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लोमश ऋषि का आश्चर्य (37)

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लोमश ऋषि का आश्चर्य

अर्जुन को इन्द्र के सिंहासन पर विराजमान देखकर लोमश ऋषि का आश्चर्य देखते ही बनता था। वे समझ नहीं सके कि धरती से आया एक मानव देवराज के सिंहासन पर आधे भाग में कैसे बैठा है!

पिछली कथा में हम अर्जुन के स्वर्ग में पहुंचने तथा देवताओं से शस्त्र-विद्याएं सीखने के साथ-साथ चित्रसेन गंधर्व से नृत्य एवं गायन विद्या सीखने की चर्चा की थी। इसी बीच एक दिन देवराज इन्द्र ने अर्जुन को स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की ओर देखते हुए देखा।

इस पर देवराज ने चित्रसेन को आदेश दिया कि वह उर्वशी को अर्जुन की सेवा में भेजे किंतु जब उर्वशी अर्जुन के समक्ष उपस्थित हुई तो अर्जुन ने कहा- ‘देवि! आप गुरुपत्पनी के समान हैं। देवसभा में मैंने आपको निर्मिमेष नेत्रों से अवश्य देखा था किंतु मेरे मन में कोई बुरा भाव नहीं था। आप ही पुरुवंश की आनंदमयी माता हैं। यह सोचकर मैं आपको आनंदित होकर देख रहा था। मरे सम्बन्ध में आपको ऐसी कोई बात नहीं सोचनी चाहिए। आप मेरे पूर्वजों की माता हैं। महाराज पुरुरवा के साथ आप पत्नी रूप में रही हैं।’

यह सुनकर उर्वशी ने कहा- ‘ हे वीर! हम अप्सराओं का किसी के साथ विवाह नहीं होता। हम स्वतंत्र हैं, इसलिए मुझे गुरुपद पर बैठाना उचित नहीं है। आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए तथा मुझ कामपीड़िता पर प्रसन्न होइए।’

अर्जुन ने पुनः कहा- ‘मैं सत्य कह रहा हूँ। जिस प्रकार कुंती, माद्री एवं शची मेरी माताएं हैं, उसी प्रकार आप भी मेरी माता हैं।

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अर्जुन की बात सुनकर उर्वशी क्रोध से कांपने लगी तथा उसने भौंहें टेढ़ी करके अर्जुन को श्राप दिया- ‘अर्जुन! मैं तुम्हारे पिता इन्द्र की आज्ञा से कामातुर होकर तुम्हारे पास आई हूँ। फिर भी तुम मेरी इच्छा पूर्ण नहीं कर रहे हो। इसलिए जाओ, तुम्हें स्त्रियों के बीच नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम सम्मान-रहित होकर नपुंसक के नाम से प्रसिद्ध होओगे।’ इतना कहकर उर्वशी वहाँ से चली गई।

उर्वशी के चले जाने के बाद अर्जुन गंधर्व चित्रसेन के पास गया और उसे सारी घटना कह सुनाई। चित्रसेन ने यह बात इन्द्र से कही। इन्द्र ने अर्जुन को बुलाया तथा प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘पुत्र! तुमने काम को भी अपने वश में कर लिया है। उर्वशी ने तुम्हें जो श्राप दिया है, वह तुम्हारे बहुत काम आएगा। जिस समय तुम तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास में रहोगे, तब तक एक वर्ष तक नपुंसक रूप में रहकर श्राप भोगोगे।’

इन्द्र की बात सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुआ और वह पूर्ण मनोयोग के साथ गंधर्व चित्रसेन से गायन एवं नृत्यविद्या सीखने लगा। एक दिन महर्षि लोमश देवराज के दर्शनों के लिए देवलोक में आए। उस समय इन्द्र अपनी सभा में विराजमान था। जब लोमश ऋषि ने देवसभा में प्रवेश किया तो वे यह देखकर आश्चर्य-चकित हो गए कि कुंती-पुत्र अर्जुन देवराज इन्द्र के साथ उनके ही सिंहासन पर बैठा हुआ है।

लोमश ऋषि ने मन ही मन विचार किया कि अर्जुन को यह आसन कैसे मिल गया! इसने कौनसा ऐसा पुण्य कर्म किया है, किन देशों को जीता है जिससे इसे सर्वदेववन्दित इन्द्रासन मिल गया है। देवराज इन्द्र ने लोमश के मन की बात जान ली। लोमश ऋषि का आश्चर्य चकित हो जाना कोई अस्वाभाविक बात नहीं थी।

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इन्द्र ने कहा- ‘ब्रह्मर्षे! आपके मन में जो विचार उत्पन्न हुआ है, उसका उत्तर मैं आपको देता हूँ। यह अर्जुन केवल मनुष्य नहीं है। यह मनुष्यरूप धारी देवता है। मनुष्यों में इसका अवतार हुआ है। यह सनातन ऋषि नर है। इसने इस समय पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है। महर्षि नर और नारायण कार्यवश पवित्र पृथ्वी पर श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। इस समय निवात कवच नामक दैत्य मदोन्मत्त होकर देवताओं का अनिष्ट कर रहे हैं। वे वरदान पाकर अपने आपे को भूल गए हैं। इसमें संदेह नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने जैसे कालिन्दी के कालिय ह्रद से सर्पों का उच्छेदन किया था, वैसे ही वे दृष्टिमात्र से निवातकवच दैत्यों को अनुचरों सहित नष्ट कर सकते हैं परन्तु इस कार्य के लिए भगवान् श्रीकृष्ण से कुछ कहना ठीक नहीं है। क्योंकि वे महान् तेजपुंज हैं। उनका क्रोध जाग गया तो समस्त संसार ही जलकर भस्म हो सकता है। इसलिए यह कार्य अर्जुन को करना है। अर्जुन निवात कवचों का नाश करने के लिए उनके लोक में जाएंगे। ब्रह्मर्षे! आप पृथ्वी पर जाकर काम्यक वन में रहने वाले दृढ़प्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर से मिलिए और कहिए कि वे अर्जुन की चिंता न करें, अर्जुन बिल्कुल ठीक है।

उन्हें यह भी कहिएगा कि अर्जुन ने समस्त अस्त्र विद्याएं सीख ली हैं तथा वे दिव्य गायन, वादन एवं नृत्यविद्या में भी प्रवीण हो गए हैं। आप अपने भाइयों के साथ निश्चिंत होकर तीर्थ सेवन कीजिए। इससे आपके सारे पाप-ताप नष्ट हो जाएंगे तथा आप पवित्र होकर राज्य भोगेंगे। हे ब्रह्मर्षे! आप बड़े सामर्थ्यवान् हैं, इसलिए आप पृथ्वी पर विचरण करते समय पाण्डवों का ध्यान रखिएगा।’

देवराज इन्द्र की बात सुनकर लोमश ऋषि का आश्चर्य समाप्त हो गया और वे पाण्डवों से मिलने के लिए काम्यक वन चले गए।

जिन दिनों अर्जुन स्वर्ग में निवास कर रहा था, उन्हीं दिनों महर्षि वेदव्यास का हस्तिनापुर जाना हुआ। उन्हें अपनी दिव्यदृष्टि से अर्जुन द्वारा देवताओं से दिव्यास्त्र प्राप्त करने की बात पता चल गई। महर्षि वेदव्यास ने राजा धृतराष्ट्र को अर्जुन की उपलब्धियों के बारे में बताया। यह समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र अपने दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन के लिए चिंतित हुआ।

जब इन्द्र को स्वर्ग में रहते हुए पांच वर्ष का समय बीत गया तब, इन्द्र ने अर्जुन को पुनः अपने भाइयों के पास लौट जाने की अनुमति दे दी। इस पर इन्द्र का सारथि मातलि अर्जुन को गंधमादन पर्वत पर छोड़ गया। उन दिनों अर्जुन के समस्त भाई महारानी द्रौपदी सहित गंधमादन पर्वत पर निवास करते हुए अर्जुन के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

जब अर्जुन ने देवराज इन्द्र के रथ से उतरकर महाराज युधिष्ठिर के चरण स्पर्श किए तो पाण्डवों एवं महारानी द्रौपदी की प्रसन्नता का पार नहीं रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र हिमालय पर गिर गए (38)

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महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र हिमालय पर गिर गए

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के 37 वर्ष बाद महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र हिमालय पर्वत पर चले गए जहाँ वे अपने जीवन में किए गए पापों के कारण एक-एक करके हिमालय पर्वत पर गिर गए। केवल युधिष्ठिर ही एक कुत्ते के साथ आगे बढ़ते हुए स्वर्ग तक जा पहुंचे।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि चंद्रवंशी पाण्डवों में केवल अर्जुन ही ऐसा था जिसे सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने एवं प्रवास करने का अवसर मिला था। जब पाण्डवों के वनवास एवं अज्ञातवास की अवधि समाप्त हो गई तो राजा कुरुद्वारा स्थापित किए गए धर्मक्षेत्र में महाभारत का भयानक युद्ध हुआ। इस क्षेत्र को कुरुक्षेत्र भी कहा जाता है।

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद महाराज युधिष्ठिर ने कुछ काल तक हस्तिनापुर पर शासन किया किंतु बाद में जब द्वारिका पुरी समुद्र में डूब गई तथा वृष्णिवंशी यादवों का संहार हो गया तब महाराज युधिष्ठिर ने अपने राज्य के दो भाग किए। उन्होंने अपने राज्य का एक भाग श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा के पौत्र परीक्षित को दे दिया। उसकी राजधानी हस्तिनापुर में रखी गई। महाराज युधिष्ठिर ने राज्य का दूसरा भाग श्रीकृष्ण के पौत्र वज्र को दे दिया जिसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ में रखी गई।

दर्शकों को स्मरण होगा कि हमने पिछली एक कथा में युयुत्सु की चर्चा की थी। उसका जन्म धृतराष्ट्र की एक वैश्य पत्नी के गर्भ से हुआ था। धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी युयुत्सु को हस्तिनापुर राज्य की रक्षा एवं देख भाल की जिम्मेदारी सौंपी ताकि वह राजा परीक्षित के कार्य में हाथ बंटा सके।

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इसके बाद पाण्डवों ने अपने राज्य का त्याग कर दिया और वे महारानी द्रौपदी को साथ लेकर पूर्व दिशा में स्थित वन के लिए प्रस्थान कर गए। सबसे आगे धर्मराज युधिष्ठिर, उनके पीछे धर्मात्मा भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव चल रहे थे। सबसे पीछे महारानी द्रौपदी चल रही थीं। महाभारत में आए वर्णन के अनुसार अनेक नदियों एवं समुद्रों को पार करके वे लाल सागर के तट पर पहुंचे। अर्जुन का दिव्य धनुष गाण्डीव तथा अक्षय तूणीर अब भी अर्जुन के साथ थे।

