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ययाति का श्राप (17)

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ययाति का श्राप

विभिन्न पुराणों में ययाति का श्राप बहुलिखित आख्यान है। ययाति का श्राप बताता है कि आज की हिन्दू संस्कृति में तथा ययाति कालीन आर्य संस्कृति में बहुत अधिक अंतर नहीं था। पुत्रों पर पिता का अधिकार आज की ही तरह सिद्ध था।

पिछली कड़ी में हमने चंद्रवंशी राजा ययाति के पुत्र यदु से चले वंशों की चर्चा की थी। इस कड़ी में हम ययाति द्वारा शापित दूसरे पुत्र तुर्वसु के वंशजों की चर्चा करेंगे। ययाति का श्राप किसी एक पुत्र तक सीमित नहीं था, अपितु केवल एक पुत्र को छोड़कर शेष सभी पुत्रों को दिया गया था।

कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि राजा ययाति के दूसरे पुत्र तुर्वसु से यवन उत्पन्न हुए जो धरती पर दूर-दूर तक फैल गये। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इन यवनों को वर्तमान समय में यहूदी एवं ईसाई माना जाता है।

कुछ पुराणों में कहा गया है कि तुर्वसु को दिया गया राजा ययाति का श्राप इस प्रकार था- ‘पिता का तिरस्कार करने वाले दुष्ट! जा! तू मांस भोजी, दुराचारी और वर्णसंकर म्लेच्छ हो जा।’ जबकि कुछ पुराणों के अनुसार राजा ययाति के बेटे ‘तुरू’ के वंशज आगे चलकर ‘तुर्क’ कहलाये।

वस्तुतः तुर्वसु से तुरुष्क उत्पन्न होने की बात अधिक सही लगती है जिन्हें आगे चलकर तुर्क कहा गया। इनका प्रारम्भिक इतिहास चीन के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से जुड़ा हुआ है। प्रारम्भ में ये इस्लाम के शत्रु थे किंतु जब मध्यकाल में इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया तब इन्होंने इस्लाम के प्रसार का बीड़ा उठाया। भारत में इस्लाम को लाने का श्रेय इन्हीं तुर्कों को जाता है।

हरिवंश पुराण में लिखा है कि तुर्वसु के पुत्र गोभानु हुए तथा गोभानु के पुत्र राजा त्रैसानु थे जो कभी परास्त नहीं होते थे। त्रैसानु के पुत्र करन्ध और करन्धम के पुत्र मरुत्त हुए। मरुत्त पुत्रहीन थे, उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम सम्मता था। राजा मरुत्त ने अपनी पुत्री संवर्त्त ऋषि को दक्षिणा में प्रदान की। संवर्त ऋषि ने उस कन्या का विवाह एक पुरुवंशी राजा इलिन से कर दिया जिससे दुष्यंत का जन्म हुआ।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

यहाँ से पुरु वंश को पौरव वंश कहा जाने लगा। इस प्रकार पुरु वंश एवं तुर्वसु वंश पौरव वंश में विलीन हो गए। महाराज दुष्यंत इसी पौरव वंश में उत्पन्न हुए थे। मान्यता है कि राजा भरत की रानी शकुंता के पेट से उत्पन्न पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ।

महाराज दुष्यंत की एक अन्य रानी के गर्भ से करुत्थाम नामक पुत्र का जन्म हुआ। करुत्थाम के पुत्र का नाम आक्रीड था। आक्रीड के चार पुत्र हुए- पांड्य, केरल, कोल तथा चोल। इन राजकुमारों ने चार राजकुलों की स्थापना की जिन्हें पांड्य, केरल, कोल तथा चोल कहा गया।

जब देवयानी के दो पुत्रों यदु एवं तुरु ने अपने पिता की वृद्धावस्था लेने से मना कर दिया तो शर्मिष्ठा के पुत्रों की बारी आई। शर्मिष्ठा के दोनों बड़े पुत्रों द्रह्यु और अनु ने भी पिता को अपना यौवन देने से मना कर दिया। इस पर राजा ने उन्हें भी भयानक शाप दिये।

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कुछ पुराणों के अनुसार राजा ययाति का श्राप उसके पुत्र अनु के लिए अत्यंत भयंकर सिद्ध हुआ। अनु से अभोज्य भोजन करने वाली प्रजा उत्पन्न हुई। वे लोग कुत्ते, बिल्ली, सांप आदि का मांस खाते थे। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि ‘अनु’ के वंशज ही इतिहास में ‘हूँग-नू’ अथवा हूण कहलाये। ये लोग भी तुरुओं की भांति चीन देश में रहते थे। हरिवंश पुराण में लिखा है कि अनु के पुत्र धर्म हुए और धर्म के पुत्र धृत, धृत के पुत्र दुदुह, दुदुह के पुत्र प्रचेता और प्रचेता के पुत्र सुचेता हुए। इस प्रकार हरिवंश पुराण में अनु के वंशजों के बारे में कहीं नहीं लिखा है कि वे धर्मविहीन तथा मांसभोजी थे। मत्स्य पुराण के अनुसार अनु के सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन परम धार्मिक एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। हरिवंश पुराण के अनुसार राजा ययाति के तीसरे पुत्र दुह्यु से भोज वंश की उत्पत्ति हुई। इस वंश के बारे में अधिक इतिहास नहीं मिलता है। जब चारों पुत्रों ने राजा ययाति का बुढ़ापा लेने से मना कर दिया तो अंत में राजा ययाति ने शर्मिष्ठा के सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपने पास बुलाकर उससे कहा कि वह अपने पिता का बुढ़ापा ले ले। पुरु ने अपने पिता का आदेश स्वीकार कर लिया।

पिता की इच्छा पूर्ण किए जाने पर पुरु को राजा ययाति का श्राप नहीं मिला।इससे राजा ययाति ने पुरु से प्रसन्न होकर उसे गंगा-यमुना के बीच की भूमि का राजा बना दिया। राजा पुरु की एक रानी का नाम कौशल्या था जिसके गर्भ से जन्मेजय नामक पुत्र का जन्म हुआ। जन्मेजय की रानी अनंता थी जिसके पुत्र प्रचिंवान हुए। प्रचिंवान का वंश काफी लम्बे समय तक चलता रहा। उसके वंश में आगे चलकर इलिन नामक राजा हुआ जिसका विवाह तुर्वसु के कुल में उत्पन्न सम्मता से हुआ जो ऋषि संवर्त्त की पालिता पुत्री थी। इलिन की एक रानी का नाम राथांतरा था जिसके गर्भ से राजा दुष्यंत का जन्म हुआ। दुष्यंत के समय से यह कुल पौरव कहलाया जिसके बारे में हम पहले बता चुके हैं।

यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पुरु आदि नामों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। राजा पुरु के विजयी और पराक्रमी होने की चर्चा भी ऋग्वेद में है। एक स्थान पर लिखा है- ‘हे वैश्वानर! जब तुम पुरु के समीप पुरियों का विध्वंस करके प्रज्वलित हुए तब तुम्हारे भय से असिक्नी अर्थात् चेनाब के किनारे के काले अनार्य दस्यु भोजन छोड़कर आए।’

ऋग्वेद में ही एक स्थान पर उल्लेख हुआ है कि- ‘हे इंद्र! भूमि-लाभ के लिए युद्ध कर रहे पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु और पुरु की आप रक्षा करें।’

इस प्रार्थना का समर्थन एक और मंत्र इस प्रकार करता है- ‘हे इंद्र! आपने राजा पुरु और राजा दिवोदास के लिए नब्बे पुरों का नाश किया है।’

पौरव वंश के राजा दुष्यंत की रानी शकुंतला के गर्भ से भरत का जन्म हुआ। भरत के नाम पर पौरव वंश को भरत-वंश तथा उनके द्वारा शासित क्षेत्र को ‘भारतवर्ष’ कहा जाने लगा। इसी कुल में आगे चलकर संवरण नामक राजा हुआ जिसकी रानी तप्ती के गर्भ से कुरु नामक प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ। कुरु के नामक यह वंश कुरुवंश कहलाया जिसके वंश कौरव कहे गए। महाभारत का युद्ध इसी कौरव कुल के राजकुमारों के बीच में लड़ा गया था जिनमें से एक पक्ष को कौरव तथा दूसरे पक्ष को पाण्डव कहा जाता था।

कुछ पुराणों के अनुसार कौरव वंश की एक शाखा हस्तिनापुर पर, दूसरी शाखा मगध पर, तीसरी शाखा अफगानिस्तान पर तथा चौथी शाखा ईरान पर शासन करती थी।

इस प्रकार पुराणों में आए वर्णन के अनुसार भारतीय आर्य राजाओं के वंशज ही बंगाल की खाड़ी से लेकर ईरान देश तक तथा काश्मीर से लेकर केरल देश तक के विशाल क्षेत्र पर शासन करते थे। ये सभी आर्य राजा एक ही परिवार से निकले थे।

इन पुराणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि भारत में आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे अपितु भारतीय आर्य राजकुल भारत के ही थे। इन राजकुलों से बहिष्कृत राजकुल तुर्कों एवं शकों के रूप में चीन, म्लेच्छों के रूप में ईरान-ईराक तथा यवनों के रूप में यूरोप आदि देशों को चले गए तथा वहाँ जाकर विधर्मी हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ययाति की पुत्री माधवी महर्षि गालव को सौंप दी गई (18)

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ययाति की पुत्री माधवी महर्षि गालव को सौंप दी गई

चन्द्रवंशी राजा ययाति के पांच पुत्रों का उल्लेख हम इससे पूर्व की कथाओं में कर आए हैं। इस कथा में हम ययाति की पुत्री माधवी की चर्चा करेंगे। जहाँ तक मेरी जानकारी है किसी भी प्राचीन पुराण में माधवी का उल्लेख नहीं हुआ है। माधवी की कथा धूर्त वामवंथी लेखकों द्वारा गढ़ी गई है ताकि पुराणों को बदनाम किया जा सके।

कहा जाता है कि महाभारत के उद्योगपर्व में माधवी का उल्लेख किया गया है किंतु मेरे पास गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत की जो प्रति उपलब्ध है, उसमें ययाति की पुत्री माधवी की कथा का उल्लेख नहीं है किंतु डाॅ. भीमराव अम्बेडकर सहित कई विद्वानों ने ययाति की पुत्री माधवी की कथा का उल्लेख किया है। अतः संभव है कि किसी अन्य प्रकाशक द्वारा प्रकाशित महाभारत में माधवी की कथा कही गई हो।

इसलिए जब हम चंद्रवंशी राजाओं की शृंखला में राजा ययाति और उसके वंशजों की विस्तार से चर्चा कर रहे हैं तब हमें राजा ययाति की तथाकथित पुत्री माधवी की कथा तथा उसकी सच्चाई की भी चर्चा करनी चाहिए।

ययाति की पुत्री माधवी की कथा के अनुसार एक बार गालव ऋषि ने अपने गुरु विश्वामित्र से पूछा- ‘मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या प्रदान करूं?

