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आजम हुमायूं शेरवानी को इब्राहीम लोदी ने छल से पकड़ लिया (162)

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आजम हुमायूं शेरवानी - www.bharatkaitihas.com
आजम हुमायूं शेरवानी को इब्राहीम लोदी ने छल से पकड़ लिया

सुल्तान इब्राहीम लोदी ने अपने पिता सिकंदर लोदी का सपना पूरा करने के लिए आजम हुमायूं शेरवानी नामक एक शक्तिशाली अमीर को ग्वालियर पर हमला करने भेजा। आजम हुमायूं शेरवानी के पास अपने पचास हजार घुड़सवार थे। सुल्तान इब्राहीम लोदी ने उसे 30 हजार घुड़सवार तथा 300 हाथीसवार योद्धा भी प्रदान किए।

आजम हुमायूं शेरवानी चम्बल से लेकर ग्वालियर तक के मार्ग की समस्त गढ़ियों पर अधिकार जमाता हुआ, ग्वालियर तक पहुंच गया। आजम हुमायूं की आंधी में तोमरों की गढ़ियां खाली होती चली गईं तथा तोमर सैनिक भाग-भाग कर ग्वालियर के दुर्ग में एकत्रित होने लगे। इस दुर्ग में पच्चीस हजार से अधिक मनुष्य नहीं आ सकते थे। अतः दुर्ग शीघ्र ही सैनिकों से भर गया।

आजम हुमायूं शेरवानी भी अपनी भारी सेना के साथ आया तथा दुर्ग को घेर कर बैठ गया। उसने दुर्ग के दरवाजों के सामने साबात बनवाए तथा उन पर तोपें जमाकर दुर्ग पर पत्थर के गोले बरसाने लगा। दुर्ग के भीतर से राजपूत सैनिक जलते हुए कपड़े, तीर तथा पत्थरों की बरसात करने लगे। इस प्रकार दोनों पक्षों में घमासान छिड़ गया।

लगभग तीन-चार वर्ष तक दोनों पक्षों में भयानक युद्ध चलता रहा। इसके बाद आजम हुमायूं शेरवानी की सेना तोमर राजा विक्रमादित्य पर भारी पड़ने लगी। जब सुल्तान इब्राहीम लोदी को उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि आजम हुमायूं सफलता के बहुत निकट पहुंच गया है तो इब्राहीम लोदी बेचैन हो गया।

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सुल्तान नहीं चाहता था कि जो सफलता उसके पिता सिकंदर लोदी को प्राप्त नहीं हो सकी थी, वह सफलता आजम हुमायूं को मिले। सुल्तान इस सफलता का श्रेय स्वयं लेना चाहता था। इसलिए सुल्तान ने आजम हुमायूं को परिदृश्य से हटाने का निर्णय लिया। उसने बहुत से अमीरों को उनके सैनिकों के साथ ग्वालियर भेज दिया तथा आजम हुमायूं शेरवानी को सुल्तान से मिलने के लिए दिल्ली बुलवाया।

नए अमीरों के दल ने ग्वालियर दुर्ग के चारों ओर पड़ी हुई मुस्लिम सेना पर घेरा डाल दिया तथा आजम हुमायूं शेरवानी को सुल्तान का आदेश बताया। आजम हुमायूं समझ गया कि सुल्तान इब्राहीम लोदी आजम हुमायूं शेरवानी के साथ कोई बड़ी चाल चलने वाला है।

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आजम हुमायूं के सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि जब जीत मिलने ही वाली है, तब वह युद्ध को इस तरह बीच में छोड़कर दिल्ली नहीं जाए किंतु हुमायूं आजम युद्ध के इस संवेदनशील बिंदु पर सुल्तान के आदेशों की अवहेलना करके अपने तथा अपने साथियों के प्राण संकट में नहीं डालना चाहता था। हुमायूं के एक तरफ तोमर थे जो किले से आग बरसा रहे थे तो दूसरी ओर दिल्ली के सैनिक थे जो उसे चारों ओर से घेरकर बैठ गए थे। इसलिए आजम हुमायूं अपने थोड़े से अनुचरों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गया। आजम हुमायूं शेरवानी के कुछ विश्वसनीय सलाहकार उसे चम्बल नदी तक पहुंचाने आए। उन्होंने मार्ग में आजम हुमायूं से पुनः प्रार्थना की कि इस तरह मौत के मुंह में जाने से तो अच्छा है कि बगावत कर दी जाए तथा इब्राहीम लोदी को सबक सिखाया जाए किंतु आजम हुमायूं ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। अंततः वह दिन भी आया जब आजम हुमायूं सुल्तान इब्राहीम लोदी के समक्ष उपस्थित हुआ। इब्राहीम ने इस पल की अच्छे से तैयारी कर रखी थी। सुल्तान के संकेत पर आजम हुमायूं शेरवानी को बंदी बनाकर जंजीरों में जकड़ लिया गया तथा उसे मजबूत जेल में बंद करके कड़ा पहरा लगा दिया गया।

इस प्रकार दुर्दांत आजम हुमायूं शेरवानी जिसने पूर्व सुल्तान सिकंदर लोदी का जमकर विरोध किया था, साधारण अपराधियों की तरह कैदी होकर रह गया।

उस काल की राजनीतिक चौसर ऐसी ही धोखेबाज, रक्त-प्रिय तथा सिद्धांतहीन थी। इसलिए केवल इब्राहीम को दोष देना व्यर्थ है। यदि सुल्तान ने मानवता को ताक पर रखकर आजम हुमायूं को बंदी नहीं बनाया होता तो कौन जाने ग्वालियर की विजय के मद में अंधा होकर आजम हुमायूं ही एक दिन सुल्तान इब्राहीम लोदी की छाती पर चढ़ बैठता। दिल्ली सल्तनत की घृणित राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं था।

सुल्तान इब्राहीम लोदी की राह के दो बड़े कांटे निकल चुके थे। जलाल खाँ मारा जा चुका था और आजम हुमायूं जेल में बंद था। अब केवल एक ही बड़ा कांटा बचा था- राजा विक्रमादित्य तोमर। उसे उखाड़ फैंकना अब अधिक कठिन नहीं था। सुल्तान स्वयं एक सेना लेकर ग्वालियर के लिए रवाना हुआ।

ग्वालियर के दुर्ग की तलहटी में सुल्तान के लिए दीवाने-खास का प्रबंध किया गया ताकि सुल्तान अमीरों से सलाह कर सके। दिल्ली सल्तनत के समस्त अमीर आज्ञाकारी अनुचरों की भांति इस दरबार में उपस्थित हुए। सुल्तान ने समस्त अमीरों से दुर्ग को शीघ्र भंग करने के सम्बन्ध में सुझाव मांगे।

अहमद यादगार नामक मुगलकालीन लेखक ने लिखा है कि राजा विक्रमादित्य ने सात मन सोना, श्यामसुंदर नामक अपना निजी हाथी तथा अपनी पुत्री सुल्तान को देने का प्रस्ताव किया किंतु सुल्तान ने उस प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया। अहमद यादगार उस काल का सर्वाधिक अविश्वसनीय लेखक था। उसने सिकंदर लोदी की पराजयों को भी विजय के रूप में प्रदर्शित किया था। अतः उसके इस कथन का विश्वास नहीं किया जा सकता।

अमीरों के सुझाव पर सुल्तान इब्राहीम लोदी ने बादलगढ़ की दीवारों में बारूद भरकर उनमें पलीता दिखा दिया। उल्लेखनीय है कि ग्वालियर दुर्ग के पांच दरवाजों में से एक द्वार बादलगढ़ कहलाता था। यह इस दुर्ग का सबसे मजबूत दरवाजा था किंतु बारूद के धमाकों से उसकी दीवार हवा में उड़ गई।

बादलगढ़ के टूटने से ग्वालियर दुर्ग का मान भंग हो गया। बहुत से राजपूत सिपाही मारे गए। जीवित बचे हुए सिपाही भैंरोंपौर बंद करके उसके पीछे चले गए। सुल्तान के सिपाहियों ने बादलगढ़ के भीतर स्थित शिवजी का अत्यंत प्राचीन मंदिर तोड़ डाला।

शिवजी के मंदिर में लगे धातु के विशाल नंदी को उठाकर दिल्ली ले जाया गया और वहाँ बगदाद दरवाजे के बाहर डाल दिया गया। बाद में जब अकबर मुगलों का बादशाह हुआ तो उसने नंदी को आग में गलवा दिया तथा उसकी धातु से तोपें तथा बर्तन बनवाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया इब्राहीम लोदी ने (163)

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ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार - www.bharatkaitihas.com
ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया इब्राहीम लोदी ने

राजा विक्रमादित्य तोमर समझ चुका था कि मनुष्यों एवं पशुओं को खोने के बाद अब उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिसके सहारे वह इस युद्ध को जीत सके। इसलिए राजा ने इब्राहीम लोदी के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया!

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर के दुर्ग पर चार सालों से घेरा डालकर बैठे आजम हुमायूं शेरवानी को दिल्ली बुलाकर कैद कर लिया तथा स्वयं एक सेना लेकर ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार करने पहुंचा। इब्राहीम लोदी की सेना ने ग्वालियर दुर्ग के पांच द्वारों में से एक बादलगढ़ को तोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली।

इसी के साथ तोमरों की पराजय निश्चित जान पड़ने लगी किंतु अभी तोमर हार मानने को तैयार नहीं थे। यद्यपि बादलगढ़ के युद्ध में तोमरों की सेना का एक बड़ा भाग काम आ चुका था तथापि अभी ग्वालियर दुर्ग के चार द्वार सुरक्षित थे जिनके रहते ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर पाना संभव नहीं था। जिस प्रकार दुर्ग की दीवारों में बारूद भरकर बादलगढ़ तोड़ा गया, उसी प्रकार गणेशपौर तथा भैंरों पौर भी तोड़ी गईं किंतु तोमर सैनिकों ने एक-एक सीढ़ी के लिए युद्ध किया तथा अपने प्राणों की आहुति दी।

लक्ष्मण पौर पर यह युद्ध अपने चरम पर पहुंच गया। यहाँ इतना भीषण युद्ध हुआ कि दोनों ही तरफ के सिपाही अपने प्राणों का मोह छोड़कर केवल मरने के लिए लड़ने लगे। इब्राहीम लोदी का एक प्रमुख अमीर ताज निमाज भी लक्ष्मण पौर पर लड़ता हुआ मारा गया किंतु अंत में लक्ष्मण पौर टूट गई। अब केवल हथिया पौर ही सुरक्षित बची थी। जीवित बचे हुए तोमर सैनिक हथिया पौर के पीछे एकत्रित हो गए।

अब तक ग्वालियर के किले में ग्वालियर नगर से रसद आ रही थी किंतु सुल्तान की सेना ने रसद आपूर्ति के मार्ग का पता लगा लिया तथा दुर्ग में पहुंच रही रसद की आपूर्ति बंद कर दी। अब तक युद्ध को चलते हुए लगभग चार साल हो चुके थे। अतः दुर्ग में रसद की कमी चल रही थी। रसद आपूर्ति के बिल्कुल बंद हो जाने से दुर्ग में स्थित हिन्दू सैनिकों एवं उनके परिवारों की हालत खराब होने लगी।

