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नहुष को श्राप देकर महर्षि अगस्त्य ने इन्द्र को पुनः देवराज बना दिया (7)

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नहुष को श्राप - www.bharatkaitihas.com
नहुष को श्राप

राजा नहुष अपने पुण्यकर्मों के संचय के कारण इंद्रलोक का स्वामी बन गया किंतु जब उसने अनाचार करके देवताओं को भयभीत कर दिया, तब महर्षि अगस्त्य ने नहुष को श्राप देकर अजगर बना दिया।

भगवान विष्णु द्वारा इंद्र की पाप-मुक्ति का उपाय बताने पर देवताओं एवं ऋषियों ने इंद्र को तीनों लोकों में ढूंढना आरम्भ किया। अंत में वह समुद्र के भीतर छिपा हुआ मिला। समस्त देवताओं एवं ऋषियों ने इन्द्र को घेर लिया तथा उससे अनुरोध किया कि वह अश्वमेध यज्ञ करके भगवान विष्णु का पूजन करे जिससे वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाएगा तथा उसे शची एवं स्वर्ग सहित सम्पूर्ण वैभव पुनः मिल जाएगा।

ऋषियों एवं देवताओं के परामर्श से देवराज इन्द्र ने अश्वमेध का आयोजन किया। ऋषियों ने ब्रह्महत्या को विभक्त करके वृक्ष, नदी, पर्वत, पृथ्वी और स्त्रियों में बांट दिया। इससे इन्द्र निष्पाप एवं निःशोक हो गया तथा वह समस्त देवताओं एवं ऋषियों को लेकर स्वर्ग लोक पहुंचा ताकि नहुष से स्वर्ग ले सके किंतु इन्द्र यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि नहुष समस्त देवताओं एवं ऋषियों का तेज हरण करके अत्यंत शक्तिशाली हो गया है। ऐसी स्थिति में इन्द्र के लिए यह संभव नहीं रहा कि वह नहुष को परास्त करके स्वर्गलोक पर अधिकार कर ले। अतः वह पुनः अदृश्य हो गया।

इन्द्र के इस तरह चले जाने पर इंद्राणी पर शोक के बादल छा गए। वह अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगी तथा कहने लगी- ‘यदि मैंने कभी कोई दान या हवन किया हो और गुरुजन को अपनी सेवा से संतुष्ट किया हो तो मेरा पातिव्रत्य धर्म अविचल रहे। मैं कभी किसी अन्य पुरुष की ओर न देखूं। मैं उत्तरायण की अधिष्ठात्री रात्रि देवी को प्रणाम करती हूँ। वे मेरा मनोरथ सफल करें।’

इंद्राणी ने रात्रिदेवी उपश्रुति की उपासना की और उससे प्रार्थना की- ‘आप मुझे वह स्थान दिखाएं जहाँ, जहाँ मेरे पति उपस्थित हैं।’

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इंद्राणी की प्रार्थना पर उपश्रुति देवी प्रकट हुईं तथा उन्होंने इंद्राणी से कहा- ‘मैं उपश्रुति हूँ तथा आपके सत्य के प्रभाव से मैं आपको दर्शन देने आई हूँ। आप पतिव्रता और यम-नियम के नियम से युक्त हैं। मैं आपको देवराज इन्द्र के पास ले चलूंगी।’

इसके पश्चात् उपश्रुति इन्द्राणी के साथ हिमालय पर्वत को लांघकर एक दिव्य सरोवर पर पहुंची। उस सरोवर में एक अति सुंदर विशाल कमलिनी थी। उसे एक ऊंची नाल वाले गौरवर्ण महाकमल ने घेर रखा था। उपश्रुति ने उस कमल के नाल को फाड़कर, इन्द्राणी सहित उसमें प्रवेश किया और वहाँ एक तंतु में इन्द्र को छिपे हुए पाया।

इन्द्राणी ने पूर्वकर्मों का उल्लेख करते हुए इन्द्र की स्तुति की। इस पर इन्द्र ने कहा- ‘हे देवी तुम यहाँ कैसे आई हो और तुम्हें मेरा पता कैसे लगा?’

इस पर इंद्राणी ने इन्द्र को नहुष की समस्त कथा कह सुनाई तथा अपने साथ चलकर नहुष का नाश करने की प्रार्थना की।

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इंद्राणी के इस प्रकार कहने पर इंद्र ने कहा- ‘देवी! इस समय नहुष का बल बहुत बढ़ा हुआ है। ऋषियों ने हव्य-कव्य देकर उसे बहुत बढ़ा दिया है। इसलिए यह पराक्रम प्रकट करने का समय नहीं है। मैं तुम्हें एक युक्ति बताता हूँ। उसके अनुसार कार्य करो। तुम एकांत में जाकर नहुष से मिलो तथा उससे कहो कि यदि तुम ऋषियों से अपनी पालकी उठवाकर मेरे पास आओ तो मैं प्रसन्न होकर तुम्हारे अधीन हो जाऊंगी! इससे सप्तऋषि अवश्य ही क्रोधित होकर नहुष को श्राप देंगे और वह नष्ट हो जाएगा।’ इंद्र के ऐसा कहने पर शची वहाँ से पुनः स्वर्ग लोक आई तथा नहुष के पास पहुंचकर वही सब कहने लगी, जैसा इंद्र ने समझाया था। इंद्राणी ने कहा- ‘हे जगत्पति! मैंने आपसे जो अवधि मांगी थी, मैं उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। यदि आप मेरी एक प्रेमभरी बात पूरी कर दें तो मैं अवश्य आपके अधीन हो जाऊंगी। राजन् मेरी इच्छा है कि समस्त सप्तऋषि मिलकर आपको पालकी में बैठाकर मेरे पास लाएं।’ इस पर नहुष ने कहा- ‘हे सुन्दरी! आपने तो मेरे लिए यह बड़ी ही अनूठी बात बताई है। ऐसे वाहन पर तो आज तक कोई नहीं चढ़ा होगा। यह विचार मुझे बहुत पसंद आया है। मुझे तो आप अपने अधीन ही समझें।’

ऐसा कहकर राजा नहुष ने इन्द्राणी को विदा कर दिया और सप्तऋषियों को अपने महल में बुलवाया।

उधर शची ने देवगुरु बृहस्पति के महल में पहुंच कर बृहस्पति से कहा- ‘नहुष ने मुझे जो अवधि दी थी, वह थोड़ी ही शेष बची है। आप शक्र की खोज करवाइए। मैं आपकी भक्त हूँ, आप मेरी रक्षा करें। ‘

इस पर बृहस्पति ने कहा- ‘तुम दुष्ट-चित्त नहुष से किसी प्रकार का भय मत मानो। उसने अब ऋषियों से अपनी पालकी उठवानी आरम्भ कर दी है, इसलिए अब उसका शीघ्र ही नाश हो जाएगा। भगवान अवश्य ही तुम्हारा मंगल करेंगे।’

इसके बाद बृहस्पति ने हवन करके अग्निदेव का आह्वान किया तथा अग्निदेव के प्रकट होने पर उनसे कहा- हे अग्नि! इन्द्रदेव की खोज करें।’

अग्निदेव ने तीनों लोकों में इन्द्र को ढूंढा। अंत में उन्हें उस सरोवर का पता लग गया जिसके कमल की नाल में बने एक तंतु में देवराज इंद्र अणु के रूप में छिपा हुआ था।

अग्निदेव ने देवगुरु बृहस्पति को इंद्र की वास्तविक स्थिति बता दी। इस पर देवगुरु बृहस्पति समस्त देवी-देवताओं तथा गंधर्वों को लेकर उस सरोवर पर गए तथा इन्द्र के द्वारा प्राचीन काल में किए गए महान् कार्यों का गुणगान करने लगे। इन स्तुतियों को सुनकर इन्द्र का तेज बढ़ने लगा और वह अपने पूर्वरूप में आ गया।

इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति से कहा- ‘विश्वरूप और वृत्रासुर दोनों ही मारे जा चुके हैं, कहिए अब आपका कौनसा कार्य शेष है!’

देवगुरु बृहस्पति ने कहा- ‘देवराज नहुष नामक एक मानव राजा, देवताओं और ऋषियों के तेज से सम्पन्न होकर उनका अधिपति हो गया है। वह हमें बहुत कष्ट देता है। आप उसका नाश करें।’

इसी समय कुबेर, यम, चंद्रमा और वरुण भी वहाँ आ गए तथा वे भी देवराज इन्द्र एवं अन्य देवताओं के साथ मिलकर नहुष के नाश का उपाय सोचने लगे। इतने में ही परम तपस्वी अगस्त्य भी वहाँ आ गए।

मुनि अगस्त्य ने देवराज इन्द्र का अभिनंदन करके कहा- ‘बड़ी प्रसन्नता की बात है कि विश्वरूप त्वष्टा तथा वृत्रासुर का वध हो जाने से आपका अभ्युदय हो रहा है। आज नहुष भी देवराज पद से भ्रष्ट हो गया।’

इन्द्र ने अगस्त्य मुनि का सत्कार करते हुए पूछा- ‘भगवन्! मैं यह जानना चाहता हूँ कि पाप-बुद्धि नहुष का पतन किस प्रकार हुआ?’

महर्षि अगस्त्य ने कहा- ‘देवराज! महाभाग देवर्षि और ब्रह्मर्षि, पापात्मा नहुष की पालकी उठाए हुए चल रहे थे। उस समय ऋषियों के साथ उसका विवाद होने लगा और अधर्म से बुद्धि बिगड़ जाने के कारण उसने मेरे मस्तक पर लात मारी। इससे उसका तेज और कांति नष्ट हो गई। तब मैंने नहुष को श्राप देते हुए कहा, राजन्! तुम प्राचीन महर्षियों के चलाए और आचरण किए हुए कर्म पर दोषारोपण करते हो, तुमने ब्रह्मा के समान तेजस्वी ऋषियों से अपनी पालकी उठवाई है और मेरे सिर पर लात मारी है, इसलिए तुम पुण्यहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ो तथा अजगर का रूप धारण करके दस हजार वर्ष तक भटको। इस अवधि के समाप्त होने के बाद ही तुम फिर से स्वर्ग में प्रवेश कर सकोगे। इस प्रकार मेरे श्राप से वह दुष्ट-चित्त नहुष इन्द्रपद से हट गया है। अब आप स्वर्गलोक में चलकर सब लोकों का पालन कीजिए।’

नहुष को श्राप से नष्ट हुआ जानकर देवराज इन्द्र ऐरावत पर चढ़कर अग्निदेव, बृहस्पति, यम, वरुण, कुबेर आदि देवगण, गंधर्व तथा अप्सराओं सहित देवलोक पहुंचा। वहाँ अंगिरा ऋषि ने अथर्ववेद से इन्द्रदेव का पूजन किया। देवराज इन्द्र फिर से देवलोक का अधिष्ठाता बनकर समस्त लोकों का धर्मपूर्वक पालन करने लगा

महाभारत सहित विभिन्न पुराणों में आई नहुष की यह कथा वस्तुतः वेदों में उल्लिखित आयु एवं उसके पुत्र नहुष से सम्बन्धित मंत्रों का कथात्मक निरूपण है।

