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वेदव्यास ने नियोग से चंद्रवंशियों के कुल की रक्षा की (27)

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वेदव्यास - www.bharatkaitihas.com
वेदव्यास ने नियोग से चंद्रवंशियों के कुल की रक्षा की

एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास पुनः हस्तिनापुर आए। सबसे पहले वे बड़ी रानी अम्बिका के पास गए। अम्बिका अपने समक्ष इतने तेजस्वी ऋषि को देखकर भयभीत हो गई तथा उसने अपने नेत्र बन्द कर लिए।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि सत्यवती के पिता ने निषाद होते हुए भी आर्य राजाओं के हस्तिनापुर जैसे प्रबल राज्य पर अपनी पुत्री सत्यवती के पुत्रों का अधिकार स्थापित करवा दिया। महर्षि अत्रि से आरम्भ हुए चंद्र वंश में अब तक जितनी भी कुल-वधुएं आई थीं वे स्वर्ग की देवियां, अप्सराएं एवं अप्सराओं से उत्पन्न कन्याएं थीं। यहाँ तक कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी भी इस कुल में ब्याहकर आई थी।

सत्यवती के रूप में पहली बार एक मत्स्य कन्या ने चंद्रवंशी राजकुल में राजरानी के रूप में प्रवेश किया। सत्यवती ने चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। जब राजकुमार चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य छोटे ही थे कि अचानक ही महाराज शांतनु का निधन हो गया। इस पर शांतनु के बड़े पुत्र भीष्म ने सत्यवती की सम्मति से सत्यवती के बड़े पुत्र चित्रांगद को हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठा दिया।

राजा चित्रांगद अपने पूर्वजों की भांति पराक्रमी राजा हुआ। उसने कई राजाओं को परास्त करके हस्तिनापुर राज्य का विस्तार किया। चित्रांगद अपने पराक्रम के कारण किसी भी मनुष्य अथवा असुर को अपने समकक्ष नहीं समझता था। इस कारण तीनों लोकों में चित्रांगद का भय छा गया। इस पर गंधर्वराज चित्रांगद ने शांतनुपुत्र चित्रांगद पर आक्रमण कर दिया।

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चित्रांगद नामक दोनों राजाओं में कुरुक्षेत्र के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ। सरस्वती के तट पर तीन वर्ष तक यह युद्ध चलता रहा। गंधर्वराज चित्रांगद बड़ा मायावी था, उसने शांतनुपुत्र चित्रांगद को सम्मुख युद्ध में मार डाला।

शांतनुपुत्र देवव्रत ने अपने भाई चित्रांगद का अंतिम संस्कार किया तथा विचित्रवीर्य का राजतिलक कर दिया। विचित्रवीर्य अभी बालक ही था, इस कारण वह अपने बड़े भाई देवव्रत के निर्देशन में राज्य करने लगा जो अब भीष्म कहा जाता था।

जब विचित्रवीर्य युवा हुआ, तब भीष्म ने उसका विवाह करने का निश्चय किया। उन्हीं दिनों भीष्म को सूचना मिली कि काशीराज की तीन पुत्रियों का स्वयंवर होने जा रहा है। इस पर भीष्म ने माता सत्यवती से अनुमति लेकर अकेले ही रथ पर बैठकर काशी की यात्रा की। जब स्वयंवर में राजाओं एवं राजकुमारों का परिचय दिया जा रहा था तब काशी नरेश की तीन कन्याएं भीष्म को बूढ़ा समझकर आगे बढ़ गईं।

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इस पर भीष्म ने उन कन्याओं को रोककर बताया कि वे अपने विवाह के लिए नहीं अपितु अपने छोटे भाई हस्तिनापुर नरेश विचित्रवीर्य के विवाह के लिए यहाँ आए हैं। ऐसा कहकर भीष्म ने बलपूर्वक उन कन्याओं को अपने रथ पर बैठा लिया। इस पर स्वयंवर में उपस्थित राजाओं ने भीष्म पर आक्रमण कर दिया किंतु भीष्म ने उस सभी को पराजित कर दिया। विजयी भीष्म उन तीनों राजकन्याओं को लेकर हस्तिनापुर लौटे तथा उन्होंने वे तीनों राजकन्याएं राजा विचित्रवीर्य को समर्पित कर दीं। तब काशी नरेश की बड़ी पुत्री अम्बा ने भीष्म से कहा कि मैं तो शाल्व नरेश को अपना पति मान चुकी हूँ, मैं विचित्रवीर्य से विवाह नहीं कर सकती। इस पर भीष्म ने उसे शाल्व नरेश के पास जाने की अनुमति दे दी तथा शेष दोनों राजकन्याओं अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया। विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग-विलास में रत हो गया किन्तु दोनों ही रानियों से कोई सन्तान नहीं हुई और राजा क्षयरोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो गया। इस प्रकार शांतनु के कुल में अब केवल राजकुमार भीष्म अकेले ही जीवित बचे।

कुलनाश के भय से माता सत्यवती ने भीष्म से कहा- ‘पुत्र! इस गौरवशाली चंद्रवंश को नष्ट होने से बचाने के लिए तुम इन दोनों पुत्र-कामिनी रानियों से पुत्र उत्पन्न करो तथा राजसिंहासन पर बैठकर राज्य का संचालन करो।’

माता सत्यवती की बात सुनकर भीष्म ने कहा- ‘मैंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने तथा हस्तिनापुर का राजा न बनने की की प्रतिज्ञा की है। मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।’

इस पर माता सत्यवती ने पराशर मुनि से उत्पन्न अपने पुत्र वेदव्यास को स्मरण किया। स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गए। सत्यवती ने उनसे कहा- ‘हे पुत्र! तुम्हारे दोनों भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गए। अतः मेरे वंश को नष्ट होने से बचाने के लिए मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी रानियों से सन्तान उत्पन्न करो।’

वेदव्यास ने माता की आज्ञा मान ली तथा माता सत्यवती से कहा- ‘हे माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वे एक वर्ष तक नियम-व्रत का पालन करती रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।’

एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास पुनः हस्तिनापुर आए। सबसे पहले वे बड़ी रानी अम्बिका के पास गए। अम्बिका अपने समक्ष इतने तेजस्वी ऋषि को देखकर भयभीत हो गई तथा उसने अपने नेत्र बन्द कर लिए। वेदव्यास ने नियोगविधि से रानी अम्बिका को गर्भवती किया तथा उसके महल से लौटकर माता सत्यवती से कहा- ‘माता! अम्बिका का पुत्र बड़ा तेजस्वी होगा किन्तु रानी द्वारा नेत्र बन्द कर लेने ने के दोष के कारण वह अंधा होगा।’

सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ और उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका भी वेदव्यास को देख कर भयभीत हो गई तथा उसका शरीर पीला पड़ गया। महर्षि ने उसे भी नियोग से गर्भ प्रदान किया तथा उसके कक्ष से लौटकर सत्यवती से कहा- ‘माता! अम्बालिका भय से पीली पड़ गई इसलिए उसके गर्भ से पाण्डुरोग-ग्रस्त पुत्र उत्पन्न होगा।’

यह सुनकर माता सत्यवती को अत्यंत दुःख हुआ और उन्होंने बड़ी रानी अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया।

इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा- ‘माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।’

इसके बाद वेदव्यास तपस्या करने पुनः वन में चले गए। समय आने पर दोनों रानियों एवं एक दासी के गर्भ से एक-एक बालक का जन्म हुआ। इस प्रकार वेदव्यास ने नियोग की सहायता से चंद्रवंशी राजाओं के कुल को समाप्त होने से बचाया।

आधुनिक काल के अनेक लोगों ने नियोग की अलग-अलग व्याख्या की है किंतु किसी भी पुराण में यह नहीं लिखा है कि नियोग क्या था! कुछ लोगों का मानना है कि नियोग एक प्रथा थी जिसमें पति के निःसंतान अवस्था में मर जाने पर स्त्री को अपने ही कुल के किसी पुरुष से एक बार गर्भधारण करने की अनुमति दी जाती थी, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि नियोग आज के टेस्टट्यूब बेबी की तरह कृत्रिम गर्भाधान की एक वैज्ञानिक विधि थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर(28)

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धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर

धृतराष्ट्र तथा पाण्डु तो महर्षि वेदव्यास की संतान थे। फिर वे चंद्रवंशी राजसिंहासन के उत्तराधिकारी कैसे हुए! धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर एक ही पिता की संतान थे, फिर भी उनमें से धृतराष्ट्र एवं पाण्डु को राजकुमार तथा विदुर को दासीपुत्र क्यों माना गया।

पिछली कथा में हमने सत्यवती के पुत्र वेदव्यास द्वारा कुरुवंशी रानियों अम्बिका एवं अम्बालिका एवं एक दासी से नियोग के माध्यम से एक-एक पुत्र उत्पन्न करने की कथा की चर्चा की थी।

अम्बा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र नेत्रहीन होने पर भी बड़ा बलशाली था। इसलिए उसका नाम धृतराष्ट्र रखा गया। अम्बालिका के गर्भ से उत्पन्न पुत्र पाण्डु रोग से ग्रस्त था इसलिए उसका नाम पाण्डु रखा गया। पाण्डु का अर्थ पीला होता है। दासी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र अत्यंत धीर-गंभीर, वेदों एवं विभिन्न शास्त्रों का ज्ञाता तथा धर्म का मर्मज्ञ था। उसका नाम विदुर रखा गया। हिन्दू संस्कृति में विदुर को आदर से धर्मात्मा विदुर कहा जाता है।

जब तक वे बालक बड़े हुए तब तक भीष्म ही माता सत्यवती के परामर्श के अनुसार हस्तिनापुर राज्य का संचालन करते रहे। जब वेदव्यास द्वारा नियोग से उत्पन्न तीनों पुत्र बड़े हुए तो राज्य सिंहासन पर किसे बिठाया जाए, इस प्रश्न को लेकर मंथन आरम्भ हुआ। चूंकि अम्बिका का पुत्र धृतराष्ट्र नेत्रहीन था इसलिए उसे राजा बनने के योग्य नहीं माना गया। दासी पुत्र को राजा बनाने की परम्परा नहीं थी। इसलिए पाण्डु रोग से ग्रस्त पाण्डु को ही राजा बनने का अधिकारी माना गया।

यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि धृतराष्ट्र तथा पाण्डु तो महर्षि वेदव्यास की संतान थे। फिर वे चंद्रवंशी राजसिंहासन के उत्तराधिकारी कैसे हुए! धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर एक ही पिता की संतान थे, फिर भी उनमें से धृतराष्ट्र एवं पाण्डु को राजकुमार तथा विदुर को दासीपुत्र क्यों माना गया।

