राजा जनमेजय ने कहा, इन्द्र को भी सांपों के साथ घसीट लो
आस्तीक द्वारा की गई यज्ञ की स्तुति को सुनकर राजा जनमेजय ने आस्तीक ऋषि को यज्ञशाला के भीतर बुलवाया। आस्तीक ऋषि ने यज्ञशाला में पहुंचकर वहाँ बैठे हुए यजमान, ऋत्विज्, सभासद् तथा अग्नि की स्तुति की जिसे सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग प्रसन्न हो गए।
पिछली कथा में हमने तक्षक द्वारा चंद्रवंशी राजा परीक्षित को विष से जलाने एवं परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय द्वारा सर्पयज्ञ का आयोजन करने की कथा की चर्चा की थी। ऋषियों द्वारा काले कपड़े पहनकर किए गए इस यज्ञ में संसार भर के सर्प आ-आकर भस्म हो गए थे किंतु वासकि एवं तक्षक जैसे बड़े सांप अब भी जनमेजय के यज्ञकुण्ड की पहुंच से दूर थे।
जब यज्ञ की आंच नागराज वासुकी तक पहुंची तो उसने अपनी बहिन जरत्कारू से कहा- ‘बहिन मेरा अंग-अंग जल रहा है। दिशाएं नहीं सूझतीं। चक्कर आने के कारण बेहोश सा हो रहा हूँ। दुनिया घूम रही है। कलेजा फटा जा रहा है। मुझे ऐसा दीख रहा है कि अब मैं भी विवश होकर धधकती आग में गिर जाउंगा। इस यज्ञ का यही उद्देश्य है। हमारी माता कदू्र ने हम सर्पों को आग में जलकर भस्म होने का श्राप दिया था। जिसके कारण हम भस्म हो रहे हैं किंतु मैंने इसी संकट से बचने के लिए तुम्हारा विवाह जरत्कारू नामक ब्राह्मण से किया था। तुम्हारा पुत्र आस्तीक सर्पयज्ञ को बंद करवा सकता है। अतः अब तुम हमारी रक्षा करो।’
इस पर जरत्कारू ने अपने पुत्र आस्तीक को बुलाकर कहा कि वह अपने मामा के कुल की रक्षा करे। इस पर आस्तीक ऋषि जो कि अभी बालक ही था, अपने मामा को उनकी सुरक्षा करने का वचन देकर राजा जनमेजय की यज्ञशाला में पहुंचा। बालक आस्तीक को यज्ञशाला के बाहर ही रोक दिया गया।
इस पर आस्तीक ने उच्च स्वर में यज्ञ की स्तुति करनी आरम्भ की। इस स्तुति को सुनकर राजा जनमेजय ने आस्तीक ऋषि को यज्ञशाला के भीतर बुलवाया। आस्तीक ऋषि ने यज्ञशाला में पहुंचकर वहाँ बैठे हुए यजमान, ऋत्विज्, सभासद् तथा अग्नि की स्तुति की जिसे सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग प्रसन्न हो गए।
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राजा जनमेजय ने बालक रूपी आस्तीक ऋषि से कहा- ‘हे ब्राह्मण-पुत्र! आप अपनी मनवांछित वस्तु मांगें।’
इसी समय इन्द्र का सिंहासन भी यज्ञकुण्ड की तरफ खिंचने लगा जिससे भयभीत होकर इंद्र ने तक्षक को छोड़ दिया। इन्द्र के जाते ही तक्षक बेहोश हो गया तथा तेजी से अग्नि कुण्ड की तरफ खिंचने लगा।
इस पर बालक रूपी आस्तीक ऋषि ने तक्षक की तरफ हाथ उठाकर कहा- ‘ठहर जा! ठहर जा! ठहर जा!’ इस पर तक्षक आकाश में ही लटक गया।
आस्तीक ऋषि ने राजा जनमेजय से कहा- ‘यदि आप मुझे मेरी मनवांछित वस्तु देना चाहते हैं तो आप इस यज्ञ को इसी समय रोक दीजिए तथा यज्ञकुण्ड की ओर आते हुए नागों एवं सर्पों को अभयदान दीजिए।’
राजा ने देखा कि तक्षक अब भी यज्ञकुण्ड से कुछ दूरी पर रह गया था इसलिए राजा ने रुष्ट होकर कहा- ‘हे ब्राह्मण! तुम्हें सोना, चांदी, गौ एवं भूमि आदि मांगने चाहिए थे। मैं चाहता हूँ कि यह यज्ञ बंद न हो।’
इस पर आस्तीक ने कहा- ‘राजन् मैं चाहता हूँ कि मेरा मातुल कुल नष्ट न हो। अतः आप मुझे यही वर दीजिए।’
इस पर राजा और ऋषि के बीच वाद-विवाद होने लगा। उनके विवाद को सुनकर यज्ञ में बैठे ऋषियों ने राजा से कहा- ‘राजन् आप वचन-बद्ध हो चुके हैं, अतः आप इस बालक को उसका मुंहमांगा वर दीजिए।’
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राजा ने सिर झुका कर ऋत्विजों, सभासदों एवं ब्राह्मणों की बात मान ली। सूतजी ने यज्ञ पूर्ण होने की घोषणा की तथा राजा ने सभी उपस्थित लोगों को बहुत सारा दान एवं सम्मान देकर विदा किया। इस प्रकार तक्षक और वासुकी यज्ञकुण्ड की अग्नि में भस्म होने से बच गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि महाभारत काल में भारत में तक्षक जाति निवास करती थी। कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि तक्षक अथवा नाग अनार्य थे और संभवतः शक थे। इनका जातीय चिह्न सर्प था। तिब्बत, मंगोलिया, और चीन के कुछ निवासी भी स्वयं को तक्षक नागों के वंशज कहते हैं। जब श्रीकृष्ण तथा अर्जुन ने खाण्डव वन का दहन करके नागों का नाश किया था तब से ही नागों ने पाण्डुपुत्रों से शत्रुता बांध ली थी। यही कारण था कि महाराज युधिष्ठिर एवं अर्जुन आदि की मृत्यु के बाद नागों ने राजा परीक्षित पर आक्रमण करके उसे मार डाला था। जब जनमेजय राजा हुआ तो उसने नागों की राजधानी तक्षशिला पर आक्रमण करके तक्षक नागों का विनाश किया था। संभवतः तक्षकों के राजा तक्षक एवं वासुकी इस युद्ध में जीवित बच गए थे और राजा जनमेजय ने उन्हें प्राणदान दिया था।
यही घटना जनमेजय के सर्पयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध हुई होगी! यद्यपि चंद्रवंशी राजाओं की शृंखला हजारों वर्षों तक चलती रही तथापि अब उनकी कथाएं दैविक शक्तियों के चमत्कारों से मुक्त हो चुकी थीं। अतः इस कथा के साथ ही चंद्रवंशी राजाओं की कथाओं के क्रम को हम विराम देते हैं।
जब राजा इक्ष्वाकु ने पुण्यों का फल महर्षि दधीचि के पौत्र को वापस लौटाना चाहा तो महर्षि दधीचि के पौत्र ने एक बार दी गई वस्तु वापस लेने से मना कर दिया!
‘धर्म’ का शाब्दिक अर्थ है- धारण करना। जो मनुष्य उत्तम विचार, उत्तम दर्शन और उत्तम आचरण को धारण करता है, वह मनुष्य धर्म से सम्पन्न है। संसार भर में मनुष्य मात्र का धर्म एक ही है। सभी मनुष्य एक ही धर्म से संचालित होते हैं किंतु सांसारिक स्तर पर धर्म के अगल-अलग नाम और स्वरूप दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये नाम और स्वरूप, धर्म के नहीं, सम्प्रदायों के हैं। धर्म तो एक ही है। यही कारण है कि भारत के लोग प्रायः यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि ‘हिन्दू धर्म’ कोई धर्म नहीं है, यह तो जीवन-शैली है।
इस कथा से हम वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु तथा उसके वंशज राजाओं की कथाओं की चर्चा करेंगे। महाराज वैवस्वत-मनु के के दस पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम इक्ष्वाकु था। बहुत से ग्रंथों में इसी इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश आरम्भ होना माना जाता है। जबकि कुछ ग्रंथों में इक्ष्वाकु को मनु की आठवीं पीढ़ी का वंशज बताया गया है। यह संभव है कि इस वंश में इक्ष्वाकु नाम के दो राजा हुए हों जिनमें से पहला इक्ष्वाकु महाराज मनु का पुत्र था और दूसरा इक्ष्वाकु मनु की आठवीं पीढ़ी का वंशज था।
मनु के पिता सूर्य के नाम पर मनु के वंशजों को सूर्यवंशी कहते थे। मनु के वंशज कई हजार सालों की अवधि में हिमालय के तराई क्षेत्र से होते हुए मध्य भारत और दक्षिण भारत तक की भूमि पर फैल गए। मनु के वंशजों ने स्वयं को आर्य कहा और उन्होंने भारत की विशाल भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं दक्षिणापथ आदि भागों में विभक्त किया।
ऋग्वेद में इक्ष्वाकु शब्द का उल्लेख केवल एक बार हुआ है। कुछ विद्वानों के अनुसार इक्ष्वाकु किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं था अपितु यह आर्यों का एक समूह था। उनके वंशज उत्तरी भागीरथी घाटी में बसते थे। कुछ ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकु के वंशजों का सम्बन्ध उत्तर-पश्चिम के जनपदों से भी था।
बहुत से पुराणों की मान्यता है कि मनु के महान पुत्र इक्ष्वाकु के नाम पर सूर्यवंश को इक्ष्वाकु वंश कहा गया। कुछ पौराणिक कथाएं राजा इक्ष्वाकु को अमैथुनी सृष्टि द्वारा मनु की छींक से उत्पन्न बताती हैं। इसीलिए इनका नाम इक्ष्वाकु पड़ा।
ईक्ष्वाकु को सूर्यवंशी राजाओं में पहला राजा माना जाता है। इक्ष्वाकु ने कोसल नामक राज्य की स्थापना की तथा अपनी राजधानी अयोध्या बसाई। राजा ईक्ष्वाकु के 100 पुत्र हुए। इनमें से पचास पुत्रों ने उत्तरापथ में और पचास पुत्रों ने दक्षिणापथ में राज्य किया। इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र का नाम विकुक्षि था। इक्ष्वाकु के दूसरे पुत्र निमि ने मिथिला का राजकुल स्थापित किया।
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राजा ईक्ष्वाकु के सम्बन्ध में एक कथा इस प्रकार मिलती है-
महर्षि दधीचि का पुत्र पिप्पलाद घोर तपस्वी था। उसने पीपल के पत्ते खाकर जीवन यापन किया था। अथर्ववेद का प्रथम संकलन पिप्पलाद ऋषि ने ही तैयार किया था। महर्षि पिप्पलाद का पुत्र भी वेदों का परम ज्ञाता हुआ। उसके जप से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उसे, अन्य ब्राह्मणों से ऊपर, शुद्ध ब्रह्मपद प्राप्त करने का वर दिया और उससे कहा कि समय आने पर यम, मृत्यु तथा काल भी उसके समक्ष उपस्थित होकर उससे धर्मानुकूल विचार-विमर्श करेंगे।
सावित्री के वरदान के अनुसार एक दिन धर्म ने पिप्पलाद के पुत्र के समक्ष प्रकट होकर उससे कहा कि वह शरीर त्याग कर पुण्य लोक प्राप्त करे।
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ब्राह्मण-पुत्र उस शरीर का त्याग नहीं करना चाहता था जिस शरीर से उसने दीर्घकाल तक तपस्या की थी किंतु यम, मृत्यु तथा काल भी पिप्पलाद के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने ब्राह्मण-पुत्र से कहा कि उसके पुण्यों का फल प्राप्त होने का समय आ गया है। अतः वह अपनी इच्छानुसार कोई भी लोक चुन ले किंतु पिप्पलाद का पुत्र कोई भी लोक ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हुआ। वह इसी लोक में और इसी शरीर में रहना चाहता था जिसमें उसने भगवान श्री हरि विष्णु की तपस्या की थी। तभी राजा इक्ष्वाकु तीर्थाटन करते हुए वहाँ आ पहुंचे। ब्राह्मण-पुत्र ने उनका भी समुचित सत्कार किया तथा उनकी इच्छा जाननी चाही। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण से कहा कि हम आपको विपुल धन-धान्य एवं अमूल्य रत्न देना चाहते हैं। ब्राह्मण-पुत्र ने धन-धान्य तथा रत्न आदि लेने से मना कर दिया और राजा से कहा कि आप ही मुझसे कुछ मांगें। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण-पुत्र की परीक्षा लेने के लिए कहा कि आपने सौ वर्ष तक जो घनघोर तपस्या की है उस तप का फल मुझे दे दें। ब्राह्मण-पुत्र ने उसी समय अपने तप का फल राजा को दे दिया। इस पर राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण पुत्र से पूछा- ‘आपके द्वारा किए गए तप का फल क्या है?’
