरोजशाह तुगलक का शासन क्रूरता की सभी सीमाओं को पार कर गया था वह हिन्दू अपराधी को महल के समक्ष जीवित जलवा देता था जबकि मुस्लिम अपराधी पर रहम दिखाकर छोड़ देता था।

फीरोज तुगलक ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए अलग-अलग युद्ध नीति अपनाई। इस कारण उसने नगरकोट तथा जाजनगर के हिन्दू राज्यों को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया किंतु बंगाल एवं सिंध सहित किसी भी मुस्लिम राज्य को पुनः दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया।

फीरोजशाह कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसकी धार्मिक नीति का परिचय उसकी पुस्तक ‘फतुहाते फिरोजशाही’ से मिलता है। इस्लाम तथा कुरान में पूरा विश्वास होने के कारण उसने इस्लाम आधारित शासन का संचालन किया। फीरोजशाह तुगलक ने उलेमाओं के समर्थन से राज्य प्राप्त किया था इसलिए उसने उलेमाओं को संतुष्ट रखने की नीति अपनाई तथा उलेमाओं की कठपुतली बन गया। वह उलेमाओं से परामर्श लिए बिना कोई कार्य नहीं करता था। वह दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्वयं को खलीफा का नायब घोषित किया।

फीरोजशाह तुगलक ने युद्ध में मिला लूट का सामान सेना तथा राज्य में उसी अनुपात में बांटने की व्यवस्था लागू की जैसे कुरान द्वारा निश्चित किया गया है, अर्थात् पांचवां भाग राज्य को और शेष भाग सेना को। फीरोजशाह तुगलक ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। उसके शासन काल में हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था। एक ब्राह्मण को सुल्तान के महल के सामने जिन्दा जलवा दिया गया। उस ब्राह्मण पर यह आरोप लगाया गया कि वह मुसलमानों को इस्लाम त्यागने के लिए उकसाता है।

फीरोजशाह तुगलक हिन्दू प्रजा को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित करता था और जो हिन्दू मुसलमान हो जाते थे उन्हें जजिया से मुक्त कर देता था। फतुहाते फिरोजशाही में वह लिखता है- ‘मैंने अपनी काफिर प्रजा को पैगम्बर का धर्म स्वीकार करने के लिए उत्साहित किया और यह घोषित किया कि जो मुसलमान हो जावेगा उसे जजिया से मुक्त कर दिया जावेगा।’

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फीरोज तुगलक ने मध्यकालीन मुस्लिम सुल्तानों की तरह हिन्दू मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ने एवं लूटने की नीति जारी रखी। उसने जाजनगर में जगन्नाथपुरी तथा नगरकोट में ज्वालादेवी मंदिर पर आक्रमण के समय हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। उसने पुरी के जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियां तुड़वाकर समुद्र में फिंकवा दीं। उसने नगरकोट पर आक्रमण करके ज्वालादेवी मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया तथा वहाँ से भारी सम्पदा लूट ली।

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फीरोज तुगलक के शासन में जो मंदिर तोड़ दिए जाते थे उनके पुनर्निर्माण पर रोक लगा दी गई थी। उसने हिन्दू मेलों पर प्रतिबंध लगा दिया। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार फीरोजशाह ने 40 मस्जिदों का निर्माण करवाया। फीरोजशाह ने मुसलमानों की पुत्रियों के विवाह में सहायता देने के लिए ‘दीवाने खैरात’ नामक विभाग खोला। कोई भी मुसलमान इस कार्यालय में अर्जी देकर पुत्री के विवाह के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकता था। प्रथम श्रेणी के लोगों को 50 टंक, द्वितीय श्रेणी के लोगों को 30 टंक और तृतीय श्रेणी के लोगों को 20 टंक दिया जाता था। मुस्लिम विधवाओं तथा अनाथों को भी इस विभाग से आर्थिक सहायता मिलती थी। फीरोजशाह तुगलक ने इस्लाम की शिक्षा के प्रसार के लिए कई मदरसे तथा मकतब खुलवाये। वह इस्लामिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देता था। प्रत्येक विद्यालय में मस्जिद की व्यवस्था की गई थी। इन संस्थाओं को राज्य से सहायता मिलती थी। विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति तथा अध्यापकों को पेंशन दी जाती थी। मकतबों को राज्य की ओर से भूमि मिलती थी। हिन्दुओं एवं शिया मुसलमानों के साथ फीरोज का व्यवहार अच्छा नहीं था। वह सूफियों को भी घृणा की दृष्टि से देखता था।

शिया मुसलमानों के सम्बन्ध में वह लिखता है- ‘मैंने उन समस्त को पकड़ा और उन पर गुमराही का दोष लगाया। जो बहुत उत्साही थे, उन्हें मैंने प्राणदण्ड दिया। मैंने उनकी पुस्तकों को आम जनता के बीच जला दिया। अल्लाह की मेहरबानी से शिया सम्प्रदाय का प्रभाव दब गया।’

जियाउद्दीन बरनी तथा शम्से सिराज अफीफ ने फीरोजशाह तुगलक की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। उन्होंने लिखा है- ‘फीरोजशाह के उपरांत इतना उदार, दयालु, न्यायप्रिय, शिष्ट तथा अल्लाह से डरने वाला और कोई सुल्तान नहीं हुआ।’ बरनी तथा अफीफ द्वारा की गई यह प्रशंसा स्वाभाविक है। वे दोनों ही उलेमा थे। सुल्तान उलेमाओं का आदर करता था और उनके परामर्श से कार्य करता था।

डब्ल्यू. एच. मोरलैण्ड ने फीरोजशाह के सम्बन्ध में लिखा है- ‘उसका शासन काल संक्षिप्त स्वर्ण युग था जिसका धुंधला स्वरूप अब भी उत्तरी भारत के गांवों में परिलक्षित होता है।’

हैवेल ने लिखा है- ‘वह एक बुद्धिमान तथा उदार शासक था। क्रूरता, निर्दयता तथा भ्रष्टाचार की लम्बी शृंखला जो तुर्की वंश के अन्धकारपूर्ण इतिहास का निर्माण करती है, उसमें फीरोज का शासन काल एक स्वागतीय विशृंखलता है।’

सर हेग के विचार में- ‘फीरोजशाह के राज्य काल की समाप्ति के साथ एक अत्यंत उज्जवल युग का अवसान होता है।’

हेनरी इलियट तथा एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘फीरोजशाह चौदहवीं शताब्दी का अकबर था।’

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘फीरोजशाह तुगलक में उस विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले बादशाह अकबर की प्रतिभा का शतांश भी नहीं था जिसने सार्वजनिक हितों का उच्च मंच से समस्त सम्प्रदायों तथा धर्मों के प्रति शान्ति, सद्भावना तथा सहिष्णुता का सन्देश दिया।’

श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘फीरोज न तो अशोक था न अकबर जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया था, वरन् वह औरंगजेब की भांति कट्टरपंथी था।’

विन्सेंट स्मिथ ने भी हेनरी इलियट के मत का विरोध किया है और इसे मूर्खतापूर्ण बतलाया है। स्मिथ ने लिखा है- ‘फिरोज के लिए अपने युग में इतना ऊँचा उठना सम्भव नहीं था जितना अकबर उठा सका था।’

इतिहासकारों के विभिन्न मतों से फीरोज के सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा बनाना कठिन है। वास्तविकता का अन्वेषण फीरोज के कृत्यों का मूल्यांकन, आलोचनात्मक तथा तर्कपूर्ण विवेचन द्वारा किया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि फीरोज ने एक कट्टर सुन्नी मुसलमान की भांति शासन किया। उसकी धार्मिक नीतियों के कारण उसके राज्य में हिन्दुओं का जीवन बहुत कष्टमय हो गया था। शियाओं एवं सूफियों के लिए भी सल्तनत की ओर से कोई संरक्षण उपलब्ध नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु (142)

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फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु

अस्सी वर्ष की आयु में फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु हो गई। वह सिकंदर लोदी और औरंगजेब की भांति मजहबी संकीर्णता से ग्रस्त था और हिन्दुओं पर अत्याचार करने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

फीरोजशाह तुगलक ने मुल्ला-मौलवियों की सलाह पर अपने शासन का संचालन किया। इस कारण राज्य में सुन्नी मुसलमानों को ही वास्तविक प्रजा समझा गया तथा शिया, सूफी एवं हिन्दू प्रजा को सुल्तान के कोप का भाजन बनना पड़ा। फीरोजशाह का जन्म ई.1309 में हुआ था। वह ई.1351 में 42 वर्ष की आयु में दिल्ली के तख्त पर बैठा था। फीरोज के अन्तिम दिन सुख तथा शांति से नहीं बीते।

ई.1370 के आते-आते फीरोजशाह तुगलक बूढ़ा हो गया और उसके अंग शिथिल होने लगे। उसने शहजादे फतेह खाँ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा राज्य के अधिकांश कार्यों की जिम्मेदारी उसी को दे दी किंतु ई1374 में शहजादे फतेह खाँ की मृत्यु हो गई। इससे सुल्तान को भीषण आघात पहुंचा। शासन में शिथिलता आने लगी और राज्य दलबन्दी का शिकार हो गया।

