पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण करते समय उनकी साहित्यिक परम्परा, रचनाकाल, विषयवस्तु और ऐतिहासिक उपयोगिता का अध्ययन आवश्यक है।

1. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उद्गम एवं विकास

पुराण भारतीय धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इनमें सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय, देवताओं, ऋषियों, राजवंशों, तीर्थों, व्रतों, धार्मिक अनुष्ठानों, दर्शन और भक्ति से सम्बन्धित विविध विषयों का वर्णन मिलता है।

पारम्परिक मान्यता के अनुसार महर्षि वेदव्यास को पुराणों का संकलनकर्ता माना जाता है। किन्तु आधुनिक ऐतिहासिक एवं पाठालोचनात्मक अध्ययन के अनुसार वर्तमान पुराणों को किसी एक लेखक की एक ही समय में लिखी गई रचनाएँ मानना उचित नहीं है। इनके विभिन्न अंशों का निर्माण, संकलन और पुनर्सम्पादन अलग-अलग कालों में हुआ।

2. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : अठारह महापुराण

हिन्दू धार्मिक परम्परा में अठारह महापुराणों तथा अठारह उपपुराणों की मान्यता प्रचलित है। अठारह महापुराणों की प्रचलित सूची निम्नलिखित है—

  1. ब्रह्म पुराण
  2. पद्म पुराण
  3. विष्णु पुराण
  4. शिव पुराण
  5. श्रीमद्भागवत पुराण
  6. नारद अथवा नारदीय पुराण
  7. मार्कण्डेय पुराण
  8. अग्नि पुराण
  9. भविष्य पुराण
  10. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  11. लिंग पुराण
  12. वराह पुराण
  13. स्कन्द पुराण
  14. वामन पुराण
  15. कूर्म पुराण
  16. मत्स्य पुराण
  17. गरुड़ पुराण
  18. ब्रह्माण्ड पुराण

कुछ सूचियों में शिव पुराण के स्थान पर वायु पुराण का नाम मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि पुराणों की सूची और क्रम के सम्बन्ध में विभिन्न परम्पराएँ प्रचलित रही हैं।

H3: 2.1. अल-बेरूनी का विवरण

अल-बेरूनी (973–लगभग 1048 ई.) ने अपनी पुस्तक किताब अल-हिन्द में भारतीय धार्मिक साहित्य का वर्णन किया। उनकी पुराण-सूची वर्तमान प्रचलित सूची से भिन्न है। यह अन्तर मध्यकालीन धार्मिक साहित्य की विविध परम्पराओं का संकेत देता है। हालाँकि केवल नामों की भिन्नता से किसी पुराण की निश्चित रचना-तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती।

3. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : रचनाकाल एवं श्लोक-संख्या

पुराणों की तिथि निर्धारित करना कठिन है, क्योंकि उनके वर्तमान पाठों में विभिन्न कालों की सामग्री सम्मिलित है। किसी पुराण में प्राचीन परम्परा का उल्लेख होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उसका पूरा ग्रन्थ उसी प्राचीन काल में लिखा गया था।

पुराणों की तिथि निर्धारित करने में भाषा, शैली, राजवंशों के उल्लेख, अन्य ग्रन्थों में उद्धरण, पाण्डुलिपियों तथा अभिलेखीय साक्ष्यों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है। इसलिए सभी पुराणों को 600 ईसा पूर्व तक रचित मानना उचित नहीं है।

H3: 3.1. अठारह महापुराणों की परम्परागत श्लोक-संख्या

परम्परा में अठारह पुराणों की कुल संख्या चार लाख श्लोक मानी जाती है। अलग-अलग ग्रन्थों में श्लोक-संख्या के भिन्न आँकड़े मिलते हैं।

पुराणप्रचलित परम्परागत श्लोक-संख्या
ब्रह्म10,000
पद्म55,000
विष्णु23,000
शिव24,000
श्रीमद्भागवत18,000
नारदीय25,000
मार्कण्डेय9,000
अग्नि15,400–16,000
भविष्य14,500
ब्रह्मवैवर्त18,000
लिंग11,000
वराह24,000
स्कन्द81,000
वामन10,000
कूर्म17,000
मत्स्य14,000
गरुड़19,000
ब्रह्माण्ड12,000

टिप्पणी: ये परम्परागत आँकड़े हैं, वर्तमान उपलब्ध संस्करणों की प्रमाणित श्लोक-गणना नहीं। विभिन्न पाठों और सूचियों में संख्याएँ भिन्न हो सकती हैं। इसलिए चार लाख श्लोकों की संख्या को परम्परागत समष्टिगत मान के रूप में समझना चाहिए।

4. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उपपुराण एवं वर्गीकरण

उपपुराणों की संख्या और सूची के विषय में भी मतभेद हैं। परम्परा में अठारह उपपुराणों की धारणा प्रचलित है, किन्तु विभिन्न ग्रन्थों में उनके नाम समान नहीं हैं। प्रो. आर. सी. हाजरा ने उपपुराण-साहित्य पर अध्ययन किया है। किसी निश्चित संख्या को सर्वमान्य मानने से पहले मूल स्रोत की जाँच आवश्यक है।

पद्म पुराण में पुराणों को सात्त्विक, राजस और तामस तीन वर्गों में बाँटने की परम्परा मिलती है। एक प्रचलित वर्गीकरण के अनुसार विष्णु, नारदीय, भागवत, गरुड़, पद्म और वराह सात्त्विक; ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, भविष्य और वामन राजस; तथा मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कन्द और अग्नि तामस पुराण माने जाते हैं। विभिन्न सूचियों में अन्तर भी मिलता है।

5. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : प्रतिपाद्य विषय

5.1. पंचलक्षण एवं दश-लक्षण

परम्परागत परिभाषा के अनुसार पुराण के पाँच लक्षण हैं—

  1. सर्ग: सृष्टि की उत्पत्ति।
  2. प्रतिसर्ग: सृष्टि की पुनर्रचना।
  3. वंश: देवताओं, ऋषियों और प्रमुख वंशों की परम्परा।
  4. मन्वन्तर: मनुओं से सम्बन्धित कालखण्ड।
  5. वंशानुचरित: राजवंशों तथा उनके प्रमुख व्यक्तियों के विवरण।

श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध, दशम अध्याय में दस लक्षण बताए गए हैं—सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय। ये पंचलक्षण से अलग हैं और पुराण की विषयवस्तु का अधिक व्यापक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।

5.2. धार्मिक, सामाजिक एवं ऐतिहासिक विषय

पुराणों में धर्म, आचार, आश्रमधर्म, दान, संस्कार, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, व्रत, विवाह, राजधर्म, कर्मविपाक और देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा जैसे विषय मिलते हैं। इनमें कुएँ, तालाब और जनकल्याण के कार्यों को धार्मिक महत्त्व देने वाली परम्पराएँ भी वर्णित हैं।

वायु, मत्स्य, विष्णु और ब्रह्माण्ड पुराणों में राजवंशों से सम्बन्धित सामग्री मिलती है। ये वंशावलियाँ प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में उपयोगी हैं, लेकिन इन्हें समकालीन ऐतिहासिक अभिलेखों के समान नहीं माना जा सकता। इनके विवरणों का अभिलेखों, मुद्राओं और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलान आवश्यक है।

6. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति

पुराणों ने हिन्दू धार्मिक परम्पराओं, भक्ति, तीर्थयात्रा, व्रत, संस्कार तथा देवताओं से सम्बन्धित आख्यानों के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। राम और कृष्ण की कथाओं, विष्णु के अवतारों, शिव की महिमा तथा देवी की उपासना से सम्बन्धित अनेक परम्पराओं के विकास में उनका योगदान रहा है।

हालाँकि आधुनिक हिन्दू धर्म को केवल पुराणों की देन मानना उचित नहीं है। वैदिक साहित्य, महाकाव्यों, आगमों, भक्ति-साहित्य और क्षेत्रीय धार्मिक परम्पराओं का भी इसमें योगदान रहा है।

पुराणों में सामाजिक आदर्शों, वर्ण-जाति व्यवस्था, धार्मिक निषेधों और स्त्री-पुरुष सम्बन्धी मान्यताओं का वर्णन भी मिलता है। इनका आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। किसी ग्रन्थ में वर्णित नियम को सभी समुदायों के वास्तविक सामाजिक व्यवहार का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

7. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : आलोचनात्मक मूल्यांकन

परम्परा में वेदव्यास को पुराणों का संकलनकर्ता माना गया है, जबकि आधुनिक पाठालोचनात्मक अध्ययन पुराणों के दीर्घकालीन विकास और विभिन्न पाठ-परम्पराओं पर बल देता है। इन दोनों दृष्टिकोणों को अलग-अलग समझना चाहिए।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में अनेक पौराणिक मान्यताओं की आलोचना की। उनके विचारों को उन्नीसवीं शताब्दी के धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन के सन्दर्भ में समझना आवश्यक है। इसी प्रकार शिव, विष्णु और देवी से सम्बन्धित आख्यानों का मूल्यांकन करते समय उनके मूल पाठ, प्रसंग और धार्मिक उद्देश्य को ध्यान में रखना चाहिए।

भविष्य पुराण और कल्कि पुराण सहित विभिन्न पुराणों की विषयवस्तु तथा पाठ-परम्पराओं में अन्तर उनके साहित्यिक विकास की जटिलता को दर्शाता है। केवल श्लोक-संख्या, नामों या विषयवस्तु में अन्तर के आधार पर रचनाकारों की मंशा के विषय में अन्तिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

8. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : निष्कर्ष

पुराण भारतीय इतिहास, धर्म, साहित्य और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें प्राचीन परम्पराओं, राजवंशों, धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक आदर्शों और दार्शनिक विचारों से सम्बन्धित सामग्री सुरक्षित है। किन्तु इनके सभी अंशों को एक ही काल की रचना अथवा समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख नहीं माना जाना चाहिए।

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण करते समय परम्परागत मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के बीच अन्तर बनाए रखना आवश्यक है। पुराणों की सूचनाओं का अभिलेखों, मुद्राओं, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और अन्य साहित्यिक स्रोतों से मिलान करके ही अधिक विश्वसनीय ऐतिहासिक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

9. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : संदर्भ ग्रन्थ

  1. डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग एक एवं चार।
  2. डॉ. राजबली पाण्डेय, हिन्दू धर्मकोश।
  3. अल-बेरूनी, किताब अल-हिन्द; अंग्रेजी अनुवाद: Alberuni’s India, एडवर्ड सी. सचाउ।
  4. एच. एच. विल्सन, The Vishnu Purana: A System of Hindu Mythology and Tradition।
  5. रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय।
  6. स्वामी दयानन्द सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाश।
  7. एफ. ई. पार्जिटर, Ancient Indian Historical Tradition।
  8. आर. सी. हाजरा, पुराण एवं उपपुराण साहित्य पर शोध-अध्ययन।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस आलेख को विस्स्तार से पढ़ें-

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उद्गम, विकास, महत्त्व पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उद्गम, विकास, महत्त्व एवं आलोचनात्मक अध्ययन

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