ब्राह्मण-पुत्र ने उत्तर दिया- ‘मैं निष्काम तपस्वी हूं, अतः मेरे द्वारा किए गए तप का फल क्या है, यह मैं नहीं जानता।’
राजा बोला- ‘जिस फल का स्वरूप ज्ञात नहीं, ऐसा फल मैं नहीं लूंगा। अतः आप मेरे पुण्य-फलों सहित उसे पुनः ग्रहण करें।’
इस पर ब्राह्मण-पुत्र ने एक बार दे दी गई वस्तु वापस लेने से मना कर दिया। इससे राजा के समक्ष भारी संकट खड़ा हो गया क्योंकि क्षत्रिय होने के कारण राजा दान नहीं ले सकता था।
ब्राह्मण ने कहा- ‘इस विषय में आपको पहले सोचना चाहिए था। आपने मुझसे मेरे तप का फल मांगा, मैंने दे दिया।’
उसी समय विकृत और विरूप नामक दो भयानक व्यक्ति एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर वहाँ पहुंचे। वे दोनों राजा इक्ष्वाकु से न्याय करने का आग्रह करने लगे।
विरूप ने राजा को बताया- ‘पूर्व काल में विकृत ने एक गाय किसी ब्राह्मण को दान में दी थी। विरूप ने उस दान का फल विकृत से मांग लिया था। कालांतर में विरूप ने दो गाएं बछड़ों सहित ब्राह्मणों को दान दीं और विरूप को उस दान के कारण बड़ा फल प्राप्त हो गया। अतः विरूप, विकृत से लिया गया पुण्य-फल उसे वापस लौटा देना चाहता है किंतु विकृत उस दान का फल वापस लेने को तैयार नहीं है। वह कहता है कि उसने दान दिया था, ऋण नहीं दिया था।’
उन दोनों की बातें सुनकर राजा इक्ष्वाकु असमंजस में पड़ गया किंतु ब्राह्मण-पुत्र पिप्पलाद ने कहा- ‘विकृत ठीक कह रहा है, दान में दी गई वस्तु ऋण नहीं होती इसलिए उसे वापस नहीं लिया जाता। यदि तुम स्वयं ही मांगे हुए फल अब ग्रहण नहीं करोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगा।’
पिप्पलाद की बात सुनकर राजा इक्ष्वाकु चिंतातुर हो उठा क्योंकि जो विवाद विकृत और विरूप के बीच में हो रहा था, वही विवाद तो पिप्पलाद के पुत्र तथा राजा इक्ष्वाकु के बीच में भी चल रहा था। अतः राजा ने ब्राह्मण के श्राप से भयभीत होकर अपना हाथ पिप्पलाद के पुत्र के समक्ष पसार दिया। ब्राह्मण ने अपने तप तथा राजा के पुण्यकर्मों के समस्त फल राजा को प्रदान कर दिए।
राजा ने कहा- ‘मेरे हाथों में संकल्प-जल है। इस जल को साक्षी बनाकर मैं कहता हूं कि हम दोनों के पुण्यों का फल हम दोनों को एक समान प्राप्त हो।’
राजा की यह बात सुनकर विरूप और विकृत अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। उन्होंने कहा- ‘महाराज! हम काम और क्रोध हैं। हमने धर्म, काल, मृत्यु और यम के साथ मिलकर आप दोनों की परीक्षा ली थी। आप दोनों ही अत्यंत धर्मनिष्ठ हैं अतः आप दोनों को एक समान लोक प्राप्त होंगे।’
इसके बाद वह ब्राह्मण-कुमार तथा राजा इक्ष्वाकु अपने मनों को जीतकर तथा दृष्टि को एकाग्र करके समाधि में स्थित हो गए। कुछ काल बीत जाने पर एक ज्योति ब्राह्मण-पुत्र के ब्रह्मरंध्र का भेदन करके निकली और स्वर्ग की ओर बढ़ी। भगवान ब्रह्मा ने उस ज्योति का स्वागत किया। वह तेजपुंज ब्रह्माजी के मुखारविंद में प्रविष्ट हो गया। उसके पीछे-पीछे उसी प्रकार राजा ने भी ब्रह्माजी के मुखारविंद में प्रवेश किया।
महाराज इक्ष्वाकु के कुल में अनेक महान राजा हुए। उसका वंशज अम्बरीष सम्पूर्ण धरती का पहला चक्रवर्ती सम्राट हुआ। उसका वंशज पृथु इतना प्रतापी राजा हुआ कि उसके नाम पर धरती को पृथ्वी कहा जाने लगा। इसी कुल में राजा मान्धाता हुआ जिसने 100 राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञ किए। मान्धाता को लवणासुर ने धोखे से मारा था।
इस कुल में अनरयण्य नाम के दो राजा हुए। इनमें से दूसरे अनरण्य को लंकापति रावण ने धोखे से मारा था। राजा त्रिशंकु और राजा नहुष भी इसी वंश में हुए। पौराणिक साहित्य का प्रसिद्ध राजा सगर भी इसी कुल में हुआ जिसके साठ हजार पुत्रों को तारने के लिए उसका वंशज भगीरथ स्वर्ग से गंगाजी को धरती पर लेकर आया था। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र भी इसी कुल का विख्यात राजा हुआ।
आगे चलकर इक्ष्वाकु कुल में राजा दिलीप, रघु, अज तथा दशरथ ने जन्म लिया। राजा रघु वचन-पालन के लिए इतने प्रसिद्ध हुए कि इस वंश को रघुवंश कहा जाने लगा। राजा दशरथ ने देवासुर संग्राम में भाग लेकर देवताओं को विजय दिलवाई। देवराज-इन्द्र अयोध्या नरेश दशरथ के लिए अपना आधा सिंहासन छोड़ता था। इन्हीं राजा दशरथ के पुत्र कौसल्या नंदन राम हुए जिन्होंने लंकापति रावण को मारकर अपने पूर्वज अनरण्य की हत्या का बदला लिया था।
दशरथ नंदन शत्रुघ्नजी ने लवणासुर को मारकर अपने पूर्वज मान्धाता की हत्या का बदला लिया था। इक्ष्वाकु राजाओं की परम्परा भारत में तब तक चलती रही जब तक कि भारत सरकार ने देशी राज्यों को भारत में अंतिम रूप से सम्मिलित नहीं कर लिया। आजादी के समय भी भारतवर्ष में ऐसे अनेक राज्य अस्तित्व में थे जिनके राजा अपनी वंश परम्परा को सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश अथवा रघुवंश से मानते थे। मेवाड़ के गुहिल तथा जयपुर के कच्छवाहे भी स्वयं को इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न मानते हैं।
सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका
राजा अम्बरीष न्यायप्रिय राजा होने के साथ-साथ भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। जब महर्षि दुर्वासा ने राजा अम्बरीष को श्राप देना चाहा तो सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका।
राजा अम्बरीष पौराणिक धर्म साहित्य के अत्यंत लोकप्रिय पात्र हैं। वे वैवस्वत मनु के प्रपौत्र, ईक्ष्वाकु के पौत्र और राजा नाभाग के पुत्र थे। राजा अम्बरीष की कथा रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में कदाचित् अंतरों के साथ मिलती है। मान्यता है कि राजा अम्बरीष ने दस हजार राजाओं को पराजित करके अपार ख्याति अर्जित की थी। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और अपना अधिकांश समय धार्मिक अनुष्ठानों में व्यय करते थे।
कुछ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार महाराज अम्बरीष सप्तद्वीपवती सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी थे और उनकी सम्पत्ति कभी समाप्त होने वाली नहीं थी। उनके ऐश्वर्य की संसार में कोई तुलना नहीं थी। इतना ऐश्वर्य होने पर भी महाराज अम्बरीष को अपना ऐश्वर्य स्वप्न के समान असत्य जान पड़ता था। इस कारण राजा अम्बरीष ने अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा की भक्ति में लगाया।
भगवान के भक्त होने के साथ-साथ वे एक न्यायप्रिय राजा थे। उन्होंने निष्काम भाव से अनेक यज्ञों का आयोजन किया। इन यज्ञों में उन्होंने विविध वस्तुओं का प्रचुर दान किया और अनन्त पुण्य-धर्म किये। उन्हें स्वर्गप्राप्ति की अभिलाषा नहीं था, उनका चित्त तो सदा भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में ही लगा रहता था।
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महाराज अम्बरीष के प्रजाजन एवं राजकीय कर्मचारी भी अत्यंत धर्मनिष्ठ थे और अपना समय भगवान के पावन चरित्र सुनने में व्यतीत करते थे। भक्तवत्सल भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को राजा अम्बरीष तथा उनके राज्य की रक्षा में नियुक्त कर दिया। सुदर्शन चक्र राजा अम्बरीष के द्वार पर रहकर राजा तथा उनके राज्य की रक्षा करने लगा।
एक बार राजा अम्बरीष ने अपनी रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए एक वर्ष तक समस्त एकादशियों के व्रत करने का संकल्प किया। वर्ष पूरा होने पर राजा ने धूमधाम से भगवान की पूजा की तथा ब्राह्मणों को गऊ दान किया। समस्त धर्म कार्यों को निष्पादित करके जब राजा अम्बरीष अपनी रानी सहित व्रत खोलने के लिए उद्यत हुए। तभी महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों सहित राजा अम्बरीष के महल में पधारे।
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राजा ने दुर्वासा का सत्कार किया और उनसे भोजन करने की प्रार्थना की। दुर्वासा ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और स्नान करने यमुना तट पर चले गये। द्वादशी में केवल एक घड़ी शेष थी। द्वादशी में पारण न करने से व्रत भंग होता। उधर दुर्वासा ऋषि कब आयेंगे इसका पता नहीं था। अतिथि से पहले भोजन करना अनुचित था किंतु ब्राह्मणों से व्यवस्था लेकर राजा ने भगवान के चरणोदक को लेकर व्रत खोल लिया और भोजन के लिए ऋषि दुर्वासा की प्रतीक्षा करने लगे। महर्षि दुर्वासा ने स्नान करके लौटते ही तपोबल से राजा के व्रत खोलने की बात जान ली। वे अत्यन्त क्रोधित होकर बोले कि मेरे भोजन करने से पहले ही तुमने व्रत क्यों खोला! ऋषि ने अपने मस्तक से एक जटा उखाड़ ली और उसे जोर से पृथ्वी पर पटक दिया। उस केश से कालाग्नि के समान ‘कृत्या’ नामक भयानक राक्षसी उत्पन्न हुई। वह तलवार लेकर राजा को मारने दौड़ी। राजा जहाँ के तहाँ स्थिर खड़े रहे। उन्हें तनिक भी भय नहीं लगा। भगवान का सुदर्शन चक्र भगवान की आज्ञा से राजा की रक्षा में नियुक्त था। उसने पलक झपकते ही कृत्या को मार दिया और दुर्वासा की ओर दौड़ा। ज्वालामय विकराल चक्र को अपनी ओर आते देखकर दुर्वासा ऋषि प्राण लेकर भागे। वे दसों दिशाओं में, पर्वतों और गुफाओं में, समुद्रों और वनों में, जहाँ-तहाँ भागते रहे किंतु चक्र उनके पीछे लगा रहा।