फीरोज ने अपने दूसरे शहजादे जफर खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया किंतु उसकी भी मृत्यु हो गई। वृद्ध हो जाने के कारण फीरोज शासन को नहीं सम्भाल सका। शासन की सारी शक्ति प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ के हाथों में चली गई।

फीरोज ने अपने तीसरे शहजादे मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी चुना किंतु सुल्तान का नायब (प्रधानमंत्री) खान-ए-जहाँ तख्त प्राप्त करने के लिए शहजादे मुहम्मद को अपने मार्ग से हटाने का उपाय खोजने लगा। उसने सुल्तान को समझाया कि शहजादा कुछ असंतुष्ट अमीरों से मिलकर सुल्तान को मारने का षड्यन्त्र रच रहा है।

सुल्तान ने षड्यंत्र करने वालों को कैद करने की आज्ञा दे दी परन्तु शहजादा राजवंश की स्त्रियों के साथ चुपके से पालकी में बैठकर सुल्तान के सामने उपस्थित हुआ और सुल्तान के चरणों में गिरकर उसे समझाया कि खान-ए-जहाँ स्वयं तख्त पाना चाहता है इसलिए उसने शहजादे पर षड्यंत्र का आरोप लगाया है। फीरोज के मन में यह बात बैठ गई। उसने खान-ए-जहाँ को पदच्युत करके बंदी बना लेने की आज्ञा दे दी। जब खान-ए-जहाँ को इसकी सूचना मिली तब वह मेवाड़ की ओर भाग गया।

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शहजादा फिर से सुल्तान का कृपापात्र बन गया और विलासिता का जीवन व्यतीत करने लगा। उसने कई अयोग्य मित्रों को नौकरियां दे दीं। इससे योग्य तथा अनुभवी अफसरों में असंतोष फैलने लगा और धीरे-धीरे शहजादे का विरोध होने लगा। अंत में गृहयुद्ध की स्थिति आ गई। इस युद्ध से घबराकर शहजादा सिरमूर की पहाड़ियों की ओर भाग गया।

वृद्ध सुल्तान फीरोजशाह तुगलक ने फिर से शासन अपने हाथों में ले लिया। अत्यंत वृद्ध हो जाने के कारण वह शासन को नहीं संभाल सका। उसने अपने सारे अधिकार अपने पोते तुगलक शाहबीन फतेह खाँ को दे दिए। थोड़े दिन बाद 20 सितम्बर 1388 को 80 वर्ष की आयु में फीरोज तुगलक की मृत्यु हो गई।

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यद्यपि फीरोजशाह अपने सुधारों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उसके सुधारों में दूरदर्शिता का अभाव था। जागीर प्रथा आरम्भ करना, गुलामों की संख्या में वृद्धि करना, सैनिकों के पदों को आनुवांशिक बनाना आदि ऐसे सुधार थे जिनका राज्य के स्थायित्व पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। सुन्नी प्रजा के लिए फीरोजशाह का शासन बड़ा उदार था। मजहबी संकीर्णता के कारण वह अच्छे तथा बुरे दोनों प्रकार के अधिकारियों के साथ दया तथा सहानुभूति दिखाता था और अनुचित साधनों का प्रयोग करने वालों की भी सहायता करता था। उसमें राजनीतिज्ञता का अभाव था। इस कारण वह राजनीति को मजहब से अलग नहीं कर सका। उलेमाओं तथा मौलवियों के परामर्श के बिना वह कोई काम नहीं करता था। वह कुरान के नियमों के अनुसार शासन करता था। इससे हिन्दू प्रजा का उत्पीड़न होता था। समस्त इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि फीरोज में उच्च कोटि की धर्मिक असहिष्णुता थी और हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था। फीरोजशाह अत्यंत साधारण योग्यता का धनी था। न उसमें महत्त्वाकांक्षा थी और न संकल्पशक्ति। सामरिक दृष्टि से उसका व्यक्तित्व बहुत छोटा था। उसमें संगठन तथा संचालन शक्ति का सर्वथा अभाव था।

न वह सल्तनत की वृद्धि कर सका और न उसे छिन्न-भिन्न होने से रोक सका। उसकी सेना का संगठन दोषपूर्ण था। जागीरदारी प्रथा तथा सैनिकों के पद को वंशानुगत बनाकर उसने शासन में ऐसे दोष उत्पन्न कर दिए जिनसे तुगलक-वंश का पतन आरम्भ हो गया।

फीरोजशाह के कार्यों में न कोई मौलिकता थी और न दूरदृष्टि। सुल्तान का स्वभाव उसका सबसे बड़ा शत्रु था। सुन्नी प्रजा के प्रति उसकी उदारता तथा दयालुता और गैर-सुन्नी प्रजा के लिए उसकी कठोरता उसके अच्छे कार्यों को चौपट कर देती थी। चौदहवीं शताब्दी में सफलता पूर्वक शासन करने के लिए सुल्तान में जिस संतुलन का समावेश होना चाहिए था, उसका फीरोज में अभाव था। सारांश यह है कि यद्यपि फीरोज के कृत्यों से सुन्नी प्रजा को सुख पहुँचा परन्तु उसकी नीति के अन्तिम परिणाम बुरे हुए और सल्तनत कमजोर हो गई।

फीरोज तुगलक का पिता मुलसलमान तथा माता हिन्दू थी। स्वाभाविक रूप से उसे हिन्दुओं से भी सहानुभूति होनी चाहिये थी किंतु राजपूत स्त्री का पुत्र होते हुए भी फीरोज कट्टर मुसलमान था और उसे हिन्दुओं से घोर घृणा थी। उसने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। वह हिन्दू प्रजा को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित करता था और जो हिन्दू, मुसलमान हो जाते थे उन्हें जजिया से मुक्त कर देता था।

एक ओर तो उसने अपनी प्रजा पर 23 प्रकार के कर हटा लिए किंतु दूसरी ओर उसने ब्राह्मणों पर भी जजिया लगा दिया। एक ओर फीरोज तुगलक मुस्लिम प्रजा को सुखी बनाने का प्रयास कर रहा था किंतु दूसरी ओर वह शिया सम्प्रदाय के मुसलमानों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं करता था। सूफियों को भी वह घृणा की दृष्टि से देखता था।

सुल्तान फीरोजशाह स्वयं को दयालु कहता था इसलिए वह बंगाल में सुन्नी मुस्लिम औरतों का क्रंदन सुनकर जीती हुई बाजी हारकर लौट पड़ा किंतु मार्ग में उसने जाजनगर तथा जगन्नाथ पुरी पर आक्रमण करके हिन्दू सैनिकों की हत्या करने में संकोच नहीं किया।

जाजनगर के राजा ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और प्रतिवर्ष कुछ हाथी भेजने का वचन दिया। फिर भी सुल्तान ने जगन्नाथ मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करवा दिया और मूर्तियों को समुद्र में फिंकवा दिया। जाजनगर जीतने के बाद अनेक सामन्तों तथा भूमिपतियों को नष्ट करता हुआ फीरोज दिल्ली लौटा। उसने नगर कोट के राजा से विपुल धन लेकर भी वहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मारा। इतिहासकारों ने सही लिखा है कि फीरोजशाह तुगलक औरंगजेब की भांति कट्टरपंथी था।

फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु पर कोई रोने वाला नहीं था। जिन मुसलमानों की भलाई के लिए उसने हिन्दुओं पर अत्याचार किए, उन मुसलमानों को भी फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु से कोई फर्क नहीं पड़ा। उसका शव दिल्ली में ही दफना दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्राह्मणों पर अत्याचार करता था फीरोजशाह तुगलक (143)

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ब्राह्मणों पर अत्याचार
ब्राह्मणों पर अत्याचार करता था फीरोजशाह तुगलक

फीरोजशाह तुगलक वैसे तो समस्त हिन्दुओं पर अत्चार करता था किंतु वह ब्राह्मणों पर अत्याचार करने में सभी सीमाएँ लांघ जाता था। उसने ब्राह्मणों पर जजिया लगा दिया तथा एक मूर्तिपूजक ब्राह्मण को लड़की की मुहर के साथ जीवित जला दिया!

फीरोजशाह तुगलक की धर्मांधता ने दिल्ली सल्तनत के शासनतंत्र में कई तरह की विसंगतियां उत्पन्न कर दीं। एक ओर वह मुस्लिम प्रजा को हर अपराध के लिए क्षमा कर रहा था तो दूसरी ओर अन्य धर्मों के लोगों के लिए फीरोजशाह तुगलक में दया और क्षमा का लवलेश भी नहीं था।

जब ई.712 में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के क्षेत्र में इस्लामिक शासन लागू किया था, तब उसने हिन्दुओं से जजिया लेने का नियम बनाया था। मुहम्मद बिन कासिम ने जजिया की तीन दरें स्थापित कीं। वह सम्पन्न वर्ग से 48 दिरहम, मध्यम वर्ग से 24 दिरहम एवं निर्धन वर्ग से 12 दिरहम जजिया लेता था। उसने ब्राह्मणों को जजिया से मुक्त रखा।

एम. एल. राय चौधरी ने लिखा है कि मुहम्मद-बिन कासिम ने ब्राह्मणों को उनकी सेवाओं के प्रत्युत्तर में जजिया से मुक्त कर दिया था। हालांकि चौधरी ने यह नहीं बताया है कि वे सेवाएं कौनसी थीं जिनके बदले में ब्राह्मणों को जजिया से मुक्त रखा गया था!

