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महाराज ययाति इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा (14)

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महाराज ययाति इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा

नहुष की तरह नहुष का पुत्र महाराज ययाति भी अपने सद्कर्मों के कारण स्वर्ग में निवास करता था किंतु जब उसके सद्कर्म समाप्त हो गए तो महाराज इन्द्र के श्राप से स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा!

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि भोग-विलासों की निरर्थकाता समझकर राजा ययाति ने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौट दिया तथा स्वयं अपनी रानियों सहित पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगा। वहीं पर राजा ययाति ने अपनी देह का त्याग किया।

महाभारत एवं मत्स्य महापुराण आदि ग्रंथों में आई एक कथा के अनुसार देहत्याग करने के पश्चात् महाराज ययाति स्वर्ग पहुंचा तथा वहाँ बड़े आनंद से रहने लगा। इन्द्र, साध्य, मरुत् एवं वसु सहित समस्त देवगण महाराज ययाति का बहुत सम्मान करते थे। इस प्रकार हजारों वर्ष बीत गए। एक दिन इन्द्र ने राजा ययाति से पूछा- ‘राजन् जिस समय आपने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाया, उस समय आपने उसे क्या उपदेश दिया?’

इस परमहाराज ययाति ने कहा-

‘देवराज मैंने पुरु से कहा कि मैंने तुम्हें गंगा और यमुना के बीच के देश का स्वामी बनाया है। तुम्हारे भाई सीमांत प्रदेशों के राजा होंगे। हे पुत्र, क्रोधियों से क्षमाशील श्रेष्ठ हैं, और असहिष्णु से सहिष्णु। मनुष्येतर जातियों से मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मूर्ख मनुष्यों से बुद्धिमान मनुष्य श्रेष्ठ हैं। किसी के द्वारा बहुत सताए जाने पर भी हमें उसे सताने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

क्योंकि दुखी प्राणी का शोक ही सताने वाले का नाश कर देता है। मर्मभेदी और कड़वी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए। अनुचित उपाय से शत्रु को अपने वश में नहीं करना चाहिए। जिस बात से किसी को कष्ट पहुंचता हो, ऐसी बात तो पापी लोग बोलते हैं।

जो लोग अपनी कड़वी, तीखी और मर्मस्पर्शी बातों के कांटे से लोगों को सताता है, उसको देखना भी बुरा है। क्योंकि वह अपनी वाणी के रूप में एक पिशाचिनी को ढो रहा है। ऐसा आचरण करना चाहिए कि सत्पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ पीछे से भी तुम्हारी रक्षा करें।

दुष्ट लोग कोई कड़वी बात कहें तो सदा उसे सहन ही करना चाहिए तथा सदाचार का आश्रय लेकर सर्वदा सत्पुरुषों के व्यवहार को ही ग्रहण करना चाहिए। वाणी से भी बाण-वृष्टि होती है। जिस पर इसकी बौछारें पड़ती हैं, वह रात-दिन सोच में पड़ा रहता है। इसलिए ऐसी वाणी का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।

त्रिलोकी में सबसे बड़ी सम्पत्ति यह है कि सभी प्राणियों के प्रति दया और मैत्री का बर्ताव हो, यथाशक्ति सबको कुछ दिया जाए और मधुर वाणी का प्रयोग हो। सारांश यह कि कठोर वाणी न बोले। मीठी वाणी बोले, सम्मान करे, दान दे, और कभी किसी से कुछ नहीं मांगे। यही सर्वश्रेष्ठ व्यवहार का मार्ग है।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

ययाति की बात सुनकर नहुष ने पूछा- ‘नहुषनंदन! आपने गृहस्थाश्रम धर्म का पूरा-पूरा पालन करके वानप्रस्थाश्रम स्वीकार किया था। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्या में किसके समकक्ष हैं?’

महाराज ययाति ने कहा- ‘देवता, मनुष्य, गन्धर्व, और महर्षियों में अपने समान तपस्वी मुझे कोई नहीं दिखाई पड़ता।’

इन्द्र ने कहा- ‘तुमने सृष्टि के समस्त लोगों का प्रभाव अपने समान न जानकर, उन सबका तिरस्कार किया है। अपने मुंह अपनी करनी का बखान करने से तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया। यहाँ के सुख-भोगों को सीमा तो है ही, जाओ यहाँ से पृथ्वी पर गिर पड़ो।’

महाराज ययाति ने कहा- ‘ठीक है। यदि सबका अपमान करने से मेरा पुण्य क्षीण हो गया तो मैं यहाँ से संतों के बीच में गिरूं।’

इन्द्र ने कहा- ‘अच्छी बात।’

इसके पश्चात् राजा ययाति पवित्र लोकों से च्युत होकर उस स्थान पर गिरने लगे जहाँ अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान् और शिबि नामक ऋषि तपस्या करते थे। राजा ययाति को आकाश से धरती की तरफ आते देखकर अष्टक ने कहा-

‘युवक! तुम्हारा रूप इन्द्र के समान है। तुम्हें गिरते देखकर हम चकित हो रहे हैं। तुम जहाँ तक आ गए हो, वहीं पर ठहर जाओ और विषाद तथा मोह छोड़कर अपनी बात बताओ। इन सत्पुरुषों के समक्ष इन्द्र भी तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता। दुःखी और दीन लोगों के लिए संत ही परम आराध्य हैं। सौभाग्यवश तुम उन्हीं के बीच में आ गए हो। तुम अपनी व्यथा ठीक-ठीक सुनाओ!’

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ययाति ने कहा- ‘मैं समस्त प्राणियों का तिरस्कार करने के कारण स्वर्ग से च्युत हो रहा हूँ। मुझमें अभिमान था। अभिमान नरक का मूल है। सत्पुरुषों को दुष्टों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो लोग धन-धान्य की चिंता छोड़कर अपनी आत्मा का हित-साधन करते हैं, वही समझदार हैं। धन पाकर फूलना नहीं चाहिए। विद्वान् होकर अहंकार नहीं करना चाहिए। अपने विचार और प्रयत्न की अपेक्षा दैव की गति बलवान् है। ऐसा समझकर संताप नहीं करना चाहिए। दुःख से जले नहीं, सुख से फूले नहीं। दोनों में समान रहे। हे अष्टक! मैं इस समय मोहित नहीं हूँ और मेरे मन में कोई जलन भी नहीं है। मैं विधाता के विधान के विपरीत तो नहीं जा सकता, ऐसा समझकर मैं संतुष्ट रहता हूँ। अष्टक! मैं सुख-दुःख दोनों की अनित्यता जानता हूँ। फिर मुझे दुःख हो तो कैसे! क्या करूं, क्या करके सुखी रहूँ, इन झंझटों से मैं उन्मुक्त रहता हूँ। इसलिए दुःख मेरे पास नहीं फटकते।’

अष्टक ने पूछा- ‘आपकी बातों से लगता है कि आप अनेक लोकों में रह चुके हैं और आत्मज्ञानी नारदादि के समान भाषण कर रहे हैं। अतः बताइए, आप प्रधानतः किन-किन लोकों में रह चुके हैं?’

महाराज ययाति ने कहा- ‘मैं पहले पृथ्वी पर सार्वभौम राजा था। मैं एक सहस्र वर्ष तक महत् लोकों में रहा। तदनंतर सौ योजन लम्बी-चौड़ी सहस्रद्वार युक्त इन्द्रपुरी में एक सहस्र वर्ष तक रहा। तदनंतर प्रजापति के लोक में जाकर वहाँ भी एक सहस्र वर्ष तक रहा। मैंने नंदनवन में स्वर्गीय भोगों को भोगते हुए लाखों वर्षों तक निवास किया। वहाँ मैं सुखों में आसक्त हो गया और पुण्य क्षीण हो जाने पर पृथ्वी पर आ रहा हूँ। जैसे धन का नाश होने पर सगे-सम्बन्धी छोड़ देते हैं, वैसे ही पुण्य क्षीण हो जाने पर इन्द्रादि देवता भी परित्याग कर देते हैं।’

यह सम्पूर्ण वर्णन महाभारत तथा मत्स्य महापुराण सहित अनेक ग्रंथों में आया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति के पूर्वज ऋषियों के पुण्यकर्म (15)

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ययाति के पूर्वज ऋषियों के पुण्यकर्म

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि स्वर्ग से गिरते हुए राजा ययाति को ययाति के पूर्वज अष्टक ऋषि ने आकाश में ही रोककर उससे इस प्रकार गिरने का कारण पूछा। जब अष्टक को लगा कि राजा ययाति सामान्य व्यक्ति नहीं है, वह ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से अत्यंत परिपक्व है तो अष्टक ने ययाति से पूछा- ‘राजन्! किन कर्मों के अनुष्ठान से मनुष्य को श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति होती है? वे तप से प्राप्त होते हैं अथवा ज्ञान से?’

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राजा ययाति ने उत्तर दिया- ‘स्वर्ग के सात द्वार हैं- दान, तप, शम, दम, लज्जा, सरलता और सब पर दया। अभिमान से तपस्या क्षीण हो जाती है। जो अपनी विद्वता के अभिमान में फूले-फूले फिरते हैं और दूसरों के यश को मिटाना चाहते हैं, उन्हें उत्तम लोकों की प्राप्ति नहीं होती। उनकी विद्या भी उन्हें मोक्ष नहीं दिलवा सकती। अभय के चार साधन हैं- अग्निहोत्र, मौन, वेदाध्ययन और यज्ञ। यदि अनुचित रीति से और अहंकार पूर्वक उनका पालन होता है तो ये भय के कारण बन जाते हैं। सम्मानित होने पर सुख नहीं मानना चाहिए और अपमानित होने पर दुःखी नहीं होना चाहिए। जगत् में ऐसे लोगों की पूजा सत्पुरुष करते हैं। दुष्टों से शिष्ट बुद्धि की चाह निरर्थक है। मैं दूंगा, मैं यज्ञ करूंगा, मैं जान लूंगा, मेरी यह प्रतिज्ञा है, इस तरह की बातें बड़ी भयंकर हैं। इनका त्याग ही श्रेयस्कर है।’

ययाति के पूर्वज अष्टक ने पूछा- ‘ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी किन धर्मों का पालन करने से मृत्यु के बाद सुखी होते हैं?’