जब महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र लाल सागर पहुंचे तब वहाँ अग्निदेव ने एक पुरुष का वेश धरकर उनका मार्ग रोका। उन्होंने पाण्डवों से कहा- ‘मैं अग्नि हूँ। मैंने नरस्वरूप अर्जुन और नारायण स्वरूप श्रीकृष्ण के प्रभाव से खाण्डव वन का दहन किया था। अर्जुन को चाहिए कि वह अपना गाण्डीव त्याग दे क्योंकि अब उन्हें इस शस्त्र की कोई आवश्यकता नहीं है। इसे मैं ही अर्जुन के लिए वरुण देव से मांगकर लाया था। अतः अर्जुन इसे वरुण देव को लौट दें।’

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अग्निदेव की बात सुनकर अर्जुन ने अपना गाण्डीव तथा अक्षय तूणीर जल को समर्पित कर दिए। इसके बाद अग्निदेव अंतर्धान हो गए तथा पाण्डव यहाँ से दक्षिण की ओर मुड़ गए। निश्चित रूप से नहीं कहा नहीं जा सकता कि महाभारत में आए इस प्रसंग में लाल सागर का तात्पर्य किस सागर से है किंतु अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका तात्पर्य वर्तमान बंगाल की खाड़ी से होना चाहिए। क्योंकि यहाँ से वे दक्षिण दिशा में चलते हुए लवणसागर तक पहुंचे। लवण सागर का तात्पर्य हिन्द महासागर से होना चाहिए। लवणसागर से पाण्डव पश्चिम की ओर मुड़े तथा कई दिनों तक चलते हुए द्वारिकापुरी तक जा पहुंचे। उन्होंने समुद्र में डूबी हुई द्वारिकापुरी को देखा तथा यहाँ से वे उत्तर दिशा में मुड़ गए। कई दिनों की यात्रा के बाद पाण्डवों ने हिमालय पर्वत के दर्शन किए। इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा पूरी हो गई। इस वर्णन का तात्पर्य यह समझना चाहिए कि भारत वर्ष की परिक्रमा पूरी हो गई। महाभारत में आए वर्णन के अनुसार पाण्डव हिमालय को लांघकर बालू के समुद्र तक पहुंचे। उसके बाद उन्होंने पर्वतों में श्रेष्ठ महागिरि सुमेरु के दर्शन किए। जिस समय का यह वर्णन है, उस समय धरती पर नदियों, समुद्रों एवं पर्वतों की स्थिति आज जैसी नहीं रही होगी।

अतः हिमालय पर्वत को पार करके महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र ने जिस बालुकामय समुद्र के दर्शन किए, उसके बारे में अनुमान लगाया जाना कठिन है। संभवतः यह स्थान हिमालय के दूसरी ओर की तराई में स्थित था जहाँ आज चीन का रेगिस्तान पसरा हुआ है। यह भी संभव है कि तब यह रेगिस्तान हिमालय के अत्यंत निकट रहा हो।

सुमेरु पर्वत के दर्शनों के बाद महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र और आगे चले। वे बड़े एकाग्रचित्त होकर एवं बड़ी तेजी से बढ़ रहे थे। उनके पीछे आती हुई महारानी द्रौपदी अचानक ही लड़खड़ाकर गिर पड़ी। उसे नीचे गिरी देखकर महाबली भीमसेन ने धर्मराज से पूछा- ‘भैया! राजकुमारी द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया था, फिर बतलाइए, क्या कारण है कि यह नीचे गिर गई?’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘नरश्रेष्ठ! इसके मन में अर्जुन के प्रति विशेष पक्षपात था, आज यह उसी का फल भोग रही है।’

यह कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर द्रौपदी की ओर देखे बिना ही अपने चित्त को एकाग्र करके आगे बढ़ गए। थोड़ी देर बाद माद्रीपुत्र सहदेव भी गिर गया। भीमसेन ने पुनः युधिष्ठिर से पूछा- ‘भैया! माद्रीनंदन सहदेव जो सदा हम लोगों की सेवा में संलग्न रहता था और अहंकार को कभी अपने पास नहीं फटकने देता था, आज क्यों धराशायी हुआ है?’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘राजकुमार सहदेव किसी को भी अपने जैसा विद्वान् नहीं समझता था, इसलिए आज इसे गिरना पड़ा है।’

द्रौपदी और सहदेव को गिरे हुए देखकर नकुल भी शोक से व्याकुल होकर गिर पड़ा। यह देखकर भीमसेन ने पुनः राजा से प्रश्न किया- ‘भैया संसार में जिसके रूप की समानता करने वाला कोई नहीं था, जिसने कभी अपने धर्म में त्रुटि नहीं होने दी और जो सदा हम लोगों की आज्ञा का पालन करता था, वह हमारा प्रिय बंधु नकुल क्यों गिर पड़ा?’

इस पर महाराज युधिष्ठिर ने कहा- ‘भीमसेन! राजकुमार नकुल सदैव यही समझता था कि रूप में मेरे समान और कोई नहीं है। इसके मन में यह बात बैठी रहती थी कि मैं ही सबसे रूपवान हूँ। इसलिए इसको गिरना पड़ रहा है।’

उन तीनों को गिरे हुए देखकर वीर अर्जुन को भी बड़ा शोक हुआ और वह भी अनुताप के मारे गिर पड़ा। दुर्धर्ष वीर अर्जुन को धरती पर गिरे हुए देखकर और मरणासन्न हुआ जानकर भीमसेन ने पुनः महाराज युधिष्ठिर से प्रश्न किया- ‘भैया! महात्मा अर्जुन कभी परिहास में भी झूठ बोले हों, ऐसा मुझे याद नहीं आता। फिर यह किस कर्म का फल है जिससे उन्हें भी पृथ्वी पर गिरना पड़ा?’

युधिष्ठिर बोले- ‘अर्जुन को अपनी शूरता का अभिमान था। इन्होंने एक दिन कहा था कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं को भस्म कर डालूंगा किंतु ऐसा किया नहीं। इसी से आज इन्हें धराशायी होना पड़ा है। इतना ही नहीं, इन्होंने समस्त धनुर्धरों का अपमान भी किया था। अतः अपना कल्याण चाहने वालों को ऐसा नहीं करना चाहिए।’ यों कहकर राजा युधिष्ठिर आगे बढ़ गए। ‘

इस प्रकार महारानी द्रौपदी एवं पाण्डुपुत्र धरती पर गिरते रहे तथा अब केवल युधिष्ठिर एवं भीमसेन ही जीवित बचे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

युधिष्ठिर का कुत्ता (39)

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युधिष्ठिर का कुत्ता

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि सुमेरु पर्वत के दर्शनों के बाद महारानी द्रौपदी, सहदेव, नकुल तथा अर्जुन हिमालय की उपत्यकाओं में गिर पड़े। अब केवल भीमसेन एवं महाराज युधिष्ठिर ही बचे थे तथा युधिष्ठिर का कुत्ता साथ चल रहा था।

थोड़ा ही आगे बढ़ने पर कुंती नंदन भीमसेन भी गिर पड़े। धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा और पूर्ववत् आगे बढ़ते रहे। भीमसेन ने धर्मराज युधिष्ठिर को पुकारकर कहा- ‘राजन्! जरा मेरी ओर देखिए! मैं आपका प्रिय भीमसेन हूँ और यहाँ गिरा हुआ हूँ। यदि आप जानते हों तो बताइए कि मेरे गिरने का क्या कारण है?’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘भीम! तुम बहुत खाते थे और दूसरों को कुछ भी न समझकर अपने बल की डींग हांका करते थे। इसी से तुम्हें भूमि पर गिरना पड़ा है।’

यह कहकर महाबाहु युधिष्ठिर भीमसेन की ओर देखे बिना ही आगे चल दिए। केवल युधिष्ठिर का कुत्ता बराबर उनका अनुसरण करता रहा। इतने में ही आकाश और धरती को प्रतिध्वनित करता हुआ एक दिव्य रथ प्रकट हुआ। उसमें देवराज इन्द्र बैठे हुए थे।

इन्द्र ने महाराज युधिष्ठिर से कहा- ‘कुंती नंदन! तुम इस रथ पर सवार हो जाओ और मेरे साथ स्वर्ग में चलो!’

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इस पर महाराज युधिष्ठिर ने धरती पर गिरे हुए अपने भाइयों पर दृष्टि डाली तथा कहा- ‘नहीं देवेश्वर! अपने भाइयों के बिना मैं स्वर्ग में नहीं जाउंगा। राजकुमारी द्रौपदी अत्यंत सुकुमारी है। उसे भी हम लोगों के साथ चलने की अनुमति दीजिए। तब मैं आपके साथ चल सकता हूँ।’

इन्द्र ने कहा- ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सभी भाई तुमसे पहले ही स्वर्ग में पहुंच चुके हैं। उनके साथ द्रौपदी भी है। वहाँ चलने पर वे सब तुम्हें मिलेंगे। अतः उनके लिए शोक न करो। वे मनुष्य शरीर का परित्याग करके स्वर्ग में गए हैं किंतु तुम इसी शरीर से वहाँ तक जा सकते हो।’

युधिष्ठिर बोले- ‘भगवन्! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है। अतः इसे भी मेरे साथ चलने की आज्ञा दीजिए।’

इन्द्र ने कहा- ‘राजन् तुम्हें मेरे समान अमरता, मेरे समान ऐश्वर्य, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है। साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी सुलभ हुए हैं। अतः इस कुत्ते को छोड़कर मेरे साथ चलो। ऐसा करने में कोई कठोरता नहीं है।’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘भगवन्! आर्य पुरुष के द्वारा निम्न श्रेणी का कार्य होना कठिन है। मुझे ऐसी लक्ष्मी की प्राप्ति कभी न हो जिसके लिए मुझे अपने भक्त का त्याग करना पड़े।’

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इन्द्र ने कहा- ‘धर्मराज! कुत्ते रखने वालों के लिए स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है। किसी मनुष्य द्वारा यज्ञ करने, कुंआ खुदवाने और बावली बनवाने से जो पुण्य प्राप्त होते हैं, कुत्ता रखने पर वे समस्त पुण्य क्रोधवश नामक राक्षस द्वारा हर लिए जाते हैं। अतः आप इस कुत्ते को छोड़ दें, ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है।’ युधिष्ठिर ने कहा- ‘महेन्द्र! भक्त का त्याग कर देने से जो पाप होता है, उसका कभी अंत नहीं होता। संसार में वह ब्रह्महत्या के समान माना गया है। अतः मैं अपने सुख के लिए कभी भी इस कुत्ते का त्याग नहीं करूंगा। जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा-दूसरा कोई नहीं है, ऐसा कहते हुए आर्तभाव से शरण में आया हो, अपनी रक्षा करने में असमर्थ एवं दुर्बल हो तथा अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे शरणागत को मैं नहीं छोड़ सकता।’ इन्द्र ने कहा- ‘मुनष्य जो कुछ भी दान, स्वाध्याय अथवा हवन आदि पुण्य कर्म करता है, उस पर यदि कुत्ते की दृष्टि भी पड़ जाए तो पुण्य के फल को क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं। अतः तुम इस कुत्ते का त्याग कर दो। इससे तुम्हें देवलोक की प्राप्ति होगी। तुमने भाइयों एवं प्रिय पत्नी का त्याग करके अपने पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवलोक को प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्ते को क्यों नहीं छोड़ देते? सब-कुछ छोड़कर अब कुत्ते के मोह में कैसे पड़ गए?’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘भगवन्! संसार में यह निश्चित है कि मरे हुए मनुष्यों के साथ न किसी का मेल होता है और न विरोध। द्रौपदी और अपने भाइयों को जीवित करना मेरे वश की बात नहीं है। अतः मर जाने पर उनका मैंने त्याग किया, जीवित अवस्था में नहीं। शरण में आए हुए को भय देना, स्त्री का वध करना, ब्राह्मण का धन लूटना और मित्रों के साथ द्रोह करना, ये चार अधर्म एक ओर तथा भक्त का त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझ में यह अकेला ही उन चारों के बराबर है।’