ऐसा प्रतीत होता है कि मुहम्मद बिन कासिम को आशा थी कि ऐसा करने से ब्राह्मण समुदाय अरबी मुसलमानों के शासकों से सहानुभूति का प्रदर्शन करेगा तथा ब्राह्मण समुदाय का शेष समाज पर प्रभाव होने से भारत में इस्लाम का प्रसार करने में सहायता मिलेगी। यद्यपि जजिया में दी गई छूट से भारत के मुस्लिम शासकों को ब्राह्मण समुदाय की सहानुभूति तो नहीं मिली तथापि ब्राह्मणों को जजिया में दी गई छूट ई.1351 में मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु होने तक जारी रही। इसे ब्राह्मणों का विशेषाधिकार समझा गया।

उलेमा और मौलवी ब्राह्मणों पर भी जजिया लागू करना चाहते थे किंतु दिल्ली के सुल्तान इस व्यवस्था में इस कारण परिवर्तन करने को तैयार नहीं होते थे कि इससे सम्पूर्ण ब्राह्मण समुदाय तुर्की शासन के विरोध में उठ खड़ा होगा तथा अन्य हिन्दू भी उसका साथ देंगे।

इसलिए तुर्की सुल्तान इस विषय पर चुप लगा जाते थे किंतु फीरोजशाह तुगलक मुल्ला-मौलवियों, उलेमाओं, मुफ्तियों और काजियों के दबाव में आ गया और उसने ब्राह्मणों से जजिया लेने के आदेश दिए। इसी के साथ उसके राज्य में ब्राह्मणों पर अत्याचार आरम्भ हो गए।

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सुल्तान के इस आदेश से सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत में हड़कम्प मच गया। दिल्ली के सैंकड़ों ब्राह्मण एकत्रित होकर सुल्तान के समक्ष उपस्थित हुए। उन्होंने जजिया को ब्राह्मणों पर अत्याचार बताया तथा सुल्तान से आग्रह किया कि जो छूट ब्राह्मण समुदाय को सैंकड़ों सालों से मिलती रही है, सुल्तान उसे बंद न करे किंतु सुल्तान ने ब्राह्मणों का अनुरोध स्वीकार नहीं किया तथा उन्हें भगा दिया।

इस पर ब्राह्मणों ने सुल्तान के निवास-स्थल ‘कूश्के शिकार’ पर अनशन आरम्भ कर दिया। उनका विचार सुल्तान के इस आदेश के विरुद्ध भूखे रहकर प्राण त्यागने का था। ब्राह्मणों ने सुल्तान के महल के समक्ष, आत्मदाह करने की भी धमकी दी।

जब दिल्ली के अन्य हिन्दुओं को ब्राह्मणों के इस संकल्प की जानकारी हुई तो उन्होंने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि वे अनशन एवं आत्मदाह नहीं करें, ब्राह्मणों का जजिया भी दिल्ली के अन्य हिन्दू चंदा करके चुका देंगे। फीरोजशाह तुगलक के समय में हिन्दू प्रजा से तीन दरों के अनुसार जजिया लिया जाता था। सम्पन्न वर्ग से 40 टंका, मध्यम वर्ग से 20 टंका तथा निर्धन वर्ग से 10 टंका। तीर्थकर इससे अलग था।

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फीरोजशाह तुगलक के समकालीन लेखक अफ़ीफ़ ने लिखा है कि दिल्ली के समस्त ब्राह्मणों ने एकत्रित होकर सुल्तान से निवेदन किया कि ब्राह्मणों से न्यूनतम दर से जजिया लिया जाए। इस पर सुल्तान ने प्रत्येक ब्राह्मण से पंजाहगानी तथा 10 टंका लेने का आदेश दिया। कहा नहीं जा सकता कि पंजाहगानी से क्या आशय था किंतु अनुमान होता है कि दोनों हथेलियों को जोड़कर उनमें जो धान आता है, उसे पंजाहगानी कहते होंगे। इस प्रकार ब्राह्मणों पर जजिया लागू हो गया। कुछ समय बाद एक और घटना घट गई जिसने ब्राह्मण समुदाय को स्तम्भित कर दिया। यह ब्राह्मणों पर अत्याचार का बहुत ही घिनौना मामला था जो मानवता को शर्मसार करने वाला था। फीरोजशाह तुगलक के समकालीन लेखक अफ़ीफ़ ने इस घटना का उल्लेख अपने ग्रंथ में किया है। वह लिखता है कि सुल्तान को किसी ने बताया कि दिल्ली में एक ऐसा ब्राह्मण रहता है जो खुल्लम-खुल्ला मूर्ति-पूजा करता है। उसने लड़की की एक मुहर बनवाई है जिसके भीतर और बाहर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र बनवाएं हैं। हिन्दू लोग एक निश्चित दिन उसके घर एकत्रित होकर मूर्तिपूजा करते हैं। उस ब्राह्मण ने एक मुस्लिम स्त्री को भी फिर से हिन्दू बना लिया है। इस पर सुल्तान ने आलिमों, सूफियों एवं मुफ्तियों को बुलवाकर उनसे पूछा कि क्या किया जाना चाहिए?

आलिमों, सूफियों एवं मुफ्तियों ने सुल्तान से कहा कि या तो वह ब्राह्मण, मुसलमान बन जाए, अन्यथा उसे जीवित जला दिया जाए।

सुल्तान ने उस ब्राह्मण को फीरोजाबाद बुलवाया। वह ब्राह्मण उस लड़की की प्रतिमा वाली मुहर के साथ सुल्तान के समक्ष उपस्थित हुआ जिसकी कि वह पूजा किया करता था। सुल्तान ने उससे कहा कि या तो वह मुसलमान बन जाए या फिर जलकर मरने के लिए तैयार हो जाए। इस पर वह ब्राह्मण जलकर मरने के लिए तैयार हो गया। सुल्तान के आदेश से संध्या की नमाज के समय उस ब्राह्मण को लड़की की प्रतिमा वाली मुहर के साथ जला दिया गया।

अफ़ीफ़ ने जिसे लड़की की मुहर कहा है, वस्तुतः वह किसी देवी की प्रतिमा वाली मुहर रही होगी तथा उस पर अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां भी रही होंगी। कुछ इतिहासकार फीरोजशाह तुगलक के आदेश से किए गए इस हत्याकाण्ड की तुलना यूरोप में हुए जियोर्डानो ब्रूनो के हत्याकाण्ड से करते हैं।

ब्रूनो को ई.1600 में रोम के पोप ने इसलिए जीवित जलवा दिया था क्योंकि ब्रूनो इसाइयों के उस सिद्धांत को मानने को तैयार नहीं था कि- ‘पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है तथा सूर्य एवं अन्य ग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।’

ब्रूनो का कहना था कि- ‘तारे दूर-दूर स्थित सूर्य ही हैं जिनके अपने ग्रह हैं। ब्रह्माण्ड अनंत है तथा उसका कोई केन्द्र नहीं है ….. ब्रह्माण्ड अनेक हैं।’ ब्रूनो ने ईसाई मत की इस बात को भी गलत बताया कि- ‘पशुओं में आत्मा नहीं होती।’

रोम के कैथोलिक चर्च ने ब्रूनो से कहा कि वह अपने विचारों का पूर्ण परित्याग करके चर्च से क्षमा याचना करे। ब्रूनो ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर 17 फरवरी 1600 के दिन बू्रनो को रोम के मुख्य बाजार में स्थित चौक ‘कैम्पो डे फियोरी’ में नंगा करके सूली पर उलटा लटकाया गया। उस समय उसकी जीभ बंधी हुई थी क्योंकि उसने धर्म के विरुद्ध शैतानियत भरे शब्द उच्चारित किए थे। उसी हालत में ब्रूनो को जीवित जला दिया गया।

जिस समय फीरोजाबाद में मूर्तिपूजक ब्राह्मण को जीवित जलाया गया, उस समय उसकी जीभ बंधी हुई नहीं थी। उस समय सुल्तान अपने साथी मुल्ला-मौलवियों के साथ बैठकर नमाज पढ़ रहा था और कुछ ही दूरी पर जीवित जलता हुआ ब्राह्मण जिबह किए जाते हुए पशु की भांति अदम्य पीड़ा से चिल्ला रहा था। ब्राह्मणों पर अत्याचार के ऐसे घिनौने दृश्य बाद में सिकंदर लोदी तथा औरंगजेब के शासन काल में भी देखने को मिले।

मजहब के नाम पर इंसानों ने पूरी दुनिया में अपने ही जैसे जाने कितने इंसानों को इसी प्रकार आग में झौंककर आने वाली पीढ़ियों को मजहब की अजेयता का पाठ पढ़ाया है। यह किसी एक महजब की बात नहीं है, हर मजहब ने ऐसा कुछ न कुछ अवश्य किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगलक वंश का पतन (144)