ययाति ने कहा- ‘जो ब्रह्मचारी आचार्य के आज्ञानुसार अध्ययन करता है, जिसे गुरुसेवा के लिए आज्ञा नहीं देनी पड़ती, जो आचार्य के जागने से पहले जागता और पीछे सोता है, जिसका स्वभाव मधुर होता है, जो इन्द्रियजयी, धैर्यशाली, सावधान तथा प्रमाद-रहित होता है, उसे शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है।

जो पुरुष धर्मानुकूल धन अर्जित करके यज्ञ करता है, अतिथियों को खिलाता है, किसी की वस्तु बिना उसके दिए नहीं लेता, वही सच्चा गृहस्थ है। जो स्वयं उद्योग करके फल-मूल से अपनी जीविका चलाता है, पाप नहीं करता, दूसरों को कुछ न कुछ देता रहता है, तथा किसी को कष्ट नहीं पहुंचाता, थोड़ा खाता और नियमित चेष्टा करता है, वह वानप्रस्थी शीघ्र सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

जो किसी कला-कौशल, भाषण, चिकित्सा, कारीगरी आदि से जीविका नहीं चलाता, समस्त सद्गुणों से युक्त जितेन्द्रिय, और असंग है, किसी के घर नहीं रहता, थोड़ा चलता है, अनेक देशों में अकेले और नम्रता के साथ विचरण करता है, वह सच्चा संन्यासी है।’

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इस प्रकार और बहुत सी वार्ता के बाद ययाति ने कहा- ‘देवता लोग शीघ्रता करने के लिए कह रहे हैं, मैं अब गिरूंगा, इन्द्र के वरदान से मुझे आप जैसे सत्पुरुषों का समागम प्राप्त हुआ है।’

ययाति के पूर्वज अष्टक ने कहा- ‘स्वर्ग में मुझे जितने लोक प्राप्त होने वाले हैं, अंतरिक्ष में अथवा सुमेरु पर्वत के शिखरों पर जहाँ भी मुझे पुण्यकर्मों के फलस्वरूप जाना है, उन्हें मैं आपको देता हूँ, आप गिरें नहीं।’

ययाति ने कहा- ‘मैं ब्राह्मण तो हूँ नहीं, दान कैसे लूं? इस प्रकार के दान तो मैंने भी पहले बहुत से किए हैं।’

इस पर ययाति के पूर्वज राजऋषि प्रतर्दन ने कहा- ‘मुझे अंतरिक्ष अथवा स्वर्ग लोक में जिन-जिन लोकों की प्राप्ति होने वाली है, मैं आपको देता हूँ। आप यहाँ न गिरें, स्वर्ग में जाएं।’

ययाति ने कहा- ‘कोई भी राजा अपने समकक्ष व्यक्ति से दान नहीं ले सकता। क्षत्रिय होकर दान लेना यह तो बड़ा अधर्म का कार्य है। अब तक किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय ने ऐसा काम नहीं किया है। फिर मैं ही कैसे करूं?’

राजा ययाति की बात सुनकर ययाति के पूर्वज वसुमान् ने कहा- ‘राजन्! मैं अपने सभी लोक आपको देता हूँ। आप यदि इसे दान समझकर लेने में संकोच करते हैं तो एक तिनके के बदले में यह सब खरीद लीजिए।’

ययाति ने कहा- ‘यह क्रय-विक्रय तो सर्वथा मिथ्या है। मैंने अब तक ऐसा मिथ्याचार कभी नहीं किया है। कोई भी सत्पुरुष ऐसा नहीं करता। मैं ऐसा कैसे करूं?’

शिबि ने कहा- ‘मैं औशीनर शिबि हूँ। आप यदि क्रय-विक्रय नहीं करना चाहते तो मेरे पुण्यों का फल स्वीकार कीजिए। मैं इन्हें आपको भेंट करता हूँ। आप न भी लें तो भी मैं इन्हें स्वीकार नहीं करता।’

ययाति ने कहा- ‘तुम बड़े प्रभावशाली हो परंतु मैं दूसरों के पुण्य-फल का भोग नहीं करता।’

अष्टक ने कहा- ‘अच्छा महाराज! आप एक-एक के पुण्यलोक नहीं लेते तो आप हम सभी के पुण्यलोक एक साथ ले लीजिए। हम आपको अपना समस्त पुण्यफल देकर नरक जाने को भी तैयार हैं।’

ययाति ने उत्तर दिया- ‘भाई! तुम लोग मेरे स्वरूप के अनुरूप प्रयत्न करो। सत्यपुरुष तो सत्य के ही पक्षपाती होते हैं। मैंने जो कभी नहीं किया, वह अब कैसे करूं?’

अष्टक ने कहा- ‘महाराज! आकाश में ये पांच स्वर्णरथ किसके दिखाई दे रहे हैं? क्या इन्हीं के द्वारा पुण्यलोकों की यात्रा होती है?’

ययाति ने कहा- ‘हाँ, ये स्वर्णरथ तुम लोगों को पुण्य लोकों में ले जाएंगे।

अष्टक ने कहा- ‘आप इन रथों के द्वारा स्वर्ग की यात्रा कीजिए, हम बाद में आ जाएंगे।’

ययाति बोले- ‘हम सभी ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर ली। इसलिए चलो हम सब साथ ही चलें। देखते नहीं, वह स्वर्ग का प्रशस्त पथ दिख रहा है।’

अष्टक, प्रदर्दन, वसुमान् और शिबि द्वारा अपने पुण्य लोकों को राजा ययाति के कल्याणार्थ दान करने की इच्छा व्यक्त करने के कारण वे सभी तपस्वी राजा स्वर्ग लोक के अधिकारी हो गए थे तथा राजा ययाति द्वारा उनका प्रतिग्रह स्वीकार नहीं करने के कारण ययाति भी स्वर्ग के अधिकारी हो गए थे। अतः वे सभी पुण्यात्मा उन दिव्य रथों पर बैठकर स्वर्ग के लिए चल पड़े।

मार्ग में ययाति के पूर्वज औशीनर शिबि का रथ सबसे आगे चलने लगा तो अष्टक ने ययाति से पूछा- ‘राजन्! इन्द्र मेरा मित्र है, मैं समझता था कि इन्द्र के पास सबसे पहले मैं ही पहुंचूंगा किंतु राजा शिबि का रथ सबसे आगे क्यों चल रहा है?’

इस पर ययाति ने कहा- ‘शिबि ने अपना सर्वस्व सत्पात्रों को दे दिया था। दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्रीं, श्री, क्षमा, सौम्यता, सेवा की अभिलाषा ये सभी गुण शिबि में विद्यमान हैं। अभिमान की छाया उन्हें छू तक नहीं गई है। इसी से वह सबसे आगे बढ़ गया है।’

इस पर ययाति के पूर्वज अष्टक ने पूछा- ‘राजन्! सच बताइए, आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं? क्योंकि ऐसा तेज न तो किसी क्षत्रिय में है और न किसी ब्राह्मण में?’

ययाति ने कहा- ‘अष्टक! मैं सम्राट नहुष का पुत्र ययाति हूँ। किसी समय मैं धरती पर सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट था।’

इस प्रकार वार्तालाप करते हुए ययाति के पूर्वज वे सभी पुण्यात्मा राजा स्वर्गलोक में प्रवेश कर गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन यदुवंश में उत्पन्न हुआ था (16)

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हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन यदुवंश में उत्पन्न हुआ था

रुद्रश्रेण्य के वंश में आगे चलकर हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का जन्म हुआ। उसने दस हजार वर्षों तक भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके चार वरदान प्राप्त किए। इनमें से पहला वरदान यह था कि मेरी एक हजार भुजाएं हों। दूसरा वरदान यह था कि जो लोग सत्पुरुषों के साथ अधर्म करते हैं, मैं उनका निवारण करूं।

पिछली कुछ कथाओं में हमने चंद्रवंशी राजा ययाति की चर्चा की है। राजा ययाति से पूर्व के चंद्रवंशी राजाओं को अंतरिक्षीय शक्तियों के प्रतीक एवं स्वर्गलोक से सम्बन्धित माना जाता है। बहुत से पुराणों में उन राजाओं के साथ ऐसे कथानक भी जोड़ दिए गए हैं जिनसे वे धरती के राजा लगने लगते हैं।

इस स्थिति से ठीक उलट, राजा ययाति की कथा में ऐसे कथानक जोड़ दिए गए हैं जिनसे ययाति का सम्बन्ध स्वर्ग से होने का आभास होने लगता है जबकि ययाति धरती का राजा था, इसलिए बहुत से पुराणों में कहा गया है कि राजा ययाति धरती का पहला चक्रवर्ती राजा था।

हम चर्चा कर चुके हैं कि राजा ययाति अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपना उत्तराधिकारी बनाकर तथा अपने शेष चारों ज्येष्ठ पुत्रों को पुरु के अधीन सीमांत प्रदेशों का राजा बनाकर अपनी रानियों सहित तपस्या करने के लिए वन में चला गया।

ययाति ने यद्यपि अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को श्राप दिया था कि तेरे वंशजों को कभी राज्य न मिले किंतु ययाति ने यदु को दक्षिण दिशा में चर्मणवती अर्थात् चम्बल नदी, वेतवती अर्थात् बेतवा नदी और शुक्तिमती अर्थात् केन नदी के प्रदेश दिए।

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वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि याति ने यदु को श्राप दिया था कि तुम मेरा अपमान करते हो इसलिए तुम्हारी संतान भी तुम्हारी तरह उद्दण्ड होगी। तुम भयंकर राक्षसों और यातुधानों को जन्म दोगे। राजकुल से बहिष्कृत यदु दुर्गम क्रौंचवन में चला गया। वहाँ उसने हजारों राक्षसों को जन्म दिया।

मत्स्य पुराण आदि पुराणों के अनुसार यदु अपने समस्त भाइयों मे श्रेष्ठ एवं तेजस्वी निकला। यदु का विवाह धौमवर्ण की पाँच कन्यायों के साथ हुआ। इन रानियों से यदु का यादव वंश चला जो वीरता और धर्म परायणता के लिए जाना गया। इसी वंश में भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम प्रकट हुए तथा इसी वंश में कंस जैसा राक्षस उत्पन्न हुआ।