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कुछ तत्कालीन लेखकों ने लिखा है कि मेवाड़ के महाराणा सांगा ने ग्वालियर की सहायता करने का प्रयास किया किंतु वे किले में सहायता पहुंचाने में सफल नहीं हो सके। महाराणा को लगता था कि ग्वालियर का युद्ध उस मोड़ पर पहुंच चुका है, जहाँ से उसके भाग्य को बदला नहीं जा सकता था किसी भी समय मुसलमानों का ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार हो सकता था। इसलिए महाराणा सांगा ने स्वयं को इस युद्ध से दूर रखने का निर्णय लिया।

ग्वालियर दुर्ग की अंतिम पौर अर्थात् हथिया पौर की स्थिति इस प्रकार की थी कि वहाँ तक न तो दुश्मन की तोपें पहुंच सकती थीं, न साबात बनाई जा सकती थी और न दीवारों में बारूद भरी जा सकती थी। इस कारण इब्राहीम लोदी को जीती हुई बाजी हाथ से जाती हुई दिखाई देने लगी किंतु इस समय तक ग्वालियर के अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे और दुर्ग के भीतर रसद पूरी तरह समाप्त हो गई थी। इस कारण राजा विक्रमादित्य तोमर इस युद्ध को और लम्बा नहीं खींच सकता था।

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राजा विक्रमादित्य की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि इस समय उसके पास न तो दुर्ग में घिरे हुए मनुष्यों को खिलाने के लिए अनाज बचा था और न दुर्ग में बंधे हुए पशुओं को खिलाने के लिए चारा बचा था। अधिकांश लोग मर चुके थे, जो जीवित थे, बुरी तरह घायल थे। बहुत से मनुष्य एवं पशु भूख और बीमारी के कारण अंतिम सांसें गिन रहे थे और तिल-तिल करके मौत के मुख में जा रहे थे। राजा समझ चुका था कि मनुष्यों एवं पशुओं को खोने के बाद अब उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिसके सहारे वह इस युद्ध को जीत सके। इसलिए राजा विक्रमादित्य ने इब्राहीम लोदी के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। जिन तोमरों के भय से दिल्लीपति को नींद नहीं आती थी और लोदी सैनिक पैर फैलाकर नहीं सोते थे, उन्हीं तोमरों की ओर से आया समर्पण का यह प्रस्ताव किसी अच्छे सपने के सच होने जैसा था। इब्राहीम लोदी की बांछें खिल गईं। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि तोमरों का राज्य सचमुच ही उसकी झोली में आ गिरेगा! उसने राजा विक्रमादित्य के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए उसे उत्तर भिजवाया कि वह किला खाली करके अपने परिवार एवं सम्पत्ति के साथ शम्साबाद चला जाए तथा सुल्तान की नौकरी करना स्वीकार करे।

विक्रमादित्य के पास इस अपमानजनतक शर्त को स्वीकार करने के अतिरिक्त केवल मृत्यु का ही मार्ग शेष बचा था किंतु उसने दुर्ग में जीवित बचे मनुष्यों एवं पशुओं के प्राणों की रक्षा के लिए सुल्तान द्वारा भिजवाए गए अपमानजनक आदेश को स्वीकार कर लिया।

एक बार फिर ग्वालियर दुर्ग की तलहटी में इब्राहीम लोदी का दरबार सजा। अमीरों ने सुल्तान को जीत की बधाई दी तथा राजा विक्रमादित्य बिना हथियारों एवं बिना अनुचरों के, सिर झुकाकर सुल्तान के दरबार में उपस्थित हुआ। सुल्तान ने राजा को शम्साबाद जाने की आज्ञा दी। इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

शम्साबाद ग्वालियर से लगभग डेढ़ सौ मील (240 किलोमीटर) तथा आगरा से लगभग एक सौ मील (160 किलोमीटर) दूर स्थित था किंतु राजा विक्रमादित्य ने सुल्तान से प्रार्थना की कि वह शम्साबाद जाने की बजाय सुल्तान के साथ आगरा चलना चाहता है। सुल्तान ने राजा विक्रमादित्य की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इस प्रकार ई.1523 में तोमरों को हमेशा के लिए ग्वालियर छोड़ देना पड़ा। मध्यएशिया से अफगानिस्तान के रास्ते भारत में आए तुर्क आक्रांताओं के समक्ष भारत के जिन राजवंशों को सर्वाधिक हानि उठानी पड़ी थी, उनमें से तोमर राजवंश भी था। उनसे दिल्ली छिन चुकी थी, आगरा छिन चुका था और अब ग्वालियर भी छिन रहा था। ग्वालियर का महान तोमर राजा दिल्ली के सुल्तान का छोटा सा जागीरदार बनकर रह गया।

जो राजा विक्रमादित्य संसार में किसी के सामने खड़ा नहीं होता था, अब उसे दिल्ली के सुल्तान के समक्ष खड़े ही रहना था। जो विक्रमादित्य अपनी मर्जी के बिना कहीं नहीं जाता था, अब उसे दिल्ली के सुल्तान के संकेत पर चाकरों की तरह दौड़ लगानी थी। ग्वालियर के तोमरों का सवा सौ साल पुराना गौरवशाली इतिहास अब नेपथ्य में जा रहा था।

काल के प्रवाह में भारत के राजकुलों का गौरव भाप बनकर उड़ रहा था। फिर भी वे विगत आठ सौ सालों से मुस्लिम सुल्तानों से लड़ रहे थे। भारत के क्षत्रिय मरना जानते थे, उन्हें प्राणों का मोह नहीं था। युद्धस्थल उनके लिए सर्वाधिक प्रिय स्थान था, इसीलिए वे आठ सौ सालों से युद्ध के मैदानों में टिके हुए थे। फिर भी कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य थी। उनमें एकता नहीं थी। उनमें से प्रत्येक राजंवश स्वयं को सबसे बड़ा मानता था, संभवतः इसीलिए प्रत्येक हिन्दू राजवंश अकेला था, उनका कोई स्वाभाविक और नैसर्गिक मित्र नहीं था।

इतिहासकार भले ही महाराणा सांगा की ओर से कुछ भी सफाई क्यों न दें किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यदि महाराणा सांगा ने भारत के अन्य हिन्दू राजाओं को साथ लेकर उसी समय दिल्ली की सेना को ग्वालियर के घेरे में घेर लिया होता तो भारत का भाग्य बदल सकता था किंतु भारत के हिन्दू राजवंश कभी एक नहीं हो सके। यदि हुए भी तो कुछ ही समय में फिर से बिखर गए। यही कारण था कि भारत के क्षत्रिय लड़ते थे, मरते थे किंतु जीतते नहीं थे।

कुछ समय बाद जब बाबर ने राजपूतों के विरुद्ध कई युद्ध जीत लिए तब उसने भारत के क्षत्रियों का विश्लेषण करते हुए लिखा- ‘राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते!’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विक्रमादित्य तोमर के पास था कोहिनूर हीरा (164)

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विक्रमादित्य तोमर - www.bharatkaitihas.com
विक्रमादित्य तोमर के पास था कोहिनूर हीरा

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर दुर्ग पर विजय प्राप्त करके राजा विक्रमादित्य तोमर को शम्साबाद का जागीरदार बनाया किंतु विक्रमादित्य शम्साबाद की बजाय अपने परिवार को लेकर आगरा के किले में रहने लगा।

हरिहर निवास द्विवेदी ने लिखा है कि धुरमंगद चम्बल की अपनी पुरानी गढ़ियों में चले गए और विक्रमादित्य अपने छोटे भाई अजीतसिंह तथा अपने पुत्र रामसिंह आदि को लेकर सुल्तान इब्राहीम के साथ आगरा चला गया। राजा विक्रमादित्य ग्वालियर से शम्साबाद क्यों नहीं गया, इसका कारण यह था कि राजा विक्रमादित्य के पास इतने सैनिक नहीं बचे थे जिनकी सुरक्षा में वह अपने परिवार को लेकर शम्साबाद जा सके।

मार्ग में विकट जंगल थे जिनमें अनेक लुटेरी जातियां निवास करती थीं। ऐसे बहुत से राज्य और गढ़ थे जिन्हें विक्रमादित्य के पूर्वजों ने एवं स्वयं राजा विक्रमादित्य ने भी कई बार दण्डित किया था। यदि उन्हें पता लग जाता कि राजा विक्रमादित्य बिना सेना के ही अपने परिवार एवं सम्पत्ति के साथ शम्साबाद जा रहा है, तो राजा एवं राजपरिवार का शम्साबाद तक जीवित पहुंचना संभव नहीं था।

यदि राजा विक्रमादित्य शम्साबाद पहुंच भी जाता और एक जागीरदार के रूप में वहाँ रहता, तो भी उसके शत्रु उसे शम्साबाद में नष्ट कर देते, राजा विक्रमादित्य अपनी तथा अपने परिवार की रक्षा नहीं कर सकता था। उस काल में राजा तथा उसका परिवार तभी तक सुरक्षित होते थे जब तक कि उसका किला, उसकी सेना तथा उसका कोष उसके अधिकार में रहते थे।

इसलिए राजा विक्रमादित्य अपने परिवार को साथ लेकर इब्राहीम लोदी के संरक्षण में ग्वालियर से आगरा पहुंचा। इब्राहीम लोदी ने भी विक्रमादित्य के सम्मान की रक्षा करते हुए उसके परिवार को ससम्मान आगरा के दुर्ग में रहने की व्यवस्था कर दी।

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गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है- ‘तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान!’ राजा विक्रमादित्य पर यह कहावत बिल्कुल सही बैठती थी। यह आगरा का वही दुर्ग था जिसे विक्रमादित्य के पुरखों ने बनाया था। आज उसी दुर्ग में तोमर राजपरिवार अनुगत के रूप में शरण लेने के लिए आया था।

ऐतिहासिक घटनाचक्र के आधार पर प्रतीत होता है कि विक्रमादित्य अपने परिवार एवं निजी सम्पत्ति के साथ आगरा के किले में ही रहता रहा। राजा विक्रमादित्य ने सुल्तान इब्राहीम की निष्ठापूर्वक सेवा की। जब ई.1526 में बाबर ने भारत पर हमला किया तब इब्राहीम लोदी को आगरा का किला छोड़कर पानीपत के मैदान में जाना पड़ा, तब इब्राहीम लोदी का सबसे बड़ा सहायक यही राजा विक्रमादित्य था। इब्राहीम लोदी ने अपने परिवार एवं अपने कोष को विक्रमादित्य के छोटे भाई अजीतसिंह के संरक्षण में छोड़ा तथा स्वयं राजा विक्रमादित्य को लेकर पानीपत चला गया।