इस रोचक कथा का वीडियो देखें-

इस प्रश्न का उत्तर आर्यों की सांस्कृतिक परम्परा में छिपा हुआ है। वस्तुतः किसी भी बालक के दो प्रकार के माता-पिता हो सकते हैं, पहले वे जो उस बालक को जन्म देते हैं और दूसरे वे जो उस बालक का पालन-पोषण करते हैं। यदि हम इसे उदाहरणों के माध्यम से समझना चाहें तो हमें शकुंतला का उदाहरण लेना होगा।

शकुंतला के पिता विश्वामित्र थे किंतु उसका पालन कण्व ऋषि ने किया था इसलिए वह कण्व की पुत्री मानी गई न कि विश्वामित्र की। इसी प्रकार निषाद-कन्या सत्यवती के पुत्र वेदव्यास का लालन-पालन पराशर मुनि के आश्रम में हुआ इसलिए वेदव्यास को ब्राह्मण माना गया जबकि उसी धीमर कन्या सत्यवती के पुत्रों चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य का लालन-पालन राजा शांतनु के महलों में हुआ था, इसलिए चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य को क्षत्रिय राजकुमार माना गया।

इसी प्रकार सत्यवती तथा उसके भाई मत्स्यराज का जन्म एक ही माता के गर्भ से हुआ था और वे एक ही पिता राजा सुधन्वा की संतान थे किंतु सत्यवती का पालन-पोषण एक निषाद के घर में हुआ इसलिए उसे निषादपुत्री माना गया जबकि उसके भाई मत्स्यराज का पालन-पोषण राजा सुधन्वा के महलों में हुआ इसलिए उसे राजपुत्र माना गया।

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इसी प्रकार नियोग प्रथा में भी यह प्रावधान था कि पति की मृत्यु के बाद किसी स्त्री द्वारा अपने कुल को चलाने के लिए नियोग से प्राप्त पुत्र उस स्त्री के मृत-पति के कुल को चलाता था तथा उसी का नाम पाता था क्योंकि उस पुत्र का पालन अपनी माता के मृत-पति के घर में होता था। चूंकि धृतराष्ट्र एवं पाण्डु का पालन-पोषण अम्बिका एवं अम्बालिका के मृत-पति विचित्रवीर्य के महलों में हुआ था इसलिए धृतराष्ट्र एवं पाण्डु विचित्रवीर्य के पुत्र माने गए। उन्हें वे सभी अधिकार प्राप्त हुए जो उन्हें विचित्रवीर्य के पुत्र के रूप में मिलने चाहिए थे। चूंकि विदुर का लालन-पालन अम्बालिका की दासी के घर में हुआ था इसलिए विदुर को दासी पुत्र माना गया। अतः आर्य परम्परा के अनुसार राजकुमार पाण्डु को राज्य का योग्य उत्तराधिकारी माना गया। चूंकि धृतराष्ट्र और पाण्डु युवा हो चुके थे इस कारण भीष्म के समक्ष एक बार पुनः राजकुमारों के विवाह का वही प्रश्न आ खड़ा हुआ जो विचित्रवीर्य के समय में उत्पन्न हुआ था। जब भीष्म ने सुना कि गांधार नरेश की पुत्री गांधारी ने भगवान शिव को प्रसन्न करके सौ पुत्रों की माता होने का वरदान प्राप्त किया है तो भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से करने का निर्णय लिया।

जब भीष्म ने गांधार नरेश के पास धृतराष्ट्र तथा गांधारी के विवाह का प्रस्ताव भिजवाया तो गांधार नरेश विचलित हो गया। वह अपनी पुत्री का विवाह नेत्रहीन राजकुमार के साथ नहीं करना चाहता था किंतु उस काल में भूण्डल पर शांतनुपुत्र भीष्म का प्रभाव इतना बढ़ा-चढ़ा हुआ था कि गांधार नरेश के लिए मना करना संभव नहीं था। अतः गांधार नरेश ने अपने पुत्र शकुनि को आदेश दिया कि वह राजकुमारी गांधारी को सम्मान के साथ हस्तिनापुर छोड़ आए।

जब गांधारी का भाई शकुनि अपनी बहिन को लेकर हस्तिनापुर आया तो हस्तिनापुर के वैभव को देखकर चकित रह गया। शकुनि ने अपनी बहिन का विवाह धृतराष्ट्र के साथ कर दिया तथा वह स्वयं भी अपनी बहिन के साथ हस्तिनापुर में ही रह गया।

इसी प्रकार यदुवंशी नरेश शूरसेन की पुत्री पृथा बड़ी सुंदर थी। वसुदेवजी पृथा के भाई थे। शूरसेन ने पृथा को अपनी संतानहीन फुफेरे भाई कुंतिभोज को दे दिया था। इस कारण पृथा को कुंती भी कहा जाता था। वह अत्यंत सात्विक प्रवृत्ति की राजकुमारी थी। जब कुंतिभोज ने कुंती के लिए स्वयंवर का आयोजन किया तो भीष्म अपने भतीजे महाराज पाण्डु को अपने साथ लेकर इस स्वयंवर में पहुंचा।

जब स्वयंवर में हस्तिनापुर से आए भीष्म तथा महाराज पाण्डु का परिचय दिया गया तो राजकुमारी कुंती ने महाराज पाण्डु को अपने पति के रूप में चुन लिया। कुछ समय पश्चात् देवव्रत भीष्म ने मद्र देश की राजधानी को घेर लिया। इस पर मद्रनरेश शल्य ने अपनी बहिन माद्री का विवाह महाराज पाण्डु के साथ कर दिया।

इस प्रकार शांतनु-पुत्र भीष्म के प्रभाव से चंद्रवंशी राजकुमारों धृतराष्ट्र और पाण्डु के विवाह भारतवर्ष के उत्तम राजकुलों की कन्याओं से हो गया। कुछ समय पश्चात् भीष्म ने राजा देवक की परम सुंदरी युवा दासी का विवाह विदुरजी के साथ करवा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधारी ने कुंती से द्वेष रखने के कारण अपना गर्भ गिरा दिया (29)

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गांधारी - www.bharatkaitihas.com
गांधारी ने कुंती से द्वेष रखने के कारण अपना गर्भ गिरा दिया

गांधारी के पेट से लोहे के समान कठोर एक मांसपिण्ड निकला। गांधारी ने उसे मांस-पिण्ड को फिंकवाने का निर्णय किया। महर्षि वेदव्यास को योगबल से इस घटना का पता चल गया और वे तुरंत गांधारी के पास आए तथा उससे गर्भ गिराने का कारण पूछा।

पिछली कथाओं में हमने चर्चा की थी कि स्वर्गीय चंद्रवंशी राजा शांतनु की विधवा रानी सत्यवती के अनुरोध पर सत्यवती के पुत्र महर्षि वेदव्यास ने शांतनु के कुल की विधवा रानियों अम्बिका एवं अम्म्बालिका से नियोग करके तीन पुत्र उत्पन्न किए। इनमें से बड़ा राजपुत्र धृतराष्ट्र नेत्रहीन था, छोटा भाई पाण्डु, पाण्डुरोग से ग्रसित था।

बड़ा राजपुत्र शरीर से बलिष्ठ होने पर भी नेत्रहीन था। इसलिए छोटे राजपुत्र पाण्डु को शरीर से रोगी एवं निर्बल होते हुए भी राजा बनाया गया। जब ये बालक बड़े हो गए तब दिवंगत महाराज शांतनु के पुत्र देवव्रत अर्थात् भीष्म ने माता सत्यवती से अनुमति लेकर धृतराष्ट्र एवं पाण्डु के विवाह भारत वर्ष के प्रसिद्ध राजकुलों की राजकुमारियों से करवा दिए।

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धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी यद्यपि नेत्रहीन नहीं थी तथापि उसने अपनी पतिभक्ति का प्रदर्शन करने के लिए स्वेच्छा से अपने नेत्रों पर कपड़े की पट्टी बांध ली। इस पर गांधारी का भाई शकुनि भी हस्तिनापुर में ही रहने लगा ताकि वह अपने नेत्रहीन बहनोई धृतराष्ट्र तथा नेत्रहीन बनकर रहने वाली बहिन गांधारी की सेवा कर सके। महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती के कुल को देखने के लिए समय-समय पर हस्तिनापुर आया करते थे। जब गांधारी हस्तिनापुर में ब्याहकर आई तो वह महर्षि वेदव्यास की आव-भगत करने लगी। एक बार महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से प्रसन्न होकर उससे कहा कि वह कोई वरदान मांगे। इस पर गांधारी ने अपने पति के समान ही सौ बलिष्ठ पुत्र होने का वर मांगा। भगवान वेदव्यास जानते थे कि गांधारी ने भगवान शिव की तपस्या करके उनसे सौ पुत्रों की माता होने का वरदान प्राप्त किया था। इसलिए उन्होंने गांधारी को वही आशीर्वाद दे दिया। कुछ समय बाद गांधारी गर्भवती हुई। महाभारत के अनुसार गांधारी का गर्भ दो वर्ष तक गांधारी के जठर में रहा। इसी बीच महाराज पाण्डु की बड़ी रानी कुंती के पेट से राजपुत्र युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इससे गांधारी को अपने पेट में पल रहे गर्भ की चिंता हुई तथा उसने अपने पति से छिपाकर अपना गर्भ गिरा दिया।

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गांधारी के पेट से लोहे के समान कठोर एक मांसपिण्ड निकला। गांधारी ने उसे मांस-पिण्ड को फिंकवाने का निर्णय किया। महर्षि वेदव्यास को योगबल से इस घटना का पता चल गया और वे तुरंत गांधारी के पास आए तथा उससे गर्भ गिराने का कारण पूछा।

इस पर गांधारी ने महर्षि वेदव्यास को मांस-पिण्ड दिखाया तथा कहा- ‘पहले मैं गर्भवती हुई किंतु कुंती ने मुझसे पहले ही अपने पुत्र को जन्म दे दिया। आपने मुझे सौ बलवान पुत्रों की माता होने का वरदान दिया था किंतु दो वर्ष तक मेरे गर्भ में रहने के बाद भी मेरे गर्भ से केवल यह मांसपिण्ड उत्पन्न हुआ है।’

महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा- ‘मेरा वचन कभी खाली नहीं जा सकता। इसलिए तुम एक सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में रखकर उनकी रक्षा का प्रबंध करो तथा इस मांसपिण्ड पर जल छिड़को। यदि तुम ऐसा करोगी तो समय आने पर इस पिण्ड से सौ बलवान पुत्र उत्पन्न होंगे।’

गांधारी ने वैसा ही किया। जैसे ही उस मांसपिण्ड पर जल छिड़का गया, वैसे ही उस मांसपिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। प्रत्येक टुकड़ा अंगूठे के एक पोरुए के बराबर था।

महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा- ‘मांसपिण्ड के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद खोलना।’

यह कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांसपिण्डों से पहले दुर्याेधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा अंत में एक कन्या उत्पन्न हुई। राजपुत्र दुर्योधन पैदा होते ही गधे की भांति रोने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे। आंधी चलने लगी तथा कई स्थानों पर आग लग गई। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ, उसी दिन कुंती के पुत्र भीमसेन का भी जन्म हुआ।

धृतराष्ट्र ने ब्राह्मणों को बुलाकर पूछा- ‘वैसे तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मेरे पुत्र दुर्योधन से ज्येष्ठ है किंतु आप लोग यह बताइए कि मेरे पुत्र दुर्योधन को राज्य मिलेगा या नहीं?’