इस पर महर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘तुमने मेरी बहुत सेवा की है, इसलिए मुझे तुमसे कोई दक्षिणा नहीं चाहिए।’

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महर्षि के बार-बार मना करने पर भी गालव ऋषि ने हठ कर लिया कि वे महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा देना ही चाहते हैं। इसपर विश्वामित्र ने रुष्ट होकर कहा- ‘हे गालव! यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो मुझे चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण वाले ऐसे आठ सौ घोड़े ला दो, जिनका दायां कान श्यामवर्ण हो।’

 गालव ने महर्षि विश्वामित्र से कुछ समय देने की याचना की ताकि वे गुरु-दक्षिणा का प्रबंध कर सकें। गालव ने कई स्थानों पर पता किया किंतु उन्हें ऐसे अश्वों के बारे में कुछ पता नहीं चला। इस पर गालव ने भगवान श्री हरि विष्णु का ध्यान किया। भगवान श्री हरि विष्णु ने गालव की सहायता के लिए गरुड़जी को भेजा।

गरुड़जी ने चारों दिशाओं का वर्णन करके गालव से पूछा- ‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें समस्त दिशाओं का दर्शन कराने के लिए उत्सुक हूँ, अतः तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ और बताओ कि हम पहले किस दिशा में चलें?’

गरुड़ के आदेश से गालव गरुड़ की पीठ पर बैठ गए तथा उन्होंने गरुड़जी से कहा- ‘हे गरुड़! आप मुझे पूर्व दिशा की ओर ले चलें जहाँ धर्म के नेत्रस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं तथा जहाँ आपने देवताओं का सानिध्य बताया है।’

जब गरुड़जी ने अंतरिक्ष में उड़ान भरी तो गालव मुनि भय से व्याकुल होकर बोले- ‘हे गरुड़! अपनी गति कम करें, कहीं ऐसा न हो आपसे ब्रह्महत्या हो जाए। मुझे न तो आपका शरीर दिखाई दे रहा है न ही अपना। सब ओर अंधकार ही अंधकार है।’

कुछ ही समय में गरुड़जी गालव को लेकर समुद्र तट के निकट स्थित ऋषभ पर्वत पर पहुंचे। ऋषभ पर्वत पर उन्हें शाण्डाली नामक तपस्विनी मिली। शाण्डिली ने उन दोनों को कुछ खाने को दिया और उसके बाद वे सो गए। जब वे लोग नींद से जागे तो गरुड़जी के पंख गायब थे।

गरुड़जी को ऐसे देखकर गालव मुनि बोले- ‘हे मित्र! अवश्य ही आपने कुछ गलत सोचा होगा।’

गरुड़जी ने कहा- ‘मैंने तो केवल इतना ही विचार किया था कि इस तपस्विनी को मुझे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लोक में छोड़ देना चाहिए। फिर भी हे देवी! यदि मैंने अपने चंचल मन से आपका कुछ अप्रिय सोचा तो आप मुझे क्षमा करें।’

गरुड़जी की बात सुनकर शाण्डाली नामक तपस्विनी बोली- ‘वत्स! तुमने मेरी निंदा की है, मैं निंदा सहन नहीं करती, जो पापी मेरी निंदा करेगा, पुण्य लोकों से तत्काल भ्रष्ट हो जायेगा। अतः आज से तुम्हें मेरी ही नहीं अपितु किसी भी स्त्री की निंदा नहीं करनी चाहिए।’

यह कहकर तपस्विनी ने गरुड़जी को उनके शक्तिशाली पंख वापस लौटा दिए। तत्पश्चात तपस्विनी की आज्ञा लेकर वे दोनों वहाँ से चल दिए।

मार्ग में गरुड़जी ने कहा- ‘गालव! श्वेतवर्ण और श्यामकर्ण वाले घोड़े हमें तभी मिल सकते है, जब हमारे पास धन हो। अतः मेरी राय में हमें किसी राजा के पास जाकर धन की याचना करनी चाहिए। चन्द्रवंश में उत्पन्न एक राजा मेरे मित्र हैं, जो महाराज नहुष के पुत्र हैं। वह मांगने पर तुम्हें निश्चय ही धन दे देंगे।’

यह बात सुनकर गालव ऋषि ने गरुड़जी को राजा ययाति के पास चलने को कहा। दोनों मित्र राजा ययाति के दरबार में पहुंचे।

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गरुड़जी ने राजा ययाति को गालव द्वारा महर्षि विश्वामित्र को दक्षिण देने के संकल्प की बात बताई तथा कहा- ‘हे नहुषनंदन! ये तपस्वी गालव मेरे मित्र हैं। ये दस हजार वर्षों तक महर्षि विश्वामित्र के शिष्य रहे हैं। हे राजन्! ऋषि गालव आपके दान के सुपात्र हैं और इनके हाथ में दिए गए दान से आपकी शोभा होगी।’ राजा ययाति का वैभव पहले ही सहस्रों यज्ञ, अनुष्ठान और दानादि के कारण क्षीण हो चुका था। अतः राजा ययाति ने कहा- ‘हे गरुड़! आप सूर्यवंश के राजाओं को छोड़कर मेरे पास आए। इससे मेरा जन्म सफल हो गया किन्तु अब मैं उतना धनवान नहीं रहा जितना आप समझते हैं। इन दिनों मेरा वैभव क्षीण हो चुका है। अतः मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने में असमर्थ हूँ। फिर भी द्वार पर आये याचक को खाली हाथ लौटाकर मैं अपने कुल को कलंकित नहीं करूंगा। मैं आपको अपनी पुत्री माधवी प्रदान करता हूँ जो आपका सम्पूर्ण कार्य संपादित करेगी।’ यह कहकर राजा ययाति ने अपनी सर्वांग-सुन्दर पुत्री माधवी को बुलाया।  

राजा ययाति बोले- ‘यह मेरी पुत्री चार राजकुलों की स्थापना करने वाली है। इसे वरदान मिला हुआ है कि प्रत्येक प्रसव के बाद यह फिर से कुमारी हो जाएगी। इसके सौन्दर्य से आकृष्ट होकर देवता, मनुष्य और असुर इसे पाने की अभिलाषा रखते हैं। आप इसे ले जाइये। इसके शुल्क के रूप में राजा आपको अपना राज्य भी दे देंगे, फिर आठ सौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्वों की तो बात ही क्या है?’

इस प्रकार धूर्त लेखकों द्वारा राजा ययाति की पुत्री माधवी गालव को सौंप दी गई। यह किसी भी काल में भारत के लोगों की संस्कृति नहीं थी। आर्य राजाओं एवं ऋषियों की संस्कृति किसी भी काल में इस प्रकार विकृत नहीं हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गालव ऋषि की पालित कन्या माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र जन्मे (19)

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गालव ऋषि की पालित कन्या माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र जन्मे

हमने पिछली कथा में चर्चा की थी कि राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी गालव ऋषि को सौंप दी ताकि गालव मुनि माधवी की सहायता से आठ सौ श्वेत अश्वों का प्रबंध कर सकें जिनका दायां कान काला हो।

गालव ऋषि ने माधवी को प्राप्त करके ययाति से कहा- ‘ठीक है, राजन्! मेरा मनोरथ पूर्ण होने के पश्चात् मैं आपसे फिर मिलूँगा।’ इतना कहकर गालव ऋषि राजकन्या माधवी को अपने साथ लेकर चल दिए। गरुड़जी पुनः भगवान श्रीहरि विष्णु की सेवा में चले गए।

गालव ऋषि माधवी को लेकर अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे तथा उनसे बोले- ‘राजन्! यह देवकन्या अपनी संतानों द्वारा वंश वृद्धि करनेवाली है। आप चाहें तो शुल्क देकर निश्चित अवधि तक इसे अपनी पत्नी बनाकर रख सकते हैं।’

राजा हर्यश्व ने कहा- ‘हे द्विजश्रेष्ठ! आपकी यह कन्या कई शुभ लक्षणों से युक्त और कई चक्रवर्ती पुत्रों को जन्म देने में समर्थ है। अतः उसके लिए आप समुचित शुल्क बताइए?’

गालव ऋषि बोले- ‘राजन्! इसके शुल्क के रूप में मुझे आठ सौ चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण वाले अश्व चाहिए जिनके दाएं कान काले हों।’ यह शुल्क चुका देने पर मेरी यह शुभ लक्षणाकन्या आपके तेजस्वी पुत्रों की जननी होगी।’

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यह सुनकर काम से मोहित हुए राजा हर्यश्व ने अत्यंत दीन स्वर में कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आप जिन अश्वों की बात कर रहे हैं, मेरे पास उस तरह के केवल दो सौ अश्व हैं। आप चाहें तो दो सौ घोड़े ले लें तथा उनके बदले में, मैं इस कन्या से केवल एक संतान उत्पन्न करूंगा। अतः आप मेरे इस शुभ मनोरथ को पूर्ण करें।’

राजा की बात सुनकर गालव ऋषि चिंतित हो गए किंतु माधवी ने कहा- ‘हे मुने! मुझे एक वेदवादी ब्राह्मण का वरदान है कि तुम प्रत्येक प्रसव के अंत में फिर से कन्या हो जाओगी।’ अतः आप दो सौ यथेष्ठ घोड़ों के बदले में मुझे राजा को सौंप सकते है। इस तरह चार राजाओं से दो सौ-दो सौ घोड़े लेकर आप अपनी दक्षिणा जुटा सकते हैं। इससे मेरे रूप सौन्दर्य पर कोई अंतर नहीं पड़ने वाला, अतः आप निश्चिन्त रहें।’