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जब लड़ाई आरम्भ हुई तो बाबर की तोपों की मार से बचने के लिए सुल्तान के मुस्लिम सैनिक मैदान से भाग छूटे। तारीखे शाही के लेखक अब्दुल्ला ने लिखा है कि सुल्तान की सेना सुल्तान से रुष्ट थी। इसलिए युद्ध के मैदान से भाग खड़ी हुई। सुल्तान के मुट्ठी भर सैनिक ही बचे। राजा विक्रमादित्य एवं उसके सैनिक शरीर में प्राण रहने तक अंत तक मैदान में टिके रहे। तारीखे शाही के लेखक अब्दुल्ला ने इस युद्ध का वर्णन करते हुए छोटी-छोटी बातों के विवरण दिए हैं किंतु उसने राजा विक्रमादित्य के बलिदान का उल्लेख तक नहीं किया जबकि अन्य लेखकों ने विक्रमादित्य के बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। 20 अप्रेल 1526 को राजा विक्रमादित्य इब्राहीम लोदी की ओर से लड़ता हुआ पानीपत के मैदान में काम आया। इब्राहीम भी जीवित नहीं बच सका। हम इस युद्ध की चर्चा आगे चलकर यथास्थान करेंगे। जब कुछ दिनों बाद हुमायूं आगरा पर अधिकार करने पहुंचा, तब विक्रमादित्य का परिवार लाल किले में ही रह रहा था। विक्रमादित्य की विधवा रानी ने हुमायूं के पास संदेश भिजवाया कि यदि हुमायूं तोमर राजपरिवार को मुक्त करके चित्तौड़ जाने दे तो इसके बदले में रानी, हुमायूं को प्रचुर सम्पत्ति अर्पित करेगी। हुमायूं ने विक्रमादित्य की विधवा रानी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा रानी से धन लेकर उसे तथा उसके परिवार को चित्तौड़ चले जाने की अनुमति प्रदान कर दी।

कुछ ग्रंथों के अनुसार जब राजा विक्रमादित्य का परिवार अपने स्वामिभक्त सैनिकों की सुरक्षा में आगरा से चित्तौड़ जा रहा था, तब किसी ने हुमायूं से शिकायत की कि रानी ने हुमायूं को जो धन दिया है, वह बहुत तुच्छ है क्योंकि रानी के पास संसार का सबसे कीमती हीरा मौजूद है।

हुमायूं के सैनिकों ने रानी तथा उसके परिवार को मार्ग में ही जा घेरा तथा उससे हीरे की मांग की। रानी ने वह हीरा भी हुमायूं को समर्पित कर दिया। हुमायूं ने वह हीरा अपने पिता बाबर को समर्पित कर दिया। बाबर ने उस हीरे को ‘कोहेनूर’ अर्थात् ‘प्रकाश का पर्वत’ कहकर पुकारा तथा उसका मूल्य संसार के ढाई दिन के भोजन के व्यय के बराबार आंका तथा हीरा फिर से अपने पुत्र हुमायूं को दे दिया।

जब तोमर राजपरिवार चित्तौड़ पहुंचा तो चित्तौड़ के महाराणा सांगा ने उन्हें राजाओं की तरह चित्तौड़ दुर्ग के महलों में रखा। रानी के का पुत्र रामशाह बड़ा होकर चित्तौड़ के महाराणा की सेवा में रहने लगा। आगे चलकर जब ई.1576 में महाराणा प्रताप तथा अकबर के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ तब विक्रमादित्य का पुत्र रामशाह तोमरों का राजा था। उसे महाराणा प्रताप की ओर से अपनी सेना के रख-रखाव हेतु वेतन मिलता था।

हल्दीघाटी के युद्ध के समय रामशाह तोमर पर्याप्त वृद्ध हो चुका था। फिर भी रामशाह तोमर के नेतृत्व में तोमरों ने महाराणा प्रताप की तरफ से अकबर के विरुद्ध युद्ध किया। हल्दीघाटी के युद्ध में सिसोदियों से भी अधिक रक्त तोमरों ने बहाया था। राजा रामशाह ने अपने तीनों पुत्रों एवं कुल के अनेक पुरुषों सहित बलिदान दिया। मानो ऐसा करके तोमरों ने अपने पूर्वजों का, अपने शत्रु के रक्त से पिण्डदान किया था। उनके महान बलिदान की चर्चा फिर कभी अवसर आने पर करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा सांगा से पराजय (165)

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महाराणा सांगा से पराजय - www.bharatkaitihas.com
महाराणा सांगा से पराजय

ग्वालियर के तोमरों को हराकर इब्राहीम लोदी ने मध्य भारत पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली किंतु उसके बाद इब्राहीम लोदी की चित्तौड़ के शासक महाराणा सांगा से पराजय हो गई।

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर के दुर्ग पर विजय प्राप्त करके राजा विक्रमादित्य तोमर को शम्साबाद का जागीरदार बना दिया किंतु विक्रमादित्य शम्साबाद जाने की बजाय अपने परिवार को लेकर आगरा के किले में रहने लगा।

इस काल में दिल्ली सल्तनत की सीमा चित्तौड़ राज्य से लगती थी। उन दिनों महाराणा सांगा चित्तौड़ पर राज्य करता था। भारत के इतिहास में महाराणा सांगा अपनी तरह का अकेला वीर हुआ है। उसका पूरा जीवन युद्ध के मैदानों में बीता था और उसके शरीर में घावों के अस्सी निशान थे जो उसे युद्धों के मैदानों से मिले थे। इन युद्धों में राणा सांगा ने अपनी एक आँख, एक पैर और एक हाथ गंवाए थे।

जिस तरह लोदी सुल्तान भारत के हिन्दू राजाओं को समाप्त करके दिल्ली सल्तनत को फिर से, अल्लाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक कालीन सल्तनत की तरह विशाल बनाना चाहते थे, उसी तरह महाराणा सांगा का स्वप्न था कि भारत से म्लेच्छों का राज्य समाप्त करके फिर से हिन्दू राज्य की स्थापना की जाए।

इसलिए महाराणा सांगा ने इब्राहीम लोदी के पिता सिकंदर लोदी के समय से ही दिल्ली सल्तनत के इलाके छीनने आरम्भ कर दिए थे और सिकंदर लोदी महाराणा के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर पाया था। फिर भी सिकंदर लोदी ने चंदेरी पर अधिकार करके मेवाड़ के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी।

जब सिकंदर के बाद इब्राहीम लोदी दिल्ली का शासक हुआ तो भी महाराणा सांगा की कार्यवाहियां जारी रहीं। इस कारण इब्राहीम लोदी और महाराणा सांगा की महत्त्वाकांक्षाएं आपस में टकरा गईं। इब्राहीम के सुल्तान बनते ही महाराणा सांगा ने हाड़ौती की सीमा पर स्थित खातोली गांव के निकट इब्राहीम लोदी की सेना में कसकर मार लगाई।

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इब्राहीम लोदी को महाराणा सांगा से पराजय बहुत भारी पड़ी। इब्राहीम लोदी स्वयं तो युद्ध क्षेत्र से जान बचाकर भाग गया किंतु उसका एक शहजादा, महाराणा सांगा के हाथों पकड़ा गया जिसे सांगा ने कुछ दिनों बाद उदारता दिखाते हुए जीवित ही छोड़ दिया। इस युद्ध में महाराणा सांगा का बायां हाथ तलवार से कट गया और घुटने में एक तीर लगने से वह सदा के लिये लंगड़ा हो गया।

 ई.1518 में सुल्तान इब्राहीम लोदी की सेना ने पुनः मेवाड़ पर आक्रमण किया। दोनों पक्षों में धौलपुर के निकट लड़ाई हुई। इस युद्ध में पुनः इब्राहीम लोदी की महाराणा सांगा से पराजय हो गई। महाराणा ने सुल्तान की सेना को युद्ध के मैदान से भाग जाने पर विवश कर दिया तथा भागती हुई सेना का बयाना तक पीछा किया। इस युद्ध के परिणाम स्वरूप मालवा की तरफ का कुछ भाग, दिल्ली सल्तनत से निकल कर मेवाड़ राज्य को मिल गया।

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अब इब्राहीम स्वयं राणा का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। इस युद्ध में किसी भी पक्ष को सफलता नहीं मिली और दोनों ओर की सेनाएँ पीछे हट गईं। कुछ समय उपरान्त राणा ने चन्देरी पर अधिकार कर लिया और इब्राहीम लोदी उसे वापस लेने में असमर्थ रहा। उन्हीं दिनों जब मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी (द्वितीय) के विरुद्ध उसके अमीरों ने षड़यंत्र किया तो महमूद माण्डू से भाग निकला। अमीरों ने उसके भाई साहिब खाँ को मालवा का सुल्तान बना दिया। ऐसी स्थिति में मेदिनीराय नामक एक हिन्दू सरदार ने महमूद (द्वितीय) की बड़ी सहायता की तथा साहिब खाँ को परास्त करके महमूद को फिर से मालवा का सुल्तान बना दिया। महमूद ने मेदिनीराय को मालवा राज्य का प्रधानमंत्री बना लिया। मालवा के विद्रोही अमीरों ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से यह कहकर सहायता मांगी कि मालवा का राज्य हिन्दुओं के हाथों में चला गया है तथा महमूद तो नाम मात्र का सुल्तान रह गया है। इस पर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने साहिब खाँ को 12 हजार सैनिकों की एक सेना दी। उसकी सहायता के लिये गुजरात का सुल्तान मुजफ्फर भी मालवा की ओर बढ़ा। मेदिनीराय ने इन दोनों सेनाओं को पराजित कर दिया और मालवा में महमूद (द्वितीय) का राज्य स्थिर कर दिया।

निराश अमीरों ने मेदिनीराय के विरुद्ध महमूद (द्वितीय) के कान भरने शुरू कर दिये। इस पर महमूद (द्वितीय) ने मेदिनीराय को मारने का षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के कारण मेदिनीराय बुरी तरह घायल हो गया किंतु जीवित बच गया। इसके बाद मेदिनीराय सतर्क रहने लगा तथा 500 राजपूतों के साथ सुल्तान के महल में जाने लगा। इस पर महमूद भयभीत होकर गुजरात भाग गया।

महमूद ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को अपने साथ लेकर माण्डू पर आक्रमण किया। इस पर मेदिनीराय माण्डू दुर्ग की रक्षा का भार अपने पुत्र को सौंपकर, महाराणा सांगा से सहायता मांगने के चित्तौड़ पहुंचा। महाराणा ने मेदिनीराय के साथ माण्डू को प्रस्थान किया किंतु मार्ग में ज्ञात हुआ कि मुजफ्फरशाह ने कई हजार राजपूतों को मारकर माण्डू पर अधिकार कर लिया है तथा महमूद (द्वितीय) को फिर से मालवा का सुल्तान बना दिया है।