अभी धृतराष्ट्र की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गीदड़ आदि मांसभोजी जंतु जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस पर ब्राह्मणों ने कहा- ‘आपके पुत्र के अशुभ लक्षणों को देखकर कहा जा सकता है कि यह बालक आपके कुल का नाश करने वाला होगा। अतः आप इस पुत्र को त्याग दीजिए।’

ब्राह्मणों की बात सुनकर धृतराष्ट्र चुप हो गया किंतु उसने अपने पुत्र का त्याग नहीं किया। 

जिन दिनों गांधारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी, उन दिनों एक वैश्य-कन्या धृतराष्ट्र की सेवा में रहती थी, उससे धृतराष्ट्र को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम युयुत्सु रखा गया। गांधारी के पुत्रों से ठीक उलट, युयुत्सु बड़ा धर्मात्मा और विचारशील था।

जब ये बालक बड़े हुए तो धृतराष्ट्र ने उन सबके विवाह योग्य कन्याओं के साथ करवा दिए तथा राजपुत्री दुश्शला का विवाह सिंधुनरेश जयद्रथ के साथ कर दिया।

व्यावहारिक रूप से देखने पर गांधारी के दो साल तक गर्भवती रहने, उसके पेट से मांसपिण्ड निकलने एवं मांसपिण्ड से एक सौ एक 101 बच्चों के उत्पन्न होने की कथा कपोल-कल्पना जैसी लगती है किंतु इस घटना को समझने के लिए हमें एक बार पुनः महर्षि वेदव्यास की तरफ चलना होगा।

महाभारत में आई कथाओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास नियोग पद्धति से पुत्र उत्पन्न करने के जानकार थे। उन्होंने ही विचित्रवीर्य की दो विधवा रानियों के गर्भ से नियोग प्रथा के माध्यम से दो राजपुत्रों एवं दासी के गर्भ से एक दासीपुत्र को जन्म दिया था।

संभवतः नियोग प्रथा आज की ‘टैस्टट्यूब बेबी’ जैसी कोई तकनीक थी जो महर्षि वेदव्यास को आती थी। अतः पर्याप्त संभव है कि गांधारी के गर्भ से प्राप्त टिशुओं से महर्षि वेदव्यास ने ‘टेस्टट्यूब बेबी टैक्नॉलॉजी’ के माध्यम से एक सौ एक बच्चों को उत्पन्न करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को स्त्री-संसर्ग से मृत्यु का श्राप दिया (30)

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ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को स्त्री-संसर्ग से मृत्यु का श्राप दिया

महाराज पाण्डु ने एक मृग युगल को तीर मारकर घायल कर दिया। वे दोनों मृग ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी थे। ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को मृत्यु का श्राप दिया!

यह कथा चंद्रवंशी राजा पाण्डु पर केन्द्रित है। एक बार हस्तिनापुर के राजा पाण्डु अपनी दोनों रानियों कुन्ती तथा माद्री के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्होंने एक यूथपति मृग को एक मृगी के साथ संसर्ग करते हुए देखा। महाराज पाण्डु ने उसी समय लक्ष्य साधकर पांच बाण चलाए जिससे वे दोनों मृग घायल होकर धरती पर गिर गए। वे दोनों मृग ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी थे।

एक धर्मशील राजा द्वारा किए गए इस अधर्मपूर्ण आचरण को देखकर नर-मृग रूपी ऋषि किन्दम ने कहा- ‘राजन्! अत्यंत कामी, क्रोधी और बुद्धिहीन मनुष्य भी ऐसा क्रूर कर्म नहीं करते! राजन् आपके लिए तो उचित यही है कि आप पापी और क्रूरकर्मा मनुष्यों को दण्ड दें। मुझ निरपराध को मारकर आपने क्या लाभ उठाया? मैं किन्दम नामक तापस हूँ तथा यह मेरी पत्नी है। मनुष्य रूप में रहकर स्त्री-संसर्ग करते हुए मुझे लज्जा आती है, इसलिए मैं मृग बनकर अपनी पत्नी के साथ विहार कर रहा था। मुझे मारने से आपको ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी क्योंकि आप यह बात जानते नहीं थे कि मैं ब्राह्मण हूँ किंतु आपने मुझे जिस अवस्था में मारा है, वह सर्वथा अनुपयुक्त है। इसलिए जब कभी भी आप स्त्री-संसर्ग की स्थिति में होंगे, उसी अवस्था में आपकी मृत्यु हो जाएगी और वह स्त्री भी आपके साथ सती होकर मृत्यु को प्राप्त होगी।’

इतना कहकर नर-मृग रूपी ऋषि किन्दम ने प्राण त्याग दिए।

जब महाराज पाण्डु को ज्ञात हुआ कि उनके हाथों से घनघोर अपराध हो गया है तो उन्हें तथा उनकी रानियों को बहुत पश्चाताप हुआ। महाराज पाण्डु ने अपनी रानियों से कहा- ‘मुझे ज्ञात है कि मनुष्य कितना भी कुलीन हो तथा उसका अंतःकरण कितना भी निर्मल हो, वह काम के फंदे में फंस ही जाता है। मेरे पिता विचित्रवीर्य भी काम-वासना के फंदे में फंसकर असमय मृत्यु को प्राप्त हुए थे। अतः अवश्य ही एक न एक दिन मैं भी काम-वासना के फंदे में फंस जाउंगा और असमय मृत्यु को प्राप्त होउंगा।’

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महाराज पाण्डु ने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए तथा भगवान श्री हरि विष्णु की तपस्या करने का निश्चय करके एक पेड़ के नीचे बैठ गए तथा अपना संकल्प व्यक्त करते हुए बोले- ‘मैं इसी समय से मौनी संन्यासी होकर जंगलों में स्थित आश्रमों में भिक्षा मांगकर अपना उदर भरूंगा और कभी भी अपनी राजधानी हस्तिनापुर नहीं लौटूंगा।’

महाराज पाण्डु ने अपनी रानियों से कहा- ‘अब तुम दोनों राजधानी हस्तिनापुर लौट जाओ। वहाँ मेरी माता अम्बालिका, दादी सत्यवती, मेरे कुल एवं परिवार के समस्त वरिष्ठ जन एवं पुर-वासियों से कहना कि पाण्डु ने संन्यास ले लिया।’

महारानी कुंती एवं माद्री को ऋषि किन्दम के श्राप तथा महाराज पाण्डु का निश्चय जानकर बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने महाराज पाण्डु से कहा- ‘संन्यास आश्रम में प्रवेश करने से अच्छा है कि आप समस्त वासनाओं का त्याग करके हमारे साथ ही वन में रहकर तपस्या करें। हम दोनों भी अपनी इंद्रियों को वश में करके आपके साथ महान् तपस्या करेंगी। हम लोग साथ-साथ ही स्वर्ग में चलेंगे और वहाँ भी पति-पत्नी के रूप में साथ-साथ रहेंगे। महाराज यदि आप हमें त्याग देंगे तो हम अवश्य ही अपने प्राण त्याग देंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। हम इस स्थिति में आपको छोड़कर हस्तिनापुर नहीं जाएंगी।’

महाराज पाण्डु ने कहा- ‘यदि तुम दोनों ने धर्म के अनुसार ऐसा ही करने का निश्चय किया है तो अच्छी बात है, मैं संन्यास आश्रम में नहीं रहकर वानप्रस्थ आश्रम में रहूँगा और घनघोर तपस्या करते हुए वन में विचरण करूंगा।’

इसके बाद महाराज पाण्डु तथा दोनों रानियों ने अपने राजसी वस्त्र-आभूषण त्याग दिए तथा वल्कल धारण कर लिए। महाराज पाण्डु ने अपने साथ आए हुए सेवकों से कहा- ‘आप ये वस्त्र-आभूषण हस्तिनापुर जाकर भ्राता धृतराष्ट्र को सौंप दें तथा हस्तिनापुरवासियों से कहें कि पाण्डु अपनी रानियों सहित वानप्रस्थी हो गया है।’ राजा के वचन सुनकर उनके साथ आए सेवक अश्रु बहाने लगे।

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जब सेवक राजा पाण्डु के कपड़े और आभूषण लेकर हस्तिनापुर पहुंचे तो राजा के बड़े भाई धृतराष्ट्र को सेवकों की बात सुनकर बड़ा दुःख हुआ। धृतराष्ट्र भी भोजन आदि भूलकर अपने भाई की चिंता में डूब गए किंतु देवव्रत भीष्म ने माता सत्यवती से सलाह करके धृतराष्ट्र को महाराज पाण्डु के प्रतिनिधि के रूप में हस्तिनापुर का राजा बना दिया। उधर महाराज पाण्डु अपनी रानियों के साथ एक पर्वत से दूसरे से पर्वत पर होते हुए गंधमादन पर्वत पर जा पहुंचे। वे केवल कन्द-मूल-फल खाकर रहते तथा संयम का पालन करते हुए ऊंची-नीची धरती पर सोते। उनकी तप-निष्ठा को देखकर वनों में रहने वाले तापस एवं सिद्ध उन तीनों का ध्यान रखते तथा उनके साथ प्रेम-पूर्ण व्यवहार करते। कई दिनों तक गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने के बाद महाराज पाण्डु अपनी पत्नियों को लेकर इन्द्रद्युम्न सरोवर को पार करके हंसकूट शिखर पर पहुंचे तथा उसे भी लांघकर शतशृंग नामक पर्वत पर पहुंचे। वहाँ बहुत से तापस, सिद्ध एवं चारण रहते थे। महात्मा पाण्डु उन सबकी सेवा करने लगे तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करके ईश्वर का ध्यान करने लगे।

वन में निवास करने वाले स्त्री-पुरुष राजा एवं उनकी रानियों को स्वजन मानकर उनसे स्नेह-व्यवहार करते थे जिसके कारण राजा एवं रानियों की तपस्या निर्विघ्न चलने लगी।

एक बार अमावस्या का दिन था। राजा पाण्डु पर्वत के शिखर पर बैठे हुए तपस्या कर रहे थे। उन्होंने बहुत से ऋषियों को ब्रह्मलोक जाते हुए देखा। पाण्डु ने उनसे पूछा- ‘आप कहाँ जा रहे हैं!’