युधिष्ठिर के ऐसा कहते ही उनके साथ चल रहा युधिष्ठिर का कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गया। वह वस्तुतः धर्मराज था जो युधिष्ठिर के धैर्य एवं सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने आया था।

धर्मराज ने युधिष्ठिर से कहा- ‘हे पुत्र! तुम अपनी निर्मल बुद्धि और धर्माचरण के कारण सदैव ही अपने पिता का नाम उज्जवल करते रहे हो। मैंने पहले भी एक बार तुम्हारी परीक्षा ली थी जब तुम्हारे चारों भाई पानी लेने के लिए सरोवर पर गए थे और मृत्यु को प्राप्त हुए थे। उस समय भी तुमने अपनी विमाता माद्री के पुत्र नकुल को जीवित देखने की इच्छा बताकर अपने समस्त स्वार्थों का त्याग किया था। आज भी तुमने केवल एक कुत्ते के प्राण बचाने के लिए देवराज इन्द्र के रथ का त्याग कर दिया। अतः स्वर्गलोक में तुम्हारी समता करने वाला कोई नहीं है। इसलिए तुम्हें अपने इसी शरीर से अक्षय लोकों की प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम एवं दिव्य गति को पा गए हो।’

धर्मराज के ऐसा कहते ही मरुद्गण, अश्विनी कुमार, देवगण, देवर्षिगण एवं सिद्धजन आकाश से धरती पर उतर गए और उन्होंने अपने हाथों से पाण्डुनंदन को इंद्र के रथ पर चढ़ाया। समस्त देवता भी अपने-अपने दिव्य रथ लेकर इन्द्र के रथ के पीछे-पीछे स्वर्ग के लिए चले।

उसी समय देवर्षि नारद ने आकाश में स्थित होकर उच्च स्वर में कहा- ‘जितने राजर्षि स्वर्ग में आए हैं महाराज युधिष्ठिर उन सबकी कीर्ति को आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं। ऐसा यश किसी और राजर्षि को भी प्राप्त हुआ है, मैंने नहीं सुना है।’

इस प्रकार चंद्रवंशी राजाओं में युधिष्ठिर अंतिम राजा थे जिन्हें सशरीर ही स्वर्गलोक में प्रवेश करने का अधिकार मिला।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कलियुग सोने का मुकुट पहन कर धरती एवं धर्म को पीटने लगा (40)

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कलियुग सोने का मुकुट पहन कर धरती एवं धर्म को पीटने लगा

हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। मैं तुझे इन चार स्थानों में निवास करने की अनुमति देता हूँ।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि जब युधिष्ठिर अपने भाइयों एवं महारानी द्रौपदी को साथ लेकर स्वर्ग जाने लगे तो उन्होंने अपने राज्य के दो भाग किए। पहला भाग भगवान श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा के पौत्र परीक्षित को तथा दूसरा भाग श्रीकृष्ण के पौत्र वज्र को दिया।

जिस समय परीक्षित का राज्य चल रहा था उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर तथा पृथ्वी ने गाय का रूप धरकर सरस्वती नदी के तट पर भेंट की। धर्म ने पृथ्वी से पूछा- ‘हे देवि! आप इतनी चिंतित क्यों हैं? क्या आप इसलिए दुःखी हैं कि मेरा एक ही पैर बचा है?’

पृथ्वी बोली- ‘हे धर्म! आप सर्वज्ञ हैं। आप जानते हैं कि जब से भगवान् श्रीकृष्ण धरती से गये है मैं उनके निर्मल चरणों का स्पर्श पाने से वंचित हो गई हूँ। इसलिए मैं दुःखी दुखाई देती हूँ।’ जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी चाण्डाल के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को डण्डे से मारने लगा। उसकी मार से धरती और धर्म भय से कांपते हुए कराहने लगे।

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संयोगवश राजा परीक्षित वहाँ से निकल रहे थे। उन्होंने एक मुकुटधारी चाण्डाल को हाथ में डण्डा लेकर एक गाय और एक बैल को बुरी तरह से पीटते हुए देखा।

राजा ने देखा कि श्वेत रंग का एक अत्यन्त सुन्दर बैल केवल एक ही पैर पर खड़ा हुआ मार खा रहा है तथा उसके पास खड़ी गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर है। दोनों ही भयभीत होकर काँप रहे हैं किंतु वे उस चाण्डाल की मार से बचने का प्रयास नहीं कर रहे हैं।

महाराज परीक्षित ने चिल्लाकर कहा- ‘अरे दुष्ट! पापी! तू कौन है? इस निरीह गाय तथा इस लंगड़े बैल को क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।’ इतना कहकर राजा परीक्षीत ने उस चाण्डाल को मारने के लिए अपनी तलवार म्यान में से बाहर निकाल ली।

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महाराज परीक्षित के क्रोध भरे वचनों को सुनकर तथा उनके हाथों में तलवार देखकर चाण्डाल रूपी कलियुग भय से काँपने लगा। उसने अपना मुकुट उतारकर फैंक दिया और भयभीत होकर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि करने लगा। कलियुग को राजा के चरणों में गिरा हुआ देखकर धर्म तथा पृथ्वी भी मनुष्य रूप में आ गए। उन तीनों ने राजा परीक्षित को अपना-अपना परिचय दिया। सम्राट परीक्षित बोले- ‘हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिए मैंने तुझे प्राणदान दिया किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।’ राजा परीक्षित के इन वचनों को सुनकर कलियुग ने कहा- ‘हे राजन्! यह समस्त पृथ्वी तो आपके ही राज्य में स्थित है और इस समय मेरा पृथ्वी पर होना काल के अनुरूप है, क्योंकि द्वापर समाप्त हो चुका है। अतः मैं इस धरती को छोड़कर नहीं जा सकता। आप मुझे रहने के लिए कोई स्थान दे दीजिए!’ कलियुग के यह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गए।

उन्होंने कहा- ‘हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। मैं तुझे इन चार स्थानों में निवास करने की अनुमति देता हूँ।’

इस पर कलियुग बोला- ‘राजन्! ये चार स्थान मेरे निवास के लिए अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और स्थान भी मुझे दीजिये।’

इस पर राजा ने कलियुग से कहा- ‘तू स्वर्ण में निवास कर।’

राजा का उत्तर सुनकर कलियुग संतुष्ट हो गया। वह उसी समय अदृश्य हो गया तथा राजा परीक्षित के सिर पर रखे हुए स्वर्ण-मुकुट में बैठ गया। धर्म एवं धरती भी राजा के इस न्यायपूर्ण व्यवहार को देखकर संतुष्ट हो गए किंतु वे जान गए कि राजा परीक्षित ने कलियुग को जो पांच स्थान दिए हैं, उन्हें पाकर कलियुग अत्यंत प्रबल हो गया है किंतु वे यह भी जानते थे कि धरती पर कलियुग के निवास करने का समय आ गया है। उसे रोक पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। धरती और धर्म दोनों को अब कलियुग का अंकुश सहन करना ही होगा।

इस एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गए। वन्य-पशुओं के पीछे दौड़ने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो गए तथा जल की खोज में घूमते हुए शमीक ऋषि के आश्रम में पहुँच गए। उस समय शमीक ऋषि नेत्र बंद करके ब्रह्मध्यान में लीन थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल माँगा किन्तु ध्यानमग्न होने के कारण शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

राजा परीक्षित के मुकुट में कलियुग का वास हो चुका था किंतु राजा उससे अनभिज्ञ था। इसलिए उसने मुनि के इस आचरण को अपना अपमान समझा। कलियुग के प्रभाव से राजा को अत्यंत क्रोध आ गया। वह करणीय एवं अकरणीय का भेद भूल गया। राजा ने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुए एक मृत-सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठा कर ऋषि के गले में डाल दिया और वहाँ से अपनी राजधानी लौट गया।

शमीक ऋषि ध्यान में लीन थे, उन्हें अपने गले में डाले गए सर्प के बारे में ज्ञात नहीं हो पाया किन्तु उनके पुत्र ऋंगी ऋषि को इस बात का पता चल गया। उसे राजा परीक्षित पर बहुत क्रोध आया। ऋंगी ऋषि ने सोचा कि यदि यह अहंकारी राजा जीवित रहेगा तो इसी प्रकार ब्राह्मणों का अपमान करता रहेगा।

अतः ऋंगी ऋषि ने कमण्डल से अपनी अंजुली में जल लेकर राजा परीक्षित को श्राप दिया- ‘हे अधर्मी राजा! आज से सातवें दिन तुझे नागराज तक्षक अपने विष से जलाएगा!’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा परीक्षित मृत्यु निकट जानकर गंगा तट पर जा बैठा (41)

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राजा परीक्षित मृत्यु निकट जानकर गंगा तट पर जा बैठा

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि जब कलियुग महाराज परीक्षित के मुकुट में आकर बैठ गया तब राजा परीक्षित की बुद्धि भ्रमित हो गई और उसने शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया! शमीक ऋषि के पुत्र शृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि- ‘हे अधर्मी राजा आज से सातवें दिन तुझे नागराज तक्षक विष से जलाएगा!’

जब शमीक ऋषि की समाधि टूटी तो उनके पुत्र ऋंगी ने उन्हें सारी घटना की जानकारी दी तथा बताया कि मैंने अधर्मी एवं अहंकारी राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा विष से जलाए जाने का श्राप दिया है।

यह बात सुनकर शमीक ऋषि को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने अपने पुत्र से कहा- ‘अरे मूर्ख! तूने घोर पाप कर डाला। अत्यंत अल्प अपराध के लिये तूने उस भगवत्भक्त राजा को घनघोर श्राप दे डाला! राजा ने अपनी इच्छा से मेरे गले में मृत सर्प नहीं डाला है, उससे यह कार्य कलियुग ने करवाया है।

राजा परीक्षित के राज्य में प्रजा सुखी है और हम लोग निर्भीक होकर जप, तप एवं यज्ञ आदि करते हैं। अब राजा के न रहने पर प्रजा में अनाचार फैल जायेगा और अधर्म का साम्राज्य हो जायेगा। यह राजा श्राप देने योग्य नहीं था पर तूने उसे श्राप देकर घोर अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि वह राजा स्वयं तुझे श्राप दे दे, किन्तु मैं जानता हूँ कि वह परम ज्ञानी है और ऐसा कदापि नहीं करेगा।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

ऋषि शमीक ने उसी समय अपना एक शिष्य राजा परीक्षित के महल के लिए रवाना किया ताकि राजा को शृंगी ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के बारे में सावधान किया जा सके।

उधर जब राजा परीक्षित ने राजमहल में पहुँच कर अपना मुकुट उतारा तो उसके मस्तिष्क से कलियुग का प्रभाव हट गया और राजा को चेतना हुई कि मैंने घोर पाप कर डाला है। जब वह अपने अपराध पर विचार कर ही रहा था कि ऋषि शमीक का भेजा हुआ शिष्य राजा के महल में उपस्थित हुआ।

ऋषि-शिष्य ने राजा को बताया- ‘ऋषिकुमार ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन तक्षक सर्प आपको विष से जलाएगा!’