इस पर ऋषि ने आकाश से लेकर पाताल तक की दौड़ लगाई। इन्द्र आदि लोकपाल तो उन्हें क्या शरण देते, स्वयं प्रजापति ब्रह्मा और भगवान शंकर ने भी ऋषि को अभय नहीं दिया।
शिवजी ने दुर्वासा को परामर्श दिया- ‘आपभगवान श्री हरि विष्णु की शरण में जाएं।’
अन्त में दुर्वासा वैकुण्ठ गए और भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े। दुर्वासा ने कहा- ‘प्रभो! आपका नाम लेने से नारकीय जीव नरक से छूट जाते हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें।’
भगवान ने कहा- ‘महर्षि ! मैं तो भक्तों के अधीन हूँ। आपने एक भक्त के प्रति अपराध किया है। अतः आप राजा अम्बरीष के पास जाएं। वहीं आपको शान्ति मिलेगी।’
इधर राजा अम्बरीष बहुत चिन्त्ति थे। वे सोचते थे कि मेरे ही कारण दुर्वासा ऋषि को मृत्यु-भय से ग्रस्त होकर भूखे ही भाग जाना पड़ा है। अतः मैं ऋषि को भोजन कराए बिना स्वयं कैसे भोजन कर सकता हूँ! अतः राजा अम्बरीष केवल जल पीकर, ऋषि के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। एक वर्ष बाद दुर्वासा ऋषि जैसे भागे थे, वैसे ही भयभीत दौड़ते हुए आए और उन्होंने राजा के पैर पकड़ लिए। राजा ने सुदर्शन चक्र से प्रार्थना की कि वह शांत हो जाए। इस पर सुदर्शन शांत हो गया।
दुर्वासा को महाकष्ट से छुटकारा मिला और उन्होंने राजा से अपने अपराध के लिए क्षमा याचना करते हुए कहा- ‘मैंने भगवान के भक्तों का महत्व देख लिया। राजन! मैंने आपका इतना अपराध किया परन्तु आप मेरा कल्याण ही चाहते रहे। आप बड़े दयालु हैं।’
राजा अम्बरीष ने महर्षि के चरणों में प्रणाम करके उन्हें आदर सहित भोजन करवाया। महर्षि के चले जाने के बाद ही राजा ने भोजन किया। जब राजा अम्बरीष को राज्य करते हुए बहुत काल बीत गया तो उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं तप करने के लिए वन में चले गए। वहाँ भगवद्-भजन तथा जप-तप करते हुए राजा अम्बरीष ने परमपद प्राप्त किया।
राजा अम्बरीष के सम्बन्ध में पुराणों में कुछ और कथाएं भी मिलती हैं। एक कथा के अनुसार राजा अम्बरीष की पुत्री ‘सुंदरी’ सर्वगुण-सम्पन्न राजकन्या थी। एक बार महर्षि नारद और महर्षि पर्वत दोनों ही उस राजकन्या पर मोहित हो गए। वे दोनों ही भगवान के बड़े भक्त थे। अतः वे दोनों ही भगवान श्री हरि विष्णु के पास गए और दोनों ने भगवान से वरदान मांगा कि उसके प्रतिद्वंद्वी का मुंह बंदर जैसा हो जाए।
इस पर भगवान विष्णु ने दोनों को वानरमुखी बना दिया। जब ये दोनों ऋषि ‘राजकन्या सुन्दरी’ के पास गए तो सुंदरी उन्हें देखकर भयभीत हो गई। सुंदरी ने देखा कि उन दोनों के बीच में भगवान श्री हरि विष्णु स्वयं विराजमान हैं। अतः सुंदरी ने वरमाला भगवान श्री हरि के गले में डाल दी।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार राजा अम्बरीष के यज्ञ-पशु को इन्द्र ने चुरा लिया। इस पर ब्राह्मणों ने परामर्श दिया कि इस दोष का निवारण मानव बलि से हो सकता है। राजा ने ऋषि ऋचीक को बहुत-सा धन देकर उनके पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु के रूप में क्रय किया। अन्त में विश्वामित्र की सहायता से शुनःशेप के प्राणों की रक्षा हुई।
महर्षि विश्वामित्र के मंत्र से शुनःशेप बलि चढ़ने से बच गया! अंबरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि वह शुनःशेप की बलि न ले किंतु वरुण अपने हठ पर दृढ़ रहा। महर्षि विश्वामित्र ने उसे बलि चढ़ने से बचा लिया ?
शुनःशेप का आख्यान ऋग्वेद, ऐतरेय ब्राह्मण, वाल्मीकि रामायण, ब्रह्मपुराण तथा महाभारत आदि ग्रंथों में कुछ अंतर के साथ प्राप्त होता है। इस आख्यान के अनुसार जब देवताओं को सोम मिलना बंद हो गया तब समस्त देवता क्षीण हो गये।
इस समय धरती पर सतयुग चल रहा था और इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न अम्बरीष नामक धर्मात्मा एवं प्रतापी राजा राज्य करता था। उसे पुराणों में इक्ष्वाकु अम्बरीष भी कहा गया है। उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने कठोर तपस्या करके देवताओं को प्रसन्न किया किंतु सोम न मिलने के कारण निर्बल हो चुके देवता राजा अम्बरीष को पुत्र नहीं दे सके। इस पर महर्षि वशिष्ठ ने अम्बरीष को सलाह दी कि वह पुत्र प्राप्ति के लिये वरुण की उपासना करे।
अम्बरीष के आह्वान पर वरुण प्रकट हुआ। राजा अंबरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि कि वह अम्बरीष को एक पुत्र प्रदान करे। इस पर वरुण ने राजा अम्बरीष को पुत्र प्राप्ति के लिए एक अनुष्ठान करने की सलाह दी किंतु वरुण ने राजा के समक्ष यह शर्त भी रखी कि जब राजा को पुत्र प्राप्त हो जाए तो राजा अपने उस पुत्र को बलिभाग के रूप में वरुण को सौंप दे। पुत्र का मुँह देखने के लोभ में राजा अंबरीष ने वरुण की यह शर्त स्वीकार कर ली।
दर्शकों की सुविधा के लिए यह बता देना समीचीन होगा कि वैदिक ग्रंथों में वरुण को मूलतः असुर के रूप में दर्शाया गया है किंतु बाद में वह देवताओं का मित्र बनकर स्वयं भी देवता बन गया था।
जब वरुण को ज्ञात हुआ कि राजा अम्बरीष की रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया है तो वह पहले से तय शर्त के अनुसार बलिभाग लेने के लिये राजा के समक्ष उपस्थित हुआ।
अम्बरीष ने वरुण से प्रार्थना की कि वह अंबरीष के पुत्र की बलि न ले किंतु वरुण अपने हठ पर दृढ़ रहा। उसने बार-बार अंबरीष से बलिभाग की मांग की किंतु राजा अम्बरीष किसी न किसी उपाय से वरुण को बार-बार टालता रहा।
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जब अम्बरीष का पुत्र रोहित सोलह वर्ष का हो गया तब वरुण ने एक बार फिर अम्बरीष के समक्ष प्रकट होकर बलिभाग मांगा किंतु राजा ने अपना पुत्र वरुण को सौंपने से मना कर दिया । इस पर राजा अम्बरीष और वरुण में झगड़ा हो गया। राजकुमार रोहित ने वरुण को अपने पिता अम्बरीष से झगड़ा करते हुए सुन लिया। रोहित ने अपने पिता से कहा कि वह एक यज्ञ करना चाहता है जिसमें वरुण को यज्ञ-पशु बनाकर विष्णु को बलिभाग देगा। इस पर तो वरुण और भी क्रुद्ध हो गया।
वरुण के कोप से बचने के लिये राजा अम्बरीष ने राजकुमार रोहित को गहन वन प्रांतर में छिपा दिया। वहाँ रोहित की भेंट ऋषि अजीगर्त तथा उसके परिवार से हुई। ऋषि परिवार को आश्चर्य हुआ कि किस कारण से अल्पवयस् आर्य राजकुमार वन प्रांतर में आ छिपा है। रोहित ने आद्योपरांत समस्त विवरण ऋषि परिवार को सुनाया जिसे सुनकर ऋषि परिवार को रोहित पर दया आई और उन्होंने रोहित के स्थान पर अपना एक पुत्र वरुण को देने का निश्चय किया।
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ऋषि अजीगर्त के तीन पुत्र थे- शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल। ऋषि परिवार में इस बात पर विचार-विमर्श हुआ कि कौनसा पुत्र वरुण को दिया जाए। ऋषि पत्नी ने कहा कि छोटा पुत्र मुझे प्राणों से प्रिय है, ऋषि बोले कि बड़ा पुत्र मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। मंझला पुत्र शुनःशेप रोहित की ही वयस् का था। उसने अपने पिता अजीगर्त से अनुरोध किया कि मैं राजपुत्र रोहित के स्थान पर यज्ञबलि बनकर वरुण को संतुष्ट करूंगा! अपने पुत्र का यह आग्रह सुनकर ऋषि अजीगर्त ने राजकुमार रोहित के प्राणों की रक्षा के लिये अपने पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनने की अनुमति दे दी। ऋषि-पुत्र शुनःशेप ने वरुण का आह्वान किया तथा उससे प्रार्थना की कि वह रोहित के स्थान पर मेरी बलि ले क्योंकि रोहित अपने पिता का एक ही पुत्र है जबकि मेरे दो भाई और भी हैं। बलिभाग न मिलने से क्षीण हो चुके वरुण ने शुनःशेप का अनुरोध स्वीकार कर लिया। राजकुमार रोहित ऋषि-पुत्र शुनःशेप को लेकर अपने पिता अंबरीष के पास आया और कहने लगा कि ऋषिकुमार शुनःशेप मेरे स्थान पर यज्ञ-पशु बनने को तैयार है किंतु राजा अंबरीष ने ऋषिकुमार शुनःशेप का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तथा कहा कि यह अन्याय है। इससे कहीं अधिक श्रेयस्कर तो यह है कि मैं अपने ही पुत्र की बलि देकर वरुण को संतुष्ट करूं।
इस पर ऋत्विज विश्वामित्र, जमदाग्नि, वसिष्ठ तथा अयास्य ने राजा अंबरीष को समझाया कि वह चिंतित न हो, अग्नि की कृपा से कोई न कोई हल निकल आएगा और बिना नरबलि के ही यज्ञ संपन्न होगा। अतः यज्ञ आरंभ किया जाये। राजा ने यज्ञ करने की अनुमति दे दी। इक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ यज्ञ के ‘होता’ बने। विश्वामित्र, जमदाग्नि और अयास्य आदि ऋत्विज मंत्रोच्चार के साथ आहुतियाँ देने लगे।
इक्ष्वाकु अंबरीष ने शुनःशेप के बदले, सौ गौएं ऋषि अजीगर्त को अर्पित कीं। शुनःशेप को बलियूप से बांध दिया गया। यज्ञ की अग्नि को बढ़ते हुए देखकर लाल वस्त्रों से बंधा शुनःशेप कातर हो उठा और अपने प्राण बचाने की गुहार लगाने लगा किंतु बलिभाग के लिए आतुर वरुण को शुनःशेप पर करुणा नहीं आई।