वेदों में दिए गए मंत्रों के आधार पर पण्डित रघुनंदन शर्मा ने अपनी पुस्तक वैदिक सम्पत्ति में लिखा है कि नहुष एक सूर्य का नाम है क्योंकि नहुष एक बार सूर्य हो चुका है। उन्होंने पांच वेदमंत्रों के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि इन मंत्रों में नहुष को सूर्य, अंतरिक्षीय शक्ति, बादल तथा आकाश में से कोई एक ठहराया जा सकता है किंतु अधिक अनुमान इस बात का होता है कि नहुष कोई विशाल बादल था जिसने अंतरिक्ष को ढक लिया। जब अगस्त्य रूपी तारा उदित हुआ तो नहुष रूपी बादल स्वयं ही बिखर गया।

महाभारत के वन पर्व में कहा गया है- ‘अगस्त्येन् ततोऽस्म्युक्तो ध्वंस सर्पेति वै रुषा।’ अर्थात् अगस्त नक्षत्र के उदय होते ही सर्परूपी पानी का अर्थात् बादलों का ध्वंस हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी रामचति मानस में लिखा है- ‘उदय अगस्त पंथजल सोखा’ अर्थात् अगस्त नामक नक्षत्र के उदय होने पर मार्ग में पड़ा हुआ जल सूख जाता है, अर्थात् वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है।

ऋग्वेद के एक मंत्र में नहुष को ‘सप्तहा’ अर्थात् सात किरणों को मारने वाला कहा गया है। ऐसा केवल बादल ही कर सकता है। अतः महाभारत में आई इस कथा का वेदों के आधार पर अर्थ निकालें तो केवल इतना अर्थ निकलता है कि नहुष नामक बादल सूर्य को ढककर इन्द्र का पद प्राप्त कर लेता है और जब अगस्त तारे का उदय होता है तो बादलों का नाश हो जाता है अर्थात् वर्षा समाप्त हो जाती है।

महाभारत में नहुष को अजगर होकर भटकने का श्राप इस ओर इंगित करता है कि बादलों का जल जो सूर्य को भी ढक लेता है, अब धरती पर अजगर की तरह चलता हुआ दिखाई देगा। यहाँ धरती पर बहने वाले वर्षा जल की धाराओं को अजगर कहा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रजि पुत्रों की कथा (8) !

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रजि पुत्रों की कथा

रजि पुत्रों की कथा के अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने रजि पुत्रों को नास्तिक बनाकर स्वर्ग से बाहर निकलवा दिया। इससे देवता पुनः सुखी हो गए।

हमने पूर्व की कड़ियों में चर्चा की थी कि उर्वशी एवं पुरुरवा के ज्येष्ठ पुत्र आयु ने राहु की कन्या प्रभा से विवाह किया था जिससे आयु को नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि एवं अनेना नामक पांच पुत्रों की प्राप्ति हुई। इनमें से राजा नहुष की कथा हम पिछली दो कड़ियों में बता चुके हैं।

क्षत्रवृद्ध के एक प्रपौत्र शौनक ने मानव समाज में चातुर्वर्ण का प्रवर्तन किया अर्थात् उनकी संतानों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र चारों वर्णों की प्रजा हुई।

क्षत्रवृद्ध के दूसरे प्रपौत्र काशिराज काशेय ने काशी नामक राज्य की स्थापना की। इसी काशिराज के वंश में धन्वंतरि हुए जिन्होंने आयुर्वेद को आठ विभागों में विभक्त किया। इस प्रकार चंद्रवंशी राजकुमारों ने बड़े-बड़े कार्य किए।

इस कथा में हम पुरुरवा के पुत्र रजि तथा रजि के पुत्रों की चर्चा करेंगे। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण एवं हरिवंश पुराण सहित अनेक पुराणों में आई एक कथा के अनुसार पुरुरवा के पुत्र राजा रजि के पांच सौ बलशाली पुत्र हुए जो राजेय के नाम से विख्यात हुए। रजि ने भगवान नारायण की आराधना की। राजा रजि के द्वारा की गई तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री हरि विष्णु ने राजा रजि को अनेक वर दिए जिससे राजा रजि त्रिलोक-विजयी हो गए।

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एक बार दैत्यराज प्रहलाद एवं देवराज इन्द्र के बीच महासंग्राम छिड़ गया जो तीन सौ वर्षों तक चलता रहा परंतु कोई भी पक्ष विजयी नहीं हो पाया।

तब देवताओं एवं दानवों ने प्रजापति ब्रह्मा के पास जाकर उनसे पूछा- ‘इस युद्ध में कौनसा पक्ष विजयी होगा?’

इस पर ब्रह्माजी ने कहा- ‘जिस पक्ष में राजा रजि शस्त्र धारण करके युद्ध करेंगे, वही पक्ष विजयी होगा!’

तब दैत्यों ने जाकर रजि से सहायता मांगी। राजा रजि दैत्यराज राहु के दौहित्र थे। इसलिए दैत्यों का भी राजा रजि पर पूर्ण अधिकार था।

इसलिए रजि ने दैत्यों से कहा- ‘यदि मेरी सहायता से देवताओं के परास्त हो जाने के बाद मैं दैत्यों द्वारा शासित स्वर्ग का इंद्र हो सकूं तो मैं आपके पक्ष में लड़ सकता हूँ।’

यह सुनकर दैत्यों ने कहा- ‘हम लोग एक बात कहकर उसके विरुद्ध दूसरी तरह का आचरण नहीं करते। हमारे इन्द्र तो दैत्यराज प्रह्लाद हैं और उन्हीं के लिए यह सम्पूर्ण उद्योग हो रहा है।’

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ऐसा कहकर दैत्य तो रजि को छोड़कर चले गए किंतु तभी देवताओं ने आकर राजा से अपने पक्ष में लड़ने का आग्रह किया। स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का पौत्र होने से देवताओं का भी राजा रजि पर पूर्ण अधिकार था किंतु राजा रजि ने देवताओं के समक्ष भी वही शर्त रखी जो उसने दैत्यों के समक्ष रखी थी। देवताओं ने रजि की शर्त मान ली तथा युद्ध में विजय मिलने के बाद रजि को स्वर्ग का नया इन्द्र बनाना स्वीकार कर लिया। अतः राजा रजि ने पूरे उत्साह के साथ देव सेना की सहायता की। राजा रजि महान् योद्धा थे और उनके पास अनेक महान अस्त्र-शस्त्र थे जिनकी सहायता से राजा रजि ने दैत्यों की सेना पराजित कर दी। युद्ध समाप्ति के बाद इन्द्र को भय हुआ कि अब उसे राजा रजि के पक्ष में इन्द्रपद का त्याग करना पड़ेगा किंतु वह इन्द्र पद छोड़ने को तैयार नहीं था। उन दिनों शतक्रतु स्वर्ग का इन्द्र था। इसलिए इन्द्र ने एक उपाय सोचा और राजा रजि के दोनों चरणों को अपने मस्तक पर रखकर कहने लगा- ‘दैत्यों के भय से हमारी रक्षा करने और हमें अन्नदान देने के कारण आप हमारे पिता हैं। आप सम्पूर्ण लोकों में सर्वोत्तम हैं क्योंकि मैं त्रिलोकेन्द्र आपका पुत्र हूँ। आप स्वर्ग मेरे ही पास रहने दें, इससे आपको अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी।’

इस पर राजा रजि देवराज इन्द्र से प्रसन्न हो गए और उन्होंने हंसकर कहा- ‘अच्छा ऐसा ही सही।’ ऐसा कहकर वे अपनी राजधानी को चले गए।

इस प्रकार शतक्रतु ही इन्द्र-पद पर आसीन हुआ। पीछे राजा रजि के स्वर्गवासी होने पर देवर्षि नारद की प्रेरणा से रजि के पुत्रों ने अपने पिता के पुत्रभाव को प्राप्त हुए शतक्रतु से अपने पिता का राज्य मांगा किंतु इन्द्र ने रजि के पुत्रों को राज्य देने से मना कर दिया। इस पर रजि के पुत्रों ने इन्द्र पर आक्रमण कर दिया तथा उसे जीतकर स्वयं ही इन्द्र पद का भोग करने लगे।

रजिपुत्रों ने इन्द्र के वैभव, यज्ञभाग और राज्य को बलपूर्वक छीन लिया। इस कारण इन्द्र को स्वर्ग छोड़ना पड़ा। एक दिन देवगुरु बृहस्पति एकांत में बैठे थे। तब त्रिलोकी के यज्ञभाग से वंचित हुए शतक्रतु इंद्र ने अवसर जानकर उनसे भेंट की।

देवेन्द्र ने कहा- ‘देव मैं रजिपुत्रों द्वारा सताया जा रहा हूँ। मुझे अब यज्ञ में भाग नहीं मिलता। क्या आप मेरी तृप्ति के लिए एक बेर के बराबर भी पुरोडाशखण्ड मुझे दे सकते हैं? आप मेरी राज्यप्राप्ति के लिए कोई उपाय कीजिए।’

शतक्रतु के ऐसा कहने पर देवगुरु बृहस्पति ने कहा- ‘यदि ऐसा है तो पहले ही तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा? तुम्हारे लिए भला मैं क्या नहीं कर सकता? मैं थोड़े ही दिनों में, रजि के उद्दण्ड पुत्रों को स्वर्ग से निकालकर तुम्हें तुम्हारे पद पर पुनः आसीन कर दूंगा।’

ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पति रजिपुत्रों की बुद्धि को मोहित करने के लिए अभिचार और इन्द्र की तेजोवृद्धि के लिए हवन करने लगे। बुद्धि को मोहित करने वाले उस अभिचार कर्म से अभिभूत हो जाने के कारण रजि-पुत्र ब्राह्मण विरोधी, धर्म-त्यागी और वेद-विमुख हो गए। इस कारण कुछ ही समय में उनका बल घट गया। तब इन्द्र ने उन्हें मार डाला और पुरोहित के द्वारा तेजोवृद्ध होकर पुनः स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया।

हरिवंश पुराण के अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने रजि के पुत्रों में मोह उत्पन्न करने के लिए एक ऐसे शास्त्र का निर्माण किया जो नास्तिकवाद से परिपूर्ण तथा धर्म के प्रति अत्यंत द्वेष उत्पन्न करने वाला था। केवल तर्क के आधार पर अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाला वह ग्रंथ नास्तिक शास्त्रों में उत्तम माना गया है।

बृहस्पति का वह नास्तिक दर्शन दुष्ट-पुरुषों के मन को अधिक भाता है। बृहस्पति उस शास्त्र को लेकर रजिपुत्रों के पास गए। रजिपुत्रों ने वह शास्त्र सुना तो वे धर्म से विमुख हो गए तथा वेदों से वैर रखने लगे। इस पर बृहस्पति ने रजिपुत्रों को ऋगवेद, युजुर्वेद एवं सामवेद से वंचित कर दिया। अब पापपूर्ण बुद्धि वाले रजि के पुत्रों को इन्द्र ने मार दिया।

उर्वशी एवं पुरूरवा के ज्येष्ठ पुत्र महाराज आयु का दूसरा पुत्र रम्भ सन्तानहीन रहा। तीसरे पुत्र क्षत्रवृद्ध का पुत्र प्रतिपक्ष हुआ। महाराज आयु के ज्येष्ठ पुत्र नहुष का विवाह विरजा से हुआ जिससे अनेक पुत्र हुए जिनमें ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख थे। इनकी चर्चा हम आगामी कथाओं में करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा धन्वंतरि ने मनुष्यों के कल्याण के लिए काशीराज के यहाँ जन्म लिया (9)