राजा परीक्षित ने उसकी बात सुनकर कहा- ‘ऋषिकुमार ने श्राप देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मुझ जैसे पापी को इस जघन्य पाप के लिए उचित दण्ड मिलना ही चाहिये। आप ऋषिकुमार से कहना कि मैं उनकी इस कृपा के लिए उनका अत्यंत आभारी हूँ।’ राजा ने ऋषि-शिष्य का यथोचित सम्मान करके उसे विदा किया।

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राजा परीक्षित ने अपने जीवन के शेष सात दिन आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने एवं भगवत्भक्ति  करने में व्यतीत करने का संकल्प किया। उसने अपना राज्य अपने पुत्र जनमेजय को दे दिया। कलियुग के जाल में फंसे हुए राजा परीक्षित ने समस्त राजसी वस्त्राभूषणों का त्याग करके वल्कल धारण कर लिए और गंगा के तट पर जाकर बैठ गया। राजा ने अपनी समस्त आसक्तियों को त्याग दिया तथा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों का ध्यान करने लगा। भगवान की प्रेरणा से अत्रि, वशिष्ठ, च्यवन, अरिष्टनेमि, शारद्वान, पराशर, अंगिरा, भृगु, परशुराम, विश्वामित्र, इन्द्रमद, उतथ्य, मेधातिथि, देवल, मैत्रेय, पिप्पलाद, गौतम, भारद्वाज, और्व, कण्डव, अगस्त्य, नारद, वेदव्यास आदि महर्षि एवं देवर्षि अपनी-अपनी शिष्य-मण्डलियों सहित राजा के पास आए। राजा परीक्षित ने समस्त ऋषियों का सत्कार करके उन्हें आसन दिए तथा उनसे कहा- ‘यह मेरा परम सौभाग्य है कि जीवन के अंतिम भाग में मुझे आप जैस देवतुल्य ऋषियों के दर्शन प्राप्त हुए। मैंने राजत्व-मद में चूर होकर परम तेजस्वी ब्राह्मण के प्रति अपराध किया है फिर भी आप लोगों ने कृपा करके मुझे दर्शन दिए हैं। मेरी इच्छा है कि मैं अपने जीवन के शेष सात दिनों का उपयोग ज्ञानप्राप्ति और भगवत्भक्ति में करूँ। अतः आप सब मुझ पर कृपा कीजिए तथा मुझे वह सुगम मार्ग बताइये जिस पर चल कर मैं भगवान को प्राप्त कर सकूँ।’

उसी समय महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेवजी भी वहाँ आ गए। समस्त ऋषियों एवं राजा परीक्षित ने शुकदेवजी को सबसे उच्च आसन प्रदान करके उनका सम्मान किया। राजा परीक्षित ने उनसे कहा- ‘हे ब्रह्मरूप योगेश्वर! आप योगियों के भी गुरु हैं। अतः कृपा करके यह बताइये कि मरणासन्न प्राणी का क्या कर्तव्य है? उसे किस कथा का श्रवण, किस देवता का जप, अनुष्ठान, स्मरण तथा भजन करना चाहिये और किन-किन बातों को त्याग देना चाहिये?’

शुकदेवजी ने कहा-

‘हे राजा परीक्षित! मनुष्य, जन्म लेने के पश्चात् संसार के मायाजाल में फँस जाता है और उसे मनुष्य-योनि का वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। उसका दिन काम धंधों में और रात नींद तथा स्त्री-प्रसंग में बीत जाते हैं। अज्ञानी मनुष्य स्त्री, पुत्र, शरीर, धन एवं सम्पत्ति को अपना सब कुछ समझ बैठता है।

वह मूर्ख पागल की भाँति उनमें रम जाता है और उनके मोह में अपनी मृत्यु से भयभीत रहता है। अन्त में मृत्यु का ग्रास होकर चला जाता है। मनुष्य को मृत्यु के आने पर भयभीत तथा व्याकुल नहीं होना चाहिये। अपने ज्ञान से वैराग्य लेकर सम्पूर्ण मोह को दूर कर लेना चाहिये।

अपनी इन्द्रियों को वश में करके उन्हें सांसारिक विषय वासनाओं से हटा लेना चाहिए तथा ऊँ का निरन्तर जाप करते रहना चाहिये जिससे मन इधर उधर न भटके। यदि मन रजोगुण और तमोगुण के कारण स्थिर न रहे तो साधक को व्याकुल न होकर धीरे-धीरे धैर्य के साथ उसे अपने वश में करना चाहिये। उसी योग धारणा से योगी को अपने हृदय में भगवान के दर्शन हो जाते हैं और भक्ति की प्राप्ति होती है।’

राजा परीक्षित ने पूछा- ‘हे महाभाग! वह कौन सी धारणा है जो अज्ञानरूपी मैल को शीघ्र दूर कर देती है और उस धारणा को कैसे किया जाता है?’

शुकदेवजी ने कहा-

‘योग की साधना करने वाले साधक को यथोचित आसन पर बैठकर प्राणायाम का साधन करना चाहिये। इसके बाद मन को चारों ओर से इस प्रकार समेट लेना चाहिये जैसे कछुआ अपने सिर एवं पैरों को समेट लेता है। भगवान के विराट स्वरूप का ध्यान करना चाहिये।

उसे यह समझना चाहिये कि पथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश आदि पंचतत्व, अहंकार और प्रकृति इन सात पदों से आवृत्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विराट भगवान का ही शरीर है, वही इन सबको धारण किये हुए हैं। पाताल विराट भगवान के तलवे हैं, रसातल उनके पंजे हैं, महातल उनकी एड़ी के ऊपर की गाँठें हैं, तलातल उनकी पिंडली हैं, सुतल उनके घुटने हैं, वितल और अतल उनकी जाँघें तथा भूतल उनका पेडू हैं।

हे परीक्षित! आकाश उनकी नाभि, स्वर्गलोक उनकी छाती, महालोक उनका कंठ, जनलोक उनका मुख, तपलोक उनका मस्तक और सत्यलोक उनके सहस्र सिर हैं। दिशाएँ उनके कान, दोनों अश्वनीकुमार उनकी नासिका, अग्नि उनका मुख, अन्तरिक्ष उनके नेत्र और सूर्य उनकी नेत्र-ज्योति है।

दिवस और रात्रि उनकी पलकें हैं, ब्रह्मलोक उनका भ्रू-विलास है, जल उनका तालू और रस उनकी जिह्वा है। वेद उनकी मस्तक-रेखाएँ और यम उनकी दाढ़ें हैं। स्नेह उनके दाँत हैं और जगत को मोहित करने वाली माया उनकी मुस्कान है। लज्जा उनका ऊपरी होठ तथा लोभ निचला होठ है।

राजन्! धर्म भगवान के स्तन और अधर्म उनकी पीठ है। प्रजापति ब्रह्मा उनकी मूत्रेन्द्रिय, मित्रावरुण उनके अण्डकोष और समुद्र उनकी कोख है। पर्वत उनकी हड्डियाँ और नदियाँ उनकी नाड़ियाँ हैं। वृक्ष उनके रोम और वायु उनका श्वास है। बादल उनके केश हैं। सन्ध्या उनका वस्त्र है।

मूल प्रकृति उनका हृदय है और चन्द्रमा उनका मन है। महातत्व उनका चित्त और रुद्रदेव उनका अहंकार हैं। वन्य-पशु उनकी कमर तथा हाथी, घोड़े, खच्चर आदि उनके नख हैं। आकश में उड़ते हुए करोड़ों पक्षी भगवान की विविध कलाएँ हैं। बुद्धि उनका मन है और मनुष्य उनका निवास स्थान है।

अप्सरा, चारण, गन्धर्व आदि भगवान के स्वर हैं। देवताओं के निमित्त किये गए यज्ञ भगवान के कर्म हैं। बुद्धि और ज्ञान से अपने मन को वश में करके भगवान के इसी विराट रूप का ध्यान करना चाहिये।’

इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान का अर्जन एवं ईश-भक्ति करते हुए छः दिन बीत गए तथा नागराज तक्षक के आने की तिथि आ गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नागराज तक्षक राजा परीक्षित को डंसने के लिए राजमहल में घुस गया (42)

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नागराज तक्षक राजा परीक्षित को डंसने के लिए राजमहल में घुस गया

जब शमीक ऋषि के शिष्य गौमुख ने हस्तिनापुर के राजमहल में उपस्थित होकर राजा परीक्षित को सूचित किया कि शृंगी ऋषि ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन नागराज तक्षक आकर आपको अपने विष से जलाएगा तो राजा परीक्षित सावधान हो गया।

पिछली कथा में हमने शापग्रस्त चंद्रवंशी राजा परीक्षित को शुकदेवजी द्वारा दिए गए उपदेशों की चर्चा की थी जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण में हुआ है। इस कथा में हम महाभारत में आए वर्णन के अनुसार राजा परीक्षित की मृत्यु का वर्णन करेंगे।

जब शमीक ऋषि के शिष्य गौमुख ने हस्तिनापुर के राजमहल में उपस्थित होकर राजा परीक्षित को सूचित किया कि शृंगी ऋषि ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन नागराज तक्षक आकर आपको अपने विष से जलाएगा तो राजा परीक्षित सावधान हो गया। जब सातवें दिन तक्षक आ रहा था तब उसने काश्यप नामक ब्राह्मण को देखा।

नागराज तक्षक ने पूछा- ‘ब्राह्मण देवता आप इतनी शीघ्रता से कहाँ जा रहे हैं? काश्यप ने कहा- ‘जहाँ आज राजा परीक्षित को तक्षक सांप जलाएगा, मैं वहीं जा रहा हूँ। मैं उन्हें तुरंत जीवित कर दूंगा। मेरे पहुंच जाने पर तो सर्प उन्हें जला भी नहीं सकेगा।’

तक्षक ने कहा- ‘मैं ही नागराज तक्षक हूँ। आप मेरे डंसने के बाद उस राजा को क्यों जीवित करना चाहते हैं?’ यह कहकर तक्षक ने एक वृक्ष को डंस लिया। उसी क्षण वह वृक्ष जलकर राख हो गया। काश्यप ब्राह्मण ने अपनी विद्या के बल से उस वृक्ष को उसी समय पुनः हरा-भरा कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

जिस समय तक्षक ने उस वृक्ष को भस्म किया, उस समय एक लकड़हारा सूखी लकड़ी लेने के लिए उस वृक्ष पर चढ़ा हुआ था और वह उन दोनों की बातें सुन रहा था। जब तक्षक ने उस वृक्ष को भस्म किया तो वह लकड़हारा भी उस वृक्ष के साथ जलकर भस्म हो गया किंतु जब काश्यप ने उस वृक्ष को फिर से हरा-भरा किया तो वह लकड़हारा भी फिर से जीवित हो उठा तथा फिर से तक्षक एवं काश्यप की बातें सुनने लगा।

काश्यप की अद्भुत विद्या को देखकर तक्षक उसे प्रलोभन देने लगा। उसने कहा- ‘जो चाहो, मुझसे ले लो!’