जब अग्नि की प्रबल लपटों के बीच ‘अभिषेचनीय एकाह सोमयाग’ में नर-पशु का आलंभन करने का समय आया तो कोई भी ऋषि अपने हाथों से शुनःशेप की बलि देने को तैयार नहीं हुआ। इस पर राजकुमार रोहित के कल्याणार्थ ऋषि अजीगर्त स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र का आलंभन अर्थात् बलि करने के लिये खड़े हुए। आत्मग्लानि से भरे राजा अंबरीष ने ऋषि अजीगर्त को सौ गौएं और प्रदान कीं। जन्मदाता पिता को ही पुत्र की मृत्यु का आह्वान करते देख शुनःशेप चीत्कार करने लगा।
शुनःशेप को चीत्कार करते हुए देखकर विश्वामित्र ने अपने पुत्र मधुच्छंदा को आज्ञा दी कि शुनःशेप के स्थान पर वह यज्ञ-पशु बन जाये। मधुच्छंदा ने यज्ञ-पशु बनने से मना दिया दिया इस पर विश्वामित्र ने अपने अन्य पुत्रों का आह्वान किया किंतु कोई भी ऋषि-पुत्र अपने प्राण देने पर सहमत नहीं हुआ। इस पर क्रुद्ध विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को श्राप दिया है कि वे भी वसिष्ठ के पुत्रों की तरह चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खाएं।
विश्वामित्र, वसिष्ठ, जमदाग्नि तथा अयास्य आदि समस्त ऋत्विज करुणा से विगलित होकर प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण तथा इंद्र से शुनःशेप के प्राणों की रक्षा करने के लिये प्रार्थना करने लगे। ऋषि विश्वामित्र के आदेश से स्वयं शुनःशेप भी प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण, विश्वदेव, उषा, इंद्र तथा अश्विनीकुमारों की बार-बार स्तुति करने लगा।
शुनःशेप के आह्वान पर अग्नि आदि नौ देव एक साथ प्रकट हुए। अग्नि ने शुनःशेप को ओज प्रदान किया। इन्द्र ने शुनःशेप को हिरण्यमय रथ दिया। इस प्रकार समस्त देवों ने शुनःशेप को कुछ न कुछ दिव्य गुण एवं वस्तुएं प्रदान कीं। समस्त देवों को शुनःशेप पर द्रवित हुआ देखकर वरुण का आसुरि भाव भी नष्ट हो गया। उसने शुनःशेप को दीर्घायु होने का वरदान देकर उसे बलि-यूप से मुक्त कर दिया।
शुनःशेप ने ऋषियों से पूछा कि मेरा पिता कौन है, मुझे बेचने वाला या खरीदने वाला! शुनःशेप का पिता कौन ? इस प्रश्न के माध्यम से मानव सम्बन्धों की जटिल व्याख्या की गई है। इस कहानी का निष्कर्ष भारतीय संस्कृति का निरूपण है।
पिछली कड़ी में हमने देखा था कि महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए मंत्र से अग्नि आदि देवताओं ने प्रकट होकर ऋषि अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप के प्राणों की रक्षा की। ऋषियों एवं देवताओं के प्रयासों से ऋषिकुमार शुनःशेप और राजकुमार रोहित के प्राण तो बच गए, यज्ञ भी पूर्ण हो गया और वरुण भी संतुष्ट होकर चला गया किंतु ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अजीगर्त के जीवन में एक नई समस्या उत्पन्न हो गई।
जब यज्ञ सम्पूर्ण हो गया तो ऋषि विश्वामित्र के 100 पुत्र अपने पिता को घृणा और क्रोध से देखने लगे क्योंकि यज्ञ के दौरान विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को पितृ-आज्ञा का उल्लंघन करने के अपराध में चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खाने का श्राप दिया था।
इसी प्रकार जब ऋषि अजीगर्त ने बलि यूप से मुक्त हुए अपने पुत्र शुनःशेप को गले लगाना चाहा तो शुनःशेप ने उन्हें अपना पिता मानने से मना कर दिया और कहा कि आपने मेरे बदले में दो सौ गौएं प्राप्त कर ली हैं। इसलिए अब आप मेरे पिता नहीं रहे। ऋषि अजीगर्त ने कहा कि मैंने पृथ्वीपालक राजा अंबरीष के पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिये तेरी बलि देने का निश्चय किया था न कि गौओं की प्राप्ति के लोभ से।
इस पर शुनःशेप ने ऋत्विजों से ही प्रश्न किया कि आप ही बतायें कि क्या ये मेरे पिता हैं जिन्होंने मुझे अपने हाथों से बलियूप से बांध दिया और मेरे वध के लिये कुठार लेकर प्रस्तुत हुए? अथवा राजा अंबरीष मेरे पिता हैं जिन्होंने दो सौ गौओं के बदले में मेरा जीवन क्रय कर लिया है?
शुनःशेप के प्रश्न पर ऋषियों में विवाद छिड़ गया। कुछ ऋषियों का मानना था कि अब भी ऋषि अजीगर्त ही शुनःशेप का पिता है जबकि कुछ ऋषियों के अनुसार राजा अंबरीष द्वारा अजीगर्त को उसके पुत्र का मूल्य चुका दिए जाने के कारण अंबरीष ही शुनःशेप का पिता हो गया है। शुनःशेप ने इन दोनों को ही अपना पिता मानने से मना कर दिया।
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ऋषि कुमार शुनःशेप ने अजीगर्त को यह कहकर पिता मानने से मना कर दिया कि इन्होंने मुझे दो सौ गौओं के बदले विक्रय कर दिया था। इसी प्रकार शुनःशेप ने अंबरीष को भी यह कहकर पिता मानने से अस्वीकार कर दिया कि राजा अंबरीष ने उसे पालने के लिए नहीं अपितु बलि देने के लिये क्रय किया था।
शुनःशेप ने ऋषियों से कहा- ‘महर्षि विश्वामित्र ने मंत्र देकर, अग्नि ने ओज देकर और इंद्र ने हिरण्यमय रथ देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। इनमें से किसी एक को मैं अपना पिता स्वीकार कर सकता हूँ किंतु इनमें से मेरा पिता होने का वास्तविक अधिकारी कौन है?’
अंततः महर्षि वसिष्ठ ने निर्णय दिया- ‘मंत्र से ही शुनःशेप के प्राण बचे हैं। इसलिये विश्वामित्र शुनःशेप के पिता होने के अधिकारी हैं।’
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इस पर शुनःशेप विश्वामित्र के अंक में जाकर बैठ गया। इस पर विश्वामित्र ने शुनःशेप को ‘देवरात’ अर्थात् देवताओं का पुत्र घोषित किया। शुनःशेप की यह कथा विभिन्न पुराणों में कुछ अंतर के साथ मिलती है। एक स्थान पर यह उल्लेख आया है कि महर्षि विश्वामित्र के कहने पर शुनःशेप ने बलियूप से मुक्त होने के लिए ऊषा देवता का स्तवन किया। प्रत्येक ऋचा के साथ शुनःशेप का एक-एक बंधन टूटता गया और अंतिम ऋचा के साथ शुनःशेप स्वयं ही बलियूप से मुक्त हो गया।
कुछ और ग्रंथों के अनुसार शुनःशेप कौशिक ऋषियों के कुल मे उत्पन्न ऋषि विश्वामित्र के पुत्र विश्वरथ और विश्वामित्र के शत्रु शम्बर की पुत्री उग्र की खोई हुई सन्तान था जिसे लोपमुद्रा ने भरतों अर्थात् कौशिकों के डर से ऋषि अजीतगर्त के पास छिपा दिया था। भरतों ने उग्र को मार दिया। कुछ ग्रंथों के अनुसार ऋषि अजीगर्त अत्यंत निर्धन था इसलिए उसने अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपना पुत्र राजा अंबरीष के हाथों बेच दिया था। कुछ ग्रंथों में यह भी लिखा है कि राजकुमार रोहित अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जंगलों में भाग गया था ताकि वरुण उसे न पकड़ सके तथा उसी ने अन्न की खोज में अपने परिवार सहित भटक रहे ऋषि अजीगर्त को इस बात के लिए तैयार किया था कि यदि वह अपने तीन पुत्रों में से किसी एक की बलि चढ़ाने को तैयार हो जाए तो वह अपने पिता राजा अंबरीष से कहकर ऋषि को इतनी गौएं दिलवा देगा जिससे ऋषि के परिवार को भूखा नहीं मरना पड़ेगा।
कुछ पुराणों के अनुसार जब शुनःशेप बलि से बचने के लिए करुण क्रंदन कर रहा था तब महर्षि विश्वामित्र ने अपने प्रथम पचास पुत्रों को बुलाया और उनसे कहा कि वे शुनःशेप को ज्येष्ठ-बन्धु के रूप में स्वीकार कर लें परन्तु उन पुत्रों ने पितृ-आज्ञा नहीं मानी। अतः विश्वामित्र ने उन पचास पुत्रों का ‘अपुत्र’ कहकर उनका त्याग कर दिया। वे ऋषि-सम्पत्ति के देय भाग से वंचित हो गए।
इस के बाद विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा और उससे छोटे पुत्रों ने शुनःशेप को अपना ज्येष्ठ भ्राता मान लिया किंतु जब ऋषि ने मधुच्छंदा और शेष पुत्रों से कहा कि वे शुनःशेप के स्थान पर बलि-पशु बन जाएं तो उन्होंने भी अपने पिता की आज्ञा मानने से मना कर दिया।
कुछ ग्रंथों में लिखा है कि जब राजकुमार रोहित अपने प्राण बचाने के लिए पिता का महल छोड़कर जंगलों में भाग आया तब एक बार उसे ज्ञात हुआ कि उसका पिता जलोदर नामक रोग से ग्रस्त होकर भयानक वेदना का सामना कर रहा है। इस पर रोहित फिर से पिता के पास लौटने को उद्धत हुआ किंतु जब यह बात देवराज इन्द्र को ज्ञात हुई तो इन्द्र ने रोहित को वापस लौटने से मना कर दिया क्योंकि देवराज इन्द्र नहीं चाहता था कि वरुण को बलिभाग प्राप्त हो।
एक पुराण में आए आख्यान के अनुसार इन्द्र ने रोहित को उपदेश देते हुए कहा- ‘चरैवेति चरैवेति, चराति चरतो भगश्चरैवेति।’ अर्थात् चलते चलो, चलते चलो। चलने वाले का भाग्य भी चलता रहता है।
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में कुछ मंत्रों का दृष्टा यही शुनःशेप नामक ऋषि है। कुछ पुराणों में बलियूप से बंधे हुए शुनःशेप द्वारा देवताओं के आह्वान के लिए पढ़े जाने वाले मंत्रों में ऋग्वेद के चतुर्थ एवं पंचम मण्डलों के मंत्र दिए गए हैं। कुछ पुराणों में यह निर्देश किया गया है कि जब किसी आर्य राजा का अभिषेक किया जाए तब शुनःशेप का प्रसंग सुनाया जाए। ऐसा संभवतः इसलिए किया गया था ताकि राजा अपने पुत्र के मोह में प्रजा के पुत्रों के प्राण लेने का साहस न करे।
कुछ पुराणों में यह आख्यान राजा अम्बरीष के पुत्र रोहित का न बताकर इसी वंश के राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित के सम्बन्ध में दिया गया है। इस आख्यान से यह भी स्पष्ट होता है कि पौराणिक काल में राजा से लेकर ऋषि और देवता तक सभी यज्ञ में नरबलि को उचित नहीं मानते थे।