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तुगलक वंश का पतन

फीरोजशाह तुगलक के जीवनकाल में ही तुगलक वंश का पतन आरम्भ हो गया था। उसके मरने के बाद तो तुगलक वंश का पतन बड़ी तेजी से हुआ। सल्तनत का वजीर ख्वाजा जहाँ अय्याशी करता रहा और तुगलकों की सल्तनत बिखरती रही।

फीरोजशाह तुगलक की मजहबी संकीर्णता ने दिल्ली सल्तनत के शासनतंत्र में कई तरह की विसंगतियां उत्पन्न कर दीं। एक बार एक सैनिक ने सुल्तान फीरोजशाह से शिकायत की कि सरकारी विभाग के क्लर्क रिश्वत लिए बिना उसके घोड़े पास नहीं कर रहे हैं। इस पर सुल्तान ने उस सैनिक को अपने पास से सोने का एक टंका दिया ताकि वह सरकारी क्लर्क को रिश्वत देकर अपना घोड़ा पास करवा सके।

सुल्तान ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि उसे एक मुस्लिम कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करनी पड़े। इसी प्रकार पूर्व सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की बहिन जो कि खुदाबंदजादा की पत्नी थी और सुल्तान फीरोज तुगलक की चचेरी बहिन थी, ने सुल्तान फीरोज को जान से मारने के लिए षड़यंत्र रचा किंतु फीरोज तुगलक ने अपनी चचेरी बहिन के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की।

एक बार कटेहर के हिन्दू शासक खड़कू ने दो सैयदों की हत्या कर दी। जब यह समाचार सुल्तान फीरोज तुगलक के पास पहुंचा तो फीरोज ने कटेहर पर आक्रमण किया। कटेहर का शासक खड़कू कुमायूं की पहाड़ियों में भाग गया। जब फीरोज ने देखा कि खड़कू को पकड़ना कठिन है तो उसने कटेहर की हिन्दू जनता को दण्डित करने का निश्चय किया। फीरोज की सेना ने 23 हजार हिन्दुओं को पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया।

अगले पांच साल तक हर साल फीरोज तुगलक कटेहर जाता रहा और कटेहर के कुछ लोगों को पकड़कर मुसलमान बनाता रहा ताकि मृत सयैदों की आत्माओं को शांति मिल सके। अंत में मृत सयैदों की आत्माओं ने स्वयं सुल्तान से कहा कि अब वह इस अत्याचार को बंद कर दे।

फीरोज ने सुन्नी मुसलमानों का रक्त न बहाने के नाम पर बंगाल एव सिंध को दिल्ली सल्तनत में शामिल नहीं किया जबकि शियाओं, सूफियों एवं हिन्दुओं पर इतने अत्याचार किए कि मुहम्मद बिन तुगलक की तुलना में फीरोजशाह तुगलक अधिक अत्याचारी सिद्ध हुआ। सुल्तान फीरोजशाह तुगलक 38 वर्ष की लम्बी अवधि तक शासन करता रहा और 80 वर्ष की आयु में मरा। तुगलक वंश का पतन उसके जीवन काल में ही होने लगा था।

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पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्ववर्ती सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने तेलंगाना के एक ब्राह्मण को मुसलमान बनाकर अपने राज्य में नौकरी दी थी। उस ब्राह्मण ने अपना नाम मकबूल रख लिया था। फीरोज तुगलक ने मकबूल को खान-ए-जहाँ की उपाधि देकर उसे अपना प्रधानमंत्री बना लिया था। वह एक योग्य वजीर था किंतु जब सुल्तान उस पर अत्यधिक विश्वास करने लगा तो मकबूल खान-ए-जहाँ ने सल्तनत में अपनी शक्ति बढ़ा ली और सल्तनत की शक्ति मकबूल के हाथों में केन्द्रित हो गई। दिल्ली के वातावरण में मकबूल खान-ए-जहाँ अत्यंत विलासी हो गया तथा उसने अपने हरम में विभिन्न जातियों की दो हजार औरतें जमा कर लीं जिनसे खान-ए-जहाँ को ढेर सारी औलादें उत्पन्न हुईं। खान-ए-जहाँ ने अपने जीवन का अधिक समय इन औरतों के साथ खर्च किया। इस प्रकार वजीर अय्याशी करता रहा और दिल्ली सल्तनत बिखरती रही। आखिर एक दिन मकबूल खान-ए-जहाँ मर गया। इस पर फीरोज तुगलक ने उसके पुत्र को खान-ए-जहाँ की उपाधि देकर सल्तनत का नायब अर्थात् प्रधानमंत्री बना दिया। नया प्रधानमंत्री अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी था। वह सल्तनत पर अधिकार करने की चेष्टा करने लगा। इससे तुगलक वंश का पतन तेजी से हुआ।

इस कारण प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ तथा शहजादे मुहम्मद के बीच शत्रुता हो गई। यह शत्रुता इस कदर बढ़ी कि उन दोनों को ही दिल्ली छोड़कर भाग जाना पड़ा। इस कारण वृद्ध एवं बीमार फीरोजशाह तब तक शासन करता रहा जब तक कि उसकी मृत्यु नहीं हो गई।

गयासुद्दीन तुगलकशाह (द्वितीय)

फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु के उपरान्त उसका पौत्र गियासुद्दीन तुगलकशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। तुगलकशाह, फीरोजशाह तुगलक के मरहूम शहजादे फतेह खाँ का पुत्र था। उसने गयासुद्दीन तुगलकशाह (द्वितीय) की उपाधि धारण की। वह अल्पवयस्क तथा अनुभव-शून्य शासक था। इस कारण गम्भीर परिस्थितियों को संभालने में सक्षम नहीं था।

दिल्ली का तख्त मिलते ही तुगलकशाह आमोद-प्रमोद में मग्न हो गया और शासन का कार्य चापलूस अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया। इस कारण राज्य के योग्य एवं पुराने अमीर सुल्तान गयासुद्दीन तुगलकशाह से असन्तुष्ट हो गए। जब तुगलकशाह ने जफर खाँ के पुत्र अबूबक्र को कारागार में डाल दिया, तब अमीरों ने सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर 19 फरवरी 1389 को सुल्तान तुगलकशाह की हत्या कर दी। तुगलक वंश का पतन अब साफ दिखाई देने लगा था।

अबूबक्र

इस प्रकार गयासुद्दीन तुगलक (द्वितीय) के बाद अबूबक्र दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस पर मरहूम सुल्तान फीरोजशाह तुगलक के छोटे पुत्र मुहम्मद ने अबूबक्र के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया जो फीरोजशाह के जीवनकाल में दिल्ली छोड़कर सिरमूर की पहाड़ियों में भाग गया था। इस संघर्ष में मुहम्मद को सफलता प्राप्त हुई और अबूबक्र मारा गया।

नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह

अबूबक्र के बाद ‘मुहम्मद’ नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। मुहम्मदशाह ने गुजरात को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए सेनापति जफर खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने भेजा। जफर खाँ ने गुजरात पर विजय प्राप्त कर ली तथा वह सुल्तान की ओर से गुजरात पर शासन करने लगा।

नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह ने इटावा तथा अन्य स्थानों के हिन्दुओं के विद्रोहों के दमन किये। यद्यपि सुल्तान इन विद्रोहों को दबाने में सफल रहा परन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने से 15 जनवरी 1394 को उसकी मृत्यु हो गई। वह पांच साल से भी कम समय शासन कर सका। नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह के काल में तुगलक वंश का पतन और अधिक तेजी पकड़ गया।

अल्लाउद्दीन सिकंदरशाह

नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमायूं ‘अल्लाउद्दीन सिकंदरशाह’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा परन्तु तख्त पर बैठने के लगभग 15 माह बाद 8 मार्च 1395 को उसकी मृत्यु हो गई।

नासिरूद्दीन महमूद

अल्लाउद्दीन सिकंदरशाह की मृत्यु के बाद नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह का सबसे छोटा पुत्र ‘महमूद’ नासिरूद्दीन महमूद के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसे चारों ओर से भयानक उपद्रवों का सामना करना पड़ा।

दूरस्थ प्रांतों में हिन्दू सरदार तथा मुसलमान सूबेदार अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे। ख्वाजाजहाँ नामक एक अमीर ने जौनपुर में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। खोखरों ने उत्तर में विद्रोह कर दिया। गुजरात, मालवा तथा खानदेश भी स्वतंत्र हो गए।

तुगलक सुल्तानों की आवाजाही के कारण राजधानी दिल्ली में विभिन्न दलों एवं वर्गों में संघर्ष आरम्भ हो गए जिसके कारण दिल्ली में गृहयुद्ध आरम्भ हो गया। सैद्धांतिक रूप से तुगलक अब भी दिल्ली के शासक थे किंतु स्पष्ट दिखाई देता था कि तुगलक वंश का पतन हो चुका है। उसे भारत के परिदृश्य से अदृश्य होने के लिए जरा से धक्के की आवश्यकता है।

नसरतशाह

मरहूम सुल्तान फीरोजशाह तुगलक का एक पोता नसरत खाँ कुछ अमीरों तथा सरदारों की सहायता से दिल्ली का तख्त प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगा। उसने फीरोजाबाद में स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार नासिरूद्दीन महमूद दिल्ली में तथा नसरतशाह फीरोजाबाद में शासन करने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीरों की अय्याशी (145)