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राजा धन्वंतरि ने मनुष्यों के कल्याण के लिए काशीराज के यहाँ जन्म लिया

राजा धन्वंतरि ने मुनि भरद्वाज से आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्म का ज्ञान प्राप्त किया तथा उसे आठ भागों में विभक्त कर दिया। फिर उन विभागों की विवेचना की। इसके पश्चात् भगवान् धन्वंतरि ने बहुत से शिष्यों को उस अष्टांग युक्त आयुर्वेद की शिक्षा प्रदान की।

उर्वशी एवं पुरुरवा के ज्येष्ठ पुत्र आयु को नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि एवं अनेना नामक पांच पुत्रों की प्राप्ति हुई। इनमें से क्षत्रवृद्ध के एक प्रपौत्र शौनक ने मानव समाज में चातुर्वर्ण का प्रवर्तन किया तथा दूसरे प्रपौत्र काशिराज काशेय ने काशी की स्थापना की। इसी काशिराज के वंश में धन्वंतरि हुए जिन्होंने आयुर्वेद को आठ विभागों में विभक्त किया। इस कथा में हम धन्वंतरि के जन्म की विस्तार से चर्चा करेंगे।

दर्शकों को स्मरण होगा कि देवों एवं दानवों द्वारा समुद्र मंथन करने से चैदह रत्नों की उत्पत्ति हुई थी जिनमें से धन्वंतरि भी एक थे। श्री हरिवंश पुराण में आई एक कथा के अनुसार जब धन्वंतरि प्रकट हुए तो वे भगवान् विष्णु के नामों का जप और आरोग्य साधक कार्य का चिंतन करते हुए सब ओर से दिव्य कांति से प्रकाशित हो रहे थे।

इस कारण जैसे ही धन्वंतरि इस संसार में प्रकट हुए उन्होंने भगवान विष्णु के दर्शन किए। भगवान विष्णु ने धन्वंतरि से कहा- ‘हे धन्वंतरि! तुम ‘अप्’ अर्थात् जल से प्रकट हुए हो, इस कारण तुम्हें अब्ज भी कहा जाएगा।’

धन्वंतरि ने भगवान विष्णु से कहा- ‘हे प्रभो! मैं आपका पुत्र हूँ। मेरे लिए यज्ञभाग की व्यवस्था कीजिए और लोक में मेरे योग्य कोई स्थान दीजिए।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

धन्वंतरि के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा- ‘हे धन्वंतरि! पूर्वकाल में यज्ञ-सम्बन्धी देवताओं ने यज्ञ का विभाग कर लिया है। महर्षियों ने हवनीय पदार्थों का देवताओं के लिए ही विनियोग किया है। इस बात को तुम अच्छी तरह समझ लो। बेटा! तुम्हें छोटे-मोटे उपहोम कभी अर्पित नहीं किए जा सकते।

क्योंकि वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं। तुम देवताओं से पीछे उत्पन्न हुए हो। अतः तुम्हारे लिए वेद-विरुद्ध यज्ञभाग की कल्पना नहीं की जा सकती और वैदिक यज्ञभाग पाने के तुम अधिकारी नहीं हो। दूसरे जन्म में तुम संसार में विख्यात होओगे। वहाँ गर्भावस्था में ही तुम्हें अणिमा आदि सिद्धि प्राप्त हो जाएगी। तुम उसी शरीर से देवत्व प्राप्त कर लोगे और ब्राह्मण लोग चरु, मंत्र, व्रत एवं जपनीय मंत्रों द्वारा तुम्हारा यजन करेंगे।

फिर तुम उस जन्म में आयुर्वेद को आठ भागों में विभक्त करके उसे आठ अंगों से युक्त बना दोगे। कमलयोनि ब्रह्माजी ने इससे पहले ही इसे देख लिया है। दूसरा द्वापर आने पर तुम संसार में अवश्य प्रकट होओगे, इसमें संशय नहीं है।’ धन्वंतरि को यह वरदान देकर भगवान् श्री हरि विष्णु अंतर्धान हो गए।

जब दूसरा द्वापर आया तब सुनहोत्र के पुत्र काशिराज धन्व पुत्र की कामना से दीर्घ तपस्या करने लगे। उन्होंने मन ही मन सोचा कि मैं उस देवता की शरण लूं जो मुझे पुत्र प्रदान करे। ऐसा विचार करके राजा ने पुत्र के लिए भगवान् धन्वंतरि की आराधाना की।

उस आराधना से संतुष्ट होकर भगवान् अब्ज राजा धन्व से बोले- ‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले नरेश! तुम जो वर प्राप्त करना चाहते हो, उसे बताओ, वह मैं तुम्हें दूंगा।’

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राजा बोले- ‘भगवन्! यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं तो आप मेरे पुत्र हो जाएं और इसी रूप में आपकी ख्याति हो!’ भगवान् धन्वंतरि तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गए। कुछ काल के पश्चात् भगवान् धन्वंतरि राजा धन्व के घर में अवतीर्ण हुए। आगे चलकर वे काशिराज बने। काशिराज भगवान् धन्वंतरि समस्त रोगों का नाश करने में समर्थ थे। उन्होंने मुनि भरद्वाज से आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्म का ज्ञान प्राप्त किया तथा उसे आठ भागों में विभक्त कर दिया। फिर उन विभागों की विवेचना की। इसके पश्चात् भगवान् धन्वंतरि ने बहुत से शिष्यों को उस अष्टांग युक्त आयुर्वेद की शिक्षा प्रदान की। भगवान् धन्वंतरि का वंश ही पीढ़ी दर पीढ़ी काशी पर राज्य करता रहा। राजा दिवोदास के काल में भगवान शिव देवी पार्वती से विवाह करके उनके साथ रहने के लिए वाराणसी नगरी में आए। भगवान शिव ने अपने गण निकुम्भ से कहा- ‘तुम वाराणसी नगरी को जनशून्य कर दो किंतु इसके लिए कोमल उपायों से काम लेना क्योंकि वाराणसी के राजा दिवोदास बड़े बलवान् एवं धर्मात्मा हैं।’

भगवान का आदेश सुनकर निकुम्भ वाराणसी में आ गया और उसने एक व्यक्ति को स्वप्न में आदेश दिया कि- ‘तू नगर की सीमा पर मेरी मूर्ति बनाकर स्थापित करवा। जो भी व्यक्ति उस मूर्ति की पूजा करेगा उसका मनोरथ सिद्ध होगा।’

उस व्यक्ति ने राजा दिवोदास से आज्ञा लेकर शिवजी के गण निकुम्भ की एक मूर्ति बनवाई तथा वाराणसी नगर की सीमा पर लगवा दी। सब लोग उसकी पूजा करके अपनी मनोकामनाएं पूरी करने लगे। इस पर राजा दिवोदास की रानी सुयशा भी पुत्र की कामना लेकर निकुम्भ की पूजा करने लगी किंतु जब बहुत काल तक रानी को पुत्र नहीं हुआ तो राजा दिवोदास ने क्रोधित होकर निकुम्भ के स्थान को नष्ट करवा दिया।

इस पर निकुम्भ ने राजा को शाप देते हुए कहा कि तुमने अकारण ही मेरा स्थान नष्ट करवाया है, इसलिए तुम्हारी नगरी अकस्मात् जनशून्य हो जाएगी तथा एक हजार वर्ष तक जनशून्य बनी रहेगी। इसके बाद वाराणसी जनशून्य हो गई तथा शिव एवं पार्वती वहाँ आकर निवास करने लगे। वाराणसी पुरी के शापग्रस्त हो जाने पर राजा दिवोदास ने अपने राज्य की सीमा पर गोमती नदी के तट पर एक रमणीय नगरी बसाई।

हरिवंश पुराण के अनुसार राजा दिवोदास ने यदुवंशी राजा महिष्मान् के पुत्र भद्रश्रेण्य के सौ पुत्रों को मारकर वाराणसी नगरी पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ अपना राज्य स्थापित किया। सतयुग आदि तीन काल बीत जाने पर भगवान शिव के गण क्षेमक ने पुरानी वाराणसी अर्थात् काशी को फिर से बसाया।

इस प्रकार प्रत्येक सृष्टि में सत्ययुग आदि तीन कालों में भगवान शिव एवं पार्वती वाराणसी में निवास करते हैं, उस समय काशी जनशून्य रहती है तथा कलियुग के आने पर भगवान शिव की वाराणसी लुप्त हो जाती है तथा मनुष्यों से परिपूर्ण काशी प्रकट होती है। तब भगवान धन्वंतरि के वंशज काशी पर शासन करते हैं। 

 -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कच ने शुक्राचार्य की पुत्री का प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया (10)

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कच ने शुक्राचार्य की पुत्री का प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया

महाराज! मैं महर्षि अङ्गिरा का पौत्र और देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच हूँ। मैं आपकी शरण में रहकर, एक हज़ार वर्षों तक, आपकी सेवा करना चाहता हूँ। आप कृपया मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

महाभारत एवं अनेक पुराणों में में नहुष एवं विरजा के पुत्र राजा ययाति की कथा आई है जिसमें कहा गया है कि राजा ययाति प्रजापति ब्रह्मा से दसवाँ पुरुष था। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किए थे। देवयानी ब्राह्मण-पुत्री थी किंतु उसका विवाह एक क्षत्रिय राजा से हुआ, इसके पीछे एक रोचक कथा छिपी हुई है।

जिस समय देवों एवं दानवों में त्रिलोक पे अधिकार करने के लिए युद्ध चल रहा था। तब देवताओं ने आङ्गिरस बृहस्पति को और दैत्यों ने भार्गव शुक्राचर्य को अपना गुरु बनाया। बृहस्पति एवं शुक्राचार्य ब्राह्मण होते हुए भी परस्पर प्रतिद्वंद्विता रखते थे।

जब युद्ध में देवताओं ने असुरों को मार दिया, तो, शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का उपयोग करके युद्ध में मृत असुरों को पुनर्जीवित कर दिया। बृहस्पति को संजीवनी विद्या नहीं आती थी। इस कारण असुरों ने जिन देवताओं को युद्ध में मारा था, उन्हें बृहस्पति जीवित नहीं कर पाये। इससे देवताओं को बड़ा दुख हुआ।

इसलिए सभी देवता देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच के पास गए और उससे आग्रह किया- ‘हे भगवन्! आप दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास जाकर उनसे संजीवनी विद्या सीख लीजिये। हम आपको यज्ञ में भागीदार बना लेंगे। शुक्राचार्य आजकल दैत्यराज वृषपर्वा के साथ रहते हैं।’

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देवताओं के अनुरोध पर देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गए और उनसे कहा- ‘महाराज! मैं महर्षि अङ्गिरा का पौत्र और देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच हूँ। मैं आपकी शरण में रहकर, एक हज़ार वर्षों तक, आपकी सेवा करना चाहता हूँ। आप कृपया मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए।’

इस पर शुक्राचार्य ने कहा- ‘मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। तुम बृहस्पति के पुत्र हो, तुम्हारा सत्कार करना बृहस्पति के सत्कार करने के सामान है। तुम मेरे पूजनीय हो। मैं तुम्हें शिष्य बनाना स्वीकार करता हूँ।’

इसके बाद कच शुक्राचार्य के आदेशानुसार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, वहीं रह कर, शुक्राचार्य की सेवा करने लगे। वे अपने गुरु शुक्राचार्य के साथ-साथ गुरुपुत्री देवयानी को भी अपनी सेवा से प्रसन्न रखते। इस तरह पांच सौ वर्ष बीत गए।

एक दिन असुरों को बृहस्पति-पुत्र कच के शुक्राचार्य के पास रहने का कारण पता चल गया। इसलिए असुरों ने कच को मारने की योजना बनाई ताकि बृहस्पति से बदला लिया जा सके और संजीवनी विद्या की रक्षा की जा सके। एक दिन जब कच गौएं चराने के लिए जंगल में गया तब असुरों ने कच को मारकर उसके मृत शरीर के टुकड़े कर दिए और वे टुकड़े भेड़ियों को खिला दिए।

संध्या में जब गायें बिना कच के वापस आईं तब गुरुपुत्री देवयानी को अनिष्ट की आशंका हुई। उसने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा- ‘पिताजी। आपने अग्निहोत्र कर लिया, सूर्यास्त हो गया किन्तु गायें बिना अपने रक्षक के हीं लौट आयीं। कहीं कच के साथ कुछ अनिष्ट तो नहीं हो गया!’