इसीलिए यह आख्यान वरुण को केन्द्र में रखकर रचा गया क्योंकि वरुण पहले असुर था और बाद में देवताओं ने वरुण को देवत्व प्रदान करके देव बना लिया था किंतु चूंकि देवताओं को सोम मिलना बंद हो गया था इसलिए जहाँ अन्य देवता बलहीन होते जा रहे थे, वहीं वरुण में आसुरी भाव पुनः प्रकट होने आरम्भ हो गए थे। आगे चलकर कुछ पुराणों में अंबरीष के वंशज वेन की कथा मिलती है जिसमें पशुबलि का भी विरोध किया गया है।
प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों में राजा वेन की कथा मिलती है। इन कथाओं के आधार पर यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि वह कौनसे मनु का वंशज था। अलग-अलग कथाओं में उसे अलग-अलग मनु का वंशज बताया गया है। अलग-अलग कथाओं के अनुसार राजा वेन को कम से कम तीन मनुओं का वंशज ठहराया गया है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार महाराज ध्रुव की चौथी पीढ़ी में वेन का जन्म हुआ। इस दृष्टि से वेन आदि मनु का वंशज था। कुछ पुराणों के अनुसार वेन ‘मृत्यु’ की मानसी कन्या ‘सुनीथा’ के गर्भ से उत्पन्न राजा अंग का पुत्र था तथा चाक्षुष मनु का प्रपौत्र था। इस दृष्टि से राजा वेन छठे मनु का वंशज सिद्ध होता है।
जबकि कुछ पुराणों के अनुसार वेन राजा ईक्ष्वाकु का वंशज था तथा राजा पृथु का पिता था। इस दृष्टि से राजा वेन वैवस्वत मनु का वंशज सिद्ध होता है।
कुछ पुराणों में कहा गया है कि महाराज ध्रुव के वन गमन के पश्चात उनके पुत्र उत्कल को राजसिंहासन पर बैठाया गया, लेकिन वे ज्ञानी एवम विरक्त पुरुष थे, अतः प्रजा ने उन्हें मूढ़ एवं विक्षिप्त समझकर राजगद्दी से हटा दिया और उनके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजा बनाया। राजा वत्सर तथा उनके पुत्रों ने दीर्घ काल तक पृथ्वी पर शासन किया। इसी वंश में अंग नामक राजा हुआ।
अंग ने अपनी प्रजा को सुखी रखा। एक बार राजा अंग ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया किंतु देवताओं ने यज्ञ-भाग ग्रहण करने से मना कर दिया क्योंकि राजा अंग के कोई पुत्र नहीं था।
इस पर राजा अंग ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया। यज्ञ में आहुति देते समय यज्ञकुण्ड में से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जिसने राजा को खीर से भरा एक पात्र दिया। राजा ने खीर का पात्र लेकर सूँघा, फिर अपनी रानी को दे दिया। रानी ने उस खीर को ग्रहण किया।
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समय आने पर रानी के गर्भ से एक पुत्र हुआ किन्तु राजा अंग की रानी एक अधर्मी वंश की पुत्री थी, इस कारण उसे अधर्मी सन्तान की प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘वेन’ रखा गया।
राजकुमार वेन अत्यंत दुष्ट था। प्रजा उसके उपद्रवों से त्राहि-त्राहि करने लगी। महाराज अंग ने वेन को कई बार दण्डित किया किंतु वेन की प्रवृत्तियों में सुधार नहीं हुआ। इस पर महाराज अंग को जीवन से वैराग्य हो गया और वे एक रात अपना राज्य त्यागकर अज्ञात वन में चले गए। जब भृगु आदि ऋषियों ने देखा कि राजा के न होने से प्रजा की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है तो ऋषियों ने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमण्डल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया।
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राजा वेन अत्यंत क्रूरकर्मा था। वह किसी भी प्रजाजन द्वारा छोटा सा अपराध किए जाने पर मृत्यु-दण्ड जैसे कठोर दण्ड देता था। इस कारण जब राज्य के चोर-डाकुओं को वेन के राजा बनने की जानकारी मिली तो वे राज्य छोड़कर भाग गए। इससे राज्य में चोर-डाकुओं के उपद्रव तो बंद हो गए। वेन क्रूरकर्मा होने के साथ-साथ घनघोर नास्तिक भी था। उसने ब्राह्मणों तथा सम्पूर्ण प्रजा को आज्ञा दी कि वे कोई यज्ञ न करें तथा किसी देवता का पूजन नहीं करें। एकमात्र वेन ही प्रजा का आराध्य है! इसलिए सभी लोग वेन की पूजा करें। जो लोग इस आज्ञा को भंग करेंगे उन्हें कठोर दण्ड मिलेगा।
जब राजा ने यह घोषणा करवाई तो समस्त ऋषिगण मिलकर वेन को समझाने के उसके पास गए। ऋषियों ने कहा कि राजन! यज्ञ से यज्ञपति भगवान विष्णु संतुष्ट होंगे! उनके प्रसन्न होने पर आपका और प्रजा का कल्याण होगा! इसलिए आप प्रजा को एवं ऋषियों को यज्ञ करने दें। वेन ने ऋषियों के इस परामर्श की अवज्ञा की। इस पर ऋषियों ने हुंकार भरकर एक कुश राजा की ओर फैंका जिसके प्रहार से राजा वेन मर गया। वेन की माता सुनीथा ने अपने पुत्र का शरीर स्नेहवश सुरक्षित रख लिया।
राजा वेन के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए ऋषियों ने वेन के शरीर को मथना आरम्भ किया। सबसे पहले वेन की बाईं जांघ को मथा गया जिससे एक काले रंग और नाटे कद का कुरूप पुत्र उत्पन्न हुआ। अत्रि ऋषि ने उससे कहा ‘निषीद!’ अर्थात् बैठ जाओ। इससे उसका नाम ‘निषाद’ पड़ गया और उसके वंशज निषाद कहलाए।
अब ऋषियों ने वेन का दाहिना हाथ मथना आरम्भ किया जिससे अत्यंत सुंदर बालक का जन्म हुआ। ऋषियों ने उसका नाम पृथु रखा तथा उसके शुभ लक्षण देखकर उसे राजा बना दिया। अब ऋषियों ने वेन का बांया हाथ मला जिससे लक्ष्मी-स्वरूपा आदि-सती अर्चि प्रकट हुई।
पद्म पुराण के अनुसार राजा वेन नास्तिक था एवं जैनियों का अनुयायी हो जाने के कारण ऋषियों से तिरस्कृत हुआ तथा पीटा गया, जिससे उसकी जाँघ से निषाद और दाहिने हाथ से पृथु का जन्म हुआ था। पद्म पुराण के अनुसार राजा वेन ने तपस्या करके अपने पापों से मुक्ति पाई।
कुछ पुराणों में वर्णन मिलता है कि राजा वेन यज्ञ में पशुओं की बलि देता था। ऋषियों ने यज्ञों में हिंसा करने का विरोध किया किंतु वेन ने ऋषियों की बात नहीं मानी। इस कारण परमपिता ब्रह्मा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने नारद मुनि को राजा वेन के पास भेजा ताकि वे वेन को पशुबलि न देने के लिए समझाएं। नारदजी ने राजा से कहा- ‘हे राजन्! यज्ञ में पशुबलि क्यों देते हो? किंचित् आकाश की तरफ देखो!’
जब वेन ने आकाश की तरफ सिर उठाया तो देखा कि जिन पशुओं की राजा ने बलि चढ़ाई थी, वे पशु आकाश में स्थित हैं तथा राजा को घूर रहे हैं। नारद मुनि बोले- ‘देखा राजन्! ये तुम्हारे पाप हैं। तुमने मूक एवं निरपराध पशुओं को देवपूजन के नाम पर मार डाला। तुम्हें लज्जा नहीं आई! क्या इंद्र या अन्य आदित्य पशु-बलि स्वीकार कर लेंगे?
कभी नहीं, वे देवता हैं ….दैत्य नहीं। हे महापापी वेन, पशुओं का रक्त बहाकर तुमने घोर पाप किया है। स्वयं को मनुष्य कहने वाले तुम वास्तव में नरपशु हो! जो सभी जीवों पर करुणा करता है, वही धर्मात्मा है। वह धर्मात्मा हो ही नहीं सकता जो पशुओं का रक्त बहाए। ईश्वर ने सब प्राणियों को जीने का अधिकार दिया है।
किसी मनुष्य को यह अधिकार नहीं है की वह किसी पशु की हत्या करे। जिस तरह तुम अपने परिजनों की हत्या नहीं कर सकते, उसी तरह पशुओं की हत्या मर करो। ईश्वर तुम्हें इस अपराध का दण्ड अवश्य देंगे।’ ऐसा कहकर देवऋषि नारद चले गए किन्तु वेन ने पशु-बलि बंद नहीं की। इस कारण ऋषियों ने कुपित होकर राजा वेन को मार डाला।
पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि ईक्ष्वाकु राजा अंग के अत्याचारी पुत्र वेन को ऋषियों ने अपनी हुंकार से मार डाला तथा वेन की माता सुनीथा ने मन्त्रा के बल से अपने पुत्र के शव की रक्षा की।
जब धरती पर कोई राजा नहीं रहा तो चारों ओर अव्यवस्था होने लगी। चोर-डाकू और आत्ताई लोग प्रजा को संत्रास देने लगे। वेन के कोई संतान नहीं थी जिसे राजा बनाया जा सके। इसलिए समस्त ऋषियों ने एकत्रित होकर वेन के शव के अंगों का मथन किया। उसकी बाईं जांघ से निषाद का, दाहिनी भुजा से पृथु नामक पुरुष का तथा बाईं भुजा से अर्चि नामक स्त्री का जन्म हुआ।
पृथु के चरण में कमल का और हाथ में चक्र का चिन्ह था। ऋषियों ने पृथु का विवाह अर्चि से कर दिया तथा पृथु को धरती का राजा बना दिया। इस प्रकार अधिकांश पुराण पृथु को वेन का पुत्र मानते हैं जबकि वाल्मीकि रामायण में इन्हें अनरण्य का पुत्र तथा त्रिशंकु का पिता कहा गया है। पृथु ने वेन को ‘पुम’ नामक नरक से छुड़ा लिया।
कुछ पुराणों में पृथु को विष्णु का अंशावतार कहकर उसकी वंदना की है। उनके अनुसार राजा पृथु का अभिषेक करने के लिए समुद्र विभिन्न प्रकार के रत्न और नदियां अपना जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुए। प्रजापति ब्रह्मा, अंगिरस ऋषि, समस्त देवताओं एवं समस्त चराचर भूतों ने उपस्थित होकर राजा पृथु का राज्याभिषेक किया।
महाभारत के शान्ति पर्व के ‘राजधर्मानुशासन पर्व’ में भी राजा पृथु के चरित्र का वर्णन किया गया है। राजा पृथु धरती का पालक सिद्ध हुआ। उसने धरती की इतनी सेवा की कि उसके नाम पर धरती को पृथ्वी अर्थात् ‘पृथु की पुत्री।’ कहा जाने लगा। जिस समय पृथु राजा बना उस समय धरती अन्नविहीन थी तथा प्रजा भूख से त्रस्त थी।
प्रजा का करुण क्रंदन सुनकर राजा पृथु अत्यंत दुखी हुए। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि धरती माता ने अन्न एवं औषधियों को अपने उदर में छिपा लिया है तो वे धनुष-बाण लेकर धरती को मारने दौड़े।
धरती एक स्त्री का रूप धरकर राजा पृथु की शरण में आई और राजा को नमस्कार करके जीवन दान की याचना करती हुई बोली- राजन्! ‘मुझे मारकर अपनी प्रजा को जल पर कैसे रख पाओगे?’