मत्स्य पुराण में लिखा है कि यदु के पांच पुत्र हुए जो सभी देवपुत्र सदृश तेजस्वी, महारथी और महान् धनुर्धर थे। उनके नाम सहस्रजि, कोष्टु, नील, अंतिक और लघु थे। सहस्रजि का पुत्र शतजि हुआ। शतजि के हैहय, हय और वेणुहय नामक तीन यशस्वी पुत्र हुए। हैहय के वंश में उत्पन्न रुद्रश्रेण्य वाराणसी नगरी का राजा हुआ।

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इसी रुद्रश्रेण्य के वंश में आगे चलकर हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का जन्म हुआ। उसने दस हजार वर्षों तक भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके चार वरदान प्राप्त किए। इनमें से पहला वरदान यह था कि मेरी एक हजार भुजाएं हों। दूसरा वरदान यह था कि जो लोग सत्पुरुषों के साथ अधर्म करते हैं, मैं उनका निवारण करूं। तीसरा वरदान यह था कि मैं सम्पूर्ण धरती को युद्ध में जीतकर उसका पालन करूं। चौथा वरदान यह था कि रणभूमि में युद्ध करते समय केवल वही व्यक्ति मेरा वध करे जो मुझसे अधिक बलवान हो। वह जब भी युद्ध क्षेत्र में उतरता था, तब उसकी सहस्र भुजाएं प्रकट हो जाती थीं। उसी के अनुरूप उसके रथ, अस्त्र-शस्त्र एवं ध्वजा आदि भी प्रकट हो जाते थे। इस वरदान के कारण हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन कहलाने लगा। हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए सातों द्वीपों को जीत लिया और उनका अधीश्वर बन गया। उसने सातों द्वीपों में दस हजार यज्ञों का आयोजन करवाया तथा प्रत्येक यज्ञ में ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा प्रदान की। उन यज्ञभूमियों में गड़े हुए यूप तथा यज्ञवेदिकाएं स्वर्ण-निर्मित थे। समस्त यज्ञकुण्ड विमानारूढ़ देवताओं द्वारा सुशोभित थे जो यज्ञ में अपना भाग लेने के लिए आए थे। गंधर्व और अप्सराएं भी नित्य आकर उन यज्ञों की शोभा बढ़ाती थीं।

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन रथ पर आरूढ़ होकर, हाथ में तलवार, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपों में भ्रमण करता हुआ चोर-डाकुओं को दण्डित करता था। वह पिच्यासी हजार वर्षों तक भूतल पर शासन करके समस्त रत्नों से परिपूर्ण होकर चक्रवर्ती सम्राट बना रहा।

हैहयराज कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ही अपने योगबल से धरती भर के पशुओं का पालक था, वही खेतों का रक्षक था और वही समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। उसने कर्कोटक नाग के पुत्र को जीतकर उसे अपनी माहिष्मती पुरी में बांध रखा था। जब वह जलक्रीड़ा करता था, तब अपनी एक हजार भुजाओं से समुद्र को मथ देता था जिससे पाताल में रहने वाले नाग एवं दैत्य व्यथित हो जाते थे। सहस्रार्जुन की भृकुटि से भयभीत होकर नर्मदा स्वतः उसके निकट आ जाती थी।

एक बार अर्जुन ने लंका नगरी में जाकर पुलस्त्य के पौत्र रावण को अपने धनुष की प्रत्यंचा से बांध लिया तथा अपनी राजधानी माहिष्मती में ले आया। जब महर्षि पुलस्त्य को इस बात का पता लगा तो उन्होंने माहिष्मती जाकर अर्जुन को बहुत समझाया। इस पर सहस्रार्जुन ने रावण को मुक्त कर दिया।

एक बार सहस्रार्जुन ने सूर्य देव के कहने पर एक वन को जलाकर राख कर दिया। उस वन में आपव नामक ऋषि की कुटिया थी, वह भी उस वन के साथ जल गई। आपव ऋषि एक हजार वर्ष से एक सरोवर में बैठकर तपस्या कर रहे थे।

उन्होंने जब समाधि टूटने पर देखा कि सहस्रार्जुन ने उनकी कुटिया जला दी है तो आपव ऋषि ने अर्जुन को श्राप दिया कि भृगुकुल में उत्पन्न परशुराम तेरी एक हजार भुजाएं काटकर तेरा वध करेंगे। समय आने पर भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन की एक हजार भुजाएं काट दीं तथा उसका वध कर दिया। इसी सहस्रार्जुन के वंश में तालजंघ नामक क्षत्रियों का कुल उत्पन्न हुआ। उनकी कहानी फिर कभी कहेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति का श्राप (17)

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ययाति का श्राप

विभिन्न पुराणों में ययाति का श्राप बहुलिखित आख्यान है। ययाति का श्राप बताता है कि आज की हिन्दू संस्कृति में तथा ययाति कालीन आर्य संस्कृति में बहुत अधिक अंतर नहीं था। पुत्रों पर पिता का अधिकार आज की ही तरह सिद्ध था।

पिछली कड़ी में हमने चंद्रवंशी राजा ययाति के पुत्र यदु से चले वंशों की चर्चा की थी। इस कड़ी में हम ययाति द्वारा शापित दूसरे पुत्र तुर्वसु के वंशजों की चर्चा करेंगे। ययाति का श्राप किसी एक पुत्र तक सीमित नहीं था, अपितु केवल एक पुत्र को छोड़कर शेष सभी पुत्रों को दिया गया था।

कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि राजा ययाति के दूसरे पुत्र तुर्वसु से यवन उत्पन्न हुए जो धरती पर दूर-दूर तक फैल गये। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इन यवनों को वर्तमान समय में यहूदी एवं ईसाई माना जाता है।

कुछ पुराणों में कहा गया है कि तुर्वसु को दिया गया राजा ययाति का श्राप इस प्रकार था- ‘पिता का तिरस्कार करने वाले दुष्ट! जा! तू मांस भोजी, दुराचारी और वर्णसंकर म्लेच्छ हो जा।’ जबकि कुछ पुराणों के अनुसार राजा ययाति के बेटे ‘तुरू’ के वंशज आगे चलकर ‘तुर्क’ कहलाये।

वस्तुतः तुर्वसु से तुरुष्क उत्पन्न होने की बात अधिक सही लगती है जिन्हें आगे चलकर तुर्क कहा गया। इनका प्रारम्भिक इतिहास चीन के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से जुड़ा हुआ है। प्रारम्भ में ये इस्लाम के शत्रु थे किंतु जब मध्यकाल में इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया तब इन्होंने इस्लाम के प्रसार का बीड़ा उठाया। भारत में इस्लाम को लाने का श्रेय इन्हीं तुर्कों को जाता है।

हरिवंश पुराण में लिखा है कि तुर्वसु के पुत्र गोभानु हुए तथा गोभानु के पुत्र राजा त्रैसानु थे जो कभी परास्त नहीं होते थे। त्रैसानु के पुत्र करन्ध और करन्धम के पुत्र मरुत्त हुए। मरुत्त पुत्रहीन थे, उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम सम्मता था। राजा मरुत्त ने अपनी पुत्री संवर्त्त ऋषि को दक्षिणा में प्रदान की। संवर्त ऋषि ने उस कन्या का विवाह एक पुरुवंशी राजा इलिन से कर दिया जिससे दुष्यंत का जन्म हुआ।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

यहाँ से पुरु वंश को पौरव वंश कहा जाने लगा। इस प्रकार पुरु वंश एवं तुर्वसु वंश पौरव वंश में विलीन हो गए। महाराज दुष्यंत इसी पौरव वंश में उत्पन्न हुए थे। मान्यता है कि राजा भरत की रानी शकुंता के पेट से उत्पन्न पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ।

महाराज दुष्यंत की एक अन्य रानी के गर्भ से करुत्थाम नामक पुत्र का जन्म हुआ। करुत्थाम के पुत्र का नाम आक्रीड था। आक्रीड के चार पुत्र हुए- पांड्य, केरल, कोल तथा चोल। इन राजकुमारों ने चार राजकुलों की स्थापना की जिन्हें पांड्य, केरल, कोल तथा चोल कहा गया।

जब देवयानी के दो पुत्रों यदु एवं तुरु ने अपने पिता की वृद्धावस्था लेने से मना कर दिया तो शर्मिष्ठा के पुत्रों की बारी आई। शर्मिष्ठा के दोनों बड़े पुत्रों द्रह्यु और अनु ने भी पिता को अपना यौवन देने से मना कर दिया। इस पर राजा ने उन्हें भी भयानक शाप दिये।

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कुछ पुराणों के अनुसार राजा ययाति का श्राप उसके पुत्र अनु के लिए अत्यंत भयंकर सिद्ध हुआ। अनु से अभोज्य भोजन करने वाली प्रजा उत्पन्न हुई। वे लोग कुत्ते, बिल्ली, सांप आदि का मांस खाते थे। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि ‘अनु’ के वंशज ही इतिहास में ‘हूँग-नू’ अथवा हूण कहलाये। ये लोग भी तुरुओं की भांति चीन देश में रहते थे। हरिवंश पुराण में लिखा है कि अनु के पुत्र धर्म हुए और धर्म के पुत्र धृत, धृत के पुत्र दुदुह, दुदुह के पुत्र प्रचेता और प्रचेता के पुत्र सुचेता हुए। इस प्रकार हरिवंश पुराण में अनु के वंशजों के बारे में कहीं नहीं लिखा है कि वे धर्मविहीन तथा मांसभोजी थे। मत्स्य पुराण के अनुसार अनु के सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन परम धार्मिक एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। हरिवंश पुराण के अनुसार राजा ययाति के तीसरे पुत्र दुह्यु से भोज वंश की उत्पत्ति हुई। इस वंश के बारे में अधिक इतिहास नहीं मिलता है। जब चारों पुत्रों ने राजा ययाति का बुढ़ापा लेने से मना कर दिया तो अंत में राजा ययाति ने शर्मिष्ठा के सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपने पास बुलाकर उससे कहा कि वह अपने पिता का बुढ़ापा ले ले। पुरु ने अपने पिता का आदेश स्वीकार कर लिया।