महाराणा सांगा मेदिनीराय को लेकर चित्तौड़ लौट आया और उसने गागरौन एवं चंदेरी के दुर्ग मेदिनीराय को जागीर में दे दिए। ई.1519 में माण्डू के सुल्तान महमूद (द्वितीय) ने गुजरात की सेना के भरोसे, गागरौन पर चढ़ाई की। गागरौन पर इस समय मेदिनीराय का प्रतिनिधि भीमकरण दुर्गपति के रूप में नियुक्त था। महाराणा सांगा ने भी अपनी सेना लेकर महमूद के विरुद्ध प्रस्थान किया। सांगा ने मालवा के तीस सरदार मार डाले तथा गुजरात की समस्त सेना को नष्ट कर दिया। गुजरात का सेनापति आसफ खाँ बुरी तरह घायल हुआ तथा उसका पुत्र मारा गया।

मालवा का सुल्तान महमूद (द्वितीय) भी युद्ध क्षेत्र में घायल होकर गिर गया। महाराणा ने उसे युद्ध के मैदान से उठवाकर अपने तम्बू में पहुंचाया तथा उसके घावों का उपचार करवाकर अपने साथ चित्तौड़ ले गया और कैद में रख दिया। जिस समय मालवा का सुल्तान राणा सांगा के हाथों कैद हुआ उस समय महमूद के पास एक रत्नजटित मुकुट और सोने की कमरपेटी भी थे। सांगा ने सुल्तान से ये दोनों वस्तुएं ले लीं तथा महमूद को मुक्त कर दिया।

ई.1520 में गुजरात तथा मालवा ने मिलकर एक साथ महाराणा सांगा पर चढ़ाई की किंतु सांगा ने उन्हें परास्त कर दिया। कुछ समय बाद गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह का पुत्र बहादुरशाह अपने दो भाइयों चांद खाँ तथा इब्राहीम खाँ के साथ महाराणा की शरण में आया। महाराणा ने बहादुरशाह तथा उसके भाइयों को उनके परिवारों सहित सम्मानपूर्वक अपने पास रखा।

जब दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया तब महाराणा सांगा और इब्राहीम लोदी के बीच युद्ध की भूमिका नए सिरे से तैयार हो गई। इसका कारण यह था कि महाराणा सांगा मालवा के खिलजी राज्य को नष्ट करके उसे मेवाड़ में मिलाना चाहता था जबकि दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी भी यही सपना देख रहा था।

इस प्रकार उस काल में दिल्ली, गुजरात, मालवा तथा मेवाड़ की राजनीतिक स्थिति इतनी भयानक हो गई थी कि जो दिल्ली सल्तनत मालवा एवं गुजरात के स्वतंत्र मुस्लिम राज्यों को फूटी आँख नहीं देख सकती थी, वह दिल्ली अब उन दोनों राज्यों की संरक्षक बनने का प्रयास करने लगी तथा महाराणा सांगा अकेला ही इन तीनों मुस्लिम राज्यों से मोर्चा ले रहा था। कर्नल टॉड के अनुसार सांगा ने दिल्ली एवं मालवा के सुल्तानों से 18 लड़ाइयां लड़ीं।

इस काल में न केवल इब्राहीम लोदी को महाराणा सांगा से पराजय का सामना करना पड़ रहा था अपितु मालवा एवं गुजरात की भी हालत पतली थी। महाराणा सांगा यदि थोड़ा भी प्रयास करता तो वह राजपूताने के अन्य हिन्दू राजाओं को अपने साथ लेकर सम्पूर्ण मध्य भारत पर अधिकार कर सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीरों की हत्या करवाता था इब्राहीम लोदी (166)

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तुर्की अमीरों की हत्या
तुर्की अमीरों की हत्या

बहुत से तुर्की अमीर सुल्तान इब्राहीम लोदी के साथ एक ही दरी पर बैठते थे और सुल्तान के सामने अपने हाथ अपनी छाती पर कैंची की तरह नहीं रखते थे। इस कारण सुल्तान इब्राहीम लोदी तुर्की अमीरों की हत्या करवा देता था। यदि कोई तुर्की अमीर गद्दारी करने का प्रयास करता था, तो उसके प्राण अवश्य ही ले लिए जाते थे।

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने ई.1523 में ग्वालियर दुर्ग पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त कर ली। इस विजय के बाद सुल्तान इब्राहीम लोदी स्वयं को उत्तर भारत के शासकों में सर्वाधिक शक्तिमान समझने लगा। उसने मियां हुसैन फार्मूली, मियां मारूफ, मियां हुसैन तथा मियां मकन आदि के नेतृत्व में चालीस हजार अश्वारोहियों की एक सेना मेवाड़ के महाराणा सांगा के विरुद्ध अभियान करने भेजी।

पाठकों को स्मरण होगा कि इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर युद्ध के दौरान अपने अमीरुल-अमरा आजम हुमायूं शेरवानी को छल से बंदी बनाया था और अपने भाई जलाल खाँ की छल से हत्या करवाई थी। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी अपने दो विरोधी अमीरों मियां हुसैन तथा मियां मारूफ से छुटकारा पाना चाहता था। अतः इब्राहीम लोदी ने मियां मकन को गुप्त आदेश दिया कि वह अवसर पाकर मियां हुसैन तथा मियां मारूफ को गिरफ्तार कर ले।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि मियां हुसैन को इस गुप्त मंत्रणा के बारे में पता लग गया और जब दिल्ली की सेनाएं मेवाड़ की सेनाओं के निकट पहुंचीं तो मियां हुसैन सुल्तान का पक्ष त्यागकर अपनी सेना के साथ महाराणा सांगा के पक्ष में चला गया। महाराणा सांगा अब तक कई युद्धों में दिल्ली की सेना में मार लगा चुका था। अतः वह दिल्ली की सेना की कमजोरियों से परिचित था। इस समय शाही सेना में 40 हजार अश्वारोही एवं 300 हाथी मौजूद थे। महाराणा सांगा के सैनिकों की संख्या ज्ञात नहीं है।

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दोनों पक्षों में जमकर घमासान हुआ जिसमें दिल्ली की सेना परास्त होकर भागने लगी। ‘तारीखे दाऊदी’ के अनुसार मेवाड़ की विजयी सेना ने इब्राहीम लोदी की सेना का बयाना तक पीछा किया तथा बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिकों की हत्या की।

मियां मकन किसी तरह जान बचाकर दिल्ली भाग गया। मुस्लिम लेखकों ने महाराणा की इस विजय के लिए मियां हुसैन की गद्दारी को जिम्मेदार ठहराया है किंतु यह बात सही प्रतीत नहीं होती। अब्दुल्ला ने लिखा है कि मियां हुसैन ने राणा के साथ युद्ध में भाग लिया जबकि रिज्कउल्ला ने लिखा है कि मियां हुसैन इस आक्रमण के समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था और अपने घोड़ों को तेजी से आगे नहीं बढ़ा रहा था।

अर्थात् रिज्कउल्ला के कथन से यह अर्थ निकलता है कि मियां हुसैन ने महाराणा का पक्ष ग्रहण नहीं किया था। अहमद यादगार ने लिखा है कि मियां हुसैन 4 हजार अश्वारोहियों सहित राणा से मिला। वह युद्ध क्षेत्र में मौजूद था किंतु उसने सुल्तान के नमक का विचार करके इस युद्ध में भाग नहीं लिया।

इन लेखकों के वक्तव्यों से स्पष्ट हो जाता है कि मियां हुसैन इस युद्ध से दूर अवश्य रहा था किंतु वह राणा सांगा की तरफ से नहीं लड़ा था। अतः दिल्ली की सेना की पराजय के लिए मियां हुसैन जिम्मेदार नहीं था।

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तत्कालीन मुस्लिम लेखकों ने लिखा है कि दिल्ली की सेना के पराजित होने का समाचार मिलने पर सुल्तान इब्राहीम लोदी स्वयं एक सेना लेकर सांगा से लड़ने के लिए आगरा से गंभीरी नदी तक आया। इसी समय मियां हुसैन तथा सुल्तान इब्राहीम लोदी के बीच सम्बन्ध सुधर जाने से मियां हुसैन फिर से सुल्तान की तरफ से लड़ने के लिए तैयार हो गया। रिज्कउल्ला लिखता है कि जब मियां हुसैन फिर से सुल्तान की तरफ चला गया तो राणा सांगा भयभीत होकर वापस लौट गया। ग्रामीणों ने उसके शिविर को नष्ट कर डाला। अतः महाराणा अपना शिविर अपने साथ नहीं ले जा सका। अन्य तत्कालीन मुस्लिम लेखकों के विवरण रिज्कउल्ला के विवरण से मेल नहीं खाते। अहमद यादगार कहता है कि मियां मकन के परास्त होकर भाग जाने के बाद मियां हुसैन ने मियां मारूफ के पास गुप्त-पत्र भिजवाया कि यद्यपि सुल्तान हम लोगों का महत्त्व नहीं समझता है तथापि हमें सुल्तान के तीस वर्षों के नमक का कर्ज अदा करना चाहिए। इसलिए हम दोनों मिलकर सांगा की सेना को नष्ट करते हैं। अहमद यादगार आगे लिखता है कि अर्द्धरात्रि के समय एक ओर से मियां मारूफ ने तथा दूसरी ओर से मियां हुसैन ने राणा सांगा की सेना पर आक्रमण करके उसे नष्ट कर दिया।

राणा स्वयं भी घायल होकर अधमरा हो गया एवं अपने लोगों के साथ भाग खड़ा हुआ। मियां हुसैन ने 15 हाथी, 300 घोड़े एवं अत्यधिक धन-सम्पत्ति सुल्तान के पास भिजवाए। इस पर सुल्तान ने मियां मारूफ को एवं मियां हुसैन को सम्मानित किया।

अहमद यादगार द्वारा दिया गया यह विवरण तारीखे दाउदी तथा वाकयाते मुश्ताकी के विवरण से मेल नहीं खाता। वस्तुतः मियां मारूफ एवं मियां हुसैन के पास इतनी सेना नहीं थी कि वे महाराणा की प्रबल सेना को नष्ट कर सकें। इसलिए तत्कालीन मुस्लिम लेखकों द्वारा सत्य से बहुत दूर, केवल झूठ के पुलिंदे रचे गए। वास्तविकता यह थी कि इस युद्ध में महाराणा सांगा ने दिल्ली की सेना को बुरी तरह परास्त किया था।

इस बात की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि इस युद्ध के कुछ समय बाद चंदेरी के युद्ध में सुल्तान इब्राहीम लोदी ने मियां हुसैन की छल से हत्या करवाई तथा उसके हत्यारों को भरे दरबार में पुरस्कृत भी किया। यदि मियां हुसैन ने सांगा पर विजय पाई होती तो इब्राहीम लोदी मियां हुसैन की हत्या नहीं करवाता।

सुल्तान इब्राहीम लोदी अपने ही तुर्की अमीरों की हत्या क्यों करवाता था, इस प्रश्न का जवाब स्वयं इब्राहीम लोदी ने एक बार तुर्की सुल्तानों में प्रचलित उस उक्ति के माध्यम से अनजाने में ही दिया था कि- ‘राजा का कोई सम्बन्धी नहीं होता, सभी लोग राजा के अधीनस्थ अमीर या प्रजा होते हैं।’