इस पर शुक्राचार्य ने ध्यान लगाकर कच को ढूंढा। उन्हें कच के टुकड़े भेड़ियों के पेट में दिखाई दिए। शुक्राचार्य ने देवयानी को बता दिया कि कच को भेड़ियों ने खा लिया है।

इस पर देवयानी विलाप करते हुए बोली- ‘पिताजी! मैं सौगंध खाकर कहती हूँ, मैं कच के बिना जीवित नहीं रह सकती।’

शुक्राचार्य ने कहा- ‘तू घबराती क्यों है! मैं अभी उसे जीवित किये देता हूँ।’

शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग करके कच को पुकारा- ‘आओ पुत्र कच!’

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गुरु की आवाज सुनकर कच का एक-एक अंग भेड़ियों को छेदते हुए बाहर निकल आया तथा फिर से जुड़कर एक हो गया। इस तरह कच दुबारा जीवित होकर पुनः शुक्राचार्य की सेवा में उपस्थित हो गया। देवयानी के पूछने पर कच ने समस्त वृत्तान्त उसे सुना दिया। जब असुरों ने देखा कि कच फिर से जीवित हो गया है तो उन्होंने कच को फिर से मार डाला किंतु शुक्राचार्य ने उसे पुनः जीवित कर दिया। ऐसा कई बार हुआ। एक दिन असुरों ने कच को मारकर उसकी देह को जला दिया और वह राख वारुणी में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दी। जब कच घर नहीं लौटा तो देवयानी पुनः अपने पिता शुक्राचार्य के पास गयी और कहने लगी- ‘पिताजी कच फूल लेने गया था किंतु अभी तक नहीं लौटा। कहीं दैत्यों ने उसे फिर से तो नहीं मार दिया?’ शुक्राचार्य ने कहा- ‘बेटी मैं क्या करूँ। ये असुर उसे बार-बार मार देते हैं।’ देवयानी के हठ करने पर शुक्राचार्य ने पुनः संजीवनी विद्या का प्रयोग करके कच को आवाज लगाई। इस पर कच ने डरते-डरते शुक्राचार्य के पेट के अंदर से ही मंद स्वर में अपनी स्थिति बताई। शुक्राचार्य ने उसकी आवाज़ सुनकर कहा- ‘पुत्र! तुम सिद्ध हो इस कारण अब तक मेरे पेट के भीतर जीवित हो। देवयानी तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न है। यदि तुम इंद्र नहीं हो तो मैं तुम्हें संजीवनी विद्या सिखाता हूँ। मैं जानता हूँ कि निश्चित रूप से तुम इंद्र नहीं, ब्राह्मण हो, इसीलिए इतनी देर तक मेरे पेट के अंदर जीवित हो! तुम यह विद्या मुझसे सीख कर मेरा पेट फाड़कर बाहर निकल आना और संजीवनी विद्या से मुझे जीवित कर देना।’

कच ने कहा- ‘मैं आपके पेट में रह रहा हूँ और आपके पुत्र के सामान हूँ। मैं आपसे कृतघ्नता नहीं करूँगा। जो मनुष्य वेदगामी गुरु का आदर नहीं करता, वह मनुष्य नर्क का भागी होता है।’

इस पर शुक्राचार्य ने उसे संजीवनी विद्या का ज्ञान दिया जिसे सीखकर कच अपने गुरु शुक्राचार्य का पेट फाड़कर बाहर निकल आया। पेट फट जाने के कारण शुक्राचार्य की मृत्यु हो गई किंतु कच ने संजीवनी विद्या का प्रयोग करके अपने गुरु को फिर से जीवित कर दिया।

शुक्राचार्य को यह जानकर बड़ी ग्लानि हुई कि धोखे में मदिरा पिलाए जाने के कारण शुक्राचार्य का विवेक इतना मर गया कि वे ब्राह्मण-कुमार की राख को मदिरा में मिलाकर पी गए। तब से शुक्राचार्य ने ब्राह्मणों के लिए यह मर्यादा बनाई कि यदि कोई भी ब्राह्मण शराब पियेगा, तो उसका धर्म नष्ट हो जाएगा। उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा और वह इस लोक में तो कलंकित होगा ही, उसका परलोक भी बिगड़ जाएगा।

इसके बाद कच ने पुनः एक हजार वर्ष तक शुक्राचार्य की सेवा की। जब वह शुक्राचार्य से विदा लेकर अपने पिता बृहस्पति के पास लौटने लगा तब देवयानी ने कच से कहा- ‘अब तुम स्नातक हो गए। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, अतः मेरे पिता से कहकर विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करो।’

इस पर कच ने कहा- ‘तुम्हारे पिता मेरे गुरु हैं तथा मेरे पिता के समान हैं। हम दोनों उनके अंदर रह चुके हैं, मैं तुम्हारे साथ बहुत वात्सल्य के साथ गुरु के घर में रहा हूँ, तुम मेरी बहिन के सामान हो। तुम मुझे पवित्र भाव से, जब चाहो, याद कर लो, मैं आ जाऊँगा। तुम मुझे वापस लौटने का आशीर्वाद दो और यहाँ रहकर सावधानी से मेरे गुरु और अपने पिता की सेवा करो।’

देवयानी ने कहा- ‘मैंने तुमसे प्रेम-निवेदन किया था, यदि तुम धर्म और अपने लक्ष्य के लिए मेरा त्याग करते हो, तो जाओ तुम्हारी संजीवनी विद्या कभी सफल नहीं होगी।’

इस पर कच ने कहा- ‘मैंने तुम्हें गुरुपुत्री होने के कारण स्वीकार नहीं किया था, कोई दोष देखकर नहीं। मेरे गुरु ने भी मुझे ऐसी आज्ञा नहीं दी थी। तुम्हारी जो इच्छा हो श्राप दे दो किंतु मैंने तो केवल ऋषि-धर्म का पालन किया है। मैं श्राप के योग्य नहीं था, फिर भी काम के वशीभूत होकर तुमने मुझे श्राप दिया है। मैं भी तुम्हें श्राप देता हूँ कि अब तुम्हें कोई ब्राह्मण-पुत्र स्वीकार नहीं करेगा। मेरी विद्या भले ही सफल न हो परन्तु जिसे मैं सिखाऊंगा उसकी विद्या तो सफल होगी!’

इतना कहकर कच पुनः स्वर्गलोग आ गया। देवताओं ने उसका बहुत सत्कार किया तथा उसे यज्ञ का भागीदार बना लिया। कच के श्राप के कारण देवयानी का विवाह एक ब्राह्मण से न होकर एक क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ। इस कथा पर हम अगली कथा में चर्चा करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देवयानी ने दैत्यों के साथ रहने से मना कर दिया (11)

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देवयानी

पिछली कथा में हमने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा की चर्चा की थी। विभिन्न पुराणों में आए आख्यानों  के अनुसार वे दोनों ही अत्यंत सुंदर थीं। एक दिन देवयानी तथा शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ उद्यान में घूम रही थीं। कुछ समय पश्चात् दोनों कन्याएं अपनी सखियों को साथ लेकर उद्यान में बने जलाशय में उतरकर स्नान करने लगीं।

उसी समय भगवान शंकर एवं पार्वती उधर से निकले। भगवान शंकर को आते देखकर देवयानी, शर्मिष्ठा एवं उनकी समस्त सखियां सरोवर से बाहर निकलकर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगीं। महाभारत में लिखा है कि दैत्यों में कलह उत्पन्न करने के उद्देश्य से इन्द्र ने वायु बनकर देवयानी और शर्मिष्ठा के कपड़े आपस में मिला दिए।

दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने शीघ्रता करने की हड़बड़ाहट में देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस पर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अत्यंत क्रोधित होकर बोली- ‘शर्मिष्ठा! एक असुर-पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या के वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।’

रानी देवयानी के कठोर वचनों को सुनकर राजकुमारी शर्मिष्ठा अपमान से तिलमिला गई। उसने कहा- ‘तेरे पिता तो मेरे पिता को सोते-बैठते कभी नहीं छोड़ते। नीचे खड़े होकर भाट की तरह स्तुति करते हैं और तेरा इतना घमण्ड!’

इस बात पर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और अधिक क्रुद्ध हो गई तथा वह वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा की देह पर धारण किए हुए अपने वस्त्र खींचने लगी। इस पर शर्मिष्ठा ने गुरुपुत्री देवयानी के वस्त्र खींचकर उसे कुएं में धकेल दिया और अपनी सखियों को लेकर वहाँ से चली गई!