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तुर्की अमीरों की अय्याशी

तुगलक कालीन तुर्की तुर्की अमीरों की अय्याशी देखते ही बनती थी। वे भी सुल्तानों की तरह अपने-अपने दरबार सजाते थे जिनमें वे सल्तनत के शासन के सम्बन्ध में अथवा सल्तनत की समस्याओं के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करने के स्थान पर वेश्याएँ नचाते थे। इस कारण दिल्ली सल्तनत तेजी से बिखरने लगी।

सुल्तान महमूद नासिरूद्दीन के काल में दिल्ली सल्तनत में दो सुल्तान हो गए। मरहूम सुल्तान फीरोजशाह तुगलक का एक पोता महमूद नासिरूद्दीन दिल्ली से तथा फीरोजशाह का एक अन्य पोता फीरोजाबाद से दिल्ली सल्तनत पर शासन करने लगा।

इस प्रकार फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद ई.1388 से लेकर ई.1405 तक गियासुद्दीन तुगलकशाह, अबूबक्र, नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह, अल्लाउद्दीन सिकंदरशाह, महमूद नासिरूद्दीन तथा नुसरतशाह नामक छः सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठ चुके थे। सुल्तानों की इस आवाजाही में तुगलक वंश के शहजादों ने एक दूसरे का जमकर खून बहाया जिसके कारण अब तुगलक वंश के नष्ट होने का समय आ गया था।

जिन दिनों दिल्ली सल्तनत पर दो सुल्तानों का शासन था, उन्हीं दिनों मध्यएशिया से तैमूर लंग जैसे प्रबल आक्रांता ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया। दिल्ली सल्तनत के दोनों सुल्तानों में से किसी में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह तैमूर लंग का सामना करे किंतु जब तैमूर पंजाब से सीधा दिल्ली आ धमका तो नासिरूद्दीन महमूद को तैमूर से युद्ध करना पड़ा किंतु नासिरूद्दीन महमूद हारकर गुजरात भाग गया।

न सुल्तान, न सेना, न वजीर, कोई भी दिल्ली को बचाने वाला नहीं रहा। तैमूर लंग के दिल्ली आक्रमण की चर्चा हम आगे चलकर विस्तार से करेंगे। जब तैमूर लंग दिल्ली को तहस-नहस करके पुनः लौट गया तब नसरतशाह फीरोजाबाद से दिल्ली आ गया और अपना दरबार दिल्ली में लगाने लगा। तुर्की अमीरों की अय्याशी तुर्की अमीरों की अय्याशी पूर्ववत् चलती रही।

कुछ ही समय बाद दिल्ली के पुराने सुल्तान महमूद नासिरूद्दीन के मन्त्री मल्लू खाँ ने नसरतशाह को दिल्ली से मार भगाया। इस पर सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद फिर से दिल्ली लौट आया और अय्याशियों में डूब गया किंतु मल्लू खाँ ने उसे भी दिल्ली में नहीं टिकने दिया। इस पर नासिरूद्दीन महमूद कन्नौज चला गया और वहीं अपना दरबार लगाने लगा।

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ई.1405 में मल्लू खाँ मुल्तान के सूबेदार खिज्र खाँ से युद्ध करता हुआ मारा गया। इस पर नासिरूद्दीन महमूद फिर से दिल्ली आ गया। इस बार भी उसने शासन पर ध्यान देने की बजाय अय्याशियों में डूबे रहना अधिक उचित समझा। सुल्तान के साथ-साथ तुर्की अमीरों की अय्याशी आग में घी का काम करती थी। इस कारण ई.1412 में दौलत खाँ नामक एक अमीर ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष अर्थात् ई.1412 में सुल्तान महमूद नासिरूद्दीन की मृत्यु हो गई। उसके साथ ही तुगलक वंश का अन्त हो गया।

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि तुगलक साम्राज्य की विशालता उसके विनाश का कारण बनी। संचार तथा यातायात के साधनों के अभाव में इतनी विशाल सल्तनत को अपने अधीन रख पाना संभव नहीं था। वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण विजय से दिल्ली सल्तनत को लाभ के स्थान पर हानि ही हुई। इससे सुल्तान के सैनिक उत्तरदायित्व तथा व्यय में वृद्धि हो गई।

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सुल्तानों का प्रायः दक्षिण अभियान पर जाना उत्तर के लिए घातक सिद्ध हो जाता था। जब सुल्तान दिल्ली में रहता था तब दक्षिण में अशांति फैल जाती थी और जब वह दक्षिण में रहता था तब दिल्ली में अशांति फैल जाती थी। तुगलकों की सल्तनत, पूर्ववर्ती शासक वंशों की भांति, सैनिक शक्ति के आधार पर खड़ी की गई थी। ऐसा शासन तब तक ही स्थायी रहता है जब तक शासक की भुजाओं में बल होता है। विद्रोही तत्त्व सेना के ही बल पर ऐसे शासन को उखाड़ फैंकते हैं। फीरोजशाह तुगलक के अयोग्य वंशज सैनिक शक्ति के बल पर इतनी बड़ी सल्तनत को अपने अधिकार में नहीं रख सकते थे। उसका नष्ट हो जाना अवश्यम्भावी था। सुल्तानों की हत्याओं ने तुगलकवंश के विनाश में बड़ी भूमिका निभाई थी। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों की हत्याओं का यह खूनी खेल ई.1192 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना से ही आरम्भ हो गया था। इसका मुख्य कारण यह था कि तुर्कों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। इसलिए प्रायः प्रत्येक सुल्तान को अपने शासन के आरम्भ से लेकर अंत तक षड्यंत्रों, कुचक्रों, विद्रोहों तथा प्रतिद्वन्द्वियों का सामना करना पड़ता था। इन षड्यंत्रों, कुचक्रों और विद्रोहों की समाप्ति प्रायः सुल्तान की हत्या से होती थी।

इस परम्परा के कारण सुल्तान के दरबार में राजनैतिक दलबन्दियों का बोलबाला रहता था और प्रत्येक दल, दुर्बल शहजादों को तख्त पर बैठाकर उन्हें कठपुतली की भांति नचाता था।

जब कभी इल्तुतमिश, बलबन, अल्लाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक और फीरोज तुगलक जैसे सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठने में सफल रहते थे, तब सुल्तानों एवं शहजादों की हत्याओं का सिलसिला कुछ समय के लिए रुक जाता था किंतु फिर भी कोई राजवंश दिल्ली के तख्त पर लम्बे समय तक अधिकार जमाए रखने में सफल नहीं हुआ था। ऐसी दशा में तुगलक वंश का भी नष्ट हो जाना स्वाभाविक था।

तुगलक वंश के विनाश में प्रांतीय सूबेदारों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। विभिन्न सूबों के पदाधिकारी तथा सेनापति स्वार्थी एवं महत्त्वाकांक्षी थे। अवसर पाते ही विद्रोह करके वे अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना का सपना देखते थे। जनता में भी सुल्तान तथा शासक वंश के प्रति निष्ठा नहीं थी। इसलिए जनता भी प्रायः विद्रोह का झण्डा उठाए रखती थी।

किसी भी सुल्तान द्वारा सल्तनत को सुदृढ़ तथा सुसंगठित इकाई बनाने का प्रयास नहीं किया गया था। शासन में एकरूपता, दृढ़ता तथा संगठन का सर्वथा अभाव था। प्रान्तीय शासकों को व्यापक अधिकार प्राप्त थे। वास्तव में तुगलक सल्तनत, अर्द्धस्वतंत्र राज्यों का एक असम्बद्ध सा संघ बनकर रह गया था। केन्द्र सरकार का सल्तनत के विभिन्न भागों पर दृढ़ता से नियंत्रण नहीं था। इससे विघटनकारी प्रवृत्तियां सदैव क्रियाशील रहती थीं।

दिल्ली सल्तनत में शासन का संचालन तुर्क तथा विदेशी अमीरों द्वारा होता था। इन लोगों को भारतीयों की आशा, अभिलाषा तथा आकांक्षाओं के साथ कोई सहानुभूति नहीं थी। उन्होंने स्वयं को विजेता समझा। वे भारतीय मुसलमानों को दोयम दर्जे का समझते थे और हिन्दू जनता के साथ पराजितों का सा व्यवहार करते थे। तुगलक कालीन तुर्की अमीरों की अय्याशी ने तुगलक वंश को दीमक की तरह चाट कर खोखला कर दिया!