इब्राहीम के पिता सिकंदर लोदी ने अफगानी अमीरों को अपने समक्ष विनम्रता पूर्वक खड़े रहने के आदेश दिए थे किंतु इब्राहीम अपने पिता से भी आगे निकल गया। उसने अमीरों को बाध्य किया कि वे सुल्तान के समक्ष अपनी छाती पर अपने दोनों हाथों को कैंची की तरह एक पर एक रखकर खड़े हों। जो अमीर ऐसा नहीं करते थे, उन तुर्की अमीरों की हत्या होनी निश्चित थी।

इब्राहीम लोदी के दरबार में अब भी कुछ बूढ़े अमीर थे जो सुल्तान बहलोल लोदी के साथ कालीन पर बैठा करते थे और सिकंदर लोदी भी उन्हें अपने समक्ष खड़े रहने के लिए बाध्य नहीं कर पाया था, इन बूढ़े अमीरों ने इब्राहीम लोदी को अपने सामने बड़े होते देखा था, इसलिए उन्हें इब्राहीम लोदी के समक्ष अपने हाथ अपनी छाती पर कैंची की तरह रखने में शर्म अनुभव होती थी और वे भीतर ही भीतर सुल्तान के विरोधी हो जाते थे। जब यह विरोध मुखर हो जाता था तो सुल्तान उन तुर्की अमीरों की हत्या करवा देता था।

इब्राहीम लोदी ने मियां भुआ को मरवा दिया जो कि उस काल में इस्लामिक कानून का विशेषज्ञ माना जाता था तथा सिकंदर खाँ लोदी ने उसे न्याय कार्य में सुल्तान की सहायता करने के लिए नियुक्त किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीरों की बगावत को कुचल दिया इब्राहीम लोदी ने (167)

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तुर्की अमीरों की बगावत को कुचल दिया इब्राहीम लोदी ने

सुल्तान इब्राहीम लोदी ने अमीरों पर अंकुश रखने के लिए नियम एवं कायदे लागू किए जिसके कारण अनेक अमीर सुल्तान के विरोधी हो गए और अनेक तुर्की अमीरों ने बगावत कर दी। दिल्ली सल्तानत के सुल्तान के विरुद्ध तुर्की अमीरों की बगावत कोई नई बात नहीं थी। यह तो कुतुबुद्दीन एबक के समय से ही चल रही थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर के युद्ध के दौरान जब आजम हुमायूं शेरवानी को विजय मिलने ही वाली थी, तब उसने जीत का श्रेय स्वयं लेने के लिए आजम हुमायूं को ग्वालियर से दिल्ली बुलाकर कैद कर लिया। जब उसके पुत्र फतेह खाँ ने सुल्तान के इस कदम का विरोध किया तो सुल्तान के आदेश से फतह खाँ को भी बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया।

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इस पर आजम हुमायूं के दूसरे पुत्र इस्लाम खाँ ने सुल्तान से विद्रोह कर दिया। आजम हुमायूं के कुछ अमीर एवं सैनिक भी इस्लाम खाँ की तरफ हो गए। इन लोगों ने आगरा के सूबेदार अहमद खाँ पर आक्रमण कर दिया।

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हुमायूं लोदी नामक एक अमीर, सुल्तान का पक्ष त्यागकर अपनी जागीर लखनऊ में चला गया। सुल्तान को कुछ और अमीरों पर भी विद्रोह में मिले होने का अंदेशा हुआ। इसलिए सुल्तान ने अपने विश्वास के अमीरों को विद्रोही अमीरों पर आक्रमण करने भेजा। सुल्तान के विश्वास के अमीरों की सेनाएं, विरोधी अमीरों की सेनाओं से हारकर आ गईं। इस पर सुल्तान ने अपने विश्वास के अमीरों को चेतावनी दी कि यदि तुम उन बागियों को हरा नहीं पाते हो तो तुम्हारे साथ भी वैसा ही बर्ताव किया जाएगा, जैसा बागियों के साथ किया जाता है। सुल्तान की इस घोषणा के बाद कुछ और अमीर बागी हो गए और दूसरे बागियों से जा मिले। इस पर सुल्तान इब्राहीम लोदी स्वयं 50 हजार घुड़सवारों की एक सेना लेकर बागियों पर कार्यवाही करने के लिए आगरा से रवाना हुआ। उधर बागी अमीरों की संख्या बढ़ती जा रही थी, इसलिए उनकी सेना काफी बड़ी हो गई थी। तत्कालीन मुस्लिम लेखकों के अनुसार बागियों की सेना में चालीस हजार घुड़सवार, कई हजार पैदल सेना तथा पांच सौ हाथी सम्मिलित थे। शेख राजू बुखारी नामक एक मौलवी ने सुल्तान एवं बागी अमीरों के बीच मध्यस्थता का प्रयास किया किंतु दोनों पक्ष एक दूसरे की कोई बात मानने को तैयार नहीं थे, इसलिए शेख राजू बुखारी असफल हो गया।

तुर्की अमीरों की बगावत में शामिल आजम हुमायूं शेरवानी और उसके पुत्र फतह खाँ की रिहाई की मांग कर रहे थे किंतु सुल्तान इब्राहीम अमीरों की इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं था। अंततः दोनों पक्षों में भयानक संग्राम छिड़ गया।

अहमद यादगार ने अपने ग्रंथ मखजाने अफगना में इस युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है-

‘लाशों के ढेर लग गए और युद्धक्षेत्र उनसे ढक गया, पृथ्वी पर पड़े हुए सिरों की संख्या कल्पनातीत थी। मैदान में रक्त की नदियां बहने लगीं और इसके बाद दीर्घकाल तक, जब भारत में कोई भयंकर युद्ध हुआ तो लोग यही कहते थे कि किसी भी युद्ध की तुलना इस युद्ध से नहीं की जा सकती।

इसमें भाई ने भाई और पिता ने पुत्र के विरुद्ध तलवारों से युद्ध किया। धनुष-बाण अलग फैंक दिए गए। भालों, तलवारों, चाकुओं और बरछों से नरसंहार हुआ। अंत में इब्राहीम की विजय हुई। उसने विद्रोहियों को परास्त किया। इस्लाम खाँ मारा गया और सैय्यद खाँ बंदी बना लिया गया। जो लोग सुल्तान के प्रति वफादार रहे, उन्हें पुरस्कृत किया गया। बागियों की जागीरें छीनकर, अपने पक्ष के अमीरों को दे दी गईं।’

तुर्की अमीरों की बगावत को कुचलने में मिली सफलता ने इब्राहीम लोदी को और भी अधिक अहंकारी तथा धृष्ट बना दिया। सुल्तान के दुर्भाग्य से आजम हुमायूं शेरवानी तथा कुछ अमीरों की कैद में ही मृत्यु हो गई इस कारण चारों तरफ फिर से सुल्तान के विरुद्ध वातावरण बनने लगा।

 बिहार में सूबेदार दरिया खाँ लोहानी, खानेजहाँ लोदी, मियां हुसैन करमाली तथा अन्य अमीरों ने विद्रोह कर दिया। जब सुल्तान ने चंदेरी पर घेरा डाला तब सुल्तान ने मियां हुसैन करमाली की हत्या करवा दी। इससे बागी अमीरों को यह विश्वास हो गया कि जब तक इब्राहीम सुल्तान के तख्त पर बैठा है, तब तक हमारा जीवन सुरक्षित नहीं है। इसलिए वे इब्राहीम को सुल्तान के पद से हटाने के उपाय सोचने लगे। इस प्रकार तुर्की अमीरों की बगावत पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई।

उन्हीं दिनों बागियों के नेता दरियां खाँ लोदी की मृत्यु हो गई जो बिहार का सूबेदार था। उसके पुत्र बहादुर खाँ ने स्वयं को बिहार का सुल्तान घोषित कर दिया तथा मुहम्मदशाह की उपाधि धारण कर ली। जब दूसरे अमीरों को इस बगावत के बारे में पता लगा तो वे सुल्तान का साथ छोड़कर बिहार पहुंचने लगे तथा बहादुर खाँ के हाथ मजबूत करने लगे।

देखते ही देखते बहादुर खाँ की सेना में एक लाख घुड़सवार एकत्रित हो गए। उसने बिहार से लेकर संभल तक के समस्त प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया। गाजीपुर का सूबेदार नासिर खाँ लोहानी भी उससे जा मिला। इस पर इब्राहीम लोदी एक सेना लेकर इस विद्रोह को दबाने की तैयारियां करने लगा।

उन दिनों पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोदी का पुत्र गाजी खाँ दिल्ली में रहा करता था। वह चुपचाप दिल्ली से निकल गया तथा अपने पिता के पास पहुंचकर बोला कि यदि इब्राहीम ने बिहार के सूबेदार बहादुर खाँ को परास्त कर दिया तो वह आपको भी अवश्य ही पंजाब से हटा देगा।

इस पर दौलत खाँ भी बगावत पर उतर आया तथा उसने अपना दूत समरकंद के शासक बाबर के पास भेजा। दौलत खाँ लोदी ने बाबर से कहलवाया कि इस समय यदि बाबर दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करता है तो वह बड़ी आसानी से भारत पर अधिकार कर सकता है क्योंकि दिल्ली सल्तनत का एक भी अमीर इब्राहीम लोदी के पक्ष में नहीं है।

दौलत खाँ का मानना था कि यदि बाबर भारत पर आक्रमण करता है तो वह भी अपने पूर्वज चंगेज खाँ तथा तैमूर लंग की तरह दिल्ली को लूटकर और हिन्दुओं को मारकर वापस अपने देश लौट जाएगा। इसके बाद दौलत खाँ पंजाब में शांति के साथ राज्य कर सकेगा किंतु दौलत खाँ का सोचना गलत था।

उन्हीं दिनों इब्राहीम लोदी का चाचा आलम खाँ भी इब्राहीम लोदी से विद्रोह करके स्वयं सुल्तान बनने के प्रयास करने लगा। उसने भी बाबर के पास पत्र भिजवाकर उसे भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।

आधुनिक काल के बहुत से लेखकों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि मेवाड़ के महाराणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने की नीयत से बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया किंतु इन लेखकों के पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

महाराणा सांगा तो स्वयं ही मालवा, गुजरात, दिल्ली एवं नागौर की मुस्लिम शक्तियों को देश से बाहर निकालने का स्वप्न देख रहा था और लगातार युद्ध कर रहा था, ऐसी स्थिति में वह एक और मुस्लिम शक्ति को भारत में कैसे आमंत्रित कर सकता था?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इब्राहीम लोदी की हत्या (168)