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पृथु ने कहा- ‘स्त्री पर हाथ उठाना अनुचित है किंतु जो पालनकर्ता अन्य प्राणियों के साथ निर्दयता का व्यवहार करता है उसे दंड अवश्य देना चाहिए।’
धरती ने कहा- ‘मेरा दोहन करके आप सब कुछ प्राप्त करें। आपको मुझे जोतने के लिए मेरे योग्य बछड़े और दोहन-पात्र का प्रबन्ध करना पड़ेगा। मेरी सम्पूर्ण सम्पदा को दुराचारी चोर लूट रहे थे, इसलिए वह सामग्री मैंने अपने गर्भ में सुरक्षित रखी है। मुझे आप समतल बना दीजिये।’
धरती के उत्तर से राजा पृथु सन्तुष्ट हुए। उन्होंने मन को बछड़ा बनाया एवं स्वयं अपने हाथों से पृथ्वी का दोहन करके अपार धन-धान्य प्राप्त किया। फिर देवताओं तथा महर्षियों को भी पृथ्वी के योग्य बछड़ा बनाकर विभिन्न वनस्पतियों, अमृत, सुवर्ण आदि इच्छित वस्तुएं प्राप्त कीं। राजा पृथु ने धरती को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार किया तथा धरती को समतल बनाकर पृथु ने स्वयं पिता की भांति धरती एवं उस पर रहने वाली प्रजा का पालन किया। महाभारत में लिखा है कि कि विभिन्न मन्वन्तरों में पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है। इसलिए राजा पृथु ने धनुष की कोटि द्वारा चारों ओर से शिला-समूहों को उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थान पर संचित कर दिया। इससे पर्वतों की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी।
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राजा पृथु की प्रशस्ति में कहा जाता है कि वे इतने प्रतापी थे कि जब वे समुद्र में चलते थे तो समुद्र स्थिर हो जाता था और जब वे पर्वतों पर चलते थे तो पर्वत उनके मार्ग से स्वयं हटकर उन्हें मार्ग प्रदान करते थे। राजा पृथु ने सरस्वती नदी के तट पर पर 100 यज्ञ किए। उस काल में यह क्षेत्र ब्रह्मावर्त प्रदेश कहलाता था। स्वयं भगवान् श्री हरि विष्णु समस्त देवताओं सहित उन यज्ञों में आए।
राजा पृथु के इस उत्कर्ष को देखकर देवराज इंद्र को ईर्ष्या हुई। उसे सन्देह हुआ कि कहीं राजा पृथु इंद्रपुरी न प्राप्त कर ले। इसलिए इन्द्र ने सौवें अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया। जब इंद्र घोड़ा लेकर आकाश मार्ग से जा रहा था तब अत्रि ऋषि ने उसे देख लिया। अत्रि ने राजा पृथु से कहा- ‘इंद्र यज्ञ का घोड़ा लेकर भाग गया है।’
इस पर राजा पृथु ने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह इंद्र से यज्ञ का घोड़ा छुड़ाकर लाए। राजा पृथु के पुत्र ने इंद्र का पीछा किया। इंद्र ने वेश बदल रखा था। पृथु के पुत्र ने जब देखा कि यज्ञ के घोड़े को लेकर भागने वाला व्यक्ति जटाजूट एवं भस्म लगाए हुए है तो राजकुमार ने उस व्यक्ति को साधु समझकर उस पर बाण चलाना उपयुक्त नहीं समझा और बिना घोड़ा लिए ही वापस लौट आया।
तब अत्रि मुनि ने राजकुमार से कहा- ‘वह साधु नहीं है, साधु के वेश में इन्द्र है।’
इस पर राजकुमार फिर से इन्द्र के पीछे गया। पृथु-कुमार को पुनः आया देखकर इंद्र घोड़े को वहीं छोड़कर अंतर्धान हो गया। पृथु-कुमार अश्व को यज्ञशाला में ले आया। समस्त ऋषियों ने पृथु के पुत्र के पराक्रम की स्तुति की। अश्व को पशुशाला में बाँध दिया गया। अवसर पाकर इंद्र ने पुनः अश्व को चुरा लिया। अत्रि ऋषि ने पुनः पृथु कुमार को सूचित किया। इस पर पृथु के पुत्र ने इंद्र पर बाण चलाया। इंद्र पुनः अश्व छोड़कर भाग गया।
जब राजा पृथु को देवराज इंद्र के इस कृत्य की जानकारी मिली तो उसे बहुत क्रोध आया। ऋषियों ने राजा को शांत किया और कहा कि आप व्रती हैं, यज्ञ के दौरान आप किसी का वध नहीं कर सकते किंतु हम मन्त्र के द्वारा इंद्र को यज्ञकुंड में भस्म किए देते हैं। यह कहकर ऋत्विजों ने मन्त्र से इंद्र का आह्वान किया।
ऋषिगण यज्ञकुण्ड में आहुति अर्पित करना ही चाहते थे कि प्रजापति ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने राजा पृथु से कहा- ‘तुम और इंद्र दोनों ही परमात्मा के अंश हो। तुम तो मोक्ष के अभिलाषी हो। तुम्हें इन यज्ञों की क्या आवश्यकता है? तुम्हारा यह सौवां यज्ञ सम्पूर्ण नहीं हुआ है, चिंता मत करो। यज्ञ को रोक दो। इंद्र के पाखण्ड से जो अधर्म उत्पन्न हो रहा है, उसका नाश करो।’
प्रजापति ब्रह्माजी की यह बात सुनकर भगवान् श्री हरि विष्णु इंद्र को अपने साथ लेकर पृथु की यज्ञशाला में प्रकट हुए। उन्होंने पृथु से कहा- ‘मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। यज्ञ में विघ्न डालने वाले इंद्र को तुम क्षमा कर दो। राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है। तुम तत्त्वज्ञानी हो। भगवत्-प्रेमी व्यक्ति शत्रु को भी समभाव से देखते हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह माँग लो।’
राजा पृथु ने भगवान् से कहा- ‘भगवन्! मुझे सांसारिक भोगों का वरदान नहीं चाहिए। यदि आप देना ही चाहते हैं तो मुझे एक सहस्र कान दीजिये, जिससे मैं आपका कीर्तन, कथा एवं गुणगान हजारों कानों से सुनता रहूँ!’
भगवान् विष्णु ने कहा- ‘राजन! मैं तुम्हारी अविचल भक्ति से अभिभूत हूँ। तुम धर्म से प्रजा का पालन करो।’ राजा पृथु की बात सुनकर देवराज इंद्र को लज्जा आई और वह राजा पृथु के चरणों में गिर पड़ा। पृथु ने देवराज को उठाकर गले से लगा लिया।
महाराज पृथु तथा उनकी पत्नी अर्चि के पाँच पुत्र हुए- विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात् राजा पृथु अपना राज्य अपने पुत्र को सौंपकर रानी अर्चि के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे। भगवान् श्री हरि विष्णु के चरणों में ध्यान लगाकर उन्होंने देह त्याग कर दिया। महारानी अर्चि राजा की देह के साथ अग्नि में भस्म हो गई। श्री हरि की कृपा से दोनों को परम-धाम प्राप्त हुआ।
विभिन्न पुराणों में आए राजा पृथु के इस आख्यान से अनुमान होता है कि यह राजा आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ होगा। क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर कृषि का आरम्भ आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ। वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर ‘होलोसीन काल’ आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। इस युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि तथा पशुपालन आरम्भ करके समाज को व्यवस्थित किया। पौराणिक साहित्य में पृथु नामक अन्य राजाओं का वर्णन भी मिलता है। वृष्णिवंश में उत्पन्न राजा चित्ररथ के पुत्र का नाम भी पृथु था जिसे भगवान श्री कृष्ण ने मथुरापुरी के उत्तरी द्वार का रक्षक नियुक्त किया था। प्रभास तीर्थ में यादव-वंश के विनाश के समय वह भी मारा गया था।
महाभारत के वन पर्व सहित अनेक पुराणों में राजा धुंधुमार की कथा मिलती है। यह कथा किसी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती है। पुराणों में ईक्ष्वाकु वंश की वंशावली को बहुत ही विकृत कर दिया गया है। इस कारण राजाओं के क्रम का वास्तविक ज्ञान नहीं हो पाता।
कुछ स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि राजा त्रिशंकु के पुत्र धुन्धुमार हुये। जबकि कुछ पुराणों के अनुसार ईक्ष्वाकु वंशी राजा कुवलाश्व ने धुंधु नामक दैत्य का वध करके धुंधुमार नाम से ख्याति प्राप्त की।
महाभारत के अनुसार ईक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व के पुत्र का नाम कुवलाश्व था। उसने धुंधु नामक दैत्य का वध करके धुंधुमार नाम से ख्याति प्राप्त की। राजा कुवलाश्व ने अपने इक्कीस हजार पुत्रों के साथ मिलकर महर्षि उत्तंक का अपकार करने वाले धुंधु नामक दैत्य को मारा था इसलिए राजा कुवलाश्व का नाम धुंधुमार हुआ।
महाभारत में आई कथा इस प्रकार से है- अत्यंत प्राचीन काल में मरु प्रदेश में रहकर तपस्या करने वाले उत्तंक नामक ऋषि ने भगवान विष्णु की तपस्या करके भगवान श्री हरि को प्रसन्न किया। भगवान ने ऋषि को यह वरदान दिया कि धुंधु नामक दैत्य तीनों लोकों का विनाश करने के लिए घनघोर तपस्या कर रहा है किंतु तुम्हारी आज्ञा से ईक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व का पुत्र कुवलाश्व मेरे योगबल का सहारा लेकर उस धुंधु नामक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य का वध करेगा।
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इधर तो भगवान ने महर्षि उत्तंक को यह वरदान दिया कि अयोध्या के राजा बृहदश्व का पुत्र धुंधु नामक दैत्य का वध करेगा किंतु उधर अयोध्या का राजा बृहदश्व तपस्या करने के लिए वन में जाने की तैयारी करने लगा। जब यह बात महर्षि उत्तंक को ज्ञात हुई तो उन्होंने अयोध्या पहुंच कर राजा से भेंट की तथा राजा बृहदश्व को समझाया कि असमय ही राज्य त्यागकर वन में नहीं जाना चाहिए। प्रजा की रक्षा करना और उसका पालन करना आपका कर्त्तव्य है। मरुप्रदेश में मेरे आश्रम के निकट रेत से भरा हुआ एक समुद्र है जिसका नाम उज्जालक सागर है। उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई अनेक योजन है। वहाँ धुंधु नामक एक बड़ा बलवान दैत्य रहता है। वह मधु-कैटभ का पुत्र है। वह सदैव पृथ्वी के भीतर छिपकर रहता है। बालू के भीतर छिपकर रहने वाला वह महाक्रूर दैत्य वर्ष में एक बार सांस लेता है। जब वह सांस छोड़ता है तो पर्वत और वनों के सहित यह पृथ्वी डोलने लगती है। उसकी श्ंवास से उठी आंधी से रते का इतना ऊंचा बवंडर उठता है कि उससे सूर्य भी ढक जाता है। सात दिनों तक भूचाल होता रहता है। अग्नि की लपटें चिनगारियां और धुएं उठते रहते हैं। महाराज! इन उत्पातों के कारण हमारा आश्रम में रहना अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्यों का कल्याण करने के लिए आप उस दैत्य का वध कीजिए।’
राजा बृहदश्व ने हाथ जोड़कर मुनि से कहा- ‘हे ब्राह्मण! आप जिस उद्देश्य से यहाँ पधारे हैं, वह निष्फल नहीं होगा। मेरा पुत्र कुवलाश्व इस भूमण्डल में अद्वितीय वीर है। यह बड़ा धैर्यवान और फुर्तीला है। आपका अभीष्ट कार्य वह अवश्य पूर्ण करेगा। इसके बलवान् पुत्र भी अस्त्र-शस्त्र लेकर इस युद्ध में उसका साथ देंगे। आप मुझे छोड़ दीजिए क्योंकि अब मैंने शस्त्रों को त्याग दिया और और मैं युद्ध से निवृत्त हो गया हूँ।’
महर्षि उत्तंक ने कहा- ‘बहुत अच्छा!’