ऋषियों ने उत्तर दिया- ‘हम लोग ब्रह्माजी के दर्शनों के लिए ब्रह्मलोक जा रहे हैं।’

इस पर महाराज पाण्डु भी अपनी पत्नियों के साथ ऋषियों के पीछे चल पड़े। ऋषियों ने राजा से कहा- ‘महाराज! ब्रह्मलोक जाने का मार्ग बड़ा दुर्गम है। उस मार्ग के कष्टों को हमारे जैसे ऋषि-मुनि एवं तापस ही सहन कर सकते हैं। मार्ग में अप्सराओं के विमानों की भीड़ से ठसाठस भरी हुई भूमि है। ऊंचे-नीचे उद्यान हैं। नदियों के कगार हैं, भयंकर पर्वत एवं गुफाएं हैं। वहाँ बर्फ ही बर्फ है, वृक्ष नहीं हैं। हरिण और पक्षी दिखाई नहीं देते। कुछ स्थानों पर तो केवल वायु ही उड़ सकता है। ऐसे मार्ग से केवल सिद्ध ऋषि ही निकल सकते हैं। ऐसे मार्ग से महारानी कुंती एवं माद्री कैसे निकल सकेंगी! अतः आप हमारे पीछे मत आइए।’

महाराज पाण्डु समझ गए कि सिद्ध-जन मुझे अपने साथ ब्रह्मलोक नहीं ले जाना चाहते! महाराज पाण्डु उसका कारण भी जान गए।

राजा ने कहा- ‘हे महात्मन्! मैं जानता हूँ कि मैंने अभी तक धरती पर चार ऋणों में से केवल तीन ऋण अर्थात् देव-ऋण, ऋषि-ऋण और मनुष्य ऋण ही चुकाए हैं, पितृ-ऋण का भार अब भी मुझ पर शेष है। उसे चुकाए बिना मैं ब्रह्मलोक में प्रवेश नहीं कर सकता। यज्ञ से देव-ऋण, स्वाध्याय और तपस्या से ऋषि-ऋण और दान एवं परोपकार से मनुष्य ऋण उतरता है किंतु पितृ-ऋण से उऋण होने के लिए पुत्र का होना आवश्यक है। मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नियों के पेट से पुत्रों का जन्म हो ताकि मैं पितृ-ऋण से मुक्त हो सकूँ।’

इस पर ऋषियों ने कहा- ‘हम देख रहे हैं कि आपकी रानियों के पेट से देवताओं के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होंगे। इसलिए आप बिल्कुल भी दुःखी न हों। आप इस देवदत्त अधिकार की प्राप्ति के लिए उद्योग कीजिए, आपका मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा!’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाण्डुपुत्र (31)

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पाण्डुपुत्र

महाराज पाण्डु की रानियों कुंती एवं माद्री ने देवताओं से पांच पुत्र वरदान में प्राप्त किए जिन्हें लोक में पाण्डुपुत्र एवं पांच पाण्डव के नाम से प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि ब्रहृलोक जा रहे ऋषि-मुनियों ने महाराज पाण्डु के कोई पुत्र नहीं होने के कारण उन्हें अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। इस बात से व्यथित होकर महाराज पाण्डु ने अपनी बड़ी रानी कुन्ती से कहा- ‘संतानहीन होने के कारण मेरा धरती पर जन्म लेना वृथा हो गया है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता। ऋषि किंदम द्वारा दिए गए श्राप के कारण मैं पुत्र भी उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि जब भी मैं तुम्हारे निकट आउंगा, मेरी उसी क्षण मृत्यु हो जाएगी।’

इस कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें महारानी कुंती के जीवन के पिछले भाग में चलना होगा। हम पूर्व की कथाओं में चर्चा कर चुके हैं कि कुंती, यदुवंशी नरेश शूरसेन की पुत्री थी। वह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थी। नागवंशी महाराज कुन्तिभोज ने कुन्ती को गोद लिया था। इस कारण कुंती को पृथा भी कहा जाता था। भारतीय संस्कृति में कुंती को पंच-कन्याओं में से एक माना जाता है तथा उन्हें चिर-कुमारी कहा जाता है।

जब राजकुमारी कुंती अविवाहित थी तथा अपने पिता कुंतीभोज के घर में रहा करती थी, तब एक बार महर्षि दुर्वासा राजा शूरसेन के महलों में अतिथि बनकर आए। राजकुमारी कुंती ने दुर्वासा ऋषि की बड़ी सेवा की जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया तथा उससे कहा कि इस मंत्र के माध्यम से कुंती जिस किसी भी देवता का आह्वान करेगी, वह देवता कुंती के अधीन हो जाएगा तथा उससे कुंती को उसी देवता के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा।

एक बार कौमार्य अवस्था में ही कुंती ने कौतूहलवश भगवान सूर्य का आह्वान किया जिससे कुंती के पेट से कर्ण का जन्म हुआ। लोकलाज के भय से कुंती ने उस पुत्र को लकड़ी की पेटी में रखकर नदी में बहा दिया था। इस भेद को संसार में भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान सूर्य के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

जब महाराज पाण्डु ने रानी कुंती के समक्ष अपनी निःसंतानअवस्था एवं अपनी विवशता प्रकट की तो कुंती ने महाराज पाण्डु को उस वरदान के बारे में बताया। इस पर महाराज पाण्डु ने कुंती से कहा- ‘तुम धर्मराज का ध्यान करके उनसे एक पुत्र प्राप्त करो। उनसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह कभी भी अधर्म की ओर नहीं जाएगा।’

महाराज पाण्डु के आदेश पर महारानी कुंती ने दुर्वासा से प्राप्त मंत्र के माध्यम से धर्मराज का आह्वान किया। एक चमकीले रथ पर सवार धर्मराज कुंती के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने कुंती से पूछा- ‘मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं?’

कुंती ने उनसे एक पुत्र मांगा। धर्मराज की कृपा से कुंती को गर्भ रह गया तथा समय आने पर कुंती ने धर्मराज के समान ही तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उस समय एक आकशवाणी हुई- ‘यह बालक धर्मात्मा मनुष्यों में श्रेष्ठ होगा तथा सम्पूर्ण धरती पर शासन करेगा। पाण्डु के इस पुत्र का नाम युधिष्ठिर होगा।’

कुछ दिनों बाद महाराज पाण्डु ने कुंती से कहा- ‘क्षत्रिय जाति बल-प्रधान है। इसलिए तुम एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करो जो बलवान् हो।’

पति की आज्ञा पाकर कुंती ने वायुदेव का आह्वान किया। महाबली वायु ने कुंती के समक्ष प्रकट होकर उसे महाबलशाली पुत्र होने का वरदान दिया। जिस समय कुंती के इस पुत्र का जन्म हुआ, उस समय भी एक आकाशवाणी हुई- ‘पाण्डु का यह पुत्र बलवान पुरुषों का शिरोमणि होगा।’

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जिस दिन वन में प्रवास कर रहे पाण्डु और कुंती के पुत्र भीमसेन का जन्म हुुआ, उसी दिन हस्तिनापुर के महलों में गांधारी के पुत्र दुर्योधन का भी जन्म हुआ। जब भीमसेन का जन्म हुआ, तब एक बाघ वहाँ आया। बाघ को देखकर कुंती अपने पुत्र भीमसेन को लेकर सुरक्षित स्थान के लिए भागी किंतु हड़बड़ाहट में बालक भीमसेन माता कुंती की गोद से फिसल गया। महाराज पाण्डु ने जब उस बालक को जाकर देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। बालक तो जीवित था किंतु जिस चट्टान पर वह बालक गिरा था, वह चूर-चूर हो गई थी। कुछ समय पश्चात् महाराज पाण्डु को चिंता हुई कि मुझे ऐसा पुत्र हो जो संसार में सर्वश्रेष्ठ माना जाए। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देवराज इन्द्र हैं, अतः महाराज पाण्डु ने कुंती से आग्रह किया कि वह एक वर्ष तक सत्य-निष्ठा पूर्वक व्रत करे। महाराज पाण्डु स्वयं भी एक वर्ष तक सूर्यदेव के समक्ष खड़े रहकर घनघोर तपस्या करते रहे। एक वर्ष की तपस्या के उपरांत देवराज इंद्र महाराज पाण्डु के समक्ष प्रकट हुए। महाराज पाण्डु ने इन्द्र से कहा- ‘मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो संसार भर में सर्वश्रेष्ठ हो।’

इस पर देवराज ने कहा- ‘मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें ऐसा पुत्र पाने का वरदान देता हूँ जो विश्वविख्यात होगा, ब्राह्मण, गौ एवं श्रेष्ठजन का सेवक होगा और शत्रुओं का नाश करने वाला होगा।’

इंद्र को प्रसन्न जानकर महाराज पाण्डु ने महारानी कुंती से कहा- ‘तुम देवराज इंद्र का आह्वान करके उनसे एक पुत्र प्राप्त करो।’ इस पर कुंती ने इंद्र का आह्वान किया। देवराज इंद्र ने कुंती को अपने ही समान सर्वश्रेष्ठ पुत्र प्रदान किया।

अर्जुन के जन्म के समय आकाशवाणी हुई- ‘कुंती यह पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन और भगवान शंकर के समान पराक्रमी तथा इन्द्र के समान अपराजित होकर अपनी माता का यश बढ़ाएगा। जैसे विष्णु ने अपनी माता अदिति को प्रसन्न किया था, वैसे ही यह तुम्हें प्रसन्न करेगा। यह बहुत से राजाओं पर विजय प्राप्त करके तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा। स्वयं भगवान् रुद्र इसके पराक्रम से प्रसन्न होकर इसे रुद्रास्त्र प्रदान करेंगे। यह इन्द्र की आज्ञा से निवात कवच नामक असुरों को मारेगा और समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को प्राप्त करेगा।’