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कुछ समय पश्चात् पुरुवंशी राजा ययाति आखेट करते हुए वहाँ आ पहुंचे। राजा ने अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं में से जल निकालना चाहा तभी राजा की दृष्टि कुएं में पड़ी हुई वस्त्रहीन देवयानी पड़ी।

राजा ने पूछा- ‘आप कौन हैं तथा इस कुएं में कैसे गिर गई हैं।’

देवयानी ने कहा- ‘हे आर्य! मैं दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। जब देवता असुरों का संहार करते हैं तब मेरे पिता उन्हें अपनी संजीवनी विद्या से जीवित कर देते हैं। मैं इस विपत्ति में पड़ गई हूँ, यह बात उन्हें मालूम नहीं है। तुम मेरा दाहिना हाथ पकड़कर मुझे कुएं से बाहर निकालो। मैं समझती हूँ कि तुम कुलीन, शांत बलशाली और यशस्वी हो। इसलिए मुझे कुएं से बाहर निकालना तुम्हारा कर्त्तव्य है।’

राजा ययाति ने ब्राह्मण कन्या जानकर देवयानी को देह ढंकने के लिए अपने वस्त्र दिए और उसे कुएं से बाहर निकाला। इसके बाद वह अपनी राजधानी को लौट गया।

कुछ पुराणों में लिखा हुआ है कि देवयानी ने राजा ययाति से प्रेमपूर्वक कहा- ‘हे आर्य! मैं दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूँ। हे क्षत्रियश्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण-पुत्री हूँ किन्तु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिए।’

राजा ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

महाभारत में देवयानी द्वारा राजा ययाति के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने का उल्लेख नहीं है। महाभारत के अनुसार जब राजा ययाति वहाँ से चला गया तब देवयानी नगर के निकट आई। वहाँ देवयानी को अपनी एक दासी दिखाई दी जो उसे ही खोजती फिर रही थी। देवयानी ने अपनी दासी से कहा- ‘तू मेरे घर जाकर मेरे पिता शुक्राचार्य से कह दे कि अब मैं वृषपर्वा के राज्य में नहीं रह सकती।’

देवयानी के आदेश से दासी ने शुक्रचार्य से वही सब जाकर कह दिया। इस पर शुक्राचार्य तुरंत ही अपनी पुत्री के पास गए और उससे कहने लगे- ‘प्रत्येक प्राणी को अपने कर्म का फल भोगना पड़ता है। जान पड़ता है कि तुमने कोई अनुचित कार्य किया है, इसी के कारण तुम्हें यह कष्ट मिला है।’

इस पर देवयानी ने कहा- ‘पिताजी! मुझे एक बात बताइए! वृषपर्वा की पुत्री ने अपनी आंखें लाल करके मुझसे यह क्यों कहा कि तेरे पिता तो मेरे पिता के भाट हैं?’

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शुक्राचार्य ने कहा- ‘पुत्री देवयानी! तू किसी भाट या भिखारी की बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मण की कन्या है जो किसी की स्तुति नहीं करता और जिसकी स्तुति सभी लोग करते हैं। इस बात को वृषपर्वा, इन्द्र और राजा ययाति सभी जानते हैं। अचिन्त्य ब्राह्मणत्व और निर्द्वन्द्व ऐश्वर्य ही मेरा बल है। मुझे ब्रह्मा ने अधिकार दिया है। भूलोक और स्वर्ग में जो कुछ भी है, मैं उस सबका स्वामी हूँ। मैं ही प्रजा के हित के लिए जल बरसाता हूँ और मैं ही औषधियों का पोषण करता हूँ। हे पुत्री! जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर ली है। जो मनुष्य घोड़े के समान भड़के हुए अपने क्रोध को अपने वश में कर लेता है, वही सच्चा सारथी है। जो क्रोध को क्षमा से दबा लेता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है। जो क्रोध को रोक लेता है, निंदा सह लेता है और दूसरों के सताने पर भी दुःखी नहीं होता, वह समस्त पुरुषार्थों का भाजन होता है। एक मनुष्य निरंतर सौ वर्ष तक निरंतर यज्ञ करे और दूसरा क्रोध न करे तो इन दोनों में से क्रोध न करने वाला अधिक श्रेष्ठ है। मूर्खजन ही एक-दूसरे से वैर करते हैं। समझदार को ऐसा नहीं करना चाहिए!’

देवयानी ने कहा- ‘पिताजी! मैं आपकी पुत्री हूँ, इसलिए धर्म-अधर्म का अंतर समझती हूँ, क्षमा और निंदा की सबलता और निर्बलता भी मुझे ज्ञात है। शिष्य का हित चाहने वाले गुरु को अपने शिष्य की त्रुटि क्षमा नहीं करनी चाहिए। इसलिए मैं इन क्षुद्र विचार वालों के राज्य में नहीं रहना चाहती। जो किसी के सदाचार और कुलीनता की निंदा करते हैं, उनके बीच में नहीं रहना चाहिए। मनुष्य को वहाँ निवास करना चाहिए जहाँ सदाचार एवं कुलीनता की प्रशंसा हो।’

शुक्राचार्य अपनी पुत्री से अत्यंत प्रेम करते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री को सांत्वना देते हुए कहा- ‘तुम ठीक कहती हो, मैं दैत्यराज वृषपर्वा से बात करता हूँ।’ इतना कहकर शुक्राचार्य दैत्यराज के महल के लिए रवाना हो गए।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति को श्राप (12)

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ययाति को श्राप

दैत्यगुरु शुक्राचार्य अपनी पुत्री शर्मिष्ठा के मोह में अंधा था। उसन महाराज ययाति को श्राप देकर बूढ़ा बना दिया जिससे ययाति की इच्छाएं अपूर्ण रह गईं। ययाति को श्राप की कथा अनेक पुराणें में मिलती है।

देवयानी द्वारा दैत्यराज वृषपर्वा के राज्य का त्याग कर दिए जाने पर दैत्यगुरु शुक्राचार्य दैत्यराज वृषपर्वा के पास आए तथा उससे क्रोधपूर्ण स्वर में कहने लगे- ‘राजन्! जो अधर्म करते हैं, उन्हें चाहे तत्काल उसका फल न मिले किंतु धीरे-धीरे अधर्म उनकी जड़ काट डालता है। एक तो तुम लोगों ने बृहस्पति के सेवापरायण पुत्र कच की बार-बार हत्या की और उसके बाद मेरी पुत्री की हत्या की भी चेष्टा की। अब मैं तुम्हारे देश में नहीं रह सकता। मैं तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ। तुम मुझे व्यर्थ बकवाद करने वाला समझते हो, इसी से अपने अपराध को न रोककर मेरी उपेक्षा कर रहे हो।’

वृषपर्वा ने कहा- ‘भगवन् मैंने तो कभी आपको झूठा या अधार्मिक नहीं माना। आपमें सत्य और धर्म प्रतिष्ठित हैं। यदि आप हमें छोड़कर चले जाएंगे तो हम समुद्र में डूब मरेंगे। आपके अतिरिक्त हमारा और कोई सहारा नहीं है।’

शुक्राचार्य ने कहा- ‘चाहे तुम समुद्र में डूब मरो अथवा अज्ञात देश में चले जाओ, मैं अपनी प्यारी पुत्री का तिरस्कार नहीं कर सकता। मेरे प्राण उसी में बसते हैं। तुम अपना भला चाहते हो तो उसे प्रसन्न करो।’

शुक्राचार्य को क्रोधित देखकर दैत्यराज वृषपर्वा अत्यंत चिंतित हुआ तथा शुक्राचार्य से बारम्बार क्षमा मांगने लगा।

दैत्युगुरु शुक्राचार्य ने कहा- ‘हे दैत्यराज! मैं आपसे किसी भी प्रकार से रुष्ट नहीं हूँ किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूंगा।’

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दैत्यराज वृषपर्वा ने देवयानी के पास जाकर कहा- ‘हे देवी! मैं तुम्हें मुंह-मांगी वस्तु दूंगा, प्रसन्न हो जाओ।’

देवयानी ने कहा- ‘राजन्! आपकी पुत्री शर्मिष्ठा एक हजार दासियों के साथ मेरी सेवा करे। जहाँ मैं जाऊं, वह मेरा अनुगमन करे।’

वृषपर्वा ने अत्यंत कष्ट के साथ देवयानी की इस शर्त को स्वीकार कर लिया क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि यदि शुक्राचार्य दैत्यों को छोड़कर चले गए तो दैत्यों को देवताओं के हाथों से बचाने वाला कोई नहीं मिलेगा।

इसलिए वृषपर्वा ने धात्री के द्वारा शर्मिष्ठा के पास संदेश भेजा- ‘कल्याणी! दैत्यजाति के हित के लिए देवयानी की दासी बन जाओ अन्यथा दैत्यगुरु शुक्राचार्य अपने शिष्यों को छोड़कर चले जाएंगे। इससे सम्पूर्ण दैत्य जाति ही संकट में पड़ जाएगी।’

शर्मिष्ठा ने अपने पिता से कहलवाया- ‘पिताजी मुझे आपका आदेश स्वीकार है। आचार्य शुक्राचार्य और उनकी पुत्री देवयानी से कहें कि वे यहाँ से न जाएं।’

दैत्यराज वृषपर्वा के आदेश से शर्मिष्ठा देवयानी के पास गई और उससे प्रार्थना करने लगी- ‘मैं सदा तुम्हारे पास रहकर तुम्हारी सेवा करूंगी। तुम यहाँ से मत जाओ।’

इस पर देवयानी ने कहा- ‘क्यों मैं तो तुम्हारे पिता के भिखमंगे भाट की बेटी हूँ और तुम बड़े बाप की बेटी हो। अब मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी?’

इस पर शर्मिष्ठा बोली- ‘जैसे बने विपद्ग्रस्त स्वजन की रक्षा करनी चाहिए। यही सोचकर मैं तुम्हारी दासी हो गई हूँ।’ मैं तुम्हारे विवाह के पश्चात् भी तुम्हारे साथ चलकर तुम्हारी सेवा करूंगी।’ शर्मिष्ठा की इस बात पर देवयानी संतुष्ट हो गई तथा अपने पिता शुक्राचार्य के साथ वृषपर्वा के राज्य में रहने को तैयार हो गई।

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कुछ समय पश्चात् देवयानी के अनुरोध पर शुक्राचार्य ने देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। इस पर शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। कुछ समय पश्चात् देवयानी पुत्रवती हुई। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र हुए- यदु और तुर्वसु। एक दिन राजा ययाति अशोक वाटिका में गया। वहाँ शर्मिष्ठा अपनी दासियों के साथ निवास करती थी। शर्मिष्ठा ने राजा को एकांत में देखा तो वह राजा के निकट जाकर कहने लगी- ‘जैसे चन्द्रमा, इन्द्र, विष्णु, यम और वरुण के महल में कोई भी स्त्री सुरक्षित रह सकती है, वैसे ही मैं आपके यहाँ सुरक्षित हूँ। यहाँ मेरी ओर कौन दृष्टि डाल सकता है! आप मेरा रूप, कुल और शील तो जानते ही हैं। यह मेरे ऋतु का समय है। मैं आपसे उसकी सफलता के लिए प्रार्थना करती हूँ। आप मुझे ऋतुदान दीजिए।’ राजा ययाति ने शर्मिष्ठा के कथन का औचित्य स्वीकार कर लिया तथा उसकी इच्छा पूर्ण कर दी। राजा ययाति के शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए- द्रह्यु, अनु और पुरु। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। एक बार रानी देवयानी राजा ययाति के साथ अशोक वाटिका में घूमने गई। वहाँ देवयानी ने शर्मिष्ठा के तीन सुंदर पुत्रों को देखा।

देवयानी ने राजा ययाति से पूछा- ‘देवकुमारों के समान ये तीन सुंदर पुत्र किसके हैं? इनका रूप और सौंदर्य तो आपके समान है।’ राजा ने देवयानी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया।

इस पर देवयानी ने बच्चों से पूछा- ‘तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?’

बच्चों ने अंगुलियों के संकेत से अपनी माता शर्मिष्ठा की ओर संकेत किया। जब बच्चे दौड़कर राजा के पास आए तो राजा कुछ लज्जित सा दिखाई देने लगा और उसने बच्चों को गोद में नहीं लिया। बच्चे रोते हुए अपनी माँ के पास चले गए। इस पर देवयानी पूरी बात समझ गई।

देवयानी ने शर्मिष्ठा से कहा- ‘शर्मिष्ठा! तू मेरी दासी है, तूने मेरा अप्रिय क्यों किया? तेरा आसुरी स्वभाव गया नहीं? तू मुझसे डरती नहीं?’