ब्राह्मण ने कहा- ‘मैं तो धन के लिए राजा के पास जा रहा हूँ।’

नागराज तक्षक ने कहा- ‘तुम उस राजा से जितना धन लेना चाहते हो, उतना धन मुझसे ले लो और यहाँ से लौट जाओ।’

नागराज तक्षक के ऐसा कहने पर काश्यप नामक ब्राह्मण तक्षक से मुंहमांगा धन लेकर लौट गया। उसके बाद तक्षक छल से राजा परीक्षित के महल में घुसा। उसने महल में सावधान होकर बैठे राजा परीक्षित को अपने विष से जला दिया।

जब तक्षक वहाँ से चला गया तब वह लकड़हारा हस्तिनापुर के राजमहल में आया और उसने जंगल में तक्षक और काश्यप के बीच का समस्त वृत्तांत लोगों को बता दिया। उन लोगों ने यह घटना परीक्षित के पुत्र जनमेजय को बता दी।

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देवी भागवत में लिखा है कि ऋषि द्वारा दिए गए श्राप का समाचार पाकर राजा परीक्षित ने सात मंजिल ऊँचा महल बनवाया और उसके चारों ओर सर्प-मंत्र जानने वाले व्यक्तियों एवं पहरेदारों को नियुक्त किया। तक्षक को जब परीक्षित के महल के सुरक्षा प्रबंधों के बारे में ज्ञात हुआ तब उसने एक सर्प को ब्राह्मण के वेश में राजा के महल में प्रवेश करने का आदेश दिया। तक्षक ने ब्राह्मण-रूप-धारी-सर्प को एक फल दिया तथा उससे कहा कि वह इस इस फल को भगवान के प्रसाद के रूप में राजा के महल में पहुंचाए। तक्षक एक छोटे कीड़े का रूप धरकर उस फल में बैठ गया। जब ब्राह्मण-रूप-धारी-सर्प ने राजा को फल दिया तो तक्षक उस फल में से बाहर निकल आया और उसने राजा को भयानक विष से जला दिया। राजा की उसी समय मृत्यु हो गई। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए तक्षक सहित संसार के समस्त सर्पों को मारने का निश्चय किया। राजा जनमेजय ने ऋषियों से कहा- ‘हे ब्राह्मणो! दुष्ट तक्षक को अग्नि में भस्म करने के लिए सर्पयज्ञ का आयोजन करो। मैं संसार-भर के समस्त सर्पों सहित तक्षक को भस्म करूंगा।’

राजा की प्रार्थना पर ऋषियों ने विशाल सर्पयज्ञ का आयोजन किया। जब यज्ञमण्डप बनकर पूर्ण हुआ तो एक ब्राह्मण ने भविष्यवाणी की कि किसी ब्राह्मण के कारण यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकेगा। इस पर राजा जनमेजय ने द्वारपालों को आज्ञा दी कि मेरी आज्ञा के बिना किसी भी व्यक्ति को यज्ञमण्डप में प्रवेश नहीं करने दिया जाए।

इसके बाद सर्पयज्ञ आरम्भ किया गया। ऋत्विजों ने काले वस्त्र पहनकर हवनकुण्ड में आहुतियां डालनी आरम्भ कीं तथा जोर-जोर से मंत्रोच्चारण करने लगे। उन मंत्रों के प्रभाव से छोटे-बड़े असंख्य सर्प आकाश मार्ग से आ-आकर यज्ञकुण्ड में गिरने लगे। बहुत से सर्प तड़पते, पुकारते, उछलते, लम्बे सांस लेते हुए, पूंछ और फनों से एक दूसरे को लपेटे हुए यज्ञकुण्ड की अग्नि में गिरने लगे। इन सर्पों में कुछ तो गाय के कान जितने छोटे थे और कुछ चार कोस तक लम्बे थे।

सफेद, काले, नीले, पीले, हरे, लाल, बच्चे, बूढ़े, सभी प्रकार के सांप टपाटप आकर आग में गिरने लगे। इस सर्पयज्ञ में ऋषि च्यवन के वंशज चण्ड भार्गव यज्ञ के होता थे। कौत्स उद्गाता, जैमिनी ब्रह्मा, शांर्गरव और पिंगल अध्वर्यु थे। अपनी शिष्य-मण्डली सहित स्वयं महर्षि वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, असित तथा देवल नामक ऋषि भी इस यज्ञ में सदस्य के रूप में सम्मिलित हुए।

सर्पों के मेद एवं चर्बी के जलने से पूरा वातावरण दुर्गंध से भर गया तथा सर्पों की चीख-पुकार से आकाश गूंज उठा। यह समाचार नागराज तक्षक ने भी सुना, वह भयभीत होकर देवराज इन्द्र की शरण में पहुंचा। उसने कहा- ‘देवराज! मैं अपराधी हूँ। भयभीत होकर आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिए।’

इन्द्र ने कहा- मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए पहले ही ब्रह्माजी से अभयदान ले लिया है। तुम्हें सर्पयज्ञ से कोई भय नहीं।’ इन्द्र की बात सुनकर नागराज तक्षक निर्भय होकर इन्द्रभवन में ही रहने लगा। सर्पयज्ञ चलता रहा और संसार भर के नाग उसमें आ-आकर गिरते रहे। अब बहुत कम सर्प जीवित बचे थे फिर भी वासुकी और तक्षक जैसे बड़े सांप अब भी जनमेजय के यज्ञकुण्ड की पहुंच से दूर थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा जनमेजय ने कहा, इन्द्र को भी सांपों के साथ घसीट लो (43)

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राजा जनमेजय ने कहा, इन्द्र को भी सांपों के साथ घसीट लो

आस्तीक द्वारा की गई यज्ञ की स्तुति को सुनकर राजा जनमेजय ने आस्तीक ऋषि को यज्ञशाला के भीतर बुलवाया। आस्तीक ऋषि ने यज्ञशाला में पहुंचकर वहाँ बैठे हुए यजमान, ऋत्विज्, सभासद् तथा अग्नि की स्तुति की जिसे सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग प्रसन्न हो गए।

पिछली कथा में हमने तक्षक द्वारा चंद्रवंशी राजा परीक्षित को विष से जलाने एवं परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय द्वारा सर्पयज्ञ का आयोजन करने की कथा की चर्चा की थी। ऋषियों द्वारा काले कपड़े पहनकर किए गए इस यज्ञ में संसार भर के सर्प आ-आकर भस्म हो गए थे किंतु वासकि एवं तक्षक जैसे बड़े सांप अब भी जनमेजय के यज्ञकुण्ड की पहुंच से दूर थे।

जब यज्ञ की आंच नागराज वासुकी तक पहुंची तो उसने अपनी बहिन जरत्कारू से कहा- ‘बहिन मेरा अंग-अंग जल रहा है। दिशाएं नहीं सूझतीं। चक्कर आने के कारण बेहोश सा हो रहा हूँ। दुनिया घूम रही है। कलेजा फटा जा रहा है। मुझे ऐसा दीख रहा है कि अब मैं भी विवश होकर धधकती आग में गिर जाउंगा। इस यज्ञ का यही उद्देश्य है। हमारी माता कदू्र ने हम सर्पों को आग में जलकर भस्म होने का श्राप दिया था। जिसके कारण हम भस्म हो रहे हैं किंतु मैंने इसी संकट से बचने के लिए तुम्हारा विवाह जरत्कारू नामक ब्राह्मण से किया था। तुम्हारा पुत्र आस्तीक सर्पयज्ञ को बंद करवा सकता है। अतः अब तुम हमारी रक्षा करो।’

इस पर जरत्कारू ने अपने पुत्र आस्तीक को बुलाकर कहा कि वह अपने मामा के कुल की रक्षा करे। इस पर आस्तीक ऋषि जो कि अभी बालक ही था, अपने मामा को उनकी सुरक्षा करने का वचन देकर राजा जनमेजय की यज्ञशाला में पहुंचा। बालक आस्तीक को यज्ञशाला के बाहर ही रोक दिया गया।

इस पर आस्तीक ने उच्च स्वर में यज्ञ की स्तुति करनी आरम्भ की। इस स्तुति को सुनकर राजा जनमेजय ने आस्तीक ऋषि को यज्ञशाला के भीतर बुलवाया। आस्तीक ऋषि ने यज्ञशाला में पहुंचकर वहाँ बैठे हुए यजमान, ऋत्विज्, सभासद् तथा अग्नि की स्तुति की जिसे सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग प्रसन्न हो गए।


पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लॉग-

राजा जनमेजय ने बालक रूपी आस्तीक ऋषि से कहा- ‘हे ब्राह्मण-पुत्र! आप अपनी मनवांछित वस्तु मांगें।’

इसी समय इन्द्र का सिंहासन भी यज्ञकुण्ड की तरफ खिंचने लगा जिससे भयभीत होकर इंद्र ने तक्षक को छोड़ दिया। इन्द्र के जाते ही तक्षक बेहोश हो गया तथा तेजी से अग्नि कुण्ड की तरफ खिंचने लगा।

इस पर बालक रूपी आस्तीक ऋषि ने तक्षक की तरफ हाथ उठाकर कहा- ‘ठहर जा! ठहर जा! ठहर जा!’ इस पर तक्षक आकाश में ही लटक गया।

आस्तीक ऋषि ने राजा जनमेजय से कहा- ‘यदि आप मुझे मेरी मनवांछित वस्तु देना चाहते हैं तो आप इस यज्ञ को इसी समय रोक दीजिए तथा यज्ञकुण्ड की ओर आते हुए नागों एवं सर्पों को अभयदान दीजिए।’

राजा ने देखा कि तक्षक अब भी यज्ञकुण्ड से कुछ दूरी पर रह गया था इसलिए राजा ने रुष्ट होकर कहा- ‘हे ब्राह्मण! तुम्हें सोना, चांदी, गौ एवं भूमि आदि मांगने चाहिए थे। मैं चाहता हूँ कि यह यज्ञ बंद न हो।’

इस पर आस्तीक ने कहा- ‘राजन् मैं चाहता हूँ कि मेरा मातुल कुल नष्ट न हो। अतः आप मुझे यही वर दीजिए।’

इस पर राजा और ऋषि के बीच वाद-विवाद होने लगा। उनके विवाद को सुनकर यज्ञ में बैठे ऋषियों ने राजा से कहा- ‘राजन् आप वचन-बद्ध हो चुके हैं, अतः आप इस बालक को उसका मुंहमांगा वर दीजिए।’