पिता की इच्छा पूर्ण किए जाने पर पुरु को राजा ययाति का श्राप नहीं मिला।इससे राजा ययाति ने पुरु से प्रसन्न होकर उसे गंगा-यमुना के बीच की भूमि का राजा बना दिया। राजा पुरु की एक रानी का नाम कौशल्या था जिसके गर्भ से जन्मेजय नामक पुत्र का जन्म हुआ। जन्मेजय की रानी अनंता थी जिसके पुत्र प्रचिंवान हुए। प्रचिंवान का वंश काफी लम्बे समय तक चलता रहा। उसके वंश में आगे चलकर इलिन नामक राजा हुआ जिसका विवाह तुर्वसु के कुल में उत्पन्न सम्मता से हुआ जो ऋषि संवर्त्त की पालिता पुत्री थी। इलिन की एक रानी का नाम राथांतरा था जिसके गर्भ से राजा दुष्यंत का जन्म हुआ। दुष्यंत के समय से यह कुल पौरव कहलाया जिसके बारे में हम पहले बता चुके हैं।

यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पुरु आदि नामों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। राजा पुरु के विजयी और पराक्रमी होने की चर्चा भी ऋग्वेद में है। एक स्थान पर लिखा है- ‘हे वैश्वानर! जब तुम पुरु के समीप पुरियों का विध्वंस करके प्रज्वलित हुए तब तुम्हारे भय से असिक्नी अर्थात् चेनाब के किनारे के काले अनार्य दस्यु भोजन छोड़कर आए।’

ऋग्वेद में ही एक स्थान पर उल्लेख हुआ है कि- ‘हे इंद्र! भूमि-लाभ के लिए युद्ध कर रहे पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु और पुरु की आप रक्षा करें।’

इस प्रार्थना का समर्थन एक और मंत्र इस प्रकार करता है- ‘हे इंद्र! आपने राजा पुरु और राजा दिवोदास के लिए नब्बे पुरों का नाश किया है।’

पौरव वंश के राजा दुष्यंत की रानी शकुंतला के गर्भ से भरत का जन्म हुआ। भरत के नाम पर पौरव वंश को भरत-वंश तथा उनके द्वारा शासित क्षेत्र को ‘भारतवर्ष’ कहा जाने लगा। इसी कुल में आगे चलकर संवरण नामक राजा हुआ जिसकी रानी तप्ती के गर्भ से कुरु नामक प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ। कुरु के नामक यह वंश कुरुवंश कहलाया जिसके वंश कौरव कहे गए। महाभारत का युद्ध इसी कौरव कुल के राजकुमारों के बीच में लड़ा गया था जिनमें से एक पक्ष को कौरव तथा दूसरे पक्ष को पाण्डव कहा जाता था।

कुछ पुराणों के अनुसार कौरव वंश की एक शाखा हस्तिनापुर पर, दूसरी शाखा मगध पर, तीसरी शाखा अफगानिस्तान पर तथा चौथी शाखा ईरान पर शासन करती थी।

इस प्रकार पुराणों में आए वर्णन के अनुसार भारतीय आर्य राजाओं के वंशज ही बंगाल की खाड़ी से लेकर ईरान देश तक तथा काश्मीर से लेकर केरल देश तक के विशाल क्षेत्र पर शासन करते थे। ये सभी आर्य राजा एक ही परिवार से निकले थे।

इन पुराणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि भारत में आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे अपितु भारतीय आर्य राजकुल भारत के ही थे। इन राजकुलों से बहिष्कृत राजकुल तुर्कों एवं शकों के रूप में चीन, म्लेच्छों के रूप में ईरान-ईराक तथा यवनों के रूप में यूरोप आदि देशों को चले गए तथा वहाँ जाकर विधर्मी हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति की पुत्री माधवी महर्षि गालव को सौंप दी गई (18)

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ययाति की पुत्री माधवी महर्षि गालव को सौंप दी गई

चन्द्रवंशी राजा ययाति के पांच पुत्रों का उल्लेख हम इससे पूर्व की कथाओं में कर आए हैं। इस कथा में हम ययाति की पुत्री माधवी की चर्चा करेंगे। जहाँ तक मेरी जानकारी है किसी भी प्राचीन पुराण में माधवी का उल्लेख नहीं हुआ है। माधवी की कथा धूर्त वामवंथी लेखकों द्वारा गढ़ी गई है ताकि पुराणों को बदनाम किया जा सके।

कहा जाता है कि महाभारत के उद्योगपर्व में माधवी का उल्लेख किया गया है किंतु मेरे पास गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत की जो प्रति उपलब्ध है, उसमें ययाति की पुत्री माधवी की कथा का उल्लेख नहीं है किंतु डाॅ. भीमराव अम्बेडकर सहित कई विद्वानों ने ययाति की पुत्री माधवी की कथा का उल्लेख किया है। अतः संभव है कि किसी अन्य प्रकाशक द्वारा प्रकाशित महाभारत में माधवी की कथा कही गई हो।

इसलिए जब हम चंद्रवंशी राजाओं की शृंखला में राजा ययाति और उसके वंशजों की विस्तार से चर्चा कर रहे हैं तब हमें राजा ययाति की तथाकथित पुत्री माधवी की कथा तथा उसकी सच्चाई की भी चर्चा करनी चाहिए।

ययाति की पुत्री माधवी की कथा के अनुसार एक बार गालव ऋषि ने अपने गुरु विश्वामित्र से पूछा- ‘मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या प्रदान करूं?

इस पर महर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘तुमने मेरी बहुत सेवा की है, इसलिए मुझे तुमसे कोई दक्षिणा नहीं चाहिए।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

महर्षि के बार-बार मना करने पर भी गालव ऋषि ने हठ कर लिया कि वे महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा देना ही चाहते हैं। इसपर विश्वामित्र ने रुष्ट होकर कहा- ‘हे गालव! यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो मुझे चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण वाले ऐसे आठ सौ घोड़े ला दो, जिनका दायां कान श्यामवर्ण हो।’

 गालव ने महर्षि विश्वामित्र से कुछ समय देने की याचना की ताकि वे गुरु-दक्षिणा का प्रबंध कर सकें। गालव ने कई स्थानों पर पता किया किंतु उन्हें ऐसे अश्वों के बारे में कुछ पता नहीं चला। इस पर गालव ने भगवान श्री हरि विष्णु का ध्यान किया। भगवान श्री हरि विष्णु ने गालव की सहायता के लिए गरुड़जी को भेजा।

गरुड़जी ने चारों दिशाओं का वर्णन करके गालव से पूछा- ‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें समस्त दिशाओं का दर्शन कराने के लिए उत्सुक हूँ, अतः तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ और बताओ कि हम पहले किस दिशा में चलें?’

गरुड़ के आदेश से गालव गरुड़ की पीठ पर बैठ गए तथा उन्होंने गरुड़जी से कहा- ‘हे गरुड़! आप मुझे पूर्व दिशा की ओर ले चलें जहाँ धर्म के नेत्रस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं तथा जहाँ आपने देवताओं का सानिध्य बताया है।’

जब गरुड़जी ने अंतरिक्ष में उड़ान भरी तो गालव मुनि भय से व्याकुल होकर बोले- ‘हे गरुड़! अपनी गति कम करें, कहीं ऐसा न हो आपसे ब्रह्महत्या हो जाए। मुझे न तो आपका शरीर दिखाई दे रहा है न ही अपना। सब ओर अंधकार ही अंधकार है।’

कुछ ही समय में गरुड़जी गालव को लेकर समुद्र तट के निकट स्थित ऋषभ पर्वत पर पहुंचे। ऋषभ पर्वत पर उन्हें शाण्डाली नामक तपस्विनी मिली। शाण्डिली ने उन दोनों को कुछ खाने को दिया और उसके बाद वे सो गए। जब वे लोग नींद से जागे तो गरुड़जी के पंख गायब थे।

गरुड़जी को ऐसे देखकर गालव मुनि बोले- ‘हे मित्र! अवश्य ही आपने कुछ गलत सोचा होगा।’

गरुड़जी ने कहा- ‘मैंने तो केवल इतना ही विचार किया था कि इस तपस्विनी को मुझे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लोक में छोड़ देना चाहिए। फिर भी हे देवी! यदि मैंने अपने चंचल मन से आपका कुछ अप्रिय सोचा तो आप मुझे क्षमा करें।’

गरुड़जी की बात सुनकर शाण्डाली नामक तपस्विनी बोली- ‘वत्स! तुमने मेरी निंदा की है, मैं निंदा सहन नहीं करती, जो पापी मेरी निंदा करेगा, पुण्य लोकों से तत्काल भ्रष्ट हो जायेगा। अतः आज से तुम्हें मेरी ही नहीं अपितु किसी भी स्त्री की निंदा नहीं करनी चाहिए।’

यह कहकर तपस्विनी ने गरुड़जी को उनके शक्तिशाली पंख वापस लौटा दिए। तत्पश्चात तपस्विनी की आज्ञा लेकर वे दोनों वहाँ से चल दिए।

मार्ग में गरुड़जी ने कहा- ‘गालव! श्वेतवर्ण और श्यामकर्ण वाले घोड़े हमें तभी मिल सकते है, जब हमारे पास धन हो। अतः मेरी राय में हमें किसी राजा के पास जाकर धन की याचना करनी चाहिए। चन्द्रवंश में उत्पन्न एक राजा मेरे मित्र हैं, जो महाराज नहुष के पुत्र हैं। वह मांगने पर तुम्हें निश्चय ही धन दे देंगे।’

यह बात सुनकर गालव ऋषि ने गरुड़जी को राजा ययाति के पास चलने को कहा। दोनों मित्र राजा ययाति के दरबार में पहुंचे।