इस आकाशवाणी के पूरे होते ही आकाश में दुंदुभि बजने लगी तथा पुष्पवर्षा होने लगी। इन्द्रादि देवगण, सप्तर्षि, प्रजापति, गंधर्व, अप्सरा आदि दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर अर्जुन के जन्म का आनंदोत्सव मनाने लगे।

इस प्रकार देवताओं के आशीर्वाद से महाराज पाण्डु की रानी कुंती को तीन पुत्र तथा माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए। इन पांचों को पाण्डुपुत्र कहा जाता था। पांचों पाण्डुपुत्र देवताओं के समान सत्यनिष्ठ, सुंदर, महाबली एवं पराक्रमी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माद्री ने देवताओं से दो पुत्रों को प्राप्त किया (32)

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माद्री ने देवताओं से दो पुत्रों को प्राप्त किया

पिछली कथा में हमने महारानी कुंती द्वारा देवताओं का आह्वान करके तीन पुत्र प्राप्त करने की चर्चा की थी। इस कथा में हम रानी माद्री द्वारा दो पुत्र उत्पन्न किए जाने की कथा की चर्चा करेंगे।

जब महारानी कुंती को दुर्वासा ऋषि द्वारा दिए गए दिव्य मंत्र की सहायता सेे तीन देवताओं के माध्यम से तीन पुत्र प्राप्त हो गए, तब एक दिन महाराज पाण्डु ने महारानी कुंती से पुनः अनुरोध किया कि वह प्रजा की प्रसन्नता के लिए एक कठिन कार्य और करे जिससे तुम्हारा यश होगा। वह कार्य यह है कि तुम माद्री के गर्भ से संतान उत्पन्न करके ने लिए अपने मंत्र का उपयोग करो।

इस पर महारानी कुंती ने रानी माद्री से कहा कि बहिन तुम केवल एक बार किसी देवताआ का चिंतन करो। उससे तुम्हें उसी देवता के अनुरूप पुत्र की प्राप्ति होगी। इस पर माद्री ने अश्विनी कुमारों का ध्यान किया। अश्विनी कुमारों ने उसी समय प्रकट होकर माद्री को नकुल एवं सहदेव के रूप में जुड़वा पुत्र प्रदान किए। ये दोनों बालक अत्यंत सुंदर था विनयशील थे।

उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि ये दोनों बालक बल, रूप एवं गुणों में अश्विनीकुमारों से भी बढ़कर होंगे। ये अपने रूप, द्रव्य, सम्पत्ति और शक्ति से सम्पूर्ण जगत् में प्रकाशित होंगे।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

जब शतशृंग पर्वत पर निवास करने वाले सिद्धों, चारणों, ऋषियों एवं तपस्वियों ने इस भविष्यवाणी को सुना तो वे सब राजा पाण्डु को बधाई देने के लिए आए। सबसे बड़े राजपुत्र युधिष्ठिर का नामकरण तो आकशवाणी के माध्यम से पूर्व में ही किया जा चुका था, अब ऋषियों ने शेष पुत्रों के नामकरण किए तथा उन्हें भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव नाम दिए। ये सभी राजपुत्र एक-एक वर्ष के अंतराल से उत्पन्न हुए थे किंतु नकुल और सहदेव जुड़वां थे। इस प्रकार राजा पाण्डु का पितृ-ऋण भी चुक गया। वे अपनी रानियों सहित शतशृंग पर्वत पर रहते हुए अपनी तपस्या करते रहे। पांचों बालक भी ऋषि-पुत्रों के साथ खेलते हुए बड़े होने लगे।

 बहुत से लोग विशेषकर कुतर्की, नास्तिक, आर्यसमाजी एवं विधर्मी लोग इस बात को लेकर सनातन हिन्दू धर्मग्रंथों पर कटाक्ष करते हैं कि यह तो मर्यादाहीन आचरण है किंतु हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि वेदों, पुराणों एवं अन्य धर्मग्रंथों में वर्णित देवता कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे अतीन्द्रिय हैं तथा दिव्य शक्तियों से सम्पन्न हैं। दिव्य होने के कारण ही उन्हें देवता कहा गया है।

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अतः सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि महारानी कुंती ने महर्षि दुर्वासा से प्राप्त दिव्य मंत्र के माध्यम से तीन देवताओं का आह्वान करके जिन तीन पुत्रों को प्राप्त किया, उनके जन्म की प्रक्रिया मनुष्यों की प्रजनन प्रक्रिया से नितांत अलग रही होगी। जिस प्रकार आज भी परग्रही जीवों के बारे में यह अनुमान है कि वे अपनी मानसिक शक्ति अर्थात् इच्छा मात्र से ही धरती की किसी स्त्री को गर्भवती कर सकते हैं, वे किसी भी मनुष्य की स्मरण-शक्ति नष्ट कर सकते हैं, वे मनुष्यों में जैविक बदलाव कर सकते हैं, उसी प्रकार उस काल के देवता भी अपनी संकल्प शक्ति से किसी स्त्री को गर्भवती कर सकते थे। कुंती एवं माद्री के पुत्र उन्हीं दिव्य देवताओं की संतान थे। अतः वे देवताओं के संकल्प-मात्र से उत्पन्न हुए थे। यदि कुंती एवं माद्री द्वारा उत्पन्न पांचों पुत्रों के जन्म में किसी प्रकार का अनैतिक आचरण होता, परिवार रूपी संस्था का अनादर होता अथवा पर-पुरुष सेवन का भाव होता तो महाराज पाण्डु महारानी कुंती एवं माद्री को इस प्रकार संतानोत्पत्ति की कभी भी आज्ञा नहीं देते। यदि ये पांचों पुत्र किसी पर-पुरुष की संतान होते तो महाराज पाण्डु उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं करते। न ही कौरव राजकुल इस बात को स्वीकार करता। अतः कुतर्कियों एवं विधर्मियों के आक्षेप गलत हैं।

जब महाराज पाण्डु तथा उनके परिवार को शतशृंग पर्वत पर निवास करते हुए कुछ समय बीत गया तब काल ने महाराज पाण्डु पर मृत्युपाश फैंकने का निर्णय लिया। वसंत ऋषि में एक दिन महाराज पाण्डु छोटी रानी माद्री के साथ सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे तब अचानक ही महाराज पाण्डु ने कामग्रस्त होकर रानी माद्री को पकड़ लिया। वे काम-वासना में इतने अंधे हो गए कि माद्री के बार-बार स्मरण दिलाने पर भी उन्हें ऋषि द्वारा दिया गया श्राप याद नहीं आया और उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गए। कुंती ने माद्री से अनुरोध किया कि वह पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर चली जाए ताकि मैं महाराज के साथ सती हो सकूं किंतु माद्री ने स्वयं सती होने का हठ पकड़ लिया। इस प्रकार रानी माद्री सती हो गई और महारानी कुंती पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई।

जब सत्यवती के पुत्र महर्षि वेदव्यास को ज्ञात हुआ कि महारानी कुंती पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई है तो वदेव्यास ने हस्तिनापुर आकर माता सत्यवती से कहा- ‘अब आपका हस्तिनापुर में रहना उचित नहीं है। अतः आप अम्बिका तथा अम्बालिका को लेकर वन में चली जाएं तथा वहाँ योगिनी बनकर योग करें। अब इस महल में कुल-नाश के षड़यंत्र रचे जाएंगे। उन्हें आप न ही देखें तो अच्छा है।’

इस पर माता सत्यवती अपनी दोनों बहुओं रानी अम्बिका एवं अम्बालिका के साथ हस्तिनापुर के महलों से निकल गई ओर जंगलों में जाकर तप करने लगी। कुछ समय बाद राजमाताओं ने अपनी देह त्याग दी। पाण्डुपुत्रों के हस्तिनापुर आगमन के साथ चंद्रवंशी राजाओं की पुरानी परम्परा समाप्त होती है तथा चंद्रवंश की परम्परा एक नवीन युग में प्रवेश करती है। इस नई परम्परा के आरम्भ होने की चर्चा हम अगली कथा में किंचित् विस्तार से करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चंद्रवंशी राजा देवताओं और मनुष्यों का मिश्रण बन गए (33)

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चंद्रवंशी राजा देवताओं और मनुष्यों का मिश्रण बन गए

चंद्रवंशी राजा ययाति ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तथा विश्वाची के साथ रमण किया। महाराज दुष्यंत ने स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री से विवाह किया।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि स्वर्गीय महाराज पाण्डु के पांचों पुत्रों के हस्तिनापुर आगमन के साथ ही चंद्रवंशी राजाओं की पुरानी परम्परा समाप्त होती है तथा चंद्रवंश की परम्परा एक नये युग में प्रवेश करती है।

ब्रह्माजी के मानसिक संकल्प से उत्पन्न मुनि अत्रि से आरम्भ हुई चंद्रवंशी राजाओं की यह सुदीर्घ परम्परा अब तक कई उतार-चढ़ाव एवं मोड़ देख चुकी थी। महाराज चंद्र से लेकर देवव्रत भीष्म तक हुए इस कुल के राजा एवं राजकुमार या तो स्वयं कोई प्राकृतिक शक्ति अथवा देवता थे या फिर वे किसी शक्ति के अधिपति अथवा किसी देवता के अवतार थे।

महाराज चंद्र, महाराज बुध तथा राजकुमार भरद्वाज अंतरिक्षीय पिण्ड थे, पुरूरवा अग्नि का एक प्रकार थे। राजा सहस्रार्जुन धरती पर मेघ बनकर बरसता था। राजा धन्वन्तरि समुद्र से उत्पन्न हुए थे, राजा ययाति ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री से और राजा संवरण ने सूर्यपुत्री ताप्ती से विवाह किया। राजा भरत किसी अन्य सौर मण्डल के सूर्य थे। नहुष आदि कुछ चंद्रवंशी राजा तो स्वर्ग के इन्द्र भी रहे। राजा कुरु में इतनी दिव्य सामर्थ्य थी कि उन्होंने कुरुक्षेत्र में एक स्वर्ग बनाने का संकल्प लिया जिसे इन्द्र ने रुकवाया।

चंद्रवंशी राजा ययाति ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तथा विश्वाची के साथ रमण किया। महाराज दुष्यंत ने स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री से विवाह किया। महाराज शांतनु ने स्वर्ग की अप्सरा गंगा को अपनी पत्नी के रूप में रखा। देवव्रत भीष्म अप्सरा के पुत्र थे तथा स्वयं आठवें वसु थे, उन्हें इच्छा-मृत्यु जैसे दिव्य वरदान प्राप्त थे।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