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राजा ने सिर झुका कर ऋत्विजों, सभासदों एवं ब्राह्मणों की बात मान ली। सूतजी ने यज्ञ पूर्ण होने की घोषणा की तथा राजा ने सभी उपस्थित लोगों को बहुत सारा दान एवं सम्मान देकर विदा किया। इस प्रकार तक्षक और वासुकी यज्ञकुण्ड की अग्नि में भस्म होने से बच गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि महाभारत काल में भारत में तक्षक जाति निवास करती थी। कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि तक्षक अथवा नाग अनार्य थे और संभवतः शक थे। इनका जातीय चिह्न सर्प था। तिब्बत, मंगोलिया, और चीन के कुछ निवासी भी स्वयं को तक्षक नागों के वंशज कहते हैं। जब श्रीकृष्ण तथा अर्जुन ने खाण्डव वन का दहन करके नागों का नाश किया था तब से ही नागों ने पाण्डुपुत्रों से शत्रुता बांध ली थी। यही कारण था कि महाराज युधिष्ठिर एवं अर्जुन आदि की मृत्यु के बाद नागों ने राजा परीक्षित पर आक्रमण करके उसे मार डाला था। जब जनमेजय राजा हुआ तो उसने नागों की राजधानी तक्षशिला पर आक्रमण करके तक्षक नागों का विनाश किया था। संभवतः तक्षकों के राजा तक्षक एवं वासुकी इस युद्ध में जीवित बच गए थे और राजा जनमेजय ने उन्हें प्राणदान दिया था।

यही घटना जनमेजय के सर्पयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध हुई होगी! यद्यपि चंद्रवंशी राजाओं की शृंखला हजारों वर्षों तक चलती रही तथापि अब उनकी कथाएं दैविक शक्तियों के चमत्कारों से मुक्त हो चुकी थीं। अतः इस कथा के साथ ही चंद्रवंशी राजाओं की कथाओं के क्रम को हम विराम देते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दधीचि के पौत्र ने तपस्या का फल लेने से मना कर दिया ! (1)

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दधीचि के पौत्र - www.bharatkaitihas.com
दधीचि के पौत्र

जब राजा इक्ष्वाकु ने पुण्यों का फल महर्षि दधीचि के पौत्र को वापस लौटाना चाहा तो महर्षि दधीचि के पौत्र ने एक बार दी गई वस्तु वापस लेने से मना कर दिया!

‘धर्म’ का शाब्दिक अर्थ है- धारण करना। जो मनुष्य उत्तम विचार, उत्तम दर्शन और उत्तम आचरण को धारण करता है, वह मनुष्य धर्म से सम्पन्न है। संसार भर में मनुष्य मात्र का धर्म एक ही है। सभी मनुष्य एक ही धर्म से संचालित होते हैं किंतु सांसारिक स्तर पर धर्म के अगल-अलग नाम और स्वरूप दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये नाम और स्वरूप, धर्म के नहीं, सम्प्रदायों के हैं। धर्म तो एक ही है। यही कारण है कि भारत के लोग प्रायः यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि ‘हिन्दू धर्म’ कोई धर्म नहीं है, यह तो जीवन-शैली है।

इस कथा से हम वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु तथा उसके वंशज राजाओं की कथाओं की चर्चा करेंगे। महाराज वैवस्वत-मनु के के दस पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम इक्ष्वाकु था। बहुत से ग्रंथों में इसी इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश आरम्भ होना माना जाता है। जबकि कुछ ग्रंथों में इक्ष्वाकु को मनु की आठवीं पीढ़ी का वंशज बताया गया है। यह संभव है कि इस वंश में इक्ष्वाकु नाम के दो राजा हुए हों जिनमें से पहला इक्ष्वाकु महाराज मनु का पुत्र था और दूसरा इक्ष्वाकु मनु की आठवीं पीढ़ी का वंशज था।

मनु के पिता सूर्य के नाम पर मनु के वंशजों को सूर्यवंशी कहते थे। मनु के वंशज कई हजार सालों की अवधि में हिमालय के तराई क्षेत्र से होते हुए मध्य भारत और दक्षिण भारत तक की भूमि पर फैल गए। मनु के वंशजों ने स्वयं को आर्य कहा और उन्होंने भारत की विशाल भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं दक्षिणापथ आदि भागों में विभक्त किया।

ऋग्वेद में इक्ष्वाकु शब्द का उल्लेख केवल एक बार हुआ है। कुछ विद्वानों के अनुसार इक्ष्वाकु किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं था अपितु यह आर्यों का एक समूह था। उनके वंशज उत्तरी भागीरथी घाटी में बसते थे। कुछ ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकु के वंशजों का सम्बन्ध उत्तर-पश्चिम के जनपदों से भी था।

बहुत से पुराणों की मान्यता है कि मनु के महान पुत्र इक्ष्वाकु के नाम पर सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश कहा गया। कुछ पौराणिक कथाएं राजा इक्ष्वाकु को अमैथुनी सृष्टि द्वारा मनु की छींक से उत्पन्न बताती हैं। इसीलिए इनका नाम इक्ष्वाकु पड़ा।

ईक्ष्वाकु को सूर्यवंशी राजाओं में पहला राजा माना जाता है। इक्ष्वाकु ने कोसल नामक राज्य की स्थापना की तथा अपनी राजधानी अयोध्या बसाई। राजा ईक्ष्वाकु के 100 पुत्र हुए। इनमें से पचास पुत्रों ने उत्तरापथ में और पचास पुत्रों ने दक्षिणापथ में राज्य किया। इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र का नाम विकुक्षि था। इक्ष्वाकु के दूसरे पुत्र निमि ने मिथिला का राजकुल स्थापित किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

राजा ईक्ष्वाकु के सम्बन्ध में एक कथा इस प्रकार मिलती है-

महर्षि दधीचि का पुत्र पिप्पलाद घोर तपस्वी था। उसने पीपल के पत्ते खाकर जीवन यापन किया था। अथर्ववेद का प्रथम संकलन पिप्पलाद ऋषि ने ही तैयार किया था। महर्षि पिप्पलाद का पुत्र भी वेदों का परम ज्ञाता हुआ। उसके जप से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उसे, अन्य ब्राह्मणों से ऊपर, शुद्ध ब्रह्मपद प्राप्त करने का वर दिया और उससे कहा कि समय आने पर यम, मृत्यु तथा काल भी उसके समक्ष उपस्थित होकर उससे धर्मानुकूल विचार-विमर्श करेंगे।

सावित्री के वरदान के अनुसार एक दिन धर्म ने पिप्पलाद के पुत्र के समक्ष प्रकट होकर उससे कहा कि वह शरीर त्याग कर पुण्य लोक प्राप्त करे।

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ब्राह्मण-पुत्र उस शरीर का त्याग नहीं करना चाहता था जिस शरीर से उसने दीर्घकाल तक तपस्या की थी किंतु यम, मृत्यु तथा काल भी पिप्पलाद के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने ब्राह्मण-पुत्र से कहा कि उसके पुण्यों का फल प्राप्त होने का समय आ गया है। अतः वह अपनी इच्छानुसार कोई भी लोक चुन ले किंतु पिप्पलाद का पुत्र कोई भी लोक ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हुआ। वह इसी लोक में और इसी शरीर में रहना चाहता था जिसमें उसने भगवान श्री हरि विष्णु की तपस्या की थी। तभी राजा इक्ष्वाकु तीर्थाटन करते हुए वहाँ आ पहुंचे। ब्राह्मण-पुत्र ने उनका भी समुचित सत्कार किया तथा उनकी इच्छा जाननी चाही। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण से कहा कि हम आपको विपुल धन-धान्य एवं अमूल्य रत्न देना चाहते हैं। ब्राह्मण-पुत्र ने धन-धान्य तथा रत्न आदि लेने से मना कर दिया और राजा से कहा कि आप ही मुझसे कुछ मांगें। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण-पुत्र की परीक्षा लेने के लिए कहा कि आपने सौ वर्ष तक जो घनघोर तपस्या की है उस तप का फल मुझे दे दें। ब्राह्मण-पुत्र ने उसी समय अपने तप का फल राजा को दे दिया। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण पुत्र से पूछा- ‘आपके द्वारा किए गए तप का फल क्या है?’

ब्राह्मण-पुत्र ने उत्तर दिया- ‘मैं निष्काम तपस्वी हूं, अतः मेरे द्वारा किए गए तप का फल क्या है, यह मैं नहीं जानता।’

राजा बोला- ‘जिस फल का स्वरूप ज्ञात नहीं, ऐसा फल मैं नहीं लूंगा। अतः आप मेरे पुण्य-फलों सहित उसे पुनः ग्रहण करें।’

 इस पर ब्राह्मण-पुत्र ने एक बार दे दी गई वस्तु वापस लेने से मना कर दिया। इससे राजा के समक्ष भारी संकट खड़ा हो गया क्योंकि क्षत्रिय होने के कारण राजा दान नहीं ले सकता था।

ब्राह्मण ने कहा- ‘इस विषय में आपको पहले सोचना चाहिए था। आपने मुझसे मेरे तप का फल मांगा, मैंने दे दिया।’

उसी समय विकृत और विरूप नामक दो भयानक व्यक्ति एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर वहाँ पहुंचे। वे दोनों राजा इक्ष्वाकु से न्याय करने का आग्रह करने लगे।

विरूप ने राजा को बताया- ‘पूर्व काल में विकृत ने एक गाय किसी ब्राह्मण को दान में दी थी। विरूप ने उस दान का फल विकृत से मांग लिया था। कालांतर में विरूप ने दो गाएं बछड़ों सहित ब्राह्मणों को दान दीं और विरूप को उस दान के कारण बड़ा फल प्राप्त हो गया। अतः विरूप, विकृत से लिया गया पुण्य-फल उसे वापस लौटा देना चाहता है किंतु विकृत उस दान का फल वापस लेने को तैयार नहीं है। वह कहता है कि उसने दान दिया था, ऋण नहीं दिया था।’

उन दोनों की बातें सुनकर राजा इक्ष्वाकु असमंजस में पड़ गया किंतु ब्राह्मण-पुत्र पिप्पलाद ने कहा- ‘विकृत ठीक कह रहा है, दान में दी गई वस्तु ऋण नहीं होती इसलिए उसे वापस नहीं लिया जाता। यदि तुम स्वयं ही मांगे हुए फल अब ग्रहण नहीं करोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगा।’

पिप्पलाद की बात सुनकर राजा इक्ष्वाकु चिंतातुर हो उठा क्योंकि जो विवाद विकृत और विरूप के बीच में हो रहा था, वही विवाद तो पिप्पलाद के पुत्र तथा राजा इक्ष्वाकु के बीच में भी चल रहा था। अतः राजा ने ब्राह्मण के श्राप से भयभीत होकर अपना हाथ पिप्पलाद के पुत्र के समक्ष पसार दिया। ब्राह्मण ने अपने तप तथा राजा के पुण्यकर्मों के समस्त फल राजा को प्रदान कर दिए।