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गरुड़जी ने राजा ययाति को गालव द्वारा महर्षि विश्वामित्र को दक्षिण देने के संकल्प की बात बताई तथा कहा- ‘हे नहुषनंदन! ये तपस्वी गालव मेरे मित्र हैं। ये दस हजार वर्षों तक महर्षि विश्वामित्र के शिष्य रहे हैं। हे राजन्! ऋषि गालव आपके दान के सुपात्र हैं और इनके हाथ में दिए गए दान से आपकी शोभा होगी।’ राजा ययाति का वैभव पहले ही सहस्रों यज्ञ, अनुष्ठान और दानादि के कारण क्षीण हो चुका था। अतः राजा ययाति ने कहा- ‘हे गरुड़! आप सूर्यवंश के राजाओं को छोड़कर मेरे पास आए। इससे मेरा जन्म सफल हो गया किन्तु अब मैं उतना धनवान नहीं रहा जितना आप समझते हैं। इन दिनों मेरा वैभव क्षीण हो चुका है। अतः मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने में असमर्थ हूँ। फिर भी द्वार पर आये याचक को खाली हाथ लौटाकर मैं अपने कुल को कलंकित नहीं करूंगा। मैं आपको अपनी पुत्री माधवी प्रदान करता हूँ जो आपका सम्पूर्ण कार्य संपादित करेगी।’ यह कहकर राजा ययाति ने अपनी सर्वांग-सुन्दर पुत्री माधवी को बुलाया।  

राजा ययाति बोले- ‘यह मेरी पुत्री चार राजकुलों की स्थापना करने वाली है। इसे वरदान मिला हुआ है कि प्रत्येक प्रसव के बाद यह फिर से कुमारी हो जाएगी। इसके सौन्दर्य से आकृष्ट होकर देवता, मनुष्य और असुर इसे पाने की अभिलाषा रखते हैं। आप इसे ले जाइये। इसके शुल्क के रूप में राजा आपको अपना राज्य भी दे देंगे, फिर आठ सौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्वों की तो बात ही क्या है?’

इस प्रकार धूर्त लेखकों द्वारा राजा ययाति की पुत्री माधवी गालव को सौंप दी गई। यह किसी भी काल में भारत के लोगों की संस्कृति नहीं थी। आर्य राजाओं एवं ऋषियों की संस्कृति किसी भी काल में इस प्रकार विकृत नहीं हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गालव ऋषि की पालित कन्या माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र जन्मे (19)

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गालव ऋषि की पालित कन्या माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र जन्मे

हमने पिछली कथा में चर्चा की थी कि राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी गालव ऋषि को सौंप दी ताकि गालव मुनि माधवी की सहायता से आठ सौ श्वेत अश्वों का प्रबंध कर सकें जिनका दायां कान काला हो।

गालव ऋषि ने माधवी को प्राप्त करके ययाति से कहा- ‘ठीक है, राजन्! मेरा मनोरथ पूर्ण होने के पश्चात् मैं आपसे फिर मिलूँगा।’ इतना कहकर गालव ऋषि राजकन्या माधवी को अपने साथ लेकर चल दिए। गरुड़जी पुनः भगवान श्रीहरि विष्णु की सेवा में चले गए।

गालव ऋषि माधवी को लेकर अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे तथा उनसे बोले- ‘राजन्! यह देवकन्या अपनी संतानों द्वारा वंश वृद्धि करनेवाली है। आप चाहें तो शुल्क देकर निश्चित अवधि तक इसे अपनी पत्नी बनाकर रख सकते हैं।’

राजा हर्यश्व ने कहा- ‘हे द्विजश्रेष्ठ! आपकी यह कन्या कई शुभ लक्षणों से युक्त और कई चक्रवर्ती पुत्रों को जन्म देने में समर्थ है। अतः उसके लिए आप समुचित शुल्क बताइए?’

गालव ऋषि बोले- ‘राजन्! इसके शुल्क के रूप में मुझे आठ सौ चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण वाले अश्व चाहिए जिनके दाएं कान काले हों।’ यह शुल्क चुका देने पर मेरी यह शुभ लक्षणाकन्या आपके तेजस्वी पुत्रों की जननी होगी।’

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यह सुनकर काम से मोहित हुए राजा हर्यश्व ने अत्यंत दीन स्वर में कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आप जिन अश्वों की बात कर रहे हैं, मेरे पास उस तरह के केवल दो सौ अश्व हैं। आप चाहें तो दो सौ घोड़े ले लें तथा उनके बदले में, मैं इस कन्या से केवल एक संतान उत्पन्न करूंगा। अतः आप मेरे इस शुभ मनोरथ को पूर्ण करें।’

राजा की बात सुनकर गालव ऋषि चिंतित हो गए किंतु माधवी ने कहा- ‘हे मुने! मुझे एक वेदवादी ब्राह्मण का वरदान है कि तुम प्रत्येक प्रसव के अंत में फिर से कन्या हो जाओगी।’ अतः आप दो सौ यथेष्ठ घोड़ों के बदले में मुझे राजा को सौंप सकते है। इस तरह चार राजाओं से दो सौ-दो सौ घोड़े लेकर आप अपनी दक्षिणा जुटा सकते हैं। इससे मेरे रूप सौन्दर्य पर कोई अंतर नहीं पड़ने वाला, अतः आप निश्चिन्त रहें।’

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कन्या के ऐसा कहने पर गालव मुनि ने राजा हर्यश्व से कहा- ‘हे राजन! आप यथेष्ठ शुल्क का एक चौथाई भाग देकर इस कन्या को ग्रहण करें और इससे केवल एक ही संतान उत्पन्न करें। मैं समय आने पर माधवी को आपसे पुनः प्राप्त कर लूंगा।’ इस तरह उस कन्या ने अयोध्या के राजा हर्यश्व के लिए एक पुत्र को जन्म दिया जो वसुमना नाम से विख्यात हुआ। नियत समय पर गालव मुनि पुनः अयोध्या पहुँचे। उन्होंने 200 घोड़े अमानत के रूप में राजा हर्यश्व के पास ही छोड़ दिए तथा माधवी को लेकर काशी नरेश दिवोदास के पास पहुँचे। उनके समक्ष भी गालव ऋषि ने वही प्रस्ताव रखा जो उन्होंने अयोध्या नरेश के समक्ष रखा था। काशीराज के पास भी उस प्रकार के केवल 200 अश्व थे। गालव ऋषि ने काशी नरेश से कहा- ‘आप भी इस देवकन्या से केवल एक संतान उत्पन्न करें। मैं समय अपने पर इस कन्या को दो दौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्वों के साथ ले जाउंगा।’ राजा दिवोदास से माधवी ने प्रतर्दन नामक पुत्र उत्पन्न किया। इसके पश्चात् माधवी पुनः गालव ऋषि को मिल गई ।

अब गालव ऋषि माधवी को लेकर भोज नगरी के राजा उशीनर के पास पहुंचे और उनके सामने भी अपना मनोरथ रखा। राजा उशीनर के पास भी इस प्रकार के केवल दो सौ घोड़े ही थे। अतः गालव ने माधवी को एक संतान उत्पन्न करने के लिए राजा उशीनर के पास छोड़ दिया। माधवी ने राजा उशीनर से सूर्य के समान तेजस्वी बालक को जन्म दिया जो शिबि के नाम से विख्यात हुआ। नियत अवधि के बाद गालव ऋषि माधवी को लेने पहुँच गए। तभी राजा के दरबार में उन्हें पक्षिराज गरुड़ मिल गए।

गरुड़जी ने कहा- ‘ब्रह्मन्! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपका मनोरथ पूरा हो गया।’

गालव ऋषि बोले- ‘पक्षिराज! अभी तो दक्षिणा का एक चौथाई भाग जुटाना शेष है।’

गरुड़जी ने कहा- ‘अब इसके लिए तुम्हारा प्रयत्न व्यर्थ होगा, क्योंकि अब ऐसे अश्व किसी के पास नहीं है।’ इस पर गालव मुनि छः सौ अश्वों तथा माधवी को लेकर महर्षि विश्वामित्र के पास पहुंचे।

गालव ऋषि ने उनसे कहा- ‘गुरुदेव! आपकी इच्छानुसार छः सौ श्वेत वर्णी अश्व आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं जिनका दायां कान श्यामवर्णी है। चूंकि मुझे तीन राजाओं ने माधवी से एक-एक संतान उत्पन्न करने के बदले में दो सौ – दो सौ घोड़े दिए हैं इसलिए अब मैं माधवी आपको सौंपता हूँ। आप भी इससे एक संतान उत्पन्न कर लें। इसके बाद माधवी पुनः मुझे लौटा दें।’

विश्वामित्र ने कहा- ‘गालव! तुम इसे पहले ही ले आते तो मुझे इससे चार वंश प्रवर्तक पुत्र प्राप्त हो जाते। अब मैं इस कन्या को ग्रहण करता हूँ। घोड़े मेरे आश्रम में छोड़ दो।’

माधवी ने विश्वामित्र से अष्टक नामक पुत्र को जन्म दिया। जब अष्टक बड़ा हुआ तब विश्वामित्र ने अपना राज्य तथा छः सौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्व अष्टक को सौंप दिए तथा स्वयं तपस्या करने के लिए तपोवन में चले गए।

गालव ऋषि ने विश्वामित्र के ऋण से उऋण होकर माधवी को पुनः उसके पिता राजा ययाति को सौंप दिया तथा स्वयं तपस्या करने वन में चले गए ।

माधवी के पुनः लौट आने पर राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी का विवाह करना चाहा किंतु माधवी ने विवाह करने से मना कर दिया तथा आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लेकर वह भी तपस्या करने के लिए गहन वनों में चली गई!