इस प्रकार चंद्रवंशी राजाओं के स्वर्ग लोक के देवताओं एवं अप्सराओं से सीधे सम्बन्ध थे, चंद्रवंशी राजाओं में से बहुतों ने देवासुर संग्राम में भाग लेकर देवताओं को विजयी बनाया था और बहुत से राजा स्वर्ग में उसी प्रकार जाया करते थे जिस प्रकार वे धरती एवं आकाश में विचरण किया करते थे।

इस प्रकार अब तक के चंद्रवंशी राजा धरती के मनुष्यों से भिन्न थे किंतु अब चंद्रवंशी राजाओं की वे पीढ़ियां बीत चुकी थीं, केवल देवव्रत भीष्म ही उनमें से अकेले जीवित बचे थे।

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पाण्डुपुत्रों के रूप में हस्तिनापुर के महलों में ऐसे राजकुमारों का प्रवेश हुआ जो देवताओं की संतान होते हुए भी प्राकृतिक शक्तियों के स्वामी नहीं थे। वे देवताओं एवं मनुष्यों के बीच की पीढ़ी थे। वे अत्यंत शक्तिशाली तो थे किंतु थे नितांत मनुष्य। उन्हें देवताओं से दिव्य शस्त्र एवं शक्तियां तो मिल सकती थीं किंतु देवत्व नहीं! इनमें से केवल अर्जुन को ही सशरीर स्वर्ग में प्रवेश पाने का अधिकारी था। शेष पाण्डवों को देहत्याग के पश्चात् ही स्वर्ग में प्रवेश मिल सकता था। जब गांधारी के पुत्रों ने देखा कि जिस हस्तिनापुर को अब तक वे अपना निर्बाध राज्य समझ रहे थे, उसी हस्तिनापुर को अब पाण्डुपुत्रों का बताया जाने लगा है तो गांधारी के पुत्र क्रोध से भड़ककर पाण्डुपुत्रों के शत्रु हो गए। वे पाण्डुपुत्रों अर्थात् पाण्डवों को मारने का उद्यम करने लगे। महर्षि वेदव्यास ने माता सत्यवती से उचित ही कहा था कि अब हस्तिनापुर में वंश-विनाश की लीला आरम्भ होने वाली है। पाण्डुपुत्र भले ही कितने ही शक्तिशाली एवं वीर क्यों न हों किंतु दुष्ट शक्तियों के आगे वे कमजोर ही थे। इसका कारण बहुत स्पष्ट था। बुराई छिपकर वार करती है और धर्म कभी सत्य से च्युत नहीं होता। गांधारीपुत्र छिपकर वार करते थे किंतु पाण्डुपुत्र शांति और धैर्य से काम लेते थे।

पाण्डुपुत्रों के सौभाग्य से जिस समय वे हस्तिनापुर के महलों में बड़े हो रहे थे, उसी समय कुंती के भाई वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण भी धरती पर अपनी लीला दिखाने आ चुके थे। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डुपुत्रों के नाम से जानी जाने वाली, देवताओं की इन धर्मनिष्ठ संतानों को अपना मित्र बना लिया। वे भगवान श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने पाण्डुपुत्रों के जीवन एवं धर्म की पग-पग पर रक्षा की। अन्यथा गांधारी के पुत्र जो स्वयं को कौरव कहते थे, कभी का पाण्डवों को मार चुके होते।

कुरुवंशी होने के कारण कौरव तो पाण्डुपुत्र भी थे किंतु गांधारी के पुत्र कुंती और माद्री के पुत्रों को कौरवों से अलग दिखाने के लिए स्वयं को कौरव तथा कुंती एवं माद्री के पुत्रों को पाण्डव कहते थे। महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने भी उन्हें कौरव एवं पाण्डव कहकर उनमें अंतर स्पष्ट किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अर्जुन की परीक्षा लेने आए भगवान शंकर (34)

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अर्जुन की परीक्षा लेने आए भगवान शंकर

महाभारत, शिव पुराण तथा अन्य संस्कृत वांगमय में भगवान शिव के द्वारा अर्जुन की परीक्षा लिए जाने का प्रसंग आया है। इस परीक्षा के माध्यम से भगवान शंकर ने अर्जुन के बल की थाह ली ताकि यह ज्ञात हो सके कि वह भविष्य में होने वाले युद्ध की लिए पूरी तरह तैयार है या नहीं! उसे दिव्य अस्त्र सौंपे जा सकते हैं या नहीं!

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि चंद्रवंशी राजाओं की नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ियों से बिल्कुल अलग थी। इस पीढ़ी तक आते-आते चंद्रवंशी राजा पूरी तरह मनुष्य बन गए थे यद्यपि उनमें देवताओं का अंश विद्यमान था।

चंद्रवंशी राजाओं की इस पीढ़ी के लिए स्वर्ग के द्वार पहले की तरह खुले हुए नहीं थे। फिर भी महाभारत में आई एक कथा के अनुसार पाण्डु पुत्रों में से अर्जुन को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने का अवसर मिला था। यह कथा इस प्रकार से है-

जब पाण्डव द्यूत क्रीड़ा में पराजित होकर तेरह वर्ष का वनवास काट रहे थे तब धर्मराज युधिष्ठिर इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि यदि दुर्योधन पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण तथा अश्वत्थामा आदि योद्धाओं को लेकर अचानक ही वन में आ गया तो वह निश्चय ही पांडवों को नष्ट करने में सफल हो जाएगा। त्रिकालदर्शी वेदव्यास को इस चिंता के बारे में पता लग गया। इसलिए वे एक दिन युधिष्ठिर से मिलने के लिए आए।

महर्षि वेदव्यास ने राजा युधिष्ठिर को परामर्श दिया कि अर्जुन तपस्या तथा पराक्रम के कारण देवताओं के दर्शन की योग्यता रखता है। यह नारायण का सहचर महातपस्वी ऋषि नर है। इसे कोई जीत नहीं सकता। यह अच्युतस्वरूप है। इसलिए तुम अर्जुन को अस्त्रविद्या प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर, देवराज इंद्र, वरुण, कुबेर और धर्मराज आदि देवताओं के पास भेजो। अर्जुन उनसे अस्त्र प्राप्त करके बड़े पराक्रम करेगा।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

महर्षि वेदव्यास के चले जाने के पश्चात् महाराज युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा- ‘दुर्योधन ने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण तथा अश्वत्थामा आदि योद्धाओं को अपने वश में कर लिया है। अब हमें केवल तुमसे ही आशा है। महर्षि वेदव्यास ने मुझे प्रतिस्मृति नामक विद्या सिखाई है। तुम उस विद्या को मुझसे सीख लो। उस विद्या को सीख लेने से मनुष्य को सम्पूर्ण जगत् स्पष्ट दिखाई देने लगता है। इस विद्या को सीख लेने के बाद तुम्हें देवताओं से भी युद्धविद्या एवं शस्त्र आदि प्राप्त करने चाहिए।’

महाराज युधिष्ठिर के आदेश से अर्जुन ने उसी समय ब्रह्मचर्यव्रत धारण किया तथा देवताओं का स्मरण करते हुए अपने गाण्डीव के साथ उत्तर दिशा में चल दिया जहाँ उसकी भेंट देवताओं से हो सकती थी।

जब अर्जुन चलने लगा तब द्रौपदी ने उससे कहा- ‘हे वीर! पापी दुर्योधन ने भरी सभा में मुझे बहुत सी अनुचित बातें कही थीं। उन्हें सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ था। अब हम लोगों का जीना-मरना, राज्य और ऐश्वर्य पाना, सब तुम्हारे ही पुरुषार्थ पर अवलम्बित है। मैं ईश्वर से तथा समस्त देवी-देवताओं से तुम्हारी सफलता की कामना करती हूँ।’

अपने भाइयों एवं द्रौपदी से विदा लेकर अर्जुन इतनी तीव्र गति उत्तर दिशा की ओर चला कि वह एक ही दिन में हिमालय पर जा पहुंचा। इसके बाद वह गंधमादन पर्वत पर होता हुआ कई दिन और कई रात तक चलकर इन्द्रकील नामक स्थान पर पहुंचा। वहाँ अर्जुन को एक आवाज सुनाई दी- ‘खड़े हो जाओ!’

अर्जुन ने रुककर चारों ओर देखा तो उसे एक वृक्ष के नीचे एक तपस्वी बैठा हुआ दिखाई दिया। उस तपस्वी ने अर्जुन से पूछा- ‘तुम कौन हो तथा तपस्वियों की इस भूमि में शस्त्र लेकर क्यों चले आए हो? यहाँ शस्त्रों का कोई काम नहीं है इसलिए अपने शस्त्र फैंक दो।’

तपस्वी की बात सुनकर अर्जुन को बड़ा विस्मय हुआ किंतु अर्जुन अपने स्थान पर खड़ा रहा, उसने अपने शस्त्रों का त्याग नहीं किया। तपस्वी ने अर्जुन से कई बार शस्त्र फैंकने को कहा किंतु अर्जुन उसी प्रकार खड़ा रहा। अर्जुन को अविचल देखकर उस तपस्वी ने कहा- ‘वत्स! मैं इन्द्र हूँ, तुम्हारे धैर्य की परीक्षा लेने के लिए आया हूँ। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो, मुझसे मांग सकते हो।’

इस पर अर्जुन ने दोनों हाथ जोड़कर कहा- ‘भगवन्! मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्र-विद्या सीखना चाहता हूँ। आप मुझे यही वर दीजिए।’

इन्द्र ने कहा- ‘तुम अस्त्र विद्या सीखने की बजाय मुझसे मन चाहे ऐश्वर्य भोग मांग लो।’

अर्जुन ने कहा- ‘मैं लोभ, काम, देवत्व, सुख अथवा ऐश्वर्य के लिए अपने भाइयों को वन में नहीं छोड़ सकता। मैं तो अस्त्र-विद्या सीखकर अपने भाइयों के पास लौट जाउंगा।’

इन्द्र ने अर्जुन को समझाया- ‘हे वीर! जब तुम्हें भगवान शंकर के दर्शन होंगे, तब मैं तुम्हें दिव्य अस्त्र दूंगा। अतः तुम उनके दर्शन प्राप्त करने का उद्यम करो। उनकी कृपा से तुम स्वर्ग में जाओगे।’ इतना कहकर इन्द्र अन्तर्धान हो गए।