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कन्या के ऐसा कहने पर गालव मुनि ने राजा हर्यश्व से कहा- ‘हे राजन! आप यथेष्ठ शुल्क का एक चौथाई भाग देकर इस कन्या को ग्रहण करें और इससे केवल एक ही संतान उत्पन्न करें। मैं समय आने पर माधवी को आपसे पुनः प्राप्त कर लूंगा।’ इस तरह उस कन्या ने अयोध्या के राजा हर्यश्व के लिए एक पुत्र को जन्म दिया जो वसुमना नाम से विख्यात हुआ। नियत समय पर गालव मुनि पुनः अयोध्या पहुँचे। उन्होंने 200 घोड़े अमानत के रूप में राजा हर्यश्व के पास ही छोड़ दिए तथा माधवी को लेकर काशी नरेश दिवोदास के पास पहुँचे। उनके समक्ष भी गालव ऋषि ने वही प्रस्ताव रखा जो उन्होंने अयोध्या नरेश के समक्ष रखा था। काशीराज के पास भी उस प्रकार के केवल 200 अश्व थे। गालव ऋषि ने काशी नरेश से कहा- ‘आप भी इस देवकन्या से केवल एक संतान उत्पन्न करें। मैं समय अपने पर इस कन्या को दो दौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्वों के साथ ले जाउंगा।’ राजा दिवोदास से माधवी ने प्रतर्दन नामक पुत्र उत्पन्न किया। इसके पश्चात् माधवी पुनः गालव ऋषि को मिल गई ।

अब गालव ऋषि माधवी को लेकर भोज नगरी के राजा उशीनर के पास पहुंचे और उनके सामने भी अपना मनोरथ रखा। राजा उशीनर के पास भी इस प्रकार के केवल दो सौ घोड़े ही थे। अतः गालव ने माधवी को एक संतान उत्पन्न करने के लिए राजा उशीनर के पास छोड़ दिया। माधवी ने राजा उशीनर से सूर्य के समान तेजस्वी बालक को जन्म दिया जो शिबि के नाम से विख्यात हुआ। नियत अवधि के बाद गालव ऋषि माधवी को लेने पहुँच गए। तभी राजा के दरबार में उन्हें पक्षिराज गरुड़ मिल गए।

गरुड़जी ने कहा- ‘ब्रह्मन्! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपका मनोरथ पूरा हो गया।’

गालव ऋषि बोले- ‘पक्षिराज! अभी तो दक्षिणा का एक चौथाई भाग जुटाना शेष है।’

गरुड़जी ने कहा- ‘अब इसके लिए तुम्हारा प्रयत्न व्यर्थ होगा, क्योंकि अब ऐसे अश्व किसी के पास नहीं है।’ इस पर गालव मुनि छः सौ अश्वों तथा माधवी को लेकर महर्षि विश्वामित्र के पास पहुंचे।

गालव ऋषि ने उनसे कहा- ‘गुरुदेव! आपकी इच्छानुसार छः सौ श्वेत वर्णी अश्व आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं जिनका दायां कान श्यामवर्णी है। चूंकि मुझे तीन राजाओं ने माधवी से एक-एक संतान उत्पन्न करने के बदले में दो सौ – दो सौ घोड़े दिए हैं इसलिए अब मैं माधवी आपको सौंपता हूँ। आप भी इससे एक संतान उत्पन्न कर लें। इसके बाद माधवी पुनः मुझे लौटा दें।’

विश्वामित्र ने कहा- ‘गालव! तुम इसे पहले ही ले आते तो मुझे इससे चार वंश प्रवर्तक पुत्र प्राप्त हो जाते। अब मैं इस कन्या को ग्रहण करता हूँ। घोड़े मेरे आश्रम में छोड़ दो।’

माधवी ने विश्वामित्र से अष्टक नामक पुत्र को जन्म दिया। जब अष्टक बड़ा हुआ तब विश्वामित्र ने अपना राज्य तथा छः सौ श्वेतवर्णी एवं श्यामकर्णी अश्व अष्टक को सौंप दिए तथा स्वयं तपस्या करने के लिए तपोवन में चले गए।

गालव ऋषि ने विश्वामित्र के ऋण से उऋण होकर माधवी को पुनः उसके पिता राजा ययाति को सौंप दिया तथा स्वयं तपस्या करने वन में चले गए ।

माधवी के पुनः लौट आने पर राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी का विवाह करना चाहा किंतु माधवी ने विवाह करने से मना कर दिया तथा आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लेकर वह भी तपस्या करने के लिए गहन वनों में चली गई!

हम पहले ही कह चुके हैं कि यह कथा किसी भी पुराण में नहीं मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने की नीयत से इस कथा को लिखा गया है ताकि हिन्दू राजाओं एवं ऋषियों पर यह आक्षेप लगाया जा सके कि वे राजकन्याओं से वेश्यावृत्ति करवाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है (20)

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माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है

माधवी का आख्यान व्यभिचारिणी स्त्री की कथा नहीं है! वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं पुराणों सहित किसी भी प्राीचन ग्रंथ में माधवी की कथा का उल्लेख नहीं है।

पुराणों में ययाति के पांच पुत्रों- यदु, तुर्वसु, अनु, द्रह्यु और पुरू का ही उल्लेख है। ये नाम वेदों में भी आए हैं किंतु माधवी का उल्लेख केवल महाभारत में बताया जाता है।

माधवी का आख्यान असंभव दोषों से भरा हुआ है। विश्वामित्र द्वारा श्वेत वर्ण एवं श्यामकर्ण वाले 800 अश्व मांगने के पीछे कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता है। माधवी का पुत्र उत्पन्न करके वापस कन्या बन जाना असंभव सी बात है। वैदिक कालीन आर्यों से लेकर पौराणिक काल के आर्यों में कन्या के विक्रय का कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है।

वैदिक आर्य परम्परा के अनुसार कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना तथा उससे नवीन राजकुल का उत्पन्न होना संभव नहीं है। विवाह के बिना संतान उत्पन्न करना वेद-विरुद्ध है।

इस तरह माधवी का आख्यान आर्य-परम्परा एवं इतिहास-परम्परा के विरुद्ध है तथा निंदनीय है। चार्वाकों एवं वामाचारियों द्वारा आर्यों को बदनाम करने की नीयत से इसक कथा की कपोल-कल्पना करके इसे महाभारत में घुसा दिया गया है।

कुछ आधुनिक विद्वानों ने माधवी का आख्यान सत्य बताकर आर्यों की संस्कृति पर हेय होने के आरोप लगाने के प्रयास किए हैं। अपनी बात के समर्थन में वे नियोग प्रथा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आर्यों में संतानोत्पत्ति के लिये देवपुरुष से संतान प्राप्त करने की प्रथा थी।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

उनके अनुसार आर्यों का ही एक वर्ग देव कहलाता था। वे अत्यंत पराक्रमी होते थे। इसलिए आर्य पुरुष अपनी पत्नी से अच्छी संतान पाने के लिए अपनी पत्नी को किसी भी देव से संतानोत्पत्ति की आज्ञा देते थे।

वास्तविकता यह है कि भारतीय आर्यों में देवपुरुष जैसी कोई प्रथा नहीं थी, जिसका उल्लेख हिन्दू धर्म को एवं प्राचीन आर्यों को कलंकित करने के लिए किया गया है।

यह सही है कि अथर्ववेद में नियोग का उल्लेख हुआ है। महाभारतकालीन आर्यों में भी नियोग प्रथा प्रचलित थी। महाराज मनु ने भी मनुस्मृति में नियोग प्रथा का समर्थन किया है, किंतु नियोग एक सामान्य परम्परा नहीं थी। इसे आपद-धर्म के रूप में अपनाया गया था। यदि किसी स्त्री का पति क्लीव होता था, अथवा शारीरिक रूप से अक्षम होता था, अथवा कोई स्त्री संतान प्राप्ति से पहले ही विधवा हो जाती थी, तब उसे नियोग करने की अनुमति दी जाती थी ताकि उसका परिवार चलता रहे और समाज में व्यभिचार न बढ़े। किसी भी स्त्री को केवल एक बार नियोग से संतान उत्पन्न करने की अनुमति होती थी। वह एक से अधिक पुरुषों से नियोग करके पुत्र प्राप्त नहीं करती थी।

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माधवी का आख्यान जो कि पूरी तरह मनगढ़ंत है, कहता है कि माधवी ने चार पुरुषों से चार पुत्र उत्पन्न किए। ऐसा नियोग-प्रथा के अंतर्गत नहीं किया जाता था। कुछ विद्वानों ने लिखा है कि यदि महाभारत में दी गई कथा सत्य है तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि माधवी कौन थी जिसने कुंवारी कन्या होते हुए भी एक से अधिक पुरुषों से पुत्र उत्पन्न किए जिनसे नवीन राजकुलों का निर्माण हुआ! कुछ वेदज्ञों का कहना है कि माधवी धरती का एक नाम है। धरती पर अनेक राजा राज्य करते हैं जो अपनी भूमि के पति होते हैं। अतः उन्हीं पर व्यंग्य करने के लिए वामाचारियों ने इस कथा का निर्माण किया है। कुछ वेदज्ञों के अनुसार किसी भी उपजाऊ भूमि को माधवी कहा जाता था और राजा ययाति ने धन और अश्व न होने पर ऋषि गालव को माधवी अर्थात् भूमि का दान दिया था। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में कम से कम तीन श्लोकों में धरती के लिए माधवी शब्द का प्रयोग किया गया है। पहले श्लोक में कहा गया है- ‘यथाहम राघवादंयम मनसपि न चिन्तये तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’ दूसरे श्लोक में कहा गया है- ‘मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड के तीसरे श्लोक में कहा गया है- यथैतत सत्यामुक्तम मे वेद्धि रामात परम् न च तथा मे माधवी देवी विवरं दतुर्रमहती।’

इन श्लोकों में माता सीता कह रही हैं कि- ‘हे धरती माँ। यदि मैंने मन, कर्म एवं वचन से प्रभु श्रीराम के अतिरिक्त किसी को मन में न लाया हो तो तुम फट जाओ और मुझे अपनी गोद में शरण दे दो।’

इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि पौराणिक भारत में धरती को माधवी कहा जाता था। अतः यदि माधवी की कथा सत्य है तो भी उसका आशय केवल इतना है कि सार्वभौम चक्रवर्ती राजा ययाति ने गालव मुनि को भूमि का एक टुकड़ा दिया था।

अब प्रश्न यह उठ सकता है कि यदि माधवी का अर्थ भूमि के टुकड़े से होता है तो विभिन्न राजाओं को उसका पति क्यों कहा गया है?