हम पहले ही कह चुके हैं कि यह कथा किसी भी पुराण में नहीं मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने की नीयत से इस कथा को लिखा गया है ताकि हिन्दू राजाओं एवं ऋषियों पर यह आक्षेप लगाया जा सके कि वे राजकन्याओं से वेश्यावृत्ति करवाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है (20)

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माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है

माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है! वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं पुराणों सहित किसी भी प्राीचन ग्रंथ में माधवी की कथा का उल्लेख नहीं है।

पुराणों में ययाति के पांच पुत्रों- यदु, तुर्वसु, अनु, द्रह्यु और पुरू का ही उल्लेख है। ये नाम वेदों में भी आए हैं किंतु माधवी का उल्लेख केवल महाभारत में बताया जाता है।

माधवी का आख्यान असंभव दोषों से भरा हुआ है। विश्वामित्र द्वारा श्वेत वर्ण एवं श्यामकर्ण वाले 800 अश्व मांगने के पीछे कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता है। माधवी का पुत्र उत्पन्न करके वापस कन्या बन जाना असंभव सी बात है। वैदिक कालीन आर्यों से लेकर पौराणिक काल के आर्यों में कन्या के विक्रय का कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है।

वैदिक आर्य परम्परा के अनुसार कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना तथा उससे नवीन राजकुल का उत्पन्न होना संभव नहीं है। विवाह के बिना संतान उत्पन्न करना वेद-विरुद्ध है।

इस तरह माधवी का आख्यान आर्य-परम्परा एवं इतिहास-परम्परा के विरुद्ध है तथा निंदनीय है। चार्वाकों एवं वामाचारियों द्वारा आर्यों को बदनाम करने की नीयत से इसक कथा की कपोल-कल्पना करके इसे महाभारत में घुसा दिया गया है।

कुछ आधुनिक विद्वानों ने माधवी का आख्यान सत्य बताकर आर्यों की संस्कृति पर हेय होने के आरोप लगाने के प्रयास किए हैं। अपनी बात के समर्थन में वे नियोग प्रथा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आर्यों में संतानोत्पत्ति के लिये देवपुरुष से संतान प्राप्त करने की प्रथा थी।

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उनके अनुसार आर्यों का ही एक वर्ग देव कहलाता था। वे अत्यंत पराक्रमी होते थे। इसलिए आर्य पुरुष अपनी पत्नी से अच्छी संतान पाने के लिए अपनी पत्नी को किसी भी देव से संतानोत्पत्ति की आज्ञा देते थे।

वास्तविकता यह है कि भारतीय आर्यों में देवपुरुष जैसी कोई प्रथा नहीं थी, जिसका उल्लेख हिन्दू धर्म को एवं प्राचीन आर्यों को कलंकित करने के लिए किया गया है।

यह सही है कि अथर्ववेद में नियोग का उल्लेख हुआ है। महाभारतकालीन आर्यों में भी नियोग प्रथा प्रचलित थी। महाराज मनु ने भी मनुस्मृति में नियोग प्रथा का समर्थन किया है, किंतु नियोग एक सामान्य परम्परा नहीं थी। इसे आपद-धर्म के रूप में अपनाया गया था। यदि किसी स्त्री का पति क्लीव होता था, अथवा शारीरिक रूप से अक्षम होता था, अथवा कोई स्त्री संतान प्राप्ति से पहले ही विधवा हो जाती थी, तब उसे नियोग करने की अनुमति दी जाती थी ताकि उसका परिवार चलता रहे और समाज में व्यभिचार न बढ़े। किसी भी स्त्री को केवल एक बार नियोग से संतान उत्पन्न करने की अनुमति होती थी। वह एक से अधिक पुरुषों से नियोग करके पुत्र प्राप्त नहीं करती थी।

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माधवी का आख्यान जो कि पूरी तरह मनगढ़ंत है, कहता है कि माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र उत्पन्न किए। ऐसा नियोग-प्रथा के अंतर्गत नहीं किया जाता था। कुछ विद्वानों ने लिखा है कि यदि महाभारत में दी गई कथा सत्य है तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि माधवी कौन थी जिसने कुंवारी कन्या होते हुए भी एक से अधिक पुरुषों से पुत्र उत्पन्न किए जिनसे नवीन राजकुलों का निर्माण हुआ! कुछ वेदज्ञों का कहना है कि माधवी धरती का एक नाम है। धरती पर अनेक राजा राज्य करते हैं जो अपनी भूमि के पति होते हैं। अतः उन्हीं पर व्यंग्य करने के लिए वामाचारियों ने इस कथा का निर्माण किया है। कुछ वेदज्ञों के अनुसार किसी भी उपजाऊ भूमि को माधवी कहा जाता था और राजा ययाति ने धन और अश्व न होने पर ऋषि गालव को माधवी अर्थात् भूमि का दान दिया था। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में कम से कम तीन श्लोकों में धरती के लिए माधवी शब्द का प्रयोग किया गया है। पहले श्लोक में कहा गया है- ‘यथाहम राघवादंयम मनसपि न चिन्तये तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’ दूसरे श्लोक में कहा गया है- ‘मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड के तीसरे श्लोक में कहा गया है- यथैतत सत्यामुक्तम मे वेद्धि रामात परम् न च तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’

इन श्लोकों में माता सीता कह रही हैं कि- ‘हे धरती माँ। यदि मैंने मन, कर्म एवं वचन से प्रभु श्रीराम के अतिरिक्त किसी को मन में न लाया हो तो तुम फट जाओ और मुझे अपनी गोद में शरण दे दो।’

इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि पौराणिक भारत में धरती को माधवी कहा जाता था। अतः यदि माधवी की कथा सत्य है तो भी उसका आशय केवल इतना है कि सार्वभौम चक्रवर्ती राजा ययाति ने गालव मुनि को भूमि का एक टुकड़ा दिया था।

अब प्रश्न यह उठ सकता है कि यदि माधवी का अर्थ भूमि के टुकड़े से होता है तो विभिन्न राजाओं को उसका पति क्यों कहा गया है?

भूमि का स्वामी होने के कारण ही राजाओं को भूपति भी कहा जाता है। और यही पृथ्विस्वरूपा माधवी और उनके चार पतियों अर्थात भूपतियों का उल्लेख महाभारत के माधवी प्रसंग का रहस्य भी है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस के बालकाण्ड में यह चौपाई लिखी है-

दीप दीप के भूपति नाना। आये सुनि हम जो पनु ठाना।

अर्थात्- एक ही समय में धरती के छोटे-बड़े खण्डों के कई स्वामी होते हैं।

कुछ विद्वानों का मानना है कि माधवी के चार पुत्र होने का तात्पर्य- धरती पर रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने से है। एक से अधिक पतियों को धारण करने वाली धरती व्यभिचारिणी नहीं होती। अतः माधवी को मानवी कन्या बताकर उसकी आड़ में, वैदिक एवं सनातन संस्कृति पर प्रहार करने की कुचेष्टा मात्र है। माधवी का आख्यान पूरी तरह असत्य है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी (21)

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शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी

शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी। इस प्रकार शकुंतला एक ऋषि एवं एक अप्सरा की संतान थी। शकुंतला का पालन-पोषण महर्षि कण्व ने किया था।

चंद्रवंशी राजाओं की कथाओं के क्रम में महर्षि अत्रि के कुल में उत्पन्न सातवें चंद्रवंशी राजा ययाति तथा उसके वंशजों की चर्चा कर रहे हैं। राजा ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था तथा उसे गंगा-यमुना के बीच के प्रदेशों का स्वामी बनाया था।

पुरु की वंश परम्परा में तेबीसवां राजा दुष्यंत हुआ। दुष्यंत की माता सम्मता, ययाति के शापित पुत्र तुर्वसु के कुल में जन्मी थी जिसका लालन-पालन संवत्र्त ऋषि ने किया था, इस प्रकार वह संवत्र्त ऋषि की पालित पुत्री थी।

राजा दुष्यंत से पुरु वंश को पौरव वंश कहा जाने लगा। दुष्यंत की रानी शकुंतला की कथा महाभारत के आदिपर्व में मिलती है। इसी कथा को आधार बनाकर महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम् नामक काव्य की रचना की है जिसे संस्कृत साहित्य का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।

यह कथा इस प्रकार से है- एक बार महर्षि विश्वामित्र ने घनघोर तपस्या की। इससे इन्द्र को भय हुआ कि कहीं विश्वामित्र इन्द्रासन प्राप्त नहीं कर लें। इसलिए इन्द्र ने मेनका नामक अप्सरा को ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा।

दैवयोग से विश्वामित्र मेनका के सौन्दर्यजाल में फंस गए तथा वे मेनका के साथ रमण करने लगे। कुछ समय पश्चात् मेनका ने एक कन्या को जन्म दिया। मेनका ने उस कन्या को महर्षि कण्व के आश्रम में छोड़ दिया तथा स्वयं स्वर्गलोक को चली गई।

कण्व ऋषि ने शकुंतला को अपने आश्रम में पड़े हुए पाया तो उन्होंने उसे पुत्री मानकर उसका लालन-पालन किया। समय आने पर शकुंतला एक सुंदर युवती में बदल गई। एक दिन राजा दुष्यंत शिकार खेलने के लिए वन में आया तथा अपने साथियों से बिछड़कर कण्व ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा।

महर्षि कण्व उस समय तीर्थयात्रा पर गए हुए थे। राजा ने उनकी पुत्री के रूप एवं यौवन पर मुग्ध होकर उसे अपना परिचय दिया तथा उससे प्रणय निवेदन किया। शकुंतला भी उस महान् राजा से प्रभावित हो गई तथा उसने राजा का प्रणय निवेदन स्वीकार कर लिया।

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राजा दुष्यंत ने शकुंतला ने गन्धर्वविवाह कर लिया तथा कुछ समय पश्चात् अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर चला गया। राजा ने वचन दिया कि वह शीघ्र ही उसे अपनी राजधानी में बुलवा लेगा। राजा ने उसे अपनी अंगूठी भी प्रदान की। कुछ समय पश्चात् शकुंतला को अपने गर्भवती होने का पता चला। वह बहुत काल तक राजा के आने की प्रतीक्षा करती रही किंतु राजा दुष्यंत उसे लेने के लिए नहीं आया।

एक दिन शकुंतला राजा दुष्यंत के आने की प्रतीक्षा में बैठी थी। उसी समय दुर्वासा ऋषि कण्व ऋषि के आश्रम में आए किंतु शकुंतला अपने विचारों में इतनी तल्लीन थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के आगमन का पता नहीं चला। जब शकुंतला ने दुर्वासा ऋषि का स्वागत-सम्मान नहीं किया तो दुर्वासा ऋषि कुपित हो गए और ऋषि ने उसे श्राप दिया कि तू जिसके विचारों में इतनी तल्लीन है, वह तुझे भूल जाए।