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इन्द्र के जाने के बाद अर्जुन ने फिर से आगे बढ़ना आरम्भ किया। एक दिन वह हिमालय को पार करके एक कंटीले जंगल में जा पहुंचा। अर्जुन ने उसी कंटीले वन में रहकर भगवान शंकर की उपासना करने का निश्चय किया। अर्जुन ने एक मास तक तीन दिन में एक बार सूखे पत्ते खाए। दूसरे मास में छः दिन में एक बार तथा तीसरे मास में पंद्रह-पंद्रह दिन में एक बार सूखे पत्ते खाकर तपस्या की। चौथे महीने में दोनों बांह उठाकर पैर के अंगूठे की नोक पर निराहार खड़े रहकर तपस्या की। नित्य जल में स्नान करने के कारण उसकी जटाएं पीले रंग की हो गईं। एक दिन भगवान शंकर भील का रूप धरकर अर्जुन के समक्ष प्रकट हुए। माता पार्वती तथा बहुत से भूत-प्रेत भी भील-भीलनी के वेश में उनके साथ हो लिए। जिस समय भगवान शंकर अर्जुन के समक्ष प्रकट हुए, ठीक उसी समय एक भयानक दानव शूकर रूप धारण करके अर्जुन को मारने के लिए चुपचाप घात लगाकर बैठ गया। अर्जुन ने शूकर को देख लिया और गाण्डीव पर बाण चढ़ाकर बोला- ‘दुष्ट तू मुझ निरअपराध को मारना चाहता है। ले तू ही मर! मैं तुझे यमराज के हवाले करता हूँ।’

जैसे ही अर्जुन ने बाण छोड़ना चाहा, वैसे ही भील वेष धारी भगवान शंकर ने अर्जुन से कहा- ‘तुमसे पहले मैंने इसे देखा है, इसलिए तुम इसे मत मारो, मैं इसे मारूंगा।’

अर्जुन ने भील की बात पर ध्यान नहीं दिया तथा अपना बाण शूकर पर छोड़ दिया। उसी समय भगवान शंकर ने भी अपना बाण चलाया। दोनों ही बाण शूकर के शरीर में धंसकर एक दूसरे से टकराए जिसके कारण भयानक आवाज हुई। शूकर दानव रूप में प्रकट होकर मर गया।

अर्जुन ने भगवान शिव से कहा- ‘तू कौन है और अपनी मण्डली के साथ इस वन में क्यों घूम रहा है? यह शूकर मुझे मारना चाहता था, इसलिए मैंने इस पर बाण चलाया, तूने इसका वध क्यों किया! अब मैं तुझे जीता नहीं छोड़ूंगा।’ 

भील रूप धारी भगवान भोले नाथ ने कहा- ‘इस शूकर पर मैंने तुमसे पहले प्रहार किया। इसे मारने का विचार मैंने तुमसे पहले ही कर लिया था। यह मेरा शिकार था, मैंने ही इसे मारा है।’

भील की बात सुनकर अर्जुन ने भील पर बाणों की वर्षा कर दी। भगवान ने उन सभी बाणों को पकड़ लिया। यह देखकर अर्जुन के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। जब अर्जुन के बाण समाप्त हो गए तो उसने भगवान को अपने धनुष की नोक से मारना आरम्भ किया। इस पर भगवान ने अर्जुन का धनुष भी छीन लिया। अर्जुन ने तलवार उठाई तो भगवान ने तलवार भी तोड़कर फैंक दी। इस पर अर्जुन ने भगवान को घूंसे से मारा। भगवान ने भी अर्जुन में एक घूंसा लगाया तथा उसे अपनी भुजाओं में पकड़ लिया। अर्जुन बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ा।

इस प्रकार भगवान शिव एवं अर्जुन में भयंकर युद्ध छिड़ गया। वस्तुतः भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए यह सारा उपक्रम किया था। अर्जुन की परीक्षा की कथा अगली कड़ी में भी जारी रहेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिव अर्जुन संवाद (35)

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शिव अर्जुन संवाद

भगवान शिव एवं पाण्डुपुत्र अर्जुन के बीच हुए युद्ध का समापन शिव अर्जुन संवाद से होता है जिसमें भगवान शिव अर्जुन को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित करवाते हैं।

पिछली कथा में हमने भगवान शिव तथा अर्जुन के बीच हुए युद्ध की चर्चा की थी। भगवान के द्वारा किए गए घूंसे के प्रहार से अर्जुन बेसुध होकर धरती पर गिर गया। थोड़ी देर में जब उसकी चेतना लौटी तो अर्जुन ने भील से युद्ध करने के लिए भगवान शिव से शक्ति प्राप्त करने का निश्चय किया।

महाभारत में आए वर्णन के अनुसार उसने मिट्टी की एक वेदी बनाई तथा उस पर भगवान शंकर की स्थापना की। और भोलेनाथ की शरण ग्रहण करके उनकी पूजा करने लगा। अर्जुन ने भगवान की पिण्डी पर पुष्प चढ़ाया। वह पुष्प उस भील के सिर पर दिखाई दिया।

अर्जुन समझ गया कि यह भील कोई साधारण मनुष्य नहीं है, अवश्य ही कोई देवता है। अतः अर्जुन ने उस भील के चरणों में गिरकर उसे प्रणाम किया। इसके बाद शिव अर्जुन संवाद आरम्भ हुआ।

भगवान शिव ने कहा- ‘हे अर्जुन तुम सनातन ऋषि हो, तुम्हारा और मेला बल एक समान है। मैं तुम्हें दिव्य ज्ञान देता हूँ जिसके बल पर तुम अपने शत्रुओं को जीत सकोगे।’ इतना कहकर भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

 अर्जुन ने धरती पर गिरकर उन्हें प्रणाम किया।

भगवान शिव ने कहा- ‘तुम नारायण के नित्य सहचर हो। पुरुषोत्तम विष्णु और तुम्हारे परम तेज के आधार पर ही यह जगत् टिका हुआ है। इन्द्र के अभिषेक के समय तुमने और श्रीकृष्ण ने धनुष उठाकर दानवों का नाश किया था। आज मैंने माया से भील का रूप धरकर तुम्हारे गाण्डीव तथा अक्षय तरकस को छीन लिया है। तुम उन्हें वापस ले लो।’

भगवान शिव को प्रसन्न जानकर अर्जुन ने कहा- ‘भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप मुझे पाशुपत अस्त्र दीजिए जिससे रणभूमि में एक साथ हजारों त्रिशूल, भयंकर गदाएं और सर्पाकार बाण निकलते हैं और जो प्रलय के समय जगत् का नाश करता है। मैं उस पाशुपत अस्त्र से भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और कटुवादी कर्ण के साथ लड़ूंगा।’

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भगवान् शंकर ने अर्जुन को गले लगा लिया और उससे कहा- ‘हे विष्णु के सहचहर अर्जुन! मैं तुझे अपना प्रिय पाशुपत अस्त्र देता हूँ क्योंकि तुम उसे उपयोग करने के अधिकारी हो। इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण एवं वायुदेव भी इस अस्त्र के धारण, प्रयोग और उपसंहार करने में कुशल नहीं हैं। फिर मनुष्य तो भला जान ही कैसे सकते हैं। मैं तुम्हें यह अस्त्र देता हूँ किंतु तुम इसे किसी के ऊपर सहसा छोड़ मत देना। अल्पशक्ति मनुष्य के ऊपर इसका प्रयोग करने पर यह जगत् का नाश कर डालेगा। यदि संकल्प, वाणी, धनुष अथवा दृष्टि से किसी भी प्रकार शत्रु पर इसका प्रयोग हो तो यह उसका नाश कर डालता है।’ अर्जुन स्नान करके पवित्रता के साथ भगवान शंकर के पास आए और बोले- ‘अब मुझे पाशुपत अस्त्र की शिक्षा दीजिए।’ महादेव ने अर्जुन को पाशुपत अस्त्र के प्रयोग से लेकर उपसंहार तक का समस्त रहस्य समझा दिया। अब पाशुपत अस्त्र मूर्तिमान काल के समान अर्जुन के पास आया और अर्जुन ने उसे ग्रहण कर लिया। उस समय पर्वत, वन, समुद्र, नगर, गांव और खानों के साथ समस्त भूमि डगमगाने लगी। भगवान शंकर ने अर्जुन को आज्ञा दी- ‘अब तुम स्वर्ग में जाओ।’

अर्जुन भगवान शंकर को प्रणाम करके वहीं खड़ा रहा। इस पर शंकर ने अर्जुन का गाण्डीव उठाकर अर्जुन को दे दिया और स्वयं आकाश मार्ग से चले गए।

इसी के साथ शिव अर्जुन संवाद समाप्त हो जाता है। पुराणों में शिव अर्जुन संवाद को अत्यंत महत्व दिया गया है। शिव अर्जुन संवाद इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि शिव रूपी ब्रह्म स्वयं मूर्त रूप धारण करके अर्जुन रूपी जीव को उसकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान करवाता है। भारतीय वांगमय की दृष्टि से जब मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, तभी उसे मुक्ति प्राप्त होती है।

अर्जुन भगवान शंकर के दर्शन करके स्वयं को कृताथ अनुभव करता हुआ वहीं खड़ा रहा। कुछ ही क्षणों में वरुण, कुबेर, यम तथा अनेक गुह्यक गंधर्व मंदराचल के तेजस्वी शिखर पर आकर उतरे। देवराज इन्द्र भी इन्द्राणी के साथ ऐरावत पर बैठकर आए।

यमराज ने अत्यंत मधुर वाणी में अर्जुन से कहा- ‘अर्जुन देखो, समस्त लोकपाल तुम्हारे पास आए हैं आज तुम हम लोगों के दर्शन के अधिकारी हो गए हो। इसलिए दिव्य दृष्टि लेकर हमारे दर्शन करो। तुम सनातन ऋषि नर हो, तुमने मनुष्य रूप में अवतार लिया है। अब तुम भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहकर धरती का भार मिटाओ। मैं अपना यह दण्ड तुम्हें देता हूँ, जिसका कोई निवारण नहीं कर सकता।’

अर्जुन ने यमराज से वह दण्ड स्वीकार कर लिया। यमराज ने उसका मंत्र, पूजन-विधान तथा प्रयोग एवं उपसंहार की विधि भी अर्जुन को सिखा दी। इसके बाद वरुण ने कहा- ‘मेरी ओर देखो! मैं जलाधीश वरुण हूँ। मेरा वारुणपाश युद्ध में कभी निष्फल नहीं होता तुम इसे ग्रहण करो। तारकासुर के घोर संग्राम में मैंने इसी पाश से हजारों दैत्यों को पकड़कर कैद कर लिया था। तुम भी इसके माध्यम से चाहे जितने शत्रुओं को कैद कर सकते हो।’