इस पर राजा बृहदश्व ने अपने पुत्र कुवलाश्व को बुलाया और उसे आज्ञा दी कि वह इस ब्राह्मण का अभीष्ट पूर्ण करे। यह आज्ञा देकर राजा बृहदश्व तप करने के लिए वन में चला गया।
महाभारत में लिखा है कि धुंधु नामक इस महाबली दैत्य ने एक पैर से खड़े होकर बहुत काल तक तपस्या की थी। जब प्रजापति ब्रह्मा उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तो ब्रह्माजी ने धुंधु को वर मांगने के लिए कहा। धुंधु बोला कि आप मुझे ऐसा वर दीजिए जिसके कारण मेरी मृत्यु किसी देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सर्प से न हो। ब्रह्माजी ने उससे कहा कि अच्छा ऐसा ही होगा। इस प्रकार धुंधु दैत्य अभय होकर महर्षि उत्तंक के आश्रम के निकट अपनी श्वास से आग की चिनगारियां छोड़ता हुआ रेत में रहने लगा।
इक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व के आदेश से उसका पुत्र कुवलाश्व उत्तंक मुनि के साथ सेना और सवारी लेकर मरुस्थल में आया। उसके इक्कीस हजार पुत्र भी उसकी सेना के साथ थे। महर्षि उत्तंक की प्रार्थना पर भगवान श्री हरि विष्णु ने अपना तेज राजा कुवलाश्व में स्थापित कर दिया। कुवलाश्व ज्यों ही युद्ध के लिए आगे बढ़ा, त्यों ही आकाशवाणी हुई कि राजा कुवलाश्व स्वयं अवध्य रहकर धुंधु को मारेगा और धुंधुमार नाम से विख्यात होगा। देवताओं ने राजा कुवलाश्व पर पुष्पों की वर्षा की। देवताओं के बजाए बिना ही, देवताओं की दुंदुभियां बज उठीं। ठण्डी हवाएं चलने लगीं और पृथ्वी की उड़ती हुई धूल को शांत करने के लिए इन्द्र धीरे-धीरे वर्षा करने लगा।
भगवान श्री हरि विष्णु के तेज से बढ़ा हुआ राजा कुवलाश्व शीघ्र ही समुद्र के किनारे पहुंचा और अपने पुत्रों से चारों ओर की रेत खुदवाने लगा। सात दिनों तक खुदाई होने के पश्चात् महाबलवान् धुंधु दैत्य दिखाई पड़ा। बालू के भीतर उसका बहुत बड़ा विकराल शरीर छिपा हुआ था जो प्रकट होने पर अपने तेज से दीदीप्यमान होने लगा, मानो सूर्य ही प्रकाशमान हो रहे हों।
धुंधु दैत्य प्रलयकाल की अग्नि के समान पश्चिम दिशा को घेरकर सो रहा था। कुवलाश्व के पुत्रों ने उसे सब ओर से घेर लिया और वे तीखे बाण, गदा, मूसल, पट्टिश, परिघ और तलवार आदि अस्त्र-शस्त्रों से उस पर प्रहार करने लगे। उन लोगों की मार खाकर वह महाबली दैत्य क्रोध में भरकर उठा और उनके चलाए हुए शस्त्रों को गालर-मूली की तरह खा गया। इसके बाद वह संसंवर्तक अग्नि के समान आग की लपटें उगलने लगा और अपने तेज से उन सब राजकुमारों को एक क्षण में भस्म कर दिया जैसे पूर्वकाल में सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने भस्म कर डाला था।
जब समस्त इक्ष्वाकु राजकुमार धुंधु की क्रोधिाग्नि में स्वाहा हो गए तब महातेजस्वी कुवलाश्व उसकी ओर बढ़ा। उसके शीरर से जल की वर्षा होने लगी जिसने धुंधु के मुख से निकलती हुई आग को पी लिया। इस प्रकार योगी कुवलाश्व ने योगबल से उस आग को बुझा दिया और स्वयं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके समस्त जगत् का भय दूर करने के लिए उस दैत्य को जलाकर भस्म कर दिया। धुंधु को मारने के कारण वह धुंधुमार नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस युद्ध में राजा कुवलाश्व के समस्त इक्कीस हजार पुत्र धुंधु के मुख से निकली निःश्वासाग्नि से जलकर मर गए किंतु तीन पुत्र दृढ़ाश्व, कपिलाश्व और चंद्राश्व जीवित बच गए।
राजा धुंधुमार के हाथों धुंधु के वध की कथा निश्चय ही किसी बड़ी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती है। यह घटना काफी बाद की प्रतीत होती है क्योंकि इस काल तक हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाई गई रेत के कारण समुद्र के किनारे पर विशाल रेगिस्तान उत्पन्न हो चुका था और समुद्र अपने मूल स्थान से काफी दूर खिसक चुका था।
अवश्य ही उस काल में इस क्षेत्र में टिक्टोनिक्स प्लेटें खिसककर आपस में टकराती होंगी जिनके कारण विशाल भूकम्प आते रहे होंगे यहाँ तक कि पृथ्वी के गर्भ में दबा हुआ गर्म लावा भी धरती की सतह को फूटकर बाहर निकलता होगा। संभवतः इन्हीं भूगर्भीय हलचलों के कारण धरती के ऊपर आकाश में दूर तक धूल और धुंआं फैल जाते होंगे और भूकम्प आया करते होंगे। जब इस क्षेत्र की टिक्टोनिक्स प्लेटें शांत हो गई होंगी तब धुंधुमार के आख्यान की कल्पना की गई होगी।
सत्युग को कृत युग भी कहा जाता है तथा कहा जाता है कि गणितीय गणना के अनुसार कृतयुग के बाद द्वापर को, द्वापर के बाद त्रेता युग को और त्रेता के बाद कलियुग को आना चाहिए था किंतु कृतयुग के समाप्त होते ही द्वापर के स्थान पर त्रेता आ गया।
पिछली कड़ियों में हमने ईक्ष्वाकु वंश के जिन राजाओं की कथा कही है, वे सत्युग के राजा थे। राजा धुंधुमार के बाद सत्युग में ईक्ष्वाकु वंश के सात राजा और भी हुए किंतु उनके काल की बड़ी घटनाएं पौराणिक साहित्य में प्राप्त नहीं होती हैं। युवनाश्व (द्वितीय) को सत्युग का अंतिम ईक्ष्वाकु वंशीय राजा कहा जाता है।
यद्यपि विभिन्न पुराणों में ईक्ष्वाकुओं की वंशावलियां अलग-अलग दी गई हैं तथापि हम युवनाश्व को ही सत्युग का अंतिम ईक्ष्वाकुवंशीय राजा मान रहे हैं क्योंकि यह माना जाता है कि युवनाश्व का पुत्र मांधाता त्रेतायुग का पहला ईक्ष्वाकुवंशीय राजा था।
सत्युग को कृत युग भी कहा जाता है तथा कहा जाता है कि गणितीय गणना के अनुसार कृतयुग के बाद द्वापर को, द्वापर के बाद त्रेता युग को और त्रेता के बाद कलियुग को आना चाहिए था किंतु कृतयुग के समाप्त होते ही द्वापर के स्थान पर त्रेता आ गया।
पुराणों में वर्णित कथाओं में त्रेता से पहले द्वापर के आगमन का कारण यह बताया जाता है कि सतयुग में धर्म रूपी वृषभ चारों पैरों पर मजबूती से खड़ा रहता है जबकि त्रेतायुग में केवल तीन पैरों पर और द्वापर में दो पैरों पर खड़ा रहता है।
कलियुग में धर्म रूपी बैल का एक ही पैर शेष रह जाने के कारण वह चलने में असमर्थ हो जाता है अर्थात् इस युग में धर्म महत्वहीन हो जाता है। इस मान्यता के अनुसार एक महायुग में क्रमशः सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग आते हैं।
चूंकि त्रेता में धर्म रूपी वृषभ चार पैरों के स्थान पर तीन पैरों पर चलता है इसलिए वह लंगड़ाते हुए चलता है।
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पुराणों के अनुसार जब तक ब्रह्माजी का दिन रहता है, तब तक पृथ्वी पर सृष्टि रहती है और जब ब्रह्माजी की रात होती है तब महाप्रलय हो जाती है। ब्रह्माजी के इस दिन को 1000 महायुगों में बांटा गया है तथा प्रत्येक महायुग को चार युगों में बांटा गया है जिन्हें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग कहा जाता है।
त्रेता युग मानव सृष्टि का द्वितीय युग है। इस युग में भगवान श्री हरि विष्णु के पाँचवे अवतार अर्थात् वामन, छठे अवतार अर्थात् परशुराम और सातवें अवतार अर्थात् श्री राम प्रकट हुए थे। यह काल इक्ष्वाकु वंशी राजा मांधाता के जन्म से आरम्भ होता है तथा इक्ष्वाकु वंशी राजा श्रीरामचंद्र की लौकिक लीलाओं के समापन के साथ पूर्ण होता है।
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विभिन्न पुराणों के अनुसार सतयुग 17 लाख 28 हजार सौर वर्ष का होता है। त्रेता 12 लाख 96 हजार सौर वर्ष का होता है, द्वापर 8 लाख 64 हजार सौर वर्ष का होता है। अंतिम युग अर्थात् कलियुग 4 लाख 32 हजार सौर वर्ष का होता है। जब द्वापर युग में गंधमादन पर्वत पर महाबली भीमसेन हनुमानजी से मिले तो हनुमानजी ने भीमसेन को बताया कि सबसे पहले सतयुग आया, उस युग में मनुष्य के मन में जो भी कामना आती थी वह पूर्ण हो जाती थी, इसलिए उसे क्रेता युग और सतयुग कहते थे। इसमें धर्म की कभी हानि नहीं होती थी। उसके बाद त्रेता युग आया। इस युग में लोग कर्म करके कर्मफल प्राप्त करते थे। फिर द्वापर युग आया जिसमें लोग सत्य एवं धर्म से दूर हो गए और अधर्म का बोलबाला हो गया। इसके समाप्त होने पर कलियुग आएगा जिसमें चारों और अधर्म का साम्राज्य दिखाई देगा और मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुसार फल नहीं मिलेगा। पुराणों में मान्याता है कि सतयुग के नायक महाराज मनु हैं। त्रेता के नायक श्री रामचंद्र हैं। द्वापर के नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं। कलियुग में भी भगवान विष्णु का एक अवतार होगा, वही इस युग के नायक होंगे।
पुराणों में मान्यता है कि सतयुग में मनुष्य की लम्बाई 32 फुट और आयु 1 लाख वर्ष हुआ करती थी। इस युग का सबसे बड़ा तीर्थ पुष्कर है। जबकि इस युग में भगवान श्री हरि के अवतार मत्स्य, हयग्रीव, कूर्म, वाराह और नृसिंह हैं। इस युग में पाप शून्य प्रतिशत और पुण्य 100 प्रतिशत फलीभूत होता है।