इस कारण शासन में चलने वाले षड़यंत्रों एवं परिवर्तनों से बहुसंख्यक जनता विमुख रहती थी। सुल्तान को संकट काल में जनता से कोई सहायता नहीं मिलती थी। इस कारण फीरोज तुगलक के बाद तुगलक वंश बड़ी आसानी से नष्ट हो गया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुओं को शासन से दूर रखने के कारण तुर्की सुल्तान, हिन्दुओं की उस प्रतिभा के उपयोग से वंचित रह गए जिसका सदुपयोग करके सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने भारत में एक प्रबल मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगलक शासकों की कमजोरियाँ (146)

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तुगलक शासकों की कमजोरियाँ

तुगलक शासकों की कमजोरियाँ तुगलक वंश के पतन का सबसे बड़ा कारण बनीं। तुगलकों से पहले किसी भी मुस्लिम राजवंश ने भारत में इतने बड़े क्षेत्र पर शासन नहीं किया था। यह एक आश्चर्य की ही बात है कि तुगलक वंश के अनेक सुल्तानों में से केवल मुहम्मद बिन तुगलक ही शासन करने का वास्तविक अर्थ समझता था किंतु वह भी जनता को अच्छा शासन देने में बुरी तरह विफल रहा।

तुर्की अमीरों की परम्परागत कमजोरियों एवं षड़यंत्रकारी राजनीतिक आदतों ने न तो किसी भी तुर्की राजवंश को अधिक समय तक दिल्ली के तख्त पर टिके रहने दिया और न कोई तुर्की सुल्तान चैन से सांस ले पाया। इसी कारण ई.1320 में जिस तुगलक वंश का दिल्ली के तख्त पर अवतरण हुआ था वह ई.1412 में ही रक्त के समुद्र में डूब गया।

उस काल के भारतीय मुसलमानों में कुलीय उच्चता का अभाव था जबकि तुर्की अमीर स्वयं को भारतीय अमीरों से बड़ा समझते थे। उलेमा अपने आप को अमीरों से भी बड़ा समझते थे। अरब से आए हुए सयैद आदि कबीलों के लोग स्वयं को सुल्तानों से भी बड़ा समझते थे। ये सब बातें तुगलक शासकों की कमजोरियाँ बढ़ाती थीं।

हालांकि तुगलक शासकों की कमजोरियाँ अपने पूर्ववर्ती तुर्क गुलामों के शासन से अलग नहीं थीं। तुर्कों के विभिन्न कबीले भी एक दूसरे को द्वेष की दृष्टि से देखते थे। कोई अफगानी था तो कोई ईरानी, कोई खिलजी था तो कोई तुगलक, कोई चगताई था तो कोई मंगोल। इन कारणों से दरबार में भिन्न-भिन्न अमीरों एवं उलेमाओं में घात-प्रतिघात चलते रहते थे जिन्होंने एक-एक करके इल्बरी वंश, बलबनी वंश, खिलजी वंश एवं तुगलक वंश का नाश कर दिया।

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिनों से ही दिल्ली सल्तनत में योग्य सेनापतियों तथा मन्त्रियों का अभाव हो गया था। यद्यपि मुहम्मद बिन तुगलक ने विदेशी अमीरों में से योग्य व्यक्तियों को चुनना आरम्भ किया था परन्तु इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ, क्योंकि विदेशी अमीर धोखेबाज थे और देशी अमीर स्वयं को अपमानित अनुभव करते थे। फीरोजशाह तुगलक के समय में योग्य सेनापति तथा मंत्री नहीं मिले। इसलिए दिल्ली सल्तनत को बार-बार छिन्न-भिन्न होने से बचाने वाला कोई व्यक्ति नहीं था।

गाजी तुगलक के समय से ही तुगलक वंश में पिता अपने पुत्रों को और पुत्र अपने पिता को शंका की दृष्टि से देखने लग गए थे और एक दूसरे की हत्या करने का षड़यंत्र रचते थे। यहाँ तक कि फीरोजशाह तुगलक भी अपने पुत्रों को शंकित दृष्टि से देखता था। इन हत्याओं एवं षड़यंत्रों के कारण तुगलक शासकों की कमजोरियाँ जनता के सामने आ गईं तथा तुगलक वंश की इमारत दुर्बल हो गई।

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दिल्ली सल्तनत की सेना में जो कौशल, योग्यता, साहस तथा शक्ति कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया, बलबन तथा अल्लाउद्दीन खिलजी के समय में थी, वह तुगलक सुल्तानों के समय में नहीं रह गई। सैनिक शक्ति के क्षीण हो जाने से तुगलक वंश पतनोन्मुख हो गया। उसमें न तो आन्तरिक विद्रोहों को दबाने की क्षमता रह गई और न विदेशी आक्रमणों से सल्तनत की रक्षा करने की।

इन दिनों मुसलमान अमीरों का नैतिक पतन अपने चरम पर था। उनमें औरतों एवं हिंजड़ों को राजदरबार में नचाने की प्रवृत्ति जोरों पर थी। वे तीतर-बटेर और मुर्गे लड़ाते थे। कबूतर पालने में समय खर्च करते थे। वेश्यावृत्ति तथा लौण्डेबाजी में प्रवृत्त रहते थे। शराब तथा रिश्वत का बोलबाला था। निरंतर विलासिता में लगे रहने से तुर्की अमीरों में अपने पूर्वजों जैसा पौरुष तथा साहस नहीं बचा था। इस कारण उनका पतन अवश्यम्भावी था।

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दिल्ली के सुल्तानों ने हिन्दुओं को सदैव निर्बल बनाने का प्रयत्न किया परन्तु हिन्दू अपनी विनष्ट स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त करने का सदैव प्रयत्न करते रहे। जब कभी हिन्दू अवसर पाते थे, विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे। हिन्दुओं को राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक तीनों प्रकार की असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। ऐसी दशा में उनके द्वारा सल्तनत की जड़ें खोदने का प्रयास करना स्वाभाविक ही था। सल्तनत को सुदृढ़ तथा सुव्यवस्थित रखने के लिए धन की आवश्यकता होती है परन्तु अल्पकालीन सुल्तान खुसरोशाह परवारी के युद्ध, मुहम्मद तुगलक की योजनाओं की विफलता तथा दुर्भिक्ष के कारण राजकोष रिक्त हो गया था। ऐसी दशा में सल्तनत का सरकारी तंत्र शिथिल होने लगा और ऐसी स्थिति में राज्य का पतन अवश्यम्भावी था। हालांकि तुगलक वंश के कुल नौ सुल्तानों ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया किंतु इनमें से गयासुद्दीन तुगलक, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोज तुगलक ही उल्लेखनीय हैं। शेष छः सुल्तानों के नाम केवल इतिहास की पुस्तकों में सिमटकर रह गये हैं, जनमानस में उनका अवशेष मात्र भी शेष नहीं है। तुगलक वंश के समस्त नौ शासक इस वंश की लुटिया डुबोने के लिए न्यूनाधिक जिम्मेदार हैं।

गाजी तुगलक अथवा गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुराने स्वामी को भारतीय मुसलमान होने के कारण नष्ट किया था। इस कारण भारतीय मुस्लिम अमीर, तुगलकों के शासन से रुष्ट ही रहे और सल्तनत की शक्ति पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई रही। यही कारण था कि गाजी तुगलक का पुत्र जूना खाँ अर्थात् मुहम्मद बिन तुगलक बड़ी आसानी से सुल्तान गाजी तुगलक अर्थात् गयासुद्दीन तुगलक को मारकर दिल्ली के तख्त पर बैठने में सफल रहा।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की असफलताओं का तुगलक वंश के पतन में बड़ा योगदान था। भारतीय प्रजा पहले से ही तुगलक वंश को घृणा से देखती थी। मुहम्मद तुगलक की योजनाओं की विफलता से जनता की अवशिष्ट श्रद्धा तथा सहानुभूति भी समाप्त हो गई। तुगलकों के विरुद्ध चारों ओर असंतोष और विद्रोह की अग्नि भड़कने लगी।

मुहम्मद बिन तुगलक अत्यंत छोटे-छोटे अपराधों के लिए मृत्युदण्ड तथा अंग-भंग करने के दण्ड देता था। इससे तुगलकों के शत्रुओं की संख्या अधिक हो गई। उसकी इस क्रूर नीति के कारण मित्र भी उससे सशंकित रहने लगे और साम्राज्य की सेवा की ओर से विमुख हो गए। सुल्तान की कठोर नीति के कारण ही विदेशी अमीरों ने उसके विरुद्ध दक्षिण भारत में प्रबल संगठन बना लिया जिसे छिन्न-भिन्न करना सुल्तान के लिए असम्भव हो गया।

जब मुहम्मद बिन तुगलक ने देखा कि देशी अमीरों का पतन हो गया और उनमें योग्यता का अभाव है तब उसने उन योग्य विदेशी अमीरों को राज्य में ऊँचे पद देना आरम्भ किया जो सुल्तान की उदारता से आकृष्ट होकर मध्य-एशिया तथा ईरान से आकर उसके दरबार में रह रहे थे। इससे दरबार में हमेशा के लिए दो विरोधी दल खड़े हो गए।

चौदहवीं शताब्दी की परिस्थितियों में शासन करने के लिए एक दृढ़-प्रतिज्ञ तथा कठोर शासक की आवश्यकता थी परन्तु मुहम्मद बिन तुगलक का उत्तराधिकारी फीरोजशाह अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति बड़ा उदार था। उसमें न महत्त्वाकांक्षाएं थीं और न युद्ध-प्रवृत्ति। उसकी उदारता का लोगों ने बड़ा दुरुपयोग किया जिससे शासन की कड़ियां शिथिल पड़ गईं।

सरकारी कर्मचारियों तथा सैनिकों में भ्रष्टाचार एवं घूसखोरी फैल गई। इससे शासन व्यवस्था खोखली पड़ गई और सल्तनत दु्रतगति से पतनोन्मुख हो गई। फीरोज धर्मान्ध था और मुसलमानों का अत्यधिक पक्ष लेता था। हिन्दू प्रजा को उसने कोई अधिकार नहीं दिए। इन बातों के परिणाम अच्छे नहीं हुए।