राजा ने कहा- ‘मेरे हाथों में संकल्प-जल है। इस जल को साक्षी बनाकर मैं कहता हूं कि हम दोनों के पुण्यों का फल हम दोनों को एक समान प्राप्त हो।’

राजा की यह बात सुनकर विरूप और विकृत अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। उन्होंने कहा- ‘महाराज! हम काम और क्रोध हैं। हमने धर्म, काल, मृत्यु और यम के साथ मिलकर आप दोनों की परीक्षा ली थी। आप दोनों ही अत्यंत धर्मनिष्ठ हैं अतः आप दोनों को एक समान लोक प्राप्त होंगे।’

इसके बाद वह ब्राह्मण-कुमार तथा राजा इक्ष्वाकु अपने मनों को जीतकर तथा दृष्टि को एकाग्र करके समाधि में स्थित हो गए। कुछ काल बीत जाने पर एक ज्योति ब्राह्मण-पुत्र के ब्रह्मरंध्र का भेदन करके निकली और स्वर्ग की ओर बढ़ी। भगवान ब्रह्मा ने उस ज्योति का स्वागत किया। वह तेजपुंज ब्रह्माजी के मुखारविंद में प्रविष्ट हो गया। उसके पीछे-पीछे उसी प्रकार राजा ने भी ब्रह्माजी के मुखारविंद में प्रवेश किया।

महाराज इक्ष्वाकु के कुल में अनेक महान राजा हुए। उसका वंशज अम्बरीष सम्पूर्ण धरती का पहला चक्रवर्ती सम्राट हुआ। उसका वंशज पृथु इतना प्रतापी राजा हुआ कि उसके नाम पर धरती को पृथ्वी कहा जाने लगा। इसी कुल में राजा मान्धाता हुआ जिसने 100 राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञ किए। मान्धाता को लवणासुर ने धोखे से मारा था।

इस कुल में अनरयण्य नाम के दो राजा हुए। इनमें से दूसरे अनरण्य को लंकापति रावण ने धोखे से मारा था। राजा त्रिशंकु और राजा नहुष भी इसी वंश में हुए। पौराणिक साहित्य का प्रसिद्ध राजा सगर भी इसी कुल में हुआ जिसके साठ हजार पुत्रों को तारने के लिए उसका वंशज भगीरथ स्वर्ग से गंगाजी को धरती पर लेकर आया था। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र भी इसी कुल का विख्यात राजा हुआ।

आगे चलकर इक्ष्वाकु कुल में राजा दिलीप, रघु, अज तथा दशरथ ने जन्म लिया। राजा रघु वचन-पालन के लिए इतने प्रसिद्ध हुए कि इस वंश को रघुवंश कहा जाने लगा। राजा दशरथ ने देवासुर संग्राम में भाग लेकर देवताओं को विजय दिलवाई। देवराज-इन्द्र अयोध्या नरेश दशरथ के लिए अपना आधा सिंहासन छोड़ता था। इन्हीं राजा दशरथ के पुत्र कौसल्या नंदन राम हुए जिन्होंने लंकापति रावण को मारकर अपने पूर्वज अनरण्य की हत्या का बदला लिया था।

दशरथ नंदन शत्रुघ्नजी ने लवणासुर को मारकर अपने पूर्वज मान्धाता की हत्या का बदला लिया था। इक्ष्वाकु राजाओं की परम्परा भारत में तब तक चलती रही जब तक कि भारत सरकार ने देशी राज्यों को भारत में अंतिम रूप से सम्मिलित नहीं कर लिया। आजादी के समय भी भारतवर्ष में ऐसे अनेक राज्य अस्तित्व में थे जिनके राजा अपनी वंश परम्परा को सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश अथवा रघुवंश से मानते थे। मेवाड़ के गुहिल तथा जयपुर के कच्छवाहे भी स्वयं को इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न मानते हैं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका (2)

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सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका

राजा अम्बरीष न्यायप्रिय राजा होने के साथ-साथ भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। जब महर्षि दुर्वासा ने राजा अम्बरीष को श्राप देना चाहा तो सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका।

राजा अम्बरीष पौराणिक धर्म साहित्य के अत्यंत लोकप्रिय पात्र हैं। वे वैवस्वत मनु के प्रपौत्र, ईक्ष्वाकु के पौत्र और राजा नाभाग के पुत्र थे। राजा अम्बरीष की कथा रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में कदाचित् अंतरों के साथ मिलती है। मान्यता है कि राजा अम्बरीष ने दस हजार राजाओं को पराजित करके अपार ख्याति अर्जित की थी। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और अपना अधिकांश समय धार्मिक अनुष्ठानों में व्यय करते थे।

कुछ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार महाराज अम्बरीष सप्तद्वीपवती सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी थे और उनकी सम्पत्ति कभी समाप्त होने वाली नहीं थी। उनके ऐश्वर्य की संसार में कोई तुलना नहीं थी। इतना ऐश्वर्य होने पर भी महाराज अम्बरीष को अपना ऐश्वर्य स्वप्न के समान असत्य जान पड़ता था। इस कारण राजा अम्बरीष ने अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा की भक्ति में लगाया।

भगवान के भक्त होने के साथ-साथ वे एक न्यायप्रिय राजा थे। उन्होंने निष्काम भाव से अनेक यज्ञों का आयोजन किया। इन यज्ञों में उन्होंने विविध वस्तुओं का प्रचुर दान किया और अनन्त पुण्य-धर्म किये। उन्हें स्वर्गप्राप्ति की अभिलाषा नहीं था, उनका चित्त तो सदा भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में ही लगा रहता था।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

महाराज अम्बरीष के प्रजाजन एवं राजकीय कर्मचारी भी अत्यंत धर्मनिष्ठ थे और अपना समय भगवान के पावन चरित्र सुनने में व्यतीत करते थे। भक्तवत्सल भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को राजा अम्बरीष तथा उनके राज्य की रक्षा में नियुक्त कर दिया। सुदर्शन चक्र राजा अम्बरीष के द्वार पर रहकर राजा तथा उनके राज्य की रक्षा करने लगा।

एक बार राजा अम्बरीष ने अपनी रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए एक वर्ष तक समस्त एकादशियों के व्रत करने का संकल्प किया। वर्ष पूरा होने पर राजा ने धूमधाम से भगवान की पूजा की तथा ब्राह्मणों को गऊ दान किया। समस्त धर्म कार्यों को निष्पादित करके जब राजा अम्बरीष अपनी रानी सहित व्रत खोलने के लिए उद्यत हुए। तभी महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों सहित राजा अम्बरीष के महल में पधारे।

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राजा ने दुर्वासा का सत्कार किया और उनसे भोजन करने की प्रार्थना की। दुर्वासा ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और स्नान करने यमुना तट पर चले गये। द्वादशी में केवल एक घड़ी शेष थी। द्वादशी में पारण न करने से व्रत भंग होता। उधर दुर्वासा ऋषि कब आयेंगे इसका पता नहीं था। अतिथि से पहले भोजन करना अनुचित था किंतु ब्राह्मणों से व्यवस्था लेकर राजा ने भगवान के चरणोदक को लेकर व्रत खोल लिया और भोजन के लिए ऋषि दुर्वासा की प्रतीक्षा करने लगे। महर्षि दुर्वासा ने स्नान करके लौटते ही तपोबल से राजा के व्रत खोलने की बात जान ली। वे अत्यन्त क्रोधित होकर बोले कि मेरे भोजन करने से पहले ही तुमने व्रत क्यों खोला! ऋषि ने अपने मस्तक से एक जटा उखाड़ ली और उसे जोर से पृथ्वी पर पटक दिया। उस केश से कालाग्नि के समान ‘कृत्या’ नामक भयानक राक्षसी उत्पन्न हुई। वह तलवार लेकर राजा को मारने दौड़ी। राजा जहाँ के तहाँ स्थिर खड़े रहे। उन्हें तनिक भी भय नहीं लगा। भगवान का सुदर्शन चक्र भगवान की आज्ञा से राजा की रक्षा में नियुक्त था। उसने पलक झपकते ही कृत्या को मार दिया और दुर्वासा की ओर दौड़ा। ज्वालामय विकराल चक्र को अपनी ओर आते देखकर दुर्वासा ऋषि प्राण लेकर भागे। वे दसों दिशाओं में, पर्वतों और गुफाओं में, समुद्रों और वनों में, जहाँ-तहाँ भागते रहे किंतु चक्र उनके पीछे लगा रहा।

इस पर ऋषि ने आकाश से लेकर पाताल तक की दौड़ लगाई। इन्द्र आदि लोकपाल तो उन्हें क्या शरण देते, स्वयं प्रजापति ब्रह्मा और भगवान शंकर ने भी ऋषि को अभय नहीं दिया।

शिवजी ने दुर्वासा को परामर्श दिया- ‘आपभगवान श्री हरि विष्णु की शरण में जाएं।’

अन्त में दुर्वासा वैकुण्ठ गए और भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े। दुर्वासा ने कहा- ‘प्रभो! आपका नाम लेने से नारकीय जीव नरक से छूट जाते हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें।’

भगवान ने कहा- ‘महर्षि ! मैं तो भक्तों के अधीन हूँ। आपने एक भक्त के प्रति अपराध किया है। अतः आप राजा अम्बरीष के पास जाएं। वहीं आपको शान्ति मिलेगी।’

इधर राजा अम्बरीष बहुत चिन्त्ति थे। वे सोचते थे कि मेरे ही कारण दुर्वासा ऋषि को मृत्यु-भय से ग्रस्त होकर भूखे ही भाग जाना पड़ा है। अतः मैं ऋषि को भोजन कराए बिना स्वयं कैसे भोजन कर सकता हूँ! अतः राजा अम्बरीष केवल जल पीकर, ऋषि के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। एक वर्ष बाद दुर्वासा ऋषि जैसे भागे थे, वैसे ही भयभीत दौड़ते हुए आए और उन्होंने राजा के पैर पकड़ लिए। राजा ने सुदर्शन चक्र से प्रार्थना की कि वह शांत हो जाए। इस पर सुदर्शन शांत हो गया। 

दुर्वासा को महाकष्ट से छुटकारा मिला और उन्होंने राजा से अपने अपराध के लिए क्षमा याचना करते हुए कहा- ‘मैंने भगवान के भक्तों का महत्व देख लिया। राजन! मैंने आपका  इतना अपराध किया परन्तु आप मेरा कल्याण ही चाहते रहे। आप बड़े दयालु हैं।’

राजा अम्बरीष ने महर्षि के चरणों में प्रणाम करके उन्हें आदर सहित भोजन करवाया। महर्षि के चले जाने के बाद ही राजा ने भोजन किया। जब राजा अम्बरीष को राज्य करते हुए बहुत काल बीत गया तो उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं तप करने के लिए वन में चले गए। वहाँ भगवद्-भजन तथा जप-तप करते हुए राजा अम्बरीष ने परमपद प्राप्त किया।