इस युग में मुद्रा रत्न की होती थी और पात्र स्वर्ण के होते थे। त्रेतायुग में मनुष्य की आयु 10 हजार वर्ष और लंबाई 21 फुट थी। इस युग का तीर्थ नैमिषारण्य और अवतार वामन, परशुराम और श्रीरामचंद्र हैं। इस युग में पापकर्म 25 प्रतिशत थे और पुण्य कर्म 75 प्रतिशत थे। इस युग में मुद्रा स्वर्ण की होती थी तथा पात्र चांदी के होते थे।
द्वापर में मनुष्य की आयु 1 हजार वर्ष और लंबाई 11 फुट बताई गई है। इस युग का तीर्थ कुरुक्षेत्र और अवतार भगवान श्रीकृष्ण हैं। इस युग में पाप कर्म और पुण्य कर्म बराबर-बराबर थे। इस युग की मुद्रा चांदी की होती थी और पात्र ताम्र के होते थे।
कलियुग में मनुष्य की आयु 100 वर्ष और लंबाई 5 फुट पांच इंच बताई गई है। इसका तीर्थ गंगाजी हैं। इसके अवतार बुद्ध एवं कल्कि हैं। इस युग में पाप कर्म 75 प्रतिशत और पुण्य कर्म 25 प्रतिशत होते हैं। इस युग की मुद्रा लोहे की और पात्र मिट्टी के हैं।
पुराणों की मान्यता है कि एक एक युग में एक एक वर्ण का शासन होता है। सतयुग में ब्राह्मणों अर्थात् ऋषि-मुनियों का शासन था। उस समय जप, तप, पूजा-पाठ और वैदिक नियमों का पालन किया जाताथा। त्रेता में क्षत्रिय वंश का शासन हुआ। इस युग में धरती पर युद्धों की भरमार थी। द्वापर में वैश्यों की अधिकता हुई। इस युग में व्यापार एवं वाणिज्य ने खूब वृद्धि की।
कलियुग को शूद्रों का अर्थात् नौकरी करने वालों का युग कहा गया है। कलियुग का वर्णन इन शब्दों में किया जाता है-
दस हजार बीते बरस, कलि में तजि हरि देहि।
तासु अर्द्ध सुर नदी जल, ग्रामदेव अधि तेहि।
अर्थात्- जब कलियुग के दस हजार वर्ष शेष रह जाएंगे तब भगवान विष्णु पृथ्वी छोड़ देंगे। जब पांच हजार वर्ष शेष रह जाएंगे तब गंगाजी का जल पृथ्वी को छोड़ देगा और जब ढाई हजार वर्ष शेष रहेंगे तब ग्राम देवता गांवों को त्याग देंगे।
पुराणों के अनुसार कलियुग में अधर्म इतना बढ़ जाएगा कि चारों ओर पाप और अत्याचार होते हुए दिखाई देंगे। पृथ्वी पर सूर्य की गर्मी बढ़ जाएगी। धरती के समस्त जल स्रोत सूख जाएंगे। शास्त्रों के अनुसार चारों युगों का क्रम अनवरत चलता है और कलियुग के बाद प्रलय होता है। भगवान शिव प्रलय के देवता माने गए हैं और उन्हीं के द्वारा सृष्टि का प्रलय किया जाता है। पूरी सृष्टि का नाश होने के बाद पुनः सृष्टि रची जाती है।
राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया लवणासुर ने
राजा मांधाता की कथा वायुपुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में मिलती है। इन कथाओं के अनुसार ईक्ष्वाकुवंशी राजा युवनाश्व सतयुग का अंतिम राजा था।
विष्णु पुराण के अनुसार अयोध्या नरेश युवनाश्व निःसंतान था। च्यवन ऋषि की सलाह पर राजा युवनाश्व ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। जब यज्ञ सम्पन्न हुआ, तब तक बहुत रात्रि व्यतीत हो चुकी थी। अतः समस्त ऋषिगण यज्ञ से अभिमंत्रित जल को एक घड़े में रख कर सो गये।
रात्रि में राजा युवनाश्व को प्यास लगी और उन्होंने घड़े में से जल लेकर पी लिया। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि इस घड़े में अभिमंत्रित जल है। जब ऋषियों की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि घड़ा पूर्णतः रिक्त है तथा उसमें अभिमंत्रित जल नहीं है।
ऋषियों ने वहाँ उपस्थित समस्त लोगों से जल के बारे में पूछा। इस पर राजा युवनाश्व ने बताया कि वह जल मैंने पी लिया! ऋषियों ने राजा से कहा कि अब उन्हीं की कोख से एक बालक जन्म लेगा।
जब इस घटना को एक सौ साल बीत गए, तब अश्विनीकुमारों ने राजा युवनाश्व की बायीं कोख फाड़कर एक बालक को बाहर निकाला। इस अवसर पर स्वर्ग के अन्य देवता भी उपस्थिति हुए।
देवताओं ने कहा कि यह तो एक पुरुष से उत्पन्न बालक है, यह क्या पिएगा? इस पर देवराज इंद्र ने अपनी तर्जनी अंगुली बालक के मुंह में डालकर- माम् अयं धाता। अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा। इस कारण बालक का नाम मांधाता पड़ गया।
देवराज इन्द्र की अंगुली पीते-तीते वह बालक तेरह हाथ जितना बड़ा हो गया। इस दिव्य बालक ने चिंतनमात्र से धनुर्वेद सहित समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इंद्र ने उसका राज्याभिषेक किया।
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राजा मांधाता ने अपने धर्म से तीनों लोकों को नाप लिया। एक बार जब उसके राज्य में बारह वर्ष तक वर्षा नहीं हुई तो राजा ने देवराज इन्द्र से वर्षा करने के लिए कहा किंतु देवराज इन्द्र ने राजा मान्धाता के तप-बल की परीक्षा करने के लिए धरती पर वर्षा नहीं की। इस पर राजा मांधाता ने इंद्र के सामने ही धरती पर वर्षा करके अपनी प्रजा के प्राणों की रक्षा की।
राजा मांधाता ने अंगार, मरूत, असित, गय तथा बृहद्रथ आदि अनेक राजाओं को परास्त करके अपने राज्य का विस्तार किया। उसका राज्य इतना बड़ा हो गया कि सूर्याेदय होने से लेकर सूर्यास्त होने तक सूर्य भगवान जितने प्रदेश में गमन करते थे, उतना प्रदेश राजा मांधाता के अधीन था। राजा मांधाता ने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिए।
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राजा मांधाता ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करने के उपरांत भगवान श्री हरि विष्णु के दर्शनों के निमित्त घनघोर तपस्या की। भगवान विष्णु ने इंद्र का रूप धारण करके तथा मरुतों को अपने साथ लेकर, राजा मांधाता को दर्शन दिए। राजा ने कहा कि मैं अब राज्य त्यागकर वन में जाना चाहता हूँ। इस पर भगवान विष्णु ने राजा मांधाता को क्षत्रियोचित कर्म का निर्वाह करते रहने का उपदेश दिया तथा मरुतों सहित अंतर्धान हो गए। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मांधाता राजा भगवान श्री हरि विष्णु के मनुष्य-अवतार थे। कुछ पुराणों में आई कथाओं के अनुसार वे महाराज युवनाश्व और महारानी गौरी के पुत्र थे। यदुवंशी नरेश शशबिंदु की राजकन्या बिंदुमती राजा मांधाता की रानी थीं जिसे चैत्ररथी भी कहते थे। रानी बिंदुमती से मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुईं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा मांधाता की पचास पुत्रियों का विवाह सौभरि नामक ऋषि से हुआ था। सौभरि ऋषि ने अपने योगबल से अपनी पत्नियों के निवास के लिए स्फटिक के महल बनवाए तथा उन महलों में सब प्रकार के सुख-संसाधन उपलब्ध करवाए। सौभरि ऋषि अपने योग बल से अपनी समस्त पत्नियों के साथ कुछ न कुछ दिन अवश्य व्यतीत करते थे। इन राजकन्याओं से सौभरि ऋषि को 150 संतानें प्राप्त हुईं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा मांधाता संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर स्वर्ग भी जीतना चाहते थे। राजा के इस विचार से देवराज इंद्र सहित समस्त देवता चिंतित हुए। उन्होंने राजा मांधाता को आधे स्वर्ग का राज्य देना चाहा परन्तु उन्होंने आधे देवलोक का राज्य स्वीकार नहीं किया। वे संपूर्ण इंद्रलोक के राजा बनने के इच्छुक थे।
देवराज इंद्र ने कहा- ‘हे राजन! अभी तो सम्पूर्ण पृथ्वी भी आपके अधीन नहीं है, मधुवन का राजा लवणासुर आपका आदेश नहीं मानता और आप सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य मांग रहे हैं!’
देवराज का यह उपालम्भ सुनकर राजा मांधाता लज्जित होकर मृत्युलोक में लौट आए। उन्होंने दैत्यराज लवणासुर के पास दूत भेजकर कहलवाया कि या तो लवणासुर राजा मान्धाता की अधीनता स्वीकार करे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। लवणासुर ने राजा मांधाता के दूत का भक्षण कर लिया। इस पर दोनों ओर की सेनाओं में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया।
लवणासुर के पास उसके पिता दैत्यराज मधु द्वारा दिया गया एक दिव्य त्रिशूल था जो मधु को भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। राजा मांधाता को इस दिव्य त्रिशूल की जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे लवणासुर पर आक्रमण कर दिया और वह धोखे से मार दिया गया।
लवणासुर ने अपने त्रिशूल से न केवल राजा मांधाता को अपितु उसकी सम्पूर्ण सेना को भी भस्म कर दिया। इस प्रकार देवराज इन्द्र ने युक्ति से काम लेकर राजा मांधाता को नष्ट करवा दिया जो सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य करने का आकांक्षी था।
पुराणों में ऐसी बहुत सी कथाएं हैं जिनमें यह बताया गया है कि जिस किसी भी मनुष्य ने सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने का प्रयास किया अथवा स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने का उद्यम किया, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो गया। राजा मांधाता के काल की सबसे बड़ी घटना यह है कि उसके शासन काल में ही धरती पर सतयुग समाप्त होकर त्रेता युग आरम्भ हुआ था।
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—
काशी...