भूमि का स्वामी होने के कारण ही राजाओं को भूपति भी कहा जाता है। और यही पृथ्विस्वरूपा माधवी और उनके चार पतियों अर्थात भूपतियों का उल्लेख महाभारत के माधवी प्रसंग का रहस्य भी है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस के बालकाण्ड में यह चौपाई लिखी है-

दीप दीप के भूपति नाना। आये सुनि हम जो पनु ठाना।

अर्थात्- एक ही समय में धरती के छोटे-बड़े खण्डों के कई स्वामी होते हैं।

कुछ विद्वानों का मानना है कि माधवी के चार पुत्र होने का तात्पर्य- धरती पर रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने से है। एक से अधिक पतियों को धारण करने वाली धरती व्यभिचारिणी नहीं होती। अतः माधवी को मानवी कन्या बताकर उसकी आड़ में, वैदिक एवं सनातन संस्कृति पर प्रहार करने की कुचेष्टा मात्र है। माधवी का आख्यान पूरी तरह असत्य है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी (21)

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शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी

शकुंतला विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री थी। इस प्रकार शकुंतला एक ऋषि एवं एक अप्सरा की संतान थी। शकुंतला का पालन-पोषण महर्षि कण्व ने किया था।

चंद्रवंशी राजाओं की कथाओं के क्रम में महर्षि अत्रि के कुल में उत्पन्न सातवें चंद्रवंशी राजा ययाति तथा उसके वंशजों की चर्चा कर रहे हैं। राजा ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था तथा उसे गंगा-यमुना के बीच के प्रदेशों का स्वामी बनाया था।

पुरु की वंश परम्परा में तेबीसवां राजा दुष्यंत हुआ। दुष्यंत की माता सम्मता, ययाति के शापित पुत्र तुर्वसु के कुल में जन्मी थी जिसका लालन-पालन संवत्र्त ऋषि ने किया था, इस प्रकार वह संवत्र्त ऋषि की पालित पुत्री थी।

राजा दुष्यंत से पुरु वंश को पौरव वंश कहा जाने लगा। दुष्यंत की रानी शकुंतला की कथा महाभारत के आदिपर्व में मिलती है। इसी कथा को आधार बनाकर महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम् नामक काव्य की रचना की है जिसे संस्कृत साहित्य का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।

यह कथा इस प्रकार से है- एक बार महर्षि विश्वामित्र ने घनघोर तपस्या की। इससे इन्द्र को भय हुआ कि कहीं विश्वामित्र इन्द्रासन प्राप्त नहीं कर लें। इसलिए इन्द्र ने मेनका नामक अप्सरा को ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा।

दैवयोग से विश्वामित्र मेनका के सौन्दर्यजाल में फंस गए तथा वे मेनका के साथ रमण करने लगे। कुछ समय पश्चात् मेनका ने एक कन्या को जन्म दिया। मेनका ने उस कन्या को महर्षि कण्व के आश्रम में छोड़ दिया तथा स्वयं स्वर्गलोक को चली गई।

कण्व ऋषि ने शकुंतला को अपने आश्रम में पड़े हुए पाया तो उन्होंने उसे पुत्री मानकर उसका लालन-पालन किया। समय आने पर शकुंतला एक सुंदर युवती में बदल गई। एक दिन राजा दुष्यंत शिकार खेलने के लिए वन में आया तथा अपने साथियों से बिछड़कर कण्व ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा।

महर्षि कण्व उस समय तीर्थयात्रा पर गए हुए थे। राजा ने उनकी पुत्री के रूप एवं यौवन पर मुग्ध होकर उसे अपना परिचय दिया तथा उससे प्रणय निवेदन किया। शकुंतला भी उस महान् राजा से प्रभावित हो गई तथा उसने राजा का प्रणय निवेदन स्वीकार कर लिया।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

राजा दुष्यंत ने शकुंतला ने गन्धर्वविवाह कर लिया तथा कुछ समय पश्चात् अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर चला गया। राजा ने वचन दिया कि वह शीघ्र ही उसे अपनी राजधानी में बुलवा लेगा। राजा ने उसे अपनी अंगूठी भी प्रदान की। कुछ समय पश्चात् शकुंतला को अपने गर्भवती होने का पता चला। वह बहुत काल तक राजा के आने की प्रतीक्षा करती रही किंतु राजा दुष्यंत उसे लेने के लिए नहीं आया।

एक दिन शकुंतला राजा दुष्यंत के आने की प्रतीक्षा में बैठी थी। उसी समय दुर्वासा ऋषि कण्व ऋषि के आश्रम में आए किंतु शकुंतला अपने विचारों में इतनी तल्लीन थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के आगमन का पता नहीं चला। जब शकुंतला ने दुर्वासा ऋषि का स्वागत-सम्मान नहीं किया तो दुर्वासा ऋषि कुपित हो गए और ऋषि ने उसे श्राप दिया कि तू जिसके विचारों में इतनी तल्लीन है, वह तुझे भूल जाए।

दुर्वासा के क्रोध भरे शब्दों से शकुंतला का ध्यान भग्न हुआ और उसने सामने खड़े दुर्वासा को देखा। शकुंतला ने महर्षि से अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की। इस पर दुर्वासा ने शकुंतला को सांत्वना दी कि जब श्राप की अवधि बीत जाएगी तब राजा ने तुम्हें जो अंगूठी दी है, उसे देखकर राजा को तुम्हारा स्मरण हो जाएगा।

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शकुंतला पहले से ही दुष्यंत के वियोग में उदास रहती थी किंतु अब दुर्वासा द्वारा शाप दिए जाने से उसका दुःख दोगुना हो गया। गर्भवती शकुन्तला कई दिनों तक दुष्यंत की प्रतीक्षा करती रही। जब महर्षि कण्व तीर्थयात्रा से लौटे तो शकुंतला ने उन्हें राजा दुष्यंत के आने, अपने गर्भवती होने तथा दुर्वासा द्वारा श्राप दिए जाने के बारे में बताया। इस पर कण्व ऋषि अपनी पालिता पुत्री को लेकर राजा दुष्यंत के राजमहल में गए। मार्ग में जब शकुंतला ने एक सरोवर से जल पिया तब उसकी अंगुली में पहनी हुई अंगूठी दुर्वासा के श्राप के कारण सरोवर में गिर गई। जब शकुंतला राजा दुष्यंत से मिली तो दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण राजा दुष्यंत शकुंतला को पूरी तरह भूल चुका था इसलिए राजा ने उसे नहीं पहचाना। शकुंतला निराश होकर राजमहल से निकली। जब मेनका ने अपनी पुत्री को इस अवस्था में देखा तो वह शकुंतला को अपने साथ ले गई और उसे कश्यप ऋषि के आश्रय में रख दिया जहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया। महर्षि कश्यप ने उस बालक का नाम भरत रखा। शकुंतला का पुत्र भरत ऋषि-पुत्रों के साथ वन में पलने लगा। कुछ वर्ष बीत जाने पर एक मछुआरा, राजा दुष्यंत को एक मछली के पेट से मिली अँगूठी भेंट करने के लिए आया।

अँगूठी को देखते ही राजा दुष्यन्त को शकुन्तला की याद आई। राजा ने शकुन्तला को ढूँढना आरम्भ किया किंतु शकुंतला कहीं नहीं मिली। कुछ समय बाद राजा दुष्यंत को देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पर देवासुर संग्राम में भाग लेने के लिए अमरावती जाना पड़ा।

देवासुर संग्राम में विजय प्राप्त करने के बाद जब राजा दुष्यंत आकाश मार्ग से वापस अपनी राजधानी लौट रहे थे तब उन्होंने मार्ग में कश्यप ऋषि के आश्रम को देखा। आश्रम में एक सुंदर बालक खेल रहा था जिसके अंग शुभ लक्षणों से सम्पन्न थे। राजा दुष्यंत कौतूहल वश आश्रम में उतर पड़े और उस बालक के निकट गए।

जब राजा ने उस बालक को अपनी गोद में उठाने के लिए हाथ आगे बढ़ाए तो बालक की सुरक्षा कर रही शकुंतला की एक सखि ने राजा को बताया कि यदि वे इस बालक को छुएंगे तो बालक की भुजा में बंधा हुआ काला डोरा सर्प बनकर राजा को डंस लेगा।

राजा दुश्यन्त ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और बालक को गोद में उठा लिया। इससे बालक की भुजा में बंधा हुआ काला डोरा टूट गया। दुष्यंत ने उस धागे को पहचान लिया। एक दिन राजा ने यह धागा शकुंतला के केशों में बांधा था।

जब शकुंतला को ज्ञात हुआ कि किसी अनजान राजा ने उसके बालक को उठा लिया है तो वह दौड़ती हुई आई। उसने राजा दुष्यंत को पहचान लिया। दुर्वासा के श्राप की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसलिए दुष्यंत ने भी अपनी पत्नी को पहचान लिया। राजा ने अपनी इस महान् भूल के लिए शकुंतला से क्षमा माँगी और वे शकुंतला तथा भरत को अपने राजमहल में ले आए। इसके बाद शकुंतला और दुष्यन्त सुख-पूर्वक जीवन बिताने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा (22)

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राजा भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा

पिछली कड़ी में हमने चंद्रवंशियों के पुरु एवं तुर्वुसु नामक दो राजकुलों के मिलने से बने पौरव कुल के प्रथम राजा दुष्यंत और स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री शकुन्तला के गंधर्व विवाह से उत्पन्न पुत्र राजा भरत की चर्चा की थी।

मेनका के दौहित्र एवं शकुंतला के पुत्र राजा भरत की गणना महाभारत में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। राजा भरत का एक नाम ‘सर्वदमन’ भी था क्योंकि भरत ने बाल्यकाल में ही कई बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन किया था।

शकुंतला के पुत्र भरत हिंसक वन्य-जीवों तथा दुर्दांत पर्वतीय पशुओं को भी सहज ही परास्त करके अपने अधीन कर लेते थे। अपने जीवन काल में उन्होंने यमुना, सरस्वती तथा गंगा के तटों पर क्रमशः एक सौ, तीन सौ तथा चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। इस उल्लेख से स्पष्ट होता है कि इस काल में आर्यजन इन नदियों के प्रदेश में फैले हुए थे।