राजा अम्बरीष के सम्बन्ध में पुराणों में कुछ और कथाएं भी मिलती हैं। एक कथा के अनुसार राजा अम्बरीष की पुत्री ‘सुंदरी’ सर्वगुण-सम्पन्न राजकन्या थी। एक बार महर्षि नारद और महर्षि पर्वत दोनों ही उस राजकन्या पर मोहित हो गए। वे दोनों ही भगवान के बड़े भक्त थे। अतः वे दोनों ही भगवान श्री हरि विष्णु के पास गए और दोनों ने भगवान से वरदान मांगा कि उसके प्रतिद्वंद्वी का मुंह बंदर जैसा हो जाए।

इस पर भगवान विष्णु ने दोनों को वानरमुखी बना दिया। जब ये दोनों ऋषि ‘राजकन्या सुन्दरी’ के पास गए तो सुंदरी उन्हें देखकर भयभीत हो गई। सुंदरी ने देखा कि उन दोनों के बीच में भगवान श्री हरि विष्णु स्वयं विराजमान हैं। अतः सुंदरी ने वरमाला भगवान श्री हरि के गले में डाल दी।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार राजा अम्बरीष के यज्ञ-पशु को इन्द्र ने चुरा लिया। इस पर ब्राह्मणों ने परामर्श दिया कि इस दोष का निवारण मानव बलि से हो सकता है। राजा ने ऋषि ऋचीक को बहुत-सा धन देकर उनके पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु के रूप में क्रय किया। अन्त में विश्वामित्र की सहायता से शुनःशेप के प्राणों की रक्षा हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शुनःशेप की बलि (4)

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महर्षि विश्वामित्र के मंत्र से शुनःशेप बलि चढ़ने से बच गया! अंबरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि वह शुनःशेप की बलि न ले किंतु वरुण अपने हठ पर दृढ़ रहा। महर्षि विश्वामित्र ने उसे बलि चढ़ने से बचा लिया ?

शुनःशेप का आख्यान ऋग्वेद, ऐतरेय ब्राह्मण, वाल्मीकि रामायण, ब्रह्मपुराण तथा महाभारत आदि ग्रंथों में कुछ अंतर के साथ प्राप्त होता है। इस आख्यान के अनुसार जब देवताओं को सोम मिलना बंद हो गया तब समस्त देवता क्षीण हो गये।

इस समय धरती पर सतयुग चल रहा था और इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न अम्बरीष नामक धर्मात्मा एवं प्रतापी राजा राज्य करता था। उसे पुराणों में इक्ष्वाकु अम्बरीष भी कहा गया है। उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने कठोर तपस्या करके देवताओं को प्रसन्न किया किंतु सोम न मिलने के कारण निर्बल हो चुके देवता राजा अम्बरीष को पुत्र नहीं दे सके। इस पर महर्षि वशिष्ठ ने अम्बरीष को सलाह दी कि वह पुत्र प्राप्ति के लिये वरुण की उपासना करे।

अम्बरीष के आह्वान पर वरुण प्रकट हुआ। राजा अंबरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि कि वह अम्बरीष को एक पुत्र प्रदान करे। इस पर वरुण ने राजा अम्बरीष को पुत्र प्राप्ति के लिए एक अनुष्ठान करने की सलाह दी किंतु वरुण ने राजा के समक्ष यह शर्त भी रखी कि जब राजा को पुत्र प्राप्त हो जाए तो राजा अपने उस पुत्र को बलिभाग के रूप में वरुण को सौंप दे। पुत्र का मुँह देखने के लोभ में राजा अंबरीष ने वरुण की यह शर्त स्वीकार कर ली।

दर्शकों की सुविधा के लिए यह बता देना समीचीन होगा कि वैदिक ग्रंथों में वरुण को मूलतः असुर के रूप में दर्शाया गया है किंतु बाद में वह देवताओं का मित्र बनकर स्वयं भी देवता बन गया था।

जब वरुण को ज्ञात हुआ कि राजा अम्बरीष की रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया है तो वह पहले से तय शर्त के अनुसार बलिभाग लेने के लिये राजा के समक्ष उपस्थित हुआ।

अम्बरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि वह अंबरीष के पुत्र की बलि न ले किंतु वरुण अपने हठ पर दृढ़ रहा। उसने बार-बार अंबरीष से बलिभाग की मांग की किंतु राजा अम्बरीष किसी न किसी उपाय से वरुण को बार-बार टालता रहा।

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जब अम्बरीष का पुत्र रोहित सोलह वर्ष का हो गया तब वरुण ने एक बार फिर अम्बरीष के समक्ष प्रकट होकर बलिभाग मांगा किंतु राजा ने अपना पुत्र वरुण को सौंपने से मना कर दिया । इस पर राजा अम्बरीष और वरुण में झगड़ा हो गया। राजकुमार रोहित ने वरुण को अपने पिता अम्बरीष से झगड़ा करते हुए सुन लिया। रोहित ने अपने पिता से कहा कि वह एक यज्ञ करना चाहता है जिसमें वरुण को यज्ञ-पशु बनाकर विष्णु को बलिभाग देगा। इस पर तो वरुण और भी क्रुद्ध हो गया।

वरुण के कोप से बचने के लिये राजा अम्बरीष ने राजकुमार रोहित को गहन वन प्रांतर में छिपा दिया। वहाँ रोहित की भेंट ऋषि अजीगर्त तथा उसके परिवार से हुई। ऋषि परिवार को आश्चर्य हुआ कि किस कारण से अल्पवयस् आर्य राजकुमार वन प्रांतर में आ छिपा है। रोहित ने आद्योपरांत समस्त विवरण ऋषि परिवार को सुनाया जिसे सुनकर ऋषि परिवार को रोहित पर दया आई और उन्होंने रोहित के स्थान पर अपना एक पुत्र वरुण को देने का निश्चय किया।

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ऋषि अजीगर्त के तीन पुत्र थे- शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल। ऋषि परिवार में इस बात पर विचार-विमर्श हुआ कि कौनसा पुत्र वरुण को दिया जाए। ऋषि पत्नी ने कहा कि छोटा पुत्र मुझे प्राणों से प्रिय है, ऋषि बोले कि बड़ा पुत्र मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। मंझला पुत्र शुनःशेप रोहित की ही वयस् का था। उसने अपने पिता अजीगर्त से अनुरोध किया कि मैं राजपुत्र रोहित के स्थान पर यज्ञबलि बनकर वरुण को संतुष्ट करूंगा! अपने पुत्र का यह आग्रह सुनकर ऋषि अजीगर्त ने राजकुमार रोहित के प्राणों की रक्षा के लिये अपने पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनने की अनुमति दे दी। ऋषि-पुत्र शुनःशेप ने वरुण का आह्वान किया तथा उससे प्रार्थना की कि वह रोहित के स्थान पर मेरी बलि ले क्योंकि रोहित अपने पिता का एक ही पुत्र है जबकि मेरे दो भाई और भी हैं। बलिभाग न मिलने से क्षीण हो चुके वरुण ने शुनःशेप का अनुरोध स्वीकार कर लिया। राजकुमार रोहित ऋषि-पुत्र शुनःशेप को लेकर अपने पिता अंबरीष के पास आया और कहने लगा कि ऋषिकुमार शुनःशेप मेरे स्थान पर यज्ञ-पशु बनने को तैयार है किंतु राजा अंबरीष ने ऋषिकुमार शुनःशेप का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तथा कहा कि यह अन्याय है। इससे कहीं अधिक श्रेयस्कर तो यह है कि मैं अपने ही पुत्र की बलि देकर वरुण को संतुष्ट करूं।

इस पर ऋत्विज विश्वामित्र, जमदाग्नि, वसिष्ठ तथा अयास्य ने राजा अंबरीष को समझाया कि वह चिंतित न हो, अग्नि की कृपा से कोई न कोई हल निकल आएगा और बिना नरबलि के ही यज्ञ संपन्न होगा। अतः यज्ञ आरंभ किया जाये। राजा ने यज्ञ करने की अनुमति दे दी। इक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ यज्ञ के ‘होता’ बने। विश्वामित्र, जमदाग्नि और अयास्य आदि ऋत्विज मंत्रोच्चार के साथ आहुतियाँ देने लगे।

इक्ष्वाकु अंबरीष ने शुनःशेप के बदले, सौ गौएं ऋषि अजीगर्त को अर्पित कीं। शुनःशेप को बलियूप से बांध दिया गया। यज्ञ की अग्नि को बढ़ते हुए देखकर लाल वस्त्रों से बंधा शुनःशेप कातर हो उठा और अपने प्राण बचाने की गुहार लगाने लगा किंतु बलिभाग के लिए आतुर वरुण को शुनःशेप पर करुणा नहीं आई।

जब अग्नि की प्रबल लपटों के बीच ‘अभिषेचनीय एकाह सोमयाग’ में नर-पशु का आलंभन करने का समय आया तो कोई भी ऋषि अपने हाथों से शुनःशेप की बलि देने को तैयार नहीं हुआ। इस पर राजकुमार रोहित के कल्याणार्थ ऋषि अजीगर्त स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र का आलंभन अर्थात् बलि करने के लिये खड़े हुए। आत्मग्लानि से भरे राजा अंबरीष ने ऋषि अजीगर्त को सौ गौएं और प्रदान कीं। जन्मदाता पिता को ही पुत्र की मृत्यु का आह्वान करते देख शुनःशेप चीत्कार करने लगा।

शुनःशेप को चीत्कार करते हुए देखकर विश्वामित्र ने अपने पुत्र मधुच्छंदा को आज्ञा दी कि शुनःशेप के स्थान पर वह यज्ञ-पशु बन जाये। मधुच्छंदा ने यज्ञ-पशु बनने से मना दिया दिया इस पर विश्वामित्र ने अपने अन्य पुत्रों का आह्वान किया किंतु कोई भी ऋषि-पुत्र अपने प्राण देने पर सहमत नहीं हुआ। इस पर क्रुद्ध विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को श्राप दिया है कि वे भी वसिष्ठ के पुत्रों की तरह चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खाएं।

विश्वामित्र, वसिष्ठ, जमदाग्नि तथा अयास्य आदि समस्त ऋत्विज करुणा से विगलित होकर प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण तथा इंद्र से शुनःशेप के प्राणों की रक्षा करने के लिये प्रार्थना करने लगे। ऋषि विश्वामित्र के आदेश से स्वयं शुनःशेप भी प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण, विश्वदेव, उषा, इंद्र तथा अश्विनीकुमारों की बार-बार स्तुति करने लगा।           

शुनःशेप के आह्वान पर अग्नि आदि नौ देव एक साथ प्रकट हुए। अग्नि ने शुनःशेप को ओज प्रदान किया। इन्द्र ने शुनःशेप को हिरण्यमय रथ दिया। इस प्रकार समस्त देवों ने शुनःशेप को कुछ न कुछ दिव्य गुण एवं वस्तुएं प्रदान कीं। समस्त देवों को शुनःशेप पर द्रवित हुआ देखकर वरुण का आसुरि भाव भी नष्ट हो गया। उसने शुनःशेप को दीर्घायु होने का वरदान देकर उसे बलि-यूप से मुक्त कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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