फीरोज तुगलक राजनीति को धर्म से अलग नहीं कर सका। वह कठमुल्लों तथा मुफ्तियों से प्रभावित रहता था। फीरोज के धार्मिक पक्षपात का राज्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। इससे हिन्दुओं में बड़ा असंतोष फैला और ऐसी प्रतिक्रिया आरम्भ हुई जिसका परिणाम तुगलक वंश के लिए अच्छा नहीं हुआ। मजहबी कट्टरता तुगलक शासकों की कमजोरियाँ बढ़ाने वाली थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तैमूर लंग ने भटनेर में दस हजार हिन्दुओं को मार डाला (147)

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तैमूर लंग ने भटनेर में दस हजार हिन्दुओं को मार डाला

तैमूर लंग को ज्ञात था कि दिल्ली का तुगलक वंश अत्यन्त दुर्बल है जिसके कारण भारत में राजनीतिक अराजकता तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप है। तैमूर लंग भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था। साथ ही वह भारत की समृद्धि से भी अवगत था और भारत की अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था।

तुगलक सुल्तानों की अदूरदर्शिता के कारण दिल्ली सल्तनत पतन के गर्त में चली गई तथा तुगलक वंश का विनाश हो गया। तुगलक वंश के नष्ट हो जाने में तैमूर लंग के आक्रमण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

तैमूर लंग का जन्म ई.1336 में मध्यएशिया में समरकंद से 50 मील दूर मावरा उन्नहर प्रांत के ‘कैच’ नगर में हुआ था। उसके पिता का नाम अमीर तुर्क अथवा अमीर तुर्गे था जो तुर्कों के बरलस कबीले की गुरकन शाखा का नायक था। इस कबीले को तुर्को-मंगोल कबीला भी कहा जाता था क्योंकि इस कबीले के लोगों में तुर्कों एवं मंगोलों के रक्त का मिश्रण हुआ था।

अमीर तुर्गे ने तैमूर की शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था की। तैमूर ने कुरान के अध्ययन के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा युद्धकला में महारथ हासिल कर ली। अल्पआयु में ही वह एक छोटे भूभाग का शासक बना दिया गया।

तैमूर लंग ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि उसका हृदय बारह या चौदह वर्ष की आयु से ही स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत हो गया था। एक तुर्की सामन्त का पुत्र होने के कारण तैमूर लंग परम्परागत रूप से चगताई वंश के सरदार के अधीन था। संयोग से तैमूर तथा उसके स्वामी में अनबन हो गई।

फलतः तैमूर को कई तरह की यातनाएं सहन करनी पड़ीं और उसे सुरक्षित स्थान की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। एक बार जब शत्रु उसका पीछा कर रहे थे, तब तैमूर की एक टांग टूट गई और वह लंगड़ा हो गया, तभी से वह तैमूर लंग कहलाने लगा।

ई.1369 में 33 वर्ष की अवस्था में तैमूर को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो गई। ई.1370 में उसने तुर्क सरदारों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें तुर्क सरदारों ने तैमूर लंग को अपना सरदार चुन लिया। ई.1370 में तैमूर ने समरकंद पर अधिकार कर लिया और वहाँ का शासक बन गया।

समरकंद हाथ में आते ही तैमूर ने अपने राज्य को विशाल सल्तनत में बदलने का निर्णय लिया। कुछ ही समय में उसने ख्वारिज्म, फारस, मेसोपोटामिया आदि कई ऐतिहासिक देशों पर विजय प्राप्त कर ली और उसका साम्राज्य चंगेज खाँ के साम्राज्य जितना विस्तृत हो गया। इसके बाद तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

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‘जफरनामा’ में तैमूर लंग द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने के कारणों का उल्लेख किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि सिक्ख-गुरु गोविंदसिंह ने ई.1706 में औरंगजेब को फारसी भाषा में एक विस्तृत पत्र लिखा था, जिसे जफरनामा कहा जाता है। इसका हिन्दी में अर्थ होता है- ‘विजयपत्र’। इस पत्र में इतिहास की कुछ घटनाओं का प्रसंगवश उल्लेख हुआ है।

जफरनामा कहता है- ‘तैमूर लंग ने कुरान का अच्छा अध्ययन किया था। वह इस्लाम को भारत में फैलाने के लिए, भारत पर आक्रमण करने की योजनाएं बनाने लगा। वह भारत पर विजय प्राप्त करके काफिरों का नाश करना और इस्लामिक जगत में अपना नाम कमाना चाहता था। वह मूर्ति-पूजकों पर विजय प्राप्त करके गाजी की उपाधि प्राप्त करना चाहता था।’

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तैमूर लंग को ज्ञात था कि दिल्ली का तुगलक वंश अत्यन्त दुर्बल है जिसके कारण भारत में राजनीतिक अराजकता तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप है। तैमूर लंग भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था। साथ ही वह भारत की समृद्धि से भी अवगत था और भारत की अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था। उन दिनों मुल्तान के शासक सारंग खाँ तथा तैमूर के पोते पीर मोहम्मद में संघर्ष चल रहा था। पीर मोहम्मद काबुल का गर्वनर था। उसने सारंग खाँ से ‘कर’ मांगा किंतु सारंग खाँ ने कर देने से इन्कार कर दिया। इस पर पीर मोहम्मद ने मुल्तान पर आक्रमण किया। पीर मुहम्मद ने सिन्धु नदी को पार करके छः माह में उच्च तथा मुल्तान पर अधिकार कर लिया। अपने पोते पीर मुहम्मद की इस सफलता ने भी तैमूर लंग को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। तैमूर ने अप्रैल 1398 में 92,000 घुड़सवार सेना के साथ समरकन्द से प्रस्थान किया और सितम्बर 1398 में सिंधु नदी को पार करके मुल्तान पहुंच गया। जब तक तैमूर मुल्तान पहुंचता, तब तक तैमूर के पोते पीर मोहम्मद ने मुल्तान से आगे बढ़कर सिंध के पश्चिमी भाग को रौंद कर उस पर अधिकार कर लिया।

तैमूर ने मुल्तान से चलकर लाहौर पर आक्रमण किया तथा लाहौर के गर्वनर मुबारक खाँ को हरा दिया। चिनाब नदी के पास पीर मोहम्मद तथा तैमूर लंग की सेनाएं एक दूसरे से आ मिलीं। यहाँ से यह सम्मिलित सेना तुलुम्बा की ओर बढ़ी। उसने तुलुम्बा के शासक जसरथ को परास्त किया जो कि खोखरों का सरदार था। इसके बाद तैमूर लंग पाक-पतन, दीपालपुर तथा अजोधन आदि नगरों को लूटता हुआ पानीपत के मार्ग से भटनेर की ओर बढ़ा।

इस समय राव दुलीचंद भटनेर का शासक था। भटनेर दुर्ग के चारों ओर भटनेर नगर बसा हुआ था जिसके चारों ओर मिट्टी की ईंटों का एक ऊंचा परकोटा बना हुआ था। दीपालपुर तथा अजोधन आदि के सैंकड़ों लोग भागकर भटनेर नगर में शरण लिए हुए थे। जब तैमूर लंग ने भटनेर की प्राचीर पर आक्रमण किया तो भटनेर के लोगों ने भटनेर की सेना के साथ मिलकर तैमूर लंग का मार्ग रोका। कुछ ही दिनों में भटनेर की नगर-प्राचीर टूट गई तथा हिन्दू सैनिकों ने नगर की प्राचीर छोड़कर भटनेर के किले में मोर्चा संभाला।

जब राव दुलीचंद की सेना किले को बचाने में असमर्थ सिद्ध होने लगी तो राव दुलीचंद ने अपने पुत्र को तैमूर से संधि करने के लिए भेजा। 9 नवम्बर 1398 को राव दुलीचंद का पुत्र तैमूर के समक्ष उपस्थित हुआ। तैमूर ने संधि करने से मना कर दिया। इस पर राव दुलीचंद का पुत्र दुर्ग में लौट आया। तैमूर लंग ने दुर्ग पर हमले तेज कर दिये तथा भटनेर नगर के लोगों की हत्याएं करनी आरम्भ कर दीं।

राव दुलीचंद का एक भाई पूर्व में ही मुसलमान बना लिया गया था। उसका असली नाम तो अब ज्ञात नहीं है किंतु मुसलमान बनने के बाद उसे कमालुद्दीन कहा जाता था। वह भी इस घेरे में अपने भाई दुलीचंद की तरफ से लड़ रहा था किंतु जब तैमूर की सेनाएं किले पर हावी होने लगीं तो कमालुद्दीन ने तैमूर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा तैमूर के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि वह अपने कुछ लोगों को किले में भेज दे ताकि उन्हें अमानी का धन दिया जा सके। अमानी के धन का तात्पर्य उस धन से है जो पराजित राजा और प्रजा की जान बख्शने के लिए विजेता शत्रु को समर्पित की जाती थी।