राजा भरत प्रवृत्ति से दानशील तथा वीर थे। राज्यपद मिलने पर भरत ने अपने राज्य का विस्तार किया। कुछ ग्रंथों में वर्णन आया है कि राजा भरत ने अपने पुरखों की प्राचीन राजधानी प्रतिष्ठानपुर के स्थान पर हस्तिनापुर को नई राजधानी बनाया। जबकि महाभारत आदि कुछ ग्रंथों के अनुसार राजा भरत के चैथे वंशज हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया जो कि वंशक्रम में महर्षि अत्रि से अट्ठाइसवां वंशज था।

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राजा भरत का विवाह विदर्भराज की तीन कन्याओं से हुआ था जिनसे उन्हें नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। भरत ने कहा- ‘ये पुत्र मेरे अनुरूप नहीं हैं।’ अतः तीनों रानियों ने भरत के शाप से डरकर अपने-अपने पुत्रों का हनन कर दिया। तब देवराज इंद्र देवगुरु बृहस्पति के पुत्र मन्यु को राजा भरत के पास लेकर आए जिससे पौरव वंश आगे चला।

इस उल्लेख से अनुमान होता है कि राजा भरत की रानियां गर्भवती तो हुईं किंतु उनके बालक जीवित नहीं रहे। अतः बृहस्पति नामक ऋषि के पुत्र को गोद लिया गया। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि मरुद्गण की कृपा से राजा भरत को भरद्वाज नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो आगे चलकर एक महान ऋषि हुए। इस आख्यान का अर्थ यह प्रतीत होता है कि भरद्वाज, राजा भरत के औरस पुत्र नहीं थे, अपितु उन्हें मरुद्गणों के माध्यम से किसी अन्य स्थान से प्राप्त किया गया था।

भारद्वाज के जन्म की कथा भी अत्यंत विचित्र है। कुछ पुराणों में कहा गया है कि बृहस्पति ने अपने भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता का बलपूर्वक गर्भाधान किया। उसके गर्भ में दीर्घतपा नामक संतान पहले से ही विद्यमान थी। बृहस्पति ने ममता से कहा- ‘मेरे पुत्र भरद्वाज का पालन-पोषण कर। यह मेरा औरस और मेरे भाई का क्षेत्रज पुत्र होने के कारण हम दोनों का पुत्र है।’

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ममता बृहस्पति के पुत्र का पालन-पोषण करने को तैयार नहीं थी। अतः वह बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज को वहीं छोड़कर चली गई। मरूद्गणों ने वह बालक राजा भरत को दे दिया। श्रीमद्भागवत् पुराण के अनुसार वंश के बिखर जाने पर भरत ने ‘मरुत्स्तोम’ नामक यज्ञ किया। इस पर मरुद्गणों ने भरत को भरद्वाज नामक पुत्र दिया। भरत की कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें यहीं रुककर उस कथा की फिर से चर्चा करनी होगी जिसमें चंद्रमा द्वारा देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण करके उसका गर्भाधान करने की बात कही गई थी जिसके परिणाम स्वरूप बुध का जन्म हुआ था। जिस प्रकार उस कथा में चंद्रमा के प्रभाव से तारा नामक नक्षत्र के बृहस्पति के प्रभावक्षेत्र से खिसककर चंद्रमा की तरफ आने तथा उसके परिणाम स्वरूप तारा से बुध नामक नक्षत्र के टूटकर अलग होने की घटना का मानवीकरण देखने को मिला था, ठीक उसी प्रकार बृहस्पति द्वारा अपने भाई उतथ्य की पत्नी का अपहरण करके उसे बलपूर्वक गर्भवती करने की कथा में भी किसी खगोलीय घटना का मानवीकरण किए जाने का अनुमान होता है। ममता के गर्भ में बृहस्पति द्वारा बलपूर्वक भरद्वाज को उत्पन्न करने की घटना वस्तुतः किसी खगोलीय घटना का मानवीकरण है जिसे चंद्रवंशी राजा भरत से जोड़ दिया गया है।

मरुद्णों द्वारा की गई सहायता का आशय खगोलीय पिण्डों के गुरुत्वकर्षण क्षेत्र में परिवर्तन करने से लगाया जा सकता है जिसके कारण ममता नामक खगोलीय पिण्ड अपनी धुरी से खिसककर उतथ्य नामक नक्षत्र के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से दूर चला गया तथा बृहस्पति नामक नक्षत्र के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश कर गया जिसके कारण ममता नामक नक्षत्र से अलग हुए पदार्थ से एक नीवन नक्षत्र बन गया जिसे भरद्वाज कहा गया।

जिस समय ममता नामक नक्षत्र उतथ्य के प्रभावक्षेत्र से बाहर निकला, उस समय ममता नामक नक्षत्र से दीर्घतपा नामक नक्षत्र के अलग होने की प्रक्रिया भी चल रही थी।

यदि हम राजा भरत की तीन रानियों के नौ पुत्रों के मरने तथा मरुद्गणों द्वारा बृहस्पति से पुत्र लाकर देने की कथा पर विचार करें तो हम पाएंगे कि स्वयं भरत भी कोई नक्षत्र था जिसके प्रभाव क्षेत्र में स्थित तीन नक्षत्रों से तीन-तीन क्षुद्र ग्रह उत्पन्न हो रहे थे किंतु इन तीनों नक्षत्रों से तीन-तीन छुद्र नक्षत्रों के उत्पन्न होने की घटना पूर्ण नहीं हो सकी इसलिए बृहस्पति के प्रभाव से उत्पन्न भरद्वाज नामक नक्षत्र राजा भरत के प्रभाव क्षेत्र में खिसक आया।

संस्कृत साहित्य में भरत नामक एक अग्नि का उल्लेख हुआ है। संभवतः यहाँ भरत किसी सूर्य का नाम था तथा यह सारी कथा एक सौरमण्डल के निर्माण की है जो हमारे सौर मण्डल से अलग था।

अब यदि हम दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत तथा अंतरिक्ष में घट रही घटनाओं में वर्णित नक्षत्रों के नामों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखें तो हमें स्पष्ट हो जाएगा कि धरती के मानवों एवं आकाश की अंतरिक्षीय घटनाओं को आपस में मिला दिया गया है।

हम आकाशीय घटनाओं को छोड़कर, पुनः धरती के मानवों की ओर लौटते हैं। महाभारत में आए एक उल्लेख के अनुसार राजा भरत ने बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया तथा महर्षि भरद्वाज की कृपा से भरत ने भूमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया। इस आख्यान का आशय यह है कि भरत को भरद्वाज ऋषि ने अपना पुत्र प्रदान किया।

भरद्वाज जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु भरत का पुत्र बन जाने के कारण क्षत्रिय हो गए। जब राजा भरत का देहावसान हुआ तो भरद्वाज ने स्वयं शासन ग्रहण नहीं करके राजपाट अपने पुत्र वितथ को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने वन में चले गए। इस प्रकार भरद्वाज पुनः ब्राह्मण बन गए।

इस प्रकार ऋषियों के माध्यम से प्राप्त वितथ अथवा भूमन्यु के माध्यम से, राजा भरत का वंश आगे बढ़ा। भरत महान प्रजापालक राजा हुए। उनके नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। इसीलिए भरत वंश में उत्पन्न अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश में बारम्बार ‘भारत’ कहकर सम्बोधित किया है।

बहुत से लोगों का मानना है कि भारत देश का नामकरण चंद्रवंशी राजा दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर न होकर सूर्यवंशी राजा भगवान् ऋषभदेव के पुत्र जड़भरत के नाम पर हुआ है। वे अपने समर्थन में भागवत् पुराण, विष्णुपुराण तथा लिंगपुराण के उदाहरण देते हैं। वस्तुतः हमारे देश का भारत नाम न तो शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र के नाम पर भारत हुआ और न भगवान् ऋषभदेव के पुत्र जड़भरत के नाम पर हुआ।

वास्तविकता यह है कि अत्यंत प्राचीन काल में आर्यों के विविध जनों में भरत नामक एक शक्तिशाली जन था जिसके वंशज इस देश में दूर-दूर तक फैल गए। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ जिसका अर्थ है- भरत के पुत्र।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सूर्य की पुत्री ताप्ती के लिए राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की (23)

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सूर्य की पुत्री ताप्ती के लिए राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की

पुराणों में कथा मिलती है कि भगवान सूर्य की पुत्री ताप्ती बहुत सुंदर थी। उसे पाने के लिए चंद्रवंशी राजा संवरण ने घनघोर तपस्या की।

अत्रि के वंशजों में हम राजा भरत तक के कुछ विख्यात राजाओं की कथाओं की चर्चा कर चुके हैं। राजा भरत के चैथे वंशज राजा हस्ती हुए जिन्होंने गंगा-यमुना के बीच में हस्तिनापुर नामक नगरी की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया। हस्ती के तीसरे वंशज का नाम संवरण था।

यद्यपि अलग-अलग पुराणों में चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली में अंतर मिलता है तथापि कुछ पुराणों के अनुसार संवरण चंद्रवंशी रजााओं की श्ृंखला में इकत्तीसवें राजा थे। वे भी अपने पूर्वजों की तरह प्रतापी राजा हुए।

एक दिन संवरण हाथ में धनुष-बाण लेकर हिमपर्वत पर आखेट करने गया। वहाँ राजा को एक अत्यंत सुंदर युवती दिखाई दी। वह युवती इतनी सुंदर थी कि राजा संवरण अपनी सुधि भुलाकर उस पर आसक्त हो गया।

राजा ने अपने तीर तरकष में रख लिए और उस युवती के निकट जाकर बोला- ‘हे तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्वी हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित्त चंचल और व्याकुल हो उठा है। क्या तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करोगी … मैं हस्तिनापुर का सम्राट हूँ। मैं तुम्हें हर तरह से सुखी रखूंगा।’

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युवती ने एक क्षण संवरण को देखा और अदृश्य हो गई। युवती के अदृश्य हो जाने पर राजा संवरण अत्यधिक व्याकुल हो गया। वह धनुष-बाण फेंककर उन्मत्तों की भांति विलाप करने लगा। कुछ समय पश्चात् वह युवती पुनः प्रकट हुई।

 युवती ने कहा- ‘राजन्! मैं सूर्य की पुत्री ताप्ती हूँ। मैं स्वयं भी आप पर मुग्ध हूँ किंतु मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में हूँ। जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती। यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को प्रसन्न कीजिए।’