शर्मिष्ठा ने कहा- ‘मैंने राजा के साथ जो समागम किया है, वह धर्म और न्याय के अनुसार है। मैंने तो तुम्हारे साथ ही उन्हें अपना पति मान लिया था।’

इस पर देवयानी ने राजा से कहा- ‘आपने मेरे साथ अन्याय किया है। अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी।’ वह आंखों में आंसू भरकर अपने पिता के घर के लिए चल पड़ी। ययाति भी भयभीत होकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

देवयानी ने शुक्राचार्य के पास पहुंचकर कहा- ‘पिताजी! अधर्म ने धर्म को जीत लिया। शर्मिष्ठा मुझसे आगे बढ़ गई। उसे मेरे पति से तीन पुत्र हुए हैं। मेरे धर्मज्ञ पति ने धर्म का उल्लंघन किया है। आप इस पर विचार कीजिए।’

इस पर शुक्राचार्य ने ययाति को श्राप दिया- ‘ययाति! तू स्त्री-लम्पट है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ, तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।’

शुक्राचार्य के श्राप देते ही ययाति तत्काल बूढ़ा हो गया। यह देखकर ययाति के शोक का पार नहीं रहा। ययाति को श्राप मिलने की आशा बिल्कुल भी नहीं थी। शुक्राचार्य इस बात को जानता था कि ययाति एक धर्मनिष्ठ राजा था, फिर भी शुक्राचार्य ने ययाति को श्राप दे दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा ययाति एक हजार वर्ष तक अपने पुत्र का यौवन भोगता रहा (13)

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राजा ययाति एक हजार वर्ष तक अपने पुत्र का यौवन भोगता रहा

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि देवयानी के शिकायत करने पर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के शाप से राजा ययाति बूढ़ा हो गया।

राजा ययाति ने भयभीत होकर कहा- ‘हे दैत्यगुरु! आपकी पुत्री के साथ विषय-भोग करते हुए अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है। कृपया मेरा यौवन लौटा दीजिए।’

राजा की बात सुनकर शुक्राचार्य ने कहा- ‘मैं तुझे तेरा यौवन नहीं लौटा सकता किंतु यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तू उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकता है।’

नहुष का पुत्र ययाति अत्यंत प्रतापी राजा था। एक बार देवराज इंद्र ने राजा ययाति से प्रसन्न होकर उसे स्वर्णनिर्मित दिव्य रथ प्रदान किया था जिसमें उत्तम एवं श्वेतवर्ण के घोड़े जुते हुए थे। उसकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी। उसी रथ के द्वारा वह अपनी भार्याओं को ब्याहकर लाया था। उस दिव्य रथ की सहायता से राजा ययाति ने छः रातों में ही सम्पूर्ण धरती, देव एवं दानवों को जीत लिया था।

उसी रथ पर राजा ययाति अपनी भार्याओं को बैठाकर लाया था।

राजा ययाति ने समुद्र और सातों द्वीपों सहित समस्त पृथ्वी को जीतकर उसे अपने अधीन किया था किंतु अचानक ही वृद्धावस्था आ जाने से यह समस्त ऐश्वर्य अब राजा के किसी काम का नहीं रहा था। असमय ही वृद्धावस्था आ जाने से भोग-विलास से राजा की तृप्ति नहीं हुई थी। इसलिए ययाति ने अपनी राजधानी पहुंचकर अपने अस्त्र-शस्त्रों का त्याग कर दिया तथा अपने पुत्रों को अपने निकट बुलाया।

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ययाति ने अपने राज्य के पांच भाग किए तथा उन भागों को अपने पांचों पुत्रों में बांट दिया। राजा ने बड़े पुत्र यदु को दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र तथा तुर्वसु को दक्षिण-पूर्वी भाग प्रदान किया। पुरु को गंगा-यमुना दोआब का आधा दक्षिण प्रदेश, अनु को पुरु राज्य का उत्तरी क्षेत्र और द्रह्यु को पश्चिमी क्षेत्र प्रदान किया।

अपने राज्य का विभाजन करने के बाद ययाति ने अपने बड़े पुत्र यदु से कहा- ‘पुत्र! दीर्घकालीन यज्ञों के अनुष्ठान के कारण तथा दैत्यगुरु शुक्राचार्य के श्राप के कारण मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गए हैं किंतु मेरी इच्छाएं पूरी नहीं हुई हैं। अब मुझे तुम्हारी युवावस्था चाहिए। तुम मेरा बुढ़ापा ग्रहण करो और मैं तुम्हारे रूप से तरुण होकर रमणीय युवतियों के साथ इस पृथ्वी पर विचरण करूंगा।’

तब यदु ने अपने पिता से कहा- ‘महाराज मैंने एक ब्राह्मण को मुँहमांगी भिक्षा देने की प्रतिज्ञा कर ली है। उसने अभी तक मुझे स्पष्ट रूप से बताया नहीं है कि उसे क्या वस्तु चाहिए। मैं जब तक उसकी भिक्षा का ऋण नहीं उतार लूं, तब तक मैं आपका बुढ़ापा नहीं ले सकता। राजन् बुढ़ापे में खान-पान सम्बन्धी बहुत से दोष हैं, अतः मैं आपका बुढ़ापा नहीं ले सकूंगा। आपके तो बहुत से पुत्र हैं जो आपको मुझसे भी बढ़कर प्रिय हैं, अतः महाराज जरावस्था ग्रहण करने के लिए आप किसी दूसरे पुत्र का वरण कीजिए!’

यदु के ऐसा कहने पर राजा ययाति कुपित हो गया और यदु की निंदा करते हुए बोला- ‘दुबुर्द्धे! मेरा अनादर करके तेरा दूसरा कौनसा आश्रय है? मैं तो तेरा गुरु हूँ! मूढ़ नराधम! तेरी संतान सदैव राज्य से वंचित रहेगी।’

इसके बाद राजा ययाति ने अपने अन्य पुत्रों तुर्वसु, द्रह्यु और अनु से भी यौवन मांगा परन्तु उन्होंने भी अपने पिता की बात मानने से मना कर दिया। राजा ययाति ने उन्हें भी वैसा ही श्राप दे दिया और सबसे अंत में शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु को बुलाया तथा उससे कहा- ‘तू मेरा बुढ़ापा ले ले और मुझे अपना यौवन दे दे।’

यह सुनकर प्रतापी पुरु ने अपना यौवन अपने पिता को दे दिया और उसका बुढ़ापा स्वयं ने ले लिया जिससे ययाति तरुण होकर पृथ्वी पर विचरण करने लगा। एक बार राजा ययाति चैत्ररथ नामक वन में गया। वहाँ उसकी भेंट विश्वाची नामक अप्सरा से हुई। राजा ययाति विश्वाची के साथ रमण करने लगा। जब दोनों को रमण करते हुए एक हजार वर्ष बीत गए, तब भी राजा को भोग-विलास करने से तृप्ति नहीं हुई। इस पर राजा फिर से पुरु के पास आया और उससे अपना बुढ़ापा वापस ले लिया।

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राजा ययाति ने अपने अनुभव के आधार पर पुरु को उपदेश दिया- ‘भोगों की इच्छा उन्हें भोगने से कभी शांत नहीं होती। अपितु घी से आग की भांति और भी बढ़ती ही जाती है। इस पृथ्वी पर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु तथा स्त्रियां हैं, वे सब एक पुरुष के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा जान लेने पर विद्वान पुरुष कभी भोग में नहीं पड़ते। जब जीव मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी के प्रति पापबुद्धि नहीं करता, तब वह ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है। जब वह दूसरे प्राणियों से नहीं डरता, जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह इच्छा एवं द्वेष से रहित हो जाता है, उस समय ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। खोटी बुद्धि वाले पुरुषों द्वारा जिसका परित्याग होना कठिन है, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोग के समान है, उस तृष्णा का त्याग करने वाले को ही सुख मिलता है। बूढ़े होने वाले मनुष्य के बाल सफेद हो जाते हैं तथा दांत गिर जाते हैं किंतु धन और जीवन की अभिलाषा बनी रहती है। संसार में जो कामजनित सुख हैं तथा जो दिव्य महान् सुख हैं, वे सब मिलकर भी उस सुख से छोटे हैं जो तृष्णा के समाप्त हो जाने से मिलता है।’

ऐसा कहकर राजर्षि ययाति अपनी दोनों रानियों सहित वन में चला गया। उसने भृगुतुंग नामक पर्वत शिखर पर दीर्घकाल तक भारी तपस्या की तथा वहीं पर अपनी देह त्याग दी। ययाति के पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रहुयु से भोज, अनु से म्लेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराज ययाति इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा (14)

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महाराज ययाति इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा

नहुष की तरह नहुष का पुत्र महाराज ययाति भी अपने सद्कर्मों के कारण स्वर्ग में निवास करता था किंतु जब उसके सद्कर्म समाप्त हो गए तो महाराज इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा!

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि भोग-विलासों की निरर्थकाता समझकर राजा ययाति ने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौट दिया तथा स्वयं अपनी रानियों सहित पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगा। वहीं पर राजा ययाति ने अपनी देह का त्याग किया।

महाभारत एवं मत्स्य महापुराण आदि ग्रंथों में आई एक कथा के अनुसार देहत्याग करने के पश्चात् महाराज ययाति स्वर्ग पहुंचा तथा वहाँ बड़े आनंद से रहने लगा। इन्द्र, साध्य, मरुत् एवं वसु सहित समस्त देवगण महाराज ययाति का बहुत सम्मान करते थे। इस प्रकार हजारों वर्ष बीत गए। एक दिन इन्द्र ने राजा ययाति से पूछा- ‘राजन् जिस समय आपने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाया, उस समय आपने उसे क्या उपदेश दिया?’

इस परमहाराज ययाति ने कहा-

‘देवराज मैंने पुरु से कहा कि मैंने तुम्हें गंगा और यमुना के बीच के देश का स्वामी बनाया है। तुम्हारे भाई सीमांत प्रदेशों के राजा होंगे। हे पुत्र, क्रोधियों से क्षमाशील श्रेष्ठ हैं, और असहिष्णु से सहिष्णु। मनुष्येतर जातियों से मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मूर्ख मनुष्यों से बुद्धिमान मनुष्य श्रेष्ठ हैं। किसी के द्वारा बहुत सताए जाने पर भी हमें उसे सताने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

क्योंकि दुखी प्राणी का शोक ही सताने वाले का नाश कर देता है। मर्मभेदी और कड़वी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए। अनुचित उपाय से शत्रु को अपने वश में नहीं करना चाहिए। जिस बात से किसी को कष्ट पहुंचता हो, ऐसी बात तो पापी लोग बोलते हैं।

जो लोग अपनी कड़वी, तीखी और मर्मस्पर्शी बातों के कांटे से लोगों को सताता है, उसको देखना भी बुरा है। क्योंकि वह अपनी वाणी के रूप में एक पिशाचिनी को ढो रहा है। ऐसा आचरण करना चाहिए कि सत्पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ पीछे से भी तुम्हारी रक्षा करें।

दुष्ट लोग कोई कड़वी बात कहें तो सदा उसे सहन ही करना चाहिए तथा सदाचार का आश्रय लेकर सर्वदा सत्पुरुषों के व्यवहार को ही ग्रहण करना चाहिए। वाणी से भी बाण-वृष्टि होती है। जिस पर इसकी बौछारें पड़ती हैं, वह रात-दिन सोच में पड़ा रहता है। इसलिए ऐसी वाणी का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।

त्रिलोकी में सबसे बड़ी सम्पत्ति यह है कि सभी प्राणियों के प्रति दया और मैत्री का बर्ताव हो, यथाशक्ति सबको कुछ दिया जाए और मधुर वाणी का प्रयोग हो। सारांश यह कि कठोर वाणी न बोले। मीठी वाणी बोले, सम्मान करे, दान दे, और कभी किसी से कुछ नहीं मांगे। यही सर्वश्रेष्ठ व्यवहार का मार्ग है।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

ययाति की बात सुनकर नहुष ने पूछा- ‘नहुषनंदन! आपने गृहस्थाश्रम धर्म का पूरा-पूरा पालन करके वानप्रस्थाश्रम स्वीकार किया था। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्या में किसके समकक्ष हैं?’