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इब्राहीम लोदी की हत्या

भारत में ऐसा कौन था जो इब्राहीम लोदी की हत्या नहीं करना चाहता था किंतु भारत के किसी भी आदमी के लिए ऐसा करना संभव नहीं हुआ। अंत में यह कार्य समरकंद से आए मंगोल आक्रांता जहीरुद्दीन बाबर ने किया। उसकी सेना ने इब्राहीम लोदी का सिर काट दिया।

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी ने अपने कुछ विद्रोही अमीरों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का प्रयास किया तो कुछ अन्य अमीरों ने भी सुल्तान से विद्रोह कर दिया। इस पर इब्राहीम लोदी ने एक विशाल सेना लेकर बागी अमीरों की सेनाओं पर हमला बोला। इस कारण दिल्ली सल्तनत की सेनाएं आपस में ही कटकर मर गईं। सुल्तान को अपने बागी अमीरों पर विजय तो मिली किंतु अब दिल्ली सल्तनत की सैन्य-शक्ति अपने न्यूनतम स्तर पर जा पहुंची थी।

उन्हीं दिनों पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ तथा इब्राहीम के चाचा आलम खाँ ने समरकंद के शासक बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। इन अमीरों का विचार था कि बाबर अपने पूर्वजों चंगेज खाँ तथा तैमूर लंग की तरह भारत की सम्पदा लूटकर वापस अपने देश लौट जाएगा तथा अफगान अमीरों का लोदी सुल्तानों से पीछा छूट जाएगा।

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बाबर मूलतः समरकंद तथा फरगना का शासक था किंतु जब उसके चाचाओं और मामाओं ने उसे समरकंद तथा फरगना से निकाल दिया तो वह काबुल आ गया था। बाबर को भारत की राजनीतिक दुरावस्था का ज्ञान था। इस कारण उसकी दृष्टि बहुत दिनों से भारत पर लगी हुई थी। जब उसे अफगान अमीरों की ओर से निमंत्रण मिला तो ई.1524 में बाबर ने पंजाब पर आक्रमण किया। बाबर ने लाहौर तथा दिपालपुर पर अधिकार कर लिया। इसी बीच बाबर को बल्ख की रक्षा के लिए काबुल लौटना पड़ा। ई.1525 में बाबर ने फिर से पंजाब के लिए प्रस्थान किया। दिसम्बर 1525 में उसने पंजाब में प्रवेश किया। पंजाब में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया तथा पानीपत पहुँच कर डेरा डाला। दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी भी अपनी सेना लेकर आ गया। बाबर ने अपनी आत्मकथा में अपने सैनिकों की संख्या 12 हजार तथा इब्राहीम लोदी के सैनिकों की संख्या एक लाख बताई है। यह संभव है कि बाबर के पास केवल 12 हजार सैनिक हों किंतु इब्राहीम के पास उस समय एक लाख सैनिक नहीं थे। ‘दिल्ली के तोमर’ नामक ग्रंथ में हरिहर निवास द्विवेदी ने लिखा है कि इब्राहीम ने जितने सैनिक ग्वालियर-आक्रमण के समय जुटाए थे, उतने सैनिक वह पानीपत के लिए नहीं जुटा सका था।

‘तारीखेशाही’ के लेखक अब्दुल्ला ने लिखा है- ‘सुल्तान की अधिकांश सेना मारी गई, जो सुल्तान से रुष्ट थी, बिना लड़े ही भाग गई। सुल्तान अपने थोड़े से आदमियों के साथ खड़ा रहा। महमूद खाँ ने उसे रणक्षेत्र से भाग जाने की सलाह दी किंतु इब्राहीम ने कहा कि अच्छा तो यही है कि हम तथा हमारे मित्र सब एक ही स्थान पर धूल एवं रक्त में मिल जाएं।’

इब्राहीम के इन मित्रों में ग्वालियर का पूर्व शासक विक्रमादित्य तोमर भी था किंतु अब्दुल्ला ने अपनी पुस्तक में उसका नाम तक नहीं लिखा।

भीषण संग्राम के उपरान्त इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। 20 अप्रेल 1526 को इब्राहीम लोदी युद्ध क्षेत्र में ही मारा गया।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘ताहिर तीबरी इब्राहीम का सिर काटकर लाया। उसका सिर लाश के एक ढेर में मिल गया था।’

अबुलफजल ने अकबरनामा में लिखा है- ‘सुल्तान इब्राहीम एक कौने में मारा गया।’

 अब्दुल्ला ने लिखा है- ‘वह शोकप्रद दृश्य देखकर बाबर कांप उठा और इब्राहीम के शरीर को मिट्टी में से उठाकर कहा, तेरी वीरता को धन्य है। उसने आदेश दिया कि जरवफ्त के थान लाए जाएं और मिश्री का हलुआ तैयार किया जाए तथा सुल्तान के जनाने को नहला कर वहाँ दफ्न किया जाए, जहाँ वह शहीद हुआ था।’

अब्दुल्ला तथा अबुल फजल ने तो राजा विक्रमादित्य के बारे में कुछ नहीं लिखा किंतु बाबर ने उसके बारे में एक पंक्ति अवश्य लिखी है। बाबर लिखता है- ‘सुल्तान इब्राहीम की पराजय में ग्वालियर का राजा विक्रमादित्य नरकगामी हो गया था।’

खड्गराय ने लिखा है- ‘जिन थोड़े से मित्रों के साथ इब्राहीम ने रण में आहुत दी, उनमें एक विक्रमादित्य भी था।’

नियामतुल्ला ने लिखा है- ‘इब्राहीम की मजार पर बहुत से मुसलमान शुक्रवार के दिन एकत्रित हुआ करते थे और नरवर तथा कन्नौज के यात्री भी श्रद्धांजलि अर्पित करने आते थे।’

पानीपत में आज भी इब्राहीम लोदी की एक मजार स्थित है किंतु एक भी तोमर वीर की समाधि नहीं है। तोमरों की कोई समाधि वहाँ पर बनी भी नहीं थी।

युद्ध की समाप्ति के बाद बाबर मृतक शत्रुओं के सिरों का चबूतरा बनवाया करता था जिसे मुडचौरा कहा जाता था। पानीपत में भी उसने मुडचौरा बनवाया। चूंकि इस युद्ध में शत्रुओं के सिर कम थे इसलिए दोनों ओर के मृतकों के सिरों से मुडचौरा बनवाया गया।

इब्राहीम लोदी, दिल्ली सल्तनत का तीसरा और अन्तिम लोदी शासक था। मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार वह दानशील, संगीत-प्रेमी तथा विद्वानों का आश्रयदाता था। उसमें साहस, शौर्य तथा बुद्धि का भी प्राचुर्य था किंतु इब्राहीम लोदी का सम्पूर्ण जीवन चरित्र पढ़ने से अनुमान हो जाता है कि वह घमण्डी, जिद्दी तथा अनुदार व्यक्ति था। किसी पर भी दया नहीं करता था और किसी से भी उसे सहानुभूति नहीं थी। वह जिस व्यक्ति से अप्रसन्न हो जाता था, उसे कभी क्षमा नहीं करता था। चूंकि वह स्वयं किसी के भी साथ धोखा कर सकता था, किसी को भी मरवा सकता था, इसलिए वह किसी भी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करता था, चाहे वह कितना ही सगा क्यों न हो।

इब्राहीम लोदी ने सुल्तान की शक्ति को प्रबल बनाने का प्रयास किया परन्तु इस प्रयास में उसने अफगान अमीरों को अपना शत्रु बना लिया। इससे सल्तनत की सैनिक शक्ति का आधार ही खिसक गया। वह राणा सांगा को नहीं दबा सका। इस कारण राणा सांगा ने चन्देरी पर अधिकार कर लिया और बयाना तथा आगरा पर भी शिकंजा कस लिया।

इब्राहीम लोदी बिहार तथा पंजाब के प्रांतपतियों को भी नहीं दबा सका। बिहार में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई और पंजाब के प्रांतपति ने बाबर को देश पर आक्रमण करने के लिए बुला लिया। अंततः बाबर ने न केवल लोदी सल्तनत को अपितु दिल्ली सल्तनत को ही सदैव के लिए ध्वस्त कर दिया।

पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ और इब्राहीम लोदी के चाचा आलम खाँ का अनुमान था कि बाबर वापस काबुल चला जाएगा किंतु उनके अनुमान गलत सिद्ध हुए।

वस्तुतः इब्राहीम लोदी स्वयं तो अपनी असफलताओं के लिए दोषी था ही किंतु साथ ही वह पूरा युग और उसकी परिस्थितयाँ भी उसकी असफलताओं के लिए जिम्मेदार थे। अफगान सरदारों में भी अपने सुल्तान के प्रति वफादार रहने तथा सल्तनत को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त विवेक नहीं था। वे अपने स्वार्थ में डूबे हुए थे और सल्तनत की जड़ों पर चोट कर रहे थे।

महाराणा सांगा जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी का उदय और बाबर जैसे दुर्दान्त आक्रांता का आक्रमण भी युगीन परिस्थितियों की देन थे जिन पर इब्राहीम लोदी विजय प्राप्त नहीं कर सका। हालांकि ग्वालियर के तोमरों पर दिल्ली सल्तनत की विजय इब्राहीम लोदी को उसके दादा बहलोल लोदी और पिता सिकंदर लोदी से अधिक रणप्रिय सिद्ध करती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

काश्मीर का मुसलमानीकरण (169)

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काश्मीर का मुसलमानीकरण

काश्मीर का मुसलमानीकरण करने में जितना हाथ मुस्लिम आक्रांताओं का रहा, उससे भी अधिक हाथ सूफियों का रहा। सबसे पहले सूफियों ने काश्मीर में जाकर मुसलमानों की जनसंख्या का निर्माण करना आरम्भ किया।

यद्यपि सुल्तान इब्राहीम लोदी की मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उसका इतिहास समाप्त हो जाते हैं तथापि उस काल में उत्तर भारत के कुछ प्रबल राज्यों तथा दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक सम्बन्धों पर चर्चा किए बिना यह इतिहास पूरा नहीं होता।

बाबर ने अपने आत्मचरित ‘तुजुक-ए-बाबरी’ अर्थात् बाबरनामा में लिखा है-

‘उन दिनों जब मैंने हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त की, तब यहाँ पर पाँच मुसलमान और दो काफिर बादशाह शासन करते थे। वे एक-दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। इस देश में उनके सिवा और भी बहुत से छोटे-छोटे राजा थे। वे राव और राजा के नाम से विख्यात थे।

उनकी संख्या बहुत अधिक थी और वे थोड़े-थोड़े स्थानों के अधिकारी थे। इन छोटे राजाओं में से अधिकांश पहाड़ियों पर रहा करते थे। पाँच मुसलमान बादशाहों में पहला था अफगान सुल्तान जिसकी राजधानी दिल्ली थी, दूसरा गुजरात में सुल्तान मुजफ्फर था, तीसरा मुस्लिम राज्य दक्षिण में बहमनी राज्य था, चौथी मुस्लिम बादशाहत मालवा में थी, पाँचवाँ बादशाह बंगाल में नुसरतशाह था।