इतना कहकर सूर्य की पुत्री ताप्ती पुनः अदृश्य हो गई। युवती को अपने सामने न देखकर राजा संवरण बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ा। कुछ समय पश्चात् सुधि आने पर राजा संवरण सूर्य की पुत्री ताप्ती के द्वारा कही गई बातों पर विचार करने लगा। उसने उसी समय सूर्यदेव की आराधना करनी आरम्भ कर दी। राजा संवरण की कई वर्षों की तपस्या के बाद सूर्यदेव ने संवरण की परीक्षा लेने का निश्चय किया। 

एक रात जब संवरण आंखें बंद करके सूर्य भगवान के ध्यान में बैठा था। तब उसे आकाशवाणी सुनाई दी- ‘संवरण! तू यहाँ तप में संलग्न है और वहाँ तेरी राजधानी आग में जल रही है।’

राजा संवरण भगवान् सूर्यदेव के ध्यान में बैठा रहा। कुछ देर बाद उसके कानों में पुनः आवाज सुनाई पड़ी- ‘संवरण, तेरे कुटुंब के सभी लोग आग में जलकर मर गए।’

 राजा संवरण इस पर भी अपने स्थान पर बैठा भगवान सूर्य देव का ध्यान करता रहा। कुछ देर पश्चात् उसके कानों में तीसरी बार आवाज आई- ‘संवरण, तेरी प्रजा अकाल की आग में जलकर भस्म हो रही है। तेरे नाम को सुनकर लोग थू-थू कर रहे हैं।’

राजा संवरण फिर भी दृढ़तापूर्वक तप में लगा रहा। सूर्यदेव राजा संवरण की दृढ़निष्ठा से प्रसन्न हुए और उन्होंने संवरण के समक्ष प्रकट होकर कहा- ‘संवरण, मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूँ। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?’

संवरण ने आंखें खोलकर सूर्यदेव को प्रणाम किया तथा बोला- ‘देव! मुझे आपकी पुत्री ताप्ती पत्नी के रूप में चाहिए!’

राजा की प्रार्थना सुनकर सूर्यदेव ने कहा- ‘तथास्तु।’ अर्थात् ऐसा ही हो!

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संवरण की इच्छानुसार सूर्यदेव ने अपनी पुत्री ताप्ती का विवाह संवरण के साथ कर दिया। संवरण हिमपर्वत पर ही ताप्ती के साथ रमण करने लगा तथा अपनी प्रजा और राज्य को भूल गया। उधर संवरण के राज्य में भीषण अकाल पड़ा और जैसा-जैसा सूर्यदेव ने कहा था, वैसा-वैसा होने लगा। संवरण के मंत्री ने अपने राजा की खोज की और शीघ्र ही उसे खोज निकाला। मंत्री ने राजा को बताया कि राज्य में अकाल पड़ गया है तथा संपूर्ण प्रजा का विनाश हो रहा है। मंत्री की बातें सुनकर संवरण का हृदय कांप गया और उसे इस बात की ग्लानि हुई कि मैंने एक स्त्री के प्रति आसक्त होकर अपनी प्रजा और राज्य को छोड़ दिया। राजा संवरण तुरंत अपने मंत्री तथा अपनी पत्नी ताप्ती के साथ अपने राज्य में पहुंचा। उसके राजधानी में पहुंचते ही राज्य में वर्षा आरम्भ हो गई। सूखी हुई पृथ्वी हरियाली से ढंक गई और अकाल दूर हो गया। प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने लगी। वह संवरण को परमात्मा और ताप्ती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी। जब हम इस पौराणिक कथा पर विचार करते हैं तो सहज ही अनुमान लगा लेते हैं कि यहाँ भी कुछ प्राकृतिक घटनाओं का मानवीकरण करके उसे चंद्रवंशी राजाओं के साथ जोड़ दिया गया है।

वस्तुतः सूर्य की तपस्या करने वाला राजा संवरण एक बादल है। भगवान सूर्य बादलों को गति प्रदान करके आकाश में ऊंचा उठाते हैं, रानी ताप्ती वस्तुतः वह जलराशि है जो बादलों को तृप्त करती है। अंत में संवरण रूपी बादल धरती पर बरसात करके प्रजा को सुखी करता है।

पुराणों में आए उल्लेख के अनुसार संवरण और ताप्ती से कुरु नामक पुत्र का जन्म हुआ जो संवरण के बाद हस्तिनापुर का राजा हुआ। कुरु भी अपने पूर्वजों की तरह प्रतापी राजा था इसलिए उसके बाद से इस वंश को कुरुवंश कहा जाने लगा तथा कुरुवंश के राजाओं को कौरव कहा जाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा कुरु के परिश्रम से धर्म क्षेत्र बन गया कुरुक्षेत्र (24)

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राजा कुरु के परिश्रम से धर्म क्षेत्र बन गया कुरुक्षेत्र

पुराणों में उल्लेख है कि राजा कुरु ने अपने ससुर अत्यागस से, ईरान से लेकर यूनान तक का विशाल भूभाग प्राप्त किया था। उसने अपने राज्य का नाम अपने पिता अजमीड़ के नाम पर अजमीढ़ रखा था।

पिछली कथा में हमने चंद्रवंशी राजा संवरण की चर्चा की थी। राजा संवरण हस्तिनापुर को बसाने वाले राजा हस्ति का पौत्र था और राजा अजमीढ़ का पुत्र था। राजा अजमीढ़ का उल्लेख बहुत से पुराणों में हुआ है। किसी समय ईरान से लेकर ग्रीस तक मेड साम्राज्य विस्तृत था। संभवतः इसका कुछ सम्बन्ध राजा अजमीढ़ से रहा हो!

अजमीढ़ के पुत्र राजा संवरण की पत्नी ताप्ती, सूर्यपुत्री थी। उसकी कोख से कुरु नामक एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। चंद्रवंशी राजाओं की परम्परा में वह बत्तीसवां राजा था। राजा कुरु की कथा मुख्यतः वामन पुराण में मिलती है। महाभारत एवं अन्य ग्रंथों में राजा कुरु तथा उसके द्वारा बसाए गए कुरुक्षेत्र का उल्लेख बार-बार हुआ है।

राजा कुरु अत्यंत प्रतापी राजा हुआ। उसका राज्य भारत के गंगा-यमुना के उपजाऊ प्रदेशों से लेकर ईरान, मिस्र, लीबिया तथा ग्रीस तक विस्तृत माना जाता है। कुरु राज्य में मिलाए जाने से पहले इस विशाल भूप्रदेश में मेड नामक राज्य हुआ करता था।

पुराणों में उल्लेख है कि कुरु ने अपने ससुर अत्यागस से, ईरान से लेकर यूनान तक का विशाल भूभाग प्राप्त किया था। राजा कुरु ने अपने राज्य का नाम अपने पिता अजमीड़ के नाम पर अजमीढ़ रखा था।

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श्रीमद्भागवत एवं विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्माजी की वंशावली में राजा अजमीढ़ की पीढ़ी में कुरु के नाम से सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र जाना जाता है। कुरु के नाम से ही पुरुवंश एवं पौरव वंश आगे चलकर कुरु वंश कहलाया।

पुराणों के अनुसार कुरु ने जिस क्षेत्र को बार-बार जोता था, उसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कहते हैं कि जब वह बहुत मनोयोग से इस क्षेत्र की जुताई कर रहा था, तब देवराज इन्द्र ने राजा से इस परिश्रम का कारण पूछा।

इस पर कुरु ने कहा- ‘मैं यहाँ पर एक धर्मक्षेत्र बना रहा हूँ। जो भी व्यक्ति यहाँ युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त होगा, वह सीधे ही पुण्यलोकों में जायेगा।’

देवराज इन्द्र को उसकी बात बड़ी हास्यास्पद अनुभव हुई और देवराज राजा कुरु का परिहास करते हुए स्वर्गलोक चले गए किंतु राजा कुरु बार-बार कुरु क्षेत्र की भूमि में हल चलाता रहा।

देवराज इन्द्र ने स्वर्ग के देवताओं को राजा कुरु द्वारा कुरुक्षेत्र में हल चलाए जाने की बात बताई। इस पर कुछ देवताओं ने इन्द्र को परामर्श दिया कि- ‘यदि संभव हो तो उसे अपने अनुकूल करने का प्रयास करिए। अन्यथा यदि प्रजा यज्ञ किए बिना ही और हमारा यज्ञभाग दिए बिना ही स्वर्गलोक में प्रवेश करने लगेगी, तब हमारा क्या होगा!’

देवताओं की सलाह मानकर देवराज इन्द्र ने पुनः राजा कुरु के पास जाकर कहा- ‘हे नरेन्द्र! आप व्यर्थ ही कष्ट कर रहे हैं। आप हल चलाना बंद कीजिए। मैं आपको वदरान देता हूँ कि यदि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य इस क्षेत्र में निराहार रहकर अथवा युद्ध करते हुए यहाँ मृत्यु को प्राप्त होगा तो वह स्वर्ग का अधिकारी होगा।’

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राजा कुरु ने देवराज की यह बात मान ली तथा हल चलाना बंद कर दिया। पुराणों में इसी स्थान को ‘समंत-पंचक’ एवं ‘प्रजापति की उत्तरवेदी’ कहा गया है। वामन पुराण के अनुसार राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र में ‘ब्रह्मसरोवर’ की स्थापना की थी। कुछ ग्रंथों के अनुसार राजा कुरु ने इन्द्र से यह वरदान मांगा था कि कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाए तथा यहाँ के सरोवरों में स्नान करने वाला मनुष्य अथवा कुरुक्षेत्र में प्राण त्यागने वाला मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करे। कुछ पुराणों के अनुसार राजा कुरु ने द्वैतवन में हल चलाकर कुरुक्षेत्र में मानव बस्तियां बसाईं। इससे स्पष्ट है कि राजा कुरु से पहले यह पूरा क्षेत्र वीरान एवं अनुपजाऊ था। राजा कुरु ने इस क्षेत्र को कृषि योग्य बनाकर वहाँ मानव बस्तियां बसाईं। ऋग्वेद में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण का उल्लेख हुआ है। कुरुश्रवण का शाब्दिक अर्थ है- ‘कुरु की भूमि में सुना गया या प्रसिद्ध।’ इस उल्लेख से यह अनुमान होता है कि ऋग्वेद काल में भी कुरुक्षेत्र एक धार्मिक एवं पुण्यस्थल माना जाता था जहाँ ऋषियों द्वारा ज्ञानोपदेश का आयोजन किया जाता था। अथर्ववेद में एक कौरव्यपति की चर्चा हुई है जिसने अपनी पत्नी से बातचीत की है। यह कौरवपति संभवतः कोई कुरुवंशी राजा था।