दुर्वासा के क्रोध भरे शब्दों से शकुंतला का ध्यान भग्न हुआ और उसने सामने खड़े दुर्वासा को देखा। शकुंतला ने महर्षि से अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की। इस पर दुर्वासा ने शकुंतला को सांत्वना दी कि जब श्राप की अवधि बीत जाएगी तब राजा ने तुम्हें जो अंगूठी दी है, उसे देखकर राजा को तुम्हारा स्मरण हो जाएगा।

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शकुंतला पहले से ही दुष्यंत के वियोग में उदास रहती थी किंतु अब दुर्वासा द्वारा शाप दिए जाने से उसका दुःख दोगुना हो गया। गर्भवती शकुन्तला कई दिनों तक दुष्यंत की प्रतीक्षा करती रही। जब महर्षि कण्व तीर्थयात्रा से लौटे तो शकुंतला ने उन्हें राजा दुष्यंत के आने, अपने गर्भवती होने तथा दुर्वासा द्वारा श्राप दिए जाने के बारे में बताया। इस पर कण्व ऋषि अपनी पालिता पुत्री को लेकर राजा दुष्यंत के राजमहल में गए। मार्ग में जब शकुंतला ने एक सरोवर से जल पिया तब उसकी अंगुली में पहनी हुई अंगूठी दुर्वासा के श्राप के कारण सरोवर में गिर गई। जब शकुंतला राजा दुष्यंत से मिली तो दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण राजा दुष्यंत शकुंतला को पूरी तरह भूल चुका था इसलिए राजा ने उसे नहीं पहचाना। शकुंतला निराश होकर राजमहल से निकली। जब मेनका ने अपनी पुत्री को इस अवस्था में देखा तो वह शकुंतला को अपने साथ ले गई और उसे कश्यप ऋषि के आश्रय में रख दिया जहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया। महर्षि कश्यप ने उस बालक का नाम भरत रखा। शकुंतला का पुत्र भरत ऋषि-पुत्रों के साथ वन में पलने लगा। कुछ वर्ष बीत जाने पर एक मछुआरा, राजा दुष्यंत को एक मछली के पेट से मिली अँगूठी भेंट करने के लिए आया।

अँगूठी को देखते ही राजा दुष्यन्त को शकुन्तला की याद आई। राजा ने शकुन्तला को ढूँढना आरम्भ किया किंतु शकुंतला कहीं नहीं मिली। कुछ समय बाद राजा दुष्यंत को देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पर देवासुर संग्राम में भाग लेने के लिए अमरावती जाना पड़ा।

देवासुर संग्राम में विजय प्राप्त करने के बाद जब राजा दुष्यंत आकाश मार्ग से वापस अपनी राजधानी लौट रहे थे तब उन्होंने मार्ग में कश्यप ऋषि के आश्रम को देखा। आश्रम में एक सुंदर बालक खेल रहा था जिसके अंग शुभ लक्षणों से सम्पन्न थे। राजा दुष्यंत कौतूहल वश आश्रम में उतर पड़े और उस बालक के निकट गए।

जब राजा ने उस बालक को अपनी गोद में उठाने के लिए हाथ आगे बढ़ाए तो बालक की सुरक्षा कर रही शकुंतला की एक सखि ने राजा को बताया कि यदि वे इस बालक को छुएंगे तो बालक की भुजा में बंधा हुआ काला डोरा सर्प बनकर राजा को डंस लेगा।

राजा दुश्यन्त ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और बालक को गोद में उठा लिया। इससे बालक की भुजा में बंधा हुआ काला डोरा टूट गया। दुष्यंत ने उस धागे को पहचान लिया। एक दिन राजा ने यह धागा शकुंतला के केशों में बांधा था।

जब शकुंतला को ज्ञात हुआ कि किसी अनजान राजा ने उसके बालक को उठा लिया है तो वह दौड़ती हुई आई। उसने राजा दुष्यंत को पहचान लिया। दुर्वासा के श्राप की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसलिए दुष्यंत ने भी अपनी पत्नी को पहचान लिया। राजा ने अपनी इस महान् भूल के लिए शकुंतला से क्षमा माँगी और वे शकुंतला तथा भरत को अपने राजमहल में ले आए। इसके बाद शकुंतला और दुष्यन्त सुख-पूर्वक जीवन बिताने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा (22)

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राजा भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा

पिछली कड़ी में हमने चंद्रवंशियों के पुरु एवं तुर्वुसु नामक दो राजकुलों के मिलने से बने पौरव कुल के प्रथम राजा दुष्यंत और स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री शकुन्तला के गंधर्व विवाह से उत्पन्न पुत्र राजा भरत की चर्चा की थी।

मेनका के दौहित्र एवं शकुंतला के पुत्र राजा भरत की गणना महाभारत में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। राजा भरत का एक नाम ‘सर्वदमन’ भी था क्योंकि भरत ने बाल्यकाल में ही कई बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन किया था।

शकुंतला के पुत्र भरत हिंसक वन्य-जीवों तथा दुर्दांत पर्वतीय पशुओं को भी सहज ही परास्त करके अपने अधीन कर लेते थे। अपने जीवन काल में उन्होंने यमुना, सरस्वती तथा गंगा के तटों पर क्रमशः एक सौ, तीन सौ तथा चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। इस उल्लेख से स्पष्ट होता है कि इस काल में आर्यजन इन नदियों के प्रदेश में फैले हुए थे।

राजा भरत प्रवृत्ति से दानशील तथा वीर थे। राज्यपद मिलने पर भरत ने अपने राज्य का विस्तार किया। कुछ ग्रंथों में वर्णन आया है कि राजा भरत ने अपने पुरखों की प्राचीन राजधानी प्रतिष्ठानपुर के स्थान पर हस्तिनापुर को नई राजधानी बनाया। जबकि महाभारत आदि कुछ ग्रंथों के अनुसार राजा भरत के चैथे वंशज हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया जो कि वंशक्रम में महर्षि अत्रि से अट्ठाइसवां वंशज था।

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राजा भरत का विवाह विदर्भराज की तीन कन्याओं से हुआ था जिनसे उन्हें नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। भरत ने कहा- ‘ये पुत्र मेरे अनुरूप नहीं हैं।’ अतः तीनों रानियों ने भरत के शाप से डरकर अपने-अपने पुत्रों का हनन कर दिया। तब देवराज इंद्र देवगुरु बृहस्पति के पुत्र मन्यु को राजा भरत के पास लेकर आए जिससे पौरव वंश आगे चला।

इस उल्लेख से अनुमान होता है कि राजा भरत की रानियां गर्भवती तो हुईं किंतु उनके बालक जीवित नहीं रहे। अतः बृहस्पति नामक ऋषि के पुत्र को गोद लिया गया। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि मरुद्गण की कृपा से राजा भरत को भरद्वाज नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो आगे चलकर एक महान ऋषि हुए। इस आख्यान का अर्थ यह प्रतीत होता है कि भरद्वाज, राजा भरत के औरस पुत्र नहीं थे, अपितु उन्हें मरुद्गणों के माध्यम से किसी अन्य स्थान से प्राप्त किया गया था।

भारद्वाज के जन्म की कथा भी अत्यंत विचित्र है। कुछ पुराणों में कहा गया है कि बृहस्पति ने अपने भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता का बलपूर्वक गर्भाधान किया। उसके गर्भ में दीर्घतपा नामक संतान पहले से ही विद्यमान थी। बृहस्पति ने ममता से कहा- ‘मेरे पुत्र भरद्वाज का पालन-पोषण कर। यह मेरा औरस और मेरे भाई का क्षेत्रज पुत्र होने के कारण हम दोनों का पुत्र है।’

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ममता बृहस्पति के पुत्र का पालन-पोषण करने को तैयार नहीं थी। अतः वह बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज को वहीं छोड़कर चली गई। मरूद्गणों ने वह बालक राजा भरत को दे दिया। श्रीमद्भागवत् पुराण के अनुसार वंश के बिखर जाने पर भरत ने ‘मरुत्स्तोम’ नामक यज्ञ किया। इस पर मरुद्गणों ने भरत को भरद्वाज नामक पुत्र दिया। भरत की कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें यहीं रुककर उस कथा की फिर से चर्चा करनी होगी जिसमें चंद्रमा द्वारा देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण करके उसका गर्भाधान करने की बात कही गई थी जिसके परिणाम स्वरूप बुध का जन्म हुआ था। जिस प्रकार उस कथा में चंद्रमा के प्रभाव से तारा नामक नक्षत्र के बृहस्पति के प्रभावक्षेत्र से खिसककर चंद्रमा की तरफ आने तथा उसके परिणाम स्वरूप तारा से बुध नामक नक्षत्र के टूटकर अलग होने की घटना का मानवीकरण देखने को मिला था, ठीक उसी प्रकार बृहस्पति द्वारा अपने भाई उतथ्य की पत्नी का अपहरण करके उसे बलपूर्वक गर्भवती करने की कथा में भी किसी खगोलीय घटना का मानवीकरण किए जाने का अनुमान होता है। ममता के गर्भ में बृहस्पति द्वारा बलपूर्वक भरद्वाज को उत्पन्न करने की घटना वस्तुतः किसी खगोलीय घटना का मानवीकरण है जिसे चंद्रवंशी राजा भरत से जोड़ दिया गया है।

मरुद्णों द्वारा की गई सहायता का आशय खगोलीय पिण्डों के गुरुत्वकर्षण क्षेत्र में परिवर्तन करने से लगाया जा सकता है जिसके कारण ममता नामक खगोलीय पिण्ड अपनी धुरी से खिसककर उतथ्य नामक नक्षत्र के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से दूर चला गया तथा बृहस्पति नामक नक्षत्र के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश कर गया जिसके कारण ममता नामक नक्षत्र से अलग हुए पदार्थ से एक नीवन नक्षत्र बन गया जिसे भरद्वाज कहा गया।

जिस समय ममता नामक नक्षत्र उतथ्य के प्रभावक्षेत्र से बाहर निकला, उस समय ममता नामक नक्षत्र से दीर्घतपा नामक नक्षत्र के अलग होने की प्रक्रिया भी चल रही थी।