इसके बाद तीसरे लोकपाल कुबेर ने कहा- ‘अर्जुन तुम भगवान के नर रूप हो! पहले कल्प में तुमने हमारे साथ बड़ा परिश्रम किया है। इसलिए तुम मुझसे अन्तर्धान नामक अनुपम अस्त्र ग्रहण करो। यह बल, परक्रम एवं तेज देने वाला अस्त्र मुझे बहुत ही प्यारा है। इससे शत्रु मूर्च्छित होकर मर जाते हैं। भगवान शंकर ने त्रिपुर नामक राक्षस का वध इसी अस्त्र से किया था।’

सबसे अंत में देवराज इन्द्र ने कहा- ‘प्रिय अर्जुन! तुम भगवान के नररूप हो, तुम्हें रिद्धि, सिद्धि तथा देवताओं की परम गति प्राप्त हो गई है। तुम्हें देवताओं के बड़े बड़े काम करने हैं और स्वर्ग भी चलना है। इसलिए तुम तैयार हो जाओ, सारथि मातलि तुम्हारे लिए रथ लेकर आएगा। उसी समय मैं तुम्हें दिव्य अस्त्र दूंगा।’

अर्जुन ने उन समस्त लोकपालों एवं गंधर्वों को प्रणाम किया। इसके बाद देवगण तो वहाँ से चले गए तथा अर्जुन मातलि की प्रतीक्षा में वहीं खड़ा रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अर्जुन का स्वर्ग प्रवास (36)

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अर्जुन का स्वर्ग प्रवास

अर्जुन का स्वर्ग प्रवास महाभारत एवं कतिपय पुराणों में वर्णित है। अर्जुन के लिए मानव देह में स्वर्ग के द्वार खुलना एक अद्भुत घटना है। यद्यपि अर्जुन के कई पूर्वज मानव शरीर में ही स्वर्ग में रहे थे और अवधि पूर्ण होने पर धरती पर पुनः भेज दिए गए थे।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि चंद्रवंशी राजकुमार कुंती पुत्र अर्जुन ने गंधमादन पर्वत पर भगवान शंकर, देवराज इन्द्र, यमराज, कुबेर एवं वरुण देव के दर्शन किए तथा उनसे दिव्य अस्त्र प्राप्त किए। इन देवताओं के जाने के बाद अर्जुन वहीं पर रुककर देवराज इन्द्र के सारथि मातलि के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

महाभारत में आए वर्णन के अनुसार थोड़ी ही देर में मातलि दिव्य रथ लेकर उपस्थित हो गया। वह रथ इतना प्रकाशमान था कि उससे चारों दिशाएं भी प्रकाशित हो रही थीं। वह इतनी तेज ध्वनि कर रहा था कि चारों दिशाएं प्रतिध्वनित हो रही थीं।

रथ में तलवार, शक्ति, गदाएं, भाले, वज्र, पहियों वाली तोपें, वायुवेग से गोलियां फेंकने वाले यंत्र, तमंचे तथा और भी बहुत से अस्त्र-शस्त्र उसमें रखे थे। उस रथ में दस हजार वायुगामी घोड़े जुते हुए थे। उस रथ पर वैजयन्ती नामक ध्वजा फहारा रही थी।

दर्शक रथ में रखे हुए शस्त्रों की सूची से हैरान न हों, गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त महाभारत में रथ में रखे गए आयुधों की यही सूची दी गई है जिसमें तोप एवं तमंचों का उल्लेख किया गया है।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

मातलि ने अर्जुन के पास आकर उसे प्रणाम किया तथा कहा- ‘इन्द्रनंदन! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपसे मिलना चाहते हैं, आप इस रथ में सवार होकर शीघ्र चलिए।’

अर्जुन मंदराचल पर्वत से आज्ञा लेकर उस मायामय दिव्य रथ में सवार हो गया। जब अर्जुन उस रथ पर सवार हुआ तो रथ की आभा और भी कई गुणा बढ़ गई। क्षण भर में ही वह रथ मंदराचल पर्वत से उठा और आकाश में अदृश्य हो गया।

अर्जुन ने देखा कि आकाश में सूर्य, चंद्रमा अथवा अग्नि का प्रकाश नहीं था। वहाँ हजारों प्रकार के विमान अद्भुत रूप में चमक रहे थे। वे अपनी पुण्य-प्राप्त-कान्ति से चमकते रहते हैं और पृथ्वी से तारों एवं दीपक के समान दिखाई देते हैं।

अर्जुन ने उन चमकने वाले तारों के बारे में मातलि से प्रश्न किया- ‘क्या ये चमकने वाले घर ही तारे हैं?’

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मातलि ने उत्तर दिया- ‘हे वीर! जिन्हें आप पृथ्वी से तारों के रूप में देखते हैं, वे पुण्यात्मा पुरुषों के निवास स्थान हैं। अब तक वह रथ सिद्ध-पुरुषों का मार्ग पार करके आगे निकल गया था। इसके बाद राजर्षियों के पुण्यलोक दिखाई पड़े। तदनन्तर इन्द्र की दिव्य पुरी अमरावती के दर्शन हुए। स्वर्ग की शोभा, सुगन्धि, दिव्यता, अभिजन और दृष्य अनूठा ही था। यह लोक बड़े-बड़े पुण्यात्मा पुरुषों को प्राप्त होता है। अमरावती में देवताओं की इच्छानुसार चलने वाले सहस्रों विमान खड़े थे। सहस्रों विमान इधर-उधर आ-जा रहे थे। जब अप्सराओं, गंधर्वों, सिद्धों ओर महर्षियों ने देखा कि अर्जुन स्वर्ग में आ गया है तब वे अर्जुन की स्तुति-सेवा करने लगे। बाजे बजने लगे। अर्जुन ने क्रमशः साध्य देवता विश्वेदेवा, पवन, अश्विनी कुमार, आदित्य, वसु, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, तुम्बुरु, नारद तथा हाहा-हूहू आदि गंधर्वों के दर्शन किए। वे अर्जुन का स्वागत करने के लिए ही वहाँ बैठे हुए थे। उनके साथ भेंट करके अर्जुन आगे बढ़ा जहाँ उसे देवराज इन्द्र के दर्शन हुए। अर्जुन ने रथ से उतरकर देवराज को प्रणाम किया। इन्द्र ने अर्जुन को उठाकर अपने आसन पर बैठा लिया। इसी के साथ अर्जुन का स्वर्ग प्रवास आरम्भ हो गया।

संगीतविद्या और सामगान के कुशल गायक तुम्बरु आदि गंधर्व प्रेम के साथ मनोहर गाथाएं गाने लगे। अंतःकरण तथा बुद्धि को लुभाने वाली घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरुथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा, मधुस्वरा आदि अप्सराएं नाचने लगीं।

अर्जुन के पैर धुलवाकर उसे देवराज इन्द्र के महल में ले जाया गया। अर्जुन को वहीं पर ठहराया गया। इन्द्र ने अर्जुन को बहुत से दिव्यास्त्र प्रदान किए तथा उनके धारण, उपयोग एवं उपसंहार का ज्ञान दिया। इन्द्र ने अर्जुन को वज्र का संचालन एवं उपसंहार करना भी सिखाया। अर्जुन ने देवराज से कहा कि अब वह अपने भाइयों के पास लौट जाना चाहता है किंतु इन्द्र ने उसे पांच वर्ष तक स्वर्ग में रहने का आदेश दिया।

एक दिन देवराज इन्द्र ने अर्जुन से कहा कि अब तुम चित्रसेन गंधर्व से नृत्य एवं गायन सीख लो, साथ ही मृत्युलोक में जो बाजे नहीं हैं, उन्हें बजाना भी सीख लो। इन्द्र के आदेश से चित्रसेन ने अर्जुन को गायन एवं वादन की शिक्षा दी तथा दिव्य वाद्ययंत्र बजाने भी सिखाए।

अर्जुन का स्वर्ग प्रवास समस्त सुखों से परिपूर्ण था किंतु फिर भी अर्जुन को अपने भाइयों की बार-बार याद आती तो वह खो सा जाता। एक दिन इन्द्र ने देखा कि अर्जुन निर्निमेष नेत्रों से उर्वशी की ओर देख रहा है।

इन्द्र ने चित्रसेन गंधर्व से कहा- ‘आप उर्वशी को अर्जुन की सेवा के लिए अर्जुन के पास भेजें।’

गंधर्वराज चित्रसेन ने उर्वशी के पास जाकर उससे अर्जुन के गुणों की चर्चा की तथा देवराज इन्द्र का आदेश कह सुनाया।

उर्वशी ने प्रसन्न होकर कहा- ‘अर्जुन के इन गुणों पर तो मैं स्वयं भी पहले से ही मुग्ध हूँ। अब तो देवराज की आज्ञा भी मिल गई है, अतः मैं अर्जुन की सेवा करूंगी।’

चित्रसेन के चले जाने के बाद उर्वशी ने स्नान आदि करके बहुत से दिव्य आभूषण धारण किए तथा दिव्य पुष्पों की माला धारण करके मुस्कराती हुई पवन और मन की तेज गति के साथ अर्जुन के पास पहुंची।

अर्जुन ने उर्वशी को देखकर अपने नेत्र झुकाकर उसे प्रणाम किया तथा कहा- ‘देवि! मैं आपको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ, मैं आपका सेवक हूँ, आप मुझे आदेश करें।’

अर्जुन की मीठी वाणी सुनकर उर्वशी अचेत सी हो गई। उसने कहा- ‘देवराज की आज्ञा से गंधर्वराज चित्रसेन मेरे पास आए थे। वे आपके गुणों का वर्णन करके मुझे आपकी सेवा में उपस्थित होने का आदेश दे गए हैं। मैं काम के वश में हूँ, आप मुझे स्वीकार कीजिए।’

उर्वशी की बात सुनकर अर्जुन ने अपने हाथ अपने कानों पर धर लिए तथा कहा- ‘देवि! आप गुरुपत्पनी के समान हैं। देवसभा में मैंने आपको निर्मिमेष नेत्रों से देखा अवश्य था किंतु मेरे मन में कोई बुरा भाव नहीं था। आप ही पुरुवंश की आनंदमयी माता हैं। यह सोचकर मैं आपको आनंदित होकर देख रहा था। मेरे सम्बन्ध में आपको ऐसी कोई बात नहीं सोचनी चाहिए। आप मेरे पूर्वजों की माता हैं। महाराज पुरूरवा के साथ आप पत्नी रूप में रही हैं।’

इस प्रकार अर्जुन का स्वर्ग प्रवास अर्जुन को उसकी संस्कृति से दूर नहीं कर सका। मानवों की संस्कृति, विशेषकर आर्यों की संस्कृति शुचिता, शुद्धि एवं उच्च आदर्शों पर आधारित थी जहाँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को नैतिकता की कसौटी पर रखा जाता था किंतु स्वर्ग में ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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