ब्राह्मण-ग्रन्थों में कुरुक्षेत्र का उल्लेख अत्यंत पवित्र तीर्थ-स्थल के रूप में हुआ है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि एक बार देवताओं ने कुरुक्षेत्र में एक यज्ञ किया जिसमें उन्होंने दोनों अश्विनों को पहले यज्ञ-भाग से वंचित कर दिया। मैत्रायणी संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण का कथन है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में एक सत्र का सम्पादन किया था। महाभारत में कुरुक्षेत्र की महत्ता का उल्लेख हुआ है तथा कहा गया है कि सरस्वती के दक्षिण एवं दृषद्वती के उत्तर की भूमि कुरुक्षेत्र में थी और जो लोग उसमें निवास करते थे, मानो स्वर्ग में रहते थे।

वामन पुराण में कुरुक्षेत्र को ब्रह्मावर्त कहा गया है। वामन पुराण के अनुसार सरस्वती एवं दृषद्वती के बीच का देश कुरु-जांगल था। मनुस्मृति के लेखक मनु ने उस देश को ब्रह्मावर्त कहा है जिसे ब्रह्माजी ने सरस्वती एवं दृषद्वती नामक पवित्र नदियों के मध्य में बनाया था जबकि ब्रह्मर्षिदेश वह था जो पवित्रता में थोड़ा कम था। इस उक्ति से लगता है कि उत्तर वैदिक काल में आर्यावर्त में ब्रह्मावर्त सर्वाेत्तम देश था जिसके भीतर कुरुक्षेत्र स्थित था।

ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल में सरस्वती कुरुक्षेत्र से होकर बहती थी। जहाँ सरस्वती मरुभूमि में अन्तर्हित होती थी, उसे ‘विनशन’ कहते थे और वह भी एक प्रसिद्ध तीर्थ था। कौरवों एवं पाण्डवों का युद्ध कुरुक्षेत्र में ज्योतिकुण्ड के निकट हुआ था। भगवद्गीता के प्रथम श्लोक में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है। वायु पुराण एवं कूर्म पुराण में लिखा है कि श्राद्ध करने के लिए कुरुजांगलः एक योग्य देश है।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में ह्वेनसांग ने कुरुक्षेत्र का उल्लेख हर्ष की राजधानी स्थाण्वीश्वर के रूप में किया है जिसे बाद में थानेसर कहा जाने लगा। ह्वेनसांग ने इसे धार्मिक एवं पुण्य भूमि बताया है। महाभारत के वन पर्व एवं वामन पुराण में कुरुक्षेत्र का विस्तार पाँच योजन व्यास में बताया गया है।

आधुनिक वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान समय में कुरुक्षेत्र में जो बड़े-बड़े सरोवर दिखाई पड़ते हैं, वस्तुतः वे लुप्त हो चुकी सरस्वती के ही अवशेष हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गंगा ने राजा शांतनु के सात पुत्रों को नदी में बहा दिया (25)

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गंगा ने राजा शांतनु के सात पुत्रों को नदी में बहा दिया

महाराज शांतनु उस शिशु को लेकर अपने महल में आ गए। गंगा और शांतनु का यह आठवां पुत्र वास्तव में प्रभास नामक आठवां वसु था जो श्राप के कारण धरती पर ही रह गया। उसका नाम देवव्रत रखा गया किंतु भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण वह बालक आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पिछली कथा में हमने चंद्रवंशी राजा कुरु की चर्चा की थी जिसकी राजधानी हस्तिनापुर थी तथा जिसने अत्यंत परिश्रम करके कुरुभूमि को पुण्य तीर्थ में बदल दिया था। उसी की वंश परम्परा में आगे चलकर राजा शांतनु का जन्म हुआ। राजा शांतनु चंद्रवंशी राजााओं में अड़तालीसवें क्रम का राजा था।

मान्यता है कि राजा शांतनु का विवाह गंगा से हुआ था। कुछ ग्रंथ शांतनु की पत्नी देवी गंगा को गंगा नदी मान लेते हैं किंतु वास्तव में शांतनु का विवाह गंगा नदी से नहीं हुआ था, अपितु गंगा नामक एक अप्सरा से हुआ था। स्वर्ग की अप्सरा गंगा का विवाह राजा शांतनु के साथ होने के पीछे दो पौराणिक कथाएं मिलती हैं।

पहली कथा के अनुसार एक बार स्वर्ग लोक में बहुत से देवी-देवता एवं महर्षि एवं राजर्षि ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित हुए जिनमें महाभिष नामक राजा भी थे। उसी समय गंगा भी ब्रह्माजी के दर्शनों के लिए आई। संयोगवश उसी समय गंगा के श्वेत वस्त्र वायु के झौंके के कारण गंगा के शरीर से खिसक गए। यह देखकर समस्त देवताओं एवं राजर्षियों ने अपने नेत्र नीचे कर लिए किंतु राजा महाभिष अपलक गंगाजी को देखते रहे।

यह देखकर ब्रह्माजी ने राजा महाभिष से कहा- ‘राजन् अब तुम मृत्युलोक में जाओ। जिस गंगा को तुम देखते रहे, वही गंगा धरती पर आकर तुम्हारा अप्रिय करेगी। इस कारण जब तुम उस पर क्रोध करोगे, तब तुम शापमुक्त होकर पुनः स्वर्ग लोक में लौट आओगे!’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

गंगा भी ब्रह्माजी को प्रणाम करके वहाँ से लौट गईं। मार्ग में गंगा की भेंट वसुओं से हुई जो महर्षि वसिष्ठ के श्राप से श्रीहीन हो रहे थे। गंगा ने वसुओं से उनकी श्रीहीनता का कारण पूछा। इस पर वसुओं ने महर्षि वसिष्ठ द्वारा दिए गए श्राप के बारे में बताया।

पौराणिक धर्मग्रंथों एवं श्रीमद्भागवत् पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की एक पुत्री का नाम वसु था जिसका विवाह धर्म से हुआ था। वसु के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न हुए जिन्हें वसु कहा जाता था। बृहदारण्यकोपनिषद में तैंतीस देवताओं का विस्तार से परिचय मिलता है। इनमें आठ वसुओं को पृथ्वी का देवता कहा गया है।

महाभारत के अनुसार आठ वसुओं के नाम इस प्रकार हैं- धर ध्रुव, सोम, विष्णु, अनिल, अनल, प्रत्यूष एवं प्रभास। श्रीमद्भागवत में इन वसुओं के नाम द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, श्वसु और विभावसु बताए गए हैं। कुछ ग्रंथों में अग्नि को प्रथम वसु बताया गया है क्योंकि अग्नि में किए गए हवन के माध्यम से ही देवी-देवताओं को उनका भाग मिलता है। वाल्मीकि रामायण में वसुओं को अदिति-पुत्र कहा गया है।

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आठ वसुओं में सबसे छोटे वसु प्रभास ने एक दिन महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को चुरा लिया। महर्षि वशिष्ठ ने ध्यान लगाकर देखा तो उन्होंने नंदनी को वसुओं के बीच खड़े हुए देखा। इस पर महर्षि वसिष्ठ ने वसुओं को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। जब वसुओं को महर्षि द्वारा श्राप दिए जाने का पता चला तो आठों वसुओं ने महर्षि से क्षमा माँगी। इस पर महर्षि वसिष्ठ ने कहा- ‘बड़े सात वसु पृथ्वी पर जन्म लेने के कुछ ही समय बाद मृत्यु को प्राप्त करके पुनः स्वर्ग लौट आएंगे किंतु प्रभास लंबे समय तक पृथ्वी लोक पर ही रहेगा।’ इस श्राप के कारण वसु बहुत दुःखी थे। इसलिए जब गंगा ने उनकी श्रीहीनता का कारण पूछा तो वसुओं ने महर्षि वसिष्ठ द्वारा श्राप दिए जाने की कथा बता दी। इस पर गंगा ने द्रवित होकर कहा- ‘ब्रह्मदेव द्वारा राजा महाभिष को श्राप दिया गया है जिसके कारण मुझे भी धरती पर जाना पड़ेगा। मैं धरती पर रहते हुए, तुम्हें श्राप से शीघ्र मुक्ति दिलवाने का उपाय करूंगी। जब मैं धरती पर जाकर, शांतनु के रूप में उत्पन्न हुए महाभिष की पत्नी बनूं, तब तुम एक-एक करके मेरे गर्भ में आना, मैं तुम्हारे धरती पर जन्म लेते ही तुम्हें जीवन से मुक्त कर दूंगी। इस प्रकार बहुत कम समय में तुम्हें श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।’

वसुओं ने गंगा का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि वसुओं ने गंगा से कहा- ‘जब आप हमें श्राप से मुक्त करेंगी तब हम सभी अपने अष्टमांश से निर्मित एक वसु को धरती पर छोड़ देंगे जो अपुत्र ही रहेगा। अर्थात्! धरती पर हमारा अष्टमांश लम्बे समय तक जीवित रहेगा किंतु हमारा वंश धरती पर नहीं चलेगा।’

उधर ब्रह्माजी के श्राप से राजर्षि महाभिष ने धरती पर आकर चंद्रवंशी राजा प्रतीप के पुत्र के रूप में जन्म लिया। शांतनु के युवा होने पर राजा प्रतीप अपना राज्य शांतनु को सौंपकर वन में तपस्या करने चले गए।

अपने पूर्वजों की तरह शांतनु भी बड़े धर्मनिष्ठ राजा हुए। एक दिन जब राजा शांतनु गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे तब उनकी भेंट एक अत्यंत सुंदर स्त्री से हुई जिसके शरीर पर दिव्य आभूषण सुशोभित थे। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो देवी लक्ष्मी ही साक्षात आ गई हों! राजा शांतनु उस स्त्री पर आसक्त हो गए तथा उसके साथ विवाह करने का अनुरोध करने लगे।

राजा ने कहा- ‘हे देवी! आप स्वर्ग की देवी हैं, दानवी हैं, गन्धर्वी हैं, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी हैं। देवकन्याओं के समान सुशोभित होने वाली सुन्दरी! मैं आपसे याचना करता हूँ कि आप मेरी पत्नी हो जाएं।’