यदि हम राजा भरत की तीन रानियों के नौ पुत्रों के मरने तथा मरुद्गणों द्वारा बृहस्पति से पुत्र लाकर देने की कथा पर विचार करें तो हम पाएंगे कि स्वयं भरत भी कोई नक्षत्र था जिसके प्रभाव क्षेत्र में स्थित तीन नक्षत्रों से तीन-तीन क्षुद्र ग्रह उत्पन्न हो रहे थे किंतु इन तीनों नक्षत्रों से तीन-तीन छुद्र नक्षत्रों के उत्पन्न होने की घटना पूर्ण नहीं हो सकी इसलिए बृहस्पति के प्रभाव से उत्पन्न भरद्वाज नामक नक्षत्र राजा भरत के प्रभाव क्षेत्र में खिसक आया।

संस्कृत साहित्य में भरत नामक एक अग्नि का उल्लेख हुआ है। संभवतः यहाँ भरत किसी सूर्य का नाम था तथा यह सारी कथा एक सौरमण्डल के निर्माण की है जो हमारे सौर मण्डल से अलग था।

अब यदि हम दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत तथा अंतरिक्ष में घट रही घटनाओं में वर्णित नक्षत्रों के नामों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखें तो हमें स्पष्ट हो जाएगा कि धरती के मानवों एवं आकाश की अंतरिक्षीय घटनाओं को आपस में मिला दिया गया है।

हम आकाशीय घटनाओं को छोड़कर, पुनः धरती के मानवों की ओर लौटते हैं। महाभारत में आए एक उल्लेख के अनुसार राजा भरत ने बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया तथा महर्षि भरद्वाज की कृपा से भरत ने भूमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया। इस आख्यान का आशय यह है कि भरत को भरद्वाज ऋषि ने अपना पुत्र प्रदान किया।

भरद्वाज जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु भरत का पुत्र बन जाने के कारण क्षत्रिय हो गए। जब राजा भरत का देहावसान हुआ तो भरद्वाज ने स्वयं शासन ग्रहण नहीं करके राजपाट अपने पुत्र वितथ को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने वन में चले गए। इस प्रकार भरद्वाज पुनः ब्राह्मण बन गए।

इस प्रकार ऋषियों के माध्यम से प्राप्त वितथ अथवा भूमन्यु के माध्यम से, राजा भरत का वंश आगे बढ़ा। भरत महान प्रजापालक राजा हुए। उनके नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। इसीलिए भरत वंश में उत्पन्न अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश में बारम्बार ‘भारत’ कहकर सम्बोधित किया है।

बहुत से लोगों का मानना है कि भारत देश का नामकरण चंद्रवंशी राजा दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर न होकर सूर्यवंशी राजा भगवान् ऋषभदेव के पुत्र जड़भरत के नाम पर हुआ है। वे अपने समर्थन में भागवत् पुराण, विष्णुपुराण तथा लिंगपुराण के उदाहरण देते हैं। वस्तुतः हमारे देश का भारत नाम न तो शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र के नाम पर भारत हुआ और न भगवान् ऋषभदेव के पुत्र जड़भरत के नाम पर हुआ।

वास्तविकता यह है कि अत्यंत प्राचीन काल में आर्यों के विविध जनों में भरत नामक एक शक्तिशाली जन था जिसके वंशज इस देश में दूर-दूर तक फैल गए। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ जिसका अर्थ है- भरत के पुत्र।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सूर्य की पुत्री ताप्ती के लिए राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की (23)

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सूर्य की पुत्री ताप्ती के लिए राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की

पुराणों में कथा मिलती है कि भगवान सूर्य की पुत्री ताप्ती बहुत सुंदर थी। उसे पाने के लिए चंद्रवंशी राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की।

अत्रि के वंशजों में हम राजा भरत तक के कुछ विख्यात राजाओं की कथाओं की चर्चा कर चुके हैं। राजा भरत के चैथे वंशज राजा हस्ती हुए जिन्होंने गंगा-यमुना के बीच में हस्तिनापुर नामक नगरी की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया। हस्ती के तीसरे वंशज का नाम संवरण था।

यद्यपि अलग-अलग पुराणों में चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली में अंतर मिलता है तथापि कुछ पुराणों के अनुसार संवरण चंद्रवंशी रजााओं की श्ृंखला में इकत्तीसवें राजा थे। वे भी अपने पूर्वजों की तरह प्रतापी राजा हुए।

एक दिन संवरण हाथ में धनुष-बाण लेकर हिमपर्वत पर आखेट करने गया। वहाँ राजा को एक अत्यंत सुंदर युवती दिखाई दी। वह युवती इतनी सुंदर थी कि राजा संवरण अपनी सुधि भुलाकर उस पर आसक्त हो गया।

राजा ने अपने तीर तरकष में रख लिए और उस युवती के निकट जाकर बोला- ‘हे तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्वी हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित्त चंचल और व्याकुल हो उठा है। क्या तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करोगी … मैं हस्तिनापुर का सम्राट हूँ। मैं तुम्हें हर तरह से सुखी रखूंगा।’

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युवती ने एक क्षण संवरण को देखा और अदृश्य हो गई। युवती के अदृश्य हो जाने पर राजा संवरण अत्यधिक व्याकुल हो गया। वह धनुष-बाण फेंककर उन्मत्तों की भांति विलाप करने लगा। कुछ समय पश्चात् वह युवती पुनः प्रकट हुई।

 युवती ने कहा- ‘राजन्! मैं सूर्य की पुत्री ताप्ती हूँ। मैं स्वयं भी आप पर मुग्ध हूँ किंतु मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में हूँ। जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती। यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को प्रसन्न कीजिए।’

इतना कहकर सूर्य की पुत्री ताप्ती पुनः अदृश्य हो गई। युवती को अपने सामने न देखकर राजा संवरण बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ा। कुछ समय पश्चात् सुधि आने पर राजा संवरण सूर्य की पुत्री ताप्ती के द्वारा कही गई बातों पर विचार करने लगा। उसने उसी समय सूर्यदेव की आराधना करनी आरम्भ कर दी। राजा संवरण की कई वर्षों की तपस्या के बाद सूर्यदेव ने संवरण की परीक्षा लेने का निश्चय किया। 

एक रात जब संवरण आंखें बंद करके सूर्य भगवान के ध्यान में बैठा था। तब उसे आकाशवाणी सुनाई दी- ‘संवरण! तू यहाँ तप में संलग्न है और वहाँ तेरी राजधानी आग में जल रही है।’

राजा संवरण भगवान् सूर्यदेव के ध्यान में बैठा रहा। कुछ देर बाद उसके कानों में पुनः आवाज सुनाई पड़ी- ‘संवरण, तेरे कुटुंब के सभी लोग आग में जलकर मर गए।’

 राजा संवरण इस पर भी अपने स्थान पर बैठा भगवान सूर्य देव का ध्यान करता रहा। कुछ देर पश्चात् उसके कानों में तीसरी बार आवाज आई- ‘संवरण, तेरी प्रजा अकाल की आग में जलकर भस्म हो रही है। तेरे नाम को सुनकर लोग थू-थू कर रहे हैं।’

राजा संवरण फिर भी दृढ़तापूर्वक तप में लगा रहा। सूर्यदेव राजा संवरण की दृढ़निष्ठा से प्रसन्न हुए और उन्होंने संवरण के समक्ष प्रकट होकर कहा- ‘संवरण, मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूँ। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?’

संवरण ने आंखें खोलकर सूर्यदेव को प्रणाम किया तथा बोला- ‘देव! मुझे आपकी पुत्री ताप्ती पत्नी के रूप में चाहिए!’

राजा की प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने कहा- ‘तथास्तु।’ अर्थात् ऐसा ही हो!

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संवरण की इच्छानुसार सूर्यदेव ने अपनी पुत्री ताप्ती का विवाह संवरण के साथ कर दिया। संवरण हिमपर्वत पर ही ताप्ती के साथ रमण करने लगा तथा अपनी प्रजा और राज्य को भूल गया। उधर संवरण के राज्य में भीषण अकाल पड़ा और जैसा-जैसा सूर्यदेव ने कहा था, वैसा-वैसा होने लगा। संवरण के मंत्री ने अपने राजा की खोज की और शीघ्र ही उसे खोज निकाला। मंत्री ने राजा को बताया कि राज्य में अकाल पड़ गया है तथा संपूर्ण प्रजा का विनाश हो रहा है। मंत्री की बातें सुनकर संवरण का हृदय कांप गया और उसे इस बात की ग्लानि हुई कि मैंने एक स्त्री के प्रति आसक्त होकर अपनी प्रजा और राज्य को छोड़ दिया। राजा संवरण तुरंत अपने मंत्री तथा अपनी पत्नी ताप्ती के साथ अपने राज्य में पहुंचा। उसके राजधानी में पहुंचते ही राज्य में वर्षा आरम्भ हो गई। सूखी हुई पृथ्वी हरियाली से ढंक गई और अकाल दूर हो गया। प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने लगी। वह संवरण को परमात्मा और ताप्ती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी। जब हम इस पौराणिक कथा पर विचार करते हैं तो सहज ही अनुमान लगा लेते हैं कि यहाँ भी कुछ प्राकृतिक घटनाओं का मानवीकरण करके उसे चंद्रवंशी राजाओं के साथ जोड़ दिया गया है।

वस्तुतः सूर्य की तपस्या करने वाला राजा संवरण एक बादल है। भगवान सूर्य बादलों को गति प्रदान करके आकाश में ऊंचा उठाते हैं, रानी ताप्ती वस्तुतः वह जलराशि है जो बादलों को तृप्त करती है। अंत में संवरण रूपी बादल धरती पर बरसात करके प्रजा को सुखी करता है।

पुराणों में आए उल्लेख के अनुसार संवरण और ताप्ती से कुरु नामक पुत्र का जन्म हुआ जो संवरण के बाद हस्तिनापुर का राजा हुआ। कुरु भी अपने पूर्वजों की तरह प्रतापी राजा था इसलिए उसके बाद से इस वंश को कुरुवंश कहा जाने लगा तथा कुरुवंश के राजाओं को कौरव कहा जाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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