महाराज ययाति ने कहा- ‘देवता, मनुष्य, गन्धर्व, और महर्षियों में अपने समान तपस्वी मुझे कोई नहीं दिखाई पड़ता।’

इन्द्र ने कहा- ‘तुमने सृष्टि के समस्त लोगों का प्रभाव अपने समान न जानकर, उन सबका तिरस्कार किया है। अपने मुंह अपनी करनी का बखान करने से तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया। यहाँ के सुख-भोगों को सीमा तो है ही, जाओ यहाँ से पृथ्वी पर गिर पड़ो।’

महाराज ययाति ने कहा- ‘ठीक है। यदि सबका अपमान करने से मेरा पुण्य क्षीण हो गया तो मैं यहाँ से संतों के बीच में गिरूं।’

इन्द्र ने कहा- ‘अच्छी बात।’

इसके पश्चात् राजा ययाति पवित्र लोकों से च्युत होकर उस स्थान पर गिरने लगे जहाँ अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान् और शिबि नामक ऋषि तपस्या करते थे। राजा ययाति को आकाश से धरती की तरफ आते देखकर अष्टक ने कहा-

‘युवक! तुम्हारा रूप इन्द्र के समान है। तुम्हें गिरते देखकर हम चकित हो रहे हैं। तुम जहाँ तक आ गए हो, वहीं पर ठहर जाओ और विषाद तथा मोह छोड़कर अपनी बात बताओ। इन सत्पुरुषों के समक्ष इन्द्र भी तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता। दुःखी और दीन लोगों के लिए संत ही परम आराध्य हैं। सौभाग्यवश तुम उन्हीं के बीच में आ गए हो। तुम अपनी व्यथा ठीक-ठीक सुनाओ!’

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ययाति ने कहा- ‘मैं समस्त प्राणियों का तिरस्कार करने के कारण स्वर्ग से च्युत हो रहा हूँ। मुझमें अभिमान था। अभिमान नरक का मूल है। सत्पुरुषों को दुष्टों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो लोग धन-धान्य की चिंता छोड़कर अपनी आत्मा का हित-साधन करते हैं, वही समझदार हैं। धन पाकर फूलना नहीं चाहिए। विद्वान् होकर अहंकार नहीं करना चाहिए। अपने विचार और प्रयत्न की अपेक्षा दैव की गति बलवान् है। ऐसा समझकर संताप नहीं करना चाहिए। दुःख से जले नहीं, सुख से फूले नहीं। दोनों में समान रहे। हे अष्टक! मैं इस समय मोहित नहीं हूँ और मेरे मन में कोई जलन भी नहीं है। मैं विधाता के विधान के विपरीत तो नहीं जा सकता, ऐसा समझकर मैं संतुष्ट रहता हूँ। अष्टक! मैं सुख-दुःख दोनों की अनित्यता जानता हूँ। फिर मुझे दुःख हो तो कैसे! क्या करूं, क्या करके सुखी रहूँ, इन झंझटों से मैं उन्मुक्त रहता हूँ। इसलिए दुःख मेरे पास नहीं फटकते।’

अष्टक ने पूछा- ‘आपकी बातों से लगता है कि आप अनेक लोकों में रह चुके हैं और आत्मज्ञानी नारदादि के समान भाषण कर रहे हैं। अतः बताइए, आप प्रधानतः किन-किन लोकों में रह चुके हैं?’

महाराज ययाति ने कहा- ‘मैं पहले पृथ्वी पर सार्वभौम राजा था। मैं एक सहस्र वर्ष तक महत् लोकों में रहा। तदनंतर सौ योजन लम्बी-चौड़ी सहस्रद्वार युक्त इन्द्रपुरी में एक सहस्र वर्ष तक रहा। तदनंतर प्रजापति के लोक में जाकर वहाँ भी एक सहस्र वर्ष तक रहा। मैंने नंदनवन में स्वर्गीय भोगों को भोगते हुए लाखों वर्षों तक निवास किया। वहाँ मैं सुखों में आसक्त हो गया और पुण्य क्षीण हो जाने पर पृथ्वी पर आ रहा हूँ। जैसे धन का नाश होने पर सगे-सम्बन्धी छोड़ देते हैं, वैसे ही पुण्य क्षीण हो जाने पर इन्द्रादि देवता भी परित्याग कर देते हैं।’

यह सम्पूर्ण वर्णन महाभारत तथा मत्स्य महापुराण सहित अनेक ग्रंथों में आया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति के पूर्वज ऋषियों के पुण्यकर्म (15)

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ययाति के पूर्वज ऋषियों के पुण्यकर्म

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि स्वर्ग से गिरते हुए राजा ययाति को ययाति के पूर्वज अष्टक ऋषि ने आकाश में ही रोककर उससे इस प्रकार गिरने का कारण पूछा। जब अष्टक को लगा कि राजा ययाति सामान्य व्यक्ति नहीं है, वह ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से अत्यंत परिपक्व है तो अष्टक ने ययाति से पूछा- ‘राजन्! किन कर्मों के अनुष्ठान से मनुष्य को श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति होती है? वे तप से प्राप्त होते हैं अथवा ज्ञान से?’

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राजा ययाति ने उत्तर दिया- ‘स्वर्ग के सात द्वार हैं- दान, तप, शम, दम, लज्जा, सरलता और सब पर दया। अभिमान से तपस्या क्षीण हो जाती है। जो अपनी विद्वता के अभिमान में फूले-फूले फिरते हैं और दूसरों के यश को मिटाना चाहते हैं, उन्हें उत्तम लोकों की प्राप्ति नहीं होती। उनकी विद्या भी उन्हें मोक्ष नहीं दिलवा सकती। अभय के चार साधन हैं- अग्निहोत्र, मौन, वेदाध्ययन और यज्ञ। यदि अनुचित रीति से और अहंकार पूर्वक उनका पालन होता है तो ये भय के कारण बन जाते हैं। सम्मानित होने पर सुख नहीं मानना चाहिए और अपमानित होने पर दुःखी नहीं होना चाहिए। जगत् में ऐसे लोगों की पूजा सत्पुरुष करते हैं। दुष्टों से शिष्ट बुद्धि की चाह निरर्थक है। मैं दूंगा, मैं यज्ञ करूंगा, मैं जान लूंगा, मेरी यह प्रतिज्ञा है, इस तरह की बातें बड़ी भयंकर हैं। इनका त्याग ही श्रेयस्कर है।’

ययाति के पूर्वज अष्टक ने पूछा- ‘ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी किन धर्मों का पालन करने से मृत्यु के बाद सुखी होते हैं?’

ययाति ने कहा- ‘जो ब्रह्मचारी आचार्य के आज्ञानुसार अध्ययन करता है, जिसे गुरुसेवा के लिए आज्ञा नहीं देनी पड़ती, जो आचार्य के जागने से पहले जागता और पीछे सोता है, जिसका स्वभाव मधुर होता है, जो इन्द्रियजयी, धैर्यशाली, सावधान तथा प्रमाद-रहित होता है, उसे शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है।

जो पुरुष धर्मानुकूल धन अर्जित करके यज्ञ करता है, अतिथियों को खिलाता है, किसी की वस्तु बिना उसके दिए नहीं लेता, वही सच्चा गृहस्थ है। जो स्वयं उद्योग करके फल-मूल से अपनी जीविका चलाता है, पाप नहीं करता, दूसरों को कुछ न कुछ देता रहता है, तथा किसी को कष्ट नहीं पहुंचाता, थोड़ा खाता और नियमित चेष्टा करता है, वह वानप्रस्थी शीघ्र सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

जो किसी कला-कौशल, भाषण, चिकित्सा, कारीगरी आदि से जीविका नहीं चलाता, समस्त सद्गुणों से युक्त जितेन्द्रिय, और असंग है, किसी के घर नहीं रहता, थोड़ा चलता है, अनेक देशों में अकेले और नम्रता के साथ विचरण करता है, वह सच्चा संन्यासी है।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

इस प्रकार और बहुत सी वार्ता के बाद ययाति ने कहा- ‘देवता लोग शीघ्रता करने के लिए कह रहे हैं, मैं अब गिरूंगा, इन्द्र के वरदान से मुझे आप जैसे सत्पुरुषों का समागम प्राप्त हुआ है।’

ययाति के पूर्वज अष्टक ने कहा- ‘स्वर्ग में मुझे जितने लोक प्राप्त होने वाले हैं, अंतरिक्ष में अथवा सुमेरु पर्वत के शिखरों पर जहाँ भी मुझे पुण्यकर्मों के फलस्वरूप जाना है, उन्हें मैं आपको देता हूँ, आप गिरें नहीं।’

ययाति ने कहा- ‘मैं ब्राह्मण तो हूँ नहीं, दान कैसे लूं? इस प्रकार के दान तो मैंने भी पहले बहुत से किए हैं।’

इस पर ययाति के पूर्वज राजऋषि प्रतर्दन ने कहा- ‘मुझे अंतरिक्ष अथवा स्वर्ग लोक में जिन-जिन लोकों की प्राप्ति होने वाली है, मैं आपको देता हूँ। आप यहाँ न गिरें, स्वर्ग में जाएं।’

ययाति ने कहा- ‘कोई भी राजा अपने समकक्ष व्यक्ति से दान नहीं ले सकता। क्षत्रिय होकर दान लेना यह तो बड़ा अधर्म का कार्य है। अब तक किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय ने ऐसा काम नहीं किया है। फिर मैं ही कैसे करूं?’

राजा ययाति की बात सुनकर ययाति के पूर्वज वसुमान् ने कहा- ‘राजन्! मैं अपने सभी लोक आपको देता हूँ। आप यदि इसे दान समझकर लेने में संकोच करते हैं तो एक तिनके के बदले में यह सब खरीद लीजिए।’

ययाति ने कहा- ‘यह क्रय-विक्रय तो सर्वथा मिथ्या है। मैंने अब तक ऐसा मिथ्याचार कभी नहीं किया है। कोई भी सत्पुरुष ऐसा नहीं करता। मैं ऐसा कैसे करूं?’