महाराज शांतनु के ऐसा कहने पर गंगा ने कहा- ‘हे भूपाल! मैं आपकी महारानी बनूंगी एवं आपके अधीन रहूँगी परन्तु मेरी कुछ शर्तें हैं कि आप कभी मेरे बारे में मुझसे कभी प्रश्न नहीं करेंगे। मैं कहीं भी जाऊं मेरा पीछा नहीं करेंगे तथा मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूं, उसके लिए मुझे कभी नहीं रोकेंगे। आप मुझसे कभी अप्रिय वचन नहीं कहेंगे। पृथ्वीपति! जब तक आप ऐसा बर्ताव करेंगे तब तक ही मैं आपके समीप रहूँगी। यदि आपने कभी मुझे किसी कार्य से रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपको छोड़ दूंगी।’

गंगा के रूप-सौंदर्य से बेसुध हुए राजा शांतनु ने गंगा की यह शर्त मान ली। इस पर राजा शान्तनु देवी गंगा को रथ पर बिठाकर अपनी राजधानी ले आए। कुछ समय पश्चात् गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह उस शिशु को महल से ले गई और उसे गंगा नदी में बहा दिया। इस प्रकार एक-एक करके गंगा के सात पुत्र हुए और उसने उन सभी को गंगा नदी में बहा दिया।

जब गंगा अपने आठवें पुत्र को नदी में बहाने के लिए गई तो राजा शांतनु ने उसका पीछा किया तथा जब वह अपने पुत्र को नदी में बहा ही रही थी तभी शांतनु ने उस बालक को पकड़ लिया तथा गंगा को इस क्रूर कर्म के लिए धिक्कारा।

राजा के कठोर वचन सुनकर गंगा ने राजा को अपनी तथा अपने पुत्रों की वास्तविकता बताई तथा उसी समय अदृश्य हो गई। महाराज शांतनु उस शिशु को लेकर अपने महल में आ गए। गंगा और शांतनु का यह आठवां पुत्र वास्तव में प्रभास नामक आठवां वसु था जो श्राप के कारण धरती पर ही रह गया। उसका नाम देवव्रत रखा गया किंतु भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण वह बालक आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सत्यवती से विवाह कर लिया राजा शांतनु ने (26)

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सत्यवती से विवाह कर लिया राजा शांतनु ने

सत्यवती का उत्तर सुनकर महाराज शांतनु चकित रह गए। निषाद कन्या होकर इतना रूप वैभव, जिसकी समता कोई आर्यकन्या एवं देवकन्या भी नहीं कर सकती थी।

पिछली कथा में हमने स्वर्ग की अप्सरा गंगा द्वारा आठ वसुओं को जन्म देने तथा आठवां पुत्र शांतनु को देकर फिर से स्वर्ग लौट जाने की कथा कही थी। गंगा का आठवां पुत्र वस्तुतः आठवां वसु था जो महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण धरती पर ही रह गया था। उसका नाम देवव्रत रखा गया। महाराज शांतनु उस बालक को अपने महल में ले आए। उस बालक में देवों के समान अद्भुत तेज एवं अतुल्य पराक्रम था।

गंगा के जाने के लौट जाने के बाद शांतनु ने 36 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। एक दिन महाराज शान्तनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुये एक सुन्दर युवती दिखाई दी। उसका रूप लावण्य किसी अप्सरा के समान था और उसके अंग-प्रत्यंग से कमल की सुगन्ध निकल रही थी। महाराज शांतनु ने उस कन्या को निकट बुलाकर उससे पूछा- ‘हे देवि! तुम कौन हो?’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

उस कन्या ने कहा- ‘महाराज! मेरा नाम सत्यवती है और मैं निषाद कन्या हूँ।’

सत्यवती का उत्तर सुनकर महाराज शांतनु चकित रह गए। निषाद कन्या होकर इतना रूप वैभव, जिसकी समता कोई आर्यकन्या एवं देवकन्या भी नहीं कर सकती थी। महाराज को लगा कि यह भी अवश्य ही गंगा के समान स्वर्ग की अप्सरा होगी। इस कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें सत्यवती के अतीत के सम्बन्ध में कुछ चर्चा करनी होगी।

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कुछ पुराणों में आई एक कथा के अनुसार एक मछली ने राजा सुधन्वा का अंश अपने शरीर में धारण किया जिससे वह गर्भवती हो गई। एक दिन एक मछुआरा मछली पकड़ रहा था, तब उसके जाल में वह मछली फंस गई। मछुआरे ने उस मछली का पेट चीरा तो उसमें से एक बालक तथा एक बालिका निकले। मछुआरे ने बालिका तो अपने पास रख ली तथा बालक राजा सुधन्वा को सौंप दिया। वह बालक आगे चलकर मत्स्यराज के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा बालिका का नाम सत्यवती रखा गया। वस्तुतः सत्यवती के पौराणिक आख्यान से हम अनुमान लगा सकते हैं कि सत्यवती राजा सुधन्वा एवं किसी धीमर-पुत्री की संतान रही होगी जिसका पालन-पोषण एक निषाद ने किया था। सत्यवती अत्यंत रूपसी कन्या थी किंतु उसकी देह में से मछली की गंध आती थी। समय अपने पर वह एक रूपवती युवती में बदल गई। एक दिन मुनि पराशर ने सत्यवती को नदी में नाव चलाते हुए देखा तो वे उस पर आसक्त हो गए। मुनि पराशर ने सत्यवती के समक्ष प्रणय निवेदन किया। इस पर सत्यवती ने कहा- मैं कुंवारी लड़की हूँ, इस कारण मेरा आपके साथ रमण करना उचित नहीं है।’

इस पर पराशर ने कहा- ‘तुम्हें मेरे साथ रमण करते हुए कोई नहीं देख सकेगा तथा तुम्हारे कौमार्य में भी कोई अंतर नहीं आएगा।’

सत्यवती ने कहा- मेरे शरीर से मछली जैसी गंध आती है, इसलिए आप मेरे साथ रमण नहीं कर सकेंगे।’

पराशर मुनि ने कहा- ‘मेरे आशीर्वाद से तुम्हारे शरीर से मछली की गंध आनी बंद हो जाएगी तथा तुम्हारे शरीर से दिव्य गंध आने लगेगी।’

पराशर की बात सुनकर सत्यवती पराशर मुनि के साथ रमण करने के लिए सहमत हो गई। पराशर मुनि ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवती के शरीर से आ रही मछली की गंध को समाप्त करके उसे दिव्य सुगंध में बदल दिया तथा अपने और सत्यवती के चारों ओर घनघोर कोहरा उत्पन्न कर दिया जिसमें सत्यवती एवं पराशर छिप गए। उनके प्रणय के परिणाम स्वरूप सत्यवती गर्भवती हो गई तथा उसने एक बालक को जन्म दिया। पुत्र को जन्म देने के बाद पराशर के आशीर्वाद से सत्यवती पुनः कुंवारी कन्या में बदल गई।

इसके बाद सत्यवती तो अपने पिता के पास चली गई और पराशर ऋषि उस पुत्र को अपने साथ लेकर वन में तपस्या करने चले गए। पराशर तथा सत्यवती के पुत्र का नाम द्वैपायन रखा गया। द्वैपायन ने धूप में खड़े रहकर घनघोर तपस्या की जिसके कारण उसकी त्वचा का रंग काला हो गया। इसलिए उसे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा।

इसी कृष्ण द्वैपायन ने वेदों को संहिता बद्ध किया था, पुराणों को लिपिबद्ध किया था तथा महाभारत एवं भागवत पुराण की रचना की थी। इस कारण उन्हें वेदव्यास कहा जाने लगा। हिन्दू धर्म में उन्हें भगवान कहकर उनका आदर किया जाता है। वेदव्यास ने सत्यवती को वचन दिया था कि- ‘जब कभी भी तू विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी, मैं उपस्थित हो जाउँगा।’

अब राजा शांतनु उसी सत्यवती के रूप-यौवन पर रीझ गए थे। उन्होंने सत्यवती से तो कुछ नहीं कहा किंतु वे सत्यवती के पिता के पास पहुँचे और उसके समक्ष सत्यवती से विवाह करने की इच्छा प्रकट की।

इस पर निषाद बोला- ‘राजन्! मुझे अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।’

शांतनु ने निषाद को बताया- ‘उनका पहले से ही एक पुत्र है। उसका नाम देवव्रत है और वही राज्य का अधिकारी है।’

निषाद ने कहा- ‘यदि आप मेरी पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं तो आपको मेरी शर्त स्वीकार करनी होगी।’ यह सुनकर शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये।

जब राजकुमार देवव्रत ने अपने पिता को उद्विग्न एवं चिंतातुर देखा तो उसने अपने पिता के मंत्रियों से कहा कि वे महाराज की चिंता का पता लगाएं। मन्त्रियों ने महाराज से उनकी उद्विग्नता एवं चिंता का कारण पूछा। इस पर महाराज शांतनु ने मंत्रियों को अपनी उद्विग्नता एवं चिता का कारण बता दिया। मंत्रियों ने उसकी सूचना राजकुमार देवव्रत को दे दी।

देवव्रत मन्त्रियों को अपने साथ लेकर निषाद के घर गया और निषाद से कहा- ‘हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के पेट से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा।’

इस पर निषाद ने कहा- ‘आप तो इस वचन का पालन कर लेंगे किंतु आपकी संतानों ने सत्यवती के पुत्रों को राजसिंहासन पर बैठाने से मना कर दिया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?’

इस पर देवव्रत ने निषाद के समक्ष दूसरी प्रतिज्ञा की- ‘आपकी पुत्री के अधिकारों की रक्षा करने के लिए मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा तथा हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करूंगा।’

राजकुमार की इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा- ‘हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है। मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके पिता के साथ करने के लिए तैयार हूँ।’

जब राजा शांतनु ने भीष्म के प्रण के बारे में सुना तो उन्होंने देवव्रत से कहा- ‘तुम  इस प्रतिज्ञा को त्याग दो। मैं सत्यवती से विवाह नहीं करूंगा।’

देवव्रत ने कहा- ‘अब तो मैं प्रतिज्ञा ले चुका हूँ।’

इस पर महाराज शांतनु ने कहा- ‘वत्स! तुमने पितृभक्ति के वशीभूत होकर भीषण प्रतिज्ञा की है, इस प्रतिज्ञा के कारण आज से तुम भीष्म के नाम से प्रसिद्ध होओगे। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारी मृत्यु तुम्हारी इच्छा से होगी।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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