हिन्दुस्तान के काफिर राज्यों में विस्तार एवं सेना की अधिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा विजयनगर का राजा है तथा दूसरा राणा सांगा है।’

बाबर ने प्रान्तीय राज्यों की पूरी सूची नहीं दी है। उस समय भारत में काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, आसाम, मालवा, खानदेश, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा आदि प्रमुख प्रांतीय राज्य थे। इनमें से काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, मालवा तथा खानदेश मुस्लिम राज्य हो चुके थे जबकि आसाम, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा तथा विजयनगर प्रमुख हिन्दू राज्य थे। इनके अतिरिक्त और भी छोटे-छोटे हिन्दू राज्य पूरे देश में फैल हुए थे।

दक्षिण में विजयनगर और बहमनी राज्यों का दिल्ली सल्तनत से कोई राजनीतिक सम्पर्क नहीं था। बाबर के भारत आगमन के समय भारत के समस्त छोटे-बड़े हिन्दू एवं मुस्लिम राज्य अपनी-अपनी सीमाओं को बढ़ाने के लिए पड़ौसी राज्यों से लड़ते रहते थे। इस कारण उनकी सीमाएँ निरन्तर घटती-बढ़ती रहती थीं।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

पाठकों को स्मरण होगा कि मुहम्मद बिन तुगलक के समय से ही प्रांतपतियों पर केन्द्रीय शक्ति की पकड़ ढीली पड़ने लगी थी और कई प्रांतपति स्वयं को पूरी तरह स्वतंत्र करने में सफल रहे थे। फीरोज तुगलक के समय यद्यपि सल्तनत के अधीन बचे हुए प्रांतपतियों ने विद्रोह नहीं किये किंतु उन पर केन्द्रीय शक्ति का भय लगभग समाप्त ही हो गया था।

ई.1398-99 में तैमूर लंग के भारत अभियान के बाद भारत की केन्द्रीय शक्ति का पराभव हो गया। इस कारण भारत में अनेक प्रान्तीय राज्यों का उद्भव हुआ तथा सम्पूर्ण देश अनेक छोटे प्रांतीय राज्यों में विभक्त हो गया। इन राज्यों के कभी न खत्म होने वाले युद्धों, लूटमार तथा विध्वंसात्मक कार्यवाहियों से देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था व्याप्त हो गई जिससे देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास को गहरा आघात लगा।

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भारत के उत्तर में स्थित काश्मीर अनादि काल से हिन्दू संस्कृति का मुख्य केन्द्र था। इस कारण इस क्षेत्र में वैदिक संस्कृति के काल से ही हिन्दू राजा शासन करते आए थे। काश्मीर में महाभारत कालीन मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें गणपतयार तथा खीरभवानी का मंदिर प्रमुख हैं। मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में काश्मीर में बौद्धधर्म का प्रचार हुआ। जब काश्मीर पर कुषाणों का अधिकार हुआ, तब भी उनके संरक्षण में बौद्धधर्म फलता-फूलता रहा किंतु जब छठी शताब्दी ईस्वी में उज्जैन में महाराज विक्रमादित्य का शासन हुआ तब काश्मीर में हिन्दूधर्म पूरे उत्साह के साथ फिर से लौट आया। महाराजा ललितादित्य के समय में काश्मीर में हिन्दू संस्कृति का विशेष रूप से प्रसार हुआ। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही काश्मीर का मुसलमानीकरण आरम्भ हुआ। सबसे पहले काश्मीर में कुछ सूफियों ने आकर बसना आरम्भ किया। तब से काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या की बसावट होने लगी। कोटरानी काश्मीर की अंतिम हिन्दू शासक थी जिसने ई.1334 से ई.1339 तक काश्मीर पर शासन किया। उसके बाद ई.1399 में रामचंद्र काश्मीर का शासक हुआ। उसने शाह मिर्जा नामक एक व्यक्ति को अपना मंत्री बनाया जो ई.1320 से काश्मीर राज्य की सेना में नौकरी कर रहा था।

अभी राजा रामचंद्र कुछ दिन ही शासन कर सका था कि मन्त्री शाह मिर्जा ने छल से राजा रामचंद्र की हत्या कर दी और स्वयं काश्मीर का स्वतंत्र शासक बन बैठा। इसके बाद काश्मीर का मुसलमानीकरण तेजी से आरम्भ हुआ।

इस काल में भारत में दिल्ली सल्तनत अपने चरम पर थी और हिन्दू राजा अपने-अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए काश्मीर के हिन्दू राजवंश को कहीं से भी सहायता नहीं मिल सकी और वह इतिहास के नेपथ्य में चला गया।

शाह मिर्जा के वंश को काश्मीर के इतिहास में शाह मीर वंश कहा जाता है। इस वंश के शासक हिन्दुओं के प्रति अत्यंत कठोर रवैया रखते थे। उन्होंने हिन्दू प्रजा पर जजिया लगा दिया तथा शरीयत के अनुसार शासन करने लगे। इस कारण केवल मुसलमानों को ही राज्य के उच्च पदों पर रखा जाने लगा।

मिर्जा वंश के शासकों ने ई.1339 से ई.1585 तक काश्मीर पर शासन किया। शाह मीर वंश के लम्बे शासन काल में काश्मीर का मुसलमानीकरण बड़ी तेजी से हुआ। काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या का तेजी से प्रसार हुआ।

ई.1420 में शाह मिर्जा के वंश में जैनुलओबेदीन नामक शासक हुआ जो अपने पूर्ववर्ती शासकों की अपेक्षा उदार और सहिष्णु था। जैनुलओबेदीन ने भारत के अनेक हिन्दू एवं मुस्लिम राज्यों से अच्छे सम्बन्ध स्थापित किए। उसने अपने राज्य में हिन्दू जनता पर से जजिया हटा दिया तथा गौ-वध का निषेध कर दिया।

तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार जैनुलओबेदीन काश्मीरी, फारसी, हिन्दी और तिब्बती भाषाओं का विद्वान था। उसने महाभारत तथा राजतरंगिणी नामक संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया तथा अनेक फारसी ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद करवाया। उसने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की तथा जनता पर करों का बोझ कम किया। उसके शासन में काश्मीर की उन्नति हुई। ई.1470 में सुल्तान जैनुलओबेदीन की मृत्यु हो गई।

जैनुलओबेदीन के बाद उसका पुत्र हैदरशाह काश्मीर का सुल्तान बना। उसने अपने पिता की धर्मसहिष्णु नीतियों को जारी रखा। हैदरशाह के उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य निकले। परिणामस्वरूप काश्मीर में अराजकता फैल गई और मुस्लिम सरदार अनेक गुटों में बँट गए। सुल्तान इन सरदारों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया।

दिल्ली से बहुत दूर स्थित होने और आन्तरिक अवस्था बिगड़ी हुई होने के कारण दिल्ली सल्तनत के काल में काश्मीर उत्तरी भारत की राजनीति में कोई विशेष भूमिका नहीं निभा पाया। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने भी कभी काश्मीर पर अधिकार करने का प्रयास नहीं किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जौनपुर तथा खानदेश दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए (170)

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जौनपुर तथा खानदेश दिल्ली सल्तनत के काल में प्रांतीय मुस्लिम राज्य थे। जौनपुर तथा खानपुर दोनों के शासक दिल्ली के सुल्तान द्वारा नियुक्त किए जाते थे।

जौनपुर

जौनपुर उत्तर प्रदेश में गोमती नदी के तट पर स्थित है। कहा जाता है कि इस नगर की स्थापना दिल्ली के सुल्तान फीरोजशाह तुगलक ने ई.1359-60 में की थी। गोमती नदी पर स्थित यह नगर शीघ्र ही उन्नति को पहुँच गया और कुछ समय के लिए तो दिल्ली के बराबर स्तर पर आ गया।

जौनपुर के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मलिक सरवर, फीरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान मुहम्मद का गुलाम था जो अपनी योग्यता से ई.1389 में दिल्ली सल्तनत का वजीर बना। सुल्तान महमूद ने उसे ‘मलिक-उस-शर्क’ अर्थात् ‘पूर्व का स्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया। ई.1394 में मलिक सरवर को दो-आब का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया। उसने उस विद्रोह को ही नहीं दबाया अपितु अलीगढ़ से लेकर बिहार में तिरहुत तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया।

मलिक सरवर ने इस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की तथा अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाया। यद्यपि उसने स्वयं को कभी सुल्तान घोषित नहीं किया तथापि वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार करने लगा। तैमूर लंग के भारत-आक्रमण के समय मलिक सरवर ने अपने स्वामी सुल्तान महमूद को कोई सहायता नहीं भेजी। ई.1399 में मलिक सरवर की मृत्यु हो गई। उसके पीछे उसका वंश शर्की-वंश कहलाया।

मलिक सरवर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुबारकशाह जौनपुर के तख्त पर बैठा। उसने स्वयं को सुल्तान घोषित किया और अपने नाम का खुतबा भी पढ़वाया। सुल्तान महमूद के वजीर मल्लू इकबाल खाँ ने जौनपुर को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। ई.1402 में मुबारकशाह की मृत्यु हो गई।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मुबारकशाह का उत्तराधिकारी इब्राहीम शाह, शर्की वंश का योग्यतम शासक हुआ। उसने 35 वर्ष राज्य किया। उसके समय में दिल्ली और जौनपुर के सम्बन्धों में कटुता आ गई। दिल्ली के सैय्यद सुल्तानों के साथ उसके सम्बन्ध खराब रहे। इसका मुख्य कारण दोनों राज्यों की विस्तारवादी नीति थी।

इब्राहीम शाह शर्की ने बंगाल को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे कोई सफलता नहीं मिली। इब्राहीमशाह शर्की ने जौनपुर में मुस्लिम संस्कृति की उन्नति के लिए अनेक उपाय किए। उसके समय में जौनपुर उत्तर भारत में मुस्लिम संस्कृति का एक प्रमुख केन्द्र बन गया।

इब्राहीम शाह शर्की ने मुस्लिम विद्वानों को उदारतापूर्वक आश्रय प्रदान किया जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। इब्राहीमशाह ने जौनपुर में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। ई.1440 में उसकी मृत्यु हो गई।

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इब्राहीमशाह शर्की की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूदशाह शर्की जौनपुर का सुल्तान बना। उसे चुनार का दुर्ग जीतने में सफलता मिली परन्तु वह कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। महमूदशाह शर्की ने दिल्ली पर भी आक्रमण किया परन्तु बहलोल लोदी ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। महमूदशाह के इस कृत्य से दिल्ली और जौनपुर की प्रतिद्वन्द्विता और भी अधिक तीव्र हो गई। महमूदशाह के बाद उसका पुत्र मुहम्मद शाह शर्की जौनपुर का सुल्तान बना। उसके समय में भी दिल्ली और जौनपुर का संघर्ष जारी रहा। कुछ समय बाद मुहम्मदशाह शर्की के भाई ने सुल्तान मुहम्मदशाह शर्की की हत्या करवा दी और स्वयं हुसैनशाह के नाम से तख्त पर बैठ गया। उसके समय में बहलोल लोदी ने जौनपुर पर भीषण आक्रमण किया। ई.1479 में हुसैनशाह शर्की बुरी तरह परास्त होकर बिहार की ओर भाग गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत से अलग होने के 75 वर्ष बाद जौनपुर पुनः दिल्ली सल्तनत का सूबा बना। दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जौनपुर का भाग अपने बड़े पुत्र बारबकशाह को सौंप दिया। बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र निजाम खाँ ‘सिकन्दरशाह लोदी’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा।