शिबि ने कहा- ‘मैं औशीनर शिबि हूँ। आप यदि क्रय-विक्रय नहीं करना चाहते तो मेरे पुण्यों का फल स्वीकार कीजिए। मैं इन्हें आपको भेंट करता हूँ। आप न भी लें तो भी मैं इन्हें स्वीकार नहीं करता।’

ययाति ने कहा- ‘तुम बड़े प्रभावशाली हो परंतु मैं दूसरों के पुण्य-फल का भोग नहीं करता।’

अष्टक ने कहा- ‘अच्छा महाराज! आप एक-एक के पुण्यलोक नहीं लेते तो आप हम सभी के पुण्यलोक एक साथ ले लीजिए। हम आपको अपना समस्त पुण्यफल देकर नरक जाने को भी तैयार हैं।’

ययाति ने उत्तर दिया- ‘भाई! तुम लोग मेरे स्वरूप के अनुरूप प्रयत्न करो। सत्यपुरुष तो सत्य के ही पक्षपाती होते हैं। मैंने जो कभी नहीं किया, वह अब कैसे करूं?’

अष्टक ने कहा- ‘महाराज! आकाश में ये पांच स्वर्णरथ किसके दिखाई दे रहे हैं? क्या इन्हीं के द्वारा पुण्यलोकों की यात्रा होती है?’

ययाति ने कहा- ‘हाँ, ये स्वर्णरथ तुम लोगों को पुण्य लोकों में ले जाएंगे।

अष्टक ने कहा- ‘आप इन रथों के द्वारा स्वर्ग की यात्रा कीजिए, हम बाद में आ जाएंगे।’

ययाति बोले- ‘हम सभी ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर ली। इसलिए चलो हम सब साथ ही चलें। देखते नहीं, वह स्वर्ग का प्रशस्त पथ दिख रहा है।’

अष्टक, प्रदर्दन, वसुमान् और शिबि द्वारा अपने पुण्य लोकों को राजा ययाति के कल्याणार्थ दान करने की इच्छा व्यक्त करने के कारण वे सभी तपस्वी राजा स्वर्ग लोक के अधिकारी हो गए थे तथा राजा ययाति द्वारा उनका प्रतिग्रह स्वीकार नहीं करने के कारण ययाति भी स्वर्ग के अधिकारी हो गए थे। अतः वे सभी पुण्यात्मा उन दिव्य रथों पर बैठकर स्वर्ग के लिए चल पड़े।

मार्ग में ययाति के पूर्वज औशीनर शिबि का रथ सबसे आगे चलने लगा तो अष्टक ने ययाति से पूछा- ‘राजन्! इन्द्र मेरा मित्र है, मैं समझता था कि इन्द्र के पास सबसे पहले मैं ही पहुंचूंगा किंतु राजा शिबि का रथ सबसे आगे क्यों चल रहा है?’

इस पर ययाति ने कहा- ‘शिबि ने अपना सर्वस्व सत्पात्रों को दे दिया था। दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्रीं, श्री, क्षमा, सौम्यता, सेवा की अभिलाषा ये सभी गुण शिबि में विद्यमान हैं। अभिमान की छाया उन्हें छू तक नहीं गई है। इसी से वह सबसे आगे बढ़ गया है।’

इस पर ययाति के पूर्वज अष्टक ने पूछा- ‘राजन्! सच बताइए, आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं? क्योंकि ऐसा तेज न तो किसी क्षत्रिय में है और न किसी ब्राह्मण में?’

ययाति ने कहा- ‘अष्टक! मैं सम्राट नहुष का पुत्र ययाति हूँ। किसी समय मैं धरती पर सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट था।’

इस प्रकार वार्तालाप करते हुए ययाति के पूर्वज वे सभी पुण्यात्मा राजा स्वर्गलोक में प्रवेश कर गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन यदुवंश में उत्पन्न हुआ था (16)

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हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन यदुवंश में उत्पन्न हुआ था

रुद्रश्रेण्य के वंश में आगे चलकर हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का जन्म हुआ। उसने दस हजार वर्षों तक भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके चार वरदान प्राप्त किए। इनमें से पहला वरदान यह था कि मेरी एक हजार भुजाएं हों। दूसरा वरदान यह था कि जो लोग सत्पुरुषों के साथ अधर्म करते हैं, मैं उनका निवारण करूं।

पिछली कुछ कथाओं में हमने चंद्रवंशी राजा ययाति की चर्चा की है। राजा ययाति से पूर्व के चंद्रवंशी राजाओं को अंतरिक्षीय शक्तियों के प्रतीक एवं स्वर्गलोक से सम्बन्धित माना जाता है। बहुत से पुराणों में उन राजाओं के साथ ऐसे कथानक भी जोड़ दिए गए हैं जिनसे वे धरती के राजा लगने लगते हैं।

इस स्थिति से ठीक उलट, राजा ययाति की कथा में ऐसे कथानक जोड़ दिए गए हैं जिनसे ययाति का सम्बन्ध स्वर्ग से होने का आभास होने लगता है जबकि ययाति धरती का राजा था, इसलिए बहुत से पुराणों में कहा गया है कि राजा ययाति धरती का पहला चक्रवर्ती राजा था।

हम चर्चा कर चुके हैं कि राजा ययाति अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपना उत्तराधिकारी बनाकर तथा अपने शेष चारों ज्येष्ठ पुत्रों को पुरु के अधीन सीमांत प्रदेशों का राजा बनाकर अपनी रानियों सहित तपस्या करने के लिए वन में चला गया।

ययाति ने यद्यपि अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को श्राप दिया था कि तेरे वंशजों को कभी राज्य न मिले किंतु ययाति ने यदु को दक्षिण दिशा में चर्मणवती अर्थात् चम्बल नदी, वेतवती अर्थात् बेतवा नदी और शुक्तिमती अर्थात् केन नदी के प्रदेश दिए।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि याति ने यदु को श्राप दिया था कि तुम मेरा अपमान करते हो इसलिए तुम्हारी संतान भी तुम्हारी तरह उद्दण्ड होगी। तुम भयंकर राक्षसों और यातुधानों को जन्म दोगे। राजकुल से बहिष्कृत यदु दुर्गम क्रौंचवन में चला गया। वहाँ उसने हजारों राक्षसों को जन्म दिया।

मत्स्य पुराण आदि पुराणों के अनुसार यदु अपने समस्त भाइयों मे श्रेष्ठ एवं तेजस्वी निकला। यदु का विवाह धौमवर्ण की पाँच कन्यायों के साथ हुआ। इन रानियों से यदु का यादव वंश चला जो वीरता और धर्म परायणता के लिए जाना गया। इसी वंश में भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम प्रकट हुए तथा इसी वंश में कंस जैसा राक्षस उत्पन्न हुआ।

मत्स्य पुराण में लिखा है कि यदु के पांच पुत्र हुए जो सभी देवपुत्र सदृश तेजस्वी, महारथी और महान् धनुर्धर थे। उनके नाम सहस्रजि, कोष्टु, नील, अंतिक और लघु थे। सहस्रजि का पुत्र शतजि हुआ। शतजि के हैहय, हय और वेणुहय नामक तीन यशस्वी पुत्र हुए। हैहय के वंश में उत्पन्न रुद्रश्रेण्य वाराणसी नगरी का राजा हुआ।

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इसी रुद्रश्रेण्य के वंश में आगे चलकर हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का जन्म हुआ। उसने दस हजार वर्षों तक भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके चार वरदान प्राप्त किए। इनमें से पहला वरदान यह था कि मेरी एक हजार भुजाएं हों। दूसरा वरदान यह था कि जो लोग सत्पुरुषों के साथ अधर्म करते हैं, मैं उनका निवारण करूं। तीसरा वरदान यह था कि मैं सम्पूर्ण धरती को युद्ध में जीतकर उसका पालन करूं। चौथा वरदान यह था कि रणभूमि में युद्ध करते समय केवल वही व्यक्ति मेरा वध करे जो मुझसे अधिक बलवान हो। वह जब भी युद्ध क्षेत्र में उतरता था, तब उसकी सहस्र भुजाएं प्रकट हो जाती थीं। उसी के अनुरूप उसके रथ, अस्त्र-शस्त्र एवं ध्वजा आदि भी प्रकट हो जाते थे। इस वरदान के कारण हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन कहलाने लगा। हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए सातों द्वीपों को जीत लिया और उनका अधीश्वर बन गया। उसने सातों द्वीपों में दस हजार यज्ञों का आयोजन करवाया तथा प्रत्येक यज्ञ में ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा प्रदान की। उन यज्ञभूमियों में गड़े हुए यूप तथा यज्ञवेदिकाएं स्वर्ण-निर्मित थे। समस्त यज्ञकुण्ड विमानारूढ़ देवताओं द्वारा सुशोभित थे जो यज्ञ में अपना भाग लेने के लिए आए थे। गंधर्व और अप्सराएं भी नित्य आकर उन यज्ञों की शोभा बढ़ाती थीं।

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन रथ पर आरूढ़ होकर, हाथ में तलवार, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपों में भ्रमण करता हुआ चोर-डाकुओं को दण्डित करता था। वह पिच्यासी हजार वर्षों तक भूतल पर शासन करके समस्त रत्नों से परिपूर्ण होकर चक्रवर्ती सम्राट बना रहा।

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ही अपने योगबल से धरती भर के पशुओं का पालक था, वही खेतों का रक्षक था और वही समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। उसने कर्कोटक नाग के पुत्र को जीतकर उसे अपनी माहिष्मती पुरी में बांध रखा था। जब वह जलक्रीड़ा करता था, तब अपनी एक हजार भुजाओं से समुद्र को मथ देता था जिससे पाताल में रहने वाले नाग एवं दैत्य व्यथित हो जाते थे। सहस्रार्जुन की भृकुटि से भयभीत होकर नर्मदा स्वतः उसके निकट आ जाती थी।

एक बार अर्जुन ने लंका नगरी में जाकर पुलस्त्य के पौत्र रावण को अपने धनुष की प्रत्यंचा से बांध लिया तथा अपनी राजधानी माहिष्मती में ले आया। जब महर्षि पुलस्त्य को इस बात का पता लगा तो उन्होंने माहिष्मती जाकर अर्जुन को बहुत समझाया। इस पर सहस्रार्जुन ने रावण को मुक्त कर दिया।

एक बार सहस्रार्जुन ने सूर्य देव के कहने पर एक वन को जलाकर राख कर दिया। उस वन में आपव नामक ऋषि की कुटिया थी, वह भी उस वन के साथ जल गई। आपव ऋषि एक हजार वर्ष से एक सरोवर में बैठकर तपस्या कर रहे थे।

उन्होंने जब समाधि टूटने पर देखा कि सहस्रार्जुन ने उनकी कुटिया जला दी है तो आपव ऋषि ने अर्जुन को श्राप दिया कि भृगुकुल में उत्पन्न परशुराम तेरी एक हजार भुजाएं काटकर तेरा वध करेंगे। समय आने पर भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन की एक हजार भुजाएं काट दीं तथा उसका वध कर दिया। इसी सहस्रार्जुन के वंश में तालजंघ नामक क्षत्रियों का कुल उत्पन्न हुआ। उनकी कहानी फिर कभी कहेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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