जब तैमूर लंग के आदमी अमानी का धन लेने किले के भीतर गए तो किले में रह रहे लोगों ने अमानी का धन देने से मना कर दिया। जब तैमूर के आदमी किले से खाली हाथ लौट आए तो तैमूर क्रोध से भर गया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वे किले को तोड़ डालें।

इस पर तैमूर के सैनिक रस्सियों तथा सीढ़ियों की सहायता से दुर्ग की दीवारों पर चढ़ने लगे। किले के भीतर रह रहे लोगों ने अपने बच्चों एवं स्त्रियों को घरों में बंद करके उनमें आग लगा दी तथा युद्ध के लिए तैयार हो गए।

‘ मुलफुजात ए तैमूरी एवं ‘जफरनामा’ में लिखा है कि छः दिन तक चले भयानक संघर्ष में दस हजार हिन्दू मारे गए। तैमूर की सेना को दुर्ग से विपुल अन्न, धन एवं वस्त्र प्राप्त हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी तैमूर लंग ने (148)

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एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी तैमूर लंग ने

तैमूर लंग ने एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी जाए।

तैमूर लंग की सेना ने भटनेर के किले पर अधिकार करके दस हजार हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद वह सरस्वती नामक नगर पर चढ़ बैठा। इस कुछ ग्रंथों में ‘सरसुति’ भी कहा गया है। वहाँ तैमूर ने कई हजार हिन्दुओं को पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया। इसके बाद वह फतेहाबाद, अहरोनी, कैथल तथा पानीपत होते हुए लोनी की तरफ बढ़ा।

10 दिसम्बर 1398 को तैमूर लंग ने यमुना नदी पार की तथा वह लोनी में घुस गया। उन दिनों मैमून नामक एक हिन्दू सरदार लोनी के किले का शासक था। तैमूर ने उसके समक्ष प्रस्ताव भेजा कि यदि वह आत्मसमर्पण कर दे तो उसके प्राण बक्श दिए जाएंगे किंतु मैमून ने लड़ते हुए मरने को श्रेयस्कर समझा।

तैमूर ने किले के चारों ओर सुरंगें खुदवा दीं। इस पर किले के भीतर रह रहे लोगों ने अपने परिवारों के सदस्यों को जीवित ही अग्नि में जला दिया और स्वयं भी तलवारें हाथ में लेकर मरने-मारने को तैयार हो गए। 11 दिसम्बर 1398 को तैमूर ने लोनी के किले पर विजय प्राप्त कर ली तथा किले में मौजूद प्रत्येक हिन्दू को तलवार के घाट उतार दिया। इसके बाद तैमूर ने किले में आग लगवा दी।

अब तैमूर लंग दिल्ली की ओर बढ़ा। तैमूर की दृष्टि में यह उसके जीवन का निर्णायक युद्ध होने वाला था। वह भविष्य की आशंका से भयभीत था। दिल्ली की प्रबल सेना के समक्ष उसकी सेना चींटी की तरह मसली जा सकती थी।

इसलिए जब तैमूर दिल्ली के निकट पहुंचा तो उसने अपनी सेना को दिल्ली के बाहर ही पड़ाव डालने का आदेश दिया ताकि दिल्ली पर आक्रमण करने की तैयारी की जा सके। तैमूर लंग को अनुमान था कि तुगलकों की विशाल सेना के रहते दिल्ली में घुसना आसान नहीं होगा।

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इस समय तक तैमूर लंग ने भारत के एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि समस्त हिन्दू-बंदियों का कत्ल कर दिया जाये।

‘मुलफुजात ए तैमूरी’ के हवाले से इलियट ने लिखा है- ‘तैमूर को संदेह था कि यदि दिल्ली की सेना से होने वाले युद्ध में तैमूर की पराजय हो जाती तो तैमूर के शिविर में बंदी बनाकर रखे गए एक लाख हिन्दू, तैमूर की पराजय का समाचार सुनकर ही अपने बंधन तोड़ देते, हमारे डेरों को लूट लेते और शत्रु से जा मिलते। इस प्रकार उनकी संख्या और शक्ति बढ़ जाती।’

मध्यएशिया से आए बर्बर तुर्कों ने तैमूर के आदेश पर एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी गई। एक लाख निर्दोष एवं निरीह हिन्दुओं के सिर काटकर यमुनाजी में फैंक दिए गए जिससे यमुनाजी का जल लाल हो गया। हजारों शव यमुनाजी के तट पर बिखर गए, जिन पर कई महीनों तक गिद्ध एवं चील आदि मांसभोजी पक्षी मण्डराया करते थे। इन एक लाख लोगों की तैमूर लंग से कोई शत्रुता नहीं थी, वे हाथों में हथियार लेकर तैमूर की सेना से लड़ने के लिए नहीं आए थे।

मार डाले गए हिन्दुओं का अपराध केवल इतना था कि वे शांति-प्रिय थे और उन्हें लड़ना नहीं आता था। वे किसान थे, जुलाहे थे, पशुपालक थे, कुम्हार, लुहार और सुथार थे, व्यापारी थे, पोथीधारी ब्राह्मण थे। वे अपना-अपना काम करके पेट भरते थे, किसी को लूटने, लड़ने-मारने के लिए कहीं नहीं जाते थे।

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जैसे जंगल में भूखा शेर निरीह हिरणों का शिकार किया करता है, वैसे ही मध्यएशिया से आए बर्बर और खूनी लड़ाकों ने भारत के इन निरीह लोगों को काट डाला। शांति पाने की आशा करना मानव-मन की सबसे श्रेष्ठ इच्छा है किंतु प्रकृति का विधान ऐसा है कि केवल शांति की आशा पालने से शांति नहीं मिलती, उसके लिए मूल्य चुकाना पड़ता है। जो समुदाय अपने देश, अपने समाज तथा मानव-मूल्यों के लिए संघर्ष नहीं करता, उसे जीने का अधिकार नहीं मिलता। उसे शांति नहीं मिलती। ये निरीह लोग जिनके शव काटकर यमुनाजी में बहा दिए गए थे अथवा जंगल में पड़े सड़ रहे थे, शांति के आकांक्षी थे किंतु शांति कैसे मिलती है, उसकी प्रक्रिया से परिचित नहीं थे। भारत के लोगों ने सदियों से केवल इतना ही सीखा था कि हर व्यक्ति के लिए एक अलग काम होता है। युद्ध करना क्षत्रियों का काम है, किसानों, जुलाहों, लुहारों, सुथारों, व्यापारियों, ब्राह्मणों एवं चरवाहों को युद्ध से भला क्या काम है? यह नीति तब तक तो ठीक थी, जब तक कि भारत के ही क्षत्रिय राजा परस्पर लड़ते थे। वे एक दूसरे के महलों, किलों, सोने के सिक्कों एवं दासियों को छीनते थे किंतु जब मध्यएशिया के आक्रांताओं ने भारतीय राजाओं के साथ-साथ भारतीय प्रजा को भी अपने निशाने पर लिया, तब शांति की यह नीति अप्रासंगिक हो गई।

इस काल में आवश्यकता इस बात की थी कि हिन्दूकुश पर्वत से लेकर यमुनाजी के तट तक विस्तृत हरे-भरे मैदानों में रहने वाले लोग हाथों में हथियार लेकर लड़ते किंतु उन्हें युद्ध हेतु तत्पर करने के लिए किसी प्रबल नेतृत्व की आवश्यकता थी किंतु भारत के तत्कालीन शासकों में इतनी योग्यता नहीं थी कि वे जनता का नेतृत्व कर सकें।

वे तो जनता को भेड़-बकरियों की तरह हांकना जानते थे, यही कारण था कि उस काल की जनता भेड़-बकरियों की तरह व्यवहार करती थी और अपनी गर्दन शत्रु की तलवार के नीचे धर देती थी। यही कारण था कि तैमूर लंग के सिपाहियों ने भारत के एक लाख मनुष्यों को भेड़-बकरियों की तरह ही काट डाला था। एक लाख हिन्दुओं की हत्या करके भी उनके मन से काफिरों के प्रति घृणा का भाव नहीं गया।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि 18 दिसम्बर 1398 को तैमूर लंग तथा दिल्ली की सेना के बीच संघर्ष हुआ। दिल्ली की सेना में 10 हजार अश्वारोही, 40 हजार पैदल सिपाही तथा 125 हाथी थे। इस युद्ध में दिल्ली की सेना आसानी से परास्त हुई तथा भाग खड़ी हुई।

जब दिल्ली की सेना भाग खड़ी हुई तो तुगलक सुल्तान, सेनापति एवं प्रधानमंत्री शतरंज के मोहरों की तरह बेजान होकर रह गए। अब उन्हें भी भागने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझा। वे भी सिर पर पैर रखकर चोरों की तरह अलग-अलग दिशाओं में भाग गए। उन्हें भय था कि कहीं तैमूर के सिपाही उन्हें देख न लें किंतु तैमूर तो इस घटना पर स्वयं हैरान था।

उसने इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी, इसलिए वह अपनी सेना को इन भगोड़ों के पीछे नहीं दौड़ा सका। संभवतः उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। जब तुगलक दिल्ली छोड़कर ही भाग रहे थे, तब इस बात से क्या अंतर पड़ता था कि वे जियें या मरें!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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