जौनपुर के गवर्नर बारबकशाह ने दिल्ली की अधीनता मानने से मना कर दिया परन्तु सिकन्दर लोदी ने उसे पराजित करके दिल्ली के अधीन किया।

बारबकशाह अयोग्य निकला और जौनपुर में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। अन्त में सिकन्दर लोदी ने विद्रोह का दमन किया और जौनपुर में एक नये सूबेदार को नियुक्त किया। सिकंदर लोदी ने अपने बड़े भाई बारबकशाह को जेल में डाल दिया गया।

सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस अवसर पर इब्राहीम के भाई जलाल खाँ ने स्वयं को कालपी का सुल्तान घोषित कर दिया। इस पर इब्राहीम ने जलाल खाँ को जौनपुर का स्वतंत्र शासक बना दिया किंतु जब जलाल खाँ ने इस पर भी इब्राहीम लोदी का विरोध करना नहीं छोड़ा तो इब्राहीम लोदी ने उसकी हत्या करवा दी। इसके बाद जौनपुर कभी भी स्वतंत्र राज्य नहीं रहा।

खानदेश

जौनपुर तथा खानदेश दोनों ही दिल्ली सल्तनत के अधीन प्रांतीय मुस्लिम राज्य थे तथा दोनों के ही शासक दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध बगावत का झण्डा उठाए रहते थे। खानदेश भी दिल्ली सल्तनत का अंग था किंतु स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित होने में सफल रहा। खानदेश मध्य भारत में ताप्ती नदी की घाटी में स्थित था।

दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने मलिक राजा फारूकी को खानदेश का सूबेदार नियुक्त किया था। फीरोजशाह की मृत्यु के बाद केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ते ही फारूकी ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद कर लिए तथा स्वयं को खानदेश का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। कुछ समय बाद ही उसे गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह (प्रथम) से युद्ध करना पड़ा जिसमें खानदेश का सुल्तान राजा फारूकी परास्त हुआ। ई.1399 में उसकी मृत्यु हो गई।

मलिक राजा फारूकी के बाद उसका पुत्र मलिक नासिर खानदेश का सुल्तान बना। उसने असीरगढ़ को जीता किन्तु उसे गुजरात के सुल्तान अहमदशाह से परास्त होकर उसकी प्रभुसत्ता स्वीकार करनी पड़ी। बहमनी सुल्तान के हाथों भी उसे पराजय का स्वाद चखना पड़ा। ई.1438 में उसकी मृत्यु हो गई। उसके दो उत्तराधिकारी अयोग्य निकले।

ई.1457 में आदिल खाँ (द्वितीय) खानदेश का सुल्तान हुआ। उसने एक तरफ तो गोंडवाना को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधारों को लागू करके शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया।

ई.1501 में आदिल खाँ (द्वितीय) की मृत्यु के बाद उसका भाई दाऊद खाँ खानदेश का सुल्तान बना परन्तु ई.1508 में उसका देहान्त हो गया और उसका पुत्र गाजी खाँ खानदेश का सुल्तान हुआ परन्तु एक सप्ताह बाद ही उसे जहर देकर मार दिया गया।

दाऊद की मृत्यु के बाद खानदेश के तख्त के दो दावेदार उठ खड़े हुए। एक दावेदार का पक्ष अहमदनगर के सुल्तान ने लिया तो दूसरे दावेदार का समर्थन गुजरात के सुल्तान ने किया। अन्त में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा द्वारा समर्थित दावेदार शहजादा, आदिल खाँ (तृतीय) के नाम से खानदेश का शासक हुआ। उसे गुजरात के करद शासक की भाँति शासन करना पड़ा।

ई.1520 में आदिल खाँ (तृतीय) की मृत्यु हो गई तथा उसके बाद उसका पुत्र महमूद (प्रथम) खानदेश का सुल्तान बना। वह भी गुजरात की अधीनता में रहा। उसमें न तो शक्ति थी और न योग्यता।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘दिल्ली से दूर होने तथा इसकी आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उस युग की राजनीति में खानदेश का कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रहा।’

यदि जौनपुर तथा खानदेश दोनों की तुलना की जाए तो जौनपुर की तुलना में खानदेश दिल्ली के सुल्तान के लिए अधिक संकट खड़ा करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति (171)

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दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति

दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति कभी स्वतंत्र, कभी अर्द्धस्वतंत्र तो कभी पूर्णतः अधीनस्थ राज्य की रहती थी। दिल्ली से दूर होने के कारण दिल्ली के सुल्तान अधिक समय के लिए बंगाल को अपने अधीन नहीं रख पाते थे।

भारत के अन्य प्रांतों की तरह बंगाल पर भी अनादि काल से हिन्दू राजाओं का शासन रहा। जिस समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था, उस समय बंगाल में गंगारिदयी नामक राजवंश का शासन करता था। यहाँ के लोग आरम्भ से ही स्वातंत्र्य प्रकृति के रहे हैं, इस कारण यह क्षेत्र पाटलिपुत्र के मौर्यों के प्रभाव से मुक्त रहा।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में शशांक ने बंगाल में गौड़ राज्य की स्थापना की जिसने कन्नौज के मौखरी राजा ग्रहवर्मन को मारा था जो कि थानेश्वर के राजा राज्यवर्द्धन का बहनोई था। जब शशांक ने राज्यवर्द्धन को भी मार डाला तो हर्षवर्द्धन थानेश्वर का राजा हुआ और उसने शशांक को मारकर अपने बहनोई तथा बड़े भाई की हत्या का बदला लिया।

चूंकि शशांक का राजवंश हिन्दू था इसलिए उस काल के बौद्धधर्म से प्रभावित बिहार एवं बंगाल के राजाओं ने मिलकर शशांक को मार दिया तथा बंगाल में एक नवीन राजवंश की स्थापना हुई जो गौड़ राजवंश कहलाता था। गौड़ राजवंश ने बंगाल में बौद्धधर्म का प्रसार किया। गौड़ों के बांद बंगाल में पालवंश तथा पालवंश के बाद सेनवंश ने दीर्घकाल तक शासन किया।

उस काल में बंगाल की जनसंख्या इतनी अधिक नहीं थी जितनी कि आज है। तब का बंगाल भारत के अत्यधिक समृद्ध प्रदेशों में से एक था। ई.1205 में इख्तियारूद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बंगाल को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। यद्यपि वह कुतुबुद्दीन ऐबक के अधीन नहीं था तथापि उसने स्वयं को कुतुबुद्दीन के प्रति विश्वसनीय बनाए रखा। उसके बाद बंगाल पर फिर कभी हिन्दुओं का शासन नहीं हो सका।

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दिल्ली से अत्यधिक दूर होने के कारण बंगाल के अधिकांश सूबेदारों ने केन्द्रीय सत्ता से सम्बन्ध विच्छेद करके अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना के प्रयास किये। बंगाल के किसी भी सूबेदार के निर्बल होने की स्थिति में अन्य कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति उसे पदच्युत करके बंगाल की सत्ता हथिया लेता था।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘बंगाल की यह बड़ी विचित्र प्रथा है कि राज्य वंशागत अधिकार से बहुत कम प्राप्त होता है। बादशाह का अर्थ उसके राजतख्त से समझा जाता है। बंगाल वाले केवल तख्त तथा पद का सम्मान करते हैं …… जो कोई भी योद्धा, बंगाल के शासक की हत्या करके तख्त हथिया लेता है, वही बंगाल का बादशाह हो जाता है। बंगाल वालों का कथन है कि हम राजतख्त के भक्त हैं। जो कोई राजतख्त पर आरूढ़ होता है, हम उसके आज्ञाकारी बन जाते हैं।’

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इख्तियारूद्दीन खिलजी की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करने का प्रयत्न किया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच गया। उसने दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने बंगाल पहुंचकर विद्रोहियों को मार डाला तथा अलीमर्दा खाँ को बंगाल का गवर्नर बना दिया। अलीमर्दा खाँ ने कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे वार्षिक कर देने को तैयार हो गया। अलीमर्दा खाँ ने बंगाल पर बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन किया और कुतुबुद्दीन ऐबक के मरते ही अल्लाउद्दीन का विरुद धारण करके बंगाल का स्वतन्त्र सुल्तान बन गया। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के समय में हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। ई.1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने इल्तुतमिश का आधिपत्य स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया।

इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट गया परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने पुनः स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया।

इस पर इल्तुतमिश ने ई.1226 में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने भेजा। नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल का गवर्नर नियुक्त कर दिया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया किंतु जब नासिरुद्दीन दिल्ली चला आया तो बंगाल में पुनः अशांति फैल गई।

इल्तुतमिश ने ई.1230 में पुनः बंगाल पर आक्रमण किया और फिर से बंगाल पर अधिकार करके अल्लाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। आगे चलकर जब नासिरुद्दीन महमूद दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसके पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। सुल्तान नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में फिर से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

ई.1243 में जाजनगर के हिन्दू राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया। उसने बंगाल पर अधिकार करके उसे दिल्ली से स्वतंत्र कर लिया। कुछ समय बाद बंगाल फिर से दिल्ली के अधीन हो गया।

जब तुगरिल खाँ बंगाल का सूबेदार बना तो उसने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण कर दिया। इस पर जाजनगर के हिन्दू राजा ने तुगरिल खाँ को परास्त कर दिया। तुगरिल खाँ ने दिल्ली के सुल्तान बलबन से सहायता मांगी। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा।

तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर युद्ध के हर्जाने के रूप में बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। ई.1279 में बलबन बीमार पड़ा। इससे प्रेरित होकर तुगरिल खाँ ने स्वयं को पुनः स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण कर ली। उसने अपने नाम की मुद्राएं चलाईं और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया।

तुगरिल खाँ के इस व्यवहार से बलबन को बड़ी चिन्ता हुई, उसने तुगरिल खाँ के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन अपने पुत्र बुगरा खाँ को साथ लेकर एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। तुगरिल खाँ भयभीत होकर अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया।

लखनौती पर बलबन का अधिकार स्थापित हो गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ पकड़ा गया। उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया और स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल खाँ के साथियों तथा सम्बन्धियों को भी कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक हत्याकाण्ड चलता रहा।

विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल खाँ की हुई थी। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में बंगाल कभी स्वतंत्र, कभी अर्द्धस्वतंत्र तो कभी पूर्णतः अधीनस्थ रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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